समिधा -56

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समिधा – 56

   प्रशांत वरुण का हाथ थामे अंदर ऑफिस में दाखिल हो गया। उन दोनों के अंदर पहुंचते ही डॉक्टर के साथ ही श्रेया और पारो की भी आंखें उन दोनों की तरफ उठ गई।
    वरुण यह सोच सोच कर हैरान हो रहा था कि उसके इस तरह से ऑफिस में चले आने से पारो पता नहीं उसके बारे में क्या सोचेगी, कहीं पारो के मन में यह ख्याल ना आ जाए कि वह एक अनजान लड़के के साथ बैठकर बातें कर रही है और इसीलिए वरुण वहां चला आया है।
    जबकि वरुण के विचारों से अलग पारो के मन में अलग ही फुलझड़ियां छूट रही थी। वरुण का इस तरह से खुद को देखते हुए पाना उसके मन में कई नई उमंगों को जगा गया था। लेकिन वह अपने इस उत्साह को सभी के सामने दिखाना नहीं चाहती थी, इसलिए वह मुस्कुराते हुए शरमा कर नीचे किताबों में अपनी नजर गड़ाए बैठी थी।
    और उसका इस तरह से मुस्कुराना देख वरुण यही सोच रहा था कि पारो उसकी हार पर मुस्कुरा रही है।
   
” अब कैसी तबियत है आपकी?”

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वरुण का डॉक्टर साहब के सवाल पर पहली बार में ध्यान ही नहीं गया। जब प्रशांत ने उसे कोहनी मारी तब वरुण को ध्यान आया कि डॉक्टर साहब उसी की तबीयत के बारे में पूछ रहे हैं..

” जी !! आपकी दवाइयों से अब मैं काफी स्वस्थ हूं।”

” मेरी दवाइयों के अलावा इनकी दुआएं और सेवा भी आपके स्वस्थ होने का एक बहुत मुख्य कारण है।”

  डॉक्टर के ऐसा कहते ही वरुण मुस्कुरा उठा। वरुण के मुस्कुरातें ही पारो उठ खड़ी हुई…

” मैं आप सबके लिए चाय लेकर आऊँ?”

पारो ने वरुण की तरफ देखकर ही सवाल किया!
और , अपनी आंखों में झांकती पारो की आंखों को सम्मोहित दृष्टि से देखता वरुण बस हां में सर हिला कर रह गया।
    पारो मुस्कुराकर ऑफिस से बाहर निकल गई..

” शी इज़ जीनीयस, बस थोड़ी ओवरकॉन्फिडेंट है।”

डॉक्टर की इस बात पर श्रेया ने भी हामी भर दी…

” थोड़ी नहीं भैया वह बहुत ज्यादा ओवर कॉन्फिडेंट है। अच्छी बात है, कम से कम एग्जाम फोबिया नहीं है उसे.. लेकिन कहीं ये ओवरकॉन्फिडेंस उसे ले ना डूबे।”

श्रेया ने अपनी चिंतित दृष्टि वरुण और प्रशांत की तरफ घुमा दी। लेकिन वरुण को उन दोनों की यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई और वह इस बात का प्रतिरोध करने से खुद को रोक नहीं पाया….

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” आत्मविश्वास!! यह एक ऐसी चीज है जो हर किसी को नहीं मिलती। यह अक्सर जन्मजात होती है। या फिर जो मनुष्य इसे स्वयं के बूते हासिल करता हैं, उसके पीछे उसकी ढेरों मेहनत छिपी होती है।
हर व्यक्ति में कोई ना कोई प्रतिभा छिपी होती है किसी को अपनी प्रतिभा का भान हो पाता है, और किसी को आजीवन अपनी प्रतिभा के बारे में पता ही नहीं चल पाता। लेकिन आत्मविश्वास एक ऐसी चीज है जिससे हम में से अधिकतर इंसान वंचित ही रह जाते हैं। हमने कितने भी गुण हो, प्रतिभा हो लेकिन अपने ऊपर विश्वास कभी नहीं रह जाता और इसीलिए हम बहुत मर्तबा ठोकर खा कर रह जाते हैं।
   पारो प्रतिभाशाली है। और उसे अपनी प्रतिभा का ज्ञान भी है, वह बुद्धिमती है और इस बात पर गर्व नहीं करती, घमंड नहीं करती, बस जानती है कि वह बुद्धि मती है और उसे अपनी बुद्धि का प्रयोग करना भी आता है। वो एक साधारण सी युवती नहीं है, उसका दिमाग वाकई हम सब से अलग चलता है। ये सारी पढ़ाई हम जैसे साधारण विद्यर्थियों के लिए जटिल होगी लेकिन उसके दिमाग के हिसाब से ये बहुत सरल और सामान्य है।
वो एक श्रुतिधर है यानी, उसके दिमाग को बनाने वाले ने ऐसे बनाया है की वो सिर्फ एक बार सुन कर, देख कर या पढ़ कर ही विषयों को याद रख लेती हैं। उसे इस सब के लिए किसी तरह से अलग से मेहनत करने की आवश्यकता नही है। उसके लिए इन सारी किताबों को बस एक बार अपनी आंखों के सामने से निकालने बस की देर है, और फिर इन किताबों में छपा सब कुछ उसके दिमाग में वैसे का वैसा छप जाएगा।
उसने सिर्फ चार महीने की पढ़ाई में हाईस्कूल में पूरे सम्भाग में पहला स्थान बनाया था। और वो चार महीने की पढ़ाई भी ऐसी जिसमें न उसने घर का कोई काम करना छोड़ा और न ठाकुर माँ की सेवा में कोई कोताही की!
मैंने उसे और उसकी मेहनत को देखा…..”

बोलते बोलते अचानक वरुण रुक गया। उसके मन में आया कि ये सब वो कैसे इतनी बारीकी से बता पा रहा है। जैसे वाकई वो रात दिन पारो के साथ ही था। फिर अचानक कुछ सोचते हुए उसने अपनी बात पूरी करी।" वह तो बाद में ओवर कॉन्फिडेंट होगी खुद पर उससे कहीं अधिक मुझे कॉन्फिडेंस है कि पारो ने जो सोच रखा है वह पूरा करके रहेगी। "

” तो फिर ये बताओ वरुणदेव!! जब इतना कॉन्फिडेंस है पारो पर कि वह जो चाहेगी वह करके रहेगी तो फिर उसके एग्जाम के रिजल्ट आने तक तुमने मीठा खाना क्योंकि त्याग रखा है भला।”

  सत्यानाश!! प्रशांत से अपने मन की कोई भी बात बताना सबसे बड़ी मूर्खता है। मन ही मन यह सोचता वरुण डॉक्टर और उसकी बहन के सामने कट कर रह गया। क्या जरूरत थी प्रशांत को इतना बड़बोलापन दिखाने की। और उससे भी अधिक उसे खुद को क्या जरूरत थी, प्रशांत को यह बताने की , कि जब तक पारो का परीक्षा फल नहीं आ जाता वह किसी भी तरह की मिठाई को हाथ भी नहीं लगाएगा।
   वरुण मन ही मन खुद को और प्रशांत को कोस रहा था कि डॉक्टर एक बार फिर चहक उठा।

” अच्छा तो मतलब आप संत स्वामी लोग भी मन्नतें करते हैं?”

” जी नहीं ऐसी तो कोई बात….”

  वरुण अभी डॉक्टर की बात का कोई जवाब दे पाता कि उसके पहले प्रशांत वापस उसकी बात काटकर शुरू हो गया….

” हां डॉक्टर साहब क्यों नहीं करते? आखिर हम भी तो इंसान ही हैं! संत साधु हम बाद में बनते हैं, लेकिन पहले हम भी आपकी तरह हाड माँस के बने इंसान ही हैं। हमारे अंदर भी एक छोटा सा दिल रहता है महसूस करने के लिए।
एक दिमाग है सोचने समझने के लिए और निर्णय लेने के लिए लेकिन हमारा भी दिल उतना ही कोमल है जितना आप सब लोगों का।
   बहुत से ऐसे कार्य होते हैं जो हमारी परिधि से बाहर के होते हैं। और उन कार्यों को पूरा करने के लिए हम भी अपने प्यारे से बाल गोपाल को रिश्वत देते रहते हैं। और इस बार हमारे वरुण देव ने कान्हा जी को यही रिश्वत दी है।
    इन्होंने पूरे सवा किलो लड्डू कान्हा जी को चढ़ाने के बाद उनके सामने हाथ जोड़कर यह प्रार्थना की, कि पारो इस साल जिन भी परीक्षाओं में बैठे उन सभी परीक्षाओं में उसकी विजय हो और अब जब तक पारो मेडिकल एंट्रेंस सेलेक्ट नहीं हो जाती यह किसी भी तरह का मीठा नहीं खाएंगे।
    कुछ ऐसी ही मन्नत जब यह बीमार पड़े थे और अस्पताल में भर्ती थे तब हमारी बहन पारोमिता ने करी थी।”

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   अब चौंकने की बारी वरुण की थी। क्योंकि उसे इस बारे में कुछ भी नहीं मालूम था, कि जब वह अस्पताल में भर्ती था , तब पारो में भी किसी तरह की कोई मन्नत की थी। वह तुरंत चौंक कर प्रशांत की तरफ देखने लगा…

” कैसी मन्नत? कौन सी मन्नत ?तुमने मुझे कुछ बताया नहीं?”

” ना बताने के लिए उस वक्त उसने मुझे कसम दे रखी थी। पारो ने उन पूरे 4 दिन जब तुम अस्पताल में भर्ती थे अन्न का एक दाना भी नहीं खाया। वो भूखी प्यासी कान्हा जी के सामने इसी जिद पर अड़ी थी, कि अगर तुम स्वस्थ होकर आश्रम नहीं लौटे तो वह कभी कुछ नहीं खाएगी।”

” यह क्या बचपना था प्रशांत!! तुम्हें तो उसे समझाना चाहिए था इस तरह अस्पताल में मेरी सेवा करते हुए खाली पेट दिन गुजार देने का क्या मतलब था?”

” तुम ही तो कहते हो ना कि वो बहुत ज़िद्दी  है। और किसी की नहीं सुनती । जब तुम्हारी नहीं सुनती तो मेरी कहां से सुनेगी?”

” पर यह तो सरासर बेवकूफी है।”

वरुण को पारो के इस त्याग के बारे में पहले कुछ नहीं मालूम था। और अब यह सुनने के बाद उसका मन पारो को देखने के लिए छटपटा रहा था।

” अच्छा तुम करो तो त्याग!  कोई और करें तो बेवकूफी! यह कैसा इंसाफ है वरुण? “

” वह बच्ची है प्रशांत !! इस उम्र में ऐसे व्रत करेगी तो उसके शरीर पर क्या असर पड़ेगा?”

” इतनी भी बच्चे नहीं है।  18 साल की हो चुकी है।  हमारा देश भी उसे वोट देने का अधिकार देता है। इसका मतलब समझते हो वह अपने बारे में निर्णय लेने में सक्षम हो चुकी है । और मुझे लगता है तुम से कहीं ज्यादा परिपक्वता से वह निर्णय लेती है। तुम्हें उसके निर्णय का आदर सम्मान करना चाहिए। “

प्रशांत की गहरी नजरें देखकर वरुण प्रशांत की बात समझ गया और झेंप कर दूसरी तरफ देखने लगा।

   लेकिन इस सब के साथ ही बाहर चाय की ट्रे लेकर खड़ी पारो ने भी वरुण की सारी सच्चाई सुन ली थी। एक तरफ तो उसका मन आह्लादित हुआ जा रहा था कि वरुण ने उसके लिए और उसकी परीक्षाओं के लिए मन्नत कर रखी है। और दूसरी तरफ आंखें भीगी जा रही थी क्योंकि जीवन में पहली बार किसी ने उसके लिए भगवान को चुनौती दी थी।
    अपने आराध्य को चुनौती देकर वरुण उसके लिए, सिर्फ उसके लिए मीठा त्यागे बैठा था। वह खुद भी जानती थी कि वरुण को मीठा कितना पसंद था। प्रतिदिन के भोजन के बाद उसे कुछ ना कुछ थोड़ी मात्रा में मीठा चाहिए ही होता था।
    कुछ नहीं मिलने पर वह भोजन के बाद लस्सी ही पी लिया करता था। जिसकी जगह आश्रम के बाकी लोग छांछ पिया करते थे। आश्रम के नियमों के अनुसार छांछ भोजन के बाद सभी को ही दी जाती थी, लेकिन मीठा ना होने की स्थिति में वरुण के लिए लस्सी ही बनाई जाती थी।
   और अब पारो को याद आ रहा था कि पिछले कई दिनों से वरुण ने लस्सी पीनी भी छोड़ दी थी। मीठा भी नही खा रहा था। और इस सब का कारण पारो उसकी बीमारी और परहेज से जोड़ कर देख रही थी।
   उसने धीमे से अपने ऑंसू पोंछे और चाय की ट्रे लेकर अंदर चली गयी।

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    डॉक्टर और श्रेया वरुण और प्रशांत की बात सुनते अचरज में डूबे बैठे थे… उन दोनों के लिये ये बहुत नई और अलग सी बात थी कि दो एक एक दूसरे से अनजान लोग यूँ एक दूजे के लिए कष्ट उठा रहे हैं।

सबको चाय देने के बाद पारो वरुण के सामने ट्रे लिए खड़ी हो गयी, उसने धीमे से अपनी कप उठा कर पारो को देखा , पारो की आंखें छलक उठी। पर उसने अपने आंसूओं को गिरने नही दिया।
वरुण को एकाएक पारो की गीली आंखों का कारण समझ नही आया, उसने वापस उसे देख इशारों में ही कारण पूछा लेकिन पारो ने धीमे से न में सिर हिला दिया….
उसके मन में करुणा का जो स्त्रोत बह रहा था उसे वो किसी को बता पाने में असमर्थ थी।
उसके हृदय की करुणा का अंत न था। कम उम्र में ब्याह के बाद देव की साज सम्भाल में वो जब अपने पति में छिपे प्रेमी को देख पाने वाली थी कि भगवान ने ऐसा वज्रपात किया कि उसका सुखस्वप्न अचानक भंग हो गया।
प्रेम का बीज जो उसके हृदय में बस बोया था देव ने उसे खाद पानी मिल भी नही पाया और वो चला गया, लेकिन फिर अचानक वरुण के सानिध्य में ऐसा कौन सा अपनापन था कि वो बीज वापस अंकुरण को तैयार होने लगा था।
वरुण के साथ रहने पर उसे यही आभास मिलता की वो देव के साथ है। आंखें बंद करने पर तो लगता ही नही की सामने कोई और है।
यहां तक कि वरुण के पास से आने वाली भीनी सी महक भी उसे देव की ही लगती, वरुण का स्पर्श , उसकी आँखों की चावनी, उसका बोलते हुए बीच में अचानक रुक जाना, उसका दूर से खड़े होकर उसे अपलक निहारना… हर बात में तो देव शामिल होता था।
अब तो उसे कई बार यूँ लगने लगा था कि वरुण की हर हरकत उसके हर क्रियाकलाप के पीछे उसका देव ही हाथ बांधे खड़ा मुस्कुरा रहा है।
और तभी तो वो वरुण के और करीब जाने को इतनी उतावली हो उठी थी।
पर अब उसे अपने मन को बांधना होगा, अब उसे अपने जीवन का लक्ष्य मिल चुका है। और उस लक्ष्य की प्राप्ति तक अब उसकी राह में कोई रुकावट न आये यही उसकी चाह थी।
ईश्वर के घर रहते हुए भी अब उसका किसी बात के लिए हाथ फैलाने का मन नही करता था। वो सामने से होकर कृष्ण को रिश्वत ही देती आयीं थी।
आज भी उसने वही किया …….

” मेरे तीन दिन भोजन न करने से तुमने उन्हें (वरुण) स्वस्थ कर दिया था, अब उन्होंने मेरी परीक्षाओं के लिए मीठा खाना छोड़ रखा है, अगर इस बार उनकी मन्नत पूरी नही की तो तुम्हारा ये मन्दिर ये आश्रम छोड़ कर हमेशा के लिए चली जाऊंगी।
अगर मैं अपनी परीक्षाओं में सफल नही हो पाई तो न मैं अब तुम्हें मुहँ दिखाउंगी और न उन्हें।”

अपनी प्रतिज्ञा मन ही मन दुहराती वो वापस श्रेया के पास जा बैठी, और अपने मन में चल रही शंकाओं और सवालों को उससे पूछने लगी। श्रेया ने अपने साथ रखी पुस्तकें और बाकी का स्टडी मटेरियल उसके हवाले किया और उसे पढ़ने और याद रखने के नुस्खे बताने लगी।
उसके साथ बातों में डूबी पारो का फिर वाकई ध्यान न वरुण पर रहा और न वहाँ बैठे बाकियों पर।

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डॉक्टर नन्दकिशोर वरुण और प्रशांत से बातों में लगा रहा पर रह रह कर वरुण का ध्यान पारो पर चला जा रहा था जो अपने और अपनी किताबों में मगन नज़र आ रही थी…..

क्रमशः

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aparna…..

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

19 विचार “समिधा -56” पर

  1. पारो के लिए वरूण की भावनाएं खुलकर दिखाई देने लगी है पर ये सब वरूण ना होकर देव ही करता है। कभी कभी हैरानी भी होती है कैसे वरूण पर देव का दिल हावी हो जाता है।❣️❣️

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  2. कितना अच्छा लगता होगा जब कोई आप पर इतना विश्वास करे। ऐसा लग रहा अब स्वयं कृष्ण पारो के साथ हो लिए हैं। पारो की क्षमता अतुल्य लग रही है, अब तो चयन पक्का है जब वरूण ने भी रिश्वत दे दी है😀। लेकिन चयन के बाद तो वह पढ़ने चली जायेगी 4 -5साल के लिए।

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