समिधा – 58


समिधा – 58

     आते आते आखिर वो दिन भी आ गया। आज से पारो और उसकी सखियों की परीक्षाएं शुरू थी। सविता सुबह से कृष्ण मंडप में बैठी बस भगवान से खुद को पास करवा देने की प्रार्थना में लगी थी।
   अपना ज़रूरी सामान अपने झोले में डाल पारो भी झटपट सीढियां उतरती नीचे चली आयी।
   नयना और मधुलिका के साथ वो भी मंडप की ओर बढ़ गयी।
   सभी ने एक साथ सामने मुरलीवाले के आगे हाथ जोड़ दिए। मन ही मन प्रार्थना करती नयना और मधुलिका की भी आंखें बंद थीं लेकिन पारो ने झट अपनी आंखें खोल इधर उधर किसी को ढूंढना शुरू कर दिया।


  
  ” चलें , अब तो प्रभु का आशीर्वाद भी ले लिया?”   नयना के सवाल पर बाकी तो दोनों ने हाँ कह दिया पर पारो अब भी चकित दृष्टि से इधर उधर देखती रही।

“क्या हुआ ? तू किसे ढूंढ रही है पारो?”

“मेरे द्वारिकाधीश को!”

“ये सामने तो हैं…!” सरिता के मूर्ति की ओर इशारा करते में पारो को दूसरी तरफ से आता वरुण नज़र आ गया….

“आ गए….”वरुण को देखते ही उसने धीमे से कहा और सीढियां उतर उसके सामने पहुंच गई।

“आशीर्वाद दीजिये, कि आपके विश्वास को विजय दिला पाऊं?”

   पारो की आत्मविश्वास से चमकती आंखें देख वरुण की आंखों में भी प्रसन्नता की शहनाई गूंज उठी….. उसकी आँखों की कोर आंखें मुस्कुराने लगी…

“तुम पारस हो पारो, जिसे छुओगी सोना बन जायेगा। निश्चित तुम्हारी विजय होगी।”

  होंठों ही होंठों में बुदबुदाते वरुण की बात आसपास कोई और नही सुन पाया और पारो वरुण के पैरों पर झुक गयी।
   अपने दोनों हाथों को वरुण के दोनों पैरों पर कुछ देर रख कर उसने आंखें मूंद लीं।
   उसे लगा ये देव की छुअन है, उसी का स्पर्श है…. और उस स्पर्श से जागी तरंगे उसके पूरे शरीर में एक ऊर्जा बन दौड़ गयी।
    उस स्पर्श को अपने माथे से लगाने के बाद वो उठने ही वाली थी कि वरुण ज़रा सा पीछे हटा और उसके पैर के नीचे की धूल उठा कर पारो ने माथे से लगा ली।
   वो उठी और प्रसन्नता से अपनी सखियों को साथ लिए अपने विद्यालय की ओर बढ़ गयी।     

*****

एक एक करती सारी परीक्षाएं निबटती गयीं। और अंतिम परीक्षा का भी दिन आ गया। उस दिन स्कूल से आते ही चारों लड़कियों की प्रसन्नता का ठिकाना नही था। एक तो अंतिम पेपर और उस पर आसान आया था, सभी अपने में मगन गाती गुनगुनाती ऊपर अपने कमरे की ओर बढ़ गईं थीं।
   अपने परीक्षा के अनुभव और अब आगे भविष्य में क्या करना है आदि की चर्चाओं में सभी व्यस्त थीं कि नीचे से एक दीदी उन चारों को खाने के लिए बुलाने आ गयीं।

“चलो तुम्हीं चारों का भोजन बाकी है, चल कर खा लो फिर रसोई समेट लेंगे हम।”

सरिता ने हाँ में सिर हिलाते बड़ी आस से पूछ लिया…

“दीदी आज खाने में क्या बना है?”

“वही मूंग की दाल और लौकी की सब्जी। चावल और रोटियां दोनो ही है तुम लोगों को जो खाना हो देख लेना।”

  सरिता का मुहँ ज़रा सा हो गया। दुनिया वाले भले उन्हें सुस्वादु भोजन खाने के योग्य न मानें पर उनकी भी तो जिव्हा थी जहाँ किसी ज़माने में छप्पन भोग भी सजते थे। पुरानी आदतों को त्याग देना इतना आसान होता है क्या?”

  मन मार कर चारों रसोई की तरफ बढ़ गईं।रसोई का काम निपटा कर लगभग भगिनी आश्रम की महिलाएं दोपहर के आराम के लिये अपने कक्ष की ओर जा चुकी थीं। वहाँ इस वक्त इन चारों के अलावा उन्हें। बुलाने गयी दीदी ही थी।

“मैं परोस दूँ। तुम लोग कहो तो भोजन गर्म कर देती हूं , थोड़ा स्वाद लगेगा वरना मूंग ठंडी अच्छी नही लगती।”

“मुझे तो गर्म भी अच्छी नही लगती है दीदी। अब जैसी है खाना तो है ही,हम खुद परोस लेंगे और खाने के बाद रसोई साफ कर देंगे। आप भी जाकर आराम कर लीजिए।”
     पारो की बात पर मुस्कुरा कर वो दीदी एक ओर खड़ी रह गईं और ये चारों लड़कियां अपना खाना परोसने लगीं….
   लेकिन भगोने खोलते ही चारों के चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी…
   पहले ही भगौने से धनिये गरम मसाले की खुशबू में तरबतर हरे चने का निमोना रखा था। दूसरे में सूखे  बैंगन तले हुए दिख रहे थे और टमाटर से छौंकी गरम दाल पर तैरता घी और  गरम चावलों से निकलती भाप  उन चारों को जैसे मुस्कुराने को बाध्य कर गयीं।
  सविता तुरंत भाग कर दीदी के गले से लग गयी…

“आज इतना सुस्वाद भोजन कैसे बनाया दीदी।”

“तुम चारों के अंतिम पेपर की खुशी में ।”

  पद्मजा दीदी रसोई में घुसती हुई बोल पड़ीं।

” भई हमारी बहने इतनी मेहनत कर रहीं तो कुछ तो हमारा फ़र्ज़ भी बनता है ना। खाना खा लो उसके बाद तुम्हारे ही शब्दों में एक और सरप्राइज है तुम लोगों के लिए।”

  और मुस्कुरा कर पद्मजा दीदी वही रखे पीढ़े पर बैठ गईं। चारों सखियां हंसती मुस्कुराती खाना परोस कर खाने बैठ गयी।
  उन लोगों का खाना समाप्त होने से पहले ही दीदी ने चार कटोरियों में निकाल रखी खीर भी लाकर उन सबके समक्ष परोस दी। उन सबकी खुशी का ठिकाना नही रहा।

   पारो ने अपने हाथ में खीर की कटोरी उठायी और खाने को थी कि उसे याद आ गया उसका परीक्षाफल आने तक वरुण ने मीठा न खाने की कसम उठा रखी है। इसका मतलब वरुण ने भी ये खीर नही खाई होगी…..
   जब उसके सेलेक्शन के लिए वरुण ने मीठा छोड़ रखा है फिर वो कैसे खा सकती है?  यही सोच उसने कटोरी नीचे रख दी।

” क्या हुआ पारो?तू खीर नही खाएगी?”

सरिता के पूछने पर उसने न में सिर हिला दिया।

“अरे बहुत स्वाद बनी है,ज़रा चख के तो देख। आज पद्मजा दीदी ने वो भुने बादाम और भुनी पोस्त का पाउडर डाल कर मस्त केसरिया खीर बनाई है। देख केसर का क्या खूब रंग आया है। एक चम्मच तो चख के देख बहन। आज की खीर अमृत है अमृत,बिल्कुल लग रहा जैसे…”

“नही सरिता!! मेरा पेट भर गया है अब एक चम्मच भी और खाया तो फट जाएगा।”

“कोई बात नही पारोमिता!! ढक कर अपने पास ही रख लेना, और बाद में खा लेना।”

पद्मजा दीदी की बात पर हामी भर पारो उठ खड़ी हुई। चारों ने रसोई समेट कर साफ सुथरी कर दी और वहाँ से अपने दोपहर के ठिकाने पर चल निकली।
  सरोवर के किनारे किनारे आगे बढ़ने पर घने पेड़ और झाड़ियों से घिरा पथरीला सा स्थान था। वहाँ सरोवर के ठीक किनारे होने से पानी से उठने वाले ठंडी हवा के झोंके भी आते थे।
    वो एक पुरानी बड़ी सी शिला थी जिसके बिछे होने से वहाँ समतल चौरस जगह बन गयी थीं,वहीं रोज़ दरी चटाई बिछा कर चारों पढ़ाई किया करती थी। आज भी चारों वहीं पहुंच गईं। 
       आपसी बातचीत में लगी चारों आज खुश थीं। कुछ समय बीतने के बाद पारो उठ कर जाने को हुई…

“क्या हुआ तू कहाँ चल दीं?”

“मौजमस्ती का समय खत्म। अब पढ़ाई शुरू करने जा रही हूं।”

“अब कौन सी पढ़ाई?”

“मैंने पीएमटी का फॉर्म भी डाल रखा है ना। उसके लिए भी तो पढना है।”

“अरे उसमें कौन सा इस साल सेलेक्शन हो ही जाना है। छोड़ न, इस साल तो बस आइडिया लेने के लिये दे देना। अगले साल अच्छे से तैयारी कर के देना। समझी।”

  पारो मुस्कुरा उठी, वो कैसे किसी को समझाती की उसके लिए ये इम्तहान नही उसके जीवन मरण का प्रश्न था।
   आती हूँ कहकर वो वहाँ से निकल गयी….

********

” कृष्ण हमेशा से न्याय के पक्षधर रहे। उन्होंने कभी किसी के साथ अन्याय नही होने दिया। स्वयं के साथ भी नही।
    शिशुपाल वध इसी का उदाहरण है। आप में से कइयों के मन में ये संशय कभी न कभी पैदा हुआ होगा कि वो तो स्वयं भगवान थे तो आखिर अपने भाई को उसकी सौ गलतियों के बाद भी माफ करने का माद्दा रखने की जगह उसे मौत क्यों दी। उन्होंने अपना भगवानपन क्यों नही दिखाया और बड़ा दिल रख कर उसे माफ क्यों नही किया।
  तो इसका जवाब यही है कि अत्याचार सहने की भी एक सीमा निर्धारित होनी चाहिए क्योंकि ये आपका शरीर भले ही हो पर बनाया तो उस सर्वशक्तिमान ने है जिसे हम अपना  सृजनकर्ता मानते हुए खुद को उसकी संतान मानते हैं। तो जब उसके बनाये संसार का हम अपमान नही करते और न सहते हैं तो उसी के बनाये हमारे शरीर का अपमान हम क्यों सहें। सिर्फ इसलिए कि अपमान करने वाला हमारा ही कोई नातेदार है हम बार बार अपनी फजीहत नही करवा सकते और बस यही समझाने के लिए उन्होंने भगवान होते हुए भी,बड़े दिल के स्वामी होते हुए भी अपने ही भाई को उसकी सौ गलती के बाद मृत्युदंड दिया।
   कि भाई भले ही तुम मेरे भ्राता हो तुम्हारा मेरे शरीर को गालियां देने का हक बनता है , लेकिन तुमसे अधिक हक तो मेरा स्वयम का मेरे शरीर पर है जिसकी मैं आराधना करता हूँ तो एक सीमा से बाहर मैं संसार में किसी को ये हक नही देता की वो मुझे अपमानित करे।
   श्री कृष्ण अगर यह समझा रहें हैं तो हम उनकी बात क्यों नही समझ पाते हैं । हम क्यों लोगों को मौके देते हैं कि वो हमें क्षण क्षण पर अपमानित करते चले जाएं।
    मैं आज इस प्रवचन के माध्यम से हमारे आश्रम की महिलाओं से कहना चाहता हूं कि आप भी उसी कृष्ण का सृजन हैं जिसका मैं और इसलिए आप भी हकदार हैं पूरे सम्मान की।
    अपने शरीर को मंदिर समझ कर उसका सम्मान कीजिये और उसे बिना ज़रूरत के कष्ट मत दीजिये, ना ही शारीरिक न मानसिक।
   अगर आप लोगो को सहीं लगे तो अबसे पूरे आश्रम के लिए समान भोजन बनेगा और आश्रम के पुरुष और महिलाएं साथ बैठ कर भोजन करेंगे। 
   जिस दिन महिलाओं का व्रत होगा उस दिन व्रत में खाया जाने वाला भोजन बनेगा और आश्रम का हर एक सदस्य उसी भोजन को खायेगा। यानी अगर महिलाएं व्रत के दिन सिर्फ शाम को आहार लेती हैं तो सिर्फ शाम में ही भोजन बनेगा और हम सब भी शाम को ही प्रसादी पाएंगे। “

   श्रद्धालुओं के पीछे बैठी भगिनी आश्रम की महिलाओं के चेहरे पर अचरज के भाव थे। उन लोगों के लिए ये बहुत बड़ी बात थी कि आश्रम के एक दयालु संत उन सभी के बारे में इतना सोच रहे थे। क्योंकि उनमें से कई एक तो ऐसी थी  जो असल में व्रत रखना ही नही चाहती थीं पर आश्रम की परिपाटी के कारण व्रत करने को मजबूर थी। उनके चेहरों पर मुस्कान खिल उठी और सबसे पीछे एक मीनार की टेक लगाए खड़ी पारो ने वरुण को देखा , वरुण ने पारो को।
  पारो की आंखें मुस्कुरा रही थी और आंखों ही में उसे अभिवादन करते हुए आभार व्यक्त कर रही थी, और वरुण की आंखें उस अभिवादन आभार का भार उठाती झुक कर मुस्कुराने लगी….

क्रमशः

  दिल से …..

    हां अब सोच लिया है कि छोटा ही सही पर दिल से लिखूंगी ज़रूर।

  मैं बहुत छोटी थी तब मुझे बहुत से व्रत त्योहारों का पता ही नही होता था। सच कहूं तो कॉलेज में आने के बाद भी मुझे छठ जैसे अनोखे व्रत के बारे में कुछ भी मालूम नही था।
   अब सोचती हूँ क्या मेरी क्लास  में कोई बिहारी बंदा/ बंदी नही था। शायद नही ही रहा होगा। पर अभी कुछ सालों में छठ का जैसे एकदम से फैशन सा आ गया है।
   हमारी टाउनशिप में भी औरतें बहुत सुंदरता से व्रत की कठिनाइयों को किनारे कर सूरज की दोनों वक्त की पूजा और अर्ध्य ज़रूर करती हैं।
  हमारे टाउनशिप में कुल जमा सात स्विमिंग पूल हैं जिनमें कमर तक डूबी सुहागन स्त्रियों का सूरज को अर्ध्य देना चमत्कृत करने वाला दृश्य होता है। मैंने जब पहली बार देखा तो वाकई गुज़बम्पस हुए थे।


  व्रत की कथा महत्ता आज भी बहुत ज्यादा नही मालूम लेकिन ये समझ में आया कि ये अत्यंत कठिन व्रत है जो महिलाएं अपने मन की हिम्मत के बलबूते करती हैं और मज़े की बात ये है कि घर परिवार के पुरुष सदस्य किसी भी स्वभाव के हों इस व्रत में बड़े बड़े डालना उठाये अपनी पत्नी/माँ/ भाभी आदी की मदद को आतुर दिखतें है और पूरे गर्व से करतें हैं।
   इस व्रत की एक और सुंदर बात ये है की पूरा मुहल्ला, गांव खेड़ा एक साथ इस पूजन में सम्मिलित होता है।
 
   आज जब फेसबुक पर रिश्तेदारों को गालियां देना लेटेस्ट ट्रेंड  है ऐसे में हमारे ही समाज का एक हिस्सा हमारे व्रत त्योहार को जिलाये रखने के लिए आज भी पूरी तन्मयता से लगा है देख कर अच्छा लगता है।

   पिछले महीने एक दोस्त मुम्बई से आई थी। एक रात मेरे घर ही उनका रुकना हुआ।
    बातों ही बातों में उसने बताया कि छठ के समय वो लोग अपने ससुराल घर में थे जो पटना से पंद्रह बीस किलोमीटर पर कहीं है। और तब उसने ससुराल का हल्का सा उलाहना भी दिया कि पहले तो सबने मना कर दिया था कि नही आएंगे इस बार , पर ऐन खरना से दो दिन पहले मंडली की मंडली चली आयी। अब सासु माँ ने खाना बनाने वाली रखी नही थी और तब इन्ही मुम्बई वाली सखी को अपनी देवरानी के साथ मिल कर पूरा खाना बजाना सब देखना बनाना पड़ा।
  रोते झींकते ही सही पर उसे अपनी बड़ी बहू होने का फर्ज याद आया और जैसा जितना बन सका उसने अपनी देवरानी की मदद  से कर लिया।
  उसके शब्दों में …-” मैंने कहा प्रीति हमसे पचास पचास रोटियां न बेली जाएंगी और न सेकी जाएंगी। कड़ाही चढ़ाओ पूरियां ही निकालेंगे अब तीनों दिन।

मैंने पूछ लिया कि खीर के साथ रोटी खाई जाती है ना। तब उसका जवाब था मेन परसादी तो खीर ही है। पहले के लोग पूड़ियाँ तलने से बचने रोटियां बनाते होंगे हम तो अपनी सास से भी कह दिए… अम्मा अब रस्मों रिवाज में थोड़े से बदलाव की ज़रूरत है । अब से हमारे यहाँ रोटी की जगह पूड़ियाँ ही चलेंगी।
 
  उसी के शब्दों में उसकी सास ने भी अपनी बहू की बात मान ली और हंसी खुशी व्रत त्योहार निपट गया।

   घुटनों से ऊपर की शॉर्ट्स पहने हाथ में कॉफी का कप थामे जब वो अपना किस्सा सुना रही थी तो सुनते हुए लगातार मेरे चेहरे पर एक मुस्कान बनी हुई थी।

सही भी तो है…

  किसी रूढ़ि को सिरे से नकार देने से कहीं बेहतर है, उसे अपनी सुविधानुसार बना कर पालन कर लेना। पुरानी पीढ़ी भी खुश और हम भी !!!!

कम से कम खाली बैठे फेसबुक के पेज पर निर्रथक गाली गलौच से कहीं बेहतर है अपनी पुरानी रूढ़ियों पर फोकस करना और उन्हें उनके सम्पूर्ण अस्तित्व में थोड़े बहुत सुधार के साथ स्वीकार करना।
   मेरे किस्सों की गुल्लक से निकला ये छोटा सा किस्सा एक व्रत पर था….
…. एक आस्था पर था, विश्वास पर था!!!

    जय छठी मैय्या की!!!

  मुझे पढ़ने सराहने के लिए दिल से आभार शुक्रिया नवाज़िश !!

aparna…
   
  

         

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

21 विचार “समिधा – 58” पर

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: