समिधा -57

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            समिधा – 57

    वक्त को बीतते वक्त नहीं लगता!! वह यह नहीं देखता कि आप उसके साथ भाग पा रहे हैं, या नहीं लेकिन उसे अपनी गति से आगे बढ़ना ही है! अगर आप उसके साथ दौड़ने में सक्षम हैं, तो आप सफल हैं। लेकिन अगर आप उसके साथ नहीं दौड़ आते तो यह आपकी कमी है, वक्त कि नहीं, वह आप को पीछे छोड़कर आगे जरूर निकल जाएगा।

     आश्रम में सभी की दिनचर्या अपने ढंग से चल रही थी। लेकिन वह एक सबसे अलग अनोखी ही थी जिसके एक पूरे दिन में 24 की जगह 40 घंटे जुड़ चुके थे।
    अपने हर काम को समय पर करने के साथ ही वह अपनी पढ़ाई से भी टस से मस नहीं होती थी। वह कब सुबह जागती और किस वक्त रात में सोया करती, किसी के पास इस बात का कोई हिसाब नहीं था। ऐसा लगने लगा था जैसे पारो इंसान नहीं किसी दूसरे ग्रह से आई कोई प्राणी थी, जिसे ना भूख प्यास सताया करती थी और ना नींद। ऐसे सारे परपंच, इंसानी कायदे कानूनों की धज्जियां उड़ाती वो अपनी पढ़ाई में मगन थी। अब बस यही पढ़ाई ही उसके पास एक साधन बचा था जिससे वह अपने जीवन को पटरी पर ला सकती थी।
   शाम को अपनी सहेलियों के साथ सरोवर की सीढ़ियों पर बैठकर पढ़ते-पढ़ते एक-एक कर उसकी सहेलियां उठ कर चली जाती, लेकिन पारो अंधेरा होने के बाद बत्तियां जलने पर भी वहीं बैठी पढ़ती रह जाती। शाम को जब मंदिर की घंटियां बजती और आरती करने के लिए लगभग पूरा आश्रम कृष्ण मंडप की ओर चला जाता तब भी पारो अपनी किताबों से सर नहीं उठाती। रात को सब सखियां सो जातीं, कमरें की बत्तियां बुझा दी जातीं तब वो भगिनी आश्रम के प्रांगण में जा बैठती क्योंकि वहाँ की बत्तियां रात भर जला करती थीं।

   उसके लिए अब उसका मंदिर उसका कृष्ण उसकी किताबें हो चुकी थी। उसका बस चलता तो वह खाना खाने के लिए भी नहीं उठती, लेकिन स्वयं खाने से पहले उसे वरुण को खाना परोसना होता था और यह उसकी जिम्मेदारी नहीं उसकी आदत हो चुकी थी। और इसलिए सुबह और शाम दोनों वक्त पर वरुण के भोजन को परोसना उसके आहार में उसके स्वास्थ्य के अनुरूप भोजन शामिल है कि नही जांचना परखना और उस तक थाली लेकर जाना पारो का नित्यकर्म हो गया था। यही एक काम वह हृदय से अपनी मनमर्जी से और प्रसन्नता से किया करती थी। इसके अलावा  पद्मजा दीदी उसे जो जो काम बताया करती वह सब दिनचर्या का हिस्सा मान खुशी से निपटा जाती। उन कामों से उसकी पढ़ाई पर कोई बाधा नहीं पड़ती। बल्कि जिस दिन जितना ज्यादा काम बताया जाता उस दिन वह अपनी उस रात की नींद में उतने घंटों की कटौती करके अपनी पढ़ाई के समय के हर्जाने को पूरा कर लेती। धीरे धीरे उसके सोने वाले कमरे के चारपाई की पीछे वाली दीवार पर उसके लिखे पर्चे चिपकने लगे थे। इन पर्चो में कुछ वह कठिन सूत्र लिखे होते जिन्हें पारो या तो ठीक से याद नहीं रख पा रही थी, या इन्हें प्रयोग करने में कहीं चूक जाया करती थी। और ऐसे सारे कठिन सूत्रों को उसने लिखकर अपने सिरहाने चिपका रखा था। जिसे सुबह उठते ही एक बार उन्हें एक नजर देख लिया करती थी।
   
  पारो के लिए बचपन से शिक्षा महत्वपूर्ण थी, लेकिन उससे अधिक उसे पढ़ाई रुचिकर लगा करती थी, इसलिए वो पढ़ती थी। पर अब उसके लिए शिक्षा उसकी साधना हो चुकी थी।
   और जब किसी व्यक्ति की रुचि में उसकी साधना जाग जाए तो सफलता स्वयं चल कर उस तक पहुंचना निश्चित है।

     अब पारो के लिए एक एक पल महत्वपूर्ण था, वो कहीं किसी बिंदु पर अपना एक पल भी व्यर्थ नही करना चाहती थी, और इसी सब में आजकल उसका ध्यान वरुण पर भी नही जाता था।
   वो अक्सर अपने सूत्र रटती हुई या मन ही मन किसी पाठ को स्मरण करती वरुण के सामने से निकल जाती और वो चुपचाप उसे देखता रह जाता।

  अब भी वो वरुण के प्रवचन की तैयारी करती पर अब सब कुछ पलक झपकते रख कर वो फटाफट अपनी किताब लिए निकल लेती। वरुण बस उसे जाते हुए देखता रह जाता।
   कल तक यही लड़की उसके आगे पीछे घूमती उसके मन की चिंता का कारण बनने लगी थी। वरुण के मन में डर बैठने लगा था कि पारो का इस कदर उसकी देखभाल करना आश्रम की आंख में न चुभ जाए।
  वो उससे इस बारे में बात करने की सोच रहा था कि उसे बिना कोई मौका दिए वो अपनी किताबों की दुनिया में खो गयी।
    और इस कदर खोई की वरुण से जुड़ी आवश्यकताओं के अलावा अब वो वरुण को देखने तक का समय भी नही निकाल पा रही थी।
  उसकी ये लगन देख कर वरुण  खुश था, बहुत खुश। और उसे  प्रसन्न होना भी चाहिए था पर कहीं न कहीं वो इस सब में पुरानी वाली पारो को बहुत शिद्दत से मिस करने लगा था।

    वो जब तब मौके ढूंढता कि उसे पारो कहीं तो कभी तो इधर उधर अपना वक्त गंवाती दिख भर जाए और फिर उसे सौ सौ उलाहने सुना कर वो अपने मन की सारी भड़ास उस पर निकाल ले, लेकिन न पारो उसे वो मौका दे रही थी और न वक्त…
  ऐसे ही एक दोपहर दर्शन पारो से मिलने चला आया।
  ऑफ़िस से बालक ने भाग कर भगिनी आश्रम जाकर ये खबर दी और पारो उसी के पीछे तेज़ तेज़ कदमों से सीढियां उतरती उतने ही तेज़ कदमों से ऑफ़िस की तरफ बढ़ती चली गयी। कृष्ण मंडप में प्रशांत के साथ किन्हीं बही खातों के हिसाब में डूबे वरुण को जैसे ही ये दिखा की पारो ऑफ़िस की तरफ जा रही है वो भी अपनी जगह से उठा खड़ा हुआ।
   प्रशांत ने उसे एक नज़र देखा…

“बस अभी आया, वो ज़रा कुछ काम याद आ गया।”

“कौन सा काम याद आ गया? काम का काम ही तो कर रहे हैं। ” प्रशांत के इस तरह टोक देने से झुंझलाहट चेहरे पर लाते हुए भी वरुण वहाँ से निकल गया, और प्रशांत मन ही मन वरुण की हालत समझता मुस्कुरा कर रह गया…

” जब वो खुद तेरी तरफ आ रही थी तब तुझे दुनियादारी नज़र आ रही थी, और अब जब वो तुझे भूल कर अपने में व्यस्त है तो तुझे चैन नही है। यही तो प्यार है, जो तुम दोनों के मन में है पर तू अपने मिथ्या अभिमान में नही स्वीकारेगा और वो अपने सच्चे स्वाभिमान में “

   मन ही मन सोचता प्रशांत वापस बही खातों में झुक गया।

  उधर ऑफ़िस की सीढ़ियां वरुण चढ़ ही रहा था कि उसे ऑफ़िस से निकलता दर्शन दिख गया।
कहाँ तो वरुण ने सोचा था पारो और दर्शन बैठ कर गप्पे मारतें दिखेंगे तो पारो को लंबी चौड़ी सी बात सुना लूंगा की यहाँ बैठे गप्पे मार कर समय की बर्बादी करने से अच्छा कुछ देर मेरा प्रवचन भी सुन लिया करो पर यहाँ तो पासा ही उल्टा पड़ गया था।
   दर्शन का बैठना तो दूर वो तो शायद खड़े खड़े ही पारो का हालचाल ले वापस मुड़ने को था।

“अरे दर्शन इतनी जल्दी चल दिये। ज़रा बैठोगे भी नही।”

“नही दादा! अब वक्त कहाँ हैं? वो तो बऊ दी को ये कुछ प्रश्नपत्र देने थे। बस वही देने आया था, वो दे दिए अब निकलता हूँ।”

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  वरुण दिल से चाहता था कि दर्शन कुछ घड़ी और ठहर जाए और कम से कम इसी बहाने वो पारो का साथ भी पा सके..

“अरे कम से कम चाय तो पीते जाओ। इतनी दूर से आते हो। स्टेशन से आये और चाय तक पिये बिना निकल गए। बाकियों का नही कह सकता पर मुझे अच्छा नही लगेगा। “

“दादा !! ”  बोलता दर्शन वरुण के पैरों पर झुक गया..

“आप आदेश कीजिये, मैं वही करूँगा जो आप कहेंगे। आप से पहले कहा है या नही पर मुझे सदा से आपमें मेरे देव दा नज़र आतें हैं। इसलिए आप जो भी कहतें हैं मुझे सब अच्छा लगता है।”

  दर्शन वहीं बैठ गया, उसे बैठते देख पारो असमंजस में खड़ी रह गयी। वो भी समझती थी कि दर्शन इतनी दूर से सिर्फ उससे मिलने, उसका हालचाल जानने और उसके लिए नोट्स देने आता है। ऐसे में कम से कम कुछ घण्टे यहाँ आराम कर के जा सकता है। पर पारो यह भी समझती थी कि अगर वो दर्शन को चायपानी के लिए रोकेगी तो उसके लिए यह सब जुटाने की ज़िम्मेदारी भी पारो की ही होगी। और अगर एक बार वो अपने किसी मेहमान के लिए कुछ करने रसोई में घुसी तो पद्मजा दीदी उसे उसके रोजाना के काम के अलावा फिर और न जाने कितना सारा काम पकड़ा देंगी। और इस सब में वक्त का जो हर्जाना होगा वो अब परीक्षा के ठीक पांच दिन पहले झेलने की उसकी हिम्मत नही थी।
    पहले तो वो अपने सोने के घण्टो में कटौती कर लिया करती थी, पर अब परीक्षा के ठीक पहले उसके दिमाग को भी पर्याप्त आराम की ज़रूरत थी, ये वो भली प्रकार जानती थी।
  उसे मालूम था अगर दिमाग ने पर्याप्त आराम नही किया तो पढ़ा लिखा सब यूँ ही बह जाना था। जितनी मेहनत से तैयारी की थी उतनी ही सुघड़ता से उस सब को परीक्षा पुस्तिकाओं में उतारना भी ज़रूरी था।
   इसलिए वो दर्शन से चाय के लिए भी नही पूछ पायी थी पर वरुण के ऐसा करते ही उसका मन खिल उठा…

“आप लोग बैठिये मैं चाय लेकर आती हूँ।”

“नही तुम भी बैठो। चाय तो कोई भी ले आएगा। “

  और वरुण ने वहीं टहलते एक बालक को रसोई में चाय के लिए कहने भेज दिया…
  पारो मन ही मन प्रसन्नता से भरी बैठी थी कि कैसे वरुण हमेशा उसकी समस्याओं को चुटकियों में वैसे ही सुलझा जाता है जैसे उसका देव सुलझा जाता था…
   वो सोच रही थी कि दर्शन ने उसी से कहना शुरू कर दिया…

” बऊ दी ! ये सारे पुराने प्रश्नपत्र हैं, एक बार आप इन पर भी सरसरी नज़र फिरा लीजियेगा। वैसे मैं जानता हूँ, आप पूरी किताब पढ़ कर जाने में विश्वास करती हैं। लेकिन इस बार आपको समय बहुत कम मिला है। इसलिए मैंने सोचा कि ये प्रश्नपत्र आपके कुछ काम आ जाएंगे।”

“कुछ नही बहुत काम आएंगे। अब पढ़ाई तो सारी हो चुकी है। अब मैं इन प्रश्नपत्रों को हल करने का काम ही करूँगी… घड़ी पर समय लगा कर कि ठीक तीन घंटों में मैं कैसे प्रश्नपत्र हल कर पाती हूँ।”

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  वरुण चौंक कर पारो की तरफ देखने लगा…. उसने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। वो भी अपनी शैक्षणिक योग्यताओं में श्रेष्ठ था। पर उसने इस हद तक जाकर कभी पढ़ने की सोची भी नही थी।
    मतलब लिख कर भी ऐसे पढ़ाई की जा सकती है ये उसके लिए बहुत नया था। ऐसे तो छोटे बच्चों को पढ़ाया जाता है पर सही बात है अगर इस हद तक कोई पढ़ाई करेगा तो जाहिर है उसके लिए परीक्षा किसी तरह की दुर्गम चढ़ाई नही बल्कि एक मजेदार खेल हो जाएगा।
     अब तक आश्रम से एक दीदी उन सबके लिए चाय लेकर वहीं चली आयीं। उन्होंने मुस्कुरा कर सबको चाय दी और नाश्ते की प्लेट टेबल पर रख चली गईं। चाय पीते हुए वरुण दर्शन से उसकी तैयारियों का जायज़ा भी लेता रहा। दर्शन भी मेडिकल के लिए ही तैयारियों में लगा था। उसका तैयारियों का ये दूसरा साल था। वो वैसे भी पारो से एक साल आगे था उम्र में भी और पढ़ाई में भी।
   दर्शन भी अति उत्साह से वरुण को अपनी तैयारियां बताता जा रहा था, और इस सब के बीच सबकी नजर चुरा कर वरुण पारो को भी देख लिया करता था।
  पर पारो वहाँ उन सब के साथ बैठ कर भी नही थी। उसके हाथ में वो प्रश्नपत्र थे और उन्हें हाथ में थामे वो एक अलग दुनिया में पहुंच चुकी थी। जहाँ वो सभी सवालों के जवाब सिलसिलेवार बनाती जा रही थी। एक भी सवाल अब तक ऐसा नही आया था जिसमें वो अटकी हो और इसलिए वो एक कुशल धावक सी एक सवाल से दूसरे सवाल की रुकावट को पार करती भागती चली जा रही थी।
  एक के बाद दूसरा दूसरे के बाद तीसरा प्रश्नपत्र हल करती वो अपने में ऐसी खोई बैठी थी कि उसे भान ही नही था कि दर्शन ने उसे दो बार आवाज़ लगाई की अब वो जाना चाहता है।
   आखिर दर्शन ने पारो के कंधे पर हाथ रख धीरे से उसे झकझोर दिया…”बऊ दी आमी जाच्छी!”

” हम्म ! “चौंक कर पारो ने दर्शन की तरफ देखा और उसके चारो तरफ घूमता उसके सवाल जवाब का संसार क्षण में गायब हो गया।

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“ठीक है दर्शन! कुशलता से जाना और अपना ख्याल रखना।”

  इतनी देर से वरुण और दर्शन के संग बैठी पारो के मुहँ से बस इतने ही बोल फूटे।
  दर्शन ने उसे प्रणाम करने के बाद वरुण को प्रणाम किया और वहाँ से निकल गया। जाते जाते वो पल भर को ठिठक कर खड़ा हो गया। उसने मुड़ कर एक बार वापस उन दोनों को देखा और उसे लगा जैसे उसके देव दा बऊ दी के साथ खड़े हाथ हिला कर उसे आशीर्वाद देते खड़े हैं।
    उसके दिल में एक चाह सी उठी कि क्या कोई ऐसी तरकीब हो सकती है जिससे वरुण दा उसकी पारो बऊ दी से ब्याह रचा लें।
   मन में ये विचार आते ही आनन्द की एक लहर उसके मन मस्तिष्क पर छा गयी लेकिन कुछ पलों में ही उसका स्वप्न धराशायी हो गया।
   वो इतने बड़े संत हैं वो क्यों अपना गरिमामयी पद त्याग कर ऐसा करेंगे। अपनी सोच पर क्षुब्ध सा वो वापस चल पड़ा।

   पारो की प्रसन्नता का आज ओर छोर न था। उसने दर्शन के जाने के बाद अपने प्रश्नपत्रों की पोटली हाथ में टांगी और चाय के कप समेटे रसोई की तरफ बढ़ने लगी। जाते जाते वो वरुण के सामने थम गई….

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उसने वरुण की तरफ देखा, वरुण ने उसे देखा…
….. और सिर्फ आंखों ही आंखों में वरुण के सिंचित कर रखे ताने उलाहने सारे बह गए….. पारो दर्शन को कुछ देर ठहरा कर चाय पिला कर भेजना चाहती थी जो वरुण ने करवा दिया था वो इसलिए आंखों से उसका एहसान अदा कर रही थी….
……और वरुण पारो के साथ दो घड़ी सुकून से बैठना चाहता था जो आज उसे बड़े दिनों बाद नसीब हुआ था इसलिए वो भी खुश था।
… दोनों एक दूसरे की आंखों में डूबे कुछ घड़ी यूँ ही खड़े रह गए…….

क्रमशः

aparna….

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लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

25 विचार “समिधा -57” पर

  1. पारो को परीक्षा के लिए ईतनी लगन से पढ़ते देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। अब जबकि पकड़ो अपनी पढ़ाई का चलते वरुण की तरफ ध्यान नही दे पा रही है तो वरुण बेचैन हो रहा है और पारो से बात करने के बहाने ढूंढ रहा है।

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  2. दरअसल घर में अब भी बच्चों को यूं ही प्रश्न पत्र बनाकर और उसे नियत समय पर हल करने के लिए दिए जाते हैं। और यह ठीक परीक्षाओं से पहले किया जाता है तो पारो को भी ऐसा करते देख बहुत खुशी हुई और आज जो पारो और वरूण को खुश देखा तो उनकी खुशी देख बहुत ही ज्यादा ख़ुशी हुई 🤗🤗❣️

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