प्यार # 62 kg

यह नीरा खुद को समझती क्या है यार जब देखो तब मोटापे पर लेक्चर देती रहती है मुझे,,          खुद उसने अपनी पूरी जिंदगी में बस एक ही काम किया है जो अपने पचासी किलो के वजन को 65 में लेकर आ गई अब मेरे पीछे पड़ी हुई है।।”  ” छोड़ो ना तुम भी किसकी किसकी बात लेकर बैठ जाती हो अब उन लोगों के पास और काम भी क्या है??असल में तो सब जलती है तुमसे।।”  ” किससे मेरी जॉब से??”  ” नहीं मेरी जान तुम्हारे हैंडसम पति से सबको लगता कितना हैंडसम पति मिला हुआ है इसे”  “ओहो मिस्टर हैंडसम आपने उन लोगों के हस्बैंड को नहीं देखा है क्या?? मुझे तो बल्कि यह लगता है कि इतने पढ़े लिखे स्मार्ट लड़कों को ऐसी गंवार लड़कियां कैसे मिल गई मैं तो फिर भी बहुत क्लासी हूँ, बस थोड़ी सी मोटी हो गई हूं।”  ” अरे कुछ मोटी वोटी नहीं हुई हो,,हाँ  हेल्थ वाइज चाहो तो कुछ कर लो,योग या जिम!! थोड़ा बहुत वेट रिड्यूस करने में कोई बुराई नहीं है पर अपने बढ़ते वजन को लेकर टेंशन में मत आ जाओ समझी, और हां शाम को याद रखना एक बर्थडे पार्टी है जाना है।।”” ओह नो आज से डाइटिंग शुरू करने की सोची थी आज ही बर्थडे पार्टी में जाना है चलो ठीक है आज खा लूंगी कल से शुरू कर लूंगी  डायटिंग।।”रागिनी भी महिलाओं की इंटरनेशनल समस्या मोटापे से ग्रस्त थी,वो उतनी मोटी थी नही पर खुद को अपने टीन एज के रूप से कम्पेयर कर के दुखी हो जाती थी।।    कॉलेज के दिनो में उसका वेलशेप्ड फिगर और कपड़े सबके ध्यान का केंद्र होते थे,उसे कभी अपने आपको मेनटेन करने की ज़रूरत ही नही पड़ी ….   इसी मुगालते में वो जी रही थी कि वो कभी मोटी नही हो सकती।।    शादी के बाद जो हल्का फुल्का एक दो के जी गेन हुआ भी वो उस पर और फ़बने लगा,और बस यही एक चूक हो गयी…….कम्बख्त बॉडी को फलने फूलने की आदत लग गयी,और ज़बान को स्वाद का चस्का ..     रही सही कसर डिलीवरी में पूरी हो गयी,उस वक्त आस पास के हर किसी का प्यार रागिनी की खाने की प्लेट पर ही उमड़ पड़ा ,  वेज नॉनवेज,मीठा तीखा जिससे जो बन पड़ा उसने आगे बढ़ बढ़ कर रागिनी को खिलाया,नतीजा बेबी तो 2.75 किलो का हुआ पर रागिनी खुद 75 में पहुंच गयी।।   बच्चे के साथ एक साल तो सोते- जागते,हँसते- रोते, सूसू पॉटी में निकल गये,पर उसके बाद जब एक बार फिर सोशल लाईफ में इंटरफेयर शुरु हुआ तब जाकर रागिनी की नींद खुली।।     अपने आस पास नज़र फिरायी तो देखा उसे जम के खिलाने वाली सखियाँ खुद स्लिम ट्रिम बनी हुई है…..     उन्हीं सखियों के साथ एक ही फ्रेम शेयर करना अब उसके लिये मुसीबत का सबब बनने लगा, हर पार्टी में जाने के पहले यक्ष-प्रश्न सामने मुहँ बाया खड़ा होता __ ” क्या पहन के जाऊँ ” और फिर तरह तरह के गाउन ,साड़ियाँ ट्राई करने मे बाद अंत में जीन्स के साथ कोई भी लम्बी कुरती या श्रग ही पेट छुपाने का हथियार बनता।।    रागिनी को जितनी कोफ्त अपने बढ़े पेट को देखकर नही होती थी उससे कहीं ज्यादा चिढ़ उसे दूसरों की दी हुई एडवाइज़ से होती….   वही सारी औरतें जो कल तक उसके फैशन ट्रेंड को फॉलो करती थी,आज उसे रह रह कर पतले दिखने की टिप्स दिया करती थी।।       ” जिम शुरु कर ले रागिनी,वर्ना तेरा दुबला होना असम्भव है”  ” पर्सनल ट्रेनर क्यों नही रख लेती।”  ” अरे शिल्पा शेट्टी का योगा विडियो देखा कर बहुत फायदा होगा।”   इसी तरह के एक से बढ़ कर एक नुस्खे उसे थमाए जाने लगे,जिनके पीछे छिपी काली सच्चाई की ” हाँ तुम मोटी हो रागिनी” उसका दिल दुखा जाती।    वजन कम करना कोई आसान काम तो है नहीं, फिर भी एक दृढ़ निश्चय के साथ रागिनी ने उस ओर कदम बढ़ाया अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित किया शेडूल बनाया, और हफ्ते में 3 दिन जिम जाना शुरु किया ……इसके साथ ही दिन भर में 8 से 10 गिलास पानी पीना सिर्फ उबली सब्जियां खाना सलाद खाना फल खाना शुरु कर दिया…  हफ्ते में 2 दिन योगा भी करने लगी….    लगभग पन्द्रह दिन की कड़ी मेहनत का नतीजा सामने आया,वजन का कांटा 2 किलो कम दिखाने लगा…     खुशी से बौराई रागिनी शाम का इन्तजार करने लगी।।     शाम में राजीव के बेल बजाते ही दरवाज़ा खुद ब खुद खुल गया,भीतर आते ही बैठक में कैंडल्स की मद्धिम रोशनी और खुशबू जादू सा असर दिखा रही थी,सेंटर टेबल पर एक खूबसूरत सी ट्रे में गुलाब की पंखुडियों के ऊपर दो चाय के कप,चाय की भरी केतली के साथ रखे थे,और पास की प्लेट पर सजी थी हाई फाईबर डाईट बिस्किट्स, जिन्हें देख राजीव के चेहरे पर मुस्कान खिल गयी,  वो सोफे पर बैठा ही था कि रेड कलर के पार्टी गाउन में रागिनी भी सामने आ गई, उसे इतना सजा धजा देख राजीव को अन्दर से घबराहट सी हुई कि कहीं आज रागिनी का जन्मदिन तो नही जो वो भूल गया,फिर अचानक याद आया अभी पिछले महीने ही तो उसके जन्मदिन के लिये डायमंड्स खरीदे थे,बिल भी अब तक किसी शर्ट की जेब में पड़ा होगा…..     फिर कहीं उन दोनों की एनिवर्सरी तो नही,पर ऐसे डायरेक्ट पूछना शोभा नही देता,बेचारी ने इतनी तैय्यारियाँ की है,क्या सोचेगी निकम्मे पति को शादी की तारीख तक याद नही ,अभी वो अपनी सोच मे डूबा ही था की ब्लास्ट हुआ__   ” कैसी लग रही हूं मैं??”    ” बहुत खूबसूरत “पानी की घूंट निगल कर राजीव ने कहा और ध्यान से रागिनी को देखने लगा कि आखिर आज क्या विशेष है??  ” मतलब स्लिम होकर मैं अच्छी लग रही हूँ ना,राजीव पता है इन पन्द्रह दिनों में ना तो मैंने राईस का दाना खाया,ना कोई मीठा,,तुम्हें पता है चाय तक छोड़ रखी थी मैंने,पर आज मेरी सारी तपस्या का फल मिल गया तुम्हें पता है मेरा 2 किलो वजन कम हो गया।।  राजीव की सांस में सांस आई,, तो यह बात है मैडम जी इसलिए इतना सेलिब्रेट कर रही है,, कुछ देर पहले राजीव के चेहरे का उड़ा हुआ रंग वापस आ गया,उसने रागिनी को खींच कर गले से लगा लिया__       ” इतना क्यों परेशान होती हो,तुम वैसे ही बहुत खूबसूरत हो मेरी जान।”   ” पर स्लिम होकर और ज्यादा लग रही हूँ ना!!”    ” हाँ बाबा!! तुम खुश हो ना?”    ” बहुत ज्यादा खुश हूँ राजीव।”    ” तो बस,जिसमें तुम्हारी खुशी!! अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हें स्लिम ट्रिम रहना है तो ऐसे ही रहो,मुझे कोई दिक्कत नही है,,मैंने तो तुमसे प्यार किया है रागिनी, तुम्हारी हाइट तुम्हारा फिगर तुम्हारे बाल आंखें होंठ हाथ पैर इन सब से नहीं,, तुमसे मैंने तुमसे प्यार किया है कल को तुम्हारे बाल कम हो जाएंगे या सफेद हो जाएंगे तो मेरा प्यार कम थोड़ी ना हो जाएगा,, बल्कि वो तो समय के साथ बढ़ता जाएगा हमेशा….. पहले तुम मेरी पत्नी थी लेकिन आज तुम मेरे बेटे की मां हो,,, मां बनने के बाद तुम्हारे लिए मेरे मन में आदर सत्कार और बढ़ गया और प्यार भी….. कल को तुम मेरी बहू की सास बनोगी, तब तुम्हारे लिए सम्मान और भी ज्यादा बढ़ जाएगा और उसके साथ ही प्यार भी।। उसके बाद तुम मेरे पोते पोतियो की दादी बन जाओगी तब तो वह सम्मान पीक पर होगा और उसके साथ ही प्यार भी…..        तुम्हारे शरीर के घटते बढ़ते इंचेज मेरे प्यार को कम नहीं कर सकते, कभी नही ।।   “ओह्ह यू आर सच अ स्वीटहार्ट राजीव,अच्छा सुनो अब जल्दी से फ्रेश होकर आ जाओ ,बहुत भूख लग रही है ,आज सेलेब्रेट करने के लिये मैंने पालक पनीर, भरवां बैगन, मटर पुलाव ,बूंदी का रायता और खीर बनाई है ,जल्दी आओ तब तक मैं टेबल रेडी करती हूँ ।”   ” हे भगवान!! इतना सारा खाना!!”    ” हाँ तो!! पन्द्रह दिन की भूखी भी तो हूँ ।   पर सुन लो बहारें मुझसे रूठी नही हैं,बहारें फिर से आयेंगी।।”    राजीव हँसते हुए कपड़े बदलने अन्दर चला गया।। 

aparna….

अनकही…

        अनकही….
पिया बसंती रे ….

        तेज़ कदमों से जल्दी जल्दी स्कूल की ओर भागती गौरी और अनिता के कदम स्कूल के बड़े घंटे को सुन और तेज़ हो जाया करते।
   दोनो अहल्याबाई शासकीय कन्या विद्यालय में बारहवीं कक्षा की विद्यार्थी थी,दोनो ने होम साइंस लिया था।
     उनके गांव में स्कूल ना होने से पास के गांव दोनों पैदल पैदल ही जाया करती थी।।अब कुछ समय से डिपो की बस चलने से कुछ राहत मिल गयी थी…
  उनके और आस पास के गांव के लड़कों लड़कियों के लिए राहत थी परिवहन की खटारी बस।

       इधर कुछ दिनों से एक लड़का अक्सर आकर उसके पीछे की ही सीट पर बैठने लगा था। इस बात पर भी उसका खुद का ध्यान कहाँ गया था, वो तो अनिता ही थी जिसके पास एक छठी इंद्री थी जो आसपास के किस लड़के के दिमाग में क्या चल रहा है का ज्ञान उसे दे जाया करती थी।

    ” वो रजुआ है ना चिल्पी के पान ठेले वाला?”

  ” हाँ क्या हुआ उसे ?”

  ” सिलाई इस्कूल वाली सरिता है ना उसको चिट्ठी फेंक के मारा रहा।”

  ” हाय सच्ची!”

  ” हाँ तो और क्या! सरिता के भैया ने क्या चप्पल से आरती उतारी थी जो रजुआ की ! क्या बताएं?”

     दोनो सखियां ऐसी ही रसभरी बातों में अपने गांव से स्कूल की दूरी तय कर जाया करतीं…..

        सत्रह अट्ठारह की उम्र वैसे भी वो उम्र है जिसमें सारा संसार सुंदर दिखने लगता है , हर मौसम बसंत हो जाता है और हर लड़की टेसू का फूल बन खिल उठती है,  हर लड़का भँवरा बन मंडराने लगता है…

  ” ये कौन है जो रोज़ तेरे पीछे आ बैठता है?

   ” हमें क्या पता?

  ” हम्म! हमें इसकी नीयत सहीं नही लगती, पहले हुँआ सामने बैठ जाता था वहाँ से तुम्हें घूरे रहता था, अब देखो हिम्मत कैसी बढ़ गयी है, सिद्धा पीछे ही आ बैठा। लफ़ंडर कहीं का!”

  गौरी अनिता की बात सुन सिहर उठी, उसका भी कुछ कुछ ध्यान तो गया था लेकिन उसने जानबूझ कर इस तरफ ध्यान देना उचित नही समझा था….
    उसे रह रह के अम्मा का गरियाना याद आ जाता…

  ” बिटियन के बिहाव करने की जगह उनका इस्कूल भेज रहें हैं ! कहाँ की कलक्टरनी बनवाएंगे इसे हैं? हमको तो आपका मूढ़ मति समझे में नही आता, पिछली बार दिद्दा कितना नीक रिस्ता लायी रही, बड़ी मनिहार की दुकान थी लड़के के बाप का लेकिन एक ये हैं कान मा जूँ नही रेंगी। अब उ कामता परसाद के यहाँ तो जाइये बात उत कर आइये नही ये रिसता भी हाथ से फिसल जाएगा। इक्के एक लड़का है उनका, सहर जाता है पढ़ने, देखने सुनने में बहुतै सुंदर है लछिमी कह रही थी।”

   आंखों में चश्मा चढ़ाये उसके बापू बहुत बार अम्मा की चीं चीं सुन के अनसुना कर जाते और बिना मतलब ही बही खाता का किया कराया हिसाब किताब जांचते बैठे रहते।
    बड़ी मुश्किल से जिद करके उसे पढ़ने जाने मिला था , वो भी बारहवीं के बाद उसका बिहाव हो ही जाना था…
    
       वो रोज़ ही स्कूल आना जाना करती लेकिन अब उसका ध्यान उस लफ़ंडर पर भी जाने लगा था। उसने खुद ने कई बार उसे अपनी तरफ ताकते पाया था लेकिन जब भी वो उसे देखती वो बस से बाहर देखने लगता ।
   उसकी नज़रों से बचने ही गौरी बस की खिड़की वाली सीट पर बैठने लगी, लेकिन अब तो तिर्यक कोण बना कर वो उसे और भी आसानी से देख पा रहा था।

   ” बहुतै गाली गलौच करता है उ।”

  ” उ कौन अन्नी?”

  ” अरे वही लंगूर जो तुम्हें ताकता रहता है, जबान बहुतै गंदी है , लबार है लबार । उस दिन संझा में हम अम्मा के साथ मंदिर गए थे वहीं बाहर जब हम मंदिर से निकले चप्पल पहन रहे थे तब वहीं बच्चों से काहे भीख मंगवा रहे कर के एक आदमी को लात ही लात मारता रहा खबीस ! “

   ” हाय राम ! ये हाथ पैर भी चलाता है?”

   ” हाँ तो और क्या! हाथ पैर के साथ जबान भी चला रहा था, अब बेचारे गरीब बच्चे भीख ना मांगे तो क्या खाएं भला।”

  ” छि कित्ता गंदा आदमी है?”

   ” और बताएं हमें तो लगता है कट्टा अट्टा लेके घूमता है साथ में । और हम तो इसे  धुआँ उड़ाते  भी देखे हैं।
    अब इस बात पर गौरी क्या कहती वो खुद लाल बाजार में अपनी माँ के साथ चूड़ी खरीदते समय उसे सिगरेट फूंकते देख चुकी थी। ये और बात थी कि उस पर नज़र पड़ते ही उसने अपने हाथ की सिगरेट फेंक कर हाथों से ही मुहँ के सामने छाया धुंआ हटाने की नाकाम सी कोशिश भी की थी।

   एक लड़के से ख़ौफ़ खाने लायक सारी ज़रूरी बातें अनिता ने गौरी के मन में भर दीं।
  
     एक दिन तो गौरी के खुद के सामने वो किसी से भिड़ा हुआ था , हिकारत से उसे देख गौरी अन्नी के साथ आगे बढ़ गयी….
    पता नही पीठ में इतना लंबा सा कैसा अजीब बस्ता टांगे रहता, बाद में कुछ उसके दोस्तो से चलती उसकी बात और कुछ कंडक्टर की बात सुन गौरी को समझ आया कि उनके स्कूल के आगे जो तहसील पड़ती है वहीं पॉलिटेक्निक कॉलेज से पढ़ाई कर रहा था वो…

   “और आसुतोस कब तक पूरा हो जाएगा तुम्हारा पॉलीटेक्निक?”   कंडक्टर के सवाल पर उसने जवाब दिया था और पहली बार उस लफंगे की इतनी मोटी गहरी सी आवाज़ उसने सुनी थी…

  ” बस चच्चा ! अगले साल जुलाई में दूसरा साल का रिज़ल्ट आ जायेगा और हम शहर निकल जाएंगे इंजीनियरिंग करने, और चच्चा गाना वाना भी तो बजाओ गाड़ी में।”

” अभी लगाए देतें हैं बिटवा।”

   और कंडक्टर ने सदियों से बसों में चलने वाले बम्पर गानों की जुगाली करनी शुरू कर दी…

    तुम तो ठहरे परदेसी साथ क्या निभाओगे
     सुबह पहली गाड़ी से घर को लौट जाओगे

   ” अरे छि ये का बजा दिए?”

  ” रुको दूसरा लगाए देते हैं…

    परदेसी परदेसी जाना नही मुझे छोड़ के…

  ” अरे यार चच्चा फ्यूज बल्ब हो तुम, हटो ज़रा हम ये नया कसैट लाये हैं शहर से”

   और उस लफ़ंडर ने आगे बढ़ कर अपना कसैट लगा दिया…..

   पिया बसंती रे काहे सताए आ जा …
   पिया बसंती रे काहे सताए आ जा….

    गौरी अपनी जगह पर ही और भी ज्यादा सिमट गई लेकिन उस दिन के बाद से उस लोफर की निडरता कुछ और बढ़ गयी…
    अब आये दिन स्कूल से लौटते वक्त की बस में वो यही गाना चलवाये रहता, उसके साथ के लड़के बिना बात हँसते और वो मुस्कुराए रहता।
    
    एक दिन तो हद ही हो गयी, उसी के कॉलेज का लड़का था …  बस में दरवाज़े के पास ही बैठा था। अपना स्टॉप आने पर गौरी अन्नी के साथ उतर रही थी कि उसने दरवाजे के ठीक सामने अपना पैर अड़ा दिया…

  ” पाय लागू भौजी! औ का हाल है?”

   घबरा कर गौरी जब तक में उसका चेहरा देख पाती आशुतोष के हाथ का एक ज़ोरदार तमाचा उस बदतमीज के चेहरे का भूगोल बिगाड़ गया। हड़बड़ा कर उसके पैर हटाते में ही एक छलांग लगा कर गौरी और अन्नी वहाँ से भाग खड़ी हुईं….
     इसके बाद चार दिन तक बुखार से तपती गौरी स्कूल नही जा पायी। पांचवे दिन ताप के साथ साथ डर भी कुछ हद तक उतर गया…

     उस दिन अन्नी अपनी मौसी के घर सत्ती माता के रोट बांधने चली गयी थी इसी से स्कूल नही जा पायी थी। एस यू पी डब्ल्यू का काम था जिसके कारण गौरी को अकेले ही स्कूल जाना पड़ा।
    और दिनों की तरह आज उसने बस्ता नही लिया था, बल्कि अपने कढ़ाई के नमूनों के रुमाल और सूई धागा सब एक कपड़े के थैले में डाले ही निकल गयी थी।
    स्कूल में टीचर दीदी को उसके नमूने बड़े पसन्द आये थे। किसी रुमाल में कमल काढ़े थे तो किसी में कुंदा की बेल। एक रुमाल जो उसने सबसे मेहनत से काढ़ा था उसमें लाल गहरे रंग से गुलाब की कलि और फूल चेन स्टिच और गांठ स्टिच लगा लगा कर काढ़ा था । और उसी रुमाल को कक्षा में सभी को दिखा कर उसकी खूब पीठ ठोंकी थी दीदी ने। बाकी सभी ने भी तालियों से उसका खूब उत्साह बढ़ाया था।

   शाम को इसी उत्साह में मगन वो स्टॉप पर बस का इंतेज़ार करती खड़ी थी कि बस आ गयी…
    आज बस और दिनों से कुछ खाली ही लग रही थी…
    कंडक्टर चाचा भी नही थे, लड़कियों के नाम पर अकेली वही बैठी थी।
    परकास ( प्रकाश) आज अपनी पूरी टोली के साथ मौजूद था। उस दिन आसुतोस के हाथ का रेपटा खाने के बाद से आज बस में नज़र आया था और आज ही उसके साथ अन्नी भी नही थी।

   उसने एक नज़र अपने आस पास दौड़ाई और फिर घबरा गई…
    ” हे भगवान आज तो वो भी नही है।”

    मन ही मन राम जी हनुमान जी से लेकर जिन जिन देवी देवताओं की उसके घर तस्वीरें लगी थीं सभी का उसने जाप कर लिया। आज तो उसका बचना मुश्किल लग रहा था। हालांकि डिराईभर भैया तो थे लेकिन एक अकेले वो इन छै सात लड़को से कैसे निपटेंगे भला।
    सोच सोच के उसका गला सूखा जा रहा था कि मैनी बाजार आ गया….दो चार इधर उधर की जो सवारियां थीं वो भी उतर गयीं।
   अब इस पूरी बस में बस वो परकास और परकास के छै लौंडे इत्ते ही जन बचे थे।
    उसकी जान निकल कर मुहँ तक आ गयी थी….

   उसके घर अखबार नही आता था तो क्या हुआ , अकेली लड़की के साथ इत्ते सारे लड़के क्या कर सकतें हैं वो अच्छे से जानती थी।
   कहीं बस डिराईभर भैया भी इन्हीं का साथ दे गए तो?

   उसका डर अपने चरम पर पहुंच चुका था।
 
   परकास और उसके दोस्त पहले तो सबसे पीछे बैठे थे फिर धीरे-धीरे उठकर इधर उधर कहीं भी बैठने लगे कोई कुछ गा रहा था कोई हंस रहा था कोई पान चबा रहा था तो कोई गुटका…

   डर के मारे मन ही मन दुर्गा चालीसा का पाठ करती गौरी खिड़की से बाहर देखती जा रही थी। बस के अंदर देखने की उसकी हिम्मत ही ना थी । बाहर देखते हुए भी उसे साफ पता चल रहा था कि वह सारे के सारे लड़के उसे ही घूर रहे थे….
   अपने झीने से दुपट्टे से उसने खुद को लपेट रखा था और उसका छोर ऐसे कस कर पकड़ा था जैसे उसकी सारी इज्जत इसी दुपट्टे में रह गयी थी।
   हे काली माता रक्षा करो! ये अन्नी की बच्ची को भी आज ही मरना था!
    वो क्यों अकेले स्कूल आ  गयी। कहीं अम्मा का डर की अकेली लड़कियां स्कूल जाकर खराब हो जातीं हैं सच ना हो जाये।
    अगर आज उसके साथ कुछ ऊंच नीच हो गयी तो क्या करेगी वो? गांव के पहले नाला पड़ता है ना बस वहीं कूद कर जान दे देगी!
    पर हाय री खराब किस्मत! एक तो उस नाले में ज्यादा पानी होता नही दूसरा गांव की तमसा नदी में बचपन से तैरती आयी है तो पानी में हाथ पैर खुद ब खुद चलने लगेंगे।
    देबी मैय्या किरपा करो, अब आगे से कभी अकेली घर से न निकलूंगी और अम्मा जहाँ कह रहीं वहीं ब्याह कर लुंगी।

   मन ही मन मन्नत मानी ही थी कि चर्र की आवाज़ के साथ बस रुकी और वो आंखें फाड़े बस के दरवाज़े की ओर देखने लगी…
    दरवाज़ा खुला और आशुतोष बस में चढ़ आया।

   जीवन में गौरी को लगा पहली बार उसने इतनी बड़ी सुकून की सांस ली , वो उसे देख मुस्कुरा उठी, उसने गौरी को देखा और फिर प्रकाश और गैंग को और एक पल में उसे सारा माजरा समझ आ गया।
   वो आगे बढ़ा ही था कि अपने बाजू में रखी थैली को गोद मे रख गौरी ने उसके अपने पास बैठने के लिए जगह बना दी।
   उस जगह को देख कर भी वो बाजू वाली खाली सीट पर बैठ प्रकाश और उसके दोस्तों को एक नज़र देखने के बाद सामने हो कर बैठ गया…
   

  ” का हो दद्दा आज कंडक्टर चच्चा नही आये?”

   ” हाँ बिटिया भई है उसकी तो आज और कल दू दिन नही आ पायेगा।”

  ” आज कोई गाना नही बजाओगे दद्दा?” अबकी बार प्रकाश की खी खीं सुनाई दी। हंसते हुए उसने ड्राइवर को गाने के लिए कहा ही था कि आशुतोष ने मुड़ कर उसे घूर कर देखा और उस दिन का करारा झापड़ याद आते ही प्रकाश अपना गाल सहलाते चुप बैठ गया…

  ” रहने दो रहने दो। हमको वैसे भी बस अताउल्ला खाँ सुनना ही पसन्द है , वो तुम बजाओगे नही।”

  आशुतोष के आकर बैठते ही गौरी की सामान्य श्वांस प्रश्वांस की प्रक्रिया शुरू हो गयी थी…
     अब तक जो यात्रा जीवन की कठिनतम यात्रा लग रही थी अब वही सुकून भरी प्यारी सी यात्रा लगने लगी थी।
   कुछ देर में ही चौपाल पर बस रुकी और प्रकाश और उसकी मंडली वहीं उतर गई।
   बस में अब गौरी और आशुतोष ही थे।

   आशुतोष ने ड्राइवर से कह कर एक बार फिर वही गाना बजवा दिया  ……

   पिया बसंती रे काहे सताए आ जा….

   गाने के बोल सुनते ही शरमा कर गौरी खिड़की से बाहर देखने लगी…

  ” ये सब तुमही बनाई हो”

  चौन्क कर गौरी ने देखा आशुतोष के हाथ मे उसका काढ़ा रुमाल था…

  ”  हाँ ” छोटा सा हाँ बोलने में ही उसका दिल उछल कर मुहँ तक आ गया था

  ” ये सब कहाँ सीखा ?”

  ” स्कूल में !”

  ” गौरी है ना तुम्हारा नाम ? हमारा नाम आशुतोष है..

   ” हम जानते हैं।”

   ” और का जानती हो हमारे बारे में?”

     “यही  कि तहसील के सरकारी कॉलेज से पॉलिटेक्निक कर रहें हैं आप। “

   ” और ?”

   ” और बस !

    “नौ महीने बाद हमारा पढ़ाई यहाँ से पूरा हो जाएगा फिर हम शहर के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज चले जायेंगे पढ़ने।”

  ” अच्छा !”

  ” और एक बात बताएं?”

  ” बताइये?

  ” हमारे बापू का नाम कामता प्रसाद है! “

   बस खचाक से डिपो में रुकी और उसके साथ ही गौरी का धड़कता दिल भी जैसे कुछ सेकण्ड्स को रुक गया।
    वो हड़बड़ा कर अपना सामान समेटे बस से जल्दी जल्दी उतर कर घर की तरफ भाग चली की तभी पीछे से आशुतोष की आवाज़ उसके कानों में पड़ी….

  “अरे ये एक रुमाल भूल गयीं हो?”   गहरे लाल रंग से काढ़ा गुलाब वाला रुमाल आशुतोष के हाथ में था…

   ” आपके लिए है, रख लीजिये। “

  कहती हँसती खिलखिलाती कामता प्रसाद की होने वाली बहु वहाँ से भाग गई….

   aparna …..
   
   

50% सेल

    ये सोमवार की सुबह आती क्यों  है?ये सिर्फ स्नेहा के लिये ही इतनी टॉर्चर होती है ,या सभी का यही हाल होता है,मालूम नही!
      तरुण को सिर्फ ये पता है की उसे ठीक 8बजे ऑफ़िस निकलना ही हैं,चाहे शहर मे कर्फ्यू लग जाये,देश मे  इमरजेन्सी आ जाये,पर 8 मतलब 8।
     स्नेहा नाश्ता बना पायी तो ठीक वर्ना ऑफ़िस कैन्टीन जिन्दाबाद।

      जैसा की दुनिया के हर मर्द को लगता है,की उसकी बीवी सबसे निकम्मी है,तरुण को भी पूरा विश्वास है,इस बात पर।
    और वो अपनी निकम्मी बीवी के टाईम मैनेजमेंट से तो कतई खुश नही रहता।

    “क्या करती रहती हो दिन भर ,एक फ़ोन नही संभाल पाती हो,,ऊपर से सारा सब कुछ अपने सर ले लोगी।”
    “क्या ज़रूरत थी नये प्रोजेक्ट पे हाथ मारने की,आराम से बैंच पे थी,,कोई काम नही ,प्रेशर नही,बस जाओ ,और आओ।”
      “अच्छा सुनो अगर आहान और ऑफ़िस एक साथ नही कर पा रही तो कुछ दिन के लिये माँ  को बुला लेते हैं,तुम्हे भी सुविधा हो जायेगी।”
        “नही नही माँ को बुलाने की ज़रूरत नही,मै कर लुंगी।”

      बस मर्दों के पास यही एक हथियार हैं,पता है सास को बुलाने के डर से बीवी हथियार डाल ही देगी। और बिना कोई और शिकायत किये चुप लगा जायेगी।

        पुरूषों के लिये उनका कैरीयर सब कुछ होता है,उनका बॉस ही उनका भगवान और ऑफ़िस ही उनका मदीना।पर औरत के लिये ! सिर्फ उसके समय काटने का ज़रीया।।
       ये बात पुरूषों के मन में भी गहरी बैठी होती है और ऑफ़िस ना जाने वाली महिलाओं के भी।

      “बैंच पे अच्छी थी……कैसे भला? किसको पसंद है काम पे भी जाओ और काम भी ना करो।”
“अरे जब अहान के लिये क्रच मिल ही गया,और ऑफ़िस शुरु कर ही दिया तो खाली क्यों बैठूँ ।”

      स्नेहा अपने विचारों मे उलझी खुद ही बडबड करती काम भी निपटाती जाती है।
     वैसे सभी औरतों मे एक ईश्वर प्रदत्त शक्ती होती है,तीन चार काम एक बार मे कर लेने की,,,लैंड लाईन से बहन से बात भी कर लेंगी,मोबाइल पे ज़रूरी मेल और मैसेज भी चेक होता रहेगा,,और साथ ही सब्जी भी कटती जायेगी,और सबसे ज़रूरी क्राईम पैट्रोल का एपिसोड साथ ही देख लेंगी।

      क्या करें,भगवान ने औरत को बनाया एक पर काम दिये अनेक।
     ऐसे ही स्नेहा खूब हडबडी मे रोज सारा काम निपटाती है,और फिर रात के खाने पे अपने पति से यही सुनती है,कि तुम दिन भर करती क्या हो?

    रोज सुबह 10बजे अहान को क्रच छोड़ कर उसे ऑफ़िस जाना होता है,इतनी हाय तौबा होती है सुबह की पूछो मत। इसी हाय तौबा मे उसने एक बार अपना मोबाइल गलती से कपडों के साथ वॉशिंग मशीन मे घुमा दिया।
       कपडों के साथ उनसे भी ज्यादा साफ सुथरा मोबाइल निकला,और स्नेहा सन्न रह गई,वो तो अच्छा था की उसके मेल पे सारे नम्बर सुरक्षित थे।

     अगली बार अहान का दूध गरम करते मे मोबाइल जाने कैसे अवन मे रखा गया,असल मे उस दिन शाम को तरुण के एक परिचित खाने पे आने वाले थे,क्या बनाऊं,क्या ना बनाऊं की उधेडबुन मे फसीं स्नेहा फ़ोन मे अपनी सहेली से इसी संबंध मे कुछ अति आवश्यक परिचर्चा मे व्यस्त थी ,तभी अहान के लिये दूध गिलास मे निकाला और अवन खोला और कान पर से मोबाईल निकाल के अवन मे रख दिया।

       अबकी बार खूब ठोंक बजा के अहान के पापा ने महंगा सा आई फोन खरीदा,उनका अटूट विश्वास  था की औरतों को सामान से ज्यादा उसकी कीमत से प्यार होता है।बस उनका आईडिया काम कर गया।

     छह महीनों मे दो स्मार्ट फोन गवां चुकी स्नेहा को   स्वयं भी आत्मग्लानी थी। अब वो अहान से भी ज्यादा फ़ोन को संभालती,पर हाय रे फूटी किस्मत!

       वही मनहूस सोमवार का दिन फिर आ गया,,दो दिन की लम्बी छुट्टी के बाद ये दिन बहुत जानलेवा होता है,खासकर नौकरीपेशा औरत के लिये।

      तरुण को नाश्ता करा के भेजा और अपने काम पे लग गई,कामवाली को जल्दी जल्दी काम समझा के अहान को तैय्यार किया और खुद नहाने घुस गई।
       स्नेहा नहा के आके जल्दी जल्दी तैय्यार होने लगी,उसने क्रीम हाथों पे निकाली ही थी की विलासिनी ज़ोर से चिल्लाई “दीदी बाबा ने पॉटी कर ली।” अब स्नेहा जब तक क्रीम को हाथों मे समेटे वहाँ पहुचीं तभी तरुण का फोन आने लगा,तरुण का फोन नही उठाने से जनाब एकदम से चिढ जाते हैं,इसलिए फोन उठाना भी आवश्यक था।
       फ़ोन को कन्धे और कानो के बीच फसाये स्नेहा ने जैसे तैसे बात करी और अहान को वैसे ही उठा बाथरूम मे ले गई।

        अहान को साफ सुथरा कर बड़े प्यार से गोद मे लिया और गर्दन सीधी कर ली,इसी बीच स्नेहा का जानी दुश्मन उसका फोन बड़ी चालाकी से उसे अंगूठा दिखा गया……और 40000 के आई फ़ोन ने ना आव देखा ना ताव कमोड मे कूद कर आत्महत्या कर ली।

   ‘छपाक ‘ इस आवाज के साथ ही स्नेहा का दिल डूब गया,आंखों मे मोटे मोटे आंसू आ गये।
    “हे भगवान! मेरे साथ ही क्यों?”
    “अब क्या मुहँ दिखाउन्गी तरुण को,उनको तो और मौका मिल गया,आज तो जान ही ले लेंगे मेरी।
सही कहते हैं,एक फ़ोन भी संभाल के नही रख सकती। क्या करुँ,कैसे बचू,कोई उपाय।”
       ” सही कहता है तरुण ,मै किसी लायक नही हूँ,ना घर सम्भालना आता ,ना ढंग से खाना बनाना ,कोई काम तो होता जो मै परफेक्टली कर पाती,ऊषा ,नीरू,चंचल ये सब कितने अच्छे से सब कर लेती हैं ।”
     जब कभी इंसान से ऐसी कोई गलती हो जाती है जो कुछ ज्यादा ही महंगी हो,तब उसे अपना असल चरित्र समझ आ जाता है,उसी समय उसे अपने सारे गुण दोष नज़र आने लगते है,अपनी भयानक भूल का पश्चाताप होने लगता है,और जाने अनजाने ही कितनी मन्नते हो जाती हैं…..पर यही कुछ समय बाद वो अति आवश्यक मन्नतें,बिल्कुल ही अनावश्यक होकर मन से निकल भी जाती हैं ।
     “गणेश जी इस बार तरुण के गुस्से से बचा लो ,आपको सवा किलो लड्डू भोग लगाउन्गी वो भी पैदल दगडू शेठ आके”
        (  दगड़ू शेठ पुणे का बहुत प्रसिद्ध गणपति मन्दिर है,जहां लेखक की स्वयं बहुत आस्था है।)
       
           ईश्वर हर असहाय की मदद करतें हैं…..उसी समय लैंड लाइन पे घंटी बजी ,,स्नेहा को पता था ,तरुण का फ़ोन है,,भारी कदमों से जा के बोला “हेल्लो ।”
    “स्नेहा क्या हुआ ,बात करते मे ही अचानक आवाज आनी बन्द हो गई। आहान तो ठीक है ना,अरे बोलती क्यों नही…..मेरा दिल घबरा रहा है जान ,तुम ठीक तो हो ना।”
     डांट पड़ने का डर था ,पर यहाँ तो गहरी सांत्वना वाले शब्द थे,भावुक होकर स्नेहा रो पड़ी।
      ऐसा रोयी ,ऐसा रोयी की हिचकी बँध गई,,बेचारी खुद चुप होना चाहती थी पर रुलायी थी की रुक ही नही रही थी।

    “रुको ,मै अभी आया।” “नही तुम मत आओ,सब ठीक है,,आहान एकदम ठीक है।”
    “वो असल मे मेरा फ़ोन ……कमोड …..”
“ओह्हो अहान ने तुम्हारा फोन कमोड मे गिरा दिया क्या?  अरे कोई बात नही ,तुम तो ऐसे रोयी की मै घबरा ही गया था।”
“फ़ोन के लिये इतना परेशान हो रहा था मेरा बेबी,कोई नही स्वीटहार्ट शाम को चलेंगे नया फ़ोन ले लेना।”
     
    इतनी देर से छाये ऊमस भरे बादल बरस गये,चारों ओर हरियाली छा गई,मयूर नाच उठे,कोयल गाने लगी,सारा संसार खूबसूरती की चादर मे मुस्कुराने लगा और……….स्नेहा की जान मे जान आई …
          …..सच कहतें हैं लोग,बच्चे भगवान का रूप होते हैं,,”आज मेरे बालगोपाल ने मुझे बचा ही लिया।
    वर्ना सच्चाई पता चल जाती तो तरुण ऑफ़िस से ही मुझे गोली मार देता।”

        थोडी देर पहले का गहन दुख दूर हो गया और गुनगुनाते हुए स्नेहा रसोई मे तरुण का मनपसंद खाना बनाने चली गई,,ऑफ़िस से छुट्टी ले ली।।

      खाना बनाते मे उसे अचानक याद आया की ऑनलाइन शॉपिंग की सेल का आज आखिरी दिन था,और उसने ढेर से कपड़े ऑर्डर करने के लिये जमा कर रखे थे, पर हाय री किस्मत !
              50परसेन्ट सेल उसके हाथ से फिसल के कमोड मे गिर चुकी थी……..और स्नेहा एक बार फिर गहन अवसाद मे घिर चुकी थी।

aparna….

बेबात की बात:–

ये जो बात बात पर लोग स्टेटस अपडेट करतें हैं ना, बेबात की बात है….         सारी ज्ञान की बातें सोशल मीडिया पर बहातें हैं ना, बेबात की बात है…..      वक्त पड़ने पर वहीं बांटा ज्ञान भूल जातें हैं , बेबात की बात है…..   आजकल तो पोहा भी बनाये लड़कियाँ तो ऐसे स्टेटस अपडेट करेंगी जैसे उदयपुर की राजकुमारी हों और पहली बार अपने महल के खानसामा के हाथ से कलछी छीन कर कुछ बनाया हो, देखा जाए तो ये सबसे बड़ी बेबात की बात है…. अजूबी हेयरस्टाइल हो या नया हेयरकट, कोई डिश हो या नए जूते हर बात की अपडेट उफ्फ कतई बेबात की बात है….  तो दोस्तों आपस में स्टेटस का आदान प्रदान नही बल्कि बातें करों क्योंकि यही बातें आगे यादें बनने वालीं है बेबात की बात तो हर कोई भूल ही जायेगा….