समिधा – 58


समिधा – 58

     आते आते आखिर वो दिन भी आ गया। आज से पारो और उसकी सखियों की परीक्षाएं शुरू थी। सविता सुबह से कृष्ण मंडप में बैठी बस भगवान से खुद को पास करवा देने की प्रार्थना में लगी थी।
   अपना ज़रूरी सामान अपने झोले में डाल पारो भी झटपट सीढियां उतरती नीचे चली आयी।
   नयना और मधुलिका के साथ वो भी मंडप की ओर बढ़ गयी।
   सभी ने एक साथ सामने मुरलीवाले के आगे हाथ जोड़ दिए। मन ही मन प्रार्थना करती नयना और मधुलिका की भी आंखें बंद थीं लेकिन पारो ने झट अपनी आंखें खोल इधर उधर किसी को ढूंढना शुरू कर दिया।


  
  ” चलें , अब तो प्रभु का आशीर्वाद भी ले लिया?”   नयना के सवाल पर बाकी तो दोनों ने हाँ कह दिया पर पारो अब भी चकित दृष्टि से इधर उधर देखती रही।

“क्या हुआ ? तू किसे ढूंढ रही है पारो?”

“मेरे द्वारिकाधीश को!”

“ये सामने तो हैं…!” सरिता के मूर्ति की ओर इशारा करते में पारो को दूसरी तरफ से आता वरुण नज़र आ गया….

“आ गए….”वरुण को देखते ही उसने धीमे से कहा और सीढियां उतर उसके सामने पहुंच गई।

“आशीर्वाद दीजिये, कि आपके विश्वास को विजय दिला पाऊं?”

   पारो की आत्मविश्वास से चमकती आंखें देख वरुण की आंखों में भी प्रसन्नता की शहनाई गूंज उठी….. उसकी आँखों की कोर आंखें मुस्कुराने लगी…

“तुम पारस हो पारो, जिसे छुओगी सोना बन जायेगा। निश्चित तुम्हारी विजय होगी।”

  होंठों ही होंठों में बुदबुदाते वरुण की बात आसपास कोई और नही सुन पाया और पारो वरुण के पैरों पर झुक गयी।
   अपने दोनों हाथों को वरुण के दोनों पैरों पर कुछ देर रख कर उसने आंखें मूंद लीं।
   उसे लगा ये देव की छुअन है, उसी का स्पर्श है…. और उस स्पर्श से जागी तरंगे उसके पूरे शरीर में एक ऊर्जा बन दौड़ गयी।
    उस स्पर्श को अपने माथे से लगाने के बाद वो उठने ही वाली थी कि वरुण ज़रा सा पीछे हटा और उसके पैर के नीचे की धूल उठा कर पारो ने माथे से लगा ली।
   वो उठी और प्रसन्नता से अपनी सखियों को साथ लिए अपने विद्यालय की ओर बढ़ गयी।     

*****

एक एक करती सारी परीक्षाएं निबटती गयीं। और अंतिम परीक्षा का भी दिन आ गया। उस दिन स्कूल से आते ही चारों लड़कियों की प्रसन्नता का ठिकाना नही था। एक तो अंतिम पेपर और उस पर आसान आया था, सभी अपने में मगन गाती गुनगुनाती ऊपर अपने कमरे की ओर बढ़ गईं थीं।
   अपने परीक्षा के अनुभव और अब आगे भविष्य में क्या करना है आदि की चर्चाओं में सभी व्यस्त थीं कि नीचे से एक दीदी उन चारों को खाने के लिए बुलाने आ गयीं।

“चलो तुम्हीं चारों का भोजन बाकी है, चल कर खा लो फिर रसोई समेट लेंगे हम।”

सरिता ने हाँ में सिर हिलाते बड़ी आस से पूछ लिया…

“दीदी आज खाने में क्या बना है?”

“वही मूंग की दाल और लौकी की सब्जी। चावल और रोटियां दोनो ही है तुम लोगों को जो खाना हो देख लेना।”

  सरिता का मुहँ ज़रा सा हो गया। दुनिया वाले भले उन्हें सुस्वादु भोजन खाने के योग्य न मानें पर उनकी भी तो जिव्हा थी जहाँ किसी ज़माने में छप्पन भोग भी सजते थे। पुरानी आदतों को त्याग देना इतना आसान होता है क्या?”

  मन मार कर चारों रसोई की तरफ बढ़ गईं।रसोई का काम निपटा कर लगभग भगिनी आश्रम की महिलाएं दोपहर के आराम के लिये अपने कक्ष की ओर जा चुकी थीं। वहाँ इस वक्त इन चारों के अलावा उन्हें। बुलाने गयी दीदी ही थी।

“मैं परोस दूँ। तुम लोग कहो तो भोजन गर्म कर देती हूं , थोड़ा स्वाद लगेगा वरना मूंग ठंडी अच्छी नही लगती।”

“मुझे तो गर्म भी अच्छी नही लगती है दीदी। अब जैसी है खाना तो है ही,हम खुद परोस लेंगे और खाने के बाद रसोई साफ कर देंगे। आप भी जाकर आराम कर लीजिए।”
     पारो की बात पर मुस्कुरा कर वो दीदी एक ओर खड़ी रह गईं और ये चारों लड़कियां अपना खाना परोसने लगीं….
   लेकिन भगोने खोलते ही चारों के चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी…
   पहले ही भगौने से धनिये गरम मसाले की खुशबू में तरबतर हरे चने का निमोना रखा था। दूसरे में सूखे  बैंगन तले हुए दिख रहे थे और टमाटर से छौंकी गरम दाल पर तैरता घी और  गरम चावलों से निकलती भाप  उन चारों को जैसे मुस्कुराने को बाध्य कर गयीं।
  सविता तुरंत भाग कर दीदी के गले से लग गयी…

“आज इतना सुस्वाद भोजन कैसे बनाया दीदी।”

“तुम चारों के अंतिम पेपर की खुशी में ।”

  पद्मजा दीदी रसोई में घुसती हुई बोल पड़ीं।

” भई हमारी बहने इतनी मेहनत कर रहीं तो कुछ तो हमारा फ़र्ज़ भी बनता है ना। खाना खा लो उसके बाद तुम्हारे ही शब्दों में एक और सरप्राइज है तुम लोगों के लिए।”

  और मुस्कुरा कर पद्मजा दीदी वही रखे पीढ़े पर बैठ गईं। चारों सखियां हंसती मुस्कुराती खाना परोस कर खाने बैठ गयी।
  उन लोगों का खाना समाप्त होने से पहले ही दीदी ने चार कटोरियों में निकाल रखी खीर भी लाकर उन सबके समक्ष परोस दी। उन सबकी खुशी का ठिकाना नही रहा।

   पारो ने अपने हाथ में खीर की कटोरी उठायी और खाने को थी कि उसे याद आ गया उसका परीक्षाफल आने तक वरुण ने मीठा न खाने की कसम उठा रखी है। इसका मतलब वरुण ने भी ये खीर नही खाई होगी…..
   जब उसके सेलेक्शन के लिए वरुण ने मीठा छोड़ रखा है फिर वो कैसे खा सकती है?  यही सोच उसने कटोरी नीचे रख दी।

” क्या हुआ पारो?तू खीर नही खाएगी?”

सरिता के पूछने पर उसने न में सिर हिला दिया।

“अरे बहुत स्वाद बनी है,ज़रा चख के तो देख। आज पद्मजा दीदी ने वो भुने बादाम और भुनी पोस्त का पाउडर डाल कर मस्त केसरिया खीर बनाई है। देख केसर का क्या खूब रंग आया है। एक चम्मच तो चख के देख बहन। आज की खीर अमृत है अमृत,बिल्कुल लग रहा जैसे…”

“नही सरिता!! मेरा पेट भर गया है अब एक चम्मच भी और खाया तो फट जाएगा।”

“कोई बात नही पारोमिता!! ढक कर अपने पास ही रख लेना, और बाद में खा लेना।”

पद्मजा दीदी की बात पर हामी भर पारो उठ खड़ी हुई। चारों ने रसोई समेट कर साफ सुथरी कर दी और वहाँ से अपने दोपहर के ठिकाने पर चल निकली।
  सरोवर के किनारे किनारे आगे बढ़ने पर घने पेड़ और झाड़ियों से घिरा पथरीला सा स्थान था। वहाँ सरोवर के ठीक किनारे होने से पानी से उठने वाले ठंडी हवा के झोंके भी आते थे।
    वो एक पुरानी बड़ी सी शिला थी जिसके बिछे होने से वहाँ समतल चौरस जगह बन गयी थीं,वहीं रोज़ दरी चटाई बिछा कर चारों पढ़ाई किया करती थी। आज भी चारों वहीं पहुंच गईं। 
       आपसी बातचीत में लगी चारों आज खुश थीं। कुछ समय बीतने के बाद पारो उठ कर जाने को हुई…

“क्या हुआ तू कहाँ चल दीं?”

“मौजमस्ती का समय खत्म। अब पढ़ाई शुरू करने जा रही हूं।”

“अब कौन सी पढ़ाई?”

“मैंने पीएमटी का फॉर्म भी डाल रखा है ना। उसके लिए भी तो पढना है।”

“अरे उसमें कौन सा इस साल सेलेक्शन हो ही जाना है। छोड़ न, इस साल तो बस आइडिया लेने के लिये दे देना। अगले साल अच्छे से तैयारी कर के देना। समझी।”

  पारो मुस्कुरा उठी, वो कैसे किसी को समझाती की उसके लिए ये इम्तहान नही उसके जीवन मरण का प्रश्न था।
   आती हूँ कहकर वो वहाँ से निकल गयी….

********

” कृष्ण हमेशा से न्याय के पक्षधर रहे। उन्होंने कभी किसी के साथ अन्याय नही होने दिया। स्वयं के साथ भी नही।
    शिशुपाल वध इसी का उदाहरण है। आप में से कइयों के मन में ये संशय कभी न कभी पैदा हुआ होगा कि वो तो स्वयं भगवान थे तो आखिर अपने भाई को उसकी सौ गलतियों के बाद भी माफ करने का माद्दा रखने की जगह उसे मौत क्यों दी। उन्होंने अपना भगवानपन क्यों नही दिखाया और बड़ा दिल रख कर उसे माफ क्यों नही किया।
  तो इसका जवाब यही है कि अत्याचार सहने की भी एक सीमा निर्धारित होनी चाहिए क्योंकि ये आपका शरीर भले ही हो पर बनाया तो उस सर्वशक्तिमान ने है जिसे हम अपना  सृजनकर्ता मानते हुए खुद को उसकी संतान मानते हैं। तो जब उसके बनाये संसार का हम अपमान नही करते और न सहते हैं तो उसी के बनाये हमारे शरीर का अपमान हम क्यों सहें। सिर्फ इसलिए कि अपमान करने वाला हमारा ही कोई नातेदार है हम बार बार अपनी फजीहत नही करवा सकते और बस यही समझाने के लिए उन्होंने भगवान होते हुए भी,बड़े दिल के स्वामी होते हुए भी अपने ही भाई को उसकी सौ गलती के बाद मृत्युदंड दिया।
   कि भाई भले ही तुम मेरे भ्राता हो तुम्हारा मेरे शरीर को गालियां देने का हक बनता है , लेकिन तुमसे अधिक हक तो मेरा स्वयम का मेरे शरीर पर है जिसकी मैं आराधना करता हूँ तो एक सीमा से बाहर मैं संसार में किसी को ये हक नही देता की वो मुझे अपमानित करे।
   श्री कृष्ण अगर यह समझा रहें हैं तो हम उनकी बात क्यों नही समझ पाते हैं । हम क्यों लोगों को मौके देते हैं कि वो हमें क्षण क्षण पर अपमानित करते चले जाएं।
    मैं आज इस प्रवचन के माध्यम से हमारे आश्रम की महिलाओं से कहना चाहता हूं कि आप भी उसी कृष्ण का सृजन हैं जिसका मैं और इसलिए आप भी हकदार हैं पूरे सम्मान की।
    अपने शरीर को मंदिर समझ कर उसका सम्मान कीजिये और उसे बिना ज़रूरत के कष्ट मत दीजिये, ना ही शारीरिक न मानसिक।
   अगर आप लोगो को सहीं लगे तो अबसे पूरे आश्रम के लिए समान भोजन बनेगा और आश्रम के पुरुष और महिलाएं साथ बैठ कर भोजन करेंगे। 
   जिस दिन महिलाओं का व्रत होगा उस दिन व्रत में खाया जाने वाला भोजन बनेगा और आश्रम का हर एक सदस्य उसी भोजन को खायेगा। यानी अगर महिलाएं व्रत के दिन सिर्फ शाम को आहार लेती हैं तो सिर्फ शाम में ही भोजन बनेगा और हम सब भी शाम को ही प्रसादी पाएंगे। “

   श्रद्धालुओं के पीछे बैठी भगिनी आश्रम की महिलाओं के चेहरे पर अचरज के भाव थे। उन लोगों के लिए ये बहुत बड़ी बात थी कि आश्रम के एक दयालु संत उन सभी के बारे में इतना सोच रहे थे। क्योंकि उनमें से कई एक तो ऐसी थी  जो असल में व्रत रखना ही नही चाहती थीं पर आश्रम की परिपाटी के कारण व्रत करने को मजबूर थी। उनके चेहरों पर मुस्कान खिल उठी और सबसे पीछे एक मीनार की टेक लगाए खड़ी पारो ने वरुण को देखा , वरुण ने पारो को।
  पारो की आंखें मुस्कुरा रही थी और आंखों ही में उसे अभिवादन करते हुए आभार व्यक्त कर रही थी, और वरुण की आंखें उस अभिवादन आभार का भार उठाती झुक कर मुस्कुराने लगी….

क्रमशः

  दिल से …..

    हां अब सोच लिया है कि छोटा ही सही पर दिल से लिखूंगी ज़रूर।

  मैं बहुत छोटी थी तब मुझे बहुत से व्रत त्योहारों का पता ही नही होता था। सच कहूं तो कॉलेज में आने के बाद भी मुझे छठ जैसे अनोखे व्रत के बारे में कुछ भी मालूम नही था।
   अब सोचती हूँ क्या मेरी क्लास  में कोई बिहारी बंदा/ बंदी नही था। शायद नही ही रहा होगा। पर अभी कुछ सालों में छठ का जैसे एकदम से फैशन सा आ गया है।
   हमारी टाउनशिप में भी औरतें बहुत सुंदरता से व्रत की कठिनाइयों को किनारे कर सूरज की दोनों वक्त की पूजा और अर्ध्य ज़रूर करती हैं।
  हमारे टाउनशिप में कुल जमा सात स्विमिंग पूल हैं जिनमें कमर तक डूबी सुहागन स्त्रियों का सूरज को अर्ध्य देना चमत्कृत करने वाला दृश्य होता है। मैंने जब पहली बार देखा तो वाकई गुज़बम्पस हुए थे।


  व्रत की कथा महत्ता आज भी बहुत ज्यादा नही मालूम लेकिन ये समझ में आया कि ये अत्यंत कठिन व्रत है जो महिलाएं अपने मन की हिम्मत के बलबूते करती हैं और मज़े की बात ये है कि घर परिवार के पुरुष सदस्य किसी भी स्वभाव के हों इस व्रत में बड़े बड़े डालना उठाये अपनी पत्नी/माँ/ भाभी आदी की मदद को आतुर दिखतें है और पूरे गर्व से करतें हैं।
   इस व्रत की एक और सुंदर बात ये है की पूरा मुहल्ला, गांव खेड़ा एक साथ इस पूजन में सम्मिलित होता है।
 
   आज जब फेसबुक पर रिश्तेदारों को गालियां देना लेटेस्ट ट्रेंड  है ऐसे में हमारे ही समाज का एक हिस्सा हमारे व्रत त्योहार को जिलाये रखने के लिए आज भी पूरी तन्मयता से लगा है देख कर अच्छा लगता है।

   पिछले महीने एक दोस्त मुम्बई से आई थी। एक रात मेरे घर ही उनका रुकना हुआ।
    बातों ही बातों में उसने बताया कि छठ के समय वो लोग अपने ससुराल घर में थे जो पटना से पंद्रह बीस किलोमीटर पर कहीं है। और तब उसने ससुराल का हल्का सा उलाहना भी दिया कि पहले तो सबने मना कर दिया था कि नही आएंगे इस बार , पर ऐन खरना से दो दिन पहले मंडली की मंडली चली आयी। अब सासु माँ ने खाना बनाने वाली रखी नही थी और तब इन्ही मुम्बई वाली सखी को अपनी देवरानी के साथ मिल कर पूरा खाना बजाना सब देखना बनाना पड़ा।
  रोते झींकते ही सही पर उसे अपनी बड़ी बहू होने का फर्ज याद आया और जैसा जितना बन सका उसने अपनी देवरानी की मदद  से कर लिया।
  उसके शब्दों में …-” मैंने कहा प्रीति हमसे पचास पचास रोटियां न बेली जाएंगी और न सेकी जाएंगी। कड़ाही चढ़ाओ पूरियां ही निकालेंगे अब तीनों दिन।

मैंने पूछ लिया कि खीर के साथ रोटी खाई जाती है ना। तब उसका जवाब था मेन परसादी तो खीर ही है। पहले के लोग पूड़ियाँ तलने से बचने रोटियां बनाते होंगे हम तो अपनी सास से भी कह दिए… अम्मा अब रस्मों रिवाज में थोड़े से बदलाव की ज़रूरत है । अब से हमारे यहाँ रोटी की जगह पूड़ियाँ ही चलेंगी।
 
  उसी के शब्दों में उसकी सास ने भी अपनी बहू की बात मान ली और हंसी खुशी व्रत त्योहार निपट गया।

   घुटनों से ऊपर की शॉर्ट्स पहने हाथ में कॉफी का कप थामे जब वो अपना किस्सा सुना रही थी तो सुनते हुए लगातार मेरे चेहरे पर एक मुस्कान बनी हुई थी।

सही भी तो है…

  किसी रूढ़ि को सिरे से नकार देने से कहीं बेहतर है, उसे अपनी सुविधानुसार बना कर पालन कर लेना। पुरानी पीढ़ी भी खुश और हम भी !!!!

कम से कम खाली बैठे फेसबुक के पेज पर निर्रथक गाली गलौच से कहीं बेहतर है अपनी पुरानी रूढ़ियों पर फोकस करना और उन्हें उनके सम्पूर्ण अस्तित्व में थोड़े बहुत सुधार के साथ स्वीकार करना।
   मेरे किस्सों की गुल्लक से निकला ये छोटा सा किस्सा एक व्रत पर था….
…. एक आस्था पर था, विश्वास पर था!!!

    जय छठी मैय्या की!!!

  मुझे पढ़ने सराहने के लिए दिल से आभार शुक्रिया नवाज़िश !!

aparna…
   
  

         

समिधा -57

Advertisements


            समिधा – 57

    वक्त को बीतते वक्त नहीं लगता!! वह यह नहीं देखता कि आप उसके साथ भाग पा रहे हैं, या नहीं लेकिन उसे अपनी गति से आगे बढ़ना ही है! अगर आप उसके साथ दौड़ने में सक्षम हैं, तो आप सफल हैं। लेकिन अगर आप उसके साथ नहीं दौड़ आते तो यह आपकी कमी है, वक्त कि नहीं, वह आप को पीछे छोड़कर आगे जरूर निकल जाएगा।

     आश्रम में सभी की दिनचर्या अपने ढंग से चल रही थी। लेकिन वह एक सबसे अलग अनोखी ही थी जिसके एक पूरे दिन में 24 की जगह 40 घंटे जुड़ चुके थे।
    अपने हर काम को समय पर करने के साथ ही वह अपनी पढ़ाई से भी टस से मस नहीं होती थी। वह कब सुबह जागती और किस वक्त रात में सोया करती, किसी के पास इस बात का कोई हिसाब नहीं था। ऐसा लगने लगा था जैसे पारो इंसान नहीं किसी दूसरे ग्रह से आई कोई प्राणी थी, जिसे ना भूख प्यास सताया करती थी और ना नींद। ऐसे सारे परपंच, इंसानी कायदे कानूनों की धज्जियां उड़ाती वो अपनी पढ़ाई में मगन थी। अब बस यही पढ़ाई ही उसके पास एक साधन बचा था जिससे वह अपने जीवन को पटरी पर ला सकती थी।
   शाम को अपनी सहेलियों के साथ सरोवर की सीढ़ियों पर बैठकर पढ़ते-पढ़ते एक-एक कर उसकी सहेलियां उठ कर चली जाती, लेकिन पारो अंधेरा होने के बाद बत्तियां जलने पर भी वहीं बैठी पढ़ती रह जाती। शाम को जब मंदिर की घंटियां बजती और आरती करने के लिए लगभग पूरा आश्रम कृष्ण मंडप की ओर चला जाता तब भी पारो अपनी किताबों से सर नहीं उठाती। रात को सब सखियां सो जातीं, कमरें की बत्तियां बुझा दी जातीं तब वो भगिनी आश्रम के प्रांगण में जा बैठती क्योंकि वहाँ की बत्तियां रात भर जला करती थीं।

   उसके लिए अब उसका मंदिर उसका कृष्ण उसकी किताबें हो चुकी थी। उसका बस चलता तो वह खाना खाने के लिए भी नहीं उठती, लेकिन स्वयं खाने से पहले उसे वरुण को खाना परोसना होता था और यह उसकी जिम्मेदारी नहीं उसकी आदत हो चुकी थी। और इसलिए सुबह और शाम दोनों वक्त पर वरुण के भोजन को परोसना उसके आहार में उसके स्वास्थ्य के अनुरूप भोजन शामिल है कि नही जांचना परखना और उस तक थाली लेकर जाना पारो का नित्यकर्म हो गया था। यही एक काम वह हृदय से अपनी मनमर्जी से और प्रसन्नता से किया करती थी। इसके अलावा  पद्मजा दीदी उसे जो जो काम बताया करती वह सब दिनचर्या का हिस्सा मान खुशी से निपटा जाती। उन कामों से उसकी पढ़ाई पर कोई बाधा नहीं पड़ती। बल्कि जिस दिन जितना ज्यादा काम बताया जाता उस दिन वह अपनी उस रात की नींद में उतने घंटों की कटौती करके अपनी पढ़ाई के समय के हर्जाने को पूरा कर लेती। धीरे धीरे उसके सोने वाले कमरे के चारपाई की पीछे वाली दीवार पर उसके लिखे पर्चे चिपकने लगे थे। इन पर्चो में कुछ वह कठिन सूत्र लिखे होते जिन्हें पारो या तो ठीक से याद नहीं रख पा रही थी, या इन्हें प्रयोग करने में कहीं चूक जाया करती थी। और ऐसे सारे कठिन सूत्रों को उसने लिखकर अपने सिरहाने चिपका रखा था। जिसे सुबह उठते ही एक बार उन्हें एक नजर देख लिया करती थी।
   
  पारो के लिए बचपन से शिक्षा महत्वपूर्ण थी, लेकिन उससे अधिक उसे पढ़ाई रुचिकर लगा करती थी, इसलिए वो पढ़ती थी। पर अब उसके लिए शिक्षा उसकी साधना हो चुकी थी।
   और जब किसी व्यक्ति की रुचि में उसकी साधना जाग जाए तो सफलता स्वयं चल कर उस तक पहुंचना निश्चित है।

     अब पारो के लिए एक एक पल महत्वपूर्ण था, वो कहीं किसी बिंदु पर अपना एक पल भी व्यर्थ नही करना चाहती थी, और इसी सब में आजकल उसका ध्यान वरुण पर भी नही जाता था।
   वो अक्सर अपने सूत्र रटती हुई या मन ही मन किसी पाठ को स्मरण करती वरुण के सामने से निकल जाती और वो चुपचाप उसे देखता रह जाता।

  अब भी वो वरुण के प्रवचन की तैयारी करती पर अब सब कुछ पलक झपकते रख कर वो फटाफट अपनी किताब लिए निकल लेती। वरुण बस उसे जाते हुए देखता रह जाता।
   कल तक यही लड़की उसके आगे पीछे घूमती उसके मन की चिंता का कारण बनने लगी थी। वरुण के मन में डर बैठने लगा था कि पारो का इस कदर उसकी देखभाल करना आश्रम की आंख में न चुभ जाए।
  वो उससे इस बारे में बात करने की सोच रहा था कि उसे बिना कोई मौका दिए वो अपनी किताबों की दुनिया में खो गयी।
    और इस कदर खोई की वरुण से जुड़ी आवश्यकताओं के अलावा अब वो वरुण को देखने तक का समय भी नही निकाल पा रही थी।
  उसकी ये लगन देख कर वरुण  खुश था, बहुत खुश। और उसे  प्रसन्न होना भी चाहिए था पर कहीं न कहीं वो इस सब में पुरानी वाली पारो को बहुत शिद्दत से मिस करने लगा था।

    वो जब तब मौके ढूंढता कि उसे पारो कहीं तो कभी तो इधर उधर अपना वक्त गंवाती दिख भर जाए और फिर उसे सौ सौ उलाहने सुना कर वो अपने मन की सारी भड़ास उस पर निकाल ले, लेकिन न पारो उसे वो मौका दे रही थी और न वक्त…
  ऐसे ही एक दोपहर दर्शन पारो से मिलने चला आया।
  ऑफ़िस से बालक ने भाग कर भगिनी आश्रम जाकर ये खबर दी और पारो उसी के पीछे तेज़ तेज़ कदमों से सीढियां उतरती उतने ही तेज़ कदमों से ऑफ़िस की तरफ बढ़ती चली गयी। कृष्ण मंडप में प्रशांत के साथ किन्हीं बही खातों के हिसाब में डूबे वरुण को जैसे ही ये दिखा की पारो ऑफ़िस की तरफ जा रही है वो भी अपनी जगह से उठा खड़ा हुआ।
   प्रशांत ने उसे एक नज़र देखा…

“बस अभी आया, वो ज़रा कुछ काम याद आ गया।”

“कौन सा काम याद आ गया? काम का काम ही तो कर रहे हैं। ” प्रशांत के इस तरह टोक देने से झुंझलाहट चेहरे पर लाते हुए भी वरुण वहाँ से निकल गया, और प्रशांत मन ही मन वरुण की हालत समझता मुस्कुरा कर रह गया…

” जब वो खुद तेरी तरफ आ रही थी तब तुझे दुनियादारी नज़र आ रही थी, और अब जब वो तुझे भूल कर अपने में व्यस्त है तो तुझे चैन नही है। यही तो प्यार है, जो तुम दोनों के मन में है पर तू अपने मिथ्या अभिमान में नही स्वीकारेगा और वो अपने सच्चे स्वाभिमान में “

   मन ही मन सोचता प्रशांत वापस बही खातों में झुक गया।

  उधर ऑफ़िस की सीढ़ियां वरुण चढ़ ही रहा था कि उसे ऑफ़िस से निकलता दर्शन दिख गया।
कहाँ तो वरुण ने सोचा था पारो और दर्शन बैठ कर गप्पे मारतें दिखेंगे तो पारो को लंबी चौड़ी सी बात सुना लूंगा की यहाँ बैठे गप्पे मार कर समय की बर्बादी करने से अच्छा कुछ देर मेरा प्रवचन भी सुन लिया करो पर यहाँ तो पासा ही उल्टा पड़ गया था।
   दर्शन का बैठना तो दूर वो तो शायद खड़े खड़े ही पारो का हालचाल ले वापस मुड़ने को था।

“अरे दर्शन इतनी जल्दी चल दिये। ज़रा बैठोगे भी नही।”

“नही दादा! अब वक्त कहाँ हैं? वो तो बऊ दी को ये कुछ प्रश्नपत्र देने थे। बस वही देने आया था, वो दे दिए अब निकलता हूँ।”

Advertisements

  वरुण दिल से चाहता था कि दर्शन कुछ घड़ी और ठहर जाए और कम से कम इसी बहाने वो पारो का साथ भी पा सके..

“अरे कम से कम चाय तो पीते जाओ। इतनी दूर से आते हो। स्टेशन से आये और चाय तक पिये बिना निकल गए। बाकियों का नही कह सकता पर मुझे अच्छा नही लगेगा। “

“दादा !! ”  बोलता दर्शन वरुण के पैरों पर झुक गया..

“आप आदेश कीजिये, मैं वही करूँगा जो आप कहेंगे। आप से पहले कहा है या नही पर मुझे सदा से आपमें मेरे देव दा नज़र आतें हैं। इसलिए आप जो भी कहतें हैं मुझे सब अच्छा लगता है।”

  दर्शन वहीं बैठ गया, उसे बैठते देख पारो असमंजस में खड़ी रह गयी। वो भी समझती थी कि दर्शन इतनी दूर से सिर्फ उससे मिलने, उसका हालचाल जानने और उसके लिए नोट्स देने आता है। ऐसे में कम से कम कुछ घण्टे यहाँ आराम कर के जा सकता है। पर पारो यह भी समझती थी कि अगर वो दर्शन को चायपानी के लिए रोकेगी तो उसके लिए यह सब जुटाने की ज़िम्मेदारी भी पारो की ही होगी। और अगर एक बार वो अपने किसी मेहमान के लिए कुछ करने रसोई में घुसी तो पद्मजा दीदी उसे उसके रोजाना के काम के अलावा फिर और न जाने कितना सारा काम पकड़ा देंगी। और इस सब में वक्त का जो हर्जाना होगा वो अब परीक्षा के ठीक पांच दिन पहले झेलने की उसकी हिम्मत नही थी।
    पहले तो वो अपने सोने के घण्टो में कटौती कर लिया करती थी, पर अब परीक्षा के ठीक पहले उसके दिमाग को भी पर्याप्त आराम की ज़रूरत थी, ये वो भली प्रकार जानती थी।
  उसे मालूम था अगर दिमाग ने पर्याप्त आराम नही किया तो पढ़ा लिखा सब यूँ ही बह जाना था। जितनी मेहनत से तैयारी की थी उतनी ही सुघड़ता से उस सब को परीक्षा पुस्तिकाओं में उतारना भी ज़रूरी था।
   इसलिए वो दर्शन से चाय के लिए भी नही पूछ पायी थी पर वरुण के ऐसा करते ही उसका मन खिल उठा…

“आप लोग बैठिये मैं चाय लेकर आती हूँ।”

“नही तुम भी बैठो। चाय तो कोई भी ले आएगा। “

  और वरुण ने वहीं टहलते एक बालक को रसोई में चाय के लिए कहने भेज दिया…
  पारो मन ही मन प्रसन्नता से भरी बैठी थी कि कैसे वरुण हमेशा उसकी समस्याओं को चुटकियों में वैसे ही सुलझा जाता है जैसे उसका देव सुलझा जाता था…
   वो सोच रही थी कि दर्शन ने उसी से कहना शुरू कर दिया…

” बऊ दी ! ये सारे पुराने प्रश्नपत्र हैं, एक बार आप इन पर भी सरसरी नज़र फिरा लीजियेगा। वैसे मैं जानता हूँ, आप पूरी किताब पढ़ कर जाने में विश्वास करती हैं। लेकिन इस बार आपको समय बहुत कम मिला है। इसलिए मैंने सोचा कि ये प्रश्नपत्र आपके कुछ काम आ जाएंगे।”

“कुछ नही बहुत काम आएंगे। अब पढ़ाई तो सारी हो चुकी है। अब मैं इन प्रश्नपत्रों को हल करने का काम ही करूँगी… घड़ी पर समय लगा कर कि ठीक तीन घंटों में मैं कैसे प्रश्नपत्र हल कर पाती हूँ।”

Advertisements

  वरुण चौंक कर पारो की तरफ देखने लगा…. उसने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। वो भी अपनी शैक्षणिक योग्यताओं में श्रेष्ठ था। पर उसने इस हद तक जाकर कभी पढ़ने की सोची भी नही थी।
    मतलब लिख कर भी ऐसे पढ़ाई की जा सकती है ये उसके लिए बहुत नया था। ऐसे तो छोटे बच्चों को पढ़ाया जाता है पर सही बात है अगर इस हद तक कोई पढ़ाई करेगा तो जाहिर है उसके लिए परीक्षा किसी तरह की दुर्गम चढ़ाई नही बल्कि एक मजेदार खेल हो जाएगा।
     अब तक आश्रम से एक दीदी उन सबके लिए चाय लेकर वहीं चली आयीं। उन्होंने मुस्कुरा कर सबको चाय दी और नाश्ते की प्लेट टेबल पर रख चली गईं। चाय पीते हुए वरुण दर्शन से उसकी तैयारियों का जायज़ा भी लेता रहा। दर्शन भी मेडिकल के लिए ही तैयारियों में लगा था। उसका तैयारियों का ये दूसरा साल था। वो वैसे भी पारो से एक साल आगे था उम्र में भी और पढ़ाई में भी।
   दर्शन भी अति उत्साह से वरुण को अपनी तैयारियां बताता जा रहा था, और इस सब के बीच सबकी नजर चुरा कर वरुण पारो को भी देख लिया करता था।
  पर पारो वहाँ उन सब के साथ बैठ कर भी नही थी। उसके हाथ में वो प्रश्नपत्र थे और उन्हें हाथ में थामे वो एक अलग दुनिया में पहुंच चुकी थी। जहाँ वो सभी सवालों के जवाब सिलसिलेवार बनाती जा रही थी। एक भी सवाल अब तक ऐसा नही आया था जिसमें वो अटकी हो और इसलिए वो एक कुशल धावक सी एक सवाल से दूसरे सवाल की रुकावट को पार करती भागती चली जा रही थी।
  एक के बाद दूसरा दूसरे के बाद तीसरा प्रश्नपत्र हल करती वो अपने में ऐसी खोई बैठी थी कि उसे भान ही नही था कि दर्शन ने उसे दो बार आवाज़ लगाई की अब वो जाना चाहता है।
   आखिर दर्शन ने पारो के कंधे पर हाथ रख धीरे से उसे झकझोर दिया…”बऊ दी आमी जाच्छी!”

” हम्म ! “चौंक कर पारो ने दर्शन की तरफ देखा और उसके चारो तरफ घूमता उसके सवाल जवाब का संसार क्षण में गायब हो गया।

Advertisements

“ठीक है दर्शन! कुशलता से जाना और अपना ख्याल रखना।”

  इतनी देर से वरुण और दर्शन के संग बैठी पारो के मुहँ से बस इतने ही बोल फूटे।
  दर्शन ने उसे प्रणाम करने के बाद वरुण को प्रणाम किया और वहाँ से निकल गया। जाते जाते वो पल भर को ठिठक कर खड़ा हो गया। उसने मुड़ कर एक बार वापस उन दोनों को देखा और उसे लगा जैसे उसके देव दा बऊ दी के साथ खड़े हाथ हिला कर उसे आशीर्वाद देते खड़े हैं।
    उसके दिल में एक चाह सी उठी कि क्या कोई ऐसी तरकीब हो सकती है जिससे वरुण दा उसकी पारो बऊ दी से ब्याह रचा लें।
   मन में ये विचार आते ही आनन्द की एक लहर उसके मन मस्तिष्क पर छा गयी लेकिन कुछ पलों में ही उसका स्वप्न धराशायी हो गया।
   वो इतने बड़े संत हैं वो क्यों अपना गरिमामयी पद त्याग कर ऐसा करेंगे। अपनी सोच पर क्षुब्ध सा वो वापस चल पड़ा।

   पारो की प्रसन्नता का आज ओर छोर न था। उसने दर्शन के जाने के बाद अपने प्रश्नपत्रों की पोटली हाथ में टांगी और चाय के कप समेटे रसोई की तरफ बढ़ने लगी। जाते जाते वो वरुण के सामने थम गई….

Advertisements

उसने वरुण की तरफ देखा, वरुण ने उसे देखा…
….. और सिर्फ आंखों ही आंखों में वरुण के सिंचित कर रखे ताने उलाहने सारे बह गए….. पारो दर्शन को कुछ देर ठहरा कर चाय पिला कर भेजना चाहती थी जो वरुण ने करवा दिया था वो इसलिए आंखों से उसका एहसान अदा कर रही थी….
……और वरुण पारो के साथ दो घड़ी सुकून से बैठना चाहता था जो आज उसे बड़े दिनों बाद नसीब हुआ था इसलिए वो भी खुश था।
… दोनों एक दूसरे की आंखों में डूबे कुछ घड़ी यूँ ही खड़े रह गए…….

क्रमशः

aparna….

Advertisements

दिल से…

एहसासों से रंगों को चुराकर
लफ़्ज़ों के मोतियाँ पिरोकर
गुनती हूँ कुछ किस्सों को यूँ
बिना क्लिक तस्वीर बनाकर

शहद सी मीठी कोई कहानी
कहीं दर्द की बहती रवानी
बूंद बूंद में ढकीं मूंदी सी
पोटली बादलों का पानी।

गंगा के पानी सी पावन
कभी लगे रिमझिम मनभावन
आप सभी की समीक्षाएँ भी
ऊसर में जैसे हो सावन ।।

कुछ शब्दों के जाल बुने
कुछ उल्टे सीधे फाल चुने
कटा सफर अब तक कुछ यूं
भर भर सपनों के ढाल गुने।
कविता तो जितना लिखती जाऊंगी उतनी ही आगे बढ़ती जाएगी, इसलिए कम शब्दों में अब तक का लेखन सफर बेहद शानदार रहा। बेशक बहुत सारे अचीवमेंट्स हैं मेरे खाते में, जैसे लंबी कहानियाँ लिख पाना, मेरे अंदर छिपी बैठी लेखिका को पा लेना लेकिन इस सब के बावजूद मेरा अब तक का सबसे बड़ा अचीवमेंट हैं आप मेरे पाठक !!
  आपसे सबसे जुड़ा ये रिश्ता यूँ ही साल दर साल मज़बूत होता रहे…

क्योंकि आप हैं तो हम हैं…


नए साल की आप सबको शुभकामनाएं!

समिधा -56

Advertisements

समिधा – 56

   प्रशांत वरुण का हाथ थामे अंदर ऑफिस में दाखिल हो गया। उन दोनों के अंदर पहुंचते ही डॉक्टर के साथ ही श्रेया और पारो की भी आंखें उन दोनों की तरफ उठ गई।
    वरुण यह सोच सोच कर हैरान हो रहा था कि उसके इस तरह से ऑफिस में चले आने से पारो पता नहीं उसके बारे में क्या सोचेगी, कहीं पारो के मन में यह ख्याल ना आ जाए कि वह एक अनजान लड़के के साथ बैठकर बातें कर रही है और इसीलिए वरुण वहां चला आया है।
    जबकि वरुण के विचारों से अलग पारो के मन में अलग ही फुलझड़ियां छूट रही थी। वरुण का इस तरह से खुद को देखते हुए पाना उसके मन में कई नई उमंगों को जगा गया था। लेकिन वह अपने इस उत्साह को सभी के सामने दिखाना नहीं चाहती थी, इसलिए वह मुस्कुराते हुए शरमा कर नीचे किताबों में अपनी नजर गड़ाए बैठी थी।
    और उसका इस तरह से मुस्कुराना देख वरुण यही सोच रहा था कि पारो उसकी हार पर मुस्कुरा रही है।
   
” अब कैसी तबियत है आपकी?”

Advertisements

वरुण का डॉक्टर साहब के सवाल पर पहली बार में ध्यान ही नहीं गया। जब प्रशांत ने उसे कोहनी मारी तब वरुण को ध्यान आया कि डॉक्टर साहब उसी की तबीयत के बारे में पूछ रहे हैं..

” जी !! आपकी दवाइयों से अब मैं काफी स्वस्थ हूं।”

” मेरी दवाइयों के अलावा इनकी दुआएं और सेवा भी आपके स्वस्थ होने का एक बहुत मुख्य कारण है।”

  डॉक्टर के ऐसा कहते ही वरुण मुस्कुरा उठा। वरुण के मुस्कुरातें ही पारो उठ खड़ी हुई…

” मैं आप सबके लिए चाय लेकर आऊँ?”

पारो ने वरुण की तरफ देखकर ही सवाल किया!
और , अपनी आंखों में झांकती पारो की आंखों को सम्मोहित दृष्टि से देखता वरुण बस हां में सर हिला कर रह गया।
    पारो मुस्कुराकर ऑफिस से बाहर निकल गई..

” शी इज़ जीनीयस, बस थोड़ी ओवरकॉन्फिडेंट है।”

डॉक्टर की इस बात पर श्रेया ने भी हामी भर दी…

” थोड़ी नहीं भैया वह बहुत ज्यादा ओवर कॉन्फिडेंट है। अच्छी बात है, कम से कम एग्जाम फोबिया नहीं है उसे.. लेकिन कहीं ये ओवरकॉन्फिडेंस उसे ले ना डूबे।”

श्रेया ने अपनी चिंतित दृष्टि वरुण और प्रशांत की तरफ घुमा दी। लेकिन वरुण को उन दोनों की यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई और वह इस बात का प्रतिरोध करने से खुद को रोक नहीं पाया….

Advertisements

” आत्मविश्वास!! यह एक ऐसी चीज है जो हर किसी को नहीं मिलती। यह अक्सर जन्मजात होती है। या फिर जो मनुष्य इसे स्वयं के बूते हासिल करता हैं, उसके पीछे उसकी ढेरों मेहनत छिपी होती है।
हर व्यक्ति में कोई ना कोई प्रतिभा छिपी होती है किसी को अपनी प्रतिभा का भान हो पाता है, और किसी को आजीवन अपनी प्रतिभा के बारे में पता ही नहीं चल पाता। लेकिन आत्मविश्वास एक ऐसी चीज है जिससे हम में से अधिकतर इंसान वंचित ही रह जाते हैं। हमने कितने भी गुण हो, प्रतिभा हो लेकिन अपने ऊपर विश्वास कभी नहीं रह जाता और इसीलिए हम बहुत मर्तबा ठोकर खा कर रह जाते हैं।
   पारो प्रतिभाशाली है। और उसे अपनी प्रतिभा का ज्ञान भी है, वह बुद्धिमती है और इस बात पर गर्व नहीं करती, घमंड नहीं करती, बस जानती है कि वह बुद्धि मती है और उसे अपनी बुद्धि का प्रयोग करना भी आता है। वो एक साधारण सी युवती नहीं है, उसका दिमाग वाकई हम सब से अलग चलता है। ये सारी पढ़ाई हम जैसे साधारण विद्यर्थियों के लिए जटिल होगी लेकिन उसके दिमाग के हिसाब से ये बहुत सरल और सामान्य है।
वो एक श्रुतिधर है यानी, उसके दिमाग को बनाने वाले ने ऐसे बनाया है की वो सिर्फ एक बार सुन कर, देख कर या पढ़ कर ही विषयों को याद रख लेती हैं। उसे इस सब के लिए किसी तरह से अलग से मेहनत करने की आवश्यकता नही है। उसके लिए इन सारी किताबों को बस एक बार अपनी आंखों के सामने से निकालने बस की देर है, और फिर इन किताबों में छपा सब कुछ उसके दिमाग में वैसे का वैसा छप जाएगा।
उसने सिर्फ चार महीने की पढ़ाई में हाईस्कूल में पूरे सम्भाग में पहला स्थान बनाया था। और वो चार महीने की पढ़ाई भी ऐसी जिसमें न उसने घर का कोई काम करना छोड़ा और न ठाकुर माँ की सेवा में कोई कोताही की!
मैंने उसे और उसकी मेहनत को देखा…..”

बोलते बोलते अचानक वरुण रुक गया। उसके मन में आया कि ये सब वो कैसे इतनी बारीकी से बता पा रहा है। जैसे वाकई वो रात दिन पारो के साथ ही था। फिर अचानक कुछ सोचते हुए उसने अपनी बात पूरी करी।" वह तो बाद में ओवर कॉन्फिडेंट होगी खुद पर उससे कहीं अधिक मुझे कॉन्फिडेंस है कि पारो ने जो सोच रखा है वह पूरा करके रहेगी। "

” तो फिर ये बताओ वरुणदेव!! जब इतना कॉन्फिडेंस है पारो पर कि वह जो चाहेगी वह करके रहेगी तो फिर उसके एग्जाम के रिजल्ट आने तक तुमने मीठा खाना क्योंकि त्याग रखा है भला।”

  सत्यानाश!! प्रशांत से अपने मन की कोई भी बात बताना सबसे बड़ी मूर्खता है। मन ही मन यह सोचता वरुण डॉक्टर और उसकी बहन के सामने कट कर रह गया। क्या जरूरत थी प्रशांत को इतना बड़बोलापन दिखाने की। और उससे भी अधिक उसे खुद को क्या जरूरत थी, प्रशांत को यह बताने की , कि जब तक पारो का परीक्षा फल नहीं आ जाता वह किसी भी तरह की मिठाई को हाथ भी नहीं लगाएगा।
   वरुण मन ही मन खुद को और प्रशांत को कोस रहा था कि डॉक्टर एक बार फिर चहक उठा।

” अच्छा तो मतलब आप संत स्वामी लोग भी मन्नतें करते हैं?”

” जी नहीं ऐसी तो कोई बात….”

  वरुण अभी डॉक्टर की बात का कोई जवाब दे पाता कि उसके पहले प्रशांत वापस उसकी बात काटकर शुरू हो गया….

” हां डॉक्टर साहब क्यों नहीं करते? आखिर हम भी तो इंसान ही हैं! संत साधु हम बाद में बनते हैं, लेकिन पहले हम भी आपकी तरह हाड माँस के बने इंसान ही हैं। हमारे अंदर भी एक छोटा सा दिल रहता है महसूस करने के लिए।
एक दिमाग है सोचने समझने के लिए और निर्णय लेने के लिए लेकिन हमारा भी दिल उतना ही कोमल है जितना आप सब लोगों का।
   बहुत से ऐसे कार्य होते हैं जो हमारी परिधि से बाहर के होते हैं। और उन कार्यों को पूरा करने के लिए हम भी अपने प्यारे से बाल गोपाल को रिश्वत देते रहते हैं। और इस बार हमारे वरुण देव ने कान्हा जी को यही रिश्वत दी है।
    इन्होंने पूरे सवा किलो लड्डू कान्हा जी को चढ़ाने के बाद उनके सामने हाथ जोड़कर यह प्रार्थना की, कि पारो इस साल जिन भी परीक्षाओं में बैठे उन सभी परीक्षाओं में उसकी विजय हो और अब जब तक पारो मेडिकल एंट्रेंस सेलेक्ट नहीं हो जाती यह किसी भी तरह का मीठा नहीं खाएंगे।
    कुछ ऐसी ही मन्नत जब यह बीमार पड़े थे और अस्पताल में भर्ती थे तब हमारी बहन पारोमिता ने करी थी।”

Advertisements

   अब चौंकने की बारी वरुण की थी। क्योंकि उसे इस बारे में कुछ भी नहीं मालूम था, कि जब वह अस्पताल में भर्ती था , तब पारो में भी किसी तरह की कोई मन्नत की थी। वह तुरंत चौंक कर प्रशांत की तरफ देखने लगा…

” कैसी मन्नत? कौन सी मन्नत ?तुमने मुझे कुछ बताया नहीं?”

” ना बताने के लिए उस वक्त उसने मुझे कसम दे रखी थी। पारो ने उन पूरे 4 दिन जब तुम अस्पताल में भर्ती थे अन्न का एक दाना भी नहीं खाया। वो भूखी प्यासी कान्हा जी के सामने इसी जिद पर अड़ी थी, कि अगर तुम स्वस्थ होकर आश्रम नहीं लौटे तो वह कभी कुछ नहीं खाएगी।”

” यह क्या बचपना था प्रशांत!! तुम्हें तो उसे समझाना चाहिए था इस तरह अस्पताल में मेरी सेवा करते हुए खाली पेट दिन गुजार देने का क्या मतलब था?”

” तुम ही तो कहते हो ना कि वो बहुत ज़िद्दी  है। और किसी की नहीं सुनती । जब तुम्हारी नहीं सुनती तो मेरी कहां से सुनेगी?”

” पर यह तो सरासर बेवकूफी है।”

वरुण को पारो के इस त्याग के बारे में पहले कुछ नहीं मालूम था। और अब यह सुनने के बाद उसका मन पारो को देखने के लिए छटपटा रहा था।

” अच्छा तुम करो तो त्याग!  कोई और करें तो बेवकूफी! यह कैसा इंसाफ है वरुण? “

” वह बच्ची है प्रशांत !! इस उम्र में ऐसे व्रत करेगी तो उसके शरीर पर क्या असर पड़ेगा?”

” इतनी भी बच्चे नहीं है।  18 साल की हो चुकी है।  हमारा देश भी उसे वोट देने का अधिकार देता है। इसका मतलब समझते हो वह अपने बारे में निर्णय लेने में सक्षम हो चुकी है । और मुझे लगता है तुम से कहीं ज्यादा परिपक्वता से वह निर्णय लेती है। तुम्हें उसके निर्णय का आदर सम्मान करना चाहिए। “

प्रशांत की गहरी नजरें देखकर वरुण प्रशांत की बात समझ गया और झेंप कर दूसरी तरफ देखने लगा।

   लेकिन इस सब के साथ ही बाहर चाय की ट्रे लेकर खड़ी पारो ने भी वरुण की सारी सच्चाई सुन ली थी। एक तरफ तो उसका मन आह्लादित हुआ जा रहा था कि वरुण ने उसके लिए और उसकी परीक्षाओं के लिए मन्नत कर रखी है। और दूसरी तरफ आंखें भीगी जा रही थी क्योंकि जीवन में पहली बार किसी ने उसके लिए भगवान को चुनौती दी थी।
    अपने आराध्य को चुनौती देकर वरुण उसके लिए, सिर्फ उसके लिए मीठा त्यागे बैठा था। वह खुद भी जानती थी कि वरुण को मीठा कितना पसंद था। प्रतिदिन के भोजन के बाद उसे कुछ ना कुछ थोड़ी मात्रा में मीठा चाहिए ही होता था।
    कुछ नहीं मिलने पर वह भोजन के बाद लस्सी ही पी लिया करता था। जिसकी जगह आश्रम के बाकी लोग छांछ पिया करते थे। आश्रम के नियमों के अनुसार छांछ भोजन के बाद सभी को ही दी जाती थी, लेकिन मीठा ना होने की स्थिति में वरुण के लिए लस्सी ही बनाई जाती थी।
   और अब पारो को याद आ रहा था कि पिछले कई दिनों से वरुण ने लस्सी पीनी भी छोड़ दी थी। मीठा भी नही खा रहा था। और इस सब का कारण पारो उसकी बीमारी और परहेज से जोड़ कर देख रही थी।
   उसने धीमे से अपने ऑंसू पोंछे और चाय की ट्रे लेकर अंदर चली गयी।

Advertisements

    डॉक्टर और श्रेया वरुण और प्रशांत की बात सुनते अचरज में डूबे बैठे थे… उन दोनों के लिये ये बहुत नई और अलग सी बात थी कि दो एक एक दूसरे से अनजान लोग यूँ एक दूजे के लिए कष्ट उठा रहे हैं।

सबको चाय देने के बाद पारो वरुण के सामने ट्रे लिए खड़ी हो गयी, उसने धीमे से अपनी कप उठा कर पारो को देखा , पारो की आंखें छलक उठी। पर उसने अपने आंसूओं को गिरने नही दिया।
वरुण को एकाएक पारो की गीली आंखों का कारण समझ नही आया, उसने वापस उसे देख इशारों में ही कारण पूछा लेकिन पारो ने धीमे से न में सिर हिला दिया….
उसके मन में करुणा का जो स्त्रोत बह रहा था उसे वो किसी को बता पाने में असमर्थ थी।
उसके हृदय की करुणा का अंत न था। कम उम्र में ब्याह के बाद देव की साज सम्भाल में वो जब अपने पति में छिपे प्रेमी को देख पाने वाली थी कि भगवान ने ऐसा वज्रपात किया कि उसका सुखस्वप्न अचानक भंग हो गया।
प्रेम का बीज जो उसके हृदय में बस बोया था देव ने उसे खाद पानी मिल भी नही पाया और वो चला गया, लेकिन फिर अचानक वरुण के सानिध्य में ऐसा कौन सा अपनापन था कि वो बीज वापस अंकुरण को तैयार होने लगा था।
वरुण के साथ रहने पर उसे यही आभास मिलता की वो देव के साथ है। आंखें बंद करने पर तो लगता ही नही की सामने कोई और है।
यहां तक कि वरुण के पास से आने वाली भीनी सी महक भी उसे देव की ही लगती, वरुण का स्पर्श , उसकी आँखों की चावनी, उसका बोलते हुए बीच में अचानक रुक जाना, उसका दूर से खड़े होकर उसे अपलक निहारना… हर बात में तो देव शामिल होता था।
अब तो उसे कई बार यूँ लगने लगा था कि वरुण की हर हरकत उसके हर क्रियाकलाप के पीछे उसका देव ही हाथ बांधे खड़ा मुस्कुरा रहा है।
और तभी तो वो वरुण के और करीब जाने को इतनी उतावली हो उठी थी।
पर अब उसे अपने मन को बांधना होगा, अब उसे अपने जीवन का लक्ष्य मिल चुका है। और उस लक्ष्य की प्राप्ति तक अब उसकी राह में कोई रुकावट न आये यही उसकी चाह थी।
ईश्वर के घर रहते हुए भी अब उसका किसी बात के लिए हाथ फैलाने का मन नही करता था। वो सामने से होकर कृष्ण को रिश्वत ही देती आयीं थी।
आज भी उसने वही किया …….

” मेरे तीन दिन भोजन न करने से तुमने उन्हें (वरुण) स्वस्थ कर दिया था, अब उन्होंने मेरी परीक्षाओं के लिए मीठा खाना छोड़ रखा है, अगर इस बार उनकी मन्नत पूरी नही की तो तुम्हारा ये मन्दिर ये आश्रम छोड़ कर हमेशा के लिए चली जाऊंगी।
अगर मैं अपनी परीक्षाओं में सफल नही हो पाई तो न मैं अब तुम्हें मुहँ दिखाउंगी और न उन्हें।”

अपनी प्रतिज्ञा मन ही मन दुहराती वो वापस श्रेया के पास जा बैठी, और अपने मन में चल रही शंकाओं और सवालों को उससे पूछने लगी। श्रेया ने अपने साथ रखी पुस्तकें और बाकी का स्टडी मटेरियल उसके हवाले किया और उसे पढ़ने और याद रखने के नुस्खे बताने लगी।
उसके साथ बातों में डूबी पारो का फिर वाकई ध्यान न वरुण पर रहा और न वहाँ बैठे बाकियों पर।

Advertisements

डॉक्टर नन्दकिशोर वरुण और प्रशांत से बातों में लगा रहा पर रह रह कर वरुण का ध्यान पारो पर चला जा रहा था जो अपने और अपनी किताबों में मगन नज़र आ रही थी…..

क्रमशः

Advertisements

aparna…..

समिधा – 55

समिधा -55

   आश्रम एक बार फिर अपनी लय में चलने लगा। पूजा पाठ आरती प्रवचन सभी अपने तयशुदा समय पर पूरे होते चले जाते।  भगिनी आश्रम की कन्याओं का पाठशाला का मार्ग भी प्रशस्त हो चुका था।
    पारोमिता अपने तीन अन्य साथियों के साथ पूरे उत्साह से स्कूल जाने और आने लगी थी। लेकिन उसके स्कूल जाने के बावजूद उसके द्वारा की जाने वाली वरुण की भक्ति और सेवा में कोई कमी नहीं आई थी।
रोज सुबह स्कूल जाने से पहले वह वरुण की प्रवचन की सारी तैयारी निपटा कर जाती उसके बैठने के स्थान पर आसन बिछाना उसकी किताबें और कलम वहां रखना साथ ही गर्म पानी का कलश रखना इनमें से कोई ऐसा कार्य नहीं था जो पारो कभी भी भूलती।
   यह सारा कुछ निपटाने के बाद उसे भगिनी आश्रम की रसोई में भी अपनी सखियों के साथ थोड़ी मदद देनी ही पड़ती, भले ही आश्रम की बाकी महिलाएं उन चारों बालिकाओं को देखकर प्रसन्न थीं। पर उनमें कुछ ऐसी महिलाएं भी थी जिनकी आंखों में जलन की भावना चमकने लगती थी। उन्हें लगता था हम ही अकेले इतनी लंबी चौड़ी रसोई में क्यों जूझ रहे है। अगर यह लड़कियाँ बाहर पढ़ने जा रही हैं तो इन्हें एक तरह से बाहर घूमने का मौका मिल रहा है।


      आश्रम के कट्टर अनुशासन से भरे माहौल से बाहर कम से कम 6 घंटे का समय इन लड़कियों को मिल जाता है जिसमें यह अपने तरीके से जी लेती हैं। ऐसे विचार रखने वाली महिलाएं इन चारों पर कुछ अधिक ही कठोर दृष्टि रखने लगी थी और उन्हीं के बनाए नियमों के अनुसार पाठशाला के लिए निकलने से पहले इन सभी लड़कियों को रसोई घर में थोड़ी मदद देनी ही पड़ती थी। पाठशाला से वापस आने के बाद भी इन चारों को अपने हिस्से के काम करने ही पड़ते थे।
     इसका फल यह हुआ कि पारो के अलावा बाकी की लड़कियाँ टूटने लगी थी। उन्हें लगता स्कूल जाने और पढ़ाई करने की थकान ही क्या कम थी जो वहां से लौटने के बाद आश्रम में इतना सारा काम भी करना पड़ता है? उनमें से एक आध के कदम डगमगाने से भी लगे थे।
      और एक शाम जब वह चारों स्कूल से आने के बाद आश्रम के अपने काम निपटा कर सरोवर किनारे बैठे पाठशाला का बाकी बचा काम लिख रही थी तब सरिता अचानक फूट पड़ी….

” मुझे नहीं करनी है ये सारी पढ़ाई ।मुझसे नहीं हो पाएगा।”

” अरे ऐसा क्यों बोल रही है सरिता, हुआ क्या?”

” हुआ क्या तो तू ऐसे पूछ रही है पारो जैसे तुझे नहीं मालूम? देखकर लगता नहीं है कि आश्रम की कुछ दीदीयों का स्वभाव कितना बदल गया है हमारे लिए।
   स्कूल जाना शुरू करने से पहले हम जितना काम किया करते थे अब मुझे लगता है उससे कहीं ज्यादा काम हम पर लाद दिया जा रहा है। जैसे की ये सारी खूसंठ बुड्ढियां हम से बदला ले रहीं हैं , कि हम आश्रम से बाहर रोज घूमने जाते हैं। उन्हें क्या पता कि स्कूल में कितनी सारी पढ़ाई करनी पड़ती है वैसे ही दिमाग का दही हुआ जाता है। उस पर आश्रम आने के बाद इनके ढेर सारे काम निपटाओ।
   मैं नहीं पढ़ पाऊंगी पारो। यही हाल रहा तो बिल्कुल नहीं पढ़ पाऊंगी।”

  ” तू सही कह रही है सरिता। तुझे पढ़ना भी नहीं चाहिए कल ही तू अपना नाम स्कूल से कटवा ले। और फिर पूरी तरह से आश्रम की सेवा में जुट जा, क्योंकि इससे अच्छी जगह तो और कहीं हो नहीं सकती… ऐसे ही तू भी आश्रम की सेवा करते करते 1 दिन इन्हीं दीदियों की तरह खूसंठ हो जाना और फिर कभी कोई हमारी जैसी बालिका यहां चली आई तो उसे भी तू इसी तरह पढ़ने मत जाने देना। उस पर भी काम का बोझ लाद लाद कर उसे इतना झुका देना, कि वह भी टूट कर बिखर जाए और पढ़ाई के अपने सपने को अपनी आंखों से निकालकर इसी सरोवर में बहा दे।”

“तू क्या कह रही है पारो?”

  मधुलिका पारो की बात सुन कर चौंक गईं….. और आगे सरिता को देख कहने लगी…

” पढ़ाई छोड़ने के और भी तो फायदे हैं। पूरा दिन आराम से दीदियों की सेवा करने का सुअवसर भी तो इसे मिलेगा। फिर हो सकता है कि पद्मजा दीदी सबसे ज्यादा सरिता को ही पसंद करने लगे और आगे जाकर जब हम सब बुड्ढे हो जाए तब सरिता को ही भगिनी आश्रम की रसोई का पूरा कार्यभार पद्मजा दीदी के द्वारा मिल जाए इससे ज्यादा खुशी की बात क्या हो सकती है पारो?”

” तू सही कह रही है मधु । ऐसा ही होगा। “

  सरिता ने बारी-बारी से पारो मधुलिका नैना को देखा और मुंह उतार कर बैठ गई….

” तुम दोनों मेरा मजाक बना रही हो है ना?”

” जी हां जैसी बातें तू कर रही है उसके बाद कोई भी तेरा मजाक ही बनाएगा। हमारी शिक्षा का द्वार खुल जाए इसके लिए इस आश्रम ने कितना बड़ा कदम उठाया है , यह तू सोच भी नहीं सकती। अब अगर 1-1 कर हम हिम्मत हार कर पढ़ना ही छोड़ दें तो हमारे बाद कभी कोई यहां से पाठशाला नहीं जा पाएगा। हम हिम्मत ना हारे अगर अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ाते रहें तो यह हमारे इस आश्रम की एक परिपाटी बन जाएगी कि अगर कोई छोटी उम्र की बालिकाएं दुर्भाग्य से इस आश्रम का हिस्सा बनते हैं तो कम से कम उच्च शिक्षा से वंचित तो ना रहे।
   अगर हम चारों ही हिम्मत हार गए तो यह याद रखना कि भगिनी आश्रम से फिर कभी कोई लड़की पढ़ने के लिए नहीं निकल पाएगी।
    बस कुछ दिनों की तकलीफ है सरिता एक बार हम कुछ कर पाए , पढ़ पाए तो इन्हीं सब दीदियों के चेहरे पर हमारे लिए मुस्कान और आंखों में हमारे लिए आशीर्वाद होगा।
    अभी असल में वह अपने समय से हमारे
समय की तुलना करते हैं और इसीलिए दुखी हो जाती है । क्योंकि कहीं ना कहीं उन सब को भी इस मौके की चाह रही होगी जो उन्हें नहीं मिला लेकिन हमें मिल रहा है। और इसीलिए एक स्वाभाविक जलन और ईर्ष्या के कारण वह हमारा मार्ग रोकना चाहती हैं, बाधित करना चाहती हैं। लेकिन दिल ही दिल में कहीं ना कहीं वह शायद यह भी चाहती होंगी की हमारी तरह बाकियों को भी यह मौका मिले।
     हमें उनके स्वभाव का दूसरा हिस्सा देखना चाहिए और उस पर ध्यान देना चाहिए। अभी तो शुरुआत है इसलिए यह सब हमें देखना पड़ रहा है कुछ समय बीतने दो यही दीदियाँ हमारे पक्ष में बाकियों के खिलाफ खड़ी हो जाएंगी, तुम देखती रहना।”

   सरिता मुस्कुराकर पारो के गले से झूल गई।

” चल चल अब लाड बाद में लड़ाना, अभी ढेर सारा काम है स्कूल का। इसे फटाफट लिखना है तभी तो कल की इकाई परीक्षा में हमारे नंबर ठीक आएंगे। “

” ठीक आएंगे ? तेरे तो हमेशा ही अच्छे आते हैं… कभी एक नंबर भी नहीं कटता तेरा। पारो एक बात बता, तेरे साथ ऐसे कैसे होता है कि कक्षा में पढ़ाई की बातें तू एक बार में याद रख लेती है।”

” क्योंकि मैं अच्छे से जानती हूं कि मेरे पास समय कम है। और ढेर सारी पढ़ाई करनी है , तो जितना हिस्सा हमारे गुरुजी पाठशाला में पढ़ाते हैं उसे मैं उसी वक्त ध्यान से सुन कर दिमाग में रख लेती हूं। जिससे बाद में उसे सिर्फ एक बार पढ़ने पर ही वह हमेशा के लिए याद रह जाए।”

” ध्यान से तो मैं भी सुनती हूं पर मेरा दिमाग तेरे जैसा तेज नहीं है।”

” ऐसा कुछ नहीं है सरु। दिमाग तो हम सब के बराबर हैं। बस पढ़ाई करते समय तेरा ध्यान रसोई में लगा रहता होगा, कि आज रसोई में गोभी बन रही है या बैंगन?”

   पारो की बात सुनकर उसकी तीनों सखियां खिलखिला कर हंस पड़ी। वह चारों वापस अपना काम कॉपी में लिखने लगी , कि उसी वक्त आश्रम के ऑफिस से पारो के लिए बुलावा आ गया।

” पारो तुमसे मिलने कोई 2 लोग आए हैं ऑफिस में?”

पारो सोच में पड़ गई कि सप्ताह के बीच में उससे मिलने कौन से दो लोग आ सकते हैं? क्योंकि दर्शन तो महीने के आखिरी रविवार को ही उससे मिलने आ पाता था….

वो उठ कर ऑफिस की तरफ चल पड़ी। वो ऑफिस की तरफ बढ़ रही थी कि कृष्ण मंडप की सीढ़ियों में बैठे वरुण ने उसे जाते देखा और वह भी सोच में पड़ गया कि इस वक्त पारो ऑफिस क्यों जा रही है।
   वह भी यही बात सोचने लगा कि आखिर सप्ताह के बीच में पारो से मिलने कौन आ सकता है ? और अपने मन की शंका का समाधान करने वह भी धीमे कदमों से उठकर पारो के पीछे चल पड़ा।

   ऑफिस में दाखिल होते ही पारो कुछ पल को सामने बैठे दोनों लोगों को देखकर अचानक पहचान नहीं पाई और फिर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान खिल गई…..

” नमस्ते डॉक्टर साहब कैसे हैं आप?”

” मैं तो ठीक हूं तुम कैसी हो?”

तारों ने मुस्कुराकर गर्दन हाँ में हिलाई और उन दोनों के सामने कुर्सी खींचकर बैठ गयी। सामने बैठे डॉक्टर ने बाजू में बैठी लड़की से पारो का परिचय करवा दिया…..

” यह श्रेया है! तुम्हें बताया था ना, मेरी बहन है! और अभी मेडिकल एंट्रेंस के लिए तैयारी कर रही है। और श्रेया यह पारोमिता है! यह इस साल ट्वेल्थ में है! और यह भी डॉक्टर बनना चाहती है, तो तुम से जितनी हो सके इनकी मदद की अपेक्षा रखता हूं। “

श्रेया ने मुस्कुराकर पारो की तरफ देखा और अपने साथ लाया हुआ एक बैग उसके सामने खोल दिया।

” पारोमिता मेडिकल एंट्रेंस इतना आसान नहीं होता। दिन-रात पढ़ना पड़ता है, मैं भी पढ़ रही हूं। लेकिन मैं यह भी जानती हूं कि इस साल मेरा सिलेक्शन होना मुश्किल है और इसलिए मैंने सोच रखा है कि मुझे एक और साल इस एग्जाम के लिए तैयारी करने को लग जाएगा। इसलिए मैं अगले साल बिना किसी कॉलेज को ज्वाइन किये ड्राप लूंगी। और उस ड्रॉप ईयर में मैं एक बार फिर से मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी करके एग्जाम दूंगी और मैं जानती हूं कि मैं अगले साल सेलेक्ट हो ही जाऊंगी। तुम भी इस साल ट्वेल्थ में हो। और अब एग्जाम को दो या 3 महीने ही बचे हैं तो ऐसे में तुम्हारा भी इस साल सेलेक्ट होना जरा मुश्किल है।”

” पर मेरे पास ज्यादा समय नहीं है। “

पारो की यह बात सुनते ही दोनों भाई बहन एक दूसरे को देखने लगे…

” मतलब?” श्रेया के इस सवाल पर पारो ने उसी से पलटकर दूसरा सवाल कर दिया..

” आप हो सके तो मुझे यह बताइए कि एग्जाम के लिए क्या क्या पढ़ना पड़ता है ?और कितने विषय हमें पूरे पढ़ने होते हैं। मेरा चयन हो या न हो लेकिन मुझे तैयारी तो इसी साल पूरी करनी है। हर एक गुजरता दिन मुझे लंबा लगने लगा है , और यूँ लग रहा कब ये परीक्षा हो जाएं। “

  पारो की अजूबा बातें उन दोनों भाई बहन के लिए समझनी दुष्कर थीं।
   श्रेया ने वहीं बैठ कर फिर पारो को हर एक किताब और पढ़ाई की बारीकियां समझानी शुरू कर दी।
   खिड़की के बाहर से अंदर झांकते वरुण ने भी डॉक्टर को देख कर पहचान लिया था और उसकी समझ में आ गया था कि डॉक्टर अपनी बहन के साथ पारो को तैयारियों में मदद देने ही आया है।


    वरुण मुस्कुरा कर वहाँ से जाने को हुआ लेकिन फिर उसका मन वहाँ से एक इंच भी हटने का नही किया। उसे इस तरह सामने बैठी पारो को देखना बड़ा भला लग रहा था।
   श्रेया के साथ पुस्तकों को पलट पलट कर देखती और बेशुमार सवाल करती पारो उसे बहुत प्यारी लग रही थी। उसकी नज़रें पारो पर से हट नही पा रहीं थी और उन कुछ पलों में वो खुद को और अपनी प्रतिज्ञा को ही नही बल्कि इस बात को भी भूल चुका था कि ये ऑफिस भी आश्रम परिसर का ही हिस्सा है और वो जहाँ खड़े होकर अंदर झांक रहा है,वहाँ से वो बाकी आश्रमवासियों को आराम से नज़र आ रहा है।

     कुछ बातों में उलझी पारो की नज़र अचानक खिड़की पर चली गयी और उसे खिड़की पर खडा वरुण नज़र आ गया जो अपलक उसे ही देख रहा था।
   वरुण की नज़र अपने ऊपर महसूस होते ही उसके मन में कुछ अजीब सी खुशी की लहर दौड़ गयी। उसे लगा जैसे उसकी नसों में रक्त का प्रवाह बढ़ गया है। वो मुस्कुराने को थी कि वरुण अचानक पलट कर वापस जाने को हुआ कि उसके ठीक पीछे खड़े प्रशांत ने उसे थाम लिया..

“इतनी रफ्तार में कहाँ भागे जा रहे हैं वरुणदेव जी। ऑफिस में कुछ मेहमान आएं हैं ,ज़रा मिल तो लीजिये।”

  वरुण को लगा जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो। वो प्रशांत की पकड़ से छूट कर आश्रम की तरफ भाग जाने को छटपटा उठा पर प्रशांत ने कस कर उसकी बांह थाम रखी थी, और वो उसे साथ ले अंदर दाखिल हो गया….

क्रमशः

aparna …

समिधा -54

Advertisements

समिधा -54

डॉक्टर के केबिन में बैठी पारो को डॉक्टर ने सारी ज़रूरी बातें समझा दीं।

“अच्छा इसका मतलब अगर किसी का ऑपरेशन करना सीखना है तो उसके लिए तीन साल और पढना पड़ता है?”

“जी हाँ !  पहले पांच साल एम बी बी एस करना पड़ता है फिर 1 साल इंटर्नशिप करनी पड़ती है तब डिग्री कंप्लीट मानी जाती है।”

“मतलब डॉक्टर उसके बाद बन जातें हैं ?”

“हाँ डॉक्टर बन जातें हैं लेकिन किसी भी बीमारी या किसी विशेष विषय में विशेषज्ञ बनने के लिए तीन साल और पढना पड़ता है।”

“मतलब उसके बाद ही….

Advertisements

“हाँ उसके बाद ही ऑपरेशन करना सीख सकतें हैं।”

“तो फिर इन पांच सालों में क्या पढाते हैं?”

पारो की बात सुन डॉक्टर के चेहरे पर हंसी खेल गयी…

“आपको जैसा लगता है उतना आसान नही है हमारा शरीर। ये एक जटिल मशीन है जिसके कलपुर्जे आपस में ऐसे जुड़ें हैं कि एक सेकंड भी कोई चलने में आगे पीछे हुआ तो बहुत बड़ा अनर्थ हो बैठता है। पहले साल में तो बस हमारा शरीर क्या है और इसके अलग अलग सिस्टम की कार्यप्रणाली को ही पढ़ाया जाता है। ऑपरेशन वो भी शरीर के किसी हिस्से का कर डालना इतना आसान थोड़े ही होता है। आधे इंच का चीरा लगाने के लिए भी तुम्हें मालूम होना चाहिए कि वहाँ की त्वचा के नीचे कितनी वेन्स और नर्वस हैं। ऐसे ही सब सर्जन बन जाते होते तो क्या बात थी?
    ये सारी तो हुई मेडिकल पढ़ाई की बात लेकिन उस कॉलेज में घुसने के लिए भी तुम्हे अलग से इम्तिहान देना होगा, जो आसान नही होता।
   तुमने तो अभी तक बारहवीं के लिए स्कूल भी नही शुरू किया। और उस इम्तिहान में 60% हिस्सा बारहवीं के सिलेबस का ही आता है।”

“और बाकी 40% हिस्सा?”

“वो ग्यारहवीं का रहता है।”

“चलिए तब तो मेरी 40 % तैयारी हो चुकी है।”

  डॉक्टर पारो की बात सुन ज़ोर से हंसने लगा…

“आत्मविश्वास अच्छी बात है लेकिन ये तो अति आत्मविश्वास है। मैं यहाँ जूनियर रेजिडेंट हूँ, अभी एम डी के लिए तैयारी कर रहा हूँ पर मैं भी नही कह सकता कि मेरी पांच साल की पढ़ाई मुझे याद है।”

पारो मुस्कुरा कर रह गयी….

“क्या आप अपनी बहन से मेरी बात करवा सकेंगे।”

“हाँ बिल्कुल! आप अपना नम्बर दे दीजिए। मैं उसे दे दूंगा।”

“मैं आश्रम में रहतीं हूँ,मेरे पास कोई फ़ोन नही है। लेकिन आश्रम के ऑफिस का एक नम्बर है,वो दे सकती हूं। पर बहुत ज़रूरी होने पर ही वहाँ बात हो पाएगी। “

  डॉक्टर ने एक पर्ची पर एक नम्बर लिख कर पारो की ओर बढ़ा दिया…

“श्रेया!! ये मेरी बहन का नाम है। हम दोनों यहीं अस्पताल के बाहर ही अगले मोड़ पर कमरा लेकर रहतें हैं। वो अभी मेडिकल एंट्रेंस के लिए पढ़ रही है। वो तुम्हारी मदद कर सकती है। लेकिन मैं बता दूं कि एंट्रेंस निकालना कोई हंसी खेल नही है। बहुत मेहनत लगती है। चलो अब मैं निकलता हुँ। मेरा टी ब्रेक खत्म हो गया, मुझे और भी काम है।”

“आपका बहुत बहुत धन्यवाद डॉक्टर साहब!”

  मुस्कुरा कर डॉक्टर बाहर निकल गया उसके पीछे पारो भी बाहर चली आयी।

Advertisements

  वरुण प्रशांत आपस में बातचीत कर रहे थे। वरुण के दिमाग में यही घूम रहा था कि पता नही पारो डॉक्टर के कमरे में इतनी देर से उसे क्या बता या पूछ रही है।
उसी समय उनके दरवाज़े पर दस्तक हुई और दरवाज़ा खोल कर पद्मजा दीदी के साथ स्वस्तिकाचार्य और उनके पीछे उदयाचार्य भी अंदर दाखिल हो गए।

“अब कैसा लग रहा है वरुण?”

“जी आचार्य जी मैं अब पहले से काफी ठीक हूँ। पता नही डॉक्टर छुट्टी क्यों नही दे रहे?”

“उन्हें अपने अस्पताल का बिल जो बढ़ाना होता है। “
पद्मजा दीदी की ये बात वहाँ खड़े किसी भी व्यक्ति को सही नही लगी पर किसी ने उनकी बात का कोई विरोध नही किया।  पद्मजा की आंखें इधर उधर किसी को ढूंढ रही थीं, और ये बात वरुण और प्रशांत से छिपी नही थी।
    उन्होंने अपने साथ लाये फल वहीं एक किनारे टेबल पर रखने के बाद वरुण के लिए जूस ग्लास में ढालना शुरू किया ही था कि वरुण ने उन्हें टोक दिया…

“पद्मजा दीदी! इस वक्त कुछ मत निकालिए। मैं नाश्ता कर चुका हूं।”

“पर इतनी सुबह सुबह कैसे? अभी तो नौ ही बजें हैं।”

“जी दीदी ! पारोमिता ने सुबह ही वरुण के लिए यहीं दलिया बना लिया था। और उसके पहले इसे फल भी खिला दिए थे। अब ग्यारह बजे तक वरुण को कुछ नही खाना है। नाश्ते के ठीक दो घण्टे बाद उसकी एक खून की जांच होनी है।
मज़े की बात ये है कि अस्पताल से आने वाला नाश्ता भी देर से आया, उसके पहले ही वरुण नाश्ता कर चुका था। पारोमिता ने कल ही वरुण के पर्चे पर लिखे खाने पीने के समय को पढ़ लिया था, और उसी के हिसाब से सब कुछ दे दिया है।”

पद्मजा दीदी के चेहरे पर तनाव की रेखाएं उभर आयीं।

“वैसे हैं कहाँ पारोमिता? नज़र नही आ रही?”

उसी समय कमरे का दरवाज़ा खोले पारो भीतर चली आयी…
सब पर नजर पड़ते ही उसने सभी को प्रणाम किया और पद्मजा दीदी के पास आकर मुस्कुरा कर उनके पैर छूकर खड़ी हो गई।
इतने पर भी पद्मजा के मुंह से पारो के लिए कोई आशीर्वाद नहीं निकला, लेकिन उदयाचार्य स्वामी और स्वस्तिकाचार्य जी के चेहरे पर पारो को देखते ही एक मुस्कान खेलने लगी।

” बहन पारोमिता मैं तुम्हारा बहुत सारा आभार व्यक्त करता हूं कि हमारे आश्रम के कर्मठ और युवा योगगुरु कि तुम भली प्रकार सेवा कर रही हो। मैं जानता हूं हम सब आश्रम में एक साथ रहते हैं , और इसलिए एक दूसरे के प्रति एक लगाव मन में आ ही जाता है। बावजूद आवश्यकता पड़ने पर बहुत कम लोग ही इतनी तन्मयता और तत्परता से सेवा कर पाते हैं।
हमारे आश्रम में सिखाए जाने वाले सेवाभाव को तुमने इतने कम समय में जितनी आत्मीयता से ग्रहण कर लिया है उसके लिए तुम्हें जितना भी धन्यवाद कहें वो कम ही होगा।
उम्र में तो तुम हम सब से बहुत छोटी हो, लेकिन अपने सेवा भाव में तुमने बड़ों बड़ों को पीछे छोड़ दिया है। तुमने जिस लगन से वरुण की सेवा की है मैं यह चाहता हूं कि आश्रम में वरुणदेव के लौटने के बाद भी उसकी दवा और खाने-पीने का प्रबंध तुम अपनी निगरानी में ही करवाओ या स्वयं ही करो जैसा भी तुम्हें सुविधा हो। “

” जी स्वामी जी आपकी आज्ञा मेरे सर माथे पर। स्वामी जी मैं एक और बात के लिए आपसे आज्ञा लेना चाहती थी?”स्वस्तिकआचार्य ने पारो की तरफ देखा और इशारे से ही उसे पूछने को कह दिया...

Advertisements

” स्वामी जी आप सब के प्रयासों से भगिनी आश्रम की कन्याओं के लिए पाठशाला का मार्ग खुल तो गया है लेकिन अब तक प्रारम्भ नहीं हो पाया है। मैं जल्दी से जल्दी अपनी पढ़ाई वापस शुरू करना चाहती हूं। क्योंकि अब परीक्षाओं में ज्यादा समय नहीं बचा है। अगर अभी मैं स्कूल नहीं जा पाई तो कहीं मैं पिछड़ ना जाऊं, लेकिन मैं आप सभी को इस बात से भी निश्चिंत करना चाहती हूं कि मेरे स्कूल जाने से स्वामी जी की सेवा में मेरी तरफ से कोई भी कमी नहीं रह जाएगी। “

” हां यह बात भी हम लोगों को तुम सबसे बतानी थी कि ट्रस्ट की तरफ से पत्र आने के बाद पास ही स्थित शासकीय कन्या शाला में बातचीत हो गई है। और तुम्हारा और बाकी बहनों का दाखिला भी हो चुका है। हमारे आश्रम से बारहवीं के इस सत्र के लिए तुम्हारे अलावा तीन और बहनों ने दाखिले के लिए इच्छा जताई थी। तो तुम चारों का दाखिला करवा दिया गया है। तुम अगर चाहो तो कल से ही कन्या शाला जाना शुरु कर सकती हो।”

” जी आचार्यवर यह तो बहुत ही खुशी की बात है । मैं यहां से इनकी छुट्टी होते ही, अगले दिन से ही स्कूल जाना शुरू कर दूंगी। “

उदयाचार्य और पारो की बातें सुनते हुए वरुण के चेहरे पर मुस्कान खेल गई। वह भी अंदर ही अंदर जानता था कि पारो का पढ़ाई के प्रति विशेष अनुराग है।

” नहीं आचार्यवर!! भले ही डॉक्टर मुझे 2 दिन और अस्पताल में रखना चाहते हैं लेकिन अब उन्होंने मेरे इंजेक्शन बंद कर दवाएं शुरु कर दी हैं और वो मैं कहीं भी ले सकता हूँ। इसलिए मैं आज ही छुट्टी के लिए बात कर लूंगा।”

पारो तो चाहती थी कि वरुण अस्पताल और डॉक्टर की निगरानी में ही रहे लेकिन फिर वरुण की जिद के आगे उनमें से किसी की भी एक ना चली और वरुण ने डॉक्टर से बात करके उसी शाम डिस्चार्ज ले लिया।


वरुण को रह रह कर यही डर सताता कि पारो जैसे उसकी सेवा में लगी फिर रही है आश्रम इस बात को अन्यथा न ले। जाने लोग क्या बातें बनाएं?

लेकिन पारो को जैसे दीन दुनिया से कुछ लेना देना ही नही था , और होता भी क्यों? देव को खोने के बाद जब उसे इन्हीं दुनिया वालों की इन्हीं चार लोगों की सबसे ज्यादा ज़रूरत थी, उस वक्त इन्हीं लोगों ने उसे अपनी ज़िंदगी से बेदखल कर कृष्ण के नाम का बहाना लगा कर आश्रम में पटक दिया था।
तो अब वो इन सब से निश्चिंत हो चुकी थी।

पहले पहल तो वो फिर भी अपने मन में वरुण के लिए पनपते आकर्षण को गलत समझ कर खुद को रोकने का प्रयास भी करती थी। पर अब जबसे उसे वरुण से हुई मुलाकातों का ध्यान आया था तबसे उसे उसी में कृष्ण रूप के दर्शन होने लगे थे, और अब वो उसकी मीरा कह लो या राधा खुद को उसकी भक्ति से रोक पाने में असमर्थ थी।

वरुण जितना ही उसे देख संकुचित हो उठता, उतने ही जतन से वो उसकी सेवा में जुट जाती।

Advertisements

आश्रम आकर दो दिन बीत चुके थे, और एक दवा के अलावा अब वरुण की सारी दवाएं बंद हो चुकी थी। वरुण ने अब वापस अपनी आश्रम की दिनचर्या में आना शुरू कर दिया था, हालांकि प्रवचन अब भी नही दे रहा था, क्योंकि डॉक्टर के अनुसार उसे अब भी लगातार बोलने में होने वाली शक्ति की हानि का नुकसान उठाना पड़ सकता था।पर अब वरुण के स्वास्थ्य में पहले से कहीं अधिक सुधार दिखने लगा था। अब सुबह उठ कर वो सरोवर किनारे टहलने के बाद सूर्य को अर्ध्य देने के अपने सबसे पसंदीदा कार्य को करने को भी पूरी तरह तैयार था।

सुबह चार बजे उठ कर साढ़े पांच किलोमीटर में फैले आश्रम परिसर का चक्कर लगाने के बाद स्नान आदि से निपट कर वरुण सरोवर में कमर तक उतरा सूर्य को अर्ध्य दे रहा था।
उगते हुए सूर्य की किरणें उसके गौर धवल कंधों पर पड़ कर बिखर रहीं थी। पानी की बूंदे भी कमल पत्र पर जैसे संकलित हों चमकती हैं वैसे ही चमक रहीं थीं।
अर्ध्य देने के बाद जैसे ही उसने वापस जल हाथ में लेने के लिए पानी में हाथ डाला उसे लगा जैसे उसके ठीक पीछे कोई खड़ा उसे निहार रहा है।
उसने सिर घुमा कर पीछे देखा और उसकी आंखें प्रसन्नता से चमक उठीं।

सामने पारो खड़ी थी। स्लेटी रंग के कुर्ते और सफेद सलवार और दुपट्टे के साथ दो चोटियां सामने लटका कर खड़ी पारो ने कंधे पर एक बस्ता भी टांग रखा था। उससे कुछ दूरी पर सरोवर की सीढ़ियों के ऊपर सविता नयना और मधुलिका भी अपना बस्ता टांगे खड़ी आपस में बातें करती पारो का रास्ता देख रहीं थीं।
पारो आज अपने स्कूल के प्रथम दिवस पर स्कूल जाने से पहले वरुण से आशीर्वाद लेने सरोवर की सीढ़ियां उतर आई थी।
उसे देख वरुण ऊपर चला आया।

पारो ने झुक कर वरुण के पैर छुए और वरुण का हाथ पारो के सिर पर अनजाने ही रखा गया….

“सदा खुश रहो!”

पारो ने खड़े होकर उसके सामने हाथ जोड़ दिए…

“आशीर्वाद दीजिये की जिस इच्छा को पूरा करने दुबारा पढ़ाई शुरू करने की ललक जागी है वो पूरा कर सकूं।”

वरुण मुस्कुरा कर रह गया…

Advertisements

“वैसे भी तुम बहुत ज़िद्दी हो, जो चाहती हो पूरा कर के ही मानती हो।”

“इसलिए आपके कृष्ण मेरी वांछित वस्तुओं को मुझसे छीन लेते हैं क्या?”

“ऐसा नही कहते पारो। बहुत बार हम उसकी इच्छा अनिच्छा समझ भी तो नही पाते, और इसलिए हमें बस ये दिखता है कि हमने ये खो दिया लेकिन उसके बदले में वो हमें जो देता है उसे हम नज़रंदाज़ करते चले जातें हैं।”

“मुझे आपकी ये गहरी बातें समझ में नही आतीं। बस ये समझ आता है कि कृष्ण भी उन्हीं का जीवन कठिनताओं से भर देते हैं जिन्हें जीने की सर्वाधिक चाह होती है।”

“जाओ!!! आज तुम्हारा स्कूल का पहला दिन है, अच्छे मन से जाओ। प्रसन्नता से जाओ। तुम्हारे जीवन के एक नए अध्याय की शुरुवात है । कृष्ण तुम्हारी हर मनोकामना पूर्ण करें।”

” शायद आपकी ही प्रार्थना आपके कृष्ण सुन लें और मेरे मन की बात पूरी हो जाये। “

मुस्कुरा कर वरुण को प्रणाम कर आत्मविश्वास से भरे ऊंचे ऊंचे डग भरती पारोमिता अपनी सखियों के संग अपने जीवन के एक नए अध्याय को रचने के लिए अपने सामने फैले विस्तृत आसमान में पंख पसारे आगे बढ़ गयी…..

…….. उस वक्त शायद उसे भी नही मालूम था कि अब उसका जीवन किस करवट बैठने वाला है…

क्रमशः

Advertisements

aparna…

समिधा -53

Advertisements

समिधा – 53

हंसते खिलखिलाते बातों में कब समय बीतता गया उन लोगों को पता ही नहीं चला। रात नर्स ने आकर उन लोगों को याद दिलाया कि रात के समय एक बहुत जरूरी गोली वरुण को देनी है... और याद दिला कर वह चली गई । जाते जाते उसने अपने मोबाइल पर टाइम अलार्म सेट कर लिया।

उस कमरे में मरीज के बेड के अलावा एक बेड अटेंडर के लिए था और इसके साथ ही एक सिंगल सोफा लगा हुआ था….

Advertisements

“मैंने गलती कर दी पारो!! मुझे तुम्हें रोकना नहीं चाहिए था अब तुम यहां सोओगी कहां?”

प्रशांत की चिंता में उसके अंदर छिपा बड़ा भाई नजर आ रहा था , जो पारो के लिए चिंतित हो रहा था। उसके मन में यह संशय भी घूम रहा था कि उन दोनों के साथ अकेले पारो को संकोच होगा।
लेकिन पारो तो जैसे अपने मन की हर चिंता हर संशय और हर ग्लानि को भूल चुकी थी। अभी उसके मन में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी, कि जैसे भी हो वरुण स्वस्थ हो जाएं। वरुण के सामने उसे बाकी सारी बातें बेमानी लग रही थी। उसके मन में एक बार भी यह नहीं आया कि आश्रम की महिलाएं उसके इस तरह अस्पताल में रुक जाने को लेकर बातें भी बना सकती हैं। पद्मजा दीदी के चेहरे का गुस्सा उसने खुद देखा था बावजूद वह वरुण के स्वास्थ्य के अलावा कुछ भी सोच पाने में अभी खुद को असमर्थ पा रही थी।
वरुण थक कर सो गया था लेकिन पारो की आंखों में नींद कहाँ? प्रशांत भी कुछ देर जागने के बाद अपने बेड पर सो गया। लेकिन पारो उस कुर्सी में बैठी जागती रही । रात में जिस वक्त पर नर्स ने दवा देने को कहा था, ठीक उसी वक्त पर वह उठकर वरुण को दवा दे रही थी कि नर्स कमरा खोल कर अंदर आने लगी। जैसे ही उसने पारो को दवा देते हुए देखा वह मुस्कुरा कर वापस मुड़कर बाहर चली गई।
उसी समय आहट से प्रशांत की नींद खुली और उसे भी समझ में आ गया की नर्स के अलार्म से पहले ही पारो ने वरुण को दवा खिला दी।
मुस्कुरा कर उसने भी करवट बदली और अपनी आंखों पर हाथ रख कर सो गया।

Advertisements

अगली सुबह से ही पारो चाक-चौबंद सारे काम जल्दी जल्दी निपटाती बार-बार दरवाजे को ताक रही थी । वरुण और प्रशांत दोनों की समझ से परे था कि पारो की नजरें दरवाजे पर किसके लिए टिकी हैं? और वह किसका इतनी शिद्दत से इंतजार कर रही है।
हॉस्पिटल के उस कमरे में एक तरफ छोटे-मोटे किचन जैसी व्यवस्था भी थी… जहां पर एक इंडक्शन कुकटॉप के साथ ही जरूरत भर के बर्तन कॉफी परकॉलेटर टी बैग आदि मौजूद थे।
जाने कहां से क्या-क्या व्यवस्था करके पारो ने इंडक्शन कुकटॉप पर ही सब्जियां डालकर दलिया बना लिया और वरुण और प्रशांत के सामने परोस भी दिया। वरुण को खाली पेट खिलाने वाली दवा के बाद ही उसने नाश्ता दिया था , उसी समय नर्स वरुण की दवाई लेकर उस कमरे में दाखिल हुई। उसने वरुण को नाश्ता करते देखा की उसका दिमाग ठनका वो तुरंत ही आगे बढ़कर उसे टोकने को थी कि उसके पहले ही पारो ने दवा का पत्ता दिखाते हुए कह दिया …..

” यह खाली पेट खाने वाली गोली मैंने इन्हें दे दी है। अस्पताल में आप लोग नाश्ते में जो सैंडविच देते हैं वह कच्ची ब्रेड इनसे खाई नहीं जाती। इसलिए मैंने यहां पर जो इंडक्शन कुकटॉप था उस पर इनके लिए दलिया बना लिया। बिल्कुल ही बिना तेल और कम नमक में बना दलिया है, जो मरीजों को दिया जा सकता है। “,

“लेकिन आपने बिना हम लोगों से पूछे ऐसे कैसे नाश्ता दे दिया? इन्हें हॉस्पिटल में भर्ती मरीजों का खाना नाश्ता सब अस्पताल की तरफ से ही दिया जाता है! उनकी कैलरीस काउंट करके ही हमारे यहां के डायटिशियन इन का खाना तैयार करती है , और आपने उन्हें दलिया दे दिया। अगर डॉक्टर साहब कुछ कहेंगे तो इसकी जिम्मेदारी आपकी होगी?”

” जी सिस्टर!! मैं सारी जिम्मेदारी लेने को तैयार हूं। लेकिन डॉक्टर साहब आए तब तो। मैं कल से आकर यहां रुकी हूं लेकिन मैंने अब तक डॉक्टर को देखा ही नहीं।”

” डॉक्टर साहब व्यस्त रहते हैं। उन्हें ओपीडी देखनी होती है और इंडोर भी देखना होता है! इसके अलावा उनकी सर्जरीज़ भी शेड्यूल होती हैं, वह अपने समय पर ही आते हैं।”

” जी आप सही कह रही हैं, लेकिन सुबह और शाम दो बार तो उनके राउंड के बारे में कमरे के बाहर लिखा ही हुआ है। इसके बावजूद वह कल शाम को आए ही नहीं इसलिए बस मैंने पूछा।”

हो गया कबाड़ा! यह लड़की हर जगह शुरू हो जाती है। भगवान ने इसे बुद्धि तो दे दी लेकिन कहाँ बोलना है कहाँ नही ये नही सीखा पाए। ये इतना बोलती क्यों है? एक बार शुरू हुई कि फिर इसे रोकना मुश्किल हो जाता है।
वरुण मन ही मन सोचता परेशान होता रहा और पारो नर्स से उलझी रहीं।

“पारोमिता!! डॉक्टर साहब अपने समय से आ ही जाएंगे… इतना परेशान होने की ज़रूरत नही है। उनका समय बहुत कीमती है। संजीदा मरीजों की खोज खबर पहले ली जाती है।” वरुण से नही रहा गया और उसने पारो को टोक दिया।

“मैं आप सब की बात समझती हूं,बस यही कहना चाहती हूं, कि हम जैसों यानी मरीज़ के परिजनों के लिए तो हमारा मरीज भी संजीदा ही है। और देखा जाए तो अस्पताल में भर्ती हर एक मरीज संजीदा है, जब तक उसकी छुट्टी नहीं हो जाती। क्योंकि कब क्या हो जाए कहा नहीं जा सकता। तो अगर डॉक्टर साहब अपने तय समय के अनुसार हर एक मरीज को देखें तो इसमें कोई बुराई तो नहीं है। “

नर्स पारो की बात का अभी कोई कड़ा जवाब देने की सोच ही रही थी, कि दरवाजा खोल कर एक युवा सा दिखने वाला डॉक्टर अंदर चला आया।

Advertisements

उसके आते ही नर्स ने एकदम से तत्परता दिखानी शुरू की और तुरंत वरुण की फाइल निकालकर उसका दैनिक रूटीन का चार्ट निकाल कर डॉक्टर को दिखाने लगी। इस सबके बीच कहीं पारो कुछ बोल ना दे इसलिए वरुण की निगाहें पूरी तरह से पारो पर टिकी थी, लेकिन पारो चुपचाप शांत खड़ी डॉक्टर को ही देख रही थी।

डॉक्टर ने सारा चार्ट अच्छे से पढ़ने के बाद एक बार वरुण का खुद बीपी चेक किया और चार्ट से मिलाकर राइट टिक करने के बाद नर्स से कुछ थोड़ी बहुत धीमी आवाज में बातचीत की और वरुण की तरफ मुड़ गया..

” सो अब कैसा फील कर रहे हैं आप?”

” पहले से काफी बेहतर हूं। “

” लेकिन रिवर्स कंजेशन ना हो जाए, इसलिए अभी एक-दो दिन आपको अस्पताल में ही रहना पड़ेगा। वैसे मेरे ख्याल से आप अपनी तकलीफ जानते ही होंगे तो इसलिए कुछ बातों का आपको हमेशा ध्यान रखना होगा और वह मैं आपकी डिस्चार्ज टिकट में मेंशन कर दूंगा। “

” डॉक्टर साहब इनकी तकलीफ क्या है, मेरा पूछने का मतलब है इनकी बीमारी क्या है? और उसका सही इलाज क्या हो सकता है?”

पारो ने बहुत संयमित और धीमें शब्दों में अपना सवाल डॉक्टर से पूछ लिया और वरुण प्रशांत को देखने लग गया। वरुण को नहीं मालूम था कि प्रशांत पारो से पहले ही सब कुछ बता चुका है बावजूद पारो डॉक्टर के मुंह से सब कुछ जानना और सुनना चाहती थी।

” जी मैं इनकी सारी समस्या आपको बताता हूं। वैसे इन्हें डॉक्टर मुरली राव देख रहे हैं। मैं जूनियर डॉक्टर हूं डॉक्टर नंदकिशोर। इनकी समस्या मैं सीधे और साफ शब्दों में आप को समझाने की कोशिश करता हूं!
ह्रदय हमारे शरीर का एक ऐसा जरूरी अंग है, जिसके कारण ही हमारे पूरे शरीर को रक्त की आपूर्ति होती है। हर एक अंग को रक्त की सप्लाई करने के साथ ही हृदय की अपनी एक स्वयं की भी परिसंचरण प्रणाली होती है। क्योंकि हृदय को भी अपना कार्य करने के लिए रक्त की आवश्यकता होती है।
हमारे ह्रदय में तीन मुख्य वाहिनीयों में अगर रक्त में गाढ़ापन आता है तो ब्लॉकेज होने लगता है। जिसके कारण ह्रदय अवरोध या हार्टअटैक जैसी समस्या का सामना करना पड़ता है।
इस समस्या में रोगी की बीमार या दूषित वेन को रिपेयर कर के या स्टंट डाल कर दुरुस्त किया जा सकता है। एक बार अगर उस दूषित नली में स्टंट डाल दिया जाए तो रोगी 10 से 15 साल के लिए सुरक्षित हो जाता है। आजकल के जमाने में यह एक सामान्य और सुरक्षित प्रक्रिया है जिसमें बहुत ज्यादा खर्च भी नहीं आता।
लेकिन वरुण जी की समस्या थोड़ी अलग है।
हार्ट की पेरिफेरी में जो वेंस होती हैं वह अपेक्षाकृत काफी बारीक और पतली होती हैं। और अगर उनमें ब्लॉकेज की समस्या आती है तो उनमें स्टंट डालकर उन्हें रिपेयर करना काफी ज्यादा मुश्किल होता है। ये एक जटिल शल्य क्रिया है, जो अब तक हमारे शहर में उपलब्ध नहीं है।
ईस में रोगी वैसे तो सामान्य होता है, और उसे कोई ज्यादा समस्या नहीं होती लेकिन कभी अचानक ही उसकी समस्या बढ़ भी सकती है।
वरुण जी के हार्ट के एक वॉल्व में भी समस्या है। और उसे भी रिपेयर करना जरूरी है । उनके वॉल्व की समस्या का निराकरण हमारे अस्पताल में हो सकता है। लेकिन उनकी दूसरी समस्या थोड़ी बड़ी है और जिससे निपटना फिलहाल हमारे अस्पताल के बस में नहीं है । इसलिए जो आवश्यक जीवन रक्षक दवाएं हैं, वह हम उन्हें देकर स्टेबल करने की कोशिश में है। और दवाओं के असर से वो स्टेबल हो भी चुके हैं।
दवाये रुकने के बाद कहीं उन्हें वापस वही लक्षण आने शुरु ना हो जाए इसलिए उन्हें 2 दिन अस्पताल में रखकर दवाए हटाकर हम उनकी जांच करते रहना चाहते हैं । जिससे बिना किसी संशय के हम उन्हें यहां से डिस्चार्ज कर सके।
इसके बाद भी मैं कुछ दवाइयां उन्हें लिख कर दूंगा जो आप उन्हें अगले 1 महीने तक रोज दीजिएगा। एक महीने बाद उन्हें वापस लाकर अस्पताल में दिखाने के बाद हम निर्णय लेंगे की ये दवाइयां आगे कंटिन्यू करनी है या बंद करनी है। “

” जी बहुत-बहुत धन्यवाद आपका डॉक्टर साहब!! आपने मेरे मन की काफी सारी शंकाएं दूर कर दी। मैं जानना चाहती हूं , कि जो सीनियर डॉक्टर इन्हें देख रहे हैं क्या वह सर्जरी नहीं कर सकते? “

सत्यानाश ये लड़की कहां से कहां पहुंच जाती है। कहां तो मैं अस्पताल ही नहीं आना चाहता और कहां यह मेरी सर्जरी प्लान करने लग गई। कोई इस लड़की को रोकता क्यों नहीं?
वरुण ने बहुत लाचारगी से प्रशांत की तरफ देखा और प्रशांत ने मुस्कुरा कर अपनी आंखें पारो पर टिका दी।

” जी जो इनका केस देख रहे हैं वह हमारे यहां के काफी सीनियर डॉक्टर है। हमारे यहां के सबसे प्रसिद्ध कार्डियोलॉजिस्ट हैं, यह हार्ट सर्जरी भी करते हैं। बड़े-बड़े शहरों से इन्हें सर्जरी के लिए बुलाया भी जाता है। लेकिन वह भी ये सर्जरी परफॉर्म नहीं कर सकते जिसकी जरूरत वरुण को है। “

” वो सर्जरी कौन से डॉक्टर कर सकते हैं और वह हमें कहां मिलेंगे?”

Advertisements

” एक बार आप लोग दिल्ली के बड़े अस्पताल जेम्स में पता कर सकते हैं। लेकिन मेरी जानकारी में अब तक वहां पर भी ऐसी कोई सर्जरी परफॉर्म नहीं की गई है। दिल्ली के अलावा अगर कहीं पता करना है तो वेल्लोर मेडिकल कॉलेज में भी आप लोग पता कर सकते हैं।
यू एस के एक डॉक्टर साहब हैं जो कार्डियक सर्जन है और स्पेशली पेरिफेरल सर्जरी के लिए ही फेमस है। वह दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में बुलाए जाने पर आकर इस सर्जरी को परफॉर्म कर चुके हैं। लेकिन सिर्फ एक सर्जरी के लिए उनको बुलाना बहुत ज्यादा महंगा पड़ सकता है। क्योंकि इसमें उनके आने-जाने रहने के खर्चे के साथ ही उनकी फीस भी देनी होगी इसके अलावा इस सर्जरी के बाद मरीज की पोस्ट ऑपरेटिव देखभाल के चार्जेस भी जुड़े हुए रहते हैं। “

पारो कुछ और पूछ पाती इसके पहले ही वरुण ने उसे रोक दिया…

” नहीं डॉक्टर साहब मैं कोई सर्जरी नहीं करवाना चाहता हूं। मुरली मनोहर ने चाहा तो मैं ऐसे ही सारी जिंदगी गुजार लूंगा। “

” मैं तो यही कहूंगा कि अगर आपके पास इतना रुपया है कि आप उन डॉक्टर को अफोर्ड कर सकते है तो आप सर्जरी करवा लीजिए। वरना दूसरा उपाय यही है कि आप जिंदगी भर दवाइयां लेते रहिए। वैसे आप अच्छा इंप्रूव कर रहे हैं । अभी पिछले 7 घंटे से हमने दवाइयां विड्रॉल पर डाली हुई है, और आपकी बॉडी सही रिस्पांस दे रही है। गुड लक मिस्टर वरुण!!
वैसे मैं शाम को एक बार फिर राउंड पर आऊंगा। तब हम आपकी प्रोग्रेस को और ज्यादा सही ढंग से समझ पाएंगे। “

डॉक्टर ने वरुण को मुस्कुरा कर देखा उसके बाद पारो को देख कर बाहर निकल गया। पारो ने वरुण और प्रशांत की तरफ देखा और वह भी भाग कर उस डॉक्टर के पीछे कमरे से बाहर निकल गई….

” डॉक्टर साहब क्या आप मुझे सिर्फ 5 मिनट और दे सकते हैं। “

डॉक्टर ने मुड़कर पारो को देखा और फिर उसे हाथ के इशारे से गलियारे की तरफ इशारा कर दिया।

” हां!! यह मेरा केबिन है! वहां आराम से बैठकर हम बात कर सकते हैं।”

पारो ने मुस्कुराकर हां बोला और डॉक्टर के तेज कदमों से कदम मिलाते उसके पीछे पीछे केबिन की तरफ बढ़ गई।
केबिन में उसे कुर्सी पर बैठाने के बाद डॉक्टर अपनी सीट पर बैठ गया। उसने एक छोटी सी बेल बजाई और इसके साथ ही एक आया दरवाजा खोल कर एक कप कॉफी लिए हाजिर हो गई।

” इनके लिए भी एक कप ले आइए। “

“नही सर , मुझे ज़रूरत नही है। “

डॉक्टर ने आया को जाने का इशारा किया और अपना कॉफी का कप उठाकर पारो की तरफ देखने लगा

” हॉं तो पूछिये आप और क्या जानना चाहती थी?”

“सर आप डॉक्टर हैं?”

पारो के सवाल पर उस डॉक्टर को हंसी आने लगी उसने हंसकर पारो से कहा..

” जी बिल्कुल डॉक्टर ही हूं। “

” सर मैं यह जानना चाहती हूं, कि डॉक्टर बनने के लिए क्या करना पड़ता है? मतलब कि क्या पढ़ना पड़ता है? पढ़ाई कितनी लंबी होती है? और इसके अलावा बाकी सब कुछ.. जो भी डॉक्टर बनने के लिए जरूरी है?

” क्या आप डॉक्टर बनना चाहती हैं?”

” जी सर!! बचपन में मेरे बाबा अक्सर कहा करते थे, कि मेरी सोना बड़ी होकर डॉक्टर बनेगी… लेकिन बाबा ने ज्यादा साथ दिया नहीं!
हो सकता है अगर आज मेरे बाबा जिंदा होते तो मेरी भी शादी नहीं हुई होती और मैं भी शायद 12वीं के बाद डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही होती। लेकिन बाबा ने बहुत जल्दी साथ छोड़ दिया। उसके बाद मां से जितना हो सके मुझे पढ़ाने लिखाने के बाद मेरा ब्याह कर दिया।
उसके बाद मुझ पर ऐसी किस्मत की मार पड़ी कि मेरे ससुराल और मायके वालों ने मुझे इस आश्रम में लाकर छोड़ दिया। यहां इन्ही आचार्य वरुण जी के कारण मेरा आगे पढ़ने का सपना पूरा हो पा रहा है।
आज अब इस साल मैं 12वीं की परीक्षा दे पाऊंगी। तो बस यही जानना चाहती हूं कि क्या मैं भी डॉक्टरी पढ़ने के अपने बचपन के सपने को पूरा कर सकती हूं….

” बिल्कुल कर सकती हो। और इसमें मैं तुम्हारी पूरी मदद भी करूँगा। मेरी एक छोटी बहन है जो इस साल 12वीं में है, और वह पिछले 2 साल से मेडिकल एंट्रेंस के लिए तैयारी कर रही है। तुम चाहो तो अपना कोई नंबर दे दो , मैं उससे तुम्हारी पूरी बात करवा दूंगा कि तुम्हें कैसे और क्या पढ़ाई करनी है।
और बाकी की जानकारी कि मेडिकल की पढ़ाई क्या होती है कैसे होती है यह सब मैं तुम्हें बता देता हूं…….

इधर कमरे में हैरान-परेशान वरुण प्रशांत की तरफ देख रहा था प्रशांत ने मुस्कुरा कर वापस कंधे उचका दिये…..

” अब ये बाहर क्यों चली गई प्रशांत? पता नहीं अब उन डॉक्टर साहब से क्या बोल बैठेगी?”

” अब तुम यह सब सोच सोच कर चिंता मत करो। चुपचाप आंखें बंद करके आराम करो। अगर जल्दी वापस लौटना है तो जल्दी से जल्दी तुम्हे ठीक भी होना पड़ेगा वरुण। “

उसी वक्त दरवाजा खुला और नर्स के साथ एक दोहरे शरीर वाली महिला भीतर दाखिल हुई…

” हेलो मिस्टर वरुण मैं हूं डॉक्टर काम्या आपकी डाइटिशियन। नर्स ने मुझे जाकर शिकायत की थी कि आपने सुबह नाश्ते में सैंडविच की जगह दलिया खाया है। मैंने आप की कटोरी भर दलिए की कैलरीज़ निकाली और साथ ही जो सैंडविच मैं आपको देने वाली थी उसका भी।
दोनों ऑलमोस्ट सेम ही था। एक और बात अगर आपको दलिया पसंद है तो आप अगले 2 दिन भी दलिया खा सकते हैं मैं हमारी किचन से आपके लिए सैंडविच की जगह दलिया ही भेजूंगी। “

” नहीं ऐसी कोई बात नहीं है डॉक्टर आप सैंडविच भी भेज सकती हैं। “

वरुण को पारो के इस कृत्य पर शर्मिंदगी सी महसूस हो रही थी । और उसे लग रहा था कि इतने बड़े अस्पताल के डॉक्टर और नर्स सब पारो की इस हरकत के कारण परेशान हो उठे हैं ।इसलिए वह अपनी तरफ से मामले को सुलझाने की कोशिश में था।

” नो, नो प्रॉब्लम!! आप दलिया ही खाइए मैं आपको दलिया ही भेजूंगी! आप ब्रेड मत खाइए!”

” अरे नहीं मैडम मुझ अकेले के कारण आप परेशान मत होइए। आप बाकी पेशेंट के लिए जो भेजती हैं, मैं भी वही खा लूंगा। मुझे भी आप सैंडविच ही भेज दीजिएगा। “

” अरे आप समझ क्यों नहीं रहे हैं, ब्रेड में यीस्ट पड़ी होती है और आपको जो दवाइयां दी जा रही है, उन के साथ यीस्ट प्रॉब्लम क्रिएट कर सकता है और आपको इससे नुकसान हो सकता है….

Advertisements

वरुण की जिद के कारण आखिर डाइटिशियन बोलते बोलते बिना सोचे समझे अपनी रॉ में सच्चाई बोल गई । असल बात तो यह थी कि उसने वरुण को भी एक सामान्य ह्रदय रोगी समझ कर उसका डाइट चार्ट तैयार कर दिया था ।जबकि डाइट चार्ट तैयार करने के पहले उसे वरुण को दी जाने वाली दवाइयों को भी देखना चाहिए था जो कि उसने नहीं देखा था।
वरुण को दी जाने वाली दवाइयों के साथ ब्रेड का उपयोग नहीं किया जाता है। यह उस डाइटिशियन को मालूम था लेकिन अनजाने में उसने बिना दवाई देखे ही वरुण के लिए भी सैंडविच ही डाइट में शामिल कर दिया था।
इत्तेफाक से सुबह सैंडविच आने के पहले पारो ने वरुण के लिए गर्म दलिया तैयार कर लिया था।
पर यह बात नर्स को बहुत नागवार गुजरी थी, क्योंकि देखा जाए तो यह अस्पताल के नियमों के खिलाफ भी था और इसीलिए नर्स एक कटोरी दलिया लिए डाइटिशियन के पास पहुंच गई थी। जिससे सारे सबूतों के साथ वह अस्पताल मैनेजमेंट में पारो के खिलाफ शिकायत दर्ज कर सकें। लेकिन डाइटिशियन ने जब दलिए और सैंडविच की कैलरी काउंट करने के बाद वरुण का दैनिक रूटीन चार्ट चेक किया तब अचानक उसकी नजर वरुण की दवाइयों पर पड़ी और उस वक्त डाइटिशियन के दिमाग की बत्ती जल उठी।
हे भगवान!! ये कितनी बड़ी गलती करने जा रही थी वो। वो तो अच्छा हुआ मरीज़ ने ब्रेड नही खाई। अगर खा ली होती तो ?
बहुत बड़ा अनर्थ टल गया था…!

इत्तेफाक से ही सही लेकिन मरीज को दिया गया नाश्ता दलिया ही मरीज के लिए बेहतर था और अगर गलती से वरुण सैंडविच खा लेता तो उसे ज्यादा नुकसान हो सकता था।
बस इसी बात को घुमा फिरा कर समझाने के लिए डाइटिशियन खुद उसके कमरे में आई थी लेकिन वरुण की जिद के कारण डाइटिशियन के मुंह से इतनी शिद्दत से छिपाई गई बात निकल गई और सच्चाई वरुण और प्रशांत के सामने आ गई।
पारो की शिकायत करने के मंसूबों पर पानी फिर जाने से और अपनी गलती पकड़ में आ जाने से नर्स चुपचाप उन सब से आंखें चुरा कर कमरे से बाहर निकल चुकी थी।
डाइटिशियन ने भी अपनी बात अधूरी ही छोड़कर वहां से खिसक लेने में ही भलाई समझी और वह भी वरुण को कुछ हेल्थ टिप्स दे कर जल्दी ही वहां से बाहर निकल गई।

उन दोनों के वहां से जाते ही कमरे में वरुण और प्रशांत ही रह गए। दोनों अचरज से एक दूसरे की तरफ देख रहे थे।

” मुझे तो लगता है वरुण , मुरली वाले ने तेरी रक्षा करने के लिए ही पारो को भेजा है। इसलिए अब चुपचाप आंख मुंह बंद करके वो जो कहती है मान लिया करो। “

” वह सब तो ठीक है लेकिन अभी वह डॉक्टर के साथ क्या बातें कर रही होगी? मैं तो यही सोच कर परेशान हूंआ जा रहा हूं…

” मत परेशान हो, वह आएगी तो वैसे ही सब कुछ बोल जाएगी….

हमेशा की तरह वरुण मुस्कुराने लगा कि तभी दरवाजे पर एक आहट सी हुई…

क्रमशः

Advertisements

aparna…

समिधा – 52


समिधा – 52

     पद्मजा दीदी को अच्छा तो नही लगा लेकिन उदयाचार्य जी के खिलाफ जाकर पारो को साथ ले जाने की उनकी हिम्मत नही थी।
    चेहरे पर गुस्से के भाव लिए वो वहाँ से चली गयी।  उनके चेहरे के भाव देख वरुण भी पल भर को घबरा गया । उसे लग रहा था पारो को यहाँ नही रुकना चाहिए और उनके साथ चले जाना चाहिए।
  लेकिन पारो  के चेहरे पर न कोई बेचैनी थी और न कोई घबराहट, जैसे वो सब कुछ पहले ही तय कर चुकी थी।

कभी कभी वरुण पारो के इस निर्भीक स्वभाव से डर भी जाता था।
प्रशांत निर्विकार भाव से खड़ा था।

   बाकी सब के वहाँ से जाते ही कमरे में बस वही तीन लोग रह गए थे।
  पारो ने बैग में से गर्म पानी की बोतल और खिचड़ी निकाल कर बाहर रखी और वरुण के लिए परोसने लगी।

“अभी कुछ खाने का मन नही है।”

“पर दवाएं तो आपका मन देख कर आपको खिलाई नही जा सकती ना। और दवा लेने के लिए आपको खाना खाना ही पड़ेगा। “

वरुण ने लाचारगी से प्रशांत की तरफ देखा। प्रशांत ने कंधे उचका कर ना में सर हिला दिया जैसे कह रहा हो मेरे बस में कुछ नहीं है।

” पारोमिता !!! मेरा सच में कुछ खाने का मन नहीं है!”

” काश ऐसा हो सकता कि आप के बदले मैं यह खाना खा लेती, आपके बदले मैं दवाइयां भी खा लेती, और सब का फल आपको मिल जाता।
    पर खैर अगर ऐसा होता तब तो मैं आपकी बीमारी ही मांग लेती भगवान से।
        वह तो मैं नहीं कर सकती, लेकिन इतना तो कर सकती हूं कि उस बीमारी का इलाज जो दवाइयां दे रहे हैं डॉक्टर वह आपको समय पर खिला सकूं।”

” तुम्हें नहीं लगता तुम कुछ ज्यादा ही ज़िद्दी हो।”

” आपको लगता है कि मैं जिद्दी हूँ?  तो फिर  पूरी कर दीजिए ना मेरी ज़िद और खा लीजिए चुपचाप। मैं जानती हूं आपको सादी खिचड़ी पसन्द नहीं है। इसीलिए सब्जियां डालकर छौंकी खिचड़ी बनाई थी। साथ ही कच्चा नींबू ले आई हूं, क्योंकि मुझे लगा शायद घी और अचार आपको अभी डॉक्टर मना करेंगे। “

वरुण ने चुपचाप प्लेट उठाई और खाने लगा। प्रशांत को हंसी आने लगी लेकिन वह अपनी हंसी छुपाने के लिए खिड़की से बाहर देखने लगा। तभी उसे लगा जैसे किसी ने उसकी कंधे पर हाथ थपथपा के उसे पीछे मुड़ने को कहा है।  प्रशांत ने पीछे मुड़कर देखा तो उसके सामने प्लेट में खाना लिए पारो खड़ी थी…

” आपके लिए भी खाना लेकर आई थी भैया!!  जानती हूं कल से ही आपने भी ठीक से कुछ भी नहीं खाया होगा। “

पारो के हाथ से थाली लेकर प्रशांत ने उसके सिर पर अपना हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में रख दिया।

“हम सब को तो खिला रही हो, लेकिन तुमने क्या खाया है?”

“आप लोग खा लीजिए फिर मैं भी खा लूंगी।”

” यह देखा प्रशांत!! हमें खिलाकर खुद भूखे रहने का कैसा षड्यंत्र है इनका?”

” भूखे रहने से क्या मेरी हर इच्छा पूरी हो जाएगी? “

पारो ने वरुण की आंखों में देखते हुए जैसे ही यह सवाल किया वरुण प्रशांत के सामने झेंप कर रह गया। और चुपचाप अपनी प्लेट और चम्मच पर ध्यान लगाते हुए खाने लग गया। और पारो मुस्कुरा कर उन दोनों को खाना परोसने में लग गयी।

  खाना खाने के बाद प्रशांत वरुण के पास ही बैठ गया दोनों आश्रम से संबंधित बातचीत में लग गए और पारो ने वही कमरे से लगे बाथरूम में सारे बर्तन धो पोंछ कर साफ-सुथरे करके वापस जमा लिये। वो लगातार कुछ न कुछ छोटा मोटा काम करती जा रही थी। लेकिन खाने नहीं बैठ रही थी और वरुण प्रशांत से बातों में लगा होने के बावजूद बार-बार पारो की तरफ देख रहा था कि आखिर वह खा क्यों नहीं रही है?
   प्रशांत को भी यह बात समझ में आ रही थी, लेकिन वह मुस्कुराने के अलावा और कुछ कर भी नहीं सकता था।
     दो महीने बाद आश्रम में होने वाले किसी कार्यक्रम के बारे में प्रशांत वरुण को बता रहा था, लेकिन वरुण का ध्यान बार-बार पारो की उठापटक में ही अटक कर रह जा रहा था। आखिर  प्रशांत ने धीमे शब्दों में वरुण को टोक ही दिया…

” सिर्फ देखने भर से क्या होगा, जाओ जाकर तुम ही मदद कर दो?  यहाँ से क्या देख रहे हो?”

” नहीं नहीं!! ऐसी कोई बात नहीं है!” वरुण चौन्क गया, जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो।

” तो कैसी बात है? वही बता दो क्योंकि मैं इतनी देर से जो तुमसे कह रहा था उसका एक शब्द भी तुमने सुना तो है नहीं। “

” अरे नहीं ऐसी बात भी नहीं है! मैं तो बस यह देख रहा था, कि इतने छोटे से कमरे में इसे क्या काम मिलता जा रहा है ,जो ये खाना-पीना छोड़कर बस काम में लगी हुई है। “

” इन औरतों के मायाजाल में मत फंसो।  यह जब चाहे तब अपनी मर्जी से काम पैदा कर सकती हैं और जब चाहे तब इनके सारे काम निपट जाते हैं।”

” तुम्हें कैसे इतना अनुभव है?  तुम्हारी तो अभी शादी भी नहीं हुई? “

” अनुभव और शादी का आपस में क्या लेना देना? शादी तो मैं जानबूझकर नहीं करना चाहता क्योंकि जिससे मैं शादी करना चाहता था वो…”

” तुम्हें छोड़ कर चली गई? “

” हां यही समझ लो दोस्त और उसके जाने के बाद यूं लगा जैसे जिंदगी से सारे रंग भी चले गए ।अपनी उलझी की जिंदगी के साथ मैं अपने परिवार वालों पर बोझ नहीं बनना चाहता था। जिंदगी इतनी निरस हो गई थी , कि हर गली मोहल्ला एक अंधेरे से भरा रास्ता नजर आने लगा था। एक ऐसा रास्ता जिसका कोई अंत नहीं था। अपनी जिंदगी से इतना परेशान था कि कुछ सोच ही नही पा रहा था और इसीलिए आश्रम चला आया।
और आज जब अपना जीवन देखता हूं, तो लगता है मैंने बहुत सही निर्णय लिया । क्योंकि इस आश्रम के बिना और कहीं भी मुझे जीवन के सही मायने नहीं मिलते। यहां आने के बाद कृष्ण सेवा के साथ मुझे समझ आ गया कि मेरी जिंदगी में भी रंग है।

” क्या उसकी कहीं और शादी हो गई? कौन थी वो?”

” साथ ही पढ़ती थी प्रिया। साथ ही हम खेले कूदे, और बड़े हुए थे । हमारे घर आसपास ही थे, सो बचपन की दोस्ती थी। साथ साथ ही स्कूल गए,  और फिर कॉलेज। इंजीनियरिंग करने के बाद हम दोनों साथ ही नौकरी में आ गए। और जैसे ही हमने अपनी दोस्ती को एक रिश्ते में बदलना चाहा, उसी वक्त उसे पता चला कि उसे ब्लड कैंसर है।

” फिर क्या हुआ?”

” मैं उसे किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं था लेकिन वह मुझसे शादी करने को राजी ना हुई। उसने मुझे अपनी कसम दे दी, कि मैं उसकी जिंदगी से दूर चला जाऊं। लेकिन मैं किसी सूरत में उनकी बात मानने को तैयार नहीं था। मैंने मेरे घर वालों को भी इस बात के लिए तैयार कर लिया, की प्रिया बीमार है। और मैं उससे तब भी शादी करूंगा और पूरी कोशिश करूंगा कि उसे अच्छे से अच्छा इलाज दिलवा कर उसे वापस एक स्वस्थ जिंदगी दे सकूं। मेरे घर वालों ने शुरू में तो मेरा विरोध किया, लेकिन फिर मेरे प्यार की ताकत के आगे वो लोग भी झुक गए और उन्होंने मंजूरी दे दी। मैं बहुत खुशी से उसके घर उसे यह खुशखबरी सुनाने गया लेकिन तब तक वह अपना घर छोड़कर कहीं जा चुकी थी।
   शायद वह समझ गई थी, कि मैं उसे किसी भी हाल में नहीं छोड़ने वाला हूं। और उसे यह लगने लगा था कि अगर मैं उससे शादी करता हूं तो मेरी सारी जिंदगी उसकी बीमारी के पीछे, उसकी तीमारदारी के पीछे ही खर्च हो जाएगी। और मुझे जिंदगी का कोई सुकून शादी का कोई सुख नहीं मिल पाएगा। मुझे सुखी करने के लिए वह अपना घर छोड़कर चली गई थी। और वह भी ऐसे कि उसने अपने घर परिवार में किसी को नहीं बताया कि वह कहां जा रही है ? उसके माता-पिता का रो रो कर बुरा हाल था ! हम सब ने मिलकर उसे ढूंढने की कोशिश की लेकिन हाथ कुछ नहीं आया।
    पता नहीं मुझसे कहां चूक हो गई थी? जो मैं उसे अपने प्यार का विश्वास ही नहीं दिला सका, कि उसके बिना जीना मेरे लिए कहीं ज्यादा कठिन होता उसके साथ उसकी तीमारदारी करते हुए जीने से। काश वो एक बार मेरे प्यार की गहराई को समझ पाती तो मुझे छोड़कर नहीं जाती ।
     मैं आज भी नहीं जानता, कि वह जिंदा है या नहीं लेकिन उसके जाने के बाद मेरे लिए यह सारी दुनिया खत्म हो गई थी। मुझे लगा जैसे मैं खुद को खत्म कर लूं, लेकिन अपने माता-पिता का चेहरा देखकर मैं वह भी नहीं कर पाया।
     इंसान वाकई जब तक जिंदा रहता है जन्म और मरण के चक्र में फंसा ही रहता है । हमसे मोह माया इतनी बुरी तरह चिपकी रहती है कि बहुत बार ना हम जी पाते हैं और न मर पाते हैं।
   ऐसी विकट परिस्थिति में कोई अगर हमारा साथ देता है तो वह हमारा खुद का धैर्य और संयम ही है।
सच कहूं वरुण तो आश्रम में आने के बाद जीवन का एक मार्ग मिल गया। जीवन को जैसे एक उद्देश्य मिल गया।
   अपना सर्वस्व श्रीकृष्ण को समर्पित करने के बाद अब भले ही सारा दिन मैं सिर्फ कृष्ण अर्चना में व्यस्त रहता हूं, लेकिन अब भी मेरे दिल के एक कोने से यही आवाज आती है, कि काश प्रिया वापस आ पाती। खैर वो जहां भी हो, स्वस्थ हो सुखी हो और सुरक्षित हो। आज भी मरने से पहले एक आखरी बार उसे सुखी देखना चाहता हूं।
   मैं चाहता हूं वह जहां भी हो,स्वस्थ हो । उसने अपना घर परिवार बसा लिया हो।उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान देखकर बस मैं आंखें मूंद लूँ। इतनी ही इच्छा है मेरी।
    दोस्त वैसे मुझे ज्यादा कहना तो नहीं चाहिए क्योंकि तुम्हारी जीवन के बारे में भी मैं बहुत ज्यादा कुछ तो नहीं जानता। फिर भी यही कहूंगा कि अगर कभी तुम्हारे रास्ते में सच्चा प्रेम तुम्हें दिखाई दे तो उसकी तरफ से बिल्कुल ही आंखें मूंद कर आगे मत बढ़ जाना।
    हम जिस कृष्ण की सेवा करते हैं। उस योगेश्वर ने भी जितना भी सारा ज्ञान संसार को दिया उस ज्ञान के पीछे कहीं ना कहीं प्रेम ही छुपा हुआ है।
    राधा और कान्हा के अमर प्रेम के लिए भी तो यही कहा जाता है..

       तुम क्या छूटीं उस कान्हा से
        जैसे सारा रस बिखर गया
       द्वारिकाधीश के हाथों फिर
       सारा महाभारत निखर गया।

   इसलिए याद रखना वरुण,  कृष्ण भी तभी तक कान्हा थे जब तक राधा उनके साथ थी,बाद तो वो द्वारिकाधीश ही हुए और महाभारत रच दी।”

  प्रशांत ने अप्रत्यक्ष रूप से वरुण को जो समझाना चाहा था वो वरुण को भी समझ में आ रहा था लेकिन वो अब भी हिम्मत नही जुटा पा रहा था।
   इतनी देर से किसी न किसी काम में उलझी पारो को देख आखिर वो खुद को रोक नही पाया…

“तुम खुद कुछ खाओगी या नही?”

  पारो ने वरुण की तरफ देखा और मुस्कुरा दी ..

“मेरा व्रत है!”

“व्रत ? आज कौन सा व्रत है?”

“एकादशी …!”

“कब से रख रही हो..?”

“जब से आश्रम में आयीं हूँ…!

“पर क्यों?

“भगिनी आश्रम की लगभग सभी बहने रखती हैं। “

“मतलब हम लोग तो नही रखते ? फिर तुम क्यों रखती हो? इसका भी कोई नियम है क्या?”

“मुझे नही पता। एकादशी तो ज़रूरी व्रत है ,  पर ऐसा लगता है जैसे वहाँ की महिलाएं शायद जानबूझ कर इतने व्रत रखती हैं कि उनके हिस्से का उस दिन का अनाज बच जाए और किसी और के काम आ सके। “

वरुण और प्रशांत चौन्क कर एक दूसरे को देखने लगे।

“ये कैसा त्याग और कैसी तपस्या है, जो आश्रम की महिलाओं के ही हिस्से आती है। “

  वरुण ने बहुत दुखी होकर कहा। और उसके दुख से प्रशांत भी दुखी हो गया।

“मैं आपको दुखी नही करना चाहती थी, लेकिन अब भी आश्रम के अंदर कई विसंगतियां हैं। लेकिन मुझे विश्वास है आप पर, की आप एक-एक कर इन सभी विषमताओं से भगिनी आश्रम को मुक्त करवा ही लेंगे। “

  “आश्रम की विसंगतियों को तो बाद में सुलझा पाऊंगा पर पहले अपने सामने खड़ी विसंगति को तो सुलझा लूँ।”

“मैं आपको विसंगति लगती हूं। “

“लगती नही हो , तुम हो। इतनी सी उम्र में इतना सारा ज्ञान समेटे बैठी हो पर अपने ऊपर आने पर तुम्हारा सारा ज्ञान गंगा में डुबकी लगा जाता है।
  अब चुपचाप पहले कुछ खाओ उसके बाद ही कुछ बोलना…”

“मेरा बोलना इतना नापसंद है कि मैं ना बोलूं इसलिए इतनी कठिन शर्त रख दी..
   और मन ही मन सोच रहे कि अब बच के दिखा पारो की बच्ची! या तो व्रत तोड़ या बोल मत। और आप जानते हैं,मेरे लिए दोनो ही बातें असम्भव हैं।”

“फिर भी तो इतनी देर से बोलती चली जा रही हो…”

  दोनों की मीठी चुहलबाजी देखता प्रशांत भी बीच बीच में तड़का लगाता मुस्कुराए जा रहा था।
  इतने दिनों में, जब से वो वरुण के साथ था पहली बार उसने वरुण को ऐसे खिलखिला कर हंसते देखा था…..

क्रमशः

aparna….



समिधा – 51

Advertisements


  समिधा -51

    अस्पताल में वरुण को होश आ गया था लेकिन उसकी हालत अब भी बहुत स्थिर नहीं थी ।
डॉक्टर उसकी अलग अलग तरह की जांच में लगे थे। प्रशांत रात भर से उसके पास बैठा था ।
   सुबह तक में वरुण की हालत थोड़ी सुधर चुकी थी। इसलिए डॉक्टरों ने उसे आईसीयू से निकालकर सामान्य आईसीयू मेडिकल वार्ड में शिफ्ट कर दिया। डॉक्टर के अनुसार अगर शाम तक में वरुण को और भी आराम हो जाता है तो उसे आईसीयू मेडिकल से डिस्चार्ज कर के कमरे में शिफ्ट कर दिया जाएगा। लेकिन प्रशांत के द्वारा डिस्चार्ज के बारे में पूछताछ करने पर डॉक्टर ने यही कहा कि अभी कम से कम वरुण को 4 दिन अस्पताल में रहना ही होगा।

  यह सुनकर कि वरुण को कम से कम 4 दिन और अधिक से अधिक 1 सप्ताह अस्पताल में रहना पड़ सकता है , प्रशांत के पास आश्रम में बाकी लोगों को भी बता देने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था और इसीलिए उसने अगले दिन आश्रम की जिन 2,-4 गुरुवरों को वरुण की हालत के बारे में बताया था उन्हें फोन करके वरुण की स्थिति की सूचना बता दी।

आश्रम में प्रशांत का फोन आते ही सभी आचार्यों में हलचल सी मच गई उस दिन सुबह की आरती और पूजा पाठ निपटने के बाद प्रवचन होना था। यह वही समय था जिस समय पर वरुण अपना प्रवचन दिया करता था। रोज की तरह पारो ने जाकर प्रवचन की सामग्री से लेकर हर चीज वरुण के हिसाब से वहां तैयार करके रख दी, और खुद श्रद्धालुओं के पीछे हमेशा की तरह बैठने की जगह वहां से हटकर मंडप से पीछे की तरफ चली गई।
    वरुण की अनुपस्थिति में आज उदयाचार्य स्वामी ने प्रवचन का जिम्मा उठा रखा था। हालांकि आज उनसे श्रद्धालुओं के सामने कुछ भी कहा नहीं जा रहा था, लेकिन फिर भी कहना तो था ही। क्योंकि मंदिर परिसर से बाहर वो लोग यह बात नहीं जाने देना चाहते थे। किसी प्रकार से प्रवचन निपटाने के बाद उन्होंने भक्तों को प्रसाद वितरण के लिए भगिनी आश्रम की तरफ भेज दिया।
   इतनी देर से मंडप के पीछे छिपी बैठी पारो अंदर से कौतूहल में थी कि आज वरुण प्रवचन देने क्यों नहीं आया?  क्योंकि अब तक भगिनी आश्रम में यह खबर नहीं पहुंची थी, श्रद्धालुओं के वहां से जाते ही वह अपनी उत्सुकता दबा नहीं पाई और उदयाचार्य स्वामी के सामने स्वयं पहुंच गई।
   पिछली रात दर्शन को भी वरुण ने साथ ही रोक लिया था लेकिन भोजन के बाद से वह खुद भी वरुण से मिला नहीं था। उसे लगा वरुण किसी जरूरी काम से ऑफिस में या फिर कहीं बाहर गया हुआ है। इसलिए दर्शन ने भी ज्यादा पूछताछ नहीं की।
और भोजन करने के बाद अपने हमउम्र लड़कों के साथ ही सोने के लिए मंडप के पीछे वाली छत पर चला गया था।

Advertisements


   सुबह जल्दी उठकर वह पारो से भेंट करने के बाद घर के लिए निकल गया। हालांकि उसका मन वरुण पर ही तब भी लगा हुआ था। उसने उस समय भी वरुण को  ढूंढने की कोशिश जरूर की। जाने से पहले एक बार बार उनसे मिलना चाहता था। लेकिन उसकी इच्छा पूरी नहीं हो पाई। वरुण ना तो अपने कमरे में मौजूद था और ना ही पुस्तकालय में ।इसके अलावा दर्शन ने सरोवर की सीढ़ियों के अलावा कृष्ण मंडप की  छत , मौलसिरी का बगीचा हर वह जगह देख ली जहाँ उनके मिलने की संभावना थी लेकिन वरुण नहीं मिला।
   10- 15 दिन में वापस आने का वादा करके दर्शन ने अपनी बऊ दी के पैर छुए और उससे विदा ले कर निकल गया।

इसके पहले जब भी दर्शन अपनी बऊ दी से मिलकर लौटता था तब बहुत भारी मन और भारी कदमों से ही वह वापस लौटा करता था उसे मन ही मन हमेशा ही लगता कि उसके भाई के जाने के बाद उसकी बऊ दी उसकी जिम्मेदारी है। और अपने भाई की निशानी समझकर उसे अपनी बऊ दी का ख्याल रखना चाहिए। और इसीलिए पारो को आश्रम में देखकर उसका मन हमेशा खट्टा हो जाता था। लेकिन इस बार पता नहीं ऐसा क्या हुआ था, कि वह बहुत प्रफुल्लित मन से वहां से लौट रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी बऊ दी को भी जीने का एक ठोस आधार मिल चुका है।

दर्शन के जाने के बाद ही पारो वरुण की सेवा के लिए उसके प्रवचन के लिए तैयारियों में लग गई थी। लेकिन वरुण को अपने प्रवचन स्थल पर ना पाकर उसका मन चिंतित होने लगा था।
   और वह अपने उतावलेपन में उदयाचार्य स्वामी के सामने पहुंचकर वरुण के बारे में एक ही सांस में पूछी बैठी।

” आज स्वामी जी नहीं है यहाँ?”

उदयाचार्य जी आश्चर्य से पारो को देखने लगे। क्योंकि पारो ने कोई नाम तो लिया नहीं था। बहुत झिझक के साथ संकुचित होते हुए पारो ने वरुण का नाम लेकर उदयाचार्य स्वामी से पूछ लिया। तब उदयाचार्य स्वामी ने कहना शुरू किया।

” आप सब भगिनी आश्रम वाली महिलाओं को अब तक नहीं बताया गया था , लेकिन कल रात में स्वामी वरुण देव की तबीयत अचानक बिगड़ गई। और उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा है । अभी भी अस्पताल में ही हैं, और मैं इस बारे में बताने के लिए भगिनी आश्रम आने ही वाला था। हमारे यहां से प्रशांत वरुण के साथ हैं। लेकिन वह कल से ही उनके साथ हैं तो हो सकता है वोनकुच घड़ी आश्रम वापस आकर आराम करना चाहते होंगे।
   इसलिए अभी मैं और स्वस्तिकाचार्य हममें से कोई भी एक अस्पताल जाकर प्रशांत को वापस भेज देगा। अगर आपमें से भी किसी को वरुण से मिलने जाना है तो हमारे साथ चल सकती हैं।”

अपना सारा लाज संकोच त्याग कर पारो एकदम से सामने आ गई

” मैं आपके साथ जाना चाहती हूं”

  पारो की उम्र ही ऐसी थी कि वहां मौजूद सभी बड़े उसे एक बालिका के समान ही व्यवहार किया करते थे। उदयाचार्य स्वामी ने उसके सर पर हाथ फेर कर हां में सर हिला दिया।

” मुझे सिर्फ 10 मिनट का समय दीजिए मैं अभी अपना सामान लेकर आती हूं।”

” सामान लेकर आने की कोई जरूरत नहीं है, हम दो-तीन घंटे में वापस लौट आएंगे।’

” लेकिन मैं नहीं लौटूंगी। मै अब उन्हें साथ लेकर ही वापस आऊंगी।”

  पारो के बाल हठ पर उदयाचार्य धीमे से मुस्कुरा उठे….

Advertisements

” ठीक है, जाओ जो भी सामान लाना है, जल्दी से लेकर आ जाओ फिर हम निकल चलेंगे।”

पारो वहां से बात कर पहले अपने कमरे में चली गयी। वहां से अपनी दो साड़ियां रख  वो नीचे रसोई में चली गई।
उसने फटाफट पतली सी खिचड़ी के साथ ही एक बड़े थरमस में भरकर गर्म पानी ले लिया। कुछ फ़ल अपने झोले में डालने के साथ ही, तश्तरी चाकू और अन्य जरूरी हर एक सामान अपने झोले में रखती वह घबराहट में रसोई के बर्तनों से टकराती इधर उधर कुछ ना कुछ गिराती भी जा रही थी, कि तभी उसकी मदद के लिए सरिता और सुनीता दोनों चलीं आयीं। दोनों ने मिलकर छोटे-छोटे डिब्बों में कई सारी चीजें वरुण के लिए उसके साथ रख दीं। वरुण की तबियत के बारे में सुन कर पारो को घबराहट सी होने लगी थी। उसकी आंखें बार बार छलकी जा रहीं थीं। उन्हें पोंछती वो फ़टाफ़ट हाथ भी चलाती जा रही थी।

” तुझे अकेले डर तो नहीं लगेगा, मैं भी साथ चलूँ।

सरीता के भोले से सवाल पर पारो बड़ी मुश्किल से मुस्कुरा कर रह गई….

” मुझे डर नहीं लगेगा सरिता, और फिर वहां वह भी तो मौजूद है ना।”

सरिता ने पारो की बात सुनकर भक्ति में अपनी आंखें बंद करते हुए हाथ जोड़ लिया..
      पारो ने वरुण के लिए कहा था जिसे वहां मौजूद सरिता और सुनीता ने भगवान कृष्ण समझ लिया।
सरिता और सुनीता को यही लग रहा था कि वरुण ने उन सब की शिक्षा दीक्षा के लिए तथा आश्रम की महिलाओं के लिए जितना कार्य किया है उसी के फल स्वरुप पारो वरुण को इतना आदर सम्मान देती है, कि उसकी सेवा के लिए तुरंत प्रस्तुत हो गई। बल्कि पारो की तत्परता देखकर एक पल को सुनीता कट कर रह गई। क्योंकि उसे लगा कि वरुण ने उसे जिस नरक कुंड से बाहर निकाला था, उसके बाद इतनी तत्परता उसे दिखानी चाहिए थी।
  इसीलिए उसने भी पारो के साथ चलने के लिए पूछ लिया….
लेकिन इस समय पारो के मन में जो चल रहा था, वह सिर्फ पारो ही समझ सकती थी। उसे इस समय न सरिता की आवश्यकता थी ना सुनीता कि, उसे बस लग रहा था वह किसी तरह हवा में उड़कर वरुण के पास पहुंच जाए, और उस की ऐसी सेवा करें कि वह एक बार फिर उठ बैठे।

उदयाचार्य स्वामी स्वस्तिकआचार्य और पद्मजा दीदी के साथ पारो भी आश्रम की गाड़ी में अस्पताल की ओर बढ़ चली।

अस्पताल में वो लोग जैसे ही पहुंचे, प्रशांत उन्हें नीचे रिसेप्शन के पास ही मिल गया। वह कुछ ज़रूरी दवाई लेने के लिए नीचे फार्मेसी की तरफ जा रहा था। आचार्यों के साथ आई हुई पद्मजा दीदी और पारो को देख कर उसके चेहरे पर भी प्रसन्नता छा गई। वह तुरंत आगे बढ़ा और उसने पारो का हाथ थाम लिया…

” मैं जानता था तुम जरूर आओगी। बल्कि मैं तो चाहता ही था कि तुम आ जाओ। और हो सके तो कुछ देर वरुण के पास बैठकर फिर लौट जाना। “

प्रशांत भी अब तक वरुण की तबीयत के कारण मानसिक रूप से बहुत परेशान था और इसलिए रीति नीति के बारे में सोचे बिना ही पद्मजा दीदी और बाकी आचार्यों के सामने ही उसने पारो के सामने अपने मन की बात रख दी। हालांकि उसके पारो से यह सब कहते तक में स्वामी जी और पद्मजा दीदी आगे वरुण  के कमरे की तरफ़ बढ़ चुके थे।

Advertisements


   कॉरिडोर में सिर्फ प्रशांत और पारो ही खड़े थे। प्रशांत के ऐसा कहते ही पारो की आंखों से दो बूंद आंसू छलक पड़े…

” अरे रोओ मत। वो ठीक है । और चार-पांच दिन में बिल्कुल ठीक हो कर आश्रम वापस भी लौट आएगा।”,

” लेकिन उनके साथ ऐसा हुआ क्यों?  क्या पहले भी उनके साथ ऐसा हो चुका है?”

” हां हो चुका है। एक दो बार नहीं कई बार। पहले उसे लगता था, कि कुछ कमजोरी और थकान के कारणों से उसे चक्कर आते हैं। बाद में जब वह अमेरिका गया और वहां उसने अपनी जांच करवाई तब पता चला कि उसे ह्रदय रोग है।”

” रोग है तो उसका कोई इलाज भी तो होगा।”

” इलाज तो है लेकिन बहुत महंगा है।और वह भी यहां इस शहर में तो संभव नहीं है। बड़े-बड़े हार्ट सर्जन भी इस ऑपरेशन को करने में एक बार को कांप उठते हैं इतना आसान नहीं है उसका इलाज। “

” आसान नहीं है तो क्या निरुपाय छोड़ दिया जाएगा। बच्चों को क्या पढ़ना आसान लगता है दूसरी तीसरी कक्षा के बच्चों को इतनी लंबे-लंबे पहाड़े याद करने पड़ते हैं क्या वह उन्हें  आसान लगता है?  15- 16 साल की बहू को जब घर भर के लिए 40-50 रोटियां बेलनी पड़ती है, तो क्या वह उसे आसान लगता है। दादा काम तो कोई भी आसान नहीं और देखा जाए तो सब आसान है।
    सिर्फ इसलिए कि यह काम कठिन है, और मैं इसे नहीं कर सकता हम उस काम को छोड़ नहीं सकते ना। तो आज से ही आप ये बात याद रखिए कि आपको उन्हें इलाज करवाने के लिए मनाना ही पड़ेगा।”

” वो बहुत जिद्दी है, और वो नहीं मानेगा। उसने यही तो कसम ली है कि अगर उसके कृष्ण का अस्तित्व है तो उसे कभी कुछ नहीं होगा। और वह अपनी एक साधारण और सामान्य औसत आयु जी कर ही मरेगा। अब ये भी क्या बात हुई। अजूबा ही है वो।  बोलो क्या कोई भगवान से भी शर्त लगाता है? “

” लगाने दजिये शर्त।
      उन्होंने भगवान से यही शर्त लगाई है, ना कि भगवान उनकी रक्षा करेंगे और उन्हें लंबा जीवन देंगे। अब इसके लिए भगवान भी तो कोई ना कोई उपाय रच सकते हैं।”

” वरुण की समस्या कोई साधारण हृदय रोग की समस्या नहीं है पारो। इसका इलाज काफी लंबा और महंगा भी है। हम लोग और आश्रम अपने इतने बड़े कर्मवीर को ऐसे खोना नहीं चाहता,  इसलिए हो सकता है आश्रम ट्रस्ट की तरफ से ऑपरेशन के लिए वरुण को पैसे दे दिए जाएं । लेकिन वरुण को मैं जितना जानता हूं वह आश्रम का 1रुपया भी अपने स्वयं के ऊपर खर्च नहीं करेगा।”

“कोई बात नहीं…
     अगर व्याधि कृष्ण ने दी है तो उसका निदान करने का उपाय भी वही देंगे।
    और  कोई उपाय भी तो हो सकता है।  आइए एक बार उनसे मिल तो लूँ।”

प्रशांत पारो को लेकर वरुण के कमरे की तरफ बढ़ गया।

प्रशांत ने कमरे का दरवाजा खोला और पारो को लेकर अंदर चला गया। अब तक वरुण को होश आ चुका था। और वह अपने पलंग पर लेटा उदयाचार्य स्वामी और  स्वस्तिकाचार्य जी से बातचीत कर रहा था।
वही एक तरफ खड़ी पद्मजा दीदी ने उसके लिए जूस ग्लास में निकाला हुआ था। उसकी तरफ बढ़ा रही थी कि वरुण ने लेने से मना कर दिया..

” माफ कीजिएगा दीदी इस वक्त लेने का बिल्कुल भी मन नहीं है। जब इच्छा होगी तब थोड़ा सा ले लूंगा।”

पारो ने पद्मजा दीदी के हाथ से गिलास लिया और वरुण के पास जाकर उसकी तरफ बढ़ा कर चुपचाप खड़ी हो गयी।

वरुण ने उसे भी एक दो बार मना किया, लेकिन पारो उसी तरह चुपचाप खड़ी रही। आखिर थक हार कर वरुण ने पारो के हाथ से जूस ले  लिया और धीरे-धीरे  पीने लगा।
          वह  जानता था कि यह जिद्दी लड़की अगर अपनी में आ जाए तो किसी की नहीं सुनेगी।
कहीं यह सिरफिरी सबके सामने कुछ बोल ना जाए। वरुण के मन में यह भी छोटा सा डर था और इसीलिए उसने चुपचाप जूस के गिलास को अपने मुंह से लगा लिया।

Advertisements

  कुछ देर सभी से बातचीत करने के बाद स्वस्तिकाचार्य उदयाचार्य वहां से निकलने लगे।  उन्होंने पद्मजा से भी साथ चलने के लिए।
पद्मजा उन लोगों के साथ ही लौटने वाली थी, उसने अपना झोला कंधे पर टांग लिया और जाकर वरुण के सिर पर अपना हाथ रख दिया….

” स्वस्थ रहो। जितना जल्दी हो सके स्वस्थ होकर आश्रम वापस लौट आओ। आश्रम तुम्हें याद कर रहा है।”

“, जी दीदी!” इतना कहकर उसने धीरे से अपने हाथ जोड़ लिए।
    पद्मजा ने  बाहर जाते जाते पारो की तरफ देखा और उसे भी साथ चलने का इशारा कर दिया। पारो की तरफ से कोई जवाब ना पाकर पद्मजा ने आखिर पारो से कह ही दिया…

” क्या हुआ?  तुम अब तक यहां बैठी क्यों हो?  चलो तुम्हें तो हम लोगों के साथ लौटना है।”

” नहीं पद्मजा दीदी मैं आज यहीं रुकूँगी।”

“सत्यानाश” मन ही मन वरुण ने सोचा और धीमे से आंखें मूंद ली, क्योंकि वो समझ गया था कि अब ये सोच बैठी है तो पद्मजा दीदी में इतनी क्षमता नही है कि वो पारो को यहाँ से ले जा सकें।

आश्चर्य से पद्मजा  कि आंखें फट गई!  दो अकेले लड़कों के साथ पारो को ऐसे अस्पताल में छोड़ देना कहीं से भी बुद्धिमानी नहीं थी। और फिर तब जब अभी-अभी प्रबोधनंद का भंडाफोड़ हुआ था।
   

” नहीं नहीं!!! तुम यहाँ अकेले कैसे रह सकती हो?  अभी चलो मेरे साथ।”

” मैं नहीं जाऊंगी दीदी मुझे क्षमा कीजिए । “

वरुण के चेहरे पर परेशानी झलकने लगी थी। उसके चेहरे को देखकर प्रशांत इस मामले में हस्तक्षेप करने आगे बढ़ गया…

” पद्मजा दीदी मैं ने ही पारो से कहा था कि हो सके तो वह हमारे साथ रुक जाए। असल में रात के समय बाहर सिर्फ लेडीस नर्स होती हैं। और ऐसे में किसी भी जरूरत के लिए मेरा बार-बार बाहर जाना या उन्हें बार-बार कमरे में बुलाना मुझे कल ठीक नहीं लग रहा था। इसलिए मैंने सोचा ही था कि भगिनी आश्रम से अगर कोई महिला आ जाती तो हमें बहुत मदद हो जाती।”

      हालांकि पद्मजा को प्रशांत की यह बात भी बहुत पसंद तो नहीं आई, लेकिन अब उसके पास कोई उपाय भी नहीं था।  क्योंकि अब अगर वह जोर जबरदस्ती से पारो को ले जाती तो यह ऐसा हो जाता की आश्रम के किसी पुरुष सदस्य की तबीयत खराब हुई और उन्हें जरूरत पड़ने पर भगिनी आश्रम की महिलाएं पीछे हट गई।

यही सब सोचती पद्मजा दीदी शांत खड़ी थी कि उदयआचार्य स्वामी उन्हें बुलाने के लिए वापस चले आए। जब उन्होंने यह देखा कि पद्मजा दरवाजे पर खड़ी है और पारो अब तक अंदर ही है तो उन्हें बात कुछ कुछ समझ में आने लगी..

” क्या हुआ पारोमिता हमारे साथ नहीं जाने वाली हैं क्या?”

” स्वामी जी मैं चाहता  था कि भगिनी आश्रम की कोई महिला……

प्रशांत की बात पूरी होने के पहले ही उन्होंने हाथ उठाकर हां में गर्दन घुमा दी।

” हां ठीक है जैसे में  आप सबको सुविधा हो। बस एक बार उस बालिका से भी पूछ लेना कि वह यहां रुकने के लिए तैयार है या नहीं?”

     उनके सवाल पर प्रशांत आगे बढ़ कर जवाब दे पाता कि इसके पहले ही पारो स्वयं आगे बढ़ गई…

” जी गुरुवर मैं स्वयं यहां रुकना चाहती हूं। “

इसके आगे वह चाहती तो कह सकती थी, कि वरुण के प्रयासों से ही उसे पाठशाला जाने का मौका मिलने वाला है। और यही वरुण का उसके ऊपर इतना बड़ा एहसान है कि उसे उतारने के लिए वह उसकी सेवा का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहती।
        लेकिन पारो ने इसमें से कुछ भी नहीं कहा। वह शायद अपने और वरुण के बीच संबंध के लिए कहीं पर भी कोई सफाई नहीं देना चाहती थी….

Advertisements

उदयाचार्य स्वामी की सहमति के बाद पारो के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान दौड़ गयी।
   उधर वरुण के चेहरे पर भी अब राहत के भाव नज़र आने लगे थे……
   अपने चेहरे की मुस्कान छिपाने ही उसने दूसरी तरफ चेहरा घुमा लिया।

क्रमशः

Advertisements

aparna…..






समिधा- 50

Advertisements


समिधा – 50

     और लगभग दस मिनट बाद सरोवर की तरफ से छपाक की आवाज़ आई।
   उसके आसपास बैठे सभी लोग सामान्य ढंग से बैठे खाते रहे,जैसे किसी ने उस आवाज़ को सुना ही न हो लेकिन वरुण का मन तो सरोवर की ओर ही लगा था,  वो एकदम से अपनी जगह पर खड़ा हुआ और सरोवर की ओर तेज़ कदमो से बढ़ गया……

    वरुण के चेहरे पर घबराहट झलक रही थी, अपने माथे पर छलक आयीं बूंदों को पोंछता वो सरोवर में पहुंचा तो देखा पारो उदास सी सीढ़ियों पर बैठी थी।
उसे वहां बैठे देख वरुण के चेहरे पर राहत के साथ ही एक नाराजगी भी नजर आने लगी वह तेजी से पारो के पास पहुंच गया..

” यह क्या भद्दा मजाक है?”

Advertisements

वरुण के सवाल पर पारो चौक कर उसकी तरफ देखने लगे

” मैंने क्या किया?”

” अभी सरोवर में क्या फेंका जो इतनी जोर की आवाज आई।  मुझे अचानक लगा जैसे तुम पानी में कूद गई और मैं भागता हुआ चला आया।”

” क्यों चले आए आप ? अगर मैं पानी में कूद भी जाती तो उससे आपको क्या फर्क पड़ता ? वैसे भी मैंने पानी में कुछ भी नहीं फेंका।

यह कहकर पारो ने सरोवर की दूसरी तरफ इशारा कर दिया।
    मंदिर परिसर के ही कुछ श्रद्धालु सरोवर के दूसरे सिरे पर सरोवर से जल कलश में भर रहे थे, उन्हीं में से किसी महिला के हाथ का पानी से भरा कलश उसके हाथ से छूटकर सरोवर में गिर पड़ा था। और जिसकी आवाज वरुण के कानों तक पहुंची थी।
    आवाज वैसे तेज भी नहीं थी, लेकिन शायद वरुण ही अपने मन में कुछ गुनता बैठा था और इसीलिए उस आवाज को उसने पारो से जोड़कर देख लिया था।

अपने आप पर लज्जित सा होता वह वापस लौटने को था कि पारो ने उसे आवाज लगा दी..

” यहां तक आए ही हैं,  तो कुछ देर बैठ जाइए।”

पारो के पास दो घड़ी बैठने का तो वरुण का भी बहुत मन था लेकिन वह क्या करता। उसके दिल और दिमाग के बीच की लड़ाई में वह बुरी तरह परेशान था। फिर भी अपने दिल के हाथों मजबूर वहीं दो सीढ़ियां उतरकर वह भी बैठ गया।

” आपने कितनी आसानी से कह दिया कि मुझ से मन हटा लो आपको क्या लगता है मेरा मन आप पर टिका हुआ है ?अभी कुछ महीनों पहले ही अपना सर्वस्व खो चुकी हूं उसके बाद आपने ऐसा सोच भी कैसे लिया कि मैं आप पर आसक्त होने लग गई।
   आपने जो भी कहा उससे आपने मेरे मान सम्मान को ठोकर पहुंचाई है! मैं जानती हूं इसमें गलती मेरी है क्योंकि मेरे मन की चंचलता के कारण ही आप मुझसे यह कहने को बाध्य हुए। लेकिन मेरा मन ऐसा चंचल क्यों हो रहा है इसका कोई जवाब मुझे खुद को भी समझ नहीं आता।
   मैं जब जब आपके सामने होती हूं मुझे ऐसा लगता है मैं अपने पति देव के सामने खड़ी हूं । मैं जानती हूं मुझे यह सारी बातें किसी पराए पुरुष के सामने कहने का कोई हक नहीं , लेकिन जाने क्यों आपको देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि आप पराये हैं। हमेशा ऐसा लगता है जैसे मैं आपको सदियों से जानती हूं।
    आपके आसपास रहने पर ऐसा लगता है जैसे देव मेरे आसपास हैं। आपकी बातें सुनना, आपको देखना, आपके आसपास रहना, आपकी सेवा करना , यह सारे कार्य सिर्फ इसीलिए करती हूं कि मुझे लगता है मैं यह अपने देव के लिए कर रही हूं। मैं जानती हूं मैं गलत हूं मैं यह भी जानती हूं कि अकिंचन हूं आपवित्र हूं आप मुझसे बात करें मैं इस लायक नहीं हूं।
    फिर भी आप कदम कदम पर मेरी सहायता करते हैं इस बात को भुलाकर कि मैं संसार की सबसे अभागिनी स्त्री हूँ। और मेरे जैसी स्त्री को प्यार करने या पाने का कोई हक नही है।
    आप अपनी जगह बिल्कुल सही है और आपने जो कहा उस बात को मैं सहर्ष स्वीकार करती हूं। आज के बाद मेरे कारण कभी आपको कोई कष्ट नहीं होगा। मैं आपके किसी मार्ग का रोड़ा नहीं बनूंगी। मेरी पूरी कोशिश यही रहेगी कि जब तक मैं इस आश्रम में रहूं यानी कि मैं जब तक जीवित रहूं तब तक आप के सामने ना पडूँ।

Advertisements

   आखरी बार आपके सामने से जाने से पहले आपके चरणों की धूल लेना चाहती हूं। क्योंकि अनजाने ही सही आपने बहुत बार मुझे मेरे देव की झलक दिखलाइ है। और सिर्फ मुझे ही नहीं उनके छोटे भाई दर्शन को भी आप में उसका बड़ा भाई देव ही नजर आता है।
    ऐसा क्यों होता है यह ना मैं समझ पाती हूं और ना ही दर्शन? लेकिन वह भी मुझसे हमेशा यही कहता है कि उसे आप में उसके बड़े भैया दिखाई देते हैं।  इसके पीछे साधन जो भी हो लेकिन साध्य आप ही हैं। और इसलिए आखरी बार आप की चरण रज लेकर आपके सामने से हट जाना चाहती हूं।”

अपनी बात पूरी कर पारो वरुण के पैरों में झुक गई। उसके पैरों के सामने की धरती से चुटकी भर मिट्टी लेकर उसने अपने माथे पर लगाई थी, कि वरुण ने उसके कंधे पकड़कर उसे ऊपर उठाया और अपने सीने से लगा लिया।

   शाम के धुंधलके  में दो शरीर एक दूसरे से जुड़े एकाकार हो गए थे। दूर से आती किसी रोशनी के कारण सरोवर में बनता उनका प्रतिबिंब ऐसे जुड़ गया था कि वह दो नहीं एक नजर आ रहे थे।

” मुझे माफ कर दो पारो मैं खुद अपने मन की हालत समझ नहीं पा रहा हूं।  मैं क्यों तुम्हारे लिए इतना कमजोर पड़ने लगा हूँ मुझे नही पता। मेरा मन तो करता है कि तुम इसी तरह हर वक्त मेरे साथ रहो …..

        मन तो और भी बहुत कुछ करता है जो मैं बता नहीं सकता और शायद बताऊंगा तो तुम सुन भी नहीं पाओगी… लेकिन क्या करूं मैं यह भी जानता हूं कि मेरा ऐसा सोचना गलत है। तुम किसी और की पत्नी हो । मैं खुद यहां सन्यासी बनने आया हूं। क्या मेरा इस तरह तुम्हारे लिए आसक्त  होना सही है? “

धीरे से वरुण ने पारो के कान में अपने मन की बात कह दी…
   और पारो ने भी उसी तर्ज पर वरुण के कानों में अपने मन की बात कह दी।
   उस सिंदूरी शाम ने दोनों के मन को जैसे प्रीत के रंग से रंग दिया था।

” आप बताइए ना!! मुझे सब कुछ बताइए, आपको क्या लगता है? आप क्या चाहते हैं? मैं सब कुछ जानना चाहती हूं.. और आप यकीन मानिए मैं सब कुछ सुन लूंगी। या शायद आपके मुंह से सुनना चाहती हूं।”

” मैं जानता हूं ,हम दोनों ही एक दूजे के लिए तड़प रहे हैं। लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि हम दोनों के मन में उठी यह कामनाएं गलत है। “

” क्या कृष्ण के मंदिर में प्रेम करना गलत है? “

Advertisements

पारो के सवाल पर वरुण ने उसके चेहरे को अपनी बाहों में भर कर अपनी तरफ खींच लिया….

” मेरे इतने पास मत आओ पारो कहीं मैं अपना सारा संयम खो ना बैठूं। मुझे सिर्फ तुम्हारी चिंता है। कभी तुम्हारे नाम पर कोई भी दाग मेरे कारण लग गया, तो मैं जिंदगी भर अपने आप को माफ नहीं कर सकूंगा। और अब जब तुम जान चुकी हो कि मेरे मन में भी तुम्हारे लिए उतना ही प्यार है, तो  हमारे उस प्यार के लिए मेरी बात मान लो और मुझसे दूर चली जाऊं। यह तुम्हारे लिए ही अच्छा होगा।
    हमारे शरीर एक नही हो पाए तो इसका मतलब यह तो नहीं कि हमारा प्यार कम हो गया….

” मतलब आप मानते हैं कि आप मुझसे….

” मानता हूं। मेरा रोम रोम आकंठ तुम्हारे प्यार में डूबा हुआ है। मैं खुद नहीं जानता कैसा कब हुआ? कैसे हुआ? कब मेरे मन में यह तरंगे  मचलने लगी? कब मेरी आंखें सिर्फ तुम्हारे चेहरे में अपना अस्तित्व ढूंढने लगी? कब मेरी उंगलियां तुम को छूने के लिए लालायित होने लगी? मेरी समझ से परे है ये सब मेरे साथ कब हुआ? लेकिन  दूसरों को मेरी भावनाओं का पता चले उसके पहले जिसके लिए यह भावनाएं हैं उसे मालूम होना चाहिए… और इसीलिए आज हिम्मत करके मैंने तुमसे सब कह दिया लेकिन आज के बाद….”

” आज के बाद वही होगा जो आप चाहेंगे मैं अब कभी भी आपके रास्ते नहीं आऊंगी।

पारो ने एक नजर वरुण को देखा और तेज कदमों से सीढ़ियां चढ़कर भगिनी आश्रम की तरफ चली गई।

वरुण नहीं खड़े सोचता रह गया कि कुछ देर पहले अचानक उसे क्या हो गया था जो उसने पारो के सामने अपने मन की सारी बातें खोल कर रख दी। उसे इस तरह पारो से अपने प्यार की बात स्वीकार नहीं करनी चाहिए थी। क्योंकि अब तक तो वह लड़की फिर भी उसके बिना जी ले रही थी लेकिन आज के बाद क्या वो एक सामान्य जीवन जी पाएगी?
    अब जब वो उसे अपने सीने से लगा चुका है, अपनी उंगलियों में उसका चेहरा थाम कर अपने चेहरे के इतने पास में ला चुका है, उसकी खुशबू महसूस करती पारो की प्रेम में बोझिल होती आंखें उसने खुद देखी हैं। क्या अब इस सब के बाद पारो उसे भूल पाएगी? उससे दूर रह पाएगी? और पारो के बारे में वो सोचना छोड़ भी दें तो क्या स्वयं वरुण पारो के इतना पास पहुंचने के बाद उससे दूरी निभा पाएगा?

Advertisements

अपने विचारों में खोया वरुण धीमे कदमों से अपने आश्रम की तरफ बढ़ने लगा कि तभी उसे ढूंढता हुआ प्रशांत वहां चला आया। प्रशांत उस से कुछ पूछता इसके पहले ही वरुण को अजीब सी घबराहट होने लगी। चेहरे पर झलकती पसीने की बूंदे, और तेज होती सांसो से वह अपनी स्थिति की गंभीरता समझ पाता कि उसी समय उसका सिर घूमा और वह बेहोश होकर प्रशांत की बाहों में गिर पड़ा।

प्रशांत वरुण की हालत, उसकी स्वास्थ्य समस्या से वाकिफ था और इसी लिए  उसे इस तरह वरुण का बेहोश होकर गिर जाना सही नही लगा। और वो उसे दो लोगों की सहायता से तुरंत मंडप की तरफ ले गया। वहाँ अन्य आचार्यो को सूचित करने के बाद वो वरुण को लिए अस्पताल निकल गया। उसके साथ आश्रम के और आचार्य भी जाना चाहते थे, लेकिन प्रशांत ने सबको यह समझा कर की अगर कोई गंभीर बात हुई तो वो सबको वहाँ बुला ही लेगा बोल एक किनारे कर अस्पताल निकल गया…

अस्पताल पहुंच कर डॉक्टरों की जांच के बावजूद वरुण को होश में आते न देख प्रशांत को चिंता सताने लगी थी। उसने आश्रम में अभी किसी को भी वरुण की सेहत के बारे में बताने से मना कर रखा था।
   अभी ही प्रबोधानन्द वाला किस्सा हुआ था,उसी चर्चा से आश्रम अब तक आंदोलित था, अब उसके बाद अगर वरुण की सेहत के बारे में मालूम चला तो जाने क्या होगा, यही सोच कर प्रशांत ने सारी जिम्मेदारी खुद पर ले कर बाकियों को इस बात से दूर ही रखा था।

  ****

  वरुण से दूर होकर पारो भगिनी आश्रम की सीढ़ियां चढ़ गई थी। अपनी खाट पर बैठी खिड़की से बाहर देखती वो जाने क्या सोचते बैठी थी कि सरिता उसे खाने के लिए बुलाने आ गयी। लेकिन भूख नही है कि ज़िद पर अड़ी पारो उसके लाख बुलाने पर भी उसके साथ नीचे नही गयी।

Advertisements

    सरिता के जाने के बाद वो खिड़की पर आ खड़ी हुई। उसकी खिड़की के इस भाग से नीचे कृष्ण मंडप का वो हिस्सा साफ नजर आता था, जहाँ अक्सर वरुण भोजन के बाद प्रशांत और बाकी लोगों के साथ बैठा करता था।
   ठीक है उसने उसे दूर रहने कहा है पर दूर से देखने पर तो कोई मनाही नही है।अगर वो उसकी खुशी के लिए उससे दूर हो सकती है तो अपने मन की खुशी के लिए उसे दूर से ताक तो सकती है।
   अपनी सोच पर, अपने बचपने पर उसे स्वयं हंसी आ गयी। और वो खिड़की पर खड़ी इधर उधर देखती वरुण को तलाशने लगी।
  लेकिन वरुण वहाँ होता तब तो नज़र आता। वो देर तक वहाँ खड़ी वरुण के बैठने की जगह ताकती खड़ी रही……

क्रमशः

Advertisements

aparna……
  


दिल से….

कायाकल्प चैलेंज:-

सुप्रभात दोस्तों। कैसे हैं आप सब? हेल्दी एंड एनर्जेटिक?.. बिल्कुल!!!

आप लोगों ने अगर ईमानदारी से पूरे सात दिन 20 बार सूर्य नमस्कार करने के बाद 15 मिनट का डांस किया है और गर्म पानी के साथ जिंजर पाउडर हनी लेमन लिया है तो आप अपने आप में खुद फर्क महसूस कर पाएंगे।

देखिए हमें किसी को कुछ साबित करने के लिए नही बल्कि खुद को साबित करने के लिए ये करना है। सिर्फ अपने आप के लिए करना है। यकीन मानिए जब आप अपनी सुबह योग और व्यायाम से करते हैं तो पूरा दिन बेहतरीन बीतता है।

आपमें से कुछ लोग थायरॉइड के लिए योग पूछ रहे थे। आज उसके बारे में छोटी सी जानकारी दूंगी।

थायराइड के लिए सर्वश्रेष्ठ व्यायाम या योग है सूर्यं नमस्कार !! इसे करने की विधि आप सब जानते ही हैं।

थायरॉइड के लिए मुख्य रूप से निम्न योगासन लाभ देते हैं।

1) मत्स्यासन :- सुखासन में बैठ कर धीमे से पीछे की तरफ झुकते हुए सिर को ज़मीन से टिका कर रखना है। इस पोज़ में गर्दन और कंधों पर स्ट्रेच आता है जो थायरॉइड के लिए लाभप्रद है।

मत्स्यासन

2) सर्वांगासन :- इस आसन में आराम से लेटने के बाद पैरों को धीरे धीरे उठाते हुए सीधा 90 डिग्री एंगल पर लाएं। जसके बाद हाथों की सहायता से कमर को सपोर्ट करते हुए कमर को ऊपर उठाते जाएं।

इस आसन में भी कंधों और सिर पर पूरा संतुलन टिका होता है तथा गर्दन पर अच्छे से स्ट्रेच आता है।

सर्वांगासन

3) हलासन :-

हलासन करने का तरीका

पीठ के बल सीधा लेटने के बाद हाथों को शरीर से सटाकर सीधा रखें. पैरों को घुटने से मोड़े बिना धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाएं और फिर सांस छोड़ते हुए पीठ को उठाते हुए पैरों को पीछे की ओर ले जाएं. पैरों की अंगुलियों को जमीन से स्पर्श करने का प्रयास करें. 
– करीब एक मिनट तक इस अवस्था में रहते हुए धीरे-धीरे मूल अवस्था में आ जाएं.

हलासन

4) सिंहासन :-इस आसन को थायराइड के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। इस आसन को करने के लिए दोनों पैरों को सामने की ओर फैलाकर बैठ जाएं। अब अपने दाएं पैर को मोड़ें और उसे बाएं पैर की जांघ पर रख लें और बाएं पैर को मोड़ें और उसे दाएं पैर की जांघ पर रख लें। इसके बाद आगे की ओर झुक जाएं। उसके अलावा वज्रासन में बैठ कर दोनों घुटनों के बल होते हुए अपने हाथों को सीधा कर फर्श पर रख लें। इसके बाद अपने शरीर के उपर के हिस्से को आगे की ओर खीचें। अपने मुंह को खोलें और जीभ को मुंह से बाहर की ओर निकालें। नाक से सांस लेते हुए मुंह से आवाज करें। इसे रोजाना 7-11 बार करें। सिंह के समान गर्जन की आवाज़ इसमें निकालनी होती है।

सिंहासन

समिधा -49

Advertisements

समिधा -49

   आसमान से उतरती धूप चेहरे पर पड़ती बहुत भली लग रही थी, और उससे भी भला लग रहा था, उन दोनों का साथ।
    वरुण और दर्शन को साथ बातों में उलझे देख पारो उन दोनों को अपलक निहार रही थी। वरुण कितने प्यार से दर्शन से घर भर की खबर ले रहा था। जैसे हर किसी को जानता हो।
   ठाकुर माँ के घुटनों से लेकर माँ के ठाकुर जी ( कान्हा जी) तक,बाबा की दुकान से लेकर काकी की बेटी के ससुराल तक हर बात की तसल्ली से तस्दीक कर रहा था कि सब कुशल हैं या नही।
   यहाँ तक कि दुकान की बढ़त के लिए उसने दर्शन को जाने कितने तरीके और नए तरीके के सामान भी बता दिए थे।
   इस बार दुर्गा पूजा में चंडी मंडप कहाँ बनेगा, क्या कैसा होगा? उन लोगों की ये सारी बातें सुनती बैठी पारो धीरे धीरे आश्चर्य में डूबने लगी।
   ये तो उससे भी ज्यादा उसके घर को जानता था।

Advertisements

लेकिन वो कैसे ये सब जानता था? जितने आराम और तसल्ली से वो दर्शन के कंधे पर हाथ रखे बैठा था, दूर से क्या नज़दीक से देखने पर भी लोगों को यही लगेगा कि दो भाई साथ बैठे एक दूजे का हाल चाल ले रहे हैं।
    जाने उस शाम में ऐसा कुछ था या पता नही क्या बात थी पर पारो वरुण पर से नज़रे फेर ही नही पा रही थी।
   
    वही चौड़ा माथा, हल्के बिखरे उलझे से बाल, और तीखी लंबी नाक और उसके नीचे उसके भींचे हुए होंठ।
    बिल्कुल जैसे किताबों में देखी किसी बहुत सुंदर ग्रीक देवता की तस्वीर हो…
  … जिसमें उसने अपना एक हाथ बड़ी अदा से अपने घुटनों पर टिका रखा हो, सतर चौड़े कंधे खुले हुए और उन पर झूलती अलकें, और ऊपर आसमान की ओर ताकती बड़ी बड़ी पलकों वाली आंखें …
….. हाँ ये चेहरा उसने देखा तो था….
…. उस शाम जब वो भागती दौड़ती जोइता के घर पहुंची थी और वो किसी अंग्रेज़ी पत्रिका के पन्ने पलट रही थी।
  वहाँ उस ग्रीक देवता जो अपने सुंदर नयन नक्श और सुंदर देहयष्टि के लिए प्रसिद्ध है को देख कर उसे इसी चेहरे की तो याद आयी थी।
   और फिर उसके बाद उसने इस चेहरे को देखा था, काली मंदिर में…
   हे भगवान!!! ये तो वही लड़का है जो मंदिर के बाहर बच्चों को गुब्बारे दिला रहा था..
…. ये तो स्वयं द्वारिकाधीश हैं फिर इनकी सत्यभामा कहाँ गयी।

  कड़ी से कड़ी जुड़ती चली गयी और पारो को एकाएक वरुण से हुई हर मुलाकात याद आती गयी। आज तक वो किस भुलावे में बैठी थी,उसे याद क्यों नही था कि वो वरुण से पहले मिल चुकी है।
   पर खैर याद आ जाने से भी क्या बदल जाना था।मंदिर की मुलाकात के बाद साड़ियों के बाज़ार में भी तो मिलना हुआ था,जहाँ उसकी पसन्द की साड़ी को उसी सनकी सत्यभामा ने छीन लिया था।
  और उसके बाद उसने वरुण को आखिरी बार देखा था अपनी शुभ दृष्टि में…
….अपनी सप्तपदी की शुभ दृष्टि में जिसमें उसे देव को देखना था!!!

    पारो की आंखें जाने क्यों छलकने को बेकरार हुई जा रहीं थीं।

     ये कैसी सज़ा मिल रही थी उसे। पहले भगवान ने उसके बाबा को छीन लिया जब बाबा जैसे ही उसका ध्यान रखने के लिए देव को उसकी जिंदगी में भेजा तो फिर उसे वापस क्यों छीन लिया।

  और अब जब उसे छीन ही लिया तो मन को इतना कड़ा तो बना सकते थे कि वो इस तरह वरुण की ओर न फिसले? क्या वरुण को लेकर उसका ऐसा सोचना उसे शोभा देता है।अब जब उसके जीवन से सारे रंग जा चुके हैं तब फिर वो क्यो वरुण को देखने भर से गुलाबी हुई जाती है।

   वो उन दोनों को देखती बैठी थी कि वरुण ने पारो की तरफ देख अपना प्रस्ताव रख दिया…

“आज दर्शन हमारे साथ यहीं आश्रम में रुकेगा। क्यों ठीक है ना पारोमिता?”

   वो तो इतनी देर से उसे ही देखती बैठी थी, लेकिन साथ ही ये भी सोच रही थी कि उसे मालूम नही चलेगा? पर ऐसा कहां सम्भव था?
वरुण भले ही दर्शन से बात कर रहा था, लेकिन तब भी उसे पारो की आंखें खुद पर महसूस हो रहीं थीं।

Advertisements

  पारो ने हाँ में सिर हिलाया और उठ कर अंदर जाने लगी…
   उसे लगा शायद वरुण उसे रोकेगा या पूछेगा कि कहाँ जा रही हो पारो? पर ऐसा कुछ नही हुआ।
  पारो ने जाकर पद्मजा दीदी को बता दिया कि आचार्य वरुण के कहने पर आज उसका देवर दर्शन वहाँ रुकने वाला है इसलिए उसके लिए भी भोजन की तैयारी करनी होगी।

    वो वापस लौट रही थी कि उसे पद्मजा दीदी ने कोई काम बता कर वहीं रोक लिया। हालांकि उसका मन तो वहीं बाहर लगा हुआ था फिर भी मन को मार कर वो वहीं काम पर लग गयी।
   कुछ देर बाद पद्मजा दीदी ने सरिता को बुला कर चाय की ट्रे पकड़ा दी कि बाहर बैठे लोगों को दे आये। पारो का मन वहीं अटका पड़ा था, पर इतनी औरतों के बीच सरिता से ट्रे लेने की उसकी हिम्मत नही हुई।
   उधर सरिता चाय लेकर बाहर पहुंची… वरुण और दर्शन के साथ ही अब प्रशांत भी वहाँ मौजूद था। वरुण ने चाय लेते हुए सामने वाली पर नज़रें उठायी तो सामने पारो की जगह सरिता थी, तुरंत उसके चेहरे का रंग बदल गया।
    वक्त रहतें ही वरुण ने खुद को संभाल लिया लेकिन प्रशांत की नज़रों ने उसकी ये चोरी पकड़ ही ली।
    शाम की आरती का समय हो चुका था। आरती के बाद आज वरुण का ही प्रवचन था।

   दर्शन श्रद्धालुओं के साथ सामने ही बैठ गया…  वरुण अपने आसन पर आया तो आज उसकी पुस्तिका के ठीक बगल में एक छोटा सा सफेद रुमाल रखा था, जिस पर नीले हरे रेशमी धागों से मुरली और मयूरपंख काढ़ा गया था। रुमाल इस ढंग से मुड़ा रखा था कि उसमें कढ़ी मुरली और पंख सामने ही नज़र आ रहे थे।
   वरुण को पाठ प्रवचन के बीच पानी के दो घूंट लेने की आदत थी, और जिसके बाद अक्सर उसके पास मुहँ पोंछने को कुछ नही होता था। और वो अक्सर अपने कुर्ते की बाँह से ही ये काम कर लिया करता था। आज वहाँ रखा रुमाल देख उसे रखने वाली याद आ गयी और उसके चेहरे पर एक मुस्कान चली आयी। वरुण को लगा जैसे कोई उसे देख रहा है उसने जैसे ही सामने नज़र उठायी प्रशांत उसे ही देखता खड़ा था। प्रशांत ने उसे देखते ही अपने दोनो कंधे उठा कर ” कहाँ तक भागोगे ” वाली मुस्कान दी और बाहर निकल गया।
   प्रवचन के बाद श्रद्धालुओं का समय तय था। वे अपनी समस्याएं स्वामी जी को बताया करते थे। वैसे तो आज के पहले वरुण ने इस समस्या परश्नोत्तरी पर काम नही किया था। और आज पहली बार वो यहाँ श्रद्धालुओं की जिज्ञासा दूर करने बैठा था।।
   उस भीड़ भाड़ के बीच से एक महिला उठ कर हाथ जोड़ कर खड़ी हो गयी…

“स्वामी जी!! मेरी शादी को साढ़े चार साल पूरे हो चुके हैं लेकिन अब तक मुझे संतान सुख नही मिला। स्वामी जी आप कुछ उपाय बताएं जिससे हमें संतान प्राप्ति हो सके।”

वरुण उस महिला की बात सुन हल्के से मुस्कुराने लगा।

” आपकी उम्र क्या है बहन ?”

“जी स्वामी जी इसी महीने तीस पूरा हो जाएगा।”

“ठीक है , मैं अब जो उपाय बताने जा रहा हूँ, वो आपको और आपके पति को एकसाथ मिलकर करना होगा,क्योंकि संतान तो दोनो के ही प्रयासों से ही मिलेगी ना!”

  उस औरत और उसके पति ने हाथ जोड़े हुए ही हाँ में सिर हिला दिया।

” आप दोनों की उम्र और शादी को बीता समय देख कर मैं समझ सकता हूँ कि आप बच्चे को लेकर कितना परेशान होंगे।”

Advertisements

“स्वामी जी हम दोनों तो एक दूसरे के साथ भी बहुत खुश हैं लेकिन घर परिवार नाते रिश्तेदार हमें चैन से जीने नही देते। जहाँ जाओ हर कोई हमें बच्चे के लिए टोकना शुरू कर देता है। इसलिए लगता है कि अब बच्चा हो ही जाना चाहिए।”

“तो क्या आप बच्चा दुनिया वालों के लिए पैदा करना चाहते हैं?”

“नही वो मतलब नही था मेरा?”  और औरत के पति ने अपनी सफाई दी..

“पर मेरा यही मतलब है। आप दोनो ध्यान से मेरी बात सुनियेगा। अगर आपको चार सालों में संतान नही हुई तो इसमें आपके प्रारब्ध का ही दोष हो ऐसा ज़रूरी तो नही। सबसे पहले अपने शरीर में क्या ऐसी समस्या है वो जानने की कोशिश कीजिये क्योंकि संतान नही हो पाने की चिकित्सा एक डॉक्टर मुझसे कहीं ज्यादा अच्छी तरह कर सकता है। मैं कोई चिकित्सक तो हूँ नही जो आपकी समस्या का निदान कर पाऊं।
   अब मुझे ये बताइये की क्या आपने पहले कभी किसी डॉक्टर से परामर्श लिया है?

“नही गुरुवर!!”

“क्यों? आपको मेरे पास आने से पहले वहीं उनके पास ही जाना चाहिए था न।
  आप अगर तन मन से बच्चे के इच्छुक हैं तो कल ही डॉक्टर के पास जाए।
अब दूसरी बात आपके मन में जब तक स्वयं के लिए ये निर्णय  लेने की बात न आये तब तक सिर्फ दुनिया के लिए आपको कुछ भी करने की क्या आवश्यकता है।
   क्योंकि दुनिया के लिए आप जितना करतें जाएंगे वो आपसे और भी ज्यादा की उम्मीद रखती जाएगी। जब तक लड़का या लड़कीं की शादी न हो जाये तब तक उन्हें शादी करने की सलाह दी जाती है उसके बाद  बच्चे के लिए सलाह दी जाती है, और सिर्फ सलाहें ही दी जाती हैं कोई मदद नही की जाती। इसलिए मेरा यही मानना है कि सिर्फ ये सोच कर की घर पर सभी रिश्तेदारों , सभी दोस्तों ने यही निर्णय लिया है तो हमें भी लेना चाहिए, आप कोई भी निर्णय न लें।
और जब आप दोनो पूर्ण प्रसन्नता और हृदय से अपने परिवार को बढ़ाने के लिए तैयार होंगे तब कृष्ण स्वयं आपका परिवार बढ़ा देंगे।
   कृष्ण पर आपके विश्वास को कभी खोना नही है। क्योंकि आपके लिए जो उचित होगा वो आपको बिना किसी बाधा के ज़रूर मिलेगा और जो आपके हिस्से का नही होगा वो आपको किसी भी मूल्य पर नही मिलेगा।
   इसलिये निर्भय रहें निशंक रहे… आपकी झोली में खुशियां ज़रूर खेलेंगी।”

Advertisements

  वो दोनो औरत और आदमी प्रसन्नता से अपनी जगह जा बैठे और श्रीकृष्ण के जयकारे से परिसर गुंजायमान हो गया।
   सबसे पीछे बैठी पारो का मन एक बार फिर अपने मन मंदिर में जा बैठे द्वारिकाधीश की ओर झुकने लगा।

    रात के भोजन के लिए सारे आचार्य बैठ चुके थे। दर्शन भी बैठ गया था। अपने हाथ में परोसने का पात्र लिए पारो वहाँ एक तरफ खड़ी हो गयी , उसकी आँखे उन लोगों में किसी को ढूंढ रही थी। दर्शन के ठीक एक तरफ प्रशांत बैठा था, और दूसरी तरफ की जगह खाली थी। जैसे ही उसे समझ आया कि वरुण वहाँ नही है,वो दूसरी तरफ उसे ढूंढने जाने को मुड़ी ही थी कि उसके ठीक पीछे खड़ा वरुण सामने आ गया।
   और उसे अपने इतने पास देख वो एक बार फिर अपनी सुध बुध खो कर उसे देखने लगी।
    दोनो एक दूसरे से आंखें हटा नही पा रहे …. कि वरुण ने ही धीमे से कहा…

“सामान्य रहो पारो। तुम कांप रही हो। “

   वरुण के इतने पास खड़ी पारो सच ही कांपने लगी थी…

“मुझ पर से अपना ध्यान हटा लो, हमारा कोई भविष्य नही है। “

   वरुण ने धीरे से अपनी बात रखी और लंबे लंबे डग भरते हुए अंदर चला गया, और पारो सूनी आंखों और सूने मन से वहीं खड़ी रह गयी। बस यही तो बचा था। पहले संसार उसका मज़ाक उड़ा रहा था, आज वरुण उड़ा गया!
   इसमें वरुण का भी क्या दोष है?  भगवान ने स्वयं जब उसके जीवन का मज़ाक बना छोड़ा है तो हर कोई अगर वही कर रहा तो किसी का क्या दोष।

ठीक ही तो कह गया वो , उस जैसी रंगहीन विधवा के साथ किसी का भी क्या भविष्य हो सकता है?

Advertisements

   ऑंसू से धुंधली पड़ी जाती आंखों के साथ उसने हाथ में पकड़ रखा सामान वहीं नीचे रखा और तेज़ कदमों से सरोवर की तरफ बढ़ गयी।

  वरुण ने कहने को कह तो दिया था, लेकिन ये कहने के लिए उसे खुद को कितनी हिम्मत लगी थी, ये वही जानता था। उसके मन में जाने क्यों ये डर बैठने लगा था कि जैसे प्रशांत समझने लगा है कहीं आश्रम के बाकी लोगों को समझ मे आने लगा तो पारो के चरित्र पर एक काला दाग लग जायेगा। और फिर वो दाग छुड़ाना बहुत मुश्किल हो जाएगा।
    वो पारो को दुनिया से बचाये रखने के लिए तो अपने प्राण भी दे सकता था फिर इतना सा कह देने मात्र से अगर वो उस पर से अपना ध्यान हटा लेगी तो इसमें बुराई क्या थी?

   वो खुद ही दोनो पक्ष सोचता चला जा रहा था। बुराई क्या थी?
   क्या उसे खुद को पारो का इस तरह इच्छा भरी आंखों से उसे देखना गुदगुदा नही जाता था?
   क्या जब जब वो पारो को देखता था, उसके मन में कामनाओं का ज्वार भाटा नही जागता था?
     क्या उसे लेकर इस दुनिया से इस आश्रम से दूर भाग जाने के ख्याल उसके मन में नही कुलबुलाते थे?

   पारो से अधिक तो वो उसे पाने को लालायित हो उठा था, और अपने मन को काबू करने को उसने पारो को दूर रहने की सलाह दे डाली थी।

  खुद ही खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी दे मारी थी। 

Advertisements

अपने मन को असीमित कठोर कर ही उसने पारो के सामने ये बात रखी थी। और ऐसा कहने के बाद भी उसकी आंखे और मन पारो से नही हट पा रहा था। वो जाकर दर्शन के पास बैठ तो गया लेकिन आंखें पारो का पीछा करती रहीं।
   पारो को अपने हाथ का सामान वहीं पटक कर ऑंसू पोंछते और सरोवर की तरफ जाते देख उसका मन ठनका कि पारो आंखों से ओझल हो गयी।
    और लगभग दस मिनट बाद सरोवर की तरफ से छपाक की आवाज़ आई।
   उसके आसपास बैठे सभी लोग सामान्य ढंग से बैठे खाते रहे,जैसे किसी ने उस आवाज़ को सुना ही न हो लेकिन वरुण का मन तो सरोवर की ओर ही लगा था,  वो एकदम से अपनी जगह पर खड़ा हुआ और सरोवर की ओर तेज़ कदमो से बढ़ गया……

क्रमशः

Advertisements

aparna……




दिल से…

दोस्तो, कैसी रही आज की सुबह।

आज ज़रा समय की कमी है इसलिए बस थोड़े में ही अपनी बात रखूंगी। आप में से कुछ लोगो ने आर्थराइटिस के लिए किए जाने वाले योग के बारे में पूछा था। आर्थराइटिस में चूंकि हड्डियां थोड़ी कमज़ोर सी होने के कारण बहुत कठिन योग पोश्चर नही किये जा सकते। लेकिन जो आसानी से किये जा सकते हैं वो मै आपको चित्रों के साथ बता रहीं हूँ।

अर्थराइटिस की समस्या से छुटकारा पाने के योगासन

  • यौगिक जॉगिंग
  • सूक्ष्म व्यायाम
  • मंडूकासन
  • शशकासन
  • उष्ट्रासन
  • मंडूकासन
  • भुजंगासन
  • ताड़ासन
मंडूकासन

2) child’s pose .. ये करने में आसान भी होता है। इसमें आपको घुटने मोड़ कर वज्रासन में बैठना है और दोनो हाथों को सामने की ओर फैलाना है। श्वांस सामान्य गति से लेना और छोड़ना है। इसमें पीठ के दर्द में बहुत राहत मिलती है।

बालासन ( child’s pose)

3) वृक्षासन :- इसमें आपको सीधे खड़े होने के बाद एक पैर को घुटने से मोड़ कर दूसरे पैर के घुटने पर टिका कर सहारा देना है। और दोनो हाथ ऊपर नमस्कार की मुद्रा में जोड़ना है। एक बार में 30 सेकंड इस पोज़ में खड़े रहना है और दोनो पैरों से इसकी आवृत्ति करनी है।

वृक्षासन

4)सुखासन :- इसमें पहले पैरों को सामने की तरफ फैला कर फिर घुटनो से मोड़ कर पालथी बना कर बैठना है। इसमें सामान्य श्वांस के साथ ही अन्य प्राणायम आदि भी किये जा सकते हैं।

सुखासन

5) वज्रासन :- बेहद आसान है। इसमें घुटनो को पीछे की तरफ मोड़ कर उस पर अपनी कमर के भाग स्थिर कर बैठना होता है। शुरुवात में अगर कठिन लगे तो सिर्फ 10 की काउंटिंग तक करें, धीरे धीरे इसे 30 सेकंड से 1 मिनट तक बढ़ाया जा सकता है।

ध्यान रहे :- अगर आपको गठियावात के कारण जोड़ों को मोड़ने में तकलीफ है। अगर आपके घुटनों में सूजन है। अगर डॉक्टर ने आपको बताया है कि जोड़ों का पानी कम हो गया है। अगर आपको इन आसनों को करने में बहुत ही ज्यादा दर्द महसूस हो रहा है तो आप किसी योग शिक्षक या जिम इंस्ट्रक्टर की देख रेख में ही योग शुरू करें ,एक बार शुरू कर लेने के बाद आप आसानी सेसब कुछ कर पाएंगे।

याद रखिये :– करना है योग , तभी बनेंगे निरोग।

वज्रासन

समिधा -48

Advertisements


समिधा – 48

       गुरु आचार्यों के बुलावे पर अमृतआनंद स्वामी अगले दिन ही आश्रम पहुंच गए। उनके वहां पहुंचने से पहले सभी आचार्यों ने मिलकर प्रबोधानंद के कार्यों का सारा लेखा-जोखा लिपि बद्ध कर रखा था। जिससे कि अमृतानंद स्वामी को इस बारे में निर्णय लेने में अधिक समय ना लगे।
     अमृतानंद स्वामी ने सारी चीजें पढ़ी और उसके बाद उन्होंने सभी गुरुओं के साथ बैठकर एक निर्णय लिया और तुरंत ही मंदिर ट्रस्ट की तरफ एक चिट्ठी भेज दी।
    मंदिर ट्रस्ट को सूचना भेजने के साथ ही वरुण के कहने पर अमृतानंद स्वामी ने प्रेस रिलीज भी जारी किया, और जिसमें उन्होंने लिखित और मौखिक आदेशात्मक निर्णय दिया कि प्रबोधानंद स्वामी का अब इस कृष्ण मंदिर या आश्रम से कोई भी लेना देना नहीं है । किसी समय अमृतानंद स्वामी ने जरूर यह सोचा था कि अपने बाद वह अपनी गद्दी प्रबोधानंद को ही सौंपेंगे लेकिन अब उन्होंने साफ और स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि उनके बाद उनकी गद्दी प्रबोधानंद को किसी भी हाल में नहीं दी जा सकती।

Advertisements

     मीडिया और अखबार वालों के लिए यह बहुत बड़ी खबर थी, क्योंकि प्रबोधानंद एक बहुत बड़ा नाम था। और उनका इस तरह से आश्रम से बेदखल होना सबसे बड़ी सनसनीखेज खबर बन कर आई थी।
     अब तक मीडिया वालों को यह खबर नहीं पहुंची थी कि प्रबोधानंद को पुलिस पकड़ कर ले जा चुकी है।
उन लोगों को तो रोज के लिए एक मसाला मिल गया था और इसलिए वह उन खबरों में नमक मिर्च लगाकर उनका समय समय पर प्रसारण कर रहे थे।
   इधर अमृतानंद स्वामी के द्वारा मंदिर ट्रस्ट को विज्ञप्ति  भेजने के बाद ट्रस्ट ने भी प्रबोधानंद के खिलाफ पुलिस में जांच के लिए शिकायत दर्ज करवा दी थी।

   ये सब कुछ होने के साथ ही पुलिस आश्रम में आकर कुछ दो चार भगिनी आश्रम की महिलाओं का लिखित बयान लेकर चार्जशीट तैयार करने में लग गयी।
   केस हाई प्रोफाइल था, इसलिए पुलिस भी तुरंत हरकत में आई थी और हफ्ते भर में ही प्रबोधानन्द का केस कोर्ट में लग गया था।

Advertisements


    
    इस सब झमेलों में प्रबोधानन्द ने एकदम से चुप्पी साध ली थी। उसकी तरफ से अब तक कोई बयान जारी नही हुआ था।
   बावजूद चारुलता डर के मारे बिना किसी को कुछ बताए वहाँ से रातों रात भाग खड़ी हुई थी। वहां भगिनी आश्रम में भी उसके बारे में किसी को कुछ नही पता था।।
   उसके ऑफिस में भी कोई उसके बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नही रखता था। जिससे पुलिस कुछ मालूमात कर पाती।
   और इसी लिए चारुलता के खिलाफ जुर्म दर्ज होने के बावजूद पुलिस उसे पकड़ नही सकी।

  आश्रम का काम वापस सुचारू रूप से प्रारम्भ हो गया। अमृतानन्द स्वामी कुछ दिन ठहर कर वापस निकल गए।
    भगिनी आश्रम की महिलाओं के लिए शिक्षा प्रारम्भ करने की उन्होंने जो बात ट्रस्ट के पास भेजी थी, वो प्रस्ताव भी ट्रस्ट ने पास कर दिया था।
   और अब आश्रम की वो महिलाएं जो आगे अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती हैं, उनके पाठशाला जाने का मार्ग प्रशस्त हो चुका था।
   ये बात मालूम चलते ही पारो ने सबसे पहले दर्शन को चिट्ठी लिखी, और अपने मन की खुशी उसने अपने बालसखा के साथ बांट ली।
   चिट्ठी पढ़ने के बाद चिट्ठी का जवाब देने के बदले दर्शन खुद अपनी बऊ दी से मिलने चला आया था। दर्शन के हाथों पारो की जेठानी आनन्दी ने कुछ दो तीन हल्के रंगों की साड़ियां भी भेज दी थीं और साथ ही पारो के पसंदीदा गुड़ के संदेश भी।
   पर जाने क्यों ये सारा सामान देख कर भी पारो के चेहरे पर कोई प्रसन्नता के भाव नही छलके। शायद वो भी समझती थी कि अपने सर पर बैठी तीन तीन सासों की नज़र से छिपा कर कुछ भेजना आनन्दी के लिए कितना कठिन रहा होगा।

   उसे वैसे भी इन सारे सामानों की आवश्यकता से कहीं अधिक आवश्यकता किसी के साथ और सहारे की थी। उसे लगा काश सामान भेजने की जगह बऊ दी ही आ जाती..
   वो दर्शन के साथ आश्रम के ऑफिस के बाहर खुले आंगन में बैठी थी… उसे सामान देख कर भले न हुई हो पर दर्शन को देख कर बहुत खुशी हो रही थी।

” घर पर सब कैसे है दर्शन?”

“सब मजे में हैं बऊ दी। तुम बताओ, तुम कैसी हो? क्या तुम्हारे घर से कोई आता रहता है मिलने?”

Advertisements

  वो क्या जवाब देती, क्योंकि वो जानती थी कि उसकी माँ की कैसी हालत थी वहां। दिन रात अपनी जेठानियों की गृहस्थी में कोल्हू के बैल सी जुती उसकी माँ के पास तो शाम के समय हाथ मुहँ धोने का भी वक्त नही हो पाता था। वो बेचारी किसी तरह बाली दादा से मिन्नतें कर ही एक बार बस यहां आ पाई थी। बाली दादा को भी पारो से स्नेह था लेकिन बात वहीं आकर अटक जाती थी कि एक जवान लड़की की ज़िन्दगी भर की ज़िम्मेदारी कोई नही लेना चाहता। जैसे उसकी उम्र और उसका रूप ही उसका सबसे बड़ा दोष हो, उसका सबसे बड़ा शत्रु हो।
   आज अगर उसका पति साथ होता तो उसकी यही खूबियां उसे स्वर्ग का सुख दिलवाती होतीं और आज उसकी यही खूबी उसकी सबसे बड़ी खामी बनी उसकी जिंदगी की पतवार को डिगा रही थी।

  ” नही दर्शन !! एक तुम्हारे अलावा कोई मिलने नही आ पाता है। मैं भी सबकी समस्या समझती हूं। और वैसे देखा जाए तो कोई मुझसे मिलने कम ही आये तो मेरे लिए ही अच्छा है। वरना घर की याद ज़्यादा आने लगती है।”

  पारो की बात पर दर्शन ने आंखें झुका ली। उसे अचानक सूझा नही की वो क्या कहे। पारो को भी बोलने के बाद लगा कि उसने ऐसा क्यों बोल दिया। अब धीरे धीरे उसका अपने घर पर के लोगों पर गुस्सा कम भी तो हो गया था। अब तो वो अपनी माँ की मजबूरी समझ पा रही थी पर कभी कभी उसके मन का विद्रोह बाहर निकल ही आता था।

” तुम्हें स्कूल कब से जाना है? “

“बस दो चार दिन में शुरू हो जाएगा। स्कूल में दाखिला नही हुआ है। अब यहाँ के गुरुवर पर निर्भर करता है कब दाखिले के लिए लेकर जाते हैं?”

“हाँ !! पर उन्हें जल्दी करना चाहिए। क्योंकि ऐसे तो पढ़ाई में पिछड़ जाओगी? और फिर इस बार बारहवीं हैं ना? “

“तुम्हें क्या लगता है दर्शन ? तुम्हारी बऊ दी स्कूल के भरोसे अब तक बैठी होगी। वो तो तुमने जिस दिन किताबें पहुंचाई थी, उसी दिन से मेरी पढ़ाई भी शुरू हो गयी थी।
   अपने स्तर पर देखा जाए तो मैं काफी कुछ पढ़ चुकी हूं। भौतिक विज्ञान और रसायन थोड़ा कम समझ में आते हैं,वो शायद स्कूल जाने से आने लगेंगे।”

Advertisements

“इतना आसान नही होता बऊ दी। मैंने तो ट्यूशन भी शुरू कर दी है। बिना अलग से पढ़े ये सब समझ में आना बहुत कठिन है। “

“अब कठिन हो या सरल,मुझे तो खुद ही पढना है। यहाँ आश्रम की तरफ से मुझे स्कूल जाने की मंजूरी मिल गयी क्या उतना कम है? अब उसके ऊपर मैं ये नही कह सकती कि मुझे पढ़ाई समझ में नही आ रही और मुझे ट्यूशन भी लेनी है।”

” एक उपाय है। मैं हर रविवार आकर तुम्हारी हफ्ते भर की पढ़ाई का लेखा जोखा ले लूंगा। और जो तुम्हें नही समझ मे  आएगा….

“उसे मैं पढ़ा दूंगा।”

  दर्शन की बात आधे में ही काट कर वरुण बोल गया।
आश्चर्य से दर्शन और पारो उसे देखने लगे।

*****

Advertisements

  वरुण अपने कमरे से निकलने के बाद से ही पारो को इधर उधर ढूंढ रहा था। उसे उससे कोई विशेष काम नही था,बस यूं ही कि वो क्या कर रही है? कहाँ है जानने के लिए ही उसकी आँखे बेकरार हुई जा रही थी।
   कमरे से निकल कर बाहर आने के बाद उसने एक बार कृष्ण मंडप पर नज़र फिराने के बाद भगिनी आश्रम की तरफ भी रुख किया।  आश्रम के सामने से निकलते हुए उसने चोर नजर से वहाँ के बाहरी परिसर पर दृष्टि डाली पर वो नज़र नही आई।
   वहाँ से हट कर वो एक बार सरोवर की सीढ़ियां भी उतर आया,लेकिन आज पारो वहां भी नही बैठी थी। सब जगह देख कर हारा थका वो कृष्ण मंडप की ओर बढ़ ही रहा था कि प्रशांत सामने से आता दिख गया…

” क्या बात है भाई वरुण? किसे ढूंढ रहे हो?”

Advertisements

“किसी को नही ! मैं तो बस यूं ही टहल रहा था।”

” इस वक्त पर टहल रहे हो? “

  प्रशांत के माथे पर चिंता की लकीरें देख वरुण ने उसे टालने के उद्देश्य से कह दिया….

“अरे मैं तुम्हें ही ढूंढ रहा था।”

  वरुण की बात पर प्रशांत मुस्कुरा कर रह गया..

“मैं भगिनी आश्रम में कब से रहने लगा? “

अपनी चोरी पकड़ी जाती देख वरुण प्रशांत से नज़र चुराता आगे बढ़ने लगा, की पीछे से प्रशांत ने उसे वापस टोक दिया….

” आश्रम के ऑफिस में कोई लड़का आया है पारोमिता से मिलने। पता नही कौन है?”

“उसका देवर दर्शन होगा। वही आता है अक्सर …”

  वरुण का इतना त्वरित जवाब सुन प्रशांत मुस्कुराने लगा। मुस्कुरा कर वो आगे बढ़ गया, और अपनी जल्दबाजी और उतावलेपन पर वरुण अपना माथा पीट कर रह गया।
  ” हद है , खुद पर ज़रा सा भी संयम नही है और बनने चलें है सन्यासी। यही हाल रहा तो आज प्रशांत ने टोका है कल को सारा आश्रम समझ जाएगा। “

मन ही मन खुद से बात करते वरुण पुस्तकालय की ओर बढ़ ही रहा था कि उसका दिल नही माना ।
  ” भाड़ में गई मेरी समझदारी। एक बार देख तो लूँ की वाकई मिलने आया कौन है?”

  वापस अपने मन से लड़ते हुए वरुण ऑफिस की तरफ को बढ़ चला।
   उस वक्त दर्शन पारो को पढ़ाई और ट्यूशन का महत्व बता रहा था कि वरुण पहुंच गया और दर्शन की बात आधे में ही काट कर उसने अपने मन की बात रख दी …
  दर्शन कह ही रहा था..

“एक उपाय है। मैं हर रविवार आकर तुम्हारी हफ्ते भर की पढ़ाई का लेखा जोखा ले लूंगा। और जो तुम्हें नही समझ मे  आएगा….

“उसे मैं पढ़ा दूंगा।”

Advertisements

   कि वरुण ने बीच में ही उसकी बात काट दी। वरुण को यूं वहाँ अचानक पहुंचना देख कर दर्शन और पारो चौंक गए।

  पारो आश्चर्य से आंखें फाड़े वरुण को देखने लगी..

“हाँ !! सच कह रहा हूँ। फिज़िक्स और केमेस्ट्री तो पढ़ा ही सकता हूँ। बाकी बचा बायोलॉजी , उसके लिए दर्शन तुम मदद कर देना ।”

” जी दादा!! सॉरी मैंने आपको गुरु जी की जगह दादा कह दिया। हमारे बांग्ला में बड़े भाई को दादा बुलाते हैं ना।”

  वरुण ने हंसते हुए दर्शन के कंधे थपथपा दिए…

” हाँ तो बोलो ना!! मैंने कब मना किया है बाबुन !!

  वरुण की बात सुनते ही दर्शन एकदम से उसकी तरफ देखने लगा, क्योंकि उस पर बहुत लाड़ आने पर उसके देव दादा भी उसे बाबुन ही बुलाते थे।
    उसे इस तरह खुद को देखते पा कर वरुण मुस्कुराने लगा…

“अरे बड़ा भाई ही तो हूँ तुम्हारा। “

  दर्शन का एकदम से दिल किया कि वरुण के गले से लग जाये लेकिन संकोच में सकुचा कर वो चुप खड़ा रहा, कि तभी वरुण ने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया।
    वरुण के गले से लगते ही दर्शन की आंखें भीग गयी। उसे बिल्कुल ऐसा लगा जैसे उसके देव दादा वापस आ गए….

   पारो की खुद आंखे भीगने लगी… उन दोनों को ऐसे साथ खड़े देख वो भी खुद को सम्भाल नही पायी।

“अब तुम क्यों रोने लग गयीं?”

  वरुण ने दर्शन को प्यार से एक ओर कर पारो की तरफ देखते हुए अपना सवाल दाग दिया। और वो वरुण के ऐसे अपनत्व भरे स्वर से एकदम पिघल गयी।
   दो दिन से वरुण से जो मन ही मन नाराज़गी पाले बैठी थी,सब भरभरा कर चूर चूर हो गयी।

Advertisements

  कैसा निष्ठुर था वो…. जब वो उससे दूर जाने की सोच उससे मन हटाने लगती तभी एकदम अपना सा बन उसके पास चला आता। और जब जब आता उसे देव का एहसास करा जाता। ऐसा लगता जैसे सिर्फ अपनी मीठी बातों से ही उसे सहला गया हो।
   और वो चाह कर भी उसके मोह से अपने आप को अलग नही कर पाती।

  पता नही कृष्ण भी कैसी लीला रच रहे थे…. कि उसके उस बंजर मन में जहाँ वो सोचे बैठी थी कि अब कोई जलधारा नही बहनी है वहाँ अमृत का स्रोत बहाने की तैयारी कर रहे थे….

क्रमशः

Advertisements

aparna ….

Advertisements


   

दिल से ….

Advertisements

Hello friends , कैसे हैं आप सब? और कैसा चल रहा है आपका कायाकल्प? प्लीज़ ये मत कहिएगा की मैंने 3 दिन से कोई अपडेट नही डाली इसलिए वेट करते बैठे हैं…

व्यायाम और योग तो हमें रोज़ करना ही है, चाहे मैं अपडेट डालूं या नही। ज्यादा नही करना है सिर्फ 15 मिनट !!!

शुरुवात में बस इतना ही करना भी पर्याप्त है। सबसे पहले हमें अपने शरीर को व्यायाम की आदत करवाना है। उसके बाद आपको सोचने की ज़रूरत ही नही पड़ेगी, आपकी बॉडी खुद ब खुद आपको खींच कर व्यायाम करवा लेगी।

महिलाओं की एक आम समस्या होती है ब्लोटिंग की । यानी पेट फूल रहा है ऐसा महसूस होता है। दोपहर के खाने के बाद शाम के समय में अगर आपको पेट में भारीपन लगता है तो ये ब्लॉटिंग ही हैं, बहुत बार ये भारीपन हल्के से दर्द में भी बदल जाता है।

आज इस ब्लॉटिंग से बचने के कुछ उपाय बताऊंगी… जिनमें से अधिकतर हम जानतें हैं पर अक्सर फॉलो करना भूल जाते हैं।

Advertisements

1) खाना खाते समय बिल्कुल भी पानी न पिएं। बहुत जरूरत हो तो हल्का गुनगुना पानी एक आध सिप ले सकतें हैं।

2) खाने के 40 मिनट बाद भी आपको भर गिलास पानी नही लेना है। थोड़ा थोड़ा ही पिये वो भी गुनगुना पानी। देखिए जैसे आप हवन करते समय अग्नि में आहुति डालते हैं कुछ ऐसा ही हमारे पेट में होता है। भूख के समय हमारे पेट में कई एंजाइम्स सीक्रिट होते हैं जो मान लीजिये पेट की अग्नि है अब उसमें हम खाना दिलातें हैं जैसे आहुति। अब अगर इसके साथ ही आप ठंडा पानी भी डाल देंगे तो पेट की अग्नि तो बुझ जाएगी ना, फिर वो उस भोजन को ठीक से पचायेगी कैसे? और यही अधपचा भोजन तरह तरह की परेशानियों को पैदा करने का कारण बनता है। तो जिस तरह हवन में अग्नि को भड़काने के लिए बीच में घी प्रयोग किया जाता है वैसे ही भोजन के बीच में ज़रूरत पड़ने पर गर्म पानी प्रयोग करें।

3) एक नियम बना लें,जब तक आपका पेट चिल्ला कर आपसे खाना न मांगे तब तक बिल्कुल न खाए। सिर्फ़ इसलिए कि खाने का वक्त हो गया है इसलिए खा लेना चाहिए वाली आदत छोड़ दीजिए। वैसे व्यायाम करने पर बहुत जोर की भूख लगती है और तब कुछ न कुछ हेल्दी फ़ूड ज़रूर खाये।।

4) हमारे खाने में प्रोटीन का बहुत महत्व है क्योंकि प्रोटीन हमारे शरीर की मरम्मत ही नही करता बल्कि शरीर को बनाने में भी सहायक है। इसलिए अपने भोजन में प्रोटीन ज़रूर शामिल करें। प्रोटीन डाइट और कौन सा प्रोटीन हमारे लिए बेटर है पर एक पूरा ब्लॉग लिखूंगी।जिससे और भी ज्यादा क्लियर हो जाएगा।

5) अब आते है आज के ड्रिंक पर। ये ड्रिंक आपको ब्लोटिंग की समस्या से निजात दिलाएगा और इसका उपयोग बहुत चमत्कारी ढंग से पेट के आधे से एक इंच को कम कर देता है। रात में सोने के पहले एक बड़े कॉफी कप में भर कर पानी लें। उसमें कुछ दो चार टुकड़े खीरे +चौथाई टुकड़ा निम्बू+ थोड़े पत्ते धनिया के+मिंट (पुदीना) के पत्ते भिगो दें।

रात भर भीगे इस पानी को सुबह खाली पेट में ले और सुबह भिगाये गए पानी को शाम के वक्त पर लें। आप देखिएगा, सिर्फ पहली बार के प्रयोग से ही आपको ब्लोटिंग की समस्या में बहुत आराम मिलेगा।

वैसे ब्लॉटिंग से बचने का एक और उपाय ये है कि हर बार कुछ भी खाने के बाद बैठ कर आराम करने की जगह कम से कम दस मिनट घर पर ही चल लें। उस से भी गैस और एसिडिटी की समस्या नही होती।

Advertisements

तो करते रहिए व्यायाम । उसी से मिलेगा आराम।।

फिर मिलते हैं अगले ब्लॉग में जिसमें आपके सवालों के जवाब शामिल होंगे कि किस व्याधि में कौन सा आसन किया जा सकता है।

तब तक खूब खाइए और खूब पसीना बहाइये ….

Advertisements

aparna

Advertisements

दिल से…

Advertisements

कायाकल्प चैलेंज

सुप्रभात दोस्तों,

आशा करती हूं कि आज का चैलेंज आपने अब तक पूरा कर लिया होगा… आज का चैलेंज था सिर्फ 20 सूर्य नमस्कार के साथ थोड़ी सी एब्स एक्सरसाईंज़। जो मैंने आपको कल बताई थी। और कल ही एक फैट कटर ड्रिंक भी बताया था आपको। जिंजर पाउडर ड्रिंक। उसे आप सभी लोग लेना शुरू कर दीजिए.. ये मेटाबोलिज्म बढ़ाने के साथ आपको चुस्त रखता है। अब हमारे अगले मुख्य बिंदु।

1) आप अगर किसी दिन सुबह का अपना 15 मिनट भूल जाएं तो कोई बात नही,किसी तरीके से शाम में उस 15 मिनट को अपने लिए निकालें और वॉक ज़रूर कर लें।

Advertisements

2) वॉक के दौरान कोशिश कीजिये कि आप किसी से बात न करें। क्योंकि बात करते हुए हमारी गति धीमी हो जाती है। आप गाने सुनते हुए वॉक कर सकते हैं। और वॉक के बीच में 1 -1 मिनट की रनिंग ज़रूर ट्राय करें।

3)अपने खाने में तरह तरह के रंगों का प्रयोग ज़रूर करें। डायटिंग टिप्स बहुत आसान है। जो मैं इस चैलेंज के साथ साथ बताती जाऊंगी। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है रात का खाना। रात का खाना आप क्या खाते हैं इस पर आपका अगला दिन निर्भर करता है। अगर आप राइस ग्रेवी या हेवी भोजन खाते हैं तो उसे पचाने में शरीर को वक्त लगता है और इसलिए हमारा शरीर अधिक आराम मांगता है और इस कारण सुबह आपकी नींद खुलने में देर हो सकती है और व्यायाम के दौरान भी आपको मसल्स में स्पासम या जकड़न महसूस हो सकती है। इसलिए योग और व्यायाम करने वाले रात का खाना हल्का खाने पर ज़ोर देते हैं।

4) अगर आप वाकई वजन कम करना चाहते हैं तो रात का खाना शाम 7 के पहले कोशिश करें कि खा सकें। अगर उसके बाद आप 10 तक जागते हैं और आपको भूख लगती हैं तो आप दूध ले सकतें है या फिर भुने मखाने या सुगर फ्री बिस्किट। रात में 10 बजे सोना ज़रूरी है तभी तो आप सुबह जल्दी उठ पाएंगे। जल्दी मतलब 4 से 5 के बीच।

5) अब कल के लिए चैलेंज है…. 20 बार सूर्य नमस्कार करने के बाद आपको अपनी पसन्द का कोई भी तेज म्यूज़िक लगाना है और उस म्यूज़िक पर आपको लगातार 12 मिनट तक डांस करना है। और ये आपको जरूर करना है। इसके लिए भी आप यूट्यूब की मदद ले सकाते हैं। पर मेरा कहना है किसी की मदद लिए बिना अकेले ही कूद फांद के वो डांस कीजिये जो बारात में करने का आपका सपना रहा हो और अपने नही किया हो।

Advertisements

तो फ्रेंड्स अगर आप रोज सिर्फ ये 15 मिनट मुझे देते हैं तो मैं वादा करती हूं, इस चैलेंज के बाद आपको आपकी ही कॉलेज पिक्चर से मिलवा कर रहूंगी।

हमारे जो साथी पहले से ही योग और व्यायाम करते आ रहे हैं उनके लिए ये शुरुवाती चैलेंज काफी कम और आसान होंगे, वो साथी अपना रूटीन ही फॉलो करें और बाकी की हेल्थ टिप्स के लिए ये अपडेट देखते रहें।

आगे आने वाले भागों में मैं आसन के नाम भी बताऊंगी और साथ ही ये भी ये कब किये जा सकते हैं और कब इन्हें करना मना है।

करते रहिए योग …. क्योंकि करने से ही होता है!!!

Advertisements

दिल से…

Advertisements

कायाकल्प चैलेंज

सुप्रभात दोस्तों

होप की आप लोगों ने कल अपनी तस्वीर उतार कर रख ली होगी और अपना वजन भी माप लिया होगा। वैसे व्यायाम और योग के हिसाब से आज भी मेरी अपडेट लेट हो रही है। क्योंकि देखा जाए तो व्यायाम का सबसे सही समय होता है सूर्योदय के पहले का। मतलब सूर्योदय से पहले आप व्यायाम शुरू करें और सूर्योदय आपके सामने हो।

Advertisements

अब आज के कुछ खास टिप्स:-

1) कल का हमारा मुख्य मन्त्र था सिर्फ 15 मिनट। इस मंत्र को हमें अभी 1 हफ्ते तक फॉलो करना है, और यकीन मानिए अगर आप हफ्ते भर रोज़ 15 मिनट कसरत करते हैं तो आपको मालूम भी नही चलेगा कि कब आपका 15 मिनट आधे घण्टे में बदला और कब वो आधा घंटा 1 में।

2) आज का आपका चैलेंज है सूर्य नमस्कार की आवृत्ति को 20 तक बढ़ाना है। यानी एक टांग से 10 और दूसरी से भी 10…..

ये बहुत आसान है, सूर्य नमस्कार 20 की संख्या में करना अधिक नही है , कर के देखिए, बड़ा मजा आएगा।

अभी हमें बढाते बढाते ये संख्या 108 पर लेकर जानी है। मैं भी 108 सूर्य नमस्कार चैलेंज ले चुकी हूं और करने में बड़ा मजा आता है। जनवरी में हम एक बड़ा चैलेंज एक साथ करने वाले हैं।

3) सूर्य नमस्कार करने के बाद अगर आप करना चाहें तो थोड़ी सी एब्स की एक्सरसाइज़ कर सकतें हैं , ये भी आसान है… और ये आप खुद भी कर सकते हैं या यूट्यूब की मदद भी ले सकतें हैं। मैंने जब दो साल पहले योग करना शुरू किया था तब मैं Psyche Truth by शनेला को देखा करती थी। इनके वीडियोस छोटे और बहुत हेल्पफुल हैं।

4) आज का आपका 15 मिनट चैलेंज लेने के बाद आप अपने चेहरे पर एक चमक देखेंगे और इसके साथ ही आपको ज़रूरत होगी एक एनर्जी ड्रिंक की । ये ड्रिंक बहुत आसान है और इसे फैट कटर ड्रिंक भी कहा जाता है। उसे आपको दिन में दो बार लेना है। एक बार सुबह और एक बार शाम 4 के आसपास :-

Advertisements

ड्रिंक – 1 बड़ा ग्लास गर्म पानी ( कुनकुना नही , गर्म पानी) लें उसमें आधा निम्बू ( अगर ज्यादा खट्टा पसन्द नही तो थोड़ा कम ) ,1चम्मच शहद, आधा चम्मच सूखे अदरक का पाउडर यानी सोंठ मिलाकर गर्मागर्म ही पी लीजिये जैसे चाय पी जाती है। ये कब्ज़ की समस्या को दूर करने के साथ ही हमारा मेटाबोलिज्म भी बढ़ाता है।

5) हममें से बहुत से लोग फलों को खाना नही पसन्द करते पर अगर आप अपने शरीर से प्यार करते हैं तो उसकी भी सुनें। हमेशा तो हम अपने मन की ही खाते हैं, आज से अपने हार्ट लिवर किडनी की मनपसंद चीज़े भी खाना शुरू कीजिए। इन्हें। फल कच्ची सब्जियां और सलाद बेहद पसंद है तो आज से इनके लिए कम से कम 1 फल रोज़ खाइए और साथ ही 5 बादाम भी( पानी में भिगोए हुए)

Advertisements

आपको ये सब पढ़ कर लगेगा,इसमें नया क्या है? ये सब तो हम पहले से जानते थे। जानते तो हम सब कुछ हैं, पर फॉलो नहीं करते तो आइए फॉलो करें और अपने दिन को और अपने जीवन को हेल्दी बनाये।

Eat healthy live happily ❤️

Advertisements

दिल से….

Advertisements

कायाकल्प चैलेंज

Advertisements

प्यारे दोस्तों, माफ कीजियेगा हमारे चैलेंज के लिए मैं ही लेट हो गयी, पर आप सब एकदम चुस्ती से तैयार हैं … यही देख कर दिल खुश हो गया।

आज इस चैलेंज से जुड़ी सिर्फ 5 बातें बताऊंगी…

1) आज आप सभी जो इस चैलेंज से जुड़ना चाहतें हैं अपना वजन और हाइट माप लीजिये। अगर घर पर इंच टेप रखते हैं तो अपने शरीर को कमर पेट सीना नाप कर डायरी में नोट कर लीजिए( बिना भूले) … अब आपका सबसे मनपसंद काम कीजिये अपनी एक फूल साइज़ तस्वीर ले लीजिए, और उसे भी आज की तारीख के साथ सुरक्षित कर लीजिए।

2) लोग कहतें हैं फिटनेस के लिए ढेर सारा पानी पीजिए। पर मेरा कहना है … रुकिए अपने पानी पीने के तरीके पर ध्यान दीजिए। पानी हम इसलिए पीते हैं कि वो हमारे शरीर से सारे टॉक्सिन्स बाहर निकाल दे,पर ध्यान दीजिएगा अगर आप पानी तो बहुत पीते है पर यूरिन आउटपुट उतना अधिक नही है तो ये पानी भी शरीर में जमा होने लगता है और ये भी वजन बढ़ाता ही है। इसलिए कोशिश यही रखें कि सुबह के समय खूब पानी पिये और उतना ही वाशरूम जाएं….. सूरज ढलने के बाद पानी भी कम कर दें।

Advertisements

3 ) मैं किसी भी तरह की हरी नीली काली लाल चाय का समर्थन नही करती। मेरा मानना है कि आपको जो स्वाद लगे वही खाये पिये .. लेकिन इस बात का ध्यान रखते हुए की वो आप कितनी मात्रा में कंस्यूम करतें हैं। सबसे ज़रूरी बात है अगर आपको चाय या कॉफी की आदत है तो वो लेते रहें पर कोशिश करें कि सुबह और शाम बस 1 कप चाय के अलावा यानी कुल 2 कप चाय कॉफी के अलावा जब भी एक्स्ट्रा चाय लें वो बिना शक्कर की लें।

4) आपके भोजन के साथ भी यही बात है। आप चावल या रोटी एक बार में कोई एक ही तरह का कार्बोहाइड्रेट खाने में प्रयोग करें। अपने खाने को सभी रंगों से सजाएं… हरा साग, पीली दाल, सफेद दही , और रंगबिरंगे सलाद से।

Advertisements

5 ) आज की आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण बात…. शारिरिक श्रम ज़रूर करें। किसी भी तरह का व्यायाम, योग सूर्य नमस्कार वाकिंग जॉगिंग… आप इनमें से जिसमें भी कुशल हैं या आपको करना पसंद है आप चुन सकतें हैं और शुरू कर सकते हैं… आज देर हो गयी पर अगर आप लोग आज ही मेरा ये ब्लॉग पढ़ लेते हैं तो आज से ही शुरू कीजिए… सिर्फ 15 मिनट …

सिर्फ 15 मिनट :-

हमारा फिटनेस मंत्र है सिर्फ 15 मिनट …

हममें से कई हैं जो सोचते ही रह जाते हैं कि आज नही काल से पूरा एक घंटा मेहनत करेंगे, जिम करेंगे पसीना बहाएंगे.. पर वो कल कभी आता ही नही। इसलिए एक मंत्र अपनाइए सर्फ 15 मिनट .. आज अभी कूद पड़िये मैदान में

Advertisements

1) फ्रेश हो लीजिये।

2) अपना योग मैट बिछाइये।

3)अपने कुछ पसंदीदा गाने लगा लीजिये।

4) हाथ जोड़ कर खड़े हो जाइए…. and lets start…

5 ) सिर्फ 5 सेट ( यानी दोनो पैरों से करने पर कुल 10 ) सूर्य नमस्कार कीजिये।

6) आज की शुरुवात बस इतनी ही… आपमें से कइयों को लगेगा अरे बस इतना ही… तो मेरा जवाब है आप शुरू तो करो… ये चैलेंज की शुरुवात है… आगे अभी बहुत कुछ करना है। सो आज शुरू कर दीजिए… और कमेंट में बताइये कैसा लगा।

आप में से बहुत लोग जो ऑलरेडी अपनी फिटनेस के लिए कुछ न कुछ करते ही है वो भी ब्लॉग को पढ़ते रहें भले ही चैलेंज में भाग ले या न ले क्योंकि आगे मैं इसी में पीसीओएस , स्पाइनल प्रॉबलम्स, थयरॉइड , ब्लोटिंग आदि के बारे में भी बताती जाऊंगी।

Advertisements

ऐसी महिलाएं जो बेबी प्लान करने की सोच रहीं हैं या जो प्रेग्नेंट हैं या जो लेक्टेटिंग मदर हैं इस चैलेंज में भाग न लें… बस पढ़ते रहें … ❤️

किसी भी तरह की हेल्थ इश्यूज वाले दोस्त भी अपने डॉक्टर से सलाह के बाद ही किसी भी तरह के व्यायाम या डाइट प्लान फॉलो करें।

आज बस 15 मिनट का मंत्रा अपनाएं… कल आपको एक सीढ़ी ऊपर चढ़नी है ।।

So be ready …. To fly❤️

Advertisements

aparna ….

दिल से…..

Advertisements

कायाकल्प चैलेंज…

प्यारे दोस्तों,

मुझे बेहद खुशी हो रही है कि आप लोग फिटनेस चैलेंज के लिए भारी संख्या में तैयार हो गए हैं।

फिटनेस सिर्फ आपके शरीर से ही नही जुड़ी होती, ये मानसिक आत्मिक और भावनात्मक भी होती है। औरतें अक्सर डिलीवरी के बाद शारीरिक रूप से तो कमज़ोर महसूस करती ही है लेकिन साथ ही भावनात्मक रूप से भी वो काफी कमजोर हो जाती है जिसे हम मूड स्विंग का नाम देते हैं, जिसके लिए काफी हद तक हमारे शरीर के हार्मोन्स ज़िम्मेदार होते हैं।

आपको पता है हम पूरी तरह अपने हार्मोन्स के कंट्रोल में होतें हैं। यानी हमारा हंसना, रोना, हमारा कभी अति उत्साहित होना तो कभी बिल्कुल ही निकम्मा हो जाना सब कुछ हमारे दिमाग में रहने वाली मास्टर ग्लैंड पिट्यूटरी निर्धारित करती है। अब सोचिए हम खुद को इतना बड़ा तीरंदाज मानतें हैं लेकिन एक छोटे मटर के दाने बराबर महज .6ग्राम की ग्लैंड हमारी बॉस होती है।

तो क्या कोई ऐसा तरीका है कि हम अपनी मास्टर ग्लैंड के मास्टर बन जाये…..हॉं है…..

Advertisements

जब कभी हम अपनी फिटनेस के बारे में सोचते हैं और व्यायाम या योग शुरू करते हैं तो हमारी ये मास्टर ग्लैंड तुरन्त सतर्क हो जाती है,और कुछ न कुछ ऐसा करने लगती है जिससे हम अपने उद्देश्य से भटक जाए क्योंकि ये अच्छे से जानती है कि अगर हम रेगुलर व्यायाम या योग करेंगे तो हम इस ग्लैंड पर राज करने लगेंगे। और इसलिए ये हमे तरह तरह के प्रलोभन देना शुरू करती है और इसी कारण हम बहाने बनाने लगते हैं….

जैसे … मैं जिम नही जाना चाहती,कयोंकि सुना है जिम छोड़ते ही वजन और तेज़ी से बढ़ता है…

– ज्यादा लंबी वॉक नही कर सकते, घुटनों में दर्द होता है।

-खाते तो हम दो चपाती ही हैं पर जाने क्या लग जाता है जो वजन कम नही हो रहा?

इसी तरह के अनगिनत बहाने होते हैं हमारे पास… क्योंकि सच कहूं तो हर किसी को आराम भरी जिंदगी पसन्द है। लेकिन कहतें हैं ना जब तक पानी में कूदोगे नही तैराकी का लुत्फ नही उठा सकते, पानी से डर कर नही बैठना है….

तो आइए हम भी चलते है एक महीने के इस हसीन जहीन सफर पर ….

Advertisements

हमारा फिटनेस चैलेंज है ” कायाकल्प” जिसमें हम पूरे महीने अपनी फिटनेस के लिए जो भी करेंगे उसे अपनी एक डायरी में नोट करते जाएंगे। आप सभी से अनुरोध है कि एक डायरी ज़रूर बना लें। डायरी ऐसी हो कि हम बीच बीच में अपनी तस्वीरें भी लगा सकें।

फिटनेस चैलेंज शुरू करने से पहले आप सभी अपनी हाइट और अपना वजन ज़रूर डायरी में नोट कर लीजियेगा। तारीख और समय के साथ।

Advertisements

इस चैलेंज के लिए हमें बस कुछ चीज़ों की ज़रूरत पड़ेगी जिनमें सबसे ज़रूरी है योगा मैट। अगर नही भी है तो कोई मोटी दरी या कारपेट काम आ सकता है, बस वो ऐसा नही होना चाहिए जो फर्श पर फिसलने वाला हो। इसके अलावा सबसे ज़रूरी चीज़ है विल पॉवर जो मैं जानती हूं आप सब के पास है।

Advertisements

तो हमारा चैलेंज शुरू होगा 1 december से….

गणेश हमारी मदद करेंगे कि हम अपना चैलेंज पूरी सफलता से पूरा कर सकें।

So be ready for a tremendous journey…

aparna …

Advertisements

दिल से…

Advertisements

हेलो दोस्तों

कैसे हैं आप सब ? जानती हूं अच्छे ही होंगे। बल्कि बहुत अच्छे… खुश स्वस्थ और खुद में मस्त।

स्वस्थ पर मैंने सबसे ज्यादा जोर दिया है…. अब चूंकि ये सिर्फ एक लेखिका का ब्लॉग तो है नही, इसमें एक डॉक्टर एक गृहिणी भी मौजूद है। तो सोचा कि क्यों ब्लॉग को सिर्फ कहानी जंक्शन बना कर छोड़ दिया जाए। क्यों न कुछ और भी इसमें शुरू किया जाए।

Advertisements

तो मैं आगे जो बताने या पूछने जा रही हूं , वो हो सकता है आपको थोड़ा बोरिंग साउंड करे पर यकीन मानिए ये उतना बोरिंग और उबाऊ नही है, और न ही उतना टफ है जितना सन् कर हमें लगता है…

तो मेरे ब्लॉग के टॉपिक को शुरू करने से पहले आप सभी से सवाल है कि आपमें से कौन कौन मेरे साथ फिटनेस चैलेंज लेने को तैयार है….?

सवाल कठिन है? पर जवाब आसान है… आ जाइये मैदान में जूझ कर…

तो अगर कम से कम पचास लोग भी हामी भर देते हैं तो कल से मैं अपना फिटनेस चैलेंज आप लोगों के साथ शेयर करूँगी।

Advertisements

Stay fit stay healthy n happy❤️❤️❤️

aparna ….

Advertisements

शादी.कॉम- 30

Advertisements

   शादी डॉट कॉम-30

    मैं तो ना चला था दो कदम भी तुम बिन
    फिर भी मेरा बचपन यही समझा हर दिन
    छोड़कर मुझे भला अब कहां जाओगे तुम
    ये ना सोचा था कभी इतने याद आयोगे तुम
    रूठ के हमसे कभी जब चले जाओगे तुम…

राजा– दोस्त ज़रा गाने को बन्द कर दो यार!! मन नही कर रहा,अभी कुछ सुनने का।।

  हाऊ शाहेब बोल कर ड्राईवर ने टैक्सी में चलते गाने को बन्द कर दिया।।

“काय पुणे चा नही हे का तुमि” ड्राईवर बातुनी था उसके इस सवाल का जवाब देना मतलब उसके अगले सवाल के लिये तैयार होना था।।
  राजा ने धीरे से ना बस बोल दिया ,पर तभी ड्राईवर ने कुछ और राग छेड़ दिया।।
  किसी सूरत में बचने की राह ना देख राजा ने आखिर उसे गाना चलाने के लिए बोल ही दिया।।
 
    “बजा ले भाई गाना ही बजा ले।।”

Advertisements

  एफएम रेडियो को ट्यून कर गाने में मगन ड्राइवर गाड़ी चलाता रहा, मुंबई पुणे हाईवे पर टैक्सी भागती रही ,,दो रातों से जगे राजा को धीरे-धीरे ठंडी हवा ने थपकी देकर सुला दिया।।।
      नींद में सोए राजा ने प्रिंस को लेकर कोई भयानक सपना देखा,,, कहते हैं ना दिमाग में जो चल रहा होता है अक्सर कच्ची नींद में वही सपने के रूप में नजर आता है…. पुणे में टैक्सी में बैठने के साथ ही राजा प्रिंस के बारे में ही सोच रहा था इसीलिए उसे ही सपने में देखा और घबरा कर उसकी नींद खुल गई तभी गाड़ी एक झटके के साथ ब्रेक के लगते ही मुंबई एयरपोर्ट के सामने रुक गई।।

    टैक्सी में बैठने के बाद और युवराज भैया से बात होते ही राजा ने अपने टिकट बुक कर ली थी किस्मत की बात थी कि मुंबई एयरपोर्ट में उतरते ही आधे घंटे में उसकी चेक-इन, थी टैक्सी वाले को पेमेंट देकर राजा अपना सामान लेकर तुरंत अंदर की ओर भागा।
       सिक्योरिटी चेक के बाद राजा को अपना फोन चार्ज करना याद आया लेकिन आसपास उस वक्त उसे कोई चार्जिंग पॉइंट नहीं मिला उसकी फ्लाइट का अनाउंसमेंट हुआ और राजा अपनी फ्लाइट में सवार दिल्ली के लिए उड़ गया।।

  एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही राजा को प्रेम मिल गया प्रेम उसे लिए तुरंत अस्पताल की ओर निकल गया।।

   इतनी देर से खुद को संभाले हुए राजा ने जैसे  ही युवराज भैया से मिलने के बाद आईसीयू में बेहोश पड़े प्रिंस को देखा उसकी आंखों से आंसू बहने लग गए,,, उसके लिए खुद को संभालना मुश्किल हो रहा था प्रिंस को देखकर उसे प्रिंस का हंसता मुस्कुराता चेहरा सताने लगा।।
  
      राजा वहां काफी देर तक प्रिंस का हाथ अपने हाथों में थामे बैठा रहा,, उसे पता भी नहीं चला कि कब मिनट घंटों में बदल गये लगभग तीन-चार घंटे बीतने के बाद युवराज भैया आए और उसे उठाकर बाहर ले गए, वैसे इस तरह प्रिंस के साथ किसी को बैठने की चिकित्सकीय अनुमति नहीं थी परंतु क्योंकि प्रिंस का प्राइवेट आईसीयू वार्ड था और दूसरा राजा की हालत देखते हुए चिकित्सकों ने उसे बिना कुछ कहे चुपचाप बैठने के लिए अनुमति दे दी थी।।

   जब राजा प्रिंस के पास बैठा था तभी प्रिंस के फोन पर किसी का कॉल आया,,प्रिंस का फोन  प्रेम के पास ही था,अनजाने नंबर से फोन आने पर प्रेम फोन लिए बाहर चला गया लगभग 10 मिनट बाहर बात करने के बाद प्रेम वापस आकर चुपचाप खड़ा हो गया।
  उस वक्त ना उसे किसी ने पूछा कि किसका फोन था और ना ही उसने किसी को बताया।।

   डॉक्टर से पता चला कि कुछ मात्रा में आंतरिक रक्तस्त्राव फिर से शुरू हो गया था तथा दिमाग को जाने वाली रक्त वाही नलिका में रक्त की आपूर्ति नहीं होने के कारण दिमाग का एक हिस्सा काम नही कर पा रहा था,, डॉक्टर अपनी तरफ से प्रयासरत थे लेकिन प्रिंस कब तक होश में आएगा?? और उसका दिमाग वापस कब तक दुरुस्त हो पाएगा, यह कहना डॉक्टरों के लिए अभी फिलहाल असंभव था।।

युवराज ने धीरे से राजा को उठाया और अपने साथ लिए आईसीयू से बाहर आ गया।। सब आईसीयू के बाहर थे, तभी युवराज के फोन पर किसी नंबर से फोन आया युवराज ने नंबर देखा और उसकी आंखों मे एक क्षण को चमक आ गयी,वो फ़ोन उठाये वहां से बाहर निकल गया कुछ देर बाद वापस आ कर उसने राजा और प्रेम से सारी बातें बताई__
    ” राजा तुम्हें अपनी भाभी की मौसी याद है जिन्होंने बचपन में रेखा को गोद लिया था हीरे जवाहरात वाली मौसी, हमारी शादी में भी आई रही।”

” हां भैया याद है हमें, अभी पिंकी की शादी में भी तो आई थी”

” हां हां वही उनके सगे  देवर पास के शहर के नेता जी हैं,, हमें पता तो पहले से था लेकिन कभी ध्यान नहीं दिया ।।अभी जब तुम्हारा यह केस हुआ तब हमें अचानक उनका ध्यान आया हमने सबसे पहले उन्हीं  को फोन लगाया पर उनके सेक्रेटरी ने बताया कि नेता जी सपरिवार विदेश घूमने गए हुए हैं … तब हमने अपने और बाकी के जान पहचान वालों से तुम्हारे केस की फाइल को दबवा दिया, हमने नेताजी के सेक्रेटरी को यह नहीं बताया था कि हम नेताजी के रिश्ते में क्या लगते हैं।। अभी नेताजी जब वापस आए तब उन्हें  उनके सेक्रेटरी ने हमारे फोन के बारे में बताया।।
   बड़प्पन देखो उनका हमारा नाम सुनते ही पहचान गए और तुरंत हमें फोन लगा लिया,, अभी हमारे फोन उठाते ही कहने लगे राधेश्याम जी के लड़के बोल रहे हो ना!! हमने  जैसे ही कहा हां तो कहते हैं,, अरे दामाद बाबू सेक्रेटरी से बोले काहे नहीं कि आप फोन किए हैं हमको विदेश में ही नंबर मिला देते हुआं ही आप से बात हो जाती कुछ हमारे लायक सेवा हो तो बताइए,, हम तुम्हारे नाम से थोड़ा बहुत बता ही रहे थे की तुम्हे भी चीन्ह डाले ,कहते हैं तुम्हरा वही भाई ऑफीसर बन गया क्या जो हीरो टाईप दिखता है,,हम बोले हाँ एक ही तो भाई है हमारा!! कहते हैं दामाद बाबू तुरंते चले आओ, आमने सामने बैठ के सब बात कर लेंगे,आपके भाई को हम कुछ ना होने देंगे।।

Advertisements


  
     युवराज के चेहरे की प्रसन्नता देख प्रेम और राजा के मन से भी एक बोझ उतर गया वैसे प्रिंस की हालत को देखते हुए राजा का ध्यान अपने केस की तरफ गया ही नहीं था,,, पर युवराज तो 2 दिन से इसी उधेड़बुन में व्यस्त था आज राजा को वहां देखते ही उसे थोड़ी तसल्ली हुई उसने राजा और प्रेम को हॉस्पिटल में सब संभाल लेने को कह कर अपने पास पड़े कुछ रुपये और चेक बुक राजा के हाथ में रख दी, और अपनी वापसी की टिकट देखने लगा।।
     ” राजा तुम्हारा फोन देना हमारे फोन पर नेट नहीं चल रहा है।”

   युवराज के ऐसा कहते ही राजा को अपने फोन का होश आया उसने जेब में से फोन निकाला जो कब से बंद पड़ा था तुरंत प्रेम से चार्जर लेकर वही हॉस्पिटल में चार्जिंग पिन में लगा दिया।। युवराज वापस अपने टिकट के लिए कोशिश करने लगा 2 मिनट बाद फोन के थोड़ा चार्ज होते ही राजा ने फोन को जैसे ही ऑन किया एक साथ कई  बीप बजने लगी
   “इतना किसका मैसेज आ रहा है राजा ??”

   “मैसेज नहीं भैया यह तो मिस कॉल अलर्ट आ रहा है” प्रेम के ऐसा बोलते ही राजा को एकदम से बांसुरी का होश आया,उसने तुरंत फ़ोन उठाया उसमें बांसुरी की 70 मिस्ड कॉल थी।।

    एक ही रात में कितना कुछ बदल गया था कल की रात जहां वह और बांसुरी साथ-साथ अपने भविष्य को लेकर सपने बुन रहे थे वही आज सुबह से दोपहर हो गई थी और उसकी बांसुरी से बात तक नहीं हो पाई थी उसने समय देखा दोपहर के 3 बज गए थे तभी युवराज भैया ने उसे और प्रेम को कैंटीन में खाना खाने के लिए भेज दिया वो और प्रेम उठकर जा ही रहे थे कि उसके फोन पर रिंग बजने लगी….. एक बार फिर बांसुरी का फोन था,,, उसने जैसे ही फोन उठाया__

” राजा कहां हो?? कल रात से फोन लगा लगा कर परेशान हो गए,, तुम्हारा कोई अता पता ही नहीं है!! दिल्ली पहुंच गए कि नहीं, हमें बताने तक की जरूरत नहीं समझी,,, हम यहां रो-रोकर हलकान हुए जा रहे हैं तुम हो कहां अभी??”

” अरे बाबा सब बताते हैं ,रुको तो सही!! कल फोन डिस्चार्ज हो गया था, और जब हम होटल से सामान लेकर निकले तो जल्दी में फोन का चार्जर और बैटरी बैंक रूम पर ही भूल गये,, बस उसके बाद अभी तो फोन चार्ज हुआ है और बस तुम्हारा फोन आ गया।।”

” कैसे अचानक दिल्ली जाना पड़ा?? क्यों किया था भैया ने फोन?? अभी तुम हो कहां पर??”

” अरे मेरी मां इतने सारे सवाल ??सब बताते हैं एक-एक करके,,, हम अभी दिल्ली एम्स में है।

” एम्स में कहां हो?”

” पूछ तो ऐसे रही हो जैसे पलक झपक के हमारे सामने खड़ी हो जाओगी कैंटीन में है।”

” फिर झपको अपनी पलकें।।”

” क्या बोल रही हो यार बांसुरी मूड थोड़ा ऑफ है हमारा।”

” तो ठीक है पीछे पलटो  फिर तुम्हारा मूड ठीक कर देते हैं।।”

    राजा ने जैसे ही पलट के देखा सामने कंधे पर बैग पैक टांगे बांसुरी मुस्कुराती खड़ी थी।

” अरे तुम यहां कैसे प्रकट हो गई?? कोई जादू चमत्कार जानती हो क्या??

” तुम्हारा नंबर बंद आ रहा था तुम्हें बार-बार फोन लगाने पर भी जब तुम्हारा फोन नहीं लगा तब हमने युवराज भैया के नंबर पर फोन लगाया पर उनका भी फोन बंद आ रहा था ।।तब हमारा एकमात्र सहारा हमारा सबसे प्यारा दोस्त प्रिंस!! हमने उसके नंबर पर फोन लगाया।।
     आज सुबह प्रिंस का फोन लग गया फोन उठाया प्रेम ने ।। हमारे पूछने की देर थी कि प्रेम ने हमको प्रिंस की सारी परिस्थिति बता दी हम समझ गए कि युवराज भैया ने इसीलिए तुम्हें अचानक बुलाया है तुम्हारा फोन नहीं लग रहा था इसिलिए हम भी सुबह-सुबह मुंबई पहुंच गये थे,रास्ते से ही पन्द्रह दिन की छुट्टी का मेल सिद्दार्थ सर को भेज दिया।। हमें तो दिल्ली निकलना ही था प्रेम से बात होते ही हमने अपनी टिकट बुक की और हम यहां पहुंच गए।।

  बांसुरी मुस्कुराने लगी उसे मुस्कुराते देखकर राजा के चेहरे पर भी मुस्कुराहट वापस लौट आई “तुम चिंता मत करो राजा तुम्हारे प्रिंस को कुछ नहीं होगा हम सब मिलकर उसे बचा लेंगे।”

” बंसी तुम आ तो गई हो पर तुम यहां रुकोगी कहां?”

Advertisements

राजा के इस सवाल का जवाब दिया प्रेम ने “भैया जी आपका फ्लैट तो है ही,, हम और युवराज भैया भी वही तो रुके हैं ।।वही आप और बंसी भी रुक जाइएगा ।”
   
   ” तुम कह तो ठीक रहे हो प्रेम, लेकिन बंसी का ऐसे अकेले हम तीनों के साथ रहना हमें कुछ सही नहीं लगता।। बंसी अब तुम मिल चुकी हो हमसे,, शाम की फ्लाइट से  वापस लौट जाओ।”

“हम तुम्हें यहां ऐसे अकेले छोड़कर अब नहीं जाएंगे”

” अरे पर भैया क्या सोचेंगे तुम समझती क्यों नहीं?”

   ” कौन क्या सोचेगा राजा किसकी बात कर रहे हो भाई?? अरे बंसी तुम?? तुम कब चली आई?? कहां रहती हो आजकल और क्या चल रहा है ??तुम तो बड़ी दुबला गई हो भाई??

  युवराज को अचानक कैंटीन में देखकर तीनों के तीनों चौक गए।।

” नमस्ते भैया!! हम पुणे में रहते हैं, वही बैंक में नौकरी कर रहे हैं।। राजा अभी पुणे आए थे तब उनसे मिलना हुआ था फिर यह अचानक आपके फोन से यहां चले आए ,,तो हमें थोड़ी घबराहट हुई प्रिंस के फोन पर कॉल  किया तो प्रेम से सारी बात पता चली प्रिंस की ऐसी हालत सुनकर हम से रहा नहीं गया और हम भी उसे देखने चले आए,, क्या हम कुछ दिन आप लोगों के साथ यहां रह सकते हैं।”

“हां-हां क्यों नहीं बन्सी!! बचपन से तुम्हें देखा है हमारे लिए तो छोटी बहन जैसी हो,, हमारी बहन मतलब  इन लोगों की भी बहन!!बिल्कुल आराम से रह सकती हो लेकिन अपनी अम्मा को बता देना कि तुम दिल्ली आई हुई हो।”

   युवराज की बहन वाली बात सुनते ही राजा के गले में चाय अटक गई और उसे हल्की खांसी आ गई, और वह उठकर वहां से बाहर चला गया।।

   राजा ने चुपके से बांसुरी को समझा दिया कि घर पे सिर्फ युवराज भैय्या ही थे जिन्हे उन दोनों के बारे में कुछ भी नही पता था।।

  कैंटीन से निकलकर सब एक बार फिर प्रिंस के पास चले आए प्रिंस की हालत में कोई सुधार नहीं था वह अब भी बेहोश था उसे देखते ही एक बार फिर राजा का चेहरा मुरझा गया राजा वही आईसीयू के बाहर लगी कुर्सी पर बैठ गया उसके पास ही बांसुरी भी बैठ गयी,युवराज अपना फ़ोन लिये बाहर निकल गया।।

युवराज की रात की टिकट हो गई थी, आईसीयू में मरीज के साथ किसी को भी  रुकने की अनुमति नहीं थी,प्रिंस को वैसे भी सारी दवा आई वी चढाई जा रही थी,इसलिये वो सभी लोग एक बार प्रिंस को देख कर घर के लिये निकल गये।।।

  राजा का प्रिंस को इस तरह अकेले छोड़कर घर जाने का बिल्कुल मन नहीं कर रहा था लेकिन बांसुरी के कारण अस्पताल में दोनों का रुकना भी सही नही था।। इसिलिए वह सभी लोग वहाँ से निकल गये और युवराज भैया को एयरपोर्ट में उतारते हुए फ्लैट के लिए निकल गए।।

   राजा और युवराज का अक्सर दिल्ली में काम पड़ता  रहता था जिसके लिए दोनों ही अक्सर दिल्ली आया करते थे,,इसीलिए युवराज ने कभी बहुत पहले एक फ्लैट लेकर यहां पर डाल दिया था अभी उसी फ्लैट में इन लोगों ने अपने रुकने की व्यवस्था कर रखी थी रसोई में एक-दो ब्रैड के पैकेट और मैगी के पैकेट पड़े थे काम चलाऊ दो चार बर्तन थे और चाय और कॉफी बनाने की सामग्री पड़ी हुई थी।।

     उन लोगों के वहां पहुंचते ही प्रेम ने घर की थोड़ी बहुत सफाई की और राजा नहाने के लिए बाथरूम में घुस गया नहाकर निकलते ही राजा प्रेम को लिए कुछ जरूरी सामान लेने घर से निकल गया।।। जाते-जाते दरवाजे को अंदर से लॉक करने के लिए बांसुरी को कह गया,उन लोगों के वापस लौट कर आने तक में बांसुरी ने एक बार फिर से पूरे घर की साफ-सफाई करी और नहा कर चाय चढ़ा दी।।

    राजा बाहर से ही आलू के पराठे पैक करवा कर ले आया था,तीनों ने चाय और पराठे खाये,पर खाते हुए एक बार फिर राजा को प्रिंस की याद ने भावुक कर दिया।।
      खाने के बाद तीनों साथ ही हॉल मे बैठे प्रिंस को और अपने पुराने समय को याद करते रहे,,प्रेम ने भी उन बातों को याद करते समय बांसुरी से अपनी गलती की माफ़ी मांग ली।।
    राजा जब रसोई में पानी की बोतल भरने गया हुआ था,तभी प्रेम ने बांसुरी को यह सच्चाई भी बता दी कि वो राजा का पत्र लेकर बांसुरी के पास गया ही नही था,और वापस आ कर राजा से सब कुछ झूठ बोल गया था।
    प्रिंस की हालत देख कर सभी भावुक हो गये थे, सभी को अचानक ही आभास हो गया था की ज़िदगी कितनी क्षणभंगुर है,इसी सब में प्रेम को भी अपने किये का पश्चाताप हो रहा था,,वो पहली बार बांसुरी को राजा के साथ देख कर प्रसन्न था।। उसे अपनी गलती का एहसास था और इसिलिए उसने सच्चे दिल से बांसुरी से माफी मांग ली थी।।

    रात गहराती चली गयी पर बातों में भिड़े तीनो दोस्तों की आंखों से नींद गायब थी।।आधी रात बीत जाने पर राजा ने बांसुरी को अन्दर के कमरे में सोने भेज दिया और खुद प्रेम के साथ बाहर हॉल मे ही लेट गया।।

दूसरे दिन सुबह सुबह ही तीनो वापस अस्पताल पहुंच गये,,पूरा दिन तीनों का वहीं बीत गया,शाम होते होते राजा को वापस बांसुरी की चिंता सताने लगी,उसे बांसुरी का इस तरह उनके फ्लैट पर रुकना पसंद नही आ रहा था,आखिर उसने एक उपाय निकाल ही लिया।।उसने बन्टी से बात की,बन्टी की एक पुरानी दोस्त दिल्ली में रहती थी ,राजा ने बन्टी से कह कर बांसुरी के रहने का इन्तेजाम उसकी दोस्त के घर पर करा दिया।।
    शाम मे राजा बांसुरी को छोड़ने निकल गया,अभी दोनो आधे रास्ते भी नही पहुँचे थे कि प्रेम का फोन आ गया” भैय्या जी तुरंत वापस आ जाइये प्रिंस को होश आ गया है।।”

Advertisements

   खुशी से राजा ने टैक्सी को वापस घुमवा लिया।।
राजा और बांसुरी भागे भागे प्रिंस के कमरे में पहुँचे,, उन दोनों को साथ देख प्रिंस इतनी पीड़ा में भी हल्के से मुस्कुरा दिया,,राजा ने दौड़ कर प्रिंस का हाथ पकड़ लिया__” पगला गये थे क्या?? क्या ज़रूरत थी इत्ता बड़ा कदम उठाने की….आइंदा ऐसा किया ना जान ले लेंगे साले तुम्हारी।।”
    राजा प्रिंस के गले से लग के रो पड़ा,बांसुरी राजा के पीछे खड़ी उसके कंधे पर हाथ रखे उसे ढाँढस बंधाती रही,,कुछ समय बाद डॉक्टर ने उन लोगों को बाहर इन्तजार करने कह कर बाहर भेज दिया।।

” राजा ,सुनो!!”

” हाँ कहो ना बंसी !!”

” हमें अपने से दूर मत भेजो ना,हम बन्टी भैया की उन दोस्त को जानते तक नही,,हम तुम्हे बिल्कुल परेशान नही करेंगे,,सच्ची!!

” अरे यार !! तुम समझती नही हो ना,,यही तो मुसीबत है।।कल जब हमारे  या तुम्हारे घर पे पता चलेगा तब ?? सब क्या सोचेंगे तुम्हारे बारे मे।

” वो सब हम नही जानते,हमे बस इतना पता है कि हम इस मुसीबत के समय तुम्हें अकेले नही छोड़ सकते,,प्लीज़ राजा,,मान जाओ ना।।”

    तभी नर्स ने इशारे से उन लोगों को बुलाकर घर से प्रिंस के लिये दाल का पानी और पतले फुल्के लाने को कहा,वैसे तो सभी मरीजों के लिये अस्पताल से ही खाना आता था,पर आई सी यू के मरीज़ों के लिये अलग से खाने की विशेष व्यवस्था नही हो पाने के कारण ही प्रिंस के लिये घर से खाना लाने कहा गया था।।

‘ देखा भगवान भी यही चाहतें हैं हम तुम्हारे साथ रहें,चलो अब हमारे साथ घर चलो ,हम जल्दी से खाना बना लेंगे।”

  राजा प्रेम को वहाँ छोड़ कर बांसुरी के साथ फ्लैट पर वापस आ गया।।
   हाथ पैर धोकर बांसुरी रसोई में  आ गयी,,एक दिन पहले ही राजा ने कुछ तीन चार तरह की दालें,कुछ मसाले ,थोड़े चावल ,आटा, आलू सब्जियां और तेल वगैरह खरीद लिया था।।
    वो जब रसोई मे आया तो सारा सामान फैलाये बांसुरी कभी किसी तो कभी किसी दाल को उठा कर देख रही थी।।

” क्या हुआ? अब तक तुम्हारी दाल चढ़ी नही??”

” हम बस देख रहे थे राजा की कौन सी दाल बनानी है।”

” ऐसा करो बन्सी मूँग की दाल बना लो।”

  राजा को कुछ कुछ समझ तो आ गया था पर जान बूझ कर अंजान बनते हुए उसने बांसुरी को भर नज़र देखा और बाहर जाते जाते उसे चाय भी बनाने कहता गया।
” क्या हुआ बन्सी जी!! आपके कुकर की तो सिटी ही नही बज रही ??”

बांसुरी ने राजा की बात सुनी और बाहर चली आयी

” क्यों तुम्हारे घर मे चाय कुकर में पकाते हैं??”

  अपने रेशमी बालों को बेतरतीबी से क्लच किये सामने के बालों को हाथो से हटाती हैरान परेशान बांसुरी को देख राजा की हँसी छूट गयी।।

” मैडम जी चाय तो पतिली में ही बनाते हैं,पर हाँ हमारे यहाँ दाल कूकर में बनाई जाती है, अब तक तो चढ़ा दी होगी ना।”

बांसुरी को समझ ही नही आ रहा था कि वो अपनी बात कैसे कहे,बडे संकोच से उसने राजा से कहा__ राजा बस एक छोटी सी मदद कर दो,हमें ना दाल बनानी नही आती,बस वो बनाना बता दो प्लीज़।”

” अभी तो बड़ी बड़ी डीँगे हांक रही थी हॉस्पिटल में,,,और हाँ एक मिनट,पुणे में तो तुम्हे देख बिल्कुल ऐसा लग रहा था जैसे कोई बहुत सुव्यवस्थित गृहिणी हो,वहाँ तो रसोई में बहुत कुछ कर रही थी।”

” हम कहाँ कुछ कर रहे थे राजा,इन दो दिनों में याद कर के बताओ,हमने अपने हाथ से चाय के अलावा और क्या खिलाया पिलाया।”

” हां यार!! चाय बस तो पिलाई तुमने ,,तो तुम तीन साल से पुणे मे क्या खा के जिंदा थी मेरी माँ??”

” पुलाव” बांसुरी खिलखिला उठी।।

” बस ” राजा की आंखे फटी रह गयी,तभी ऐसी कमज़ोर हो गयी

” नही , कभी कभी मैगी और ब्रेड भी खा लेते थे,और हाँ पोहा भी। असल मे तुम्हारे साथ साथ हमारा खाना पीना भी छूट गया राजा,,बस तुम्हे याद करते और चाय बना बना के पीते रहते।

” वाह इससे अच्छा तो हमे याद कर कर के कचौड़ियाँ बनाना सीख लेतीं कम से कम हमें बना के तो खिला पाती।।”

” वो अब तुम सीखा देना।।”

” हम्म चलो हटो,अब तुम ऐसा करो चाय चढाओ तब तक हम दाल पका लेते हैं,,वैसे दाल बनाना कोई रॉकेट साईंस भी नही है यार।

” हमें पता है राजा पर हमारे साथ एक छोटी सी समस्या है,,जैसे लोगो के साथ होता है ना किसी एक रंग को नही देख पाते,या सीधी और आड़ी रेखाओं को एक साथ नही समझ पाते,बस वैसा ही कुछ हमारे साथ है।।”

” मतलब क्या बन्सी??

Advertisements

” मतलब हम मूँग की दाल और उरद की दाल मे अन्तर नही कर पाते।”

  राजा का हँस हँस के बुरा हाल था,उसने पूछा तुअर दाल तो पहचानती हो, हाँ मे सर हिलाते हुए बांसुरी अन्दर गयी और अपने हाथ मे कुछ पकड़े बाहर ले आयी,राजा के सामने आकर उसने अपनी मुट्ठी खोल दी __” ये देखो !! ये रही तुअर दाल।”

राजा पेट पकड़ के हँसते हँसते बांसुरी के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया__ ” ये चने की दाल है मैडम।।”
   उसे हँसते देख बांसुरी भी हंसने लगी,तभी कूकर ने सीटी दे दी।।

   चाय छान कर बांसुरी दो कप में ढाल कर ले आई ।।
” चाय पीकर रोटियाँ बना ली जायेँ ।”

” जो हुक्म मेरे आका ।” बाँसुरी के ऐसा कहते ही एक बार फिर राजा हंसने लगा।।

क्रमशः

Advertisements

aparna..
 

समिधा – 47

Advertisements


   समिधा – 47

  
    उदयाचार्य के अपनी बात समाप्त करने के बाद सारे आचार्य सोच में थे सभी की निगाहें वरुण की ओर थीं कि आखिर वरुण के दिमाग में ऐसी कौन सी योजना है जिसके लिए वो इतने आत्मविश्वास से कह रहा है।
  उदयाचार्य ने उससे पूछा पर अपना विचार बताने के पहले वरुण भी कुछ जानना चाहता था।
  
  ” स्वामी जी अब तक आपने जो बताया उससे तो यही मालूम चला कि प्रबोधानन्द जी ने आश्रम के लिए बहुत कुछ किया है। पर मुझे ये समझ नही आ रहा कि इतना ज्ञानी अचानक ऐसे पतित कार्य में कैसे संलग्न हुआ? “

  ” यहाँ उपस्थित सभी के मन में यही बात है शायद। और इस के बारे में मैं कुछ भी नही जानता लेकिन यहाँ उपस्थित स्वस्तिकाचार्य इस बात पर रोशनी डाल सकतें हैं। स्वस्तिक क्या आप इस बारे में कुछ कहना चाहेंगे?”

   अब सभी स्वस्तिकाचार्य की तरफ देखने लगे। अपने गले को ज़रा साफ कर उन्होंने बोलना शुरू किया….

Advertisements

“मैं शुरू से प्रबोधानन्द के साथ नही था। मैं उसके काफी पहले ही यहाँ आचार्य पद पर आ चुका था। प्रबोधानन्द ने जब आचार्य का पद संभाला तब अमृतानंद स्वामी ने उसे मेरे साथ कर दिया और मुझसे कहा कि मैं उसे आचार्य पद की गरिमा और दीक्षा के बारे में अवगत करा दूं|  मैंने सोचा नया लड़का है इसे अभी बहुत ही चीजें सिखानी समझानी पड़ेगी। लेकिन वह मेरी सोच से बहुत आगे था। और वैसे देखा जाए तो सही अर्थों में वाकई वह बहुत तीव्र बुद्धि का स्वामी था। हम जब तक किसी समस्या के लिए सोचना शुरू कर पाते, उसके पहले ही वह समाधान प्रस्तुत कर दिया करता था। अब ऐसे व्यक्ति को मैं क्या और कैसे सिखा पाता ? इस चीज को मैं भी समझता था और इसलिए मैंने उसे कुछ भी समझाने की जगह उसकी तरफ दोस्ती का ही हाथ बढ़ाया और उसने भी बहुत प्रेम से वो हाथ थाम लिया। उसने बहुत कुशलता से आश्रम की जिम्मेदारी उठानी शुरू कर दी थी। आश्रम में एक नियम था कि हर एक काम के लिए एक व्यक्ति और एक व्यक्ति के लिए एक काम । लेकिन उसने आश्रम के लगभग हर एक काम को पूरी जिम्मेदारी से अपनी निगरानी में करवाना शुरू कर दिया। हर बात के लिए वह आदेश पारित करता और उसके व्यक्तित्व का प्रभाव ऐसा था कि हर कोई उसके सामने नतमस्तक हो उसका आदेश मानने को बाध्य हो जाया करता था। शायद किसी किसी को भगवान अंदर से ही सम्राट बनाकर पैदा करते हैं। प्रबोधानन्द उन्हीं में से एक था, लेकिन कहते हैं ना कि एक सम्राट में जहां लोगों का नेतृत्व करने की क्षमता होती है, निर्णय लेने की क्षमता होती है, सभी में अनुशासन बनाए रखने की क्षमता होती है, वहीं इतनी सारी अच्छाइयों के बावजूद एक सम्राट के अंदर हमेशा अपने आधिपत्य को लेकर एक गर्व की भावना, अभिमान की भावना जरूर रहती है। और उस अभिमान से प्रबोधानन्द भी अछूता नहीं रह सका।

    शुरुआत में जितने प्रेम और प्यार से वह सभी स्वामी गुरु आदि का आदर किया करता था। धीरे-धीरे उसकी आंखों से वह प्यार और सम्मान घटने लग गया। एक समय ऐसा आया कि उसे अपने प्रभुत्व अपने बल पर अपनी बुद्धि और विवेक पर इतना अभिमान हो गया कि, वह अपने साथ के आचार्यों पर भी कड़े शब्दों का प्रयोग करने लगा।
    पहले तो हम सभी ने यह प्रयास किया कि हम प्रबोधनंद की बातों पर ध्यान ही ना दें लेकिन धीरे-धीरे यह समस्या बढ़ने लगी। अब ऐसा हुआ कि जिस आश्रम में वह रहा करता वहां हर एक चीज उसकी पसंद की होने लगी। हर एक कार्य के लिए चाहे कोई भी स्वामी या आचार्य निर्धारित हो, पर उस कार्य को कैसे करना है और कैसे नहीं का निर्णय प्रबोधनंद स्वविवेक से लेने लगा। उसने अब किसी भी कार्य के लिए किसी अन्य से पूछने की आवश्यकता ही समझनी छोड़ दी। एक बार हम सब ने मिलकर सोचा भी की अमृतआनंद स्वामी से इस बारे में बात करनी चाहिए , लेकिन हम सब यह भी जानते थे कि  प्रबोधानन्द अमृतआनंद स्वामी का सर्वाधिक प्रिय शिष्य है, और उनकी आंखों पर उस समय प्रबोधनंद के स्नेह का चश्मा चढ़ा हुआ था। वह इस कदर उससे प्रभावित थे, कि उन्होंने मन ही मन शायद यह तय कर लिया था, कि वह अपनी गद्दी अपने बाद प्रबोधनंद को ही देंगे।
     अमृतआनंद स्वामी की वृद्धावस्था और उनका प्रबोधानन्द पर अटूट विश्वास देखकर हम में से किसी का भी मन नहीं हुआ, कि हम स्वामी जी से प्रबोधानन्द की शिकायत करें। हम मन मार कर रह गये, लेकिन यहीं पर हमने गलती कर दी। अगर कोई विषबेल आपके आंगन में फलने फूलने लगे तो उसे शुरुआत में ही काट कर फेंक देना चाहिए, वरना वह बढ़ते बढ़ते अमरबेल का रूप धर लेती है। और उसके बाद वह उस उद्यान में उपस्थित हर एक वनस्पति को लील जाती है यही हमारे साथ भी हुआ।
    इसके बाद एक बार मैंने गुपचुप तरीके से आश्रम ट्रस्ट में प्रबोधानन्द के खिलाफ शिकायत दर्ज की उसका परिणाम यह हुआ कि, ट्रस्ट ने मुझे ही उस आश्रम से हटाकर दूसरे आश्रम में पदस्थ कर दिया। मैं समझ गया कि प्रबोधनंद की पहुंच अब बहुत ऊंची हो चुकी थी और वह हमारी तरह एक सामान्य आचार्य बस नहीं रह गया था। उसने जितना कार्य हम सबके सामने आश्रम के लिए किया था अंदर ही अंदर उसने ट्रस्ट के लोगों के साथ भी अपने संबंध उतने ही प्रगाढ़ कर लिए थे।
      उम्र तो उसकी भी ऐसी कोई ज्यादा थी नहीं। और जैसे उसकी उम्र थी उस उम्र में सामान्य कामनाएं जागना स्वाभाविक ही था। और इसीलिए आश्रम किसी भी गुरु स्वामी आचार्य से उनकी इच्छा के विरुद्ध जाकर ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करवाता। आश्रम में आज भी सुविधा है कि अगर कोई आचार्य चाहें तो अपने पद से त्याग पत्र देकर विवाह करके गृहस्थाश्रम व्यतीत कर सकते हैं… और जब चाहे तब विवाह की जिम्मेदारियों को निपटाने के बाद अपनी आयु पूरी करने के बाद वानप्रस्थआश्रम में आने पर हमारे कृष्ण आश्रम वापस आ सकते हैं। लेकिन प्रबोधानन्द ने विवाह के मार्ग को नहीं चुना क्योंकि आश्रम में अब उसका अपना एक स्थान था पद था। और उस गरिमामय पद पर रहते हुए वो अपने मनमाने कार्य कर सकता था।
   यह तो हम सबको बहुत बाद में पता चला कि वह विदेशों में मंदिरों के शिलान्यास, निर्माण आदि में बहुत बड़ी राशि लिया करता था। उसमें से कुछ राशि अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए अलग से रख लिया करता था ।जबकि ऐसा करने की आज्ञा किसी को भी नहीं है। अगर आप मंदिर ट्रस्ट के लिए मिली राशि को स्वयं के उपयोग के लिए रखना चाहते हैं तो इसके लिए आपको ट्रस्ट से अनुमति लेनी होती है।
   वैसे भी आश्रम ट्रस्ट हर महीने सभी सदस्यों को फिर चाहे वह गुरु हो आचार्य हों, उनके कार्य और पद के अनुरूप  एक निश्चित राशि प्रदान किया ही करती है। इसके बावजूद प्रबोधानन्द ने राशि का गबन शुरू कर दिया। और यहीं से उसका पतन शुरू हुआ। पहले पहल विदेशों में पूजा-पाठ कर्मकांड करवाने के नाम पर जब भी वो जाया करता था, तो अपने आने-जाने का खर्च भी वह विदेशों में स्थित अपने यजमानों से ही वसूला करता था। वहीं धीरे से उसकी कुछ महिला मित्र बननी शुरू हुई, और फिर उसे एक बार इस तरह की मित्रता की आदत हुई वो सुधारने की जगह बिगड़ता ही गया।

Advertisements


    मैंने अपने स्तर पर उससे बात करने की और समझाने की बेहद कोशिश की, लेकिन अब वह जिस स्थान पर पहुंच चुका था वहां उसे उसके अभिमान ने इस कदर जकड़ रखा था कि वह अपने सामने हर किसी को गलत समझने लगा। तरह-तरह के कुतर्कों से उसने मुझे भी परास्त कर दिया। मैंने एक बार उसे यह धमकी भी दे दी कि मैं ट्रस्ट से बात करूंगा, लेकिन मेरे द्वारा ट्रस्ट में बात किए जाने से पहले ही उसने पता नहीं ट्रस्ट के लोगों से क्या बात की कि मुझे मेरे पद से एक पद नीचे स्थान देकर ट्रस्ट ने एक बार फिर मेरा स्थान बदल दिया।
   उसने पता नही ट्रस्ट के लोगों को क्या घुट्टी पिलाई थी , कि कोई उसके बारे में कुछ सुनना ही नही चाहता था। और बस इसलिए मैं भी चुप लगा गया। लेकिन मुझे नही पता था कि बढ़ते बढ़ते उसकी मनमानी इतनी बढ़ जाएगी कि वो अपने ही आश्रम की महिलाओं पर कुदृष्टि डाल बैठेगा।
   और ये उसने जो भी किया है कहीं से भी क्षमा के योग्य नही है। इसलिए उदयाचार्य जी का ये कथन की उसे बाहर निकलवाना होगा मुझे रास नही आ रहा है। हालांकि उदयाचार्य जी ने ऐसा कहा है , तो कुछ सोच कर ही कहा होगा लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर तो नही चाहता कि वो बाहर आये। बल्कि ये चाहता हूं कि कुछ ऐसा हो जिससे आश्रम की बदनामी हुए बिना ही उसे उसके किये की सज़ा मिल जाये और साथ ही इस कार्य में उसके साथ संलग्न अन्य लोगों को भी जेल का सुख मिल सके।
   बोलो वरुण तुम क्या कहना चाहते थे।”

” गुरुवर आप सभी मुझसे बड़े हैं श्रेष्ठ भी हैं। मेरे मन में यह विचार आया था कि अगर आश्रम ही प्रबोधानन्द के खिलाफ रिपोर्ट करेगा तो आश्रम की बदनामी नही होगी। पर अगर कोई श्रद्धालु या भक्त आश्रम के किसी सदस्य पर उंगली उठाता है तो पूरे आश्रम की बदनामी होती है। मेरा कहना बस ये है कि हमें अमृतानन्द स्वामी जी को सारी बातें बता देनी चाहिए। उसके बाद वो प्रबोधानन्द के खिलाफ लिखित कार्यवाही कर उस कार्यवाही को ट्रस्ट में भेज कर पारित करवाएं और उसके बाद सार्वजनिक रूप से अगर अमृतानन्द आचार्य प्रबोधानन्द का पद समाप्त कर उसे मठ से निष्कासित करने का आदेश दे देते हैं, तो उसके बाद उस पर कोई भी इल्जाम लगे वो सारे उसके अपने होंगे और तब उसके किये कार्यों का और उस पर लगे आरोपों का कोई दुष्प्रभाव आश्रम पर नही पड़ेगा।”

  वहाँ उपस्थित सभी आचार्यों ने एक साथ वरुण की बात पर सहमति की मुहर लगा दी।  तुरंत ही सर्व सहमति से उदयाचार्य जी ने अमृतानन्द स्वामी को फ़ोन मिला दिया।
    सारी बातें सुनने के बाद अमृतानन्द स्वामी भी सकते में आ गए। उनके मन के लिए ये बहुत बड़ी चोट थी, उन्होंने प्रबोधानन्द को अपनी संतान मान कर प्रेम किया था, और अपनी संतान का ऐसा कलुषित दुर्व्यवहार उनके लिए असहनीय था। बड़ी कठिनता से उन्होंने खुद को संभाला और अगले ही दिन आश्रम पहुंचने की बात कह कर फ़ोन रख दिया।
   वहाँ उपस्थित सभी आचार्य वर अब भी परेशान थे पर अब कम से कम उन सभी को एक मार्ग मिल गया था।
   उदयाचार्य जी ने वरुण और प्रशांत को  स्वस्तिकाचार्य के साथ मिलकर प्रबोधानन्द के काले कारनामों को कलमबद्ध करने की ज़िम्मेदारी दी और इस मामले में जो भी जितना प्रकाश डाल सकता था, उनसे उतनी सहायता करने की बात रख दी।

  शाम की आरती का समय होता देख उनमें से कुछ आचार्य पूजा स्थल को चले आये।
   रात्रि के भोजन के बाद भी कुछ समय वेद चर्चा हुआ करती थी। उसके लिए आज दो दिन से कोई एकत्र नही हो पा रहा था। इस हेतु आज उदयाचार्य ने सभी से विशेष आग्रह कर सभी को कृष्ण मंडप में बुलाया था।
    खाने के बाद वरुण कुछ देर को सरोवर की सीढ़ियों पर आ बैठा था। वो धीमे धीमे छोटे छोटे तिनके ऊपर की सीढ़ियों पर बैठे सामने पानी में फेंकता जा रहा था। सीढ़ियों का ऐसा निर्माण हुआ था कि ऊपर की सीढ़ियां खड़ी सी थी और नीचे की ढलान पर थीं। जिसके कारण अगर कोई सबसे नीचे की सीढ़ियों पर बैठा हो तो ऊपर बैठे इंसान को दिखाई न दे।
   वही वरुण के साथ हुआ। वो तिनके पर तिनके फेंकता रहा और कुछ देर में ही नीचे की सीढ़ियों पर कुछ हलचल सुनाई पड़ी,वरुण ने ध्यान से देखा नीचे की सीढ़ियों से पारो ऊपर चली आयी।
   उसके बालों में जगह जगह तिनके फंसे हुए थे।
वो उन्हें धीमे से निकालते हुए चली आ रही थी। वो खुद खाने के बाद सरोवर के पास बैठी वरुण के बारे में ही सोच रही थी। वो सोच रही थी कि वरुण में ऐसा क्या था जो उसके आसपास रहने पर उसे ऐसा आभास होता था जैसे वो देव के पास हो… और कहीं उसकी आंख बंद हुई तब तो बिल्कुल यही लगता कि उसके पास वरुण नही देव है। वरुण उसे कोई अपरिचित अनजान पुरुष क्यो नही लगता था। उसकी मुस्कान, उसकी गहरी आंखें सब कुछ उसे क्यों डुबाने पर तुली थीं।
   बहुत बार दिमाग लगा कर सोचने पर उसे आभास होता था कि उस जैसी स्त्री को ऐसे लुभावने सपने देखने का कोई हक नही है ,जब वो अकेली होती हर बार यही प्रण करती की अब वो वरुण के मोहपाश में नही फंसेगी पर उसे एक झलक देखते ही वो जैसे सब भूल कर रह जाती।
   आज भी सरोवर में बैठी वो यही सोच रही थी कि शायद वरुण उससे दूर भागना चाहता है और एक वो है कि उससे चिपकी चली जा रही है,अब उसे भी अपना मन कड़ा करना ही होगा।
  की तभी उसके बालों में एक तिनका आकर उलझ गया, और फिर एक के बाद एक आते ही चले गए और कहीं बाल चिड़िया का घोंसला न बन जाये इस डर से उसे अपनी जगह से उठ कर ऊपर जाना पड़ा जहाँ वरुण उसे आश्चर्य से खड़ा देख रहा था।
  वरुण तक पहुंचते ही उसका नियंत्रण बिगड़ा और वो अपनी ही साड़ी में उलझ कर गिरने को थी कि वरुण ने उसे सम्भाल लिया। उसकी कमर के इर्द गिर्द वरुण की बाहों का घेरा था।
    पारो का कलेजा जैसे उछल कर मुहँ को अ गया। उसकी डर से आंखें बंद हो गयी। और वरुण की उंगलियों के स्पर्श से उसके सोए मन के सारे तार झनझना उठे…
  …. वो पता नही कब तक वैसी ही खड़ी रह जाती की उसे पकड़ कर वरुण ने  सीधा खड़ा कर दिया….

Advertisements
Advertisements

” आंखें खोलो पारोमिता , तुम ठीक हो!”

  घबरा कर पारो ने आंखे खोल दी… अब भी उसकी धड़कन रेलगाड़ी से होड़ लेती भाग रही थी।

“सांस लो पारोमिता!”

  पारो ने एक नज़र वरुण को देखा और शरमा कर नीचे देखने लगी।

  उसकी हालत समझते हुए भी वरुण उसे वहीं छोड़ तेज़ कदमों से अपने कमरे की ओर चला गया।

“पहले तो पारो ही कहा करते थे, अब अचानक पारोमिता? लेकिन क्यो ?
   अपनी सोच में गुम पारो भी भारी कदमों से अपने भगिनी आश्रम की तरफ मुड़ गयी…

क्रमशः

Advertisements

aparna …..

समिधा -46

Advertisements

  समिधा -46

      अगले दिन मंदिर में उपस्थित सभी आचार्य गुरुओं की मीटिंग बैठी। वरुण और प्रशांत भी मौजूद थे।
  चर्चा का विषय एकमात्र यही था कि प्रबोधानन्द के मामले में क्या किया जाए? अभी तक तो बस मामला एक पुलिस थाने में ही था लेकिन जैसे ही मामला कोर्ट कचहरी या मीडिया तक जाएगा तो आश्रम की बदनामी होनी तय थी।

    आश्रम के लिए बहुत ही विकट परिस्थिति थी ये सभी चिंतित बैठे थे। वरुण और प्रशांत चुपचाप एक दूसरे को देख रहे थे। उन्होंने प्रबोधानन्द को तो मज़ा चखा दिया था लेकिन उसका इतना दूरगामी परिणाम सोचा ही नही था। हालांकि इस बात पर एक बार वरुण और प्रशांत की बात भी हुई थी।
   वरुण का दिमाग इसी बात पर अड़ा हुआ था कि उदयाचार्य जी ने बोलना शुरू किया…

Advertisements

“प्रबोधानन्द की कहानी आप सभी नहीं जानते हैं… ऐसा नहीं है कि इसने सिर्फ गलत काम ही किए हैं, मुझे तो खुद आज अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा कि प्रबोधानन्द ऐसा भी कर सकते हैं।
   अपने घर से किसी बात पर रूठ कर निकले प्रबोधानन्द को जो अमृतानंद स्वामी ने अपने पास पनाह दी और अपने साथ लेकर गए…..
…… तो वह स्वयं भी इनके दिमाग से और इनकी वाकपटुता से प्रभावित रह गए थे।
  फिर  अमृतानंद स्वामी ने यह सोचा था कि यह मठ के कार्यों को करने वाले सदस्य के रूप में मठ में उनके साथ रह लेंगे। उस समय प्रबोधानन्द की उम्र भी कम थी। मात्र चौदह – पंद्रह साल की उम्र में वह अपना घर त्याग चुके थे। पर अमृतानंद स्वामी के साथ आने के बाद उन्होंने अमृतानंद स्वामी की भक्ति में अपना दिन रात एक कर दिया। वो वही करते जो स्वामी जी कहते। उनकी आज्ञा से उठना बैठना… सोना जागना, खाना पीना…उनकी इतनी भक्ति देख स्वामी जी भी प्रसन्न थे, उस पर प्रबोधानन्द दिमाग के एकदम तेज़ थे।
    उस समय प्रबोधानन्द स्वामी बनारस निवास किया करते थे। उस मठ में भी विभिन्न तरह के चढ़ावो के साथ ही धन भी चढ़ा करता था। उस सबको गिनने और अलग करना रोज़ का सिरदर्द हो गया था। तब एक रात जब कुछ महंत यही काम कर रहे थे, उन सब के लिए चाय लेकर गए प्रबोधानन्द ने तुरंत कहा…-“अगर शुरू से ही ये सभी वस्तुएं अलग अलग डालने की व्यवस्था हो अर्थात दानपात्र ही 2 हों जिनमें एक में रुपये और दूसरे में अन्य वस्तुएं डाली जायें तो किसी को भी असुविधा नही होगी।”
  वहाँ उपस्थित सभी लोग चौन्क कर उस बालक को देखने लगे कि इतनी छोटी उम्र में इतनी बुद्धि कैसे? कुछ एक महंतों ने बात काटनी चाही पर अमृतानन्द स्वामी को प्रबोधानन्द की बात जम गई और उन्होंने वही किया…
    ऐसे ही एक बार की बात है…
मठ में कुछ ऊँची जात के लोग दर्शन को आये हुए थे। वो लोग अपना पूजा पाठ महानुष्ठान करवा रहे थे… उसी समय वहाँ कुछ निम्नजातिवर्ग के लोग आ पहुंचे और दर्शन के लिए मंडप से होते हुए आगे बढ़ गए।
   वहाँ अनुष्ठान में बैठे किसी ने उन लोगों को देख कर पहचान लिया और वहाँ बवाल मचा दिया कि इन लोगों को अंदर प्रवेश कैसे और किसने दिया?
  इन्हें मंदिर दर्शन की पात्रता नही होनी चाहिए… और वैसे उस समय भी उन्हें मंदिर दर्शनों की पात्रता तो थी पर मंडप में प्रवेश नही दिया जाता था।
तो इसी बात को ध्यान में रख़ कर किसी ने उन्हें टोक दिया कहा कि अगर दर्शन करना भी है तो मंडप से परे खड़े होकर ही दर्शन करें। यहां सब छूकर अपवित्र न करें।
   यह सब सुनते ही मठ में अमृतानन्द स्वामी समेत सभी को गुस्सा तो बहुत आया लेकिन उनमें से कोई भी खड़े होकर उस आदमी की बात काट पाता कि महज इक्कीस वर्ष के प्रबोधानन्द ने चाकू उठा कर उस आदमी के हाथ में एक छोटा चीरा बना दिया। उसके तुरंत बाद उसने अपने और उन दलितों के में से एक पुरुष के हाथ में भी चीरा लगा दिया।
   तीनो का खून बलबला कर छलक उठा। वहीं रखें एक पात्र में उसने उन दोनों आदमियों के साथ साथ अपना भी खून एकत्र किया और फिर उस नाराज व्यक्ति के पास जा पहुंचा।
  उसके कटे हुए स्थान पर हल्दी का लेप रख उसने उस पात्र को उसके सामने बढ़ा दिया। अब तक में वह आदमी गुस्से से पागल हो उठा था… लेकिन वह नाराज होता उसके पहले अमृतानंद स्वामी भी उसके पास पहुंच चुके थे कि तभी प्रबोधानन्द ने बोलना शुरू किया…

-” महानुभाव आप मुझसे उम्र अनुभव आदि सभी में बड़े हैं… इसलिए मैं आपको क्या शिक्षा दूं ? फिर भी मैं अबोध बालक बस यह कहना चाहता हूं, इस पात्र में से आप अपना स्वयं का रक्त पहचान लीजिए , बस आपको इतना ही करना है , और तुरंत ही हमारा मठ और यह आश्रम उन दलितों को उनके खून के द्वारा पहचान कर यहां से बाहर कर देगा।”

Advertisements

बात अचंभित कर देने वाली थी!!! अमृतानंद स्वामी ही नहीं वहॉं अनुष्ठान में बैठे हर एक व्यक्ति के मन में यही सवाल जागा कि इतनी छोटी उम्र में यह बालक इतनी बुद्धिमता वाली बात कैसे कर सकता है? अमृत आनंद स्वामी धीरे धीरे मुस्कुराने लगे…
उस आदमी ने उस पात्र को अपने हाथ में लिया और इधर उधर हिलाकर बहुत कोशिश की …कि उन तीनों रक्त को पृथक कर सकें लेकिन यह संभव नहीं था।

” यह तीनों तो बिल्कुल एक से है, इनमें वे अपना रक्त चुनना असंभव है । यह क्या मजाक कर रहे हो तुम? “

प्रबोधानन्द मुस्कुराने लगे और उन्होंने मंदिर की तरफ देख कर इशारा कर दिया…-” जब उस बनाने वाले ने आपके हमारे और उस आदमी के रक्त में कोई भेद नहीं किया। तब आप और हम कौन होते हैं? सिर्फ चमड़ी के रंग या पैदा होने के स्थान और कुल को लेकर भेदभाव करने वाले?
   क्या आप माता सीता का कुल बता सकते हैं ?उनका गोत्र बता सकते हैं? क्योंकि रामायण के अनुसार तो वह राजा जनक की गोद ली हुई पुत्री थीं।
महाराज जनक को खेत की ज़मीन जुताई के समय मिली सुंदर कन्या यानी धरती की बेटी थी वह।
धरती का तो कोई कुल नहीं, कोई जाति नहीं, कोई धर्म नहीं… फिर भी प्रभु श्री राम ने माता सीता से कभी उनके कुल और जाति के बारे में सवाल किये बिना उन्हें अपनाया, उनसे विवाह किया। उन्होंने तन मन से उन्हें अपनी प्राणप्रिया माना और अपना लिया। तो जब हमें बनाने वाले उस परमात्मा ने जाति और कुल के ऊपर विचार नहीं किया तो हम और आप क्या उनसे भी बड़े हो गए हैं जो यह भेदभाव करने लगे हैं?”

प्रबोधानन्द की बात सुनते ही उस आदमी ने आंखें झुका ली। उसे मन ही मन इतनी ग्लानि हुई की उसने उसी समय प्रबोधनंद के पैर पकड़ लिये। अमृतानंद स्वामी के चेहरे पर एक गर्व भरी मुस्कान छलक उठी और उस दिन से हमारा मठ और आश्रम पूरी तरह से हर जाति वर्ग के लिए खुल गया।

   इतना ही नहीं पहले हर कार्य के लिए अलग सेवादार नियुक्त किए जाते थे। कई सेवादार तो सिर्फ अपना पूरा जीवन आश्रम की साफ सफाई में ही निकाल दिया करते थे।
  लेकिन जब अमृतआनंद स्वामी ने प्रबोधानन्द जी को एक गरिमामय पद दिया तब अमृतानंद स्वामी से कहकर प्रबोधानन्द जी ने सेवादारों की प्रथा भी हमारे मठों से और आश्रमों से हमेशा हमेशा के लिए समाप्त करवा दी। उन्होंने कहा कि मंदिर में कार्य करने वाला हर एक व्यक्ति और हर एक सदस्य उस कृष्ण के लिए कार्य कर रहा है, तो वह चाहे प्रवचन देने का कार्य हो भजन कीर्तन पूजा-पाठ आरती का कार्य हो या साफ-सफाई का, है तो सभी एक बराबर श्रद्धालु !! हैं तो सभी उस मुरली वाले के भक्त!! तो इसलिए इन सभी पदों को स्वामी, आचार्य और गुरुवर इन नामों से पुकारा जाए भले ही काम के अनुसार इन पदों को निम्न मध्यम और उच्च तीन भागों में बांट दिया जाए जिससे पद क्रम के अनुसार आचार्य वर और गुरुवर के बारे में बाकी लोगों को मालूम चल सके लेकिन सेवादार कोई भी ना कहलाये।
   वैसे कृष्ण का सेवादार होना भी अपने आप में सम्मानित पद ही है, और अपने आप में ही बहुत प्रसन्नता की बात है । लेकिन अगर सेवादार कहलाएंगे तो मंदिर के हर एक सदस्य फिर सेवादार ही कहलाएंगे।

  अमृतानन्द स्वामी को प्रबोधानन्द की यह बात भी बहुत अच्छी लगी। और उन्होंने फिर हमारे हर एक आश्रम से सेवादार पद को समाप्त कर दिया।
पहले पहल हमारे ट्रस्ट के मुख्य मंदिर में जो नियम बनाए जाते थे , वही हर मंदिरों और मठों में पालन करना आवश्यक था। यहां तक कि किस दिन क्या भोजन बनेगा? किस मठ में कितना दूध दिया जाएगा? अगर गाय पाली जाएंगी तो कितनी संख्या में गाय पाली जाएंगी ? लगभग कुल कितने गुरुवर और आचार्यवर आश्रम में निवास करेंगे? हर एक चीज का नियम एक पुस्तिका में लिखा होता और उस पुस्तिका के प्रति हर एक मठ और आश्रम में पहुंचा दी जाती। और सभी लोग अक्षरश: उसमें लिखी बातों का पालन किया करते थे लेकिन ऐसा पालन करना भी बहुत कठिन था।
   बनारस के आश्रम की पुस्तिका में लिखा है कि सोमवार को सुबह पालक साग बनेगा तो वह पालक साग हर जगह बनना आवश्यक था।
    राजस्थान, गुजरात … यह सब ऐसी जगह है जहां हर समय हर एक साग भाजी का मिलना संभव नहीं हो पाता है। ऐसे में उनके यहां बहुत बार इस तरह के नियम पालन नहीं हो पाते थे, और वस्तुतः उन्हें हर्जाने के रूप में मुख्य आश्रम को एक राशि भेजनी पड़ती थी।
प्रबोधानन्द एक बार राजस्थान के आश्रम गए हुए थे अमृतानंद स्वामी के साथ । तब उन्होंने वहां के आश्रम में यह सारी परेशानियां देखीं।हालांकि इस बारे में वह खुद भी यही सोच रहे थे और तब उन्होंने अमृतानंद स्वामी से इस बारे में बात की कि हर एक मठ और आश्रम के उस जगह के अनुसार अपने नियम होने चाहिए क्योंकि बहुत सी ऐसी वस्तुएं हैं जो पूरे भारत में हर जगह नहीं मिल सकती। इसके साथ ही पूरे भारत में हर राज्य की अपनी अलग विशेषताएं हैं। अपना अलग पहनावा, अपना अलग खान-पान है तो ऐसी स्थिति में एक मुख्य आश्रम के द्वारा सभी आश्रमों को संचालित किया जाना तो गलत नहीं है, लेकिन दैनिक उपयोग मैं आने वाली वस्तुओं के लिए नियम बनाना और उसे पालन करने को बाध्य करना सही नहीं है। क्योंकि ऐसे नियमों का पालन तो हर जगह एक साथ संभव ही नहीं है।

अमृतआनंद स्वामी स्वयं प्रबोधनंद की बातों से सहमत थे। लेकिन वह अपने से ऊपर बैठे ट्रस्ट के लोगों से यह बातचीत करने में संकोच का अनुभव कर रहे थे। तब प्रबोधनंद ने स्वयं आगे बढ़कर अमृतानंद स्वामी के पैर पकड़ लिए…-” स्वामी जी अगर आप आज्ञा दें तो ट्रस्ट के आचार्य से मैं स्वयं बात कर लूंगा।”

Advertisements

“लेकिन ट्रस्ट के सदस्यों से बात करने के लिए अभी तुम बहुत छोटे हो प्रबोधानन्द। उन लोगों तक हर कोई नहीं पहुंच सकता। सीढ़ी दर सीढ़ी तय कर कर ही उन तक पहुंचा जा सकता है।

” इसका भी उपाय है मेरे पास! आप ट्रस्ट से मुलाकात के लिए समय मांगिये और जब आप मिलने जाए तो आप कह दीजिएगा कि आपके गले में खराश है या खराबी है, जिसके कारण आप अपना प्रवक्ता साथ लेकर आए हैं। मैं सिर्फ आपके प्रवक्ता की हैसियत से यह बातें एक बार ट्रस्ट के सामने रखना चाहता हूं। आखिर मंदिर के ट्रस्ट में भी इंसान ही तो हैं और वह हम इंसानों की तकलीफों को नहीं समझेंगे तो कौन समझेगा?

अमृतआनंद स्वामी तो पहले ही प्रबोधानन्द से प्रभावित थे, अब उसने उन्हें निशब्द कर दिया था। उनका ये कहने का मतलब नही था कि वो ये सब नही कह सकते और किसी और के द्वारा अपने मन की बात कहलवा सकतें हैं ,वो यही बात प्रबोधानन्द को समझना चाहते थे पर अपनी जिद के पक्के प्रबोधानँद को कुछ भी समझाना अपने आप में टेढ़ी खीर था। उन्होंने उसे हामी भरी और उसे साथ लिए ट्रस्ट से मुलाकात करने चल पड़े। ट्रस्ट से हुई उनकी मुलाकात सफल रही। ट्रस्ट के आगे प्रबोधानन्द ने अपने तर्कों से ट्रस्ट में उपस्थित सभी लोगों को इस बात के लिए मना लिया कि राज्य के अनुसार अलग-अलग आश्रम अपनी सुविधा अनुसार अपने दैनिक उपयोग की वस्तुओं को तय कर सकते हैं और अपने नियम रोज के लिए स्वयं बना सकते हैं।

   मंदिर के पूजन अर्चन अनुष्ठान आरती भजन आदि के सारे कार्यक्रम सभी आश्रमों में एक समान होंगे… लेकिन हर आश्रम का खानपान और पहनावा उस आश्रम के वातावरण के अनुसार होगा।

यह भी एक बहुत बड़ा परिवर्तन था, जो सभी आश्रमों में हुआ था। और इस परिवर्तन के बाद हर एक आश्रम ने व्यक्तिगत रूप से प्रबोधानन्द से मिलकर उसे आभार व्यक्त किया था और इसके बाद एक भव्य कार्यक्रम में प्रबोधनंद को गुरु की पदवी मात्र 22 वर्ष की आयु में दे दी गई थी।

उस समय आश्रम सिर्फ हमारे भारतवर्ष में ही मौजूद था। उसी समय एक अमेरिकन भक्त बनारस के आश्रम में आया था । प्रबोधनंद से मिलने और उनका प्रवचन सुनने के बाद उसने इस आश्रम को वाशिंगटन में खोलने की प्रार्थना की। अमृतआनंद स्वामी और ट्रस्ट के बाकी लोग इस बात के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन एक बार फिर प्रबोधानन्द ने ट्रस्ट के लोगों के साथ मिलकर मंत्रणा की और अमृतआनंद स्वामी की उपस्थिति में सभी को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि मंदिर भारत से बाहर भी खुलना चाहिए।
   उन्होंने सभी से यही कहा कि जब बाकी के धर्म के लोग अपने धर्म का प्रचार प्रसार कर सकते हैं, तो हम इस बात में पीछे क्यों रहें? ठीक है, हम यह मानते हैं कि हमारे धर्म को प्रचार प्रसार की आवश्यकता नहीं है!! लेकिन फिर भी इस तरह के प्रचार में मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती।
दूसरी बात अगर अमेरिका में हमारा भव्य आश्रम् बनता है तो अमेरिका और वहां रहने वाले भारतीयों के द्वारा मोटी रकम चंदे के रूप में हमारे आश्रम को मिलेगी। आप सभी यह मत सोचें कि मुझे रुपयों का कोई लालच है , मैं बस यह चाहता हूं, कि जितनी मोटी धनराशि हमारे आश्रम को मिलेगी उस धनराशि का फायदा हम आश्रम के द्वारा संचालित अस्पतालों वृद्ध आश्रम अनाथ आश्रम आदी में लगाकर अपने आश्रम का लाभ बढ़ा सकते हैं।
   प्रबोधानन्द ने और भी ऐसी कई बातें कही कि ट्रस्ट के सभी आचार्यों के साथ अमृत आनंद स्वामी भी प्रबोधानन्द के भक्त हो गए । सबने एक साथ अमेरिका में मंदिर खोलने को मंजूरी दे दी।

  अमेरिका में मंदिर ट्रस्ट की स्थापना के समय अमृतानंद स्वामी के साथ ट्रस्ट के बाकी लोग भी गए थे। और उन सब के साथ प्रबोधानन्द भी उस कार्यक्रम में शामिल हुए थे।
   उस अंग्रेज ने तो प्रबोधानन्द के हाथों ही मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कराई जानी चाहिए थी। लेकिन प्रबोधानन्द ने यहां पर अपने स्वभाव की विनम्रता दिखाते हुए अमृतानंद स्वामी को आगे कर दिया और इस प्रकार एक बार फिर वह सब की आंखों में ऊंचा उठ गया था।
उस मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से वापस लौटते साथ सभी मठाधीशों ने एक साथ मिलकर प्रबोधानन्द को गुरु से एक और ऊपर की पदवी यानी आचार्य की पदवी दे दी। वह भी महज़ दो ही सालों के भीतर । यानी कि इस पूरे आश्रम में सबसे कम उम्र में आचार्य की पदवी पर पहुंचने वाला प्रबोधनंद ही बन गया था। महज 24 की आयु में आचार्य का पद पा चुके प्रबोधानन्द के लिये आगे रास्ते खुलते चले गए। अमेरिका में एक बार मंदिर खुलने के बाद यह सिलसिला नहीं थमा। और भारत से बाहर यूरोप लंदन ऑस्ट्रेलिया नीदरलैंड्स एमस्टरडम सभी जगह हमारे ट्रस्ट स्थापित हुए। और हर जगह प्रबोधानन्द अमृतानंद स्वामी के साथ बना रहा। आगे के उनके कई मंदिर के कार्यक्रमों में तो प्रबोधानन्द अकेले ही जाने लगा और फिर ऐसा हुआ कि साल में तीन से चार बार प्रबोधानन्द के विदेशों के चक्कर लगने लग गए…

देखा जाए तो आश्रम की कीर्तिगाथा में प्रबोधानन्द का बहुत बड़ा हाथ है। और दूसरी बात प्रबोधानन्द को तो हमने पुलिस के हवाले कर दिया लेकिन उसे रातों रात छुड़वा कर यहां से बाहर भेजना होगा क्योंकि बाकी सारे कई आश्रमों में उसके श्रद्धालुओ की संख्या इतनी अधिक है कि उसके नाम पर उसके भक्त बवाल मचा देंगे…

Advertisements

“आप सही कह रहे हैं आचार्य! प्रबोधानन्द ने गलत तो किया है लेकिन साथ ही वो बाहर के लोग भी तो गलत है जिन्होंने आश्रम की महिलाओं के साथ गलत किया है। हमें उनके बारे में भी सोचना चाहिए कि कैसे उन्हें  कानून के हवाले किया जाये।”

  सभी की बातें सुनते बैठे वरुण के दिमाग में फिर कोई बात आने लगी थी…

” मेरे पास एक उपाय है … जिससे आश्रम का गलत लाभ उठाने वाले सभी कानून की गिरफ्त में भी आ जाएंगे और प्रबोधानन्द पर लगे इल्ज़ाम के कारण आश्रम पर कोई आंच न आने पाएगी… लेकिन..!

“क्या है वो उपाय?”

  स्वस्तिकाचार्य ने उससे पूछा ही था कि सभी के लिए चाय लिए पारो और सरिता वहाँ चली आयीं।
हर किसी के सामने चाय का प्याला रखती सरिता ने जब वरुण के सामने प्याला रखा तो उसमें हल्दी वाला दूध देख कर वरुण के माथे बल पड़ गए, उसने तुरंत चेहरा उठा कर सरिता की ओर देखा तो सरिता तुरंत एक तरफ हो गयी और उसने दूसरी तरफ खड़ी पारो की ओर इशारा कर दिया…

   पारो ने आंखों ही आंखों में वरुण से पी लेने की गुज़ारिश की और तभी प्रशांत ने भी धीमे से उसकी ओर झुक कर एक फुलझड़ी छोड़ ही दी…

” सर्दी भी तो है तुम्हें, हल्दी वाला दूध गले को आराम देगा.. पी भी लो, वरना ये भिजवाने वाली तब तक सामने खड़ी घूरती रहेगी जब तक पी नही लोगे।”

  वरुण ने सामने देखा, पारो एक तरफ खड़ी उसे ही घूर रही थी…-“कैसे समझाऊँ इसे ..?”

“क्या समझाना है भाई! पहले खुद समझो, अपनी तबियत देखो, फिर दूसरे को समझाना।”

   वरुण ने एक बार फिर पारो की तरफ देखा और चुपचाप अपना गिलास उठा कर मुहँ से लगा लिया…
   पारो मुस्कुरा कर बाहर निकल गयी….

क्रमशः

Advertisements


   

aparna …

Advertisements

समिधा-45

Advertisements

समिधा – 45

    पुलिस प्रबोधानन्द को पकड़ कर ले जा चुकी थी लेकिन आश्रम का माहौल आज सामान्य नही हो पाया था।
  मंदिर तो बिना बताए बंद नही किया जा सकता था, इसलिए श्रद्धालुओं के लिए मंदिर खुला था पर आश्रम के बाकी दैनिक कार्यक्रम जैसे प्रवचन भजन आदि आज के लिए स्थगित कर दिए गए थे।
  चारुलता जल्दी से जल्द वहां से निकल जाना चाहती थी… लेकिन आश्रम के गुरु आचार्यों ने चारुलता को ऑफिस में पूछताछ के लिए बुला लिया।

    इधर रोज का पूजन अर्चन साधारण रूप से समाप्त करने के बाद आज वरुण को प्रवचन नहीं देना था वह सरोवर की तरफ निकल गया वहां उसके बाकी साथी उसका इंतजार कर रहे थे…

” आओ वरुण बस तुम्हारा ही इंतजार हो रहा था… अब बताओ जरा की उस पाखंडीनंद के होश ठिकाने लाने के लिए तुमने उसकी खीर में क्या मिलाकर खिलाया था?”

Advertisements

” हां यह सवाल तो हम सब जानना चाहते थे, बल्कि मैं तो और भी बहुत सारे सवाल आप से पूछना चाहती थी स्वामी जी।”

अबकी बार सवाल सुनीता की तरफ से आया था यह सभी लोग सीढ़ियों पर बैठे थे। सबसे नीचे बैठी पारो की आंखें वरुण पर एकदम स्थिर थीं और एकटक उसे निहार रही थी। बहुत बार उसे खुद भी लगता कि वह कैसे बेशर्म सी वरुण को ताकने लगती थी लेकिन पता नहीं क्यों वरुण की आंखों से उसे देव की आंखें झांकती हुई नजर आती थी।
    वरुण को देखकर हमेशा ऐसा लगता था कि शरीर भले ही वरुण का हो लेकिन इसके अंदर दिमाग दिल सब कुछ देव का आ गया है।

  वरुण ने एक नजर उन सब को देखा और फिर उन्हीं के साथ सीढ़ियों पर बैठकर उसने सुनीता की तरफ देखा और बोलना शुरू किया…

” आप सभी के सवालों का जवाब जरूर दूंगा। लेकिन सबसे पहले मैं आपसे जानना चाहता हूं , कि आखिर आपने अपने ऊपर इतने अत्याचार होने दिए ही क्यों?
   अगर पहली बार में ही उस पाखंडी को आपने आंखें दिखा दी होती! और खींच के एक थप्पड़ उसके गाल पर रख दिया होता तो शायद वह इतना आगे नहीं बढ़ पाता।

   “आप सही कह रहे हैं स्वामी जी! शायद मैं ही कमजोर पड़ गई थी… कुछ अपने परिवार की तकलीफों के कारण और कुछ उस मजबूत आदमी के दिए प्रलोभन के कारण, शायद मेरे मन में भी यह लालच आ गया था कि इस एक आदमी को खुश और संतुष्ट करके मैं अपना जीवन संवार लूंगी… लेकिन जब ऐसा कुछ हुआ नहीं , तब मेरी आंखें खुली और मुझे समझ में आया कि मैं किस गहरे दलदल में फंस चुकी हूं। और जब एक बार उस गहरे दलदल में नीचे उतर गई तब मुझे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं मिला।”

“ऐसा तुम्हें लगता है सुनीता, कि तुम्हें रास्ता नहीं मिला। आखिर तुमने पारो से सब कुछ सच कहा ना!! यही सच अगर कुछ सालों पहले कह देती तो पहले ही इस दलदल से मुक्ति मिल जाती।”

“पर किसे कहते स्वामी जी? आश्रम में जितनी महिलाएं हैं, उनमें से मैं किस पर विश्वास करूं और किस पर नहीं? यह भी तो मुझे नहीं पता था। वह तो पारो इतनी निश्चल है बिल्कुल बच्चों सी कि इससे अनजाने ही मैं अपने ह्रदय की सारी पीड़ा कह गई।  और इत्तेफाक देखें कि इसने बिना देरी किए आपसे सब कुछ कह दिया और आप दोनों ने मिलकर हमें उस नर्क से बचा लिया।”

  “वह सब तो ठीक है, लेकिन इस सब के बारे में हम पांचों से बाहर कोई बात नहीं जानी चाहिए। क्योंकि चारुलाता अब तक आश्रम में है, और उसके खिलाफ हमें अब तक कुछ भी नहीं मिला। अगर प्रबोधानंद पुलिस के सामने चारुलाता के खिलाफ कुछ बोलते भी हैं, तो भी चारुलता को कुछ दिन रिमांड में रखने के बाद सबूत ना मिलने की कारण पुलिस छोड़ भी सकती है। इसलिए अब हमें उस पर नजर रखनी होगी। हालांकि अभी अभी प्रबोधनंद पकड़ा गया है, तो चारु जरूर कुछ समय के लिए शांत हो जाएगी…… लेकिन बहुत लंबे समय तक शांत बैठी रहे वह ऐसी औरत नहीं है।”

“तुम सही कह रहे हो प्रशांत और मेरा साथ देने के लिए तुम्हारा आभार भी व्यक्त करता हूं ..दोस्त!!”

“एक तरफ दोस्त भी कहते हो, और दूसरी तरफ आभार भी देते हो! खैर अब बताओ कि यह सारी दवाइयां और वह जादूई  धूप यह सब तुम्हें मिला कहां से?”

Advertisements

“मेरी दोस्त सारा से!! मैं जब सिएटल (अमेरिका) में रह रहा था तब वहां सारा से मेरी दोस्ती हुई थी। सारा के पिता जाने-माने जादूगर थे और वह अक्सर बड़े-बड़े जादू के शो किया करते थे। उन सब के दौरान वह कई अलग-अलग तरह के करतब दिखाया करते थे
और वाकई अपनी आंखों के सामने उनके बड़े-बड़े जादुई करतब देखना ऐसा लगता था जैसे मैं वाकई जादू की दुनिया में पहुंच गया हूं । असल में वह इल्यूशंस क्रिएट किया करते थे। यानी कि ऐसे दृश्य हमारे सामने बनाया करते थे कि, हमें यूं लगता वह सारा सबकुछ जो हम स्टेज पर देख रहे हैं , सच है। जबकि वह असल में सिर्फ एक तस्वीर हुआ करती थी। तब उस समय मैंने सारा से उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की थी, और सारा ने मुझे अपने पिता से मिलवाया भी था ।
  उसके पिता अमेरिका में घूम घूम कर अलग अलग जगह शो किया करते थे इसलिए सारा सिएटल में रहा करती थी।
   उनके पास वैसे तो वक्त कम हुआ करता था, लेकिन हम लोग सारा के अच्छे दोस्त थे इसलिए उन्होंने हमें सिर्फ समय ही नहीं दिया अपनी काफी सारी ट्रिक्स भी बताइ और उसी में उन्होंने इस जादुई पाउडर के बारे में बताया था।
     वो जब जादू किया करते थे तब उनके सहयोगी हर एक पंक्ति के पीछे उस जादुई पाउडर को मोमबत्तियों में डालकर जला दिया करते थे। लोगों को ऐसा लगता था कि यह खुशबू के लिए जलाया जा रहा है। लेकिन इससे निकलने वाला धुआं आंखों के सामने एक अलग सा पर्दा तैयार कर देता था और जिसके कारण हम जब जादू देखते थे तो बहुत सी चीजें जो हमारे पीठ के पीछे पर्दे पर चला करती थी.. वह हमें अपने सामने नजर आती थी और ऐसा लगता था हम उन चीजों को साफ-साफ देख रहे हैं।  वह हमारे पीठ के पीछे दो लड़कियों को आधा-आधा काट कर जोड़ दिया करते थे। यानी एक लड़की का धड़ और दूसरी लड़की का सिर, यह सब हमारे पीछे की स्क्रीन पर वह कंप्यूटर के द्वारा ग्राफिक से किया करते थे.. लेकिन उस पाउडर के कारण हमें यूं लगता था जैसे स्टेज पर हमारे सामने दो लड़कियां आधी आधी कट कर आपस में जुड़ गई वह वाकई गजब का अनुभव था।
    यह इत्तेफाक ही था कि जब मैं अमेरिका से हमेशा के लिए भारत वापस आ रहा था तब उन्होंने मुझे गिफ्ट के तौर यह पांव पाउडर भेंट किया था। हालांकि उन्होंने उस समय यह कहा भी कि यह तुम्हारे किसी काम का नहीं है लेकिन फिर भी मेरी याद के तौर पर इसे रख लो……. और देखो उस पाउडर ने आज कितना काम किया।
    सुबह जब प्रबोधनंद हवन कर रहे थे और प्रशांत ने उनके पीछे यह धूप जलाई, तब प्रबोधनंद को अपने सामने बैठी वह लड़कियां नजर आने लगी जो उनके पीछे थी। और इसीलिए हाथ बढ़ाने पर वह किसी को भी छू नहीं पा रहे थे। इसके साथ ही उस धूप का यह प्रभाव हुआ कि उन्हें आंखों में कुछ धुंधलापन सा आया और इसी के कारण उन्हें भूख लगनी बंद हो गई। मैं यह इसलिए चाहता था कि शाम को उन्हें दवा वाली खीर खिलानी थी और उसका अधिक असर तभी होता जब खाने वाला खाली पेट हो। मेरी इच्छा पूरी हो गई क्योंकि प्रबोधानंद ने दिनभर कुछ भी नहीं खाया था।
    शाम को जब पारो ने प्रबोधआनंद को वह नशीली खीर खिलाई तो उस के कारण उसका दिमाग भी काम करना बंद कर गया। उस चीज के प्रभाव के कारण ही उसे हर चीज दुगुने प्रभाव से नजर आ रही थी… जब साधारण सी साज सज्जा के साथ सुनीता और कावेरी बार बार उसके सामने आने लगीं तब उसे उन दोनों में ही भयानक भूतनीया नजर आने लगीं। इसके साथ ही खिड़की से बाहर की तरफ टॉर्च की रोशनी और बड़े कटआउट की सहायता से दीवार पर हमने लाश की झूलती हुई परछाई भी बना दी। उस परछाई को देखकर वो और भी ज्यादा डर गया इसके साथ ही कमरे की रोशनी भी हम बार-बार जला बुझा रहे थे और इन्हीं सब चीजों का एक साथ ऐसा असर हुआ कि प्रबोधआनंद खुद ही हर एक बात कबूल कर गया। हालांकि यह सब करने से पहले मैंने नहीं सोचा था कि प्रबोधनंद इतनी जल्दी पकड़ में आ जाएगा। मैंने उसे एक बहुत मजबूत आदमी सोच रखा था लेकिन शायद उसके पाप कर्मों की हांडी इतनी बढ़ चुकी थी कि छलकने ही लगी थी…… और इसीलिए वह बार-बार बेशर्मी से चारुलता को पारो को अपने कमरे में भेजने के लिए कहने लगा था।
   अपनी ताकत और घमंड में वह इस कदर चूर हो गया था कि उसे दिन दुनिया के बारे में सोचने और फिक्र करने की  बात भूले से भी दिमाग में नहीं आ रही थी! और बस यही से उसके पतन का रास्ता शुरू हो गया। उसने कभी सोचा भी नहीं कि सारे संसार से थकी हारी औरतें इस आश्रम में पनाह लेती हैं और वह इन औरतों को खराब करके इनका सौदा कर देता है। सुनीता , कावेरी क्या आप लोगों ने सोचा भी है कि आपको बड़े-बड़े नेता मंत्रियों के सामने परोसने के बाद यह लोग आपके बदले एक मोटी रकम लिया करते थे।
   बहुत शर्म की बात है कि इतने बड़े मंदिर परिसर से और इतने सारे आचार्यों की पीठ पीछे से ऐसा काला काम यहां होता रहा। और आज तक किसी ने इस काम को रोकने की कोशिश नहीं की …मेरा तो सोच सोच कर ही खून खौल रहा था, मैंने कितनी मुश्किल से खुद को रोका है उस प्रबोधनंद को मारने से यह मैं ही जानता हूं। वरना मेरा बस चलता तो मैं उसका गला दबाकर उसे वहीं खत्म कर देता। लेकिन मैं भी चाहता हूं कि वह कानूनी तरीके से पूरी सजा काटे।
    अब एक बात और मैं आप दोनों से कहना चाहता हूं चारुलाता तो पूरी कोशिश में होगी कि वह आज के आज यहां से अपने घर निकल जाए । उसके यहां से जाते हैं आप दोनों को इतना डर नहीं रह जाएगा।। पुलिस प्रबोधनंद को पकड़कर जरूर ले गई है, लेकिन उसके खिलाफ उन्हें पुख्ता गवाह और सबूत चाहिए होंगे । प्रबोधनंद का इकरारनामा काफी है… लेकिन आप दोनों को आगे आकर अपने ऊपर बीती हर एक बात पुलिस से कहनी होगी। क्योंकि इकरारनामा उसने अनजाने में किया है जब उसे कोर्ट में पेश किया जाएगा तब जरूर अपनी बात से मुकर जाएगा और अगर वह अपनी बात से मुकर गया और हमारे पास कोई गवाह नहीं रहे तो कोर्ट उसे बड़ी आसानी से छोड़ देगा। तो क्या मैं आप दोनों से यह उम्मीद कर सकता हूं कि आप दोनों गवाही देने से पीछे नहीं हटेगी।”

” हम बिल्कुल पीछे नहीं हटेंगे। आपने और पारोमिता ने जिस तरह से हमारा साथ दिया है, हम कोशिश करेंगे कि इस नर्क में हमारे साथ आश्रम की और भी जो महिलाएं शामिल थी वह भी अगर प्रबोधानंद के खिलाफ बोलने के लिए खड़ी हो जाए तो और भी अच्छा होगा। “

Advertisements

“लेकिन वरुण यह भी तो हो सकता है कि यहां मौजूद सभी आचार्यवर यह बात ना पसंद करें। क्योंकि इससे हमारे मंदिर और आश्रम की बदनामी होगी। देखो वैसे भी अगर एक स्वामी पाखंडी निकला ढोंगी निकला तो उसके साथ चलने वाले हर किसी को बाहर निशाना बनाया जाएगा। इस पूरे कृष्ण आश्रम पर उंगलियां उठने लगेंगी और लोगों का भरोसा टूट जाएगा तो अभी कुछ कहा नहीं जा सकता कि प्रबोधानंद के ऊपर कोई केस चलेगा या नहीं!”

“कह तो तुम सही रहे हो दोस्त इस बारे में भी कुछ सोचना होगा।  मैं सोच रहा हूं इस बारे में अमृतआनंद स्वामी जी को फोन करके सब कुछ सच बता देना चाहिए। इसके बाद वो जो निर्णय लें वह निर्णय हमें भी मानना ही पड़ेगा।”

     ऑफिस में उपस्थित उदयाचार्य  स्वस्तिकआचार्य तथा बाकी गुरुवरों ने चारुलता से जितना हो सकता था , पूछताछ की… लेकिन वह अपनी बात पर अड़ी रही । और उसने यही कहा कि प्रबोधानंद स्वामी अपनी रोज की दवाइयां लेना भूल गए थे और शायद इसीलिए तबीयत सही नहीं होने के कारण कुछ भी बोले चले जा रहे थे। उसने उनके इस आचरण के लिए सभी से माफी मांगी और रोते हुए ऑफिस से बाहर निकल गई। वह सरोवर के पास से गुजर कर अपने कक्ष की ओर तेज कदमों से जा रही थी, तभी उसने वरुण पारो और बाकी लोगों की  बातें सुनी और वह वही एक बड़े से कदंब के पेड़ के पीछे छुप कर खड़ी हो गई और इन लोगों की योजना के बारे में सुनने लगी।
    
    वह लगभग सारी बातें सुन लेती कि तभी पीछे से सरिता चली आई…-” प्रणाम चारु दीदी वहां रसोई में पद्मजा दीदी आपको बुला रही हैं।”

चारु का पहले ही दिमाग खराब था और उस पर जैसे ही वरुण कुछ काम की बात बताने लगा था कि यह लड़की धमक पड़ी थी। उसका मन तो किया यही गड्ढा खोदकर सरिता को दफन कर दे। लेकिन अपने जज्बात समेटे वो पैर पटकती रसोई की तरफ निकल गई। सरिता को अचानक से समझ में नहीं आया कि चारु दीदी उस पर नाराज क्यों हो रही थी, कि तभी उसकी नजर सरोवर की सीढ़ियों पर बैठी पारो और बाकी लोगों पर चली गई वह मुस्कुराती हुई उन लोगों की तरफ बढ़ गई।

   आश्रम में सुबह सुबह  जो कुछ भी हुआ था उसमें आश्रम के किसी भी सदस्य को यह भनक तक नहीं लग पाई थी कि इस सारे काम के पीछे वरुण पारो प्रशांत सुनीता और कावेरी का हाथ है।
   आश्रम के लोग यही सोच रहे थे कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि प्रबोधनंद अपने कमरे से बाहर भागता हुआ आया और चिल्ला चिल्ला कर उसने अपने पापों के बारे में खुद ही वहां उपस्थित समूह को बता दिया।
    जहां महिलाएं इसे कृष्ण का चमत्कार मान रही थी, तो वही आश्रम के पुरुष किसे प्रबोधआनंद के पापों का घड़ा भरकर छलकना मान रहे थे। खैर जो भी था किसी को भी इस सबके पीछे वरुण और पारो का हाथ है, यह भान नहीं हो पाया था।

Advertisements

   अपने दोनों हाथों को तेजी से हिलाती मुस्कुराती सरिता भी उन लोगों के पास जाकर सीढ़ियों पर बैठ गई….-” आज आप लोगों का भोजन करने का विचार नहीं है क्या? कब से देख रही हूं तीन-चार दिन से आप लोग सरोवर के इसी स्थान पर मंडली जमा कर बैठ जाते हैं, और जाने क्या बातों में लगे रहते हैं। और यह पारो दुष्ट मुझसे कुछ बताती भी नहीं।”

“तुझे भी सब कुछ बता दूंगी, लेकिन अभी वक्त नहीं आया है… और अगर तुझे कुछ भी जानना है तो इन से पूछ ले।”
     पारो ने धीमे से वरुण की तरफ इशारा कर दिया वरुण ने बाकियों से नजरें छुपा कर पारो को आंखें तरेर कर देखा और पारो ने आंखों ही आंखों में उससे माफी भी मांग ली।

   “तुम लोग नहीं बताओगे तो मैं चारु दीदी से जाकर पूछ लूंगी , वह अभी उस कदम्ब के पेड़ के पीछे खड़ी खड़ी तुम लोगों की बातें सुन रही थी, कि तभी पद्मजा  दीदी ने मुझे उन्हें बुलाने के लिए भेजा और मैंने उन्हें रसोई की तरफ भेज दिया। अब समझ आया इसीलिए शायद वह मुझ पर नाराज हो रही थी कि, वह तुम लोगों की पूरी बात नहीं सुन पाई होंगी।”

  नादानी और भोलेपन में सरिता सारी बातें कह गई और वरुण प्रशांत के कान खड़े हो गए…;” क्या कहा चारु लता यहां खड़ी थी?”

“यहां नहीं वहां कदम्ब के पेड़ के पीछे। वैसे वहां से मुझे तो तुम लोगों की कुछ खास बातें समझ में नहीं आई, पर वह पूरे कान लगाए हुए तुम लोगों की बातें सुन रही थी। “

वरुणा प्रशांत ने एक दूसरे को गहरी नजरों से देखा और कुछ सोच में डूब गए।

“कोई बात नहीं आप में से किसी को भी डरने या घबराने की कोई जरूरत नहीं है। वैसे भी अगर चारु लता ने हमारी सारी बातें सुन ली होंगी, तब भी वह हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। और दूसरी बात अब वह बौखलाहट में कोई ना कोई ऐसा कदम जरूर उठाएगी जिससे वह खुद भी फंस जाए। “

सरिता ने बड़ी बड़ी आंखों से उन सब की तरफ पलकें झपकाते हुए देखा। उसके सिर के ऊपर से यह सारी बातें निकल गई। और इसलिए वह सीढ़ियों पर अपनी जगह खड़ी हो गई…-” पारो तू चलेगी मेरे साथ? सारे आचार्यवर बैठ रहे हैं। चल उन्हें खाना परोसने।”

पारो ने चुपचाप हां में सिर हिलाया और एक नजर भर उनकी तरफ देख कर उठ कर चली गई। वरुण भी उसकी आंखों में बंधा कुछ देर तक उसे देखता ही रह गया ।
      जैसे ही पारो और सरिता उन लोगों की आंखों से ओझल हुए प्रशांत ने अपनी बात रख दी…-” अब हम लोगों को भी यहां से अंदर चलना चाहिए वरना आचार्य लोग भी सोचेंगे कि आखिर हम यहां बैठ कर कर क्या रहे हैं? आप लोग भी भगिनी आश्रम की तरह प्रस्थान कीजिये।”

   प्रशांत ने कावेरी और सुनीता की तरफ हाथ छोड़ दिए वह दोनों भी उन दोनों को प्रणाम कर रसोई की तरफ बढ़ गई।

Advertisements

  कृष्ण मंडप के सामने ही एक बड़ा सा भोजन कक्ष बना हुआ था। जहां आमने-सामने लंबाई में दरियां बिछाकर और इन दरियों के सामने छोटे-छोटे पाटे रखकर गुरु आचार्यों को भोजन करने बैठाया जाता था आज भी सारे आचार्य खाने एक साथ बैठ गए।
  सुबह के कार्यक्रम के बाद आज मन तो किसी का भी खाने को नहीं था लेकिन वहां का बना भोग पहले श्री कृष्ण को अर्पित किया जाता था और इसीलिए उन सभी का खाना असल में कृष्णार्पण हो जाने के कारण प्रसाद स्वरूप हो जाया करता था और प्रसाद को नकारने की हिम्मत उनमें से किसी में भी नहीं थी। और इसीलिए सभी बेमन से खाना खाने बैठ गए। आज सरिता और पारो भोजन परोस रही थी।
    सभी की थालियों में रोटियां परोसते हुए पारो आगे बढ़ी। वरुण के सामने जाकर वो ठिठक गई। वरुण ने सिर्फ एक ही रोटी का इशारा किया और पारो ने उसकी थाली में दो रोटियां डाल दी। वरुण ने आंख उठाकर उसे देखा और आंखों ही आंखों में पारो ने उसे खा लेने का अनुरोध किया और आगे बढ़ गई।
     सभी की दाल की कटोरीयों में घी डालने का जिम्मा भी पारो के ही हाथ आया और सभी की कटोरी में उस छोटी चमची से पिघला हुआ घी डालते हुए पारो एक बार फिर वरुण की कटोरी में दो चम्मच डालकर आगे बढ़ने लगी…. वरुण ने उसे घूर कर देखा।थोड़ा आगे बढ़कर पारो ने दोनों हाथ धीरे से जोड़ कर उससे माफी मांग ली और जग में से गिलासों में पानी ढालने लगी….
     

क्रमशः

Advertisements

aparna….
   
    

समिधा-44

Advertisements


  समिधा -44

उनके वहां से जाते हैं पारो ने चैन की सांस ली, और दरवाज़े की ओर बढ़ गयी।  क्योंकि उसे पता था दरवाजे के भीतर शयन कक्ष के पहले बने गलियारे में उसके साथी उसका इंतजार कर रहे थे……

   दरवाजे को धीरे से खोलकर पारो अंदर चली आई। अंदर आते ही उसकी नजर वरुण और सुनीता पर पड़ी वो लोग दीवार से लगे एक तरफ चुपचाप सांस रोके खड़े थे। उन दोनों पर नजर पड़ते ही पारो के चेहरे पर मुस्कान चली आयी।
    वरुण ने उसे जल्दी से भीतर आने का इशारा किया और अपने होठों पर उंगली रख कर चुप रहने का भी। पारो ने हाँ में सिर हिलाते हुए अंदर प्रवेश करने के बाद अपने हाथ की थाली एक हाथ में पकड़ी और मुड़कर दरवाजा बंद करने लगी।
      दरवाजा बंद करते समय ही उसकी नजर वहां से जाती हुई चारु पर पड़ी और राहत की सांस लेकर पारो ने दरवाजा बंद कर दिया।
    दरवाजा जरा जोर से ही पारो ने बंद किया था… इस खटके की आवाज को अंदर लेटे हुए स्वामी जी ने भी सुन लिया उन्होंने तुरंत अंदर से आवाज लगा दी

Advertisements

“कौन है वहां?”

“स्वामी जी!! मैं हूं पारोमिता!”

“अच्छा आ जाओ, भीतर आ जाओ।”

“जी स्वामी जी अभी आई।”

एक बार वरुण की तरफ देखकर वह अंदर दाखिल हो गई।
    उसके अंदर प्रवेश करने से पहले ही वरुण ने अपने पास छुपा कर रखी एक पुड़िया खोल कर स्वामी जी की खीर की कटोरी में कुछ मिला दिया।
   धीमे कदमों से थाली लिए पारो स्वामी जी के सामने पहुंच गई …स्वामी जी की आंखों में अब भी सुबह का खुमार नजर आ रहा था। पारो ने उन्हें गहरी नजरों से देखते हुए उनसे पूछ लिया…-” अब कैसी तबीयत है आपकी?”

  पारो को ऐसे खुद की तरफ देखते देख कर प्रबोधानन्द के चेहरे पर भी मुस्कान चली आई।

” सुबह से अभी ठीक महसूस कर रहा हूं। अब थोड़ी-थोड़ी भूख लगनी भी शुरू हो गई है। पता नहीं सुबह अचानक ऐसा क्या हुआ था, कि आंखों में जरा धुंधला धुंधला दिखने लगा और सिर भारी हो रहा था। उसके बाद कुछ भी खाने पीने का मन ही नहीं कर रहा था।”

“अभी तो साफ साफ दिखाई दे रहा है ना?”

आंखों में धुंधलेपन की समस्या प्रबोधानंद को अब भी हो रही थी… लेकिन जाने क्यों उसने उसे झूठ ही कह दिया…-” हां!! अभी तो साफ साफ दिख रहा है।

   पारो ने मुस्कुराकर प्रबोधानंद के पलंग के एक तरफ बैठने के लिए रखी कुर्सियों के सामने टेबल पर उसकी थाली रख दी…-” आप इधर आ जाइए और खाना खा लीजिए।”

  प्रबोधानंद का तो अपने पलंग से उठने का बिल्कुल भी मन नहीं कर रहा था… जाने सुबह से शरीर क्यों ऐसे टूट रहा था? लेकिन फिर भी पलंग पर बैठ कर खा तो नहीं सकते थे, इसलिए उठ कर उन्हें कुर्सी तक जाना ही पड़ा …उनकी कुर्सी के ठीक पीछे खिड़की खुलती थी।
     खिड़की के पीछे प्रशांत छिपकर खड़ा था। उसने एक बार फिर अपने आसपास यह देखकर कि कोई भी नहीं है, सुबह वाली धूप जलाकर खिड़की से जरा अंदर की तरफ सरका दी… उसका धुँआ धीरे-धीरे प्रबोधआनंद के चारों तरफ फैलने लगा…
  ” मैं आपके लिए हल्का गुनगुना पानी लेकर आती हूं।”

   यह बोलकर पारो उनके सामने से हटकर एक तरफ जाने लग गई…. प्रबोधानंद ने उसे रोकना चाहा लेकिन एक बार फिर उन्हें थोड़ा अजीब सा महसूस होने लगा। आंखें वापस थोड़ी सी भारी होने लगी, और ऐसा लगा जैसे उन्हें देखने में कुछ कष्ट सा हो रहा है। उन्होंने अपनी आंखें मली और जैसे ही उन्होंने अपनी आंखें खोली सामने सुनीता बैठी थी…

” इतनी जल्दी आप हमें भूल गए स्वामी जी? कितने बड़े-बड़े वादे किए थे आपने हमसे, कि हमें अपने साथ विदेशों की सैर करवाएंगे….. बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घुमाएंगे,  खूब सारे नए कपड़े दिलवाएंगे । आश्रम में हमें अलग से कमरा दिलवा देँगे।  अपने तो इसमें से  कुछ नहीं दिलवाया बल्कि आपके जाने के बाद हमे जो मिला वह तो और भी बुरा था।”

” तुम हमारे कमरे में कैसे आ गयी? जाओ यहां से, हम तुमसे बाद में बात करेंगे।”

” ऐसे कैसे चले जाए?  पहले हमारा चेहरा तो देख लीजिए… हमने तो अपना चेहरा आधा ढक रखा है। आपने हमें पहचाना कहां होगा? आपके लिए तो हम और हमारी जैसी लड़कियां तितली की तरह है , बस एक बार अपनी उंगली से पकड़ा और जैसे ही हमारा रंग आपकी उंगलियों में छूटा आप हमें छोड़ कर उड़ जाते हैं। “

” यह सब क्या बक रही हो?  तुम हो कौन?”

Advertisements

और सरिता ने अपने चेहरे से अपने आंचल को हटा दिया… अब तक उसकी सिर्फ आंखें ही नजर आ रही थी उसका चेहरा देखते ही प्रबोधानंद चौक कर जरा पीछे की ओर सरक गया।
  उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था क्योंकि आप तक उसने आश्रम की लड़कियों को इस कदर डरा कर रखा था कि किसी की हिम्मत उसकी अनुमति के बिना उसके कमरे में प्रवेश करने की नहीं हुई थी। यह लड़की आज अचानक बिना उससे अनुमति लिए ऐसे कैसे चली आई… यही उनके लिए बहुत बड़ी बात थी?  आंखों के धुंधलेपन से परेशान उन्होंने अपनी आंखों को एक बार मलकर वापस खोला तो सामने पारो खड़ी थी….

” स्वामी जी यह आपका पानी हल्का सा गर्म है….. संभल के पीजियेगा कहीं मुहँ ना जल जाए। “

स्वामी जी आश्चर्य से चारों तरफ देखने लगे। क्योंकि अब उन्हें सुनीता कहीं नजर नहीं आ रही थी । उन्होंने एक बार फिर अपनी आंखें साफ की और पारो को देखने लगे…-” पारोमिता क्या  इस कमरे में और कोई भी लड़की है? क्या तुमने किसी को भी देखा है?”

  “ना” में सिर हिला कर पारो गुमसुम सी खड़ी रही….-” मैंने तो किसी को नहीं देखा स्वामी जी!! इस कमरे में तो सिर्फ मैं ही हूं। आप भोजन तो शुरू कीजिए। आज आपने सुबह से कुछ भी नहीं खाया ऐसे में तो कमजोर हो जाएंगे आप?”

“आज अचानक तुम्हें हमारी चिंता क्यों होने लगी? कल तो बहुत जोर का थप्पड़ मार कर गई थी?”

“चिंता तो मुझे आज भी आपकी नहीं हो रही है, लेकिन क्योंकि आप इस आश्रम का एक हिस्सा है और मैं भी इस आश्रम की सदस्य हूं , तो मेरा फर्ज बनता है कि आप के खान-पान का ध्यान रखूं।”

“अकड़ बहुत ज्यादा है तुममें लड़की?”

“जानती हूं स्वामी जी!! शायद परिस्थितियों ने मुझे ऐसा बना दिया है।”

“हम कह तो रहे हैं कि हम तुम्हारी परिस्थितियां बदल देंगे। तुम्हें वह सारी सुख सुविधाएं मिलेंगी, जो तुम जैसी लड़की को मिलनी चाहिए। तुम जानती भी हो कि तुम कितनी सुंदर हो। और तुम अपने इस रूप को भुनाकर कितना कुछ पा सकती हो। इस संसार में हर एक वस्तु की एक कीमत होती है, तुम भी बहुत सुंदर हो अगर तुम हमारी बात मान जाओ तो हम तुम्हें कहां से कहां पहुंचा देंगे तुम सोच भी नहीं सकती…

  स्वामी जी अपनी लय में कहते चले जा रहे थे कि तभी पारो के ठीक पीछे से कावेरी सामने चली आई…

” जैसे आपने मुझे पहुंचाया….?  आज से  पांच साल पहले यही शब्द आपने मुझसे कहे थे । याद है, स्वामी जी? तब मैं भी आश्रम में नई-नई आई थी। कुछ समय तक तो मुझे आपकी बातें बहुत बुरी लगी लेकिन फिर लगने लगा कि शायद इस आश्रम से मुक्ति का यही उपाय होगा। लेकिन आपने क्या किया मुझे बुद्धू बना कर मुझसे झूठ बोल कर मुझे हर लिया।
   यही सारे सपने तो आपने मुझे भी दिखाये थे।  यही सारे हसीन वादे आपने मुझसे भी किए थे, कहा था अगर मैं आपके जीवन में चली आई तो मेरे जीवन से सारी कालिख और अंधेरा दूर हो जाएगा। लेकिन आपने क्या किया ? मेरा भोग लगाने के बाद आपने अपने परिचितों में मेरा प्रसाद बांट दिया ….
    मुझे तो आपने एक निर्जीव वस्तु से भी गई बीती बना दिया था…..याद है  स्वामी जी !!! भूल गए क्या?”

प्रबोधानंद के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। क्योंकि इस कावेरी से पिछले डेढ़ दो साल से उनकी कोई मुलाकात नहीं हुई थी। यह आज अचानक कहां से यहां टपक पड़ी थी? उन्होंने तो बहुत पहले ही चारु से कहा था कि इसे किसी और आश्रम में भेज दिया जाए। अब इसका यहां पर कोई काम नहीं , लेकिन पता नहीं क्यों चारु ने इसे नहीं भेज यही रख रखा था।

   वो आंखें फाड़  उसे देखने की कोशिश कर रहे थे पर आंखें और धुंधली होती जा रही थी। उन्होंने नीचे सर किया और अपनी आंखों पर थोड़ा पानी लगा कर आंखें खोली… लेकिन अब कोई भी वहां नहीं था।  पारो नीचे बैठी थाली में कुछ और चीजें सजाकर उनकी राह देख रही थी….

” यह सारी लड़कियां अंदर कैसे आती जा रही है?

” कौन सी लड़कियां स्वामी जी !!!यहां तो बस मैं ही हूं, और आप कुछ खा भी नहीं रहे।”

पारो ने खीर की कटोरी उठाई और स्वामी जी के सामने कर दिया “कम से कम ये खीर ही खा लीजिए।”

“हमें कुछ ठीक नहीं लग रहा है… सुबह से तबीयत ठीक नहीं हो रही, और अभी कुछ अजीब अजीब सी चीजें हो रही है।”

“आप सोचते बहुत है ना स्वामी जी!! मन ही मन मनसूबे  तैयार करने लगते हैं। इतने बड़े-बड़े सपने देखने लगते हैं, कि असल जिंदगी में आपको कुछ नजर ही नहीं आता।”

“यह क्या बकवास कर रही हो।”!

Advertisements

    पारो ने धीमे से गुनगुना कर जो कहा था वह भी प्रबोधानंद को सुनाई दे गया और वह उस पर नाराज होने लगे… इस पर पारो ने मुस्कुराकर वह कटोरी वापस उनके सामने कर दी…

    “जी आप नाराज मत होइए.. मेरा कहने का तात्पर्य सिर्फ यह था कि, आप अपने खाने पीने पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते। आज आपने सुबह से कुछ भी नहीं खाया है ….और शायद इसीलिए आपकी तबीयत सही नहीं लग रही है।  चलिए अब आप सबसे पहले यह खीर खत्म कीजिए..”

  प्रबोधानंद को भी यही लगा कि शायद सुबह से एक अन्न का दाना भी उसके पेट में नहीं गया और इसीलिए उसे तबीयत ज्यादा खराब लग रही है। वह फटाफट खीर खाने लग गया, और लगभग दो-तीन मिनट में ही उसने पूरी कटोरी खा कर नीचे रख दी। पारो के चेहरे पर मुस्कान खेलने लगी।

  तभी पारो के पीछे से वापस सुनीता निकलकर सामने चली आई …प्रबोधनंद के ठीक सामने हाथ बांधे खड़ी हो वापस मुस्कुराने लगी।
   इतनी देर में प्रशांत ने धुँआ करने के लिए जो सामग्री रखी थी उसे हटा लिया था जिसके कारण अब पारो सुनीता या कावेरी को उस धुँए से कोई समस्या नहीं होनी थी।

“हर चीज़ अब भी सबसे पहले ही चाहिए आपको स्वामी जी। और फटाफट चट कर जाने की आदत भी गयी नही आपकी। मुझे भी ऐसे ही खा कर जैसे कटोरी एक तरफ फेंक दी मुझे भी फेंक दिया था। याद है स्वामी जी?
    और आपके वो कुत्ते जिनके सामने मुझे फेंका था आपने, कुछ दिनों पहले तक नोच रहे थे मुझे। फिर जानते हैं आप? मैंने उनसे बचने के लिए क्या उपाय किया?
   आप कैसे जानेंगे ? आपकी प्रिय चारु ने आप तक ये बात आने ही नही दी….., या हो सकता है आपको पता भी हो तो आप अनजान बने घूम रहे हों?”

” कौन सी बात ? क्या किया तुमने?”
   ये पूछते हुए प्रबोधानन्द ने एक नज़र वहीं एक तरफ खड़ी पारो पर डाली। लेकिन पारो के चेहरे पर ऐसे निर्लिप्त भाव थे जैसे उसे सुनीता नज़र ही नही आ रही…

“क्या आप सच में नही जानते कि मैंने क्या किया? चलिए मैं ही बता देती हूँ। जब आपके उन रईस दोस्तो से मैं तंग आ गयी और मुझे बचने का कोई उपाय नही दिखा तब मैंने अपनी ही साड़ी का फंदा बनाया और झूल गयी… ऐसे…”
    वो एक तरफ को किनारे सरक गयी…. और उसके ठीक पीछे की दीवार पर फांसी के फंदे से लटकी एक औरत की छाया सी दिखने लगी।
   प्रबोधानन्द के कमरे में वैसे भी अधिक प्रकाश नही था, नाइट बल्ब जैसी नीली झिली सी रोशनी में दीवार पर औरत की झूलती लाश की परछाई डरावना माहौल बना रही थी…
   वो हड़बड़ा कर अपनी जगह से गिरते गिरते बचा, उसे अपनी आंखों पर विश्वास नही हो रहा था। वो तुरंत पीछे की ओर घुमा, ये देखने के लिए की आखिर परछाई बन कहाँ से रही है। पर उसके पीछे मुड़ते ही उसके सामने बाल बिखेरे कावेरी खड़ी थी…

” मुझे क्यों इतनी जल्दी भूल गए स्वामी जी?  आपने तो कहा था आप मेरा भला कर देंगे, मेरी जिंदगी सवार देंगे ….मैं अगर आपका कहना मान जाऊं तो आप जिंदगी भर मेरा ख्याल रखेंगे। लेकिन आप तो दो ही साल में मुझे भूल कर अपने रास्ते निकल गए। आप तो बहुत बड़े पाखंडी निकले स्वामी जी। “

  ” जाओ यहां से…. तुम यहाँ कैसे आ गई? यह तुम सब की कोई मिलीभगत है, मैं समझ गया हूं। “

  प्रबोधानंद  ने उसे हटाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया लेकिन उनका हाथ कावेरी के सामने से निकल गया… पर वह कावेरी को छू नहीं पाए।
        इस बात से वह थोड़ी देर को चौक गए और कावेरी को पकड़ने के लिए आगे बढ़ने लगे.. कावेरी अब भी अपनी जगह पर ही खड़ी थी और प्रबोधनंद को ऐसा लग रहा था वह चलते जा रहे हैं, लेकिन वह कावेरी तक पहुंच नहीं पा रहे थे….

    उन्होंने वापस पलट कर देखा पारो अब भी उनकी थाली में कुछ थोड़ा बहुत परोस रही थी। वह बिल्कुल इस तरह से निर्लिप्त उनकी थाली सजा रही थी, जैसे उसे ना तो कमरे की दीवार पर लाश की परछाई नजर आ रही और ना ही सरिता और ना कावेरी। वो मुड़ कर एक बार फिर उस तक चले आए..

” ए लड़कीं सुनो क्या नाम है तुम्हारा?”
घबराहट में वह पारो का नाम तक नहीं ले पा रहे थे… पारो ने नीचे बैठे बैठे ही उनकी तरफ अपना चेहरा उठा दिया अपनी गहरी काली आंखों से उन्हें घूरते हुए उसने कहा ….”सरिता !!! सरिता नाम है मेरा!”

” क्या बकवास कर रही हो? तुम सब मिली हुई हो, मैं सब जानता हूं.. यह सब मुझे डराने के लिए कर रही हो ना बोलो?”

” जो खुद अपने पाप की गहराई में डूबता चला जा रहा हो, उसे मैं क्या डराऊंगी?”

” बंद करो यह नाटक और निकलो तुम सब मेरे कमरे से। “

  उसी पल कमरे में थोड़ी रोशनी बढ़ गई पारो वापस थाली को सजा कर  प्रबोधानंद की तरफ देखने लगी….-” स्वामी जी आप वहां कब चले गए आप तो यहां बैठे खा रहे थे… मैं तो आपकी कटोरी में खीर परोस रही थी….
    मैं इतनी देर से खीर की कटोरी पकड़े खड़ी हूं और आपने अभी तक चखी भी नहीं।  क्या कल के थप्पड़ से अब तक आप मुझसे नाराज हैं?”

  प्रबोधानंद के चेहरे पर गुस्से की लकीरें खिंच गई उसने घूर कर पारो की तरफ देखा…-” मुझे बुद्धू बना रही हो। तुम्हें क्या लगता है मुझे समझ में नहीं आ रहा है… अभी अभी तो मैंने खीर खाकर कटोरी रखी थी और तुम ये दूसरी कटोरी देते हुए कह रही हो कि मैंने खीर नहीं खाई?  उल्लू समझ रखा है क्या मुझे?”

प्रबोधानंद के ऐसे कहते हैं किसी ने उसे कंधों से पकड़कर अपनी तरफ मोड़ लिया । प्रबोधनंद जैसे ही पलटा सामने सुनीता खड़ी थी…-” उल्लू नहीं पाखंडी समझा है तुझे, और तू पाखंडी है। और अब तू अपनी सजा भुगतने तैयार रह ।
     तेरे कारण ही मैंने अपना जीवन समाप्त कर दिया। और अब मैं वापस आई हूं तुझ से बदला लेने के लिए… और सिर्फ मैं ही नहीं इस आश्रम की जिस जिस लड़की के साथ तूने ज्यादती की है, वह सारी लड़कियां अब तुझ से बदला लेकर रहेंगी ।”

  ” दूर रहो मुझसे।  तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। प्रबोधानंद ने सुनीता का हाथ पकड़ने के लिए उसकी तरफ हाथ बढ़ाया, लेकिन हवा में ही प्रबोधानंद का हाथ इधर-उधर घूमता रहा। लेकिन सामने खड़ी सुनीता को वह छू भी नहीं पाया । प्रबोधानंद का डर अब अपने चरम पर था।
    ना तो वह कावेरी को छू पा रहा था और ना सुनीता को।
    दीवार पर अब भी वह परछाई वैसे ही नजर आ रही थी। इधर पारो का अलग ही नाटक चल रहा था। अब उसका सिर जोर-जोर से घूमने लगा… उसे लगा वो इस कमरे में रहा तो पागल हो जाएगा ….
    वह जोर से चिल्लाते हुए गलियारे की तरफ भागा कि तभी सुनीता ने उसका हाथ पकड़ लिया..-” तुझे क्या लगता है प्रबोधानन्द तू अब भी जिंदा है?  अरे मूर्ख अगर तू जीवित होता तो तू मुझे कैसे देख पाता? तेरी तबीयत बिगड़ी थी ना उसमें तेरे प्राण पखेरू उड़ चुके हैं।”

Advertisements

” चुप करो जैसे चमत्कारों की कहानियां हम अपने श्रद्धालुओं को सुनाते हैं, वैसी ही  उटपटांग कहानियां हमें मत सुनाओ हम जानते हैं कि…”

” तू कुछ नहीं जानता और अगर जानता भी है तो जानबूझकर अनजान बन रहा है। आ  मुझे छूने की कोशिश कर। क्या तू मुझे छू पा रहा है? नहीं ना फिर तुझे समझ में क्यों नहीं आ रहा प्रबोधानंद!!
     अगर इस संसार में देवता है तो दानव भी है। अगर इंसान हैं तो आत्माएं भी हैं। हर इंसान के अंदर एक आत्मा होती है और जब वह आत्मा उस इंसान से विलग हो जाती है तो इंसान मृत हो जाता है।
   मेरी आत्मा तो उसी दिन मृत हो गई थी, जिस दिन तू ने अपने इन गंदे हाथों से मुझे छुआ था। लेकिन फिर भी मैं घिसट सिसक कर ही सही  जिंदा थी। पता नहीं क्यों जिंदा थी? शायद अपने परिवार को पालने पोसने के लिए।
    लेकिन जब तेरे और तेरे आदमियों की ज्यादातियां बढ़ती गई तब मेरी हिम्मत चूक गई। और उस समय ना तो मेरा बीमार छोटा भाई मेरी आंखों के सामने था और ना मेरी बूढ़ी मां।  उस वक्त मुझे बस यही लगा कि मैं अपनी आत्मा को अपने शरीर से अलग कर दूं। अपनी आत्मा को मुक्ति दे दूँ। और मैंने अपने गले में फांसी लगाकर खुद को मुक्त कर दिया। ये मेरी सोच थी कि मैं मुक्त हो जाऊंगी , लेकिन मेरी आत्मा यहीं इसी आश्रम में भटकती रह गई… तेरे इस रंगीले कमरे के चारों तरफ।
   क्योंकि मेरी मौत का जिम्मेदार तू जो था। आखिर मेरी आत्मा क्यों नहीं भटकती? मेरी मौत को भी तो पूरा न्याय नहीं मिला। इस आश्रम के लोगों को भी मेरी मृत्यु के बारे में पता नहीं चल पाया। तेरी उस महिला मित्र ने मेरी लाश को अपने आदमियों से कहकर ठिकाने लगवा दिया। इस आश्रम के एक आचार्य तक को  भी पता नहीं चला कि भगिनी आश्रम में रहने वाली सुनीता अचानक कहां चली गई।”

प्रबोधानन्द  ध्यान से सुनीता की बातें सुनता रहा …
  सुनीता उसकी तरफ बढ़ती हुई अपनी बात कहती रही और प्रबोधनंद पीछे हटते हुए उसकी बातें सुनता रहा धीरे-धीरे उसकी बातें सुनते हुए प्रबोधानन्द आगे बढ़ता चला गया…और कमरे से बाहर आ गया।

” मैं सच कह रहा हूं जैसे इस आश्रम के किसी आचार्य को नहीं पता था वैसे ही मुझे भी नहीं पता था कि तुम मर चुकी हो। “

” अब तो पता है ना!! तो अब चल मेरे साथ।।”

  “नहीं मुझे छोड़ दो मुझे जाने दो”
  
     रात बीत चुकी थी, हल्की सी भोर का समय था।कमरे में हल्का उजाला हल्का अंधेरा सा था।  उस पर बाल बिखराई भूतनी के समान दो औरतें ….दीवार पर बनती लाश की परछाई… और उस पर खाई हुई खीर में मिली हुई दवा का असर प्रबोधानंद के सर चढ़कर बोलने लगा था… उसका डर अपने चरम पर था.. अब उसे लगा अगर वह उस भूतिया कमरे में रहा तो पागल हो जाएगा….
   अपने कमरे से वो गलियारे की तरफ निकल रहा था कि पारो उसके सामने चली आयी….

” खीर तो खा लीजिये स्वामी जी। “

   उसे एक तरफ को धक्का देकर वो चारु का नाम पुकारता बाहर निकल गया…

” ये क्या हो रहा है हमारे कमरे में?  वो लड़कियां सुनीता और कावेरी वहाँ कहाँ से चली आयीं? ठीक है हम मानते हैं कि हमारे उनके साथ गलत सम्बन्ध थे!! ये भी मान लेते हैं कि उन्हें इस काम के लिए हम ही ने डराया धमकाया भी… और हमारे बाद बड़े बड़े व्यापारियों नेता मंत्रियों के सामने भी उन्हें परोस दिया पर उसका मतलब ये थोड़े ही हुआ कि इस सब में हम अकेले दोषी हैं। इस सब से हमारा अकेले का तो फायदा नही होता? अगर हम उन लड़कियों के साथ वक्त बिताने के बाद उन्हें  रईसों के हवाले कर देते थे तो क्या बदले में उन लड़कियों की कोई कमाई नही होती थी। अभी अगर ये लड़कियां बाहर बैठ कर यही धंधा करती होती तो पुलिस के चक्करों से इन्हें कौन बचाता। हमारे सरंक्षण में कम से कम उनसे तो सुरक्षित ही हैं। ठीक है माना कि तुम लोग इसे दलदल मानते हो पर उन लोगो को इस दलदल में खींचने में हमारे साथ साथ तुम्हारा भी बहुत बड़ा हाथ …”

  प्रबोधानन्द कमरे से बाहर मंदिर परिसर के बीचोंबीच खड़े चारु पर तेज़ आवाज़ में अपनी भड़ास निकाले जा रहे थे कि आसपास की भीड़ देख चारु ने उनके मुंह पर हाथ रख दिया…..

” यह क्या कह रहे हैं आप स्वामी जी मैं इस बारे में कुछ भी नहीं जानती।”

   उसने चारों ओर देखा आसपास मंदिर के आचार्य भगिनी आश्रम की महिलाएं और बाकी सदस्य भी जमा हो गए थे। उस गोल घेरे के बीच प्रबोधनंद और चारु लोगों से घिरे खड़े थे। चारु ने एक बार फिर सब की तरफ देखा और हाथ जोड़ लिए….-” मैं सच कह रही हूं इस बारे में मैं कुछ भी नहीं जानती कि यह  स्वामी जी क्या बोल रहे हैं? “

    उसने उदयआचार्य और बाकी गुरुओं को देख वापस अपनी बात कहनी शुरू कर दी…-” मैं सच कह रही हूं आचार्यवर!! मैं इस बारे में कुछ भी नहीं जानती। मैं प्रबोधानंद जी की खास सेवा में उपस्थित रही हूं लेकिन यह महिलाओं से जुड़ी क्या बात कह रहे हैं वह मैं कुछ भी नहीं जानती।”

” कोई बात नहीं मैडम!! आप एक तरफ हट जाइये, यह जो भी कह रहे थे यह सब हमने रिकॉर्ड कर लिया है। और अब कौन क्या जानता है? और क्या नहीं? यह सब थाने में चल कर ही पता चलेगा। चलिए स्वामी जी आपका समय पूरा होता है।”

  चारु की आंखें फैल गई उसने पीछे पलटकर देखा पीछे पुलिस खड़ी थी। उन्ही पुलिस वालों में से एक पुलिस इंस्पेक्टर ने अपने फोन पर स्वामी जी की कही गई एक एक बात रिकॉर्ड कर ली थी।
 
   इस सारे झोल झमेले के बीच ही वरुण पारो और बाकी लोग कमरे से बाहर निकल आये थे , और चुपके से उसी भीड़ का हिस्सा बन गए थे। वरुण ने ही पुलिस को इत्तला कर यहाँ बुलवाया था।

Advertisements

    आश्रम के सारे लोगों के सामने पुलिस वाले ने एक बार फिर रिकॉर्डिंग चलाई और आगे बढ़ कर प्रबोधानन्द के हाथ में हथकड़ियां डाल दी…

” उम्मीद है आप में से कोई भी इस पाखंडी को यहाँ से लेकर जाने का विरोध नही करेगा।”

  सभी आचार्य गणों ने घृणा से प्रबोधानन्द को देख पुलिस के जाने के लिए मार्ग बना दिया…

    प्रबोधानन्द जो अपना सिर पकड़े वहीं ज़मीन पर बैठ गया था कि हथकड़ी को पकड़ कर पुलिस वाले ने खींचा और गिरते पड़ते वो खड़ा हो गया..

  जाते जाते उसने एक बार पलट कर देखा, पारो भी उस भीड़ में खड़ी उसे दिख गयी। उसे आंखों से ही भस्म करता वो पुलिस की गाड़ी की तरफ बढ़ रहा था कि उस भीड़ से हवा में उड़ता एक चप्पल उसके माथे पर जाकर लगा, उसके बाद उस भीड़ से एक एक कर लहराते हुए चप्पलों से प्रबोधानन्द का सम्मान तब तक चलता रहा जब तक पुलिस उसे अपने घेरे में लेकर गाड़ी में बैठा कर ले नही गयी…

क्रमशः

Advertisements

aparna….

समिधा – 43

Advertisements

समिधा – 43

        हवन समाप्त होते तक में प्रबोधआनंद थोड़ी थकान महसूस करने लगे थे।
    हवन के पूरे होते ही, वह वहाँ से उठ गए और अपने कमरे की ओर जाने लगे… वहां बैठे आचार्यों ने उनसे आरती करने के लिए विनम्र अनुरोध भी किया, लेकिन उन्होंने तबीयत सही नहीं लगने का बहाना कर अपने कमरे की ओर रुख कर लिया….

Advertisements


    सुबह तक वो भले चंगे थे , यहाँ तक कि पूजा पाठ निपटा कर जब हवन में बैठे तब भी ठीक थे फिर हवन के बीच अचानक न जाने क्या हुआ कि उन्हें हल्की घबराहट सी लगने लगी। वो तो हवन बीच में छोड़ा नही जा सकता था वरना वो हवन छोड़ ही कमरे में चले जाते।
     उनके वहां से जाते ही हवन पूजन होने के बाद रोज की तरह वरुण अपने प्रवचन के लिए अपनी जगह पर आ बैठा।
   अपने आसन पर बैठते हैं उसकी नजर सामने पाटे पर रखी पुस्तिका और कलम पर पड़ी और उसे एकदम से पारो का चेहरा याद आ गया।
    वरुण के ठीक बगल में बायीं ओर गुनगुने पानी का कलश रखा था। और कलश से लगा हुआ एक छोटा सा चांदी का गिलास रखा था। इन सभी छोटी छोटी चीजों में आज उसे पारो नजर आ रही थी… मुस्कुराकर उसने आज की कथा कहनी प्रारंभ की…..
    
        वरुण के कथा समाप्त करने के बाद भगिनी आश्रम की वह महिलाएं जो वहां रोज बैठकर भजन गाती थी ने हारमोनियम संभाला और ढोलक बजाते हुए भजन गाने लगी….

Advertisements


    

     सांवरी सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया।

एक तो तेरे नैन तिरछे, दूसरा काजल लगा ।
तीसरा नज़रें मिलाना, दिल दीवाना हो गया ॥

एक तो तेरे होंठ पतले, दूसरा लाली लगी ।
तीसरा तेरा मुस्कुराना, दिल दीवाना हो गया ॥

     एक तो तेरे साथ राधा, दूसरा रुक्मणि खड़ी ।
     तीसरा मीरा का आना, दिल दीवाना हो गया ॥

    भजन समाप्त होते तक में आश्रम में भोजन का समय हो गया था।
   सबका भोजन आदि निपटा कर दोपहर में एक बार फिर सरोवर पर वरुण प्रशांत पारो सुनीता और कावेरी एक साथ थे।
   आज रात के लिए जो भी उनकी तैयारी थी वह सब लगभग पूरी हो चुकी थी। कोई एक सामान वरुण ने बाहर से मंगाया था जो शाम तक मिल जाने की संभावना थी।
   सारी बातें सब को अच्छे से समझा देने के बाद वरुण ने सभी को जाकर आराम करने कह दिया…..  और खुद वही सरोवर की सीढ़ियों पर बैठ गया। प्रशांत ने उसे साथ चलने के लिए पूछा भी…-” नहीं प्रशांत मैं थोड़ी देर शांति से यहां बैठना चाहता हूं! बस थोड़ी देर में आ जाऊंगा।

” ठीक है जैसा ठीक समझो, पर आ जरूर जाना। इतनी देर तक और इतना लंबा प्रवचन देने के बाद तुम्हें भी थोड़े आराम की जरूरत है वरुण।”

  वरुण के “हां” में सर हिलाते ही प्रशांत सुनीता कावेरी के साथ ही पारो भी वहां से निकल गई… लेकिन वरुण को वहां अकेले छोड़ पारो का मन कहां लगता?
    अपने कमरे में जाने के बाद वो एक बार फिर धीमे कदमों से वापस लौट आई…-” क्या मैं भी यहां बैठ सकती हूं? आपके एकांत में मेरे आ जाने से कोई विघ्न तो नहीं पड़ेगा?”

वरुण ने पारो की आवाज सुनी और चौक कर पीछे देखा…. वह सामने हाथ बांधे ख़ड़ी मुस्कुरा रही थी… वरुण ने भी इशारे से मुस्कुरा कर सिर हिला दिया और वह आकर उसके कुछ सीढियां नीचे की सीढ़ियों पर बैठ गई…

” आज भी तो प्रबोधानंद के लिए भोजन लेकर जाने का जिम्मा तुम्हारे हिस्से था ना?  गई थी क्या उनके कमरे में?”

पारो को जाने कैसे लेकिन यह समझ आ गया कि वरुण को शायद यही बात मन ही मन मथ रही थी कि सुबह से उसे पारो कहीं दिखाई नहीं दी थी और उसने यह सोच लिया था कि प्रबोधानंद की जिद को पूरा करने हो सकता है पारो को उसके कमरे में चारु ने भेज दिया हो।

“आपको क्या लगता है? मैं गई थी या नहीं? “

Advertisements

   पारो के इस गोलमोल जवाब से वरुण चिढ़ गया।

“अब ये मुझे क्या पता? मैं कोई अंतर्यामी तो हूँ नही। और तुम इस तरह पहेलियां बुझाने से अच्छा है सीधे शब्दों में मेरे सवाल का जवाब दे दो।”

अब भी वरुण के समझ से बाहर था कि आखिर क्यों वह इतने हक से पारो को डांट लिया करता था।
  आज प्रवचन के पहले मिलने के बाद से उसने पारो को अब तक नहीं देखा था। लगभग यह दो-तीन घंटे का समय यूं ही बीत गया था…
   और उसके लिए पारो को यह बताना बहुत कठिन हो रहा था कि इन दो तीन घंटों में पारो को देखे बिना उसका जी कैसे कसमसा कर रह गया था.. ..
  
     उसका ध्यान बार-बार प्रबोधानंद के कक्ष की तरफ चला जा रहा था कि, कहीं उसने पारो को बुलाकर वापस कोई बदतमीजी तो नहीं कर दी । हालांकि पारो का पिछला व्यवहार देखकर वह थोड़ा बहुत तो आश्वस्त हो गया था कि अब प्रबोधानंद इतनी आसानी से पारो पर हाथ नहीं डाल सकता। लेकिन फिर भी आखिर मन ही तो था जो पारो के लिए बेचैन हुआ जा रहा था।
   और वह अपने मन में चलती इस उलझन का कोई ओरछोर नहीं पा रहा था।

   ऐसी बेचैनी तो उसे कभी कादंबरी के लिए भी नहीं हुई थी। उस समय भी नहीं जब नई-नई सगाई के बाद वह कादंबरी को पहली बार इंडिया अकेले छोड़कर अमेरिका जा रहा था …..
        फिर इस लड़की में ऐसी क्या बात थी कि जो इसकी तरफ देखते ही उसके ह्रदय में ममता का सागर उमड़ पड़ता था। हमेशा ऐसा लगता था कि इस लड़की को अपने सीने से लगाए इस सारे संसार से छुपा कर कहीं दूर ले जाए। और लेकिन उसी पल उसका खुद का दिमाग उसके मन पर कोड़े बरसाने लगता था, कि वह यहां सब कुछ छोड़ कर सांसारिक वृत्तियों को छोड़कर वैराग्य लेने आया हुआ है… और ऐसे में उसके मन में एक पराई औरत के लिए ऐसे भाव आना सही नही है।

   “नहीं!!! मैं आज अभी तक प्रबोधानंद के कमरे में नहीं गई हूं! उन्होंने खुद ही चारु दीदी से संदेश भेज दिया था कि, आज वह पूरे दिन आराम करना चाहते हैं और उनके कमरे में कोई भी नहीं आएगा।
  उन्होंने खुद ही कह रखा है कि वह शाम को ही अपने कक्ष से बाहर आएंगे और रात का भोजन मेरे हाथ से भेजने के लिए कहलवा दिया है।”

Advertisements

” बहुत अच्छे!!! सुबह कुछ भी नहीं खाया इसका मतलब हमारी सुबह वाली तरकीब काम कर रही है… और अच्छा है उनका दिन भर खाली पेट रहकर रात में ही सीधे भोजन करना भी हमारे फायदे की ही बात है।
  तुमने सुनीता और कावेरी को सब कुछ ठीक से समझा दिया है ना। “

” हां मैंने तो समझा ही दिया है, लेकिन आपने भी इतनी बार उन लोगों को समझाया है कि अब हम में से कोई भी कुछ नहीं भूल सकता। “

   पारो के मुस्कुराकर कहने पर भी वरुण के चेहरे पर कठोरता वाले भाव बने रहे। वह बेचारा अपने आप में परेशान था। वह एक युद्ध अगर प्रबोधानंद के खिलाफ लड़ रहा था, तो दूसरा युद्ध अपने खुद के मन के खिलाफ लड़ रहा था।
     उसे अपने मन को, अपनी आत्मा को पारो से विमुख करना था।  लेकिन कितनी भी कोशिश कर ले वह बार-बार पारो की तरफ फिसलता चला जा रहा था।

   “रुकिए जरा एक मिनट, इधर झुकिए मेरी तरफ!”

वरुण को एकाएक पारो की बात समझ नहीं आई वह इधर-उधर देखने लगा कि पारो खुद दो सीढ़ियां ऊपर चढ़कर वरुण के कंधे तक पहुंची और हाथ बढ़ाकर उसके कान के ऊपर पेड़ से लटकती मकड़ी को उसके जाल के साथ हटाकर एक तरफ फेंक दिया।
    मकड़ी हटा देने के बाद भी पेड़ से कुछ घास फूस जो गिरकर वरुण के बालों में अटकी थी पारो उन्हें वहां से हटाने लगी। अनजाने ही पारो की कोमल उंगलियां वरुण के कानो और उसके आसपास की त्वचा से होते हुए बालों पर फिरती रही और वरुण की धड़कने बढ़ाती रही।
   वरुण को उस वक़्त यही लग रहा था कि यह पल यही ठहर जाए…
     वो  इसी तरह सीढ़ियों पर बैठा रहे और उसके बालों में पारो की उंगलियां यूं ही फिरती रहे… उसे एक पल को लगा कि काश वो पारो की गोद में सर रखकर अपनी सारी चिंताओं से मुक्ति पा लें….
     लेकिन तभी उसकी आंखें झटके से खुल गई और उसने पारो का हाथ जोड़ से झटक दिया…

” यह क्या कर रही हो?  अपनी सीमाओं को समझो?”

  ” क्यों?अपनी सीमाओं से परे जाकर मैंने ऐसा कौन सा अपराध कर दिया? जो आप इतने गुस्से में आ गए? “

वरुण की समझ से बाहर था कि वह पारो को कैसे बताएं, कैसे समझाए कि जब जब पारो की उंगलियां गलती से भी उसे छू जाती हैं तो उसके मन में कैसी अदम्य लालसा जागने लगती है, उसे पाने की।  जिन लालसाओं, कामनाओं को वह छोड़ कर अपने जीवन में आगे बढ़ना चाहता है…. वही कामनाएं अपना सर उठाने लगती हैं।
   
” कुछ नहीं …तुम नहीं समझोगी।  अब जाओ तुम भी थोड़ी देर आराम कर लो आज रात में हो सकता है रात भर जागना पड़ जाए। “

  वरुण को भर नजर घूर कर पारो ने हां में सर हिलाया और धीमे कदमों से सीढ़ियां चढ़कर अपने भगिनी आश्रम की तरफ मुड़ गई।

    शाम के समय भगिनी आश्रम की महिलाएं एक साथ चाय  पिया करती थी… पर आज पारो सुनीता और कावेरी अपनी चाय लिए ऊपर चले आए।
    खिड़की के पास बैठी  पारो की आंखें खिड़की से बाहर ही लगी हुई थी… बार-बार बाहर देखती जैसे वह किसी को ढूंढ रही थी ….सुनीता और कावेरी आपस में बातें कर रही थी लेकिन सुनीता का ध्यान पारो पर ही था…

” क्या हुआ पारो किसे ढूंढ रही हो?

” नहीं किसी को भी तो नहीं।” पारो के चेहरे पर बिल्कुल ऐसे भाव चले आए जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो कि तभी सीढ़ियों पर से ऊपर चढ़कर सरिता भी अपनी चाय लिए उन लोगों के पास चली गई…

” तुझे नई सखियां क्या मिली अपनी पुरानी सखी को इतनी जल्दी भूल गई।

सरिता के मीठे से उलाहने पर पारो ने आगे बढ़कर उसके गले में अपनी  गलबहिया डाल दी और उसके कंधे पर अपना सर रखें मुस्कुराने लगी…

” तुझे कैसे भूल सकती हूं?  तू ही तो है जो उस समय मेरे साथ थी जब मेरी मां ने भी मेरा साथ नहीं दिया!  आश्रम के शुरुआती दिन कितने कठिन थे मेरे लिए और तूने हर मोड़ पर, हर रास्ते पर मेरा साथ दिया है। तुझे तो मैं अपनी अंतिम सांस तक भी नहीं भूल सकती। “

“चल चल बातें मत बना!! बल्कि यह बताओ कि तुम तीनों मिलकर क्या खिचड़ी पका रहे हो? आज दोपहर के भोजन के बाद भी तुम तीनों अचानक ही गायब हो गए थे। ?
  दोपहर भोजन के बाद जब आश्रम की सभी बहने अपनी-अपनी जगह पर आराम कर रही थी तब चारु दीदी दो घड़ी के लिए ऊपर हमारे इस कमरे में भी आई थी। तुम तीनों के ही पलंग खाली देखकर उन्होंने मुझसे ही सवाल किया… और वह भी तेरा नाम लेकर पूछा था कि पारोमिता कहां गई?”

“फिर तूने क्या कहा?”

Advertisements

“कुछ नहीं, बस मैंने कह दिया कि गौशाला में एक गौमाता जरा अस्वस्थ हैं । उनके पैर में थोड़ी चोट लग गई है उन्हें ही तेल हल्दी लगाने गई होगी। कभी उसे  डॉक्टर बनने का भूत सवार था न!”

“हमें बचा लिया तूने।”

“अब मुझे भी बचाओ! मेरा भी उद्धार करो! और मुझे भी बताओ कि यह क्या चल रहा है तुम तीनों के बीच।”

“कल सुबह तुझे सब कुछ पता चल जाएगा बहन…. बस तब तक थोड़ा सा धैर्य रख ले। “

“चल ठीक है तेरी बात मान कर मैं धैर्य ही रख लेती हूं पर और क्या-क्या रखने के लिए देगी मुझे? “

  उन चारों की बातों के बीच में कब शाम ढल गई उन्हें पता ही नहीं चला!  शाम की आरती भजन पूजन के बाद भोजन भी निपट गया।
  

      रात्रि भोजन के समय भी चारु ने जब प्रबोधनंद से खाने के लिए पूछा तो उन्होंने उस वक्त भूख नहीं होने की बात कह दी। और कहा कि वह बाद में भोजन करेंगे, पहले वह आश्रम के बाकी लोगों का भोजन निपटा लें।
   सब कुछ हो जाने के बाद चारु लता ने पारो को बुलाया और उसके हाथ में स्वामी जी की भोजन की थाली पकड़ा दी। उस थाली पर ऊपर से एक रेशमी कपड़ा भी ढक दिया… पारो उस थाली को लेकर स्वामी जी के कमरे की तरफ बढ़ चली..

   आश्रम के नियम भी अनोखे हैं! हम सभी के लिए लौकी तोरी टिंड़े कद्दू के अलावा कुछ नहीं बनता, क्योंकि अगर हम तामसिक भोजन खाएंगे तो हमारे मन में तामसिक विचार आएंगे… तो यह प्रबोधानन्द ढोंगी के लिए इतने छप्पन भोग बनाने की क्या जरूरत है ? सबसे ज्यादा तो इसे ही अपने मन को बांध कर रखने की जरूरत है।

  मन ही मन विचार करती पारो आश्रम वाटिका के बीचो बीच अकेले बने प्रबोधानंद के कक्ष के सामने खड़ी थी!  चारु लता वहां तक साथ आई थी उसके बाद उसने पारो से सवाल किया…-” मैं भी अंदर चलूं या तुम..

उनकी बात आधे में ही काट पारो ने हड़बड़ा कर तुरंत ही कह दिया…-” नहीं मैं संभाल लूंगी!! आप जाइए! आप भी दिनभर आश्रम में व्यस्त थी… आप भी थक गई होंगी , चारु दीदी!!”

  पारो के मुंह से इतनी समझदारी वाली बातें सुन चारु को थोड़ा अजीब सा लगा लेकिन उसे लगा कि हो सकता है प्रबोधानंद के व्यक्तित्व का जादू शायद इस लड़की पर भी चल गया हो… थकान के कारण बहुत ज्यादा सोचने का उनका कुछ मन भी नहीं था।  वह मुंह फेर कर भगिनी आश्रम में बने अपने कमरे की तरफ आगे बढ़ गई।
      उनके वहां से जाते हैं पारो ने चैन की सांस ली, और दरवाज़े की ओर बढ़ गयी।  क्योंकि उसे पता था दरवाजे के भीतर शयन कक्ष के पहले बने गलियारे में उसके साथी उसका इंतजार कर रहे थे……

क्रमशः

Advertisements

aparna….

दिल से……

    
     वैसे तो आप सभी जानते हैं कि फिल्मी गानों का और मेरी कहानियों का रिश्ता पुराना है… गाने बस मधुर होने चाहिए , चाहे वह मेरी पैदाइश के पहले के भी क्यों ना हो। पर अगर गाना सुंदर है मधुर है तो मुझे पसंद जरूर आता है। ऐसे ही कुछ भजन भी बहुत अच्छे लगते हैं। मैंने हमेशा अपनी कहानियों में कहीं ना कहीं जगह बनाकर फिल्मी गाने घुसाए हैं, हालांकि साहित्य की दृष्टि से एक अच्छे साहित्य उपन्यास में फिल्मी गाने नहीं होने चाहिए।

Advertisements


     मुझे एक बार हमारी प्रतिलिपि के ही सुविख्यात साहित्यकार स्वर्गीय श्री कुसुमाकर सर ने गाने लिखने पर टोका भी था…. उन्होंने कहा था कि गाने उपन्यास की सुंदरता को समाप्त कर देते हैं!
      और उसके बाद से मैंने फिल्मी गाने कहानियों में डालना बंद कर दिया। शायद आप लोगों ने भी नोटिस किया होगा कि जीवनसाथी में कुछ भागों में फिल्मी गाने थे लेकिन बाद के भागों में मैंने गाने डालने बंद कर दिए।
    खैर मैं गाने डालती भी थी तो सिर्फ 2 पंक्तियां लिखती थी जिससे शब्द सीमा भी कम रहें, और जरूरत के मुताबिक मैं जो भाव फिल्मी गानों से प्रस्तुत करना चाहती हूं वह भी पाठकों तक पहुंच जाए। वैसे ही आज इस भजन को कहानी के इस भाग में लिखा है।
   शुरू में इस भजन की सिर्फ दो पंक्तियां ही लिखी थी लेकिन सच कहूं तो यह भजन मुझे इतना पसंद है , कि मैं अपने आप को रोक नहीं पाई और तीन अंतरे लिख दिए।

     कभी फुर्सत में हों तो इस भजन को गूगल करके सुनिएगा जरूर…. बहुत मीठा भजन है।

  जय श्री राधे राधे….

  पढ़ते रहिए ….. आप लोगों का मुझे यूं पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता है…

Advertisements

aparna….

समिधा -42

Advertisements

  समिधा -42

      प्रबोधानन्द को अपने तयशुदा कार्यक्रम के हिसाब से हरिद्वार निकलना था, लेकिन अब उनका मन वहाँ से जाने का ही नही हो रहा था। अमृतानन्द स्वामी के पास से प्रबोधानन्द को बुलाने के लिए बार बार संदेश आ रहे थे लेकिन उसने आखिरकार अपनी बीमारी का बोल कर आने में असमर्थता जता ही दी।

   प्रबोधानन्द फिलहाल यहीं रुकने वाले हैं ये जानने के बाद वरुण तनाव में आ गया था। उसे लगा था एक आध दिन रुक कर प्रबोधानन्द निकल गया तो चिंता ही खत्म, लेकिन अब वो यहाँ रुकने वाला है ये सोचने वाली बात हो गयी थी….

प्रबोधानन्द के दिमाग से पारो के थप्पड़ वाली बात नहीं निकल पा रही थी। और इसीलिए अब उसके मन में पारो को पाने की इच्छा बदले की भावना के साथ मिलकर अधिक प्रबल हो गई थी….
     पारो का थप्पड़ रह रह कर उसे अपमान की आग में झुलसाता जा रहा था और इसी लिए अब उसके दिमाग में हर वक्त पारो से बदला लेने का जुनून , उसका अपमान करने की इच्छा बलवती होती जा रही थी और इसलिए उसने चारु से भी साफ शब्दों में कह दिया था कि वो भी अब कुछ दिन आश्रम में ही रुक जाए।
“चारु आज तो किसी भी कीमत पर वह लड़की हमारे कमरे में होनी चाहिए। समझ रही हो ना?”
   
” हमने तो हमेशा ही आपकी आज्ञा पर उसे आपके पास भेजा है, आप ही का स्वास्थ्य साथ नही देता तो क्या किया जाए। वैसे अभी आपका स्वास्थ्य कैसा है?”

   चारु को मन ही मन प्रबोधानन्द पर गुस्सा आने लगा था। उसे स्वामी जी का किसी के लिए ऐसा पागलपन नही सुहा रहा था। उसके अनुसार प्रबोधानन्द को अपने कार्य पर अधिक ध्यान देना चाहिए ये सब तो बाद कि बातें हैं लेकिन प्रबोधानन्द इन्ही सब व्यसनों में अधिक लिप्त होते जा रहे थे। लिप्त तो वो खुद भी थी, लेकिन हर काम समयानुसार किया करती थी।
    उसे हर काम के लिए एक वक्त और हर वक्त पर वो काम करना पसंद था, और अब प्रबोधानन्द का पागलपन उसका जी का जंजाल बनता जा रहा था।
प्रबोधानन्द की फरमाइशें भी सीमाएं लांघती जा रही थी।
   उन्हें अब हर वक्त पारो अपने सामने चाहिए थी। आश्रम में ऐसे खुल्लमखुल्ला उनकी इक्छाओ की पूर्ति करना मुश्किल था। फिर भी प्रबोधानन्द को नाराज़ करना चारु के बस के बाहर की बात थी और इसलिए वो मजबूरी में उनका हुकुम बजाए जा रही थी…

  ” यही हाल रहा तो किसी दिन ये स्वामी जी भगिनी आश्रम की औरतों से जूते खाते यहाँ से निकाला जाएगा। अरे थोड़ा तो संयम रखो, उस लड़की को देख कर एकदम ही पगला गया है।” मन ही मन सोचती चारु उनके कमरे की ओर बढ़ चली….. सुबह प्रबोधानन्द के बुलाने पर वो जब उनके कमरे में गयी तब फिर एक बार वो शुरू हो गए थे।
” सुनो चारु! आज के हमारे हवन में वो हमारे साथ ही बैठेगी! और बल्कि आज के बाद हमारे हर कार्य में उसे ही हमारे सहयोग के लिए ठीक कर दो। और किसी की अब हमें आवश्यकता नही है। समझ गयीं!” 
    चारु ने मन ही मन अपना माथा पीट लिया। वो कैसे इस ठरकी बाबा को समझाए की ऐसे करने से सारे आश्रम में बातें फैलने लगेंगी लेकिन प्रबोधानन्द भी अपने ही गर्व में चूर था। उसके अनुसार इस आश्रम में उसे रोक टोक सके ऐसा कोई न था।

” जी गुरुवर! हम जा रहे आपकी तैयारियां करने, तब तक आप भी स्नान ध्यान निपटा लीजिये।”
  
   वो उन्हें प्रणाम कर बाहर निकल गयी… पैर पटकती भुनभुनाती वो रसोई की तरफ बढ़ी जा रही थी कि सामने से आता वरुण दिख गया…-“ये एक और ज्ञानी मिल गया। एक वो है जो अपनी ऊटपटांग फरमाइशों से आश्रम में जीने नही दे रहा और एक ये है कृष्ण लीला सुना सुना कर मरने भी नही दे रहा। क्या करें हम ? “

” क्या हुआ चारुलता जी! आप कुछ परेशान लग रही हैं।”
   वरुण के सवाल पर वो धीमे से मुस्कुरा कर भर रह गयी। वरुण का जवाब देने के लिए उसके पास कुछ होता तब तो कहती….
   उसी समय भगिनी आश्रम से निकलती महिलाएं रसोई की ओर बढ़ रही थी, उसने उनमें से ढूंढ कर पारो को आवाज़ लगा दी..
“ओ लड़की इधर आना। ” पारो ने सुनने के बाद भी उधर का रुख नही किया, धीमे से सरिता ने उसके कान में फुसफुसा कर कहा भी ..-“पारो तुझे ही पुकार रहीं हैं। जा सुन ले।”
” मैं ओ लड़की नही हूँ सरु ! जब तक मेरा नाम नही लेंगी मैं नही सुनूँगी।”
   
“अरे ओ सुन क्यों नही रही… क्या नाम है तुम्हारा?”
  चारु को पारो का नाम अच्छे से याद था पर अपने स्वभाव के कड़वेपन के कारण उसे हर किसी को जलील करने में ही सुख मिलता था… और इसलिए वो उसे ऐसे बुला रही थी पर उसे भी नही पता था कि उसका पाला किससे पड़ा था। पारो बिना सुने रसोई की तरफ मुड़ गयी, सरिता बार बार डर के मारे उसे कोहनी मारती रही…. लेकिन पारो ने एक बार भी मुड़ कर चारु की तरफ नही देखा, आखिर थक कर चारु ने उसका नाम पुकार लिया…-” अरे ओ पारोमिता तुम्हे ही बुला रहें हैं । ज़रा यहाँ आना!”

  अब पारो के कदम ठिठक कर रुक गए और वो मुड़ कर चारु तक चली आयी..-“पहले हमारी आवाज़ सुनाई नही दी थी क्या?”

Advertisements

“आवाज़ तो सुनाई दे रही थी पर समझ नही आया था कि आप मुझे बुला रहीं है।”

  पारो ने हाथो से ही चारु और वरुण को प्रणाम किया। वरुण तो उसे ही देख रहा था, पारो का जवाब सुन उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान खिल उठी।

” अभी प्रबोधानन्द स्वामी हवन करेंगे और उसके बाद उनका उद्गार होगा। इन दोनों मौकों पर तुम्हें उनके साथ ही बने रहना है। स्वामी जी का आदेश है!”

“क्षमा करें चारु दीदी। पर आज मैं हवन में नही बैठ पाऊँगी!”

“लेकिन क्यों?”

    पारो ने एक नज़र वरुण पर डाली और वापस चारु की ओर मुड़ गयी…” अभी तीन दिन मैं मंदिर नही जा सकती, अशुद्ध हूँ।  आप समझ रहीं हैं ना!”

” ओह्ह अच्छा! फिर ऐसा करना जब वो हवन निपटा कर अपने कक्ष में जाएं तब उनका जलपान लेकर उनके कमरे में पहुंचा देना।”

  बिना कोई जवाब दिए पारो नीचे देखती खड़ी रही और चारु अपनी चप्पल फटकाती वहाँ से निकल गयी।

   वरुण ने पारो की ओर देखा, पारो ने आंखें उठाई और उसकी आंखें मुस्कुराने लगी।
“आपके व्याख्यान के लिए सारी तैयारी कर दी है। आपकी पुस्तिका आपकी कलम और हल्का गुनगुना पानी, सब कुछ आपके आसन के पास रख आयीं हूँ। पानी अभी कुछ ज्यादा गर्म है पर जब तक आपके बोलने का समय होगा तब तक सही तापमान में रहेगा,आपके पीने लायक हो जाएगा।”
    वरुण की आंखों में प्रश्नचिन्ह था कि अभी अभी हवन में न बैठ पाने का कारण उसकी प्रवचन सामग्री की तैयारियों में बाधक क्यों नही बना?

  वरुण की आंखों का सवाल पारो समझ गयी….. पारो ने एक पल को पलकें झपकी और वापस वरुण को देख मुस्कुरा उठी…-“चारु दीदी से झूठ कहा मैंने। मुझे उस पाखण्डिनंद के साथ किसी हवन में नही बैठना, और इसके लिए चाहे मुझे झूठ बोलना पड़े या और कोई उपाय करना पड़े पर मुझे ये गलत नही लगता। हो सकता है आपकी नज़र में मैं गलत हों लेकिन मुझे उस आदमी के सामने भी जाने से घिन आ रही है।”

Advertisements

  वरुण के चेहरे पर भी एक अलग सी मुस्कान रेंग गयी…-“ठीक है, ठीक है। अभी शांत हो जाओ। अधिक उत्तेजना में ज़ोर से न कह जाना अपनी बात। वैसे तुम्हारी बात सत्य है कृष्ण भी तो यही कहतें हैं… की परपीड़क को मारने के लिए जो झूठ छल प्रयोग किया जाता है वो पाप नही पुण्य है। तुम्हारे इस झूठ का कोई दोष तुम पर नही आएगा पारो।”

” मैं पाप पुण्य नही मानती। मरने के बाद कहाँ जाऊंगी क्या करूँगी किसे पता है। मरने के बाद मेरे अच्छे कर्मों का लेखा जोखा जिसे आप पाप पुण्य में बांधते है मुझे मिलेगा भी की नही मैं क्या जानूं?
   मेरे हृदय को जो सत्य और सही लगता है वही मेरे लिए पुण्य है और जो गलत लगता है वो पाप। उस पाखंडी से छुटकारा पाने अगर मुझे उसे मारना भी पड़ गया तो ये मेरे लिए पुण्य ही होगा।”

“हम्म सही कह रही हो। अभी उनका हवन चलेगा और उस समय से मेरा आख्यान होने में लगभग बीस मिनट का समय रहेगा। तुम ऐसा करो पीछे सरोवर के पास सुनीता और एक आध वो लड़कियां जो प्रबोधानन्द का शिकार बन चुकी हैं को लेकर आओ। तुरंत!!
   मैं प्रशांत को लेकर वहीं पहुंच रहा हूँ।”

“क्या करने वाले हैं आप?”

“अभी अभी तुमने ही तो उपाय बताया है। बस वही करना है।”

” मैंने क्या उपाय बताया?”पारो आश्चर्य से वरुण को देखने लगी..

“सरोवर तक सबको लेकर तो आओ। फिर सभी के सामने बताता हूँ कि हमें आगे क्या करना है।इस प्रबोधानन्द को तो इसी के जाल में फांसना होगा वरना
इसके अत्याचारों पर कोई विराम नही लगेगा। और उसे हमें रँगे हाथों पकड़ना है। इसलिए सुनीता जैसी और भी कोई उसकी सताई औरतें हो तो उन्हें भी ले आना लेकिन सुनो पारो ज्यादा औरतों को इस बारे में मालूम न हो तो अच्छा है। मुझे लगता है आश्रम में कुछ चारुलता की औरतें भी तुम सब के बीच घुली मिली हैं जिससे आश्रम की हर खबर उस तक पहुंचती रहे। इसलिए ज़रा होशियार रहना। “

   हॉं में सिर हिला कर पारो वहाँ से रसोई की ओर मुड़ गयी।
     हवन शुरू हो चुका था इसलिए उन लोगों के पास ज्यादा वक्त नही बचा था।
   पारो ने जाकर सुनीता से बात की और सुनीता तुरंत अपने साथ कि एक और लड़की कावेरी को ले आयी।कावेरी उन लोगों से उम्र में कुछ ज्यादा बड़ी थी लेकिन उम्र बढ़ जाने पर भी उसकी सुंदरता म्लान नही हुई थी।
     पारो ने पिछली रात ही सुनीता को ये बात बता दी थी कि उसने वरुण से उसकी समस्या का ज़िक्र किया है और वो उन सभी को इस दलदल से निकालने के लिए प्रयासरत है।

   ****

Advertisements

  मंदिर में पूजा अर्चना के बाद हवन प्रारम्भ हो चुका था। प्रबोधानन्द ने हवन में पारो को न देख चारुलता से उसके बारे में पूछने के लिए चारुलता को ढूंढना शुरू किया। लेकिन उनकी सवालिया नज़रों से बचने के लिए चारुलता खुद हवन में उपस्थित ही नही हुई।
    गुस्से में खीझते प्रबोधानन्द हवन करते रहे। उन्हें उम्मीद थी कि हवन के बाद कमरे में शायद चारु पारो को भेज दे।
         

    वो अपनी हवन वेदी में अकेले ही बैठे थे। उनका स्थान भी सामान्य लोगों से ज़रा ऊंचाई पर बना था। बाकी सभी आचार्य अपनी अपनी वेदियों में आंखें बंद किये बैठे ध्यानमग्न मंत्रोच्चार कर रहे थे…
    उसी समय प्रशांत सरोवर के पास से तेज़ कदमो से मंडप की ओर चला आया।
   उसे पता था मंडप में बैठे दस के दस आचार्य इस वक्त आंखें बंद किये बैठे होंगे। वो चुपके से प्रबोधानन्द के पीछे चला आया। उसने अपने हाथ में कुछ छिपा रखा था , उसे जला कर उसने धीमे से प्रबोधानन्द के पीछे से सामने की ओर सरका दिया और खुद उनके सामने तरफ आकर उनके घृत पात्र को भरने लगा। प्रबोधानन्द ने हलचल की आवाज़ सुन ऑंखे खोल दी। प्रशांत ने उनके सामने ही उनके घृत पात्र को भरा और पास ही रखी हवन सामग्री में घी डालने लगा कि प्रबोधानन्द की नज़र हवन कुंड के दूसरी तरफ बैठी कावेरी पर चली गयी। बाल खोले, आंखों में प्रगाढ़ अंजन लगाए कावेरी उस समय ऐसी लग रही थी जैसे कितना रो कर आई है। उन्होंने उसे देखा और प्रशांत की तरफ देखने लगे,पर प्रशांत चुपचाप अपना काम करने में लगा था।
   उन्हें एकाएक अपनी आंखों पर विश्वास नही हुआ और उन्होंने वहीं हाथ पोंछने के लिए रखे मलमल से अपनी आंखें साफ की और फिर सामने देखा लेकिन अब वहां कोई नही था, न कावेरी और न प्रशांत!!

   वो एक बार फिर ध्यान लगाने की कोशिश करते हवन में समिधा को सही ढंग से संजोते उस पर घी की धार बहाने लगे….

क्रमशः

Advertisements

aparna…..
   

समिधा -41

Advertisements

      समिधा -41

       दरवाज़े से भीतर आते ही पारो की नज़र वरुण पर पड़ी और वो चौन्क कर मुस्कुरा उठी। और उसे देखते ही वरुण ने अपने होंठों पर उंगली रख़ उसे चुप रहने का इशारा कर दिया।
    वरुण की बात समझ कर वो भी चुपके से दरवाज़ा बंद कर वहीं खड़ी रह गयी।
  दरवाज़े पर खड़े दोनो कुछ पलों के लिए जैसे सारी बाहरी दुनिया भूल कर रह गए।
   पारो की आंखों में उलाहना था तो वरुण की आंखों में माफ़ी…

” कोई है क्या?”
  दोनो शांत खड़े थे कि अंदर से प्रबोधानन्द की आवाज़ उन तक चली आयी। दोनों से कोई जवाब देते नही बना कि तभी वरुण ने पारो से जवाब देने का इशारा किया और खुद अपनी जेब से कुछ निकालने लगा…

” जी स्वामी जी!! मैं अभी आयीं।” पारो के शब्दों में मधुरता और कोमलता का लवलेश भी नही था। अपने कठोर शब्दों के लिए उसके मन में कोई ग्लानि भी नही थी।
“जल्दी आओ, हमें पानी चाहिए। “
“जी !!”
  पारो ने लाचारगी से वरुण की तरफ देखा,उसने तब तक अपने हाथ में पकड़ रखी धूप उसकी ओर बढ़ा दी।
  ये क्या है वाले भाव चेहरे पर लिए पारो वरुण की ओर देखने लगी। वरुण ने उसके सामने अपनी चौड़ी सी हथेली फैला दी…
    उसकी हथेली पर लिखा था
     “इसे जला देना, बस दो मिनट में उसे नींद पड़ जाएगी।”
   वरुण की हथेली में कुछ लिखा था, पर पारो को पढ़ने में असुविधा सी हो रही थी, वो वरुण के सामने से हट कर उसकी बगल में चली आयी और एक बार फिर वही देव की खुशबू उसे इस संसार से परे ले चली। कुछ पलों को उसने आंखें बंद कर ली।
    उसे लगा सामने देव की हथेली फैली रखी है। उसने उन हथेलियों को अपने हाथ में थाम लिया और अपनी आंखों के पास पढ़ने ले आयी..
      उसके हाथ में लिखी पंक्तियों को पढ़ने के बाद पारो के चेहरे पर हंसी खेल गयी.. उसने मुड़ कर वरुण की तरफ सवालिया नज़रों से देखा.. वरुण ने हॉं में सिर हिला दिया और उसे अंदर जाने का इशारा कर दिया।
  पारो उसके हाथ से धूप लिए अंदर चली गयी।  उसे वरुण की इस हरकत पर हंसी आ रही थी, और अपनी हंसी दबाने के बाद भी चेहरे पर मुस्कान कायम थी उसे मुस्कुरातें देख प्रबोधानन्द अपने पलंग पर उठ बैठे…-“सुबह तो बहुत अकड़ कर गयी थी , अब देख ली हमारी ताकत। खुद मुस्कुरातें हुए हमारी सेवा में चली आयीं ना।”
   बिना प्रबोधानन्द को देखे ही पारो ने सबसे पहले जाकर धूप जला कर एक ओर रख दी..
  अच्छा चारु ने पूरी व्यवस्था से भेजा है लड़कीं को। मन ही मन सोचते प्रबोधानन्द के चेहरे पर मुस्कन रेंगने लगी…
“अच्छा सुनो ! इधर आओ, बैठो तो सहीं हमारे पास। “
   पारो अपनी नाक पर अपना ही आँचल रखती प्रबोधानन्द से ज़रा दूर खड़ी रही…

” ये नाक क्यों बंद कर रखी है। तुम्हें ये खुशबू पसन्द नही है क्या?

Advertisements

“फिर कौन सी खुशबू पसन्द है? सुनो हमारे पास तो तरह तरह के देसी विदेसी परफ्यूम के जोड़े भी हैं। हमारे विदेशी समृद्ध जजमान तोहफे देते रहते हैं। तुम चाहो तो कुछ निकाले तुम्हारे लिए।”
  वो चुपचाप ना में सिर हिला कर खड़ी रह गयी
“क्या हुआ कुछ बोलोगी नही? ये तो गलत बात है। सुबह थप्पड़ भी तुम्हीं ने मारा , और अब चुप भी तुम ही खड़ी हो।हमें तो लगा था हम तुम्हें बुला कर उस थप्पड़ का बदला बहुत गुस्से में लेंगे पर तुम्हारा चेहरा इतना भोला और मासूम सा है कि क्या तुमसे कोई नाराज़ रहे।
  तुम्हारा वो थप्पड़ भी माफ किया, तुम भी क्या याद करोगी किस स्वामी से पाला पड़ा था।
   अच्छा सुनो यहाँ आओ तो सहीं। हमारे पास बैठो, दो बातें हमसे भी कर लो.. हम इतने भी बुरे नही हैं जितना तुमने सोच लिया।
  अगर कोई हमें पसन्द आ जाये तो हम उसका जीवन संवार देते हैं.. तुम्हें भी यहाँ आश्रम में सब मिलेगा, जो चाहोगी वो सब। तुम्हारे लिए अलग कमरे की व्यवस्था करवा देँगे.. हमारे साथ हमारी विदेश यात्राओं का हिस्सा बन पाओगी..”
  आगे के शब्द उनके मुहँ में ही लड़खड़ाने से लगे और धीरे धीरे उनकी आंखें बंद होने लगीं।
  पारो को समझ आ गया कि वो धूप काम करने लगी है। उसके चेहरे पर वापस धीमी सी मुस्कान खेलने लगी…
.    अपने आप में बड़बड़ाते स्वामी जी धीरे धीरे गहरी नींद में खोने लगे और फिर कुछ ही देर में एक तरफ उनकी गर्दन लुढ़क गयी।
     पारो चुपचाप दबे पांव उस शयनकक्ष के बाहर के गलियारे की तरफ चली आयी। वहाँ वरुण भी अपनी नाक पर रुमाल बांधें बैठा था।
   उसके पास आ कर पारो ने हाथ के इशारे से वरुण को बता दिया कि प्रबोधानन्द सो चुका है। वरुण के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आयी।
   वो बाहर गलियारे में ज़मीन पर ही दीवार से टेक लगाए बैठा था। पारो भी उस तक जाकर वहीं बैठ गयी..
” अब तुम अपने कमरे मे जाकर आराम से सो जाओ। मैं यहीं रहूंगा। कोई ज़रूरत हुई तो मैं देख लूंगा।”
    पारो ने गहरी नज़रों से वरुण की तरफ देखा..
“आप भी अपने कमरे में जाकर आराम कीजिये, आप को भी आराम की ज़रूरत है।”
“हॉं तो मैं ने कब कहा कि मैं आराम नही करूँगा। मैं यही सो रहूंगा।”
” यहाँ कितना आराम हो पायेगा ?”
“हो जाएगा, तुम चिंता मत करो। तुम जाओ यहाँ से।”
    वरुण के ऐसा बोलते ही पारो वहाँ और जम कर बैठ गयी..
“मैं तभी जाऊंगी जब आप यहाँ से जाएंगे। “
“अरे मेरी बात अलग है, तुम्हारी अलग। तुम्हारा यहाँ रुकने का कोई औचित्य ही नही।”
” मैं वैसे भी स्वामी जी के लिए नही आपके लिए रुक रही हूं।”

ना में सिर हिला कर वो बिना कुछ बोले खड़ी रही

      एक पल को वरुण का चेहरा गुलाबी सा हो गया..
   वरुण ने परेशान हो एक गहरी सांस ली और अपनी बात रखने लगा…-” मैं भी चला गया तो चारु जी को क्या कहेंगे?”
“वो तो मैं चली गयी तब भी कुछ कहना ही होगा ना। तब क्या कहेंगे?”
   इसी बीच वरुण को कुछ देर पहले अंदर से आती पारो और प्रबोधानन्द कि बातें याद आ गईं और उसे एक पल को लगा कि पूछ लें अंदर क्या बातें हो रही थीं…” प्रबोधानन्द क्या कह रहे थे तुमसे?”
  पारो कुछ देर को शांत रही फिर धीमे से उसने कहना शुरू किया…” कुछ देर पहले जब मैं यहाँ आयीं थी तब इन्होने मेरा हाथ पकड़ लिया था..”
   वरुण के माथे की नसों में तनाव आने लगा..-” फिर?”
“फिर क्या मैंने पलट कर एक झापड़ धर दिया उनके गाल पर!”
     आश्चर्य और खुशी से वरुण के चेहरे पर चमक दौड़ गयी…-” सच?”
” हाँ !!! मुझे भी नही पता अचानक मुझे क्या हो गया था, शायद दिमाग में पहले से गुस्सा भरा पड़ा था, इसलिए शायद!”
” हम्म ! बहुत गुस्से वाली हो?”
“नही !!! पहले कभी नही आता था, ससुराल या मायके में आता भी था तो खुद को संभाल लेती थी पर अब पता है यहाँ कोई नही है अपना। खुद ही खुद का ध्यान रखना है..”
    वरुण का चेहरा जाने कैसा तो हो गया… वो जानता था कि सामने बैठी पारो सच कह रही है लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर गहन उदासी सी छा गयी…
   वो कुछ सोचते हुए अपने आप में गुम था कि पारो ने उसकी चुप्पी को देखते हुए अपनी बात रख दी…

   “सुनिए आप से कुछ बात कहनी थी?” 
    ” हॉं कहो!”    वरुण ने कहा और फिर पारो ने एक एक कर सुनीता की बताई सारी बातें वरुण को बता दी…..
   जैसे जैसे बातें खुलती गयी वरुण के आश्चर्य की सीमा नही रही.. उसे विश्वास ही नही हो रहा था कि आश्रम में इतना कुछ चल रहा है, और वो भी आचार्य अमृतानन्द के जाने बिना।
  ” क्या करना चाहिए कि ये सब रुक जाए?”
   “सोचना पड़ेगा! क्योंकि अगर हम सीधे सीधे जाकर पुलिस में या अमृतानन्द स्वामी से कहते हैं तो सबूतों के अभाव में हम ही झूठे ठहरा दिए जाएंगे। दूसरी बात हमें ये भी पता करना होगा कि इस सब में कौन कौन जुड़ा हुआ है। आश्रम से कितने लोग इस काम में लिप्त है। सारी बातें पता चलने के बाद ही हम कुछ कर पाएंगे। और उसके लिए हमें और लोगों की भी ज़रूरत होगी।”
  ” और कौन हमारी मदद कर सकता है?”
   “तुम अपने आसपास की महिलाओं में धीरे धीरे पता करो कि कौन कौन इस सब से जुड़ी हैं और उन सब के पास से बाकी जानकारियां निकलवाने की कोशिश भी करना। तब तक मैं भी इधर कोशिश करता हूँ कुछ पता चलता है तो।”
    दोनों की बातों में रात बीतती जा रही थी कि फिर वरुण ने जोर देकर पारो को उसके कमरे में आराम करने भेज ही दिया…
    पारो चाहती तो थी कि वरुण भी कुछ देर आराम कर ले लेकिन वो तैयार नही हुआ….

Advertisements

****
    सुबह के साढ़े चार बज रहे थे, आश्रम में हल्की फुल्की सी हलचल अभी शुरू हुई ही थी कि प्रबोधानन्द के कमरे के दरवाज़े पर खटका सा हुआ।
वहीं बैठे बैठे नींद लेते वरुण की दरवाज़े पर की दस्तक से आंख खुल गयी।
   उसने धीमे से दरवाज़ा खोला सामने पारो खड़ी थी। अपने हाथ में कुछ लिए हुए वो अंदर आ गयी। उसके हाथ में एक गिलास था। वरुण चौन्क कर उसे देखने लगा..-“, ये क्या है?”
” ये सोंठ वाला गरम पानी है। लीजिये पी लीजिये!”
” लेकिन ये क्यों?”
  ” ज़रूरी है आपके लिए। आप लीजिये और पी लीजिये उसके बाद आप थोड़ी देर अपने कमरे में जाकर आराम कर लीजिए। अब मैं यहाँ बैठती हूँ। “
     वरुण ने पानी धीरे से पीना शुरू किया, उसे वो पानी गले में बड़ी राहत दे रहा था..
“तुम्हें कैसे मालूम था कि ये पानी मुझे अच्छा लगेगा।”
” पुराने नानी के नुस्खें हैं ये तो। आप को कल बार बार खांसी सी आ रही थी, उसी से लगा कि आपको ये पीना चाहिए। “
    वरुण मुस्कुरा कर रह गया… उसने जब तक में वो खत्म किया, आश्रम में हल्का उजाला सा फैलने लगा था।।
   वरुण उठ कर अपने कमरे की ओर चला गया। उसके जाने के कुछ देर में ही चारुलता हाथ में चाय का कप लिए खुद चली आयी।
   दरवाज़ा खुला हुआ था, और दरवाज़े के साथ लगी दीवार से पीठ टिकाए पारो ज़मीन पर ही बैठी थी।
   दरवाज़ा खोल चारु भीतर चली आयी, पारो पर तीखी नज़र डाल वो अंदर चली गयी।
   उसने देखा, स्वामी जी गहरी नींद सोए पड़े थे। अभी भी उनके उठने के कोई आसार नजर नही आ रहे थे। चाय वहीं एक किनारे रख वो बाहर निकल आयी..-” जाओ अब तुम भी अपने काम धाम में लगो। भोर होने लगी है। “
  पारो चुपचाप उठ कर जाने लगी तो चारु ने उसे टोक दिया…-“स्वामी जी की तबियत बिगड़ी तो नही?”
  पारो ने चारु को मुड़ कर देखा और गहरी नज़रों से उसे देखते हुए कहने लगी…-“मेरे यहाँ आते ही कुछ देर में स्वामी जी गहरी नींद सो गए. ..”
” अच्छा तुरंत ही?” चारु के कौतूहल का ठिकाना न था
” जी! शायद थके हुए थे और तबियत भी..”
“हम्म !! ठीक है जाओ!”
    पारो को स्वामी जी के कमरे से रात में निकल कर अपने कमरे में जाते चारु पहले ही देख चुकी थी लेकिन उस वक्त उसने कुछ नहीं कहा।
      आधी रात के वक्त कहीं बीच में जब धूप पूरी जल चुकी थी वरुण ने जाकर उसके अवशेष वहाँ से समेट लिए थे और अपने कमरे में जाते समय एक तरफ को बहते पानी में प्रवाहित भी कर दिए थे।

***

Advertisements


   
   सुबह सवेरे आश्रम की अपनी गतिविधिया शुरू हो चुकी थीं। सुबह की मंगल आरती के बाद वरुण का प्रवचन था।
    मंदिर में भी रोज़ रात कान्हा जी का बिस्तर लगाया जाता था और उसके बाद मंदिर के पुजारी वहाँ पर्दा खींच कर बाहर चले आते थे।
   उसके बाद सीधे सुबह चार बजे ही पर्दा खोला जाता था। और ये काम सालों से एक ही पुजारी जी के जिम्मे था। और उनका कहना था कि रात में कितने भी अच्छे से बिस्तर लगाया जाए, लेकिन सुबह बिस्तर की चादरों में सिलवटें जरूर नजर आती हैं । और यही उनका विश्वास था कि उनके कान्हा जी भी दिन भर सारे संसार का पालन करने के बाद रात में कुछ घड़ी का आराम जरूर करते हैं।
     नियम से हर चार दिन में कान्हा जी का बिस्तर चादर तकिए के गिलाफ़ बदल दिए जाते थे।
    आज भी कान्हा जी को जगाने के बाद उनका स्नान ध्यान आचमन पूजन संपन्न होने के बाद उनकी आरती करते हुए पुजारी जी ने आरती के बाद अंत में कपूर जलाकर वरुण के हाथ में थमा दिया। कपूर के साथ ऊंची ऊंची लपटों से कान्हा जी की आरती उतारते हुए वरुण ने मन ही मन यह संकल्प लिया कि जिस तरह कान्हा जी ने नरकासुर का वध किया था और 16000 महिलाओं को मुक्ति दिलाई थी उसके आतंक से, उसी तरह अब इस आश्रम में जिन महिलाओं की दुर्गति हो रही है उन्हें उस पाप कुण्ड से वह मुक्त करवाकर रहेगा….

    आरती करने के बाद कपूर दान को नीचे रखने के बाद वरुण ने प्रणाम किया और जैसे ही मुड़कर अपने आसन की तरफ बढ़ा… पारो ने तुरंत उसके आसन के सामने रखे पटल को पोछने के बाद उसकी किताबों के साथ ही एक कलम भी वहां रख दी। यह वही कलम थी जिससे आख्यान के बीच वरुण अक्सर किताब में कुछ निशान खींचा करता था। शायद वह पंक्तियां उसे कुछ ज्यादा ही पसंद आती थी.. इसलिए उन पंक्तियों के नीचे अपनी कलम से निशान बना लिया करता था….

Advertisements

   आज तक आरती होने के बाद वह खुद उतर कर पीछे बने वाचनालय से अपनी पुस्तक और कलम उठा कर लाता था लेकिन आज उसके आरती संपन्न करते तक में पारो सब कुछ लाकर वहाँ रख चुकी थी। उसने श्रद्धालुओं को प्रणाम किया और एक नजर किनारे खड़ी पारो पर डाली। पारो ने आंखों ही आंखों में उसे प्रणाम किया वरुण ने भी धीमे से उसे जवाब दिया और अपनी जगह पर बैठ गया।  अपनी जगह पर बैठते ही उसका ध्यान गया किनारे पर ही एक तांबे का बड़ा सा जग रखा हुआ था, उसे बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि वह कभी भी वहां पर कोई भी पानी का कलश नहीं रखा करता था। उस जग  के साथ ही एक छोटा सा गिलास भी रखा था। गिलास औंधा रखा था जिसके नीचे एक छोटा सा कागज फड़फड़ा रहा था। वरुण ने उस कागज को उठाकर खोला उसमें मोती से अक्षरों में लिखा हुआ था…-” आख्यान के बीच में अगर जरूरत महसूस हो तो थोड़ा पानी पी लीजिएगा वरना गला सूखने से आपको तकलीफ हो जाती है, पानी हल्का गरम है। गले को राहत मिलेगी।…..”
     वरुण ने उस पर्ची को मोड़ कर अपने कुर्ते की जेब में डाल लिया उसके चेहरे पर एक भीनी सी मुस्कान खेल गई। उसने सामने देखा पारो उसे ही देख रही थी। पारो ने धीरे से जग की तरफ इशारा किया और सिर नीचे करके धीमे-धीमे कदमों से बाहर निकल गई….

    मन ही मन श्रीकृष्ण स्मरण करते हुए वरुण ने आज का आख्यान शुरू कर दिया…

क्रमशः

Advertisements

aparna…

दिल से….

     सबसे पहले तो आप सभी का हार्दिक आभार कि आप सभी मुझे इतना दिल से पढ़ते हैं और सराहतें हैं।
    अब चलते हैं आने वाली कहानियों के बारे में जानने। जैसा कि मैंने पहले भी आप लोगों से कहा था कि दिवाली के बाद मैं एक नई कहानी वापसी की शुरुआत करूंगी अपने ब्लॉग पर। इसके साथ ही मैंने यह भी सोचा था की मायानगरी भी प्रतिलिपि की जगह अब सिर्फ ब्लॉग पर आएगी। लेकिन आप सब जीवनसाथी से इतना ज्यादा जुड़े हुए हैं कि राजा और बांसुरी को वापस पढ़ने के लिए आप मायानगरी से भी जुड़ना चाहते हैं तो आप सभी की इतनी सारी डिमांड देखते हुए मैंने यही सोचा है कि अब कहानी मायानगरी प्रतिलिपि पर ही आएगी।
     ब्लॉग पर और प्रतिलिपि पर एक साथ एक ही कहानियां चलाना जरा मुश्किल हो रहा है। कहानी के हिस्से पहले मेरी नोटबुक पर सुरक्षित होते हैं, उसके बाद प्रतिलिपि के ड्राफ्ट पर और उसके बाद ब्लॉग पर। एक ही चीज तीन-तीन जगह पर सुरक्षित होने से जगह की बहुत समस्या हो रही है फोन पर..
       यही सब सोचकर अब यह निर्णय लिया है कि समिधा दोनों जगह एक साथ आती रहेगी।
    लेकिन अब से बाकी कहानियां दोनों जगह पर अलग-अलग आएंगी।
   कोशिश मेरी यही रहेगी कि जिन कहानियों को भी मैं धारावाहिक के रूप में लिखूं उनके भले ही सिर्फ 15 मिनट के पार्ट हों लेकिन रोज आ सकें। जिससे आप सभी पाठकों को भी सुविधा हो।
    मायानगरी प्रतिलिपि पर ही आएगी और मेरी कहानी वापसी एक्सक्लूसिवली सिर्फ मेरे ब्लॉग पर आएगी।

    आप सभी से यही निवेदन है कि आप सभी इसी तरह मुझे पढ़ते रहें और अपना स्नेह बरसाते रहे। आप लोगों की समीक्षाओं से रेटिंग से और दिए गए स्टिकर से भी बहुत ज्यादा उत्साह बढ़ता है। और आप लोगों का यह बढ़ाया हुआ उत्साह ही हम लेखकों को लिखने की ताकत देता है। मुझे पढ़ते रहने के लिए दिल से आभार
शुक्रिया
नवाजिश!!!

Advertisements

aparan…

समिधा-40

Advertisements


  समिधा -40

        ऑफ़िस से वापस आश्रम लौटते तक प्रबोधानन्द बिल्कुल ठीक थे.. आह्लादित थे प्रसन्न और प्रफुल्लित थे।
   लेकिन आश्रम के मुख्य द्वार से भीतर प्रवेश करते ही उन्हें वापस तबियत खराब सी लगने लगी। ऐसा लगा जैसे एक बार फिर ज्वर की अवस्था होने वाली है।
” हमें तबियत कुछ ठीक नही लग रही चारुलता!”
“अगर आप कहें तो मैं यहीं रुक जाऊँ आपकी सेवा के लिए।”
” नही !!तुम्हें रुकने की ऐसी कोई आवश्यकता नही है। ये दोनों हैं ना। तुम आश्रम का अपना काम निपटा कर वापस लौट सकती हो।”
चारुलता ने एक नज़र पास में बैठी पारो पर डाली और धीमे से फुसफुसा उठी…-” सुन लिया, स्वामी जी चाहतें हैं तुम ही उनकी देखभाल करो। तो सम्भाल लेना, समझीं।”
   अभी कुछ देर पहले ही पारो को चारुलता में देवी के दर्शन हुए थे, और इसलिए अभी भी उसे ये बात बुरी तो लगी पर उसमें अपने मन को मना लिया।
   
   परिसर में प्रवेश के साथ ही प्रबोधानन्द कि तबियत ऐसी बिगड़ी की गाड़ी से उतर कर अपने कमरे तक जाना भी दुभर हो उठा….
     एकबारगी उसने सोचा भी था कि कुछ देर कृष्ण मंडप में बैठना है लेकिन अपनी हालत देखते हुए समझ आ गया कि ये असम्भव होगा। वो चुपचाप धीमे कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ गए…
    जाते जाते उसने चारु को इशारा कर दिया..

Advertisements

चारु ने भगिनी आश्रम की रसोई में जाकर एलान कर दिया कि अबसे प्रबोधानन्द स्वामी की सेवा में पारो ही जाएगी। पारो के हाथों में फलों मेवों की तश्तरी के साथ उसे दूध भी पकड़ा दिया चारु ने, और उसे स्वामी जी के कमरे की ओर भेज दिया….
       
      वरुण के प्रवचन का समय हो चुका था और इसलिए वो मंडप की ओर बढ़ गया। पारो ने वरुण की तरफ देखा कि शायद वो एक बार मुड़ कर देख ले लेकिन बिना उसकी तरफ एक बार भी देखे वरुण अपनी लय में आगे बढ़ता चला गया।
    वो सीढियां चढतें हुए जानता था कि पीछे खड़ी पारो उसे ही देख रही है , वो खुद मुड़ कर एक बार उसे देख लेना चाहता था लेकिन अपने मन को समझा कर कड़ा कर उसने खुद को रोक ही लिया।
   सीढियां चढ़ कर उसके ओझल होते ही पारो वापस आगे बढ़ गयी।

    प्रबोधानन्द के कक्ष में प्रवेश के साथ ही उसे अजीब सी घुटन होने लगी। लेकिन चारु दीदी का आदेश था सो वो नही टाल सकी।

   वो कमरे में अंदर गयी तो देखा प्रबोधानन्द अपने तोषक पर अधलेटे से अपने फ़ोन में कुछ देख रहे थे। पारो ने उनके सामने जाकर फलों की टोकरी रख दी।  वो वहाँ सामान रख कर उठ ही रही थी कि प्रबोधानन्द ने उसकी कलाई थाम ली।
      पारो की दाईं कलाई प्रबोधानन्द की चौड़ी हथेली में कसमसा उठी…-” हमसे इतना डरने की क्या आवश्यकता है? हमारे आसपास भी नही टिकती तुम? अरे हम कोई बहुत उम्रदराज नहीं हैं… अभी सिर्फ उनतीस के….”
   प्रबोधानन्द की बात पूरी होने से पहले ही पारो के उलटे हाथ का एक जोरदार करारा थप्पड़ प्रबोधानन्द के चेहरे पर था।
   वो आश्चर्य से कलबला कर रह गए। पारो का हाथ छोड़ वो अपना गाल सहलाने लगे।
   ” अगर आप बाहर किसी से भी इस थप्पड़ की चर्चा नही करेंगे तो मैं भी किसी से कुछ नही कहूंगी। न आपकी गंदी नज़र के बारे में और न ही आपकी इस हरकत के बारे में।
   लेकिन अगर आपने शुरुवात की तो मैं भी सब कुछ सबके सामने बोल जाऊंगी। फिर भले ही मुझे ये आश्रम छोड़ कर जाना ही क्यों न पड़ जाए पर आपका कच्चा चिट्ठा अमृतानन्द स्वामी तक पहुंचा ही जाऊंगी। समझे आप?”
  ” व्यापार कर रही हो ,वो भी हमसे?”
   ” व्यापारियों के साथ ही तो व्यापार किया जाता है। मुझे उन कमज़ोर लड़कियों के जैसा मत समझ लीजियेगा जो आप जैसों की ज़्यादती सह कर भी चुप रह जातीं है सिर्फ इस डर से की अगर कुछ कह दिया तो ये आसरा भी छिन जाएगा।
   मुझे इस बात का कोई भय नही है। जैसे ये आसरा मिला कहीं और भी मिल जाएगा।”
” धमकी दे रही हो हमें। तुम जानती भी हो किस से बात कर रही हो।”
” मैं धमकियां नही दिया करती आप चाहें तो आज़मा कर देख लीजिए, अगर आप में हिम्मत है तो बुला लीजिये सारे आश्रम को।
    और मैं किस से बात कर रही ये मुझे अच्छे से मालूम है। एक नम्बर का झूठा लंपट दुर्व्यसनी है ये आदमी जो छद्म रूप धर आश्रम में घुस आया है और यहाँ की पवित्रता भंग करने के प्रयास में है। अभी तो सिर्फ एक थप्पड़ मारा है अगर दुबारा मुझे छूने या देखने का भी प्रयास किया तो डंडे से मार मार कर प्राण ले लुंगी। “
     प्रबोधानन्द के पास शब्द नही बचे थे। अपमान से उनके कानों की लोरियां जलने लगी थीं और चेहरा काला पड़ गया था…
   दूसरी तरफ मुहँ फेर कर उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं और पारो तेज़ कदमों से वहाँ से बाहर निकल गयी।
    आश्रम के पीछे बने सरोवर तक तेज़ तेज़ कदमों से पहुंच वो भरभरा कर ढह गई। सीढ़ियों पर बैठी वो फफक कर रो पड़ी….
    उसकी समझ से बाहर था आखिर उसकी किस्मत में लिखा क्या था? यहाँ जिस आस उम्मीद से आई थी अगर वो ही नही पूरी हो पा रही थी तो आखिर उसके यहाँ भी रहने का क्या औचित्य था।
    हालांकि प्रबोधानन्द से पहले आश्रम के किसी पुरुष ने कोई गलत बात उससे नही की थी लेकिन ये प्रबोधानन्द सुधर ही नही पा रहा था।

   पर उसकी उलझन का कारण दूसरा भी था। गुस्सा तो उसे प्रबोधानन्द पर ही था लेकिन वरुण की बेपरवाही भी कहीं न कहीं उसके गुस्से का कारण थी।
   उसे समझ नही आ रहा था कि कल तक हर बात पर उसका साथ देने वाला वरुण आज अचानक उस सरोवर के बाद से उसकी तरफ देख तक नही रहा आखिर क्यों?
     वो तो सुनीता की समस्या वरुण से बताने की सोच रही थी लेकिन अगर वरुण का यही रवैय्या रहा तो कैसे उसे बता पाएगी?

” क्या हुआ आप यहाँ अकेली बैठी हैं? कोई परेशानी?”

   पारो ने चौन्क कर पीछे देखा, वहाँ वरुण का दोस्त प्रशांत खड़ा था..-” नही कुछ नही। बस ऐसे ही।”
  प्रशांत भी कुछ सीढियां छोड़ कर वहीं बैठ गया…

Advertisements

” मेरी कोई बात सुनता ही नही। बेहद ज़िद्दी है। जो ठान लिया वही करेगा फिर चाहे उसका कुछ भी परिणाम हो?”
   पारो आश्चर्य से प्रशांत की ओर देखने लगी…
” मैं समझी नही। आप किसकी बात कर रहे है?”
” उसी पागल से लड़के की जो सारी दुनिया भूल जाता है अपने कर्तव्यपालन के लिए और किसी से कुछ कहता तक नही।”
पारो को समझ में तो आने लगा था कि प्रशांत वरुण के लिए कह रहा है लेकिन ऐसे वो कैसे उसका नाम ले लेती इसलिए पूछ बैठी…

” वरुण के बारे में बात कर रहा हूँ। आप जानती हैं उसे कितनी बड़ी समस्या है?”

  पारो ने न में सिर हिलाते हुए मना कर दिया…-” क्या समस्या है उन्हें?”

“उसके हृदय में छेद है और साथ ही उसके हृदय के किनारों में ठीक से खून नही पहुंच पाता है , डॉक्टरों के शब्दों में कहुँ तो ब्लॉकेज है। “.

” डरने वाली बात है क्या?”

” बिल्कुल डरने वाली बात ही है। उसकी समस्या का समाधान सिर्फ सर्जरी है, और वो अब कुछ करवाना ही नही चाहता। कहता है जितना जीवन बचा है अब उसे कृष्ण समर्पित करना है।”
“हाँ तो कृष्ण समर्पित करने का ये मतलब तो नही है ना कि अपने जीवन को ही दांव पर लगा दिया जाए। अपनी ज़िंदगी के लिए प्रयास करना गलत थोड़े न है। भगवान दवा लेने से मना तो नही करते ये तो आपकी बुद्धिमत्ता कहीं से नही हुई।”

” मैं तो समझा समझा कर हार गया, लेकिन किसी को तो उसे समझाना होगा, दवाएं बिल्कुल ऐसे छोड़ देना भी सहीं नही है ना। अभी कल रात ही उसे हल्का सा चक्कर आ गया था। अपनी क्षमता से अधिक काम करता है और किसी से अपनी तकलीफ कहता नही ऐसे कैसे काम चलेगा। “

“हम्म ! लेकिन आप मुझसे ये सब क्यों बता रहे?”

  प्रशांत के पास इस बात का कोई जवाब नही था। वो क्या बताता की वो कई बार वरुण को पारो के ताकते देख चुका है , वो जानता है कि मन ही मन पारो के लिए वरुण के मन की कोमल भावनाएं क्या हैं ? और इसलिए वो खुद भी यही चाहता है कि वरुण की भावनाएं पारो भी जान ले। लेकिन ये सब कहने की उसकी हिम्मत नही थी तो उसे जो सही लगा उसने कह दिया।

   आरती के घंटो शंख की आवाज़ आते ही पारो और प्रशांत वहाँ से उठ कर कृष्णमंडप की ओर बढ़ गए।
  आरती के बाद वरुण सबको आरती देता उन दोनों तक भी चला आया।
   पारो के चेहरे के ठीक सामने आग की लपटें उसके चेहरे को उजाले से भरती जा रही थीं।
   वरुण एकटक उसे देखता खड़ा रह गया…-” यहाँ का काम निपटा लीजिये फिर आज हमें प्रबोधानन्द स्वामी की सेवा में ही रहना है।”
  पारो की बात पर किसी अच्छे बच्चे की तरह वरुण ने हॉं में सिर हिलाया और आरती रख कर बाहर चला आया।

*****

Advertisements


   
      पारो के बाहर जाते ही प्रबोधानन्द अपमान की आग में तिलमिला कर रह गया था। लेकिन वो ये भी समझ गया था कि ये पारो की शिकायत करने का उचित समय नही था। अब तो बदले की भावना उसके अंदर दावानल की भान्ती जल रही थी। और उसके भीतर की ये अग्नि उसे सिर्फ शारीरिक ही नही मानसिक रूप से भी संतप्त करने लगी थी।
  बहुत अकड़ है तुझमें छोकरी। मैं भी तुझे दिख दूंगा की प्रबोधानन्द आखिर है क्या बला। तुझे अपने कदमो पर गिरा कर तेरी सारी अकड़ न निकाल दी तो प्रबोधानन्द मेरा नाम नही।
  अभी शारीरिक रूप से अस्वस्थ था तो मुझे थप्पड़ धर गयीं न। ये थप्पड़ तुझे बहुत भारी पड़ेगा। इस थप्पड़ का मूल्य जीवन भर चुकाने पर भी नही चुका पाएगी। समझती क्या है खुद को हैं….
   अभी बिंदल से बात करता हूँ और तेरी सारी हेकड़ी निकलवाता हूँ।
  प्रबोधानन्द किसी को फ़ोन लगाने जा ही रह था कि चारु कमरे में चली आयी…-“अरे आपने तो कुछ भी नही लिया? ऐसे तो कमज़ोरी आ जायेगी स्वामी।जी।”
“चारु वो लड़कीं कहाँ गयी? वो आज रात भर हमारे कक्ष में ही रहेगी? हमें जिस वस्तु की आवश्यकता होगी वही प्रस्तुत करेगी। समझ गयीं तुम, वरना तुम्हारे सारे फंड जो आश्रम की तरफ से मिलते है कैंसिल ही समझो।”
   प्रबोधानन्द का आखिरी वार निशाने पर लगा,चारु तिलमिला कर रह गयी। उसे गुस्सा तो प्रबोधानन्द की अजीबोग़रीब फरमाइश पर आ रहा था पर उतरने वाले था पारो पर।
   अभी भी तो उसने पारो को यहाँ भेजा था पर वो यहाँ फल और दूध पटक कर जाने कहाँ गायब हो गयी थी।
  इतनी नाराज़गी के बावजूद अपने चेहरे को संयत किये मुस्कुरा कर चारुलता ने प्रबोधानन्द को प्रणाम किया और हंस कर उसकी बात मान ली…-” आप कहें तो जीवनपर्यंत उसे आपकी सेवा में लगा दूं । आप इतने नाराज़ क्यों लग रहे हैं स्वामी जी। कुछ भूल हो गयीं क्या हम सब से?”
    प्रबोधानन्द खुद तिलमिलाए बैठा था लेकिन पारो के थप्पड़ की बात वो ऐसे किसी को भी क्या बताता इसी से चुप लगा गया।
  ” बिंदल से बात हुई क्या तुम्हारी?”
  ” हाँ उनसे तो हमारी बात होती ही रहती है। उन्ही से तो ये सारा कारोबार है।”
   ” हम्म सब ठीक चल रहा है ना?”
   ” सब कुछ मज़े में चल रहा है स्वामी जी, आप ये कुछ भोग ग्रहण करें मैं तब तक मैं आपके भोजन के साथ उस लड़की को भी भेजती हूँ। अबकी ज़रा समझा सीखा कर भेजूंगी।”
  “नही उसकी आवश्यकता नही है। समझाना सिखाना हम खुद कर लेंगे। तुम बस भेज दो।”

   चारुलता ने प्रबोधानन्द को प्रणाम किया और बाहर निकल गयी। उस कक्ष से बाहर निकलते ही उसके तेवर बदल गए। जलती हुई आंखों से पारो को ढूंढती चारु को पारो तो नही मिली पर वरुण ज़रूर मिल गया…-” वरुणदेव सुनो, उस लड़की को कहीं देखा क्या ?”
” किसे ?”
” वही लड़की पारोमिता? प्रबोधानन्द स्वामी की तबियत फिर बिगड़ गयी है। उन्हें कक्ष में अकेले नही छोड़ा जा सकता उनके साथ किसी का होना ज़रूरी है। सो इसलिए हम लोगों ने सोचा कि पारो ही उनके कमरे में रुक जाए, रात मध्यरात कही उनकी तबियत बिगड़ी तो कम से कम हमें बाहर खबर तो दे पाएगी।”
” मैं रुक जाता हूँ उनके साथ!”
” नही!स्वामी जी का आदेश यही है वही रुकेगी तो अब वही रुकेगी। जाओ भेजो उसे”

  वरुण के चेहरे पर तनाव की रेखाएं खिंच गयीं। एक गहरी सांस भर वो चारु के सामने से हट कर पारो को ढूंढता आगे बढ़ गया कि तभी उसे दूसरी तरफ से पारो आती हुई नजर आ गई।
   वह अभी पारो से कुछ कह पाता कि उसके पहले ही चारुलता की आवाज उन दोनों के कानों में गूंज गई
” पारोमिता प्रबोधानन्द स्वामी की तबीयत आज भी सही नहीं है। और इसलिए आज रात तुम उनके कक्ष में उनकी सेवा में प्रस्तुत रहोगी। कहीं आधी रात उनकी कुछ तबीयत बिगड़ी तो हमें बताने के लिए उनके साथ किसी का होना बहुत जरूरी है।”
     चेहरे पर मैं ही क्यों वाले भाव लाते हुए भी पारो ने चारुलता दीदी से कुछ नहीं कहा। और चुपचाप सिर झुका कर हां कह दिया। उसकी इस तरह हां कहने पर वरुण को पारो पर ही जोर से गुस्सा आ गया। चारुलता दीदी अपनी बात कह कर वहां से भगिनी आश्रम की तरफ बढ़ गई। प्रशांत भी किसी काम से निकल गया अब वहां बस वरुण और पारो ही खड़े रह गया।
” मुंह में दही जमा रखा था क्या?  मना भी तो कर सकती थी?”
  वरुण को खुद समझ नहीं आया कि आज तक पारो से इतने सम्मान से बात करने वाला वह आज उसे किस अधिकार से इस तरह डांट बैठा ।
” स्वामी जी की तबीयत सही नहीं है , उनकी सेवा के लिए वहां किसी का रहना जरूरी है। ऐसे में मना करना अच्छा नहीं लगता।”
    मन ही मन पारो को वरुण का इस कदर उसकी चिंता में उसे डांटना अच्छा लग रहा था लेकिन वह भी वरुण के शाम के बर्ताव के कारण थोड़ी सी दुखी थी। और इसीलिए उसने ऐसा उल्टा जवाब दिया उसका जवाब सुनकर वरुण की भौहें तन गई।
” अच्छा तो यह बात है । पूरे आश्रम में एक तुम्हारे अलावा और कोई नहीं बचा उनकी सेवा के लिए।”
” उनकी सेवा के लिए तो बहुत से लोग हैं । लेकिन अगर मुझे ही चुना गया है, और मुझे मौका मिल रहा है तो इसमें आपको क्यों कष्ट हो रहा है?”
   पारो की इस बात ने वरुण की आंखें खोल दी उसे एकदम से आभास हुआ कि जैसे वह वरुण नहीं कोई और है। उसके अंदर से ऐसा लगा जैसे कोई और पारो के ऊपर इतना हक जताते हुए उससे बात कर रहा है।
    पारो सही ही तो कह रही थी आश्रम में भले ही बहुत से लोग हैं लेकिन अगर पारो को स्वामी जी की सेवा करने का मौका मिला तो उसे क्यों बुरा लग रहा था?  क्यों उसे बार-बार प्रबोधआनंद की दृष्टि में पारो के लिए गलत ही नजर आ रहा था ? ऐसा और तो किसी को नहीं नजर आ रहा, फिर अकेले उसे ही क्यों? क्या वह कुछ ज्यादा सोच ले रहा है… कहीं यह उसके मन में पारो के लिए  कोमल भावनाओं से पैदा हुई जलन तो नहीं है।
     अगर वह प्रबोधानंद को गलत समझ रहा है तो वह खुद भी कितना सही है?
   प्रबोधानंद अगर पारो को घूरता रहता है तो वह खुद भी तो दुनिया से छिपकर उसे देखने का कोई भी बहाना नहीं  छोड़ता? तो फिर उसमें और प्रबोधानंद में अंतर भी क्या हुआ ? उम्र का भी ऐसा कोई खास बहुत ज्यादा अंतर नहीं है..
    प्रबोधानंद अधिक से अधिक उससे दो या तीन साल ही बड़े होंगे।

Advertisements

     वो अपने मन के भावों में इस कदर फंसता जा रहा था कि उसे खुद ही समझ नहीं आ रहा था कि उसके मन में पारो के लिए जागती कोमल भावनाएं सही है या गलत?
   अपने मन को कड़ा कर वह वहां से मुड़कर कृष्ण मंडप की तरफ बढ़ गया और पारो अकेली खड़ी रह गई।

   पारो को लगा था कि अगर वह कुछ कड़े जवाब देगी तो वरुण शायद नरम पड़ जाएगा । और एक बार फिर तालाब किनारे उसके साथ पत्थर फेंकने वाला वरुण बन जाएगा। लेकिन यहां तो पांसा ही उल्टा पड़ गया। उसकी कठोर वचनों को सुनकर वरुण ऐसा टूटा कि उसे अकेला छोड़ कर वहां से चला गया।
     पारो ने तो वरुण के सामने बस उसे चिढ़ाने के लिए ही अंदर जाने की बात मान ली थी, लेकिन अब उसकी स्थिति विकट थी। वह अपने ही शब्दों में बुरी तरह फंस चुकी थी। काश जिस समय वरुण, प्रशांत उसके साथ खड़े थे तभी वह चारुलता दीदी की बात मानने की जगह काट देती, तो वह दोनों लड़के मिलकर कोई ना कोई और उपाय निकाल लेते। लेकिन उसने खुद ने चारु की बात पर हामी भर दी और उसके बाद वरुण से इतनी सारी बहस करके उसे भी नाराज कर दिया। अब तो उसके पास कोई नहीं बचा था जो उसे बचा सके और पता नहीं अंदर वह प्रबोधानंद क्या सोच कर बैठा था।

     आश्रम में भोजन का समय हो चला था सभी आचार्य गुरुवरों के बाद भगिनी आश्रम की महिलाओं ने भी भोजन कर लिया। सबको खिलाने पिलाने के बाद अंतिम पारी में बैठी सरिता सुनीता पारो और उनकी हमउम्र सखियां एक दूसरे से बातें करते हुए खाना खा रही थी। लेकिन पारो का आज किसी काम में मन नहीं लग रहा था। उससे एक निवाला भी खाया नहीं गया। उसे रह-रहकर बस यही चिंता सता रही थी कि उसने क्यों प्रबोधानंद के कक्ष में जाने के लिए हामी भर दी।
    उन लोगों का खाना निपटते ही चारुलता एक बार फिर पारो के पास चली आई… उसे दूर से ही देख कर चारु ने गर्दन हिलाकर स्वामी जी के कमरे में जाने का उसे इशारा कर दिया! पारो चुपचाप मन मसोसकर अपने जगह से उठकर चारु की तरफ बढ़ने लगी की सुनीता ने उसका हाथ पकड़ लिया…-” अपना ध्यान रखना बहन। “
हां में सिर हिला कर पारो धीमे कदमों से आगे बढ़ गई।
   दिल में तो उसके ऐसी हलचल मची थी कि एक-एक कदम मनो भारी हुआ जा रहा था। लेकिन अपने आप को समझती अपने मन को समझाती धीमे-धीमे कदमों से प्रबोधानंद के कक्ष की ओर बढ़ चली। मन ही मन वो जाने कितने तरीके सोच रही थी कि अगर अब प्रबोधानंद ने उस पर हाथ डालने की कोशिश की तो वह क्या करेगी।  उसे याद था कि कुछ समय पहले जब वह फल रखने उनके कमरे में गयी थी तो वहां फलों के पास एक छोटा सा चाकू भी रखा था। उस चाकू को याद कर के उसके मन में थोड़ी सी तसल्ली के भाव जागे…..
      ज्यादा कुछ हुआ तो चाकू उठाकर प्रबोधनंद के आर पार कर देगी…. बस यही सोचकर वह वाटिका में मैं बने उस अकेले कक्ष के दरवाजे तक पहुंच गई ।वहां पहुंचने के बाद वो एक बार मुड़कर पलटी.. चारु दीदी सीढ़ियों से नीचे खड़ी थी। उन्होंने उसे अंदर जाने का इशारा किया और आगे बढ़ गई… तीन चार सीढ़ियों के ऊपर ही कक्ष का दरवाजा था, जो लगा हुआ था। उसने धीरे से दरवाजा खोला और अंदर प्रवेश किया। दरवाजे के साथ एक छोटा सा गलियारा लगा था, जिससे अंदर बढ़ने पर सोने का कमरा था।
    दरवाजे के अंदर घुसते ही उसकी नजर दीवार से लग कर खड़े वरुण पर पड़ गई।  और उसे देखते ही पारो के चेहरे पर सूरज सी रोशनी चमकने लगी। उसकी आंखें खुशी से उद्भासित हो गई… उसने आश्चर्य से वरुण की तरफ देखा वरुण ने तुरंत अपने होठों पर उंगली रख कर उसे चुप रहने का इशारा किया और पारो ने गर्दन हाँ हिलाकर एक भीनी सी मुस्कान वरुण को दी और मुड़कर दरवाजा बंद कर लिया…

Advertisements

क्रमशः

Advertisements

aparna ……
   
     
      

समिधा – 39

Advertisements

  समिधा – 39

    वरुण के गाड़ी में बैठते ही प्रबोधानन्द का चेहरा उतर गया। उनकी नज़र में वैसे तो अब तक वरुण ने ऐसा कुछ नही किया था बावजूद वो वरुण को पसन्द नही कर पाते थे| जबकि वो लड़का उनके आगे पीछे घूमता उनकी सहायता को ततपर नज़र आता था।
  ” कहाँ घूमना चाहेंगे गुरुवर?”
  ” यहाँ के रास्ते मालूम भी हैं तुम्हें?”
   ” जी! शुरुवाती दिनों में तो मैं और प्रशांत पैदल ही पूरा मथुरा घूम आया करते थे। श्री कृष्ण जन्मस्थली तो जाने कितनी बार हम हो आये। प्रभु की जन्मस्थली देख कर मन ही नही भरता।”
“हम्म ! हमें तो द्वारिकाधीश मंदिर बहुत पसंद है। वहाँ भी चलेंगे।”
” जी! सबसे पहले आपको कंस किला लेकर चलता हूँ।”
” वहाँ ऐसा क्या है? हमें तो ज़रा पसन्द नही।”
“जी यही तो दिखता है कि कंस जैसा इतना बड़ा राजा जिसके पास न धन की कमी थी ना राज्य की बस अपने लोभ और लालच ने उसे कहीं का नही छोड़ा। आज उसका किला कैसा जीर्ण शीर्ण पड़ा है जो कभी आमोद प्रमोद का गढ़ हुआ करता था। ये सब हमें ये दिखाता है कि राजा हो या रंक समय सभी का बदलता ज़रूर है। और घमंड कभी किसी का नही टिकता। अगर हम अपने मन को शुद्ध साफ नही रख पाते हैं तो भगवान स्वयं हमारे मन की कालिख दूर करने का प्रयत्न करते हैं।”

Advertisements


“बस बस… स्वामी जी ने तुम्हें प्रवचन की ज़िम्मेदारी क्या सौंपी तुम तो हर जगह शुरू हो जाते हो। ये सब जो बता रहे हो तुम क्या सोचते हो, हमें नही पता होगा।?”
“ऐसा तो असम्भव है गुरुवर! जो मैं जानता हूं वो तो समंदर की एक बूंद बराबर भी नही। आप तो स्वयं समंदर हैं।”
“अच्छा सुनो  वरुण देव! हमें ज़रा कुसुम ताल की तरफ चलना होगा। वहीं थोड़ा आगे बढ़ कर हमारा भी ऑफिस है। हम प्रबोधानन्द जी को वहाँ भी ले जाना चाहतें हैं।”
” जी, ज़रूर।”
     चारुलता की बात पर वरुण ने हामी भरी और गाड़ी पहले कुसुम ताल की ओर ही घुमा ली।
     गोवर्धन और राधा कुंड के बीच कुसुम सरोवर स्थित था। उधर से गुजरते हुए प्रबोधानन्द को उस सरोवर की सुंदरता ने ऐसा आकृष्ट किया कि उन्होंने वहीं गाड़ी रुकवा ली।
   वो चारों लोग सरोवर पर उतर गए। प्रबोधानन्द के पीछे ही चारुलता चल रही थी।  उनके पीछे वरुण था और वरुण के ठीक पीछे थी पारो। वो जानबूझ कर ऐसे चल रही थी कि उस पर प्रबोधानन्द की नज़र न पड़े…
   कुछ आगे बढ़ कर वो लोग वहीं सीढ़ियों पर बैठ गए।
    प्रबोधानन्द अपने बचपन से लेकर अपने स्वामी बनने के किस्से उन लोगो को सुना रहे थे। चारुलता तो बहुत खुशी से सब सुन रही थी पर न वरुण को ही उनकी बातों में कोई रस मिल रहा था और न ही पारो को।
      वो सीढ़ियों पर सबसे ऊपर और पीछे की तरफ बैठी थी। वो धीमे से उठ कर वहाँ से दूसरी तरफ निकल गयी। कुछ छोटे बकरी के बच्चे इधर से उधर कुलांचे भर रहे थे, वो उनके पास खड़ी उनकी उछल कूद देखने लगी।
    तभी उसका ध्यान एक मेमने पर गया जो सबसे अलग थलग एक तरफ खड़ा था। पारो ने देखा उसके पैर पर शायद चोट सी थी, हल्की लालिमा सी दिख रही थी, और शायद उसी चोट के कारण वो हिल डुल नही पा राह था।
   कि तभी उसे देव के साथ कि वो शाम याद आ गई। जब घर भर से झूठ बोलकर देव पारो को तांत्रिक बाबा के पास बंधवाने के नाम पर घुमाने लेकर जाया करता था। और एक शाम ऐसे ही बहाने बना कर निकले वो दोनो एक तालाब के किनारे बैठे सूरज को डूबते देख रहे थे… और साथ ही देख रहे थे पास में खेलते कुछ बकरी के बच्चों को..
    उनमें से एक बच्चा यूं ही किनारे चुपचाप पड़ा था तभी देव ने कहा जरूर इसके पैर में मोच आई होगी। बस इसी लिए यह पैर अपना सीधा नहीं रख पा रहा है।  देव  तुरंत अपनी जगह से उठा और उसने जाकर उस बच्चे को सीधा खड़ा किया…. उसके बाद उसके उस भाग में जिसमें मोच सी महसूस हो रही थी और लालिमा थी! उस हिस्से को सीधा करके उसने अपनी जेब से रुमाल निकाला और वहां पर बांध दिया। थोड़ी देर पैर पर मालिश जैसी करने के बाद मेमने का बच्चा उछलता कूदता अपने साथियों के साथ खेल में लग गया और पारो देव को देख कर मुस्कुरा उठी…
” अरे वाह आपने तो उसे बिल्कुल ठीक कर दिया।”
” जानती हो पारो हमारा शरीर खुद अपने आप में एक वैद्य होता है। जब भी हमारे शरीर में कोई भी समस्या या व्याधि पैदा होती है, तो हमारा शरीर सबसे पहले उस व्याधि से लड़ने के लिए तैयारी करने लगता है। और यह बात हम इंसानों से ज्यादा यह जानवर समझते हैं। हम तो हल्के से बुखार में भी डॉक्टर के पास दौड़े चले जाते हैं कि, बुखार कम करने की दवा दे दो। लेकिन यह नहीं समझते कि हमारे शरीर में आखिर ऐसा क्या हुआ जिसके कारण हमें बुखार आया ।
   जानती हो जब भी हमारे शरीर में कीटाणुओं जीवाणु विषाणुओं का आक्रमण होता है, तो हमारा शरीर अपना तापमान बढ़ा कर उन जीवाणुओं को हमारे अंदर प्रवेश करने से रोकता है, उनसे लड़ता और उन्हें मारने की कोशिश करता है, और तभी हमें बुखार आता है। लेकिन हम इस बात को समझे बिना दौड़कर डॉक्टर के पास चले जाते हैं। यह सारे निरीह बेजुबान जानवर हम से कहीं ज्यादा समझदार होते हैं…”
   पारो मुस्कुराकर देव की बात सुनती रहती थी उसे देव को सुनना बहुत पसंद था….

Advertisements

   वह अपनी मीठी सी यादों में खोई उस मेमने को सहला रही थी कि तभी उसके कानों में ऐसा लगा जैसे देव की ही आवाज गूंजने लगी…-” कुछ नहीं हुआ है इस मेमने को बस हल्की सी मोच आई है। अभी ठीक हो जाएगा।”
  झट से पारो ने पलटकर देखा पीछे वरुण खड़ा था। वरुण ने अपनी जेब से रुमाल निकाला और मेमने के पैर को थोड़ा सीधा किया और उसकी मोच वाली जगह पर बांध दिया। कुछ देर मालिश करने के बाद उसने मेमने को खड़ा कर दिया। थोड़ी देर लड़खड़ाने के बाद वह मेमना उछलता कूदता अपने साथियों के पास भाग गया….

” देखा यह जानवर हम से कहीं ज्यादा समझदार होते हैं। हम तो अपने शरीर में होने वाली अधि व्याधियों को पहचान नहीं पाते, जबकि हमारा शरीर खुद उन व्याधियों से लड़ने के लिए तैयार रहता है ।लेकिन यह जानवर इस मामले में हम से कहीं ज्यादा समझदार होते हैं । वह मेमना अपने उस मोच  वाले पैर को अपने शरीर से दबाए बैठा था। एक सीध में उसने अपने पैर को रखा हुआ था,और वह इसी तरह बैठा रहता तो 2 से 3 घंटे में उसकी मोच अपने आप ठीक हो जाती। उसके पैर के उस हिस्से की मांसपेशियां शिथिल हो जाती और उसे आराम मिल जाता। इसीलिए उसे देखते ही मुझे समझ में आ गया कि उसके किस पैर में कहां पर मोच आई है।”

    पारो आश्चर्य से वरुण के चेहरे को देखती रह गई… उसे लगा यही सब तो पहले भी उसके साथ हो चुका है। बस उस समय वरुण नहीं देव था सामने। लेकिन क्या ऐसा संभव है कि दो अलग-अलग लोग बिल्कुल एक ही तरह की बातें और एक ही तरह की सोच के हों।
    
        उसे जाने क्यों उस वक्त वरुण के अंदर देव की झलक मिल रही थी।
   ऐसा लग रहा था सामने वरुण नहीं देव खड़ा है… आंखों की वैसी ही चमक। चेहरे पर वैसा ही तेज। और उसके पास से आने वाली वही भीनी भीनी सी खुशबू कुछ भी तो देव से अलग नहीं था…..
      
    पता नहीं कैसे लेकिन उसके मन में अचानक से ऐसे भाव आने लगी कि जैसे वह देव के साथ तालाब के किनारे सीढ़ियों पर बैठी रहती थी, वैसे ही काश वरुण के साथ बैठ सके। उसकी सीढ़ियों से दो तीन सीढियां ऊपर देव बैठा करता था और उसके घुटनों पर सिर टिकाए वह बैठी सामने तालाब को देखती उस पर पत्थरों से निशाने लगाया करती थी, और वह हमेशा उसके निशानों का मजाक उड़ाया करता था।
     दोनों के बीच पत्थरों के निशानों का खेल हुआ करता था…. दोनों शर्त लगाते थे कि किसका पत्थर कितनी बार कूदकर तालाब में गायब होगा।
    और वह हर बार देव से जीत जाया करती थी।

अपने में गुम पारो सरोवर को देख रही थी कि तभी उसके बाजू से होते हुए एक चपटा का पत्थर तालाब में एक के बाद एक पांच कुदाली लगाता हुआ दूर तक चला गया…
     वह चौक पर पलटी… वरुण हाथ में ढेर सारे पत्थर लिए खड़ा था। उसने पारो की तरफ वो पत्थर बढ़ा दिए…-” निशाना लगाओगी?”
   हॉं में सिर हिला कर उसने वरुण के हाथ से पत्थर लिया और निशाना लगा दिया। उसका पत्थर सिर्फ तीन कुदाली के बाद ही डूब गया ।
    और इस बात पर उसकी भौहें चढ़ गयीं…-” नहीं ऐसा नहीं हो सकता! अगर आपके पत्थर ने पांच कुदाली लगाई है तो मेरा पत्थर दस बार कूदेगा देख लीजिएगा।’
“हाथ कंगन को आरसी क्या?  दिखा दो!
     कि आखिर तुम्हारा पत्थर दस बार कैसे कूदता है?”

       उसके बाद तो एक दूसरे से लड़ते झगड़ते पारो और वरुण वहां पर निशाना लगाते रहे । ऐसा लग रहा था जैसे कोई दो किशोर बालक बालिका है जो आपस में खेल कर एक दूसरे को हरा देना चाहते हैं।
  शुरू के दो तीन बार के बाद पारो के पत्थर ज्यादा दूर तक होने लगे और वह खुशी के मारे किलकारी मारती तालियां बजाकर हंसने लगी। उसे इस कदर खुश देख वरुण के चेहरे पर जो भाव थे वह समझाने मुश्किल थे। वरुण अपलक दृष्टि से पारो को देख रहा था, जैसे कितने दिनों बाद उसे यह चेहरा देखने को मिला था, कितने दिनों बाद ये मोहक मुस्कान उसके चेहरे को रंग रही थी।
     उसका  मन किया कि उस चेहरे को अपने दोनों हाथों में पकड़ कर चूम ले।  लेकिन तभी उसे भान हुआ कि वह वरुण है… आश्रम का एक कर्तव्यपरायण सदस्य!  और सामने खड़ी लड़की सिर्फ एक लड़की नहीं बल्कि उसी आश्रम की ही सम्मानित महिला सदस्य है ।
     और उसके लिए वरुण के मन में इस तरह की कोई भी भावना आना गलत है। सरासर गलत है।
   अपने मन के भावों को एक झटके से अपने दिमाग से निकाल कर वरुण ने हथेली में रखे बचे हुए पत्थर वहीं फेंक दिये और वापस मुड़ कर सीढ़ियां चढ़ गया। पारो को अचानक समझ में नहीं आया कि ऐसा क्या हुआ कि वरुण वहां से ऐसे चला गया।
   उसका तो अभी भी मन कर रहा था कि वरुण उसके पास ही खड़ा रहे और वह दोनों इसी तरह पत्थर फेंकते रहे।
    एक ठंडी से सांस भर कर वह भी वरुण के पीछे सीढ़ियां चढ़ गई….
” कहां चले गए थे आप दोनों? “
  उन दोनों के वहां पहुंचते ही चारु लता ने प्रश्न कर दिया।
” बस यही तो थे।  उस तरफ जरा बकरी के बच्चे और गाय के बछड़े खेल कूद रहे थे उधर ही चले गए थे।”
” बता कर जाना चाहिए था ना! प्रबोधानन्द स्वामी गाड़ी में जाकर बैठ चुके हैं। चलिए यहां से हमारे ऑफिस जाना है।”
चारुलता की बात पर सिर झुका कर वरुण गाड़ी की ओर बढ़ गया !

Advertisements


     
         कुछ देर पहले की जो शाम मुस्कुराती हुई ढल रही थी , उसे याद करते हुए पारो के चेहरे पर अब भी मुस्कान थी… वह भी चारुलता के पीछे धीमे कदमों से कार की तरफ बढ़ गई।
     उसे यही नहीं समझ में आ रहा था कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि वरुण बिना कुछ बोले पलट कर चला गया। उसका मन उसी बात में लगा हुआ था कि अचानक उसे समझ में आ गया कि वरुण के मन में ऐसा क्या आया होगा।
   उसे अपनी सोच पर भी बुरा महसूस होने लगा। उसे यह लगने लगा कि वह खुद कैसे वरुण के लिए अपने मन में कुछ गलत सोचने लगी थी? आखिर क्यों वह वरुण को देव की जगह देखने लगी? और जैसे ही यह बात उसके मन में आई वह शर्मिंदा होकर गाड़ी से बाहर देखने लगी। अब तक वरुण पर टिकी उसकी नजरें खुद ब खुद वरुण से हट गई। उसने तय कर लिया कि अब वह खुद को वरुण से दूर रखने का प्रयास करेगी।

     वरुण के मन की भी सारी चपलता ठंडी पड़ गई थी। वह अपनी सोच में गुम गाड़ी चलाने लग गया था। प्रबोधआनंद को इस तरह से वरुण और पारो का अचानक गायब हो जाना पसंद नहीं आया था। लेकिन दूर खड़े वह उन दोनों को बछड़ों के पास खड़ा देख चुके थे। और वैसे देखा जाए तो उन दोनों का वहां इस तरह खड़े रहना कुछ गलत भी नहीं था। अपने मन को यही समझा कर प्रबोधआनंद एक बार फिर प्रसन्न होने की कोशिश करने लगे।
  आगे बढ़ते हुए गाड़ी चारुलता के ऑफिस के ठीक सामने जाकर रुकी। चारुलता ने सादर प्रबोधानन्द जी को अंदर आमंत्रित किया, उन्हीं के पीछे वरुण और पारो भी ऑफिस में प्रवेश कर गए..
      ऑफिस में प्रबोधानन्द को बैठाने के बाद चारुलता अपने तरह-तरह के कागज पत्तर निकालकर उनके सामने बिछाती चली गई। वह प्रबोधानन्द को हर तरह से अपने प्रभाव में ले लेना चाहती थी। वह दिखाना चाहती थी कि वह समाज सेवा के क्षेत्र में किस तरह से अग्रणी है। वृद्ध आश्रमों में जाकर फल और कंबल बांटने हों, या दिव्यांगों के अस्पताल में जाकर समय-समय पर जरूरी दवाइयां बांटनी हो, हर क्षेत्र में चारुलता के कागज बड़े पक्के थे।
   वह काम कितना और क्या करती थी यह तो वह खुद ही जानती थी । लेकिन उनके पास उनके सारे किए कामों का लेखा-जोखा भरपूर था।
   एक किया चार दिखाया की तर्ज पर हर जगह के फोटोग्राफ्स भी उसने फाइल करके रखे हुए थे।
    पारो के लिए यह सब बहुत नया था। यह सब देखकर उसकी आंखें फटी जा रही थी। उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई एक औरत अकेले भी समाज कल्याण का इतना सारा कार्य कर सकती है वह भी बिना किसी की सहायता के।
   कुछ देर पहले चारुलता के लिए उसके मन में जो थोड़ी सी कड़वाहट आ रही थी, वह अब अचानक चली गई। और उसे चारुलता दीदी में देवी नजर आने लगी।
वरुण एक तरफ चुपचाप बैठा अपने आप में खोया हुआ था कि, तभी चारुलता का चपरासी उन सभी के लिए चाय और कुछ नाश्ता ले आया।
    प्रबोधानन्द की आंखे रह रह कर पारो पर ठहर जाया करती। चारुलता ने चाय की कप प्रबोधानन्द की ओर बढ़ा दी।
  वो अपना कप थामे अपनी जगह से उठे और पारो के पास जाकर खड़े हो गए।
उन्होंने अपना कप उसकी ओर बढ़ा दिया…-“मैं चाय नही पीती स्वामी जी!”
” क्यों ? ” और ये कहते हुए उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रख दिया…
   पारो ने अब तक झुका रखी अपनी नज़र ऊपर उठायी और उसकी जलती आंखें प्रबोधानन्द के चेहरे पर गड़ गयीं।
   उस नाजुक कोमल सी लड़की की उन तीखी आंखों का तेज प्रबोधानन्द सह नही सका और उसने तुरंत उसके कंधे पर रखा हाथ हटा लिया। वो अपना कप अपने हाथ में लिए वहाँ से अपनी जगह वापस लौट गया।
” मुझे पसन्द नही है।” पारो का जवाब ऐसा था कि प्रबोधानन्द को एकबारगी समझ में नही आया कि वो चाय के लिए कह रही है या उसके स्वभाव के लिए।
  प्रबोधानन्द के हटते ही सामने बैठे वरुण पर पारो की नज़र पड़ गयी। वरुण भी उसे ही देख रहा था, लेकिन कुछ देर पहले के उखड़े उखड़े से वरुण के चेहरे पर अब थोड़ी शांति नज़र आने लगी थी।
  शायद उसने भी प्रबोधानन्द का हाथ रखना और हटा लेना देख लिया था और पारो के चेहरे पर आए गुस्से से ही उसके चेहरे पर संतोष की रेखाएं खींच गयीं थीं।
   उसने भी चाय लेने से मना कर दिया।
” अरे क्यों? तुम भी चाय नही पीते क्या?”
“कभी पिया करता था पर अब मन नही करता।”
    चारुलता एक बार फिर अपनी बतकही में लग गईं और पारो और वरुण अपने अपने मन से एक दूजे को हटाने में लग गए….

Advertisements

क्रमशः

   दिल से….

   आप में से कई पाठकों ने कहा कि कहानियां तो अच्छी चल रही है, लेकिन आप लोग मेरा कॉलम दिल से बहुत मिस कर रहे हैं। मिस तो मैं भी कर रही थी, लेकिन जीवनसाथी समाप्त करने के बाद पता नहीं क्यों कुछ समय तक दिल से लिखने का मन नहीं किया मैं भी अजातशत्रु जी को बहुत मिस कर रही हूं।

   अजातशत्रु और बांसुरी ऐसे दिल दिमाग पर छाए हैं की उस कहानी को समाप्त करने के बाद सच कहूं तो चार-पांच दिन तक मोबाइल देखने का भी मन नहीं किया। मैंने खुद नहीं सोचा था कि मैं इतनी इमोशनल ब्रेकडाउन में चली जाऊंगी।
    पहले लगता था कि प्रेम कथाएं लिखना सरल होता है। लेकिन असल में ऐसा नहीं है। जब आप कोई कहानी लिखते हैं तब आप उस कहानी की दुनिया में पूरी तरह से चले जाते हैं। मैं खुद अपने आप को राजा साहब के महल में महसूस करती थी , उनके कमरे उनकी बालकनी उनका दीवानखाना पिया का अस्पताल समर और राजा साहब का ऑफिस, प्रेम और निरमा का आशियाना हर एक जगह ऐसा लगता था मैं उन किरदारों के साथ खुद भी खड़ी हूं।
     जब-जब रसोई से झांक कर निरमा प्रेम से चाय के लिए पूछा करती थी, तो ऐसा लगता था मैं भी निरमा से कह दूं कि मेरे लिए भी एक कप बना लेना।

Advertisements

    यह सब लेखकों के लिखने के साइड इफेक्ट्स होते हैं। और इसीलिए शायद बहुत से लेखक जब कोई एक लंबी कहानी खत्म करते हैं तो उसके बाद एक ब्रेक या पॉज़ ले लेते हैं। क्योंकि वह शायद खुद अपने रचे उन किरदारों  से बाहर निकलने की जद्दोजहद में लगे होते हैं ।
    और उस समय उनका दिमाग किसी नए किरदार को रचने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होता।
    
       और शायद यही वह चीज होती है , जिसे राइटर्स ब्लॉक कहा जाता है। मेरे साथ तो यह अक्सर होता है। जब मैंने shaadi.com लिखी थी तब बांसुरी की विदाई के बाद भी मेरा यही हाल था। और अपने आप को संभालने के लिए मुझे एक लीक से हटकर कहानी लिखनी पड़ी। क्योंकि अगर shaadi.com के तुरंत बाद मैं कोई प्रेम कहानी शुरू करती तो उस पर shaadi.com वाले राजा और बांसुरी की ही छाप नजर आती और इसील