जीवनसाथी-124

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  जीवनसाथी-124

       राजा साहब के कार्यालय में मीटिंग पर मीटिंग चल रही थी अब लगभग उनके मंत्रिमंडल का गठन हो चुका था और शपथ ग्रहण का समय भी आ गया था।

     अगला दिन बहुत महत्वपूर्ण था राजा के लिए। राजनीति में उसकी पारी की शुरुवात होने जा रही थी। आज तक वो अपने महल और रियासत की साज सम्भाल करता आया था लेकिन अब वो सरकार बनाने जा रहा था। अब वो पूरे एक राज्य को संभालने जा रहा था।
    अपने काम समेट कर वो कमरे में पहुंचा तब बाँसुरी बच्चे को गोद में लिए इधर से उधर टहलती उसे सुलाने की कोशिश कर रही थी।
   बाँसुरी ने राजा को देखा और मुस्कुरा उठी…-“आजकल तो राजा साहब के दर्शन मिलने कठिन हो गए हैं। “
  राजा मुस्कुरा कर हाथ मुहँ धोने चला गया… उसके बाहर आते ही बाँसुरी एक बार फिर शुरू हो गयी…
” कल रात आप सोने भी नही आये? कहाँ रह गए थे?

राजा ने अपने बाल पोंछते हुए उसे देखा और फिर बच्चे को गोद में ले लिया…-” कल काम बहुत ज्यादा था। सारा काम निपटाने के बाद आदित्य, रेखा और केसर के पिता से मिलने की ज़िद लिए भी बैठा था तो रात में सारा काम में निपटने के बाद समर और आदित्य के साथ रेखा के पिता से मिलने चला गया था। हालांकि वह खुद भी यही सोच रहे थे कि वह एक-दो दिन में महल आएंगे, लेकिन हम लोगों के जाने से वो खुश नजर आए। वह अपने घर वापस लौटना चाहते थे उन्होंने अपने मन की बात हम लोगों के सामने ही कहीं तो आदित्य ने उसी समय कह दिया कि चले हम आप को छोड़ देते हैं। उसके बाद उन्हें लेकर उनके घर तक गए। वहां पर नौकरों से कहकर सब कुछ ठीक-ठाक करवाया फिर वहां से वापस लौटते में हम लोगों को बहुत देर हो गई थी। रात में दो बजे फिर मैंने सोचा तुम्हें आधी नींद से जगाना सही नही होगा इसलिए ऑफिस में ही सो गया।”

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” हम्म ! मैं परेशान न हो जाऊं इसलिए ऑफिस में ही सो गए! मैं तो इस बात से और ज़्यादा परेशान हो गयी। रात में उठ उठ कर आपको रिंग करती रही। “

राजा को याद आया उसका फ़ोन बंद हो चुका था..-” ओह्ह मेरा तो फ़ोन ही बंद पड़ा था।”
” जी हाँ! अब आप मुझे अपना फ़ोन असिस्टेंट ही बना लीजिए। आपके कॉल्स देखा और संभाला करूँगी। “
” अभी तो बस मुझे संभाल लीजिये हुकुम। उतना ही काफी है।”
  राजा ने सो चुके शौर्य को बिस्तर पर रखा और बाँसुरी को बाहों में भर लिया। दोनों खिड़की पर खड़े बाहर निकलते चांद को देख रहे थे। बाँसुरी की कुछ उलझी सी लटें उसके माथे पर इधर उधर हवा से उड़ कर उसे परेशान कर रहीं थीं। राजा ने उन्हें उंगली से उसके कान के पीछे समेट दिया… उसकी उंगलियां बाँसुरी की गर्दन पर फिसलने लगी कि उनका नन्हा राजकुमार नींद में कोई सपना देख डर के मारे चिल्ला कर रोने लगा, और बाँसुरी राजा को एक तरफ कर बच्चे के पास भाग गई…
” आजकल हमारी हुकुम के पास हमारे लिए वक्त नही है।”
“हाँ जैसे आपके पास ढेर सारा वक्त है।”
” नन्हे नवाब नही चाहते कि प्रोपर्टी में उनका कोई हिस्सेदार आ जाये। बस जैसे ही पापा मम्मी पास आये की बुक्का फाड़ दहाड़ लगातें हैं।”
  राजा की बात सुन बाँसुरी ने मुस्कुरा कर शौर्य को गोद में लिया और वापस उसे सुलाने की कोशिश में लग गयी…-“साहब सो मत जाना। मैं बस इसे सुला कर अभी आयीं।”
   बाँसुरी ने इधर उधर टहलते हुए आखिर बच्चे को सुला ही लिया।
   वो उसे बिस्तर पर रखने आई की देखा राजा गहरी नींद में डूबा किसी मासूम बच्चे सा नज़र आ रहा था। उसका माथा चूम कर वो कमरे की बत्तियां बुझाने चली गयी।

****

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          अगली सुबह राजा का पूरा दिन व्यस्त गुजरना था।
   शपथ ग्रहण होना था। इसी से वो तैयार होकर सुबह ज़रा जल्दी ही निकल रहा था। उसके साथ उसके मंडल के बाकी सदस्य और समर प्रेम भी थे। युवराज और आदित्य भी उनके साथ हो लिए थे।
   विराज के पास भी और कोई चारा नही बचा था।  रूपा ने ही राजा को टीका लगाया,बाँसुरी उसके पास खड़ी मुस्कुरा रही थी।
  रेखा भी वहीं थी…-“तुमसे एक बात पूँछे बाँसुरी?”
” हाँ पूछो रेखा।”
” राजा साहब को तुमने बताया क्यों नही कि आज तुम्हे शौर्य को वैक्सीन लगवानी है? क्या अकेले ही वैक्सीन लगवाने जाओगी। “
“वैसे जाना क्यों पड़ेगा भला ? तुम्हारे बुलाने पर डॉक्टर यहीं आ जाएंगे। “रूपा ने रेखा की बात पर बाँसुरी की तरफ देख कर कहा। अब तक राजा और उसकी सेना वहाँ से निकल चुकी थी।
  ” जी भाभी साहब ! पिया से बात कर लुंगी, वो भेज देगी किसी को। और जहाँ तक साहब को रोकने की बात है रेखा, वो मैंने जानबूझ कर नही किया।
  हम औरतों से यहीं तो गलती हो जाती है। जब हमारे पति हमसे और हमारे बच्चे से अधिक समय अपने काम को देने लगतें हैं तब हम उनकी मजबूरी समझे बिना ज़बरदस्ती उन पर अपने काम लादते चले जाते हैं! बस फ़िज़ूल की अपनी महत्ता दिखाने! और ऐसे में होता कुछ नही बस सामने वाले का तनाव बढ़ता है । हम हमेशा अपने आप को महत्वपूर्ण दिखाने के लिए पतिदेव के कामों को समझे बिना उन पर अपना बोझ भी ला देते हैं और मुझे यह हम औरतों की बेवकूफी लगती है।
   मुझे तो शुरु से पता था कि आज शपथ ग्रहण है । इसलिए साहब के पास वक्त नहीं होगा इत्तेफाक से आज ही शौर्य की वैक्सीनेशन की डेट भी है। अब अगर मैं इस वक्त साहब से यह उम्मीद करूं कि पहले वह मेरे साथ बच्चे को वैक्सीनेट करवाएं और उसके बाद सदन में जाएं तो यह तो गलत उम्मीद है ना।
मैं यह भी जानती हूं कि अगर मैं साहब को बता देती तो उनका मन शपथ ग्रहण में नहीं लगता। और बार-बार उनका मन उनके लाडले की तरफ लगा रहता।  ऐसे में परेशान होकर वह मुझे फोन करते और अपना खुद का वक्त भी बर्बाद करते , इसीलिए मैंने उनसे कुछ कहा ही नहीं। और फिर मेरे साथ रूपा भाभी साहब है, तुम हो, फिर मुझे किस बात की चिंता?”

” तुम्हारी बातें सुनकर हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है बांसुरी! हमने पति पत्नी के रिश्ते को कभी इस नजरिए से देखा ही नहीं। हमने हमेशा यही सोचा कि हमारा सबसे पहला हक है विराज सा पर और बाकियों का हमारे बाद। लेकिन तुमने अपने राजा साहब पर सारी दुनिया को हक जताने दिया, और खुद हर वक्त उनके किनारे खड़ी रही, उनका सहारा बनकर। और इसीलिए तो आज इतनी सारी जिम्मेदारियां होने के बाद भी राजा साहब सब कुछ मुस्कुराते हुए निभा ले जाते हैं।
      तुम दोनों सच्चे अर्थों में “जीवन साथी” हो ! ऐसे साथी जिनके जुड़ने से एक दूसरे का जीवन संवर गया।”

” धन्यवाद रेखा।  ऐसा तुम्हें लगता है कि हम दोनों बहुत परफेक्ट है। पर ऐसा नहीं है । हम दोनों में भी कमियां हैं , और थोड़ी  नहीं बहुत सारी हैं। लेकिन हमने एक दूसरे को एक दूसरे की कमियों के साथ स्वीकार किया है। और मजे की बात यह है कि हम एक दूसरे की कमियों को सुधारने की कोई कोशिश नहीं करते। क्योंकि जब हम सामने वाले की कमियों को सुधारने की कोशिश करने लगते हैं, तो हम उसे बदलने की कोशिश करने लगते हैं। और यहीं पर जाकर बातें बिगड़ जाती हैं । जो जैसा है अगर हम उसे वैसे ही स्वीकार लें, और पूरे मन से स्वीकार लें तो हमारी जिंदगी आसान हो जाती है।
    और दूसरी बात एक दूसरे की कमियां सुधारने की जगह अगर हम अपनी कमियों पर काम करना शुरू कर दें तो जिंदगी और आसान हो जाती है।  मैं तुमसे बहुत दिनों से एक बात कहना चाह रही थी पता नहीं तुम मेरी बात समझ पाओगी या नहीं।”

“कहो ना बाँसुरी! बेझिझक कहो क्योंकि अब हम देवरानी जेठानी से ज्यादा सहेलियां बन गई हैं।”

” बस उसी सहेली वाले रिश्ते के लिए तुमसे कह रही हूं कि केसर ने तुम्हारे लिए जो सोच रखा है उसे पूरा करने के लिए कोशिश तो करके देखो।

“पर हमने आज तक कोई काम नहीं किया बांसुरी हमें किसी भी चीज का कोई अनुभव नहीं है।”

“अनुभव लेकर कोई भी पैदा नहीं होता रेखा। अनुभव काम करने से आता है , तुम्हें क्या लगता है मुझे कलेक्ट्री का बहुत अनुभव था। कुछ भी नहीं था। मैंने बहुत सारी गलतियां की हैं लेकिन अपने काम में  डटी रही। “

“अरे हां तुम्हारी छुट्टियां कब तक है?”

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“पूरे 6 महीने की छुट्टियां मिली है मुझे! और इन छुट्टियों में यह छोटा सा नन्हा सा राजा साहब भी संभलने लायक तो हो ही जाएगा। उसके बाद देखूंगी अगर यह छोड़कर जाने लायक हुआ तब तो ऑफिस ज्वाइन करूंगी वरना एक दो महीने की और छुट्टियां बढ़ा लूंगी। अब कल से तुम भी एनजीओ का काम देखना शुरू करो। “

  रेखा को खुद के ऊपर इतना भरोसा तो नहीं था लेकिन बांसुरी की बात सुनकर उसे लगा कि उसे वाकई अपने और अपनी केसर दीदी के लिए कुछ करना ही होगा।


*******

दिन बीतते देर नहीं लगती और खासकर जब कोई किसी काम में व्यस्त हो तब तो समय का पता भी नहीं चलता ।
   आदित्य ने केसर की बॉडी के बारे में रेखा से कोई अधिक चर्चा नहीं की थी क्योंकि वह नहीं चाहता था कि वो रेखा को किसी भी तरह की उम्मीद दे । क्योंकि अगर यह वाकई केसर की बॉडी होगी और वह रेखा से यह कह जाएगा कि यह केसर नहीं है तो रेखा फिर से एक उम्मीद में जी उठेगी और कहीं उसकी उम्मीद पूरी नहीं हुई तो वह वापस टूट पड़ेगी इसलिए आदित्य ने इस बारे में रेखा से कुछ भी नहीं कहा।
   
     विराज अपने कामों में व्यस्त था और अब रेखा ने उससे किसी भी तरह की कोई भी उम्मीद रखनी छोड़ दी थी। रेखा का बेटा अब स्कूल जाने लगा था और इसलिए रेखा के पास भी वक्त था और इसलिए उसने केसर के दिए सारे कागजों को सरसरी तौर पर देखना शुरू किया।
      रेखा अक्सर केसर की यादों में डूब जाया करती थी। उसे हमेशा लगता कि केसर दुनिया के लिए बेशक गलत थी लेकिन अपने खुद के परिवार के लिए उसने कितना कुछ किया था। आज तक देखा जाए तो रेखा ने अपने पिता के लिए कुछ भी नहीं किया था। क्योंकि केसर ने उसे करने का कुछ मौका ही नहीं दिया। और अब जब रेखा के पास मौका था कि वह केसर और अपने पिता के लिए कुछ कर सकती थी तब भी केसर उसके लिए ही इतना कुछ छोड़ कर चली गई ।
        ऐसे ही एक शाम जब रेखा केसर को बहुत याद कर रही थी, तब अपने पिता से मिलने चली गई उसके पिता भी रेखा को देखकर खुश हो गए और उन्होंने केसर के सारे बिजनेस के पेपर और एनजीओ के कागज भी रेखा के हवाले कर दिए…;” अब हमसे यह सब संभाला नहीं जाता बेटा, अगर हो सके तो तुम अपना यह बिजनेस ही संभाल लो। हम जानते हैं तुम महलों की रानी हो। तुम्हें काम करने की कोई जरूरत नहीं है लेकिन फिर भी घर का बिजनेस है हमसे अब सम्भल नहीं पा रहा।  केसर ने बड़े प्यार से संवारा था इस सारे काम को तो अगर तुम चाहो…

रेखा ने अपने पिता की बात आधे में ही काट दी… “जी पिता साहेब आप चाहते हैं तो हम यह काम कल से ही संभाल लेंगे। बस एक बार घर पर सभी से पूछ लें।”

   रेखा ने वापस लौट कर बांसुरी से इस बारे में बात की। बांसुरी और रूपा यह सुनकर बहुत खुश हुए। वहाँ तो सभी ये चाहते थे कि रेखा अपने खोल से बाहर निकले।
    उसी शाम खाने की मेज पर रेखा ने अपने काम को शुरू करने की बात वहां मौजूद सभी लोगों के सामने रखी और युवराज से आग्रह किया कि वह उसे अपना काम करने की अनुमति दें। युवराज इस बात पर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने रेखा  के सिर पर हाथ रख दिया…-” आप हमारी छोटी बहन जैसी है रेखा! आपको कहीं किसी मोड़ पर भी हमारी जरूरत पड़े तो आप बेझिझक कहिएगा ! हम जानते हैं कि केसर ने बहुत मजबूती से अपना बिजनेस खड़ा किया है, आप उस बिजनेस को बहुत आगे ले जाएंगी। हमारा आशीर्वाद आपके साथ है।
   एक तरह से अब उस परिवार में युवराज ही सबसे बड़ा था और उस से अनुमति लेने के बाद ही वहां के सारे कार्य संपन्न होते थे। रानी मां की मौत के बाद महाराजा साहब अब खाने की टेबल पर नहीं आया करते थे। उनका खाना हर वक्त उनके कमरे में पहुंचा दिया जाता था। दादी साहब भी बहुत बुज़ुर्ग हो गई थी। इसलिए उनका भी कमरे से बाहर आना जाना कम ही हुआ करता था। खाने की टेबल पर बाकी सभी लोगों के साथ अब महाराजा साहब की कुर्सी खाली जरूर होती थी लेकिन उनकी बाजू वाली कुर्सी पर युवराज ही बैठा करता था।
   राजा अजातशत्रु अब मुख्यमंत्री बन चुके थे और इसलिए उनकी व्यस्तताएं अलग तरीके से बढ़ गई थी। कई बार कार्य की अधिकता के कारण उन्हें अपने मुख्यमंत्री आवास पर ही रुकना पड़ता था। तब ऐसे में वह अपने ड्राइवर को भेजकर बांसुरी और अपने छोटे नवाब को भी अपने पास बुला लिया करते थे। और दो-चार दिन के काम को निपटाने के बाद उनका परिवार वापस महल आ जाया करता था।
    बहुत बार जब वह दूसरे प्रदेशों के दौरे पर होते थे तब बांसुरी महल में ही रहा करती थी।
  ऐसा ही कोई जरूरी काम था जिसके सिलसिले में राजा अजातशत्रु को दिल्ली के दौरे पर जाना पड़ा था। उन्होंने विराज से भी साथ चलने की गुजारिश की थी लेकिन विराज उनके साथ नहीं गया था। महल में होने के बावजूद वह रात्रि के सह भोज में कभी भी समय पर नहीं पहुंचा करता था जब उसका मन किया करता वह सब के साथ खाने चला आता और कभी अपने कमरे में ही अपना खाना मंगवा लिया करता था।
   आज भी जब रेखा ने सबके सामने अपना काम शुरू करने की बात रखी विराज अपने कमरे में बैठा शराब में डूबा पड़ा था। सब का आशीर्वाद और सहमति देखा प्रसन्नता से विभोर होती वह अपने कमरे में चली गई थी।
 
            विराज को एक तरफ सोफे पर बेसुध पड़ा देख उसका मन वितृष्णा से भर गया।
क्यों उसका मन अपने ही पति के लिए स्नेह से नहीं भर उठता है। उसकी समझ से परे था। ऐसा तो नहीं था कि उन दोनों के बीच हमेशा सिर्फ तकरार और लड़ाई झगड़े ही हुआ करते थे। कुछ प्यार भरे लम्हे भी तो बीते थे उनके बीच, और आज भी बीतते थे।  जब कभी विराज नशे में नहीं होता था तब वह रेखा से बहुत प्यार से पेश आता था।
   तब उसे रेखा बहुत सुंदर भी नजर आती थी। रेखा कि हर बात भी अच्छी लगती थी। लेकिन अक्सर उनके साथ होता था कि जब वह शांत बैठे बातचीत करने लगते थे तो जाने कैसे बातें ऐसा मोड़ ले लेती थी कि दस मिनट में ही उनकी बातों में टकराव आ जाता था कभी रेखा भड़क उठती थी तो कभी विराज।
   शायद इसी को कहते हैं मन का मेल ना हो पाना। तन तन से जुड़ चुके थे। दोनों की अपनी ज़रूरतें थी और उन्हें पूरा भी कर लिया जाता लेकिन मन का मेल कभी नहीं हो पाया था और शायद इस जीवन में अब कभी होना भी नहीं था।
    रेखा की सहायिका उसके बेटे को सुला कर जा चुकी थी। विराज की बोतल एक तरफ लुढ़की पड़ी थी। उसकी आधी खाई प्लेट भी एक ओर पड़ी थी। रेखा ने सहायिका से कह वो सब साफ करवा दिया। विराज सोफे पर ही सो चुका था।
   रेखा भी कपड़े बदल कर सोने चली गयी। अगले दिन से उसका काम शुरू होना था।

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*****

  
     बड़े दिनों के बाद समर को फुरसत मिली थी उसने पिया को कॉल लगा लिया…-“क्या बात है? आज मंत्री जी ने खुद फ़ोन किया है? कुछ तो गड़बड़ है।”
” क्या यार शर्मिंदा मत करो। मैं तो हमेशा कॉल करना चाहता हूँ,मिलना चाहता हूँ पर जानती तो हो वक्त की कितनी कमी है।”
“जानती हूँ तभी तो मैं भी सुबह शाम फोन कर कर के परेशान नही करती। वरना मन तो मेरा भी करता है कि मैं अपने क्यूट बेबी से रोज़ पूंछू ” मेरे शोना बाबू ने खाना खाया!”
” ओह्ह रियली ! तुम्हें ऐसा बोलना अच्छा लगता है?”
” ऑफकोर्स ! गलत क्या है इसमें। इट्स क्यूट यार। अब आजकल सोशल मीडिया पे बाबू शोना का मज़ाक उड़ाने का ट्रेंड चल रहा है, जिसे देखो वही “बाबू शोना ” जोक्स बना रहा मीम्स बना रहा, इसका मतलब ये थोड़े न हो गया कि मुझे अच्छा नही लगता। और एक मज़े की बात ये जो लोग आज ऐसी बातों का मज़ाक बनाने वाले ही कभी खुद ऐसी बातें करते रहें होंगे। खैर वो छोड़िए मंत्री जी आप बताइए कैसे फ़ोन किया ?”
” मिलना था तुमसे।”


” अरे वाह! तो आ जाइये फिर !”
” अभी तो हॉस्पिटल में होंगी ना?”
” हॉं ! बस दस मिनट में वापस निकलूंगी। किसी कॉफी शॉप में मिल लें।”
” न न ! अकेले मिलना है। तुम्हारे रूम पर आ जाऊँ?”
” बड़े शरारती हो रहें हैं आप। क्या बात है?”
” बस वही, जो तुम समझ रही हो।”
” आज कॉफी शॉप पे मिल लेतें हैं। बहुत दिन से साथ में कोल्ड कॉफी नही पी।”
“मतलब तुम नही चाहती कि मैं तुम्हारे रूम पर आऊं?”
“अरे नही बाबा! ऐसा कुछ नही है, चलिए ठीक है रूम पर ही आ जाइये। कब तक आएंगे।
” दस मिनट में पहुंचता हूँ। आज ज़रा फ्री हूं तो सोचा तुम से ज़रा अच्छे से मिल लिया जाए।
” दस मिनट बस ! नही रुकिए , आप बीस मिनट में आइये। तब तक मैं भी पहुंच जाऊंगी। “
” अरे मैं तुम्हें लेता हुआ चलता हूँ ना। क्या प्रॉब्लम है? “ओके!”
   पिया ने तुरंत फ़ोन रखने के बाद अपनी काम वाली दीदी को फ़ोन लगाया। वो चार दिन से नदारद थी। पिया के अस्पताल की सीनियर डॉक्टर छुट्टी पर गयी थीं, इसी से अस्पताल में भी भारी मगजमारी हो रही थी। और घर की साफ सफाई नही हो पा रही थी।
छोटा सा फ्लैट था। चार दिन से वो खुद बर्तन ज्यादा न निकलें इसलिए कभी मैगी तो कभी सैंडविच पर गुज़ारा कर रही थी। और चारो दिन के बर्तन सिंक पर पड़े अपनी किस्मत को रो रहे थे।
   घर के कामों से उसे वैसे भी मौत आती थी। उसकी मेड ही सुबह उसका बिस्तर ठीक करने से लेकर साफसफाई बर्तन खाना बनाना सब किया करती थीं।
  पिया को घबराहट सी होने लगी। समर ऐसे उसके साथ गया तो उसका कबाड़ घर देख कर क्या सोचेगा? उसे लगेगा छि कितनी गंदी है। जब घर सही नही रख सकती तो शादी क्या निभाएगी।
   मेड को दो बार पूरी रिंग देने पर भी उस नामुराद ने फ़ोन नही उठाया।
  गिरती पड़ती पिया अपना एप्रन उठाये वहाँ से घर के लिए भागी…
   उसका फ्लैट दो गलियों के बाद ही था, वैसे वो कई बार पैदल ही आ जाया करती थी पर अधिकतर स्कूटी से ही आती थी। आज स्कूटी भी उसकी सामने रहने वाली आँटी का बेटा मांग कर ले गया था।
    जान हथेली पर लेकर वो मरती पड़ती अपने फ्लैट की तरफ भागी। जाते जाते ही उसने समर को मैसेज कर दिया कि एक केस आ गया है, आधा घंटा लगेगा।
   भाग कर वो घर पहुंची, दरवाज़ा खोलते ही उसका सिर घूम गया।
   दो दिन के धुले कपड़े सामने काउच पर अंबार लगाए पड़े थे। सामने टेबल पर एक तरफ किताबें, न्यूजपेपर्स,  चिप्स के पैकेट्स, कुछ अधखुली बिस्किट्स के रैपर, कोल्ड ड्रिंक्स के कैन पड़े हुए थे।

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    उसे भी तो अजीबोग़रीब शौक थे। सुबह उठ कर उसे रनिंग भी करनी होती थी लेकिन रातों को उल्लू के समान जाग कर टीवी पर आंखें भी फोड़नी होती थी। और मूवीज़ के साथ उसके मुहँ कान चलते ही रहते थे।  फटाफट खुद पर बड़बड़ाती पिया इधर उधर फैला कबाड़ समेटने में लग गयी कि उसका फ़ोन बजने लगा….-” मैनूं डर जेहा लगदा ए, दिल टूट न जाये वेचारा।” उसने तुरंत कॉल लिया और स्पीकर में डाल दिया।
  ” क्या कर रही थी मेरी बच्ची?”
” मम्मी घर साफ कर रही थी यार, प्लीज़ अभी फ़ोन रखो बिज़ी हूँ।”
” हैं ? तू घर साफ कर रही थी? झूठ मत बोल!”
” सच्ची कह रही हूँ मम्मी।”
” सुन सुन फ़ोन न रखियो ,मैं वीडियो कॉल ट्रांसफर कर रही हूँ। एक बार न तुझे घर साफ करते देखने की बड़ी तमन्ना है।”
” हद करते हो यार मम्मी आप? दुनिया की कौन सी माँ होगी जो अपनी बच्ची को काम करते देख खुश होती है?”
” बेटा जी। ये हम माओं से पूछो, हर माँ के कलेजे में ठंडक पड़ जाती है जब उसकी बेटी अपने हाथ से पानी लेकर पीती है। सच्ची स्वर्ग का सुख मिल जाता है।”
” ओह्ह मेरी फेकता भरपूर माँ! अपने डायलॉग अपने पास संभाले रखो और मुझे काम करने दो।”
” पर ये तो बता आज सूरज पश्चिम से निकला क्या जो तू साफ सफाई में लगी है।अच्छा अब समझी पक्का समर आने वाला होगा मिलने।”
   पिया अपनी जीभ काट कर रह गयी। ये मम्मी हर बात समझ कैसे जाती है।
” अच्छा सुन तू अपना काम निपटा ले , और सिर्फ हॉल की सफाई करके छोड़ न दियो, अपना कमरा रसोई और बाथ रूम भी साफ कर लेना।”
अब यार ये मम्मी ने अलग ही पेंच डाल दिया। अब बाथरूम साफ करने की क्या ज़रूरत?
   इतनी सारी सफाई के बाद उसे खुद भी तैयार होना था और वापस अस्पताल भागना था, जिससे समर के साथ फ्लैट पर वापस आये तो समर भी उसका चमकीला घर देख कर खुश हो जाये, लेकिन अभी तो हॉल भी साफ नही हो पाया था। वो धड़ाधड़ हाथ चला रही थी कि दरवाज़े पर बेल बज गयी और उसका दिल धक से रह गया।
    ” नहीईईई ….  उसे सरप्राइज देने के लिए कहीं मंत्री जी अस्पताल में पता करके उसे ढूंढते यहाँ तो नही चले आये।
   हे भगवान! ऐसे फ़िज़ूल स्यापे उसी की किस्मत में क्यों लिखें हैं।।।
    अब इतना तबाहो बर्बाद घर देख कर समर के दिल का रोमांस हवा न हो जाये।
  वो सोच ही रही थी कि वापस कॉल बेल बज गयी….

क्रमशः

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aparna

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दिल से ……

       कैसे है आप सब दोस्तों!!
  
   कल हमारे  समाज की अंताक्षरी प्रतियोगिता में भाग लेने का मौका मिला। और क्या कहूँ इतना मज़ा आया।
    गानों के साथ वैसे भी मेरा कनेक्शन बड़ा पक्का है। बॉलीवुड तो लगता है मेरे खून में घुला है।
    हमारी पांच लोगों की टीम थी, खूब धमाल हुआ खूब मस्ती की। कुल जमा 17 टीम्स थी। एक से एक धुरंधर पुराने गानों के सुर सम्राट टाइप।
  लेकिन  हम दूसरी पोजीशन के साथ जीत गए। इक्कीस सौ रुपये हमने जीते। और सासु माँ ने सभी के सामने बड़े लाड़ से प्यार भरा आशीर्वाद दिया। मौसी सास और मामी सासों ने आकर गले से ही लगा लिया।
    ज़माना बदल गया है भाई, अब बहु को रोटी बनानी न भी आये तो सासु जी बड़े प्यार से सम्भाल लेती हैं। अरे बेचारी को किताबों से फुर्सत मिलती तब तो रोटी बेलना सीखती।
   न ऐसा नही है कि कुछ नही आता।
   लेकिन जिन चीजों पर मास्टरी है वो किसी काम की नही हैं।

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    मेरे साथ अक्सर होता है कि जब तक मैं रसोई पर खड़ी उबलते दूध पर नज़र रखी होतीं हूँ, सीधे सादे बच्चे सा चुपचाप पड़ा रहता है। और जैसे ही फोन की बीप सुन बाहर निकलती हूँ, कमबख्त सुनामी से टक्कर लेता उफान मार मार के गिर पड़ता है।
    क्या आपके साथ भी होता है?

  चलिये जल्दी ही मिलतें है कहानी के अगले भाग के साथ तब तक पढ़ते रहिये ….
 
   मैंने किसी ज़माने में एक फ़िज़ूल सी हॉरर भी लिखी थी ” थैंक यू” अगर आप लोग चाहे तो वो भी पलट सकतें हैं। ( उनके लिए जो मुझसे हॉरर लिखने की गुज़ारिश करतें हैं)

   आपके ढेर सारे प्यार, समीक्षा स्टिकर्स के लिए दिल से आभार , शुक्रिया नवाज़िश

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aparna ….


    

शादी.कॉम – 26

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शादी डॉट कॉम-26


      
     “मल्टीनेशनल बैन्क्स की तर्ज पर खालिस देसी बैंक भी अपने कर्मचारियों को इस तरह की पार्टी और आयोजन का झुनझुना पकड़ा कर अत्यधिक परिश्रम  कार्य से होने वाली  मानसिक और शारीरिक थकान को दूर करने का सरल उपाय सिखाने की आड़ में उन पर क्षमता से अधिक कार्य थोप रहे हैं,” उस विषय पर प्रस्तावित अन्तिम दिन की कार्यशाला में सारे आयोजन उसी हिसाब से रखे गये थे।।

   पांचवे दिन के ट्रेनिंग सेशन के अंत में सभी की डिनर की व्यवस्था पास के ही एक फाईव स्टार होटल  में की गयी थी,हल्की फुल्की साज सज्जा के साथ ही बैंक कर्मियों में से कुछ एक द्वारा गीत संगीत पेश करने की भी तैयारी थी,इसके अलावा सवेरे के विषय को अनुपूरक करने कुछ एक छोटे मोटे सहभागिता गेम्स का भी आयोजन किया गया था।।
ये पार्टी पूरी तरह से पारिवारिक थी जिसमे कर्मचारी चाहें तो अपने परिवार को भी लेकर आ सकते थे।

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     तीसरे दिन के अपने सेशन के बाद लंच किये बिना ही राजा जो गया था वो चौथे दिन भी बांसुरी को नही दिखा था,ये कैसा बदला ले रहा था वो,जब तक लिस्ट मे बांसुरी का नाम नही था वो मौजूद था और उसका नाम जोड़ने के बाद खुद गायब हो गया था।।
     पर अन्तिम दिन सारी टीम की उपस्थिति अनिवार्य थी,इसीसे बांसुरी को उम्मीद थी,कि आज तो वो आयेगा और हुआ भी वही,राजा आ गया।।

     ऐश ग्रे साड़ी में धागे से बने गुलाबी बूटे बहुत सुंदर लग रहे थे,और उस साड़ी में संवरी बांसुरी भी।।
    माला और बांसुरी साथ ही बैठे थे कि माईक हाथ में लिये सिद्धार्थ ने गाना शुरु कर दिया

        कब कहाँ सब खो गयी
      जितनी भी थी परछाईयाँ
      उठ गयी यारों की महफ़िल
         हो गयी तन्हाईयाँ
       क्या किया शायद कोई
         पर्दा गिराया आपने

      दर्द-ए-दिल, दर्द-ए-जिगर
         दिल में जगाया आपने……….

  हर एक अंतरे पर बांसुरी को निहारता सिद्धार्थ बडे लय में अंदाज में  गा रहा था…..
    बांसुरी सोच ही रही थी कि अच्छा है राजा नही है,वरना सिद्धार्थ की इस बेशर्मी पर जाने उसके बारे में क्या कुछ सोच बैठता,अभी ऐसा सोच के उसने अपने बालों को पीछे किया ही था कि उसके पीछे थोड़ा हट के एक टेबल से टिक के खड़े राजा पर उसकी नज़र पड़ गयी।।
      गहरे ग्रे रंग की शर्ट और काली पैंट में खड़े राजा पर से उसकी आंखें एकाएक हट नही पायीं।।
     तब तक में राजा ने भी उसे देख लिया लेकिन तुरंत ही दुसरी तरफ मुहँ फेर किसी से बातों मे लग गया।।

      पहले दूसरे दिन तो ऐसी निर्लिप्तता नही दिखा रहा था,अचानक ऐसा क्या हो गया ….
     आज अन्तिम दिन था,आज के बाद राजा वापस चला जायेगा,आज ही का दिन है और यही कुछ पलछिन जिनमें वो अपनी बिगडी बना सकती है,पर क्या करे?? कैसे कहे?? कि राजा आज भी हमे फर्क नही पड़ता कि तुम बैंक अधिकारी हो गये!! तुम्हारी नौकरी लग गयी!!
    हमारे लिये तो आज भी तुम हमारे कानपुर के हमारी गलियों के वही राजा हो,कभी जिसकी ज़ुल्फों के साथ हमारी सांसे ऊपर नीचे होती थी।।

    अपनी सोच मे गुम बांसुरी को अचानक स्टेज की तरफ जाते राजा दिखा और तभी सिद्धार्थ ने राजा को गाने के लिये माईक थमा दिया,थोड़ी ना नुकुर के बाद राजा ने माईक संभाल लिया__


       बावरा मन राह ताके तरसे रे
      नैना भी मल्हार बन के बरसे रे
    आधे से अधूरे से, बिन तेरे हम हुए
    फीका लगे है मुझको सारा जहां
     बावरा मन राह ताके…

     ये कैसी ख़ुशी है, जो मोम सी है
    आँखों के रस्ते हँस के पिघलने लगी
      मन्नत के धागे, ऐसे हैं बाँधे
   टूटे ना रिश्ता जुड़ के तुझसे कभी
     सौ बलाएँ ले गया तू सर से रे
          नैना ये मल्हार…

गाने के प्रवाह में खोयी बांसुरी की नज़र राजा पर से हट ही नही पा रही थी,और वो था कि गाते समय उसने एक बार भी उसकी तरफ देखना ज़रूरी नही समझा।।

     डिनर के लिये कर्मियों के परिवारों का भी निमन्त्रण था,बहुत से कर्मचारी अपने बीवी बच्चों के साथ आये हुए थे।।
     
   राजा ने अपना गीत समाप्त किया और स्टेज पर से उतर ही रहा था कि उसकी नज़र सिद्धार्थ पर पड़ गयी और एक बार फिर उसके मुहँ मे एक कड़वाहट घुल गयी,सिद्धार्थ अपनी माँ को सबसे मिलवाते हुए बांसुरी की तरफ ही बढ रहा था।
     दक्षिण भारतीय पोचमपल्ली साड़ी में एक साधारण सा जूड़ा बनाई हुई सिद्धार्थ की माँ चेहरे से ही बेहद सुलझी हुई समझदार गृहिणी लग रही थी, अकेले ही ज़माने की ठोकरें खाती बेटे की अकेले परवरिश ने उनके चेहरे को एक दिव्य तेज़ से रंग दिया था।।

     बांसुरी स्टेज के दूसरी तरफ अकेली ही खड़ी थी कि सिद्धार्थ वहाँ पहुंच गया__

सिद्धार्थ- बांसुरी इनसे मिलो,ये मेरी मॉम है,and mom she is bansuri ,I’ve already told u about her..

  सिद्धार्थ की माँ ने मुस्कुरा कर बांसुरी का अभिवादन किया कि अपने उत्तर भारतीय संस्कारों में लिपटी बांसुरी ने झट आगे बढ कर उनके पैर छू लिये।।
     बांसुरी का लपक के इस तरह पैर छूना उन्हें मोहित कर गया,उन्होँने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया,अपनी टूटी फूटी अन्ग्रेजी मिश्रित हिन्दी में उन्होनें अगले दिन सुबह के सह्भोज पर उसे भी आमन्त्रित कर लिया।।

    अगले दिन महीने का दूसरा शनिवार होने से बैंक की छुट्टी थी,इसीसे टीम की वापसी के पहले जितने लोग आज रात की फ्लाईट से नही वापस हो रहे थे उन सब को बड़े इसरार के साथ सिद्धार्थ ने अपने घर सुबह के खाने पर बुला लिया था।।
      राजा ने सिद्धार्थ के आग्रह को सिरे से नकार कर अपने आने की असमर्थता प्रकट कर दी थी।।
     कभी किसी आयोजन का हिस्सा ना बनने वाली सिद्धार्थ की माँ एक तरह से टीम को स्वयं आमंत्रण देने ही आयी थी।।

    बांसुरी से जब तक उनकी बातें होती रही,राजा उन्हें  ही देखता रहा,पर जब उसने देखा की वो बांसुरी को साथ लिये उसी की तरफ आ रही हैं, तो वो एकाएक पलट कर दूसरी ओर देखने लगा।।

    ” हेलो ,कैसे हैं आप??”

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  राजा- जी नमस्कार!!! मैं ठीक हूँ,आप कैसी हैं।

” देखिए आप हमारे घर आये बिना नही जा सकते, मैं स्पेशली आप को इन्वाईट करने ही यहाँ  तक आयी हूँ ,कल का लंच आपको हमारे घर पर ही लेना है।”
    पता नही ये उनका स्नेह भरा आग्रह था या आश्चर्यजनक रूप से उनके व्यक्तित्व की अम्मा से समानता पर उस भद्र महिला के आग्रह को फिर राजा ठुकरा नही पाया, आखिर उसने भी झुक कर उनके पैर छू ही लिये।।

   तभी माला हाथ में स्टार्टर की प्लेट थामे वहाँ चली आयी,चार लोगों के बीच अकेली प्लेट पकड़ी खड़ी खुद को देख उसे अपनी भूल का आभास हुआ,और उसने अपनी प्लेट राजा की तरफ बढ़ा दी__

” सर लिजिये ना,आप कुछ ले ही नही रहे।”

” आप इतने प्यार से देंगी तो कोई लेने से कैसे मना कर सकता है।”
   बांसुरी एक बार फिर बुझ के रह गयी,आखिर हुआ क्या है राजा को।।

    पर बांसुरी को अब हर पल यही लग रहा था कि कैसे भी करके इस गलतफहमी को दूर करना ही पड़ेगा,चाहे इसके लिये उसे किसी भी हद तक जाना पड़े ।।

    माला ने उसी समय माईक बांसुरी के हाथ थमा दिया,बहुत सहम के आखिर उसने गाना शुरु किया

    मैं कागज़ की कश्ती, तू बारिश का पानी
           ऐसा है तुझसे अब ये रिश्ता मेरा
          तू है तो मैं हूँ, तू आए तो बह लूँ
            आधी है दुनिया मेरी तेरे बिना
           जी उठी सौ बार तुझपे मर के रे
                 नैना भी मल्हार…

बांसुरी ने बहुत मन से राजा के गाये हुए गाने को ही आगे बढ़ाया,पर उसके गीत को समाप्त करते में राजा वहाँ से जा चुका था।।

     राजा के जाने के बाद फिर बांसुरी का मन भी उस पार्टी से उचाट हो गया,जैसे तैसे समय काटती आखिर वो भी सर दर्द का बहाना बनाये वहाँ से निकल पड़ी ।।

  पार्टी हॉल में नेटवर्क ना होने से कैब बुक नही हो पा रही थी,इसीसे पैदल मेन रोड पर आगे बढ़ती बांसुरी अपने मोबाइल पर सर झुकाये कैब बुक करने में ही लगी हुई थी__

” अरे सम्भल के,ऐसे चलोगी तो गिर पड़ोगी!!

   राजा की आवाज़ सुन बांसुरी ने झटके से ऊपर देखा,सामने से उसीकी तरफ आते राजा को देख उसका चेहरा खिल उठा__

बांसुरी– ऐसे बीच में पार्टी छोड़ कर कहाँ निकल गये।।

राजा– बहुत बेचैनी सी लगने लगी थी अन्दर, इसिलिए बाहर खुली हवा में सांस लेने निकल गया।

राजा– तुम यहाँ कैसे?? पार्टी तो अभी चल ही रही होगी।।

बांसुरी– हाँ हमें भी थोड़ा अच्छा सा नही लग रहा था,इतनी भीड़ भाड़,हल्ला गुल्ला रास नही आ रहा था।तुमने खाना खाया राजा ??

राजा — खा लेंगे….तुम्हें अचानक हमारी फिक्र कैसे होने लगी।।

बांसुरी– अरे ऐसे क्यों बात कर रहे ,,हम फिक्र नही करेंगे तो और कौन करेगा तुम्हारी??

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राजा — जो हमारे लिये बनी होगी वो करेगी।।

बांसुरी– अच्छा !!! कौन है वो ज़रा हम भी सुनें,तुमने बताया ही नही कि शादी के लिये लड़की भी ढूँढ लिये।।

राजा– हाँ जैसे तुमने तो मिलते साथ ही सब बता दिया।।

बांसुरी– क्या बोल रहे हो तुम?? हमे समझ नही आ रहा,कभी भी साफ साफ बोलने की आदत भी तो नही है तुम्हारी।।

राजा– जैसे तुम सब साफ साफ बोलती हो,जब इतनी ही सफाई है बातो में तो अब तक बताई काहे नही कि उससे शादी करने जा रही हो।।

बांसुरी– पगला गये हो क्या?? किससे शादी करने जा रहे हम??

राजा — बनो मत बांसुरी!! सिद्धार्थ ने हमे सब कुछ बता दिया है।।

बांसुरी– अरे बाबा क्या बता दिया उसने,,हमें भी तो बताओ।।

राजा– यही कि तुम दोनों शादी करने वाले हो।।

बांसुरी– पगला गये हो क्या तुम?? एक बात बोले चाहे तुम कितने बड़े ऑफीसर बन जाओ ,
रहोगे गधे के गधे ,,  उसने कहा और तुमने मान लिया,अरे एक बार हमसे पूछना तो था।।

राजा — सवाल पूछने और जवाब देने का कोई रस्ता पीछे छोड़ गयी थी क्या ,जो हम कुछ पूछ पाते।।

बांसुरी– तुमने भी तो आवाज़ नही दी पीछे से….क्या इतनी सी बात पे कोई ऐसा जीवन भर का बैर मोल लेता है।।कहते कहते बाँसुरी की आंखें भीग गयी

   राजा ने आगे बढ़कर बांसुरी के दोनो हाथ अपने हाथों में ले लिये एक हाथ से उसके बहते आँसूं पोंछ उसकी आंखों में झांकते हुए उसने कहा__

राजा– आज भी तुमसे उतना ही प्यार करते हैं बांसुरी, कभी भूल ही नही पाये तुम्हें ।।
हमारे अनपढ़ होने से हमे छोड़ गयी यही सोच सोच कर पागल हो गये,और तुम्हारे जाने के बाद पढ़ने की ऐसी लत लगी की पागलों के समान किताबों में  ही घुसे रहने लगे,किताबें ही जीवन हो गयी थी हमारे लिये…..तुम्हारे बिन सब कुछ कितना फीका हो गया था ,कितना बेरंग !! चाय भी अच्छी नही लगती थी, फिर भी पीते थे,सिर्फ और सिर्फ तुम्हें याद करने के लिये…..जिम छूट गया!! दोस्त छूट गये!! यहाँ तक की हमारी खुद की तबीयत हमसे रूठ गयी पर तुम नही छूटी,कितना याद किया ये कैसे बताएँ क्योंकि तुम तो हमारे अन्दर ही समा गयी थी,इस कदर हमसे जुड़ गयी थी कि सोते जागते दिमाग में एक ही नाम चलता था ….बांसुरी!!

   बांसुरी के आँसू रूकने के बजाय बहते चले जा रहे थे,और अब राजा के आँसू भी उसका साथ दे रहे थे।।

बांसुरी– तुम्हें क्या लगता है,हम यहाँ बहुत खुश थे,किसी से तुम्हारे बारे में पूछ नही पाते थे,प्रिंस प्रेम सबने हमसे बात करना बन्द कर दिया,यहाँ तक की निरमा ने भी,,बस बुआ की चिट्ठी में कभी कोई हाल तुम्हारा मिला तो मिला,वर्ना कुछ नही।।

राजा– एक बार फोन भी तो कर सकती थी ना, राजा जिंदा है या मर गया,जानने की भी इच्छा नही हुई तुम्हारी ।।

बांसुरी–तुम तो फिर भी अपने अम्मा बाऊजी के साथ थे युवराज भैय्या के साथ थे,,हम तो यहाँ एकदम अकेले हो गये थे!! कभी तुम्हें नही लगा कि अकेले क्या कर रही कैसे जी रही एक बार फोन ही कर लूँ ।।
      कभी कहीं से गुजरते और तुम्हारे पर्फ्यूम की खुशबू आ जाती तो पागलों जैसे इधर से उधर भटकते फिरते,तुम्हें ढूंढते रहते थे,जबकि जानते थे की तुम यहाँ नही हो।।
     हमारे पागलपन की हद बताएँ राजा,तुम्हें हमेशा अपने पास महसूस करने के लिये लड़की होते हुए भी तुम्हारा जेंट्स पर्फ्यूम लगाते हैं,माला जाने कितनी बार इस बात पर हमारा मजाक भी बना चुकी है,पर हमे अपने कपडों से आने वाली तुम्हारी खुशबू ही भाती है ,क्या करें।।

     दोनो एक दूसरे का हाथ थामे एक दूसरे की आंखों में इतने सालों के अपने पलछिन देखते हुए सवाल जवाब में लगे थे कि अचानक राजा बांसुरी के चेहरे पे झुकने लगा__

बांसुरी– क्या कर रहे हो ये राजा ??

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राजा– उस शाम एक काम अधूरा रह गया था बंसी …… आज वही पूरा करने जा रहे …..

मुस्कुराते हुए बांसुरी ने राजा को पीछे धकेल दिया

बांसुरी– इतनी सारी शिकायतें जमा कर रखी है हमने,उन्हें सुनने की फुरसत नही है?? आये बड़े प्यार करने वाले….

राजा– कर लेना बाबा, शिकायतें भी कर लेना,,सब सुन लूंगा……
      राजा ने अपने दोनो हाथों में बड़े प्यार से बांसुरी का चेहरा पकड़ा और….
   ” पहले उस रात का हिसाब तो पूरा कर लेने दो।”

बांसुरी– नही ,पहले हमारी बात सुनो!! क्या कह रहे थे सिद्धार्थ सर ,मुझसे शादी करेंगे,हो चुकी तब तो।।तुमने कहा नही उनसे कि बांसुरी सिर्फ और सिर्फ राजा की है,और राजा से ही बांसुरी की शादी होगी।।

राजा– नही कहा!! लेकिन कल उनके घर जायेंगे ना तब कह देंगे,,अब खुश!!

बांसुरी– हाँ बहुत बहुत खुश ।।

राजा– तो फिर आओ इधर।

बांसुरी– कब से देख रहे हैं,घूम फिर के एक ही जगह तुम्हारा कांटा अटक जा रहा

राजा– इत्ते साल से इन्तजार भी तो किया है तुम्हारा बन्सी!!!
      मुस्कुराती हुई बांसुरी आगे बढ़ कर राजा के गले से लग गयी,और राजा उसके चेहरे पे झुकता चला गया।।

क्रमशः

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aparna..

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समिधा -33

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  समिधा – 33

       वरुण अपनी तैयारियों के लिए खाना निपटने के साथ ही भगिनी आश्रम की तरफ निकल गया।
  आश्रम की महिलाएं खाने बैठीं थी । वहाँ की वरिष्ठ महिलाओं की खाने की पारी थी। पारो और बाकी कम उम्र की लड़कियां और महिलाएं खाना परोस रहीं थीं।
  भोजन कक्ष के बाहर ही एक छोटा कमरा और था, जहाँ वरुण पहुंच कर बैठ गया था। वो उस आश्रम की देखभाल करने वाली पद्मजा दीदी का इंतज़ार करने लगा।
  वो जहाँ बैठा था वहाँ से लगी खिड़की से वो बड़े आराम से अंदर देख सकता था पर मारे संकोच के वो अंदर नही देख रहा था।
   भोजन कक्ष में उसी समय अंदर से पारोमिता एक साथ चार पांच गिलास में पानी ले आयी। पद्मजा दीदी के इशारे पर एक गिलास पानी बाहर बैठे वरुण के लिए भी वो लेती गयी।
   उसने वरुण की तरफ ध्यान से देखे बिना ही उसके सामने गिलास बढ़ा दिया। वरुण ने एक नज़र पारो को देख नज़रें नीचे की और गिलास की तरफ हाथ बढ़ा दिया।

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  पारो की कंपकपाती उंगलियों के ठीक ऊपर वरुण की तपती उंगलियां छू गयीं।
    दोनों के ही शरीर में उन उंगलियों से गुज़रती तरंगे बहती चली गईं।
  घबराहट में पारो के हाथ से गिलास छूट गया। और वो हड़बड़ाती  सी अंदर चली गयी। गिलास की आवाज़ पर खिड़की से कई जोड़ी आंखें उन दोनों की तरफ उठ गई होंगी यही सोच वरुण ने शर्मिंदा होकर गिलास उठाया और खिड़की पर रखने को हुआ कि उसकी नज़र अंदर कक्ष में बैठी औरतों पर चली गयी। कुछ दो एक  उसे अब भी देख रहीं थी बाकियों का ध्यान अपनी थालियों पर ही था।
   वरुण की न चाहते हुए भी नज़र उनकी थालियों पर चली गई। और उससे कुछ देर पहले का अपना खाया भोजन याद आ गया।
  मंदिर में वैसे भी तामसिक भोजन तो नहीं बनता था लेकिन मंदिर के आचार्य गुरुवर उनके लिए बनाए जाने वाले भोजन में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि उनकी थाली हर तरह के पोषक आहार से बनी हो।
   वरुण की थाली में  मिलने वाली भोज्य सामग्री यहां अंदर आश्रम की महिलाओं की थाली में से गायब थी।  वह कुछ क्षणों के लिए चौक गया क्योंकि उसे यह मालूम था कि आश्रम की यही महिलाएं एक साथ मिलजुल कर पूरे आश्रम का खाना तैयार करती हैं। तो फिर खाने में यह भेदभाव कैसे? वहां बैठी महिलाओं में  किसी की भी थाली संपूर्ण नहीं थी बल्कि सभी के थाली में जरा जरा सी खिचड़ी ही परोसी हुई नजर आ रही थी।
    वह अभी इस भेदभाव के बारे में सोच ही रहा था कि अंदर से पद्मजा दीदी बाहर निकल आई….-” जय श्री कृष्णा वरुण जी आइए बैठिए। “

” जय श्री कृष्णा दीदी कैसी हैं आप।”
” हम ठीक हैं आप बताइए हम लोगों के लायक क्या सेवा है? हमें भी जानकारी मिल चुकी है के आश्रम के कार्यक्रम के लिए श्री प्रबोध आचार्य जी का आना तय हो चुका है।”
” जी दीदी आपने सही कहा! मुझे भगिनी आश्रम के साज संभाल का काम दिया गया है। आप सभी के साथ मिलकर मुझे पूरे आश्रम परिसर में फूलों की सज्जा देखनी है। इसके साथ ही गोपाल जी के लिए भी पुष्प वस्त्रों का निर्माण करना है। यह काम भी आप सभी के सुपुर्द किया गया है।
   हवन की तैयारी के लिए भी आप में से कुछ दो चार महिलाओं की आवश्यकता होगी। क्योंकि लगभग 21 हवन वेदियाँ तैयार होंगी, जिनके चारों तरफ अल्पना बनानी होगी। इसके लिए आप अपने आश्रम में से चुनकर कुछ महिलाओं का एक समूह तैयार कर दीजिएगा। मेरा इस सब में यही कार्य है कि आप लोगों को अपने कामों के लिए जितनी वस्तुओं की आवश्यकता होगी, आप मुझे एक लिस्ट तैयार करके दे दीजिएगा। मैं सारी सामग्री आप लोगों तक पहुंचा दूंगा। इसके साथ ही बीच बीच में आकर मैं कार्य की रूपरेखा देखता रहूंगा वैसे अब हमारे पास सिर्फ दो दिन ही बचे हैं कल और परसो दो दिन में यह सारी तैयारियां हो जाए तो बहुत अच्छा है। “

” जी आप सही कह रहे हैं वरुण जी वैसे हमारे आश्रम में जितनी महिलाएं हैं सभी अल्पना बनाने में फूलों के वस्त्र बनाने में पारंगत हैं तो हम चुन कर दो अलग-अलग समूह तैयार कर देते हैं। जिससे सारे काम सही समय पर निपट जाए हम अभी सबका भोजन निपटते ही सब से बात करके किन वस्तुओं की आवश्यकता होगी इसकी सूची तैयार करके आपके कक्ष में भिजवा देंगे। “

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” नहीं ! नहीं ! आप यहां से किसे हमारे कक्ष में भेजेंगी। यहां तो सभी महिलाएं हैं। आप शाम तक तैयार करके रखें। आरती के बाद मैं खुद आकर आप से ले लूंगा। “

  पद्मजा दीदी ने मुस्कुराकर वरुण के सामने हाथ जोड़ दिये। उनकी मुस्कान के बावजूद वरुण नहीं मुस्कुरा पाया उसने एक नजर खिड़की से अंदर की ओर देखा। अब आश्रम की बाकी बची महिलाएं भोजन के लिए बैठ चुकी थी।
   यह इत्तेफाक था या ईश्वर की इच्छा कि वह जहां बैठा था वहां से ठीक सामने उसे पारो बैठी नजर आ रही थी। उसकी थाली में तो और भी कम खिचड़ी थी। मुश्किल से दो से तीन  निवालों का भोजन सामने रखे वह धीरे-धीरे एक-एक दाना चुग रही थी। जैसे अपने भोजन को निगलने से पहले वह उससे माफी मांग रही हो।
    वरुण का ह्रदय कसमसा कर रह गया उसने पद्मजा दीदी की तरफ देखा…-” अगर आप बुरा ना माने तो क्या मैं आपसे कुछ सवाल पूछ सकता हूं। “
” जी बिल्कुल पूछिए। “
” सारे मंदिर परिसर में यहां रहने वाले सभी लोगों का भोजन आप लोग ही तो बनाते हैं ना। “
” हां हम ही लोग यह भोजन बनाते हैं।
” तो क्या आश्रम में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग भोजन तैयार होता है। “
   पद्मजा दीदी एकाएक यह सवाल सुनकर चौन्क गयी क्योंकि आज तक यहां के किसी अन्य पुरुष ने उन लोगों के खाने के बारे में कभी कोई सवाल नही किया था।
” आप ऐसा सवाल क्यों पूछ रहे हैं वरुण जी?”
” मैं भी नहीं पूछता अगर मैं अपनी आंखों के सामने ऐसा होते नहीं देखता। मैं अभी कुछ देर पहले ही भोजन करके आया हूं और मेरी थाली मैं जो सब था वह यहां नहीं है। “
” आप इस सब में क्यों पड़ रहे हैं। जाने दीजिए यह सब बातें आपके विचार करने योग्य नहीं है!  बल्कि हम तो यह कहेंगे कि भगिनी आश्रम ही आप लोगों के विचार करने योग्य नहीं है! अब जैसा जीवन मिला है वैसा यहां की औरतें काट ही लेंगी।”
” आप उसी जीवन को काटने की बातें कह रही हैं जिस जीवन को उस मुरलीधर ने आपको दिया है।  आपका जीवन उनकी भेंट है जिसे आप इस तरह गंवा रही हैं। और कह रही हैं कि हम किसी भी तरीके से जीवन काट लेंगे। “
” यह बड़ी-बड़ी बातें यहां की इन मूर्ख औरतों की समझ से परे है वरुण जी। “
” यहां कोई मूर्ख नहीं है दीदी और ना ही यह बातें किसी के समझ से परे हैं । यहां सभी का जीवन अनमोल है। क्योंकि हम सब उस मुरलीधर के चरणों में पड़े हैं। हमारे जीवन का रचयिता वही है और जब तक उसने हमारी सांसे लिखी हैं हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम उन सांसो का सदुपयोग करें। अब बताइये की ये भेदभाव क्यों ?”
” किसी ने ये भेदभाव नही किया है वरुण जी। हम महिलाओं को खुद के लिए यही खिचड़ी रुचिकर लगती है, इसलिए हम यही बना लेतें हैं। समय भी कम लगता है।”
” तो हम सबके लिए भी खिचड़ी बनाया कीजिए। हमारे लिए तो रोटियां भी बन रही हैं सब्जी बन रही है दाल है चावल भी बनाए जा रहे हैं इतना सारा क्यों? और इन सब के बावजूद हमें सलाद मिठाई और दही भी दी जाती है। जबकि आप लोग सिर्फ खिचड़ी खा रही हैं उसके साथ  आपको न घी परोसा गया  और ना ही दही। यह तो गलत है ना दीदी। “
” वरुण जी ऐसा कुछ भी नहीं है कि कोई भी हमें रोक रहा है इन सब चीजों को खाने से।
  हम लोगों का ही जी नहीं करता इतना सब खाने का। “
” चलिए अच्छी बात है ।लेकिन हो सकता है यह आपका व्यक्तिगत विचार हो, क्या आपने यहां उपस्थित बाकी लोगों से इस बारे में पूछताछ की है कि क्या वह सारी महिलाएं भी सिर्फ खिचड़ी खा कर गुजारा करने को तैयार है। “
” जब घर परिवार पूरा समाज हम से मुंह मोड़ कर खड़ा हो जाता है ना तो एक पेड़ की छांव भी हमें बहुत ममतामई लगने लगती है । फिर यहाँ इस आश्रम में तो हमें रहने को एक छत दी हुई है। खाने को दो वक्त का भोजन मिल ही रहा है। तो क्या हम लोग अपनी तरफ से आश्रम का खर्चा बचाने के लिए इतना भी नहीं कर सकते कि जितना हो सके कम खाएं। हम किसी को भी अनशन करने नहीं कहते। लेकिन हमारा यह कहना है कि शरीर को चलाने के लिए जितना भोजन आवश्यक है उससे अधिक खाकर हमारे शरीर में सिर्फ अनावश्यक चर्बी ही जमेगी आलस्य ही पनपेगा।  तो इसलिए हम सब के लिए यही अच्छा है उचित मात्रा में उचित आहार का ही सेवन करें। “
  वरुण समझ गया था कि बात कुछ और थी और पद्मजा दीदी उसे नहीं बता रही थी। अंदर से किसी के बुलाने पर पद्मजा उठकर अंदर चली गई उसके जाते ही एक बुजुर्ग सी महिला रसोई की तरफ की दीवार की ओर से निकलकर वरुण के सामने चली गई…
” वह कभी सच नहीं बताएगी । वो ही क्या इस आश्रम की कोई भी महिला तुम्हें पूरा सच नहीं बताएगी। “
” लेकिन क्यों ऐसी क्या बात है जो मुझसे छुपाई जा रही है। “
” देख बेटा मैं बहुत बुजुर्ग हो चुकी हूं। अब जाने कितने दिन का मेरा जीवन शेष है। लेकिन इस आश्रम में बहुत समय से हूं। और यहां का सारा कारोबार देखती और समझती हूँ।
   यह लोग कहते हैं औरत का मन बहुत चंचल होता है।  पति के बिना रहती औरत जैसे तैसे करके खुद के मन को संभालने की कोशिश करती है अब ऐसे में अगर वह गरिष्ठ और तामसिक भोजन करेगी तो उसका मन चंचल होकर इधर-उधर भागने को करेगा और ऐसे में कुछ ऊंच-नीच हो गई तो आश्रम का नाम खराब होगा इसीलिए…
    जबकि सच्चाई इन बातों से बहुत अलग है। क्या नहीं होता यहाँ? जितने गहरे में जाओगे उतनी सच्चाइयां जानते जाओगे। अभी तो तुम्हें कुछ भी नही पता…”
” काकी आप वहाँ क्या कर रही हैं?” भीतर से पद्मजा की तीखी पुकार सुन वो वृद्धा कुछ बड़बड़ाती हुई वापस रसोई में घुस गई।
    वरुण उस वृद्धा से इतनी कड़वी सच्चाई सुनकर कांप उठा। यह कैसा न्याय था समाज का भी और आश्रम का भी।  यह लोग इन महिलाओं को क्यों इतना अलग समझते हैं। क्या इन महिलाओं के शरीर में वही रुधिर नहीं बहता जो बाकियों के शरीर में बहता है।
   और बाकी जो भी हो लेकिन अभी आने वाले श्री प्रबोधानन्द से वह इस बारे में बात करके रहेगा। लेकिन ऐसे सीधी प्रबोधानन्द से बात करने पर कहीं उदयचार्य जी नाराज ना हो जाए। तो इसलिए एक बार उसे उनके कान में भी यह बात डालनी पड़ेगी कि आश्रम में सभी के लिए एक समान व्यवस्था होनी चाहिए।
   जब यहां इस आश्रम में किसी भी तरह का जातिगत भेदभाव, रंग से जुड़ा भेदभाव, अमीरी गरीबी का भेदभाव नहीं देखा जा रहा तो महिला और पुरुष के बीच का भेदभाव क्यों इतना व्यापक रूप से पांव फैलाए बैठा है।
    वहीं महिलाएं जो आश्रम के पुरुषों के लिए इतनी तरह का भोजन बनाती हैं। अपने लिए क्यों फिर खिचड़ी बना लेती हैं। वो यही सोचते हुए आश्रम की तरफ की रसोई के सामने से होकर निकल रहा था तब उसकी नजर भीतर की तरफ पड़ी …. वहाँ आचार्यों के भोजन हो जाने के बाद रसोई में स्थित बड़े-बड़े बर्तनों में जो भोजन बना बचा रह गया  था। उसी भोजन को आपस में मिलाकर खिचड़ी का रूप दे दिया गया था। यानी असल बात तो यह थी कि आश्रम में मौजूद पुरुषों के भोजन कर लेने के बाद जो भी भोजन बच जाता उसमें कमीबेसी को सही करने के लिए वहां की वरिष्ठ महिलाएं उस सारे भोजन को एक साथ मिलाकर गर्म करके महिला आश्रम की औरतों को परोस दिया करती थी।
   वरुण की आंखें छलकने को थी, लेकिन उसने अपने आप को मजबूत कर लिया। पता नहीं केदारनाथ से लौटने के बाद उसके साथ क्या हुआ था, कि जब पाए तब उसकी आंखें छलक उठने को तैयार हो जाती थी। वह अपनी अति भावुकता पर शर्मिंदगी सी महसूस करने लगा था।
 
        वो तेज़ कदमों से आगे बढ़ गया। सामने से आते प्रशांत ने उसे असमंजस से देखा..-“क्या हुआ कुछ परेशान लग रहे हो?”
वरुण कुछ भी कहने की हालत में नही था , वो चुपचाप आगे बढ़ गया।
   प्रशांत किसी काम से दूसरी तरफ जा रहा था,वो वरुण के चेहरे का क्रोध देख उसके पीछे ही हो लिया। वरुण सीधे उदयाचार्य जी के कमरे में पहुंच गया लेकिन वो इस समय किसी बहुत ज़रूरी काम से कहीं बाहर गए हुए थे।
   कुछ देर वहीं बैठा वरुण कुछ सोचता रहा फिर वाटिका की तरफ निकल गया।

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***
  
   अगला दिन बीत गया, और तैयारियों में डूबा आश्रम बाकी सारी बातें बिसरा गया। यही हाल वरुण का हुआ। उस दिन भगिनी आश्रम का भोजन देख
जितनी तेजी से उसका खून जला था, उस खून का उबाल उतनी ही तेज़ी से अगले दिन बैठ भी गया। उसके ऊपर आश्रम की जिम्मेदारियां भी तो थी। उन्हीं सब व्यस्तताओं में वो इस बात को भूल कर रह गया।

   कार्यक्रम के ठीक एक दिन पहले सभी अतिथियों का आना शुरू हो चुका था। स्वामी प्रबोधानन्द जी भी अपने निर्धारित समय पर पहुंच गए।
   स्वामी जी को स्टेशन से आश्रम लेकर आने के लिए आश्रम की सबसे महंगी गाड़ी भेज दी गयी थी।
   प्रबोधानन्द जी के आसन के सामने ही कलश स्थापना होनी थी।
    वाटिका में पीछे बने सरोवर से शुद्ध जल के कलश मंगवाए गए थे।
सीधी सतर पंक्तियों में महिलाएं सिर पर जल से भरा कलश लिए हवन स्थल पर रखने जा रही थीं।
नियमों के अनुसार उन सभी को आकंठ सरोवर में डूब कर ही अपना कलश भरना था। और उन्हीं भीगे वस्त्रों में कलश स्थापित कर वो लोग अपने कमरों में जा सकती थीं।
      महिलाएं कलश रख कर स्वामी प्रबोधानन्द को प्रणाम कर एक तरफ खड़ी होती जा रहीं थीं। पारोमिता भी अपना कलश सिर पर उठाए धीमे कदमों से आगे बढ़ती गयी।
       जल से भीगे श्वेत वस्त्रों में सिर पर पानी का कलश रखे वो स्वर्ग से उतरी मेनका सी लग रही थी। प्रबोधानन्द वैसे तो हवन कुंड की बाकी तैयारियों को देख रहे थे लेकिन जैसे ही उनकी नज़रे पारो पर पड़ी वो चाह कर भी उस पर से अपनी आंखें नही हटा सके।
   पारो के कदमों के साथ साथ उनके हृदय का कंपन भी बढ़ता जा रहा था। माथे पर छलक आई बूंदों को उन्होंने पोंछ लिया।
   उसने ठीक उनके सामने आकर उन्हें प्रणाम किया तब जाकर उन्हें चेत आया और हाथ उठाकर उसे आशीर्वाद दे वो खुद पर लज्जित से दूसरी तरफ देखने लगे।
    पारो धीमे कदमों से अपनी साथियों की तरफ बढ़ गयी। और वहाँ से वो सारी साध्वियां आश्रम की तरफ बढ़ चलीं।
     वहीं खड़े वरुण की कनपटी पर जैसे कोई हथौड़े चलाने लगा था। उसके मन में आ रहा था कि वो उसी वक्त प्रबोधानन्द का गला दबा दे।
   उसकी कामातुर दृष्टि वरुण की आंखों से बच नही पायी थी।
   और उसे ये भी समझ आ गया था कि अब उसे यहाँ आश्रम में हर समय पारो की परछाई बन उसके आसपास रहना होगा।
     आश्रम में धूप गुग्गुल की खुशबू के बीच मंत्रोच्चार प्रारम्भ हो चुका था लेकिन इस सब के बीच अपने अशांत मन को साधने वरुण गोपाल जी की मूर्ति के सामने हाथ जोड़े खड़ा पारो के लिए खुशियों का वरदान मांग रहा था……

क्रमशः

   दिल से ….

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    समिधा सिर्फ एक कहानी है। मैंने समिधा शुरू करने से पहले ही कहा था कि एक अजीबोग़रीब प्रेम कहानी दिल में कुलबुला रही है। और मुझे यकीन नही था कि ये कहानी आप लोगों को पसन्द आएगी।
      
    आजकल लोगों का जीवन व्यस्त से व्यस्ततम होता जा रहा है और साथ ही लोगों की पसन्द भी बदलती जा रही है। थ्रिल इस शब्द ने हमारे समाज में तेज़ी से पांव पसारें हैं।
   और मैं जानती हूँ मेरी कहानियों में थ्रिल नही होता।

  समिधा  वैसे तो बिल्कुल ही सादी सी कहानी है लेकिन आगे कई ऐसे मोड़ आएंगे जिन्हें लिखने पर शायद आप लोग मेरे खिलाफ भी हो सकतें हैं।
   मेरी ये कहानी किसी भी धर्म विशेष, किसी आश्रम विशेष या किसी संत महात्मा का विरोध नही करती। कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। अगर आश्रम का कोई काला हिस्सा मैं लिखतीं हूँ तो ये पूरी तरह मेरी कल्पना की उपज है उसे किसी भी मंदिर ट्रस्ट आदि से जोड़ कर न देखें।
    जहाँ ढेर सारी अच्छाई हैं वहाँ कुछ बुराई भी पनप सकती है।
     इतना सारा मैं इस लिए समझा रही हूँ क्योंकि कई बार आप पाठक पढ़ते हुए नाराज़ भी हो जातें हैं। और आपकी नाराज़गी झेलने की हिम्मत नही है रे बाबा मुझमें।
     
    वैसे मैं हमेशा हल्की फुल्की कहानियां ही लिखती हूँ पता नही इस बार इतना भारी विषय कैसे रास आ गया लिखने को।

   चलिए मेरी पाती बड़ी होती जा रही है। अब लिखना बंद करती हूँ। जल्दी मिलेंगे कहानी के अगले भाग के साथ।
  तब तक पढ़ते रहिये….

(कृष्ण मंदिर या कृष्ण आश्रम का मैं उल्लेख कर रहीं हूँ लेकिन प्लीज़ इसे इस्कॉन ट्रस्ट से जोड़ कर ना देखें ।)

  aparna ….

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जीवनसाथी -123

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  जीवनसाथी -123

     अस्पताल से लौटने के बाद भी आदित्य को जाने क्यों इस बात पर यकीन नही हो रहा था कि वो बॉडी केसर की थी।
    वो बिना किसी से कहे चुपचाप अपने कमरे में चला गया। ये पूरा दिन महल के लिए कठिनता भरा रहा था। केसर का इस तरह महल से गायब होने के बाद उसकी लाश मिलने के साथ ही “मायानगरी” मेडिकल छात्रा की आत्महत्या ने भी महल को एकबारगी हिला कर रख दिया था।
   अपने कमरे में नाराज़ युवराज  विराज को बुला कर यूनिवर्सिटी के बारे में पूछताछ करना चाहता था। उनका और राजा का देखा सपना  ये तो नही था फिर कैसे उनकी बनाई यूनिवर्सिटी में ये सब हो रहा था। युवराज यही सोच रहा था कि यूनिवर्सिटी का पूरा दारोमदार विराज के कंधों पर सौंप कर उन्होंने और राजा ने सही किया या नही। उन्होंने सभी से कह कर अभी उस लड़की की आत्महत्या वाली बात राजा तक पहुंचने नही दी थी। 
 
        वैसे भी राजा की परेशानी के और भी कई कारण थे।

   युवराज ने किसी काम से समर को बुलाया और उसके बुलावे पर समर तुरंत चला आया।
   यूनिवर्सिटी सुसाइड केस पर कुछ देर बातचीत करने के बाद वो राजा के कमरे की तरफ चला गया।

    अगले दिन की रूपरेखा उसे बताने के बाद राजा से आराम करने कहा और खुद किसी बेहद ज़रूरी काम से निकलने लगा कि राजा ने उसे रोक लिया …-” सच सच बताओ समर ! तुम कहाँ व्यस्त हो? कल चुनाव के नतीजे भी आ रहें हैं। मैं जानता हूँ तुम्हारे दिमाग में कुछ न कुछ तो चल रहा है।”
  समर ने मुस्कुरा कर ना में सिर हिलाया..-” नही हुकुम अभी इस वक्त कुछ नही चल रहा है। बस कल सुबह हमें शहर ज़रा जल्दी निकलना होगा,वही सोच कर आपको आराम करने कह रहा था।”  

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   राजा ने समर को देखा वो उसे एक बार झुक कर प्रणाम कर बाहर निकल गया। राजा भी समझता था कि उसे जिताने को समर ने रात दिन एक कर रखा था।

****

अगली सुबह राजा समर के साथ निकल गया । युवराज आदित्य और प्रेम भी उनके साथ थे लेकिन विराज उन लोगों के साथ नहीं गया।
      परिणाम पहले ही सभी लोगों को पता था राजा और उसके साथ के लोग भारी मतों के साथ विजयी हुए थे।  पक्ष और विपक्ष दोनों ही राजा को अपनी और मिलाने के लिए आतुर थे और जिसके लिए उन लोगों की बात समर से चल भी रही थी।
    विराज ने वही किया जिसका समर को डर था।  विराज अपने दो लोगों के साथ राजा को छोड़ एक दूसरी पार्टी में जाकर मिल गया और अपना विश्वास मत उस पार्टी को सौंप दिया।
     राजा वैसे तो किसी भी पार्टी के साथ हाथ नहीं मिलाना चाहता था लेकिन उनमें से एक पार्टी ऐसी थी जिसे कुछ हद तक राजा सपोर्ट कर रहा था। यह बात अच्छे से जानते हुए भी विराज ने दूसरी पार्टी के पक्ष में जाकर अपना विश्वास मत प्रस्तुत कर दिया था।
     समर के द्वारा रखी शर्त कि राजा को मुख्यमंत्री बनाया जाए तभी राजा अपने लोगों के साथ उस पार्टी को अपना बहुमत देगा इस बात पर राजा ने सहमति नहीं जताई।
   समर में राजा को समझाने की कोशिश भी की। युवराज प्रेम सभी लोग समर की तरफ से राजा को समझाने खड़े हो गए….

” तुम समझ नहीं रहे हो कुमार तुम्हारा एक ऊंचे पद पर होना बहुत जरूरी है। अगर तुम मुख्यमंत्री बनते हो तो यह पूरा राज्य तुम्हारा होगा और तब तुम इस पूरे राज्य के लिए कार्य कर सकते हो। “

” मैं आपकी बात समझता हूं भाई साहब। लेकिन इस बार अगर मेरे लोग सिर्फ इतनी ही सीटों पर विजेता रहे हैं तो मुझे सिर्फ विधायक बन कर भी खुशी है। और मैं विधायक बनके भी अपने सारे कार्यों को अंजाम दे सकूंगा आप चिंता ना करें। “

” हमें चिंता तुम्हारे मिलने वाले पद की नहीं तुम्हारी कार्यक्षमता की है। अभी सिर्फ तुम एक शहर के लिए कार्य कर सकते हो लेकिन अगर तुम मुख्यमंत्री बनते हो तो तुम्हें पूरे राज्य के लिए कार्य करने का अवसर मिलेगा। तो तुम पांच सालों के लिए इस अवसर को क्यों गंवाना चाहते हो? यह हमारी समझ से परे है।”

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” भाई साहब मैं अपनी पार्टी छोड़कर और किसी की पार्टी में नहीं मिलना चाहता हूं। मुझे मुख्यमंत्री का पद तभी मिलेगा जब मैं अपने साथियों को लेकर उस पार्टी के साथ हाथ मिला लूँ। संभावना यह भी है कि वह लोग अभी हमें यह लालच दे कि वह मुझे मुख्यमंत्री का पद देंगे लेकिन अंदर ही अंदर वह लोग क्या तय करते हैं, यह हम अभी नहीं समझ सकते। राजनीति बहुत कठिन कार्य है यहां लोग हमारे सामने कुछ नजर आते हैं लेकिन हो कुछ और जाते हैं। इसलिए मैं मुझे जो पद मिल रहा है उसी में खुश हूं ,संतुष्ट हूं । हां पांच सालों में अपनी पार्टी पर इतना कार्य अवश्य करूंगा कि मेरी पार्टी इतनी बड़ी हो जाए कि मैं अपनी जीत के बलबूते किसी और के विधायक चुराए बिना मुख्यमंत्री पद पर काम कर सकूं। “

” जैसी तुम्हारी मर्जी कुमार! वैसे हमें हमारे छोटे भाई पर बेहद गर्व है और हमें पूरा विश्वास है कि इन पांच सालों में तुम अपनी मेहनत से वह पद पा ही लोगे जिसके तुम हकदार हो। “

     भवन का कार्यक्रम शुरु हो चुका था स्पीकर के आते ही सभी अपनी अपनी जगह पर खड़े गए।
  राज दल पार्टी और जन जागरण पार्टी में कड़ी टक्कर थी। दोनों में से किसी भी पार्टी ने इतनी बड़ी जीत हासिल नहीं की थी कि उनमें से चुनकर मुख्यमंत्री का पद दिया जा सके। सारा दारोमदार राजा की पार्टी पर था।
    माननीय स्पीकर महोदय ने भी राजा की पार्टी से सवाल किया कि वह अपने जीते हुए लोगों को लेकर किस पार्टी का सहयोग करना चाहते हैं? और किस पार्टी को सहमति देते हैं?
   अब तक राजा युवराज प्रेम विराज आदि बाकी लोगों को यही लग रहा था कि समर की बात राज दल पार्टी से चल रही है।
    और सिर्फ राजा की खिलाफत करने के लिए ही विराज ने जन जागरण पार्टी के साथ हाथ मिला लिया था। राजा के कुल जीते हुए लोगों में से विराज दो लोगों को लेकर जन जागरण दल से हाथ मिला चुका था।
  स्पिकर महोदय के कहने पर कि किसी एक पार्टी से ही नेता चुना जाएगा आप सभी आपस में मिलकर यह निर्णय ले लीजिए।
   दोनों पार्टी के लोगों के आरोप प्रत्यारोप शुरू हो गए। लेकिन इसी सबके बीच कुछ ऐसा हुआ कि वहां उपस्थित सभी लोगों की आंखें फटी की फटी रह गई।
  जन जागरण पार्टी के जीते हुए लोग एक-एक करके राजा की पार्टी की तरफ आने लग गए। यह देखकर राज दल पार्टी वाले भी चौक कर रह गए।
  यहां तक कि जन जागरण दल के मुखिया राजेश्वर सिंह भी इस बात से अनजान थे, कि उनके ही दल के लोग राजा की टीम से जाकर हाथ  मिला रहे हैं।
    कुछ दस मिनट ही बीते होंगे कि अब उस सभागार का सीन बदल चुका था। जहां पहले दो मुख्य दल जन जागरण पार्टी और राज दल प्रमुखता से एक दूसरे के सामने खड़े थे। और राजा की पार्टी एक छोटी सहयोगी पार्टी के रूप में नजर आ रही थी। वही जन जागरण दल के लगभग 80% लोगों के राजा की पार्टी में आकर मिल जाने से राजा की पार्टी अपने आप वहां सबसे बड़ी और प्रमुख पार्टी के रूप में नजर आने लग गई थी।
    इस बारे में राजा अजातशत्रु को स्वयं कोई खबर नहीं थी उन्होंने आश्चर्य से समर की तरफ देखा समर होंठो ही होठों में धीमे से मुस्कुराता स्पीकर महोदय की तरफ मुंह करके खड़ा हो गया। उसने उनसे कुछ कहने की आंखों ही आंखों में इजाजत मांगी।
  स्पीकर महोदय की सहमति मिलते ही समर ने अपनी बात रखनी शुरू की…-” जैसा कि आप सभी जानते हैं बहुमत मिलने वाली पार्टी ही विजेता पार्टी होती है। और फिर उस पार्टी में से चुना गया नेता मुख्यमंत्री का पद संभालता है । वैसा ही कुछ अभी इस सभा भवन में देखने को मिल रहा है। अब तक दो विजेता पार्टियों में से एक पार्टी जन जागरण दल के 80% लोग राजा अजातशत्रु सा  की पार्टी का समर्थन करने चले आए हैं। और अब इस प्रकार यहां मौजूद सभी राजनीतिक पार्टियों में राजा अजातशत्रु सिंह की पार्टी सबसे अधिक बहुमत के साथ बनी विजेता पार्टी के रूप में उभर कर आ रही है। तो अब ऐसे में स्पीकर महोदय से प्रार्थना है कि कि वह एक बार फिर अपने शब्दों में विजेता पार्टी का नाम संबोधित करें। “

   सुबह से चल रहा वहां का सारा फसाद एकाएक शांत हो गया सबके देखते ही देखते सारा सब बदल गया।
     राजा अजातशत्रु की वह छोटी सी पार्टी जिस में से कुल 11- 12 लोग ही चुनाव में खड़े हुए थे। हालांकि ये और बात थी कि निर्विवाद रूप से यह सभी खड़े हुए प्रत्याशी भारी बहुमत से विजेता हुए थे । लेकिन यह पार्टी इतनी छोटी थी कि किसी अन्य पार्टी को सपोर्ट करके ही अपना पद विधानसभा में पा सकती थी।
     पहली बार शायद इतिहास में ऐसी कोई घटना घटी थी कि एक सहयोग कर सकने वाली छोटी पार्टी में अचानक से बड़ी पार्टी के इतने सारे विजई प्रत्याशी शामिल होकर उस छोटी पार्टी को एक बड़ी पार्टी में रूपांतरित कर गए थे।
     जन जागरण दल के मुखिया के पास अब कोई चारा नहीं बचा था। गिने-चुने प्रत्याशियों के साथ वह सरकार बनाने में असमर्थ थे। और अगर वह अपने इन गिने  चुने प्रत्याशियों को लेकर राजा के खिलाफ जाकर राज दल पार्टी से हाथ भी मिला लेते, तब भी यह जाहिर था की राजा की पार्टी ही सरकार बनाती और ऐसी स्थिति में अपने दुश्मन टीम के साथ हाथ मिलाकर विपक्ष में बैठने का कोई खास लाभ नहीं था।
   जन जागरण दल के नेता राजेश्वर सिंह जी के चेहरे का रंग उड़ चुका था । लेकिन वह जानते थे कि अब उनके पास राजा को पूरी तरह से समर्थन देने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था। क्योंकि राजा से हाथ मिलाने का मतलब था सरकार बनाना और अगर सरकार बनती है तो भले ही मुख्यमंत्री का पद ना मिले लेकिन कैबिनेट में कोई एक सशक्त पद के दावेदार तो वह बन ही सकते थे। इतनी तो उम्मीद वो राजा अजातशत्रु से कर ही सकते थे। हालांकि उनके मंत्री यानी समर पर उन्हें अब रत्ती भर भी भरोसा नहीं रह गया था।
    उन्हें कितने दिनों में कभी भी समर पर जरा सा भी अविश्वास नहीं हुआ था। वह लड़का जो बार-बार उन्हें यह आश्वासन दे रहा था कि राजा अजातशत्रु अपनी टीम के साथ उन्हें ही सहयोग और समर्थन देंगे बस बदले में उन्हें राजा अजातशत्रु को मुख्यमंत्री का पद देना होगा।
    वह आज तक समर को कम उम्र का अनुभवहीन लड़का समझ कर उसके ऊपर रौब ऐंठते आ रहे थे। उसका फोन रखने के बाद अक्सर वह अपने चमचों के सामने समर का मजाक उड़ाया करते थे, कि बताओ सिर्फ दस  लोगों की जीती हुई टीम को लेकर यह लड़का अपने राजा साहब को मुख्यमंत्री बनाने के सपने देख रहा है।
    उसका इस तरह मजाक उड़ाते समय उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि यह लड़का अचानक इस सभा भवन में इस ढंग से उनका मजाक बना जाएगा। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनकी नाक के नीचे से उनके इतने सारे विधायकों को यह लड़का इस तरह ले उड़ेगा।
    सभी तरफ से निरुपाय हो उन्होंने अपने बाकी बचे प्रत्याशियों के साथ जाकर राजा अजातशत्रु से हाथ मिला लिया।


   
       भारी जोश खरोश से और भारी बहुमत से राजा अजातशत्रु की पार्टी विजेता घोषित कर दी गई। यह ऐलान होते ही कि राजा अजातशत्रु की टीम सरकार बनाएगी बाहर खड़े उनके समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। टीवी पर अलग-अलग चैनलों में दो दिन से चलती वाद विवाद की लहर एकाएक उस समय थम कर रह गई जब एक छोटी और नई बनी राजा अजातशत्रु की पार्टी को सरकार बनाने के लिए मौका दिया गया।
     जहां एक तरफ लोग राजा अजातशत्रु की भलमनसाहत के किस्से गा रहे थे, तो वही कुछ उनके विरोध में भी बोल रहे थे कि उन्होंने अपने राजा होने का लाभ उठाते हुए खूब रुपए पैसे देकर जन जागरण दल के लोगों को अपनी तरफ मिला लिया। लोगों के बोलने से ना समर का कुछ बिगड़ना था और ना राजा अजातशत्रु का।

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     वैसे तो विजेता दल का चुनाव होने के बाद सरकार बनाने को लेकर विजेता दल को समय दिया जाता है। लेकिन यहां पर राजा अजातशत्रु के दल में इतना उत्साह था कि निर्विवाद रूप से वहां उसी समय राजा अजातशत्रु को भावी मुख्यमंत्री के पद के लिए चुन लिया गया।
      अब यह पार्टी उनकी थी आलाकमान भी वह स्वयं थे और मुख्यमंत्री के दावेदार भी।
    स्पीकर महोदय के द्वारा राजा अजातशत्रु को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करते ही पूरे सभा भवन में करतल ध्वनि गूंज उठी। राजा अजातशत्रु का प्रभाव ही ऐसा था कि विपक्षी टीम के भी सारे सदस्यों ने टेबल बजाकर राजा अजातशत्रु के मुख्यमंत्री पद को स्वीकारने के लिए सहमति जताई।
    स्पीकर महोदय द्वारा राजा अजातशत्रु को एक हफ्ते का समय दिया गया। जिसमें राजा अजातशत्रु अपनी कैबिनेट के मंत्रियों का चुनाव कर सकें। लगभग हफ्ते भर बाद की तारीख शपथ ग्रहण के लिए सुनिश्चित करने के बाद सभा स्थगित कर दी गई।

    इस सारे हो हल्ले में पूरा दिन निकल गया। सभा विसर्जित होने के बावजूद राजा अजातशत्रु से व्यक्तिगत रूप से मिलकर सभी उन्हें बधाइयां देने में लगे रहे बधाइयों का भार ग्रहण करते-करते राजा अजातशत्रु थक कर चूर होने लगे थे।
   शाम ढल चुकी थी। और उन सभी को अभी महल पहुंचने में घंटे भर का और समय लगना था। विराज एक बार फिर मुंह की खा चुका था उसने जो सोचा उसका बिल्कुल उलट हुआ था।
   उसने सोचा था वो राजा अजातशत्रु के विपरीत जाकर उस पार्टी से हाथ मिलाएगा जिससे राजा अजातशत्रु का बैर है लेकिन उसे नहीं मालूम था कि यह बैर सिर्फ उसे दिखाने के लिए ही समर ने रचा था असल में अंदरूनी तौर पर समर पहले ही जन जागरण दल के प्रत्याशियों को अपनी तरफ मिलाने का काम शुरू कर चुका था।
    समर जानता था राजनीति ऐसी दलदल है जहां पर कमल खिलाने के लिए उस दलदल में स्वयं गहरे तक उतरना पड़ता है। और उसी गहराई में उतरने के लिए उसे उस दलदल का एक हिस्सा बनना पड़ा था। विराज को धोखा देने के लिए उसने विराज की ही तरह झूठी चाल चली थी।
    वह शुरू से विराज के सामने इसी तरह दिखाता रहा जैसे वह राज दल पार्टी की तरफ है। क्योंकि समर का यह मानना था कि अगर लोगों के सामने यह बात जाती है कि महल के राजा अजातशत्रु और उनका भाई विराज एक दूसरे के खिलाफ हैं, तो उससे राजा अजातशत्रु की राजनीतिक छवि पर असर पड़ सकता है । और उस छवि को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक था कि लोगों के सामने यह नजर आए कि विराज राजा अजातशत्रु के समर्थन में खड़ा है। इसीलिए जैसे ही विराज अपने लोगों को लेकर जन जागरण दल की तरफ गया। वहां के सारे लोग विराज और उसके लोगों को लेकर राजा अजातशत्रु की तरफ चले आए । विराज को यही लगता रहा कि वह जन जागरण दल की तरफ है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से वह राजा के ही दल का सदस्य हो गया था।
     और अब जब राजा अजातशत्रु का दल सरकार बनाने जा रहा था तब ऐसे में राजा को छोड़कर विपक्ष से हाथ मिलाने की हिम्मत विराज में नहीं थी।
    खून के घूंट पीकर आखिर विराज भी राजा को बधाई देने चला आया…-“बधाई हो अजातशत्रु! आखिर जीत ही गए तुम!”
” मेरी यह जीत मेरी अकेले की नहीं है विराज इसमें तुम और तुम्हारे साथियों का भी अभूतपूर्व योगदान है जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता।”
  राजा ने आगे बढ़कर विराज को गले से लगा लिया।
युवराज ने भी विराज के कंधे थपथपाये…-” तुम दोनों भाइयों को मिलकर सरकार चलाना है। कैबिनेट में कौन सा स्थान तुम्हारे लिए सही रहेगा पहले ही तय करके कुमार को बता देना कहीं ऐसा ना हो बाद में इसी बात पर तुम दोनों में कोई कलह क्लेश हो जाए। अब हम नहीं चाहते कि हमारे भाइयों के बीच किसी भी तरह की कोई गलतफहमी हो।”

” जी भाई साहब जैसी आपकी आज्ञा।” ऐसा कहकर विराज ने युवराज के पैर छू लिये।

    सारे के सारे लोग एक साथ महल की तरफ निकल पड़े।
    लगभग 10 गाड़ियों में अपने अपने बॉडीगार्ड के साथ वो लोग महल की ओर आगे बढ़ रहे थे कि प्रेम के पास  निरमा का फोन आने लगा…-“कहाँ है आप ? अभी घर पहुंचने में और कितना वक़्त लगेगा?”
” अभी तो निकलें ही हैं। अभी तो वक्त लगेगा। हुकुम की मुख्यमंत्री की सीट पक्की हो चुकी है। बाहर पार्टी कार्यकर्ताओं से भी मिलते हुए आना होगा ना। “.
” ये तो बहुत खुशी की बात है कि राजा भैया जीत गए। खैर उन्हें ही जीतना भी था। “
” तुम बताओ,फ़ोन कैसे किया? कोई ज़रूरी खबर ?”
” हम्म ! है तो ज़रूरी बात,लेकिन वापस आ जाओ फिर बताती हूँ।”
” क्या हुआ है ? कुछ परेशान लग रही हो।  “
” वही मायानगरी के केस के बारे में बताना था। जिस लड़की ने सुसाइड किया था, उसके बारे में मालूम चल चुका है। आप आ जाओ फिर बात करतें हैं। मैं सोच रही कि अभी ये बात राजा भैया तक न पहुंचे तो अच्छा है।”
” हम्म ! ठीक है।” प्रेम ने फ़ोन रख तो दिया लेकिन उसके दिमाग में वही केस चक्कर काटने लगा। अभी तक इस बात को यूनिवर्सिटी से बाहर नही जाने दिया गया था।”

  महल पहुँचने से पहले समर ने गाड़ियां पार्टी कार्यालय की तरफ मुड़वा ली थीं।  वहाँ राजा के समर्थक उसका इंतजार कर रहे थे। बाजे गाजों और ढेर सारी आतिशबाजी के साथ राजा का धूमधाम से स्वागत करने के बाद कार्यकर्ताओं ने पारी पारी से सभी का सम्मान किया और सभी अंदर चले गए…
   राजा  समर को देख मुस्कुरा उठा…-” आखिर कर के ही मानते हो अपने मन की। मैंने तो कहा था मैं इस साल विधायक बन कर भी खुश हूं। पर तुमने ठान रखी थी कि मुझे मुख्यमंत्री बना कर ही मानोगे।”
राजा की बात पर युवराज ने भी मुहर लगा दी…-“बिल्कुल सही! हमें भी जिस ढंग से समर ने बताया था हम यही सोच रहे थे कि तुम कभी मुख्यमंत्री बनने के लिए अपनी पार्टी जनजागरण पार्टी से मिलवाने के पक्ष में नही रहोगे। और तब हमने भी यही कहा था  समर से कि अपनी पार्टी का विलय करके जीत हासिल करने वालों में तुम नही हो!”
” बस आपकी इसी बात के बाद मैंने ये दूसरा तरीका अपनाया हुकुम!”
” तुम तो हो ही पैन्तरेबाज़। कोई वहाँ सोच भी नही सका होगा कि एकदम अंत में जाकर ऐसा कुछ हो जाएगा। पर जो भी हो समर तुमने जो किया वो और कोई नही कर सकता था।”
   प्रेम की इस बात के बाद राजा एक एक कर के सभी कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत रूप से मिलने के बाद वहां से वापस महल के लिए निकल गया।

******

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       प्रेम को घर पहुंचने में रात हो गयी थी। मीठी को सुला कर निरमा बाहर हॉल में बैठी उसका रास्ता देख रही थी, इसके साथ ही वो कुछ कागज़ हाथों में थामें पढ़ भी रही थी।
   प्रेम की गाड़ी आ कर रुकते ही वो दरवाज़े पर भाग कर चली आयी..
   प्रेम ने अंदर आकर निरमा को देखा..-“अरे अब तक जाग रही हो। रात के ढाई बज गए हैं। तुम्हें सो जाना चाहिए था न। फिर सुबह सुबह तुम्हें काम पर भी जाना होता है। “
   निरमा मुस्कुरा कर रसोई से पानी ले आयी। प्रेम के हाथ में गिलास थमा कर वो कहने लगी…-“आप अच्छे से जानतें हैं जब तक आप आ नही जाते मुझे नींद नही आती है। और फिर आज थोड़ा कुछ काम भी था। इसलिए काम निपटा रही थी। “
” अच्छा हाँ! तुमने फ़ोन भी तो किया था? क्या थी वो ज़रूरी बात?”
“अभी आप थक कर आएं हैं मैं सुबह बताती हूँ। आप जाइये फ्रेश हो लीजिये ,मैं खाना गरम कर लूं। “
” नही खाना नही खाऊंगा।” कहता प्रेम नहाने चला गया। उसके बाथरूम से बाहर आने पर भी निरमा किसी काम में लगी थी। उसे इतना व्यस्त देख वो भी परेशान हो उठा…-“क्या बात है निरमा? तुम अब भी सोने नही आ रही।”
उसके हाथ मे दूध का गिलास थमा कर उसने अपने कागज़ समेट लिए।।
” बताओ न क्या बात है? “
” मुझे लगता है , मेडिकल में कुछ गड़बड़ चल रही है। यूनिवर्सिटी इतनी बड़ी है कि हर वक्त सभी तरफ ध्यान देना मुश्किल होता है।  दूसरी बात अभी यूनिवर्सिटी अपने स्थापना के दौर में ही तो है, इस समय हम सबका काम वैसे भी बढ़ा हुआ है। “
” क्या हुआ , काम का तनाव ज्यादा लग रहा है क्या? “
” नही! ऐसी बात नही है। असल में मेरे नीचे और ऊपर भी कई लोग काम करते हैं तो बस वही समझ से बाहर हो रहा है कि कहां पर गड़बड़ हो रही है।
   पहले ही इतने सारे मामले होते हैं उस पर ये आत्महत्या का मामला आ गया। उस लड़की और उसके घर वालों के लिए बहुत दुख हो रहा है। मैंने उसके घरवालों को कल बुलवाया है। उनसे मिल कर उसके बारे में और भी बातें पता चलेगी की आखिर माज़रा क्या था? क्यों उसे आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा। “
” कहीं कोई रैगिंग का चक्कर तो नही है ना? और वैसे भी ये राजा अजातशत्रु की बनाई यूनिवर्सिटी है । यहाँ तो रैगिंग होनी ही नही चाहिए। “
” आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि एक आदर्श यूनिवर्सिटी में सिर्फ सीधे सच्चे लोग पढ़ें। कोई रैगिंग न हो ,सब शराफत से साथ चलें तभी वो एक आदर्श विश्वविद्यालय होगा। ऐसा नही है प्रेम बाबू। रैगिंग भी कॉलेज की पढ़ाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए मैं रैगिंग के पूरी तरह खिलाफ भी नही हूँ। बस किसी तरह का शारीरिक उत्पीड़न न हो।
  आपको मालूम है ये बच्चे जब स्कूल की पढ़ाई पूरी कर के हमारे पास पढ़ने आते हैं तब इन्हें किसी तरह का सामाजिक व्यवहारिक ज्ञान नही होता। इनके साथ होने वाली छोटी मोटी रैगिंग इन्हें उस व्यवहारिक ज्ञान को सिखाने का माध्यम है।
   बच्चे मानसिक रूप से भी स्ट्रांग होतें है और प्रैक्टिकल नॉलेज में भी।
  पर ये लड़की वाला मुझे रैगिंग का मामला नही लग रहा। अब कल सुबह ही मालूम चलेगा कि सारा मुद्दा क्या है आखिर। आप भी स्पोर्ट्स फैकल्टी इंचार्ज हैं तो कल आपको भी मीटिंग में आना होगा।”
” जो हुकुम आपका। वैसे कितने बजे तक पहुंचना होगा। “
” लंच के बाद ही मीटिंग रखी जायेगी। मैं आपको समय मेसेज कर दूँगी। हमारी कोशिश तो यही है कि ये बात राजा भैया तक  न जाये।”
” इतनी बड़ी बात हुई है। ये उनसे छिपाई नही जा सकती। उन्हें बता देना ही सही रहेगा। “
” हम्म !”
   खिड़की पर खड़ी निरमा अपनी सोच में गुम हो गयी। रह रह कर उसकी आंखों में उस बच्ची का चेहरा और बेजान शरीर तैरता जा रहा था….
   और वो और अधिक उदासी में डूबती जा रही थी।

क्रमशः

दिल से…

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       ढेर सारी मतलब, वाकई ढेर सारी बातें हैं दिल से कहने के लिए बस समझ में नहीं आ रहा कहां से शुरू करूं ।
    
        सबसे पहले तो असत्य पर सत्य की विजय का अनूठा पर्व विजयादशमी  हम सब मना चुके हैं और आप सभी को इस पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।
  
      श्री राम तो मन प्राण में बसे हुए हैं और उनका नाम ही पर्याप्त है अपने पाप काटने के लिए।

    अब बात करते हैं कहानी की। जैसा कि मैंने पहले कहा था जीवनसाथी समाप्त होने के बाद भी माया नगरी के साथ चलती रहेगी लेकिन इसी बीच मायानगरी शुरू कर दी। अब मायानगरी में मैंने 5 साल का लेग दिखाया था।
   लेकिन ये लैग, जेटलैग में बदल गया ।
  खैर !!
   
   तो हुआ ये की जीवनसाथी में भी मुझे ये पांच साल का गैप दिखाना था। लेकिन कहानी मर्ज करने के चक्कर में बिना टाइम गैप के कहानी मिल गयी।
   आप लोगों को भी नज़र आ रहा है कि मैं कितनी फुर्ती से जीवनसाथी समेटने में लगी हूँ बस इसलिए गलती से मिस्टेक वाली सिचुएशन तैयार हो गयी।

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  तो साथियों अब यहाँ से दोनो कहानियों को बिना टाइम ट्रेवल किये ही हम साथ में लेते चलेंगे। दिमाग में कोई डाउट आये तो आप बेशक पूछ लीजियेगा अगर मुझे जवाब समझ आ गया तो मैं ज़रूर आपकी शंका का समाधान करूँगी।
   
  आपमें से बहुत से लोग प्रेम और निरमा की कहानी भी अलग से पढना चाहते थे। तो मैं वो भी लिखने की सोच रहीं हूँ। हालांकि अब जब तक पुरानी कहानियां नही खत्म होंगी। कोई नई कहानी नही शुरू करूँगी।
  जैसे शादी.कॉम शुरू की थी जीवनसाथी के रूप में कुछ अलग फ्लेवर और अलग कलेवर में । बस ऐसे ही प्रेम निरमा की नई कहानी भी काफी अलग सी होगी। प्लॉट वही होगा लेकिन इस बार फ्लेवर और कलेवर फिर से अलग होंगे। तो अगर पढना चाहतें है तो समीक्षा में हाँ ज़रूर लिखियेगा । अगर सौ लोगों ने भी हामी भर दी तभी इस कहानी पर काम शुरू करूँगी वरना कुछ दूसरा भी चल रहा है दिमाग में।
   
    लेखकों के साथ बड़ी मुसीबत होती है। सामने कोई बैठा आपसे अपना दुख दर्द बांट रहा होता है और आप उसमें छिपा अपना किरदार तलाश रहे होते हैं।
    वो तो अच्छी बात है कि मेरे बहुत कम रिश्तेदार मुझे पढ़ते हैं वरना मेरी जो खबर ली जाती कि क्या कहूँ।
    हालांकि अब कुछ बेहद करीबी रिश्तों में भनक लगने लगी है।
   अभी कुछ दिन पहले ही मेरी एक जेठानी सा का फ़ोन आया। कुछ इधर उधर की बातों के बाद उन्होंने मुझे पूछा कि ” देवरानी जी! तुम डॉक्टरी के अलावा भी कुछ करती हो क्या?” मैंने कहा – नही तो। तब उन्होंने वापस पूछा -“हमारा मतलब है कुछ कहानियां भी लिखती हो क्या? “
मन ही मन सोचा – “गए बेटा । पकड़ी गई। मैंने कहा हाँ जीजी लिखती हूँ। बस ऐसे ही थोड़ा बहुत।”
उन्होंने कहा-“हम सारी बहने प्रतिलीपी पर हैं। मेरी दीदी शायद तुम्हें ही पढ़ती हैं। तुमने जीवनसाथी के नाम से कुछ लिखा है क्या? “
मैंने कहा -“हाँ दी ! लिखा है बल्कि अब भी लिख रहीं हूँ।”
उन्होंने तुरंत कहा-“यार ये तो बता दो की बाँसुरी कैसे इतनी केयरलेस हो गयी। उसने अपना फोन कहाँ गंवा दिया। तो मतलब बाँसुरी और राजा वाली अपर्णा तुम ही हो। “
मैंने कहा – ” हाँ दी ! मैं ही हूँ।” और दिल में आ रहा था, हे भगवान मैंने कुछ ऐसा वैसा न लिख दिया हो कि अपनी प्यारी जेठानी से नज़रे न मिला पाऊं।
  लेकिन उसके बाद उन्होंने फ़ोन पर इतना सारा प्यार बरसाया की क्या कहूँ।
” अब तो भई जल्दी ही तुमसे मिलने आएंगे। अपनी देवरानी से नही राजा और बांसुरी वाली अपर्णा से।”
   मैंने भी सहर्ष स्वीकृति दे दी। बातें तो फिर ढ़ेर सारी हुई, लेकिन सब बताने बैठी तो आप बोर हो जाएंगे जैसे अभी हो रहे।
   वैसे इतना तो बनता है।

      अभी पुरानी कहानियों को खत्म करने के बाद ही कुछ नया लिखूंगी प्रतिलीपी पर।

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   बाकी किस्से शुरू हो जाएंगे दीवाली के बाद से।
दो नए रूपों में…. वापसी और … एक सरप्राइज!

आजकल कुछ ज्यादा ही पहेलियों में बात करने लगीं हूँ शायद। पर सच कहूं तो मुझे खुद कोई और पूछे तो पहेलियों के जवाब मालूम नही होते।
 
   मेरे दिमाग के घोड़े दौड़ते कम हैं, ज्यादातर एक ही जगह खड़े खड़े सोचते रहतें हैं, मेरी तरह ।
  और दौड़ना भूल जातें हैं।

  आज तो ढ़ेर गपशप हो गयी। अब जल्दी ही मिलतें हैं बाकी कहानियों के साथ।
  पढ़तें रहिये, खुश रहिये…

मुझे पढ़ने और सराहने के लिए हॄदयतल से आभार आप सभी का।
  आपकी मुहब्बत है कि लिख रही हूँ।।

aparna..

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शादी.कॉम-25

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शादी डॉट कॉम-25

     दो दिन कब पलक झपकते बीत गये बांसुरी को पता भी नही चला,तीसरे दिन से टीम द्वारा एक ट्रेनिंग सेशन का आयोजन किया जाना था जिसमें
टीम के अलग अलग सदस्यों द्वारा विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दिया जाना था,हालांकि बैंक के रूटीन कार्य में व्यवधान ना हो इसलिये कुछ चुने हुए बैंक कर्मियों को ही इस ट्रेनिंग सेशन का हिस्सा बनाया जाना था।
      बांसुरी बस इसी चिंता में थी कि उसे इसका हिस्सा बनने मिलेगा या नही।।

*************

टीम के द्वारा बैंक के सीनियर कर्मचारियों की लिस्ट तैयार कर सिद्धार्थ को दे दी गयी थी जिनमें बांसुरी का नाम नही था ,,पर सिद्धार्थ चाहता था कि बांसुरी भी इस प्रशिक्षण का हिस्सा बने।।बाकी तीन मेंबर्स काफी सीनियर थे इसलिये उसने राजा से ही बात करने की सोची__

” सर आपकी लिस्ट से मेरी सबसे अच्छी एम्प्लायी का नाम गायब है,,,आप एक बार फिर से देख लेते तो अच्छा रहता।।”

” सिद्धार्थ साहब!! ये लिस्ट नायर सर ने बनाई है और मैं उनके निर्णय के खिलाफ नही जा सकता , हमसे काफी सीनियर हैं वो।।”

” मैं समझ सकता हूँ,,पर क्या आप एक बार ट्राई कर सकते हैं प्लीज़,असल मे बांसुरी बहुत कुशल कर्मी है,उसे ये ट्रेनिंग मिलेगी तो वो और चमक जायेगी।

राजा– समझा सकता हूँ,लेकिन……

राजा ने अपनी बात पूरी भी नही की थी कि सिद्धार्थ फिर शुरु हो गया।।

सिद्धार्थ– वो सर बात दरअसल ये है,  की असल में हम शादी करने वाले हैं,,क्या है उसकी भी ट्रेनिंग हो जाये तो हम दोनो के लिये ही अच्छा रहेगा।।

   राजा के हाथ से चाय उसके कपडों पर छलक गयी,उसने सिद्धार्थ की तरफ देखा__

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राजा — कब ?? I mean कब करने वालें  हैं??

सिद्धार्थ- बस जल्दी ही!! हमारी तरफ से तो सब ओके ही है,मेरी माँ को तो बांसुरी बहुत पसंद भी है, जल्दी ही वो शुभ दिन भी आ जायेगा।।

     गलतफहमी!!!ऐसी ही जटिल वस्तु होती है,जिसे हो जाती है वो फिर सामने वाले की प्रत्येक बात को अपने विशिष्ट चश्में से देखने लगता है।।
    हमारी तरफ से सब ओके है में सिद्धार्थ का तात्पर्य उसके और उसकी माँ की तरफ से था,पर राजा ने सोच लिया बाँसुरी और सिद्धार्थ की तरफ से।।
     इस चर्चा के बाद उसे सिद्धार्थ से कोई बात करने का मन नही किया।।

   क्या क्या नही किया था उसने बांसुरी के लिये…..
उस शाम के बाद पलट के देखा भी नही बांसुरी ने , कितनी देर वहाँ बैठा रह गया था,वो तो बाद में बन्टी जबर्दस्ती उठा कर घर ले गया,,पूरे दो दिन ना कुछ खाया ना पिया।।
    तीसरे दिन कैसा तेज़ बुखार आ गया था उसे… सारा सारा दिन एक ही बात तो दिमाग मे चल रही थी,माँ को समझाए या बांसुरी को!!
    दोनो में से एक ने भी उसका साथ दे दिया होता तो क्या ऐसे घुल घुल के रोग पाल लिया होता उसने।।
     इसके बावजूद उसने बांसुरी के इम्तिहान वाले दिन एक चिट्ठी देकर प्रेम को उसके पास भेजा था, फोन करने का तो सवाल ही नही था,ऐसे बुखार मे तप रहा था कि माँ सारा समय उसके सर के पास ही बैठी थी।।।

      प्रेम को कैसा खोटे सिक्के सा फिरा दिया था बांसुरी ने,ना ही उसके खत को पढ़ा और ना जवाब ही भेजा।।
     
     वो तो उसे खुद को पता भी नही चल पाया था कि ज्वर की तीव्र पीड़ा में वो रात भर बाँसुरी का नाम जपता रहा था,और उसकी उसी तड़प ने आखिर अम्मा का कलेजा भी मरोड़ के रख दिया था।।

     बेचारी दिन निकलते ही बन्टी को साथ लिये अपने सारे मान को ताक पर रख बांसुरी के घर भी पहुंच गयी,पर क्या लाभ हुआ आखिर??
     वहाँ उसकी बुआ ने क्या क्या नही सुनाया था अम्मा को___
        ” माफ करना दुल्हीन हमरी बांसुरी की तो नौकरी लग गयी, पढ़ी लिखी जो ठहरी।।देखो बुरा ना मान जाना पर सिर्फ सकल सूरत ही सब कुछ ना होवे है,सोने की प्रतिमा को घर मे सजाया जा सकता है पेट की आग नही बुझाई जा सकती।।छोरी ने तो कह दिया है…सादी करेगी तो अपने जैसे पढ़े लिखे लड़के से वर्ना कन्वारी रह जायेगी।।

अम्मा– क्या सच!! उसने खुद ऐसा कहा??

बुआ– हाँ तो,जो हम झूठ बोलेंगी तो जे जीभ अभी के अभी गल के गिर जाये…..
     जाते जाते एक बात और सुन लो दुल्हीन ,जितना दहेज का लिस्ट तुमने हमे थमाया था ना उतना तो छोरी दो साल में कमा के तुम्हारे चरणों में डाल देती पर सबर कहाँ था तुममें,जाओ अब सम्भालो अपने लल्ला को,कहीं ज़हर वहर ना खा ले।।

    ये सारी बातें और किसी ने कही होती,तो एक बार को राजा अविश्वास कर भी लेता पर वापस लौटने के बाद अम्मा ने ही बन्टी के सामने हर एक बात उसे बता दी थी,,कितना रोयी थी अम्मा उसे गले से लगा के……
      जिस लाड़ले के लिये अम्मा ने अपने स्वाभिमान को नही देखा उस माँ के लिये फिर बेटा कैसे इतना निष्ठुर हो सकता था।।

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    उसे भी समझ आ गया था,बांसुरी कभी उसके जैसे अनपढ़ गंवार से ब्याह नही कर सकती।।
    बांसुरी से ब्याह का उसे भी कहाँ कोई उत्साह रह गया था,बस उसके पीछे से रह गयी थी अम्मा के अपमान की कड़वी घूंट।।
    वो भी पढ़ा लिखा होता बड़के भैया की तरह तो मजाल थी कि बुआ उसकी अम्मा पर इतना कीचड़ उछाल पाती।।

     ठीक है बुआ जी ने जो कहा वो उनकी बुद्धि के हिसाब से कहा __ पर पढ़ी लिखी समझदार बांसुरी को क्या हो गया था,मान लिया की जब बुआ और अम्मा की भेंट हुई तब वो वहाँ नही थी,नौकरी करने दूसरे शहर चली गयी थी,पर क्या उसकी मां या दीदी ने उसे इस बार में कुछ भी नही बताया,, और अगर बता दिया तो क्या दोस्ती के नाते भी एक बार बांसुरी का फर्ज नही बनता था कि हमें फोन कर ले,अम्मा के अपमान के लिये माफी मांग ले।।
    कौन सा पहाड़ टूट जाता,इसे स्वाभिमान नही अभिमान कहा जाता है।।
   ये भी मान लिया कि हो सकता है उसकी माँ और बहन ने ना बताया हो,तो क्या इतना प्रेम भी दोनो के बीच नही था कभी,कि एक बार खुद ही हाल चाल पूछ ले।।

     उसने बांसुरी से जुड़ी किस वस्तु को खुद से अलग किया था ….ना उसने अलग होने की कोशिश की और ना हो पाया।।

    उसे पढाते समय के सारे छोटे छोटे नोट्स जो बांसुरी ने अपनी लेखनी से उकेरे थे,आज भी उसकी कॉपी में वैसे के वैसे दबे पड़े थे।।
     उसे याद है बांसुरी हर दिन पढ़ाना शुरु करने के पहले पन्ने पर सबसे ऊपर ‘राम ‘ लिखा करती थी, क्या उसकी वही आदत आज राजा के जीवन का हिस्सा नही हो गयी थी।।
      उसे खुद को चाय कभी पसंद नही थी,वो तो घर पे हमेशा दूध लस्सी या छांछ ही पिया करता था,वो तो बांसुरी की संगत में चाय की ऐसी लत लगी कि आज तक नही छूटी  और ना वो छोड़ना चाहता है।।

   उसे आज भी याद है ,जब पहली बार बांसुरी को अपनी बुलेट पे बैठाए वो हनुमान जी के मन्दिर गया था,,वहाँ मन्दिर से बाहर निकलते समय एक बूढ़ी अम्मा ने कुछ प्रसाद और फूल के साथ एक रक्षा सूत्र भी उसके हाथ में रख दिया था,उस रक्षासूत्र को बांसुरी ने उसकी कलाई पर बड़े प्यार से बांध दिया था…..
      आज इतने सालों में भी रोज़ रोज़ अपने खुशबूदार साबुन से उसे सुवासित कर उसके जीर्ण शीर्ण कलेवर के बावजूद अपने हाथ में बांधे रखा है।
एक से एक महंगी ब्रांडेड कमीज़ों से होड़ लगाता वह धागा आज भी उसके हाथ में वैसे ही बंधा है जैसा वो बांध गयी थी।।

    उस शाम के बाद सिर्फ उसी के बारे में सोच सोच के कैसा भयानक राज रोग पाल लिया था उसने…..
    दस दिन के ज्वर ने बुरी तरह से तोड़ कर रख दिया था,जब कुछ स्वस्थ अनुभव हुआ तो धीरे धीरे उसने अपने आसपास की दुनिया पर गौर करना शुरु किया,वापस अपना काम शुरु किया ,हालांकि मन तो किसी काम में नही लग रहा था,उस पर सदा सर्वदा बने रहने वाला गरदन का दर्द….
        पूरे छह महिनों तक उसने अपने दर्द को नज़र अंदाज कर दिया था…..
      नज़र अंदाज किया या शायद समझ ही नही पाया कि दर्द शारीरिक अधिक है या मानसिक!! उस पर उसके जाने के बाद किताबों से मोहब्बत सी हो गयी थी,,हर किताब में वही तो नज़र आने लगी थी, चाहे इतिहास हो या भूगोल,उससे इतर कुछ भी कहाँ दिखता था….
     पता नही उसे भूलने के लिये या उसकी यादों में और ज्यादा डूब जाने के लिये वो किताबों में समाता चला गया।।
   
     ऐसी ही एक दोपहर अपने कमरे में एक किताब में सर झुकाये पढ़ते में ऐसी तीव्र पीड़ा उठी की कराह के रह गया,बड़े भैय्या परेशान से उसे लिये डॉक्टर के पास भागे भागे गये थे।।
     सी टी स्कैन,एम आर आई और भी जाने कितनी जांचे हुई थी,और डॉक्टर साहब की बात ने घर भर को कितना डरा दिया था__सर्वाइकल में ब्लैक पैच दिख रहे हैं,या तो टी बी हो सकता है या फिर….. कैन्सर!!!

       अम्मा तो सुनते ही महामृत्युन्जय जाप मे बैठ गयी थी,दादी का रो रो के बुरा हाल था,भैया रात दिन एक कर मुम्बई के सबसे बड़े अस्पताल का अपोइंटमेंट जुगाड लिये थे …..
      कैसा बुरा समय था,जैसे हर तरफ सिर्फ और सिर्फ अन्धेरा ही अन्धेरा छा गया था।।
     उस समय भी एक मन कहता था कि काश बांसुरी वापस आ जाये पर दूसरा मन कहता कि अच्छा ही हुआ जो वो पहले ही चली गयी क्योंकि अगर जिंदगी इतनी छोटी ही थी तो उसके साथ गुजारने के बाद उसे छोड़ कर मरना भी कहाँ आसान होता।।

    ऐसे ही बुरे वक्त में तो लोगों की पहचान होती है, कोई ऐसा दोस्त नही बचा था,जो गले लग के ना रोया हो,वो तो बड़े भैया ने डपट के रोक दिया था वरना प्रेम प्रिंस के साथ साथ लगभग मोहल्ले के 40 लड़के खड़े थे मुम्बई तक साथ जाने के लिये।।
     इतना सब होने पर भी क्या बांसुरी के घर वालों को कोई खबर नही पहुंची थी,और अगर पहुंची भी तो क्या वो लोग इतने निर्दयी थे कि उसे कुछ बताया तक नही!! और अगर इस सब के बाद उन लोगों ने उसे सब बता दिया तो फिर वो इतनी निष्ठुर कैसे हो गयी।।

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     तीन दिन की लगातार एक के पीछे एक हो रही जांचों ने कितना थका दिया था उसे,पर बड़े भैय्या किसी पहाड़ की तरह अडिग उसे संभाले खड़े रहे थे, हर जांच की रिपोर्ट के लिये एक जगह से दूसरी जगह भागते भैया का खुद का वजन एक हफ्ते में गिर गया था,पर उनके चेहरे पे उसने कोई खीज कोई झुन्झलाहट नही देखी थी।।
       कहीं जांच में कैन्सर आ गया तो इस बात से वो खुद कांप रहा था पर भैया का चेहरा आत्मविश्वास से दमक रहा था जैसे उसे बार बार आंखो ही आंखो मे दिलासा दे रहे हों__” छोटे तुझे कुछ नही होने दूंगा, यमराज की गोद से भी तुझे संजीवनी चखा के खींच लाऊँगा।।”
     आखिर भैया के विश्वास की ही जीत हुई,रिपोर्ट्स में बोन टी बी ही निकला।।घर के लोगों ने राहत की सांस ली….
     डॉक्टर की छै महीने की दवा के साथ ही अम्मा जाने कहाँ कहाँ के मन्नत के धागे भभूत क्या क्या नही ले आयी।।
     ऐसा लगने लगा था घर का बेटा नही पूरा घर बीमार है।।
      सभी की साधना सफल हुई,छै महीने की दवा के बाद एक बार फिर सारी जांच हुई और सब कुछ सामान्य आ गया।।
   पर इस पूरे समय अन्तराल में क्या कोई भी एक दिन एक क्षण ऐसा गया जब उसने बांसुरी को याद ना किया हो,,घर वालों के अपार प्रेम के सामने वैसे बांसुरी का कोई मह्त्व नही बचता था पर पागल मन को ये छोटी सी बात सम्झानी बड़ी मुश्किल थी,वो तो अपने पर ही अड़ा था।।

     पढ़ाई और किताबों में उसे दिन रात घुसे देख युवराज भैया ने ही बैंक की तैयारी को कहा और फॉर्म भी भर डाला ।।
     पता नही बांसुरी के जाने के बाद ऐसा क्या हुआ जो वो जब कभी कोई भी इम्तहान देने बैठता ऐसा लगता जैसे बांसुरी का साया उसके ऊपर सवार है, पेपर हाथ में आते ही बांसुरी की आत्मा जैसे उसके अन्दर समा जाती और वो सारे प्रश्न बड़ी आसानी से हल कर जाता,पूरे आत्मविश्वास के साथ।।

     ये आत्मविश्वास असल मे बांसुरी का नही उसका खुद का था,उसके प्रेम का था।।

    उसे खुद को भी नही पता था की अपने आप को रात दिन किताबों में डूबा कर उसने अपने लिये प्रतियोगी परीक्षाओं को कितना आसान कर लिया था।
     ग्रेड बी निकालने के बाद उसे युवराज भैया से उसके मह्त्व का पता चला था।।

  अपनी बिमारी से उठने के बाद उसने कभी बांसुरी के बारे मे पता करने की ज़रूरत नही समझी थी,।।
  बस उसे इतना ही पता था की वो महाराष्ट्र मे कहीं रहती है।।

    पुणे के लिये निकलते समय उसे भैया ने एक बार याद भी दिलाया था__ ” राजा तुम्हारी बिमारी के समय सिद्धिविनायक मन्दिर में नारियल रख आये थे हम कि अब जब भी इधर आयेंगे उनके दर्शन को ज़रूर जायेंगे,अब जब पुणे तक जा ही रहे हो तो एक बार मुम्बई जाकर गणपति बप्पा को धन्यवाद भी बोलते आना।।”

    भैया की बात पहले भी उसके लिये पत्थर की लकीर थी पर अब जैसे उन्होनें उसे अपने बेटे की तरह संभाला था उनकी किसी बात को काटने का सवाल ही नही उठता था।।
     वैसे भी 5 दिन की कार्यशाला में दो दिन ऑडिट और तीन दिन ट्रेनिंग के थे,उसके बाद अगले दिन मुम्बई मे दर्शन कर वही से लौटने के लिये फ्लाईट की टिकट उसने करा रखी थी।।

****

   आज सिद्धार्थ के मुहँ से उसके और बांसुरी के रिश्ते के बारे में सुन अनजाने ही उसे अपने बीते साल याद हो आये थे ।।
      भले ही बांसुरी उसे छोड़ कर बहुत आगे बढ़ गयी थी पर क्या आज भी वो वहीं उसी मोड़ पर खड़ा उसका इन्तजार नही कर रहा था।।

       ये साथ गुज़ारे हुए लम्हात की दौलत
    जज़्बात की दौलत ये ख़यालात की दौलत
कुछ पास न हो पास ये सौगात तो होगी बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी…..

यही गाना तो था जो जब कभी रेडियो पर बजता झट अम्मा आकर बन्द कर दिया करती थी,जैसे इस गाने को बन्द कर देने से राजा उन सभी लम्हों से बाहर निकल आयेगा।।

   खैर उसके नौकरी में आते ही घर वालों को लगने लगा था कि वो सामान्य होने लगा है…..
    उनका सोचना किसी हद तक सही भी था,वो सामान्य हो चला था ऐसा तो उसे खुद को तब तक लगता रहा जब तक उसने बांसुरी को देखा नही था।

  पहले दिन जब वो दरवाजा खोल के अन्दर आकर खड़ी हुई,उसे देखने के बाद क्या चाह कर भी वो उससे नजरें हटा पा रहा था…..
     उसे देखते ही सारी रंजिशे कैसे छू मंतर हो चली थी,अपना खुद का हृदय भी अदृश्य रूप से उसीके चरणों में जा बैठा था,,कितनी प्यारी लग रही थी और उतनी ही मासूम!! उसे देख लगा ही नही कि राजा की कोई भी तकलीफ उसे पता थी,क्योंकि अगर उसकी एक भी तकलीफ का पता बांसुरी को होता तो वो कभी उसे छोड़ कर नही जाती ।।

     लंच में उसे दूर अपने दोस्तों के साथ बैठा देख कैसे मन मसोस के रह गया था,कैसी जलन सी उठ रही थी हृदय मे,लग रहा था एक बार गले से लगा लूँ तो सारी जलन दूर हो जाये,ठन्डक पड़ जाये कलेजे में ।।
      पर हाय रे मन!!!होता भले अपना है पर सोचता दुनिया के बारे मे है।।
     अगर मैंने ऐसा किया तो लोग क्या सोचेंगे ,दुनिया क्या सोचेगी ।।और हम रह जाते हैं अपने विचारों के साथ अकेले,एक शून्य में!!
      जिस शून्य से हमें उबारने उसी दुनिया से कोई नही आता जिसके बारे में सोच कर हम अकेले पड़  जाते हैं।

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*********

  सिद्धार्थ के जाते ही नायर सर से बात कर उसने बांसुरी का नाम भी लिस्ट में जोड़ दिया।।
    ट्रेनिंग शुरु हुई,,नारायण सर के लेक्चर के बाद उसे ही वैश्विक अर्थव्यवस्था और मुद्रा के स्थिरीकरण के बारे में बोलना था।।

    बोलना शुरु करने के पहले उसने अपनी वॉलेट में एक बार झांक के उसमें लगी तस्वीर को देखा और राजा से वापस आर के बन अपनी स्पीच बोलने में लग गया।।

     लगातार 3 घन्टे बोलने के बाद वो वापस अपनी सीट पर आ गया,लंच के बाद के सेशन में लोग अपनी क़्वेरीस पूछने वाले थे।।

    लंच में कैन्टीन में माला और राहुल के साथ बैठी बांसुरी  की निगाहें दरवाजे पर ही टिकी थी कि कब राजा आयेगा,,,उसकी टीम  के सद्स्य एक एक कर आते गये,पर वो नही आया।

   क्रमशः

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aparna…

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समिधा- 32

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  समिधा -32

    ‘”कृष्ण क्या है? एक विचार! एक चिंतन! या एक संपूर्ण युगपुरुष! जिसने युगों के विचारों को बदल दिया। श्री कृष्ण के जीवन में जन्म से लेकर उनके जीवन काल तक हर पल कुछ न कुछ घटता रहा और वह जो भी घटता रहा वह श्री कृष्ण का स्वयं रचित कार्य था । यानी अपने प्रारब्ध को समझकर उन्होंने उसके लिए प्रयास किया।
     उनकी यह जीवनशैली हमें भी यह समझाती है कि अगर अपने भविष्य को सुनियोजित-सुनिश्चित करना है तो अपने वर्तमान पर कार्य करना होगा।
    मैं कभी-कभी सोचता हूं कि इतनी सारी किताबें पढ़ने के बाद मैं श्रीकृष्ण को समझ गया हूं। जान गया हूं। उनका जीवन दर्शन पा चुका हूं । और जिस घड़ी मुझे यह महसूस होता है, कि मैं श्रीकृष्ण के करीब हूं उसी क्षण वह मुझसे दूर चले जाते हैं। मेरे और उनके बीच एक लंबा फासला बन जाता है। और उस फासले को पाटने के लिए मुझे एक बार फिर उनके जीवन चक्र को पढ़ना और समझना पड़ता है।
     मैं जानता हूं जब तक मैं उनकी लीलाओं को पूरी तरह समझ कर अपने आप में व्याप्त नहीं करूंगा। तब तक वह इसी तरह मुझ से दूर भागते रहेंगे । और उन्हें पाने की लालसा में मैं उनके पीछे भागता रहूंगा इसी भागा दौड़ी का नाम ही तो भक्ति है।

   हां, मैं कृष्ण भक्त हूं! पूरी तरह से कृष्ण की भक्ति में लीन उनका एक साधक उनका पुजारी जिन्हें उनका नाम लेना पसंद है! उनका श्रृंगार करना, उन्हें भोग लगाना और उनकी भोग की थाली उनके सामने रखकर करबद्ध निवेदन करना कि आओ मेरे कृष्ण और यह भोग ग्रहण करो! पसन्द है। मैं भी बहुत बार चाहता हूं उस बच्चे की तरह जिद पर अड़ जाऊं कि जब तक तुम नहीं खाओगे मैं यहां से नही हिलूंगा । और एक सुटियाँ लेकर मैं भी बैठ जाऊं उस मूर्ति के सामने। इस ज़िद को पकड़कर कि, तुम आओ और यह भोग खा कर ही जाओ।
      आप सब मेरा विश्वास नहीं करेंगे लेकिन ऐसा करने का मैंने कई बार प्रयास किया। और हर बार वह छलिया मुझे छल ही जाता है। कभी मुझे गुरुवर का बुलावा आ जाता है तो कभी किसी और कारणवश मुझे उस भोग की थाली के सामने से हटना ही पड़ता है। और मैं जब तक वापस आता हूं उसमें से एक कोई ना कोई हिस्सा खत्म हो चुका होता है। और मैं मुस्कुरा कर उस छलिया के सामने हाथ जोड़ देता हूं कि आखिर तुमने मुझे ठग ही लिया।
    मैंने आज तक द्वारिकाधीश को प्रकट होकर मेरे सामने बैठकर भोग की थाली में भोग लगाते नहीं देखा। लेकिन यह भी सच है कि हर बार उस भोग की थाली का कोई एक हिस्सा अपने आप गायब हो चुका होता है। मैं यह नहीं कहता कि मूर्ति उस भोग को ग्रहण कर लेती है लेकिन वह किसी ना किसी रूप में उस भोजन को प्राप्त जरूर कर लेती है।

    यहां आने से पहले मेरा मन बहुत अशांत था। शारीरिक रूप से भी और मानसिक भी।
     अपनी उसी अशांतता को अस्थिरता को दूर करने के लिए मैं आश्रम आया था। यहां आते  साथ मुझे अच्छा लगने लगा ऐसा भी नहीं था।
     मुझे समय लगा यहां ढलने में। यहां की जीवन चर्या को अपनाने में। लेकिन हर एक आगे बढ़ते समय के साथ मैं भी आगे बढ़ता गया और कृष्ण लीला में डूब कर रह गया।
   और आज मैं गर्व से कहता हूं कि मैं कृष्ण भक्त हूं। भक्त होने और अंधभक्त होने में बहुत महीन सा अंतर होता है ।
   भक्ति आपके अंदर पौरुष को जगाती है । आपकी ताकत को कई गुना बढ़ा देती है। जब आप किसी की भक्ति करते हैं तो वह भक्ति आपके अंदर  एक विश्वास पैदा करती है, कि आपके साथ जो भी होगा उचित होगा। वही अंधभक्ति आप को कमजोर कर जाती है। जब आप किसी के अंधभक्त हो जाते हैं तब आप बिना कुछ सोचे आंख मूंद कर उस पर भरोसा कर लेते हैं।
     वैसे कृष्ण की लीला ऐसी है कि अगर आप उनके अंधभक्त होते हैं तब भी वह आपको अंधे होकर आगे गिरने नहीं देंगे । वह हर कठिन समय पर आपको थामे रहेंगे।
कृष्ण लीला के वर्णन में जो अनिर्वचनीय सुख है, वह और कहीं नहीं। यह रस बोलने वाले को भी उतना ही सिक्त करता है जितना सुनने वाले को।
    अगली बार मैं कुछ कृष्ण लीलाओं का वर्णन करूंगा लेकिन वैसे नहीं जैसे आप आज तक सुनते आये हैं।
     कृष्ण चरित्र पर आज तक हमारे कवियों ने साहित्यकारों ने रचनाकारों में बहुत कुछ लिखा है। और कृष्ण को महिमामंडित कर के चमत्कार करने वाले पुरुष के रूप में वर्णित किया है। जिससे हम साधारण जनमानस उनसे एक दूरी महसूस करते हैं। हमें लगता है हमारी सारी समस्याओं को किसी चमत्कार के माध्यम से कृष्ण सुलझा देंगे लेकिन अब इतनी सारी किताबें पढ़ने के बाद मुझे यह जाकर समझ में आया कि राम और कृष्ण ने अपना जीवन बहुत साधारण तरीके से जिया । राजा होते हुए भी वह दोनों सदा एक आम व्यक्ति की तरह अपना जीवन यापन करते रहे । अपने जीवन में आने वाली हर कठिनाई  का उन्होंने खुलकर सामना किया। सिर्फ चमत्कार दिखाकर किसी कठिनाई को पार नहीं लगाया।
    मेरे विचार से उन दोनों ने ऐसा इसलिए किया जिससे हम साधारण जनमानस उन के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को भी सार्थक कर सकें।
श्री कृष्ण ने जीवन में चमत्कार किए लेकिन उन चमत्कारों के पीछे भी हमेशा कोई ना कोई लक्ष्य या कारण मौजूद था। अगली चर्चा में हम आपस में ऐसे ही कुछ विषयों का उल्लेख करेंगे। और आपस में परिचर्चा करेंगे, उम्मीद करता हूँ कि हमारी अगली परिचर्चा सफल सिद्ध होगी।”

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     अपनी बात समाप्त कर वरुण ने सामने बैठे श्रोताओं की तरफ देख कर अपने हाथ जोड़ दिए। सामने बैठे लोगों में अधिकतर लोग मंदिर से बाहर से आए दर्शनार्थी थे, जो वरुण के प्रवचन को सुनने के लिए दर्शनों के बाद बैठ जाया करते थे। उसके अलावा मंदिर परिसर में कार्य करने वाले कुछ एक लड़के थे और भगिनी आश्रम की कुछ महिलाएं भी एक तरफ बैठी हुई थी पारोमिता भी उन्हीं में से एक थी।
     भगिनी आश्रम की महिलाओं की पंक्ति में सबसे सामने बैठी पारोमिता की आंखें पूरी तरह वरुण पर केंद्रित थी।  उसे जाने क्यों वरुण को देख देख कर उसके चेहरे में बीच-बीच में देव की झलक मिल जाया करती थी और उस समय वह अपने मन को मार कर इधर-उधर देखने लगती थी।
     उसे इस तरह खुद का किसी पराए पुरुष की तरफ देखना अच्छा नहीं लग रहा था लेकिन वह अपने मन को उसके चेहरे से अपनी आंखें हटाने के लिए मना भी नहीं पा रही थी। प्रवचन के बीच से उठकर जाना मंदिर के नियमों के विरुद्ध था इसलिए प्रवचन समाप्त होने तक उसे वहां बैठना ही था और उसकी मर्जी से अलग जाकर उसकी आंखें घूम फिर कर वरुण के चेहरे पर केंद्रित हो ही जा रही थी।

  ” गुरुवर आपकी बातें हमें भी कृष्ण सागर में डूबा ले जाती हैं”  एक महिला के ऐसा कहते हैं वरुण ने अपनी बाईं तरफ बैठी महिलाओं की तरफ दृष्टिपात किया और मुस्कुराकर हाथ जोड़ दिए। कि तभी उसकी नजर सामने बैठे पारोमिता पर चली गई।
    और वह खुद कुछ देर के लिए उसे देखता रह गया। अंदर से उसके मन में अचानक ही तरंगे बहने लगी। उसे खुशी का आभास होने लगा, उसे अच्छा लगा कि पारोमिता भी उसे सुनने बैठी है।
    उसका मन किया कि वो कहता रहे और सामने बैठी पारो सुनती रहे। वो उसकी तरफ देख रहा था कि पारो की भी नज़र वरुण पर पड़ गयी..
   वरुण को एकाएक कुछ सूझा ही नही और उसने यूँ ही बिना कुछ सोचे कह दिया…-” आप लोगों के मन में अगर कोई शंका है तो आप पूछ सकती हैं। “
    पारो ने न में सिर हिला कर सिर नीचे कर लिया।

  लोग उठ कर जाने लगे थे। आश्रम की महिलाएं उसी जगह पर गोल घेरा बनाये बैठ गईं और ढोलक मंजीरा बजा बजा कर भजन गाने लगीं।
   उन्हें भजन करते देख पारो ने साथ बैठी सरिता से पूछा और अपनी जगह पर खड़ी हो गयी…-” ए ऐसे भजन बीच में छोड़ कर नही जाते।” उन्हीं महिलाओं में से एक कि कड़वी सी आवाज़ पारो के कान में पड़ी और पारो ने हाथ जोड़ कर बाहर निकलने की अनुमति मांग ली।
     वरुण का मन भी अब तक वहाँ से उठने का नही हो रहा था। वरना बाकी दिनों में प्रवचन के बाद वो उठ कर चला जाया करता था। पर आज दो चार लोगों के बुलाने पर भी वो किसी किताब को खोले वहीं बैठा रहा।
   की उसी वक्त पारो उठ कर बाहर निकल गयी। उसके वहाँ से निकलते ही वरुण का मन भी वहाँ से जाने का करने लगा। कुछ देर अपने मन को मना कर वो कुछ एक दो पन्ने पलटने के बाद आखिर वो भी उठ ही गया।

   परिसर से बाहर निकल इधर उधर देखता वो आगे बढ़ रहा था कि उसके साथ हमेशा बने रहने वाले स्वामी प्रशांत ने उसे टोक दिया…-“क्या हुआ वरुण ?”
   प्रशांत और वरुण ने कृष्ण आश्रम में अपनी यात्रा साथ ही शुरू की थी। कलकत्ता से जिन चार लड़कों की टोली केदारनाथ भेजी गई थी उनमें भी प्रशांत शामिल था। यहाँ तक कि केदारनाथ से वापसी के बाद जब वरुण देव के घर गया था तब भी प्रशांत उसके साथ देव के घर के बाहर तक गया था।
   वो बाहर ही गाड़ी में बैठा वरुण का इंतेज़ार कर रहा था। शुरू से ही साथ होने के कारण दोनो के बीच फ़िज़ूल औपचारिकता की कोई दीवार नही थी, इसी से  दोनों एक दूसरे का नाम ही लिया करते थे।

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   प्रशांत के द्वारा उसे पुकारे जाने पर जैसे वो यथार्थ में लौट आया…-“नही कुछ भी तो नही।”
” किसी को ढूंढ रहे हो क्या?” वरुण के चेहरे पर अपनी आंखें गड़ाए प्रशांत ने सवाल किया और उसकी आंखें देख वरुण खुद में ही झेंप कर रह गया।
   वाकई आश्रम में आकर रहते हुए वो आज कर क्या रहा था। जब से उस लड़की को देखा था जैसे उसका खुद पर से अधिकार ही खत्म हो गया था। जब तक वो वहाँ बैठी थी अच्छा लग रहा था, जैसे ही उठ कर गयी उसका मन भी उसके पीछे जाने को बावला होने लगा।
  पर ये तो गलत था!!! अब प्रशांत को क्या जवाब दे यही सोच रहा था कि प्रशांत ने ही उसकी बेचैनी का जवाब दे दिया…-“वो मंदिर के पीछे तरफ निकली है, शायद वाटिका के पीछे बनी झील पर चली गयी है।”
   वरुण प्रशांत की बात सुन एक बार फिर झेंप गया। अपनी झेंप मिटाने उसने एकदम ही निरर्थक सा सवाल कर दिया…-“कौन ?”
  और प्रशांत ने उसे ऐसी नज़रों से देखा कि वरुण फिर बिना प्रशांत की ओर देखे ही अपने अध्ययन कक्ष की तरफ बढ़ गया…
    प्रशांत भी उसके पीछे चल ही रह था की आश्रम के कुछ लड़के उन दोनों की तरफ चले आये…-” गुरुवर ! आप दोनों को भी गुरु उदयाचार्य अपने कमरे में अभी बुला रहें हैं।”
     सुबह के इस समय पर उदयाचार्य जी अधिकतर आश्रम की ज़रूरतों पर काम किया करते थे। आश्रम से सम्बंधित मीटिंग्स के लिए वो अक्सर दोपहर के खाने के बाद ही सबको बुलाया करते थे। आज अचानक क्या हो गया ये सोचते वरुण और प्रशांत भी तेज कदमों से उनके कमरे की ओर बढ़ चले।
    आश्रम के मुख्य संचालक, अन्य आचार्य और गुरुओं को मिलाकर लगभग ग्यारह बारह लोग  उस आश्रम के प्रमुख लोगों में थे जिनमें वरुण और प्रशांत भी शामिल थे।
   सभी के वहाँ पहुंचते ही उदयाचार्य जी ने अपनी बात कहनी शुरू की…. -” आप सभी को ये बताते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि हर वर्ष की तरह इस बार भी आश्रम का स्थापना दिवस मनाया जाना है। आज से ठीक तीसरे दिन ये शुभ तिथि पड़ेगी और उस दिन पूरे हर्षोल्लास के साथ हम अपने मंदिर आश्रम का स्थापना दिवस मनाएंगे। वैसे तो हर साल श्री श्री गुरुवर अमृताचार्य जी ही यहाँ आते थे लेकिन इस बार वो अमेरिका में स्थित मंदिर के विशेष कार्यक्रम में सम्मिलित होने जा रहे हैं।
  लेकिन इस बात से दुखी होने की आवश्यकता नही है क्योंकि उनकी जगह  इस बार श्री गुरुवर प्रबोध आचार्य हमारे बीच उपस्थित रहेंगे।
    वो अपने ऑस्ट्रेलिया प्रवास से कल ही वापस लौटे हैं और कल शाम तक वो हमारे आश्रम पहुंच जाएंगे। तब तक आश्रम की साफ सफाई और बाकी तैयारियां आप सभी को मिलजुल कर देखना है।
    ये हमने सूची तैयार कर रखी है। आप लोगों के नाम के सामने आपके काम लिखें हैं। अभी हमें थोड़ा बाज़ार का भी काम है तो हम अब निकलेंगे। आप लोग अपने काम के अनुसार अगर आश्रम में किसी प्रकार की कमी देखते हैं या कोई आवश्यकता लगती है तो उसे सूचीबद्ध कर के आज शाम तक हमें दे दीजिएगा। जिससे गुरुवर के आने पर उन्हें आश्रम में कोई कमी न लगे।”

   सूची उन्होंने सामने बैठे एक गुरुजी के हाथ में थमा दी और बाकी काम समेटने लगे।
   अपने नाम के आगे लिखा काम देखते वो लोग सूची आगे बढ़ाते जा रहे थे। 
प्रशांत ने अपना काम देख वरुण की ओर सूची बढ़ा दी। उसके नाम के सामने भगिनी आश्रम की महिलाओं की सहायता से पूरे मंदिर परिसर और आश्रम की पुष्प सज्जा के साथ ही गोपाल जी के वस्त्रो आदि की तैयारी लिखी थी।
  अपना अपना काम देख सभी लोग वहां से निकल गए।
  ” चलो फटाफट खाना खा कर अपना अपना काम देखना होगा। अब समय ही कहाँ बचा है। कल तक तो गुरुवर आ जाएंगे।”
  ” हाँ ! लेकिन प्रशांत ये बताओ कि ये गुरुवर हैं कौन?”
   ” ये श्री श्री स्वामी जी के परम शिष्य हैं। कहा जाता है बचपन में एक बार ये अपनी कक्षा में फेल हो गए, तब ये  नौ दस साल के रहे होंगे। इनके पिता ने क्रोधित हो इन्हें घर के बाहर निकाल कर दरवाज़ा बंद कर दिया। कुछ समय बाद जब पिता जी का गुस्सा शांत हुआ तब उन्होंने दरवाज़ा खोला तो ये वहां से गायब थे। अब इनकी ढूंढ मची तो पता चला ये गांव के बाहर की चौपाल पर अपना आसन जमाये बैठे थे। माता पिता सबने विनती चिरौरी कर ली लेकिन फिर ये लौट कर घर वापस नही गए। इनकीं माँ इनका खाना पीना सब वहीं ले आती। ये कभी खाते, कभी चार पांच दिन बिना खाये पड़े रहते। माँ रो रोकर आधी हो गईं पर ये घर वापस नही लौटे। एक सुबह जब इनके माता पिता रोज़ की तरह इनका भोजन लेकर वहाँ पहुंचे तो ये अपनी जगह नही थे। बाद में पता चला कि श्री स्वामी अमृताचार्य जी की गाड़ी उधर से निकली थी और स्वामी जी ने इनसे रुक कर कुछ बातचीत की और इनकी विद्वत्ता से इतने प्रभावित हुए कि इन्हें अपने साथ ले लिया। एक पत्र इनके माता पिता के नाम छोड़ गए जिसमें अपना पता ठिकाना सब लिख गए थे।
   इनके माता पिता कई बार इनसे मिलने आये लेकिन ये फिर कभी वापस नही लौटे। हालांकि इनकीं नाराज़गी तो बहुत पहले ही दूर हो गयी थी। कहा जाता है श्री श्री स्वामी जी ने इन्हें खूब शिक्षा दिलवाई और अब ये देश विदेश में घूम घूम कर प्रवचन देते हैं। उम्र तो यही कोई अट्ठाईस उनतीस के लगभग होगी पर अपने ज्ञान से ये हर तरफ छा गए हैं।
   मेरा इनसे मिलने का बहुत मन था, अब कल उनके दर्शन कर धन्य हो जाऊंगा। “

” अब तुमसे इतनी तारीफ सुन कर मेरा भी मन इनके दर्शन करने का होने लगा है।

” तुम्हें तो भई चुन कर भगिनी आश्रम मिला है। काम करते हुए उसे भी ढूंढ लेना, कुछ देर पहले जिसके पीछे जाते हुए कमरे का रास्ता भूल गए थे। “

” क्या कह रहे हो प्रशांत। मंदिर है ये और हम इसे अपवित्र नही कर सकते। “

” माफ करो दोस्त। मैं सिर्फ मज़ाक कर रहा था। चलों अपना काम धाम देखें। “

  प्रशांत ने उस वक्त बात बदल ज़रूर दी लेकिन वरुण के मन में ये बात रह गयी। क्या उसका बर्ताव वाकई पारोमिता के लिए अलग से दिखाई दे गया था। ऐसा हुआ तब तो आज प्रशांत ने उसे पकड़ा कल कोई और पकड़ लेगा।
   ऐसा होना तो ठीक नही है। अब उसे अपने मन को।कड़ा कर रखना होगा। चाहे कुछ भी हो जाये वो अब उस लड़की की तरफ आंख उठा कर भी नही देखेगा।

अपने संकल्प को मन ही मन दुहराते  वो अपने कमरे की ओर बढ़ रहा था कि सामने से तेज़ी से आती पारो ठीक उसके सामने तक आकर रुक गयी। अगर नही रुकती तो ज़रूर वरुण से टकरा चुकी होती। वरुण अपने दोनो हाथों को खड़ा कर ज़रा पीछे हो सतर खड़ा हो गया..-” माफ कीजियेगा ।” कह कर वो एक ओर से होकर आगे निकल गयी, और एक बार फिर उसका पीछा करती वरुण की आंखें दूर तक पारो के पीछे चलती चली गईं।

क्रमशः

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aparna ….


      


  

दिल से…. चिट्ठी आप सबों के नाम!

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प्यारे दोस्तों।

सबसे पहले तो आप सभी का शुक्रिया अदा करती हूं कि मेरे एक बार बोलने पर आप सभी मेरे ब्लॉग पर चले आए। पर यहां मेरे ब्लॉग पर भी आप सब मुझे सपोर्ट कर रहे हैं। मैं जानती हूं आप सब के दिल में यह भी चल रहा होगा कि आखिर मैंने अपना ब्लॉग लिखना क्यों शुरू किया। देखा जाए तो यह जरूरी था बेहद जरूरी। सिर्फ मेरे लिए ही नहीं मेरे जैसे उन ढेर सारे लेखकों के लिए भी जो ढेर सारी मेहनत करके लिखते तो हैं लेकिन उनके लिखेगा प्रतिसाद उन्हें नहीं मिल पाता।

मैं यहां किसी भी प्लेटफार्म की बुराई नहीं करूंगी। सभी प्लेटफार्म अपनी अपनी जगह सही है चाहे वह ऑनलाइन लेखन के प्लेटफार्म हों या ऑडियो स्टोरी सुनाने के प्लेटफार्म। हर एक प्लेटफार्म अपने आपके लिए काम करता है। अपनी ग्रोथ के लिए अपनी खुद की टीम के लिए । अगर हम लेखक उन प्लेटफार्म से जुड़ते हैं तो कहीं ना कहीं हमारा भी अपना एक लालच होता है कि हमें पाठक मिले। हमारी कहानियों को श्रोता मिले। आज बहुत से लेखक ऐसे हैं जो 1 से अधिक प्लेटफार्म पर काम कर रहे हैं। और यह लेखक लगातार काम कर रहे हैं। किसी प्लेटफार्म पर कहानियां लिखते हैं तो किसी दूसरे ऑडियो प्लेटफॉर्म के लिए भी अपनी कहानियां देते हैं। आप सोचिए उन लेखकों के दिन में भी 24 घंटे ही हैं। और वह उस टाइम को मैनेज करके लगातार मेहनत करते हैं। सिर्फ इसलिए कि उनकी कहानियों से उनकी कोई कमाई हो सके। लेकिन सच कहूं तो कोई भी प्लेटफार्म लेखकों को उनके परिश्रम के मुताबिक पारिश्रमिक नहीं देता। शायद इसीलिए लोगों को लेखन में कैरियर बनाने के लिए बहुत सोचना पड़ता है। ना ही इस क्षेत्र में जल्दी पैसा मिलता है और ना ही नाम। बावजूद लेखक के अंदर की भूख उसे लिखने के लिए बाध्य करती हैं। और यह भूख पैसों की भूख से कहीं ज्यादा तीव्र होती है । यह भूख होती है कि उसके लिखे को कोई पढ़े सराहे। अगर किसी लेखक को ढेर सारे पाठक मिलते हैं तो भले ही कमाई ना हो लेकिन वह उसी में संतुष्ट हो जाता है यह मेरा व्यक्तिगत विचार है जरूरी नहीं कि हर लेखक मेरे विचारों से सहमत हो।

अब मैं बात करती हूं अपने ब्लॉग और प्रतिलिपि की।

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मैं सच कहूं तो प्रतिलिपि की शुक्रगुजार हूं क्योंकि प्रतिलिपि ने ही मुझे वह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म दिया जहां आप सब से मेरी मुलाकात हो पाई। आज से ढाई साल पहले मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं लेखक भी बन सकती हूं । तब तक मैं सिर्फ और सिर्फ एक पाठक थी। प्रतिलिपि पर मैंने कभी कोई कहानी पढ़ कर लिखना नहीं सिखा। जैसा कि बाकी लेखक कहते हैं कि वह अपने शुरुआती दिनों में प्रतिलिपि पर पढ़ा करते थे और यही पढ़ते हुए उन के मन में लेखक बनने का विचार जागा। मैं बचपन से ही पाठक थी और वह भी जबरदस्त पाठक । पढ़ने का इस कदर शौक था कि मैं रोज घर पर आने वाले दोनों न्यूज़पेपर पूरे चट कर जाने के बाद सारे एडवर्टाइजमेंट और यहां तक कि निधन वाले कॉलम भी पढ़ लिया करती थी। जब कभी बचपन में मैं अपनी अलमारी जमाया करती तो कहीं भी अगर न्यूज़ पेपर बिछाने की पारी आती तो मैं उस पेपर को खोलकर घंटों तक पढ़ती रह जाती। मेरे इसी पढ़ने के शौक में जाने कितनी बार मेरी चाय के बर्तन को दूध की गंज को जला दिया। कॉलेज के दिनों में भी मेरा यही हाल था। संडे हमारा एक टाइम फीस्ट होने के कारण शाम के समय हमारा टिफिन नहीं आया करता था और तब पारी पारी से हम सहेलियां सबके लिए मेगी बनाया करती थी। जिस दिन मेरी पारी होती थी आप सोच ही सकते हैं कि मैं कितना बंटाधार करती रही होंगी। मैंगी चढ़ा कर वहीं खड़े-खड़े मैं कोई ना कोई किताब खोल कर पढ़ने लग जाया करती थी और मैगी की जलने की खुशबू सूंघकर मेरी सहेलियां दौड़कर रसोई में भागती थी कि आज फिर मैंने उनके डिनर को जला दिया।

पढ़ने के इतने जल्लादी शौक के बाद भी मुझे लेखन हमेशा से रॉकेट साइंस लगा करता था। मैं जब भी अपने पसंदीदा लेखकों को पढ़ती थी तो यही सोचती थी कि लिखना बहुत मेहनत का काम है। कैसे कोई लेखक इस कदर हमारी भावनाओं को अपने पन्नों पर उतार लेता है। और कैसे हम उसके लिखे को पढ़कर बिल्कुल वही महसूस करने लगते हैं। उसके लिखे शब्दों के साथ हंसते हैं और उसी के लिखे शब्दों को पढ़कर रोते हैं। ऐसा कैसे संभव हो सकता है? मेरे लिए लेखक हमेशा से परम श्रद्धेय थे अब भी हैं और हमेशा रहेंगे!

आप में से कई लोग बहुत बार यह सवाल भी कर चुके हैं कि मैं प्रतिलिपि पर इन लेखकों को पढ़ती हूं तो मैं आपको बताना चाहती हूं कि मैं जिम साहित्यकारों को पढ़कर बड़ी हुई हूं और जिनकी रचनाएं आज भी समय निकालकर पढ़ती हूं उनमें से प्रेमचंद शरतचंद्र ममता कालिया आदि के अलावा शायद ही किसी की रचना प्रतिलिपि पर मौजूद हो।

प्रतिलिपि पर आज के नए लेखकों की भरमार है और सभी बेहद खूबसूरत लिखते हैं। लेकिन इनमें से किसी को भी पढ़ने का अब तक सौभाग्य नहीं मिल पाया और इसका कारण उन लेखकों की कमी नहीं बल्कि मेरे पास वक्त की कमी है। जब थोड़ा सा समय मिलता है आप सभी के लिए कुछ ना कुछ लिखने की कोशिश करती हूं और इसी कोशिश में किन्ही भी नए लेखकों को नहीं पढ़ पाती हूँ।

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प्रतिलिपि पर जब से मोनेटाइजेशन शुरू हुआ लेखकों के बीच भी एक होड़ सी लग गई अपने सब्सक्राइबर्स बढ़ाने की होड । पर देखा जाए तो इस बात पर हम लेखकों का कोई कसूर भी नहीं आज तक निशुल्क लिखी रहे थे लेकिन जब कहानी पर कमाई का जरिया मिला है तो कोई भी क्यों छोड़ना चाहेगा।

इसके बाद बात शुरु हुई पाठकों की नाराजगी की । सब्सक्रिप्शन से हटाने के लिए लोगों ने इनबॉक्स में भूकंप ला दिया। पहले पहल मैंने भी सोचा कि मैं अपनी कहानियों को सब्सक्रिप्शन से हटा लूंगी लेकिन फिर यह महसूस हुआ कि अगर मैं ऐसा करती हूं तो मेरे साथ के बाकी लेखक ऐसा नहीं करते तो जाहिर सी बात है कि उनके ऊपर और भी ज्यादा दबाव डाला जाएगा कि देखिए उन्होंने तो अपनी कहानी से सब्सक्रिप्शन हटा लिया फिर आप क्यों इतना लालच कर रही हैं। जाहिर है यह कंपैरिजन नहीं होना चाहिए लेकिन होगा। अगर मैं सब्सक्रिप्शन हटाती हूं तो इसमें मेरे साथी लेखकों की तो कोई गलती नहीं है अगर वह अपनी कहानी उसे अपनी मेहनत से कोई कमाई करना चाहते हैं तो इसमें वह कोई गुनाह नहीं कर रहे बल्कि मैं पूरी तरह से उन सभी के सपोर्ट में हूं कि ऐसा करना ही चाहिए।

और इसीलिए मैंने अपनी कहानियों से सब्सक्रिप्शन नहीं हटाया। बल्कि बीच का यह रास्ता चुना कि मैं ब्लॉग पर भी अपनी कहानियां उसी समय पोस्ट कर सकूं। जिससे जो लोग सब्सक्रिप्शन लेकर नहीं पढ़ना चाहते वह मेरे ब्लॉग पर आकर उसी दिन निशुल्क उस कहानी को पढ़ सकते हैं।

इतना शानदार ऑफर देने के बावजूद अब तक बहुत से लोग प्रतिलिपि पर ही मुझे पढ़ना चाहते हैं । मैं उन पाठकों की इस बात को भी पूरी तरह समझती हूं मैं विज्ञान की विद्यार्थी हूं और अच्छे से जानती हूं कि मोमेंट ऑफ इनर्शिया यही होता है। जी हां इसे जड़त्व का नियम भी कहा जाता है इसका अर्थ है जब हम चलते रहते हैं तो हम चलना ही चाहते हैं रुकने के लिए हमारा शरीर हमारा विरोध करता है इसीलिए जब हम चलती हुई बस से उतरते हैं तो हम एकदम से स्थिर नहीं हो सकते हमें थोड़ी देर तक अपने शरीर को बस के साथ ही दौड़ आना पड़ता है या गति में रखना पड़ता है।

बस यही मोमेंट आफ इनर्शिया प्रतिलिपि पर पढ़ने वाले पाठकों के साथ भी हैं । उन्हें लगता है प्रतिलिपि पर पढ़ना आसान है। इसके अलावा कहीं भी और जाकर वह पढ़ना नहीं चाहते। मैं भी किसी पर दबाव नहीं बनाना चाहती लेकिन इसी कारण अब मुझ पर दबाव बढ़ने लग गया है । दो प्लेटफार्म पर एक साथ एक ही कहानियों को चलाना बेहद मुश्किल और तनाव भरा है। कब किस जगह पर कौन सी कहानी पोस्ट की थी। किस प्लेटफार्म पर अभी कहानी का अगला कौन सा भाग डालना है यह सब बहुत जटिल हो गया है।

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और इसीलिए अब यह सोचा है कि कुछ कहानियां सिर्फ अपने ब्लॉग पर ही लिखूंगी।

ब्लॉग पर लिखने से मुझे क्या फायदा है अब मैं उसके बारे में आप सभी को बताना चाहती हूं। पहली बात ब्लॉग पर आप सभी निशुल्क मुझे पढ़ सकते हैं दूसरी बात मेरे ब्लॉग पर अगर 1000 से ज्यादा फॉलोवर्स होते हैं तो वर्डप्रेस ब्लॉग मुझे मेरा ब्लॉग लिखने के लिए आप सब से कोई शुल्क लिए बिना मेरे अकाउंट को बिजनेस अकाउंट बना देता है और जिससे मुझे लाभ मिलता है। इसके अलावा मेरी कहानियों पर गूगल ऐड जो भी एडवर्टाइजमेंट डालता है उससे भी मुझे रेवेन्यू जेनरेट होता है यानी कि मेरी कमाई होती।

अब आप सोचिए कि ये आपके और मेरे दोनो के लाभ का सौदा है। आपको कुछ नहीं करना सिर्फ आकर मुझे पढ़ना है वह भी पूरी तरह से निशुल्क और उसके बदले मुझे गूगल से और वर्डप्रेस से पैसे दिए जाएंगे क्योंकि मेरा पेज बार-बार खोला जा रहा है और मेरे पेज पर एडवर्टाइजमेंट नजर आ रहे हैं।

क्योंकि यह मेरा पर्सनल ब्लॉग है और यह गूगल पर है तो इसलिए 1000 फॉलोअर्स से अधिक होने पर गूगल भी मुझे कुछ निश्चित राशि देना शुरू करेगा। मैं मानती हूं यह राशि बहुत कम है ।रेवेन्यू बहुत ज्यादा जनरेट नहीं होता लेकिन फिर भी मुझे मंजूर है। क्योंकि यहां मेरे पाठकों को मुझे पढ़ने के लिए कुछ भी खर्च करने की जरूरत नहीं है। लेकिन मुझे फायदा बढ़ाने के लिए आप यह जरूर कर सकते हैं कि मेरी कहानियों को आप अपनी सोशल अकाउंट पर शेयर कर सकते हैं। मेरे इस पेज यानी अनकहे किस्से को आप ज्यादा से ज्यादा अपने इंस्टाग्राम फेसबुक आदि अकाउंट पर शेयर कर सकते हैं। अगर आप सभी के फेसबुक पर 100 दोस्त भी हैं, और अगर उन्हें मेरी कहानी पढ़ना पसंद आता है ।तो वह मेरे ब्लॉग पर आकर मुझे फॉलो कर सकते हैं और इस तरह मेरे फॉलोवर्स की संख्या बढ़ सकती है। और साथ ही बढ़ सकते हैं मेरी रोजाना के व्यूज। आपको इस सम्बंध में कोई भी डाउट है तो आप समीक्षा में मुझसे खुल कर पूछ सकते हैं।

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वैसे यह आप सभी का प्यार ही था कि पहले महीने में ही मेरे ब्लॉग पर लगभग रोज के 1000 से ज्यादा व्यूज आने लग गए थे। लेकिन आप सभी को एक बार फिर अपना प्यार साबित करना पड़ेगा मेरे फॉलोवर्स बढ़ाने में और मेरे व्यूज बढ़ाने में सिर्फ आप सभी मेरी मदद कर सकते हैं।

प्रतिलिपि और मेरी मोहब्बत कितनी तगड़ी है यह तो आप सब जानते हैं । वहाँ पर ढेर सारे लेखक अपने कुकू एफएम पॉकेट एफएम के पोस्ट शेयर करते रहते हैं लेकिन उनसे प्रतिलिपि को कोई परेशानी नहीं है। और मैं ने जैसे ही अपने ब्लॉग के बारे में लिखा मुझे तुरंत नोटिस जारी कर दिया। इसलिए अब वहां मैं अपनी कोई पोस्ट शेयर नहीं कर सकती। हो सकता है कि कई पाठकों को शायद यह पता ही नहीं कि मैं अब मेरे ब्लॉग पर भी लिखती हूं तो दोस्तों हो सके तो आप सभी के सोशल अकाउंट पर मेरी कहानियों या मेरे पेज का प्रचार करने में मेरी मदद करें।

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बाकी तो आप सभी जानते हैं कि मैं संस्कारी बहुत हूं इसलिए पंगों से दूर ही रहती हूं। पर अब जाने क्यों आप सभी ब्लॉगर जो मेरे ब्लॉग पर मुझे फॉलो करते हैं से एक अलग से जुड़ाव हो गया है आप लोगों के सामने तो दिल खोल कर मैं अपनी भड़ास निकाल सकती हूं। तो बस मुझे दिवाली तक में 1000 फॉलोअर्स चाहिए और साथ ही चाहिए डेली के 2000 प्लस व्यूज भी।

वहां 22000 लोग फॉलो करते हैं पर पता नहीं क्यों फॉलो करते हैं। मेरी बात सुनते तो है नहीं पर चलो कोई नहीं। जो सुनते हैं वह लोग भी अगर मान गए तो भी बहुत बड़ी बात है।

एक और बात कहनी थी आप 297 फॉलोअर्स यहां मौजूद हैं। क्या आप सभी को मेरी हर पोस्ट की नोटिफिकेशन मिलती है। अगर आप लोगों को नोटिफिकेशन नहीं मिलती तो प्लीज प्लीज प्लीज मुझे इस पोस्ट पर मैसेज करके बताइए। मेरा टेलीग्राम चैनल और फेसबुक पेज की लिंक भी मैं आपसे शेयर करूंगी। आप हो सके तो मेरे फेसबुक पेज को भी फॉलो कर सकते हैं और टेलीग्राम चैनल को भी। जिससे मैं हर कहानी की पोस्ट का लिंक वहां शेयर कर सकूं।

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और अगर आप इतना सारा मेरे लिए करेंगे तो मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं नई नई अनोखी और अलग हटकर कहानियां आप लोगों के लिए सिर्फ आप लोगों के लिए अपने ब्लॉग पर लिखती रहूं।

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आप सभी की संस्कारी लेखिका

aparna…..

शादी.कॉम – 24

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  शादी डॉट कॉम:- 24
                   

                  रिवॉलविंग चेयर पे वही तो बैठा था,  अपनी सफेद कमीज की बाहों को कुहनीयों तक मोड़ कर दाहिने हाथ मे ऑडिटर वाली पेन्सिल पकड़े टेबल पर पड़ी फाइल को देखता,,बिल्कुल वैसे का वैसा।। पर बुआ सही कह रही थी ,कुछ दुबला हो गया था,और ये चश्मा कब लग गया जनाब को।।
       अपने इस अवतार में तो और भी लुभावना हो गया था राजा!!
      राजा को देख ही रही थी कि राजा से उसके किसी साथी ने कुछ कहा,जिसे सुन वो खिलखिला के हँस पड़ा और तभी उसकी नज़र दरवाजे पे खड़ी बांसुरी पर पड़ गयी।।

      कितनी दुबली हो गयी थी बांसुरी!! पहले से कुछ अलग भी लगने लगी थी,अपने लम्बे बालों को सदा बांधे रखने वाली बंसी के बाल कितने करीने से कटे संवरे उसने खुले छोड़ रखे थे,एकदम एक सीधी लाइन मे सतर सीधे बाल ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने गर्म लोहा चला दिया हो ,उसपर सामने की कुछ लटें हवा से उड़ कर बार बार आंखों के आसपास आ उसे परेशान कर रही थी,जिन्हें उतनी ही शालीनता से अपनी उंगलियों से कान के पीछे संवारती बांसुरी कितनी प्यारी लग रही थी….
     खुले बाल ,आंखों मे लगा काजल,कानों में छोटे-छोटे हीरे के कर्णफूल,और गले में सोने की पतली सी चेन,उसी से मैच करती रागा की घड़ी, स्मार्ट तो पहले ही थी अब महानगरीय छवि को इतनी आसानी से आत्मसात कर और भी मोहक हो चली थी…..

      दोनों ने अभी एक दूसरे को भर नज़र देखा भी नही था कि सिद्धार्थ की आवाज़ उनके कानों में पड़ी

सिद्धार्थ -“सर ये मेरी एम्प्लायी हैं बांसुरी!!,ये आपको इस फाइल की सारी डिटेल्स समझा देंगी, कम बांसुरी!!”

राजा-” हेलो!! प्लीज़ बी सीटेड!!

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बांसुरी- ” थैंक यू” बोल कर बांसुरी राजा की सामने की कुर्सी पर बैठ तो गयी पर उसे खुद अपने आप पर बड़ी शर्मिंदगी सी हो रही थी,,राजा को देखने के बाद उसकी हृदय गति जिस तीव्रता से बढ़ती चली जा रही थी ,ऐसा लग रहा था शताब्दी से होड़ लगा रही है।।
         कांपते पैरों को यथासम्भव संयत कर उसने झुक कर फाइल उठा ली,,ऑफिस की सबसे होनहार एम्प्लायी का सारा तेज़ आज चूक गया,वहाँ की सबसे धुरंधर खिलाडी का हर दांव टेढ़ा पड़ गया.. बांसुरी उसे देख चकित थी,उसे बार बार देखने का मोह त्याग नही पा रही थी,लेकिन वो अपने पूरे आत्मविश्वास के साथ मुस्कुराता उसके सामने बैठा एक के बाद एक हर साल का हिसाब उससे बड़े आराम से मांगता चला जा रहा था।

     इसी हड़बड़ी में किसी एक जगह पे गलती से छूट गये दस्तखत करने जैसे ही बांसुरी ने टेबल से पेन उठानी चाही,वहीं रखा पानी का गिलास लुढ़क गया, वो ज़मीन पे गिर के चकनाचूर होता उसके पहले ही राजा ने उसे पकड़ लिया __

  राजा– रिलैक्स बांसुरी!! आराम से बताती जाओ ,हमें कोई जल्दी नही है,हम पूरे पांच दिन यहाँ रुकने वाले हैं।।

   पूरे पांच दिन पर राजा ने सच में ज़ोर दिया था या बांसुरी के ही मन का वहम था,पर जो भी था उसका दिल तो बार बार यही कह रहा था कि ये पांच दिन उसके जीवन से कभी समाप्त ना हों।।

    इसके बाद करीबन तीन घन्टे दोनो फाइलों पर सर गड़ाये काम करते रहे,बीच में जितनी भी बातें हुई सिर्फ बैंक और बैंक के काम को लेकर ही हुई।।

    ऑडिटर टीम का लंच फाईव स्टार होटल में प्रस्तावित था,जहां सिद्धार्थ उन सब को लेकर जाने वाला था,पर टीम के सीनियर के साथ अन्य लोगों ने भी वही बैंक के कैन्टीन में ही खाने की इच्छा जाहिर की जिससे एक पल को सिद्धार्थ भी सोच में पड़ गया कि कहीं ये भी टीम की इंटर्नल ऑडिट का हिस्सा तो नही?
      पूरी टीम को लिये सिद्धार्थ कैन्टीन में पहुंच गया, वहाँ पहले से बैठे सभी कर्मचारी सतर हो गये, पर टीम पूरी तन्मयता से मेन्यू देखने में ही व्यस्त थी,जब सभी को समझ आ गया कि ये उनके काम का हिस्सा नही है तब एक बार फिर सभी अपने खाने पीने और बातों में लग गये ।।
 
      उसकी टेबल से कुछ दूर हट कर जिस टेबल पर सिद्धार्थ ने सब को बैठाया वहाँ जान बूझ कर राजा ने ऐसा किया या अनजाने में बांसुरी समझ नही पायी पर जिस कुर्सी को सिद्धार्थ ने राजा के बैठने के लिये खोला उसे छोड़ राजा उस कुर्सी पे जा बैठा जिससे वो ठीक बांसुरी के आमने सामने पड़ गया।।

     वो तो बड़े मज़े से सबसे हँसता बोलता खाता रहा पर बांसुरी के गले से फिर एक निवाला भी नीचे नही उतरा….सभी का साथ देने वहाँ बैठना भी ज़रूरी था,पर अपनी प्लेट और चम्मच से निरर्थक खेलती बांसुरी को बार बार यही लग रहा था की सामने बैठे वो उसे देख रहा है,और इत्तेफाक से जब जब बांसुरी की नज़र राजा पर पड़ी हर बार उसने उसे खुद को देखता हुआ ही पाया….शरमा कर कभी बाल ठीक करती कभी पहले से जमे आंचल को सही करती बांसुरी वहाँ से निकल भागने को तड़प उठी।।

    इतने सालों में मन ही मन जिसका नाम जपती चली जा रही थी ,आज उसी से ऐसे आमना सामना हो गया कि सारा प्रेम सरल संकोच में बदल गया।।
  
      लंच समाप्त कर टीम वापस अपने काम में लग गयी,उन लोगो के रुकने की व्यवस्था बैंक की तरफ से मैरियट में की गयी थी।।
     लंच के बाद बांसुरी वापस अपने डेस्क पर आ गयी थी,कुछ थोड़े बहुत काम निपटा के टीम वहाँ से निकल गयी तब एक बार फिर सिद्दार्थ ने मीटिंग बुला ली।।

“गाईज़ आज का तो काम निबट गया,पर कल ये लोग सारे इंटरनल आडिट शुरु करेंगे, कल का दिन हमारे लिये थोड़ा मुश्किल हो सकता है ,सो बी रेडी”

  सिद्धार्थ के जाते ही माला दो कॉफ़ी के कप पकड़े बांसुरी की डेस्क पर आ गयी।।

” बंसी !! यार देखा तूने क्या हैंडसम बंदा आया है, हाय!!! ऐसे बंदे आयें तो मैं रोज़ ऑडिट करा लूँ ।”

राहुल- ” सुना है ग्रेड बी क्लियर किया है उसने ,वो भी एक बार में।।सही है बॉस ….. भगवान जिसे देतें हैं छप्पर फाड़ के देतें हैं ।”

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माला- ” सही है !!! क्रीम जॉब है,फुल ऐश!! बंदा शकल से ही पैदाईशी ब्रिलीयन्ट दिख रहा,स्कूल कॉलेज टॉपर टाईप,है ना बंसी ।।

   माला की बात सुन बांसुरी को ज़ोर की हँसी आ गयी,वो कैसे मुहँफट होकर राजा को गधा बोल देती थी ,और आज देखो उसके ही ऊपर पहुंच गया।।

माला– नाम क्या था राहुल ,उस बंदे का?? और है कहाँ का??

‘राजकुमार ‘ बोलते बोलते बांसुरी चुप रह गयी

राहुल- तुझे बड़ी माख लगी है पता करने की,,शादी करने का विचार है क्या??

माला– और क्या ? ऐसा सही प्रपोसल मिले तो क्यों ना शादी कर लूँ,तेरे जैसे बन्दर से तो फार बेटर है।

राहुल- आर के बोल रहे थे सब के सब ,हम तो भाई आर. बी.आई. वालों को सर ही बोलतें हैं,क्या पता कल को आठ दस साल बाद ये गवर्नर बन जायें और इनके दस्तखत वाले नोट से हम अपना राशन खरीदें ।
माला– हम्म पर जो भी हो,बंदा तो दिल ले गया मेरा, चल यार बांसुरी अब घर चलें,आज तो थकान भी बड़ी मीठी सी लग रही।।

   सब के सब हँसते हुए घर को निकल पड़े ।।

************

     बांसुरी बाथरूम से हाथ मुहँ धो कर निकली तब तक में माला चाय बना कर ले आयी और रेडियो ट्यून करने लगी__

           मन ये साहेब जी, जाणे हैं सब जी
              फिर भी बनाए… बहाने
          नैना नवाब जी, देखें हैं सब जी
              फिर भी न समझे… इशारे

          मन ये साहेब जी, हाँ करता बहाने
            नैना नवाब जी, न समझे इशारे
              धीरे-धीरे नैनों को धीरे-धीरे
                  जीया को धीरे-धीरे
                     भायो रे साएबों

धीरे धीरे कहाँ वो तो बहुत तेज़ी और मजबूती से हृदय में अपना आसन जमाये बैठा है…..
      बांसुरी एक बार फिर सोच मे पड़ गयी__ इतना लम्बा समय तो नही बीत गया था फिर ये कैसा संकोच दोनो के बीच पसर गया था।
     “चलो मैं तो लड़की हूँ,लड़कियाँ स्वभाव से ही संकोची होती हैं,पर वो तो आगे बढ कर बात कर सकता था,पूछ सकता था__ कैसी हो बांसुरी ?
   पर उसने भी कहाँ ज़रूरत समझी हालचाल पूछने की,अरे इतने साल कहाँ रही,कैसे रही,कुछ जानने का मन नही किया??
   कैसे बना रहा जैसे कोई जान पहचान नही ,सारा वक्त बस फाइल्स और बैंक की ही बातें करता रहा, जैसे बहुत ही गम्भीर हो अपने काम के लिये, क्या मै नही जानती,एक एक रग से वाकिफ हूँ,और मेरे सामने ही इतना दिखावा!!”

    दिखावे वाली बात सोच बांसुरी को खुद पर ही हँसी आ गयी__ कहाँ किया उसने दिखावा?? कोई दिखावा बनावटीपन ना उसे पहले कभी छू पाया था ना अभी!! वो तो बिल्कुल सामान्य बना हुआ था, ना उसे बांसुरी से कोई शिकवा था ना शिकायत!!
   और शायद इसी बात से बांसुरी ज्यादा परेशान हो उठी थी।।
     अगर कभी भी दोनो के बीच प्रेम था तो उसे वापस मिलने के बाद शिकायत करनी चाहिये थी ना, पूछना चाहिये था मुझे अकेला छोड़ कर कहाँ  चली गयी थी बांसुरी पर नही वो तो बिल्कुल तटस्थ बना हुआ था,ऐसे मुस्कुरा रहा था जैसे असल में उसे अब कोई फर्क ही नही पड़ता बांसुरी रहे या ना रहे।।
      पर जब फर्क ही नही पड़ता तो ऐसे घूर घूर के देख क्यों रहा था।।

माला- मैडम जी कहाँ खोयी हुई हो!!! इतनी देर से देख रही हूं बाई गॉड,खुद से बातें कर रही हो, क्या हो गया भई ,,सिद्धार्थ की याद सता रही क्या??

   माला बांसुरी को देख ज़ोर से हंसने लगी

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माला– नही नही अच्छा है,लगे रहो!! बेटा शादी तो करनी ही है एक दिन,और बॉस अगर आप पे फिदा है तो इससे अच्छा तो कोई ऑप्शन हो ही नही सकता ।।।

बांसुरी- चुप करो यार!! ऐसा कुछ नही है,हम तो कुछ और सोच रहे थे…..

माला — अब तो लग रहा जैसे इस आर.के. के चक्कर में मुझे भी तेरे जैसे सोचने की आदत पड़ जायेगी।।
     क्या महक रहा था यार बंदा ,जाने कौन सा पर्फ्यूम लगाया था उसने।

बांसुरी– डेविडॉफ

माला– क्या?? क्या कहा तूने,,तुझे कैसे पता??

बांसुरी– हमें कैसे पता होगा,तुम खुद ही सोचो …. अरे यार हमने तो ऐसे ही मजाक मे कह दिया,और तुम सीरियस होकर बैठ गयी।।

माला– हम्म सही कहा ,पर यार राहुल कह रहा था बंदा तेरे ही शहर का है….यार इसी बहाने बात करवा दे मेरी ,कुछ तू अपने शहर की बात पूछ लियो और उसी बहाने मैं उसे ताड़ लूंगी।।

   बाँसुरी मुस्कुरा कर रसोई में चली गयी__” पुलाव बनाने जा रही हूँ,चलेगा ना।”

माला- दौड़ेगा मेरी जान!! तेरे हाथ के मटर पुलाव पर तो ‘ मैं वारी जावाँ,’।।

***************

अगले दिन सुबह से ही बैंक में अफरा तफरी मची थी, सभी टीम मेंबर्स बहुत गम्भीरता से हर एक फाइल का मुआयना कर रहे थे।।
     टीम के सीनियर तीनो लोग ऑडिट में व्यस्त थे , सभी किसी ना किसी काम को करने में लगे थे बस एक वो ही कहीं नही था।।
   
          चारों तरफ बार बार देखने पर भी बांसुरी को राजा नज़र नही आ रहा था,पहले उसे लगा शायद सिद्धार्थ की केबिन में होगा इसिलिए एक बार वो बहाने से वहाँ भी हो आयी,पर वहाँ भी नदारद।।
     दूसरे ऑफिस रूम में भी नही था,यहाँ तक की हार कर बांसुरी एक बार लॉकर रूम भी झांक आयी, आखिर आज गायब कहाँ हो गया??

         अपने डेस्क पे वापस आ कर बाँसुरी ने फाइल खोली ही थी कि उसे अपने पीछे से वही आवाज़ सुनाई दी__ ” हमें ढूँढ रही थी??”

   चौंक कर बांसुरी ने पीछे देखा,,,राजा खड़ा मुस्कुरा रहा था,वो भी मुस्कुरा उठी…..

सिद्धार्थ– सर!!आईये आईये ,आप ही का वेट कर रहे थे,,अब तबीयत कैसी है आप की,is everything alright?”

राजा- yeah everything is fine,,चलिये आगे का काम देखा जाये।।

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    बांसुरी पे एक के बाद एक बम फोड़ा जा रहा था, पहले आर.बी.आई. की टीम के हिस्से के रूप मे, फिर ऐसी धुआँधार अन्ग्रेजी बोल के…..
    कितना बदल गया था वो,,पर मन से आज भी वही कानपुर का अपने मोहल्ले का राजा भैय्या ही था…..
       जी में तो आ रहा कि एक बार गले से लग के इतने दिनों के सारे ताने उलाहने माफ कर लिये जाये,पर सामने पड़ने पर तो हाथ भी मिलाने की हिम्मत नही हो रही थी।।

**************

    लंच के समय एक बार फिर बांसुरी ने सोचा __ “अगर आज सामने की कुर्सी पर बैठा तो बिना किसी लाज शरम के मैं भी आँखे खोल के देखूँगी….कुछ ज्यादा ही फ्रैंक हो रहे हैं जनाब!!

   पर हाय रे मन!! जो सब सोच सोच के भावी रूपरेखा तैयार की जाती है ,ज़रूरी नही कि ये मन उस समय आपका साथ दे और आपको सब अपने मन का पूरा करने दे।।
      बांसुरी का मन खुद हर बार उसे धोखे पे धोखे दिये जा रहा था,बेचारी कुछ सोच के रखती पर राजा के सामने पड़ते ही हो कुछ जाता।।

     एक बार फिर वही हुआ!!,वो बड़ी शान से अपनी टीम के साथ आया और ठीक उसके सामने की कुर्सी खींच बैठा गया….एक बार फिर बांसुरी कट के रह गयी,ना उसके बाद वो माला से कोई बात कर पायी और ना ही ढंग से कुछ खा पायी।।

    टीम के सदस्यों के खाने की व्यवस्था देख सिद्धार्थ बांसुरी की टेबल पे चला आया ,और एकदम उसकी कुर्सी के पास ही खड़ा हो कर उन लोगों को आगे के बारे में कोई जानकारी देने लगा….
       सिद्धार्थ पहले भी ऐसा करता था या आज ही कर रहा था पर बांसुरी को उसका इतना घुल मिल के  बात करना रास नही आ रहा था….

     बात करते करते सिद्धार्थ ने बांसुरी की प्लेट से एक इडली उठा ली और बड़े मज़े से चटनी लगा कर खाने लगा,पर उसकी इस हरकत पर बांसुरी तिलमिला कर रह गयी,मन ही मन प्रार्थना करती हुई कि राजा ने ना देखा हो उसने जब राजा की तरफ देखा तो वो उसे ही देख रहा था।।
    अब इतनी दूर से वो उसे समझाती भी कैसे कि सिद्धार्थ की इस हरकत में बाँसुरी की कोई जिम्मेदारी नही थी….पता नही आज ही वो क्यों इतना फ्रेंडली हो रहा था।।

    बाँसुरी ने अपने सूखते गले को तर करने पानी पीकर गिलास नीचे रखा और सामने देखा तब तक राजा वहाँ से जा चुका था।।

***************

   राजा को सिद्धार्थ का इस तरह बांसुरी से घुलना मिलना पसंद तो नही आ रहा था,पर वो भी कॉरपोरेट जगत की सभ्यता को समझता था,इस बात को जानने लगा था कि साथ काम करते हुए अक्सर ऐसे रिश्ते बन जाते हैं  ।।
     तभी राजा को फोन बजने लगा उसे उठाये वो बाहर निकल गया।।

   बाँसुरी ने जब राजा को अपनी कुर्सी पर नही पाया तो वो भी लपक के बाहर निकल गयी….

माला– क्या हुआ बंसी ?? कहाँ चल दी तुम?

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बांसुरी– बस अभी आयी……बिना उन लोगो की तरफ देखे वो जल्दी से कैन्टीन से निकल ही रही थी कि बाहर गैलरी में इधर से उधर घूमते हुए फोन पर बात करते राजा पर उसकी नज़र पड़ गयी,राजा ने भी उसे देख लिया,वो मुस्कुराते हुए उसकी तरफ बढ़ आया__
 
   ” बन्टी का फोन था,उसकी पोस्टिंग मुम्बई में ही है, आज शाम मुझसे मिलने पुणे आ रहा है।।

” अच्छा” बांसुरी को इससे अधिक कुछ सूझा ही नही कि क्या कहे।।

राजा– तुम भी चलोगी डिनर पर?? यहीं कहीं आस पास चले जायेंगे जिससे तुम्हें लौटने मे देर ना हो।।

    उफफ!! कितना औपचारिक निवेदन था ये,,अरे पूरे रौब से भी तो कह सकता था,कि बांसुरी रात मे हमारे साथ तुम भी डिनर पर चलना पर नही….
       बांसुरी को अपने विचारों में खोये देख राजा कुछ बोलने ही जा रहा था की उसने तुरंत ही हामी भर दी,बांसुरी को लगा अगर उसने जल्दी से जवाब नही दिया तो कहीं राजा अपनी योजना ही ना बदल दे।।

” हाँ हम आ जायेंगे,पर आना कहाँ हैं??”

” रुके तो हम मैरियट में हैं,, चाहें तो वहाँ डिनर कर सकते है पर वापसी में तुम्हें थोड़ा दूर पड़ेगा।।”

” कोई बात नही,हम आ जायेंगे।।

” ठीक है ,ऐसा करना अपनी सहेली को भी लेते आना जिससे अकेले ना लौटना पड़े ।।”

  बांसुरी ने हाँ में सर हिलाया और मुस्कुरा के वापस चली गयी पर ये आखिरी बात दिल में फांस की तरह चुभ गयी….माला को लेकर आने क्यों बोला आखिर राजा ने??

*************

    वैसे हमेशा सिर्फ दस मिनट में झट से तैयार होने वाली बंसी को आज क्या पहनूँ क्या ना पहनूँ सोचने में ही आधा घंटा लग गया…..
     आधे घन्टे से तैयार हो कर बैठी माला ने जब हर एंगल से अपनी सेल्फी खींच ली तब झल्ला के उसने ही आलमारी से एक मैरून कुर्ता निकाल उसके हाथ में पकड़ा दिया__
    ” बन्सी अब और देर की ना तूने,तो मैं अकेली ही चली जाऊंगी।”

  बांसुरी तैयार होकर आयी तो माला उसे देखती ही रह गयी__
    ” क्या बात है बन्सी!! आज तो मतलब खूब जम रही हो ,,दिन भर जिसके गाने सुनती हो ना तुम्हारी प्यारी सुचित्रा सेन उनकी नवासी रायमा जैसी ही लग  रही हो, भई अब तो बता दो ,हम जा कहाँ रहे हैं ।।

” सरप्राइस है आपके लिये,चलिये तो सही।।”
  मुस्कुराती हुई बंसी दरवाजा खोल बाहर निकल आयी।
 
    दोनों के वहाँ पहुंचने तक राजा और बन्टी भी हॉल में आ चुके थे,और उन्हीं दोनो का इन्तजार कर रहे थे।।

माला–उफ अल्ला!! बन्सी तू वापस चल घर,फिर बताती हूँ तुझे,,एक बार तो बताती की हम आर के से मिलने आ रहे हैं,यार मैं भी कुछ ढंग का पहन लेती, कैसी बेकार सी जीन्स डाल ली मैंने।।

  दोनों को देखते ही राजा ने खड़े होकर दोनो का मुस्कुरा के अभिवादन किया और माला का बन्टी से परिचय करवा दिया_
” ये मेरे कजिन है रविवर्मा,मुम्बई एक्सेंचर में काम कर रहे हैं,मेरा काम पुणे में है पता चला तो मुझसे मिलने आ गये।।
    और बन्टी ये हैं माला जी,ये भी उसी बैंक में काम करती हैं जहां बांसुरी ।।

बन्टी– हेलो जी!! आप दोनो से मिल कर बड़ी खुशी हुई,,क्या हाल है बंसी !!तुम तो यार और दुबली हो गयी हो,वैसे अच्छी लग रही हो।।

माला को कुछ भी समझ नही आ रहा था वो कभी बांसुरी को देखती कभी अपने सामने बैठे दोनो लड़कों को।।

  बांसुरी ने दो दिन से राजा को फॉर्मल कपडों में ही देखा था,उसे अभी ब्लू डेनिम और टी शर्ट में देख थोड़ा संकोच कम होने लगा।।
   इत्तेफ़ाक़ से राजा ने भी मैरून टी शर्ट ही पहनी थी

बांसुरी– कैसे हैं आप बन्टी भैया,क्या हाल चाल हैं ।

बन्टी–हाल तो फिलहाल ए सी है,और चाल चलन के तो हम बचपन से बड़े पक्के हैं।।

राजा– हाँ ये मुझसे बेहतर कौन जानता है,,अरे बन्टी अकेले ही आये तुम रानी को भी लेते आना था।।

बन्टी– मैं ले तो आता लेकिन उनका चौथा महीना चल रहा है,इसिलिए इतनी लम्बी ड्राइव के लिये उसने मना कर दिया।।

बांसुरी– एक मिनट !! किसने मना कर दिया?? क्या चल रहा है?? मुझे कुछ समझ नही आ रहा ,साफ साफ बताईये।।

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राजा– अरे तुम्हें पता नही शायद!! हमारे बन्टी भाई की शादी हो चुकी है,पूरे दो साल हो गये शादी को।।

  ये सुनकर बांसुरी ने बन्टी की तरफ खुशी से चहक के देखा कि बन्टी पहले ही बोल उठा__

बन्टी– यार बन्सी तुम ना तो एफ बी पे हो ना इंस्टा पे , मैं ढूँढता भी कैसे,वैसे मैने राजा को बोला था,तुम्हे बताने के लिये…पता नही इस नामुराद ने बताया क्यों नही।।

बांसुरी– वो सब बाद में,पहले आप अपनी शादी की कहानी तो बताइये।।

बन्टी– हाँ बिल्कुल!! वो तो सबसे ज़रूरी है।।
देखो भई हुआ ये कि दिल्ली में मेरी एक नई गर्लफ्रैंड बन गयी,जिसको खाने का बड़ा शौक था,वो रोज़ सुबह फोन पे यही प्लान करती की किस नये रेस्तराँ को आबाद किया जाये,और बस इतने से पेट नही भरता था उसका,,मेरा दिमाग भी बराबर खाती थी, जाने उसे कौन सी ऐसी गलतफहमी थी कि अंबानी मेरे बाप का नौकर है।।रोज़ नही फरियाद,रोज़ नयी गुजारिश ,अच्छा और फोन इत्ते प्यार से करती ‘ हेलो बाबू’ की मैं एकदम पिघल जाता था।।
     वैसे घंटो बात करती फिर जब उसका रखने का  मन करता तो बहाना मार देती ‘ बेबी मॉम आ रही है’
पहले तो साला मैं गधे पे गधा बनता गया,फिर एक दिन शाम को जब हम लौट रहे थे मैनें कहा घर तक छोड़ देता हूँ,कम्बख्त कहती है-‘ नो बेबी !! होस्टल वॉर्डन  ने देख लिया तो मुसीबत हो जायेगी!!
  मैं सोच में पड़ गया कि होस्टल में मम्मी कैसे आ जाती है पर मैनें कुछ कहा नही।।
   फिर बाद में समझ आया मम्मी वम्मी नही आती वो तो उसके दूसरे बॉयफ्रेंड का फोन आता था,,बेमुराद, बेमुरव्वत, बेवफा !! मैनें लाखों उड़ा दिये उसके गोलगप्पो के पीछे।।
    उसी चक्कर में तो रानी से मिलना हुआ।।

बांसुरी– अच्छा कैसे??

बन्टी– मेरी एक्स को एक दिन गोलगप्पे की तलब लगी,जो उसे हर दो दिन के बाद लग ही जाती थी,तो हम दोनो गली मुहल्ले ढूँढ ढाँढ के उसके पसंदीदा गोलगप्पे वाले तक पहुंच गये …..अब इनका शुरु हुआ ,एक पे एक खाना और उसपे तुर्रा देखो__” भैय्या मिर्ची तो डाली ही नही,थोड़ा और तीखा करो ना” वो गोलगप्पे वाला बेचारा कई बार मिर्ची डालने के बाद अपना एवरेस्ट का पैकेट निकाल चेक करने लगा __ साले टी वी पे बोलते हैं सही तीखा सही लाल ।।और ये धुरंधर यहाँ ‘ ना ही तीखा ना ही लाल’ कर रही है।।
      भर पेट खाने के बाद जब आगे बढ़े तो उसकी पेट में कोहराम मच गया,,एवरेस्ट के तीखालाल ने अपना कमाल दिखाया।।
      मैं  उसको लेकर सीधा एम्स भागा,वहाँ मैडम को तुरंत ऐडमिट कर लिया गया…..
   वहीं हमारी मुलाकात हुई रानी से!! रानी को तो जानती हो ना??

बाँसुरी ने राजा की तरफ प्रश्न पूछती निगाहों से देखा उसने आंखों से ही हाँ कह कर समाधान कर दिया

बन्टी– रानी वहाँ सर्जरी में एम एस कर रही थी,मैने उसे प्रिया से मिलवाया और दोस्ती का वास्ता देकर प्रिया की एक्स्ट्रा केयर लेने को कह ऑफिस निकल गया।
   अब जब जब मैं ऑफिस से फोन करुँ प्रिया का फोन बिज़ी आये,बाद मे उसने कहा मम्मी से बात कर रही थी।।
   पर डिस्चार्ज के समय प्रिया को बाहर भेज रानी ने मुझे सारी सच्चाई बता दी उसके दूसरे बॉय फ्रेंड के बारे में ।।
   बस यही से रानी से दोस्ती शुरु हुई और घर वालों के आशीर्वाद से दो साल पहले शादी भी हो गयी।।

माला– वॉव मज़ा आ गया सुन के!! अब प्लीज़ कोई मुझे ये बतायेगा कि आप सब एक दूसरे को कैसे जानते हैं ।।

बन्टी– क्यों इन दोनों ने तुम्हे कुछ बताया नही।।

बांसुरी ने घबरा के बन्टी की तरफ देखा ही था की राजा की आवाज़ कानों में पड़ी __

राजा- हम दोनो एक ही शहर से हैं,बल्कि एक ही मोहल्ले के हैं,इसिलिए अच्छी जान पहचान है!!बस!!

   मैरियट के बड़े से हॉल में एक तरफ गज़ल सन्ध्या का आयोजन किया गया था,जहां कोई एक साहब गुलाम अली जी की गज़ल गा रहे थे__

  इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महफिलें
    हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा।
    कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा।
    कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा।।

  डिनर होते होते ग्यारह बज चुके थे ,,इतना समय हो गया देख कर राजा थोड़ा परेशान होने लगा__

राजा — हम साथ चलें क्या बांसुरी,तुम लोगों को वहाँ ड्रॉप कर हम वापस आ जायेंगे।।

बांसुरी– नही नही !! आप परेशान मत होईये,,पुणे तो जागता शहर है,वैसे भी सदाशिव पेठ में भीड़ भाड़ रहती है।।

राजा ने उनके लिये कैब बुक करी और  बांसुरी के
बार बार मना करने के बावजूद गाड़ी में उन दोनों को पीछे बैठा कर खुद ड्राईवर के बाजू वाली सीट पर बैठ गया,दुसरी कैब लेकर बन्टी भी मुम्बई निकल गया।।
 
     उनकी कैब सदाशिव पेठ की तरफ भाग चली, एफ एम में चलते गाने के साथ बांसुरी एक बार फिर कानपुर की गलियों में और राजा में खो के रह गयी…..

         मेरी साँस साँस महके
              कोई भीना भीना चन्दन
         तेरा प्यार चाँदनी है
               मेरा दिल है जैसे आँगन
         हुयी और भी मुलायम
                मेरी शाम ढलते ढलते
        हुयी और भी मुलायम
                मेरी शाम ढलते ढलते
         ये कहाँ आ गये हम
                 यूँ ही साथ साथ चलते………

क्रमशः

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aparna…
    
      

जीवनसाथी- 122

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    जीवनसाथी -122

      गाड़ी खाई से निकाली जा चुकी थी। गाड़ी महल की ही थी, जो विराज के नाम से थी लेकिन उसमें विराज नही था।
         गाड़ी में केसर थी, लेकिन उसके पिता नदारद थे। सड़क पर आते जाते लोगों का भी मजमा लगा हुआ था। पुलिस की गाड़ी के साथ ही एंबुलेंस भी लगी खड़ी थी।
  भीड़ को चीरते महल के लोग भी वहाँ पहुंच गए थे। समर और आदित्य के साथ ही युवराज भी आ चुका था।
रेखा को बाँसुरी ने महल में ही रोक लिया था। इतना सब हो हल्ला होते देख विराज को ढूंढ़वाने युवराज ने पहले ही अपने लड़कों को दौड़ा दिया था।
    विराज के बरामद होते ही युवराज ने उससे फ़ोन में बात कर सारी बातें उसे बता दी थी और तुरंत महल वापसी का फरमान सुना दिया था।
    अजातशत्रु से विराज का बैर अलग था लेकिन युवराज के लिए उसके मन में सम्मान था और इसी कारण वो उससे दबता भी था।
    बिना कोई बहाना किये  वो कुछ देर में ही महल चला आया था।
   उसे सामने सही सलामत देख रेखा की जान में जान आ गयी थी।
   ” बाँसुरी हमें लगता है गाड़ी में केसर दीदी और पिता साहब रहें होंगे।”
    रेखा का शक सहीं भी साबित हुआ था।

*****

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    गाड़ी की हालत बहुत खराब थी, और उससे भी ज्यादा गाड़ी में मिलने वाली लाश की। सिर्फ कपड़ों के रंग, जूतों और हाथ में बंधी महंगी घड़ी से ही लाश की पहचान केसर के रूप में हो पाई थी।
   गाड़ी का भयानक एक्सीडेंट हुआ था इसलिए लाश का पोस्टमार्टम होना बहुत जरूरी था इसीलिए एंबुलेंस में उसे डालकर अस्पताल की और भेज दिया गया। पंचनामा करने के बाद पुलिस बाकी औपचारिकताओं को पूरा करने चली गई महल से सारे लोग वापस लौट आए लेकिन समर आदित्य के साथ अस्पताल चला गया था।
       महल में यह खबर पहुंचते ही कि केसर जिस गाड़ी से जा रही थी वही गाड़ी दुर्घटनावश या किसी बड़ी गाड़ी की चपेट में आकर खाई में गिर चुकी थी, एक बार फिर दुख का माहौल बन गया था ।
रेखा पिछले कुछ दिनों में इतनी बार रो चुकी थी कि अब उसके आंसू थम गए थे। वह समझ गई थी कि उसकी केसर  दी अब हमेशा हमेशा के लिए उसे छोड़ कर जा चुकीं थीं, लेकिन एक बात थी कि जाने से पहले उन्होंने उसे एक रास्ता दिखा दिया था अपनी जिंदगी का रास्ता।
     केसर वहां से जाने से पहले रेखा से मिलकर अपनी प्रोजेक्ट की सारी डिटेल उसे समझा चुकी थी। इसके साथ ही उसने सारे कागज पत्तर रेखा के हवाले कर दिए थे।
   रेखा ने केसर से मिलकर उसे रोकने और समझाने की बहुत कोशिश की थी। लेकिन केसर रेखा को ही अपनी बातें समझा गई थी।
     केसर ने रेखा से स्पष्ट कहा था कि वह यहां से निकलकर अपनी नई जिंदगी जीना चाहती है। अब तक कि उसकी जिंदगी में शायद उसे कुछ भी वैसा नहीं मिला जिसकी उम्मीद थी लेकिन अब वह अपनी जिंदगी अपने हिसाब से बनाना चाहती है। उसने जाने से पहले अपने पिता साहब के एक मित्र का जिक्र भी किया था कि उनसे एक बार मिलने की इच्छा है तो हो सकता है हम लोग महल से निकलने के बाद उनसे मिलने जाए।
    
    जब बांसुरी निरमा और बाकी लोग रेखा को सांत्वना देते उसके आंसू पोंछ रहे थे उसी वक्त उनमें से किसी ने बताया कि वहां केसर की ही लाश मिली थी और रेखा के पिता साहब वहां मौजूद नहीं थे।
   यह सुनते ही रेखा को केसर की वह बात याद आ गई थी और उसने तुरंत युवराज भाई साहब को अपने पिता के उन मित्र का पता ठिकाना और फोन नंबर दे दिया था।
   रेखा का सोचना सही निकला युवराज ने उस नंबर पर फोन कर जब पतासाजी की तो पता चला रेखा के पिता वहीं मौजूद थे।
  उनसे बात करने पर सारी बातें और स्पष्ट हो गई थी उन्होंने बताया कि रेखा उन्हें वहां छोड़कर अकेली ही अपनी हवेली के लिए निकली थी और उसका कहना था कि दो दिन में हवेली साफ करवा कर अपने पिता को वहां बुला लेगी।
    रेखा को अब सारी बातें समझ में आने लग गई थी। उसकी केसर दीदी बहुत दिन से परेशान थी। उसे और उसके आत्मसम्मान को अब इस महल में रहना पसंद नहीं आ रहा था। रेखा यह सब जानते समझते हुए उसे भी यही समझाती रहती थी कि महल के लोग उसके बारे में अब कुछ नहीं सोचते लेकिन इतना समझाने के बावजूद केसर के मन में जो चल रहा था आखिर उसने अपना निर्णय उसी आधार पर लिया।
    इसलिए ही तो रेखा के इतना ज़िद करने पर भी उसने ड्राइवर साथ लेकर जाने से इंकार कर दिया था और कह दिया था कि हवेली में पहुंचने के बाद वह अपने सबसे भरोसेमंद आदमी के हाथों गाड़ी वापस भिजवा देगी।
    जाने  केसर के दिमाग में यह सब कब से चल रहा था। क्योंकि उसने कुछ समय पहले ही बिजनेस के सारे लीगल पेपर रेखा के नाम से तैयार करवा लिए थे। यहां तक कि एनजीओ में भी अपने नाम के साथ साथ रेखा का भी नाम हर जगह डलवाया था। रेखा को याद आने लगा कि उसने इस बात पर आपत्ति भी की थी….-” सारा काम तो आप करेंगी जीजा साहब फिर नाम हमारा क्यों डाला है? इसका मतलब मेहनत करें आप और प्रॉफिट में हिस्सेदार हों हम! यह कैसा न्याय हैं आपका। “
   तब  केसर ने बड़े प्यार से रेखा के सर पर हाथ फेर कर उसे अपने गले से लगा लिया था…-” हमारा सब कुछ आपका ही तो है। इस जिंदगी में और कुछ कमाया हो या ना कमाया हो। रुपए तो हमने बहुत कमा लिया आपके लिए रेखा। यह सब कुछ आपका ही है, बस यह याद रखना कि आपको इस सब की सार संभाल करनी है। “
” हमसे यह सब नहीं होगा जीजा साहेब। हम अपने घर परिवार और बच्चे में ही खुश हैं हमारी जिंदगी तो बस इतनी ही है इन्हीं सबके बीच।”
” नहीं अब तुम्हारा बेटा भी बड़ा होने लगा है इसलिए घर परिवार की परिधि से भी बाहर खुद को पहचानो रेखा। “
     रेखा को अब केसर कि कहीं हर बात धीरे-धीरे समझ में आ रही थी मतलब इतने दिनों से वह जो प्रोजेक्ट तैयार कर रही थी वह पूरी तरह से रेखा को खड़े करने के लिए था । उसने अपनी हवेली, बिज़नेस सभी में रेखा का नाम जुड़वा दिया था। और इतना सब करने के बाद पिता साहब को लेकर निकल गयी।
   उन्हें उनके सबसे करीबी दोस्त कम पार्टनर के घर छोड़ वो अकेली ही अपनी मंज़िल तय करने निकल गयी।
     यानी केसर महल से निकलते समय ही ये तय कर चुकी थी कि उसे अब ज़िंदा नही रहना।
   उसकी गाड़ी वाकई किसी बड़ी गाड़ी से टकरा कर असंतुलित हो खाई से गिर गई या उसने जानबूझकर उस खतरनाक मोड़ पर अपनी गाड़ी खाई में गिरा दी, यह राज अब केसर के साथ ही हमेशा हमेशा के लिए चला गया।

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     रेखा ने आंसू भरी आंखें उठा कर ऊपर देखा समर और आदित्य भी वापस चले आए थे। आदित्य भरी आंखों से आकर रेखा के पास बैठ गया उसने रेखा के दोनों हाथ थाम लिए।
    आज भले ही उन दोनों का देखा जाए तो कोई रिश्ता नहीं था। लेकिन आज से 6 महीने पहले तक दोनों भाई बहन के रिश्ते में बंधे थे। और दिल से आज भी आदित्य रेखा को अपनी छोटी बहन ही मानता आया था । जाते-जाते केसर ने उसके ऊपर रेखा की जिम्मेदारी भी डाल दी थी।
   वो मज़बूत था। उसकी आँखों में बहुत जल्द ऑंसू नही आया करते थे। और आज भी उसने अपने दिल में बहते आंसूओं को बाहर आने से रोक लिया था।
     
     विराज भी भागता दौड़ता वापस आ गया था। उसे भी अब तक रेखा और केसर की सच्चाई मालूम हो चुकी थी,  रेखा के पास बैठे आदित्य को देख वो दूसरी तरफ आ कर बैठ गया।

” खुद को सम्भालिए रेखा, ये वक्त मज़बूत होने का है न कि कमज़ोर होकर बिखर जाने का। आपके पिता साहब को हम महल वापस ले आते हैं। चलिए …”!

  रेखा आश्चर्य से विराज को देखती रह गयी… उसने धीरे से मना कर दिया…-” ,हमारी बात हुई थी उनसे। अभी वो वहीं रहना चाहतें हैं।
 
“ठीक है जैसी उनकी मर्जी। वैसे आप चाहें तो हम चलतें हैं आपके साथ। केसर बाई सा की बॉडी लाने…”

  रेखा पर एक के बाद एक बम फूट रहे थे, उसकी समझ से बाहर था कि आज विराज को हो क्या गया था।
    उसने धीरे से सिर हिला कर मना कर दिया। उसकी हिम्मत नही थी अपनी केसर दीदी को वैसे देखने की। पुलिस ने पंचनामा करने के बाद वैसे भी बॉडी को अस्पताल भेज दिया था,पोस्टमॉर्टम के लिए।
    रेखा ने आदित्य की तरफ देखा, वो खुद खोया सा बैठा बाहर कहीं दूर देख रहा था।
  समर धीमे कदमों से आकर आदित्य के पास खड़ा हो गया। उसने धीरे से उसके कंधों पर हाथ रख दिये, आदित्य समझ गया कि समर उससे कुछ कहना चाहता है…
   आदित्य के समर की ओर देखते ही समर ने अपनी बात कह दी…-” हमें वापस अस्पताल जाना होगा आदित्य! उन्हें कोई कंसेंट फॉर्म भरवाना है।”
   आदित्य ‘हाँ’ में सिर हिला कर खड़ा हो गया। उसने आंखों ही आंखों में रेखा की तरफ देखा और चलने के लिए इशारों में ही पूछ लिया। रेखा ने सिर हिला कर मना कर दिया।
    आदित्य और समर अस्पताल निकल गए…

  अस्पताल में समर आदित्य को साथ लिए पिया के केबिन के बाहर पहुंचा की बाहर खड़ी नर्स ने समर को पहचान कर केबिन का दरवाजा खोल दिया…-” आप अंदर बैठिये सर। मैडम एक डिलीवरी में हैं। निपटा कर यहीं आएंगी। आप लोगों के लिए चाय ले आऊं तब तक? “
    ‘न’ में सिर हिला कर दोनों थके हारे से वहीं बैठ गए। आदित्य का मन बेचैन सा हो रहा था, उसे बार-बार यही लग रहा था कि केसर ऐसा कदम नही उठा सकती। या तो उसके किसी दुश्मन ने ऐसा किया या केसर के किसी दुश्मन ने। पर कौन हो सकता है।
   वो सोचता सोचता टहलते हुए दरवाजे तक पहुंचा ही था कि एक झटके से दरवाज़ा खुला और एक औरत उसके सामने चली आयी…-” सर ! मैं आपसे रिक्वेस्ट करती हूँ, उस फूल सी बच्ची का पोस्टमार्टम मत कीजिये। प्लीज़ हो सके तो उसकी बॉडी हमें वापस कर दीजिए। हम लोग वैसे भी बहुत शर्मिंदा हैं कि उसके माँ …
    नीली आसमानी साड़ी में अपने लंबे बालों को करीने से पीछे बांध माथे पर छोटी सी बिंदी लगाए वो औरत अपने चश्में के भीतर से उसे घूरती कहने लगी कि उसकी बात आदित्य ने काट दी…

” जी आप किसकी बात कर रहीं हैं? मैं शायद नही समझ पा रहा। मैं इस शहर से भी नही हूँ…”
  आदित्य कुछ कह पाता कि वो एक बार फिर वही सब कहने लगी…-” देखिए वो बच्ची परेशान थी। लेकिन उसकी परेशानी का कारण “मायानगरी” नही है। वो असल में उसने मुझसे सारी बात बताने की कोशिश की थी,कुछ थोड़ा बहुत मैं जानती भी हूँ…

उनकी बातों के बीच ही कमरे का दरवाजा खोले पिया भीतर चली आयी।
   वो उस दूसरी खड़ी औरत की तरफ देखते ही सब समझ गयी। उसने अपनी टेबल से पानी का गिलास उठा कर उसकी तरफ बढ़ा दिया…-” जैसा आप सोच रहीं हैं मैडम वैसा नहीं है यह डॉक्टर नहीं है यह खुद भी एक….”
   आगे की बात पिया भी नहीं कह पाई उसने उस औरत को एक कुर्सी पर बैठाया और खुद जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गई समर और आदित्य की तरफ उसने कुछ पेपर्स बढ़ा दिये….

” केसर जी की पहचान सिर्फ उनके कपड़ों और उनके हाथ में बंधी इस घड़ी से हो पाई है। अगर आप लोगों को ये शंका हो कि ये केसर नही कोई और है तो हम लोग डी एन ए टेस्ट करवा सकते हैं।”

” क्यों केसर का चेहरा…?”

” एक्सीडेंट में बुरी तरह से खराब हो चुका है। आप देख कर शायद ही पहचान पाएं। वैसे अगर आप लोग देखना चाहतें हैं तो देख सकते। हैं। अभी उनका पोस्टमार्टम किया जा रहा है।
   मैं तो यही कहूंगी की आप लोग उन्हें घर लेकर जाने की जगह यही उनका क्रिमेशन भी करवा दें। क्योंकि उनकी बॉडी की जो हालत है , वो घर लेकर जाने लायक नही है।”

“मैं फिर भी एक बार देखना चाहता हूँ..”

  आदित्य के ऐसा कहते ही पिया ने समर की तरफ देखा और आदित्य को देख “हाँ” में सिर हिला दिया। वो अपनी जगह से उठ खड़ी हुई। उसके पीछे ही समर आदित्य और वो दूसरी औरत भी चल पड़ी।
   मॉर्ग( मुर्दाघर) में पिया बेधड़क अंदर घुस गई लेकिन समर बाहर ही खड़ा रह गया। आदित्य धीरे से अंदर चला गया। पिया ने केसर के चेहरे पर पड़ी चादर हटा दी। और उसे देख साथ खड़ी मैडम ने अपना सिर थाम लिया, उसी की बाजू वाली बेड पर उस लड़की की लाश पड़ी थी। उसकी बंद आंखे  और चेहरा देख मैडम खुद को संभाल नही पायी और सिसक कर रो पड़ी। उनका रोना बढ़ते बढ़ते तेज़ होता चला गया और उनकी हिचकियाँ बंध गयीं।

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   पिया को आकर उन्हें संभालना पड़ा…-“मैडम प्लीज़ खुद को संभालिए। मैं समझती हूं वह आपकी यूनिवर्सिटी की लड़की थी पर इस वक्त उसके माता-पिता को इनफॉर्म करना बेहद जरूरी है। “
   पिया उन सब से बात कर रही थी कि बाहर से वॉर्ड बॉय ने पिया को पुकार कर कहा कि पुलिस की गाड़ी बाहर आई है।
    उसकी बात सुन पिया अपने कमरे की तरफ बढ़ गयी। उसके पीछे ही आदित्य और वो मैडम भी चली आयीं।
    समर पहले ही आकर उसके केबिन में बैठ चुका था। उसे जाने क्यों मुर्दाघर के बाहर पहुंचते ही अजीब सी घुटन महसूस हो रही थी। उसकी बिगड़ी शक्ल देख पिया ने उसकी तरफ पानी का गिलास बढ़ाया ही था कि उसके दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी और दरवाजा खोल कर दो पुलिस के अधिकारी अंदर चले आए।  उनके आते तक में पिया ने अस्पताल में उस वक्त मौजूद बाकी दोनों सीनियर डॉक्टर्स को भी बुलवा लिया था।
  पिया ने उन दोनों में अधिकारियों का अभिवादन कर उन दोनों को बैठने के लिए जगह दी इसके साथ ही वह समर और आदित्य की तरफ घूम गई….
” अगर आप लोगों की इजाजत हो तो हम अस्पताल की तरफ से केसर….. केसर जी का क्रीमेशन कर देंगे! आप लोगों को ये कंसेंट फॉर्म भर कर साइन करना होगा। “
    समर को भी उस वक्त पिया की बात सहीं लगी। उसने आदित्य के कंधे पर हाथ रखा। आदित्य ने नीचे सिर किए हुए ही  “हां” में सर हिला दिया !समर ने पिया को इजाजत दे दी।
    पिया उन पुलिस वालों से बातों में लग गई” सर आप लोग चाय या पानी कुछ लेंगे”
  ” नहीं डॉक्टर पिया इस वक्त हम सिर्फ उस लड़की के बारे में पूछताछ करने आए हैं। आप उनके बारे में क्या बता सकती हैं?”
” सर ये मैडम माया नगरी यूनिवर्सिटी के मेडिकल कॉलेज में लैब अटेंडेंट हैं, वह लड़की जिसने मेडिकल कॉलेज में सुसाइड किया है इनकी रिश्तेदार थी उसके बारे में यह ही आपको बता सकती हैं। “

   उन दोनों में से एक पुलिस वाले ने उन मैडम की तरफ देख कर अपना हाथ आगे बढ़ा दिया” जी नमस्कार मैं इंस्पेक्टर रोहित हूं। पहले बनारस में काम कर रहा था अभी ट्रांसफर में यहां 2 महीने पहले ही ज्वाइन किया है। आप तफ्सील से मुझे उस लड़की का नाम ?वह क्या पढ़ती थी? क्या करती थी? सारी बातें बता सकती हैं। “

” जी इंस्पेक्टर साहब नमस्ते। मेरा नाम रागिनी श्रीवास्तव है! मैं मायानगरी यूनिवर्सिटी के रानी बांसुरी मेडिकल कॉलेज के फिजियोलॉजी डिपार्टमेंट में लैब अटेंडेंट का काम करती हूं। यह लड़की दूर के रिश्ते में मेरी भतीजी होती थी। अभी सेकंड ईयर में थी। मेरा मतलब है फर्स्ट ईयर पास करके सेकंड ईयर में आई ही थी। “

” इसने क्यों सुसाइड किया? क्या आप इन बातों पर रोशनी डाल सकती हैं?”

” सर ये यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में ही रहा करती थी। इसलिए मैं ज्यादा कुछ तो नहीं बता सकती, लेकिन यह बता सकती हूँ, कि लड़की पढ़ने में बहुत होशियार थी। मध्यम वर्गीय परिवार की लड़की थी सर । इसने ऑल इंडिया मेडिकल एंट्रेंस में टॉप किया था। टॉप फिफ्टी में जगह बनाई थी सर।  और खुद ही मायानगरी का चुनाव कर के यहां आई थी।
      सर आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि उसके शरीर के साथ छेड़छाड़ मत करवाइए।  उसके माता-पिता उसे इस हालत में नहीं देख पाएंगे । उनके सपनों को पूरा करने ही वो यहां आई थी। उनके लिए यह सदमा बहुत बड़ा है, कि उनकी बेटी अब नहीं रही। सर आपसे एक रिक्वेस्ट और है , डॉक्टर मैडम से गुजारिश करके उसका पोस्टमार्टम रुकवा दीजिए।
      सर मैं बताना चाहती हूं कि उसके सुसाइड में हमारे मायानगरी का कोई हाथ नहीं है। वह किसी तरह की उलझन या परेशानी में नहीं थी। क्योंकि अभी लगभग एक हफ्ते पहले ही मेरी उससे बात हुई थी। और वह काफी खुश लग रही थी।
   वह शायद अपने साथ वाले बच्चों को और कुछ मेडिकल के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाना शुरू कर चुकी थी। क्योंकि उसने मुझसे कहा था कि मेरी कमाई शुरू हो गई है। बहुत खुश थी वह। मैंने कभी नहीं सोचा था कि वह ऐसे सुसाइड कर लेगी।”

  रोहित ने मुड़कर पिया की तरफ देखा….-” डॉक्टर साहब क्या बिना पोस्टमार्टम के बॉडी इन के हवाले की जा सकती है?

पिया ने “ना” में सिर हिला दिया…-” सर हमें मौत का कारण कैसे पता चलेगा? “
” जी आपकी बात भी सही है। ” रोहित वापस उन मैडम की तरफ मुड़ गया…-” मैं देखता हूं क्या हो सकता है। और यह कहना चाहता हूं कि मुझे अभी इसी वक्त आपकी यूनिवर्सिटी का चक्कर लगाना पड़ेगा। “
“सर आप बिल्कुल हमारी यूनिवर्सिटी में आ सकते हैं! पर मैं फिर आपसे गुजारिश करूंगी कि अगर आप लोग सादे कपड़ों में आकर पूछताछ करें तो ज्यादा अच्छा रहेगा । असल में हमारे यहाँ मैनेजमेंट सीट के भी बहुत सारे बच्चे हैं तो इसलिए हमारी रेपुटेशन का भी थोड़ा…

” जी मैं समझता हूं।” रोहित ने उसकी बात बीच में ही काट दी और समर की तरफ मुड़ गया…-” समर जी यह राजा अजातशत्रु की बनाई यूनिवर्सिटी ही तो नहीं है कहीं। “

समर और रोहित आपस में परिचित थे। फिर अभी कुछ दिन पहले ही दून वाले केस के समय भी रोहित ने समर की बहुत मदद की थी। आज भी यहां मिलते ही दोनों एक दूसरे को पहचान कर अभिवादन कर चुके थे।
  समर के हाँ में सिर हिलाते ही रोहित चौक कर अपनी जगह से खड़ा हो गया। और अचानक उसका ध्यान इस बात पर गया कि अस्पताल में समर और आदित्य मौजूद है।

“क्या आप दोनों भी उसी केस के सिलसिले में यहां आए हुए हैं।”

” ना ” में सिर हिलाकर समर केसर के साथ घटी वारदात रोहित को बता गया रोहित चौक कर आदित्य की तरफ देखने लगा…

“यह केसर कहीं रेखा की बड़ी बहन तो नहीं? “

आदित्य के हां कहते ही रोहित के चेहरे पर परेशानी के भाव झलकने लगे । वह अपनी जगह से उठकर बाहर निकल गया। बाहर निकलते हुए उसने अपने साथ वाले पुलिस वाले को भी बाहर बुला लिया। उनसे कुछ देर बात करने के बाद वह वापस समर की तरफ बढ़ गया…-” अगर आप लोग बुरा ना माने तो क्या मैं आप लोगों के साथ एक बार महल चल सकता हूं।”

समर और आदित्य के हाँ कहते ही वो पिया के पास पहुंच गया…-” डॉक्टर साहब मैं एक बहुत जरूरी काम निपटा कर महल से वापस आता हूं! उसके बाद आगे की तफ्तीश करूंगा!  तब तक के लिए अगर हो सके तो आप पोस्टमार्टम शुरू मत करवाइएगा।
    रोहित ने  एक नज़र उन मैडम की तरफ देखा। मैडम ने उसकी तरफ देखकर दोनों हाथ जोड़ दिये।  रोहित समर और आदित्य के साथ बाहर निकल गया।

   समर ड्राइविंग सीट पर बैठ गया आदित्य उसके साथ वाली सीट पर और रोहित पीछे बैठ गया।

  ” मैं समझता हूं तुम बहुत परेशान हो आदित्य।  लेकिन भगवान के रचे  खेल को कोई नहीं समझ सकता । जिसका जितना साथ होता है वह उतना ही साथ देता है।”

  समर की बात सुनकर आदित्य उसकी तरफ देखने लगा….-” क्या तुम्हें पूरा भरोसा है कि वह केसर की ही बॉडी थी? “

  समर आश्चर्य से आदित्य की तरफ देखने लगा-” तुम कहना क्या चाहते हो? “

” वह केसर नहीं थी। मैं जानता हूँ,वो केसर नही थी।”
  अपनी बात कह कर आदित्य चुपचाप सामने देखने लगा समर ने कुछ सोचते हुए गाड़ी और तेजी से महल की तरफ दौड़ा दी।

क्रमशः

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दिल से….

     प्यारे दोस्तों कैसे हैं आप सब?  पिछली तीन चार दफा से ऐसा हो रहा था कि, आप सब मुझसे शिकायत कर रहे थे कि आपको “दिल से” पढ़ने नहीं मिल रहा! तो यह भी एक कारण था आज “दिल से” लिखने का और दूसरा कारण था कहानी में आई नई गुत्थियों को आपके सामने थोड़ा सा सुलझा सकूं।
  
      मेरे जो पाठक सिर्फ जीवनसाथी पढ़ रहे हैं। उन्हें यह सुसाइड वाला एंगल शायद समझ में नहीं आ पाया होगा, लेकिन मैंने पहले भी कहा था कि जीवन साथी खत्म होने के बाद वह माया नगरी के साथ चलती रहेगी तो बस यही बात है।
    मायानगरी के छठवें  भाग के अंत में मेडिकल कॉलेज हॉस्टल में एक लड़की ने सुसाइड कर लिया था।  वही कड़ी जीवनसाथी के इस भाग में जोड़ी गई है। लेकिन आप लोग निश्चिंत रहिए जो पाठक सिर्फ जीवनसाथी पढ़ रहे हैं, उन्हें निराश होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि इस सुसाइड केस से जुड़ी जितनी भी बातें मायानगरी की है वह जीवन साथी के अगले भाग में आपको पढ़ने मिल जायेंगी।
    दूसरी बात माया नगरी में भी इस मर्डर मिस्ट्री को सुलझाया जाएगा लेकिन वह कॉलेज और वहां के स्टूडेंट के पॉइंट ऑफ व्यू से होगा। रंगोली और अभिमन्यु के नज़रिए से।
      दोनों ही कहानियों में किसी तरह का कोई रिपीटेशन नहीं होगा। बावजूद जो पाठक जीवनसाथी पढ़ रहे हैं वह भी संतुष्ट रहेंगे और जो मायानगरी पढ़ रहे हैं वह भी संतुष्ट रहेंगे।
     और जो पाठक दोनों कहानियां पढ़ रहे हैं उनकी तो फिर बल्ले-बल्ले है।
    तो आप सब पढ़ते रहिए त्योहारों को एंजॉय करते रहिए।
   

    और एक छोटी सी बात …..
    …..   याद रखें नवदुर्गा 9 दिन बैठती हैं हम उन्हें नौ दिन पूजते हैं । लेकिन उनका आदर हमें साल के 365 दिन करना है , अपने आसपास रहने वाली बच्चियां लड़कियां युवतियां औरतें प्रौढा वृद्धाएं सभी में वही नवदुर्गा है बस नजर और नज़रिए का अंतर है।

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    हमारी तरफ तो खूब गरबा और डांडिया होता है। आपकी तरफ भी होता होगा तो लगे रहिए झूम झूम कर करते रहिए और एक दूसरे के साथ त्योहारों का आनंद लीजिए…

          पेथल पुरमा सुनले ओ छोरिया
           झूमे नगरिया जब जब ये घूमे
             कमरिया रे थारी कमरिया
             कमरिया रे थारी कमरिया….

    शुभो नवरात्रि !!!

   मुझे पढ़ने और सराहने के लिए आप सबों का हार्दिक आभार प्रियजनों!!!

aparna…..

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मायानगरी -6

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   मायानगरी-6

    होस्टल के कमरे में रंगोली रोती बैठी थी और झनक की समझ से बाहर था कि आखिर ऐसी कौन सी बात हो गयी जो रंगोली ऐसे धुंआधार रोये पड़ी है।

” अरे कुछ बता भी दो यार रंगोली! हुआ क्या? क्या रैगिंग वाली बात से परेशान हो ? ये सब बहुत कॉमन है यार। इसके लिए इतना टेंशन लेने की ज़रूरत नही है। बस कुछ दिनों की बात है फिर यही सीनियर्स खूब हेल्प करेंगे। ले पानी पी और अब चुप हो जा।”

   पानी पीकर रंगोली थोड़ा संभली और अपनी परेशानी उसने कहनी शुरू की…-“झनक यार इस लड़के ने मुझे कहीं का नही छोड़ा।”
  झनक चौन्क कर रंगोली को देखने लगी, उसे रंगोली की बात एकदम से समझ में नही आई…-” किस की बात कर रही है तू ?”
“वही इंजीनियरिंग वाला। कहाँ से आकर गले पड़ गया यार। अब क्या करूँ। ये तो हर जगह मुझे बदनाम करने में लगा हुआ है। सीनियर्स पर प्रोफेसर्स पे मेरा कितना खराब इम्प्रेशन पड़ेगा, सोच तो!”
” अरे यहाँ ये सब कोई नही सोचता!”
“सभी जगह सोचते हैं यार! बस कहने की बात है कि नही सोचते। आज तक मेरे स्कूल में मेरी इतनी अच्छी इमेज थी इसने सब सत्यानाश कर दी। एक नम्बर का बेवकूफ है , अरे भई मैंने मांगी तुझसे हेल्प तो तू क्यों हर जगह मेरा गार्जियन बनकर घूम रहा  है।”
” गार्जियन नही पति!” झनक ने चुटकी ली और रंगोली एक बार फिर नाराज़ होकर रोने लगी…-“यार प्लीज़ मत बोल ऐसा। इस लड़के से ऐसी नफरत हो रही है ना कि सामने आ जाये तो गला दबा दूँ। इसने सब जगह मेरा नाम खराब किया है।”.
” तो अब कर भी क्या सकते हैं यार। छोड़ ना। तू क्या उससे माफी मंगवायेगी?”
” हाँ ! बिल्कुल मंगवाऊंगी। जिस जिस से जाकर उसने खुद को मेरा पति बोला है उस हर एक के सामने जाकर हाथ जोडकर माफी मांगेगा और माफी जब तक नही मिलेगी हमारे सीनियर्स के पैरों पड़ा रहेगा।”
” तेरी मर्ज़ी! लेकिन मुझे नही लगता वो हीरो तेरी बात मानेगा।”
” झनक तू बस ये सोच की हम उससे कहाँ मिल सकतें हैं । मुझे उससे अकेले में बात करनी है।”
” हम्म इंजीनियरिंग वाला बंदा है, कैंटीन में सुट्टा मारते मिल ही जायेगा। नाम गांव कुछ पता है उसका?”
” नाम अभिमन्यु बताया था और मैकेनिकल पांचवे सेम का स्टूडेंट है। यार एक तो मुझे पढ़ाई की इतनी ज्यादा टेंशन हो गयी है कि हर वक्त पेट में अजीब सी गुड़गुड़ होती रहती है ऊपर से इस ने और नाक में दम कर दिया।”
” पढ़ाई की टेंशन अभी से क्यों?”
” बुक्स देखीं हैं। इतनी मोटी मोटी की लगता है मुझे खा जाएंगी। ये फिजियो की “गायटन एंड हाल” और ये ग्रे की एनाटॉमी। पता नही कुछ मेरे पल्ले भी पड़ेगा कि नही। मुझे तो ये सब पढ़ने के लिए डिक्शनरी लेकर बैठना पड़ेगा यार। मेरी स्कूलिंग हिंदी मीडियम थी ना!”
” अबे ये बात! इसलिए इतना डर रही तू। सुन किताबें तो यहीं हैं जो तीर्थ है हमारा ! लेकिन हमें तीर्थ पूरा करवातें हैं चौरसिया जी और जैन साहब।”
” मतलब?”
” मतलब फिजियो की हम पढेंगे जैन और एनाटॉमी में पढ़ेंगे बी डी चौरसिया। ये हमारी भाषा की किताबें हैं। यानी है तो इंग्लिश में लेकिन हमारी आसान सी इंग्लिश में। और फिर जो समझ न आये उसके लिए मैं हूँ ना। “
” हम्म ! मैं पास तो हो जाऊंगी ना!”
” तुझे रंगोली बस रोने की बीमारी है क्या? अब तक उस छछूंदर के नाम पर आँसू बहा रही थी, अब पढ़ाई के नाम पर।”
” यार झनक क्या करूँ? यहाँ रैगिंग के सिवा कुछ होता ही नही तो मज़ा कैसे आएगा। मुझे तो हॉन्टेड कैसल लग रहा है ये मायानगरी।”
” चल नीचे चलते हैं। कुछ अच्छा सा खाएगी तो दिमाग काम करेगा और फिर तुझे उस रितिक रोशन से लड़ने भी तो जाना है ना?”
” छोड़ यार! किसी ने उससे बात करते देख लिया तो और मुसीबत हो जाएगी। जाने दे। बस भगवान से प्रार्थना है अब मेरी पढ़ाई पूरी होते तक उसकी शक्ल न देखने को मिले।
“आमीन !! नही मिलेगी।”

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  रंगोली जो कुछ देर पहले अभिमन्यु को पानी पी पीकर कोस रही थी, अब उसे भूलभाल कर नीचे होस्टल मेस में जाने की तैयारी कर रही थी।
    झनक के साथ रंगोली नीचे पहुंची तो पता चला आज किन्हीं कारणों से मेस बंद रहेगा। उन लोगों के पास ऊपर कमरे में भी कुछ खाने को नही था। झनक के कहने पर दोनों हॉस्टल के बाहर बनी कॉमन कैंटीन में आ गईं।
   
     अभिमन्यु भी अधीर को साथ लिए रंगोली को ताड़ने के बहाने हैं मेडिकल कॉलेज की तरफ पडने वाली कैंटीन में आकर बैठा था कि उसी वक्त रंगोली झनक के साथ कैंटीन में दाखिल हुई।
   उसे देखते ही खुशी से चौक कर वो खड़ा हो गया और तुरंत रंगोली के पास पहुंच गया ” हेलो कैसी हैं आप? मैं अभिमन्यु!”
   अभिमन्यु को वहां आया देख रंगोली के तन बदन में आग लग गई। उसे पिछले चार-पांच दिन से जो चल रहा था वह सब एकदम से याद आ गया और वह बुरी तरह से अभिमन्यु पर भड़क उठी।
” तुम समझते क्या हो खुद को और मुझे क्या समझ रखा है? यह कोई फिल्म चल रही है कि तुम हीरो और मैं हीरोइन बन गई।
  देखो मिस्टर अच्छे से इस बात को समझ लो, कि मैं सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई करने यहां आई हूं! तुम मेरे नाम के साथ अपना नाम इस तरह से जोड़ दोगे तो मैं तुम्हारी डायरेक्ट कंप्लेन अपनी डीन से कर दूंगी। डीन से यह बात सीईओ मैडम तक पहुंची तो तुम्हें सीधे रस्टिकेट कर दिया जाएगा। अब तुम फोर्थ सेमेस्टर में रहो चाहे फिफ्थ सेमेस्टर में, तुम्हारी पूरी की पूरी पढ़ाई डब्बा हो जाएगी। समझ में नहीं आता  की तुम्हें कॉलेज में पढ़ाई करना है या बस हीरोगिरी करने आए हो। क्या इधर-उधर घूम घूम के लड़कियों को परेशान करना , सिर्फ यही काम है तुम्हारा।
मेरी सारी इमेज खराब कर दी । पता नहीं मेरे सीनियर क्या सोचेंगे कि कल कि आई जूनियर अफेयर चला रही है।
   देखो तुम होगे किसी रईस बाप की बिगड़ी औलाद , तुम्हारे लिए पढ़ाई करना एक शौक होगा। तुम्हें रुपए पैसे कमाने से कोई लेना-देना नहीं होगा लेकिन मैं ऐसी नहीं हूं। मैं हद दर्जे की मिडिल क्लास लड़की हूं। रुपए पैसों से भी और फैमिली वैल्यूज से भी।
    मैं इतनी मिडिल क्लास हूं कि मेरे विचार भी मेरे जैसे ही मिडिल क्लास हैं। मेरे लिए मेरा कैरेक्टर सबसे बड़ी बात है, मैं यहां सिर्फ और सिर्फ पढ़ने आई हूं । पढ़ाई करके मुझे एक अच्छा डॉक्टर बनना है। अपना क्लीनिक डालना है खूब पैसे कमाने हैं। अपने मम्मी पापा को खुश रखना है। उनके आज तक के जो सपने पूरे नहीं हो पाए उन्हें पूरा करना है। मेरे पास प्यार इश्क मोहब्बत करने के लिए बिल्कुल वक्त नहीं है।
    तुम सोच भी नहीं सकते कि तुमने मेरा कितना बड़ा नुकसान किया है। मैं माफी मांगती हूं मुझसे गलती हो गई कि मैंने रैगिंग से बचने के लिए आकर तुम्हें गलती से प्रपोज कर दिया और वह सिर्फ और सिर्फ रैगिंग थी उसके लिए मुझे माफ करो। और प्लीज मेरी जिंदगी से दूर हट जाओ।
   हो सके तो अब जब तक मैं इस कॉलेज में हूं मुझे अपनी शक्ल मत दिखाना । प्लीज तुम्हारे हाथ जोड़ती हूं, क्योंकि तुम मेरे लिए यह तो करोगे नहीं कि मेरे सारे सीनियर से जाकर यह बात कहो कि तुम जो भी कह रहे थे वह गलत था, झूठ था, मजाक था। पहले मेरी सारी सीनियर्स मैडम के सामने तुमने मेरी इमेज खराब की, बाद में मेरे सीनियर सर लोगों के सामने भी तुमने वही कर दिया। अब मेरे पूरे कॉलेज में सब मुझे तुम्हारी गर्लफ्रेंड समझ रहे हैं। जबकि ऐसा कुछ है नहीं और तुम शायद नहीं जानते प्रोफेशनल कॉलेज में कैरेक्टर बहुत ज्यादा मैटर करते हैं।
   तुम्हें शायद नहीं पता होगा लेकिन मेरे मार्क्स पर भी इस बात का असर पड़ेगा । मेरे प्रैक्टिकल मार्क्स तो ज़ीरो ही हो गए क्योंकि प्रोफेसर एक कैरक्टरलेस लड़की को कभी भी अच्छे मार्क्स नहीं देते।”

   बोलते बोलते रंगोली की आंखों से आंसुओं की धार बहने लगी झनक उसे संभाली हुई थी। और बार-बार शांत करवा रही थी लेकिन अभिमन्यु रंगोली के इस रूप को देखकर दिल से घबरा गया था। रंगोली के आंसू उसकी आंखें भिगो गए थे । उसने सोचा भी नहीं था कि जिस बात को वह आज तक इतना कैजुअल ले रहा था वो रंगोली के लिए इतनी बड़ी बात हो सकती है, उसने तुरंत अपने दोनों हाथ जोड़  दिए।

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“मुझे माफ कर दो रंगोली मैं तुम्हारे हर एक सीनियर से मिलकर माफी मांग लूंगा। और तुम बेहिचक पढ़ाई करो मैं अब तुम्हें कभी डिस्टर्ब करने नहीं आऊंगा।”

  अभिमन्यु अपनी आंखें पोंछता वहां से बाहर निकल गया अधीर भी उसके पीछे भागता चला गया।

  वह तो अच्छा था कि इस कैंटीन में ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं थी और यह लोग दरवाजे पर ही टकरा गए थे इसलिए किसी ने भी इन लोगों पर ध्यान नहीं दिया लेकिन रंगोली को अब बस यही महसूस हो रहा था कि हर किसी की निगाहें उसी की तरफ़ है। उसने झनक का हाथ पकड़कर धीमे से कहा कि “अब मैं अंदर नहीं जा सकती मुझे वापस कमरे में जाना है” झनक उसकी हालत समझ गई थी इसलिए उसे साथ लेकर वह हॉस्टल वापस चली आई।

   लुटा पिटा सा अभिमन्यु भी अपने हॉस्टल पहुंच गया अधीर ने उससे खाने के लिए भी पूछा लेकिन अब उसकी भूख प्यास सब उड़ गई थी।
   उसने अपने कमरे का दरवाजा खोला तो देखा सामने सीपी सर बैठे हैं।
“सर आप यहां? मुझे बुला लिया होता।”

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“अब का कांड कर दिए हो मिसिर जी?”

“क्या बात हो गई सर मैं समझा नहीं?”

“मेडिकल में जाकर कुछ हंगामा किए हो भाई?”

“आपसे किसने कहा?”

“ऋषि खुराना की टीम सीईओ मैडम के पास गई थी! तुम्हारी शिकायत लेकर। बुलावा आया है, वाशिंग पाउडर के ऑफिस में।
      कल मैडम ने तुमको याद किया सुबह सुबह पहुंच जाना नौ बजे। हम भी चलेंगे तुम्हारे साथ हम जानते हैं तुम कुछ गलत काम तो कर नहीं सकते। पर यार थोड़ा तो सोचा करो निरमा मैडम के पास हम ही लोग गए थे यह फरियाद लेकर कि स्टूडेंट्स का अपनी परिधि को लांघना बंद करवा दीजिए। उन्होंने बंद करवाने की कोशिश शुरू की कि हमारा यह लड़का मेडिकल में पहुंच गया। “

अभिमन्यु को बीते दिन वाली सारी बातें याद आ गई और उसने अपने सर पर अपना हाथ मार लिया

“अब याद आया! तो वह साला इस चक्रव्यूह में फंसाने की बात बोल रहा था। उस कमीने को तो मैं देख लूंगा सिपी सर।”

“अरे हटाओ छोड़ो यार ! उसको तो हम एक साथ सब देख लेंगे, उसकी चिंता छोड़ो। फिफ्थ सेम के एग्जाम की डेट आ गई है। उस पर भी फोकस करो। इस बार तुम्हारा चांस है अगर इस बार टॉप कर लिए तो अगले सेमेस्टर बुक बैंक फ्री मिलेगा तुमको।

“यह बढ़िया बात बताएं सर आप। एग्जाम कब से हैं?”

“2 हफ्ते बाद की डेट आई है बेटा! कभी थोड़ा लाइब्रेरी के बाहर लगे नोटिस बोर्ड पर भी नजरें फिरा लिया कीजिए। वैसे तो आप दोनों बहुत ही ज्यादा व्यस्त रहते हैं! लेकिन अपने व्यस्त शेड्यूल से थोड़ा टाइम निकाल कर नोटिस बोर्ड पर भी नजर डाला कीजिए।”

  अभिमन्यु और अधीर झेंप कर इधर-उधर देखने लगे।
सीपी उठकर अभिमन्यु के बालों पर हाथ रख कर बाहर निकल गया दरवाजे से पलट कर एक बार फिर उसने अभिमन्यु को आवाज लगा दी…- घबराओ मत ऋषि खुराना की तो खबर हम सब मिल कर लेंगे! अभी फिलहाल कल जाकर मैडम के पैर पकड़ लेना कि तुम को सस्पेंड ना करें! 2 हफ्ते बाद एग्जाम हैं। इस बात की भी दुहाई दे देना जिससे तुम्हें माफ कर दें। आई बात समझ में?”

  अभिमन्यु ने झुक कर सीपी सर के पैर छू लिये। और सीपी  ने उसे ऊपर उठा कर अपने कलेजे से लगा लिया…-” छोटे भाई हो बे हमारे।’

******

   अगली सुबह निरमा के ऑफिस के बाहर अभिमन्यु इधर से उधर चक्कर काट रहा था कि तभी निरमा के ऑफिस का दरवाजा खुला और एक लंबे चौड़े डील डौल वाला स्मार्ट सा बंदा एक बच्ची का हाथ पकड़े बाहर निकल आया…
   हड़बड़ी में अभिमन्यु उससे टकराते टकराते बचा…-” सॉरी सर! वो ज़रा दिमाग घुमा हुआ है ना। इसलिए कुछ सूझ नही रहा और आपसे टकरा गए।”
” कोई बात नही। “
वो व्यक्ति आगे बढ़ने को था कि उस बच्ची ने अभिमन्यु के हाथ में थमा गुलाबों का बुके देख उसे पाने की ज़िद शुरू कर दी।
   और अभिमन्यु उस लड़की से बचाने के लिए गुलाब इधर उधर छुपाने लगा…
  ” नो मीठी! अभी यहाँ से चलो तुम्हें शाम में पापा रोज़ेज़ दिलवा देंगे।”
” आप भूल जातें हैं पापा।”


   उस व्यक्ति ने मुस्कुरा कर अभिमन्यु की तरफ देखा…-“तुम परेशान मत हो। जाओ अंदर मैं इसे सम्भाल लूंगा। “
  अभिमन्यु विनम्रता से दुहरा होता उसी आदमी से अपने मन की बात कहने लगा….
” ये असल में मैडम के लिए लेकर आया हूँ।”
  सामने खड़े आदमी की भौहें ज़रा तन गयीं। उसके चेहरे के भाव देख अभिमन्यु को लगा ये आदमी भी अंदर बैठी औरत से परेशान ही होगा , वो अपनी लय में कहता चला गया।
  ” क्या बताऊँ सर। इतनी कड़क हैं ये मैडम की आपकी गलती न भी हो तो भी आपको सॉरी बुलवा कर रहेंगी।”
   सामने खड़े उस आदमी ने अभिमन्यु का कंधा थपथपा दिया…-“समझ सकता हूँ। और ये बात मुझ से बेहतर कौन जानेगा।”
” सर इतनी स्ट्रिक्ट है मैडम की पहला तो इन्हें देखते ही हम क्या कहने आये थे वो भूल जातें हैं। दूसरा ये अपनी मीठी ज़बान से हमें ऐसे लपेटतीं हैं कि जो वो करवाना चाहतीं हैं फिर वही होता है।
   आप कितने पापड़ बेल लो होगा वही जो इन्होंने सोच रखा होगा। इन्हें कोई फर्क नही पड़ता की पढ़ने में कैसे हैं? आपके एम्बिशन क्या हैं? हम सब इनके लिए सिर्फ गधे हैं। बल्कि इन्हें यह लगता है कि इनके इस केबिन के बाहर हर कोई गांव है यह अकेली हिटलर है।
   हिटलर नहीं बल्कि यह तो मुझे तुगलक लगती है। बिना सर पैर के फरमान जारी कर दिया तो कर दिया। अब तुम फॉलो करते हो तो ठीक और अगर नहीं की तो तुम्हारा सर कलम कर दिया जाएगा।
   अच्छा सदियों से यह परंपरा रही है कि कितना भी खडूस राजा रहा हो,सर कलम करने से पहले आप की आखिरी इच्छा जरूर पूरी करने के लिए पूछता था। लेकिन यह ऐसी है कि आप की आखिरी इच्छा भी नहीं पूछेंगी सीधे खटाक।

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“बहुत सताए हुए लग रहे हो इनके।”

” क्या करें इनसे ज्यादा हम अपनों के सताए हुए हैं।अपने कॉलेज के लौंडो की मदद करने के चक्कर में बुरी तरह से फंसे बैठे हैं। पता है अंदर जाएंगे तो मैडम सूली पर चढ़ा ही देंगी।”

“एक बार बात करके देखो दोस्त ! हो सकता है तुम्हारी सुन ले।”

अभिमन्यु ने लाचारगी से ना में से सिर हिला दिया…

“अभी 2 दिन पहले तो इनसे बात करके गए हैं सर जी। कैंपस में इधर-उधर लड़के ना घूमे उसके लिए आकर बड़े प्यार से इन से बात की कि आर्ट्स एंड स्पोर्ट्स वाले लड़कों का इधर-उधर घूमना बंद करवा दें। वह लड़के वैसे भी वाहियात हैं। अब कल तो हम किसी काम से मेडिकल गए थे अब वहां के कुछ लड़कों ने आकर आग लगा दी! अब मैडम जी हमारे नाम से फतवा जारी कर चुकी हैं। हमें इसीलिए बुलवाया गया है कि हमारे नाम का सस्पेंशन लेटर हमारे हाथ में रख दिया जाए ,क्योंकि मैडम ने आदेश पारित कर दिया था। और वह आदेश भी ऐसा वैसा नहीं कि दो से तीन बार वार्निंग दी जाएगी फलाना ढिकाना। बल्कि आदेश यह था कि अब से अगर कोई भी लड़का किसी दूसरे कैंपस में नजर आया तो उसे तुरंत सस्पेंड कर दिया जाएगा। एक महीना के लिए। अब बोलिए 15 दिन बाद हमारे एग्जाम होने हैं। यह हमें सस्पेंड कर देंगी तो हम तो पूरा एक सेमेस्टर पीछे हो जाएंगे ना। “

“बात तो चिंता की है! पर तुम ऐसा करना, जाते साथ पहले मैडम से यह सारी बातें बोल देना। हो सकता है सुन ले, वैसे कभी-कभी सामने वाले की भी सुन लेती हैं। स्ट्रिक्ट तो हैं लेकिन अगर कोई अपनी सच्चाई पर अडिग रहे तो उसे माफ भी कर देतीं हैं।’

“पापा चलो न देर हो जाएगी। फिर मम्मी आपको डांट लगाएंगे कि मीठी को लेट करवा दिया।”

अभिमन्यु ने प्यार से उस बच्ची के सर पर हाथ फेरा और मुस्कुरा कर उसके पास झुक कर बैठ गया …-“हां बेटा जाओ घर पर आपकी मम्मी वेट कर रही होगी ना।”

“नहीं भैया! मम्मी तो अंदर बैठी हैं ।यह मम्मी का ही ऑफिस है। और स्कूल ले जाने के पहले पापा मुझे मम्मी से मिलवाने लाते हैं।”

   अभिमन्यु खट से खड़ा हो गया। उसने घबराते हुए सामने खड़े आदमी की तरफ देखा…-” आई एम सॉरी सर। मुझे पता नहीं था कि आप….”
    वह कहते कहते रुक गया कि प्रेम ने उसके सामने हाथ बढ़ा दिया…-” मैं प्रेम सिंह चंदेल हूँ। अंदर आपकी जो हिटलर मैडम बैठी हैं हमारी ही शरीक-ए-हयात हैं।
   और वैसे इतनी भी खडूस नहीं है वो। नाम क्या बताया तुमने अपना?”

“सर अभिमन्यु! अभिमन्यु मिश्रा मेकेनिकल 5th सेमेस्टर में पढ़ता हूं।”

“अरे जन्मकुंडली नहीं पूछी भाई । जाओ जाओ अंदर जाओ । मैडम ने ग्रीन बत्ती जला दी है।”

  अपने बालों पर हाथ फेरता झूमता हुआ सा अभिमन्यु निरमा की केबिन में दाखिल हो गया और प्रेम मीठी का हाथ  थामे उसके स्कूल के लिए निकल गया।

******

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    कैंटीन से लौटती रंगोली और झनक हॉस्टल पहुंचे कि देखा एक पुलिस की गाड़ी उनके कम्पाउंड में खड़ी है, और आसपास काफी सारी भीड़ भाड़ जमा हो रखी है।
    वो लोग भी धीमे से घुस कर भीड़ का एक हिस्सा हो गए। आसपास खुसफुसाहट चल रही थी,ध्यान लगा कर सुनने में भी कुछ समझ नही आ रहा था। झनक ने साथ खड़ी एक लड़की से ” माज़रा क्या है?”पूछ ही लिया।
  उसने जो बताया वो सुन कर रंगोली और झनक के होश उड़ गए।
    उन्हीं के हॉस्टल में किसी लड़की ने फंदे से लटक कर आत्महत्या कर ली थी……

क्रमशः

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aparna..

समिधा -31

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     समिधा – 31

      भगिनी आश्रम एक तीन मंजिला आश्रम था, जिसमें बहुत बड़े बड़े हॉल एक ऊपर एक बने हुए थे। इनमें सबसे ऊपरी मंजिल पर कुछ कमरे और खुली छत थी। ये कमरे भगिनी आश्रम के सामान रखने के लिए उपयोग में लाइ जाती थीं। इन्हीं में एक कमरा चारु दीदी को मिला था,जिसमें वो जब कभी आकर आश्रम की लिखा पढ़ी भी जांच लिया करती थीं।
    एक कमरे में आश्रम की महिलाओं के उपयोग के लिए दानदाताओं द्वारा मिली सामग्री रखी थी तो दूसरे कमरे में पहले कभी सन्यासिनों द्वारा बुने कपडे चटाइयां आदि पड़े थे।
    एक दो कमरे खाली पड़े थे लेकिन बाहर से उन पर ताला पड़ा था। उसकी निचली मंज़िल पर बड़े से हॉल में पारो को साथ लिए सरिता खड़ी थी और उसे सबसे पीछे की तरफ खाली पड़े एक पलंग को दिखा कर इशारा कर दिया, कि वही पलंग उसका है।
    लंबे चौड़े से हॉल में आमने सामने दोनो तरफ दीवार से लग कर पलंग बिछे थे, और हर एक पलंग के पीछे खिड़की खुलती थी। पलंग के बाजू से एक छोटी अलमीरा बनी थी जिसमें साध्वियां अपना सामना, पानी का बर्तन चंदन माला आदि रखा करती थीं।
     उस पूरे हॉल में लगभग बाइस पलंग बिछे थे। हर पलंग के पीछे खिड़की होने से कमरा बहुत ही ज्यादा खुला और हवादार लग रहा था। हॉल के एक तरफ सामने बड़ा सा दरवाजा था जिस के ठीक सामने ही नीचे जाने और ऊपर जाने की सीढ़ियां बनी हुई थी। हॉल के दूसरी तरफ जो दरवाजा खुलता था उसके पीछे  गुसल खाने बने हुए थे।
     ” सुबह उठने के बाद हमें अपनी अपनी जगह की सफाई करने के साथ ही नीचे के हॉल की सफाई करनी होगी। सबसे नीचे खाने का कमरा बना हुआ है। वहां झाड़ू पोछा करने के बाद हमें बाथरूम आदि धोना होता है। और उसके बाद नहा कर हम भजन के लिए मंदिर पहुंच जाते हैं।
      वहां का पूजा पाठ भजन आरती होने के बाद हमें पीछे बनी रसोई की तरफ जाना होता है ।वहां पर दोपहर के खाने की तैयारी करनी होती है। दोपहर का खाना बनने के बाद जब गुरु आचार्य और सभी संतो के लिए भोजन चला जाता है, तब हम सभी बहने अपने हिस्से का भोजन लेकर अपने आश्रम में आ जाती हैं।  वहां सबसे नीचे जो हॉल बना हुआ है वही बैठकर हम सब एक साथ भोजन करते हैं।
    उसके बाद चाहो तो दोपहर में अपने कक्ष में आकर आराम कर सकती हो । शाम को होने वाली संध्या आरती के पहले एक बार फिर हमें फूल तोड़कर उन्हें धोकर मंदिर में पहुंचाना होता है।”

” फूलों की माला नहीं बनानी होती?”

” नहीं फूलों की माला हम नहीं बनाते! फूलों की माला वहीं रहने वाले आचार्य या गुरुवर ही बनाते हैं। क्योंकि फूलों की माला तो सीधे गोपाल जी को चढ़ाई जाती है ना हमारी बनाई माला कैसे चढ़ेगी वहां?”

जाने क्यों पारो का चेहरा कसैला सा हो गया वह चुपचाप सरिता के दिखाए पलंग की तरफ आगे बढ़ गई उसके हाथ में एक ही बैग था। उसने उस बैग को नीचे रखा और उसमें से सामान निकाल कर उस छोटी सी अलमारी में जमाने लग गई।

   ******

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      पारो को आश्रम में आए 2 दिन ही हुए थे कि एक दोपहर जब रसोई में मदद कर रही थी कि तभी ऑफिस से एक लड़का उसे ढूंढता हुआ वहां चला आया….-” पारोमिता दीदी कौन है? “

  वहां काम करती सभी औरतों की आंखें उसकी तरफ उठ गई। आश्रम में मौजूद औरतों के लिए यह बहुत बड़ी बात होती थी, कि बाहर से उनसे कोई मिलने आया है। क्योंकि उनमें से अधिकतर के परिजनों ने तो उन्हें यहां छोड़ने के बाद शायद यह मान लिया था कि वह सब अब उनके लिए हमेशा हमेशा के लिए मर चुकीं हैं। एक बार यहां छोड़कर जाने के बाद ना कोई परिजन मिलने आते थे और ना ही इनमें से कभी किसी को घर बुलाया जाता था।
     उसकी बात सुन पारोमिता धीरे से खड़ी हो गई…-” जी मैं हूँ पारोमिता!”
” दीदी आपको उधर ऑफिस में बुलाया जा रहा है।”
    पारो ने एक नज़र सरिता पर डाली और उन सभी की प्रवर सुलोचना दीदी से आंखों ही आंखों में बाहर जाने की आज्ञा ले बाहर निकल गयी। सरिता ने भी दीदी की तरफ एक बारगी देखा, उन्होंने आंखों से ही उसे भी साथ जाने की इजाज़त दे दी।
   वो खुशी से पारो के साथ हो ली।

   उदयाचार्य जी के साथ ऑफिस में सिर झुकाए दर्शन बैठा था। पारो के वहाँ पहुंचते ही वो झट से खड़ा हो गया…
“कैसी हो बऊ दी!”
   दर्शन को देख पारो की आंखें भर आई उससे एकाएक कुछ कहते नहीं बना उसने अपना सिर झुका लिया। और “हां” में सर हिला दिया।  उसे देखकर दर्शन की भी आंखे भर रही थी लेकिन उसने खुद को संभाल लिया। उसने मुड़कर एक बार सामने बैठे उदयाचार्य जी की तरफ देखा उन्होंने शायद दर्शन का इशारा समझ लिया…-” हां हां आप बिल्कुल आश्रम घूम सकते हैं। सरिता इन्हें और पारो बहन को ले जाओ बाहर हमारी वाटिका और आश्रम घुमा दो।”

    दर्शन ने अपने हाथ में थाम रखी बैग को कस कर पकड़ा और धीमे से बाहर निकल गया । उसके पीछे पारो भी बाहर चली गई । सरिता ने मुड़कर एक बार उदयाचार्य जी को प्रणाम किया और वहां से बाहर निकल गई। उदयाचार्य अजीब सा मुहँ बनाकर वापस अपने रजिस्टर में गड़ गए। उन्हें हमेशा यही लगता कि आश्रम की सबसे मोटी जिम्मेदारियां उन्हीं के कंधों पर हैं और इसीलिए जब भी बाहर से कोई मिलने आता तो उनका सिर दर्द और बढ़ जाता ,क्योंकि आने वाले की पूरी जीवन कुंडली उन्हें एक अलग रजिस्टर में लिखनी पड़ती। कि वह किस से मिलने आया है? जिससे मिलने आया है उनसे वह कैसे परिचित है ?किस समय आया? किस शहर से आया ?कितनी देर यहां रहा? उसने आश्रम में क्या-क्या देखा? आश्रम के किन-किन कमरों में वह गया? और कब वापस लौटा? उसके साथ कोई सामान तो नहीं था? आदि इत्यादि।
    इतनी सारी लिखा पढ़ी का काम करने में अक्सर आचार्य झल्लाते रहते थे।

    उस ऑफिस से निकल कर वह लोग एक तरफ बने रास्ते से चलते हुए आश्रम की वाटिका में पहुंच गए। वहाँ ढेर सारे पेड़ों के बीच कुछ बड़े-बड़े पेड़ भी लगे हुए थे उन बड़े पेड़ों के चारों तरफ गोलाकार चबूतरे बने हुए थे जो साफ-सुथरे उजले थे । वही चबूतरे पर जाकर दर्शन बैठ गया, पारो उसके पास ही खड़ी रही।  सरिता ने दर्शन की तरफ देखा…-” आप आश्रम नहीं देखना चाहते? “
    सरिता भी पारो से कुछ दो-तीन साल ही बड़ी थी और उसकी भी किस्मत काफी कुछ पारो से मिलती जुलती थी। दर्शन ने उसे देखकर “ना” में सर हिला दिया और पारो की तरफ देखने लगा पारो उसके पास ही सर झुकाए खड़ी थी।

“बैठो ना बाउदी। “

  पारो वही चबूतरे पर दर्शन से जरा हट कर बैठ गई।

“क्या हुआ अचानक तुम यहां क्यों चली आई? मैं बस 1 दिन के लिए ही तो दूसरे गांव गया था,बाबा के साथ! और वापसी पर पता चला कि तुम्हारी मां आई थी और उसके बाद तुमने यहां आश्रम आने की जिद पकड़ ली। आखिर ऐसा क्या हुआ बाउदी जो तुम घर छोड़ कर हम सब को छोड़ कर यहां चली आई?

पारो समझ गई थी कि उसके आने का असली कारण किसी ने भी दर्शन को और उसके बाबा को नहीं बताया होगा। सब ने इस बार भी उसके आश्रम आने की जिम्मेदार उसी को ठहरा दिया होगा। वह अपनी किस्मत पर मुस्कुरा कर रह गई।

“बस ऐसे ही दर्शन अब वहां मन नहीं लग रहा था!”

“तो क्या यहां लग रहा है? यहां कैसे रह पाओगी बऊ दी? यहां इतने परायों के बीच जहाँ ना अपनी जमीन है ना अपनी मिट्टी ना ही अपनी बोली ना अपना खान-पान । इन सबके बीच रहना मुश्किल नहीं लग रहा तुम्हें। “

अपनों की आंखों में अपने लिए पारो इतना सारा पराया पन देख चुकी थी कि अब उसके मन ने अपना और पराया सोचना ही छोड़ दिया था।

“ऐसा क्यों सोचते हो दर्शन कि यहां मिट्टी अपनी नहीं है! लोग अपने नहीं हैं ! यह सब हमारी सोच पर ही तो निर्भर करता है, बल्कि यहां तो भगिनी आश्रम में सब मेरे जैसी ही किस्मत की मारी हैं। और हम एक दूसरे के साथ सब अपना दुख भुला लेते हैं, बांट लेते हैं। कुछ अपने आंसू बहा लेते हैं तो कुछ सामने वाले के आंसू पोंछ लेते हैं। मुझे तो यहां अच्छा लग रहा है दर्शन।”

“तुम्हारे चेहरे से तो नहीं दिख रहा कि तुम्हें अच्छा लग रहा है। बउ दी एक बात बोलूं मेरे साथ वापस चलो कम से कम तुम्हें देखकर लगता है, कि  मेरे देव दादा…”

इसके आगे दर्शन कुछ नहीं बोल पाया लेकिन पारो समझ गई कि वह क्या कहना चाहता है।

“नहीं दर्शन अब वापस नहीं जाऊंगी। अब मेरे हिस्से जितनी भी सांसे बची हैं ,वह मुझे यही इसी आश्रम में लेनी है । अब यहां से कहीं नहीं जाऊंगी। एक बात बताओ क्या तुम अकेले आए हो?”

“हां बउ दी , और मेरे साथ कौन आता अकेला ही आया हूं।

पारो के चेहरे पर एक मुस्कान खेल गई।  वह समझ गई कि दर्शन घर पर बिना किसी से कुछ बोले आया है।

“घर पर बिना बताए मुझसे मिलने चले आए हो फिर किसके सहारे मुझे वापस लेकर जाना चाहते हो दर्शन?”

दर्शन पारो की बात पर इधर-उधर देखने लगा। सच ही तो कह रही थी पारो अब इतने दिन में वह भी घर वालों को अच्छे से जानने लग गई थी। जब यहां आने से पहले उसके घर पर बात करने की हिम्मत नहीं हुई तो आखिर किस आधार पर वो पारो को वापस लेकर जाना चाहता है।
   हालांकि वह यही सोच कर आया था कि किसी भी तरीके से पारो को घर वापसी के लिए मना लेगा लेकिन उसके मन में एक शंका यह भी था कि पता नहीं पारो उसके साथ वापस जाना चाहेगी या नहीं और इस लिए….

“मेरे बारे में सोच सोच कर दुखी मत हो दर्शन। मैं यहां बड़े सुख से हूं।”

“हां वह तो देख पा रहा हूं। पहले ही इतनी दुबली थी अब तो ऐसा लगता है जैसे हड्डियां उभर आई हैं।”

उसकी बात सुन पारो खिलखिला कर हंस पड़ी।

“ठीक है अब से खा पीकर थोड़ी मोटी हो जाऊंगी! अगली बार मिलने आओगे तो इससे बेहतर पाओगे मुझे।”

दर्शन ने अपने धोखेबाज आंसुओं को जो उसकी बिना मर्जी के भी उसके गालों पर लुढ़क आये, उन्हें पोंछ लिया और खड़े होकर पारो का हाथ पकड़ लिया।
” बउ दी आपके लिए कुछ सामान लेकर आया हूं मना मत करना।”

“क्या है दिखाओ तो सही।”

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दर्शन ने इतनी देर से अपने कंधे पर टांग रखे बैग को अपनी गोद में रखकर उसकी चेन खोल दी उसमें पारो के लिए किताबें रखी थी।
     घर पर किसी तरह से जुगत लगा कर आखिर दर्शन और आनंदी के जोर देने पर पारो को 11वीं की परीक्षा देने का मौका मिल चुका था।
    पारो के आश्रम आने के बाद ही उसका परीक्षा फल भी आ गया था। और वो अच्छे नंबरों से पास हो चुकी थी।
     दर्शन को जब पारो के परीक्षाफल का पता चला तब वो बाहर ही था, वो खुशी से बांवरा मिठाई लिए जब घर पहुंचा तब उसकी प्यारी बऊ दी उसे घर भर में कहीं नही नज़र आई ।
   जब माँ से उसने पूछा तो माँ ने उसकी पूछताछ से परेशान हो कह दिया…-“मर गयी तेरी बऊ दी” और वो नाराज़ हो घर से बाहर चला गया था।
    गुस्सा उतरने के बाद जब आधी रात वो घर लौटा तब आनन्दी बऊ दी ने खाना परोसते हुए उसे पारो के जाने की सारी बात सिलसिले वार बता दी।
    और अगले ही दिन घर पर बिना किसी से कुछ कहे वो उससे मिलने निकल गया।
    पर जाने क्यों अपनी माँ की बात सुन उसका मन कड़वाहट से भर गया था। बऊ दी से ऐसी भी क्या नाराज़गी। उनकी तकलीफ समझने की जगह हर कोई उनकी तकलीफ बढ़ाने में लगा था।
   रास्ते भर सोच सोच कर उसका सिर फटने लगा था। उसे पारो की घर वापसी का कोई मार्ग दिखाई नही दे रहा था, फिर भी मन ही मन वो उसे वापस ले जाने को मना लेने का एक प्रयास तो करना ही चाहता था।
       पारो के लिए क्या लेकर जाना चाहिए  उसे नही सूझ रहा था कि एकदम से उसे लगा अगर पारो उसके साथ नही भी आई तो कम से कम जहाँ हैं वहीं से अपनी आगे की पढ़ाई ही कर ले। और इसलिए उसने उसके लिए किताबें रख ली थीं, वो भी अगली कक्षा की।
   बैग खोलते ही पारो की नज़र किताबों पर गयी और उसकी आंखें भर आयीं।

“अब इन किताबों का क्या करूँगी ? “

“पढना ! किताबों का भला और क्या किया जाता है? “

   वो दोनों बातें कर रहे थे कि उनके पास से होकर वरुण किसी अन्य आचार्य से बात करता निकल गया। और उसे पीछे से देख दर्शन के मुहँ से बेसाख्ता “देव दादा”निकल गया।
     दर्शन की आवाज़ पर वरुण चौन्क कर पलट गया।

   वरुण ने दर्शन को देखा और दर्शन ने वरुण में छिपे देव को।
   वरुण को देखते ही जाने क्यों दर्शन के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कुराहट चली आई वरुण ने भी दर्शन को पहचान लिया वरुण कदम बढ़ाता दर्शन तक चला आया।

  ” आप तो हमारे घर आये थे ना…?

  ” कैसे पहचान लिया मुझे ?”
वरुण के सवाल पर दर्शन के मुहँ से उसके बिना चाहे भी वो बात निकल गयी जो सुन वहीं खड़ी पारो भी चौन्क गयी
   ” आपको देख बिल्कुल ऐसा लगा जैसे मेरे देव भैया वापस आ गए। बऊ दी ये वहीं तो हैं जो उस वक्त हमारे घर आये थे, जब…। “

  पारो ने बिना वरुण का चेहरा देखे ही उसकी ओर हाथ जोड़ दिए, और इतनी देर में वरुण पारो की सारी आपबीती समझ गया।
   उस दिन पहली बार आश्रम में उसे देखने के बाद एकाएक वो उसे नही पहचान पाया था लेकिन जाने क्यों जब तक वो नज़र आती रही थी उस पर से नज़रे नही हटा पा रहा था।
   बादबाकी उस रात वो अपने इस कृत्य पर बेहद शर्मिंदा भी हुआ था।
   आश्रम में होते हुए वो ऐसे कैसे किसी औरत को अपलक देख सकता था?
आश्रम आने के बाद से ही उसने डॉक्टर की बताई दवाएं भी लेनी छोड़ दी थीं……
   यही सब सोचते सोचते जाने रात की किस पहर उसकी नींद लग गयी थी, सुबह भोर की पहली किरण से जब उसकी नींद खुली तब उसे एहसास हुआ कि कल रात वो जाने कितनी जागती रातों के बाद चैन की नींद सो पाया था….

क्रमशः

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aparna….

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शादी.कॉम -23

मुलाकात : राजा और बांसुरी की

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   शादी डॉट कॉम:- 23

     समय!!! समय को किसी से लेना देना नही होता, उसे सिर्फ चलना है ,चाहे कोई लाख चाहे की वो रुक जाये ठहर जाये ,पर नही समय अपनी गति से ही भागेगा।।

      इन पांच साढ़े पांच सालों में राजा और बांसुरी के घरों में परिवारों में मुहल्ले में बहुत कुछ बदल गया।
   युवराज भैया ने दो नयी एजेंसी डाल दी,सिर्फ रुपयों पैसों मे ही उनका रुतबा नही बढ़ा बल्कि घर परिवार में भी बढ़ गया,जहां पहले वो घर के सबसे बड़े लड़के थे अब एक छोटे से बालक के पिता हो गये, रूपा पहले ही अभिमानिनी थी अब पुत्र की जननी होकर उस अभिमान के सोने पे सुहागा चढ़ गया।।
     खाता पीता परिवार सदा मधुमक्खियों के छत्ते सा होता है,छत्ते में एकत्र मधु के लालच में जैसे मक्खियां भिनकती हैं ऐसे ही नाते रिश्तेदार घेरे रहते हैं ।।
   
    राधेश्याम जी के घर पर भी बेला कुबेला कुछ ना कुछ होता ही रहता था,कोई तीज त्योहार,मुंडन छेदन,सीक सुहागिल हो,इसी बहाने घर परिवार की औरतों को बहाना मिल जाता,पहले तो सब दबी ढकी आवाज़ में ही राजा के ब्याह के प्रगति पत्र का जायजा लेती थी,पर अब वही ज़बान खुलने लगी थी।।
     जब घर की माल्किन ही मुहँ मे दही जमा के बैठी हो तो बोलने वालियों को मौका तो मिल ही जायेगा ना।।
    
” काये हो सुशीला बहन?? कब खिला रही हो रजुआ के ब्याह का लड्डू।”
     पड़ोस की बिन्नी काकी अपनी मित्र मंडली में अपने मुहँफट स्वभाव के लिये जानी जाती थी

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” अरे बिन्नी जिज्जी हम तो सुन रहे रजुआ कहीं का बड़ा आफीसर बन गया है,,क्यो सुसीला  तुम नही बताई कभी ,अरे कहाँ का लार्ड कमिस्नर हो गया है राजा।”

” अरे तुम लोग  भी ना!! अपने अपने कोच के पेड़े को निहारो ना,सुहागिल तो निबटने दो तब हम बताएंगे कहाँ का लार्ड गवर्नर बना है हमारा राजा।”

“चाची जी!! लल्ला जी के लाने ही तो अम्मा जी सुहागिल खिला रही हैं,जो मन्नत मानी थी वो पूरी जो हो गयी।।”

” हां भई रूपा !! अब तो जैसे तुम्हरे कन्हैय्या को गोद खिला रही ऐसे ही एक और बहुरिया आ जाये उसका भी एक आध लड़का लड़की कुछ हो जाये बस फिर तो सुसीला और भाई साहब के सब तीरथ हुई जायें।”

” तुम्हरे मुहँ मा घी सक्कर।।”

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         जी में आता है, तेरे दामन में सर झुका के हम
               रोते रहें, रोते रहें…….
        तेरी भी आँखों में, आंसूओं की, नमी तो नहीं
        तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई, शिकवा, तो नहीं..
       तेरे बिना ज़िन्दगी भी लेकिन, ज़िन्दगी, तो नहीं
       ज़िन्दगी नहीं, ज़िन्दगी नहीं, ज़िन्दगी नहीं……

माला– ओ मैडम !! और कोई गाना नही है आपके पास!!क्या यार,सुबह सुबह यही मनहूस गाना बजा देती हो।।

   माला की बात पर बांसुरी मुस्कुरा के वापस तैयार होने लगी….

माला– बस यही तो है!! आपसे हम कुछ भी कह लें आप बस अपनी कातिल मुस्कान फेंक दीजिये हम पे

बांसुरी- चलो चलो जल्दी से तुम भी तैयार हो जाओ, आज  बॉस ने तो सुबह सुबह ही मीटिंग बुलाई है।

माला- हाँ जी मुझे पता है, सुनने में आ रहा था की आर.बी.आई. की टीम आने वाली है।।

  बाँसुरी ने हाथ पे घड़ी बांधते हुए हामी में सर हिला दिया।।

     अम्बा जी गढी से एक साल पहले ही बांसुरी को अपनी दुसरी पोस्टिंग पुणे में मिल गयी थी, पहले पहल वर्किंग वीमेंस हॉस्टल मे  रहने के कुछ समय बाद सदाशिव पेठ में बांसुरी अपने ऑफिस की कुलीग माला के साथ शेयरिंग फ्लैट में  रहने चली आयी थी…..
        दोनों सखियाँ साथ ही ऑफिस आती जाती,
मस्तमौला और हंसमुख स्वभाव की माला बेहद बातूनी थी इसीसे उसके स्कूल कॉलेज घर परिवार ,पास के दूर के नाते रिश्तेदार हर किसी के बारे में बांसुरी को सब कुछ पता था,पर माला के बार बार पूछने पता करने पर भी जाने क्यों बांसुरी ने उससे उतनी ही बातें बताईं जितनी ना बताती तो भी कोई फर्क नही पड़ता।।

      बांसुरी का अपने घर जाना बहुत कम हो गया था,हर रविवार वो अपनी मम्मी को फोन कर घर परिवार का हाल समाचार लेती रहती थी, गाहे बगाहे बड़ी बहन वीणा भी उसे फोन कर शादी कर लेने का उलाहना सुनाती रहती थी।।

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     मम्मी पापा से बात कर घर की ,अपने मोहल्ले की अपने शहर की याद जब हद से ज्यादा सताने लगती तब वो अपनी छोटी सी टाउनशिप में बने बड़े से जिम पहुंच जाती,माला इस बात पे अक्सर उसे आड़े हाथों लिया करती __ ‘ अरे कभी समय भी तो देख लिया कर,,रोज़ तो सुबह सुबह जिम पहुंच ही जाती है,फिर अचानक क्या होता है तुझे जो कभी शाम मे कभी रात में 9 बजे जिम भाग जाती है, यार फिटनेस फ्रीक होना अच्छी बात है पर तू तो साइको होती जा रही है,अपने आप को देख ….बिल्कुल जीरो फिगर हो गयी है,कहीं कुछ समय बाद गायब ना हो जाना।।

      ” तेरी तो हर बात अजीब ही लगती है बन्सी!! अब इस मोबाइल के ज़माने में चिट्ठियां कौन लिखता है तुझे,,किसी दिन तेरे इस पेन फ्रेंड को पकड़ के रहूंगी।”
   पर माला बस ताने मार के अपनी बात खुद भूल जाती,इतने महिनों से आने वाली चिट्ठियों को ना कभी उसने पढ़ने की कोशिश की और ना चिट्ठी भेजने वाले को पकड़ने की।।
      हर पन्द्रह बीस दिन में आने वाली इन चिट्ठियों में जैसे बांसुरी की जान बसती थी,, बुआ की लिखी इन चिट्ठियों में सारे रिश्तेदारों का हाल समाचार रहता था,पर कहीं किसी कोने में बुआ हमेशा उसके बारे में भी एक लाइन लिख ही जाती थी और उसी एक नाम की अमृत बूंद पूरे महीने के लिये बांसुरी को जीने का बहाना दे जाती।।
      ” क्या बताऊँ छोरी!! तेरे पीछे से रजुआ ने तो घर से निकलना ही छोड़ दिया है।।”
  
    ” बिटिया सुनने मे आ रहा सुसीला का छोरा भी कोई परीक्षा दे रहा।।”
  
      ऐसे ही समय समय पर बिना बांसुरी के पुछे भी बुआ जी राजा के बारे में यत्न पूर्वक हर खबर उसे दे जाती।
    
      “कितना दुबला गया है का बताएँ लाड़ो,लम्बा तो पहले ही भतेरा था,अब तो पूरा ताड़ लगने लगा है।”
   
      ” सुना है सुसीला ने जहर खाने की भी धमकी दे डाली सादी कराने,,,पर मजाल लड़के के कान में जूं भी रेंग जाये।”
    
      “बिटिया कोई कोई तो जे भी कह रहा की रजुआ दीछा उक्छा (दीक्षा) लेने वाला है।”
     
       ” मुझे तो कभी कभी डर लागे है छोरी,जे छोरा किसी कनफड़े गुरू की शरण में हिमालय ना निकल जाये।”

    ऐसे ही बताने योग्य-अयोग्य हर बात बुआ जी बिना किसी आडम्बर के लिख जाती और मात्र उस एक पंक्ति में छिपे अपने जीवन की सार्थकता को बड़े यत्न से बांसुरी अपनी इत्र से सुवासित हाथी दांत की बनी डिबिया में सहेज लेती ।
      जैसे उसके जीवन में अब दो ही महत्वपूर्ण बातें बची थी,एक रोज़ का जिम और दूसरा बुआ जी की चिट्टीयां।।

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     दोनों भागती दौड़ती स्टॉप पे लगभग समय से पहुंच ही जाती थी,उनके बैंक की गाड़ी उन्हें लेने और छोड़ने आया करती जिसमें उनके अलावा आस पास के और भी एम्प्लायी हुआ करते।
     और दिनों की तरह उस दिन भी गाड़ी में सब होने वाली मीटिंग की चर्चा में लगे थे।।

” बांसुरी यार तू संभाल लियो ज़रा।। उस बड़बोले सिद्धार्थ की तेरे सामने ही बस बोलती बन्द रहती है,वर्ना हम सब को तो वो आंखो से ही गोली मार देता है हिटलर!।।

” शट अप राहुल!! फिजूल में बांसुरी को परेशान ना करो,और बॉस के बारे में ऐसा बोलते शरम नही आती।।”

” नो माला!! बिल्कुल शरम नही आती,उस खबीस बॉस को शरम आती है,इतनी सारी लड़कियों के सामने मुझ जैसे हैण्डसम बन्दे को यूँ लताड़ देता है, फिर!!! मुझे तो उसे कमीना बोलने मे भी शरम नही आती।।

” कम ऑन राहुल!! जब तुम बॉस बनोगे तब तुम भी ऐसे ही हो जाओगे,क्यों है ना बांसुरी ।।”

  बांसुरी मुस्कुरा के रह गयी

” बांसुरी यार कहाँ खोयी रहती है तू,बस हर बात का एक ही जवाब,तेरी स्माईल !! कोई लड़की इतना कम भी बोल सकती है मैनें कभी सोचा भी ना था,चलो यार भागे,,जल्दी से तैयारी कर लेते हैं,सिद्धार्थ आता ही होगा।।”

   कॉर्पोरेट जगत को कई मायनों में अन्ग्रेजी सभ्यता का अनुगामी माना जा सकता है,व्यवसायिक पाठ्यक्रमों में जहां सीनियर्स के लिये सर और मैडम बोलना प्रारंभ हुआ वही कॉरपोरेट में चाहे आपका सीनियर आपसे 30 साल भी बड़ा हो पूरे आदर के साथ उनका भी नाम ही लिया जाता है।

  बांसुरी के बैंक में भी कई सहकर्मी थे हर आकार प्रकार के,अलग अलग धर्म -जाति और उम्र के।।
    बांसुरी का ऑफिस का कार्य लोन इत्यादी से सम्बंधित था जहां उसे सिद्धार्थ को रिपोर्ट करना होता था,सिद्धार्थ 29-30 साल का नौजवान था जिसने बैंकिंग में कई श्रेणियाँ उत्तीर्ण कर अपने लिये यथोचित स्थान और सम्मान कमा लिया था।।

सिद्धार्थ- हेलो फ्रेंड्स ,जैसा की आप सभी जानतें हैं, आर बी आई का दौरा होने वाला है,और हमे इस बार उनकी हर बात उनकी हर चुनौती के लिये तैयार रहना है।।
     उनकी सबसे ज्यादा नज़र लोनधारकों से जुड़ी है,तो मैं चाहता हूँ बांसुरी,राहुल और नेहा आप तीन लोग टीम बनाकर इस काम में लग जायें।
    किसी भी खाता धारक के पेपर्स अधूरे नही होने चाहिये,कोई भी रैंडम पेपर्स वो लोग मांग सकते हैं।
         बड़ी सरकारी डील्स,एन जी ओ के साथ हुई डील्स और बड़ी ज़मीनों के लीज वगैरह के कोई पेपर कच्चे ना रहे,और हो सके तो आप लोग एक बार क्या क्या पूछा जा सकता है उनके जवाबों की रिहर्सल भी कर लेना,,ओके गाईज़।


 
   इसी तरह की कई अति महत्वपूर्ण चर्चाओ को निबटा कर सिद्धार्थ अपने केबिन में चला गया।।

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  ” भई हम तो सिर्फ टाईम पास कर रहे यहाँ,काम तो बस दो ही बन्दे करते हैं एक सिद्धार्थ दूसरा बांसुरी।”

  ” क्यों राहुल,ऐसा क्यों बोल रहे।”

   ‘” और क्या ,सही तो कह रहा हूँ,बन्दे को और कोई तो नज़र ही नही आता,सारी प्लानिंग्स बस एक ही को बताईं जाती हैं बांसुरी मैडम को,अमा यार हम भी खड़े हैं,जब हमारा नाम ले रहे हो तब तो हमें देख लो, यार बांसुरी इसने तुझे अब तक प्रपोज़ कैसे नही किया।।”

   बांसुरी- बकवास मत करो राहुल!! सिद्धार्थ को लगता है कि हमें जल्दी से कुछ समझ नही आता इसिलिए हमे ही सब कुछ एक्सप्लेन करते हैं।”

   राहुल- वॉव ग्रेट!! अच्छी जोड़ी है तुम दोनो की,सच कहता हूँ बांसुरी तुम सोच सकती हो बन्दे के बारे में,अरे दक्षिण भारतीय है तो क्या हुआ है तो वेदुला ब्राम्हण।।नार्थ वेद्स साऊथ,बेहतरीन जोड़ी जमेगी।”
      राहुल की बात अनसुनी कर बांसुरी अपने डेस्क पे चली गयी,राहुल की हमेशा की ही आदत थी जिसे बांसुरी ही क्या कोई भी गम्भीरता से नही लेता था, पर यही हँसी मजाक की बातें सिद्धार्थ के कानों में भी पहुंचने लगी थी।।

      29 साल का सिद्धार्थ तेलुगू ब्राम्हण परिवार का इकलौता लड़का था,इंजिनीयरिंग की पढ़ाई के दौरान ही विदेशों में आगे की पढ़ाई के लिये की जाने वाली टफेल में सफल नही हो पाने के बाद उसने प्रथम प्रयास में ही बैंक पी.ओ.का इम्तिहान पास कर लिया था,और उसके बाद सिलसिलेवार अपनी मेहनत और बुद्धि के बल पर अच्छे खासे सिनियर्स को पीछे छोड़ते हुए वो उच्च पद पर आसीन था।

       पढ़ा लिखा नये ज़माने का सिद्धार्थ जो पहले बात बात पे शादी का माखौल उडाया करता था,उसके लिये उसके कैरियर से अधिक कोई बात महत्वपूर्ण नही रही थी,पर अब इधर कुछ दिनो से शादी ब्याह को लेकर गम्भीर होने लगा था,एक दिन हँसी मजाक में उसने अपनी माँ से पूछ भी लिया__ कि अगर वो किसी उत्तर भारतीय कन्या से विवाह करना चाहे तो क्या उसकी माँ को आपत्ति हो सकती है के जवाब में उसकी माँ ने आगे बढ़कर अपने बेटे का माथा चूम लिया और उसकी खुशी में ही अपनी खुशी का ठप्पा लगा दिया था।।
         
       दुबली पतली सांवली सलोनी चुप चाप अपने काम में लगी रहने वाली बांसुरी पहली ही नज़र में उसे बहुत भा गयी थी,पर आज तक किसी बहाने भी सिद्धार्थ उससे अपने दिल की बात नही कह पाया था…..
     नये साल की पार्टी में जब उसे जबर्दस्ती माईक पकड़ा दिया गया था तब कितने मन से उसने बांसुरी की तरफ देखते हुए गाया था__

    एक अजनबी हसीना से यूँ मुलाकात हो गयी
  फिर क्या हुआ ये ना पूछो कुछ ऐसी बात हो गयी।

   उसी के बाद से राहुल और ऑफिस के कुछ एक उसके हमउम्र सहकर्मी बांसुरी को उसके नाम से छेड़ने लगे थे,उसे अपने केबिन से ये सब हल्की फुल्की गपशप सुनना बड़ा पसंद आता था पर आज तक उसके नाम पे बांसुरी को चहकते उसने कभी नही देखा था,बल्कि नये साल की पार्टी वाले दिन भी जब सबने उसे गाने का इसरार किया तब भी कैसा तो मनहूस सा गाना गाया था उसने__

     तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नही…

पर जो भी हो ,उसे धीर गम्भीर सी चुप चाप सी रहने वाली बांसुरी ने मोह लिया था। इसिलिए इतना ध्यान रखने पर भी कोई ना कोई चूक उससे हो ही जाती थी, जब कभी बांसुरी के साथ बाकी लोगो को वो काम के बारे में कुछ भी बताया करता उसकी नज़रे सिर्फ और सिर्फ बांसुरी पर ही टिकी होती।
 
    आज की इतनी महत्वपूर्ण मीटिंग में भी यही हुआ।

    इस मीटिंग के पूरी होते ही सारे लोग अपने अपने क्यूबिक पे जाकर काम पर जुट गये।।
     वैसे तो आर बी आई की टीम इसके पहले भी विज़िट पे आ चुकी थी,पर वो विजिट तकरीबन 8 साल पहले हुई थी,इसीसे इस बार तैयारियाँ कुछ अधिक ही उफान पर थी,इस बार 3 लोगों की टीम आ रही थी जो पूरे पांच दिन रह कर अलग अलग विषयों पर बैंकर्स को ट्रेनिंग देकर और उनका ऑडिट कर जाने वाली थी,जिनमें शुरु के दो दिन ऑडिट के थे और बाकी के दिन ट्रेनिंग के।।

    सभी को ऑडिट का ही डर सता रहा था,जितनी भी इमानदारी बरती जाये कही ना कहीं कोई ना कोई फाइल ऐसी कच्ची रह ही जाती है जिसपे ऑडिटर की पैनी नज़र पड़ ही जाती है।
     
   अपना काम जल्दी निपटा कर बांसुरी माला के क्यूबिक में पहुंची__

बांसुरी-” क्या हुआ माला मैडम?? अभी तक समेटा नही ,सब का सब फैला पड़ा है।।”

माला- अरे नही यार!! ये कहाँ कहाँ से आते है धारक!!बोल बोल के हम बैंकर्स मर जायेंगे पर मजाल है जो ये लोग सारे के सारे पेपर्स एक बार में जमा कर दें,खैर तूने कर लिया क्या सारा काम।

बांसुरी- हाँ डाटा हैंडलिंग तो कर ली सारी,बाकी भी फाइल्स कर ली है ,कुछ थोड़ा सा चेक करना है वो रूम पे हम कर लेंगे,तुम्हें और कितना समय लगेगा।

माला- क्यों तुझे निकलना है क्या??

बांसुरी- हां ….वो आज मंगल है ना हमे मन्दिर जाना है।

माला- अरे हाँ यार!! मैं भूल कैसे गयी?? तेरा तो हर मंगलवार एपॉइंटमेंट रहता है ना हनुमान जी के साथ, तो तू निकल ले,मैं सीधे रूम पे ही पहुंचती हूँ ।।और बन्सी यार आज कुछ अच्छा सा पका लेना खाने में,बॉस ने आज कुछ ज्यादा ही पका दिया ऑफिस में ।

बांसुरी- नाम भी बता दो डिश का ,क्या खाना है।।
  हँसते हुए बाँसुरी अपना बैग लटकाये माला से विदा लेकर मन्दिर के लिये निकल गयी।।

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   ऑफिस से मन्दिर दूर था,जल्दी जल्दी भागती दौड़ती बांसुरी ने बस पकड़ी और आरती शुरु होने के पहले पहुंच गयी।।
     मंदिर की भीड़-भाड़ में उसे आज काफ़ी पीछे खड़े होना पड़ा,अपनी जगह पर खड़ी दोनो हाथ जोड़े वो वापस अपने शहर पहुंच गयी थी।
    इसिलिए तो शायद हर मंगलवार वो यहाँ आया करती थी,यहाँ पहुंचते ही कितना सुकून मिलता था, सब कुछ सिलसिलेवार याद आने लगता था,हर मंगल के लिये एक ही स्मृति उसके मानस पटल पर अंकित थी,पर वही एक स्मृति हर बार उसे पुलकित कर जाती थी,जब वो राजा के पीछे उसकी बुलेट पे बैठी पहली बार बड़े हनुमान मन्दिर गयी थी, दोनो ने साथ ही हाथ जोड़े थे और उसके बाद लगभग दस मिनट तक आँख बन्द किये राजा के होंठ धीरे धीरे कुछ बुदबुदाते रहे थे और वो निर्निमेष उसे देखती खड़ी थी।।
      लोग कहतें हैं वस्तुएं बेजान होती हैं,पर वही किसी की स्मृति से जुड़ कर कैसी सजीव हो उठती हैं।
  इसी मन्दिर से पहली बार निकलते समय बाहर की छोटी सी फूलों की गुमटी में लटकी रुद्राक्ष की माला उसे कैसे मोह गयी थी,और उसने झट उसे खरीद लिया था,वैसा ही रुद्राक्ष तो वो सदा अपने दायें हाथ में पहना करता था।
       गोरे चौड़े से मणिबंध में कसा रुद्राक्ष कितनी ही बार उसकी धड़कनों में उथल पुथल मचा चुका था।।
 
    राडो की उसकी घड़ी,रे बैन के ग्लास ऐसा कौन सा उसका स्मृति चिह्न था जो बांसुरी ने सहेज के ना रखा हो,ये सारी वस्तुएं अपनी कमाई से खरीद खरीद कर उसने अपनी आलमारी के एक हिस्से में ऐसे सजा रखी थी जैसे खुद राजा ही उस हिस्से में आकर बस गया था।

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      अपने विचारों मे मगन बांसुरी ने आंखें खोली तो एक बारगी उसका दिल धक से रह गया…..
      उसके सामने खड़े लोगों में थोड़ा आगे राजा से डील डौल वाला कोई खड़ा था ।।

   हाँ वही तो लग रहा है,वही चौड़े कंधे,वही घने बाल!! फिर अपनी ही सोच पे बांसुरी को हँसी आ गयी__ ‘वो आकृति हृदय में ऐसी छप गयी है कि हर जगह वही नज़र आता है’  यहाँ कहाँ से राजा प्रकट हो जायेगा।।
        पांच साल से अधिक समय बीत चुका उसे देखे ,,उस शाम के बाद तो गुस्से में उसका नम्बर भी  फ़ोन से हटा दिया था,पर दिल से कहाँ  हटा पायी।।

     इसिलिए कभी कहीं कोई छै फुटिया गोरा चिट्टा नज़र आता तो मुस्कुरा के रह जाती,अपने आप को समझा के __ नही ये वो नही है।।
    उसके यहाँ दूध देने आने वाला गोपाल अलाहाबाद का ही तो है,उसकी आवाज़ और बोलने का तरीका कितना मिलता है राजा से,, इसिलिए आगे पीछे जब समय मिल जाये बांसुरी उससे दो बातें कर ही लेती है।।

     कई बार अपने मन को समझा चुकी,इतना सब उसके लिये कर के भी उसी से बात करने में इतना संकोच क्यों।।
     उस शाम के बाद कितना इन्तजार किया था बांसुरी ने कि एक बार वापस राजा फोन कर ले,तुरंत दौड़ कर उसके पास चली जाऊंगी ,उसकी माँ के भी
पांव पकड़ लूंगी…पर वो राह तकती रह गयी,कोई फ़ोन नही आया,और फिर इम्तिहान पास कर वो दूसरे शहर चली आयी ,,पर हर दफा उसकी आंखे और कान फोन की रिंग पर ही बने रहे।।
     एक फ़ोन तक करना राजा ने ज़रूरी नही समझा।।

    अपने मन को कितना मारा था उसने और आखिर अपनी सारी हिम्मत जुटा के अपनी पहली पोस्टिंग के बारे में बताने राजा को खुद ही फ़ोन लगा लिया।
      पर हाय री किस्मत!! फोन उठाया भी किसने, रूपा भाभी ने,,कैसी कड़वी थी वो बात चीत __ ” अच्छा तो नौकरी लग गयी तुम्हारी,चलो अच्छा हुआ, वर्ना जैसा रंग है ऐसे में लड़का मिलना बहुते मुस्किल होता,है ना बांसुरी!!! अब वहीं अपने बैंक में ही कोई ठीक ठाक छोकरा पकड़ ब्याह कर लेना,तुम्हारे लिये भी वही अच्छा रहेगा।”

” हमारे ब्याह की चिंता करने की आप को ज़रूरत नही है भाभी,हमारे मम्मी पापा हैं ये सब देखने के लिये।”

” मम्मी पापा को भी कहाँ मौका दे रही हो,तुम तो खुदे खोजे पड़ी हो,सोभा देता है का लडकियों का ऐसे उज्जडपना ,आप ही बता रहीं कि अम्मा हमारे फेरे फिरा दो अब…अब हमें मायके में नींद नही आती, वैसे तुम्हें बता दे कि हमारे लल्ला जी ने तो अम्मा के चरणों की सौगन्ध उठा ली है कि उनकी पसंद की लड़की से ही ब्याह करेंगे चाहे भले कानी लूली क्यों ना हो।।”

अपमान से बांसुरी के कान जलने लगे….

” आपकी रेखा से तो ठीक ही हैं,उसने तो बताने की भी ज़रूरत ना समझी ,खुद ही मन्दिर में माला बदल आयी,और सीधे आशीर्वाद लेने पहुंच गयी।”
   बोल कर तड़ाक से फोन काट दिया था उसने, बिस्तर पर पड़ी कितनी देर तक रोती रह गयी थी….
पता नही रूपा भाभी की बात में कितनी सच्चाई थी पर उस दिन के बाद से उसने कभी राजा को फ़ोन नही लगाया,,बहुत बार उठा कर फिर वापस रख दिया था।।
     आज मन्दिर में उस लड़के को पीछे से देख बिल्कुल ऐसा लगा जैसे मानो राजा ही दोनो हाथ जोड़े आंखे बन्द किये होंठो में कुछ बुदबुदाता खड़ा है,एक बार को मन किया कि उस तक पहुंच जाये,बाजू में जाकर कम से कम चेहरा तो देख ही सकती है,पर फिर अपनी ही बुद्धि पे हँसी आने लगी, कैसी बचकानी हरकत होगी ये,कहीं वो कोई और निकला तो?? क्या कहेगी ,कि क्यों उसे देख रही थी।।और चलो मान लिया कहीं राजा ही निकल गया तो???
     इस तो का कोई जवाब बांसुरी के पास नही था, ऐसा होना सर्वथा असम्भव था,मुस्कुरा के एक बार और प्रणाम कर वो मन्दिर से बाहर निकल गयी।।

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     रोज़ सुबह 9 बजे खुलने वाला बैंक आज सुबह 6 बजे से ही खुल गया था,पूरे बैंक को झाड़ पोंछ कर चमका दिया गया था,बैंक ऐसा दिख रहा था जैसे ताजी बनी काजू कतली पे लगा चांदी का वर्क।
      और दिनों की तरह सरकारी बैंक वाला ठप्पा आज यहाँ कही नज़र नही आ रहा था,बिल्कुल किसी शानदार प्राईवेट मल्टीनेशनल बैंक की तरह चमकते अपने बैंक को देख बांसुरी और माला की आंखें भी खुशी से चमक उठी थी।।
     वैसे उन लोगो का कोई फॉर्मल ड्रेस कोड नही था,पर आज सारे ही लोगों को समरसता दिखाने की ताकीद की गयी थी,इसीसे सभी पुरूष सफेद शर्ट में और महिलाएं केरला ओणम वाली क्रीम कलर की साड़ी में थी।।
       आर बी आई की आने वाली टीम के दो सीनियर मेंबर चेन्नई से आ रहे थे और एक मेंबर कोच्ची से था।।
        अपने निर्धारित समय से दस मिनट पहले ही टीम वहाँ पहुंच गयी, सभी कर्मचारी अपने क़्युबिक में अपने अपने काम पर लगे हुए थे, लोगों की भी भीड़-भाड़ बढ़ चुकी थी,ऐसे में टीम धीरे-धीरे सब जायजा लेती एक से दूसरी जगह तफरीह कर रही थी,पहले बताया गया था 3 लोग आने वाले हैं,पर कुल 4 लोग आये थे,जिनमें से 2 अन्दर वाले हॉल में ऑडिट शुरु करने चले गये थे…बाकी दो लोग कर्मचारियों से मिलते जुलते उनकी डेस्क पर ही किसी भी फाइल को पूछ ले रहे थे।।

     कुछ थोड़ी ही देर में सिद्धार्थ हडबडाया सा बांसुरी के डेस्क पे आया__” बाँसुरी वो लीज़ वाली फाइल ले कर तुम आ जाओ ,एक्सप्लेन करना पड़ेगा,असल में वो काम मैनें देखा ही नही था,और उसीकी फाइल मांग रहे हैं,तुम आ जाओ जल्दी!!

    बांसुरी फाइल लिये सिद्धार्थ के केबिन में पहुंची ही थी कि टीम में से किसी ने कॉफ़ी की फरमाइश कर दी __” हमें तो सिद्धार्थ जी चाय ही पिलवाइये, कल जब से पुणे आये हैं,ढंग की एक भी चाय नही मिली।”
 
     बांसुरी का दिल उछल कर मुहँ को आ गया,ये आवाज़ तो राजा की थी,हाँ उसी की थी….अपनी  आखिरी सांस तक भी कभी इस गहरी आवाज़ को भूल पायेगी क्या, आवाज़ की तरफ उसने मुड़ कर देखा, रिवॉलविंग चेयर पे वही तो बैठा था,अपनी सफेद कमीज की बाहों को कुहनीयों तक मोड़ कर दाहिने हाथ मे ऑडिटर वाली पेन्सिल पकड़े टेबल पर पड़ी फाइल को देखता,,बिल्कुल वैसे का वैसा।। पर बुआ सही कह रही थी ,कुछ दुबला हो गया था,और ये चश्मा कब लग गया जनाब को।।
       अपने इस अवतार में तो और भी लुभावना हो गया था राजा!!
      राजा को देख ही रही थी कि राजा से उसके किसी साथी ने कुछ कहा,जिसे सुन वो खिलखिला के ज़ोर से हँसा और तभी उसकी नज़र दरवाजे पे खड़ी बांसुरी पर पड़ गयी।।

क्रमश:

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aparna..

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जीवनसाथी-121

विराज की गाड़ी में कौन था। क्या भगवान उसे उसकी गुनाहों की सज़ा दी रहे

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   जीवनसाथी -121

         आदित्य पिंकी के बेटे को बाहों में लिए बगीचे में घूम रहा था कि ऊपर खड़ी केसर पर उसकी नज़र पड़ गयी। केसर उसे ही देख रही थी। आदित्य ने उसे भी इशारे से नीचे बुला लिया लेकिन केसर ने ना में सिर हिला दिया।
   कुछ समय बाद केसर अपना फ़ोन लिए उसमें कुछ करने लगी कि आदित्य के फ़ोन पर मैसेज की बीप आयीं।
   उसने तुरंत फ़ोन निकाला, मेसेज देखा… केसर का ही था…-“तुमसे कुछ बेहद ज़रूरी बात करनी है। कुछ देर के लिए हमारे कमरे में आ सकते हो?”
   आदित्य ने ऊपर देख कर हां में सिर हिला दिया। कमरे में वापस जाकर उसने बच्चे को पिंकी को थमाया और उल्टे पैरों वापस लौट रहा था कि पिंकी ने उसे टोक दिया…-“आदित्य भैया हमारे साथ चाय ले लीजिए।”
  आदित्य मना नही कर पाया, आखिर पिंकी ने पहली बार उससे कुछ मांगा था। वो वहीं उन लोगों के साथ बैठ गया।
   काकी सा और पिंकी के साथ बैठ आदित्य चाय तो पी रहा था लेकिन उसका दिमाग केसर की तरफ ही था।
  इधर काकी सा ये सोच कर की आदित्य उन सब के साथ सहज हो जाए उससे  बातें किये जा रहीं थीं। पिंकी के बचपन की बातों से लेकर, अपने जोड़ों की तकलीफ अपनी वेनिस की यात्रा तक सब कुछ उसे सुना दिया।
    बातों ही बातों में वक्त बीतता जा रहा था, आखिर आदित्य अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ।

  ” काकी सा हमें ज़रा कुछ काम है , हमें निकलना होगा।”
” हॉं ठीक है आप निकल जाये आदित्य लेकिन अब अगर आप हमें काकी सा की जगह  माँ बुलाएंगे तो हमें ज्यादा खुशी होगी।”
  आदित्य ने मुस्कुरा कर उनके पैर छू लिए…-“आप वाकई हमारी माँ ही तो हैं। हमने उनकी सिर्फ तस्वीर ही देखी है। रोज़ हमारी सुबह उनकी तस्वीर से ही हुआ करती थी, लेकिन अब से आप भी हैं जो हमारी सुबह को रोशन बना देंगी। “

  काकी सा ने उसके सिर पर हाथ फेरा और वो बाहर निकल गया। तेज़ कदमों से चलते हुए वो केसर के कमरे तक पहुंच गया…
… लेकिन केसर वहाँ नही थी। रेखा उसके कमरे में  आँसू बहाती खड़ी खिड़की से पार कुछ देख रही थी।
” रेखा  क्या हुआ ? केसर कहाँ है?”
रेखा ने आदित्य को देखा और वापस रोने लगी। रोते रोते उसने एक चिट्ठी आदित्य की ओर बढ़ा दी…

  आदित्य ने धीरे से चिट्ठी खोली चिट्ठी केसर की ही थी जो उसने आदित्य के लिए लिख छोड़ी थी…

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   आदित्य,

  वैसे तो हमने सोचा था तुमसे मिलकर हर एक बात तुमसे सामने बैठकर कहेंगे लेकिन जाने क्यों हमारी हिम्मत ही नहीं हुई और इसीलिए हमने कल रात ही ये चिट्ठी लिखी।
   सोचा था तुम्हें अपने हाथ से यह चिट्ठी दे देंगे और तुम अपने कमरे में जाकर तफसील से इसे पढ़ कर इस चिट्ठी का जवाब दे देना।
   हमने जिंदगी में बहुत सारे गलत काम किए हैं बल्कि अगर हम यह कहें कि हमने सिर्फ गलत काम किए हैं तो भी गलत नहीं होगा। लेकिन तुमने हमेशा हमारा साथ दिया।  उस वक्त जब तुम और हम दोनों किसी के हाथ का मोहरा थे तब भी तुमसे जब बन पड़ता था हमारी मदद किया करते थे। और बाद में जब हम इस बात को जान गए कि हम किसी के हाथों का मोहरा है उस वक्त भी तुमने हमारा साथ नहीं छोड़ा।
  ठाकुर साहब के आदमी जब हमारी जान के पीछे पड़े हुए थे। उस वक्त एक तुम ही थे, जो हमें उन सब से बचाकर सुरक्षित महल तक ले आए। हम यह बिल्कुल नहीं कहेंगे कि इसमें तुम्हारा कोई स्वार्थ था क्योंकि भले ही हम ठाकुर साहब के गुनाहों का सबूत थे लेकिन हम जानते हैं तुम ने हमें बचाया है तुम्हारे दिल में छिपी इंसानियत के कारण। तुम वाकई दिल का हीरा हो।
   हम भी औरों की तरह राजा अजातशत्रु से बहुत प्रभावित थे, लेकिन हमारे मन में उनके लिए जो झूठी कड़वाहट भरी गई थी उसके कारण कुछ समय के लिए ही सही हमें उनसे नफरत हो गई और उनसे और उनकी बीवी से बदला लेने के लिए हम इस हद तक नीचे गिर गए कि हमने कुछ हत्याएं भी की ।
      इतने बड़े गुनाहों की सजा इतनी आसानी से नहीं मिलती आदित्य।
     हम मानते हैं कि राजा अजातशत्रु और बांसुरी ने हमें माफ कर दिया। हम यह भी जानते हैं कि तुम भी हमें माफ कर चुके हो लेकिन हमारा जमीर हमारी आत्मा हमें माफ नहीं कर रही।
   जिस वक्त हम राजा अजातशत्रु को धोखा दे रहे ,थे उस वक्त भी वह हमारे पिता के स्वास्थ्य के लिए, उनकी जिंदगी के लिए चिंतित थे। वो हर पल हमारी खुशी के लिए दुआएं मांग रहे थे, और ऐसे भले इंसान को हमने धोखा दिया है।
    कभी-कभी यही सब सोचकर हमारा ज़मीर हमें कचोटने लगता है कि आज भी हम उन्हीं लोगों के महल में पड़े हैं , कभी जिनकी जिंदगी हम छीन लेना चाहते थे।
   आदित्य हमारे गुनाहों की सजा यह नहीं है, कि हमें माफ कर दिया जाए। क्योंकि आप लोगों की माफी हमारे दिल को अंदर तक और ज्यादा मरोड़ उठती है।
हमें माफ करने की जगह अगर राजा अजातशत्रु और तुमने हमें कोई सजा दी होती ना, तो हमारी आत्मा का बोझ शायद उतर गया होता । लेकिन तुम लोगों ने हमारे हर गुनाह बख्श दिये और हमें गले से लगा कर माफ कर दिया।
    जिस वक्त हम जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे तुमने इतने प्यार ,इतनी शिद्दत से हमारी सेवा की, कि हम उसका एहसान अपनी सारी जिंदगी नहीं उतार पाएंगे। हमारे साथ कुछ वक्त बिताने के बाद तुम्हें मालूम चल ही गया होगा कि लड़कियों वाला कोई अच्छा गुण हममें मौजूद नहीं है। बावजूद तुमने कदम कदम पर हमारी मदद की। चाहे रसोई में  रोटियां सेकने की बात हो या सब्जी बनाने की। चाहे घर की सफाई हो या कपड़े धोने की। हर काम हम बिगाड़ कर रख देते थे, और तुम उसे वापस तरतीब से सही कर दिया करते थे।
    आखिर क्या क्या करोगे आदित्य हमारे लिए और क्यों किया इतना सब हमारे लिए?
           हम इस लायक नहीं है। बिल्कुल भी नही।
   देखा जाए तो हम इस लायक कभी थे ही नहीं और ना अब है।
   हम जानते हैं हमारी जगह कोई और लड़की होती तब भी आप उसकी ऐसे ही मदद करते, क्योंकि यह मदद का जज्बा आपके खून में है। आखिर आप राजा अजातशत्रु के ही तो भाई है ना । आप सभी भाइयों में चाहे युवराज सा हों, या अजातशत्रु, आप हो या विराट आप सभी में आप लोगों का राजसी खून नजर आता है।
    आप सभी वाकई राजपूतों की शान है, और आप सभी की यह शान हमेशा बरकरार रहे। हम जिंदगी भर भी आप लोगों के लिए दुआ करेंगे तो भी वह कम ही होगा । जिस ढंग से आप लोगों ने हमारे पापा साहेब को बीमारी में मदद की, उनकी सेवा का इंतजाम करवाया, उसके लिए हम दिल से आप सब के आभारी रहेंगे।
   विराज और रेखा एक ऐसा जोड़ा है आप के महल में जो कभी एक साथ सुखी नहीं रह सकता। अभी भी जब से हम इस महल में आए हैं रेखा को हमेशा परेशान ही देखते आ रहें हैं। हमारी छोटी बहन है।  उसकी चिंता हमें लगी ही रहती है। जब से हम यहां महल में आए हमने रेखा को हमेशा हमारे पिता साहब की सेवा करते पाया। उसे भी तो अभी-अभी ही मालूम हुआ है कि उसके जीवन की कड़वी सच्चाई क्या है? पर फिर भी रेखा अपनी परिस्थितियों से समझौता करने में हम से कहीं ज्यादा कुशल है हम शायद अब थकने लगे हैं।
   आप लोगों ने विराज और रेखा के मामले में भी हमेशा रेखा का साथ दिया। और विराज को सही रास्ते पर लाने के लिए राजा अजातशत्रु आज भी प्रयासरत हैं। विराज का स्वभाव चाहे कितना भी कसैला क्यों ना हो लेकिन राजा अजातशत्रु इतने मीठे हैं कि वह एक ना एक दिन विराज को भी सुधार ही लेंगे । हमें पूरा विश्वास है। और इसी विश्वास के कारण हम अपनी बहन रेखा को आप लोगों के पास छोड़े जा रहे हैं।
    हम अपने पिता को अपने साथ लिए जा रहे हैं।  क्योंकि पहले तो ऐसा लगा था कि हम उन्हें भी रेखा के साथ आप लोगों के पास, आप लोगों के सहारे ही छोड़ कर आप सब की दुनिया से कहीं दूर चले जाएंगे। लेकिन फिर लगा कि उनकी सेवा करने का सौभाग्य हमें मिला है, और उस सौभाग्य को हम आप लोगों को सौंप देंगे तो आप लोगों के हम पर और भी एहसान चढ़ते चले जाएंगे ।
     यही सोचकर हम अपने पिता साहब को अपने साथ लेकर जा रहे हैं। आप लोगों ने हमारे बुरे कामों के बावजूद हम पर जो एहसान किए हैं और जो एहसान लगातार करते चले जा रहे हैं, उसके लिए हम आप सभी के शुक्रगुजार हैं। लेकिन अब इन एहसानों का बोझ हम पर भारी होने लग गया है। अगर हम यही महल में रुक गए तो कहीं इन एहसानों के बोझ तले दबकर मर ना जाए, इसलिए आप सब को छोड़कर जा रहे हैं। हमारा खुद का जमा जमाया बिजनेस है हमें उसे भी देखना है ।
  भले ही आज तक हम ठाकुर साहब के हाथ की कठपुतली थे, लेकिन हमारा एक छोटा सा ही सही अपना व्यक्तित्व था जो कहीं दबा छुपा सा रह गया था।

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    हमें मालूम है हमारा खत पढ़ते वक्त आपको शायद ऐसा लगा हो कि हम अपनी जिंदगी से बेज़ार होकर अपने आप को खत्म करने ना चले जाएं, लेकिन नहीं आदित्य।
     आपके साथ रहकर हमने इतना तो समझ लिया है कि कोई इंसान अंदर से कितना भी टूटा हुआ हो, जिंदगी हमेशा उसे जुड़ने का मौका जरूर देती है।
अगर हमने हमारी जिंदगी में बेइंतिहा दुख देखे हैं तो आपने कौन सा कम देखें । आपका टूटा हुआ बचपन बिखरी हुई जवानी सभी को समेटकर आज भी आप जिंदगी से जूझ रहे हैं , लड़ रहे हैं। जिंदगी को जी रहे हैं। आप देखिएगा आदित्य एक दिन खुशियां आप के गले लग जाएंगी।
    आप जो चाहते हैं अपनी जिंदगी में, आपको वह सब मिलेगा। आपका परिवार आपके पिता साहब आपकी छोटी बहन पिंकी सब कुछ।
  हम सिर्फ इन बातों की दुआ कर सकते हैं और हमेशा करते रहेंगे आपके लिए।
     हम जितना राजा अजातशत्रु से प्रभावित थे कहीं उतना ही आपसे भी प्रभावित हो चुके हैं ।आप पहली नजर में जितने संगदिल और गुस्सैल नजर आते थे आप अंदर से वैसे बिल्कुल भी नहीं है।
   आप सब ने तो अपने आप को दुनिया के सामने साबित कर दिया है पर हमें आज तक मौका नहीं मिला। अब हम भी जा रहे हैं खुद को साबित करने, लेकिन दुनिया के सामने नहीं अपने आप के सामने।
    आज तक हम जो करते आ रहे थे किसी और के लिए करते आ रहे थे और इसीलिए शायद सही और गलत का फर्क नहीं समझ पा रहे थे लेकिन अब हम जो करेंगे अपने लिए करेंगे अपनी बहन के लिए करेंगे।

   इतने दिन महल में रहते हुए हमने एक निर्णय लिया था जिसके बारे में हम आपसे चर्चा करना चाहते थे। लेकिन वक्त ही कुछ ऐसा चल रहा था कि हमारा कुछ ज्यादा बोलने का मन ही नहीं किया करता था हमने एक निर्णय लिया है आदित्य।
   हम हमारे जैसे बेचारे बच्चों के लिए एक बाल आश्रम खोलने की सोच रहे हैं।
   हमारे पास तो फिर भी हमारे पिता साहब थे बावजूद हम भटक गए। लेकिन बहुत से ऐसे बच्चे होते हैं जो अच्छी परवरिश ना मिल पाने के कारण कम उम्र में भटक जाते हैं। गलतियां करने लगते हैं। और बाद में उनके पास पछताने या आत्महत्या करने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचता।
    जिन बच्चों के पास उनके मां बाप नहीं है , उनके लिए तो फिर भी ढेर सारे आश्रम खुले हुए हैं लेकिन कई बच्चे ऐसे भी होते हैं जो मां बाप के होते हुए भी उनकी कमी महसूस करते हैं। हम ऐसा ही एक आश्रम बनाएंगे जहां ऐसे बच्चों की काउंसलिंग के लिए डॉक्टर मौजूद रहेंगे।
   किशोरवय के वह बच्चे जो किन्हीं भी कारणों से भटक गए हैं । कम उम्र में ड्रग्स लेने लग गए हैं, या बुरी आदतों के शिकार हो गए हैं। उनके लिए हमारा यह आश्रम होगा। , जहां अनुभवी चिकित्सकों की देखरेख में इन बच्चों को उनकी नशे की नशे की लत और बाकी बुरी लतों से निजात दिलाई जाएगी।
   हम जब से आप के साथ थे इसी प्रोजेक्ट को करने में व्यस्त होते थे। अब जाकर हमारा सोचा हुआ प्रोजेक्ट पूरा हुआ है । कुछ 2-4 में प्रायोजकों से भी बात चल रही थी जिन्होंने अपनी सहमति दे दी है। बाकी तो हमारा खुद का बिजनेस भी है। जिसका एक मोटा पैसा हम यहां पर लगाएंगे हमारे पिता साहब और रेखा भी इस प्रोजेक्ट में हमारा साथ देने तैयार है।
     तो अब तुम समझ ही गए होंगे कि हमने अपनी जिंदगी ढूंढ ली है अब हम यह खत लिखना बंद करते हैं कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया है ।
  लेकिन क्या करें बातें भी तो इतनी ढेर सारी थी।
हम तुम्हारे सामने ज्यादा कुछ बोल नहीं पाते हैं। लोगों को लगता है हम बहुत गुस्सैल हैं, घमंडी हैं, बदतमीज है । हो सकता है लोगों को सही लगता हो। शायद हम ऐसे ही हैं लेकिन हम जो भी हैं अपने आप में खुश हैं। और अब अपने इस काम के साथ  हम नई शुरुआत करने के लिए अपने पिता साहब को लेकर निकलने की सोच चुके हैं। हमारा इस शहर में भी बंगला है और दून में भी। आप जहां भी चाहे आकर हमसे मिल सकते हैं फिलहाल हम आपके ही शहर में यानी यही रहेंगे।
    आप जब हमारी जरूरत महसूस करें हम बस एक फोन कॉल की दूरी पर ही है। वैसे तो आप के आस पास आपके अपने मौजूद हैं। तो जाहिर है आपको हमारी कमी नहीं खलेगी, लेकिन कभी अगर किसी भी मौके पर आपको यह लगे कि हम आपकी मदद कर सकते हैं , तो प्लीज हमें याद करने में गुरेज मत कीजिएगा।बिना कोई दूसरा विचार मन में लाए सीधे हमें बुला लीजिएगा हम तुरंत आपके पास मौजूद रहेंगे।
   हमारी एक छोटी सी जिम्मेदारी रेखा को हम आपके पास छोड़ कर आए हैं। उसका ध्यान रखिएगा आदित्य। अब खत लिखना बंद करते हैं कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया।

  केसर !!!

   केसर के खत को पढ़ने के बाद आदित्य ने मोड़ कर अपनी जेब में रख लिया। वह खत पढ़ते-पढ़ते कमरे से जरा बाहर आ गया था उसने मुड़कर देखा दरवाजे पर खड़ी रेखा ने अपने आंसू पोंछ लिए…-” आप जाएंगे क्या दीदी से मिलने?”

” जरूर जाऊंगा! आपकी दीदी से मिलने भी और उन्हें वापस लेकर आने भी।”

रेखा ने हां में सर हिलाया और वापस अंदर चली गई। उसे उस वक्त जाने क्यों बांसुरी के पास बैठने का मन कर रहा था, अंदर से निकल अपने बेटे का हाथ थामे वह बांसुरी के कमरे की तरफ चली गई।

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  रेखा बांसुरी के कमरे में पहुंची तो उसने देखा वहाँ निरमा पहले ही मीठी को साथ लिए बैठी थी। दोनों सखियों को साथ देख रेखा वापस मुड़कर जाने लगी कि बांसुरी ने उसे आवाज देकर अंदर बुला लिया।

“अंदर आ जाओ रेखा बाहर से क्यों जा रही हो।”

सकुचाती हुई वह भीतर चली आई निरमा ने भी आगे बढ़कर रेखा का अभिवादन किया।

   बांसुरी के बच्चे को गोद में लिए रेखा प्यार से देखने लगी…-‘ कितना मिलता है ना इसका चेहरा हुकुम से!”

” सही कहा बच्चे अधिकतर अपने पिता की ही तो परछाई होते हैं ।कहा जाता है ना कि गर्भावस्था में मां जिसका चेहरा सबसे ज्यादा देखती है, उसी की छाप बच्चे पर पड़ती है। और जाहिर है एक पत्नी अपने पति को ही तो सबसे ज्यादा देखती है । और दिल से चाहती है कि उसी की परछाई उनकी संतान बने। “

निरमा की बात पर रेखा ने मुस्कुराकर हामी भर दी…-” लेकिन निरमा तुम्हारी मीठी प्रेम भैया जैसी बिल्कुल नहीं लगती। “

  कुछ पलों को निरमा हड़बड़ा कर चौन्क गयी कि तभी बांसुरी ने मुस्कुराकर बात ही बदल दी।

” हां भई कुछ बच्चे मां पर भी तो पड़ेंगे वरना औरतें नाराज़गी में मां बनने से इस्तीफा नहीं दे देंगी। “

  तीनों सखियां हंसती खिलखिलाती बातचीत में लग गई । बच्चे भी आपस में खेल रहे थे। बांसुरी का बेटा उसकी गोद में ही था कि कुछ देर में ही रेखा के फोन की घंटी बजने लगी….

रेखा ने फोन उठाया, दूसरी तरफ से जाने किसका फोन था लेकिन रेखा फोन में बात करते हुए काफी घबरा गई….” क्या लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? नहीं ऐसा नहीं हो सकता वह किसी और की गाड़ी होगी। अभी कुछ देर पहले ही तो ….” अपनी बात पूरी करने से पहले ही वो फफक पड़ी।

  “क्या हुआ रेखा किसका फोन था? “

बांसुरी के सवाल पर रेखा जोर से रोने लगी।  रोते रोते ही उसने फोन पर हुई बातचीत बांसुरी और निरमा को बता दी फोन पुलिस चौकी से किन्ही पुलिस वाले का था।
   शहर से बाहर जाने वाले हाईवे पर एक एक्सीडेंट हुआ था।  गाड़ी पलट कर नीचे खाई में गिर गई थी। गाड़ी को ऊपर निकालने की कोशिश की जा रही थी। ऊपर से देखने पर गाड़ी का जो नंबर समझ में आया उसको ट्रैक करने पर मालूम चला कि गाड़ी महल की ही थी और विराज के नाम से रजिस्टर्ड थी।
      महल की गाड़ी जो विराज के नाम से रजिस्टर्ड थी, इतना  पता चलने पर पुलिस वालों ने विराज के नंबर पर कॉल लगाया लेकिन विराज का नंबर लगातार बंद आ रहा था इसलिए पुलिस वाले ने रेखा के नंबर पर फोन लगा लिया था।
    बांसुरी और निरमा को यह सब बताते हुए रेखा की हिचकियां बंध गई।
    बांसुरी ने तुरंत अपना फोन उठाया और समर को फोन लगा दिया उधर निरमा भी अब तक प्रेम को फोन लगा चुकी थी।
    अपने आंसू पूछती खुद को संभालती रेखा भी विराज को फोन लगाने कांपते हाथों से उसका नंबर डायल करने लगी……

क्रमशः

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aparna….

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वापसी ….

समय के चक्र को घुमा कर रख देने वाली एक प्रेम कहानी…

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वो कितना कुछ कर रहा था खुद को संभालने के लिए। ऐसा लगने लगा था उसने यामिनी को नही अपने जीवन को खो दिया है। यामिनी की कही हर बात, उसकी मुस्कान, उसकी आंखें कुछ भी तो भुला नही पा रहा था। जब सब कुछ सही था तो यामिनी ऐसे उसे छोड़ क्यों चली गयी। वो खुद को ही मनाता समझाता रहता कि वो एक दिन वापस आएगी। ज़रूर आएगी।

हर वो जगह जहां वो यामिनी के साथ एक बार भी गया था छान आया। यामिनी का कोई दोस्त और सहेली नही बचे थे जिनसे उसने उसके बारे में पूछताछ न कि हो। यामिनी से जुड़ी हर चीज़ को उसने गले से लगा कर सम्भाल रखा था। पहले पहल लोग उस पर तरस खाते थे, उसे समझाने की कोशिश करते थे, लेकिन अब लोगों ने उससे और उसके पागलपन से कन्नी काटना शुरू कर दिया था।

वजह !!! वजह यही थी कि लोग अब उसे समझा कर थक चुके थे कि रागिनी मर चुकी है। उसका प्लेन 35000 फीट की ऊंचाई पर क्रैश हो चुका है। उसके अस्थि पंजर भी किसी को नसीब नही हो सकते….

लेकिन वो लोगों की कही बातों में भी उसे ढूंढ ही लेता था। और ऐसे ही एक दिन किसी की इस बात को की मरे हुए लोग वापस नही आते, उनसे मिलने के लिए खुद मरना पड़ता है , पूरा करने वो भी शहर की सबसे ऊंची पहाड़ी पर नीचे छलांग लगा कर मरने ही तो खड़ा था, कि किसी के कोमल हाथों ने उसे अपनी तरफ खींच लिया था।

वो भोर थी!! मानवविज्ञान की विद्यार्थी। जो जाने कब से उसके मोहपाश में बंधी खुद को ही भूल बैठी थी। और फिर उसने उसे बाहों में समेट लिया। जिस प्यार की तलाश में वो अपनी ज़िंदगी भूल बैठा था उसी ज़िन्दगी से उसे प्यार करना सीखा दिया भोर ने।

उसकी जिंदगी ने जैसे दूसरी करवट ले ली थी। भोर के साथ ने उसके जीवन में मधुमास वापस ला दिया था। अब उसके भी दिन रात चाशनी में भीगे बीतने लगे थे। दोनों ने शादी कर ली थी, और फिर भोर ने उसे उसकी जिंदगी का सबसे सुंदर तोहफा दिया था… उसका अपना बेटा।

ज़िन्दगी ऐसी खुशगवार भी हो सकती है, उसने नही सोचा था। देखते ही देखते तीस साल बीत चुके थे। आज वो खुद पचपन बरस की उम्र में अपने आप को कितना खुश और संतुष्ट पाता था और इसका एकमात्र कारण थी भोर। भोर वाकई उसके जीवन में सवेरा लेकर आई थी। अपने नाम के जैसे ही सुंदर, हालांकि अब तो उसके चेहरे पर भी उम्र के निशान नज़र आने लगे थे। माथे पर कुछ समय की लकीरें खींच गयीं थी और कनपटी और मांग पर के बालो में चांदी झलकने लगी थी, ये और बात थी कि वो हर पंद्रह दिन में बड़े करीने से अपने बालों को डार्क ब्राउन शेड्स से रंग लेती थी। पर कमर पर की परिधि, पेट के आसपास का बढ़ता वृत्ताकार घेरा उसे भी बावन का न सहीं अड़तालीस का तो दिखाने ही लगा था।

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आईने के सामने खड़े वो खुद भी तो अपनी कनपटी पर की सफेदी देख मुस्कुरा उठता था, और बालों की स्टाइल बदल बदल कर उन्हें छिपाने की असफल कोशिश में लग खुद ही ठठा कर हँस पड़ता था। आज भी इसी कोशिश में था कि दरवाज़े पर घंटी बजी। घंटी सुनते ही उसके चेहरे पर लंबी सी मुस्कान खेल गयी थी। आज ही उसके बेटे का पच्चीसवाँ जन्मदिन था, और आज ही उसे एक नई कंपनी में जॉइन करना था। वो ही घर वापस आया होगा ये सोच कर दिनकर दरवाज़ा खोलने आगे बढ़ गया।

दरवाज़ा खुला लेकिन सामने उसका बेटा नही यामिनी खड़ी थी। यामिनी !!! वही यामिनी, जिसके लिए वो कभी पागल हो चुका था। वही यामिनी जिसके लिए वो खुद को मारने जा रहा था। लेकिन ये तो सचमुच वही यामिनी थी। वही आज से तीस साल पहले वाली यामिनी। सिर्फ बाइस साल की यामिनी। पर ऐसा कैसे संभव है? गुलाबी टॉप और ब्ल्यू डेनिम में सीधे सतर बालों को दोनो तरफ के कंधों पर सामने रखे खड़ी वो वैसे ही मुस्कुरा रही थी जैसे उस दिन जब वो उसे प्लेन में बैठाने गया था…..

क्या ये सम्भव था ? या यामिनी किसी तूतनखामेन की ममी में अब तक सोई पड़ी थी जो जस की तस वापस लौट आयी थी।

मेरे प्यारे पाठकों , ये रही मेरी नई कहानी की छोटी सी झलक। ये कहानी भी मेरी बाकी कहानियों की तरह प्रेम कहानी ही होगी लेकिन बहुत सारे रहस्य और रोमांच से भरी इस कहानी का अंत कुछ अलग हट के होगा।

ये कहानी नवंबर में दीवाली के बाद शुरू होगी। और इसके भाग रोज़ आएंगे। एक और बात ये कहानी एक्सक्लुसिवली सिर्फ और सिर्फ मेरे ब्लॉग पर ही आएगी।

मुझे पढ़ने और सराहने के लिए आप सभी का दिल से शुक्रिया….

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शादी.कॉम – 22

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      आँधी की तरह उड़कर इक राह गुज़रती है
       शरमाती हुई कोई क़दमों से उतरती है
           इन रेशमी राहों में इक राह तो वो होगी
         तुम तक जो पहुंचती है इस मोड़ से जाती है                                                              इस मोड़ से जाते हैं……  
      कुछ सुस्त कदम रस्ते,कुछ तेज़ कदम राहें…

  अपने कमरे में बैठी बांसुरी को समझ ही नही आ रहा था कि उसने सही किया या गलत….अपनी माँ का मुरझाया चेहरा वो कभी भी सहन नही कर पाती थी,उस समय भावावेश में आकर उसने राजा की अम्मा को खरी खोटी सुना तो दी पर अब रह रह के राजा का बुझा बुझा सा चेहरा ,जाते समय उसे रोकती हुई राजा की आंखें सब याद आ रहा था, बांसुरी जैसे खुद से ही बातें कर रही थी__ अच्छे से जानती हूँ,मेरे सामने तक तो मुहँ खोल नही पाता अपनी अम्मा के सामने क्या बोलेगा,बस नाम का राजा बाबू है,सारी होशियारी प्रिंस और प्रेम तक ही सीमित है,,बातें इनकी निकलेंगी जब वसूली करने जातें हैं,बाकी समय तो बस सर हिला के ही काम चला लेंगे….अरे पर एक बार तो अपनी अम्मा को टोक सकता था।”

  बांसुरी का मन राजा से बात करने के लिये व्याकुल हो उठा,

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          पर हाय रे मन!! मन की भी शायद अपनी आत्मा होती है, देह होता है ,तभी तो हर बड़ी छोटी बात को खुद से लगा लेता है,हाड़ मांस से बने शरीर को जितनी चोट नही पहुंचती उससे कहीं अधिक मन चोटिल हो जाता है….
         ऐसे समय जब कोई अपने प्रेम को  सर्वोपरी रख अपनी या सामने वाले की गलती पे झुक जाना चाहे ये मन देवदार बन जाता है,अकड़ के तन जाता है,और हर एक इच्छा को अपने नैनों से तोल कर निर्णय लेता है।।
    यही बांसुरी के साथ हुआ!!उसे मन्दिर में जो सही लगा उसने कर दिया पर अभी उसका मन राजा के लिये रो पड़ा,कैसे भी किसी भी हाल में उससे मिलने को वो तड़प उठी…..पर जैसे ही उसे मेसेज करने उसने फोन उठाया उसके अन्दर से एक आवाज़ आयी __ वो भी तो कर सकता है फ़ोन,,ठीक है शायद हमने बात बिगाड़ दी पर शुरु तो उसी की अम्मा ने किया था,और दोनो भाई मुहँ में कुल्फ़ी जमाये बैठे थे,हम भी आखिर क्या करते।। हम जाने लगे तब आगे बढ़ कर रोक भी तो सकता था,ठीक है अपनी अम्मा के सामने नही बोल सकता पर हमें तो बोलते समय रोक सकता था,हमे भी कोई शौक तो है नही की दूसरों का अनादर करें,बस हो गया जो होना था,अब एक बार फोन तो कर ले ,पूछ तो ले ,कैसी हो बांसुरी ।।पर नही जनाब तो अकड़ के बैठे होंगे,ये विचार आते ही बाँसुरी का दिल कसमसा के रह गया, उसे राजा का मासूम सा चेहरा याद आ गया,भला आज तक कब और किस बात पे वो अकड़ के खड़ा रहा था,वो तो बेचारा फलों से लदा ऐसा तमाल तरु था जिसकी छाँव से उसकी पूरी बिरादरी सुवासित थी।।

    बांसुरी ने फ़ोन करने को फ़ोन उठाया ही था की राजा के नम्बर से कॉल आ गया,थोड़ी देर पहले का क्षुब्ध स्वाभिमान एक बार फिर करवट ले खड़ा हो गया,बांसुरी ने तुरंत उचक कर फोन नही उठाया __ वो भी तो जाने हम बांसुरी  है।।
       हाय रे ये मिथ्या अभिमान!! जिसके लिये दिल टूक टूक रो रहा था,सामने से उसे ही उद्विग्न देख अपनी रोग और पीड़ा भूल गया,और उसके घावों पे मलहम देने की जगह नमक की बोरी उठा ली।।

    बांसुरी जब तक फोन उठाती फोन कट गया, उसके चेहरे पर एक मुस्कान खिल गयी__ अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे,अच्छा मज़ा चखाया!

    एक बार फिर फोन घनघना उठा__

बांसुरी- हेलो

राजा- बांसुरी!!
 
अपना नाम राजा के मुहँ से सुनना था की रहा सहा धैर्य गुस्सा सब भाटे की तरह उतर गया,वेगवती नदी सा बह गया।।

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बांसुरी-” इत्ती देर से याद आयी हमारी,सुबह से कहाँ मर रहे थे,एक बार को नही सोचा कि हम कैसे जी रहे होंगे।”

राजा- अरे सोचा नही होता तो अभी फ़ोन क्यों करते, सुबह से मौका ही नही मिला,सब हमी को घेरे खड़े थे,मन्दिर से आने के बाद अम्मा ने घर पर सब को सब बता दिया है,घर में कर्फ्यू वाली स्थिति हो गयी है।

बांसुरी- तो हमारे घर कौन सा हालात कन्ट्रोल में हैं, मन्दिर से आने के बाद बुआ ने ऐसा हंगामा मचाया है कि हमारे घर में भी इमरजेन्सी के से हालात हो गये हैं,,राजा एक बात बोलें

राजा- घर से भाग चलने बस मत बोलना।

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बांसुरी- हम वही बोलने वाले थे जादुगर सैंया।।

राजा- हम दोनो तरफ सब कुछ संभाल लेंगे बस तुम अपने आप को संभाले रखना,हमे ती समझ नही आता की हम किसे किसे देखे,बाकी सब को या तुम्हें ।कभी भी तमक जाती हो।।

बांसुरी– क्या करें?? हम अपनी अम्मा के लिये कुछ भी सुन नही पाते,,पर अब ध्यान रखेंगे,अच्छा सुनो!! कल कहीं मिल सकते हैं क्या?? अकेले?

राजा- क्या हो गया,अकेले काहे मिलना चाह रही??

बांसुरी- ऐसा कुछ नही,जैसा तुम सोच रहे,और सुनो!! सोचना भी मत!! हम तो प्लान बनाना चाह रहे कि आखिर ऐसा क्या हो सकता है कि तुम्हारी अम्मा की बात माननी भी ना पडे और पूरी भी हो जाये।

राजा- वही तो हम भी सोच रहे,क्या ऐसा किया जाये कि सब सही हो जाये और किसी को तकलीफ भी ना हो,चलो फिर यही ठीक रहा,कल रॉयल पेलेस चलते हैं,वहाँ बैठ के सोचेंगे ।।

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  बांसुरी- सुनो,एक बात बोलें ।

राजा- मना कर देंगे तो नही बोलोगी।

बांसुरी- तब तो और ज़ोर से चिल्ला के बोलेंगे,कान फाड़ के बोलेंगे,तुम्हें सता के बोलेंगे।।

राजा- तो बोलो ना,पूछती क्या रहती हो,सुनो सुनो सुनो!! जैसे बड़ा सम्मान दे देती हो।।

बांसुरी– कल तुम अपनी नीली शर्ट पहन के आना  और हम भी अपनी नीली कुर्ती ही पहनेंगे,ठीक है।

राजा बांसुरी की बात पर खिलखिला के हँस दिया, तभी अचानक किसी के आने की आहट से दोनो ही चौकन्ने हो गये_

राजा- बांसुरी बन्टी ऊपर आ रहा है,हम फोन रखते हैं ।।

बांसुरी- अरे रुको !! सुनो तो….

राजा– अरे रख रहे हैं यार,तुम तो पिटवा कर ही मानोगी लग रहा।।
   हँसते हुए दोनो ने अपना अपना फोन रख दिया।।

            पास बुला के गले से लगा के
             तुने तो बदल डाली दुनिया
             नए हैं नजारे नए हैं इशारे
           रही ना वो कल वाली दुनिया

           सपने दिखाके ये क्या किया
                 ओ रे पिया
           तुने ओ रंगीले कैसा जादू किया
          पिया पिया बोले मतवाला जिया।।

   रेडियो पे बजते गाने ने बांसुरी के चेहरे पे एक लाज भरी मुस्कान बिखेर दी।।

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              *********************

    अगले दिन दोनो परिवार अपनी अपनी दिनचर्या में लीन थे,सुशीला जहां खुश थी कि चलो उस लड़की से पीछा तो छूटा वही अपनी लाड़ली के दुख से प्रमिला दुखी थी,पर दोनो ही महिलाओं ने आम हिन्दुस्तानी औरतों की तरह ही अपने मन को पूर्ण रूपेण अपने नियन्त्रण में रखा हुआ था,एक दुखी थी एक सुखी थी पर दोनो में से किसी की दिनचर्या में कोई व्यवधान नही था।।
        घर के किसी सदस्य की किसी भी आवश्यकता को अधूरा नही रखा गया था,सब समुचित व्यवस्था थी।।
 
     बांसुरी कुछ गुनगुनाती सीढियों से नीचे उतरी, रसोई की खिड़की से झांक लगा के प्रमिला ने उसे आवाज़ लगायी

प्रमिला- लाड़ो!! नाश्ता ले आऊँ तेरा!!

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बांसुरी- नही मम्मी ,हम कुछ काम से बाहर जा रहे हैं, वापस आकर खा लेंगे

प्रमिला- अरे कम से कम दो पूड़ी तो खा ले।

बांसुरी ने मुस्कुराते हुए प्रमिला को देखा,__”पूड़ी तो हमने कब से खाना छोड़ रखा है मम्मी ,भूल जाती हो ,अभी 2 किलो और कम करना है,चलो हम जा रहे वर्ना देर हो जायेगी।।”

” अरे पर जा कहाँ रही छोरी?”

” कहीं नहीं बुआ,जल्दी आ जायेंगे।।

बांसुरी के निकलते ही बुआ जी ने प्रमिला को पृश्नवाचक निगाहों से भेद दिया__” परमिला कहीं उस रजुआ का बुखार फिर तो नही चढ़ गया छोरी को,कल तो बड़ा पांव पटकती निकली रही मन्दिर से।।

प्रमिला– नही पता जिज्जी,वैसे बांसुरी ऐसी है तो नही,ज़बान की बड़ी पक्की है मेरी बेटी।।

      यही तो लोग नही समझ पाते कि ना प्यार का भरोसा,ना प्यार करने वालों का।।जब एक बार इन्सान प्यार में पड़ जाये तब वो सिर्फ एक ही काम सलीके से और शिद्दत से कर सकता है वो है प्यार,
इसके अलावा हर एक काम बेमानी हो जाता है, ना तो फिर अपना वचन याद रहता है और ना मान सम्मान।।

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        रॉयल पैलेस जाते हुए बांसुरी ने निरमा को भी साथ ले लिया,वहाँ पहुंचने पे देखा राजा और बन्टी पहले से बैठे उनका रास्ता देख रहे थे।।

    बांसुरी को देखते ही राजा की आंखे मुस्कुरा पड़ी,
बन्टी ने आगे बढ़कर दोनो को अपने सामने की कुर्सियों पर बैठा दिया।।

बन्टी- देखो बांसुरी और राजा,तुम दोनो को ऐसा कोई हल निकालना पड़ेगा जिससे सांप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे।।

बांसुरी– भैय्या हम तो चाहतें हैं,ना सांप ही मरे ना लाठी ही टूटे,क्यों राजा!!

राजा– तो क्या सोचा ?? ऐसा क्या करें कि सब मान जायें,  बोलो बांसुरी!!

बांसुरी- राजा तुम हमारे तुम्हारे बारे में सब कुछ अपने पापा को बता दो,हमे यकीन है वो मान जायेंगे।

बन्टी- इत्ता आसान नही है बांसुरी पण्डित जी को भोग लगाना,वो भी परले दर्जे के जट्ठर हैं,बल्कि मौसी ही कुछ मुलायम हैं,जब वही इत्ती भरी बैठी हैं तो मौसा जी का सोचो भी मत,उसपे इनके घर के सब पुरखे अमृत पीकर आये हैं,90 की हो चुकी दादी अब तक अपने पसंद की मोहनथाल बनवाती है बहुओं से।।

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राजा- फिर करें तो क्या करें बन्टी,हमे तो समझ ही ना आ रहा??

बांसुरी– तुम्हें कभी कुछ आसानी से समझ आया भी है? भला हो ये समझ आ गया कि हमसे प्यार है।

बन्टी- देखो बिना दान दहेज ये शादी ना हो पायेगी, बांसुरी तुम भी अच्छे से जानती हो,कुछ काम समाज और दुनिया को दिखाने भी किया जाता है,है ना?

बांसुरी- हाँ तो?

बन्टी- तो ये कि मौसी जी ने जितना बोला उतना तो करना ही पड़ेगा,अब कुछ तो अंकल जी की भी तैयारी होगी ही,बाकी कमी बेसी को हम पूरा कर देंगे, मतलब हम नही हमारा भाई राजा!! क्यों राजा?

राजा ने बन्टी की बात पर बांसुरी को देखा,उसके चेहरे पर भी कोई भाव नही था,जैसे उसे समझने में दिक्कत आ रही थी कि ऐसा करना सही रहेगा या नही।।

बांसुरी– हमारे पापा को शायद अच्छा नही लगेगा राजा

बन्टी- लेकिन कुछ तो रास्ता निकालना ही पड़ेगा ना
तुम अपने पापा को समझा भी तो सकती हो।

बांसुरी- हां समझा सकते हैं,पर एक बात बताइये भैय्या ,हम पापा को ये समझायें की राजा से रुपये उधार ले कर हमारी शादी उसी से करा दे इससे कहीं ज्यादा आसान ये नही रहेगा कि  राजा अपनी अम्मा को ये समझा दे कि वो दहेज नही लेना चाहता।

राजा- बांसुरी तुम्हें क्या लगता है हमनें अम्मा से बात नही की,जितना कह सकते थे कह चुके हैं,,अब देखो यार अम्मा भी अपनी जगह कहाँ गलत है बताओ।

बांसुरी- तुम्हारी आँख मे ना तुम्हारी अम्मा भक्ति का चश्मा चढ़ा है,उस चश्मे को उतारो तब नज़र आयेगा की कौन गलत है और कौन सही,,हमे बन्टी भैय्या की बात अच्छी नही लगी।
      भले ही एक साधारण नौकरी में हैं हमारे पापा पर आज तक हमे किसी चीज़ की कमी नही महसूस होने दी,राजकुमारी बना के पाला पोसा,और आज हम अपने स्वार्थ के लिये अपने पापा के आत्मसम्मान को आग लगा दे,ये नही हो पायेगा राजा।।
     तुमसे प्यार करते हैं इसिलिए तुम्हारे आगे हमारा मान अपमान हम नही देखते पर अपने पापा को तुम्हारे पैरों में रुपयों के लिये झुकते नही देख पायेंगे।

राजा- यार तुम बात को कहाँ से कहाँ मोड़ दी,,काहे तुम्हारे पापा झुकेंगे?? हम चुपचाप जितने की उन्हें ज़रूरत होगी लाएंगे और तुम्हारे घर छोड़ जायेंगे। अब कल को हम उनके दामाद बन जायेंगे तो एक तरह से उनके बेटे जैसे हुआ ना,बेटे से कुछ लेने में कैसा संकोच?

बांसुरी- सही कह रहे हो ,बेटे से कैसा संकोच?? फिर चुपचाप आने का संकोच काहे कर रहे,डंके की चोट पे आना,अपने अम्मा बाऊजी को बोल कर आना की अपने होने वाले ससुर के लिये रुपये लिये जा रहे, उनके ज़रूरत है।।

राजा-बांसुरी तुम कोनो कसम खा कर आयी हो का कि लड़े बगैर नही जायेंगे

बांसुरी- हाँ बिल्कुल!! वैसे ही जैसे कल तुम्हारी अम्मा कसम खा के आयी रही ।।

राजा — बांसुरी!! हम कुछ कहते नही इसका मतलब ये नही कि तुम कुछ भी कहती जाओगी,,अम्मा है हमारी,उन्होनें जितना सहा है ना तुम उनकी पैर की धूल बराबर भी नही हो।। एक बात तो सुन के सही नही जाती तुमसे अम्मा से बराबरी करने चली हो।  अरे बचपन से अपने घर परिवार पड़ोस समाज सब जगह उन्होनें जो देखा है वही उनके दिमाग में बैठा है।। तुम्हारी तरह पढ़ी लिखी होती तब तो उनकी अपनी समझ होती ना,उनके खुद के ब्याह में दहेज मिला,सभी मौसियों का ब्याह ,चाचा का ब्याह फिर बुआ का ब्याह सभी जगह यही देखी है हमरी अम्मा इसे ही सही समझती है,तो इसमे उनकी क्या गलती।।
    जिस उम्र में तुम अपनी माँ के आंचल में दुबकी पड़ी थी उस उमर से घर गृहस्थी का बोझ उठा रही हमारी अम्म्मा।।बारह साल की उमर से ददिया सास चचिया सास और खुद की सास की सेवा में प्राण दिये जा रही हैं,और आज तक उनके सर का पल्लू कभी खिसका तक नही और तुम उनकी दो बातें सुन उन्हें पलट के चार बातें सुना गयी।।
       मजाल है जो आज तक हमारी अम्मा ने दादी को कभी पलट के जवाब दिया हो,ऐसा तो नही है कि हर बार बड़े बूढ़े सही बात ही बोलतें हों,पर जो भी बोला सुनाया हो दादी ने हमारी अम्मा ने उन्हें या बाऊजी को कभी जवाब नही दिया।।

बांसुरी– हम क्या बोल रहे और तुमने क्या समझ लिया।।

राजा- क्या समझ लिया,सही ही समझा।। हमारी ही आँख में चश्मा चढ़ा था,पर अम्मा का नही तुम्हरा,अब उतार फेंकने पर साफ साफ दिख रहा कि तुम्हारा ज्ञान कितना कोरा और उथला है बांसुरी ।।
   एक बात और कह दें,जो लड़की हमारी अम्मा का सम्मान नही करेगी ,इज्जत नही करेगी हम किसी जनम में उससे शादी नही करेंगे।।

बांसुरी– राजा तुम धमकी दे रहे हो हमे।।

राजा– हम सच बोल रहें हैं,,हमारी अम्मा से ज्यादा हम किसी से प्यार नही कर सकते,,तुम अपनी बताओ ,हमारी अम्मा के हिसाब से ढल सकती हो।तो ठीक है वर्ना जाओ,हमें भी तुम्हारी कोई ज़रूरत नही है।

बन्टी और निरमा चुपचाप बैठे दोनो की बातें सुन रहे थे,कुछ देर पहले की साधारण बातें अचानक ही ऐसे मोड़ ले लेंगी किसी ने सोचा भी ना था।।
     किसी ने सही कहा है__ बन्दूक से निकली गोली और ज़बान से निकली बात कभी वापस नही हो सकती।।

  काश दोनो में से एक ने भी अपनी जिह्वा पे समय रहते नियन्त्रण पा लिया होता तो स्थिति इतनी विकट ना होती।यहाँ गलती किसकी थी किसकी नही ये पक्ष विचारणीय रह ही नही गया,दोनों में से किसी ने उस समय झुकना अपनी शान के खिलाफ समझा।।

           ***************************

      इस पूरे वाकये को कई दिन बीत गये।। बांसुरी ने इम्तिहान पास कर लिया और एक महीने की ट्रेनिंग के लिये पुणे आ गयी,बन्टी भी वापस दिल्ली लौट गया, सभी अपने अपने कामों मे लग गये,जीवन का नाम ही चलना है,वो कभी किसी के लिये रुकता कहाँ है।।

     बांसुरी की ट्रेनिंग पूरी हो गयी और पहली नियुक्ति में उसे अम्बा जी गढी जाना पड़ा, उसने अपना कार्यभार संभाल लिया,कभी कुछ दिनों के लिये उसकी अम्मा या बुआ जी आ जाते हैं ।
     बन्टी की जिंदगी में एक बार फिर कोई लड़की आ गयी,वो अपने जीवन अपने बॉस और नयी नयी बनी गर्लफ्रैंड में व्यस्त रहने लगा।

    सभी का जीवन व्यस्त था,सभी अपने आप में लगे थे,बस एक राजा था जिसका जीवन उस शाम रुक गया,,उसने पहले की तरह जिम जाना छोड़ दिया, भैय्या के वसूली के काम में भी अब प्रिंस और प्रेम ही जाते ।।
    घर के लोग जैसे अम्मा,बाऊजी बड़े भैय्या चाचा जी सभी अपने लाड़ले के व्यवहार से क्षुब्द थे दुखी थे,पर वो खुश था अपने आप मे,अपने कमरे में अपनी किताबों के साथ।।
    अम्मा को लगा बांसुरी का भूत उतर गया,अम्मा को इस बात का कई एक बार प्रमाण भी मिल चुका था,, आखिर माँ थी कैसे अपने बेटे के जीवन से अनभिज्ञ रहती,उन्हें समझ आ चुका था की अब बांसुरी और राजा की हल्की फुल्की भी बातचीत नही होती।।
   खूब खोद कुरेद के उन्होनें बन्टी से भी सारी सच्चाई उगलवा ली थी,कि उस शाम के बाद दोनों में कभी कोई बात नही हुई ।।
      उस शाम को बीते पूरे पांच बरस गुज़र गये……बांसुरी चली गयी सिर्फ राजा के जीवन से ही नही उसके शहर से भी दूर ।।
  
   पर जब वो चली ही गयी थी राजा के जीवन से तो ऐसा क्या था जो राजा ने खुद को किताबों में इस कदर गुम कर लिया था…..

क्रमशः

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अपर्णा।।

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जीवनसाथी -120

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   जीवनसाथी – 120

     चुनाव के नतीजे आने लग गए थे रुझानों से साफ जाहिर था कि राजा और उसकी टीम ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया था। राजा की जीत तो पहले ही 100% तय थी।
समर अपने ऑफिस में बैठा हुआ इन्हीं सब जोड़ घटाव को देख रहा था कि मंत्री जी का फोन आ गया।

   समर उनसे बात कर ही रहा था कि आदित्य भी ऑफिस में चला आया। इस सारी प्रक्रिया में आदित्य ने भी समर का पूरा पूरा सहयोग किया था। वह हर जगह राजा के छोटे भाई की हैसियत से उस का साथ निभाता जा रहा था।
   राजा को उसने एक पल को भी अकेला नहीं छोड़ा था। आज तक जहां समर और प्रेम राजा के दाएं और बाएं हाथ थे अब आदित्य भी उनकी टीम में शामिल हो गया था।
    अब धीरे-धीरे महल आदित्य को भी अपनाने लग गया था। युवराज भैया, रूपा, जया, जय, विराट यह सभी लोग जहां आदित्य को पूरी तरह दिल खोलकर अपना चुके थे, वही पिंकी आज भी आदित्य से कुछ हद तक नाराज ही लगा करती  थी।
     राजा के बेटे यश के कार्यक्रम में शामिल होने आई पिंकी को उसकी मां ने कुछ समय के लिए महल में ही रोक लिया था।
    पिंकी और उसके बेटे के रुकने से पिंकी की मां को भी सहारा हो जाता था। अपनी जेठानी की मौत के बाद से वह कुछ ज्यादा ही डूबा हुआ सा महसूस करने लगी थी। आदित्य के बारे में पता चलने के बाद उनकी जो थोड़ी बहुत बातचीत अपने पति से हुआ करती थी, वह भी पूरी तरह से बंद हो चुकी थी। बल्कि अभी पिछले कुछ समय से उन्होंने हरिद्वार जाकर रहने का मन बना लिया था लेकिन पिंकी और राजा ने उन्हें किसी तरह रोक लिया।

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   आजकल उनकी तबीयत भी कुछ ऊपर नीचे ही रहा करती थी।
   उन्हीं के बारे में सोचते विचारते आदित्य समर के ऑफिस में प्रवेश कर गया। समर को चिंतित सा फोन में बात करता देख आदित्य भी उसके सामने बैठ गया।

“क्या हुआ समर कोई चिंता की बात है?”

“हां! ऐसा ही कुछ समझ लो।”

“हुआ क्या? चुनाव के नतीजे तो कल घोषित होने वाले हैं! और जहां तक मुझे लगता है राजा भैया और उनके सारे लोग जितने ही वाले हैं।”

“जितने ही वाले हैं कि बात नहीं आदित्य।। यह सभी लोग जीत चुके हैं।”

” ये तो बड़ी अच्छी बात है। फिर किस बात की चिंता में इतना विचार मगन बैठे हो।”

“इसी बात की चिंता है ! मैं नहीं चाहता था कि यह सारे लोग एक साथ जीते।”

“यह क्या कह रहे हो समर? होश में तो हो?”

“मेरा कहने का यह मतलब है, कि मैं नहीं चाहता था कि विराज भी जीते! लेकिन हुकुम का प्रभाव ही ऐसा है, कि उनके आस पास खड़ा हर व्यक्ति उनके प्रभाव के कारण हर जगह सफल हो ही जाता है।
   विराज अपने बलबूते तो कभी यह चुनाव नहीं जीत सकता था लेकिन लोगों ने  उसे हुकुम की टीम है यह मानकर विराज को भी जिता दिया और वह भी भारी बहुमत से।”

“मेरे ख्याल से तो यह खुश होने की बात है।”

“खुश होने की बात होती आदित्य अगर विराज हमारे सब के लिए लॉयल होता।”

“मतलब विराज आज हमारे लिए लॉयल नहीं है।”

“नहीं बिल्कुल भी नही। बात दरअसल यह है की हुकुम और उनके आदमी इतनी ज्यादा संख्या में नहीं थे कि सरकार बना सकें, लेकिन हुकुम और उनके सारे लोग अपने अपने जगह से चुनाव जीत चुके हैं। अब अगर हमें सरकार में शामिल होना है, तो हुकुम को अपने सारे जीते हुए विधायकों के साथ सरकार से हाथ मिलाना होगा यानी पक्ष या विपक्ष से हाथ मिलाना होगा।
   मैं खुद अब तक यही सोच रहा था की किसी एक पार्टी से तो हमें हाथ मिलाना ही पड़ेगा तो जिस पार्टी से हाथ मिला कर हमें अधिक लाभ हो उसी पार्टी से मैं चाहता था कि हुकुम हाथ मिला ले।
    मैं उस पार्टी के सामने यही शर्त रखने वाला था कि भले ही कम सदस्यों के कारण हुकुम अपनी सरकार नहीं बना सकते लेकिन जैसे चुनाव के नतीजे घोषित हुए हैं उससे यही साबित होता है कि जनता हुकुम को अपने मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है तो हम हुकुम को मुख्यमंत्री के पद पर देखने की शर्त पर ही अपने सारे विधायक किसी भी एक पार्टी को देते। हम उसी पार्टी की तरफ जाते जो हुकुम को मुख्यमंत्री का पद देगी।”

“पर यह तो बहुत बड़ी शर्त हो जाती ।  इस बात के  लिए तो वो लोग शायद ही तैयार हों।”

“देखो हमेशा यह होता है, कि जीती हुई पार्टी ही सरकार बनाती है !अभी हुकुम की पार्टी के अलावा बाकी दोनों बड़ी पार्टीयों में बहुत ज्यादा संख्याओं का अंतर नहीं है हुकुम जिस पार्टी की तरफ जाएंगे वही पार्टी सरकार बनाएगी तो ऐसे में हुकुम का पद बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।
   वैसे मुख्यमंत्री पद तो जीतने वाली पार्टी से ही चुना जाता है और हमारे विधायक सिर्फ उनकी पार्टी की संख्या बढ़ाने वाले विधायक ही कहलाएंगे । लेकिन हमारे राजा साहब कोई ऐसे साधारण व्यक्ति तो है नहीं। और न ही वह कोई साधारण विधायक हैं।  उनके साथ जनता का बेशुमार प्यार है।
    बात ऐसी थी कि उनकी पार्टी नई पार्टी थी इसलिए उन्होंने कम जगह से लोगों को खड़ा किया। अगर बड़ी पार्टी के समान इतनी बड़ी संख्या में वो अपने लोगों को चुनाव लड़वा पाते और अपने लोगों को खड़े कर पाते तो बेशक भारी बहुमत के साथ हमारे हुकुम की निर्विवाद रूप से सरकार बनती और हमारे हुकुम बिना किसी शक शुबहें के मुख्यमंत्री होते।
       पार्टी और प्रत्याशी तो बहुत से खड़े हुए लेकिन अभी हमारे सामने जो दो मुख्य पार्टी खड़ी हैं उनमें से एक है राजदल  पार्टी और दूसरी है जन जागरण दल।
दोनों ही तरफ के नेताओं का लगातार मेरे पास फोन आ रहा है, कि मैं हुकुम की तरफ से सारे विधायकों को उनके सपोर्ट में भेज दूं। जिससे कि वह सरकार बना सके और मैंने अभी-अभी राजदल पार्टी से कह दिया है कि अगर वह हम से हाथ मिलाना चाहते हैं तो यह मेरी शर्त है कि हमारे राजा साहब ही मुख्यमंत्री बनेंगे।
    देखो जाहिर सी बात है कि जैसे ही हम किसी पार्टी से हाथ मिलाते हैं हम सारे मिलकर एक पार्टी बन जाएंगे और उस समय मुख्यमंत्री उस पूरी पार्टी में से किसी को भी चुना जा सकता है। इसलिए राजा साहब एक बार फिर निर्विवाद रूप से मुख्यमंत्री पद के दावेदार बन जाएंगे।”

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“क्या यह सारी बातें राजा भैया जानते हैं।”

“अब तक तो नहीं जानते।”

“हां मुझे भी यही लगा था। क्योंकि मुझे नहीं लगता राजा भैया किसी दूसरी पार्टी से हाथ मिलाने के लिए तैयार होंगे। उन्हें मुख्यमंत्री बनने का कोई लालच नहीं है। वह तो विधायक बन कर भी अपने क्षेत्र की सेवा कर ही लेंगे। भगवान ने चाहा तो अगले चुनाव तक उनकी पार्टी इतनी सक्षम हो जाएगी कि वह अपने बलबूते पर बिना किसी से हाथ मिलाए मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी कर सकते हैं।”

“तुम्हारी कहीं एक एक बात बिल्कुल सही है आदित्य। राजा साहब को जब मेरा यह प्लान पता चलेगा तो वह मुझ पर बहुत नाराज होंगे , लेकिन इसीलिए मैंने यह सोच रखा है कि यह सारी बातें उनसे युवराज भैया कहेंगे मैं नहीं। दूसरी बात राजनीति ऐसी काजल की कोठरी है जिसमें आप अंदर घुसकर बिल्कुल बेदाग बाहर नहीं आ सकते।
  राजा साहब फिर भी बेदाग हैं। उनके सारे दाग मैं अपने ऊपर लेने को तैयार हूं। लेकिन उनके राजनैतिक कैरियर के लिए फिलहाल किसी एक पार्टी से हाथ मिलाना बेहद जरूरी है।
   हां यह किया जा सकता है कि एक बार मुख्यमंत्री बनने के बाद राजा साहब अपने कार्यों से वैसे भी जनता का दिल इतना जीत ही लेंगे कि अगले 5 सालों में उनकी अपनी नई पार्टी बना कर वो अलग हो जाएं।”

“तुम्हें लगता है कि अगर राजा भैया एक बार किसी पार्टी से जुड़ गए तो कभी भी उस पार्टी को छोड़ेंगे?”

“नही छोड़ेंगे!,मैं जानता हूँ इस बात को। इसलिए ऐसी पार्टी से हुकुम को जुड़वाने की कोशिश में हूँ जो बाकी राजनैतिक पार्टियों से ठीक हो। बाकी तो हुकुम वो पारस हैं कि जिस पत्थर को छू ले वह सोना बन जाए! जाहिर है वो जिस पार्टी से जुड़ेंगे उस पार्टी को भी अपने मुताबिक बना ही लेंगे।”

“सही कह रहे हो समर! लेकिन अब भी मुझे इस बात पर यकीन करना मुश्किल लग रहा है कि राजा भैया अपनी पार्टी को किसी और पार्टी से मिला लेंगे।”

“कोशिश करने में क्या बुराई है आदित्य?”

“बिल्कुल कोशिश तो हम सब करेंगे ही। अभी यह बताओ कि मंत्री जी से बात करने के बाद तुम इतने चिंतित क्यों हो गए थे। और यह विराज की धोखा देने वाली क्या बात है?”

“मैं चाह रहा था कि राजा साहब राज दल पार्टी के साथ हाथ मिला लें। यह बात विराज को मालूम चल गई हैं। और अब वह जन जागरण दल से बातचीत करने में लगा हुआ है। तुम जानते ही हो कि राजा साहब के अलावा कुल 11 सीटों पर हमारे लोग खड़े हुए थे, यानी राजा साहब को मिलाकर हमारे पास कुल 12 विधायक हैं। इनमें से तीन लोग विराज के खास हैं। अगर विराज अपने उन तीन लोगों को लेकर जन जागरण दल की तरफ चला जाता है, तो हमारे विधायक कम हो जाएंगे और ऐसे में राज दल पार्टी के ऊपर प्रेशर बनाने में हमें समस्या खड़ी हो जाएगी।”

“यह तो बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर दी विराज ने! अगर वह अपने तीन लोगों को साथ लेकर जाता है, इसका मतलब हमारी पार्टी से कुल चार लोग कम हो जाएंगे और सिर्फ आठ लोग ही बचेंगे राज दल पार्टी से जुड़ने के लिए।”

“बिल्कुल सही समझे आदित्य! अब अगर सिर्फ आठ लोगों के साथ हम हाथ मिलातें हैं तो मेरा गणित वापस गलत हो जाएगा और मैं दबाव बनाने में असमर्थ हो जाऊंगा।

“तो अब क्या सोचा है आगे?”

“सोचा तो यही है कि आज विराज के उन तीन लोगों से जाकर मीटिंग करता हूं। पहले तो रुपए पैसे देकर ही उन्हें अपनी तरफ मिलाने की कोशिश करूंगा और अगर नहीं तैयार होते हैं तो…”

” तो उस सूरत में क्या करोगे?”

समर ने अपनी जेब से गन निकल कर सामने टेबल पर रख दी।

“उस सूरत में बस एक ही उपाय बचेगा मेरे पास।”

“यह क्या समर तुम लोगों को जान से मारने की धमकी दोगे।”

“देना ही पड़ेगा आदित्य और कोई चारा भी नहीं है! राजनीति रुपया या खून मांगती ही है। मेरे पास और कोई उपाय नहीं है अगर विराज के वह तीन विधायक हमारी तरफ आ गए तो फिर विराज अकेला कुछ नहीं कर पाएगा। मन मार कर ही सही उसे हमारी तरफ आना ही पड़ेगा। “

“सही कह रहे हो। “

“कौन सही कह रहा है और क्या सही कह रहा है आदित्य?”

आदित्य और समर अपनी बातों में लगे थी कि राजा और युवराज भी उस कमरे में चले आए। राजा के इस सवाल पर आदित्य मुस्कुराकर समर की ओर देखने लगा।

“आपके अलावा और कौन हर वक्त सही हो सकता है हुकुम?”

“यह तो गलत बात है समर ! हमारे अलावा एक और इंसान है, जो हर वक्त सच्चाई और ईमानदारी पर अडिग खड़ा रहता है। और वह है हमारे बड़े भाई युवराज सा।”

“जी सही कहा हुकुम! इन की तो बात ही निराली !है आप लोगों के लिए चाय या कॉफी कुछ मंगवाया जाए।”

“हां मंगवा लो! उसके बाद जरा रियासत के दौरे पर जाना है। “
   राजा के ऐसा कहते ही समर ने बैल बजा कर बाहर खड़े सहायक को अंदर बुला कर कॉफी के लिए कह दिया।
    राजा इस वक्त रियासत के दौरे पर निकलने वाला है यह सुनकर समर के चेहरे पर मुस्कान खिल गई… क्योंकि उसे युवराज से बात करने के लिए वैसे भी एकांत चाहिए था।

   सबके साथ कॉफी पीने के बाद राजा प्रेम के साथ रियासत के दौरे पर निकल गया! उसने जाती बेला आदित्य से भी पूछा, आदित्य उनके साथ जाने को तैयार था, लेकिन निकलते वक्त अचानक उसका पैर हल्का सा मुड़ा और मोच खा गया। जिसके कारण वह वही बैठ गया। उसकी हालत देख राजा ने उसे आराम करने की सलाह दी और प्रेम के साथ बाहर निकल गया।
     समर युवराज से क्या बातें करना चाहता है यह आदित्य जान ही चुका था इसीलिए उन दोनों को कमरे में छोड़ वह भी बाहर निकल गया । समर ने उसके जाते ही अपने ऑफिस के बाहर खड़े सहायक से कह दिया कि किसी भी हाल में अगले दो घंटे तक वह उसे और युवराज को डिस्टर्ब ना करें।

    आदित्य अपने कमरे की तरफ जा रहा था कि उसे पिंकी की माँ के कमरे से कुछ अजीब सी आवाज़ें सुनाई पड़ीं।
  उसे एकाएक समझ नही आया कि हुआ क्या है?और ये आवाज़ कैसी आ रही है?
    उसे एकाएक अंदर जाने में भी संकोच सा लग रहा था। झिझकते हुए उसने दरवाज़े पर दस्तक दी लेकिन अंदर से कोई जवाब नही आया। उसने दो तीन बार दस्तक देने के बाद उसने आवाज़ लगा दी, लेकिन जब अंदर से कोई आवाज़ नही आई तब वो दरवाज़े को हल्का सा धक्का दिए भीतर चला गया।
    आश्चर्य की बात ये थी कि कमरे में अंदर कोई नही था,एक नौकर तक नही।
   आदित्य ने बाथरूम का दरवाजा खटकाना चाहा वो खुला हुआ ही था। उसने धीरे से झाँक कर देखा अंदर कोई नही था।
   उसे अब वो आवाज़ बड़ी करीब से सुनाई दे रही थी, जैसे कोई रोते हुए हिचकियाँ ले रहा हो। आवाज़ की दिशा में उसने आगे बढ़ना शुरू किया तो आवाज़ और साफ सुनाई पड़ने लगी।
    आवाज़ बालकनी की तरफ से आ रही थी।

   वो धीरे से बालकनी में पहुंच गया। उसने देखा बालकनी की एक तरफ बनी मेहराब पर जाने कैसे पिंकी का बेटा चढ़ गया था, और अब वहां की जालीदार लकड़ियों पर खुद को संभालने की कोशिश में सिसक रहा था।
   आदित्य ने उसे देखने के बाद एक बार नीचे झाँक कर देखा और उसका सिर घूम गया। कमरा तो पांचवी मंज़िल पर ही था लेकिन आदित्य को अलटोफोबिया था यानी उसे ऊंचाई से डर लगता था। डर भी कोई सामान्य डर नही बेहद घबराहट और रक्तचाप बढ़ा देने वाला डर।
     उसे इतनी ऊंचाई पर चक्कर से आने लगते थे। उसने अपनी आंखें एक पल को बंद की और एक गहरी सांस भरी।
   आंखें खोल कर वो बिना दुबारा नीचे देखे बच्चे की तरफ बढ़ने लगा बच्चा उसे देखकर घबराहट में कहीं अपना संतुलन ना बिगाड़ बैठे इसलिए आदित्य एकदम शांति से बिना कोई शोर किए उस कंगूरे तक पहुंच गया।  बहुत धीमे से उसने बिना आवाज किए पास रखे मोढ़े को कंगूरे तक रखा और उस  पर चढ़ गया।  धीरे से अपना एक पैर बालकनी के किनारे बनी रेलिंग पर रख वह उस रेलिंग पर कंगूरे को पकड़कर चड गया। अब उसका एक हाथ बच्चे तक आसानी से पहुंच पा रहा था। अपने दूसरे हाथ से कंगूरे को पकड़े हुए उसने एक हाथ से बच्चे को धीमे से अपनी गोद में उठाना चाहा। बच्चा आदित्य को देख कर और जोर से रोने लगा। आदित्य ने बहुत कोमलता से उसका जाली में फंसा पैर बाहर निकाला और एक हाथ से ही बच्चे को गोद में लेकर अपनी तरफ खींच लिया।  इस झटके में एक बार उसका खुद का संतुलन बहुत बुरी तरह से बिगड़ गया लेकिन उसने दूसरे हाथ से कंगूरे को इतनी जोर से थाम रखा था कि वह गिरने से बाल-बाल बच गया। अगर इस वक्त आदित्य वहां से गिरा होता तो वह पांचवीं मंजिल से सीधे महल की पथरीली जमीन पर गिरता।
भगवान का शुक्र मनाते आदित्य ने बच्चे को कस कर पकड़ा और वापस मोढ़े की सहायता से बालकनी में उतर गया।
   
     आदित्य जिस वक्त बालकनी में आया था उसी वक्त काकी साहब की सहायिका उस कक्ष में कुछ सामान रखने आई थी। उसने आदित्य को बालकनी की तरफ जाते देखा तो आदित्य को क्या चाहिए यह पूछने वह भी उसके पीछे-पीछे बालकनी तक चली आई और जैसे ही उसने बच्चे को कंगूरे पर लटके देखा वह तुरंत भाग कर बगल वाले कक्ष में बैठी पिंकी और काकी साहब को बताने चली गई थी।
   
आदित्य जैसे ही बच्चे को लेकर बालकनी के फर्श पर बैठा उतने में ही एक किनारे सांस रोके खड़ी पिंकी आदित्य तक चली आई और रोते-रोते उसने अपने बच्चे को आदित्य की गोद से ले लिया।
    पिंकी के पीछे काकी साहब भी आदित्य तक चली आई।  उसके बालों में हाथ फेर कर उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया और उसके सामने अपने दोनों हाथ जोड़ दिये।
    वह उनके हाथ थाम कर सिर हिला कर उन्हें मना करने की कोशिश में था कि उसकी आंखें बंद हुई और वह बेहोश होकर वहीं गिर पड़ा।
     घबराई हुई पिंकी ने तुरंत पास खड़ी सहायिका से पानी का गिलास मंगवाया और उसे डॉक्टर को इत्तिला करने के लिए भेज दिया। काकी साहब ने आदित्य का सिर अपनी गोद पर रख लिया। आदित्य के माथे पर पसीने की बूंदें छलक आई थी । पिंकी ने ग्लास से पानी निकालकर आदित्य के चेहरे पर छींटना शुरू किया। कुछ देर में ही सहायिका ने दो और सहायकों को बुला लिया। जिन लोगों की सहायता से काकी साहेब ने आदित्य को अंदर कमरे में ले जाकर अपने पलंग पर लेटा दिया । कुछ देर में ही डॉक्टर साहब भी चले आए। आदित्य की जांच करने के बाद उन्होंने एक गोली उसकी जीभ के नीचे रख दी और काकी साहब और बाकी लोगों की तरफ मुड़ गए।
    पिंकी के पिता भी इतनी देर में आकर पीछे हाथ बांधे खड़े हो गए थे

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“अरे ये तो दिल्ली वाले आदित्य सिंह है ना। मैं जानता हूँ इन्हें। मुझे लगता है शायद स्ट्रेस के कारण इनका बीपी बहुत ज्यादा बढ़ गया है। बीपी कम करने के लिए फिलहाल मैंने एक गोली इन्हें  खिला दी है। जैसे ही स्ट्रेस थोड़ा कम होता है इन्हें होश आ जाएगा। बेहोश हो जाने का फिलहाल यही एक कारण मुझे समझ में आ रहा है। मैं यह कुछ दवाइयां लिख कर दिए जा रहा हूं, इनके होश में आने के बाद आप इन्हें   खिला दीजिएगा और कल एक बार इन्हें मेरी क्लीनिक पर भेज दीजिएगा मैं एक बार फिर से सारी जांच कर लूंगा।”

पिंकी डॉक्टर साहब के सामने हाथ जोड़ें अनुनय करने लगी …-“डॉक्टर साहब कोई घबराने की बात तो नहीं है।”

“अरे नहीं बिल्कुल घबराने की बात नही है। असल में आदित्य जी अलटोफोबिक हैं। इन्हें ऊंचाई से डर लगता है, लेकिन जब इन्होंने बच्चे को कंगूरे पर फंसा देखा तो अपने डर को एक तरफ कर यह बच्चे को बचाने के लिए जुट गए और बस उसी सब में इन्होंने इतना ज्यादा स्ट्रेस ले लिया कि इनका बीपी एकदम से शूट कर गया। बच्चे को बचाने के बाद यह अपने उसी बढ़े हुए बीपी के कारण बेहोश होकर गिर गए। “

   डॉक्टर की बातें सुन पिंकी आश्चर्य से सामने लेटे आदित्य को देखने लगी। उसे यकीन नहीं आ रहा था कि जिस आदमी से वह सिर्फ इस वजह से नफरत किया करती थी कि वह उसके पिता की ही अवैध संतान है, वही लड़का अपनी जान की परवाह किए बिना अपने डर को एक तरफ रख उसके बच्चे को बचाने के लिए जी जान से जुट गया । अगर कहीं डर के कारण वह अपना संतुलन खो कर जमीन पर गिर जाता तो उसकी जान भी जा सकती थी। लेकिन उसके बेटे को बचाने के लिए आदित्य ने अपनी जान की भी परवाह नहीं की।
      और वह आदित्य की कोई गलती ना होने पर भी बिना वजह उसे सजा दिए जा रही थी। क्या आदित्य वाकई उसके भाई होने का हक नहीं रखता?
   क्या आदित्य महल का उत्तराधिकारी होने का हक नहीं रखता?
    और यह सब सोचने और तय करने वाली वह खुद होती कौन है? एक तरह से देखा जाए तो आदित्य उसके पिता की पहली पत्नी की संतान है इस हिसाब से वह अवैध कैसे हुआ?
   सिर्फ सोचने का ही तो फर्क है। आखिर उसके बड़े पिता साहेब ने भी दो-दो शादियां की। क्या राजा भैया और युवराज भाई साहब ने विराज और विराट को नहीं अपनाया?
   युवराज भाई साहब ने तो आज तक विराज विराट और राजा भैया में कोई अंतर ही नहीं किया और यही हाल राजा भैया का भी है। तो उन दोनों भाइयों के संरक्षण में पली वह खुद कैसे इतनी कठोर ह्रदय हो गई?
   पिंकी को अपने आप पर बहुत ज्यादा शर्मिंदगी महसूस होने लगी। उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह चली! पिंकी की मां ने आकर उसे प्यार से अपनी बाहों में समेट लिया…-” मत रोइये बेबी! आपके भाई को कुछ नहीं होगा।”
अपनी मां के मुंह से आदित्य के लिए यह संबोधन सुन वह अपनी मां के गले से लग गई। मां और बेटी दोनों ही एक साथ जी भर कर रो लेना चाहती थी।  उन दोनों को रोते देख पिंकी के पिता भी उनके पास आकर बैठ गये। पिंकी की मां ने पिंकी को शांत करवाने के बाद उसके पिता के हाथों पर अपना हाथ रख दिया….-” आप चिंता मत करिए! आदित्य को कुछ नहीं होगा! हम हमारे बेटे को कुछ भी नहीं होने देंगे।”

    पिंकी के पिता की आंखों में खुशी की दो बूंदें छलक आई। कुछ देर में ही आदित्य को होश आ गया। उसने आंखें खोली, सामने पिंकी बैठी थी। पिंकी को देखते ही उसे उसके बच्चे का ध्यान आया और उसने तुरंत आसपास नजरें दौड़ानी शुरू की। तभी पिंकी की मां ने आगे बढ़कर आदित्य के सर पर हाथ रख दिया। उसके माथे पर हाथ फेरते हुए वह प्यार से कहने लगी…-“घबराइए मत आदित्य। आपका भांजा बिल्कुल सही सलामत है ।”
  पिंकी ने सहायिका की तरफ इशारा किया। सहायिका उसके बेटे को गोद में लिए उस तक चली आई । पिंकी ने अपने बेटे को अपनी गोद में बैठाया और आदित्य की तरह उसका चेहरा कर दिया…-” बेटा मामा जी को नमस्ते करो!”
    पिंकी के मुंह से अपने लिए ऐसा प्यार भरा संबोधन सुनकर आदित्य का भी दिल भर आया। धीरे से उठकर आदित्य तकिए का सहारा लिए पलंग पर टिक कर बैठ गया। उसके आसपास उसकी बहन पिंकी , उसकी माँ और उसके पिता खड़े थे। और इन सब के पीछे अदृश्य रूप से खड़े मुस्कुरा रहे  थे राजा अजातशत्रु सिंह!! जो आदित्य को उसका हक दिलवाने के लिए इस महल में लेकर आए थे। आज उनका वह सपना सही अर्थों में पूरा हो रहा था।
आदित्य के पिता ने सामने बढ़कर आदित्य को गले से लगा लिया…-” हमें  हमारी हर गलती के लिए माफ कर दो बेटा और पूरी तरह से वापस लौट आओ।”
  काकी साहब ने भी अपने पति की हां में हां मिलाई…-” आदित्य बेटा! आज तक हमें कभी बेटे की कमी महसूस नहीं हुई, क्योंकि पिंकी के साथ ही युवराज, कुमार,  विराज विराट सभी हमें भी छोटी मां का दर्जा ही देते आए हैं। लेकिन आज तुम्हें पाकर हमारा वह स्थान और थोड़ा ऊंचा हो गया है। तुम पिंकी के बड़े भाई थे, और सदा रहोगे। अब इस महल से वापस लौटने की कभी सोचना भी मत।”

  पिंकी का बेटा आदित्य की गोद में जाने के लिए  मचलने लगा। आदित्य ने प्यार से हाथ बढ़ाकर उसे गोद में ले लिया।

“आदित्य भैया संभल कर यह बहुत शैतान है! आपको परेशान कर देगा।”

पिंकी के मुंह से खुद के लिए भैया शब्द सुन आदित्य मुस्कुराने लगा बच्चे को गोद में लिए ही वो बाहर निकल गया।
   उसका दिल इस वक्त मिली खुशियों से ऐसा भर आया था कि कहीं उसकी आंखें छलक ना आए, इसी डर से वहां बैठे सब लोगों को छोड़ यह खुशखबरी फोन पर राजा अजातशत्रु को सुनाने ही वहां से बाहर निकल गया…..

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क्रमशः

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aparna …….


शादी.कॉम – 21

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शादी डॉट कॉम: 21

       तेरे बिना चांद का सोना खोटा रे
          पीली पीली धूल उड़ावे रे
            तेरे संग सोना पीतल
             तेरे संग कीकर पीपल
              आजा कटे ना रतिया………
         ओ हम दम बिन तेरे क्या जीना
      तेरे बिना बेस्वादी बेस्वादी रतिया ओ सजना…

   ” लगे रहो बेटा!!! सही जा रहे हो,,एक एक लक्षण प्रेम मे पागल प्रेमी का दिख रहा तुममे।”

” क्या यार बन्टी,,अब ऐसा क्या देख लिये तुम?”

” जैसे गाने सुन रहे हो ना आजकल बेटा मैं ही क्या कोई अन्धा भी तुम्हारी आंखों में देख पढ लेगा कि बच्चा प्यार में है,,,मैं तो फिर भी पढा लिखा हूँ,और वो भी अच्छी खासी दिल्ली युनिवर्सिटी से…..तुमने ये तो ना सोच लिया कि झुमरितलैया से पढ कर भाई इतना ज्ञान बघार रहा है…” अपनी ही बात पे बन्टी ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा

” पता है एक बार हमारा बॉस अड़ गया कहता है __ लड़कों कुछ अच्छा करना है मुझे,जिससे मेरे बाद मेरा नाम हो,मैनें धीरे से कहा _ ट्रेन के टॉयलेट  में अपना नाम नम्बर लिख आईये,,सदियों तक लोग गंदे टॉयलेट की फ्रस्ट्रेशन में गालियाँ आपके नाम की निकालेंगे।।”

” तुमने ऐसा कह दिया बॉस से।”

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” अबे नही यार!! ऐसी पते की बातें तो मेरे मन में ही दफन रह जाती हैं,ऊपर से मैनें कहा __ क्या सोच रहे हैं आप बताइये सर जिससे आपकी कुछ मदद की जा सके,,कम्बख्त कहता है बाइजूज़ जैसा कोई काम का एप बनाना चाहता हूँ कि लोग उसमें बच्चों को पढ़ा कर मेरा नाम लें लाइक ‘ साहूज़’ ।।
    मैनें कहा सर एप सही नही है, मैनें एक बार बाईजूज में इतिहास पढ़ना चाहा,कम्बख्त इतना अनाप शनाप हड़प्पा की खुदाई में निकलवा दिया इन लोगों ने कि ‘साहनी साहब’ की आत्मा भी कलप गयी कि यार ये सब इन लोग कहाँ से निकाल निकाल ला रहे मुझे तो ना मिला आज तक….

” फिर मान गया बॉस??”

” जो अपने मातहत की बात मान जाये वो बॉस ही कैसा?? उसके बाद एप का भूत उतरा तो अब अपने क्लाइंट और खुद की प्रोजेक्ट डिस्कशन की विडियो यू ट्यूब पे लॉन्च करने की प्लान कर रहा है कमीना।।कुल मिला के ना खुद चैन से जियेगा,ना हमे जीने देगा….खैर मेरी बातें छोड़ और जल्दी से तैयार हो जा फिर मौसी को लेकर मन्दिर भी तो जाना है।”

दोनों भाई बातों में लगे थे कि सुशीला एक बड़ी सी ट्रे में दो प्लेट में नाश्ता और चाय लिये ऊपर चली आयी।।

” अरे मौसी जी हम नीचे ही आ रहे थे,आप यहाँ नाश्ता क्यों ले आईं ।”

” 9 बज गया अभी तक तुम लोग नीचे आये नही तो हम यहीं ले आये,चलो जल्दी से नाश्ता कर लो,तुम्हारी पसंद का आलू का पराठा और मूँग की दाल का हलुआ बनाये हैं बन्टी।।”

” अरे वाह!! मौसी जी इसी बात पे चलिये मन्दिर घूम आते हैं ।”

” मन्दिर?? अभी !! मतलब सुबह सुबह।।”

” मन्दिर तो सुबह सुबह ही जाया जाता है ना मौसी।”

     इतनी देर से चुप बैठे राजा ने अपनी माँ का हाथ पकड़ कर उन्हें कुर्सी पर बैठाया और माँ की आंखों में देखते हुए अपनी बात उनके सामने रख दी__

” माँ आज बांसुरी और उसकी माँ तुमसे मिलने आने वाली हैं शिव मन्दिर मे!! एक बार मिल लो उन लोगों से।”

सुशीला कभी राजा कभी बन्टी को भौचक नजरों से देखने लगी

” कर ली आखिर अपने मन की,जब हमसे पूछे बिना ही मिलनी तय कर आये तो टीका बरिक्षा भी तय कर आओ।।”

” अम्मा नाराज काहे हो जाती हो….बिना तुम्हरी मर्ज़ी कुछ नही करेंगे भई ,,कम से कम एक बार मिल तो लो,।।”

” का फायदा मिलने जुलने का ,जब हमरी राय कोनो मायने ही नही रखती तो का फायदा बोलो।”

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” कैसी बात कर रही हो मौसी,राजा को बचपन से देखे हैं,आज तक आपसे पूछे बिना तो पानी भी नही पीता लड़का,शादी तो बहुत दूर की बात है।”

” पानिये भर नही पीता है,बाकी सलगे काम अपन मर्ज़ी का ही कर रहा आजकल।”

” एक बार मिलने में कोई बुराई नही मौसी,मिल तो लो पहले,बाद की बाद में देखी जायेगी।”

   आखिर दोनो लड़कों की बहुतेरी जद्दोजहद ने सुशीला को मिलने जाने की हामी भरने मजबूर कर ही दिया…..
      सभी समय से तैयार हो कर मन्दिर पहुंच गये।।

” कहाँ हैं भई तुम्हरे मेहमान ?? अभी तक मन्दिरे नई पहुँचे, बड़ा लड़की ब्याहने चले हैं ।।”
    सुशीला की बड़बड़ जारी थी कि बुआ जी मन्दिर के अन्दर से निकल वहाँ उन लोगों के बीच धम्म से कूद पडीं …..

   ” कैसन हो सुसीला, पहले पहल तो मोहल्ले के सब कार्यक्रम में दिख भी जाती थी,आजकल तो दरसनों दुर्लभ है,अब तो बहु वाली हो फिर भी बाहर फिरे को टैम नही निकाल पाती ।”

” अरे हम बाहर घूमै फिरै लागें तो हुई जाये सब काम धाम।।बहु तो आन गयी पर आजकल की छोरियां ना काम की ना काज की….अपने मरे बिना सरग कहाँ दिखता है जिज्जी,लगे रहत हैं दिन भर काम मा, हम ना सकेलें तो पूरा घर पड़ा रहे,बचपना से एही करते आ रहे बस,अपनी मर्ज़ी से तो आज तक एक साड़ी भी नही ली,अब आजकल के बच्चे हैं सादी ब्याह भी अपनी मर्ज़ी से करना चाहतें हैं ।”

” का कहें सुसीला,आज कल के बच्चो में लाज शरम तो रह नही गया,एक हमारा जमाना था,हम सास के भी सामने अपने इनसे बात नही कर पाते थे,और आजकल के लड़िका लोग पहले ही कहे देते हैं ए अम्मा इन  संग हमर फेरे फिरा,लुगाई बना दो।”

” खाली लड़कों को काहे दोस दे रहीं,लड़कियाँ कम है का आजकल की,ऐसा तो चटक मटक बनी घूमेन्गी ,और फिर कहीं कोनो लड़का कुछ बोल भर दे तो उसके सर जूतियाँ बरसायेंगी….आजकल की लड़कियाँ बड़ी जब्बर हैं,इनसे पार पाना मुस्किल है बल्कि लड़के सीधे हो गये है इनके सामने।”

   बांसुरी ने राजा को देखा,वो सर नीचे किये जमीन पर पड़े छोटे से पत्थर के टुकड़े को अपने पैरों से इधर उधर करता बैठा था,बन्टी ने बांसुरी को देखा फिर उसकी माँ को और आखिर बीच बचाव करने कूद पड़ा …..

” इस चर्चा का तो कोई उपाय और कोई फल नही मौसी जी,,आप दोनो विदुषीयां जब बात कर रहीं तो मुझे बीच मे बोलना तो नही चाहिये,पर मैं कहना चाह रहा था कि राजा और बांसुरी के बारे में अगर बात कर लेते तो…..”

” तो और किसके बारे में बात कर रहे।” मौसी के कठोर जवाब पे बन्टी एक बार फिर मुखर हो उठा

” नहीं मेरा मतलब कि,इनकी शादी के बारे में बात कर लेते तो ….”

” अब यही तो तुम बच्चों के दिमाग मे नही आता, कैसे ये ब्याह सम्भव है?? कोई मेल मिलाप ही नही है दोनों घरों का,, आप ही बताइये जिज्जी!! आप बड़ी हैं घर की,,आप ठहरे सरजूपारी हम के के,,कैसे हो पायेगा,नही नही राजा के बाबूजी बिल्कुल नही मानेंगे।”

” देखो दुल्हीन हम का कह रहे कि एक बार दुनो के बाबूजी लोगो को बात करने देते हैं,हम भी जानते हैं, की रीत रीवाज, दान दहेज,मिलनी पूछनी सब अलग है ,पर हैं तो दुनो परिवार ब्राम्हण ।।तो एक बार बात बढाने मे हर्ज का है।”

” बुज़ुर्गवार हो कर कैसी बात कर रही जिज्जी,,पूरा समाज थू थू करेगा,कहेगा हमारे पास नही रही का लड़की जो बाहर से धरे लायी,और सही बोले अब कोई दुराव छिपाव भी नही रह गया,हमारे राजा के लिये 50-50 लाख का भी रिस्ता आ रहा है।।”

बहुत देर से चुप बैठी प्रमिला ने अपनी बात रखी__

” मैं कह रही थी,हमाई भी तो अकेली ही लड़की है अब शादी के लिये,इसके पापा ने जो जोड़ जाड़ के रखा है,सब इसी का तो है,हमलोग भी अपनी तरफ से बहुत अच्छी शादी ही करेंगे दीदी।”

” देखो मैं किसी को कम जादा नही आंक रही भाई,,बुरा मत मान जाना पर हमरे बड़के के में भी बिना मांगे पूछे ही सब कुछ आ गया था,अब ये हमारा आखिरी लड़का है,रुखा सूखा ब्याह देंगे तो समाज ताना मारेगा_ कहेगा लड़के में कोनो खोट रहा होगा जभी बिना लेन देन के हो गयी सादी।”

प्रमिला- हम पूछ तो रहे जिज्जी,आप अपनी बात रखिये ना ,हम कोसिस पूरी करेंगे कि आपको कोई असुविधा ना हो।

सुशीला- अरे का का करेंगी?? बरीक्षा ही सात आठ लाख की पड़ जायेगी,फिर तिलक कम से कम इक्कीस का तो चढायेंगी,जेवर जट्टा आप अपन बिटिया को जो दे वो आपकी मर्ज़ी पर पांव पखारते समय दामाद को चेन तो पहनाएंगी की नही….
    फिर तिलक बारात हर मौके पे मेहमानों को लिफाफ़ा पकडायेंगी,अब आजकल 20-50 रुपया का लिफाफ़ा भी तो नही चलता ,कम से कम 100 रुपैय्या तो डालना ही पड़ेगा और लड़के के ताऊ ,चाचा फूफा मौसा लोगो को 500 का ।।सास की पिटरिया रीति तो ना भेज देंगी,रूपा 3 तोले का हार लायी रही ,आप उतना ना सही पर कुछ तो डालेंगी,फिर सास के साथ जेठानि को एक आध कर्णफूल अँगूठी कुछ तो पकड़ाना पड़ेगा ही।।
   सामान के लिये चलो हम मना भी कर देंगे पर पार्टी तो देंगे ना आप लोग,कम से कम ग्यारह सौ बराति का खाना खरचा हो जायेगा ।।

प्रमिला- हाँ अब इतना तो करना ही पड़ेगा,,लड़की हमारी है आखिर।।
   प्रमिला के धीमे से शब्द जैसे गले में ही रुंध गये

बांसुरी- इतना कुछ नही करना पड़ेगा मम्मी ।।माफ कीजियेगा आँटी जी,पर बेटी पैदा करने का जो पाप हमारी मम्मी ने किया उसकी अच्छी खासी सज़ा आपने सुना दी,पर हमे ये सज़ा मंजूर नही है।
  राजा तुम अच्छे तो बहुत हो,हमे बहुत प्यारे भी हो पर अब हम तुमसे शादी नही कर पायेंगे ,चलिये मम्मी।।
    और आँटी आपको एक बात और बता दें,हम आगे पढ़ाई और नौकरी दोनो करना चाहतें हैं,पर शायद आपको ये भी पसंद नही आयेगा,वैसे आपकी पसंद का हममे कुछ भी नही है,आपको यहाँ आकर हमारे कारण जो भी परेशानी उठानी पड़ी उसके लिये माफी चाहतें हैं ।नमस्ते।।

बन्टी- अरे ऐसे कैसे!! बांसुरी बड़ों की बात चीत अभी चल रही है,ऐसे बीच मे तुम्हारा बोलना ठीक नही है,,ये सब तो शुरुवाती बाते हैं,धीरे धीरे सब सुलटाएंगे,तुम काहे इतना टेंशन ले रही हो।

बांसुरी- नही बन्टी भैय्या,जहां बातों की शुरुवात ही गलत नींव पर हो वहाँ हमारा सपनों का महल खड़ा नही हो पायेगा,चलिये मम्मी।

   बांसुरी को जाने कौन सी बात इतनी परेशान कर गयी,राजा की अम्मा का हद से ज्यादा बोलना या राजा की गम्भीर चुप्पी !! पर इसके बाद बिना रुके वो अपनी माँ का हाथ पकड़े मन्दिर से बाहर निकल गयी,उनके पीछे बुआ जी अपने पुरखों को कोसती दहेज लोभियों पे भाषण देती धीरे धीरे चल पडी,जाते जाते उन्होनें आखिरी व्यंग सुशीला पे भी दे मारा_

” अच्छा नही किया दुल्हिन!! जितना तुमने कहा उतनी सब की तैयारी रही हमारे भाई की,पर ऐसे इस ढंग से बच्चो के सामने…..का सोच रही अब खुस रह पाओगी तुम?? कर सकती हो तो हमरी बांसुरी के पहले राजा का ब्याह कर के दिखा दो, बड़ी खुसी से तुम्हरे द्वारे आयेंगे तुम्हरे राजकुमार के ब्याह का लड्डू खाने,और हम भी तुम्हें न्योत रहे एक महीना के अन्दर अन्दर तुम्हे बंसी के ब्याह का लड्डू खिला के रहेंगे।।”

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  आंखों से आग बरसाती बुआ जी अपने घुटने संभालती चली गयी।।

          ************************

              एक सौ सोलह चाँद की रातें,
               एक तुम्हारे काँधे का तिल
               गीली मेहंदी की खुशबू,
                झूठमूठ के शिकवे कुछ
          झूठमूठ के वादे भी, सब याद करा दो
         सब भिजवा दो, मेरा वो सामान लौटा दो……

  रेडियो पर बजते गाने के बोल सुन अनजाने ही दो आंसू बांसुरी के गालों पे लुढ़क आये,,खिड़की पर खड़ी वो अपनी सोच में गुम कहीं खो गयी।।

क्रमशः

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aparna..

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यूँ ही…

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एक तारा भी नज़र आता नही मुम्बई के आसमान पर

यूँ कहने को मुम्बई सितारों की नगरी है…..

aparna ..

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समिधा-30

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   समिधा – 30

    वरुण को मठ में आए लगभग आठ 9 महीने बीत चुके थे और अब उसका काम बदल चुका था। मठ में किस व्यक्ति को कितना समय हुआ है उसकी शिक्षा-दीक्षा क्या है इसके आधार पर कार्य विभाजित है बावजूद मठ में शुरुआती दिनों में हर एक व्यक्ति को सारे जरूरी काम करने पड़ते थे।
    वेद अध्ययन के लिए जितना समय निश्चित था वरुण ने उस समय से पहले ही सारी किताबें पढ़ ली थी उसका अध्ययन पुख्ता था।
    उसके मन में ढेर सारे प्रश्न थे और उन्हीं प्रश्नों का उत्तर ढूंढने ही तो वो कृष्ण आश्रम आया था। आखिर जीवन क्या है ? इसे किसने रचा है ? अगर इसे रचने वाला भगवान है तो उसने इस जीवन में इतनी मुश्किलें क्यों डाली है? रोग जरा और मृत्यु सदैव स्वाभाविक क्यों नहीं हो सकते? अगर जीवन देने वाला परमात्मा है तो उसने इस जीवन में रोगों की सृष्टि क्यों की?  आखिर क्यों इंसान यह समझता है कि अगर इनका जवाब यह है कि भगवान ऐसे दुख देकर अपने प्रति आस्था जगाने का काम करते हैं तो फिर हम उस ईश्वर को पिता क्यों मानते हैं?

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    क्या कोई पिता अपना महत्व दिखाने के लिए अपने पुत्र को दुख और दर्द दे सकता है?
   
     इसी तरह के कई सवाल थे जो वरुण के मन को मथते रहते थे और जिनके कोई जवाब उसे नहीं मिल पाते थे। अक्सर जब प्रभकराचार्य स्वामी प्रवचन दिया करते तब वरुण अपना कोई ना कोई सवाल उनके समक्ष प्रस्तुत कर दिया करता। अमृतानंद स्वामी पहले तो कोशिश करते कि उसकी समस्या का कोई समाधान उसे बता सकें लेकिन जब वह नहीं बता पाते तो सब कुछ ईश्वर इच्छा कहकर शांत हो जाया करते। लेकिन उनके शांत हो जाने पर भी वरुण के मन का कौतूहल शांत नहीं हो पाता था। और इसी उधेड़बुन में वह अपने प्रश्नों के साथ रात रात भर जागता चला जाता था। और फिर सुबह की पहली किरण के साथ ही वह वेद पुस्तिकाओं को खोलें अपने प्रश्न उनमें ढूंढने लगता था।
     अध्ययन करते करते धीरे-धीरे एक समय ऐसा आने लगा कि वरुण को स्वतः ही अपने मन में चलते सारे सवालों के जवाब मिलने लगे और इसके साथ ही उसे यह भी समझ में आने लग गया कि मठ में उसके ऊपर जितनी भी आचार्य बैठे हैं, यह आवश्यक नहीं कि उन्होंने भी वेद अध्ययन किया हो। या उन्हें वाकई इतना ज्ञान हो कि वह प्रवचन दे सकें। बावजूद वरुण उम्र में छोटा होने के कारण और अनुभव की कमी के कारण किसी को भी रोक टोक नहीं पाता था।

    यह सत्य भी है । धर्म और आस्था से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जिन्हें अनजाने ही सामान्य लोगों पर थोप दिया जाता है बिना किसी कारण को जाने। लेकिन जो सच्चे अर्थों में वेदों का अध्ययन करते हैं वह जानते हैं कि हर एक चीज के पीछे कोई ना कोई वैज्ञानिक तथ्य जरूर है।
     अब यही वरुण के साथ होने लगा उसका विज्ञानी दिमाग जब वेदों के अध्ययन के साथ उलझा तो उसमें से जुड़कर जो नया दर्शन निकला उसने वरुण के ज्ञान चक्षु खोल दिये।

       आश्रम में आचार्यों के अलग-अलग पद  सुनिश्चित थे। वेद अध्ययन के समय तक सभी सामान्य व्यक्ति शिष्यों की श्रेणी में आते थे। लेकिन छह महीनों के कठिन तप के बाद वरुण को आचार्य पद पर पहुंचने की पहली सीढ़ी प्राप्त हो चुकी थी। और अब वह अपने से ऊपर के गुरु प्रभाकर आचार्य के प्रवचन के बाद जनसमूह को सामान्य बोलचाल की भाषा में श्रीकृष्ण से जुडी कथाएं सुनाने लगा था।
    जनसमूह के सामने श्री कृष्ण कथा कहते हुए वरुण खुद श्री कृष्ण के अमृत में ऐसा डूबा रहता था कि उसके मन को अपरूप शांति मिलने लगी थी।
       आश्रम बहुत बड़ा था जहां अलग-अलग स्तर पर गुरु और आचार्य उपस्थित थे सभी के काम बटे हुए थे। लेकिन इतने महीने होने पर भी उस आश्रम के मुख्य और सर्व प्रमुख आचार्य श्री अमृताचार्य स्वामी जी से अब तक वरुण की भेंट नहीं हो पाई थी।
  
   स्वामी अमृत आचार्य के बारे में कई कहानियां आश्रम में सुप्रसिद्ध थीं। कहानियों के नायक पद से निकलकर अब वह किवदंती बन चुके थे । अपने धर्म के प्रचार को लेकर उनकी आस्था इतनी सुदृढ़ थी कि वह जगह-जगह घूमकर कृष्ण पर प्रवचन देते लोगों को कृष्ण भक्ति के मार्ग से जुड़ते चले जा रहे थे। और अब उनका सारा जीवन पूरी तरह से सिर्फ कृष्ण को समर्पित हो गया था। वरुण का उनसे मिलने का सबसे बड़ा लालच यही था कि उन आचार्य की कहानी बहुत कुछ वरुण को उस की कहानी से मिलती सी लगती थी। लेकिन शायद अब तक वरुण की किस्मत में उनसे मिलना नहीं लिखा था इसीलिए यह सुयोग उसके जीवन में अब तक नहीं आ पाया था।

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    भक्ति मार्ग पर प्रवचन देने के बाद शाम का कार्य समाप्त हो चुका था। वरुण अपनी किताबों को समेट एक तरफ रख मंदिर परिसर की आरती के बाद बाहर निकल रहा था कि तभी एक ओर बैठी आश्रम की महिलाओं ने भजन कीर्तन शुरू कर दिए।
   उन महिलाओं पर नजर पड़ते हैं वरुण ने अपने साथ चल रहे अपने मित्र से उनके बारे में पूछना शुरु कर दिया…- ” कौन है यह सब और कहां से आई हैं!”

   वरुण के सवाल का जवाब उस की जगह उदयाचार्य जी ने दिया।
    उदयाचार्य जी आश्रम में रहने वालों के रहने और खाने की व्यवस्था देखा करते थे। इसीलिए परिसर में पीछे स्थित भगिनी आश्रम की व्यवस्था का भार भी इनके कंधों पर ही था….-” दुनिया की सताई औरतें हैं। जिन्हें कहीं आसरा नही मिलता वो बेचरियाँ यहाँ आश्रम आ जाती हैं।
   कम से कम दोनों समय का खाना तो मिल ही जाता है।”

” ऐसा क्यों कह रहें हैं , गुरुवर? देखा जाए तो बेचारा  इस संसार में कोई नही, क्योंकि उस पालनहार ने पैदा किया है तो व्यवस्था भी वहीं करेंगे। और दूसरी तरफ देखें तो सभी बेचारे क्योंकि अब तक उस पालनहार के श्रीचरणों से दूर है।”

” अरे बाबा वरुणानँद स्वामी जी आप ये प्रवचन जन मानस के लिए ही बचाये रखिये। हम खुद स्वामी हैं और आपसे कहीं अधिक ये सब जानते समझतें हैं।”

” गुरुवर आपको उपदेश दे सकूं इतना ज्ञानी मैं नही हुआ अभी और न कभी हो पाऊंगा । मैं तो बस ये कहना चाहता हूँ कि अगर ये सभी महिलाएं अपने सभी अंगों से सक्षम है , दिव्यांग नही हैं तो इन्हें सिर्फ परिवार के ठुकराए जाने के कारण बेचारी कह देना तो इनका अपमान हुआ न।”

“हां दिव्यांग नही है इसलिए ही तो इनसे मंदिर परिसर की साफसफाई और रसोई का काम लिया जाता है। वरना क्या सिर्फ मुफ्त की रोटियां तोड़ने के लिए हैं ये?”

” ऐसा मत कहिये गुरु जी। मैं शायद अपनी बात आपको समझा नही पाया। इसलिए आप ज़रा नाराज़ से हो गए। मैं बस ये कहना चाहता था कि ये सब भी अगर सिलाई कढ़ाई बुनाई जैसे कार्य कर के अपना समय किन्हीं सकारात्मक कार्यो में लगा सकें तो इनके मन को भी एक आत्मसंतुष्टि तो मिलेगी। “

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     उदयाचार्य जाने क्यों वरुण से ज़रा रूष्ट ही रहा करते थे, कारण किसी को स्पष्ट ना था। शायद वरुण के उच्च शिक्षित होने से बाकी शिष्यों और प्रधान गुरुवर में उसका मान सम्मान था, उसने अपने व्यवहार से भी जल्दी ही अपने लिए एक जगह बना ली थी या और जो कोई भी कारण हो, और इसलिए वो अक्सर वरुण के सवालों के ऐसे ही उल्टे जवाब दिया करते।
    वो उससे बातों में उलझे ही थे कि एक शिष्य भागा हुआ सा उन तक आ पहुंचा…

” गुरु जी ! बाहर एक बहन आयीं हैं, आश्रम में जगह चाहिए उन्हें! चारु दीदी की चिट्ठी भी है उनके पास।”

  उदयाचार्य ने उस शिष्य की तरफ देख मुहँ टेढ़ा सा कर लिया…-“आश्रम में जगह कहाँ बची है, ये सारे संसार की दुखियारी यहीं क्यों चली आती हैं, मथुरा में और भी तो आश्रम हैं। वृंदावन चलीं जाएं पर नही सबको यहीं आकर मरना है।”
   बड़बड़ाते हुए उदयाचार्य बाहर की ओर निकल गए, और उनकी इस बिना वजह की चिड़चिड़ाहट से स्तब्ध वरुण अपने कमरे की ओर चल गया।
    
     उदयाचार्य ने बाहर आकर मंदिर परिसर के एक ओर स्थित कार्यालय में आगंतुकों को बैठाया और एक मोटा सा रजिस्टर अलमारी से निकाल कर उनके सामने बैठ गए।
   ” नाम बताइये ?”
   ” पारोमिता !”
   ” पूरा नाम , पति या पिता का नाम, अपने घर का पता, शहर । सब कुछ बताइये।”
  ” पूरे नाम का जब कोई अस्तित्व ही नही बचा तो उस नाम को लिख कर क्या फायदा। नाम पारोमिता ही लिखिए। पति और पिता दोनों ही नही हैं, इसलिए उनके नाम बताने से क्या प्रयोजन। और आपका तीसरा प्रश्न था घर का पता? तो अगर मेरे पास मेरे घर का पता होता तो मैं यहाँ क्यों आती? “
   पारो की बातें सुन उदयाचार्य ने रजिस्टर से तुरन्त अपना चेहरा ऊपर उठाया और ऐसी मोटी बातें बोलने वाली के चेहरे पर गड़ा दी।
   चेहरे से बाल विधवा ही लग रही थी। ऐसी परम सुंदरी और विधवा? विधाता के लिखे लेख कोई नही समझ सकता… उनके मुहँ से एक आह निकल गयी…” बेचारी!” और ये शब्द बोलते ही उन्हें वरुण याद आ गया। वो लपक के अपने इधर उधर देखने लगे, किसी ओने कोने से टपक पड़ा तो फिर एक बार बखिया उधेड़ना शुरू कर देगा।
   सामने बैठी पारो को स्वयं के लिए ये सम्बोधन बहुत चुभता था, लेकिन अब उसके पास सुनने के अलावा चारा भी क्या था?

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  “पता तो लिखवाना ही पड़ता है? देखिए भविष्य में कभी ये बीमार पड़तीं हैं, या इनकी मृत्यु हो जाती हैं तो संस्कार के लिए घर वालों को तो बुलाना ही पड़ेगा ना?”
   उदयाचार्य ने पारो के साथ बैठी महिला को देख कर अपनी बात समझानी चाही।
   ” क्या कृष्णभूमि में मेरा अंतिम संस्कार करने वाला भी कोई न होगा? जहाँ जीवित व्यक्ति की पूछ परख नही वहाँ उसके मरने से किसी को क्या दुःख होगा, उल्टा सभी प्रसन्न ही होंगे। “
   पारो की माँ ने उसकी बात सुन उसे अपने अंक में भर लिया…-“ऐसा मत बोल लाड़ो। मेरा दर्द तुझे कैसे समझाऊँ। तुझे अपने साथ ले भी जाऊंगी तो किस किस से तेरी रक्षा कर पाऊँगी बेटी। तेरी जो उम्र है तेरा जो रूप है ,अपने ही घर में भेड़िये पैदा हो जाएंगे। घर की औरतें तानों से तुझे छलनी करेंगी और पुरुष अपनी आंखों से!
   स्वयं भुक्तभोगी न होती तो क्या अपने कलेजे के टुकड़े को ऐसे किसी मंदिर में छोड़ देती? ये कृष्ण का स्थान है बेटी यहाँ हर कदम पर कृष्ण तेरे साथ होंगे और मुझे पूरा विश्वास है वो सदा तेरी रक्षा करेंगे। “

” क्यों क्या कृष्ण सिर्फ मंदिरों में रहतें हैं। और अगर तुम्हारे भगवान मंदिरों में रहतें हैं तो केदारनाथ में क्या वो आंखें मूंदे बैठे थे जो इतना बड़ा प्रलय उन्हें नही दिखा। मुझे मत बहलाओ माँ! तुम्हारे कृष्ण भी अपने रचे संसार की तरह ढोंगी हैं। जहाँ सब अच्छा होता है श्रेय लेने दौड़े चले आतें हैं और जहाँ कुछ गलत हुआ उसे मानव पर थोप देतें हैं। “

   रोते रोते पारो की माँ ने उसे गले से लगा लिया…. पारो की आंखें भी बरसने को थी लेकिन उसने खुद को संभाल लिया। वो अपनी माँ का दुख समझ पा रही थी लेकिन अब उसके मन में हर किसी के प्रति नाराज़गी ने घर कर लिया था। इसलिए जब ससुराल में उससे मिल कर उसकी माँ लौटने लगी तब उसने उन्हें पकड़ कर ज़िद कर ली कि वो उसी वक्त उसे आश्रम छोड़ दें।
   ससुराल में सास, ठाकुर माँ सब उसे समझा समझा कर हार गए कि वो लोग उसकी तैयारी करवा कर उसे कुछ दिनों में आश्रम छोड़ आएंगे पर वो राजी नही हुई। और उसकी ज़िद के आगे हारकर उसकी माँ को।लेने आये बाली दादा ने वहीं से मथुरा की टिकट निकाली और पारो और उसकी माँ को साथ लिए मथुरा निकल गए।
    ससुराल छोड़ने की ज़िद भले ही पारो ने पकड़ ली थी लेकिन देव से जुड़ी यादों से किनारा करना ऐसा भी आसान नही था। उस घर का आंगन जहाँ बैठ कर वो अपने बही खाते सहीं किया करता था, वहाँ की रसोई जहाँ उसने पहली बार खीर बना कर उसे खिलाई थी और उसने प्यार से पारो की उंगलियां चूम ली थी। ऊपर कमरे की ओर जाती सीढ़ियां जिन पर बैठे वो अक्सर उसे छेड़ता रहता था और उसका कमरा। वहाँ तो जगह जगह वो समाया हुआ था।
    सब कुछ याद करती वो ससुराल की दहलीज पर खड़ी फफक पड़ी थी। ये कैसा निर्वासन था उसका, जिसमें अब वापसी की कोई गुंजाइश नही बची थी। ये ऐसी घड़ी थी कि उसे अपनी सास, ठाकुर माँ और बाकियों के लिए भी कलेजे में ममता उमड़ घुमड़ रही थी। यूँ लग रहा था उसकी सास ही उसे अपने कलेजे से लगाये रोक ले।
   पर तभी उसकी नज़र सबसे पीछे खड़े उस नीच पर पड़ गयी जिसकी दृष्टि पड़ने से ही वो मैली हुई जा रही थी।

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    सौभाग्य कहा जाए या दुर्भाग्य कि उस समय दर्शन भी अपने पिता के साथ पास के गांव गया हुआ था वरना देव का वो छोटा भाई अपनी बऊ दी को शायद ऐसे वहाँ से कभी नही जाने देता।
   आनन्दी का अंदर रो रोकर बुरा हाल था। चलती बेला उसने पारो से छिपाकर उसके बैग में कुछ रुपये और लडडू डाल दिए थे। उससे अधिक करने की शायद उसकी भी हिम्मत नही थी।
  एक आनन्दी से ही वो जाकर खुद से उसके पैरों पर गिर कर आशीर्वाद ले आयी थी। और उसने उसे उठा कर आने सीने से लगा लिया था।
   बाकियों के पैर छूना तो औपचारिकता मात्र रह गयी थी।
      नही अब इस घर में उसका दाना पानी नही रहा था। अगर मोह माया में पड़कर वो यहाँ रुक भी गयी तो कब तक खुद को बचा कर रख पाएगी। उसका बुरा करने के बाद इल्जाम भी न हो उसी पर डाल दिया तो मरने के सिवा क्या बचेगा।
   वो भारी कदमों से उस चौखट को एक आखिरी प्रणाम कर वहाँ से निकल गयी।
    अपनी माँ के साथ गाड़ी में बैठते ही फिर उसके लिए खुद को संभालना मुश्किल हो गया था। लगातार रोती पारो को देख उसके बाली दादा ने एक बार उसकी माँ से उसे घर ले चलने की बात भी कही लेकिन माँ बेटी दोनों ही इस बात पर चुप लगा गयीं थीं।

    आश्रम पहुंच कर बाहर से उसका वृहदाकार रूप देख कर और बाहरी लोगों से उसके बारे में पूछ ताछ कर पारो की माँ और दादा आश्वस्त हो गए थे। बाहरी लोगों के अनुसार ये आश्रम सच्चे अर्थों में स्वर्ग था। वहाँ रहने वाली महिलाओं को ससम्मान वहाँ स्थान दिया जाता था। भगिनी आश्रम की संचालिका चारुलता दीदी असल में किसी एन जी ओ को चलाती थीं जिसके अंतर्गत वो महिलाओं और बालिकाओं के लिए ढेर सारे काम करतीं थीं। उनका बाहर शहर में ही एक अनाथ बालिका आश्रम भी था। विधवा महिलाओं के रहने आदि के लिए उन्होंने आश्रम के साथ मिलकर काम करना शुरू किया था तथा अपनी संस्था की महिलाओं के रहने की व्यवस्था आश्रम में करवाने की अर्जी दी थी जिसे मान लिया गया था और उसके बाद ही इस कृष्ण आश्रम में भगिनी आश्रम खुला था और उसके बाद से ही दुनिया भर की सताई हुई महिलाओं का ये ठिकाना हो गया था।
  बीच बीच में आश्रम संचालिका चारुलता दीदी भी आया करतीं थीं। भगिनी आश्रम में रहने वाली महिलाओं को सिर्फ पूरे आश्रम के लिए भोजन पकाने का ही काम था। इनमें से जिन्हें वहाँ रहते आठ दस साल व्यतीत हो चुके थे ऐसी महिलाओं को चारु दीदी अपने अनाथ आश्रमों और बाक़ी कामों में सहायता के लिए साथ ले जातीं थीं।
   यहीं सब जान कर पारो की माँ आश्वस्त सी हो गईं थीं।
 
  ” अब जो है जैसा है यही तेरा घर है लाड़ो!” पारो को खुद से अलग कर उन्होंने उसका सामान उसके हाथ में दिया और आँसू पोंछती बाहर निकल गईं। बाहर निकलते हुए बाली दादा उसकी माँ को उसके वहाँ रहने के लाभ समझाते जा रहें थे।

    उदयाचार्य जी ने वहीं  से गुज़रती एक महिला को आवाज़ लगा दी…-“सरिता ये नई आयीं है आश्रम में , इन्हें अपने साथ ले जाओ। इनके सोने आदि की व्यवस्था देख लेना और आश्रम के नियम आदि इन्हें समझा देना।”
” जी आचार्य जी! आओ बहन!”
  पारो अपना सामान लिए सिर झुकाए उस औरत के साथ चली गयी।

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   दोनों आगे बढ़ रहीं थीं बगीचे के बीच से गुजरते हुए उन्हें किसी की आवाज़ कानों में पड़ी। कोई  सामने खड़े बच्चे से कह रहा था…-“एकदम ताजे खिले फूलों को रहने दो। जो फूल अब तब में झरने को हैं उन्हें ही पूजा के लिए तोड़ लो।”
” पर गुरुवर पूजा में तो ताज़े फूल ही चढतें हैं।”
” हाँ तो पेड़ पौधों से तुरंत तोड़े फूल ताज़े ही तो हैं। उन नए खिलें फूलों को कुछ दिन तो ताज़ी हवा में सुकून की सांस भर लेने दो। ये फूल वैसे भी कल तक झर जाएंगे इसी से आज इनसे गोपाल जी का श्रृंगार करने से ये फूल भी चमक जाएंगे और हमारे गोपाल ज्यू तो सबको महका ही देते हैं।”
    वरुण उस बालक को यह सब कह कर पलटा ही था कि सामने पारो से टकराते बचा…-” थोड़ा ऊपर देख कर चलो बहन। वरना टकरा जाओगी। “
  पारो के साथ चलने वाली सरिता ने वरुण को प्रणाम किया तो उसे देख पारो ने भी हाथ जोड़ दिए। सरिता को प्रणाम का जवाब देने के बाद पारो को देख जाने क्यों वरुण कोई जवाब नही दे पाया। और जाती हुई पारो के पीछे दूर तक उसकी आंखें पारो को उसके आश्रम तक छोड़ आयीं….

क्रमशः

aparna…

मायानगरी -5

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मायानगरी – 5

      मेरे पास आओ मेरे
     दोस्तों एक किस्सा सुनो
       मेरे पास आओ मेरे
     दोस्तों एक किस्सा सुनो

    कई साल पहले की ये बात है
      बोलो ना चुप क्यों हो गए
         भयानक अंधेरी
        सी यह रात में
       लिए अपनी बन्दूक
             मैं हाथ में……

   ” अबे सालों बस सुनने आये हो क्या? साला आज कल के लड़कों को कोई तमीज ही नही है। हम सीनियर होकर हम ही गाना भी सुनाए। शर्म करो कुत्तों। ये मैं गुनगुना रहा था कमीने कान गड़ाए खड़े हैं।”

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     इंजीनियरिंग कैम्पस में कंप्यूटर साइंस के जूनियर्स को मैकेनिकल के सीनियर्स धरे बैठे थे कि कंप्यूटर वाले सीनियर्स वहीं चले आये…

” अरे सीपी यार इन लोगो को काहे दबोच रखे हो, हमारे वाले हैं ये। “

” निशांत यार हम भी जानते हैं । लेकिन देखो, शुरू से ही हमारे कॉलेज में फैकल्टी वाइज कभी फसाद नही हुआ। हम अगर तुम्हारे बंदों को रैंग करते है तो तुम्हे भी तो खुल्ली छूट है यार हमारे बंदों को नोचने की।

“भाई वो बात नही है यार। इस बार की बैच में ज़रा हाई फाई लड़के भी हैं। मैनेजमेंट कोटा खूब भरा है।”

” अरे तो क्या हुआ? मैनेजमेंट कोटा से आने वालों को क्या हम तमीज नही सिखाएंगे। भाई ये हमारी ही नैतिक जिम्मेदारी है कि लड़कों को लड़का बनाया जाए। अब स्कूल से ये क्या सिख पढ़ कर आते हैं। कुछ नही। सिर्फ होर्लिक्स पी लेने से टॉलर स्ट्रॉन्गर और स्मार्टर नही बना जाता। हम ही हैं जो इन टोडलर्स को चलना सिखाते हैं।
  कायदे से यही वो जगह है जहाँ इन जाहिलों को इंसान बनाया जाता है।”
  तभी सीपी की नज़र एक जूनियर पर पड़ी जो थर्ड बटन से सर ऊपर कर के देखने की कोशिश कर रहा था कि सीपी का जोरदार तमाचा उसके चेहरे को लाल कर गया।
   जोश ही जोश में तमाचा इतना ज़ोर का पड़ा की लड़का घूम कर ज़मीन पर गिरा और बेहोश हो गया…

  वहीं चबूतरे पर बैठे अभिमन्यु और बाकी लड़के भी भाग कर देखने चले आये।
  लड़कों में हड़कंप मच गया। कम्प्यूटर वाले लड़के डर के मारे अपनी बिल्डिंग को खिसक लिए। सीपी को लगा नही था कि उसका पंजा ऐसा फौलाद का है। आश्चर्य से वो कभी उस बेहोश जूनी को तो कभी अपने हाथ को देख रहा था कि अभिमन्यु ने लड़के को उठाया और अपने कंधे पर डाल मेडिकल की तरफ भाग चला।
   अधीर भी उसके पीछे हो लिया।

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   लंबा चौड़ा अभिमन्यु उस नाजुक दुबले पतले से जूनियर लड़के को कंधे पर लिए बिल्कुल साक्षात सती को कंधो पर लिये महादेव सा चला जा रहा था।

  मेडिकल में गेट पर  से घुसते ही बायीं ओर कॉलेज का हॉस्पिटल था। अभि उसी तरफ निकल गया…

“ला यार थोड़ी देर मैं भी पकड़ लूँ। “

  अधीर के इस प्रोपोजल के आते में ही मेडिकल कैम्पस में खड़ी स्ट्रेचर लिए वार्डबॉय भागा चला आया…

” क्या हुआ है लड़के को? “

  डॉक्टर के सवाल पर अभिमन्यु ने ही जवाब दिया..

” बेहोश हो गया है। “

” वो तो दिख रहा है। बेहोश कैसे हुआ? “

  अभि और अधीर एक दूसरे को देखने लगे। डॉक्टर के सामने ये बताना कि रैगिंग में पड़े थप्पड़ ने ये हाल किया है महंगा पड़ सकता था।

” इसने ब्रेकफास्ट नही किया था डॉक्टर!”

ड़ॉक्टर ने अजीब सी नज़रों से अभि को घूर कर देखा और लड़के को साथ लिए अंदर चला गया।

  अभी और अधीर के पीछे सीपी और उसके 1-2 चेले भी भागते हुए मेडिकल चले आए। सीपी और चेले वहीं बाहर बैठ गए।

   अभि और अधीर इधर उधर भटकते उस लड़के के होश में आने का इंतज़ार कर रहे थे कि कहीं से मधुर सी गाने की आवाज़ चली आयी। दोनों उसी दिशा में बढ़ चले…

  मेडिकल प्रथम वर्ष के छात्रों का आज अस्पताल विज़िट करने का पहला दिन था और आज ये नन्हे-मुन्ने बच्चे रेजिडेंट डॉक्टर्स के हत्थे चढ़ गए थे।
   असल में इन्हें इनके कुछ सीनियर्स ने अस्पताल की ओपीडी से कुछ आवश्यक सामान लाने का बेइंतिहा गैरजरूरी काम दिया था।
   इसी चक्कर में ये चार पांच लड़के लड़कियां यहाँ फंस गए थे।
वैसे रेजिडेंट डॉक्टर्स इतना व्यस्त होते थे कि वो जूनियर्स की रैगिंग लेते नहीं थे। लेकिन पिछले दिन की हेक्टिक शेड्यूल की थकान उतारने के लिए आज उनके पास जूनियर्स नाम का एंटरटेनमेंट मौजूद था। और बस इस एंटरटेनमेंट की बहार देखते हुए रेजिडेंट डॉक्टरों का भी उ ला ला करने का मन करने लगा।
  डॉक्टर्स ड्यूटी रूम में इन जूनियर्स की रैगिंग चल रही थी।
  इत्तेफाक से रंगोली ही उस रैगिंग की सबसे पहली शिकार बनी थी। सीनियर से उसे गाना सुनाने को कहा था और वह अपने गले को साफ कर गाना शुरू कर चुकी थी।

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देख लो हमको करीब से
आज हम मिले हैं नसीब से
     यह पल फिर कहां
    और यह मंजर फिर कहां
  गजब का है दिन सोचो जरा
   यह दीवानापन देखो जरा
तुम भी अकेले हम भी अकेले मजा आ रहा है कसम से…..

   कमरे के ठीक बाहर खड़े अभिमन्यु और अधीर के कानों तक भी यह स्वर लहरी पहुंच चुकी थी। आवाज का नशा अभिमन्यु पर ऐसा छाया कि बेहोशी के आलम में उसने दरवाजा धीरे से खोल दिया…
उसके दरवाजा खोलते ही सारे सीनियर्स अपनी जगह से उठकर खड़े हो गए। जूनियर्स पहले ही खड़े थे जो थर्ड बटन में थे   वह लोग भी दरवाजे की तरफ देखने लगे । अभिमन्यु और अधीर को ऐसे सामने खड़े देख एक सीनियर रेजिडेंट ने उन लोगों से पूछ लिया…-” आप लोग कौन हैं यहां क्या कर रहे हैं?”

“हम इंजीनियरिंग के हैं ,एक मरीज लेकर आए थे।”

“मरीज लेकर आए थे? क्या हुआ तुम्हारे मरीज को?”

“जरा चक्कर आ गया था।”

“हां तो ठीक है! लेकिन यहां क्या कर रहे हो? मरीज को भर्ती करवा दिया है ना ड्रिप चढ़ेगी शाम तक बंदा अपने पैरों पर चलकर इंजीनियरिंग कैम्पस वापस आ जाएगा इसलिए अब  फुटो यहां से।”

अभिमन्यु ने रंगोली को देखा रंगोली ने अभिमन्यु को और अभिमन्यु के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कुराहट आ गई!  पास खड़ी झनक ने रंगोली को तुरंत कोहनी मारी….-” देख आखिर तेरा पति  तुझे ढूंढता यहाँ तक चला आया।
“चुप कर बकवास मत कर।”
रंगोली  जितना धीमा बोल सकती थी उतना धीमा बोली लेकिन उसने इतना धीमा बोल दिया कि पास खड़ी झनक तक को सुनाई नहीं दिया और झनक ने इतनी जोर से “क्या” कहा कि सारे रेजीडेंट डॉक्टर उन दोनों को देखने लगे।

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  उसी वक्त बाहर से गुजरते मृत्युंजय की नजर डॉक्टर्स ड्यूटी रूम पर पड़ गई। वह अभिमन्यु और अधीर को हाथ से हटा कर दरवाजे से भीतर चला आया…-” क्या हो रहा है यहां पर?”
सारे जूनियर रेजीडेंट डॉक्टर घबराकर एक तरफ खड़े हो गए …-“कुछ नहीं सर! वह बस जरा यह फर्स्ट ईयर जूनियर्स हैं इन्हें एनाटॉमी पढ़ा रहे थे।”
“एनाटॉमी पढ़ाना है, तो लैब में पढ़ाया करो। यहां बिना बोन और बिना किसी ऑर्गन के तुम लोग एनाटॉमी कैसे पढ़ा रहे हो?”
मृत्युंजय ने जूनियर की तरफ देखा और उन्हें वहां से जाने की इजाजत दे दी।

  उस कमरे से बाहर निकलते ही जूनियर्स ने चैन की सांस ली… -“यहां तो यार हर मोड़ पर आतंक छाया हुआ है! वह गाना आज मेरी समझ में आ रहा है, यहाँ रोज-रोज हर मोड़ मोड़ पर होता है कोई ना कोई हादसा।  बस उन्हीं हादसों का अड्डा है हमारा कॉलेज। क्लास में बैठते हैं तो फँस जाते हैं। लैब में जाते हैं तो फँस जाते हैं। हॉस्पिटल आते हैं तो भी फँस जाते हैं। जहां देखो वहां सीनियर का आतंक है। आखिर कब बच पाएंगे हम लोग।”
   झनक की बात पर साथ चल रहा लड़का राहुल हंसने लगा…-” तुम लोग तो फिर भी लड़कियां हो यार! तुम बच जाती हो, हम लोगों के साथ हॉस्टल में भी इतनी ज्यादा अति होती है कि हम बता नहीं सकते।”
  “प्लीज बता ना क्या रैगिंग होती है तुम लोगों के साथ।”
  ” चुप कर! नहीं बताना।”
“अरे ऐसा क्या करते हैं भई सीनियर बता ना प्लीज।”
“होती है बॉयज वाली रैगिंग! जैसे तुम्हारी गर्ल्स प्रॉब्लम तुम हमसे शेयर नही कर सकती, हम भी नही कर सकते ।”
” बड़ा आया। मत बता।”
   वो लोग बातें करते अगर बढ़ ही रहे थे कि पीछे से उन्हें आवाज़ लगाते अभिमन्यु और अधीर चले आये…
” एक्सक्यूज मी गाइज़! आप लोग मेडिकोज हैं?
   अभिमन्यु के सवाल पर रंगोली के अलावा बाकी लोगों ने उसे घूर कर देखा..-” हां जी आपको क्या प्रॉब्लम है?”
“नो नो! कोई तकलीफ नहीं है । एक्चुली मैं कुछ जानना चाहता था मेडिकल टर्म्स में।”
राहुल ने उसे बिल्कुल ही हिकारत भरी नज़रों से घूर कर देखा।
” भाई मेरे! ऐसे घूर कर मत देख! मैं भी कोई ऐवें नहीं हूं। इंजीनियरिंग कर रहा हूं, मेकेनिकल से। और उम्र के लिहाज से देखा जाए तो तुम सबसे दो-तीन साल बड़ा ही हूंगा। और प्रोफेशनल कॉलेज के हिसाब से देखा जाए तो यूनिवर्सिटी सीनियर हूं तुम्हारा।”
अबकी बार जवाब राहुल की जगह अतुल ने दिया…-” जी कहिए क्या पूछना है आपको।”

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“दोस्त कहीं आराम से बैठ कर बात कर सकते हैं । ज़रा सीरियस मुद्दा है।”
“ओके बाय गाइज़। तुम लोग बैठ कर बातें करो मैं और रंगोली चलते हैं।” झनक रंगोली का हाथ थामे आगे बढ़ने लगी कि अभिमन्यु उन दोनों के सामने अचानक से जाकर खड़ा हो गया….-” अरे मैडम! प्लीज रूके ना आप चार डॉक्टर रहेंगे, तो मेरी समस्या को आप लोग आसानी से समझ कर सुलझा सकते हैं । आप मेडिकल की पढ़ाई करने आई हैं। आप लोगों का तो पेशा ही है लोगों के दुख दर्द सुनना।”
   झनक ने एक नजर अभिमन्यु को देखा और हां में सर हिला दिया।
   रंगोली का वहां रुकने का बिल्कुल मन नहीं था वह झनक का हाथ पकड़े बार-बार उसके हाथ पर दबाव बनाती वहां से निकल चलने की गुजारिश कर रही थी।
    उन चारों डॉक्टरों के साथ अभिमन्यु और अधीर मेडिकल कैंटीन में पहुंच गए।
  वह चारों अभी फर्स्ट ईयर में थे इसलिए कायदे से उन्हें कैंटीन जाना अलाउड नहीं था। और यह बात उन चारों को मालूम नही थी, अनभिज्ञता में वह चारों अभिमन्यु के साथ कैंटीन में प्रवेश कर गये।
   कैंटीन में काम करने वाला लड़का झाड़न अपने कंधे पर लटकाए उन तक चला आया…-‘ फर्स्ट ईयर के लगते हो आप लोग।”
  झनक ने उसे घूर कर देखा…-” हां तो!”
“तो यह कि अगर सीनियर्स ने देख लिया कि फर्स्ट ईयर में वेलकम पार्टी मिले बिना आप लोग कैंटीन चले आए हो तो…?”
“तो क्या बे? हम लोगों को सिखा रहा है!” अबकी बार राहुल उलझ पड़ा।
“मैं क्या सिखाऊंगा? आप लोगों को रात में वह सामने पीपल पर लटकी उल्टी चुड़ैल सब कुछ सिखा देगी।”
“अरे गुरु घंटाल! यह लोग खुद से नहीं आए मैं इन लोगों को लेकर आया हूं! और मैं फिस्थ सेमेस्टर में हूं यानी कि सीनियर बन चुका हूं यूनिवर्सिटी का । और यूनिवर्सिटी के हर कैंटीन में हमें जाना अलाउड है, आई बात समझ में।”

अजीब सा मुहँ बनाकर उनके टेबल पर झाड़न मार कर वह लड़का जाने लग गया….-” अबे जाते-जाते ऑर्डर तो ले जा।”
“क्या लोगे आप लोग?” उसने एक नजर सब को घूर कर फिर पूछा….
” तेरे यहां का सबसे स्वादिष्ट व्यंजन क्या है ?”
“इस वक्त सिर्फ मैगी और सैंडविच मिलेगा।”
“और पीने के लिए ?”
   अभिमन्यु ने मुस्कुराते हुए पूछा…
” आप जो पीते हो वो कतई नही मिलेगा।
उस लड़के ने एक नज़रअभिमन्यु को देखा और अपनी ही कही बात संभाल ली…-” स्ट्रौबरी शेक।”
अभिमन्यु का मुंह बन गया उसने कहा …-“इन चारों के लिए वही ले आ।”
“अब बोलो? कौन सी  मेडिकल इमरजेंसी के बारे में पूछना था तुम्हें? झनक के सवाल पर अभिमन्यु मुस्कुराने लगा।
“अबे ओए टॉम क्रूज दांत बाद में दिखाना पहले फटाफट बता तेरी प्रॉब्लम क्या है ?” अबकी बार राहुल लपका
“वह प्रॉब्लम यह है कि मेरा एक दोस्त है उसकी याददाश्त जरा गुम होने लगी है! सुबह ब्रश किया है कि नहीं उसे कुछ याद नहीं रहता।  कई बार रात में सोता है लेकिन सुबह उठने पर फिर कहता है मैं तो रात भर सोया ही नहीं। नहा कर आता है, और फिर नहाने चला जाता है। खाने का तो पूछो ही मत जितनी बार दे दो हर बार खा जाता है। क्योंकि वह यही भूल चुका होता है कि वह खा चुका है। और तो और कई बार यह भी भूल जाता है कि वह सुसु पॉटी करके आ चुका है। इस प्रॉब्लम का इस समस्या का कोई समाधान है आप लोगों के पास डॉक्टर?”
“अबे यार कौन है यह नमूना? “
अभिमन्यु ने अधीर की तरफ इशारा कर दिया अधीर ने उसे घूर कर देखा और अपनी जगह से खड़ा हो गया…
” शरमा गया बेचारा। क्या है ना ऐसी समस्या है कि बाहर किसी से डिस्कस नहीं कर सकते, आप लोगों को देखकर लगा जैसे दिल से आपसे रिश्ता है। इसीलिए आपसे यह तकलीफ कह गया।”

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    अभिमन्यु अपनी बात कहते हुए रंगोली को देखता रहा। रंगोली ने घबराकर पलके नीचे कर ली। वह झनक का हाथ इतनी जोर से पकड़ी हुई थी, कि अब झनक को हाथ में दर्द होने लगा था। झनक अपनी जगह से खड़ी हो गई…-” चल रंगोली अब हम वापस जाते हैं हॉस्टल के लिए लेट हो रहे हैं।’
   वह दोनों वहां से निकलने को ही थी कि चार पांच सीनियर लड़कों की टोली उनका रास्ता रोक खड़ी हो गयी…
” फर्स्ट ईयर? “उनमें से एक ने कड़क कर पूछा।
“यस सर!” मिमियाती सी आवाज़ में राहुल ने जवाब दिया
” वेलकम पार्टी के पहले कैंटीन जूनीज़ के लिए अलाउड नही है। तुम लोगो को मालूम नही था।”
” वी आर सो सॉरी सर। हमें वाकई मालूम नही था। “
” अच्छा बेटा! और फर्स्ट मन्थ में ही तितलियों को लेकर कैंटीन घूम रहें हो। “
  रंगोली के लिए तितली सम्बोधन सुन अभिमन्यु का खून खौल उठा…-“माइंड योर लैंग्वेज, व्हाटएवर इस योर नेम? “
” तू कौन है बे? बीच में बोलने वाला? मेडिको तो नही है!”
” मेकेनिकल इंजीनियरिंग थर्ड ईयर का स्टूडेंट हूँ,नाम अभिमन्यु है। “
” तो बेटा अभिमन्यु तेरे गुर्दो में दर्द क्यों हो रहा जब हम अपने बच्चों को डांट रहे। “
” डाँटो लेकिन तमीज से। अगर गर्ल्स के लिए कोई बदतमीजी करोगे तो मैं सहन नही करूँगा। “
” क्यों बे तेरी सेटिंग है क्या ये। ” उसने रंगोली की तरफ इशारा किया..
” हां है। और आज के बाद इसे परेशान किया तो नाम याद रख लेना अभिमन्यु से बुरा कोई नही होगा।”
  अभिमन्यु उसे धमका कर निकल गया,अधीर भी उसके पीछे गिरता पड़ता भाग गया।
   इतनी सारी बहस के बीच पीछे खड़े सीनियर्स के इशारे पर वो सारे जूनियर्स भी वहाँ से खिसक लिए।
” वेलकम बेटा अभिमन्यु! मेडिकल के चक्रव्यूह में तुम्हारा स्वागत है। जानते नही हो तुम, तुम्हारा पाला ऋषि खुराना से पड़ा है।”
   खून का घूंट पीकर ऋषि खुराना भी अपनी गैंग के साथ निकल गया।

   वहीं पीछे एक सबसे किनारे की टेबल पर गौरी बैठी अपनी नोटबुक में कुछ लिख रही थी।
  उसकी एकमात्र खास सहेली प्रिया किसी काम से स्टाफ रूम गयी थी। उसी का इंतज़ार करती गौरी अपनी नोटबुक खोली बैठी थी कि तभी विधायक नारायण दत्त का लड़का वेदांत वहाँ अपनी टोली के साथ चला आया।
   यही वो लड़का था जिसके इधर उधर तफरीह करने से परेशान सीपी सर अभिमन्यु और बाकियों को लिए निरमा से मिलने गए थे।
   कैंटीन में सारे टेबल भरे थे। गौरी के सामने तीन कुर्सियां खाली पड़ी देख वेदांत ने एक कुर्सी पकड़ कर पीछे खींची और बैठने को था कि मृत्युंजय आकर उस कुर्सी पर बैठ गया।
    मृत्युंजय ने वेदांत को देख उसे थैंक्स बोला और गौरी की तरफ देखने लगा।
  गौरी वेदांत के व्यवहार को देखते हुए अचरज में थी कि मृत्युंजय आ गया और उसे देख गौरी के चेहरे पर सुकून लौट आया।
   उन दोनों को एक दूसरे को देखते देख वेदांत वहाँ से हट गया कि तभी उसके एक चेले ने उसे आवाज़ लगा दी…-” गुरु यहाँ टेबल खाली है। आ जाओ।”
   एक नज़र गौरी को घूर कर वेदांत आगे बढ़ गया…

“, थैंक यू सर। आप हमेशा मेरी परेशानी में मेरा साथ देने खड़े रहते हैं।”
” इट्स माय प्लेजर गौरी। और बताओ कैसी हो तुम?”
“ठीक हूँ । अभी एक हफ्ते से मेडिसिन बंद की है। और मुझे नींद भी सही या रही है।”
” इट्स गुड! लेकिन एकदम से विड्रॉ नही करेंगे। धीरे धीरे ही मेडिसिन छोड़ना।”

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” जी सर। “
” कॉफी लोगी? “
गौरी ने हाँ में सिर हिला दिया…
दोनो साथ बैठे कॉफी पीते इधर उधर की बातें करते रहे।
     जय के साथ होने पर गौरी के चेहरे पर काफी समय बाद मुस्काने लौटने लगीं थीं…..

क्रमशः

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aparna…

जीवनसाथी -119

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  जीवनसाथी – 119

    
     सगाई निपट चुकी थी सभी लोग इधर-उधर घूमते हुए आपस में बातें करते खाते-पीते मसरूफ थे, और समर और पिया बाकी लोगों से अलग एक दूसरे में खोए हुए एक किनारे बैठे थे।

“अब बताइए डॉक्टर साहिबा! यह किस का आईडिया था?”
“अब यह भी आपको बताना पड़ेगा! अब भी आप समझ नहीं पाए कि यह सारा किस का आईडिया हो सकता है?”
“रानी साहिबा का!”
“जी हां! बिल्कुल! असल में रानी साहिबा अपने रूटीन चेकअप के लिए जिस दिन मेरी ओपीडी में आई, उसी वक्त मेरी मम्मा मुझे सरप्राइस देने मौसी और बाकी रिश्तेदारों के साथ सीधे अस्पताल में ही धमक पड़ी! मम्मी ने अनजाने ही रानी साहेब के सामने मेरी सगाई की बात बोल दी। वह सुनते ही रानी साहब का दिमाग ठनका, और उन्होंने मुझे सगाई की बधाई दे दी । लेकिन जाते-जाते यह भी बता गयीं कि तुम इस शहर में नहीं हो। बल्कि राजा साहब का केस लड़ने दून गए हुए हो । बस उस एक वाक्य से ही मेरी सारी गलतफहमी दूर हो गई । अब आगे क्या करूं क्या ना करूं यही सोच रही थी। क्योंकि मैं खुद ही अपने बनाए जाल में फंस चुकी थी। लड़का और उसके घर वाले पहले ही यहां मौजूद थे। सगाई से बचने का जब कोई उपाय नहीं दिखा तो मैंने खुद उस लड़के से मिलकर उसे सारी सच्चाई बता दी एंड रेस्ट इज हिस्ट्री।”
“मुझे लगा ही था कि यह सब रानी साहब का ही कारनामा है। “
“वह तो भला हो रानी साहेब का। जुग जुग जिए वो। उनके कारण कम से कम तुमने इजहार तो किया वरना मैं वाकई सगाई करके चली जाती और तुम हाथ मलते रह जाते। “
“ओ मैडम! ऐसा भी नहीं है , लड़कियों की कोई कमी नहीं है हमारे लिए। “
“मालूम है मालूम है! अच्छे से जानती हूं।”
दोनों एक दूसरे से बातें करते एक दूसरे की बाहें थामे भवन के बाहर बगीचे में टहलते हुए जरा दूर तक निकल आए। दोनों आगे बढ़ते जा रहे थे कि सामने से एक गाड़ी आकर अचानक रुकी। गाड़ी का दरवाजा खुला और उसमें से रेवन बाहर निकल आई।

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      रेवन ने समर को देखा और समर ने रेवन को।
  मुस्कुराती  रेवन समर की ओर आगे बढ़ने लगी उसे आगे बढ़ते देख मुस्कुराते हुए समर भी आगे बढ़ गया और अनजाने ही उसके हाथों  में थमा पिया का हाथ उससे छूट गया।
   रेवन आगे बढ़ कर उसके गले से लग गयी…- हाय हॉटी हॉउ आर यू?”
   इतने दिनों बाद अचानक रेवन को सामने देख समर की भी खुशी का ठिकाना नहीं था। दोनों एक दूसरे का हालचाल लेने में पास खड़ी पिया को कुछ देर के लिए भूल कर ही रह गए। कुछ देर बाद पिया खुद उन दोनों के पास चली आई। समर ने पिया को देखते ही रेवन से मिलवाया।
  “ओह्ह !सो शी इज योर फियांसी?”
  समर ने हां में  सिर हिला कर पिया के कंधों पर हाथ रख कर उसे अपने से सटा लिया। रेवन और समर एक बार फिर अपनी बातों में डूब गए और पिया वहां खड़ी होने के बावजूद उनके बीच से गायब सी हो गई।

*****

     रेवन का थीसिस का काम पूरा हो चुका था और उसी के फाइनल सबमिशन के लिए वह यहां वापस आई थी।
   उसने आने से पहले समर को अपने आने के बारे में बताया था और समर ने ही उसे अपने शहर बुला लिया था।
   लेकिन समर को खुद अपनी सगाई के बारे में मालूम नहीं था । जब वो वहां सगाई के बाद पिया के साथ बैठा था तभी रेवन का मैसेज आया कि वह इस वक्त कहां है? और समर ने उस बात को अधिक गंभीरता से लिए बिना सीधे रेवन को अपना पता ठिकाना भेज दिया और रेवन उसी वक्त वहाँ उससे मिलने पहुंच गई।
   समर के लिए ये एक सामान्य सी बात थी लेकिन पिया के लिए ये उतनी भी सामान्य बात नही रह गयी थी।

******

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   दिन बीतते वक्त नही लगता। देखते ही देखते राजा और बाँसुरी के राजकुमार को पैदा हुए बारह दिन बीत भी गए।
    बारहवें दिन पर महल की प्रथानुसार बच्चे को सूर्यदर्शन करवा कर नाम रखा गया…
  नाम क्या रखना है इसी सिलसिले में पिछले बारह दिन से बाँसुरी और राजा की बातचीत चल रही थी। बाँसुरी को कोई नाम पसन्द ही नही आ रहा था।  और राजा बाँसुरी की तरह फैंसी नाम सोच ही नही पा रहा था। आखिर पूजा वाले दिन बच्चे को पूजा सम्पन्न करने के बाद घर से बाहर ले जाया गया और उसके बड़े पिता यानी युवराज ने उसे गोद में लेकर उसके कान में धीरे से रूपा द्वारा उसके लिए चुना गया नाम उसे बता दिया ….” राजकुमार शौर्य सिंह”! क्यों कुमार ठीक है ना?”
राजा मुस्कुरा उठा…-“जी भैया , मैं इसमें कुछ और जोड़ना चाहता हूँ। इसका नाम होगा ‘शौर्य प्रताप सिंह’
क्यों प्रेम ठीक है? “
   प्रेम ने मुस्कुरा कर अपने दोनों हाथ जोड़ दिए। पिंकी ने आगे बढ़ कर अपने प्यारे से भतीजे को गोद में ले लिया…-” बिल्कुल अपने पापा जैसे ही बनना मेरे लाडेसर! तुम्हें तुम्हारी फुई की उम्र लग जाये। ” पास रखे कजरौटा से काजल निकाल कर उसकी आँखों में आंज पिंकी ने बुआ का नेग पूरा किया और बांसुरी ने रूपा के हाथ से लेकर एक नवलखा हार पिंकी के गले में डाल दिया।
   बच्चे को आशीर्वाद देने सभी उस पर अक्षत बरसाने लगे।
      शाम में बच्चे के आने की खुशी में लंबा चौड़ा कार्यक्रम था। बाकी लोग उन्हीं तैयारियों में लगे थे और घर की बुज़ुर्ग महिलाएं सोहर गाने वालों को बुलवाए शगुन के गीत सुन रही थीं।
         रूपा और जया बाकी सारी तैयारियों में लगीं थीं, पिंकी ने बांसुरी को उसके कमरे में भेज दिया।
        बाँसुरी की रात से नींद पूरी नही हुई थी। रात भर उसका नन्हा उसे जगाए रखता था। और सुबह से पूजा पाठ के कारण भी उसे आराम नही मिल पाया था। वैसे तो राजमहल में नौकरों की कमी नही थी, लेकिन उसकी ताई ने उसे छोटे बच्चे को हर किसी के हाथ में न सौंपने की ताकीद कर रखी थी।  फिर उसका खुद का भी माँ का दिल था,ऐसे कैसे किसी के भी पास छोड़ कर आराम कर लेती , आज बच्चा कुछ ज्यादा ही  रो भी रहा था।
   उसे गोद में लिए इधर से उधर चलती वो कुछ गाकर उसे चुप कराने की कोशिश में थी कि राजा भी कमरे में चला आया।
   राजा की तरफ देखे बिना ही वो राजकुंवर को चुप कराती रही…-“क्या बात है हुकुम? कुछ नाराज़ हो क्या? “
  राजा की बात सुनते ही उसकी आँखों में आँसू आ गए…-“अरे ये क्या? इसमें  रोने की क्या बात है? हुआ क्या बताओ तो सही।”


  बाँसुरी क्या बताती? जब उसे कुछ खुद समझ आ पाता तब तो वो राजा से कुछ कहती। सब कुछ तो अच्छा ही हो रहा था बिल्कुल किसी सपने के पूरे होने जैसा…
   मनभावन पति, खुशहाल परिवार, स्वस्थ और सुंदर बच्चा! किसी भी औरत के जीवन में इस से इतर और क्या चाहिए। यहाँ तक कि वो तो खुद अपने पैरों पर भी खड़ी थी। एक राजपरिवार की बहू होते हुए भी उसका खुद का आत्मसम्मान था और अपने पूरे वजूद के साथ वो वहाँ की जिलाधीश थी। बावजूद उसके आंसूओं की धार रुकने का नाम नही ले रही थी कि राजा ने तुरंत जाकर उसकी गोद से बच्चे को अपनी गोद में लिया और बाँसुरी को पानी का गिलास पकड़ा दिया।
   पानी पीकर उसे थोड़ी राहत मिली तो वो हाथ मुहँ धोने चली गयी।
   उसी बात का फायदा उठा कर राजा ने तुरंत पिया को फोन लगा लिया।
      बांसुरी से जुड़ी सारी बातें उसे बता कर राजा परेशान हो उठा…-“,वो कुछ कह भी नही रही बस रोये जा रही है पिया। क्या करूं?”
” आपको बिल्कुल भी घबराने की ज़रूरत नही है राजा साहेब! ऐसा होता है। इसे पोस्टपार्टम डिप्रेशन कहा जाता है।
  ये लगभग अस्सी से नब्बे फीसदी औरतों में होता है। असल में इस वक्त शरीर में हार्मोनल लेवल इतना ऊपर नीचे होता है कि औरतें बेहद भावुक हो जातीं हैं। शरीर में इतने बदलाव के साथ ही न ठीक से खाना हो पाता है और न नींद इसलिए बहुत सी औरतो में  चिड़चिड़ापन भी आ जाता है। पर ये कोई बहुत घबराने की बात नही है। ये समस्या क्षणिक होती है। इसे मूड स्विंग भी कहा जाता है। पल में नाराज़ पल में खुश।
   अभी देखिएगा वो कुछ थोड़ा बहुत खा पी लेंगी तो बिल्कुल ठीक महसूस करने लगेंगी। हो सकता है उनकी नींद पूरी न हुई हो, तो अगर दस मिनट की भी झपकी लेंगी तो फ्रेश लगेगा उन्हें । इस वक्त उन्हें आपके प्यार और सपोर्ट की बहुत जरूरत है। हो सकता है वो आप पर नाराज़ भी हो बैठें। पर आपको थोड़ा धैर्य से काम लेना पड़ेगा।”
  दरवाजे पर खटका होते ही राजा ने” ठीक है मैं सब समझ गया!” कह कर फोन रख दिया। बांसुरी के बाहर आते ही उसने बांसुरी को अपने पास बुला लिया।
बांसुरी बैठना नहीं चाह रही थी। उसे हड़बड़ी थी, ढेर सारे काम निपटाने थे। लेकिन राजा ने उसे अपने पास बैठा कर उसका सर अपनी गोद में रख लिया। बच्चे को वह पहले ही बिस्तर पर लेटा चुका था।
” क्या कहना चाह रहे हैं आप ? अभी मैं बिल्कुल नहीं बैठूंगी! वक्त नहीं है शाम की पार्टी के लिए तैयार भी होना है।”
“मेरी हुकुम को तैयार होने की कोई खास जरूरत नहीं है ! सिर्फ 10 मिनट में तुम पार्टी के लिए रेडी हो जाऊंगी मेरे पास आओ तो सही।”
बड़े इसरार से राजा ने उसे अपने पास बैठा लिया और धीरे से उसके सिर को पकड़ कर अपनी गोद में रख लिया। उसके बालों में हाथ फिराते वो इधर उधर की बातें करता रहा। मुश्किल से दो मिनट में बांसुरी मीठी नींद में खो गई।
  राजा उसे देख कर मुस्कुरा उठा।
यह औरतें भी ना, इन्हें मालूम होता है कि इन्हें क्या समस्या है। और उसका समाधान क्या है। लेकिन समस्या का समाधान करने की जगह यह सिर्फ नाराजगी व्यक्त करतीं हैं।
  बांसुरी इतनी मीठी नींद में सो रही थी कि उसका सिर उठाकर नीचे रखने का राजा को मन नहीं किया।
उसने वहीं बैठे बैठे समर को फोन लगा लिया और अगले हफ्ते होने वाले चुनावों की तैयारियों का जायजा लेने लगा।
    घंटे भर बाद बांसुरी की आंख खुली, और वो एकदम चौक कर हड़बड़ा कर उठ बैठी…-” अरे आपने मुझे जगाया क्यों नहीं? मैं सो क्यों गई ? मुझे तैयार होना था।”
“जानबूझकर नहीं जगाया! तुम्हारी नींद ही नहीं पूरी हो रही है। तुम्हें भी तो जरूरत है, अपना ख्याल रखने की। ऐसे ही चलता रहा तो बीमार पड़ जाओगी।”
“जी !  दुनिया की हर मां अपने बच्चे के लिए अपनी नींदे गंवाती ही है, लेकिन कोई बीमार नहीं पड़ती।”
“सही कह रही हो तुम । इसीलिए तो मां का दर्जा सबसे ऊपर है। अब वह सब छोड़ो, अब बातों में वक्त जाया मत करो। हाथ मुहँ धो कर फटाफट तैयार हो जाओ। तुम्हारी ब्यूटीशियन दो बार आकर दरवाजे से वापस लौट चुकी है।”
“मुझे बहुत देर हो जाएगी रूपा भाभी जया भाभी सब लोग तैयार हो गए होंगे।”
“अभी कोई भी तैयार नहीं हुआ! सब हो रहे हैं ।और तुम तो रानी साहेब हो। तुम्हें इतना हड़बड़ाने की कोई जरूरत नहीं ।कार्यक्रम आठ  से है, हम आराम से पहुंच जाएंगे ।”
“आपके पैरों में दर्द नहीं हुआ, मैं लगभग घन्टे भर से आपके पैरों में सर रख के सो रही थी।”
“तुम्हारे पास रहने से कभी मुझे दर्द हो सकता है भला?”
      राजा मुस्कुराकर अपने काम से बाहर निकल गया। उसके जाते ही बांसुरी की ब्यूटीशियन अंदर आ गई। बांसुरी मुस्कुराते हुए पार्टी के लिए तैयार होने लगी।

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   राज महल का कार्यक्रम शुरु हो चुका था । नए राजकुंवर की अगुवाई में सारा महल रोशनी से जगमग आ रहा था ढेर सारे अतिथियों के साथ राज महल के लोग मिलते जुलते सबकी बधाइयां और आशीर्वाद ग्रहण करते खुश नजर आ रहे थे।
   बांसुरी के चेहरे की चमक आज कुछ अलग ही कहानी कह रही थी। राजा हमेशा की तरह भले ही बांसुरी से दूर खड़ा था और दूसरों से बातचीत में लगा था लेकिन बीच-बीच में उसका ध्यान बांसुरी पर चला ही जाता था । वह इधर उधर से किसी भी तरीके से समय निकालकर बांसुरी के पास पहुंचकर उसका हालचाल ले लिया करता। कभी किसी वेटर के हाथों उसके लिए कुछ खाने की चीज भेजता या फिर कभी कोई जूस भेज देता। बांसुरी दूर से ही उसे देखकर मीठी सी झिड़की से उसे नवाज़ जाती।
     दूर बैठी पिया बांसुरी और राजा को देख-देख कर मुस्कुरा रही थी। तभी समर हाथ में दो गिलास थामे वहां चला आया। एक गिलास पिया के सामने रखते हुए वहीं उसके पास कुर्सी खींच कर बैठ गया…-” क्या बात है बहुत मुस्कुरा रही हो?”
“आपकी राजा साहेब और रानी बांसुरी की जोड़ी एकदम परफेक्ट है। वो कहते हैं ना मेड फॉर ईच अदर वही कपल हैं। !”
“कह तो सही रही हो! वैसे हमारा भी ऐसा ही कुछ कपल बनने वाला है।”
“वह तो वक्त ही बताएगा! वैसे आप राजा साहिब जितने सीधे सच्चे नहीं लगते मुझे।”
“क्यों भाई अब मुझ में क्या खराबी दिख गई तुम्हें? देखो मेरा जो भी पास्ट था, मैंने सब कुछ पूरी सच्चाई से तुम्हारे सामने रख दिया था उसके बाद तुमने निर्णय लिया है।”
“हां ! तो मैं कहां कुछ कह रही हूं आपके पास्ट के लिए। बल्कि मैं ऐसा कहने वाली कोई होती भी नहीं! क्योंकि मेरा खुद का भी एक खूबसूरत पास्ट था।”

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    समर की ड्रिंक उसके हाथों से छलकती जरा सी नीचे गिर गई ।वह चौक कर पिया की तरफ देखने लगा   ” क्या कहा तुमने?”
“यही कि मेरा भी एक खूबसूरत सा पास्ट था।”
“कौन था वह? क्या करता था? कहां मिला था तुम्हे?”
“बताया तो था एक बार।”
“नहीं! मुझे तो कुछ याद नहीं”।
“मेरे कॉलेज में ही था। डॉक्टर था। मुझसे सीनियर था। कॉलेज में ही हम पहली बार मिले, दोस्ती हुई और दोस्ती प्यार में बदल गई। जब मैं फाइनल ईयर में पहुंची तब वह हॉस्टल छोड़कर एमडी की तैयारी के लिए रूम लेकर रहने लगा तब मैं भी उसके साथ ही शिफ्ट हो गई थी।”
“व्हाट डु यू मीन तुम उसके साथ लिव इन थीं।”
“हां! अब  एक ही फ्लैट में रहते थे तो लिव इन ही कहा जाएगा ना!”
“मतलब कैसे रहते थे? मेरा मतलब कैसे रिलेशन थे तुम दोनों के?”

     पिया के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई वह मुस्कुराते हुए अपनी कहानी आगे बताने लगी…..
   “वैसे ही रिलेशन थी जैसे एक प्रेमी और प्रेमिका के बीच होते हैं! एक नॉर्मल कपल के बीच जो रिलेशन होता है वही कपल जो जल्दी शादी करनेवाला हो।”
“तुम दोनों शादी करने की सोच रहे थे।”
“सोच रहे थे लेकिन कर नहीं पाए!”
“क्यों जब इतना आगे बढ़ गए थे तो शादी कर लेनी थी।”
“वह बहुत एंबिशियस था! उसे एम एस करने के लिए यूएस जाना था। और उसे यूएस के सबसे बड़े बोस्टन हॉस्पिटल  में सर्जन बनना था। वह चाहता था मैं भी उसके साथ चलूं।”
“तो चली जाना था ना।”
“ऐसे कैसे चली जाती? मेरे मम्मी पापा की तो मैं अकेली बेटी हूं। उन्हें छोड़कर उनसे इतनी दूर अमेरिका कैसे चली जाती? और फिर दूसरी बात अमेरिका चली जाती तो तुम से कैसे मिलती?”

समर मुंह बनाकर दूसरी ओर देखने लगा पिया ने छुप कर अपनी हंसी छुपा ली।

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“उसके बाद उसने बहुत कोशिश की कि मैं मान जाऊं, लेकिन मैं अपना देश अपने पेरेंट्स को छोड़ने के लिए बिलकुल राजी नहीं थी, और उसने मुझे छोड़ दिया। वह मुझे छोड़ कर अमेरिका चला गया। सच कहूं तो उस वक्त बहुत टूट गई थी। मुझे लगा मैं फाइनल ईयर पास भी कर पाऊंगी या नहीं। लेकिन फिर मेरा एक दोस्त मेरा क्लासमेट था, उसने पढ़ाई में मेरी बहुत मदद की और सच कहूं तो फाइनल ईयर मैं उसी की मदद के कारण पास कर पाई।”
“अब ये दूसरा कौन है यार?”
“अरे नहीं उसके साथ वैसा कोई रिलेशन नहीं था! यह बहुत प्यारा दोस्त था अक्सर मेरे कमरे में आया करता था मुझे पढ़ाने।”
“फिर वहीं रुक तो नहीं जाता था।”
“यार तुम तो जादूगर निकले! बिल्कुल रुक ही जाता था। ऑब्विसली  हमारी पढ़ाई काफी टफ  होती है। कि हम रात रात भर पढ़ते हैं तो जब रात में चार चार बजे तक मेरे साथ पढ़ता था तो  उतनी सुबह उठकर घर कहां जाता मेरे कमरे में ही सो जाया करता था।”

“हद है  यार पिया! तुम्हारी क्लास में कोई लड़की नहीं थी जो तुम्हें पढ़ा सके! तुम्हारी पढ़ाई में मदद कर सके?”
“बहुत सारी थी। लेकिन लड़कियों में जलन की भावना बहुत होती है ना। जानते तो हो मैं वैसे भी शुरू से टॉपर टाइप की लड़की थी। तो सारी लड़कियां तो बहुत खुश थी इस बात से कि मेरा ब्रेकअप हो गया, और मैं पढ़ाई में मन नहीं लगा पा रही हूं। इसलिए कोई भी मेरी मदद करने क्यों आता भला? बस यही था अरविंद जो मेरी मदद करता रहा।”
“अच्छा तो इसका नाम अरविंद था।”
“हां बहुत पढ़ाया उसने मुझे । एक तरह से कहूं तो
मेरा गार्जियन कम गाइड कम दोस्त कम…”
“बस बस समझ गया! तो अभी कहां है ये तुम्हारा अरविंद?”
“पता नहीं यार बहुत समय से कांटेक्ट में नहीं हूं।”
“क्यों ऐसा क्या हो गया?”
“कुछ नहीं मेरी क्लास का एक दूसरा लड़का था शरभ वह भी अच्छा था। वह एक्चुली मेरे शहर का था। तो जब भी वह घर से आता जाता था तो मेरी मम्मी उसके हाथ से सामान भेज दिया करती थी। बस इसी बात पर अरविंद और शरभ का कुछ पंगा हो गया था।”
तुम्हारी मम्मी शरभ के हाथ से तुम्हारे लिए सामान भेजती थी इस बात पर अरविंद को क्या दिक्कत हो गयी यार?”
“शरभ ने एक बार सामान के साथ एक लव लेटर मुझे दे दिया बस अरविंद को सहन नहीं हुआ।”
“हे भगवान ! तो ये शरभ भी लाइन में था।”
“जब अरविंद ने उसकी खूब पिटाई की तब मुझसे मेरी कुछ सहेलियों ने कहा कि असल में अरविंद भी मुझे पसंद करने लगा था। “

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   समर अब अपना सर पकड़ कर बैठ गया…-” यह कितना घुमा रही हो यार पिया? यह सब पहले क्यों नहीं बताया?”
“क्यों? पहले बता देती तो तुम मुझसे शादी नहीं करते?”

   समर पिया को देखता रहा  और प्रिया जोर जोर से हंसने लगी समर को अचानक सब कुछ समझ में आ गया।

“उल्लू बना रही थी ना मेरा इतनी देर से।”

पिया जोर-जोर से हंसने लगी…-” हां जी बिल्कुल उल्लू ही बना रही थी । मैं बस यही देखना चाहती थी कि लड़के कितने बायस होते हैं न। जब अपनी होने वाली बीवी को अपने प्रेम प्रकरण सुनाते  हैं तो पूरे गर्व से सुनाएंगे। और साथ ही कहेंगे देख लो भाई मैंने तुम्हें सब बता दिया है। क्योंकि वह जानते होते हैं कि सामने वाली लड़की उनसे इतना टूट कर प्यार करती है कि उनके पास्ट को सुनकर भी सब कुछ सह कर भी उन्हें अपना लेगी।
     लेकिन लेकिन जब वही काम हम लड़कियां करती हैं तो तुम लड़कों के तन बदन में आग लग जाती है। तुम्हारे दिमाग में ऊटपटांग ख्याल आने लगते हैं ।यह रिलेशन में थी मतलब जरूर कुछ ना कुछ गड़बड़ होगी और तब तुम हमें एक्सेप्ट करने से पहले सौ बार सोचने लगते हो?
आखिर क्यों इतना सोचना। जब तुम शादी से पहले के अपने रिलेशंस के लिए खुद को माफ कर सकते हो तो अपनी होने वाली बीवी को क्यों नहीं? और अगर तुम्हारी होने वाली बीवी को तुम उसके पास्ट के लिए माफ नहीं कर सकते तो अपने आप को कैसे इतना साफ सुथरा मान लिया मिस्टर मंत्री जी?”
समर ने पिया के सामने कान पकड़ लिये…- मैं हार मानता हूं डॉक्टर साहिबा!! आपके सामने मैं वाकई हार मानता हूं! अरे यार बस मेरी लाइफ में लड़कियां आई और गई। कहीं भी मैं किसी सीरियस रिलेशनशिप में नहीं था। और दूसरी बात दोस्ती से आगे मेरा कोई भी रिलेशनशिप नहीं गया, नॉट इवन विद रेवन।
   तुम चाहो तो खुद रेवन से पूछ लो।”

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“मुझे किसी से नहीं पूछना। तुम पर भरोसा है बहुत भरोसा। आंख मूंदकर तुम्हारी हर बात पर विश्वास करती हूँ।  लेकिन शादी के बंधन में बंधने से पहले मैं बस एक बार अपने मन की यह बात तुमसे कहना चाहती थी जो आज मैंने कह दी। मैं प्यार तो तुमसे बहुत करती हूं समर बहुत ज्यादा लेकिन हमेशा तुम मेरे लिए मेरे पति ही रहोगे मैं कभी भी भगवान का दर्जा तुम्हें नहीं दे पाऊंगी। एक और बात मैं कभी भी अपने माता-पिता को तुम्हारे लिए नहीं छोडूंगी मेरे लिए हमेशा उनकी जगह सबसे ऊपर है ।जब कभी भी उन्हें मेरी जरूरत होगी मैं उनके एक फोन कॉल पर दौड़ी चली जाऊंगी उस वक्त प्लीज मुझे कोई भी दुहाई देकर रोकने की कोशिश मत करना। और तीसरी और सबसे बड़ी बात जितना प्यार और विश्वास मैं तुमसे करती हूं उतने ही प्यार और विश्वास की तुम से भी उम्मीद करती हूं। आज हालांकि एक झलक मैंने देख ली कि कहीं ना कहीं तुम्हारे अंदर भी लड़कों वाला वह ईगो छिपा हुआ है कि मेरी वाइफ….
      पर मैं समझती हूं ऐसा सभी के साथ होता है। और इसीलिए कह रही हूं कि मुझ पर अपना विश्वास कभी मत खोना । शादी का बंधन प्यार से भी ज्यादा विश्वास पर टिका होता है और अगर दोनों में से किसी भी एक के मन में विश्वास की वो डोर  टूट गई तो उसे जोड़ना बहुत मुश्किल होता है।

“विश्वास रखिये डॉक्टर साहिबा! यह मंत्री जी आपके विश्वास को जिंदगी भर टूटने नहीं देंगे।”
बातें करते हुए दोनों महल के भवन से बाहर बगीचे की तरफ चले आए थे। वही बनी एक झील के किनारे बैठे दोनों अपने भविष्य के प्यारे सपने बुनते रहे अगले दिन से समर को होने वाले चुनावों की रणभूमि में जो कूदना था।

****

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     चुनाव का एक हफ्ता देखते देखते ही बीत गया राजा समर युवराज विराट आदित्य प्रेम सभी इन कामों में ऐसे व्यस्त हो गए थे कि घर परिवार की तरफ किसी का ध्यान ही नही रहा।
    अपने समय पर चुनाव भी हो गए। सत्तारूढ़ पार्टी और विपक्ष दोनों ने ही वह सारे तामझाम किए जिनसे वोटर्स को अपनी तरफ खींचा जा सके ।
   कोई मुफ्त की दारू बांट रहा था तो कोई मुफ्त के कंबल लेकिन सभी किसी न किसी तरह का प्रलोभन ही दे रहे थे एकमात्र राजा की पार्टी ही ऐसी थी जो इस बार पूरी इमानदारी से लड़ रही थी।
     बेईमानी की इंतहा यह थी कि किसी किसी बूथ पर पार्टी के लोग खुद बैठकर सामने से लोगों को तोहफे देते हुए अपनी पार्टी के प्रत्याशी को वोट देने की गुहार कर रहे थे लेकिन लोग भी अब इतने नासमझ और अनपढ़ नहीं रह गए थे खासकर राजा की रियासत के लोग।

    चुनाव समाप्त होते ही वोटों की गिनती प्रारंभ हो चुकी थी।
    वोटों की गिनती में कोई गड़बड़ ना हो सके इसलिए बाहर राज्य से भी लोगों को बुलाया गया था रुझान आने शुरू हो गए थे और रुझानों के मद्देनजर राजा की पार्टी के प्रत्याशी जिस जगह से भी खड़े हुए थे वहां उन्हीं की जीत दिखाई देने लगी थी हालांकि अभी पूरा परिणाम आने में समय था लेकिन फिर भी राजा के पास पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ के ही फोन बजने लगे थे।
  इस सब के बावजूद समर मन ही मन अब भी शंकित था। उसे जब तक परिणाम सामने न आ जाये किसी पर भी विश्वास नही था कि उसके पास नेता जी का फोन चला आया…
   उनका फ़ोन रखते ही उसके माथे पर चिंता की लकीरें दिखने लगीं थीं…

क्रमशः

aparna …

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  दिल से….

  न हो पाया भई, मैंने कोशिश बहुत करी की ये अंतिम पार्ट लिख लूँ पर नही हो पाया।
अब तो मुझे लग रहा ये कहानी नही बल्कि पीपल वाली चुड़ैल है जो मुझसे चिपक गयी है और मुझे छोड़ कर जाने को तैयार ही नही।
  कहती है तू भले और कुछ भी लिख ले पर ये कहानी तो तुझे आजीवन लिखनी पड़ेगी।
  
     जब तक तेरी कहानी चलेगी तब तक तेरी सांस चलेगी टाइप्स!!!

  हे भगवान ! ये तो किसी हॉरर कहानी का प्लॉट सा बन गया है।
  लिख लूँ क्या एक हॉरर भी।
कमेंट में ज़रूर बताना आप लोग। और आजकल प्रतिलिपी पर आप लोगों के कमेंट्स छोटे होने लगें हैं। मैंने तो पहले भी कहा था कि मुझे आप लोगों का नाइस, वेरी स्वीट, सुपर्ब स्टोरी भी चल जाता है लेक़िन आप ही लोगों ने समीक्षा में बड़ी बड़ी पोथियां लिख कर शेरनी के मुहँ में खून लगा दिया, अब आप लोगों की छोटी समीक्षा दिल में ठक सी लगती है कि क्या मैं अच्छा नही लिख रही कि मुझे इतने छोटे कमेंट मिल रहे।
   तो दोस्तों पढ़ने के साथ लिखते भी रहें।
मतलब मुझे पढ़ें और मेरी रचना पर कमेंट लिखें।।
   जस्ट जोकिंग। आप सभी को पढ़ने के लिए स्वतंत्र हैं पर ….
…. बस ज्यादा खुल कर मैं नही लिखती….
… कारण आप सब को पता ही है…
         … संस्कार बहुत है ना मुझमें❤️

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aparna….
    

शादी.कॉम-20

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           अगर लैला मजनूँ,हीर राँझा के घर वाले एक बार में ही उनके प्यार को कबूल लेते तो शायद ही ऐसी सफल प्रेम कहानियाँ रची जातीं।।

   अम्मा की ना ने दोनो के मन में छिपा रहा सहा संकोच भी समाप्त कर दिया,दोनो को ही समझ आ गया कि एक दूसरे के बिना जीना व्यर्थ है,और अब वो दोनों सिर्फ दोस्त से कहीं आगे निकल चुके हैं ।।

  ” राजा!! ऐसे क्यों देख रहे ,जैसे पहली बार देखा हो।।”

बांसुरी की बात पर राजा मुस्कुराने लगा।।।

” सुनो !! हम तुम्हें छूना चाहते हैं,तुम्हें छू कर तसल्ली करनी है कि हम सपना नही देख रहे,राजा बाबू सच में हमारे घर के सामने खड़े हैं ।

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” अच्छा!! सच में ??” और मुस्कुराते हुए राजा ने बांसुरी को अपनी तरफ खींच कर गले से लगा लिया।।

   दोनों एक दूसरे के गले से लगे एक दूसरे में डूबे खड़े थे कि __

   ” बांसुरी !!इत्ती रात गये यहां का कर रही हो।”

  दोनो इस आवाज़ को सुन झटके से अलग हो गये

  ” पापा आप!! ये ….वो राजा हैं,हमारे जिम इंस्ट्रक्टर,जिन्हें हम पढाते भी थे।” राजा ने लपक के बांसुरी के पिता के पैर छूने चाहे,पर उन्होनें हाथ बढ़ा कर उसे रोक दिया__” हाँ ठीक है ठीक है,तुम अभी घर चलो ।”

” हां पापा चल रहे!! ” बांसुरी ने आंखों ही में राजा से बिदा ली और अपने पापा के पीछे सर झुकाये घर चली गयी।।

  राजा अपने बालों पे हाथ फेरता रह गया,अपनी बुलेट वापस  उसने घर की तरफ मोड़ ली __

  पूरे रास्ते मुस्कुराते हुए राजा घर पहुँचा ,हालांकि बांसुरी के पिता ने उन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया था,पर इस बात से डरने की जगह उसे एक सुखद एहसास था कि बताना तो आखिर सभी को है,चाहे किसी ढंग से पता चला पर खुशी की बात है कि बंसी के घर पे भी पता तो चल ही गया।।

बांसुरी के पिता पढ़े लिखे सरकारी मुलाजिम थे, इसीसे उन्हें कितनी भी गम्भीर विषय से जुड़ी बात हो उसपे अनावश्यक हाय तौबा मचाना पसंद नही था,साधारण तबीयत के साधारण पुरूष थे।।

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       बांसुरी से ना उन्होनें कुछ पूछा ना बांसुरी ने ही आगे बढ़ कर कोई कैफियत दी,पर अपने धीर गम्भीर पिता की आवाज़ से ही उसने भांप लिया कि उसका यह कार्य पिता को कहीं अन्दर तक कष्ट दे गया है।।

    अगले दिन सुबह और दिनों की तरह बांसुरी जिम नही गयी,उसे घर पे ही इधर उधर निरर्थक डोलते देख उसकी अम्मा से रहा नही गया__

  ” का हुआ?? आज जिम नही जाओगी का बंसी ?”

प्रमिला के सवाल का जवाब बंसी की जगह उसके पिता ने दिया__

” नही! आज के बाद ये कभी जिम नही जायेगी, वर्मा से बात हुई है,कल लड़के वालों को घर बुला लिया है….सोच रहा हूँ अब इसी साल इसके भी हाथ पीले कर दूँ ।”

   बांसुरी ने अपनी माँ को देखा और उन्होनें बांसुरी को,आंखों ही आंखों में दोनो ने एक दूसरे की पीड़ा पढ़ ली।।

  ” हुआ क्या?? कुछ बताएंगे भी!!! ऐसे कैसे तुरंत हाथ पीले कर देंगे।”

   ” देखो प्रमिला,मेरा यही मानना है कि हर काम अपने समय पर हो जाना चाहिये,चाहे विद्या ग्रहण हो या पाणिग्रहण!! बहुत पढ लिख ली बांसुरी,अब इसका भी ब्याह कर दूँ तो मुझे भी चैन मिले।”

   ” मर गयी रे,ये जोड़ गठान का दर्द मुआ मेरे परान लेकर ही जायेगा…..” अपने घुटने हाथों से सहलाती बुआ जी ने घर में प्रवेश किया_” ठीके तो कह रहा है मेरा भाई,अब इत्ता सारा तो पढ़ लिख ली है,कौन सा हमें छोकरी को कलेक्टर कमिस्नर बनाना है,अब निबटो इससे भी,उमर हुई जा रही इसकी भी।”

” परनाम करते हैं जिज्जी!! छोटा मुहँ बड़ी बात हो जायेगी,पर अभी बाईस की तो हुई है और अगले हफ्ते इसका बैंक का पेपर भी है,एक बार चुन ली जाये फिर अपने पैर पे खड़ी हो जायेगी फिर निबटाते रहेंगे ब्याह।।”

” हम तुमसे पूछ नही रहे,तुम्हे बता रहे कल शाम को खाने पे बुला लिया है उन लोगों को,तुम अपना सब तैयारी ठीक-ठाक रखना।”

” जी अच्छी बात है!!” प्रमिला ने एक बार बांसुरी को देखा और रसोई में वापस चली गयी,बांसुरी भी सर झुकाये ऊपर अपने कमरे में चली गयी।।

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   ” सांसों में बड़ी बेकरारी आंखों में कई रतजगे
कभी कही लग जाये दिल तो,कहीं फिर दिल ना लगे
अपना दिल मैं ज़रा थाम लूँ,जादू का मैं इसे नाम दूँ
जादू कर रहा है,असर चुपके चुपके …….”

    
      जिम में चलता गाना असल में राजा भैया के मन में चल रहा था,रह रह के नज़र दरवाजे पे जा कर अटक रही थी……..सब आ रहे थे जा रहे थे पर ना उसे आना था ना वो आई।।

    आखिर इन्तजार की घडियां पहाड़ बनने लगी और राजा ने बांसुरी को फ़ोन लगा दिया, पूरी रिंग बजती रही पर फ़ोन नही उठा,अब कल रात की एक एक बात किसी फिल्म की रील की तरह आंखों के सामने से गुजरने लगी।।।

     और समझ में आ गया कि बांसुरी क्यों नही आयी , उसने फोन क्यों नही उठाया।।राजा की मोटी अकल को आखिर समझ आ ही गया की बांसुरी के पापा को उन दोनों का यूँ मिलना रास नही आया, अजीब बेचैनी से राजा व्याकुल हो उठा,उसने एक बार फिर बांसुरी को फोन लगाया,इस बार थोड़ी देर में ही फ़ोन उठा लिया गया।।

” फोन क्यों नही उठा रही थी बांसुरी??”

” पापा थोड़ा गुस्से में लग रहे राजा,अब हमे जिम आने नही मिलेगा,अगले हफ्ते हमारा पेपर है,पता नही दे पाएँगे या नही?”

   दोनो अभी अपनी बातों में लगे थे कि राजा की अम्मा किसी से बात करती राजा के कमरे तक आ गयी__

” ए राजा!! देखो कौन आया है??आओ बेटा बन्टी, तुम राजा के कमरे में आराम करो हम तुम्हरा सामान ऊपरे भिजाये दे रहे।”

” जी मौसी जी।”



  राजा की मौसी का बेटा बन्टी राजा का ही हमउम्र था और पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली में रह कर नौकरी कर रहा था,वही अचानक बिना किसी पूर्वसूचना के अपना बैग टाँगे राजा के घर टपक पड़ा था।

” तुमसे बाद में बात करते हैं बांसुरी अभी मेहमान आ गये हैं,रख रहे फोन।”

राजा ने आगे बढ़ कर भाई को गले से लगा लिया__

” का हो गुरू!! एकदम दाढ़ी वाढी बढ़ाए बैठे हो, क्या हो गया ??”

” क्या बताऊँ राजा!! ब्रेक अप हो गया यार,दिमाग एकदम खराब हो गया,दिल्ली में मन नही लग रहा था साला,और मम्मी पापा के पास जाता तो शादी शादी रट लगा देते इसिलिए छुट्टी लेके यहाँ आ गया।”

” ब्रेक अप हो गया ,पर काहे,हमारा मतलब कैसे?”

” वो तो मैं बाद में बताऊंगा,पहले तुम बताओ,किससे इतना घुस घुस के बात कर रहे थे,जो मुझे और मासी को देखते ही फोन रख दिया।”

” अरे वो ?? वो कोई नही ,,बस ऐसे ही ,,तुम अपनी कहानी बताओ पहले।”

” अच्छा !! तो हमारी कहानी सुनने के बाद साहब अपनी सुनायेंगे।अबे कुछ नही रखा यार मेरी कहानी में,बस एक लड़की थी ,पसंद आ गयी थी ….

” फिर?”

” फिर क्या??फिर भाई ने प्रपोस कर दिया,और किस्मत खराब थी साला ,उसने भी एक बार में हाँ कह दी।।”

” इसमें किस्मत का क्या दोष बन्टी,ये तो अच्छा ही हुआ।”

” खाक अच्छा हुआ!!! राजा कानपुर से बाहर निकल के देखो,लोग कितना फॉरवर्ड हो गये हैं,अच्छा एक बात बताओ क्या पढ़ाई करी है मैनें?”

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” तुमने वो क्या कहते हैं …..

” हाँ हाँ बताओ बताओ,निसंकोच बोलो बे।”

” बन्टी वो इंजीनियरिंग वाली पढ़ाई…”

” हाँ वही बी टेक किया है मैनें ,एम बी ए करने वाला हूँ,अच्छी खासी नौकरी कर रहा हूँ,है की नही?”

” हाँ भाई सौ टका!!”

” अब इसके बाद सुनो ,,इतना सब करने के बाद भी मैं मैडम को गंवार लगता हूँ,कहती है तुम्हारी प्रनन्सियेशन सही नही है।।”

” क्या ??क्या सही नही है??”

” अबे उच्चारण यार!!! कहती है बेबी तुम ना सही से बोल नही पाते हो,मैनें कहा यार सेक्रेड हार्ट इंग्लिश मीडियम स्कूल से पढ़ा हूँ,कहती है_ होगा पर तुम्हारा एक्सेन्ट सही नही है,तुम ना ब्रिटिश इंग्लिश नही बोल पाते…..हिन्दुस्तानी हूँ यार अपनी इंग्लिश बोलूंगा ना भाई।।अब मैं तुझे शुरु से अपनी कहानी सुनाता हूँ ।”

” तो अभी तक क्या सुना रहे थे गुरू!!”

” दिमाग ना खराब कर भाई का यार,वर्ना नही सुनाऊंगा।”

” मजाक कर रहे थे भाई ,तुम सुनाओ यार अपनी राम कहानी।”

“जानते हो ,पहली बार कहाँ मिला उससे,,अरे वहीं यार!!!आजकल का प्रेम तीर्थ !! आज कल वही एक जगह है जहां रोज़ हजारों प्रेम कहानियाँ सुबह शुरु होती हैं और शाम होते होते खतम!! मेरी तो फिर भी तीन महीना चल गयी…..

” अबे ऐसी कौन जगह है दिल्ली में??”


“अबे दिल्ली नही ,,,,फेसबुक पे!! बन्दी ने ऐसी ऐसी खूबसूरत फोटो डाल रखी थी कि बस पूछ मत भाई!!! भाई बहक गया,,मैनें फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी उसने मान ली ,,गप्पे शप्पे शुरु हो गयी…..अब तो बन्दी  रोज़ नया प्रोफाइल पिक लगाये ,कभी लेफ्ट से कभी राईट से ,कभी सामने से,ऊपर से ,नीचे से…मतलब ये की फोटो देख देख के ही मैनें तो यार बच्चों के नाम तक सोच लिये,फिर एक दिन धीरे से प्रपोज़ भी कर दिया,उसने झट मान भी लिया,फिर मैनें मिलने को बुलाया,तब नखरे चालू हुए।।फिर भी आखिर मान गयी…..अच्छा उसके ऊपर भी पहली डेट कैसी होनी चाहिये पर भी घुमा फिरा के खूब क्लास ले ली मेरी,कहती है __ ‘मेरी हर फ्रेंड को उसके बी एफ ने पहली मुलाकात में कोई ना कोई गिफ्ट दिया है,जैसे टॉमी हाईफ्लायर की वॉच या रिंग..लायक दैट यू नो!!’ अब मैं इतना भी नासमझ नही हूँ यार एक सोने की अँगूठी खरीद के ले गया।”

” फिर क्या हुआ??”

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” फिर क्या ,जब मैं वहाँ पहुँचा और उसकी शकल देखी!!! कसम से भाई ,दिल का दौरा आते आते बचा,,भगवान बेड़ा गर्क करे इन चीनियों का ऐसे ऐसे फोन बनाये है ना,ओपो-विवो कि साला इस मोबाईल से अपनी ही फोटो खींच के बंदा ना पहचान पाये,जन्मजात कोयला भी इनमें फिरंगी लगे।। खैर मैनें अपना दिल सम्भाला और जाकर बैठ गया,अब उसके आत्मविश्वास की इन्तेहा देखो,पूछती है__ कैसी लग रही हूँ मैं? मैनें कहा_ तुम हूर हो परी हो, इस दिल्ली की नही लगती,शिमला मसूरी हो। मेरे इस भद्दे जोक पे भी हंसने लगी ,कहती है _ शुक्रिया !! खैर अँगूठी ले आया था तो मैनें निकाल लिया देने के लिये, कहती है __ omg ridiculous! तुम गोल्ड रिंग लाये हो ,मैं तो सिर्फ diamonds पहनती हूँ,,फिर सोच क्या हुआ।।”

” ब्रेकअप??”

” नही यार!! इतना झल्ला भी नही है तेरा भाई ,, बहुत सबर है भाई में….दिल में  तो आवाज़ उठी कि जाहिल औरत किसी भी एंगल से तू डायमन्ड के लायक नही लगती पर ऊपर से मैनें कहा__ चलो बेबी शॉपिंग चलतें हैं,ले लेना अपनी पसंद का कुछ!!
    अब भाई मैं तो उसे ‘ शाह जी’ ,’ अनोपचंद तिलोकचंद’ टिकाने वाला था,कम्बख्त ‘ गीतांजली’ ले गयी यार!!! पूरे बहत्तर हज़ार खरचे तब जाके मैडम के चेहरे पे स्माइल आयी।।
    फिर पूरा दिन घुमाती रही ,कभी यहाँ कभी वहाँ, शाम को जब उसे घर छोड़ने गया,तो मैने बाय बाय के साथ सोचा एक छोटी सी किस ले लूं,कहती है __ नो बेबी !! ये सब शादी के बाद!! मैनें कहा हमारे यहाँ भी गहने शादी में ही चढाये जाते हैं ।।पर मेरा ये खून्खार जोक भी उस नामुराद के पल्ले ना पड़ा ।।
    फिर तो बस सिलसिला ही चल निकला,हर वीकएंड पे शॉपिंग मूवी डिनर!! अब यार इतना भी नही कमा रहा था तेरा भाई!!!

” तो इस बात पे ब्रेकअप हुआ।”

” अबे नही यार!! इतना सब कर के देने के बाद मैडम को ये समझ आया की मैं केयरलेस हूँ मैं उससे रीलेटेड महत्वपूर्ण तारीखें भूल जाता हूँ,जैसे उसके कुत्ते का जन्मदिन, उसकी फुफी की शादी की सालगिरह,हम पहली बार कब एफ बी पे दोस्त बने, इसी तरह के कई बिल्कुल ही भुला देने योग्य तारीखों को कैसे कोई याद रखे।।कहने लगी_ ” तुम मुझसे सच्चा प्यार नही करते,तुम बस मेरी खूबसूरती से प्यार करते हो।।” माँ कसम भाई कलेजा मुहँ को आ गया,जी मे आया चिल्ला चिल्ला के कहूं __ कम्बख्त किसी अच्छे आंखों के डॉक्टर से इलाज करा अपना।।पर मैं फिर ज़ब्त कर गया।।फिर उसकी लाईफ मे आ गया एक एन आर आई बंदा!! बिल्कुल फिल्मी स्टाइल में!! उसके पापा के दोस्त का लड़का !! और भाई विदेशियों ने सदियों हम हिन्दुसतानीयों पे राज किया ही है,वही हुआ ।।मैडम भी उड़ गयी सात समंदर पार,और तेरा भाई पी पिला के गम गलत करने लगा।।”

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” अरे दारु की लत लगा ली तुमने गुरू।”

” अबे दारु की लत लगाये मेरे दुश्मन।।दारु तो बेटा ऐसा है कि भाई के खून में घुली है,इन्जीनियरिंग फर्स्ट ईयर में रैगिंग में कमीने सीनियर्स ने जब पहली बार पिलायी,हमने फुल एक्टींग करी जैसे हमे बिल्कुल नही जन्ची ।।उन्होनें और पिलायी,हमने भी खूब ढकोल के पिया,,तो दारु तो अब ऐसा है कि चढ़नी ही बन्द हो गयी बे।।हम तो चाय पीने पिलाने की लत की बात कर रहे थे।।
    तो बेटा इस तरह हमारी प्रेम कथा शुरु हुई और अपने अंजाम तक पहुंच भी गयी अब तुम बताओ,ये तुम्हारा क्या चक्कर चल रहा है।”

” क्या बताएँ बन्टी,हमारा ऐसा कुछ चलने लायक चल ही नही रहा!! एक लड़की है बांसुरी!! पहले हमारी दोस्त बनी, धीरे धीरे अच्छी लगने लगी…अब तो यार आदत सी पड़ गयी है उसकी,पर हमने पहले ही उसे कह दिया कि अम्मा से पूछ कर ही आगे कदम बढ़ाना है।”

” तो मान गयी मासी जी।”

” अबे कहाँ यार!! अम्मा तो अलगे राग छेड़े बैठी हैं सरजूपारी है तो ब्याह नही हो सकता।।”

” अरे तो सरजूपारी भी तो ब्राम्हण ही है,यहाँ तो हमारे पिता श्री ने हमारा नाम ही अजीब रख दिया __ ‘ रविवर्मा’ इसिलिए बन्टी नाम चलाते हैं ।।कोई बहुत फेमस पेंटर बाबू थे रवि वर्मा साहब!! तुम्हारे कला पारखी मौसा जी यानी मेरे पिताजी को और कोई नाम नही मिला…..पहले पहले तो मुझे कॉलेज में सब वर्मा समझते थे फिर जब पूरा नाम बताया तो खासा मजाक भी बन गया__ रविवर्मा उपाध्याय!!!
हां तो बेटा आगे क्या हुआ?”

” क्या होना था? कुच्छो नही हुआ,ना हो पायेगा,,हम सोच रहे अम्मा के एकदम पैर पकड़ लेते हैं,क्या बोलते हो तुम?”

” क्यों लड़की वाले तैयार बैठे हैं क्या?”



” अबे कहाँ यार!! पहले अम्मा तो तैयार हो जायें ।”

” और अम्मा के तैयार होने के बाद कहीं लड़की वाले मुकर गये तब,क्या करोगे।”

” ये तो सोचे ही नही भाई”

” हमारी मानो तो एक बार लड़की के घर वालों से मिल आओ!! अपने मन की बात बता दो उन्हें,,फिर वो लोग मां गये तो अम्मा तो यार मान ही जायेंगी, आत्महत्या की धमकी चमकी दे डालना और क्या।”

” हम्म!! तो मतलब हम पहले बांसुरी के घर वालों से मिल लें और बात कर लें ।”

” बिल्कुल!! और किसी तरह जुगत लगा के दोनो घर की औरतों की मीटिंग करा दो,किसी मन्दिर में!! घर की औरतें तैयार हो जायें ना तो आदमियों को मानना ही पड़ता है बंधु ।”

” बात तो पते की बोले हो बन्टी भाई ,तो फिर निकलते हैं हम बांसुरी के घर के लिये,तुम अपनी तलब मिटाओ चाय पीकर!!”

” अबे रुको यार!! बड़ी हडबडी में हो क्या बात है?? चाय पीकर मैं भी चले चलता हूँ,,देखूँ तो ज़रा कौन सी बांसुरी बजा रहे हो तुम।”


        **************************


            मेरी हर मन मानी बस तुम तक                         बातें बचकानी बस तुम तक
           मेरी नज़र दीवानी बस तुम तक
तुम तक तुम तक।।

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    दोनो भाई चाय खतम कर बाँसुरी के घर की ओर निकल चले।।

   ” क्या बात है राजा!!! तुम तो बेटा सच में प्यार में पड़ गये हो जभी रान्झणा के गाने सुन रहे हो।”

” क्यों ज़रूरी है प्यार में पड़ने पर रान्झणा के गाने ही सुने जाये।।”

” नही बिल्कुल नही!! मैं तो ब्रेकअप के बाद ‘ लम्बी जुदाई’ सुनने लगा तो एक दोस्त ने कहा ,कौन से जमाने में जी रहे हो यार,मैने कही क्यों__ तो कहता है आजकल लड़कियाँ ब्रेकअप के बाद दिल पे पत्थर रख के मुहँ पे मेक’प कर लेती हैं,और तुम्हारा बावरा मन जाने क्या चाह रहा,सम्भालो यार खुद को।मैनें संभाल लिया और तबसे जस्टिन बीबर सुनने लगा।।”

” वो क्या गाता है गुरू??”

” पता नही भाई!! मैं तो फैशन के मारे सुनता हूं, लोगो को भले गाने का एक शब्द ना समझ आये पर बनेंगे ऐसे जैसे बहुत बड़े अन्ग्रेजी संगीत के ज्ञाता हो,  आस पास इम्प्रेशन मारने एक आध गाना पता होना चाहिये ना।”

   कुछ देर पहले अपने दिल से दुखी राजा के मन का कुहासा बन्टी की बातों से छन्ट गया,अपनी पूरी ऊर्जा के साथ वो गाड़ी भगाता अगले ही पल बांसुरी के दरवाजे खड़ा था।।

   दरवाजे को प्रमिला ने खोला,और पूरे आदर के साथ दोनो लड़कों को अन्दर बिठाया।।।

    अपने पापा के ऑफिस निकलते ही माँ बेटी में सारी बातें हो चुकी थी,बांसुरी ने पापा की नाराजगी का कारण माँ को बता ही दिया था,प्रमिला को वैसे भी पहले से ही राजा पसंद था पर पति की खिलाफत करने की उस भारतीय नारी ने आज तक।कल्पना भी नही की थी,इसीसे अपनी सोच में गुम प्रमिला ने बांसुरी को आवाज़ लगाई।।
    इस वक्त पे माँ और बेटी दोनो यही चाहती थी की कोई भी बाहरी व्यक्ति ना आये और वो लोग राजा के साथ बैठ कर आगे क्या करना है कैसे करना है कि रूपरेखा पर चर्चा कर सकें….पर भगवान को भी कभी कभी अपने प्रियजनों से हँसी मजाक करने का मन करता है इसिलिए वो बुआ जी जैसे लोगों की सृष्टि करतें हैं ।।

    बांसुरी अपने कमरे से उतर कर आयी ही थी कि दरवाजे को भड़भड़ाती बुआ जी का आगमन हुआ।।

” अरे कौन मेहमान बैठे हैं परमिला?”

  बुआ जी का अक्समात आगमन सभी को चकित कर गया।।

“राधेश्याम जी गैस वाले हैं ना,, उन्ही के लड़कें हैं जिज्जी राजकुमार!! “

” हाँ हाँ!! मिले रहे उस दिन !! याद आ गया । औ बेटा कहो कैसन आना हुआ,सब कुसल मंगल घर में,कभी ऐसने अपन अम्मा को भ