जीवनसाथी – 110





  जीवनसाथी – 110


कोई ट्रेन उसी वक्त स्टेशन से छूट रही थी। आदित्य और केसर प्लेटफॉर्म पर पहुंचे की उन गुंडों पर इन लोगों की और गुंडों की इन पर नज़र पड़ गयी…
    उनमें से एक ने अपनी गन उठा कर उन लोगों की तरफ तानी ही थी कि चलती ट्रेन में भाग कर आदित्य चढ़ा और केसर को भी अंदर खींच लिया, लेकिन उसी वक्त उस गुंडे ने गोली चला दी। साइलेंसर लगी होने के कारण बिना आवाज़ के वो गोली केसर के कंधे की हड्डी पर जा लगी……

    केसर कसमसा कर रह गई आदित्य ने तुरंत उसे संभाल लिया कंधे पर से खून की धार बह निकली और पीड़ा में तड़पती केसर ने अपने मुंह में चुन्नी ठूंस कर अपनी रुलाई रोकने की नाकाम सी कोशिश की लेकिन दर्द इतना भी कम नहीं था कि उसे आसानी से सह लिया जाए ।
   उस ट्रेन की एक अच्छी बात ये थी कि उस डिब्बे में उस वक्त बहुत कम लोग मौजूद थे। रात का वक्त होने से सवारियां और भी कम थी ।अनारक्षित डिब्बा था इसलिए अधिकतर सवारियां कामगार मजदूरों की थी…. उस पूरे डब्बे में मुश्किल से चार या पांच सवारी थी वह भी सारे मजदूर ही थे । जो सुबह से काम कर करके इतना थक चुके थे अब कि अपने गमछे से अपना चेहरा ढके खिड़कियों के सहारे टिक कर गहरी नींद सो चुके थे। ट्रेन चलने के साथ ही बाहर से मीठी हवा के झोंके आ रहे थे जो थके हारे लोगों को सुलाने के लिए काफी थे।  केसर को दरवाजे के पास ही नीचे बैठाकर आदित्य एक बार पूरे कूपे का चक्कर लगा आया। ज्यादातर लोग दूर-दूर ही बैठे थे और झपकी ले रहे थे। एक सुरक्षित जगह देखकर आदित्य ने केसर को उठाया और उस सीट पर ले गया केसर को नीचे की सीट पर सुलाने के बाद उसने अपनी जींस की जेब से एक छोटा सा पैना औजार निकाल लिया। ऊपर से देखने में वह नेल कटर जैसा लग रहा था लेकिन उसे खोलने पर अंदर से एक तीखी छुरी नजर आने लगी।
     अपनी जेब से ही रूमाल निकाल कर उसने उसे पानी से अच्छी तरह भिगो लिया और निचोड़ कर ले आया । केसर को उसने पेट के बल लिटा कर उसकी गोली लगी बाजू को देखा….. अब उसका गोली लगा कंधा आदित्य के सामने था। आदित्य ने केसर की चुन्नी का गोला सा बनाकर केसर के मुंह में रख दिया दोनों दांतों  के बीच चुन्नी को दबाए केसर चुपचाप पड़ी रही।
    आदित्य केसर के बालों में हाथ फेरने लगा और बहुत धीमे और प्यार भरे शब्दों में उसे समझाने लगा  ….

    “केसर बाईसा मेरी बात ध्यान से सुनना, अगर यह गोली आज के आज अभी नहीं निकाली गयी, तो उसका जहर पूरे शरीर में फैल जाएगा। मुझे नहीं पता यह ट्रेन कहां तक जाएगी , और कब रुकेगी ।    
   अस्पताल का इंतजार करने में कहीं देर ना हो जाए, मैं जानता हूं तुम्हारे भीतर भी राजपूती खून है। और तुम इस छोटे से दर्द को सह लोगी।गोली बहुत भीतर तक नहीं गई है ऊपर ही है। मुझे नजर आ रही है बस मेरे ऊपर विश्वास रखना। “

   धीमे धीमे बातें करते हुए आदित्य ने उस पैने औजार से कंधे पर जहां गोली लगी थी वहां आसपास जगह बनानी शुरू कर दी थी।  केसर को दर्द हो रहा था…. बहुत दर्द लेकिन शायद उसकी जिंदगी में जितने दर्द उसे मिले थे उससे यह दर्द थोड़ा कम ही था… वह चुपचाप अपनी चीख रोकने का प्रयास करती पड़ी रही। आदित्य ने एक दो बार उस घाव के आसपास कट बढ़ाने की कोशिश की और तीसरी बार में गोली की भीतरी सतह पर चाकू अटा कर उसे तेजी से ऊपर की ओर निकाल दिया।

एक झटके में गोली बाहर चली आई। उस गोली के निकलते ही खून का सैलाब सा बह निकला। आदित्य ने पानी से भीगे अपने रुमाल को छोटे से घाव में भर दिया। खून के कारण सफेद रुमाल रंग कर गुलाबी और फिर लाल हो गया…..
    
  केसर के ही दुपट्टे के दोनों छोर मिलाकर आदित्य ने उसके कंधे पर जोर से बांध दिया । इस सबके अलावा उन दोनों के पास कोई उपाय भी नहीं बचा था। दर्द के अतिरेक से केसर को बेहोशी छाने लगी। दर्द सहते सहते धीरे-धीरे उसने अपनी आंखें मूंद ली लगभग आधी रात के वक्त किसी स्टेशन पर गाड़ी धीमी हुई और आदित्य बेहोश केसर को उठाए स्टेशन पर उतर गया । सामान तो दोनों के पास भी कुछ नहीं था बस आदित्य की जेब में कुछ पैसे पड़े थे और उसके सारे क्रेडिट और डेबिट कार्ड पड़े थे। स्टेशन पर उतर कर धीरे-धीरे उसे साथ लिए आदित्य बाहर निकल गया। लगभग आधी रात का वक्त था पूरा स्टेशन सुनसान विरान पड़ा हुआ था। मुख्य द्वार से बाहर एक रिक्शावाला अपने रिक्शा में बैठा सो रहा था।
अपने चेहरे को अपने ही गमछे से ढके वह गहरी नींद में सोया पड़ा था कि आदित्य ने धीमे से उसे हाथ देकर जगा दिया।
    
” आस-पास कोई अस्पताल है तो ले चलो भैया।

  नींद से जागे रिक्शा वाले की नजर साथ खड़ी केसर पर नहीं पड़ी। उसने उनींदी सी नजर आदित्य पर डाली और बोल पड़ा

” ₹200 लगेगा!”

” हां जो लगेगा ले लेना फिलहाल इस वक्त अस्पताल ले चलो।”

रिक्शा वाले ने उसे बैठने का इशारा किया और पैडल मारने को हुआ कि तभी उसकी नजर केसर पर भी पड़ गई…

” दो सवारी है 300 लगेगा।”

“हां जो भी लगे ले लेना … लेकिन यहां का जो सबसे बड़ा अस्पताल है वहां ले चलो।”

“बड़ा छोटा सब एक ही है बाबूजी! यहां इस शहर में सिर्फ एकमात्र सरकारी अस्पताल है.. वही ले चलता हूं भगवान की कृपा हुई तो डॉक्टर साहब मिल जाएंगे वरना आपकी किस्मत।”


“ठीक है भाई जहां जो है ले चलो!”

रिक्शेवाले ने उन दोनों को रिक्शा में बैठा कर रिक्शा आगे बढ़ा दिया।  धीरे धीरे चलता रिक्शा कच्ची पक्की सी सड़क से होते हुए एक छोटे से सरकारी अस्पताल के सामने जाकर रुक गया। रात के 2:00 बज रहे थे अस्पताल का दरवाजा बंद था रिक्शा वाले ने उन दोनों को उतारा और जाने को हुआ कि, जाने कुछ सोचकर रुक गया और अस्पताल के दरवाजे पर जाकर उसने दरवाज़े पर लगी सांकल खटखटा दी…
  उसके खटखटाने के कुछ देर बाद अंदर से आवाज आई

“इतनी रात गए कौन है?”

” मैं हूं डॉक्टर साहब बिहारी अक्सर आपसे दवा लेकर जाता हूं!”

“इतनी रात में क्या हुआ बिहारी? क्या जरूरत पड़ गई?

आवाज अंदर से ही आ रही थी बिहारी ने फौरन उत्तर दे दिया …

“डॉक्टर साहब कोई मजलूम बाहर से आए हैं। स्टेशन से उन्हें लिए आ रहा हूं । शायद ट्रेन में पत्नी की तबीयत बिगड़ गई आप जरा देख लीजिए एक बार…

अबकी बार दरवाजा खुल गया नाइट सूट पर ओवरकोट डाले एक मध्यम उम्र के डॉक्टर साहब बाहर चले आए ।रिक्शेवाले को देखकर उन्होंने मरीज को लेकर अंदर आने का इशारा कर दिया । उनका इशारा पाते ही आदित्य केसर को लिए अंदर चला आया ।
    यह छोटी सी सरकारी डिस्पेंसरी थी, जिसमें बहुत ज्यादा सुविधाएं नहीं थी। रेजिडेंशियल डिस्पेंसरी होने से ओपीडी के पिछले हिस्से में जो दो कमरे थे उन्हीं में डॉक्टर ने अपना आवास भी बना रखा था। रात के समय अक्सर मरीज नहीं आया करते थे, इसलिए सिस्टर और बाकी स्टाफ की डॉक्टर साहब छुट्टी कर दिया करते थे। डॉक्टर का खुद का परिवार शहर में बसा हुआ था। वह अकेले अपनी सरकारी डिस्पेंसरी में पड़े रोगियों की सेवा में अपना वक्त बिताया कर रहे थे।

          केसर को मरीजों की जांच वाली टेबल पर लेटाने के बाद वह आदित्य की तरफ घूम गए …

  “हुआ क्या? मतलब क्या तकलीफ है इन्हें?”

    उनके सवाल पर आदित्य ने धीरे से रिक्शा वाले की तरफ देखा और डॉक्टर के पास चला आया । उनके कानों में फुसफुसाकर धीरे से उन्हें बता दिया..

  ” कंधे पर गोली लगी है ।”

डॉक्टर के हाथ से स्टेथोस्कोप छूटते छूटते बचा , उन्होंने रिक्शा वाले को देखा और रिक्शा वाले ने उन्हें और दोनों  एक साथ आदित्य को देखने लगे।

” गोली कैसे लगी? आप लोग हैं कौन? ये तो मेडिकोलीगल है फिर?”

डॉक्टर की बातें सुन आदित्य समझ गया था सब कुछ सच बताना उन दोनों के लिए खतरनाक होगा, लेकिन कुछ तो बताना ही होगा।  आदित्य आगे कहने लगा

“मैं आपको सब कुछ सच-सच बता दूंगा डॉक्टर साहब…. फिलहाल उनकी जान बचाने पर फोकस कीजिए।”

   “पर यह पुलिस का मामला है । इन्हें गोली लगी है, मुझे पुलिस को इनफॉर्म करना पड़ेगा। और इस कस्बे में कोई पुलिस थाना नहीं है। पुलिस को इनफॉर्म करके बुलाने में सुबह हो जाएगी।”

” जी डॉक्टर साहब आप घबराइए मत। हम दोनों खुद पुलिस के अधिकारी हैं। यह जो आपके सामने लेटी हैं यह खुद एक आईपीएस ऑफिसर हैं। हम एक केस सॉल्व करके लौट रहे थे, लेकिन हमने जो सबूत जमा कर रखे थे उन्हें हमसे छिनने के लिए ही हम पर गोलियां चलाई गई। और यह मैडम गोलियों का शिकार हो गई। आप चाहे तो मैं मेरे सबोर्डिनेट से आपकी बात करवा सकता हूं। लेकिन फिलहाल मेरे पास मेरे परिचय का कोई सबूत नहीं है। लेकिन यकीन मानिए आप हमारी मदद करके किसी भी तरीके की परेशानी में नहीं फसेंगे।”

आदित्य का लंबा चौड़ा डील डॉल देखकर उसकी बात पर यकीन नहीं कर पाने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। वह तो पैदाइशी पुलिस वाला दिख ही रहा था।

    केसर की भी लंबाई चौड़ाई और उसके चेहरे की मजबूती देखकर आसानी से आदित्य की बात पर यकीन किया जा सकता था, कि केसर कोई आईपीएस अधिकारी है। आदित्य ने सोच रखा था कि अगर डॉक्टर और भी ज्यादा सबूत मांगेंगे तो फिर समर के फोन पर कॉल करके वह उससे डॉक्टर की बात करवा देगा क्योंकि हाल फिलहाल और तो किसी का फोन नंबर उसे याद नहीं था। समर और अजातशत्रु के अलावा किसी के फोन नंबर उसे याद नहीं थे। अपनी इस परेशानी के लिए राजा  अजातशत्रु को परेशान करना उसे सही नहीं लगा। वह समर को फोन करने के बारे में आगे सोचता इसके पहले ही डॉक्टर ने केसर के कंधे पर बंधा दुपट्टा खोल दिया उसने आदित्य और रिक्शे वाले को बाहर जाने को कहा और केसर की चिकित्सा में लग गया।

गोली तो आदित्य ने पहले ही निकाल दी थी उस घाव की अच्छे से ड्रेसिंग करके टिटनेस का और बाकी पेन किलर आदि का इंजेक्शन देने के बाद डॉक्टर ने केसर को नींद की दवा देकर सुलाया और बाहर चला आया।

   आदित्य के सामने दवाइयों का पर्चा रखकर डॉक्टर अपनी कुर्सी में बैठ गया….

  “यहां से कहां जाना है अब आप लोगों को? “

आदित्य को तो यह भी नहीं पता था कि यह जगह कौन सी थी डॉक्टर को कुछ जवाब तो देना जरूरी था आदित्य ने दिल्ली कह दिया डॉक्टर कुछ देर उसका चेहरा देखता रहा फिर सोच में पड़ गया।

  ” आप दोनों की पोस्टिंग दिल्ली है तो आप वहां से इतनी दूर मध्य प्रदेश के मुरैना में क्या कर रहे हैं?”

” जी आपसे बताया ना हम यहां एक केस की तफ्तीश करने आए थे बस सबूत समेटकर निकलने ही वाले थे, कि उन लोगों को हम पर शक हो गया… आप तो जानते ही हैं चोर और पुलिस के बीच छत्तीस का आंकड़ा होता है जब जिसे मौका मिल जाए वह दूसरे पर गोली चला ही देता है।
कभी हम अपने दुश्मनों को ढेर कर जाते हैं, तो कभी वह हम पर भारी पड़ जाते हैं। हमारे साथ यह दिक्कत हुई कि हम भेस बदलकर उनके अड्डे पर गए थे, जिसके कारण हमारे पास ना तो इस वक्त हमारी यूनिफार्म है और ना ही सर्विस रिवाल्वर। यहाँ तक की हमारा परिचय पत्र भी हमने साथ नही लिया था। बल्कि सब कुछ हमने सुरक्षित होटल में छोड़ रखा था।”

“जी मैं समझ सकता हूं आपकी बात लेकिन सर्विस रिवाल्वर भी छोड़ दी। बिना रिवाल्वर के ही दुश्मन के अड्डे पर जाना कहां की बुद्धिमानी है?

“आप सही कह रहे हैं डॉक्टर साहब! लेकिन बहुत बार ऐसी मजबूरी का सामना हम लोगों को करना ही पड़ता है फिर भी कुछ ना कुछ औजार तो हम अपने पास रखते ही हैं । “

        कहकर आदित्य ने अपनी छिपी हुई कटारी निकालकर डॉक्टर के सामने रख दी…
  अपनी रॉयल गोल्डन ईगल गन उसने बड़ी चतुराई से ही छिपा रखी थी। वैसे दिखा तो सकता था लेकिन पुलिस की सर्विस  रिवॉल्वर और उसकी गन का अंतर बच्चा भी आसानी से पकड़ सकता था।
   और उस गन के सामने आते ही अपनी पहचान छिपाना बहुत मुश्किल हो जाता।

” यह देखिए …इसी की मदद से कुछ समय पहले इनकी कंधे पर लगी गोली निकाल चुका हूं।”

    डॉक्टर ने एक नज़र कटार पर डाली और हां में सर हिला कर चुपचाप बैठ गया

   “आप कुछ लेना चाहेंगे चाय या फिर कॉफी?”

आदित्य को चाय की तलब तो लगी थी लेकिन उस डॉक्टर पर पूरी तरह विश्वास भी नहीं कर पा रहा था। मुरैना शहर से लगा यह कोई छोटा सा कस्बा था जो मुरैना जिले के अंतर्गत आता था। अब तक वही एक किनारे जमीन पर बैठे रिक्शा वाले की भी नींद उड़ चुकी थी वह आदित्य से बुरी तरह प्रभावित नजर आ रहा था ।
   अब वह आदित्य के सामने हाथ जोड़े खड़ा हो गया…..

   ” हुजूर बाहर गुमटी से चाय लेता आऊं?”

आदित्य ने डॉक्टर की तरफ देखा और फिर रिक्शा वाले की तरफ घूम के हां में सर हिला दिया।
रिक्शावाला तुरंत मफलर से खुद को ढंकता बाहर निकल गया ।
डॉक्टर की तरफ घूम कर आदित्य ने एक बार फिर देखा और अपनी बात कहने लगा…

  ”  डॉक्टर साहब मैं जानता हूं मेरी बात पर विश्वास करना मुश्किल है, आप चाहे तो अब भी मैं किसी से भी आपकी बात करवा सकता हूं ।अगर आप चाहे तो मैं यही विजय राघव गढ़ के कलेक्टर शेखर जी,  शेखर मिश्रा जी से भी आपकी बात करवा सकता हूं।”

“आप शेखर मिश्रा को कैसे जानते हैं?

  डॉक्टर पढ़ा लिखा और जानकार आदमी था वह अपने प्रदेश के जिला अधिकारियों के बारे में जानता था उसकी यह नब्ज़ पकड़ में आते ही आदित्य के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान चली आई…

” जी शेखर मिश्रा ही क्या मैं तो बांसुरी अजातशत्रु सिंह जी को भी जानता हूं। फिलहाल दून में एडीएम के पद पर काम कर रही हैं। उन्हीं के साथ लीना जी भी हैं जो आईपीएस हैं। जी उनकी पहली पोस्टिंग मध्यप्रदेश में ही कही हुई थी।”

  “लीना मैडम को भी आप जानते हैं… चंबल में बहुत थोड़े वक्त के लिए पोस्टिंग थी उनकी।
एक बार उनकी भी बांह में गोली छूकर निकल गई थी उस वक्त यही से गुजर रही थी वो।  हमारे पास यही आयीं रहीं वो मरहम पट्टी करवाने।”

“अरे क्या बात कर रहें है डॉक्टर साहब! लीना मैडम आपके पास आई थीं?  हम सब ने एक साथ ही ट्रेनिंग कंप्लीट की है… लीना मैडम और यह जो अंदर लेटी हुई है ना  केसर मैडम इन दोनों ने साथ में आईपीएस की ट्रेनिंग पूरी की है।”

  अधिकारियों के नाम बुलाए जाने से अब डॉक्टर के चेहरे पर थोड़ा-थोड़ा भरोसा आदित्य को नजर आने लग गया था। आदित्य ने मन ही मन बांसुरी का शुक्रिया अदा किया” थैंक यू भाभी आज आप के और आपके दोस्तों के कारण जान जाते-जाते बची है।”

   सुबह तक में केसर की हालत में काफी सुधार आ गया था कुछ जरूरी दवाइयां अपने पास से ही देकर डॉक्टर ने आदित्य और केसर को विदा कर दिया! केसर को साथ लिए आदित्य उसी रिक्शे में बैठ कर एक बार फिर निकल गया।

  उस कस्बे में आस पास रुकने के लिए कोई लॉज या धर्मशाला नहीं थी।
   रिक्शेवाले से कहकर आदित्य ने उसे शहर जाने वाली किसी बस में बैठाने के लिए कह दिया ।छोटे से बस स्टैंड पर आदित्य और केसर को उतारकर वो रिक्शावाला वहां से चला गया । केसर को अच्छी तरह से शॉल में लपेटकर एक चाय की गुमटी में बैठाकर आदित्य वहां से निकल गया।

   कस्बा बहुत ज्यादा बड़ा तो नहीं था लेकिन घना बसा हुआ था। वहां जाकर 1-2 घर देखने के बाद ही आदित्य को अपने रहने लायक ठिकाना मिल गया.. मकान मालिक से चुपके से बात कर उसने तुरंत ही 2 महीने का एडवांस पेमेंट किया और केसर को लेने निकल गया दोपहर के वक्त जब पूरी बस्ती अपने अपने घरों में दुबकी पड़ी थी, चुपके से केसर को लिए सीढ़ियां चढ़ पर अपने कमरे में चला गया । इस बार उसने सोच लिया था कि केसर उसके साथ रहती है ये बात आसपास किसी को पता नहीं चलने देगा, क्योंकि जाहिर था ठाकुर के गुंडे उन दोनों को ढूंढ रहे थे इसलिए वह जहां भी पूछताछ करते वहां एक आदमी और एक औरत के रहने का ठिकाना ही पता करते । और अगर  केसर के साथ रहने के बारे में किसी को मालूम ही ना चले तो आदित्य के बारे में की हुई पूछताछ से भी गुंडे उन तक नहीं पहुंच पाएंगे। उसे बस अब केसर के ठीक होने का ही इंतजार था। उसे उम्मीद थी 10 से 15 दिनों में केसर ठीक हो जाएगी, लेकिन उसकी उम्मीद यहां गलत साबित हुई 2 दिन पूरी तरह से बेहोश रहने के बाद आखिर केसर को होश आ गया लेकिन होश में आने के बावजूद वह अपनी जगह से उठने और बैठने में लाचार महसूस कर रही थी। गोली उसकी हड्डी में जाकर लगी थी और शायद इसीलिए उसकी रीढ़ की हड्डी पर भी कुछ असर हो गया था। उसे सीधे बैठने उठने चलने फिरने सब में तकलीफ हो गई थी।
    आदित्य अकेला ही घर से बाहर जाता। जरूरत भर का सामान लेकर वापस आ जाता। उसने मकान मालकिन के बार बार पूछने पर भी काम वाली बाई के नाम पर मनाही कर दी थी।
    दो कमरे और एक रसोई का मकान था।  वह इन कमरों को खुद ही साफ कर लिया करता। यहां शिफ्ट होने के बाद घर की साफ सफाई और जरूरत भर के बर्तन वह खरीद लाया था। दूध वाले को भी ऊपर चढ़कर आने की उसने मनाही कर रखी थी। दूध के समय वह खुद नीचे बर्तन लिए चला जाता।

कुछ एक बार मकान मालकिन ने उसकी तरफ दोस्ताना हाथ बढ़ाने के लिए उसके दरवाजे पर ठकठक भी की लेकिन आदित्य ने कुछ ना कुछ बहाना बनाकर उनके बढ़े हुए दोस्ती के हाथ को हमेशा ही झटक दिया।
    वह वहां उन सभी से केसर को छुपाए रखना चाहता था । कपड़े भी अक्सर रात में धोया करता और सुखा दिया करता। सुबह बाकी लोगों के जागने से पहले ही वह कपड़े निकाल कर अंदर ले आता।
     खाना बनाना उसे नहीं आता था, लेकिन जो जितना आता वैसा ही कुछ भी बनाकर वह अपना और केसर का पेट भर लेता।

उसे लगा था पंद्रह दिन में केसर की हालत में इतना सुधार तो हो ही जाएगा कि वह समर को फोन कर अपने बारे में सूचना दे दे लेकिन पंद्रह दिन बस पलक झपकते बीत गए।
    केसर बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी। केसर की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी ।उसकी कमजोरी बढ़ती जा रही थी। आदित्य को समझ नहीं आ रहा था कि उसे क्या करना चाहिए? क्योंकि इस हालत में केसर को यहां से  लेकर निकलना उसकी जिंदगी से खिलवाड़ ही था… आखिर एक दिन वह केसर को वहीं छोड़ कर शहर चला गया। शहर में एक अच्छे डॉक्टर से मिलकर उसने उन्हें केसर से जुड़ी परेशानियों से अवगत कराया और डॉक्टर की सलाह पर जरूरी दवाइयां और जरूरी मल्टीविटामिन साथ लिए चला आया। डॉक्टर के अनुसार केसर को फिजियोथैरेपी की जरूरत थी लेकिन आदित्य किसी भी तरीके से फिजियोथैरेपिस्ट को अपने कमरे पर नहीं बुला सकता था ।
      आखिर उसने खुद ही कुछ आयुर्वेदिक तेलों की सहायता से केसर की मालिश शुरू कर दी ।
     उसकी रीढ़ की हड्डी पर की जाने वाली मालिश का धीरे-धीरे असर दिखने लगा और हफ्ते भर में केसर बिना किसी सहारे के धीरे से उठकर बैठने लगी….. आदित्य की सेवाओं का असर था कि केसर अब धीरे से अपने दोनों पैर जमीन पर रख बिना सहारे के धीरे-धीरे ही सही चलने लगी थी।
   हालांकि अपनी इस कोशिश में वह दो तीन बार अपना संतुलन बिगाड़ कर गिर चुकी थी, कई बार वह चलते हुए रो पड़ती लेकिन अक्सर आदित्य कुछ ना कुछ बहाना बनाकर उसे चलाने के लिए खड़ा कर ही देता।
   सुबह शाम उसे सहारा देकर वो अब रोज़ ही उसे चलाने लगा था।
   लेकिन अब कभी कभी वो उसे चलाने के लिए खड़ा करके कोई बहाना लगा कर अंदर भाग जाता और अंदर से छुप छुप कर वो केसर को देखा करता ।

  शुरू शुरू में आदित्य जब ऐसा करता तो केसर वापस मुड़कर अपने बिस्तर पर ही जाकर बैठ जाना चाहती, उस वक्त उसे वो दो कदम का फासला भी बहुत ज्यादा लगता। उतना सा चलना भी उसके लिए  भारी पड़ जाता, लेकिन धीरे-धीरे शायद केसर को भी समझ आने लग गया था कि आदित्य उसके साथ ऐसा क्यों कर रहा है ?और अब केसर भी अपनी सारी ताकत समेटकर इस जिद में आ गई थी कि अब उसे अपने पैरों पर चलना ही है।

उनकी मकान मालकिन और उनके आसपास की सखियों के लिए आदित्य अजूबा ही था। एक ऐसा लड़का जो रहता तो अकेले था लेकिन हर सामान हमेशा दो की संख्या में खरीदा करता था। सब्जियां भी हर रोज ताजी लिया करता अंडे भी रोज  लिया करता । दूध  दो लीटर लेता था। मकान मालकिन की समझ से परे था कि अकेला छह फुटिया लड़का कैसे रोज़ छह अंडे और 2 लीटर दूध पूरा का पूरा गप कर जाता है।

समय बीतता जा रहा था और उन्हें वहां रहते कुछ महीने गुजर चुके थे। अब तक आदित्य ने केसर को बाहरी दुनिया से छुपा कर ही रखा हुआ था।  केसर को भी उसने समझा दिया था कि वह खिड़की से बाहर ना झांके। कहीं किसी ने देख लिया तो मुश्किल हो सकती है। केसर अब आदित्य की हर बात चुपचाप मानने लग गई थी।

   आदित्य बाहर से कुछ सामान लेकर लौटा ही था कि दूध वाले का समय हो गया। वह सीढ़ीयां उतरता नीचे पहुंचा ही था कि आजू-बाजू की सभी महिलाओं को अपनी सीढ़ियों के पास ही मकान मालकिन से गप्पे मारते देख लिया उसने दूध लिया और वापस ऊपर मुड़ गया।

   रसोई में खड़ा वो चाय चढ़ा ही रहा था कि दरवाजे पर किसी ने ठकठक की। उसे समझ आ गया था कि इतने महीनों से जिन औरतों को वह मूर्ख बनाता आ रहा था आज उन सभी ने गोष्ठी करके उसका कच्चा चिट्ठा जानने  का मन बना ही लिया था।

उसने दरवाज़ा धीमे से खोल ही दिया….

… सामने समर खड़ा था…

******

     बांसुरी की महल वापसी के साथ ही महल में उसकी गोद भराई की तैयारियां शुरू हो गई थी।
शुभ तिथि मुहूर्त निकाल कर बाँसुरी की दोनो जेठानियाँ तैयारियों में लग गयी थीं।
    गोद भराई वाले दिन सुबह राजा को साथ लिए रूपा और जया कुल देवी के मंदिर में पूजा करवाने चली गईं थीं।
  गर्भावस्था में आठवें महीने के बाद मंदिर प्रवेश नहीं करने के नियम के कारण बाँसुरी नही जा पायी थी।  रेखा बाँसुरी के कमरे में ही उसके पास रुक गयी थी….   उसका बेटा वहीं पास ही खेल रहा था…..

” क्या हुआ रेखा आप कुछ परेशान हो?”

वहीं पास ही खेलते अपने बेटे को देखती बैठी रेखा ने आंखें उठा कर बाँसुरी को देखा और उसकी गीली आंखें देख बाँसुरी घबरा गयी..

” क्या हुआ ? आप तो रो रही हैं!”

  ” कितनी अजीब किस्मत है हमारी बाँसुरी। सोचो तुम्हारी और हमारी शादी एक ही दिन एक ही मुहूर्त में हुई उसके बावजूद कितना अंतर है हमारे वैवाहिक जीवन में। “

  बाँसुरी भी विराज के स्वभाव से परिचित थी। वो चुप ही बैठी रही…

” हम जानती हैं राजा साहब और विराज सा के स्वभाव में बहुत फर्क है !लेकिन फिर भी..
       सब कहते हैं अग्नि के फेरे जिंदगी बदल देतें हैं, फिर उन्हीं अग्नि के पवित्र फेरों में घूमने के बाद तुम्हारी जिंदगी इतनी संवरी हुई , और हमारी जिंदगी इतनी बिखरी हुई क्यों है ? बांसुरी यह मत सोचना कि हमे तुमसे जलन हो रही है.. हमने तुम्हारी तपस्या भी देखी है, समझी है । तुम्हारे और हमारे स्वभाव में भी अंतर है यह भी जानते हैं,लेकिन आखिर किस बात की सजा हमें हमारी  किस्मत दे रही है?
   बचपन से जिस घर को हमने अपना माना जिस राजपूताने की शान में अभिमान से भरे घूमा करते थे वह एक झटके में ही हमसे अलग हो गया।
   ना वह माता-पिता हमारे रहे और ना वो राजपूताना। उसके जाने के साथ ही हमारा अहंकार भी चला गया।
ब्याह हुआ और राज महल में चले आए कुछ समय के लिए रानी की पदवी भी मिली , लेकिन वह भी श्रापित।
   ऑंसू में लिपटी हुई कितनी रातें हमने सिसक सिसक कर अकेले अपने बिस्तर पर गुजार दी यह सोचते हुए कि जाने हमारे राजा जी कहां भटक रहे होंगे। हमारी तकलीफ कौन समझेगा?
   किसी समय हमारी भी यही चाहत थी कि हम रानी बने लेकिन शादी के बाद हमें समझ में आ गया कि हर एक पत्नी यही चाहती है कि उसका पति भले ही राजा ना हो लेकिन दिल से उसका पति ही बना रहे। काश विराज सा हमारी बात को समझ पाते। काश कभी वह हमें समझ पाते ।
    काश उनके अंदर का पुरुष हमारे अंदर की स्त्री को देख पाता लेकिन उनकी आंखों पर जाने किस बात की पट्टी बंधी है।
    विराज सा आज भी उसी झूठे अभिमान में डूबे बैठे हैं जिसमें कभी हम डूबे बैठे थे। लेकिन आज देखो जिंदगी की कड़वी सच्चाईयों ने हमें कहां लाकर पटक दिया । आज हमारे पास ना मायका ही बचा ना ससुराल। रानी मां थी तब तक एक आस थी कि हम भी इस महल का एक हिस्सा है, हमें भी यहां सम्मान मिलेगा लेकिन अब उनके जाने के बाद वह आस भी चली गई।”

” प्लीज ऐसा मत बोलिए रेखा। और किसी पर आप भरोसा करें या ना करें लेकिन हमारे साहब पर आप आंख मूंद कर भरोसा कर सकती हैं। जब तक वह गद्दी पर हैं आपको इस महल में आपका पूरा सम्मान मिलेगा। आप ऐसा क्यों सोचती हैं कि आज आप रानी नहीं है तो आपका सम्मान चला गया। अरे आप इस महल की एक सम्माननीय सदस्या तो हैं ही, इस महल के राजकुमार विराज सा की धर्मपत्नी भी हैं। आपने अपने आप को इतना कम क्यों आंक लिया। और सबसे बड़ी बात एक औरत की पहचान वह खुद होती है ।
    उसके अभिभावक उसका पति या उसका घर नहीं।

    आपकी भी अपनी खुद एक पहचान है, मैं तो यही कहूंगी कि आप अपने नाम से पहचानी जाये। इससे बढ़कर  कोई और बात नहीं।
    
     मुझे मेरे साहब से बहुत प्यार है, मैं अपने नाम के साथ हमेशा उनका नाम जोड़ कर रखना चाहती हूं। लेकिन अपना नाम खोना नहीं चाहती। मुझे मेरे नाम से भी उतना ही प्यार है। मैं सिर्फ रानी अजातशत्रु सिंह ही नहीं कहलाना चाहती मैं बांसुरी अजातशत्रु सिंह के नाम से पहचानी जाना चाहती हूं। और आपसे भी यही कहती हूं कि आप अपने आप को पहचानिए। आपके अंदर भी कोई तो बात है आप अपने उस हुनर को अपनी इस काबिलियत को पहचान कर अपने आप को खड़ा करने के लिए क्यों नहीं सोचती भला?
     आप क्यों हमेशा विराज सा का चेहरा देखती हैं, कि वह आप को सहारा दे।
      सिर्फ शादी हो जाने से ही यह तो नहीं हो जाता की पत्नी पति से अलग कुछ कर ही नहीं सकती? आखिर जिस ईश्वर ने आपके पति को यहां जन्म दिया उसी ईश्वर ने आपको भी तो गढ़ा है।
    तो आप अपने अस्तित्व को कैसे सिर्फ अपने पति के अस्तित्व में घोलकर खुद को भूल जाने पर आमादा है।
  अपने आप को पहचानिए रेखा, अपने आत्मविश्वास को जोड़िए। इस तरह आंसू बहाने से और किस्मत पर रोने से कुछ नहीं मिलने वाला। अपने हक के लिए आपको खुद आवाज उठानी होगी और मैं तो ये भी कहूंगी कि अगर आप विराज सा के साथ खुश नहीं है तो आप उनसे अलग हो सकती हैं।”

बांसुरी की कही अंतिम बातें सुन रेखा चौन्क कर उसकी तरफ देखते हुए मन ही मन सोचने पर  मजबूर हो गई …..क्या विराट से अलग होना उसके लिए इतना आसान होगा?
     वह अपनी सोच में गुम थी की सहायिकाये दोनों को बुलाने चली आयीं। रूपा और जया ने सारी तैयारियां कर रखीं थी।
बांसुरी को कार्यक्रम के लिए तैयार होने छोड़कर रेखा अपने कमरे में चली गई ।कुछ देर बाद ही रनीवास का दीवान खाना महल की औरतों और सेविकाओं से भरा हुआ था।
     रानी माँ को गुज़रे साल नही पूरा था इसी से कार्यक्रम सादा और पूरी तरह निजी रखा गया था….
   बाँसुरी ने जैसे ही अपने कमरे से बाहर कदम रखा उसकी आंखें आश्चर्य से चौड़ी हो गईं…..
    उसके सामने पूरे रास्ते गुलाबों की पंखडियाँ बिखरी पड़ी थी…
   एक तरफ फूलों से सजी पालकी तैयार रखी थी। पालकी के कहारों की जगह पर प्रेम, विराट और बाँसुरी के ताई जी के दोनों बेटों के साथ ही रेखा भी खड़ी थी।
  बाँसुरी आश्चर्य से भरी उन सभी को देखती खड़ी ही रह गयी….

  उसने सोचा ही नही था कि उसकी गोद भराई की रस्म इतनी भव्य होने जा रही है….
   उसे लगा था सिर्फ राजपरिवार की औरतें और कुछ खास आमंत्रित अतिथियों के साथ ही कार्यक्रम कर लिया जायेगा इसलिये उसने अपने मायके को बुलाने की इच्छा भी ज़ाहिर नही की थी…..
     लेकिन राजा अजातशत्रु तो राजा अजातशत्रु हैं, बाँसुरी के मन की बात कैसे नही समझते…..
   अपने मायके के लोगों को देखते ही बाँसुरी के चेहरे पर चमक चली आयी……
   

क्रमशः

दिल से….

   अभी पिछले कई भाग थोड़ा सिरियस मोड में चले गए थे, इसलिए अगले भाग में एक छोटे हिस्से में बाँसुरी की गोद भराई की रस्म होगी, जिसमें हम सब थोड़े मज़े कर पाएंगे। इसके साथ ही बाकी की कहानी आगे बढ़ेगी।

  राम जी से प्रार्थना है कि मेरी कहानी को बीरबल की खिचड़ी बनने से  बचा लो…
    पिछले पांच भाग से मैं ये सोच कर बैठी थी कि कहानी को 110वे भाग में समाप्त कर दूँगी लेकिन राजा अजातशत्रु जी तो अपनी कहानी समाप्त ही नही करने दे रहे।
  पर ऐसे कैसे चलेगा राजा जी? कही तो विराम लेना पड़ेगा।

  अभी फिलहाल सोच रहीं हूँ अगले चार या पांच भाग में कहानी को समेट लूँ,बाकी आगे जैसी राम जी की इच्छा।

     नई कहानी के बारे में भी एक प्लॉट सोच रखा है उसे जल्दी ही एक छोटी सी पाती (पत्र) के रूप में आपसे रूबरू करवाउंगी।

  तब तक सोचते रहिये की वैक्सीन लगवाना ज़रूरी है कि नही….
   … इसी बात पर एक खुरापाती किस्सा मेरी डिस्पेंसरी से ….

   एक महिला आयीं उन्होंने अपनी तकलीफ बताई और मैंने दवा लिख दी।
  फिर उन्होंने मुझसे सवाल किया…

” मैडम ये वैक्सीन लगवाने से हमारे पड़ोस की एक औरत खत्म हो गयी? तो कैसे वैक्सीन लगवाएं मैडम ?

   इसका जवाब देते वक्त मेरा खुरापाती दिमाग शैतानी पर उतर आया…

  क्या आप बता सकते हैं कि मैंने क्या जवाब दिया ?

  जवाब देते वक्त याद रखियेगा , संस्कारी बहुत हूँ मैं…

aparna …..




 
  







  

 

जीवनसाथी – 109




जीवनसाथी-109



उन दो कमरों के घर मे रहते हुए उसे और केसर को कुछ दिन ही बीते थे और आदित्य समर को फ़ोन करने की सोच ही रहा था  कि केसर सीढ़ियों पर से गिर कर चोट लगवा बैठी।
   
   भगवान जाने क्या किस्मत में लिखा बैठे थे कि वो चाह कर भी उस छोटी सी जगह से निकल कर सुरक्षित अपने घर नही पहुंच पा रहा था……

    मकान मालकिन उन दोनों को शादीशुदा जोड़ा समझ गाहे बगाहे केसर से इधर उधर की गप्पे मारने में  लगी रहती लेकिन केसर का ठंडा बर्ताव उनके जोश पर घड़ों पानी डाल देता।
   वो भी जुझारू महिला था इतनी जल्दी हिम्मत नही हारने वाली थी….
   कभी वो कढ़ी लेकर ऊपर पहुंच जाती तो कभी चने की भाजी। उन्हें अपने हाथों पर पूरा विश्वास था। उनके हाथों की बनी कढ़ी अच्छे अच्छों को पिघला सकती थी, फिर ये किस खेत की मूली थी…
   ऐसे ही एक शाम वो गरमागरम समोसे लिए ऊपर पहुंच गईं….
   केसर खिड़की से बाहर देखती चुपचाप बैठी कुछ सोच रही थी कि ये धमक पड़ीं…

” ये लो , हम सहीं वक्त पर पहुंचीं हैं ना! “

” कैसे ? ” केसर को बातें घूमा कर करने की आदत तो थी नही, उसके लट्ठमार जवाब पर वो दुगुने जोश से भर गयीं।

” अरे चाय का वक्त हो रहा ना, हमें लगा तुम मियां बीवी चाय पी रहे होंगे , समोसे पहुंचा दें… तुम्हारी चाय का स्वाद बढ़ जाएगा।

  केसर ने एक नज़र उन्हें देखा और मुस्कुरा कर समोसे की प्लेट लेकर रख ली, लेकिन वो अब भी खड़ी हीं थीं…

” ले तो ली आपसे प्लेट! अब जा सकती हैं आप!”

  ऐसे जवाब की आस तो नही थी उन्हें पर वो कौन सा जंग हारने आयी थी यहाँ..

” खाली समोसे देकर थोड़े न निकल जाएंगे, अब तुम दोनों की चाय बनाओगी ही तो हमारी भी चढ़ा लो..!

  गुस्से में उन्हें घूरती केसर प्लेट पकड़े रसोई की ओर चली गयी और जाते जाते भी एक चिंगारी छोड़ ही गयी….

” चाय नही पीते हम लोग। हम कुछ और पीते हैं , पियेंगी?”

  केसर को लगा नही था कि उन्होंने सुन लिया होगा, पर आशा के विपरीत वो सुन चुकी थीं…..

” चाय नही पीती तो क्या पीती हो? काफी…हम काफी भी पी लेंगी!”

  केसर ने रसोई में घुस कर अपना माथा पीट लिया, कि तभी बाहर से आदित्य अंदर चला आया… सीढियों पर ही उसे आवाजें सुनाई पड़ चुकी थी। मकान मालकिन को नमस्ते कर वो फटाफट रसोई में घुस गया…
    रसोई में केसर बर्तन इधर उधर करती गुस्से में खड़ी थी… उसे समझ ही नही आ रहा था कि करे क्या?
  आदित्य ने फटाफट एक बर्तन लिया और पानी गैस पर चढ़ा दिया…आदित्य को देख उसके चेहरे पर राहत चली आयी..

” हम क्या करें आदित्य? हमें तो चाय तक बनानी नही आती? और ये मुटल्लो धमक पड़ी चाय पीने। हद हैं यार ये औरतें भी। समोसे जैसी जेओमेट्री बना सकती हैं तो चाय भी खुद क्यों नही बना ली। जब समोसा ला  ही रही थी चाय भी ले आतीं।”

  आदित्य को हंसी आ गयी…

” मिडिल क्लास में ऐसा ही होता है केसर! “

” व्हाट द .. ” केसर कुछ बोलते बोलते रुक गयी और वहीं किनारे रखी वाइन उठा कर गिलास में डालने वाली थी कि आदित्य ने हाथ बढ़ा कर उससे छीन लिया….

“अभी मत पियो केसर, वो बैठीं हैं बाहर। उन्हें समझ आ जायेगा? “

” तो क्या हुआ? हमें कोई फर्क नही पड़ता? “

” पड़ता है। हमें अभी फर्क पड़ता है। हम ठाकुर के गुंडो से छुप कर रह रहें हैं।अगर कही से भी भनक पड़ गईं उन लोगो को तो हमारा बचना मुश्किल हो जाएगा।
   इसलिए हमें यहाँ यहीं के लोगो जैसे रहना होगा। “

  केसर ने बोतल वापस रख दी…

” क्या कह रहे थे तुम? ये मिडिल क्लास क्या होतीं हैं ?

  चाय खौल चुकी थी, उसे छानते हुए आदित्य मुस्कुरा उठा…” चलो बढ़िया है कि तुम इनके बारे में जानना चाहती हो। इनसे ज्यादा इरिटेट मत होना। ये मध्यम वर्गीय परिवार और खास कर इनके घरों की औरतें ऐसी ही होती हैं। हर किसी से घुल मिल जाती हैं। इनके लिए एक तरफ तो इनका घर परिवार ही पूरी दुनिया है दूसरी तरफ पूरी दुनिया को ये अपना परिवार मान लेती हैं।
  ये सभी के लिए इतनी ही स्वीट होतीं हैं। कोई अनजान आदमी भी इनके घर आएगा, तो ये उसे चाय पिलाये बिना जाने नही देती।
   इनके लिए प्यार जताने का सबसे सामान्य तरीका है उसे खिलाना पिलाना।
  ये तुमसे दोस्ती करना चाहती हैं इसलिए तुम्हारे लिए हमेशा कुछ न कुछ बना कर लाती रहतीं हैं। और तुम अपने घमंड में उनके लाये सामान फेंकती रहती हो!

” घमंड में नही फेंकते। हमसे वो सब अजूबा खाया ही नही जाता!”

” तुमने चख कर देखा भी है कभी वो अजूबी चीजें? जो उनका स्वाद जानोगी? आजतक नौकरों के हाथ का बना ही तो खाती आयी हो… अब पहली बार कोई तुम्हारे लिए स्पेशली कुछ बना कर ला रहा तो उसकी ज़रा सी कदर कर लो..
  चलो आओ उनके साथ ही बैठ कर चाय के साथ ये समोसे खा कर देखो!”

” पर सुनिए आदित्य, ये समोसे वो सिर्फ हम दोनों के लिए लाई हैं वो बस चाय पियेंगी। ऐसा उन्होंने ही कहा।”

” भले ही ऐसा उन्होंने कहा हो लेकिन अंदर से वो चाहती हैं हमारे साथ बैठ कर खाना। वरना देखो क्या इतने समोसे तुम् खा पाओगी। चिड़िया सी तो तुम्हारी डाइट है और जब से यहाँ आयी हो, सिर्फ प्रोटीन शेक पर ही ज़िंदा हो। खैर आज मैं राशन का सामान ले आया हूँ। आज रात में कुछ बना कर खाएंगे। मैं ये रोज़ रोज़ अंडा ब्रेड और मिल्क शेक पी पीकर थक गया हूँ।”

  आदित्य ने ट्रे केसर के हाथ में दी और उसे बाहर निकलने को पीछे से हल्का सा धक्का दे दिया…
   केसर को बहुत अजीब लग रहा था, वो कभी ऐसे ट्रे लिए नही चली थी। उसने फटाफट बाहर जाकर ट्रे टेबल पर पटक दी…
   मकान मालकिन के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी…
आदित्य ने चाय का कप उठा कर उनके हाथ में दिया और खुद अपनी चाय लिए एक कुर्सी पर बैठ गया। केसर आदित्य की तरफ देखने लगी…

” बहुरिया को चाय नही पकड़ाई तो देखो कैसे नाराज़ हो गईं हैं…!”

आदित्य भी मुस्कुरा उठा, उसने एक समोसा उठा लिया… ” खुद ले लेगी”!

  आदित्य को एक नज़र घूर कर केसर ने भी एक समोसा उठा लिया। समोसा मुहँ में रखते ही उसकी आंखें चौड़ी हो गयी…
   ऐसा अमृत सा स्वाद भी हो सकता है किसी वस्तु का , उसने आज तक सोचा ही नही था।
   सालों से उसका एक बंधा बंधाया नाश्ता था। जिम करने के बाद वह अक्सर अंडे और प्रोटीन शेक ही पिया करती थी, इसके अलावा उसने कई सालों से कोई और नाश्ता किया ही नहीं था। दोपहर के खाने में भी वह अक्सर नॉनवेज ही खाया करती थी वही हाल रात के खाने का भी था।
   अपनी अब तक की जिंदगी में उसने समोसे शायद पहली बार ही खाए थे एक खत्म कर उसने दूसरा उठा लिया।
    खुद में मगन केसर को समोसे खाते देख आदित्य को हंसी आ गई…. ” समोसों के साथ चाय भी पीकर देखो। और मज़ा आएगा!”

  आदित्य की बात सुन समोसे के साथ ही चाय पीने के चक्कर में हड़बड़ाहट में केसर ने अपना मुंह जला लिया । समोसे का तीखापन उस पर गर्म चाय! वो अपने हाथों से मुहँ के सामने हवा कर रही थी कि हंसते हुए आदित्य ने उसे पानी की ग्लास पकड़ा दी..

” ज़रा सब्र कर के खाओ। सारे तुम्हारे ही हैं। ” आदित्य का हँस हँस कर बुरा हाल था, उसे हंसते देख मकान मालकिन भी मुस्कुरा उठी…
    अपनी चाय खत्म कर उन्होंने कप नीचे रखी और प्रशंसात्मक दृष्टि से केसर को देखने लगी….

” चाय बड़ी बढ़िया बनाई है बहुरिया ने। खाना वाना तो बढ़िया बनाती ही होगी? “

  आदित्य ने मुस्कुरा कर हां कह दिया…

मकान मालकिन को मुस्कुराते देखा आदित्य ने एक छौंक और लगा दी….

” जल्दी ही कुछ बनाकर पहुंचाएगी आपके पास किसी दिन।”

अब तक दो समोसे टिका चुकी केसर ने घूर कर आदित्य को देखा और खुद को चाय के कप में डूबा दिया। उसे चाय पीते देख मकान मालकिन वहाँ से उठ गयीं….

“हम चलतीं हैं अब शाम के खाने की तैयारी भी करनी हैं। आज मंगोड़ी बनानी है। आप लोग खाते हैं क्या? अगर पसन्द है तो हम भेज देंगी। ”

” हम सांप और चमगादड़ छोड़ कर सब खा लेते हैं.”

  आदित्य की बात पर हंसते हसंते वो नीचे चली गयी…
”  कुछ भी बोल देता है यह लड़का, बड़ा मजाकिया है।”

  उनके जाते ही आदित्य ने दरवाज़ा बंद किया और अंदर चला आया..

” क्यों कैसे लगे समोसे केसर बाई सा? “

  आदित्य अब भी मुस्कुरा रहा था, केसर ने एक नज़र उसे घूरा फिर वापस समोसे की प्लेट देखने लगी..

“नो ! तीसरा खाने की सोचना भी मत। अभी तुम्हारे लिए दो ही बहुत हैं। कुछ समय पहले ही बिस्तर से उठी हो।अभी अपने पाचन तंत्र पर ज्यादा लोड मत दो चाय खत्म कर लो फिर ये बर्तन अंदर रखा आना।”

” माय फुट! हम नही रखने जा रहे कुछ अंदर!”

” ओह बाई सा! यहाँ कोई आपका नौकर नही है।।अपने काम खुद ही करने पड़ेंगे। “

  केसर ने दूसरी तरफ मुहँ फेर लिया और आदित्य हंसते हुए सारे बर्तन समेटे रसोई में चला गया….
आदित्य के बर्तनों को साफ करने की आवाज़ सुन नाराज़गी से केसर भी अंदर चली आयी और उसके हाथ से बर्तन ले लिए…

” जाइये इतना भी एहसान करने की ज़रूरत नही है हम पर। हम धो लेंगे। “

” आपको बर्तन धोने आतें हैं। सिर्फ पानी से साफ नही करना है। वो जो सोप रखा है ना उसे भी लगाइए … हाँ ठीक ऐसे ही, अब पानी से साफ कर लीजिए। “

  नाराजगी से कुढ़ती केसर बर्तन साफ करती रही और आदित्य एक समोसा उठाये गुनगुनाता हुआ बाहर चला गया….

*******

  चुनाव की तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी थीं । आज शाम राजा के ऑफिस में उम्मीदवारों के नामो की घोषणा होनी थीं।
   किस किसको उम्मीदवार घोषित किया जाना था और किस जगह से उन्हें चुनाव लड़ना था यह सारी घोषणाएं आज शाम होनी तय थी। राजा ने विराज को भी बुला रखा था।
            इसके साथ ही 2 दिन बाद माया नगरी विश्वविद्यालय का उद्घाटन भी होना था। सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं….
   यहाँ तक कि अलग अलग महाविद्यालयों का नामकरण भी हो चुका था। वाणिज्य और कला संकाय का नाम जहाँ रानी रूपमती कला महाविद्यालय था वहीं राजा युवराज सिँह क्रीड़ा महाविद्यालय था…
  रानी बाँसुरी अजात शत्रु सिंह जहाँ चिकित्सा महाविद्यालय था वहीं राजा अजातशत्रु सिंह अभियांत्रिकी महाविद्यालय था।
    महाराज के नाम पर विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी का नामकरण हुआ था तो रानी माँ के नाम पर कला वीथिका नामांकित थी।
    कॉमर्स कॉलेज जहाँ विराज के नाम पर था वहीं फोटोग्राफी से सम्बंधित कॉलेज का नाम विराट पर था।
    बराबरी से सभी को कार्यभार दिया गया था। चिकित्सा महाविद्यालय के लिए जहाँ पुराने और अनुभवी डॉक्टरों की टीम मुहँमांगी कीमत पर आयात की गई थी वहीं अभियांत्रिकी महाविद्यालय के लिए भी नवरत्न कंपनियों के रिटायर्ड इंजिनिंयर्स और बड़े नामचीन महाविद्यालयों के प्रोफेसर और लेक्चरर आदि थे।
    इसी तरह से सारे महाविद्यालयों के लिए लेक्चरर और प्रोफेसर इकट्ठे किए गए थे। हर एक महाविद्यालयों की अपनी-अपनी प्रशासनिक कार्य प्रणाली और टीम अलग अलग थी लेकिन उन सब के ऊपर भी एक टीम बनाई गई थी जिस टीम में अधिकतर सदस्य राजमहल से थे कुछ अन्य अधिकारी भी थे।
विश्वविद्यालय का मुख्य कर्ताधर्ता विराज को बनाया गया था इसके साथ ही उसकी सहायता के लिए युवराज समर और खुद अजातशत्रु भी मौजूद थे। विश्वविद्यालय की सीईओ के पद के लिए चुने गए नामों में जब मतदान करवाया गया तो सबसे अधिक मतों के साथ निरमा उस पद के लिए चयनित हुई थी। निरमा को भी चयन के पहले तीन तरह के साक्षात्कार के दौर से गुजरना पड़ा था उसके बाद ही उसे उस पद के उपयुक्त पाया गया था। दो दिन बाद सभी पदाधिकारियों को भी अपनी पदों की शपथ लेनी थी। महल में सभी व्यस्त थे राजा शाम की मीटिंग के लिए पहुंच चुका था समर युवराज भैया विराट काकासाहेब प्रेम आदि के साथ बाकी जिन लोगों को राजा ने बुलवाया था सभी आ चुके थे सिर्फ विराज नदारद था।
   
    सभी आपस में चर्चा कर रहे थे, समय बीतता जा रहा था लेकिन विराज का कोई अता पता नही था। आखिर राजा ने जो मुख्य मुद्दा था उसी पर चर्चा शुरु कर दी…
    उसने जिन जिन स्थानों से अपने उम्मीदवार खड़े करने थे उनकी लिस्ट समर के हाथ में थमा दी… ग्यारह लोगों के नामों की लिस्ट में ठीक पांच मिनट पहले राजा ने कोई बदलाव किया था। उस बदलाव के बाद जब समर ने वो लिस्ट पढ़नी शुरू की ठीक उसी समय विराज भी वहाँ पहुंच गया…
    उम्मीदवारों में अधिकतर वही नाम थे जिनके बारे में महल में शुरू से चर्चा थी कि ये लोग राजा की टीम का हिस्सा हो सकतें हैं। उनमें कुछ राजा के पुराने दोस्त थे, तो कुछ  महाराज के पूर्व परिचित थे।
   राजा ने समर प्रेम और युवराज के नाम भी प्रस्तावित किये थे लेकिन ये तीनो ही लोग सक्रिय राजनीति में उतरे बिना ही अपरोक्ष रूप से राजा का समर्थन और सहायता करना चाहते थे इसलिए महल से सिर्फ दो ही लोगो के नाम उम्मीदवारी में थे। एक विराज और दूसरा स्वयं राजा अजातशत्रु सिंह!

     अंतिम समय में राजा ने सिर्फ उम्मीदवारों के खड़े होने की जगहों में मामूली बदलाव करवाये थे और उन्हीं बदलावों से विराज एकाएक चिढ़ उठा..

” हमने पहले ही कहा था कि हम राजपुर से चुनाव लड़ना चाहते हैं, आपने हमें भुवाली से टिकट दी है। ऐसा क्यों? मतलब आप जानबूझ कर हमेशा वही करेंगे जिससे हमें नीचा देखना पड़े।”

” विराज अभी मैं इस बात का कोई जवाब नही देना चाहता। आज बस स्थान का आबंटन था। अब सभी को अपना अपना नामांकन भरने जाना है उसके बाद देखेंगे।”

” उसके बाद देखने के लिए बचा ही क्या? सबसे कमजोर सीट दे दी हमें। जहाँ से पता है हम नही जीत सकते। “

” भुवाली में जनसंख्या बाकी जगह से कम है,वहाँ पर अच्छे से कैम्पेन कर के हम वहाँ के सारे वोट खींच सकते हैं इसलिए तुम्हे  वहाँ से लड़वा रहें हैं। राजपुर से लड़ना तुम्हारे लिए मुश्किल होगा विराज। वो एक बड़ा विधानसभा क्षेत्र है। “

” हाँ इसलिए उसे खुद के लिए रखा है ना। पर याद रखना, तुम कुल ग्यारह सीट से लड़ रहे हो अजातशत्रु! सारी सीट्स जीत भी गए तो भी पावर में पार्टी आने लायक तो नही ही कर पाओगे।  किसी न किसी पार्टी से हाथ तो मिलाना ही पड़ेगा। “

” वो सब बाद कि बातें हैं। अभी बस इन ग्यारह जगहों पर ही ध्यान देना है,बाकी बाद में देखेंगे। “

” मुझे मंज़ूर नही है, मुझसे कहीं ज्यादा अच्छी सीट तो तुमने बाकियों को बांट रखी है। हर जगह तुम्हारा मुझसे बैर ही नज़र आ रहा है मुझे। “

  ” ठीक है जैसी तुम्हारी मर्ज़ी! अगर चुनाव नही लड़ना चाहते हो तो तुम यहाँ से जा सकते हो। “

  राजा भी अब विराज की हरकतों से परेशान हो चुका था , ऐसे में उसका नाराज़गी से विराज को जाने कह देना विराज को और भी नाराज़ कर गया। वो अपनी जगह से उठने ही वाला था कि कुछ सोच कर वापस बैठ गया…
   मन ही मन उसके कोई षड्यंत्र चल ही रहा था। उसने जो भी सोच रखा हो लेकिन अब भी वो राजा अजातशत्रु को पूरी तरह से शायद जान नही पाया था।

******

      तैयारियों में व्यस्तता से प्रेम रात ज़रा देर से घर लौट पाया था…..
   निरमा अपना सारा काम निपटा कर मीठी का होमवर्क करवाती बैठी थी कि प्रेम की गाड़ी की आवाज़ आयी और मीठी भागती हुई बाहर निकल गयी।
   गाड़ी खड़ी कर प्रेम ने मीठी की गोद में उठा लिया, और मुस्कुराते हुए भीतर चला आया….
   मीठी धीमे शब्दों में अपने पापा से अपनी मम्मा की बुराई कर रही थी और बहुत गंभीरता से प्रेम उसकी बातों को सुन रहा था और धीरे धीरे मुस्कुरा रहा था…

” अच्छा तो आज मम्मा ने मीठी को ज़ोर से डांट लगाई। क्यों भई मम्मा ये क्या बात हुई भला, हमारी स्वीट सी एंजेल को क्यों डाँटा गया है ? “

” आपकी स्वीट एंजेल से पूछिए कहाँ कहाँ से ऐसी खुरापातें सीख कर आती है ? “

” क्यों ऐसा क्या हुआ एंजेल? “प्रेम ने मीठी की तरफ देखा, तो मीठी ने अपने पापा के कंधों पर मुहँ छिपा लिया…

” मैंने सुबह इसे यहाँ लिखने बैठाया और किचन में अपना काम निपटा रही थी, तो ये शैतान होमवर्क करने से बचने के लिए बाहर चली गयी, और वहाँ ज़ोर से इसने कुछ गिरा दिया। मैं घबरा कर भागती हुई वहाँ पहुंची तो ये जनाब वहाँ बगीचे में बैठी रो रहीं थीं। मैंने पूछा क्या हुआ मीठी तो इसने अपनी बाजू मेरे सामने कर दी। मैं घबरा गयी क्योंकि इसके बाजू में से खून बह रहा था।  मैं तुरंत उसे उठाकर अंदर भागी, इसे चुप करवाने लगी, मैंने जल्दी से कॉटन लेकर इसकी बाजू को साफ किया तो क्या देखती हूं यहां तो स्किन बिल्कुल साफ है, मुझे कहीं कोई जख्म नजर नहीं आया । जब मैंने घूर कर इसे देखा और कड़क कर पूछा कि यह क्या था , सच बताओ वरना पिटाई कर दूंगी। तब इस शैतान की बच्ची ने धीरे से कहा कि इसने अपने हाथ में टोमेटो सॉस लगाया था। जिससे कि मुझे ऐसा लगे हाथ से खून बह रहा है, और मैं इसे लिखने को ना कहूं। अब बताइये आप शैतान की खाला है कि नही? इसकी पिटाई होनी चाहिए या नही? “

” अरे बस बस मम्मा! थोड़ा ठंडी हो जाइए और पहले एक बात डिसाइड कर लीजिए..”

” क्या ?”

” वो ये कि मीठी अगर शैतान की बच्ची है तो मैं और तुम क्या हैं?”

  अपने पापा की बात पर मीठी खिलखिला कर हँस पड़ी और वापस अपने पापा से चिपक गयी…
   बनावटी गुस्सा चेहरे पर लिए निरमा रसोई में चली गयी…

” बस ऐसे ही सर पर बैठा रखिये और बिगाड़ दीजिये लड़कीं को। कल को ससुराल जाएगी और अगर किसी ने मुझे दो बातें सुनाई तो मैं तो कह दूंगी, इसके पापा की कारस्तानी है सब। मैं नही जानती।”

” मेरी प्रिंसेस ससुराल क्यों जाएगी मैं तो ऐसा लड़का चुनूँगा जो यहाँ मेरे साथ आकर रहे। कोई भी मुझे मेरी बेटी से अलग नही कर सकता, उसकी माँ भी नही। “

  रसोई में झांक कर प्रेम ने अपनी बात की आखिरी लाइन कही और गोद में मीठी को लिए टहलता रहा।
      चार बरस की होने पर भी अब भी मीठी की सोने की आदतें नही बदली थी।
जब तक प्रेम उसे गोद में लेकर इधर से उधर एक दो चक्कर न लगा ले वो सोती नही थी।
   कुछ दस मिनटों में ही मीठी गहरी नींद सो गई, उसे अंदर ले जाकर निरमा ने उसके पलंग पर सुला दिया…

     खाने की टेबल पर प्रेम के सामने थाली परोस कर निरमा ने रखी और खुद रसोई में चली गयी…

” तुम भी अपनी थाली ले आओ न। रोज़ रोज़ तुमसे कहना पड़ता है।”

“और रोज़ रोज़ मैं आपसे कहती हूँ कि आपको गरमागरम फुल्के खिलाने के बाद ही मैं अपनी परोस कर लाऊँगी।”

  निरमा अपनी थाली भी ले ही आयी, लेकिन आज उसका मन खाने में नही लग रहा था….

” क्या हुआ? कुछ परेशान सी लग रही हो? “

निरमा ने प्रेम की तरफ देखा और अपने मन की बात कहने लगी…

” मुझे कुछ ज्यादा ही बड़ी जिम्मेदारी नही सौंप दी राजा भैया ने? बस वही सोच सोच कर परेशान हूँ क्या इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाने लायक हूँ मैं? कहीं ये पोस्ट मुझे सिर्फ आपके रुतबे के कारण तो नही मिली? “

” ऐसा सोचना भी मत निरमा। हुकुम बहुत बड़े दिल वाले हैं ये बिल्कुल सही बात है लेकिन व्यवहारकुशल भी उनसा कोई नही होगा।
   तुम्हें अगर इस पोजीशन पर बैठाया है तो कहीं न कहीं तुम्हारी कोई ऐसी खूबी तो देखी ही होगी वरना इतने लोगों के ऊपर तुम्हें बिना तुम्हारी योग्यता के बैठा कर वो अपना और अपनी यूनिवर्सिटी का नाम खराब नही होने देंगे।
   और खासकर तब जब ये उनके बाबा हुकुम का सपना रहा हो और उस सपने को अपनी दादी हुकुम के सामने पूरा करने जा रहे हों।
   तुम बिल्कुल निश्चिन्त रहो, और कल की तैयारी कर लो। मुझे मेरी निरमा पर पूरा भरोसा है वो सारे काम कुशलता से निपटा लेगी और फिर कहीं कोई दिक्कत या परेशानी आयी तो मैं तो हूँ ही तुम्हारे पीछे।
   तुम्हें हमेशा सपोर्ट करने के लिए। “

  निरमा की आंखें छलक आयीं। उसे इस वक्त बस यही डर सता रहा था कि वो इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभाल सकेगी या नही लेकिन प्रेम की बातों ने उसके आत्मविश्वास को थोड़ा सा ही सही बढ़ा दिया था….

    अगले दिन पूरी रियासत में त्योहार सा दिन था… रियासत से कुछ दूर मायानगरी को बसाया गया था। प्राचार्य प्रधानाचार्य आदि शिक्षक गणों को उनके लिए बनाई कॉलोनी में बसाया जा चुका था।
   मायानगरी के अंदर खोली गई छिटपुट दुकाने मिल्क पार्लर , कैंटीन, आइसक्रीम पार्लर खुल चुके थे। मायानगरी के उद्घाटन के अगले दिन से वहाँ एडमीशन शुरू होने थे।

    मुख्य द्वार से मंच तक गुलाबों से ढका कालीन बिछा था। मुख्य द्वार से ही अंदर प्रवेश करते ही राजा के दादा हुकुम की विराट प्रतिमा लगी थी। उस प्रतिमा के चारों ओर गोलाकार फव्वारा था जो रंगबिरंगी रोशनियों का पानी प्रतिमा के चरणों पर गिरता किसी म्यूज़िकल फाउंटेन का सा समा बांन्ध जाता था।
   परिसर विशाल था,दूर दूर तक शिक्षा का प्रताप नज़र आ रहा है। हर एक महाविद्यालय का अपना अलग परिसर था। हर एक परिसर में बाहर उसी से सम्बद्ध व्यक्ति की प्रतिमा स्थापित थी। महाविद्यालय के बाहर एक बड़े बोर्ड में सारा ले आउट बना कर लगाया गया था।
      हर एक संस्थान अपने आप में पूर्ण होते हुए मायानगरी का अभिन्न अंग बना हुआ था।
   लेकिन मायानगरी खुद में सम्पूर्ण थी…

  मंच पर सभी गणमान्य अतिथियों के आगमन के साथ ही समर ने कार्यक्रम को शुरू करने की घोषणा करने के लिए राजा अजातशत्रु को बुलाया और उनके घोषणा करने के साथ ही दादी साहेब को सहायिकाएं अपने साथ ले आयीं।
     महाविद्यालय परिसर में पंडित जी द्वारा पूजा करवाये जाने के बाद  नारियल फोड़ कर श्री गणेश किया गया… और दादी साहेब ने अपने हाथों से फ़ीता काट कर शुभारंभ कर दिया….

   निरमा ने आगे बढ़ कर दादी साहेब के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और मंच पर चली आयी…

   मायानगरी की शुभ शुरुवात हो चुकी थी।

*****

      ऐसा नही था कि आदित्य को खाना बनाना आता था , फिर भी किसी तरह उसने अपनी अक्ल लगाकर कुछ सब्ज़ियों के साथ चावलों को मिला कर पका लिया, और पुलाव तैयार हो गया…
   केसर बाहर बैठी कोई पुराना अखबार पढ़ रही थी। कुछ देर में भूख लगने पर वो अपना मिल्क शेक बनाने रसोई में आई तब आदित्य उन दोनों के लिए प्लेट्स में खाना परोस रहा था…

” ये क्या बना लिया और कब बनाया? “

” जब तुम अखबार में डूबी हुई थीं तब… वैसे अभी भी पैर ठीक नही हुआ है तो इतना भागदौड़ मत करो वरना परेशानी में पड़ जाओगी। ”

“क्या है ये ? वेजेटेबल राइस? “

” यस बाई सा, इसे पुलाव भी कह सकतें हैं। आइये खा कर देखिए ज़रा हमारे हाथों का कमाल।”

  दोनों बैठ ही रहे थे कि दरवाज़े पर फिर खटका हुआ। मुहँ बना कर केसर ने आदित्य की तरफ देखा…

” पक्का वही मुटल्लो आयी होंगी, कुछ लेकर। “

” एक तो तुम्हारे लिए कुछ न कुछ लेकर आतीं हैं उस पर तुम उन्हीं पर नाराज़ होती हो। हद है। मना कर दें क्या उन्हें ? यहाँ आने के लिए।

  इतनी देर में आदित्य ने दरवाज़ा खोल दिया था। मकान मालकिन ही थीं, उन्होंने बाहर ही से एक कटोरी आदित्य को पकड़ाई और चली गईं।
  आदित्य ने उन्हें धन्यवाद कह कर दरवाज़ा  बंद कर लिया….

  ” अरे इतनी जल्दी चली गयी वो चैटर बॉक्स? “

  आदित्य ने केसर की तरफ वो कटोरी बढ़ा दी। कटोरी में देसी आम का अचार था।
   एकबारगी आम के अचार की मनमोहक खुशबू से ही केसर की आंखें बंद हो गयी..

“पिकल ? “

“हां लेकिन ये तुम्हारे विदेशी पैक्ड पिकल नही हैं। टेस्ट कर के देखो, आज तक ऐसा स्वाद नही मिला होगा कहीं।”

आदित्य की बात पूरी होने से पहले ही केसर ने एक फांक उठा कर मुहँ में रख ली, और उस अनुपम स्वाद के अवर्णनीय सुख में पूरी तरह से डूब गई…

कुछ देर आंखे बंद किये उस स्वाद में डूबने उतरने के बाद जब केसर ने आंखें खोली तो आदित्य उसे देखता बैठा मुस्कुरा रहा था…

” ऐसे क्या देख रहे हो? “

” देख रहा हूँ तुम्हारी लाइफ से कितनी चीजें मिसिंग थी आज तक। अचार विचार कुछ भी तो नही चखा है आज तक तुमने। खैर ये बताओ कैसा लगा तुम्हे अचार? “

” बहुत बहुत टेस्टी है। कल ही आंटी को थैंक यू बोल कर आऊंगी। “

” वाह ये तो कमाल हो गया,, यानी एक अचार से मुट्ल्लो आंटी में बदल गईं। ”

  आदित्य हँसने लगा और अपनी प्लेट में अचार निकाल कर केसर खाने लगी कि तभी दरवाज़े पर एक बार फिर घंटी बजी…
   इस बार आदित्य को हाथ से बैठे रहने का इशारा कर केसर ही दरवाज़ा खोलने उठ गई….

   केसर ने जैसे ही दरवाज़ा खोला ,सामने से तीन चार आदमी उसे धक्का देते भीतर चले आये…
   आदित्य कुछ समझ पाता कि उन लोगो ने दोनो पर गन तान दी…
   आदित्य ने भी उतनी ही फुर्ती से अपने सामने रखी प्लेट उठा कर उन पर फेंकी और एक दूसरे पर उन लोगों को धकियाते हुए केसर का हाथ पकड़ कर सीढियां उतर कर भाग निकला।
   वो लोग भी उनके पीछे ही उतर गए….
कुछ देर तक वो लोग उनका पीछा करते रहे । पैरों में चोट होने से केसर को भागने में तकलीफ हो रही थी। वो लोग चूंकि गाड़ी में थे इसलिए आदित्य ने संकरी पतली सी गली भागने के लिए चुनी थी, इसलिए उन्हें कोई सवारी गाड़ी भी नही मिल पा रही थी।
  किसी तरह भागतें भागतें वो लोग रेलवे स्टेशन पहुंच ही गए….

   कोई ट्रेन उसी वक्त स्टेशन से छूट रही थी। आदित्य और केसर प्लेटफॉर्म पर पहुंचे की उन गुंडों पर इन लोगों की और गुंडों की इन पर नज़र पड़ गयी…
    उनमें से एक ने अपनी गन उठा कर उन लोगों की तरफ तानी ही थी कि चलती ट्रेन में भाग कर आदित्य चढ़ा और केसर को भी अंदर खींच लिया, लेकिन उसी वक्त उस गुंडे ने गोली चला दी। साइलेंसर लगी होने के कारण बिना आवाज़ के वो गोली केसर के कंधे की हड्डी पर जा लगी……

क्रमशः

जीवनसाथी – 108




   जीवनसाथी -108




   इतने महीने निकल चुके थे ,कुछ छोटी मोटी परेशानियों के अलावा कोई ऐसी बड़ी परेशानी तो हुई नही थी तो अब क्या होगा, यही सोच कर बाँसुरी राजा के साथ अस्पताल निकल गयी।

  डॉक्टर ने उसकी जांच की और चिंता की लकीरें उनके माथे की सलवटों में उभर आयीं….

” मैडम मुझे पता हैं आप अपना पूरा ध्यान रखती होंगी लेकिन अभी इस वक्त आपके गर्भाशय में पानी की मात्रा बहुत कम दिख रही है।”

” ओह्ह, डॉक्टर क्या ये बहुत परेशानी की बात है? “

” हां परेशानी की बात तो है आपको कुछ दवाई दे दे रही हूं साथ ही ये पाउडर ले लीजिएगा। और फिलहाल अभी आपको एक दवा की ड्रिप चढ़ानी पड़ेगी उसके बाद हो सकता है कि तुरंत में ही थोड़ा सा इंप्रूवमेंट दिख जाए।”

“ठीक है डॉक्टर! पर क्या मैं ट्रैवल कर सकती हूँ?”

डॉक्टर थोड़ी देर के लिए सोच में पड़ गयी….

” आपके हसबैंड को भी अंदर बुला लेते हैं फिर बात करते हैं ।”

   बांसुरी कुछ कह पाती इसके पहले ही डॉक्टर ने बेल बजा कर पियोन से राजा को अंदर भेजने के लिए कह दिया…
    राजा के अंदर आते ही उन्होंने इशारे से उसे बैठने को कहा और वापस बांसुरी की ओर मुड़ गई….

” जी वैसे मैं ट्रैवलिंग की इजाज़त तो नही दूँगी क्योंकि आप खुद अपने गर्भाशय की स्थिति जानती हैं……

राजा अब तक इन बातों से अनजान था। उसने बाँसुरी की तरफ देखा, बाँसुरी ने आंखें झुका ली…

  डॉक्टर राजा की तरफ देख कर कहने लगी..

” राजा साहब आप तो जानते ही हैं मैडम मेरे पास अपने चौथे महीने में आयीं थीं ,तब तक बच्चे की ग्रोथ हो चुकी थी, ऐसे में एबॉर्शन करना रिस्की था। स्पेशली मैडम की जान के लिए….

  राजा को डॉक्टर की कोई बात समझ में नही रही थी… वो बार बार बाँसुरी और डॉक्टर की तरफ देख रहा था।
  

” सॉरी लेकिन मैं आपकी बात समझ नहीं पा रहा हूं क्या आप मुझे पूरी बात बता सकती हैं?

राजा के सवाल पर डॉ बड़े आश्चर्य से उसे देखने लगी…

” जी हां बता सकती हूँ। आप दोनों को तो पता ही होगा कि इनकी प्रेगनेंसी में शुरू से ही कॉम्प्लिकेशन थी। इन्होंने इतनी ज्यादा गर्भनिरोधक गोलियां खाई थी कि उसके कारण इनका गर्भाशय गर्भ को अपने अंदर रोक सकने में सक्षम नहीं था। यह बात मुझसे पहले इन्हें देखने वाली डॉक्टर ने इन्हें बताई या नहीं यह तो मैं नहीं जानती, लेकिन जब यह मेरे पास आईं तब मैंने इन्हें इनकी प्रेगनेंसी से जुड़ी सारी कॉम्प्लिकेशन समझा दी थी। शुरुआत में भी डर था लेकिन समय बढ़ने के साथ ये परेशानी भी बढ़ती चली गयी…
   जैसे-जैसे गर्भ का वजन बढ़ता जा रहा, वैसे-वैसे गर्भाशय की कैपेसिटी कम होती जा रही है। इसीलिए इन्हें शुरू में ही सजेस्ट किया गया रहा होगा कि यह बच्चा ना रखें। लेकिन अब क्योंकि इन्होंने रख लिया और 8 महीने बीत भी चुके हैं तो अब बस यही कहूंगी कि जैसे भी हो एक सुरक्षित डिलीवरी हो जाए। अभी भी गर्भाशय की क्षमता में कमी होने के कारण ही बच्चे का वजन भी जरा कम है और इसी कारण गर्भाशय में पानी भी कम है । मुझे तो लगता है कि बांसुरी मैडम को और भी कोई दिक्कतें आई होंगी। हो सकता है इन्होंने मुझसे शेयर नहीं किया ? मैडम आप से पूछती हूं, क्या कभी आपको नाक से खून आना या और कुछ ऐसी तकलीफ हुई है? “

बांसुरी ने बिल्कुल नहीं सोचा था कि उसकी प्रेगनेंसी की कॉम्प्लिकेशन इस तरह से राजा के सामने आ जाएगी, लेकिन अब तो बात खुल चुकी थी अब उस बात पर पर्दा डालने का कोई मतलब नहीं था उसने डॉक्टर की तरफ देखकर हां में सर हिला दिया राजा वापस चौक कर बांसुरी को देखने लगा…

” क्या? क्या सच में कभी तुम्हें नेज़ल ब्लीडिंग हुई है ?बाँसुरी ने फिर हां में सर हिला दिया अबकी बार डॉक्टर भी परेशान हो गई

“आप पढ़ी-लिखी हैं मैडम आपको ऐसा  नहीं लगा की आपको यह बात मुझसे शेयर करनी चाहिए।”

बांसुरी के पास किसी के सवालों का कोई जवाब नहीं था। वह जानती थी कि उसने राजा के साथ गलत किया है, लेकिन उस वक्त उसे यही सही लगा था । उसने राजा की तरफ देखा और उसके दोनों हाथों को थाम लिया ….

” मुझे माफ कर दीजिए साहब , लेकिन बच्चे के नाम पर आप इतने खुश हो गए थे, इतने खुश हो गए थे कि मुझे यह बता कर आपकी खुशी छीनना उस वक्त जायज नहीं लगा।  जब मुझे मेरी कॉम्प्लिकेशंस का पता चला तब मैं भी बहुत डर गई थी। एक पल को लगा कि मुझे यह बच्चा नहीं रखना चाहिए। पर जाने क्यों दूसरे पल ही यह ख्याल आ गया कि यह मेरे साहब का बच्चा है। मेरे अंदर साहब का ही अंश तो पल रहा है, तो जब मेरे साहब इतने स्ट्रांग फाइटर हैं, तो उनका बच्चा कैसे इतना कमजोर हो जाएगा कि अपनी जिंदगी की जंग ही ना लड़ पाए बस आपके ऊपर जो भरोसा था, जो विश्वास था उसी विश्वास ने मुझे रोक लिया। और डॉक्टर मैं आपसे भी यही कहना चाहती हूं कि इस पूरे प्रेगनेंसी में मुझे बच्चे से कोई तकलीफ नहीं हुई। कभी-कभी काम की अधिकता से या सोने जागने में देर सवेर हो जाने से नाक से हल्का खून आ जाया करता था, लेकिन मेरी एक फैमिली डॉक्टर हैं। डॉक्टर पिया, उन्होंने मेरी बहुत मदद की है। मेरी प्रेगनेंसी के शुरुआत से ही उन्होंने मेरा बहुत साथ दिया। मैं रात बे रात किसी भी वक्त उन्हें फोन करूं वह हमेशा मेरे लिए तैयार रहती थी। तो आप दोनों से मैं यही कहना चाहती हूं कि अब भी यूट्रस में पानी की कमी हुई है लेकिन बच्चा तो अब भी नॉर्मल ही है ना। हां वजन जरूर उसका थोड़ा कम है, उसे मैं उसके बाहर आने के बाद खिला पिला कर पूरा कर लूंगी । बस डॉक्टर आप इतना बता दीजिए कि मैं पूरे प्रिकॉशंस के साथ अपने घर तक ट्रेवल कर सकती हूं या नहीं मुझे पता है, मैं ना साहब के साथ रहूंगी तो मैं सुरक्षित रहूंगी और मेरा बच्चा भी पूरी तरह सुरक्षित रहेगा। डॉक्टर आप जरूर हैं लेकिन आप से मैं प्रॉमिस कर रही हूं कि मेरे बच्चे को कुछ नहीं होगा मुझे भरोसा है और मैं जानती हूं मेरा यह भरोसा मेरे साहब टूटने नहीं देंगे।”

“बांसुरी लेकिन इतनी बड़ी बात तुमने छुपाई कैसे मुझसे?  पिया को मालूम था इसका मतलब निरमा को भी मालूम था… तुम सब ने मिलकर छुपा लिया। तुम्हें एक बार भी नहीं लगा कि यह बात मुझे पता होनी चाहिए और वह भी तब जब बच्चे के बढ़ने से तुम्हारी जान पर भी खतरा हो सकता है!”

“अच्छा बताइए साहब अगर मैं आपको यह सब पहले ही बता देती तो क्या आप यह बच्चा रखने देते?  अभी तक जो भी हो आज आठवें महीने तक पहुंच गया है ना, तो बस एक हफ्ते की बात है ..नौवां महीना लग ही जाएगा उसके बाद तो यह पैदा भी हो सकता है। तो जब इतना लंबा सफर तय कर लिया तो यह एक हफ्ता भी पलक झपकते आपके साथ तय कर लूंगी। मैंने बहुत समय अकेले गुजारा है इस बच्चे के साथ। अब इसके जन्म होने तक मैं अपने महल में अपने कमरे में रानी बनकर आपके साथ रहना चाहती हूं । प्लीज मुझे महल ले चलिए मैं अपने घर पहुंच जाऊंगी, फिर मुझे कुछ नहीं होगा।”

राजा ने एक नजर डॉक्टर पर डाली डॉक्टर ने भी धीमे से हां में सर हिला दिया….

“सारी जरूरी दवाइयां मैं आपको बता दे रही हूं आप वह सब लेकर ट्रैवल कर सकते हैं”

डॉक्टर की रजामंदी मिलते ही बांसुरी के चेहरे पर मुस्कान चली आई और वह अपनी जगह से खड़ी हो गई उसके वहां से उठते ही राजा भी उसकी फाइल समेटे उसके साथ बाहर चला आया । राजा कुछ कहने ही जा रहा था कि बाँसुरी  ने उसकी होंठों पर अपना हाथ रख दिया…

” अब कुछ बोल कर इस कीमती समय को ज़ाया मत कीजिए साहब । अब तो कुछ हो भी नहीं सकता , अब जो होगा वह सिर्फ डिलीवरी होगी आपके बच्चे की डिलीवरी। हमारे बच्चे की डिलीवरी। “

राजा यह भी समझता था कि गर्भावस्था में मां को ज्यादा परेशान करना सही नहीं है अब उसके हाथ में कुछ रह भी नहीं गया था इसलिए बांसुरी को साथ लिए वह उसके घर के लिए निकल गया। एक दिन बाद उन दोनों की वापसी की फ्लाइट जो थी….

***

  बांसुरी को साथ लिए राजा महल में पहुंच चुका था। दोनों अभी मुख्य द्वार में पहुंचे ही थे कि दौड़कर एक सहायिका ने उन्हें मुख्य द्वार पर रोक दिया। राजा चौक पर उसे देखने लगा कि अचानक उन्हें इस तरह रोकने वाली यह कौन होती है कि तभी उसके पीछे से रूपा आरती का थाल और पानी से भरा कलश सहायिका के साथ लिए वहां चली आई… सेविका से कहकर उसने पानी का कलश लिया और बांसुरी और राजा की एक साथ नजर उतार कर वह कलश सहायिका को पकड़ा दिया। इसके बाद दोनों की आरती उतारकर चंदन कुमकुम का तिलक कर बांसुरी को उसने अपने आंचल की छांव में ले अंदर कर लिया…

” बहुत-बहुत बधाइयां आपको बांसुरी ! आखिर इतने दिन अपने ऑफिस के कामों में और अपने सड़े से सरकारी बंगले में बिता दिए अब जाकर हमें मौका दिया है अपने राजकुमार के लिए मनपसंद बनाने और उसकी मां को उसका मनपसंद खिलाने का।
   भई महल भी तो पलके बिछाए अपने राजकुमार का इंतजार कर रहा है…

  रूपा की  लाड़ भरी बातें सुन बांसुरी मुस्कुरा उठी। जया और रूपा ने बांसुरी को प्यार से बिठाया और उसके लिए तरह तरह की खाने पीने की सामग्रियों से सामने रखी टेबल सजा दी।  दोनों ने बांसुरी के साथ चहल भरी शरारतें भी शुरू कर दी….

“अच्छा राजकुमार ही होगा यह आपको कैसे पता भाभी साहिब? “

जया के सवाल पर रूपा मुस्कुरा उठी

” इनकी शक्ल देखी? शक्ल से ही लग रहा है कि पेट में इस रियासत का भावी राजकुमार पल रहा है , तभी इतनी मुरझा गई हैं…”

” यह भी कोई बात हुई भाभी साहेब! इतनी लंबी यात्रा भी तो करके आ रही हैं उसकी क्लान्ति भी तो चेहरे पर ही नजर आएगी।

” बिल्कुल यात्रा की क्लान्ति तो चेहरे पर नजर आती है लेकिन अगर पेट में बिटिया होती है ना तो वह मां को अंदर से भी थकने नहीं देती इसलिए मां के चेहरे में चमक रहती है। बेटा शुरू से ही लाडेसर होता है इसलिए मां के सर पर चढ़ा रहता है और मां बेटे के शौक खुशी खुशी पूरी करते थक जाती है । प्यार तो दोनों से ही होता है दोनों ही तो अपना हिस्सा है लेकिन दोनों के प्यार करने के तरीके अलग होते हैं बस और कुछ नहीं”

रूपा जया उन दोनों के बच्चों फूफू साहब इन सब के बीच पहुंचकर बांसुरी को बहुत राहत मिली थी। उसके चेहरे की मुस्कान से संतुष्ट होकर राजा भी मुस्कुरा कर बाहर निकल गया जाते-जाते उसने बांसुरी से इजाजत भी ले ली बांसुरी भी घर पहुंच कर खुश थी उसने मुस्कुराकर राजा को जाने की इजाजत दे दी।

******

   मध्यप्रदेश के छोटे से एक कस्बे में राशन की दुकान पर लंबी लाइन में अपनी पारी की प्रतीक्षा करता वो बार बार अपनी घड़ी पर नज़र भी मार लेता था।
    उसे घर जाने की कुछ ज्यादा ही जल्दी थी….

” अरे भैया ज़रा जल्दी कर दो ना। कब से हम लाइन में खड़े हैं आपको नजर नहीं आ रहा है?”

” अरे आप भी देखे ना भैया भीड़भाड़ भी तो बहुत है। दुकान में आज दो ही लड़के हैं दो लड़कों ने छुट्टी मार ली हम भी क्या करें अकेले बताइए कहां कहां देखें गल्ला तो हमें ही देखना है ना।”

ठीक है ठीक है दीजिए जल्दी।”

लड़के को बहुत जल्दी थी उसने जैसे तैसे वहां से सामान लिया और तेज कदमों से चलता हुआ एक तरफ निकल गया दो चार गलियां पार करके वह अपने घर की गली में मुड़ गया।
  लोहे के गेट को खोल वो किनारे से ऊपर को जाती सीढियां चढ़ता ऊपर पहुंचा। जेब से चाबी निकाल उसने दरवाजे पर लगा ताला खोला और भीतर चला गया……

उसके ऊपर जाते ही उसी घर पर नीचे रहने वाली औरत बाहर निकल आयी…
  उसके बाहर आते ही उसके बाजू वाली और उसके भी बाजू वाली भी महिलाएं बाहर चली आयीं…
  आपस में तीनों की ही खुसर पुसर चालू हो गयी…

  ” देखा मैंने कहा था ना ये अकेला नही रहता है यहाँ!”

” फिर ? और कौन रहता है जिज्जी ? वैसे लगता तो हमें भी है कि कोई और है ज़रूर, लेकिन ये तो बाहर जाते हुए ताला लगा कर जाता है।”

” हाँ तो क्या ? हमने अपने इन्हीं आंखों से देखी है जिज्जी उनके छत पर एक दिन जनानी कुर्ती सूख रही थी। आप ने जे कैसे मोड़ा को घर किराए पर दे दिया जिज्जी। घर देने के पहले पड़ताल भी नही की! हम तो कह रहीं अंदर किसी मोड़ी को छिपा रखा है जे लड़के ने। “

” अरे अब हम का बताई बहन? फलाने से मिल कर गया रहा मोड़ा, बात कर रखी थी। इनके हाथ में एडबाँस रुपल्ली धर गया अब हरे हरे नोटों के सामने इनकीं जबान कहाँ खुले है फिर?
   अब देखो यहाँ रहते पूरे चार महीने हो गए…
  आया भी कैसे था तुम्हें बताएं। आधी रात जब पूरा मुहल्ला गहरी नींद में सोया पड़ा था ये चला आया,दबे पांव। और फिर बस वो दिन और आज का दिन है।
  किसी बहाने से इसे घर बाहर निकलने की कोशिश करो पहले ही इसके पास बहानों का ढेर रहता है। एकदम शांत पड़ो रहतो है तो अब हम भी क्या बहाना बना बना कर, झगड़ें तुम ही कहो।
  हमने तो इनसे कह दी है कि मोड़ो को घर से निकाल फेंको बाहर। कोई तो राज छिपा रखा है इसने?

” जिज्जी चलो न दरवाज़ा पीट पीट कर बाहर निकाल उसके घर की तलाशी ही ले लेते हैं।”

“राम राम ऐसी बातें न करो। हमारे ये सुन लेंगे न तो वो मोड़ो को नही हमई को घर से निकाल बाहर करेंगे। जे सुनना ही नही चाहते उसके खिलाफ कुछ। जैसे पंद्रह हजार में पुरो घर खरीद रखो हो मोड़ो ने।”

” जे का बात कर रहीं जिज्जी। ये आपके इत्ते से माचिस की डिबिया से घर का पंद्रह हजार। “

  औरत की आंखे फट  कर बाहर आने को थीं….

कहने वाली कह गयी लेकिन उसकी साफगोई मकान मालकिन को चुभ गयी…

“काहे लता तुम्हे हमार जे घर माचिस की डिब्बी सा लगे है तो तुम कौन से हवा महल में बसेरा कर रही हो। है तो तुम्हारे भी लाने कुल जमा तीन कमरे। हमाये तो फिर भी नीचे का घर देखो इत्ता बड़ा आंगन,रसोई दालान शिव मंदिर,इतना फैला घर बना रखा है। ऊपर तो जाने कौन कैसा रहने या जाए इसी से गुड्डू के पापा ने ऊपर दुइ कमरे निकलवा के छोड़ दिया। अब वो माचिस का डिब्बा कहाँ से हो गया। और इतनी माख लगी है जाओ न किसने रोका है बनवा लो और चढ़ा लो किराए पे।”

” अरे जिज्जी बुरा मान गयीं तुम तो।
  ये लो लौकी की लापसी बनाई है,ज़रा चख के बताओ। हम यही देने तुम्हे आये रहे कि इस सारी पंचायत में अपन असली काम तो भूल ही गये…..

  लापसी ने माचिस की डिब्बी को उड़ा कर रख दिया, कटोरा थामते ही मकान मालकिन को शुद्ध घी की खुशबू ने सराबोर कर दिया और वो कुछ समय के लिए ऊपर रहने वाले रहस्यमयी लड़के के बारे में भी भूल गयीं।।

   ठीक उसी समय वो धड़धड़ाते हुए सीढियां उतर आया, उसे अचानक आया देख तीनों अपनी बातचीत भूल उसे देख मुस्कुराने लगीं…

  उसने उन्हें देख हाथ जोड़े और वहाँ उसी वक्त पहुंचे दूध वाले से दूध लेकर ऊपर चला गया….

” ए रुको ज़रा…. उनमें से एक ने उस लड़के के उपर जाते ही दूध वाले को रोक कर कहा…

” तुम दूध देने ऊपर काहे नही जाते।सीढियां चढ़ने में आलस आता है तुमको..”

” नही अम्मा जी। वो तो भैया जी ही मना किये हैं। उनका कहना है दूध के वक्त पे वो ही नीचे उतर आएंगे। वरना हमें कौन तक्लीफ होनी है उपर जाकर देने में।”

” हम्म ठीक है ठीक है, जाओ… दूध लेते कितना हैं तुम्हारे भैया जी?”

” दुइ लीटर !”
  और दूध वाला अपना केन उठाये निकल गया…

  तीनो एक बार फिर एक दूसरे को देखती सलाह मशविरा में लग गईं….
   ” अकेला मोड़ा दुइ लीटर दूध पी जाता है? जे तुमको ठीक लग रहा जिज्जी? इसके लच्छन ठीक न लग रहे हमें….

   दूध वाले से दूध ऊपर ले जाकर आदित्य ने दरवाज़ा धीमे से खोला और अंदर चला गया……

   भगोने में दूध पलट कर उसने उबालने रखा और उसी वक्त निकाला हुआ जूस हाथ में लेकर दूसरे कमरे की ओर बढ़ गया…

  कमरे में एक पलंग पर केसर लेटी हुई थी। आदित्य ने उसे सहारा देकर उठाया और जूस का ग्लास धीमे से उसके कांपते हाथों में थमा दिया….
  कृतज्ञता से उसे देखती केसर ने बहुत जोर लगा कर और बड़ी मुश्किलों से उस गिलास को पकड़ा। यूँ लगा उस गिलास को पकड़ने में भी उसे कितनी तकलीफ हो रही होगी…
   आदित्य साथ ही बैठा उसे देखता रहा, लेकिन आगे बढ़ कर उसने ग्लास पकड़ने में उसकी कोई मदद नही की।

बहुत मुश्किल से आधे घंटे से ज्यादा वक्त लगा कर केसर ने किसी तरह ज्यूस खत्म किया कि आदित्य ने हाथ का सहारा देकर उसे पलंग से नीचे उतार लिया.. और उसका हाथ थामे उसे उसी कमरे में इधर से उधर धीमे कदमों से चलाने लगा….

” अरे भूल गया, मैं अपने लिए चाय चढ़ा कर आया था। तुम बस दो पल के लिए खड़ी रहो मैं फटाफट चाय लेकर आता हूँ।”

  आदित्य ने धीरे से उसे अकेले वहीं खड़ा छोड़ा और रसोई की ओर भाग गया… एक पल को केसर को लगा वो गिर जाएगी, लेकिन फिर उसने खुद को संभाल लिया… और बहुत मजबूती से अपने पैरों पर ज़ोर देती खड़ी रहने की कोशिश करती रही…
       कुछ देर वैसे ही खड़ी रहने के बाद उसने धीमे से अपना एक पैर उठा कर रखने की कोशिश की और धीरे से आगे बढ़ने लगी,एक पल को उसे लगा वो भरभराकर गिर पड़ेगी लेकिन उसने खुद को संभाल लिया…
    कमरे के बाहर दरवाज़े के पीछे से आदित्य छिप कर खड़ा उसे देखते हुए मुस्कुरा रहा था।
   बहुत डगमगाते हुए केसर धीरे धीरे आगे बढ़ती चली गयी…

  उसे इस तरह खुद से बिना किसी सहारे के चलते देख आदित्य ने राहत की सांस ली और अंदर चला गया…

    दून से केसर को साथ लेकर भागतें हुए आदित्य का सामना ठाकुर साहब के आदमियों से हो ही गया था। कितना बचते बचाते निकला था वो लेकिन ठाकुर के आदमियों के हत्थे चढ़ ही गया था।
     केसर की तबियत संभली नही थी। उसे जैसे तैसे लेकर वो ट्रेन में सवार हो गया था।
   उस वक्त उसे लगा कि उसने केसर की जान ठाकुर साहब और उनके आदमियों से बचा ली थी। ट्रेन में आरक्षित सीट तो थी नही, जैसे तैसे टीटी से बात कर और सीट का दुगुना मूल्य चुका कर ऐसी प्रथम के कूपे में उसने केसर को आराम से लेटा दिया था।
    खुद बाहर निकल इधर उधर झांकते वो यही देखने का प्रयास कर रहा था कि कहीं वो लोग उसका पीछे तो नही हैं।
   आखिर ट्रेन स्टेशन से छूटी और उसे राहत मिली थी।
   ट्रेन वहाँ से कहाँ जा रही थी, उसे नही पता था। ट्रेन छूटते ही उसने सोचा था कि फ़ोन कर के राजा को अपने और केसर के बारे में बता दे लेकिन फ़ोन अपनी जगह  से नदारद था। यानी इतनी भागदौड़ में फोन उसकी जेब से निकलकर कहीं गिर गया था। वह तुरंत केसर तक पहुंचा और उससे उसका फोन मांग लिया , केसर की तो हालत ही ऐसी नहीं थी कि वह अपने फोन या अपनी  किसी भी चीज़ का ध्यान रख पाती। परेशान हाल आदित्य दूसरी सीट पर पैर फैलाए बैठ गया था, सोचते-सोचते जाने कब उसकी आंखें लग गई।
    दिन भर की थकान और भागदौड़ ऐसी थी कि आदित्य को भी गहरी नींद ने घेर लिया था उसी गहरी नींद में उसे अचानक लगा कि उसके माथे पर कोई चीज रखी गई है । उसने आंखें खोली सामने ठाकुर साहब का आदमी उस पर गन ताने खड़ा था । आदित्य चौक कर अपनी जगह बैठ गया उसने बाजू वाली सीट पर देखा  केसर के माथे पर भी गन ताने दो लड़के खड़े थे । उस पूरे कूपे में वह तीन आदमी उन दोनों पर गन टिकाये  मौजूद थे, फिर तो उसके अंदर का सोया राजकुमार जाग गया और अपने  राजपूताना खून की गर्मी से झुलसते आदित्य ने  पलक झपकते ही उन तीनों पहलवान से लड़कों को पटखनी दे दी । उसकी पिटाई से वो तीनों एकबारगी बेहोश हो गए, चित पड़े तीनों लड़कों पर एक नजर डाल वह केसर का हाथ थामे उस कूपे से बाहर निकल गया था। ट्रेन किसी स्टेशन पर जरा सा धीमी हुई थी कि आदित्य केसर के साथ वहीं उतर गया, उसे नहीं पता था कि यह कौन सा स्टेशन है?
    बाहर निकलने पर उसने देखा स्टेशन का नाम भिंड था।

  नई जगह नया शहर और उन दोनों अजनबीयों के पास कोई सामान तक नहीं था। बारिश से बचते बचाते वो स्टेशन पर बाहर बनी एक चाय की टपरी पर रुक गए। आदित्य ने वहां बिछी बेंच पर केसर को बैठाया और उसके हाथ में गर्म चाय पकड़ा दी। चाय वाले से वह आस-पास रहने लायक होटल या लॉज के बारे में पूछताछ कर ही रहा था कि एक रिक्शा उसके सामने चला आया…

” आइए बाबू जी हम आपको एकदम सस्ती और अच्छी जगह पहुंचा देंगे!”

आदित्य ने एक नजर उसे घूर कर देखा फिर उसे अचानक याद आया कि यहां उसे अपनी पहचान छिपाए रखनी है। क्योंकि अभी भी ठाकुर साहब और उसके आदमियों का डर बना हुआ था। वो केसर को साथ लिए उस रिक्शा में बैठ गया । रिक्शावाला कोई गाना गुनगुनाते हुए उन दोनों को साथ लिए एक लॉज में पहुंच गया।
एक नजर देखते ही आदित्य को वो लॉज बिल्कुल पसंद नहीं आया उसने रिक्शेवाले से किसी अच्छे होटल में ले चलने को कहा। इस तरह एक जगह से दूसरी जगह घूमते आखिर आदित्य को अपने लायक एक ठीक-ठाक होटल मिल ही गया। किसी तरह समझौता करते हुए आदित्य केसर को लिए एक रूम में चला गया लेकिन रह रह कर उसके दिमाग में ट्रेन वाला किस्सा घूम रहा था। जब ठाकुर साहब के आदमी ट्रेन तक पहुंच गए तो वह यहां तक भी पहुंच सकते थे। उसके दिमाग में अब पूरी तरह से केसर को लेकर चिंता समाई हुई थी। केसर की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उन लोगों का इस तरह किसी भी लॉज धर्मशाला या होटल में रहना सुरक्षित नहीं था।। ठाकुर साहब के आदमियों को उसने बहुत कम आंक लिया था। जब वह केसर के साथ भागा था तब उसके पीछे लगभग दर्जन भर लोग भागे थे लेकिन ट्रेन में उसका सामना सिर्फ 3 लोगों से हुआ इसका मतलब बाकी के लोग ट्रेन में ही उन दोनों को तलाश रहे थे और इन तीनों के हत्थे वह दोनों चढ़ गए थे। वह तो अच्छा हुआ कि उसने बाकी लोगों के आने से पहले ही उन तीनों को ठिकाने लगा दिया और एक स्टेशन पर उतर गया लेकिन जैसे ही उनके बाकी साथी इन तीनों तक पहुंचे होंगे उन लोगों को आभास हो गया होगा कि आदित्य और केसर किस स्टेशन पर उतरे हैं? वह जरूर भिंड और इसके अगले और पिछले स्टेशनों की भी तलाशी लेंगे और तलाशी लेने वाले शहर के लॉज, होटल और धर्मशालाओं की ही तलाशी लेंगे । यह सब सोचते सोचते आदित्य के दिमाग में यह बैठ गया कि केसर को लेकर उसका किसी होटल में रुकना सही नहीं है। यही सोचकर अगले दिन सुबह ही उसने केसर के साथ वह होटल खाली कर दिया। बाहर एक रिक्शा कर उसने रिक्शेवाले से किसी भी वर्किंग विमेन हॉस्टल ले चलने की बात कही। केसर को समझा-बुझाकर उस हॉस्टल में सिर्फ 2 दिन रुकने के लिए मनाया और उसे वहां छोड़ अपने लिए कमरा देखने निकल गया था। कितनी मुश्किलों के बाद उसे रहने लायक एक दो कमरे का घर मिल ही गया था। और वो केसर को लिए वहां चला भी आया इसी बीच उसे अखबारों में दून की आईएएस ऑफिसर बांसुरी अजातशत्रु सिंह की हिरासत की खबर भी पढ़ने को मिल गई थी और इस खबर को पढ़ने के साथ ही उसे समझ आ गया था कि केसर का जिंदा रहना कितना जरूरी था।
      हालांकि अगले दिन के अखबारों में ही बाँसुरी की रिहाई की खबर भी छपी मिल गयी थी, और उसे समझ आ गया था कि फिलहाल उसके पास केसर के पूरी तरह स्वस्थ होने तक का वक्त मिल गया है।
   केसर की हालत ऐसी नही थी कि उसे लेकर इस वक्त महल तक लौटा जाए, और सबसे बडी बात या बड़ा डर उसे इसी बात का था कि महल के आसपास ठाकुर साहब के लोग घात लगाए बैठे उन दोनों का इंतज़ार कर रहें होंगे।
   वो यही सोच रहा था कि दो चार दिनों में जब केसर की हालत कुछ ठीक हो जाये तब समर से बात कर वो यहाँ से केसर को साथ लेकर निकल जायेगा, लेकिन एक के बाद एक कुछ न कुछ ऐसा घटता चला गया कि वो वहाँ से बाहर ही नही निकल पाया।
    उन दो कमरों के घर मे रहते हुए उसे और केसर को कुछ दिन ही बीते थे और आदित्य समर को फ़ोन करने की सोच ही रहा था  कि केसर सीढ़ियों पर से गिर कर चोट लगवा बैठी।
   
   भगवान जाने उसकी और केसर की  किस्मत में क्या लिख बैठे थे कि वो चाह कर भी उस छोटी सी जगह से निकल कर सुरक्षित अपने घर नही पहुंच पा रहा था……

क्रमशः

 


aparna…..
  
   





  

जीवनसाथी- 107




जीवनसाथी-107




    राजा रियासत वापस लौट चुका था। उसे लग रहा था सारा मामला उलझता ही चला जा रहा है। वो एक गांठ सुधार कर खोलने निकालता की दूसरी गांठ उलझ जाती, अब सब कुछ ऐसा लग रह था जैसे उसके हाथों से बाहर होता जा रहा था।

  उसने कुछ ज़रूरी बातचीत करने समर को अपने कमरे में बुला लिया….

” समर क्या खबर है ठाकुर की ? “

” हुकुम जैसा आपने कहा था , वैसा ही संदेश अफसरों को भिजवा दिया है।
   ठाकुर साहब का मामला अब तक विचाराधीन है। उन्हें पकड़ने के चौबीस घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश तो कर दिया गया था लेकिन उनका वकील मजबूती से उनके पक्ष में खड़ा रहा, और तो और उसने बेल की आवेदन भी लगा रखी है।
   उसी  ने ठाकुर साहब को अपनी पत्नी को मार कर उसके कार्यक्रम में शामिल होने के बहाने निकलने का रास्ता सुझाया था।
  क्योंकि शायद वो भी समझ गया है कि इतने ढेर सारे सबूतों के साथ अब उनकी रिहाई मुश्किल है।

” हम्म !तो क्या किया जाए? “

” कल सुबह ठाकुर साहब को लेकर दो पुलिस वाले दून निकल रहें हैं, उन्होंने मजिस्ट्रेट तक पत्नी के अंतिम कार्यक्रम में जाने की इच्छा जताते हुए पत्र लिखा था, इसी से अनुमति भी मिल गयी है।”

“चलो फिर कल सुबह ही मुलाकात की जाए उनसे। “

“जी हुकुम ! हुकुम एक बात और कहनी थी। यूनिवर्सिटी का काम लगभग पूरा हो चुका है। काफी सारे रिक्रूटमेंट भी पूरे हो गए हैं। कल यूनिवर्सिटी के प्रबंधन से सम्बंधित चुनाव होना है। तो अगर आप उस इंटरव्यू को ले सकें तो …?

” समर इन सब बातों से दूर ही रखो मुझे। वैसे भी बहुत सारा काम फैला पड़ा है। न हो तो रतन सा को बुलवा सकते हो। बाँसुरी के मित्र शेखर को भी पूछ सकते हो। लेकिन हाँ इन लोगो का खाली होना ज़रूरी है। अपने काम को नकार कर हमारा काम करने कोई भी न आये ये ध्यान रखना। “

” राजा भैया , आप कहें तो मैं कुछ मदद कर सकती हूँ क्या?”

  राजा के कमरे के दरवाज़े पर प्रेम के साथ खड़ी निरमा की आवाज़ सुन राजा उस ओर देखने लगा…

” अंदर आ जाओ। तुम दोनो बाहर क्यों खड़े हो? “

” आपसे मिलने का बहुत मन कर रहा था भैया इसलिए ये जैसे ही घर आये मैं इनके पीछे पड़ गयी कि मुझे अभी महल लेकर चलो वरना ये तो बस टालमटोल करतें रहतें हैं।”

” सही कहा भाभी जी। वो तो आप आ गईं  इसकी ज़िन्दगी में वरना ये जैसा आदमी है जीने में भी टालमटोल करता फिरता।

समर की बात सुन वहाँ बैठे सभी हँसने लगे …..

” भैया बाँसुरी कैसी है? आपके साथ जाने के पहले इन्होंने कुछ नही बताया था,वरना मैं भी साथ चली जाती। उसकी तबियत तो ठीक है ना? “

” हाँ निरमा तबियत ठीक है उसकी, लेकिन आजकल बात बात पर इमोशनल हो जाती है। मैं समझता हूँ उसकी प्रॉब्लम क्या है। किसी किसी में मूड स्विंग कुछ ज्यादा ही होतें हैं शायद!”

” हम्म वो तो है। भैया अभी वहाँ उसके पास काम करने के लिए नौकर चाकर तो ढेरों होंगे लेकिन देखभाल करने के लिए कोई नही है। चाचा जी की तबियत ठीक नही होने के कारण चाची भी उसके पास नही जा पा रहीं हैं।

” हाँ निरमा। मैंने भी कहा कि मम्मी को बुला लो तो उसने मना कर दिया,कहने लगी पापा को अभी मुझ से ज्यादा जरूरत है मम्मी की।”

” अगर आप दोनो इजाज़त दें तो क्या मैं कुछ दिनों के लिए बांसुरी के पास चली जाऊँ। शुरु के तीन महीने ही सबसे क्रूशियल होतें हैं ,अगर ये सही निकल गए तो आगे थोड़ा चिंता कम हो जाती है।”

  राजा ने खुशी से निरमा के दोनों हाथ थाम कर अपने माथे से लगा लिए…

” सच तुम जाना चाहती हो? ” राजा ने एक नज़र प्रेम की तरफ डाली

” हुकुम मुझसे पूछने या इजाज़त लेने की आपको कब से ज़रूरत पड़ने लगी। आप तो बस आदेश कीजिये। आप जब कहेंगे मैं निरमा को छोड़ आऊंगा। “

” तुम दोनो दिल के इतने करीब हो कि मेरे मन में चल रही सारी उथलपुथल तुम्हें पता चल जाती है। मैं सच कहूं तो बाँसुरी को अकेले छोड़ कर आने का मन ही नही था, और उसका अपना काम अधूरा छोड़ कर यहाँ आने का मन नही था।
  निरमा तुमने मेरी कितनी बड़ी मुश्किल आसान कर दी है। तुम्हें क्या बताऊँ? “

  ” एक भाई की परेशानी उनकी बहन नही समझेगी तो कौन भला समझेगा। तो भैया मैं कल ही मीठी को लेकर निकल जाऊंगी।”

    निरमा से बात कर राजा के चेहरे पर तसल्ली चली आयी। मुस्कुरा कर निरमा ने राजा से विदा ली और प्रेम के साथ अपने घर निकल गयी।

   राजा वापस समर के साथ अपनी चुनावी तैयारियों की बातचीत में लग गया….

*****

    अगली सुबह ठाकुर साहब को पांच पुलिस वालों के साथ दून के लिए विदा कर दिया गया।
  ठाकुर साहब की रईसी को दरकिनार कर पुलिस वाले उन्हें ट्रेन से साथ लिए चल पड़े।
ठाकुर साहब बार बार उन्हें फ्लाइट से चलने की दुहाई देते रहे लेकिन उनकी एक न सुनी गई।
लॉ एंड ऑर्डर को निभाते पुलिस वाले उन्हें ट्रेन में साथ लिए निकल गए।
  राजा ने उन अफसरों को संदेश भिजवा रखा था कि वो लोग जब भी ठाकुर को लेकर निकले राजा को पहले ही सूचित कर दें जिससे राजा उनसे मुलाकात कर सके लेकिन ठाकुर साहब के भी कई लोग ऊपरी महकमे में मौजूद थे जो ठाकुर साहब और राजा अजातशत्रु की दुश्मनी के बारे में जानते थे इसलिए उनके सुरक्षा कारणों को देखते हुए एन मौके पर उनके साथ जाने वाले अफसरों और सिपाहियों को बदल दिया गया।
    समर बाहर खड़ा इंतेज़ार करता रहा लेकिन किसी और गुप्त मार्ग से ठाकुर साहब को साथ लिए पुलिस की टुकड़ी निकल ही गयी…

   समर के खबरी ने जब उसे इस बात की सूचना दी की ठाकुर साहब तो यहाँ से निकाले जा चुके हैं समर खून का घूंट पीकर रह गया।
   वो फौरन राजा के पास चला आया….

” अब क्या करें हुकुम ? हमने ठाकुर को थोड़ा कम ही आंक लिया था शायद। वो हमारी आंखों में धूल झोंक कर निकल गया।”

” लेकिन उन्हें कम मत समझियेगा । वो अब भी ताक में होंगे कि कब उन्हें मौका मिले और वो हुकुम पर वार कर सकें। हुकुम अब आपकी सुरक्षा और बढ़ानी पड़ेगी। अब तक चार लोग आपको कवर कर के चला करते थे , अब आप चारों तरफ से एक गोल घेरे में ही अपने कमरे से बाहर निकलेंगे। “

  राजा प्रेम की बात सुन हंसते हुए उसे देखने लगा….

” तुम्हारा बस चले तो तुम मुझे डिबिया में बंद कर के रख दो। “

  राजा भले ही मुस्कुरा रहा था लेकिन दिल ही दिल में उसे भी महसूस हो गया था कि अब ठाकुर और भी खतरनाक हो जाएगा।
  उसे खुद की चिंता थी भी कहाँ, वो बस अपने करीबियों को लेकर ही परेशान था।

“मुझे नही लगता इतनी जल्दी ठाकुर साहब अब कोई कदम उठाएंगे। उन्हें भी मालूम है कि अब हम सब उनकी रग रग से वाकिफ हैं और उनके हर कदम पर हमारी निगाहें होंगी। “

” फिर भी उन्हें कम मत समझियेगा हुकुम। मुझे लग रहा है वो सबसे पहले आदित्य और केसर को ढूंढने निकलेंगे। क्योंकि अब तो उनकी नाराज़गी का सबसे बड़ा सबब आदित्य हो गया है। “

” हम्म मुझे भी इसी बात की चिंता है, आदित्य को उन्होंने ही पाल पोस के इतना बड़ा किया और वो अचानक हमारी तरफ हो गया। खून को खून पुकारता ही है, हम क्या कर सकतें हैं। आदित्य की आंखों पर बंधी पट्टी खुल गयी और वो अपने परिवार के पास चला आया।”

  ” जी मैं निकलता हूँ हुकुम। आदित्य की अब तक कोई खबर नही है। और अब ठाकुर साहब भी लापता हैं।”

  राजा ने हाँ में सर हिलाया और उठ कर अपनी बालकनी तक चला आया।
  उसके उठते ही प्रेम और समर भी वहाँ से निकल गए।

  बालकनी में खड़ा राजा अपने भविष्य के बारे में सोच रहा था। अब जाकर लगने लगा था कि सब ठीक है कि वापस परेशानियां चली आयीं। वो निरमा को बाँसुरी के पास भेज तो रहा था लेकिन वो तो सिर्फ देखभाल कर सकती थी ,और बाँसुरी की सुरक्षा का क्या?
  अभी ही ऐसा समय पड़ना था कि चुनाव सर पर होने से न वो काम छोड़ कर जा सकता था और न बाँसुरी ही आ सकती थी।
    कभी कभी कैसी मजबूरी आ जाती है कि इंसान को न चाहते हुए भी सब कुछ वक्त पर छोड़ना पड़ जाता है…….

********


    ठाकुर साहब को गायब हुए छै महीने बीत चुके थे….
    इस बीच उन्होंने कहीं कोई ऐसी हरकत नही की थी कि जिससे राजपरिवार पर कोई आंच आये।
  पुलिस ने उनके गायब होने के बाद रिपोर्ट तैयार की थी कि स्टेशन से ट्रेन पकड़ने तक वो सबके साथ ही थे। उन्हें हथकड़ियों के साथ ले जाया जा रहा था।
आधी रात के वक्त वो बाथरूम जाने का बहाना कर उठे, उनके साथ दो सिपाही भी भेजे गए थे। बावजूद उन लोगों को चकमा देकर ठाकुर साहब उस स्टेशन से भाग खड़े हुए।
  चलती ट्रेन से मध्यरात्रि में ऐसे अचानक ठाकुर साहब कैसे गायब हो गए पर आला अफसरों की जांच कमेटी बैठी लेकिन कोई फल नही निकला।
   राजा पहले ही समझ चुका था कि ठाकुर साहब और पुलिस वालों की मिलीभगत थी जिसमें उन्हें भागने का मौका मिल गया था।
       समर और प्रेम के लड़कों ने चप्पा चप्पा तलाश किया। जहाँ जहाँ उनके जाने की उम्मीद हो सकती थी हर वो जगह देख ली ढूंढ ली लेकिन ठाकुर साहब घास में गिरी सुई साबित हुए थे।

  वक्त बीतता जा रहा था। महल में समर प्रेम और राजा के अतिरिक्त किसी को भी विराज और ठाकुर साहब के सम्बन्धो के बारे में कुछ भी पता नही था। खुद विराज भी इस बात से अनजान था।
    रानी माँ के जाने के बाद उसके मन में अलग ही उथल पुथल मची थी।
   गद्दी जाने का उसे दुख तो था लेकिन वो भी जनता था कि अकेले गद्दी संभालना उसके बस की बात नही थी।
    राजा के चुनाव में अपनी अलग पार्टी तैयार करने से उसे एक उम्मीद बंधी थी कि पार्टी प्रत्याशी के रूप में राजा उसे ज़रूर चुनेगा।
    उनके राज्य में चुनाव होना था । फिलहाल अस्सी सीटों पर मतदान होने थे। जिनमें से राजा की रियासत जिस जिले में आती थी वहां और उसके आस पास के जिलों का मिलाकर राजा ने कुल ग्यारह पदों पर अपने उम्मीदवार खड़े करवाये थे।
    इन सारी प्रक्रियाओं के पहले राजा ने लगभग पूरे राज्य का दौरा किया था। हर जगह अपनी रैली में उसने जनता को संबोधित करते हुए उनकी समस्याओं को सुनने के साथ ही सुलझाने का वायदा भी किया था।
   इस तरह से रैलियां करने का उसका मुख्य उद्देश्य जनता की रग को पहचानना था। वो जानता था चुनाव में जनता किस करवट बैठे ये पहले से तय करना मुश्किल था। उस पर आजकल की राजनैतिक पार्टियों की उठापटक , ई वी एम मशीनों से छेड़छाड़, वोट बैंक की राजनीति, सिर्फ एक शराब कि बोतल और एक प्लेट मुर्गे पर बिकते लोगों के कारण पूरी ईमानदारी से लड़ना मुश्किल था लेकिन राजा तो राजा था।
    वो शुरुवात में ही अपनी सच्चाई और ईमानदारी से डिगना नही चाहता था।
    रैली करवाने का एक और उद्देश्य अपनी पहुंच को  पहचानना भी था। वो बारीकी से हर गणना करता चल रहा था। वो यही जानना चाहता था कि कहाँ कहाँ से वो अपने उम्मीदवार खड़े कर सकता है।
     उसकी तैयारी चाक चौबंद थी। वैसे भी उसने कभी कोई काम बिना पक्की तैयारी के किया भी नही था।

राजा अजातशत्रु भले ही एक रियासत के राजा हो लेकिन उनकी पहुंच लगभग पूरे राज्य तक थी।….

   राजा की नेकनीयत के किस्से फैलने लगी थे। किस्से कोरे तो थे नही। जब किस्सों के साथ ही जनता काम भी होते देख पा रही थी तो जाहिर है उनका जुड़ाव राजा की तरफ बढ़ता भी जा रहा था….
   जनता अब राजा के इशारे भी समझने लगी थी लेकिन आज भी कोई था जो उससे बैर पाले चल रहा था।
    विराज को न सुधरना था और न वो सुधरा। आखिर खून तो ठाकुर साहब का ही था। उस पर ठकुराइन की मौत के हफ्ते भर बाद जब वो दून गया तब उसके साथ एक और घटना घट गई….

     ठकुराइन की मृत्यु के बाद उनका काम काज निपटने से पहले रेखा की महल वापसी मुश्किल थी। उसने विराज से बात कर वहाँ रुकने की मंजूरी ले ली थी। विराज ने भी जल्दी ही मिलने आता हूँ तभी साथ में वापस लौट आएंगे कह कर उसे मंजूरी दे भी दी थी।
  उन्हीं दिनों एक शाम उदास सी रेखा बगीचे में बेटे को खेलते देखती बैठी थी कि उसका फ़ोन बजने लगा…

  उसने तुरंत उठाया, उसे लगा विराज का होगा लेकिन फ़ोन रोहित का था…

” कैसे हो रोहित? बड़े दिनों बाद याद किया!”

“हां एक केस के सिलसिले में यहाँ आना हुआ था। आपकी माँ के बारे में पता चला , सुन कर बहुत बुरा लगा। अगर आपको ऐतराज न हो तो क्या हम एक बार मिल सकतें हैं।”

” हमें ऐतराज क्यों होने लगा रोहित। तुम माँ साहब की मातमपुर्सी के लिए ही तो आ रहे हो आखिर।आ जाओ। “

” जी लेकिन क्या आपके घर आ सकता हूँ। वहाँ किसी को ऐतराज न हो? “

रेखा भी अपने घर वालो को जानती थी। जब तक उसके पिता यानी ठाकुर साहब थे उन्होंने सब को दबा कर रखा हुआ था, उनके जेल जाने के बाद माँ का भी वही रवैया था। ज़ाहिर है अब उन दोनों के बिना उसके लिये इन सब के मन में कोई बहुत ज्यादा प्रेम तो था नही। वो तो उसकी ऊंची ससुराल की साख के कारण यहाँ उसे पलकों पर रखा जा रहा था लेकिन अगर एक मौका भी इन लोगों को मिल जाये तो उसे नीचा दिखाने से बाज़ नही आने वाले थे।
   यही सब सोचती रेखा ने रोहित को कॉफी शॉप में मिलने बुला लिया था…
   अगले दिन बेटे को भी साथ ले रेखा ड्राइवर के साथ कॉफी शॉप पहुंच गई थी। रोहित पहले ही वहाँ बैठा उन लोगो का इंतेज़ार कर रहा था…
   रेखा ने बाहर से ही गार्डन कैफे में बैठे रोहित को देख लिया था। उसने ड्राइवर को वापस भेज दिया।

   ज्यादा देर न हो इसलिए उसने घरके पास वाले कैफे में ही रोहित को बुला लिया था।
  ड्राइवर घर पहुंचा उसी वक्त विराज भी रेखा से मिलने  सरप्राइज देने चला आया।
   घर परिवार के लोगो ने घर के दामाद का स्वागत किया लेकिन ये पूछने पर की रेखा कहाँ है कोई सही जवाब नही दे पाया ।
    रेखा की काकी ने ड्राइवर को बुलवा भेजा…

” कुंवर सा हमें तो बाई सा ने यही कहा कि किसी सहेली के घर जा रहीं हैं। अब वो तो घर की बेटी ठहरी इसलिए उन पर कोई सूतक तो लगेगी नही इसलिये उन्हें घर बाहर जाने में भी कोई रोक तो थी नही।
  हमने भी मना नहीं किया कि उनका ज़रा मन लग जायेगा । “

” हर्ष को साथ लेकर गईं है क्या? “

” जी हाँ हर्षवर्धन भी साथ गयें हैं उनके, ये खड़ा है ना ड्राइवर यही तो छोड़ कर आया है। क्यों कहाँ छोड़ कर आये हो बाई सा को? आप आराम कीजिये कुंवर सा हम उन्हें अभी फ़ोन लगा देते हैं।

” नहीं काकी सा रहने दीजिये।हम खुद इन्ही ड्राइवर के साथ जाकर उन्हें सरप्राइज देना चाहतें हैं।”

” जी जैसी आपकी मर्जी।”

   रेखा और विराज के दिल आज तक नही मिले थे। पर कुछ राजपरिवार का होने की ज़िम्मेदारी और कुछ रानी माँ का मरने से पहले लिया वादा की कभी रेखा को न छोड़ना के कारण ही विराज जैसे तैसे इस रिश्ते को निभा रहा था।
  वैसा ही कुछ हाल रेखा का भी था। और अब अपने जन्म से जुड़ी सच्चाई जानने के बाद तो उसके मन में एक डर सा बैठ गया था कि कहीं विराज को उसकी सच्चाई पता चल गई तो वो उसे तुरंत महल से निकाल बाहर करेगा और अब ठाकुर साहब और ठकुराइन के न रहने पर मायके में भी वो ज्यादा दिन किसी का मुहँ सहारे के लिए नही देख सकती थी।

   दोनो ही अपनी अपनी तरफ से अपने रिश्ते को बचाने की कोशिश में थे….
   युवराज के बार बार समझाने पर ही विराज रेखा को लेने आया था, और इसलिए उसे बिना बताए सरप्राइज देकर चौंकाना चाहता था।
   ड्राइवर ने विराज को ठीक उसी कैफे के सामने उतार दिया।
  विराज को लगा शायद अपनी सहेली से मिलने रेखा यहीं आयी हैं।
  वो बेधड़क गार्डन के रास्ते अंदर चला गया…अंदर जाते हुए ही उसकी नज़र गार्डन में सबसे किनारे की टेबल पर पड़ गयी….

    एक लंबी कुर्सी कम सोफे पर रोहित के कंधे पर सर रखे रोती रेखा उसे दिख गयी।
  रोहित ने गोद में हर्ष को भी संभाल रखा था। विराज के पैर अपनी जगह पर जम गए। क्रोध से उसकी आंखें उबलने लगीं थीं।
  एक बार पहले भी इसी लड़के से मिलते हुए विराज ने रेखा को पकड़ा था और आज फिर वही।
  इसका मतलब इनके बीच कोई खिचड़ी तो पक रही थी। लड़का भी हिम्मती था तभी तो जो लड़का रेखा से मिलने उसके ससुराल तक पहुंच गया उसके लिए मायके तक पहुंचना कौन सी बड़ी बात थी।
  गुस्से से उबलती आंखों से वो कुछ देर वहीं खड़ा उन्हें देखता रहा …

   रेखा ने रोते हुए अपना सर रोहित के कंधों से हटा लिया । रोहित ने टिश्यू पेपर उसकी ओर बढ़ाया और सामने रखी प्लेट से कुछ उठा कर हर्ष को खिलाने लगा।
   ऑंसू पोंछ रेखा रोहित को कुछ बताने लगी। उसकी बातें सुनता रोहित बीच बीच में हर्ष को खिलाता भी जा रहा था… और अब विराज से खुद को संभालना मुश्किल होने लगा था। वो गरजता हुआ उन दोनों के सामने जा खड़ा हुआ….

” तो ये सब चल रहा है यहाँ ? इसलिए आप नहीं चाहतीं थीं कि हम जल्दी आये आपको लेने और बहाना ये की माँ साहेब के सारे काज निपट जाएं। वाह रेखा वाह। पहले भी एक बार …

” बस कीजिये। आपकी सोच ही घटिया है इससे ज्यादा आप सोच भी नही सकते।
  अगर दो लोग साथ बैठे हैं तो उनके बीच कुछ गलत ही हो ये ज़रूरी तो नही है। लेकिन आप इससे ज्यादा सोच भी तो नही सकते , आपसे और उम्मीद भी क्या करें हम ! “

  रेखा की बात पूरी होने से पहले ही एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गालों पर रसीद कर विराज रोहित की ओर मुड़ने ही वाला था कि उसके खुद के चेहरे पर एक ज़ोर का घूंसा पड़ा और वो एक झटके से नीचे गिर गया।
  गुस्से में रोहित को घूरता विराज खड़ा होता कि रोहित उसके सीने पर सवार उस पर ताबड़तोड़ मुक्कों और घूंसों की बारिश कर बैठा।
   रोती बिलखती रेखा ने रोहित को पकड़ कर खींचा और उसे दूसरी तरफ को धक्का दे दिया…

” बस करो रोहित! तुम्हें ये हक किसने दिया कि तुम हमारे पति पर हाथ उठाओ। सिर्फ दोस्त हो और दोस्त जैसे ही रहो। अभी के अभी यहाँ से निकल जाओ। “

” अब ये सब दोस्ती का ड्रामा करने की ज़रूरत नही है तुम दोनों को। हमने सब कुछ देख लिया है और हम अभी के अभी यहाँ से वापस लौट रहे हैं।”

  रेखा के मन में पनपता डर साकार हो गया था। उसे विराज से प्यार बिल्कुल भी नही था लेकिन विराज के छोड़ देने पर अपने अंधकारमय भविष्य के बारे में सोच अचानक वो उसके सामने हाथ जोड़े खड़ी हो गयी..

” ऐसे मत जाइए विराज सा। एक बार हमारी भी बात सुन लीजिए। हमने कोई गलती नही की। जिस गुनाहगार को फांसी दी जाती है उसकी भी आखिरी इच्छा पूछी जाती है और आप हमें बिना किसी गुनाह के ही बिना मौका दिए छोड़ कर चलें जा रहें हैं। ऐसा मत कीजिये आपको आपके बेटे की कसम।”

  जाने क्या सोच कर हिकारत से एक नज़र रोहित को देख विराज ने हर्ष को गोद में उठाया और आगे बढ़ गया। अपना पर्स संभाले गिरते पड़ते रेखा भी उसके पीछे भागती चली गयी।
   जाते जाते उसने एक बार भरी हुई आंखों से रोहित को देखा और आंखों ही आंखों में उससे माफी मांग निकल गयी।
  अपनी सूनी आंखों से उसे देखता रोहित चुपचाप उसे जाता देखता रहा।
   वो खुद भी यही चाहता था कि रेखा और विराज का जीवन पटरी पर आ जाये लेकिन न चाहते हुए भी वो बार बार उन दोनों के बीच आ खड़ा होता था।

   विराज ने उसी समय ड्राइवर को गाड़ी एयरपोर्ट की तरफ लेने कहा और बच्चे को गोद में लिए बैठ गया।
रेखा भी चुपचाप बैठ गयी। आंखें तो उसकी बरस ही रही थी दिल भी रो रहा था। एक बार मुड़ कर अपना मायका अपना घर देख भी नही पायी थी।
   अपना चेहरा हाथों से छिपाए वो अपने ऑंसूओं को रोकने की कोशिश कर रही थी कि गाड़ी एक झटके के साथ रुक गयी..
  उसने देखा गाड़ी उसके घर के सामने ही रुकी थी।

” जाइये अपना और हर्ष का सामान तुरंत लेकर आ जाइए फिर हम सीधे एयरपोर्ट निकल जाएंगे। “

  विराज के मन में कब क्या चलता है रेखा की समझ से बाहर था। फिर भी बिना किसी से कुछ बोले ऐसे निकल जाने पर तो मायके में उसकी नाक ही नही बचनी थी। कम से कम अब एक बार सबसे मिल कर यह तो कह सकती है कि महल से बुलावा आ जाने से उन्हें ऐसे तुरंत निकलना पड़ रहा है।
   वो सामान लेकर घर भर में सबसे विदा लेकर निकल गयी थी।

      विराज ने उसे लाकर वापस महल में पटक दिया था और एक बार फिर अपनी पुरानी ज़िन्दगी में खो गया था। दोस्तों के साथ पी पिलाकर इधर इधर घूमना, कभी शिकार पर निकल जाना इसी सब में विराज खुद को भुलाए था।
     उसे काम तो कुछ नही करना था लेकिन अधिकार सारे चाहिए थे।

   वक्त बीतता जा रहा था और बीतते वक्त के साथ विराज के स्वभाव की उद्दंडता बढ़ती जा रही थी।


उसे रेखा को साथ लेकर आये छै महीने बीत चुके थे।राजा पूरी तरह से अपने चुनावों की तैयारियों में लगा था।
    बाँसुरी की प्रेग्नेंसी में अब भी मुश्किलें थीं लेकिन अब उसने सात महीने पूरे कर लिए थे। काम भी काफी हद तक उसने समेट लिया था क्योंकि अब उसे छुट्टियों पर जाना था।
   निरमा के आ जाने से उसे काफी राहत हो गयी थी। लीना भी लगभग दो तीन दिनों के अंतर में आ ही जाती थी….
   पंद्रह बीस दिनों में एक बार राजा भी किसी तरह समय निकाल कर आ जाया करता था।
   दिनों में जैसे पहिये लग जाते थे जब वो आ जाता था । दोनों साथ में दो दिन रहे या हफ्ते भर पर दिन पलक झपकते बीत जाते थे , और उसके वापस लौटते ही दिन नीरस से गुमसुम से हो जाते थे।
    बीच में कुछ दिनों के लिए उसकी माँ और फिर ताई भी आ कर रह गईं थीं।
   समय कठिन ज़रूर था पर बीतता जा रहा था। हर एक दिन बीतने के साथ ही बाँसुरी में सकारात्मकता आती जा रही थी।
   उसे धीरे धीरे विश्वास होने लगा था कि अब उसे या उसके बच्चे को कोई समस्या नही आएगी…
    उसने छुट्टियां डाल दी थीं , शाम तक उसे वापस ले जाने राजा भी आ गया था….

    एक दिन के बाद दोनो की महल वापसी थी कि ताई ने टोक दिया….

  ” बंसी बेटा , परसो लंबी यात्रा पर निकलना है उसके पहले एक बार अपनी डॉक्टर से जांच करवा लें छोरी। लंबी यात्रा है तेरी।।”

” कहाँ लंबी है ताई। यहाँ से निकल कर पांच से छै घंटो में तो महल पहुंच ही जाऊंगी।

” ताई सही ही कह रहीं हैं बाँसुरी , चलो अभी ही चलतें हैं । एक बार चेकअप करवा कर ही निकलेंगे। “

  इतने महीने निकल चुके थे ,कुछ छोटी मोटी परेशानियों के अलावा कोई ऐसी बड़ी परेशानी तो हुई नही थी तो अब क्या होगा, यही सोच कर बाँसुरी राजा के साथ अस्पताल निकल गयी।

  डॉक्टर ने उसकी जांच की और चिंता की लकीरें उनके माथे की सलवटों में उभर आयीं….


क्रमशः

 

  aparna ….


 

जीवनसाथी – 106




  जीवनसाथी – 106



       लीना की बात खत्म होने तक बाँसुरी सांस रोके उसकी सारी बातें सुनती रही। उसे यकीन नही था कि कोई आदमी ऐसा भी हो सकता है कि सिर्फ और सिर्फ अपने फायदे के लिए अपनी पत्नी तक को दांव पर लगा दिया।
   सुबह से कुछ अधिक ही दौड़भाग हो चुकी थी, कुछ शारीरिक थकान और कुछ भूख से अब बाँसुरी को वहाँ अच्छा नही लग रहा था…
    फिर भी उसने खुद को संभाले रखा था…
अचानक उसे जैसे कुछ याद आ गया…

” लीना वहाँ ठाकुर साहब की पत्नी के साथ जो दूसरी औरत मिली वो कौन थी?”

कुछ देर लीना नीचे देखती चुप बैठी रही…
   फिर धीमे से उसने बाँसुरी को सच बता दिया..

” तुम्हारी देवरानी रेखा थी। ठाकुर साहब की बेटी। अंदाज़ा यही लगाया जा रहा है कि वो और उसकी माँ किसी से शायद मिलने जा रहीं थीं। शायद ठाकुर साहब के केस के लिए की कैसे उन्हें बचाया जाए? और विडंबना देखो अपने पति को ही बचने जाने वाली औरत को उसके पति ने खुद की जान बचाने मरवा दिया।
   एक पॉइंट ये भी हो सकता है कि ठाकुर साहब ने खुद अपने किसी आदमी से कह कर ठकुराइन को घर से बाहर उस समय पर निकलवाया हो और उन पर हमला करवा दिया हो।
    अभी इन्वेस्टिगेशन चल रही है, मामला थोड़ा और साफ हो तभी सच्चाई पता चलेगी।”

” रेखा से कोई पूछताछ नही हुई क्या? “

” नही अभी वो इस हालत में नही है। शायद एक्सीडेंट के समय वो बेहोश हो चुकी थी और उसे अपनी माँ का इस तरह चले जाना मालूम नही हो सका। अभी कुछ समय पहले ही होश आया है। अभी डॉक्टर्स ने ऑब्जरवेशन में रखा है, सुबह उससे पूछताछ की जाएगी।
   तुम्हारे लिए कुछ खाने को मंगवाया है, थोड़ा सा खा लो वरना सेहत पर असर पड़ेगा। “

   लीना के इशारे पर बाहर से एक अर्दली खाने की प्लेट लिए अंदर चला आया…
   थाली देखते ही बाँसुरी की सुबह से सोई भूख जाग उठी..

” वाह ! मशरूम मसाला और चांवल … देखते ही जो खुशी बांसुरी के चेहरे पर आई पहला निवाला लेते ही वो गायब हो गयी।
   उसे ऐसी उबकाई आयी कि उससे कुछ खाया नही गया…
   लीना ने एक नज़र उसे देखा और मुस्कुरा उठी..

” ओहो तो डबल प्रोमोशन हो गया है कलक्टरनी जी का। बहुत बहुत बधाईयां बाँसुरी! पर अभी मुझे बताओ कि तुम क्या खाओगी , वही मंगवा लेते हैं। “

  “अब कुछ मंगवाने की ज़रूरत नही है लीना। इनका खाना मैं साथ लेकर आया हूँ। “

  राजा को अंदर प्रवेश करते देख बाँसुरी के चेहरे पर हंसी खिल गयी। वो भाग कर राजा के गले से लग गयी…
    मन इतना परेशान था कि उसके ऑंसू बहने लगे..

” अब रोने की क्या बात है हुकुम? आ गया हूँ मैं। “

” हम्म थोड़ा परेशान हो गयी थी। आजकल मूड स्विंग भी बहुत होता है ना!”

बाँसुरी को प्यार से एक तरफ कर राजा ने लीना को देखा …

” थैंक्स लीना! तो क्या अब मैं बाँसुरी को लेकर जा सकता हूँ। “

” जी हाँ! सुबह हो सकता है कुछ पूछताछ के लिए आपको आना पड़े। वैसे आप परेशान मत होना मैं ही घर आ जाऊंगी।  और एक बात, आप लोग अभी रेखा को अपने साथ नही ले जा पाएंगे। उसे कल अस्पताल से छुट्टी के बाद हम ज़रा पूछताछ के लिए यहाँ ला सकतें हैं।”

” रेखा ? रेखा अस्पताल में है? “

लीना आश्चर्य से राजा की ओर देखने लगी। उसे लगा था कि राजा और बाकी के लोग इस बात को जानते होंगे।

” राजा साहब कल रात ठाकुर साहब की पत्नी और बेटी रेखा एक साथ ही बाहर निकले थे। वो दोनों ठाकुर साहब के बचाव के लिए कुछ सबूत इकट्ठे करने जा रहे थे शायद, और उसी बीच ये हादसा हो गया….
   … हालांकि ये भी कहा जा रहा है कि….

लीना कुछ देर को सोच में पड़ गयी कि क्या उसे पूरी बात बता देनी चाहिए या नही लेकिन वो आगे बता पाती उसके पहले ही समर जो कुछ देर पहले ही किसी के फोन के कारण बाहर गया था, वापस चला आया। और उसके राजा से कुछ बात करने के कारण लीना अपनी बात कह नही पायी।

” हुकुम विराज सा बहुत नाराज हैं। वो दरअसल जब लीना से आपकी बात हो रही थी उसी वक्त उनका फोन आया और उन्होंने ये बात सुन ली कि रेखा ठाकुर साहब के बचाव के लिए प्रयास करने जा रही थी।”

“” ओह्ह ये तो गलत हो गया।”

” जी हुकुम ये गलत हो गया। अब वो गुस्से में वहाँ से निकल रहें हैं यहाँ रेखा बाई सा की खबर लेने। और आप उनके गुस्से को जानतें ही हैं। वैसे उनसे बात होने के बाद विराट का भी हमें फ़ोन आया था । उन्होंने कहा है कि वो विराज सा को अकेले नही छोड़ेंगे। और कोशिश यही करेंगे कि वो अभी न आये पर अगर नही मानये तब वो भी साथ ही आ जायेंगे।”

” ठीक है, दोनो साथ रहेंगे तो कम से कम विराज का गुस्सा तो सम्भल जाएगा, लेकिन अब मुझे एक और बात की चिंता हो रही है समर।।
  एक तो ये कि रेखा ने हम सब के साथ ये धोखा क्यों किया? उसे क्या ज़रूरत थी ऐसा करने की? मतलब ठाकुर साहब की सारी सच्चाई पता चलने के बाद भी वो अपने पिता को बचाना और किसी तरह से इस सब से बाहर निकालना चाहती थी। वैसे रेखा को पूरी तरह गलत भी नही मान सकते क्योंकि वो तो ये सब अपने पिता के लिए कर रही है लेकिन अब विराज इस बात को समझेगा नही , उसने मॉम को खोया है और ज़ाहिर है अभी इस बात को ज्यादा वक्त बीता नही तो उसका इस बात को सामान्य मानना मुश्किल है। उसे यही लगेगा कि रेखा ने बहुत बड़ी गलती कर दी है। “

लीना बाकी बातें भी बताने की सोच रही थी कि राजा बाँसुरी को लेकर निकलने लगा। उसे भी बाँसुरी और उसकी हालत देख तरस आने लगा था। वो जितनी जल्दी घर पहुंच कर आराम कर ले उतना अच्छा है सोच कर लीना ने ठाकुर साहब के बारे में और कुछ नही कहा और समर और प्रेम के साथ राजा बाँसुरी को संग लिए अपनी कोठी के लिए निकल गया….. रात वैसे भी आधी से ज्यादा बीत चुकी थी।


     बाँसुरी ने भी थकान के कारण राजा से ज्यादा कुछ नही कहा।
   कोठी में पहुंचते ही बाँसुरी सीधे अपने कमरे में चली गयी।  राजा समर और प्रेम से बातें करता अपनी अगली रणनीति के बारे में सोच रहा था, उसे अभी सबसे ज्यादा चिंता विराज की ही हो रही थी। अचानक उसे आदित्य की भी याद आ गयी…

” समर आदित्य की क्या खबर है? वो भी तो यहीं होगा? रेखा को लेकर तो वो ही आया था दून !”

” हुकुम उनका फ़ोन बंद आ रहा है। कल शाम के पहले बात हुई तो थी पर ऐसी कोई खास नही, थोड़ा परेशान लग रहे थे। ज़ाहिर है अभी जैसी घटनाएं घट रहीं हैं उनका परेशान होना स्वाभाविक भी है।”

” हम्म !” छोटा सा जवाब देकर राजा फिर किसी सोच में डूब गया था। उसकी जिंदगी में सारे मोती ऐसे बिखरे पड़े थे उन्हें एक साथ एक धागे में सहेजना कितना मुश्किल लग रहा था।
   वो सोच में गुम था कि उसके मोबाइल पर बांसुरी का मैसेज चला आया…

” साहेब ऊपर आइये ! ”

  बाँसुरी का मैसेज पढ़ते ही वो प्रेम और समर को भी आराम करने बोल ऊपर चला गया…

” क्या हुआ बाँसुरी ठीक तो हो ना? “

  बाँसुरी ने मुस्कुरा कर राजा की आंखों में देखा …  और ना में सर हिला दिया…

” आप यहीं मेरे पास रहिये साहब! आजकल घबराहट सी होने लगी है, हर बात पर। “

  राजा ने हां में सर हिलाया और बाँसुरी के पास पहुंच गया।
   राजा की गोद में सर रखे बाँसुरी खिड़की से बाहर दिखते आसमान को देखती रही…
     वो अपनी ही परेशानी में गुम थी। उसकी तबीअत और उसकी प्रेग्नेंसी की जटिलता के बारे में राजा को कुछ नही मालूम था। उसने एक बहुत बड़ा निर्णय अपने अकेले के बलबूते ले लिया था। अगर वो राजा को सब बता देती है तो वो ज़रूर उसके स्वास्थ्य को देखते हुए उसे प्रेग्नेंसी टर्मिनेट करने ही कहेगा।
  वैसे ही उसकी परेशानियां कम नही हैं उस पर ये एक और सरदर्द हो गया। इससे अच्छा तो ये प्रेग्नेंसी ही नही होती।
   कुछ दे कर छीन लेना तो हृदय को हमेशा छलनी कर जाता है। आखिर भगवान ने उसके साथ ऐसा क्यों किया है।
  अभी भी एक डर तो हमेशा उसके मन में बना रहेगा कि कहीं आगे चल कर कुछ गड़बड़ न हो जाये। और ऐसा हुआ तब भी तो राजा दुखी हो ही जायेगा तो क्या  इससे अच्छा अभी ही बता कर बात खत्म कर लेना चाहिए । बांसुरी ने लंबी सांस खींची और बैठने ही वाली थी कि राजा ने उसे वापस खींच कर लिटा दिया। उसके बालों में हाथ फेरते वो उसे अपने बचपन के किस्से सुनाने लगा…
   अपनी माँ से जुड़ी बातें बताना उसे सदा से पसन्द था ये और बात थी कि माँ से जुड़ी यादें ही गिनी चुनी थी उसके पास।
  बस उन्हीं गिनी चुनी यादों के मोती वो बाँसुरी के साथ अक्सर चुनता अपने बचपन को याद किया करता था….

“माँ साहब को गाने का बहुत शौक था बाँसुरी ! मैं बहुत छोटा था पर मुझे बहुत अच्छे से याद है अक्सर शाम के वक्त माँ साहेब अपने कमरे में बैठ वीणा बजाया करतीं थीं।
   महल के नौकर चाकर भी सुनने आ जाया करते थे। और मैं मेरा तो पूछो ही मत, बिल्कुल खो जाता था उनके सुरों में।
   बाँसुरी ये जो हमारी बेटी होगी न उसे मैं सबसे पहला तोहफा अपनी माँ की वीणा ही दूंगा। मुझे उसे देख कर ऐसा लगेगा जैसे इतने सालों बाद मेरी माँ वापस आ गयी। है ना बाँसुरी!

  बाँसुरी की आंखें भर आईं , दुनिया भर के सामने इतनी मजबूती से खड़ा रहने वाला राजा अजातशत्रु उसका पति अंदर से अब भी एक बच्चा ही तो है। आज तक उसने राजा के अंदर की इस बात को पहचाना क्यों नही।
    वो एक कुशल शासक है,बहुत आज्ञाकारी छोटा भाई है तो उतना ही साज संभाल करने वाला बड़ा भाई भी है।
   जितना ही उन्मुक्त  और उतावला प्रेमी है उतना ही परवाह करने वाला , ध्यान रखने वाला पति भी है।
  अपनी प्रजा का पालक है तो मैत्री के लिए अपने प्राणों तक की परवाह न करने वाला सखा भी है।
  लेकिन उसके इन सारे रूपों में उसका बाल रूप उसने कहीं भीतर सहेज रखा है, छिपा रखा है सबसे। अपने अपूर्ण बाल्यकाल की मधुर स्मृतियों के साथ, जिन स्मृतियों में वो एक नन्हा बालक है और उसके साथ है सिर्फ उसकी माँ!

   राजा अजातशत्रु का एक पक्ष ये भी है कि उसकी उन स्मृतियों से उसने अपने हर करीबी को दूर रखा है। उन स्मृतियों की तिजोरी में उसके और उसकी माँ के अलावा कोई नही है , न उसकी प्रजा न पिता न भाई न दोस्त यहाँ तक कि बाँसुरी भी नही।
  उन यादों में गोते लगाता वो हमेशा एक नौ साल का बच्चा बन जाता है जो अपनी माँ का आँचल थामे बस उसके आगे पीछे घूमना चाहता है। बस उन्हीं की बातें सुनना चाहता है।
   वो बच्चा जो बार बार अपनी माँ की हथेली खोल कर सूंघ लेता है। और जब उसकी माँ पूछती है ” ये क्या मेरे हाथो को सूँघता रहता है  तू कुमार?

तो वो उतने ही भोलेपन से कह देता ” आपके हाथो से खुशी की खुशबू आती है माँ साहेब !”

  ” चल पगला! कुछ भी कहता है! खुशी की भी कोई खुशबू होती है!”  और प्यार से उसके बालों पर हाथ फेर वो इधर उधर व्यस्त हो जातीं।
   और उसी खुशी की खुशबू से महका वो छोटा सा लड़का अपने खिलौनों में व्यस्त हो जाता।
   उसे क्या पता था कि ये खुशबू उसके पास क्षणिक ही थी।।
   इसलिए तो अपनी माँ के जाने के बाद वो शायद अपना बचपना ही भूल गया था।
   सारे राजमहल के खिलाफ जैसे उसने अदृश्य तलवार खींच ली थी। महल के हर कायदे कानून की धज्जियां उड़ाने में उसे आनन्द आने लगा था।
    महल के नियमों को ताक पर रख उसने महाराज को पिता साहब की जगह डैड और रानी माँ साहेब को मॉम कहना शुरू कर दिया था। जाने छोटी मोटी ऐसी कितनी ही निरर्थक और उद्धेश्यरहित नियमावली को उसने अपने स्वयं के लिए बांन्ध कर फेंक दिया था।
   रियासत से बाहर पढ़ने की आज़ादी के लिए लड़ झगड़ कर बनारस जाना हो या बिना अनुमति लिए रियासत की आम जनता के घर पर हो रहे शादी ब्याह में सम्मिलित होना हो उसने हर जगह महल के नियम कानूनों वहाँ के प्रोटोकॉल को पलट कर रख दिया था।

      बाँसुरी से मिलने के बाद तो उसने सोच ही लिया था कि उससे शादी कर महल और रियासत सब छोड़ कर अलग चला जायेगा लेकिन उसकी नियति को ये मंज़ूर जो नही था।
  नियति के साथ साथ युवराज भैया, दादी साहेब, समर सब ने मिल कर जिस ढंग से उसे गद्दी पर बैठाया वो मना भी तो नही कर पाया था।
   और गद्दी पर बैठने के साथ ही एक नए अजातशत्रु का जन्म हुआ था।
  महल के नियमों कायदों के लिए प्रतिबद्ध , अपने वचनों के लिए कटिबद्ध अजातशत्रु!

स्नेह तो उसके मन में सदा से सबके लिए था,बस जिन नियमों की अवहेलना करता फिरता था अब उन्हीं नियमों का पालन सबसे करवाने लगा था।
  पर जीवन के इतने उतार चढ़ावों में भी उसने अपने अंदर का वो नौ साल का मासूम बच्चा जो अपनी माँ की हथेलियों में खुशी की खुशबू सूंघा करता था को बचा कर रखा हुआ था।

    बाँसुरी की आंखें झरने लगी थीं। वो जब से राजा से मिली थी हर बात के लिए उसी पर तो निर्भर होती चली जा रही थी। बिना मन की भास्कर से होती शादी में भी वो खुद कहाँ कुछ कह पाती अगर राजा ने आगे बढ़ कर उसे हिम्मत न दी होती।
    महल के लोगों को मनाना था या उसके मायके वालों को हर जगह राजा ही तो आगे था। वो तो बस उसे देखती मुग्ध होती हर जगह चुप ही खड़ी थी।
   यहाँ तक कि उसकी पढ़ाई उसकी तैयारी में भी वो हर कदम पर साये की तरह उसका साथ देता रहा और अपने सुख दुख के पलों में भावविह्वल होती वो कभी उसके अंदर छिपे बच्चे को देख ही नही पायी।

  वो जब कभी अपनी माँ से जुड़े किस्से उसे सुनाता,वो सुनती ज़रूर लेकिन उसके साथ ही वो अपने किस्से कहने लगती और अक्सर वो उसकी बातें सुनता चुप हो जाता।

  “राजा राजा! तुम इतने अच्छे क्यों हो? क्या सच में तुम्हारे जैसा कोई इंसान हो सकता है। नही ! शायद सैकड़ों सालों में कभी तुम्हारे जैसा कोई पैदा होता होगा और मेरी किस्मत है कि तुम मुझे मिल गए।
   तुम्हारी इस खुशी तुम्हारे बच्चे के लिए मेरी जान भी चली जाए तब भी मैं अब उसे जन्म देकर ही रहूंगी। “

अपने मन में चलती उहापोह से बाँसुरी को राहत मिल गयी थी।

  राजा खुद में खोया उसे कुछ न कुछ ऐसी बातें बताता जा रहा था जिन्हें सुन कर बाँसुरी को हंसी आये और वो थोड़ा सुकून महसूस कर सके। लेकिन उसकी गोद में सर रख कर उसकी बातें सुनती बाँसुरी की आंखें बरस रहीं थीं।

“अरे ये क्या?तुम रोने क्यों लगी?  क्या हुआ हुकुम। कुछ परेशान हो? “

गला इतना रुन्ध गया था कि वो कुछ बोलने की हालत में ही नही थी। उठ कर उसने राजा को गले से लगा लिया…

” साहेब ! एक बात कहुँ!”कुछ सम्भलने के बाद उसने अपने आंसू पोंछ कर राजा की तरफ देखा

” बोलो बाँसुरी!

” कभी मेरी भी हथेली सूंघ लो। शायद तुम्हारी खोई हुई खुशी की महक मिल जाये। “

” क्या हुआ बाबू ? तुम अचानक इतनी उदास कैसे हो गयी? “

  बाँसुरी की भरी हुई आंखें देख राजा ने उसे अपने गले से लगा लिया।
   बाँसुरी रोती रही , और वो उसके बालों पर हाथ फिराता बैठा रहा।
  उसे समझ आ रहा था कि ये सब बाँसुरी के मूड स्विंग्स के कारण हैं,इसलिए शान्ति से बैठे उसने उसे रो लेने दिया।

*****

   सुबह राजा के मना करने पर भी बांसुरी रेखा से मिलने चल ही दी…
   आखिर वो दोनो यहाँ साथ ही तो आयीं थीं दून।  रेखा के बहुत इसरार से बुलाने के कारण वो एक बार उसके मायके जाने भी वाली थी लेकिन उसी वक्त पड़े किसी ज़रूरी काम के कारण नही जा पायी थी। और बस उसी के बाद ये हादसा हो गया था। हालांकि ठकुराइन यानी रेखा की माँ ने उससे कभी सीधे मुहँ बात नही की थी।
  उस दिन भी फ़ोन पर गरज बरस कर फ़ोन उन्होंने पटक दिया था।
  
  राजा के साथ ही प्रेम और समर भी थे लेकिन अंदर सिर्फ बाँसुरी और राजा ही गए।
अब तक रेखा को भी होश आ चुका था। उसके मायके से भी रिश्तेदार वहाँ उससे मिलने आ कर जा चुके थे क्योंकि ठकुरानी का काम भी आज ही होना था, इसी से रेखा को आज ही छुट्टी दिलवाना भी ज़रूरी था।
   रेखा के रिश्ते के एक मामा बाहर अस्पताल की औपचारिकता पूरी कर ही रहे थे कि राजा और बाँसुरी के वहाँ पहुंच जाने से वो उनसे मिलने आगे बढ़ गए। रेखा के बारे में उनसे पूछ कर राजा बाँसुरी के साथ आगे बढ़ गया और जाते जाते समर को बिल्स और बाकी चीज़े देखने का इशारा करता गया।
    रेखा की हालत अब भी बहुत खराब थी, बाँसुरी के साथ आये राजा को देख उसे लगा ठकुराइन की खबर सुन कर ही राजा विराज के साथ वहाँ आया होगा।
  राजा को देख वो अपने बिस्तर से उठ कर खड़ी हो गयी..

” नही खड़े होने की ज़रूरत नही है रेखा। तुम आराम करो। हम दोनों बस तुम्हें देखने आए थे। “

” जी भाई साहब !” धीरे से बैठने के बाद भी उसकी नज़र बाहर दरवाज़े की ओर ही थी…
  उसे बाहर की तरफ देखते देख बाँसुरी ने पूछ ही लिया..

” किसी का इंतेज़ार था क्या रेखा? “

” हाँ हमे लगा भाई साहब के साथ विराज सा भी होंगे। उन्हें भी तो हमारी माँ ..
   इससे आगे वो और कुछ नही बोल पायी और वापस उसकी सिसकियां उस कमरे में गूंज उठी। बाँसुरी ने रेखा को गले से लगा लिया..

” खुद को संभालो रेखा। हम सभी तुम्हारी हालत समझ सकतें हैं। अभी कुछ दिन भी नही हुए जब हम सब ने रानी माँ को खो दिया, और अब तुम्हारी माँ भी….
   फिर भी तुम्हें खुद को संभालना तो होगा ही ना।”

  रेखा के ऑंसू थम नही रहे थे। उसके बगल में बैठी बाँसुरी उसकी पीठ पर हाथ फेरती उसे सांत्वना देती रही । कुछ देर में ही रेखा के मामा भीतर चले आये। ठकुराइन के अंतिम संस्कार का समय आ गया था, रेखा की वहाँ पूछ मची थी।
  मामा जी के साथ रेखा अपने घर के लिए निकल गयी। उनके साथ ही राजा और बाँसुरी भी उसके घर की ओर बढ़ गए।
  

*******

      ठकुराइन को गुजरे तीन चार दिन बीत चुके थे। अब तक रेखा अपने घर पर ही व्यस्त थी।
अब राजा भी वापसी की तैयारी कर चुका था। बाँसुरी भी राजा के आ जाने से काफी कुछ सम्भल चुकी थी और अपना ऑफिस का काम भी उसने संभाल लिया था।
   अभी उसे उसके गृहग्राम में पोस्टिंग मिलना संभव नही था लेकिन समर इसके लिए भी प्रयासरत था कि किसी तरह अब बाँसुरी को वापस अपने शहर में ही पोस्टिंग मिल जाये।
   उन लोगों को शाम में निकलना था। दोपहर में ही लीना उनसे मिलने चली आयी, इत्तेफाक की बात थी कि उस वक्त रेखा भी बाँसुरी से मिलने आई हुई थी।

    रेखा से एक बार पहले भी पूछताछ के सिलसिले में लीना मिल चुकी थी।

” अब कैसी तबियत है आपकी रेखा जी। “

“जी पहले से अब ठीक हूँ।

” जी !! वैसे उस दिन आप इतनी परेशान लग रही थी कि आपसे कुछ पूछा ही नही गया। लेकिन बात ये भी है कि अगर हमें सच्चाई नही पता चलेगी तो हम उन हत्यारों तक पहुंचेंगे भी कैसे?.
  आपकी माँ ने आखिरी बार बाँसुरी से बात की थी, इसलिए पुलिस का एक शक बाँसुरी पर भी जाता है।अगर आप सारी बातें बता पाएंगी तो हो सकता है बाँसुरी को कुछ राहत हो जाये। फिलहाल एक फोन कॉल के अलावा और कोई सबूत बाँसुरी के खिलाफ न होने से ही मैंने अभी तक उसका अरेस्टेशन रोक रखा है, वरना तो यहाँ एक भी सबूत मिला और लोग हम पर चढ़ पड़ेंगे उसे सलाखों के पीछे भेजने के लिए।”

” नही ऐसा कैसे हो सकता है? भाभी साहेब तो वहाँ थी ही नही। “

आज तक रेखा बाँसुरी को उसके नाम से ही बुलाया करती थी, उसका अचानक से ऐसे बोलना सभी को चकित कर गया। रेखा राजा की तरफ देखने लगी। राजा ने समर और प्रेम की ओर देखा और वो दोनों बाहर चले गए।

   उनके बाहर जाते ही रेखा ने एक एक कर सारी बातें राजा और बाँसुरी को बता दी। उसका केसर से मिलने जाना , ठकुराइन का उसका पीछा करते हुए उसके और केसर तक पहुंच जाना। उसने सब कुछ बता दिया। केसर ने ठाकुर साहब के षड्यंत्र और उनकी प्लानिंग की जो बात कही वो भी सारी बात उसने राजा को रोते रोते बता ही दी…

” हमें तो यकीन नही हो रहा कि ये वही इंसान है जिसे हमने अपना पिता माना था कभी। वो इतना गिर सकते हैं ये हमने कभी सपने में भी नही सोचा था। अपनी रिहाई के लिए उन्होंने अपने ही लोगों से कह कर माँ को भी मरवा दिया।”

  राजा के चेहरे पर नाराजगी झलकने लगी थी लेकिन उसने अब तक कुछ भी नही कहा था।

” इतनी बड़ी चालें चलने वाले ठाकुर साहब को मौका तो मिला था अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार में आने का? फिर वो अभी आये क्यों नही?”

बाँसुरी के सवाल पर लीना ने जवाब दिया…

“ठाकुर साहब के घर से अर्जी भेजी गई थी लेकिन वो सही समय पर वहाँ की जेल में रिसीव नही हो पाया। उसके बाद वहाँ के जेलर और बाकी ऑफिसर्स ने ठाकुर साहब से इस बारे में बात कर उनसे कहा कि अगर आपके परिवार वाले रुक सकते हैं तो आप को भेज दिया जाएगा , पर उन्हें। पहुंचने में समय लग जाता इसलिए सभी ऑफिसर ने मिल कर उन्हें पांचवें दिन भेजने का निर्णय लिया है।”

  लीना की बात सुन राजा कुछ सोच में पड़ गया। ” इसका मतलब ठाकुर साहब कल या परसों निकलेंगे” लीना के हाँ कहते ही उसने अपनी  घड़ी पर नज़र डाली और तैयार हो गया। उन लोगों का भी निकलने का वक्त हो गया था। उसका बाँसुरी को साथ ही ले जाने का मन भी था लेकिन बाँसुरी ने कुछ समय बाद छुट्टियां लेने की बात कह उसे अकेले ही वापस लौटने को मना लिया था।

  किन्हीं कारणों से विराज का आना  भी नही हो पाया था।
   उसके भी दो दिन बाद ही आने की गुंजाइश बन रही थी।

  राजा बाँसुरी को अकेले छोड़ कर जा नही पा रहा था, लेकिन उसका रुकना भी मुश्किल था। उसकी परेशानी समझती बाँसुरी ने लीना को अपने पास ही रोक लिया था।

  लीना के सुरक्षित हाथों में बाँसुरी को सौंप राजा थोड़ा निश्चिन्त तो था, लेकिन फिलहाल उसके दिमाग में क्या चल रहा था, ये कोई नही समझ पाया था….

क्रमशः




 

जीवनसाथी- 105




     जीवनसाथी –105



    आप पर हत्या के प्रयास का आरोप है मैडम। मैडम आप भी जानती है। कि हम सब आपको कितना सम्मान देते हैं।
   आपको इस तरह साथ लेकर जाते हुए अच्छा नही लग रहा मैडम लेकिन कानून आप भी जानती हैं और हमसे ज्यादा अच्छे से जानती हैं, इसलिए अगर आप।खुद चलेंगी तो ज्यादा सुविधा हो जाएगी….अभी आपको पूछताछ के लिए ही लेकर जा रहे हैं। ए सी पी से एक बार आपकी मुलाकात हो जाये बस उसके बाद देखते हैं।

” ठीक है!  पर क्या मैं एक बार अपने वकील से बात कर सकती हूँ?

  पुलिस वाले कि  इजाज़त मिलते ही बाँसुरी ने तुरंत समर को फ़ोन लगाया ……
     लेकिन बताती क्या, उसे खुद सारा मामला पता नही था……..

  समर के फ़ोन उठाते ही बाँसुरी ने झट पट उसे पुलिस का आना और बाकी बातें बता दी। बाँसुरी ने फ़ोन पुलिस वाले को देने कहा। पुलिस वाले ने फ़ोन ले लिया…

” क्या हुआ ? ” पुलिस वाले कि झुंझलाहट भरी आवाज़ सुन समर भी झुँझला उठा…

” आप पूरी बात बताए बिना हुकुम को हाथ भी नही लगा सकते। आप जानते हैं ना वो ए डि एम हैं वहाँ की। और वैसे भी रात के वक्त किसी भी महिला को आप थाने नही ले जा सकते? “

” जानतें हैं सर । लेकिन हमें भी तो हमारी ड्यूटी करनी है। ठाकुर साहब यहाँ के प्रतिष्ठित लोगों में से हैं। मैडम ने उन पर हाथ डालने की कोशिश की है। इसीलिए इन्हें तलब किया गया है।”

” लेकिन उसके सारे सबूत हैं मैडम के पास जो उन्होंने जमा भी करवा दिए हैं, फिर ? अब क्या कानून भी बस इसलिए रह गया है कि प्रतिष्ठित परिवारों की जी हुजूरी करे।

” सर बात ये है कि ठाकुर साहब की पत्नी की लाश मिली है , लाल टिब्बा के पास। उनकी गाड़ी का एक्सीडेंट हुआ है वहाँ। और उनके फ़ोन पर आखिरी कॉल बाँसुरी मैडम की ही थी। शक की बिनाह पर उन्हें ले जाया जा रहा है।

पुलिस वाले ने फोन कट कर बाँसुरी के हाथ में दिया और बाँसुरी को साथ लिए बाहर निकल गया।
  बाँसुरी खुद हैरान थी,की ये क्या हो गया ? उसे कुछ दो घंटे पहले ठाकुर साहब की पत्नी का फ़ोन आया तो था। उन्होंने खुद उसे फ़ोन लगाया था। वो बार बार ठाकुर साहब के ऊपर लगाए इलज़ाम हटाने की बात कह रहीं थीं।
  बाँसुरी ने उन्हें कानून की बातें समझाने की कोशिश भी की लेकिन बिल्कुल ऐसा लग रहा था जैसे वो रटी रटाई बातें कहती जा रहीं हैं, वो किसी की कुछ सुनना ही नहीं चाहतीं हों। अपनी बात कहते हुए वो लगातार बाँसुरी पर इल्जाम भी लगाए जा रहीं थीं और फिर अचानक ही उन्होंने फ़ोन काट दिया था।

   बाँसुरी थाने पहुंची ही थी कि राजा का फोन आ गया….

” ये क्या हो गया बाँसुरी? तुम घबराना मत। मैं बस यहाँ से तुरंत निकल रहा हूँ।”

  राजा की आवाज़ सुनते ही बाँसुरी का गला भर आया पर जिले भर की कलक्टरनी वहाँ पुलिस थाने में बैठ के रोये शोभा देता है क्या?
   मन में ऐसी दुख अवसाद की लहर सी उठी लगा किसी ने उसके हृदय को अपनी मुट्ठी में बंद कर मसल दिया हो।
   एक तो राजा से बिना मन के उसे दूर आना पड़ा उसपर शारीरिक अस्वस्थता और उस के ऊपर ये खून का इल्जाम।
   उसके बिल्कुल समझ से बाहर था कि आखिर हो क्या रहा है?

” मैं ठीक हूँ साहेब। बस आप आ जाइये तो फिर यहाँ भी सब ठीक हो जाएगा। “

“मैं समर को लेकर निकल ही गया हूँ। “

” पर आप अपनी गाड़ी से आएंगे तो उसमें तो बहुत वक्त लग जायेगा। ” बाँसुरी रुआँसी हो गयी…

” बाबू हमारे पास हमारा अपना चॉपर भी तो है। बीच बीच में भूल जाती हो क्या की रियासत की रानी भी हो कलेक्टर होने के साथ साथ।

“बस आप जल्दी आ जाईये साहेब। यहाँ अच्छा नही लग रहा मुझे।।”

   ” लीजिये मैडम पानी पी लीजिये।” पुलिस वाले ने बाँसुरी के सामने पानी का गिलास रख दिया। पहले भी एक दो बार काम के सिलसिले में बाँसुरी उस से मिल चुकी थी।
    बाँसुरी ने थक कर पानी का गिलास उठा लिया…

” मैडम आप आराम से बैठिये अभी साहब आ रहे हैं फिर वो आपसे बात कर लेंगे। “

  हम्म बोल कर बाँसुरी नीचे सर किये बैठी अपने फोन को देखती रही कि, बाहर से किसी के आने की आहट हुई। तेज़ कदमों से बूट्स खटकाते आई पी एस की अगुआई में सभी पुलिस वाले सतर खड़े हो गए।
   बाँसुरी भी सबको देखती खड़ी होने ही जा रही थी कि उसके सामने यूनिफॉर्म में लीना खड़ी थी…

   बाँसुरी के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान चली आयी। लीना ने उसे देखने के बाद एक नज़र बाकियों को देख कर बाहर जाने का इशारा कर दिया।
   सबके बाहर जाते ही लीना ने आकर बाँसुरी को गले से लगा लिया….

” तू कहाँ थी लीना?  और तेरा तो आई ए एस में ही हुआ था ना? कितनी कोशिश की तुझे ढूंढने की!”

” चल झूठी! कहाँ से ढूंढने की कोशिश की तूने। किसी सोशल साइट पर तो तू है नही, उल्टा तुझे ढूंढना मुश्किल है बहुत। “

” ये बता तू यहाँ कैसे?  बाँसुरी के सवाल पर लीना मुस्कुरा उठी…

” यार रैंक के हिसाब से आई ए एस कैडर ही मिल रहा था पर मैंने आई पी एस चुना। पता नही क्यों लेकिन प्रशासन में बैठ कर काम करने से ज्यादा मुझे लॉ एंड ऑर्डर के लिए काम करने का मन था। पहली पोस्टिंग तो बड़ी तूफानी मिली थी, बस्तर के बीहड़ों में। मुश्किल से साल भर काम किया कि वहाँ के हुक्मरानों को मेरा काम अखर गया और मुझे कालाहांडी भेज दिया। वहाँ के जंगलों की कटाई पर रोक लगाने के कारण सिर्फ छै महीने में वहाँ से उठा कर यहाँ भेज दिया गया है।
   वैसे भी हमारी लाइफ कहाँ स्टेबल रहती है। आज यहाँ तो कल वहाँ। दो साल से ज्यादा कहीं वैसे भी कहाँ टिक पातें हैं। और मान लो कोई ईमानदार ऑफिसर हुआ तो साल छै महीने में ही बोरिया बिस्तर बांन्ध लो भैया।
   इसी बीच माँ की तबियत बहुत बिगड़ी गयी थी। उनकी चाह थी कि उनकी नज़रों के सामने ही उनकी।किसी बेटी की तो शादी हो ही जाए तो मेरी छोटी बहन के लिए लड़का ढूंढा उसकी शादी निपटाई। फिर भाई की पढ़ाई भी पूरी हो गयी थी उसने भी अब नौकरी कर ली है। इसी सब में व्यस्त हो गयी थी यार, लेकिन तुम यारों की बहुत याद आती थी। हमारी दिल्ली की तैयारियां, लब्सना की ट्रेनिंग सब कुछ बिल्कुल गोल्डन वर्ड्स में जैसे छप कर रहा गया है दिलो दिमाग में।
  तू बता तेरे क्या हाल चाल हैं? और ये सबसे बड़ी बात मर्डर किसका कर बैठी तू? “

” यार कितना कैजुअल बोल रही है मर्डर ! जैसे तेरा रोज़ का काम है? “

” हाँ तो ये मेरा रोज़ का ही काम है हर हाईनेस। अब बता क्या मैटर है? “

” पता नही यार! मुझे खुद कुछ समझ नही आ रहा। ये सब ठाकुर साहब के चक्कर में हो रहा है या किसी और का काम है? “

“हम्म । ये ठाकुर पंगेबाज भी बहुत है। हुकुम से तो तो इसकी कभी नही जमी..”

” तुझे भी पता है ये सब..!

” तू भूल मत, दिल्ली में हुकुम ने मुझे तेरी बॉडी गार्ड नियुक्त कर रखा था, उस समय समर से काफी बातें पता चली थी। खैर !!!
   अभी मेरी बात ध्यान से सुन, मैंने ही तुझे बुलवाया है यहाँ। क्योंकि सारी बात जानने के बाद मुझे लगा कि तेरा अकेला रहना सुरक्षित नही है । “

” क्या ? लेकिन क्यों ? “

“रुक मैं सारी बात बताती हूं। ठाकुर साहब की पत्नी आज शाम किसी काम से अपने घर से निकली थीं। शाम गहराने के बाद एक मोड़ पर उनकी गाड़ी का एक्सीडेंट हुआ और वो उसमें मृत पायी गयीं।
  वो पिछले कुछ दिनों से तुमसे ही बात कर रही थीं तो इसलिए एक भौंडी सी कल्पना कथा के अनुसार तूने चिढ़ में आकर उन्हें  मार दिया , ठाकुर साहब से बदला लेने के लिए। हालांकि इस बात का कोई सेंस नही बनता।
   लेकिन मुझे ये लगा कि एक तरफ ठाकुर साहब जेल में हैं दूसरी तरफ उनकी पत्नी की हत्या हो जाने से उनके चेले चपाटे कहीं तुझे नुकसान पहुंचाने न पहुंच जाए,इसलिए तुझे यहाँ बुलवा लिया। और कोई तरीका नही दिखा फिलहाल तुझे इस सब से बचाने का।
   और एक बात कानून की नज़र से देखें तो उनके फ़ोन पर तुझसे बात होने के अलावा और कोई सबूत तेरे खिलाफ नही बन रहा है। इसलिए कोई डर की बात नही है। फिर मैं यही कहूंगी की तू कुछ दिनों के लिए छुट्टी लेकर घर चली जा।”

” नही लीना, छुट्टियां ले लेकर वक्त बिताने के लिए थोड़े न जॉइन किया है। अब तो जो हो जाये इन लोगों से बिना डरे और बिना हारे काम करना है , बस।

लीना ने उन दोनों के लिए चाय मंगवा ली। बाँसुरी से वैसे भी कुछ खाया नही जा रहा था।

लीना से मिलने और बातें करने के बाद अब बाँसुरी काफी रिलैक्स लग रही थी…
  दोनों चाय पीती पुरानी यादों में खो गयीं।


*******

   निरमा सारा काम निपटा कर कमरे में आई तब प्रेम मीठी को किसी किताब से कोई कहानी पढ़ कर सुना रहा था।
    पलंग पर टिक कर बैठे प्रेम के ऊपर ही मीठी सोई हुई थी।
  उन दोनों को ऐसे देख निरमा के चेहरे पर एक लंबी सी मुस्कान चली आई…..

” सो चुकी है मीठी!”

प्रेम एक हाथ से मीठी का सर सहलाता कहानी पढ़ता जा रहा था। निरमा की बात पर उसका ध्यान गया कि मीठी तो वाकई सो चुकी है। उसने धीमे से उसे खुद पर से उठा कर नीचे लेटा दिया।

  तब तक में निरमा प्रेम के पास चली आयी..

” अब मेरी पारी है। ” शरारती आंखों से प्रेम को देखती निरमा को देख प्रेम ने किताब एक तरफ रख कर बाहें खोल दी..

  प्रेम की बाहों में सिमटती निरमा मुस्कुरा कर कुछ समय के लिए खामोश सी हो गयी..

  ” मुझे समझ में नही आता कि राजा भैया और बाँसुरी की मुसीबतें कब कम होंगी। “

” क्यों क्या हुआ? “

प्रेम के सवाल पर निरमा उसे देखने लगी..

” अब देखिए न इतने दिनों बाद दोनों कुछ दिनों के लिए साथ हुए भी तो चैन से रह नहीं पाए। पहले दादी साहब की तबियत बिगड़ी और फिर रानी माँ का अचानक ऐसे चले जाना। कुछ सम्भल पाता कि बाँसुरी को वापस अपने काम पर जाना पड़ गया। “

” हम्म ! पर वो भी क्या कर सकती हैं । जाना तो पड़ता  ही ना? “

  निरमा पास में ही लेटी मीठी को देखने लगी…

” समय का पता ही नही चलता न। अभी लगता है कल ही तो मीठी पैदा हुई थी और अब देखो ठुमक ठुमक कर अपने स्कूल जाने लगी।

“मेरा तो मन ही नही था कि मीठी को कहीं बाहर भेजूं लेकिन तुम्हारी ज़िद की वजह से इतनी छोटी बच्ची को स्कूल भेज रहा हूँ।”

  मुस्कुरा कर निरमा प्रेम को देखने लगी…

” इतने क्यूट हो न आप!! मेरी ज़िद के कारण स्कूल भेजा। आपका बस चले तो अनपढ़ ही रह जायेगी मेरी बेटी। आप उसे और मुझे कहीं जाने ही नही देंगे।।

” ज़रूरत भी क्या है तुम्हें कहीं जाने की? “

” हम्म रुपये पैसों से तो ज़रूरत नही है। लेकिन घर पर बैठे अब बोर हो जाती हूँ। अब तो मीठी भी थोड़ी बड़ी हो गयी है वो भी खुद में व्यस्त रहती है…

” तो ? नौकरी करना चाहती हो ? “

  निरमा ने प्रेम की तरफ देखा .. उसे लगा पता नही कहीं प्रेम नाराज़ न हो जाये…

” हाँ चाहतीं तो हूँ, लेकिन आप नही चाहेंगे तो नही भी करुंगी। ऐसी कोई बड़ी बात नही है। “

” कर लो जॉब! मैंने कब मना किया ? “

” सच्ची !”

” हाँ भई। बिल्कुल कर सकती हो जॉब, बस ये ना हो कि कुछ दिनों में थकान से परेशान हो कर मेरी मीठी को डांटना फटकारना शुरू कर दिया। अपने काम की टेंशन को मीठी पर उतारने लगीं।”

” नही परेशान मत होइए, मीठी पर तो नाराज़गी कभी ज़ाहिर नही करूँगी। नाराज़गी दिखाने के लिए मेरे पास मीठी के पापा हैं ना। ”

  आंखें बंद किये निरमा की बात सुनते प्रेम ने झट आंखें खोल दी…” अच्छा तो इसलिए हूँ मैं। गुस्सा दिखाने, झगड़े करने। है ना। अभी बताता हूँ। ”  बोल कर प्रेम ने निरमा को बाहों में कस लिया

” प्यार नही करता हूँ ?है ना !”

” मैंने कब कहा कि आप प्यार नही करते, एक उसी काम में तो एक्सपर्ट हैं आप !”

” अच्छा बेटा , तो आओ फिर बहुत दिन से अपनी एक्सपर्टीज चेक नही की मैंने। “

” झूठे !

” और क्या सच तो बोल रहा हूँ। तुम्हें आजकल फुरसत ही नही होती है। जाने अपनी डायरी में घुसी क्या लिखती रहती हो। “

  निरमा को ज़ोर से हंसी आ गयी…

” आ गए घूम फिर के डायरी में। मैंने पढ़ने क्या नही दी आप हाथ मुहँ धो कर मेरी डायरी के पीछे ही पड़ गए हैं। अरे डायरी पर्सनल होती है। उसे लिखने वाले के अलावा कोई नही पढ़ता,तभी तो उसमें मन की बातें लिखी जा सकती हैं।”

” मन में कोई और है क्या ? “

” नही तो!”

” तो जब मन में भी हम हैं तो मन की बातें पढना हमें अलाऊ क्यों नही है भला?”

” मुझे शर्म आती है। पता नही मेरा लिखा पढ़ कर आप क्या सोचेंगे। “

” हर बात पर तो तुम्हें शर्म आती है निरमा। बात बात पर शरमा कर गुलाबी हो जाती है। लेकिन बहुत खूबसूरत लगती हो शरमाती हुई। ”

  निरमा ने पलकें झुका लीं …

” ये लो तुम तो फिर ऐसे शरमाने लगीं जैसे मैंने मीठी का भाई लाने की फरमाइश कर दी हो…”

  प्रेम के सीने पर सर रखे लेटी निरमा की पीठ पर उसकी सरकती उंगलियों को महसूस करती निरमा ने चेहरा उठा कर प्रेम को देखा और मीठी सी झिड़की दे दी…

” कहें या न कहें आप, हरकतें तो वहीं रहतीं हैं हमेशा।”

” अब कौन सी हरकत कर दी मैंने।”

” अपनी उंगलियों से पूछिए! कहाँ चल रहीं हैं।

” अरे उंगलियों की वहीं जाने। तुम्हें देखते ही फिर मेरे काबू में नही रह जातीं हैं।

  झटके से प्रेम उठ गया, और निरमा को गोद में उठाये कमरे से बाहर निकल गया।

” अरे रुकिए एक बार मीठी को देख तो लूँ सोई भी है या नही।”

  जाते जाते एक बार प्रेम पलटा और मीठी को गहरी नींद में सोए देखा निरमा को गोद में लिए ही बाहर निकल आया..

  दोनो एक दूसरे को देखते एक दूजे में खोए जा रहे थे कि प्रेम का फ़ोन बजने लगा….
   प्रेम ने एक नज़र फ़ोन पर डाली , फ़ोन समर का था..

” समर की टाइमिंग भी बड़ी खतरनाक है! खुद तो शादी कर नही रहा और हम जैसों को …

  बोलते बोलते ही प्रेम ने फोन उठा लिया…

” प्रेम सो तो नही गए थे ना?”

” नही , नही सोया था । बोलो समर क्या बात है? “

” अभी के अभी दून निकलना होगा। मैं और हुकुम जा रहें हैं। तुम भी अपना थोड़ा सामान रख लो। अपनी गाड़ी से मत निकलना, हम लोग तुम्हें ले लेंगे। “

” हुआ क्या है ? रानी सा तो ठीक हैं? “

” रानी साहब को पूछताछ के लिए पुलिस थाने ले गयी है, मर्डर हुआ हैं वहाँ?

” किसका ? ” प्रेम चौन्क कर अपनी जगह से उठ कर खड़ा हो गया..

” ठाकुर साहब की धर्मपत्नी का। मेरे खबरी लगें हैं सब पता करने में । तुम रेडी हो जाओ। दस मिनट में हम लोग पहुंच रहें हैं।

” ठीक है!”

बिना ज़रूरत की बातें करना प्रेम को कभी भी पसन्द नही था। कब हुआ मर्डर , क्यों हुआ मर्डर जैसी फ़िज़ूल बातें जिनको पूछने से भी सामने वाला जवाब नही दे पाएगा जानते हुए भी ऐसे अवसरों पर लोग आपा खो कर ऐसे सवाल अमूमन कर ही जातें हैं लेकिन प्रेम इन्हीं बातों में सबसे अलग था।
  काम की बात के अलावा वो कभी किसी बकवास में अपना वक्त जाया नही करता था।

  उसने तुरंत ही एक नम्बर पर कॉल किया और इस मर्डर से जुड़ी बातें पता करने को कह दिया।
   फ़ोन रखने के बाद अपना सामान रखने को बोलने उसने निरमा की तरफ देखा, उतनी देर में निरमा उसका बैग पैक कर वहाँ ला चुकी थी।
   अपना बैग देख वो मुस्कुरा कर आंखों ही आंखों में निरमा को आभार प्रकट कर गया…

” कैसे सब समझ जाती हो?”

” फ़ोन में होती बातें सुन ली थी न इसलिये वक्त जाया किये बिना फटाफट आपका सामान पैक कर दिया, आप जाइये तैयार हो जाइए,मैंने कॉफी के लिए दूध भी चढ़ा दिया है। “

  मुस्कुरातें हुए प्रेम ऊपर सीढियां चढ़ने लगा कि अचानक उसे कुछ याद आया और वो पलटा ही था कि उसके पहले ही निरमा बोल उठी..

” हाँ मुझे पता है आप बिना नहाए घर से नही निकलते चाहे जिस वक्त भी निकलें इसलिए आपका टॉवेल और साफ कपड़े बेड पर रख दिये हैं..

अपने बालों में हाथ फिराता प्रेम फटाफट ऊपर चला गया।

  दस मिनट बाद प्रेम राजा और समर के साथ दून के लिए चॉपर में बैठ चुका था।


*******

  रेखा का मन बदला हुआ सा था तो उसे इस बार मायके में भी सभी का व्यवहार बदला बदला सा लग रहा था।
   उसे अपने बचपन की सारी बातें याद आ रहीं थीं। वो मानती थी कि उसे ठाकुर साहब और उनकी पत्नी यानी उसके माँ बाप ने बहुत ज्यादा लाड़ प्यार दिया, लेकिन वही लाड़ उसे प्यार से ज़िम्मेदारियों को सिखाने की जगह अकड़ और स्वायत्तता दे गया।
   बचपन में गैर जरूरी चीजों की मांग को भी पूरा कर उसके सामने इस तरह दूसरे बच्चों को बेइज़्ज़त किया जाता कि उसे खुद में एक गलत तरह का अभिमान और आत्मसंतुष्टि आने लगी कि वो जो मांगती है जो करती है वो सब सही है। और उसके अलावा हर कोई गलत है।
   इसी अभिमान ने उसे ज़रूरत से ज्यादा घमंडी और नकचढ़ी बना दिया।
   हमेशा गुड्डे गुडियो की फरमाइश करने वाली रेखा ने कब इंसानों को भी अपने हाथ की कठपुतली समझना शुरू कर दिया वो खुद नही समझ पायी।

    रोहित से हुई पहली मुलाकात के बाद जब उसकी सबसे अच्छी दोस्त ने एक शाम बनारस के घाट पर उसके और बाकियों के सामने रोहित को पसन्द करने की बात रखी तब उसी ज़िद में कि उसके रहते कैसे कोई स्मार्ट लड़का किसी और लड़कीं को चुन सकता है उसने रोहित से दोस्ती बढ़ाई और उसे पाने की ज़िद में सारी हदे पार कर दीं।
     लेकिन उसकी हर कमी को उसकी हर मूर्खता को अपने पैसों की छांव से ढकते ठाकुर साहब ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली।

  जब कभी इंसान को कोई ऐसी सच्चाई पता चले जिसके बारे में वो आज तक अंधकार में था , उसके बाद वो खुद से जुड़े हर सच को उस नए सच से ढाँक कर देखने लगता है।

  ठाकुर ठकुराइन के प्यार को भी अब रेखा इसी नज़र से देख रही थी कि क्या अगर वो उनकी खुद की औलाद होती तो वो लोग उसे इस कदर बिगाड़ कर रखते?
    आदित्य उनकी सगी बहन का लड़का था इसी लिए उसे कितना पढ़ाया लिखाया और इस काबिल बना दिया कि वो अपने पैरों पर खड़ा हो सके और वो चूंकि गोद ली हुई बेटी थी इसी से न उसे ढंग से पढ़ाई लिखाई का महत्व सिखाया और न ही कोई और काम का काम।

  अपने विचारों में उलझी रेखा जब उस जगह पर पहुंची जहाँ आदित्य ने उसे बुलाया था , वहाँ आदित्य पहले ही उसका इंतजार कर रहा था।
   रेखा को देखते ही वो उसकी गाड़ी की तरफ बढ़ गया..

” रेखा बाई सा अगर आपको अपने साथ लेकर आता तो घर पर किसी को भी शक हो सकता था। क्योंकि हम दोनों पहले कहीं साथ गए नही न। इसलिए आपको ड्राइवर के साथ अकेले आने कहा। दूसरी बात मामी जी की नज़र बड़ी तेज़ है। घर से निकलते वक्त मुझसे भी बड़ी पूछताछ की थी उन्होंने। “

” हम्म हम समझतें है आदित्य भैया। चलिए हमारी बहन कहाँ हैं ? हम मिलना चाहतें हैं उनसे।”

” आइये हमारे साथ!”

ड्राइवर को वहीं छोड़ रेखा और आदित्य पैदल ही निकल गए। रेखा अपने बेटे को घर पर ही छोड़ कर आई थी, वो उन पहाड़ियों के ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर आदित्य के साथ चली जा रही थी इस बात से बेखबर की उसकी माँ उसका पीछा कर रही थी।

   एक पुराने से गोदाम में आदित्य घुस गया। उसके पीछे ही रेखा भी चली गयी।
  बाहर से उजड़ा सा वीरान दिखने वाला गोदाम अंदर ठीक ठाक ही था।
   एक लिफ्ट में प्रवेश कर आदित्य उसे साथ लिए बेसमेंट में चला गया।
   बेसमेंट आश्चर्य जनक रुप से साफ सुथरा और सुसज्जित था। हॉल में आदित्य के दो तीन लड़के थे, उनसे इशारों में कुछ बात कर आदित्य एक कमरे की तरफ बढ़ गया।
  
  “ये सब मेरे आदमी हूं। केसर चूंकि बहुत कुछ जान चुकी थी इसलिए ठाकुर साहब के आदमियों से उसे बचाने के लिए  मुझे उसे ऐसे यहाँ रखना पड़ा। उसका ज्यादा वक्त अस्पताल में रहना भी सुरक्षित नही था। ”

  कमरे का दरवाजा खुलते ही रेखा भाग कर भीतर चली गयी…
   केसर ने दरवाज़े की आहट पर आँखें खोल दी।केसर की हालत देख रेखा रो पड़ी…

” बाई सा हमें माफ कर दीजिए। हम आज तक आप हमारी बहन हैं यह  कैसे नही जान कर समझ पाए?

  रेखा आगे बढ़ केसर के गले से लग गयी…
दोनो बहनों की आंखों से गंगा जमना बरस पड़ी । जाने कितनी शिकायतें कितने शिकवे उन ऑंसूओं में धुलते बहते रहे।

  उन दोनों को नही पता था कि ठकुराइन उन्हें बाहर से देख रही है।

” तो आखिर ये कारण था जिसकी वजह से तुम ऐसी गुमसुम हो गईं थीं। “

  ठकुराइन को एकदम से सामने देख वो दोनो चौन्क गयीं…

” मम्मी आप यहाँ? ” रेखा उन्हें देखते ही बौखला गयी। लेकिन वो रेखा को अनदेखा कर आदित्य को ढूंढने लगी। और आदित्य पर नज़र पड़ते ही वो उस पर बरस पड़ीं।

” दिखा ही दिया न अपने गंदे खून का असर! आखिर चैन नही पड़ा तुझे। खुद तो जन्मते ही अपनी माँ को खा गया। उस पर पाल पोस के बड़ा करने वाले ठाकुर साहब के लिए भी हमेशा मनहूस ही बना रहा। जबसे उनके जीवन से जुड़ा वो भी कहाँ चैन से बैठ पाए। हमेशा कही न कहीं उनका पैर उलझा ही रहा।और अब जब उनके आराम करने की उम्र आयी उन्हें दाखिल जेल करवा दिया। शर्म नही आती तुझे। पाखंडी कहीं का। मेरी नज़रों से दूर हो जा। ठाकुर साहब को तो दूर किया ही अब इस रेखा को भी जाने क्या पट्टी पढ़ा दी कि वो यहाँ इतनी दूर इस लड़कीं से मिलने चली आयी।”

  आखिर केसर से नही सुना गया। ठकुराइन तो और भी जाने क्या क्या कह जातीं उसके पहले ही केसर ने उन्हें बीच में ही टोक दिया…

” आदित्य पर गलत इल्ज़ाम लगाना बंद कीजिए ठकुराइन। ठाकुर साहब जिन भी मुश्किलों में फंसे रहे हैं वो अपने स्वार्थ और मक्कारी के कारण। हमें नही लगता कि आपको उनका स्वभाव याद दिलाने की हमें ज़रूरत भी है। हमसे कहीं ज्यादा तो आप उन्हें जानती हैं और अगर नही जानती तो हम उनके कारनामे आपको बताए देते हैं। “

” हम कुछ नही सुनना चाहते। ये जो एहसान फरामोश लड़कीं यहाँ खड़ी है जिसे कभी बड़े प्यार से हमने अपनी गोद में समेट लिया था आज हमसे छिप कर अपनी सगी बहन से मिलने आई है। वाह !!!
   इसे ही तो कहतें हैं कि खून अपना असली रंग ज़रूर दिखा देता है। ठाकुर होती , हमारा खून होती तो क्या इस तरह इस कठिन समय में हमें छोड़ अपनी बहन को ढूंढती फिरती। बल्कि इसे तो हर हाल में हमारा साथ देना चहिये था। आखिर अपनी नीचता दिखा ही दी।

” मम्मी प्लीज़ ! ये सब क्या कह रहीं है आप। आपसे किसने कहा कि हम आपको और पापा साहेब को छोड़ कर कहीं जा रहें हैं। बस सारी सच्चाई पता चलने पर हम एक बार अपनी बहन से मिलना ही तो चाहते थे, उसमें ऐसा क्या गलत हो गया। वही बहन जो हमारे जीवन को खुशहाल बनाने अपने जीवन को नरक बना गयी क्या उससे एक बार मिल कर उसके गले लग कर आभार व्यक्त कर देने से हम नीच हो गए। हमने अपना असली खून दिखा दिया? ये कैसी बातें कर रही हैं आप?

“बिल्कुल सहीं कह रहे हैं हम। अगर हमारा अपना खून होता तो क्या हमसे धोखा कर के इस तरह बिना बताए यहाँ चला आता।

” धोखा आपसे रेखा ने  नही ठाकुर साहब ने किया है।!”

केसर की बात पर ठकुराइन ने खा जाने वाली नज़रों से उसे देखा और वापस रेखा को कुछ सुनाने जा रही थीं कि केसर आगे बोल पड़ी…

“आप माने या न माने पर यही सच है। ठाकुर साहब ने आज तक अपने आसपास रहे हर व्यक्ति का लाभ उठाया है आप उनसे अलग नही है । आप समझिए हमारी बात को।
   हमने जब छिप कर उनकी बातें सुनी थीं तब उन्होंने राजा अजातशत्रु को मारने की प्लानिंग के बाद भी कुछ कहा था…

  राजा का नाम आते ही आदित्य जो अब तक इस सारे नाटक को देखता चुपचाप एक ओर हाथ बंधे खड़ा था तुरंत केसर के पास चला आया…

” क्या कहा था उन्होंने केसर ? इसलिए जानना है कि कहीं फिर वो भैया को कोई हानि तो नही पहुंचाना चाहते? “

” उनकी पूरी बात तो हमें भी समझ नही आई पर उन्होंने जो कहा था वो हम बता देतें हैं। उन्होंने कहा राजा अजातशत्रु को मारने का उनका पूरा और पक्का प्लान है, अगर कहीं कोई चूक हो गयी तब वहाँ की चाक चौबंद तैयारियों के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ सकता है और तब जब वो जेल में रहेंगे उस समय का उनका मास्टर प्लान है। और उस मास्टर प्लान में उनका साथ देगी रानी , उनकी रानी।
   हमें ये तो समझ आ गया था कि ये बात ठकुराइन से सम्बंधित ही है। हमें लगा ठकुराइन उन्हें छुड़वाने के लिए शायद कुछ करने वाली होंगी… लेकिन तभी उन्होंने आगे की अपनी बात कहनी शुरू की…
    उनके अनुसार जब वो जेल में होंगे तब उनका सबसे खास आदमी जिसे वो ये सब बता रहे थे किसी तरह ठकुरानी को उनके घर से दूर ले जाकर उनकी जान ले लेगा।
   ठकुरानी के मरने की खबर को इस ढंग से फैलाया जाएगा कि रानी और राजा दोनो ने मिल कर षड्यंत्र कर ठाकुर साहब के परिवार को समूल नष्ट करने ही ऐसा किया।
  पत्नी का अंतिम संस्कार करने के लिए उन्हें कुछ समय के लिए रिहा भी किया जाएगा, उस बात का फायदा उठा कर वो भाग निकलेंगे और खून के इज़ाम में फसेंगी रानी …
   अगर रानी साहेब फंस गई तो उनकी व्हाइट कॉलर पर जो दाग लगेगा सो लगेगा राजा साहब के नाम को भी बट्टा लग जायेगा और उनका राजनैतिक कैरियर शुरू होने से पहले ही खत्म समझो। फिर उनकी आधी ज़िन्दगी तो रानी सा को जेल से निकालने की कोशिश में बीत जाएगी और बाकी आधी सोचने में की किससे पंगा लिया था आखिर। “

” तुम्हारी एक एक बात बकवास है केसर। हम जानतें हैं रेखा को बरगलाने ही ये सब कहानी रच रही हो न? रेखा तुम हमारे साथ चलोगी या अभी कुछ देर और रुकना चाहती हो यहाँ।”

  रेखा कुछ सोच समझ पाती, उतनी ही देर में पैर पटकती ठकुरानी वहाँ से बाहर निकल गयी।
    उनके बाहर निकलते ही में किसी का फ़ोन उनके फोन पर आ गया , जिसे उठा कर वो बस “ठीक है तो बता दीजिए क्या बोलना है हम बोल देंगे।” कह कर फ़ोन रख दिया….
    तेज़ कदमो से चलती वो साथ साथ ही किसी को फ़ोन भी लगाती चल रही थी। कुछ देर बातें करने के बाद वो आंखों से ओझल हो गईं। रेखा का इस सब में रो रोकर बुरा हाल था।
  केसर उसे समझना चाहती है थी कि बाहर से एक ज़ोर के धमाके की आवाज़  आयी । केसर के अलावा आदित्य और रेखा बाहर की ओर भागे और बाहर का दृश्य देख रेखा के होश उड़ गए ….

  ठकुरानी की गाड़ी को पीछे से आते ट्रेलर ने इस बुरी कदर झिंझोड़ा था जैसे कोई बड़ा सा डायनासोर किसी छोटी सी बिल्ली को मुहँ में दबाए इधर उधर अलट पलट कर जान निकलने पर नीचे फेंक दे।

  आदित्य और रेखा को बाहर आते देख गाड़ी वाला अपनी गाड़ी  को तेजी से भगाता चला गया….
   आदित्य ने तुरंत ही पुलिस की गाड़ी को फ़ोन करने के लिए फ़ोन निकाला ही था कि रेखा ने उसे टोक दिया…

” पागल हो गए हैं क्या आप ? अगर आपने पुलिस को बुलाया तो यहाँ तक पहुंची पुलिस केसर दीदि को भी बाहर निकाल देगी फिर आप उसे पापा साहेब के लोगों से बचा पाएंगे?
  आप उसे लेकर निकलिए हम मम्मी को देखते हैं ।

अपने अंत समय में इतनी उठापटक होने के बावजूद आज छब्बीस साल तक जिसे माँ मानती चली आयी थी उसे इस हाल में देख किस बेटी का दिल नही पसीजता।
    उनके पास पहुंच जैसे ही रेखा ने उन्हें देखा अत्यधिक पीड़ा और करुणा से वो बेहोश हो गयी।
आदित्य को उसने पहले ही वहाँ से भगा दिया था। वो केसर को गोदाम के पिछले रास्ते से भगा कर ले जा चुका था।
  लेकिन भागतें भागतें भी उसने पुलिस को इस दुर्घटना की इत्तिला दे दी थी। उसे ये नही समझ आया था कि ठकुरानी जिंदा नही बची हैं। उसे लगा एक साधारण सा एक्सीडेंट है जिसमें ठकुरानी बाल बाल बच चुकी हैं।

पुलिस के वहाँ पहुंचने पर दो औरतें वहाँ बेहोशी की हालत में थी , एक रेखा दूसरी उसकी माँ। दोनो को साथ लिए पुलिस अस्पताल निकल गयी।
    अस्पताल जाते ही में पुलिस के एक अधिकारी के पास बाँसुरी को तुरंत थाने लेकर आने का आदेश हुआ और आदेश का पालन करने उस टुकड़ी में से तीन पुलिस वाले एक लेडी कॉन्स्टेबल को साथ लिए बाँसुरी की कोठी पहुंच गए….

क्रमशः







   

जीवनसाथी – 104

जीवनसाथी – 104





       अपनी लाल लाल आंखों से खिड़की से बाहर दूर आकाश को देखते राजा अजातशत्रु की आंखों से ऑंसू बह चले, तभी आकर किसी ने उनके कंधे पर हाथ रख दिया।
   राजा ने पलट कर देखा , सामने विराज खड़ा था।

  राजा उससे गले लग सिसक उठा।
दोनों भाई एक दूसरे को सहारा दिए रोते रहे, पास खड़ा विराट भी उन दोनों के गले से लग गया…..

    ” हुकुम निकलने की सारी तैयारी हो गयी है। रानी माँ को लेकर जाने के लिए एयर एम्बुलेंस तैयार है।”

  समर ने जितने धीमे शब्दों में हो सकता था कहा और चुपचाप एक ओर खड़ा हो गया।
    तीनों भाई अपने आंसू समेटते समर के साथ आगे बढ़ गए।
   उन लोगों के रानी माँ को लेकर महल पहुँचते में युवराज ने सारी तैयारियां कर रखीं थीं।

   सारे महल के साथ ही साथ जैसे सारी रियासत भी अपनी रानी को अंतिम विदाई देने रास्ते पर चली आयी थी।
     रानी माँ को महल में लाने के कुछ समय बाद उनके अंतिम दर्शनों के लिए महल के बाहर बगीचे में रखा गया था और एक एक कर शहर के गणमान्य लोग ,और जनता आती जा रही थी और दर्शनों के बाद फूल चढ़ाती एक ओर से निकलती जा रही थी।

   ऐसा लग रहा था जैसे सारा महल दुख में डूब गया था।

   महल के नियमों का पालन करते हुए आखिर रानी माँ का अंतिम संस्कार कर दिया गया।
   
एक युग का अंत हुआ। एक अध्याय  समाप्त हुआ।

  जाते जाते रानी माँ आखिर पश्चाताप पूरा कर ही गयी। उनके मन की सारी ग्लानि उनका सारा दुख सिर्फ उनके और राजा अजातशत्रु के बीच ही रह गया। उन्होंने क्यों अजातशत्रु की गोलियां अपने सीने पर ले लीं ये राज़ उनके साथ ही दफन हो गया। क्योंकि उनकी राज की बात तो अजातशत्रु किसी से कहने जाएंगे नही।
    अपनी जीवन की सारी गलतियों सारे पाप को उन्होंने अपने अंत समय में राजा से माफी मांग कर तर लिया।
   कहा भी नाता है गलती करने वाले को अगर ये एहसास भी हो जाये कि वो गलत है तो वहीं उसकी गलतियां माफ हो जातीं हैं।
     
   रानी माँ और उनके बेटों का राज़ उनके और राजा के बीच ही रह गया। उन दोनों के अलावा कोई जानता था तो वो थे ठाकुर साहब । और उनसे ये बात महल में महाराज तक पहुंच सकती थी, इसी बात को सोचते राजा ने एक निर्णय ले ही लिया।

  महल में सभी इस दुर्घटना से चकित थे, दुखी थे किसी को कुछ समझ नही आ रहा था कि अचानक ये सब क्या हो गया।

  उस रात फिर महल में किसी से कुछ खाया पिया नही गया।
  
  वक्त जैसा भी हो गुज़र ज़रूर जाता है। ये महल के लिए कठिनतम समय था पर गुजरता जा रहा था।
महल के रिश्तेदारों का आना जाना लगा हुआ था। उस पर बाँसुरी की तबियत भी सही नही थी। उसके माता पिता भी आ चुके थे।
    महल में चलती रस्मों के बीच  फिर बाँसुरी को राजा से अपनी तबियत के बारे में कहने का वक्त भी नही मिला।
   एक एक कर रस्में  निपटती गयीं और रिश्तेदार महल से विदा ले निकल गए।

   बाँसुरी की छुट्टियाँ भी समाप्त हो चुकी थीं उसे अपने काम पर लौटना था। राजा के पास भी अब चुनाव की तैयारियों के लिए समय कम बचा था । सो सभी अपने काम पर लग गए ।
  इतनी सारी व्यस्तता के बाद भी कभी अचानक राजा को रानी माँ से हुई आखिरी भेंट याद आ जाया करती। उनकी अपने बच्चों के लिए चिंता याद आ जाती। और उनसे किया खुद का वादा याद आ जाता।

  अगले दिन बाँसुरी को वापस देहरादून निकलना था। ठाकुर साहब के कारनामों की फाइल्स तैयार करवा कर कोर्ट भेजनी थी। और भी ढेर काम थे। एक दिन पहले शाम में निरमा ने बाँसुरी और राजा को अपने घर बुला रखा था।
     बाँसुरी पहले ही वहाँ पहुंच चुकी थी।दोनों सखियां बगीचे में बैठी बातें कर रही थी कि बाँसुरी के फ़ोन पर पिया का फ़ोन चला आया।
    पिया ने कुछ जाँच करवाई थी उसकी रिपोर्ट वो बाँसुरी को भेजने वाली थी। बाँसुरी ने उसे भी निरमा के घर बुलवा लिया।

   बगीचे में मीठी इधर से उधर भागती खेल रही थी। उसके पीछे पीछे बाँसुरी भी भागती उसे पकड़ने की कोशिश में थी …

” रानी साहिबा अब ये दौड़ना भागना आपको बंद करना पड़ेगा। “

   बाँसुरी चौन्क कर पिया को देखने लगी.. ” क्यों?

” क्योंकि आपकी पदोन्नति हो गयी है। आप माँ बनने वाली हैं। “

बाँसुरी का चेहरा खिल उठा। निरमा भाग कर उसके गले से लग गयी…

” बहुत बहुत बधाई हो बाँसुरी । मुझे लग ही रहा था कि तू हम सबको गुड़ न्यूज़ देने वाली है। जय हो महारानी साहिबा।”

  बाँसुरी मुस्कुरा कर नीचे देखने लगी..

” लेकिन रानी साहिबा आपसे कुछ कहना है। “

” हाँ कहो पिया? “

” आपकी कुछ जांचे और होंगी।”

बाँसुरी से पहले निरमा ने ही सवाल कर दिया…

“लेकिन क्यों ? क्या हुआ ? इतनी शुरुवात में ही इतनी सारी जांचों की क्या ज़रूरत? “

” जी इनकी अब तक जो भी जांचें हुई हैं उससे ये पता चल रहा है कि इनका गर्भाशय कुछ दवाओं के निरंतर प्रयोग के कारण थोड़ा कमज़ोर हो गया है और बच्चे को नौ महीने तक संभाले रखने में अक्षम हो सकता है।”

  पिया की बात सुनते ही निरमा परेशान सी बाँसुरी की तरफ देखने लगी। लेकिन बाँसुरी बिना परेशान हुए पिया तक चली आयी..

” साफ साफ कहो पिया की मैं ये बच्चा कैरी कर सकती हूँ ना? “

” एक और जांच की रिपोर्ट कल तक आएगी उसे देखने से ये स्पष्ट हो जाएगा मैम ! इसलिए कह रहीं हूँ आप पहले टेस्ट की रिपोर्ट देख लीजिये अगर आपका यूटरस कैपेबल है तभी आप बेबी के लिए सोचिये वरना अबो्र्ट करवा लीजियेगा। वरना आगे जाकर ये प्रॉब्लम क्रिएट कर सकता है।”

” ओके! मैं कल ही तुम्हारे हॉस्पिटल ही आ जाऊंगी। फिर मुझे वापस भी निकलना है। कल शाम की ही फ्लाइट है। निरमा कल के टेस्ट की रिपोर्ट के पहले मैं साहेब से कुछ नही बताना चाहती। तुम समझ रही हो न? क्योंकि अगर अबो्र्ट ही करवाना पड़ गया तो अभी से उन्हें एक बार खुशखबरी देकर फिर दुख देने का कोई मतलब नही। अगर टेस्ट में कुछ गड़बड़ हुई तभी उन्हें सारी बात बता कर निर्णय लिया जाएगा। क्यों पिया ठीक है ना?  “

” यस मैम !”

  उन लोगों की बातों के बीच ही राजा प्रेम और समर भी चले आये।
   राजा को अपनी पार्टी के बारे में कुछ बातें करनी थी इसलिए शेखर को भी बुला लिया था।
   
      जब से राजा ने ये घोषणा की थी कि वो राजनीति में उतरना चाहता है पक्ष और विपक्ष दोनों ही पार्टियां उसे खुद में मिलाने को एक से बढ़ कर एक प्रस्ताव रख रहीं थीं।
   इन्हीं प्रस्तावों की आड़ में समर ने शासन पर थोड़ा दबाव बनवा कर मायानगरी के लिए परमिट पास करवा लिया था।
  विश्वविद्यालय खोलने के लिए आवश्यक मानकों को पहले ही वो लोग पूरा कर चुके थे।
  चूंकि राजा खुद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पढ़ा था उसके दिलो दिमाग पर बीएचयू  हमेशा छाया रहता था।
   उसका सपना बीएचयू की तर्ज पर यूनिवर्सिटी खोलने का ही था, फिर भी मायानगरी के ले आउट के पहले वो नालंदा,तक्षशिला सबका चक्कर लगा चुका था।
    और इन सबको देखने के बाद उसने अपने विश्विद्यालय का डिसाइन तैयार करवा लिया था।
वो रात दिन एक किए अपने काम में व्यस्त था। जब कभी वो शाम को खाली अपने कमरे में अकेला होता उसे एकदम से रानी माँ और उनकी कही आखिरी बातें याद आ जातीं और वो वापस कमरे से अपने ऑफिस का रुख कर लेता।
  इसी सब व्यस्तता मेँ बाँसुरी की तबियत उसके मुरझाए से चेहरे पर भी उसका ध्यान नही जा पा रहा था।

  बाँसुरी की शाम की फ्लाइट थी और उसे सुबह डॉ पिया से मिलने जाना था। अपनी बाकी रिपोर्ट्स को पर्स में रख वो तैयार हो रही थी कि पर्स से झांकती एक गुलाबी सी अस्पताल की पर्ची पर राजा की नज़र चली गयी।
    वो जब तक उसे पर्स में ठीक से रख पाता बाँसुरी हड़बड़ी में बाहर आई और राजा के माथे को चूम कर पर्स उठाये बाहर निकल गयी..

” इतनी जल्दबाजी में जा कहाँ रहीं हैं हुकुम?

” निरमा के साथ अस्पताल जा रही हूँ। वापस आकर सब बताती हूँ, तब तक आप भी अपना काम निपटा लीजिये”

बाँसुरी जल्दी जल्दी बाहर निकल गयी, और उसके निकलते में वो गुलाबी पर्ची बाहर गिर गयी…

  बाँसुरी अस्पताल पहुंची तब तक में उसकी पुरानी सारी जांचों की रिपोर्ट्स आ चुकी थी।

   पिया के केबिन में बाँसुरी और निरमा पहुंच कर पिया का इंतजार कर रही थी । पिया किसी केस में थी, वो निपटा कर वहाँ चली आयी।
  आते ही उसने उन दोनो का अभिवादन किया और दराज से फाइल निकाल का बाँसुरी के हाथ में दे दी..

  बाँसुरी फाइल खोले पढ़ने लगी, सब कुछ मेडिकल टर्म्स में लिखा था…  समझने की कोशिश करती बाँसुरी के चेहरे पर प्रश्नवाचक चिह्न देख पिया उन्हें बताने लगी

” मैंम आई एम सॉरी।  पर अभी आपकी रिपोर्ट्स कुछ सही नही आई हैं। इस बार आप अगर ये बेबी कैरी करती हैं तो आप के और बेबी दोनो के लिए खतरा हो सकता है। तो मैं यही सलाह दूंगी की आप इस बार बच्चा न रखें। एबॉर्शन ही बेटर है।
   इन रिपोर्ट्स के ये मतलब नही है कि आप कभी कंसीव नही कर पाएंगी। नेक्स्ट टाइम बेबी प्लान करने से पहले ही आपको प्रॉपर ट्रीटमेंट दी जाएगी जिससे आप हेल्थी बेबी कैरी कर सकें।”

  बाँसुरी का चेहरा मुरझा गया। उसने सोचा था राजा को बताने के बाद उसके चेहरे की खुशी देखने में जो सुकून मिलेगा वो कितना प्यारा होगा।
  उसे खुद भी अब बच्चे की चाह थी। उसकी माँ भी उसे उसकी तबियत की लिए ढेरों हिदायतें देकर गयीं थीं कि ऐसे रहना वैसे रहना। खूब दूध, नारियल पानी पीते रहना। पपीता मत खाना…
   माँ तो उसे देखते ही समझ गयी थीं और उन्होंने ढेरों बातें अपनी बिटिया को समझा सीखा दी थी। जाने कहाँ से काला धागा लाकर उसकी बांह पर तावीज़ के साथ बांन्ध भी दिया था कि उनकी बेटी और उसकी संतान को किसी की नज़र न लगे।
उसे अपनी माँ को समझाना पड़ा था कि अभी महल में कोई उसकी अवस्था से परिचित नही है इसलिए थोड़ा अपनी खुशी को संभाले रखें।
   शुरू से वो चाहती थी कि पहले डॉक्टरी जांच हो जाये तभी वो अपनी अवस्था का सुसमाचार महल में देगी।
   और अब पिया से बात करने के बाद उसकी हिम्मत टूटने लगी थी।
   इतने दिनों बाद तो कोई खुशी की खबर उनके जीवन में आई थी उस पर भी ऐसा वज्रपात?

  लेकिन निरर्थक भावुकता के लिए उसके पास समय भी कहाँ था। उसे वापस लौट कर अपना काम देखना था इसके साथ ही मायानगरी के अंदर खुलने वाले कॉलेज का काम भी उसे देखना था। इतनी सारी ज़िम्मेदारियों के साथ खुद के बारे में सोचने की फुरसत कहाँ थी?

” ओके पिया ! मैं एबोर्शन के लिए रेडी हूँ। “

निरमा चौन्क कर बाँसुरी को देखने लगी। इतनी भावुक लड़की ने इतना बड़ा निर्णय कैसे एक झटके में ले लिया।
  वो बाँसुरी को देखती सोच रही थी… कि बाँसुरी ने एकबार फिर पिया के सामने अपनी बात दुहरा दी। उसी वक्त उसके मोबाइल पर राजा का फोन आने लगा…

” कहाँ हो हुकुम? “

” कहीं नहीं , बस आ रही हूँ वापस !”

” नही तुम वहीं रुको,मैं आ रहा हूँ तुम्हारे पास।”

” अरे पर आप क्यों आ रहे? आपको ढेर सारा काम है मैं आ रहीं हूँ ना। “

” अब छिपाओ मत। तुम अस्पताल में हो मुझे पता है और मुझे खुशखबरी देने की तैयारी में हो। तुम्हारा सरप्राइज मैंने फेल कर दिया । ”

और इतने दिनों बाद राजा के खुल के हँसने की आवाज़ सुन बाँसुरी खिल उठी।

“आप खुश हैं साहेब ? “

” खुश अरे मैं  पागल हो रहा हूँ खुशी के मारे। और एक तुम हो जो मुझे बिना बताए सारे टेस्ट अकेले अकेले करवाई जा रही हो। आखिर कब देने वाली थी मुझे सरप्राइज। बेबी के बर्थ के साथ ? ये भी हद है। मैंने रिसिप्ट देख कर जान लिया फिर सोचा में भी वेट कर लेता हूँ हुकुम जब बताएंगी तभी ऐसी एक्टिंग करूँगा की तुमसे ही पता चला लेकिन देखो न कैसा अधीर हो रहा हूँ कि रहा है नही गया। क्या करूँ? “

  बाँसुरी चुपचाप बैठी मुस्कुराती रही।
राजा अपने दिल की बातें कहता रहा और वो सुनती रही..
” बस दस मिनट में अस्पताल पहुंच रहा हूँ , तुम वहीं इंतज़ार करो। वहाँ से मंदिर चलेंगे, सबसे पहले देवी दर्शन करेंगे उसके बाद ही महल में सब को यह खबर सुनाएंगे।  अरे एक बात तो मैं तुमसे कहना ही भूल गया!”

” क्या साहेब ?”

” मुझे तो तुम्हारी गुड न्यूज पहले ही रानी माँ ने दे दी थी। “

” कब ? मैंने तो उन्हें कुछ नही बताया था!”

बाँसुरी के इस कब का कोई जवाब राजा के पास नही था। उसने रानी माँ की हकीकत बाँसुरी से भी छिपा रखी थी।

” तुम वो सब छोड़ो,मुझे तो लग रहा है , ये सब मॉम की ही ब्लेसिंग्स हैं कि जाते जाते भी वो तुम्हे  और मुझे अपना आशीर्वाद इस रूप में दे गयीं अब वही तुम्हारी रक्षा भी करेंगी। तुम देखना बाँसुरी हमारी प्यारी सी एक बेटी ही होगी,बिल्कूल तुम्हारे जैसी। “

  बाँसुरी ने मुस्कुरा कर उसे जल्दी आने कह फ़ोन रख दिया। बाँसुरी के फ़ोन रखते ही पिया ने उसकी तरफ पर्चा बढ़ा दिया…

” अभी ज्यादा समय नही हुआ है मैम तो आप ये दवा लेंगी तो उसी से एबो..”

“नही पिया। अब मैं कोई दवा नही लुंगी।” बाँसुरी की बात सुन निरमा और पिया दोनों ही चौन्क गयीं..

” ऐसे कैसे बाँसुरी। अब तक तो तू तैयार थी,फिर अचानक ? और फिर ये भी तो क्लियर नही है कि बच्चा कैरी हो पायेगा या नही। कही  आगे जाकर खुद कुछ गड़बड़ हो गयी तो? “

“कुछ नही होगा निरमा। साहेब का भरोसा झूठ नही होता। उन्हें लग रहा कि मुझ पर और मेरे बच्चे पर रानी माँ की विशेष कृपा है तो वो ज़रूर बच्चे की रक्षा करेंगी। “

“पर मैम ये आपके लिए भी रिस्की है। आपका ये डिसीज़न लाइफ थ्रेटनिंग भी हो सकता है। “

” तुमने ‘भी’ लगाया न इसका मतलब नही भी हो सकता। ” बाँसुरी मुस्कुराने लगी

” मेरी माँ हमेशा कहती हैं पिया की आप जैसा अपने लिए सोचते जाते हो आपकी लाइफ वैसी ही बनती चली जाती है।अगर आप पॉज़िटिव सोचो तो सब कुछ पॉज़िटिव होता जाता है।
  फिर मैं क्यों डरूँ। अगर कुछ तबियत ऊपर नीचे हुई भी तो तुम हो न। मैं तुमसे कॉन्टैक्ट में रहूंगी ही।”

” वो तो ठीक है मैंम, लेकिन.”

” अब कोई लेकिन ,किंतु परंतु अगर मगर नही। बस सोच लिया मैंने। और एक बात निरमा तुझे और पिया बस को ये सब पता है तो प्लीज़ तुम दोनों सारी बातें अपने तक ही रखना। साहेब को इस बारे में नही पता चलना चाहिए। साहेब रानी माँ के जाने से बहुत दुखी थे, आज बहुत दिनों बाद उनके चेहरे पर रौनक दिखी है। मैं इस रौनक को जाने नही देना चाहती। और हाँ मैं तुम दोनो से प्रॉमिस करती हूँ अगर आगे किसी भी समय ऐसा लगा की बच्चे को रखने पर मुश्किलें बढ़ रहीं है तब मैं डॉक्टर की सलाह पर ही आगे का फैसला लूँगी।”

“किस बात का फैसला ले रहीं है आप?”

   राजा ने आकर प्यार से बाँसुरी के दोनों हाथों को थाम लिया…

” आपको अकेले छोड़ कर काम पर वापस लौटने का !”

राजा को जैसे अचानक कुछ याद आ गया..

” अरे हाँ आज तो तुम्हें वापस जाना है ना बाँसुरी? “

” हाँ ! आप तो भूल ही बैठे थे!”

” भुला नही था! बस तुम्हारे जाने की डेट याद नही रखना चाहता। अभी तो थोड़ा वक्त है ना, तो चलो मंदिर दर्शन कर तुम्हारे लिए देवी माँ का आशीर्वाद ले लेते हैं।”

  निरमा और पिया बाँसुरी को देखते रहे, बाँसुरी ने अपने जीवन का इतना बड़ा निर्णय ले लिया था वो भी राजा को बिना सच्चाई बताए।
   बाँसुरी ने आंखों ही में निरमा से चुप रहने का इशारा किया और राजा के साथ मंदिर जाने आगे बढ़ गयी। उसके पीछे धीमे कदमों से निरमा भी बढ़ चली।
   बाहर गाड़ी में प्रेम उन्हीं लोगों का इंतज़ार कर रहा था।

***

   शाम बाँसुरी को छोड़ने जाते हुए राजा उसे रोक लेना चाहता था,लेकिन साथ ही वो ये भी जानता था कि बाँसुरी जैसी ईमानदार और कर्मठ कर्मी से ऐसी उम्मीद करना मुश्किल है।

  बाँसुरी को इस हालत में अकेला छोड़ने का उसका बिल्कुल मन नही था। वो इस अवस्था में जब किसी के साथ  और सहयोग की उसे सबसे ज्यादा जरूरत थी , अकेली जा रही थी।
  राजा ने ज़िद कर उसके साथ महल की दो खास दासियों को भी भेजने का निर्णय सुना दिया।
   इस पर भी उसे कुछ खाली सा लग रहा था। उसका काम इस कदर फैला नही होता तो शायद वो भी बाँसुरी के संग चला जाता लेकिन उस पर महल की सारी जिम्मेदारी आ गयी थी, ऐसे में वो अपने मन का राजा रह भी कहाँ गया था?
   जल्दी ही उससे मिलने आने का वादा कर वो उसे फ्लाइट में बैठा कर वापस निकल गया।
   बाँसुरी अकेली नही थी। आदित्य को भी अपना काम धाम संभालने के साथ ही केसर से भी मिलना था, वहीं रेखा को इतने दिनों बाद अपनी सच्चाई मालूम चली थी। वो भी अपनी बहन से मिलना चाहती थी।
   रेखा और आदित्य भी बाँसुरी के साथ ही दून जाने निकल पड़े थे।

*****

     दिन बीत रहे थे, समय अपनी तेज़ी से आगे बढ़ता चला जा रहा था। रेखा को दून पहुंचे चार दिन हो चुके थे लेकिन उसे अब तक अपनी बहन से मिलने का मौका नही मिल पाया था।
   कायदे से वो ठाकुर साहब के घर यानी अपने मायके पहुंची थी। वहां के लिये, ठाकुर साहब की पत्नी के लिए वो आज भी उनकी बेटी रेखा ही थी। उनसे और सबसे मिलने जुलने में ही दिन निकलते जा रहे थे। ठाकुर साहब की पत्नी कभी ठाकुर साहब के जेल जाने को लेकर बहुत दुखी हो जाती कभी बिल्कुल सामान्य हो जाती, जैसे उनके लिए ये एक सामान्य बात थी।
   वो ही ठाकुर साहब की अनुपस्थिति में उनका व्यापार देख रहीं थीं।
ठाकुर साहब के सारे कारनामों से वो भी परिचित थीं लेकिन उनकी नज़रों में ठाकुर साहब गलत नही थे। कुछ उन्ही की तर्ज पर वो भी कारोबार आगे बढ़ा रहीं थीं।
  रेखा को एक दोपहर मौका मिल ही गया , उसकी आदित्य से पहले ही इस बाबत बात हो चुकी थी, उसी ने दोपहर के वक्त उसे लाल टिब्बा बुलाया था…

” मम्मी मैं आज रुचि से मिलने जाना चाहती हूँ। जाऊँ ?”

  रेखा जब से मायके आयी थी, उसके रंग ढंग कुछ बदले बदले से थे, ये ठकुरानी महसूस कर रहीं थीं लेकिन रेखा के स्वभाव का बदलाव उनकी समझ से परे था। पहले बात बात पर तुनकने वाली रेखा अब किसी बात पर कोई टोकाटाकी किये बिना शांत पड़ी रहती।
   पहले मनपसंद खाना न मिले तो थाली फेंक देने वाली रेखा इस बार जो सामने आ जाता चुपचाप निगल रही थी।
     जिसकी बातें ही खत्म नही होतीं थीं अब वो घर भर के लोगों की भीड़ में भी चुपचाप बैठी रहती। जैसे मन ही मन कोई जंग लड़ रही हो।
   ठकुराइन और बाकी लोग यह भी सोच रहे थे कि शायद ठाकुर साहब के कारण रेखा के ससुराल में जो बवाल मच गया उसके बाद रेखा को मायके आने की इजाज़त भी कितनी मुश्किल से मिली होगी। और इस सब चिंताओं में ही मन ही मन घुलती रेखा इस कदर परेशान है कि सामान्य नही हो पा रही है।
   इसके बावजूद जब रेखा ने रुचि से मिलने की इच्छा जाहिर की तो ठकुराइन का माथा ठनक गया।
   रुचि कॉलेज में रेखा के साथ ही थी। और दोनो की ही कभी आपस में नही जमी।
  शादी के बाद रेखा जहाँ अपनी ससुराल में पूरी तरह घुल नही पायी वही रुचि शादी के बाद अमेरिका के रंग में पूरी तरह रंग गयी थी। शादी के तुरंत बाद ही वो अमेरिका चली गयी थी और अब तक वापस नही आई थी।
   रेखा की बात सुन ठकुराइन भी सोच में पड़ गईं उन्हें लगा शायद वो वापस आयी हो।पर जाने क्या सोच उन्होंने घर के पुराने नौकर पूरन को रुचि के घर का चक्कर लगाने भेज ही दिया…

   पूरन ने आकर यही खबर दी कि रुचि जब से अमेरिका गयी वापस ही नही आई। जिसका  अंदेशा था वही हुआ।
    
   और रेखा के घर से निकलते ही ठकुराइन भी उसके पीछे घर से निकल पड़ीं।

*****

   इतने दिनों बाद ऑफ़िस पहुंच कर बाँसुरी अपने काम में पूरी तरह डूब चुकी थी। पुराने काफी काम पेंडिंग पड़े थे , जिनके साथ ही नए कामों का भी अंबार लगा था।
   वो एक के बाद एक फाइल्स पढ़ती उन्हें आगे बढ़ाती जा रही थी कि उसकी नज़र एक चिट्ठी पर पड़ी…

   “अभी भी वक्त है सुधर जाओ वरना दोनो पति पत्नी का वो हश्र होगा कि कुछ सोचने का भी वक्त नही मिलेगा।”

  इन दो पंक्तियोँ के अलावा कहीं कुछ नही लिखा था ,न चिट्ठी भेजने वाले का नाम न अता पता।
बाँसुरी ने चिट्ठी फाड़ कर डस्टबिन में डाल दी। वो अगली फाइल पढ़ ही रही थी कि उसके ऑफ़िस के बाहर एकदम से शोरगुल होने लगा…
    हल्ला जब घटने की जगह बढ़ता ही गया तब उसने अपने पियोन को बुला कर बाहर क्या चल रहा है पूछा ।
  पियोन कुछ जवाब दे पाता उतनी देर में भीड़ का एक रेला बाहर उन्हें रोकते लोगों को धक्का दे अंदर चला आया…

” आप ही हैं यहाँ की ए डी एम मैडम ?”

  उनमें से सबसे आगे खड़े तेज़ तर्रार आदमी ने बाँसुरी की ओर प्रश्न उछाल दिया..

“जी हाँ ! मैं ही हूँ। बोलिये क्या समस्या है आपकी? “

” हमारी समस्या स्वयं आप हैं मैडम ! आपने हमारे शहर के गणमान्य ठाकुर साहब को बिना किसी गुनाह के जेल भेज दिया, अब उनके पूरे परिवार के पीछे पड़ गईं हैं।
  आखिर आपकी दुश्मनी क्या है मैडम? आप क्यों ठाकुर साहब के परिवार के पीछे पड़ी हैं। “

” मैं क्यों उनके परिवार के पीछे पडूंगी। आपको कुछ गलतफहमी हुई है।मैं तो अब तक उनके परिवार से मिली भी नही,बात रही ठाकुर साहब को जेल में डालने की तो उसके पीछे उनके काले कारनामे हैं मैं नही!”

” आप तो ऐसे कह रहीं जैसे बड़ी दूध की धुली हैं आप! सबको पता है कैसे सेलेक्ट होकर आयी हैं आप यहाँ। भई राजा साहब की पत्नी को फेल करने का महापाप कौन करेगा  भला?”


” आपको अगर यही सब कहना है तो यहाँ से बाहर निकलिए और बाहर जाकर ये सब तमाशा कीजिये। “

” आप तो हमें भगाएँगी ही मैडम! सच किसी को हजम जो नही होता। यहाँ का बच्चा बच्चा जानता है ठाकुर साहब और उनके परिवार को। भगवान तुल्य ठाकुर साहब को हवालात की हवा खिलाने से पहले एक बार सोचा तक नही।इतना बड़ा निर्णय लेते हुए सोचा तक नही?

  बाँसुरी समझ चुकी थी कि इन लोगों के मुहँ  लगाना अपना पैर कुल्हाड़ी पर दे मारना है। वो चुपचाप बैठी अपनी फाइल्स खोल देखने लगी….
   वो आदमी बढ़ चढ़ कर बोलता रहा और बाँसुरी अपना काम करती रही।

  उन लोगों के ऑफिस से बाहर जाते ही बाँसुरी और उसके स्टाफ़ ने चैन की सांस ली…

  बाँसुरी के उससे एक जूनियर अधिकारी ने उन लोगों के जाते ही बाँसुरी के सामने पानी का गिलास बढ़ा दिया…

” क्यों वर्मा जी ! ये ठाकुर साहब तो कुछ अधिक ही प्रसिद्ध हैं दून में? “

“नही मैडम ऐसा कुछ नही है। बल्कि उनसे तो यहाँ के रहने वाले खूब चिढ़ते थे। उन्होंने तो अपने तुगलकी फरमानों से सबका जीना मुहाल कर रखा था यहाँ का!”

” तो फिर ये इतना सपोर्ट क्यों कर रहे थे।

” मैडम हमें तो लगता है ये ठाकुर साहब की आड़ में किसी और का काम है? “

” मतलब ?”

” मतलब ये कि आपके साहब यानी राजा जी चुनाव में उतर रहें हैं वो भी बिना किसी पार्टी की सहायता लिए।अब ऐसे में उनके विपक्षियों को डर तो है ही राजा जी से।
   अगर वो लोग किसी तरह आपको यहाँ से बदनाम कर नौकरी से सस्पेंड कर दें तो राजा जी के ऊपर एक दबाव बनेगा न।
अब मैडम आप तो जानती ही हैं प्रशासनिक वालों का जीवन कितना कठिन होता है। हर पल अंगारों पर ही चलाना है।
   अब अगर हमारे घर के किसी सदस्य पर किसी तरह का दबाव बनाना है तो हमारे काम में ये लोग ऐसे ही घोल घाल कर हमारा नाम खराब करने की कोशिश करतें हैं। जिससे हमारा नाम खराब हो। ज़ाहिर है पब्लिक वोट डालने से पहले उम्मीदवार की सातों पुश्तों की तहकीकात करती ही है। बस यही कारण लग रहा हमें तो। ये भी हो सकता है कि आपके द्वारा राजा जी पर पार्टी में मिलने का प्रेशर बनाना चाहते हों।

” यही तो मुसीबत है।सात पुश्तों की तहकीकात करने वाली जनता बस उम्मीदवार की ही तहकीकात कर ले न तो हमारे यहाँ के चुनाव में पारदर्शिता आने लगेगी।

” जी मैडम !”

” ओके वर्मा जी आप अपना काम देखिए। मैं जानती हूँ ऐसे लोगों को कैसे संभालना है।”
   

   इस सारी बातों को निपटा कर बाँसुरी रात में घर पहुंची तब तक थकान से चूर हो चुकी थी। अपनी अवस्था का ध्यान रखे बिना वो काम में लगी थी। उसकी माँ ने कहा भी था कि वो कुछ दिनों के लिए उसके पास आ जाएंगी लेकिन पापा अकेले कैसे मैनेज करेंगे कह कर बाँसुरी ने उन्हें आने से मना कर दिया।

   घर पहुंच कर खाने बैठी ही थी कि राजा का फ़ोन चला आया। मुस्कुरा कर उसने फ़ोन उठा लिया….

  ” कैसे रोज़ जान जाते हो कि अब खाना खाने बैठ रहीं हूँ। “

” बस दिल से दिल को राह जो है। आपको भूख वहाँ लगती है,मुझे यहाँ महसूस हो जाता है। “

” अच्छा जी! आपने खाना खाया साहेब ? “

” बस सोचा पहले अपनी हुकुम से बात कर लूं फिर खाना खाया जाएगा।”

  मुस्कुरा कर बाँसुरी ने उसे भी अपनी प्लेट मंगवाने को कहा और सुबह ऑफिस में घटी सारी बातें उसे सिलसिलेवार बताती चली गयी…

   तभी दरवाज़े पर किसी की आहट सी हुई। बाँसुरी की सहायिका उसे बुलाने चली आयी…
   बाँसुरी बाहर निकलती तब तक में पुलिस के दो आला अधिकारी भीतर चले आये…

” आई एम सॉरी मैडम !आपको इस वक्त थाने चलना होगा!”

  उनके ऐसा बोलते ही बाँसुरी हतप्रभ गयी।

  ” थाने लेकिन क्यों? “

” आप पर हत्या के प्रयास का आरोप है मैडम। मैडम आप भी जानती है। कि हम सब आपको कितना सम्मान देते हैं।
   आपको इस तरह साथ लेकर जाते हुए अच्छा नही लग रहा मैडम लेकिन कानून आप भी जानती हैं और हमसे ज्यादा अच्छे से जानती हैं, इसलिए अगर आप खुद चलेंगी तो ज्यादा सुविधा हो जाएगी….

” ठीक है!  पर क्या मैं एक बार अपने वकील से बात कर सकती हूँ?

  पुलिस वाले कि  इजाज़त मिलते ही बाँसुरी ने तुरंत समर को फ़ोन लगाया ……
     लेकिन बताती क्या, उसे खुद सारा मामला पता नही था……..

क्रमशः





    
  
  
   


   

जीवनसाथी – 103

जीवनसाथी -103



घुटनों पर झुके ठाकुर साहब को अपने गन पॉइंट पर रखे प्रेम की आंखों में खून उतर आया था। वो गुस्से में वहीं शायद ठाकुर साहब को गोली मार चुका होता लेकिन इधर उधर फैले हाहाकार के बीच उसे बाँसुरी की चीख ‘साहेब ‘ सुनाई दी और वो ठाकुर को अपने आदमियों के हवाले कर तुरंत स्टेज की ओर भाग खड़ा हुआ।
    प्रेम के ठाकुर साहब के पास पहुंचते तक में आदित्य भी पहुंच चुका था। लेकिन इतनी तैयारियों के बाद भी आखिर वो लोग चूक ही गए और ठाकुर साहब की गन से गोली चल ही गयी…..

    ******

  मंच पर भाषण देते अजातशत्रु की ओर सभी की नज़रे थीं। सभी मगन थे, ध्यान से राजा जी के कहे एक एक शब्द सुन रहे थे, लेकिन रानी माँ का पूरा ध्यान सिर्फ ठाकुर साहब पर था।
     वो सिर्फ और सिर्फ उन्हें ही घूर रहीं थीं। वो चाहती थी कि एक बार ठाकुर साहब उन्हें देखे और वो उनसे हाथ जोड़ विनती कर उन्हें रोक ले।।
  पर ठाकुर साहब ने दुबारा रानी माँ की ओर नही देखा तो फिर नही देखा।
    ठाकुर साहब जैसे ही ज़रा हरकत में आये रानी माँ सतर्क हो गईं और जैसे ही ठाकुर साहब ने अपनी छिपी हुई गन निकाल कर अजातशत्रु के ऊपर तानी रानी माँ एक झटके से उठी और अजातशत्रु के पास पहुंच उसे एक तरफ को झुका दिया।
      किसी के कुछ समझने से पहले एक गोली राजा अजातशत्रु के कान के बहुत पास से होती हुई निकल गयी।
    ठाकुर साहब कहाँ रुकने वाले थे, एक के बाद एक उन्होंने लगातार तीन गोलियाँ चला दी और राजा अजातशत्रु को एक ओर धकेलती रानी माँ उन बची दो गोलियों की चपेट में आ गईं।
   मंच पर बैठे लोग सामने बैठी जनता जब तक कुछ समझ पाती गोलियाँ चल चुकी थीं।
   बाँसुरी अपने साहब को आवाज़ लगाती उन तक भाग कर पहुंची तब तक में अजातशत्रु रानी माँ को सहारा दिए नीचे बैठ चुके थे।
   प्रेम के आदमी इतनी देर में ठाकुर साहब को पकड़ चुके थे…. उनके हवाले उन्हें कर प्रेम भी राजा अजताशत्रु की तरफ दौड़ चला, उसके पीछे ही आदित्य भी भागा।
   मंच पर समर ठीक अजातशत्रु के पीछे ही खड़ा था, इसी से रानी माँ के धक्के के समय उसने गोली देख अजातशत्रु को कवर कर लिया था बावजूद गोली रानी माँ को लग ही गयी।
    अजातशत्रु को बचाने के लिए उन्हें हटाती रानी माँ खुद ठाकुर साहब के निशाने पर आ गयी। एक गोली कोहनी को छूती हुई पेट पर लगी और दूसरी सीने पर।
   गोली लगते ही रानी माँ वहीं गिर पड़ी। अजातशत्रु की गोद में सर रखे रानी माँ ने पीड़ा से आंखे बंद कर ली।
     मंच के नीचे लोगों में भगदड़ मच गई थी। समर और प्रेम ने अजातशत्रु की मदद करते हुए रानी माँ को उठाया,तब तक में विराज मंच के नीचे तक में अपनी गाड़ी ले आया।
  रानी माँ को गाड़ी में डाल वो सभी अस्पताल के लिए निकल गए।
     प्रेम के कुछ आदमी मंच पर से  लोगो को उतार गाड़ी में चढ़ाते जा रहे थे और बाकी आदमी नीचे भगदड़ मचाती जनता को भी घबराने की जगह सयंम से निकालते जा रहे थे……
  
    एक के पीछे एक दस गाड़ियां फर्राटे से अस्पताल की ओर बढ़ गईं।
     अस्पताल में  समर ने फ़ोन कर दिया था इसलिए ओटी पहले ही तैयार थी।
     अस्पताल पहुंचते ही बिना कोई देर किए रानी माँ को तुरंत ओटी ले जाया गया।
    बाकी सभी बाहर ही खड़े रह गए। एक के पीछे एक गाड़ियों में सभी वहाँ पहुंच चुके थे। रानी माँ के साथ विराज अजातशत्रु समर थे, तो उसके पीछे की गाड़ी में प्रेम के साथ बाँसुरी युवराज रुपा और महाराज थे।
    इन गाड़ियों के वहाँ से निकलते ही आदित्य गाड़ी लिए काकी साहब के सामने पहुंच गया। सोचने समझने का समय ही किसके पास था। आदित्य की गाड़ी में ही काका साहेब काकी साहेब के साथ पिंकी और रतन भी चले आये
    विराट अपने किसी एडवांस फोटोग्राफी कोर्स के लिए फिलहाल अफ्रीका में था इसी से उसे किसी ने कोई सूचना नही दी थी।
   यूँ लग रहा था पूरा का पूरा महल अस्पताल पहुंच गया था।
    
    डॉक्टरों की टीम रानी माँ की जान बचाने में लगी थी और बाहर सभी हैरान परेशान बैठे भगवान से प्रार्थना कर रहे थे।

  सबसे किनारे की कुर्सी पर अकेली बैठी रेखा जब से अस्पताल पहुंची थी बस रोये ही जा रही थी। अजातशत्रु के पास बैठी बाँसुरी का ध्यान बहुत देर से रेखा पर था , उसने किसी सहायक को भेज राजा के लिए साफ कपड़े मंगवा लिए थे।
  रानी माँ को संभालने के चक्कर में राजा की सफेद पोशाक खुनाख़ून हो चुकी थी। बाकियों को तो कुछ नही लग रहा था पर जाने क्यों बाँसुरी राजा को वैसे देख नही पा रही थी, इसलिए इतनी सब परेशानियों के बाद भी उसने कपड़े मंगवा लिए।
   सहायक के कपड़े लाते ही वो मिन्नतें कर राजा को साथ लिए कपड़े बदलवाने चली गयी।
साफ सुथरे कपड़ों में राजा को वहीं छोड़ फिर वो रेखा की तरफ बढ़ गयी…..

  रेखा का रोना बदस्तूर जारी था।

  बाँसुरी ने रेखा के कंधे पर धीमे से हाथ रख दिया,रेखा ने एक बार उसे सर उठा कर देखा और दूसरी तरफ मुहँ फेर लिया…

” मैं जानती हूँ तुम मुझसे नाराज़ हो,मैंने ठाकुर साहब के खिलाफ सबूत इकट्ठे किये , उन्हें जेल भेजने के लिए। लेकिन ऐसा क्यों किया ये भी तो जान लो रेखा। एक बार अपनी बड़ी बहन मान कर ही मेरी बात सुन लो। “

” क्या सुनें हम बाँसुरी। अब सुनने को रह क्या गया। हमारा तो सब चला गया। अपने हमारे पिता हुकुम को जेल करवा ही दी। अब अगर कहीं रानी माँ को कुछ हो गया तो हम तो कहीं के नहीं रहेंगे। विराज सा वैसे ही हमारा मुहँ नही देखेंगे। ससुराल में सब हमसे नाराज़ हो जाएंगे और यहाँ की सब की नाराजगी के बाद हम मायके भी नही जा सकते।  पिता हुकुम के जेल में रहने पर वहाँ भी तो मुश्किलें पैदा हो जाएंगी न।
    अब न तो हम ससुराल के रहे न मायके के…

” आपने ऐसा सोचा भी कैसे रेखा! होता वही है जो वो परमशक्ति चाहती है। दूसरी बात ठाकुर साहब ने जो किया वो उनके मन का द्वेष था और उनके उस कृत्य के लिए आप कहीं से भी जवाबदार नही हैं। जैसे पहले आप रियासत की बहू थीं अब भी हैं और परिस्थितियां कुछ भी हों आप हमेशा इस घर की बहू रहेंगी। आपके आदर सम्मान में कोई कमी कभी नही आएगी।
   आज मॉम की जो भी हालत है उसके लिए कहीं न कहीं वो भी ज़िम्मेदार हैं, इसलिये उनकी हालत की ज़िम्मेदार आप खुद को मत मानिए।
   आप जिस दिन मेरे छोटे भाई विराज की दुल्हन बन कर आयीं उसी दिन से मैंने आपको अपनी छोटी बहन मान लिया था, और मैं कोई बात ऊपरी तौर पर नही कहता, मैंने अगर कोई रिश्ता किसी के साथ बनाया है तो उसे दिल से निभाया भी है, ये आप भी जानती हैं। फिर आपने इतनी बड़ी बात सोच कैसे ली कि अगर मॉम को कुछ हो गया तो महल आपको यहाँ से उठा कर बाहर फेंक देगा।
  
  रेखा ने डबडबाती आंखों से राजा की ओर देखा … राजा ने उसके सर पर हाथ रख दिया..

” आप अपनी और अपने बेटे की बिल्कुल चिंता मत कीजिये, आप मेरे संरक्षण में हैं।”

” भाई साहब लेकिन हमें हमारे पिता हुकुम की तो चिंता हो ही रही है ना? “

” अभी फिलहाल उनके बारे में भी मत सोचिये। मेरा यही मानना है कि जो भी होता है अच्छे के लिए होता है, आप भी अभी शान्त मन रहिये और विश्वास रखिये जो भी होगा अच्छा ही होगा।”

 
राजा की बातों से भी रेखा को कोई तसल्ली नही मिली।  वो अब भी वो अपने पिता को लेकर परेशान ही थी।
   उसे इस बात का भी डर रह रह कर सता रहा था कि कहीं विराज इसके पिता पर का गुस्सा उसके ऊपर न निकाल दे। उसकी इस परेशानी को सभी समझ भी रहे थे लेकिन ये समय ही ऐसा था कि जो भी विराज से बात करने जाता विराज उसी पर नाराज़ हो सकता था।
    सभी चुपचाप बाहर बैठे रानी माँ की सकुशल वापसी का इंतज़ार कर रहे थे।
    
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   आदित्य धीमे कदमों से चलते हुए रेखा के पास पहुंच गया। रेखा की आंखें भरी ही थीं। आदित्य उसके बाजू में बैठ गया। उसके बैठते ही रेखा ने उसे देखा और उसके कंधे पर सर रखे फफक के रो पड़ी। आखिर इतने लोगों के बीच वही अकेला तो उसके मायके का था। रेखा तो अब तक ये भी नही जानती थी कि ठाकुर साहब और उनकी धर्मपत्नी उसके असली माता पिता नही हैं।
   उसे तो आदित्य उसकी बुआ का लड़का ही मालूम था, हालांकि वो भी शादी से पहले कभी भी आदित्य से ज्यादा हिली मिली नही थी। हमेशा अपनी माँ के कड़े निर्देशों का पालन करती वो आदित्य से एक दूरी बनाए रखती थी। लेकिन आज वही पराया सा लगने वाला भाई अचानक कितना अपना लगने लगा था। कहा भी जाता है ससुराल में तो मायके से आया कौंवा भी प्यारा लगने लगता है फिर आदित्य तो उसका भाई था।।
   रेखा के सर पर हाथ फिराता आदित्य चुपचाप बैठा रहा और रेखा उसके कंधे पर सर रखे रोती रही।

” रेखा बाई सा आपसे हम कुछ बात करना चाहतें हैं।”

” हाँ कहिये । “

” नही यहाँ सबके बीच नही। क्या आप बाहर चल सकती हैं? “

  रेखा ने एक नज़र आदित्य की तरफ देखा और उसके साथ बाहर जाने के लिए खड़ी हो गयी। आदित्य ने राजा को देख कर बाहर जाने की अनुमति ली और तेज़ कदमों से बाहर निकल गया। रेखा भी धीरे धीरे उसके पीछे बाहर निकल आयी…

” आपसे कुछ बताना चाहतें हैं। पता नही आप हम पर विश्वास करेंगी भी या नही। “

” कहिये क्या कहना चाहतें हैं।”

  एक गहरी सांस भर कर आदित्य ने ठाकुर साहब की सारी कारस्तानी रेखा को बता दी। सारी बातें सुनती कभी चौंकती कभी आश्चर्य से आँखें फाङती रेखा को जैसे विश्वास ही नही हो रहा था।

  ” हमारी कही एक एक बात सही हैं रेखा बाई सा। आप मामा जी की असली बेटी नही हैं। “

” तो उनकी असली संतान कौन है फिर? “

” ये तो हम नही बता पाएंगे। आपको उतना ही बताया जितना जानना आपके लिए ज़रूरी था। मामा जी ने सिर्फ़ हमारी ज़िंदगी का ही मज़ाक नही बनाया बल्कि आपकी बड़ी बहन और आपके पिता का जीवन भी उन्होंने बर्बाद कर के रख दिया है।

  वक्त और परिस्थितियों के बदलने में वक्त नही लगता। अब तक जो रेखा ठाकुर साहब को पिता समझ उनके जेल जाने से दुखी थी, जिसे सारे महल वासी अपने दुश्मन से लग रह थे अब कुछ ही पलों में अपनी अनदेखी बहन और पिता के लिए ममता से भर उठी।
 
   आदित्य पर भरोसा कर लेने का एक और कारण भी था, उसने बचपन से ही आदित्य को ठाकुर साहब के साथ ही देखा था। आदित्य ने जीवन भर ठाकुर साहब के अलावा न किसी पर विश्वास किया न किसी के साथ काम किया, तो अब अगर वो ऐसा कह रहा कि वो ठाकुर साहब की बेटी नही है तो इसका मतलब ये बात सच ही होगी ।

  उसने तुरंत अपनी माँ यानी ठाकुर साहब की पत्नी को फ़ोन लगाना चाहा लेकिन फिर कुछ सोच कर फ़ोन नीचे रख दिया…

” आपको सबूत चाहिए ना। रुकिए…” ऐसा कह आदित्य ने अपने एक आदमी को फ़ोन लगा दिया। उससे बात कर उसने केसर से बात करने की इच्छा जताई।
  वो आदमी तुरंत केसर तक फ़ोन लेकर पहुंच गया…

” केसर ! कैसी तबियत है अब तुम्हारी ? हम जल्दी ही आने वाले है तुम्हारे पास।  “और फिर थोड़े शब्दों में आदित्य ने वहाँ जो कुछ भी घटा सब सारा केसर को बता दिया..

” पहले से आप सभी को बताने के बावजूद ठाकुर साहब ने वो कर ही लिया जिसके लिए वो यहाँ से भागे थे आखिर।
  सोचो आदित्य कहीं वो गोलियां अजातशत्रु को लग जाती तो क्या होता?
रानी माँ को लगीं ये तो एक तरह से अच्छा ही हुआ। उन्हें तो मर ही जाना चाहिए क्योंकि अजातशत्रु तो उन्हें कोई सज़ा देंगे नही। रही बात ठाकुर साहब की तो उन्हें भी अगर अजातशत्रु की अदालत में पेश किया जाता तो वो उन्हें भी माफ ही कर देता…

” बस बस एक मिनट रुको तो सहीं ।
   केसर यहाँ कोई है जो तुमसे बात करना चाहती है। ” और आदित्य ने फ़ोन रेखा को थमा दिया।

  ” कौन रेखा? हमारी छोटी बहन रेखा ? रेखा हमसे बात करना चाहती है? क्या सच में ? तुमने उसे क्या बताया आदित्य हमारे बारे में ? “

  केसर अपनी रौ में बहती कही चली जा रही थी। बिना ये जाने की दूसरी तरफ उसकी बात आदित्य नही बल्कि रेखा सुन रही थी…
    अपने आप को संभाल कर रेखा ने धीरे से केसर का नाम पुकारा …

” दीदी !”

” कौन ? आदित्य कौन है वहाँ तुम्हारे साथ?”

” हम हैं दीदी सा रेखा !”

एक पल को ये नाम सुनते ही केसर की आंखों से मोतियों की लड़ी बहने लगी। इसी बहन के अच्छे जीवन के लिए, अपने पिता के लिए क्या क्या नही किया उसने।
  और आज वही बहन उसे पुकार रही थी। पर रेखा से किसने कहा दिया कि वो दोनो बहनें हैं।

” रेखा ! कैसी हो? “

” कैसे होंगे दीदी सा? अभी अभी हमें हमारे जीवन की सबसे बडी सच्चाई पता लगी है। हमें तो ये समझ ही नही आ रहा कि हम करें क्या? इस बात पर रोएं कि हम ठाकुर साहब की औलाद नही हैं या इसी बात पर खुश हो रहें। “


” हम समझ सकतें हैं रेखा आपकी हालत।।क्योंकि  हम ऐसी हालत के खुद शिकार हो चुके हैं लेकिन अब क्या कहें।
   हमारी किस्मत ही भगवान ने जाने कैसी सियाही से लिखी है कि हम कहीं के न रहे। समझ में नही आता कि ज़िन्दगी भर गलतियां करते रहे और जब समझ आया कि हम गलत थे और अब सुधारना चाहते हैं तब भगवान ने वक्त ही नही छोड़ा हमारे पास।

” ऐसा क्यों बोल रहीं हैं दीदी सा?”

” हम सच कह रहे हैं रेखा। हमने जीवन भर गलतियां की हैं। अजातशत्रु और बाँसुरी के जीवन में बिना मतलब ज़हर घोलने की कोशिश की हमने। हम तो आज उन दोनों से माफी मांगने के भी काबिल नही हैं।
  हमारे पिता जब अस्पताल में भर्ती थे उस वक्त का लाखों का बिल अजातशत्रु ने चुकाया था ये जानते समझते हुए भी की हमारे ही कारण उनकी पत्नी उनसे अलग हुई थी। जबकि हम आज तक यही सोचते आये थे कि ये सारे अस्पताल के बिल्स ठाकुर साहब ही भरतें आएं हैं।
   पर हम सच कहतें हैं जिस दिन से हमने उस महल में रहना शुरू किया था , हमारे हर खर्च का वहन अजातशत्रु और उसके महल ने किया ।
    आज जब हमें सारी सच्चाई मालूम चल गई है हम राजा अजातशत्रु और रानी बाँसुरी को मुहँ दिखाने लायक भी नही बचे।

   अब तक अपने पिता के जेल जाने के लिए बाँसुरी को गुनाहगार समझती रेखा की आंखें भी अब धीरे धीरे खुलने लगी।

” ठाकुर साहब ने न जाने कितनी दफा राजा अजातशत्रु पर वार किए उनकी जान लेने की कोशिश की , अब ये सब जानने के बाद भी क्या कोई पत्नी होगी जो अपने पति के दुश्मन को छोड़ देगी? उसे तो ठाकुर साहब को गोली मरवा देनी चाहिए थी, लेकिन ये दोनों राजा रानी जाने किस मिट्टी के बने हैं। बाँसुरी ने कायदे से उनके कारनामों के खिलाफ सबूत जमा किये और उन्हें पुलिस के हवाले करना चाहा। अगर उसी समय ठाकुर साहब जेल चले गए होते तो भी ठीक था पर वो वहाँ से भाग गए और एक बार फिर पहुंच गए राजा अजातशत्रु और रानी बाँसुरी को मारने।
   उनका ये प्रयास आज का नही है रेखा। उनकी ये कोशिश तो राजा अजातशत्रु के बचपन से ही चल रही है। अब ये सब जानने के बाद कौन होगा जो उन्हें माफ कर पायेगा।
   इन दोनों ने तो फिर भी बदला लेने की जगह कानूनी रास्ता चुना है।
  तुम्हें एक बात पता है रेखा, ठाकुर साहब ने दुश्मन भी ढेरों पाल रखें हैं। इसलिए जब उनके नाम से समन जारी हुआ तब कहीं उनके दुश्मनों को पता चलने पर वो सब मिल कर उनकी पत्नी और बाकी सदस्यों को नुकसान न पहुंचा दे इसलिए बाँसुरी ने उनकी पत्नी की सुरक्षा के लिए दो पुलिस कर्मी भी लगा दिए हैं।  

   रेखा ने वहीं खड़े खड़े दूर से ही एक नज़र बाँसुरी और राजा को देखा।
  राजा विराज को सहारा दिए बैठा था और बाँसुरी काकी साहेब के पास थी। दोनो ही के चेहरों से चिंता झलक रही थी और ये कोई बनावटी चिंता नही थी।  एक निश्चिन्तता से भरी हल्की मुस्कान रेखा के अधरों पर भी छा गयी।

” दीदी साहेब । अभी हम ससुराल में हैं इसलिए फोन रखतें हैं।।जल्दी ही आयंगे आपसे मिलने। वैसे मिलें तो पहले भी कई दफा हैं लेकिन अब के जो मिलना होगा वो अलग ही होगा हर बार से। “

  ” अपना ख्याल रखना रेखा। “

” जी बाई सा। “

रेखा ने फोन आदित्य को थमाया और धीरे धीरे चलती आगे निकल गयी।
    महल की बाकी औरतों के पास पहुंच वो भी धीरे से बाँसुरी के पास बैठ गयी…

” थैंक यू बाँसुरी ! तुमने जो किया उसके लिए। ”  बाँसुरी ने एक नज़र रेखा को देखा और धीमे से मुस्कुरा कर रह गयी।

   महलवासियो को अस्पताल पहुंचे दो घंटे हो चुके थे और डॉक्टरों की टीम ने अब तक कोई जवाब नही दिया था।
    महाराज के लिए वहाँ बैठना मुश्किल हो रहा था, इसलिए युवराज प्रेम के साथ महाराज को लिए महल वापस छोड़ने चले गए।

   बाकी सभी लोग वहाँ बैठे भगवान से रानी माँ कें जीवन के लिए प्रार्थना कर रहे थे।।
कुछ देर में एक सीनियर डॉक्टर बाहर चले आये, उनके आते ही सभी उनकी ओर दौड़ चले…

   ना में सर हिलाते हुए वो राजा के पास जा खड़े हुए…

” ऑपरेशन कर के गोलियाँ तो निकाल दी हैं हमने राजा साहब, लेकिन अभी भी कुछ कहा नही जा सकता।
   मैं तो यही कहूंगा कि आप इन्हें शहर के किसी बड़े अस्पताल या फिर दिल्ली एम्स ले जाइए। “

” दिल्ली ले जाने की कंडीशन में हैं वो ? “

” नही अभी तो नही हैं लेकिन आप तैयारी रखिये। आज की रात निकल जाए तब कुछ उम्मीद की जा सकती है। आप लोगों को किसी मुगालते में नही रखना चाहता, फिर भी सुबह तक देखते हैं अगर हालत ठीक रहती है तो कल सुबह तक में ले जाएं तो सही रहेगा।

   समर ने तुरंत दिल्ली फोन कर रानी माँ को अगले दिन लाने के लिए बुकिंग कर ली।
  फिर तो आनन फानन सब होता चला गया। उस काली रात के बीतते ही उम्मीदों का सूरज जगमगाया और राजा समर प्रेम और विराज के साथ रानी माँ को साथ ले दिल्ली निकल गया।

  वहाँ डॉक्टरों ने सारी तैयारी कर रखी थी, रानी माँ को तुरंत भर्ती कर उनका इलाज शुरू कर दिया गया।

   बाँसुरी भी राजा के साथ जाना तो चाहती थी लेकिन जाने क्यों उसकी तबियत उसे सही नही लग रही थी। थकान से उसका चेहरा कुम्हला गया था, और इसीलिये उसकी स्थिति देख राजा ने उसे महल में रहने और आराम करने को छोड़ दिया।

  चार दिन के गहन उपचार के बाद पांचवी रात आखिर रानी माँ ने आंखे खोल दी। रात गहरी बीत चुकी थी , सुबह होने को थी पर कमरे में उजाला नही फैला था। रानी माँ ने धीमे से आंखे खोली तो देखा , उनके पैरों के पास एक आरामकुर्सी में राजा अधलेटा सा सोया पड़ा है। एक दूसरी कुर्सी पर प्रेम सोया था और साथ कि कैंप कॉट में समर हाथ पांव सिकोड़े पड़ा था।
   अपने सामने राजा को बैठे देख उनकी आंखें भर आई ….
   ये रियासत के राजा हैं जिन्हें न अपनी सुविधा का ख्याल है और न अपने ऐशोआराम का। बिल्कुल किसी आम बेटे की तरह जिसकी माँ अस्पताल में पड़ी हो वो अपनी माँ के पलंग के एक तरफ की कुर्सी पर ही सोया हुआ था।
   उन लोगों को देखते रानी माँ के मन में ख्याल आया कि ये तीनों यहाँ है तो बाकी लोग कहाँ हैं?

अपने ज़िन्दगी भर के पाप मन ही मन दोहराती रानी माँ की आंखें भर आईं। उन्होंने करवट लेनी चाही और उस हल्की सी आहट से राजा की आंखें खुल गईं..

” मॉम कैसी तबियत लग रही है अभी ? कुछ चाहिए आपको? “

” हम कहाँ हैं कुमार?”

” आपको लेकर हमें दिल्ली आना पड़ा मॉम। ”

” आप तीनों के अलावा और कौन आया है? “

  राजा इस बात को समझता था कि एक माँ का मन तो अपनी संतान में ही अटका रहता है, और इसी से वो विराज को अपने साथ लेकर आया था।

” विराज भी साथ ही है मॉम। कल दिन भर बहुत थक गया था इसलिए रात में सोने के लिए होटल चला गया! विराट अपने असाइनमेंट के लिए अफ्रीका में था वो भी कल रात पहुंच चुका है, वो भी आराम करने होटल में ही रुक गया।”

” तुम क्यों नही गए कुमार? “

” मैं आपको छोड़ कर कैसे जा सकता हूँ मॉम? “

  रानी माँ अपने बहते आंसुओं के साथ भी मुस्कुरा उठी….

” हमारा अंतिम समय आ गया है कुमार, और अपने इस अंतिम समय में ईश्वर से बस यही प्रार्थना है कि अगले हर जन्म में वो हमें आपकी माँ बनाए। जैसे औरतें हर जन्म में वही पति पाने के लिए करवाचौथ करती हैं काश कोई व्रत उसी संतान को पाने का हो पाता तो हम आपके लिए ज़रूर करते।
  कुमार हम कुछ कहना चाहतें हैं..

” कहना क्या आप आदेश करें मॉम। “

  रानी माँ एक बार फिर मुस्कुरा कर रह गईं

“आपको पता नही लेकिन हमने ज़िन्दगी भर बहुत पाप किये हैं…

  राजा ने आगे बढ़ रानी माँ का हाथ थाम लिया…

” आप ऐसी कोई भी बात नही कहेंगी जिससे अभी आपकी तकलीफ बढ़े मॉम।”
  
   “नही बेटा आपसे सब कह लेने से तकलीफ बढ़ेगी नही बल्कि घटेगी। आप नही जानते हम क्या हैं? “

” मुझे जानना भी नही है मॉम। आप मेरे लिए माँ थी और हमेशा रहेंगी। आप प्लीज़ अभी स्ट्रेस मत लीजिये।

रानी माँ बहुत आराम से बात कर पा रहीं थी , उन्होंने चेहरे पर लगा ऑक्सीजन मास्क भी हटा दिया था..

” देख लो हमें कोई तकलीफ नही है बात करने में। कहतें हैं न दिया बुझने से पहले अपनी पूरी लौ में जलने लगता है , बस वैसा ही कुछ समझ लो। “

” मॉम प्लीज़ ऐसा कुछ मत कहिये। अभी आपको लंबा जीवन जीना है, विराज विराट के बच्चों के साथ खेलना है…

  रानी माँ ने राजा की बात आधे में ही काट दी..

” तुम्हारे  बच्चों के साथ खेलने की तमन्ना ज़रूर अब पैदा हो गयी थी लेकिन वो अब पूरी नही हो पाएगी। हम जानतें हैं बाँसुरी खुशखबरी सुनाने वाली है, अच्छा सुनो अब सबसे ज़रूरी बात जो हम कहना चाहतें हैं वो ये है कि अगर हमारी सच्चाई महाराज या महल के सामने आ गयी तो विराज विराट का कोई सहारा नही रह जाएगा कुमार..

” मॉम आपसे वादा करता हूँ आपकी विराज और विराट की कोई सच्चाई कभी महल या डैड के सामने नही आएगी। आप मुझ पर पूरा भरोसा कर सकती हैं।

” एक आप पर ही तो पूरा भरोसा है कुमार। हमारे जाने के बाद हमारे बच्चे अनाथ न हो जाएं ये ध्यान रखना। आप राजनैतिक कैरियर शुरू करने जा रहें हैं, यूनिवर्सिटी शुरू करने जा रहें हैं… हमारी शुभकामनाएं हैं आपके साथ। बस हमारे लिए एक काम कर देना आप!

” आप हुकुम कीजिये मॉम!”

” विराज को भी राजनीति में अपने साथ रखना कुमार। अब तक बड़े भाई की तरह संभाला है उसे अब हमारे बाद एक माँ की तरह संभालना। वो ज़रा तेज़ मिज़ाज़ का है। जल्दी भड़क जाता है। उसे सही गलत की अब भी पहचान नही है फिर भी उसे कभी अकेला मत छोड़ना कुमार।
   अपनी पार्टी में उसे भी कोई ओहदा देना, यूनिवर्सिटी में भी उसके लिए कुछ रखना कुमार। उससे जिम्मेदारियां भले निभाई न जाएं लेकिन पद का लालच तो है ही उसके मन में।
  हो सकता है आपके साथ रहते रहते वो भी अपनी जिम्मेदारियां समझ जाएं।
विराट की हमें चिंता नही है,हम जानतें हैं उसे प्रकृति और रंगों से प्यार है और वो उसी में अपनी ज़िंदगी के रंग भी ढूंढ लेगा।
   लेकिन विराज विराट से बहुत अलग है। विराज को सत्ता की पावर की भूख है। राजगद्दी नही संभाल पाया इस बात के लिए उसके अंदर मलाल भी है। इसलिए उसे अपने साथ किसी महत्वपूर्ण पद पर रख लोगे तो उसे थोड़ी खुशी और हमारी आत्मा को संतुष्टि मिल जाएगी कुमार।

  राजा ने मुस्कुरा कर उनके हाथों को अपने हाथों से थपकी देकर उन्हें आश्वासन दिया..

” आप निश्चिन्त रहें मॉम , आप नही भी कहतीं तब भी विराज के लिए एक सीट थी ही मेरे पास। वो हम सब के साथ चुनाव लड़ेंगा और जीतेगा भी। अब उसे सदन तक पहुंचाना मेरा काम है। और एक वादा करता हूँ, अब तक यूनिवर्सिटी का काम अपने सर ले रखा था मैंने। लेकिन मैं खुद इतनी जिम्मेदारियां नही उठा पाऊंगा तो अबसे यूनिवर्सिटी की सारी जिम्मेदारी विराज की हुई।
  वही विश्वविद्यालय का कर्ता धर्ता होगा। बीच बीच में मैं और बाँसुरी भी देखते रहेंगे।
  
  अब आप आराम कीजिये मॉम मैं डॉक्टर को इत्तिला कर दूं कि आपको होश आ गया है। ”

  रानी माँ के माथे को चूम उनका हाथ धीमे से उनके बिस्तर पर रख  उसने उनके बेड के बगल में लगा अलार्म बजाया और फिर ये सोच कर की कहीं सिस्टर और डॉक्टर सो न रहें हों खुद उन्हें बुलाने बाहर निकल गया।

   डॉक्टरों के साथ राजा लौट कर आया तब तक में रानी माँ ने वापस अपनी आंखें मूंद ली थीं।
   डॉक्टरों ने आते ही उनकी जांच शुरू कर दी। उनके हाथ को थामे एक डॉक्टर उनकी नब्ज़ जांच रहा था, उसने दो बार जांच करने के बाद अपने साथ के डॉक्टर के कान में कुछ कहा और टॉर्च लिए रानी माँ की आंखें खोल देखने लगा..
   अब तक में प्रेम और समर भी जाग चुके थे…..
  डॉक्टरों की टीम ने जो जो हो सकता था कर के देख लिया और राजा की तरफ देख ना में सर हिला दिया…

” सॉरी राजा साहब! रानी माँ को बचाया नही जा सका। वी आर वेरी सॉरी!!”


राजा उनकी बात सुन चौन्क गया…

” अरे पर ये हुआ कब? मैं अभी पांच मिनट पहले ही तो आप लोगों को बुलाने निकला तब तक तो…

” जी वाईटल्स चेक करने पर लग रहा है रानी माँ की डेथ एक से डेढ़ घंटे पहले ही हो चुकी थी।

” क्या ? लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है?

राजा ने रानी माँ के चेहरे की तरफ देखा, उनके चेहरे पर से सिस्टर ने ऑक्सिजन मास्क हटा दिया था। मुहँ में डाली रॉयल्स ट्यूब नाक में डाली गई ट्यूब सब निकाला जा रहा था, और रानी माँ को देखता खड़ा राजा इसी सोच में डूबा था कि पिछले एक डेढ़ घण्टे से तो वो रानी माँ से बात कर रहा था। और उस समय उसने इस बात पर ध्यान ही नही दिया कि रानी माँ के मुहँ नाक में कोई पाइप नही था, ऑक्सीजन मास्क तो उन्होंने खुद हटाया था।
   पर अगर डॉक्टर के अनुसार उनका देहांत एक डेढ़ घंटे पहले ही हो गया था तो वो अब तक क्या रानी माँ की आत्मा से बातें कर रहा था, या फिर कोई सपना देख रहा था जिसमें उसे आगे क्या करना है कैसे करना है का मार्गदर्शन देने रानी माँ चली आयीं थीं।

  वो हैरान परेशान सा एक कुर्सी में ढह गया। अब तक समर और प्रेम ने महल और विराज विराट को फोन कर सूचना दे दी थी।

      महल में रानी माँ के देहावसान की खबर मिलते ही उनकी अंतिम यात्रा की तैयारियां शुरू हो गईं थीं।
  विराज विराट तुरंत ही अस्पताल पहुंच गए थे । रानी माँ के शरीर को महल वापस ले जाने की तैयारी में समर और प्रेम जुट गए थे।
  विराज विराट एक दूसरे का सहारा बने एक दूसरे को संभाले खड़े थे और राजा सबसे अलग एक किनारे की कुर्सी पर बैठा रानी माँ के बारे में ही सोच रहा था…

  ” भले ही दुनिया वालों की नज़रों में आप गलत होंगी मॉम लेकिन मैं जानता हूँ आपने अपनी पूरी ज़िंदगी सिर्फ अपने बच्चों को कुछ बनाने में लगा दी। क्या कोई माँ अपने बच्चों के लिए इतना भी कलप सकती है कि मौत से भी इजाज़त लेकर चली आयी अपने बच्चे के लिए अर्जी लगाने।
  आप जहाँ कहीं भी हैं मॉम आपसे राजा अजातशत्रु का वादा है विराज को सिर्फ टिकट ही नही दिलाऊंगा बल्कि उसे जिता कर भी रहूंगा। आप निश्चिंत होकर महाप्रयाण पर निकलिए , आप ने जो जैसा कहा है वो सारे अधिकार आज से विराज के हुए। उसे कभी किसी कीमत पर अकेला नही छोडूंगा। “

  अपनी लाल लाल आंखों से खिड़की से बाहर दूर आकाश को देखते राजा अजातशत्रु की आंखों से ऑंसू बह चले, तभी आकर किसी ने उनके कंधे पर हाथ रख दिया।
   राजा ने पलट कर देखा , सामने विराज खड़ा था।

  राजा उससे गले लग सिसक उठा।
दोनों भाई एक दूसरे को सहारा दिए रोते रहे, पास खड़ा विराट भी उन दोनों के गले से लग गया…..

क्रमशः


जीवनसाथी-102




   जीवनसाथी — 102


     बाँसुरी सहायिका की बस इतनी ही बात सुन पायी और पहले से दिमाग में चलती उसकी उलझनो ने एक कहानी सी बुन ली, उसने मन ही मन सहायिका की बात को आधा ही सुन ये सोच लिया कि राजा अजातशत्रु गिर गए हैं और बस इतना सुनते ही बाँसुरी खुद बेहोश होकर गिर पड़ी….

    निरमा ने सहायिका की सहायता से उसे उठा कर बिस्तर पर लिटा दिया और उसके पास बैठी उसकी हथेलियां मसलती रही।
    सहायिका के डॉक्टर को बुलाने की बात पर निरमा ने अस्पताल से किसी को बुलाने की जगह पिया को ही फ़ोन कर बुला लिया।
  इस वक्त किसी को बाहर से बुलाने में ज्यादा हंगामा होने की संभावना देखते हुए ही निरमा ने पिया को बुला लिया था।
    पिया के आते में बाँसुरी को होश आ गया था। पिया ने कुछ ज़रूरी जांच के बाद अगले दिन बाँसुरी को अस्पताल बुला लिया था…

” आपके कुछ टेस्ट करने होंगे मैम , उसके बाद ही कुछ क्लियर बता पाऊँगी। वैसे ऐसा पहली बार हुआ न ? “

  बाँसुरी ने हाँ में सर हिला दिया..

” कोई घबराने वाली बात तो नही है पिया? “

” नो नॉट ऐट ऑल। “

  बाँसुरी ने निरमा की तरफ देखा..” साहेब ?”

” अरे बिल्कुल ठीक हैं तुम्हारे साहेब। फ़िज़ूल ही तू बेहोश हो गयी। उस चंपा की बच्ची की भी अच्छी क्लास ले ली मैंने। वो ये कहने जा रही थी कि तुम्हारे साहेब गिरनार पर बैठ कर मंच तक गये हैं और ये अभूतपूर्व दृश्य वहाँ उपस्थित सभी मीडिया कर्मियों ने कैप्चर कर लिया है। और इस दृश्य की साक्षी आप यानी साहेब की हुकुम भी बन पाए इसलिए समर ने तुझे बुलाने उसे भेजा था। “

  पिया की प्रश्नवाचक दृष्टि देख निरमा हँसने लगी..

” गिरनार यानी रियासत का सबसे पुराना हाथी। वो इनके साहब यानी राजा जी का प्रिय हाथी  है। राजा जी के दसवें जन्मदिन पर ग्वालियर रियासत के राजा के यहाँ से तोहफे में आया था। राजा अजातशत्रु की शान कहलाता है गिरनार। और जब अपनी पूरी सजधज के साथ झूम झूम कर चलता है तो लगता है जैसे ऐरावत आ गया। “

” मतलब सफेद हाथी हैं? “

” हाँ सफेद हाथी हैं।

“तब तो मुझे भी देखना है। आप लोग भी तो वहीं जा रहें हैं ना? मैं भी साथ चलूं? “

पिया के सवाल पर निरमा और बाँसुरी दोनो ही मुस्कुरा उठी..

” बिल्कुल चलो। पर ये बताओ कि हमारी महारानी बाँसुरी चल सकती हैं या इन्हें आराम करने दिया जाए। “

” जी चल सकती हैं अब नींबू पानी के बाद इन्हें पहले से बेटर लग रहा होगा? “

हाँ में सर हिला कर बाँसुरी भी उठ बैठी।

तीनों वहाँ से मैदान की तरफ निकल गए…

तीनो साथ साथ चल रहे थे कि पिया के मोबाइल पर समर का मैसेज चला आया…

” कहाँ हो? “

समर का मैसेज पढ़ वो मुस्कुरा उठी..

” क्यों ?”

” ऐसे ही बस पूछ लिया? “

” काम पर हूँ।”

” ओके ! वैसे आज हुकुम का जनदर्शन था तो मैंने सोचा तुम्हे इनवाइट कर लूं। तुम भी हमारे राजा रानी को देख लो। “

” वो तो मैं दोनो से मिल भी चुकी हूँ। “

” वो अलग बात थी। आज दोनो अपने असली अवतार में हैं । और रियासत की सारी जनता आयी थी इसलिए मैंने सोचा तुम भी आ जाती..

हंसते हुए पिया ने अपनी लाइव लोकेशन समर को भेज दी…
   उसकी लाइव लोकेशन देख समर चौन्क गया

” तुम महल में हो ? तुम महल में क्या कर रही हो? “

” आपकी महारानी जी ने बुलवाया था। आप को तो अभी याद आया कि मुझे बुलाया जाए। “

” अरे नही यार। कल से थोड़ा ज्यादा ही बिज़ी था। अब चलो फटाफट आ जाओ। ऐसे मोबाइल पर घुसा हुआ मैं अच्छा नही लगता।”

” बस इसे ही कहते हैं सेल्फ ऑब्सेस्ड। मैं ऐसे में अच्छा लगता हूँ ऐसे में नही लगता। मैं इत्ता हैंडसम हूँ मैं इतना स्मार्ट हूँ। अरे कभी खुद को छोड़ दूसरों को भी तो देखिए।”

” आ जाओ तुम्हे देख लेता हूँ। “

” बस बातें बातें बातें करवा लो मंत्री जी से, पैसे थोड़े न लगने हैं आखिर? “

” हा हा हा!! चलो बस करो। इस बारे में बाद में बात करेंगे । अभी फटाफट पहुंचो। हुकुम जनता को सम्बोधित करने वाले हैं।”

मुस्कुरा कर फ़ोन रख पिया भी बाँसुरी के पीछे चल पड़ी।

  प्रेम जनदर्शन कार्यक्रम में पहले से ही था और अभी समर के बताने के बाद पूरी मुस्तैदी से अंदर आये सभी लोगों को देखने जांचने की कोशिश में लगा था। लेकिन इतने लोगो की भीड़भाड़ में खुद का चेहरा छिपाए कोई और भी था जो भीतर आ चुका था…

” कोई भी अपने चेहरे को ढाक कर नही रखेगा, सभी से निवेदन है कृपया चेहरे पर रखा गमछा या रुमाल हटा दें।”

  प्रेम की टीम के सदस्य भीड़ भाड़ से गुजरते हुए सभी से अपील करते जा रहे थे।

  मंच में ही एक तरफ महाराज और रानी माँ के लिए भी आसन थे। रानी माँ  शांति से बैठी कार्यक्रम की प्रतीक्षा कर रहीं थीं की उनका फ़ोन घनघना उठा…       फ़ोन पर आए नम्बर को देख उन्होंने अपने साथ बैठे महाराज को देखा और फ़ोन लिए एक ओर चली गयी…

” हम यहाँ इधर उधर ठोकरें खा रहे और आप मंच पर आसीन हैं ? आपको ज़रा सा भी नहीं लगता है ना हमारे लिए? “

” आप यहाँ कहाँ पहुंच गए? कहाँ हैं अभी आप?”

” बस ऐसी जगह हैं कि आप साफ नजर आ रही हैं? “

ठाकुर साहब की बात सुन रानी माँ इधर उधर देखने लगीं..

” ऐसे यहाँ वहाँ देख कर हमें नही ढूंढ पाएंगी आप? “

“”क्यों आये हैं आप यहाँ? “

” ओहो ऐसे तेवर? जैसे आप जानती नही की हम क्या चाहतें हैं और क्यों आएं हैं? “

” अब क्या चाहतें हैं आप ठाकुर साहब? “

” अब क्या चाहतें है तो आप ऐसे पूछ रहीं जैसे हमारी सारी चाहतें पूरी कर दी हों आपने। अब तक जो करते आये हैं हम अकेले ही तो करते आये हैं , आपको तो आपके बेटों के सिवा कुछ नज़र ही कहाँ आता है। अगर आपके बेटे हमारे बीच नही होते तो अब तक आप हमें भुला चुकी होतीं।”

” ये सब क्या फसाद लिए बैठे हैं आप ? अब तो ये सब भूल जाइए। अब जो जैसा है वैसा ही रहने दीजिए और हो सके तो सब कुछ भूल भाल कर यहाँ से वापस चले जाइये। वैसे भी किस चीज़ की कमी है आपको। एक रियासत ही होने से सब कुछ थोड़े न हो जाता है। धन दौलत रुतबा किस बात की कमी है।”

” अच्छा तो क्या सिर्फ धन दौलत रुतबे के लिए ही था ये जो था? “

“नही था। लेकिन अब तो सब भूल जाइए। उम्र के इस पड़ाव पर आकर हमें लगने लगा है कि ये सारी बातें कितनी गैरजरूरी थीं। ये बदला ये लालच इन सब की कोई ज़रूरत ही नही थी।”

” तुम्हें क्यों ज़रूरत होगी? तुम तो वैसे भी बड़ी रानी को मार कर गद्दी पर पहुंच ही गयीं फिर जब बच्चों का समय आया तब चाल चल कर विराज को गद्दी पर बैठा दिया लेकिन जब ये लगने लगा कि विराज गद्दी के लायक नही है और रियासत नही संभाल पाने के कारण कही जनद्रोह न तो जाए और तुम्हारे पास विराज को हटा कर उस अजताशत्रु को बैठाने के अलावा कोई चारा नही बचा तब बड़ी चालाकी से तुम उसके पाले में चली गयीं । इस डर से की कहीं राजा बनने के बाद वो तुमसे बदला लेने के लिए कहीं तुम्हे रियासत से निकाल न फेंके तुमने उसकी तरफदारी शुरू कर दी और साथ ही हमें रास्ते से हटाने के लिए अजातशत्रु की बीवी को भेज दिया।
   उसने जाने कौन  कौन से गड़े मुर्दे उखाड़ने शुरू कर दिए और हमारे किये हर कुकर्म का लेखा जोखा पोथी पत्रा तैयार कर हमारे मुहँ पर मार गयी।
   सब कार्यों के सबूत उसके पास हैं यहाँ तक कि उसके पति पर बनारस पर चलाईं जाने वाली गोली पर भी हमारा नाम लिख रखा है उस घमंडी एस डी एम ने. क्या नाम है उसका …”

” बाँसुरी ?”

” हाँ उसी बाँसुरी ने। अपने कद से ऊंचा काम कर गयी है वो भी आते ही। उस लड़की को पता नही है कि उसने किस पर हाथ डाला है, उससे तो ऐसा बदला लिया जाएगा कि उसकी सात पुश्तें कांपेगी। “

” अब उसके पीछे पड़ने से आपको क्या मिलेगा ठाकुर साहब। अब ये सब छोड़िए।

” हम इतनी आसानी से किसी को नही छोड़ने वाले। उस लड़की और अजातशत्रु को तो कभी नही। दोनो को ऐसी मौत मारेंगे की मौत भी घबरा जाएगी। बहुत घमंड है उस लड़की को अपने पति पर तो पहले उसका पति मरेगा और फिर वो भी तड़प तड़प कर जान दे देगी। हमारी तलवार हमारी बंदूक प्यासी है और इसकी प्यास बुझाना हमारा धर्म है। ”

” गलत कर रहे हैं आप। बल्कि हम कहते हैं आप सरेंडर कर दीजिये, अभी भी कुछ नही बिगड़ा है।”

“बिगड़ा आपका कुछ नही है रानी साहेब। आपके तो दोनो हाथो में लड्डू है। पहले आप हमारे साथ थीं क्योंकी आपको विराज को गद्दी पर बैठाना था अब आप अजताशत्रु के साथ हैं क्योंकि आपको अपना जीवन बचाना है। हद दर्जे की स्वार्थी औरत हैं आप। आप किसी की सगी नही हो सकती , कभी नही। ”

” ऐसा ही है तो आप हमें मार दीजिये। आपके बदले की आग शायद हमारे खून से ठंडी हो जाये। आपकी तलवार की आपकी बंदूक की प्यास बुझाने के लिए अगर हम ये कर सकते हैं तो हमें खुशी होगी।”


” अब असली खुशी तो हमें तभी होगी जब आपके खानदान का नामों निशान मिट जाएगा। और सबसे पहले मरेगा अजताशत्रु!
   लेकिन इतनी जल्दी नही। अभी तो हम आपके चेहरे पर फैली घबराहट को और देखना चाहते हैं। जाइये जा कर अपने पति के पास बैठ जाइए।
   पर जो भी हो रानी साहिबा आज भी आप भले ही अपने पति के साथ बैठीं हो पर मन में तो हम ही होंगे।

” आप कुमार को कुछ नही करेंगे। उस पर हमला नही करेंगे आप! आपको हमारी कसम।”

” अभी के अभी तोड़ दी आपकी कसम! अब हमें कोई फर्क नही पड़ता न आपकी कसम से और न आपसे।
  अब आप बैठ कर इंतज़ार कीजिये हमारी गोली को अजातशत्रु के सीने के आर पार जाते। भले ही हम पकड़े जाएं मारे जाए लेकिन आज अजताशत्रु को कोई नही बचा सकता। ”

  रानी माँ और कुछ कह पाती कि ठाकुर साहब ने फोन बंद कर दिया। रानी मां के दुबारा लगाने पर फोन बंद आने लगा, वो परेशान हाल वापस जाकर अपनी जगह पर बैठ गईं….

राजा अजताशत्रु का उद्बोधन शुरू होने वाला था उसके पहले राजा जी के मंत्री समर सिंह मंच पर एक ओर रखे माइक पर चले आये …

” मैं समर सिंह मंच पर आसीन सभी आदरणीय जनों और आप सभी गणमान्य नागरिकों  का अभिवादन करता हूँ।”

  समर के अभिवादन के साथ ही उत्साहित जनता ने करतल ध्वनि से सभा गुंजायमान कर दी।
   उसी समय समर के मोबाइल पर मैसेज बीप बजी..

” जंच रहें हैं मंत्री जी! पर कभी तो काली या सफेद के अलावा कोई और शर्ट पहन लिया कीजिये ।” 

पिया के भेजे मेसेज पर नज़र पड़ते ही समर मुस्कुरा उठा… मुस्कुराते हुए उसने अपनी बात आगे बढ़ाई…

” आप सभी की आंखें जिस प्रतीक्षा में थी आज आखिर आप सभी का वो चिरप्रतीक्षित दिन आ गया। आप सभी के प्रिय राजा हमारे राजा “राजा अजताशत्रु सिंह बुंदेला” आज वापस अपनी राजगद्दी पर बैठ चुके हैं….
    गद्दी पर बैठना और रियासत को संभालना राजा साहब के लिये अपनी संतति का पालन करने जैसा ही है। वो हमेशा से अपनी प्रजा के पालक ही रहें हैं। उनके यहाँ नही होने पर भी अपरोक्ष रूप से उन्होंने आप सभी का ध्यान रखा ही है, लेकिन अब धीरे धीरे सरकार हुकुम के कार्यो में उनका पूरा पूरा साथ देने में असमर्थता जता रही है। मनमाने ढंग से हुकुम की बनाई योजनाओं पर कोई क्रियान्वयन नही कर रही है।
  हुकुम ने गांव के एक ओर पशुभूमि योजना तैयार कर के प्रस्ताव भेजा था इसके अंतर्गत इधर उधर आवारा घूमते पशुओं के लिए रियासत में एक ओर चारागाह और पशुओं के दान पानी की व्यवस्था की जाएगी जिससे पशुओं पक्षियों को भी आहार मिल सके। पहले सरकार ने समर्थन किया लेकिन अब उसी ज़मीन के लिए रोड़ा लगा रही है। अब ऐसे में कुछ भी अकेले अपने दम पर करना मुश्किल हो जाता है। और ये तो सिर्फ एक योजना है ऐसे ही जाने कितनी योजनाएं है जो अब तक शासन के बक्से में बंद पड़ी रह गई।
   इसी सब निपटने के लिए हुकुम ने यह निर्णय लिया है कि वो अब चुनाव में भी उतरेंगे..

  समर के इतना कहते ही ज़ोर की हर्ष ध्वनि के साथ जनता ने जोरदार तालियां बजानी शुरू कर दीं।
  मुस्कुराते हुए समर ने पलट कर एक नज़र राजा की तरफ देखा वो भी बैठा मुस्कुरा रहा था।।

” आप सब से यही उम्मीद थी कि आज तक जितना प्यार आप लोगों ने अपने राजा जी को दिया है यही प्यार जब हमारे राजा जी मंत्री बन जाएंगे तब भी देते रहेंगे।”

  समर खुद ही अपनी ही बात पर धीमे से हँस कर राजा को माइक पर बुला कर एक तरफ हाथ बांधे खड़ा हो गया।

   राजा के माइक पर आते ही वापस ज़ोर की हर्षध्वनि शुरू हो गयी।
  राजा ने मुस्कुरा कर अपनी जनता को देखा और दोनो हाथ जोड़ दिए। एक बार फिर राजा अजातशत्रु की जयकारों से पूरा मैदान भर गया…

*******


   आदित्य मंच के दोनों तरफ बने सिक्योरिटी मचान पर खड़ा दूरबीन हाथ में लिए उस भीड़भाड़ में अपने मामा को ढूंढ रहा था।
   आज उसे अपना सारा बचपन अपनी आंखों के आगे से गुजरता दिख रहा था।
  उसकी मामी से उसे कभी कोई स्नेह नही मिला था। माता पिता का प्यार तो उसने कभी पाया ही नही लेकिन जब तक उसके नाना जीवित रहे उन्होंने उसे कभी कोई कमी नही होने दी।
   उसके नाना के घर की यही सबसे बड़ी समस्या थी कि परिवार तो बहुत बड़ा था लेकिन अपना कहने को वहाँ कोई न था।
उसकी माँ और मामा बस दो ही सगे भाई बहन थे.. उनमें भी माँ उसे जन्म देकर रहीं नही और मामा जी के मामी से कोई संतान नही हो पाई।
  नाना जी का लंबा चौड़ा परिवार ज़रूर था, उनके चार उनसे छोटे भाइयों का परिवार भी साथ ही रहता था लेकिन सभी अपने अपने स्वार्थों में लिप्त थे।
   नाना जी के चारों भाइयों  के भरे पूरे परिवार थे।  छोटी सी रियासत नुमा पैतृक संपत्ति के कारण घर पर होने वाले ढेरों विवाद के बावजूद सभी एक साथ ही थे।
   लेकिन ये साथ भी नाना जी के रहने तक ही था।
उसे आज भी याद है, बचपन में परिवार के किसी भी बच्चे से कोई भी गलती हो हर कोई उसे ही कूट जाया करता था एक नाना जी ही थे जो हमेशा आकर उसके बहते ऑंसू पोंछ दिया करते थे।
  उस वक्त तो वो बहुत छोटा था इसलिए उसे उस नफरत का कारण कभी समझ ही नही आया कि आखिर क्यों घर भर की औरतें उसे देखते ही मुहँ चढ़ा लिया करती थी,घर भर के मर्द उससे नौकरों सा व्यवहार करते थे और बच्चे उन्हें तो उनके अभिभावकों ने सख्त मनाही कर रखी थी उसके साथ उठने बैठने खेलने कूदने से।
  खाने के समय पर जब घर भर के बच्चों को साथ बैठाया जाता तब उसकी मामी उसकी थाली एक किनारे सबसे अलग लगा दिया करती। एक बार तो उसने ये बात नाना जी से अनजाने ही कह भी दी थी। उसमें मामी की शिकायत करना है ऐसा कुछ तो सोचा ही नही था लेकिन उसके बाद नाना जी से पड़ी डांट का बदला मामी ने उसकी चमड़ी उधेड़ कर ही लिया था।
  रात जब नाना जी के कमरे में सोते वक्त वो दर्द से कराह उठा तब नानाजी ने उसकी शर्ट ऊपर कर उसकी नाजुक सी पीठ पर उभर आये गुलाबी निशान देख लिए थे।
   इतने छोटे बच्चे को इतनी कड़ी और कठोर सजा देने वाली बहु को फिर उन्होंने अगले ही दिन आड़े हाथों लिया था। पर हाय री किस्मत !
    अगले दिन बहु को डांटते डपटते ही दिल का ऐसा ज़बरदस्त दौरा उन्हें पड़ा कि ईलाज के लिए अस्पताल गए नानाजी फिर कभी वापस लौट कर नही आ पाए।
    और इतने बड़े घर परिवार में वो एक बार फिर अकेला रह गया।
   उसे हमेशा से अपनी ज़बरदस्त याददाश्त से चिढ़ थी। बचपन की छोटी से छोटी याद भी उसके जहन में ऐसे बसी थी जैसे कल ही कि बात हो।
   एक बार किसी बात पर उसकी मामी ने उस पर हाथ उठा दिया था और उनके गुस्से को सहन करने की क्षमता चूक जाने के बाद वो खुद गुस्से में पैर पटकता वहाँ से चला गया था लेकिन उसकी आँखों से एक बूंद ऑंसू नही टपका था। वहीं बैठे मामा जी फिर उसके पीछे भागे चले आये थे और उसे मना ही लिया था। और उसी दिन के बाद से शायद उसके मामा जी ने उसके अंदर की सहनशीलता को परख लिया था और उसके अंदर के इंसान को पत्थर बनाने में कोई कोर कसर नही छोड़ी थी।
     उस छोटी सी घटना के बाद से मामा जी उसे अपने साथ ही रखने लगे थे, अपने साथ घुमाना फिराना और राजा अजातशत्रु की रियासत और उनके खानदान की बुराई गिनाना यही उनका काम रह गया था। पर इस सब में एक बात ये अच्छी हो गयी कि उन्होंने आदित्य को बदला लेने के काबिल बनाने के चक्कर में उसकी पढ़ाई लिखाई पर अतिरिक्त ही ध्यान देना शुरू कर दिया था।
   उसका दिमाग इतना तेज था कि मामा जी को कभी उसके लिए बहुत ज्यादा खर्च करने की ज़रूरत ही नही पड़ी। स्कॉलरशिप की सीढ़ियां चढ़ते उसने अपनी प्रतिभा के बल पर ही रियासत के राजकुमारों के लिए बने स्कूल में अपना स्थान बना लिया था।
  ये उसकी योग्यता ही थी कि एक एक कर सफलता की सीढ़ियां चढ़ता आज वो एक नामी बिज़नेस मैन बन चुका था।
वक्त कैसे करवट लेता है कोई उससे पूछता। वही घर परिवार के लोग, वही रिश्ते की मामियां जो पहले उसे देख नाक भौं सिकोड़ती थी अब उसके लंबे चौड़े कारोबार पर रीझ कर अपनी सखियों की बेटियों के रिश्तों का चुग्गा उसके लिए फेंकने लगी थी। अपने बच्चों को उससे दूर रखने वालियों के वही बच्चे आज उसी की फर्म में काम कर रहे थे।
    अपने अनचाहे से बचपन की तंग और कड़वी यादों ने ही तो उसे गज़ब का चिड़चिड़ा और सख्त मिज़ाज़ बना छोड़ा था ।
  मामा जी ने वाकई उसका जीवन नरक बनाने में कोई कसर नही छोड़ी थी।
   जब पहली बार उसके शिक्षक ने उसकी शिकायत की थी कि उसने अपने साथ पढ़ने वाले लड़के पर गुस्से में कुर्सी के हत्थे से वार किया तब मामा जी ने उसे डांटने की बजाय उन शिक्षक महोदय को ही आड़े हाथों ले लिया था।
   ऐसे ही एक बार किसी ने जब मामा जी को ये बता दिया कि वो स्कूल के बाहर दोस्तों के साथ छिप कर सिगरेट पी रहा था तब भी उसे डांटने के बजाय मामा जी ने बताने वाले को ही उल्टा डपट दिया था….

“राजपूती खून है, सिगरेट चिलम के छल्ले नही उड़ाएगा तो क्या धुनि रमायेगा मसान में? “

और शिकायत करने वाला उलटे पैरों वापस लौट गया था।
   मामा जी ने उसी शाम उसे वापस बुलाया और अपने साथ बैठा कर पिलाना शुरू कर दिया। क्या अगर उसके सगे पिता होते तो ऐसा करते। कभी नही।
माना कि उनके घरों में पीना पिलाना सामान्य बात होती है लेकिन उम्र का एक लिहाज तो होता ही है, और होना भी चाहिए।
   वो कितना भी तेज हो गुस्से वाला हो पर फिर भी सिर्फ दो दिन की मुलाकात में ही उसकी अजातशत्रु के सामने अब ग्लास पकड़ने की हिम्मत नही होगी।
   मामा जी ने तो उसे ऐसी लत लगवा दी की कुछ समय पहले तो उसकी तबियत भी बिगड़ने लगी थी। डॉक्टर ने कहा भी था कि अगर वो इसी तरह पीता रहा तो एक दिन उसका लिवर खराब हो जाएगा। पर उसे खुद की जान की फिक्र ही कहाँ थी। बल्कि आज के पहले उसे कभी न अपनी न किसी और कि जान की फिक्र थी लेकिन आज ….
    आज मामला बदल चुका था। आज तो उसकी भावनाये अजातशत्रु के लिए इस कदर परिवर्तित हो चुकी थीं कि वो उनके लिए अपने प्राण भी त्याग सकता था।
   बल्कि अब उसके अंदर ये भावना प्रबल होने लगी थी की आज तक उसके किये हर पाप का प्रायश्चित करने का यही मौका है कि राजा अजताशत्रु किसी तरह बच जाएं भले ही उनकी जगह उसे खुद को क्यों न मरना पड़े।
      उसके हाथ में वही गन थी जो कभी अजताशत्रु को मारने के लिए मामा जी ने ही उसे भेंट की थी। एक बार गन बाहर निकाल उसने हाथ में रख बड़ी ममता से उसे देखा और फिर वापस डाल लिया।
    भले ही किसी भी कारण से दी हो लेकिन इस गन की गोलियों पर कभी राजा अजताशत्रु का नाम नही लिखा जा सकता।
    भीड़ भाड़ से नज़र हटा कर उसने मंच पर सामने खड़े राजा जी पर नज़र डाली और आँखों को झपक कर वहीं से प्रणाम किया और वापस भीड़भाड़ की तरफ देखने लगा।
   गहरी नज़रों से एक एक चेहरे को टटोलते आखिर उसकी नज़र उस एक चेहरे पर जाकर अटक ही गयी, जिन्हें वो पूरी शिद्दत से ढूंढ रहा था।
   उन्हें देखते ही वो उसने तुरंत प्रेम को फ़ोन लगाया और उनकी जगह उसे बता कर खुद नीचे उतर चुपचाप उनकी तरफ बढ़ने लगा…
    दूसरी तरफ से प्रेम भी अपनी सिक्योरिटी के लोगों को बाकी तरफ से उन्हें घेरने भेज एक ओर से उनकी तरफ बढ़ने लगा…
   मंच पर सामने खड़ा राजा अपने दिल की बात अपनी रियासत से कह रहा था…..

  ” मैं राजा अजताशत्रु सिंह आप सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ। आप सभी के स्नेह के कारण ही मैं वापस आ पाया हूँ।
  ईश्वर का शुक्रगुजार हूं कि उसने मुझे हर उस चीज़ से बख्शा है जो मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ थी।
मेरा बचपन, मेरे अभिभावक, मेरी शिक्षा दीक्षा, मेरी कार्यस्थली हर जगह पर उसने मुझे वही दिया जो मेरे लिए  श्रेष्ठ था। इसके साथ ही एक सबसे बड़ा तोहफा जो उसने मुझे दिया है वो है मेरे रियासत की जनता…

  एक बार फिर उल्लसित जनता जयकार करने लगी..

” आप सब पर अटूट विश्वास होने से मैंने ये निर्णय लिया है कि मैं इस बार चुनाव लड़ूंगा। चुनाव में अब बहुत समय बाकी नही है। अभी तक नामांकन भी नही दिया क्योंकि मन के किसी कोने में एक शंका थी कि क्या मैं चुनाव लड़ कर जीत पाऊंगा। सच कहूं तो , अभी जो भी पार्टी शासन में है और जो विपक्ष में मुझे दोनो की ही तरफ से चुनाव नही लड़ना है।
  मैंने अपनी पार्टी बनाने का निर्णय लिया है। और इसके लिए मुझे आपमें से ही कुछ जुझारू कार्यकर्ता चाहिये जो पार्टी के लिए जी जान लगा दें। मुझे कुछ ऐसे लोग भी चाहिए जो जिन्हें टिकट देकर अलग अलग जगह से मैं खड़ा कर सकूं मेरे साथ लड़ने के लिए। एक तरह से आप ये समझ लीजिये की मैं बिना किसी राजनैतिक पार्टी की सहायता के पूरी तरह अपने कंधों और आपके भरोसे ये चुनाव लड़ना और जीतना चाहता हूँ…
    अभी चुनाव जीतना तो दूर की बात है सबसे पहले तो चुनाव लड़ना ज़रूरी है। क्या हम सब मिल कर चुनाव लड़ भी पाएंगे? क्या हम सभी में वो एकजुटता है वो ताकत है कि हम शासन के विरुद्ध खड़े होकर लड़ सकते हैं?
     क्योंकि एक बात तो तय है अगर हम एक बार भी शासन के विरुद्ध अपनी पार्टी बना कर खड़े हो गए उसके बाद कहीं हम हार गए तो …..

  राजा की बात बीच में ही रोक ज़ोर ज़ोर से जनता ने नारे लगाने शुरू कर दिये कि राजा अजातशत्रु का हार जाना असम्भव है।

  मुस्कुराते हुए राजा ने आगे कहना जारी रखा।

”  बच्चों के स्कूल के बाद महिला कॉलेज खोला था रियासत में। लेकिन मुझे हमेशा से यही लगता था कि रियासत और आस पास के गांव के बच्चों को अगर चिकित्सा विज्ञान पढ़ना है या इंजीनियरिंग करनी है तो बहुत दूर जाना पड़ता है पढ़ने के लिए। इसके अलावा और भी कई ऐसी शिक्षा शाखाएं हैं जिनके बारे में अपूर्ण ज्ञान होने से हमारी रियासत के बच्चे पढ़ नही पाते क्योंकि उन्हें मालूम ही नही होता कि ये भी शिक्षा का एक हिस्सा है। इन्ही सब समस्याओं पर बहुत समय से हमारा सबका विचार विमर्श चल रहा था। युवराज भाई साहब हमेशा से यही चाहते थे कि जैसा हमारी रियासत का हम राजकुमारों के लिए स्कूल बना है सर्व सुविधा युक्त वैसा ही एक विश्वविद्यालय यहाँ बनना चाहिए जहाँ सिर्फ हमारी रियासत के बच्चे ही नही बाहर के भी बच्चे आकर उचित फीस में शिक्षा पा सकें।
   विश्वविद्यालय का आधे से अधिक खर्च रियासत वहन करेगा और बाकी का विद्यार्थियों की फीस से किया जाएगा।
  कोशिश तो शुरू से यही है कि शासन की मंजूरी के साथ ही कुछ वित्तीय सहायता भी शासन की तरफ से मिल जाये। पर अगर नही भी मिल पाई तब भी रियासत इस विश्वविद्यालय को खोल कर रहेगी। मेरी तरफ से लगभग सारी तैयारियां की जा चुकी हैं। शासन का अप्रूवल मिलते ही मेरा यूनिवर्सिटी का सपना भी पूरा होने की राह पर चल पड़ेगा। यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग की अलग अलग ब्रांचेज़ के अलावा मेडिकल कॉलेज, कला संकाय और वाणिज्य कॉलेज भी होंगे।
   रियासत से बाहर शहर की ओर जाते समय हमारी ही रियासत की काफी लंबी चौड़ी ज़मीन है । इस जमीन पर कभी हमारे पूर्वजों ने एक नगर बसाने की सोची थी। लेकिन किन्ही कारणों से उनका वो सपना पूरा नही हो सका।
     पूर्वजों के देखे उस स्वप्न को पूरा करने की चाह मेरे पूज्य दादा साहेब के मन में भी थी और उन्होंने उस नगर का नाम भी चुन लिया था।
  उनके अनुसार उस नगर में किसी वस्तु की कमी नही होनी थी और इसके लिए उन्होंने तैयारी करवानी शुरू भी कर दी थीं। और इसलिए वो ज़मीन खाली तो है लेकिन उसमें बगीचे उद्यान और कुछ एक आधी अधूरी इमारतें तैयार हैं। दादा साहेब ने उस नगर का नाम तक रख लिया था — “मायानगरी”
    एक ऐसी नगरी जहां किसी को किसी चीज़ की कमी न हो।
   वर्तमान संदर्भ को देखते हुए मुझे युवराज भैया और महल के बाकी युवाओं यानी मेरे भाइयों को लगा कि नगर बसाने की जगह अगर हम उस वृहत नगरी में विश्वविद्यालय बसाएं तो बहुत से विद्यार्थियों का भला हो जाएगा।
     हम सब की चाहत ऐसी प्रबल थी कि शासन की सहायता मिले बिना ही हमने वहाँ का काम शुरू करवा भी दिया है।
  मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए साथ ही अस्पताल होना भी आवश्यक है। उसके लिए हमारा 50 बिस्तरों का अस्पताल पहले ही खुल चुका है।
  उसका निरीक्षण होने के बाद हमे चिकित्सा महाविद्यालय की अनुमति मिल चुकी है। इसलिए मायानगरी का एक बड़ा हिस्सा मेडिकल कॉलेज के लिए निर्धारित किया जा चुका है। वहाँ की इमारतें,लैब मोर्चरी लड़कों और लड़कियों के हॉस्टल बन कर तैयार हो चुके हैं।
   इंजीनियरिंग की अलग अलग फैकल्टी के लिए ऑडिटोरियम कक्षाएं लैब लड़को लड़कियों के हॉस्टल तैयार करने के साथ ही वहाँ के प्रोफ़ेसर लेक्चरर के रहने के लिए कॉलोनी भी डेवलप की जा चुकी है।
   कला संकाय, विज्ञान , वाणिज्य के लिए भी अलग अलग कक्षाएं स्टाफ रूम्स लाइब्रेरी लैबोरेट्री सभी कुछ पूरी तरह तैयार हो चुके हैं।
   सभी कॉलेज बिल्डिंग्स के बीचोंबीच सेंट्रल लाइब्रेरी है।
    उस पूरी मायानगरी को हम सब ने मिल कर शिक्षा का हब बनाने की तैयारी कर ली है।
   बहुत सी बातों के लिए शासन की स्वीकृति मिल भी चुकी है , कुछ एक चीजों की स्वीकृति मिलते ही एक महीने के अंदर यूनिवर्सिटी का शुभारंभ …..

    राजा की बात पूरी नही हो पाई थी कि सट की आवाज़ के साथ एक गोली उसके कान के पास से छूते हुए निकल गयी।
    गोली उसके माथे पर निशाना लगा कर साधी गयी थी लेकिन जब तक गोली उसका माथा फोड़ कर आगे बढ़ती, उससे तेज़ गति से रानी माँ ने आकर उसे एक ओर धक्का दे दिया, जिससे गोली कान के पास से होकर गुजर गई..
    लेकिन चलाने वाले ने एक के बाद एक लगातार तीन फायर किए।
  पहली भले ही राजा के कान के पास से गुज़र गयी लेकिन बाकी की दोनों गोलियाँ उसके सीने पर उतारने को निशाना साधा गया था।
    उन तीन गोलियों को चलाने वाले ने अगली गोली भी राजा पर साध रखी थी लेकिन तब तक में प्रेम ने उसे पकड़ कर उसका हाथ इतनी जोर से पकड़ कर मरोड़ा की वो दर्द से कराहता नीचे गिर पड़ा।
    उसकी गन उछल कर दूसरी ओर गिर पड़ी थी, जिन्हें सुरक्षा कर्मियों ने उठा लिया।
   घुटनों पर झुके ठाकुर साहब को अपने गन पॉइंट पर रखे प्रेम की आंखों में खून उतर आया था। वो गुस्से में वहीं शायद ठाकुर साहब को गोली मार चुका होता लेकिन इधर उधर फैले हाहाकार के बीच उसे बाँसुरी की चीख ‘साहेब ‘ सुनाई दी और वो ठाकुर को अपने आदमियों के हवाले कर तुरंत स्टेज की ओर भाग खड़ा हुआ।
    प्रेम के ठाकुर साहब के पास पहुंचते तक में आदित्य भी पहुंच चुका था। लेकिन इतनी तैयारियों के बाद भी आखिर वो लोग चूक ही गए और ठाकुर साहब की गन से गोली चल ही गयी…..

क्रमशः

aparna…..

  
   





 



   




  

जीवनसाथी – 101




   जीवनसाथी – 101



” चाँद पाने की ज़िद तो हर बच्चा कभी न कभी ज़रूर करता है पर चाँद हर किसी को नसीब हो ये ज़रूरी तो नही? ”

  शेखर के साथ बैठे आदमी ने उससे पूछ ही लिया” क्या हो गया कलेक्टर साहब ?

” कुछ नही बस ज़रा सा इश्क़ हो गया है। ” शेखर धीमे से अपनी बात कह मुस्कुराता रह गया। उसकी बात साफ न सुन पाने के कारण वो व्यति भी दूसरी तरफ देखने लगा…..

” और एक बात अभी हम कलेक्टर नही एडिशनल कलेक्टर के पद पर हैं। और इसके पहले पंचायत सचिव पे जॉइन किये थे”

  साथ बैठा व्यक्ति वापस शेखर को देखने लगा..

” जी जी कलेक्टर साहब मतलब ए डी एम साहब!”

  राजगद्दी पर बैठने के बाद राजपत्र पर हस्ताक्षर कर राजा एक बार फिर अपनी रियासत का घोषित सम्राट बन बैठा, अघोषित तो वो सदा से था।

   जनदर्शन कार्यक्रम के लिए बाहर लोगों का हुजूम लगने लगा था। राजा भी बाँसुरी को साथ लिए निकल पड़ा।
   मंच से नीचे उतर वो आगे बढ़ ही रहा था कि हड़बड़ाते हुए आदित्य चला आया…


” भैया आप से कुछ बात करनी थी, ज़रा पांच मिनट का समय हमें दे पाएंगे क्या आप? “

  आदित्य के चेहरे की घबराहट देख राजा के साथ बाँसुरी भी चौन्क गयी…

” क्या बात है आदित्य ? कुमार को आप क्यों रोक रहे हैं? क्या आपको नही मालूम कि राजतिलक के बाद ऐसे किसी शुभ कार्य के लिए जाते राजा को रोकना अपशकुन होता है?”

  रानी माँ की बात पर आदित्य ने उन्हें एक नज़र देख कर नज़रे फेर लीं…

” अपशकुन न हो इसलिए ही तो राजा साहब से बात करना ज़रूरी है। ”  मन ही मन सोच कर भी आदित्य कुछ नही बोल पाया लेकिन उसकी डरी सहमी सी दृष्टि ने राजा से बहुत कुछ कह दिया….

” ठीक है आदित्य! चलो पहले तुम्हारी बात ही सुन लेता हूँ।।”

  आदित्य ने आगे बढ़ कर राजा का हाथ थाम लिया…”भैया आपके ऑफ़िस चल सकते हैं क्या? “

  हां में सर हिला कर राजा ने समर की तरफ देखा, राजा का इशारा समझ समर ऑफिस खोलने आगे बढ़ गया। उसके पीछे तेज़ कदमों से राजा और आदित्य भी बढ़ गए….
       
ऑफिस में प्रवेश करते ही आदित्य ने झट दरवाज़ा बंद कर दिया…

” भैया हम आपसे ये कहना चाहते हैं कि आप आज जनदर्शन कार्यक्रम में  न जाये प्लीज़।”

” लेकिन क्यों आदित्य? ऐसी क्या बात है?”

राजा के पूछने पर आदित्य ने सिलसिलेवार सारी बातें उसे बता दीं। पहले उसे लगा छिपाने लायक बातें छिपा भी जाएगा लेकिन बोलने पर आया तो सब कुछ बोलता चला गया…

   सारी बातें सुनते बैठा राजा जितना दुखी और परेशान दिख रहा था उतना ही दुखी समर भी दिख रहा था …
    राजा ने चुपके से अपनी आंखों में आये ऑंसू पोंछ लिए….

” तो अब इस बात का यही उपाय है कि मैं जनदर्शन कार्यकर्म में न जाऊँ? पर ये बताओ कि क्या इस कार्यक्रम के बाद मुझे मारने की साज़िश नही होगी? वो तो होती ही रहेगी न तो अपने मरने के डर से क्या मैं अपनी रियासत के लोगों से दूर चला जाऊँ? क्या करना चाहिए मुझे?”

” हम तो यही कहेंगे भैया की आप आज बाहर मत जाइए , वैसे भी रानी माँ का इतना बड़ा सच पता चलने के बाद अभी आप सम्भल भी नही पाएं हैं।।इस अवस्था मे आपका बाहर जाना सही नही है। “

आदित्य की बात सुन समर उसके करीब चला आया, उसके कंधो पर हाथ रख वो उसके पास ही बैठ गया..

” आदित्य रानी माँ के बारे  और ठाकुर साहब के बारे में हुकुम सब जानतें हैं!”

” क्या ? सच ? “

  आदित्य एक बारगी चौन्क उठा। इतनी बड़ी बात की रानी माँ और ठाकुर साहब ने मिलकर इस रियासत को मिटाने में कोई कसर नही छोड़ी। यहाँ तक की राजा की माँ की मौत के पीछे भी वही कारण थी। उनके दोनो बेटों में भी खानदान का खून नही होने के बावजूद उन्हें गद्दी पर बैठाने की ज़िद उसके अलावा हमेशा राजा की जान पर मंडराते खतरे की ज़िम्मेदार औरत के बारे में सब जानकर भी कोई कैसे इतना सामान्य रह सकता है?

” राजा भैया क्या ये सच है? “

  आदित्य के सब्र का बांन्ध छलका जा रहा था। उसे किसी कीमत पर विश्वास नही था कि राजा सब जानता है। क्योंकि इतने बड़े षड्यंत्र को जानने के बाद तो कोई भी राजा हो ठाकुर साहब और रानी माँ को दीवारों में चुनवा चुका होता, गर्म तेल के खौलते कड़ाहे में उतार चुका होता।
   हे भगवान आखिर ये आदमी किस मिट्टी से बना है?

   आदित्य ने देखा राजा की आंखों में आंसू थे, उसने समर की ओर देखा, उसकी आंखें मानो प्रश्न कर रही थी कि क्या ऐसा सम्भव है?

  ” हाँ आदित्य , हुकुम वाकई सब जानतें हैं। पहले हुकुम को भी इस बारे में मालूमात नही थे, क्योंकि इसके पहले इन पर जितने भी हमले हुए थे वो सारे ऐसे थे कि किसी पर शक की गुंजाइश ना हो, लेकिन जब इन पर बनारस में हमला हुआ तब प्रेम और मैं ज़रा ज्यादा सचेत हो गए। रोहित से कह कर हमने हमलावरों की तलाश शुरू करवा दी और बस उसके बाद एक एक कर हर गुत्थी सुलझती चली गयी। हमलावरों से रोहित ने ठाकुर साहब का नाम उगलवा लिया और रेखा बाई सा से रानी माँ और ठाकुर साहब की दोस्ती का पता चल गया।
   ठाकुर साहब के पुराने कॉलेज के दोस्तों से और भी खुलासे होते गए।
  उसके बाद आई केसर!!
         केसर जिस ढंग से हुकुम के पीछे पड़ीं थीं उसकी जन्मपत्री निकलवाना हमारे लिए बहुत ज़रूरी हो गया था। एक बार मैंने प्रेम को केसर के घर और ऑफिस भेजा था, तब प्रेम ने केसर के पिता की ठाकुर साहब से होती बातचीत सुन ली, उनके फोटो भी लिए और जब मैं और प्रेम सब तरफ से पूरी तरह सबूत जुटा सके तब हिम्मत कर के हमने हुकुम से सब कुछ कह दिया। हुकुम को वक्त तो लगा लेकिन उन्होंने खुद को संभाल लिया। “

” तो मतलब भैया आपने इतने बड़े कसूर के लिए उन दोनों को माफ कर दिया? “

” किसने कहा मैंने माफ कर दिया? “

“तो फिर ये क्या है? आपने अब तक कुछ किया भी तो नही? “

“कैसे कह सकते हो कि मैंने कुछ नही किया?  ज़रूरी तो नही है कि किसी भी गलती की सज़ा तुरंत दे दी जाए। और ये भी ज़रूरी नही की सज़ा ऐसी हो जो सामने वाले को तुरंत तकलीफ दे जाए। मैं तो ऐसी सज़ा देने में यकीन करता हूँ कि सामने वाला खुद अपनी गलती समझ कर माफी मांग ले।”

“मैं समझा नही भैया? आप कहना क्या चाहते हैं? “

” रानी माँ का एकमात्र सपना यही तो था कि विराज गद्दी पर बैठे, बैठा दिया उसे गद्दी पर और सौंप दिया सारा राजपाट की संभालो।
   बाकी लोगों के साथ साथ विराज को खुद समझ आ गया कि वो कितना लायक है कितना नही। ”

  आदित्य सोचता बैठा रहा , की आगे समर ने बोलना शुरू किया…

” भाई हमारे हुकुम अलग हैं दुनिया से। मैं एक उदाहरण देकर समझाता हूँ, जैसे अगर एक इंसान ने दूसरे को मारा तो वो दूसरा उसको मार कर सज़ा दे लेता है या चुपचाप आगे बढ़ जाता है लेकिन हुकुम उस के साथ तब तक बने रहतें हैं जब तक वो मारने का कारण न जान लें। और उसके बाद भी मारने के कारण पर जब तक सामने वाले इंसान को गिल्ट न फील हो जाये हुकुम उसका सहारा बने खड़े रहतें हैं , और जब देख लेतें हैं कि सामने वाले के मन का सारा ज़हर निकल चुका तब चुपके से उसके सर के नीचे से अपना कंधा हटा लेते हैं।
    इनका सज़ा देने का स्टाइल ज़रा अलग है।”

” मेरी तो समझ से बाहर है कि आप कैसे इतना धैर्य रखें हैं। अगर कोई मुझे ऐसे धोखा दे तो मैं तो शायद उसका खून कर जाऊँ!”

” ठाकुर साहब ने तुम्हें भी तो धोखा दिया है पर तुम उन्हें कहाँ मार पाए अब तक? बोलो? “


” मारना तो चाहता ही हूँ। बस मौका नही मिला? “

” मारना तो मैं भी चाहता हूँ आदित्य , बस यही सोच लो मुझे भी मौका नही मिला। ”

राजा के मुहँ से ऐसा सुनते ही आदित्य एक बार फिर चौन्क गया….

” क्या सच में भैया? “

” हाँ आदित्य ! गुस्सा तो दोनो पर ही बहुत आया था मुझे भाई , लेकिन मेरे साथ ये समस्या है कि गुस्से में जैसे औरों का दिमाग काम करना बंद कर देता है मेरा ज़रा ज्यादा चलने लगता है। इसलिए मेरे निर्णय औरों से अलग हो जातें हैं।
     अब सुनो जैसे ही हम लोगों को केसर से ये पता चला कि किसी आदित्य ने मेरा नाम लेकर उसके साथ गलत किया वैसे ही समर और प्रेम उस आदित्य यानी तुम्हारी खोज में लग गए।
   हालांकि एक शक केसर पर यह भी हुआ कि हो सकता है वो अपने साथ हुई ज्यादती का ढोंग रच रही हो लेकिन फिर लगा कि अगर एक प्रतिशत भी उसकी बात में सच्चाई हुई तो तुम्हे  ढूंढना ज़रूरी हो जाएगा।
   तुम्हारी तलाश कर लेने के बाद तुम्हारे बारे में सच जानना था इसलिए मैं और प्रेम तुम्हारे ऑफिस में घुस गए और समर रह गया विराज के पास।
     मैं कभी सामने वाले का पूरा सच जाने बिना उसे सजा नही देता।
   तुम्हारे साथ काम करते हुए ये तो समझ में आ गया कि तुम बेहद गुस्से वाले थोड़े अकड़ू और घमंडी हो लेकिन ये भी समझ आ गया कि ये तुम्हारा असली स्वभाव नही है बल्कि अपने साथ हुई नाइंसाफियों ने तुम्हे दीन दुनिया से इतना उचाट कर दिया है कि तुम अपने चारों ओर एक खोल बनाये घूमते हो। जिससे दुनिया तुम्हारा असली चेहरा न देख पाए।
    और समझ आ गया कि न तुम गुस्सैल हो न अकड़ू और न घमंडी।
  अब बोलों अगर मैं केसर की बात मान कर सीधे तुम्हें सज़ा दे देता तो कैसे तुम्हारे भीतर का छिपा हुआ प्यारा छोटा भाई मुझे मिलता।
    असल में देखा जाए तो सज़ा तुम्हें मिल भी गयी। ज़िन्दगी भर तुम्हारे मामा ने जिस अजातशत्रु को मारने के लिए तुम्हारे अंदर ज़हर घोला आज तुम खुद मन प्राण से उसी अजताशत्रु का जीवन बचाने में लगे हो। ऊपरी तौर पर देखा जाए तो ये सज़ा ही है, लेकिन भाई मेरे तुम्हे मैं किसी सज़ा का हकदार नही मानता। जैसे ही मुझे और प्रेम को समझ में आया कि केसर की बातें भले ही सच हो पर तुमने उसके साथ ऐसा नही किया तब हम लोगों ने तुम्हारी सच्चाई तलाशी और सब समझ आ गया।
   तुम्हारे घर भी गए, जहाँ नौकरों के अलावा और कोई रिश्तेदार नही था। नौकरों में भी बाकी लोग तो काम कर फुर्सत हो जाते थे बस काका रह जाते थे उनसे बात कर महसूस हुआ कि तुमने उन्हें कभी नौकर समझा ही नही उल्टा हमेशा उनकी इज्जत करते रहे ।
   उनसे तुम्हारे जीवन के कई छुपे पहलुओं पर बात हुई और इसी तरह तुम्हारे बारे में और सब पता चलता गया।
   तुमसे भी जुड़े ठाकुर साहब ही निकले और इस तरह हमें पूरा यकीन हो गया कि हर एक मोहरे के पीछे चाल चलने वाला एक ही चेहरा है।
     रानी माँ की बात करूँ तो उन्हें  मैं कभी अपनी माँ की जगह दे ही नही पाया। मेरे लिए उनकी आंखों में मुझे प्यार कभी नही दिखा , बचपन से ही तिरस्कार और घृणा ही दिखी लेकिन मेरी माँ ने मुझे हमेशा सिखाया था कि बेटा घृणा का बदला घृणा से नही दिया जा सकता । बस माँ की वही एक बात मैंने हमेशा अपने मन में बांन्ध रखी थी और इसलिए मॉम की हर घृणा का बदला मैं प्रेम से देता गया।।
    जब रस्सी के बार बार आने जाने से पत्थर पर निशान पड़ जातें हैं तो वो तो आखिर एक औरत हैं एक माँ हैं, प्यार से कैसे अछूती रहतीं। और मैंने खुद महसूस किया कि धीरे ही सहीं लेकिन उनके स्वभाव में परिवर्तन दिखने शुरू हो गए।
    जब ठाकुर साहब ने बनारस पर मुझ पर गोली चलवानी चाही तब मॉम ने उन्हें साफ मना कर दिया था और कहा भी की वो किसी भी तरीके से विराज को गद्दी पर बैठाने की कोशिश करेंगी लेकिन मुझे कुछ नही होना चाहिए लेकिन ठाकुर साहब ने उनकी बात सुने बिना मुझ पर गोली चलवाई ।
     मेरे घर लौटने के बाद भी मेरे लिए चिंता उनका दिखावा नही था बल्कि उनका मन वाकई बदलने लगा था।
   उसके बाद मैंने जैसे ही बाँसुरी वाली बात रखी मॉम को मौका मिल गया ठाकुर साहब से किया वादा पूरा करने का।
  सच कहूं तो उस वक्त दिल से मैं भी यही चाहता था कि राजगद्दी छोड़ कर बाँसुरी को साथ लेकर कही निकल जाऊँ इस सारे झमेले से दूर। शांति से अपना जीवन गुजारने।
  लेकिन भगवान को ये मंज़ूर न था, और भगवान के साथ साथ मेरे शुभेच्छुओं को भी। दादी साहब बिल्कुल नही चाहती थी कि विराज गद्दी पर बैठे और उन्होंने ऐसे सब कुछ प्लान किया कि मुझे गद्दी पर बैठाना सब की मजबूरी सी हो गयी।
    गद्दी पर मेरे बैठते ही ठाकुर साहब वापस अपमान की आग में जलने लगे और मुझे कैसे हटायें यही सोचने लगे और तब उन्होंने मुझे दवाएं देना शुरू करवा दिया, हालांकि दवाओं के बारे में मुझे काफी समय तक कुछ पता नही था।
    और सच कहूं तो मुझे नही लगता कि मॉम को भी दवाओं के बारे में कुछ मालूम होगा, क्योंकि ठाकुर साहब ने अपने जिस डॉक्टर को अस्पताल में काम पर लगवाया था उसके लिए बस यही कहा था कि वो एक गरीब डॉक्टर है और उसका नौकरी में लगना बेहद ज़रूरी है और शायद इसलिए मॉम ने उसे नौकरी पर रखवा लिया होगा।”

“राजा भैया! माफ कीजियेगा लेकिन इतना सब रानी माँ के बारे में पता चलने पर भी आप अभी भी उन पर भरोसा किये बैठे हैं कि वो आपकी जान की दुश्मन नही हैं”

” आदित्य मेरी बात समझो । मेरा ये कहना है कि रानी माँ पहले और जो रही हों लेकिन धीरे धीरे ही सहीं वो बदल चुकी हैं और अब वो मेरी जान नही लेना चाहती। मैं जानता हूँ ठाकुर साहब के लिए आज भी मैं उनका सबसे बड़ा दुश्मन हूँ लेकिन मॉम के विचार बदल चुके हैं वरना उन दोनों के इतने झगड़े न होते।

“फिर भी भैया आपको नही लगता कि आपके पिता और इस रियासत को उन्होंने बहुत बड़ा धोखा दिया है और इस धोखे की कोई माफी नही है।”

” बात तो तुम्हारी सही है आदित्य लेकिन उन्हें भगवान ने इसकी पूरी सज़ा दे दी है। उनके दोनो बेटों में से कोई भी राजकाज संभालने लायक नही बन पाया जिस बात का सपना आंखों में पाले उन्होंने जाने कितने अपराधों से अपने हाथ रंग लिए लेकिन फायदा क्या ? वही सिफर।
   विराज को गद्दी पर बैठा कर ही मैंने दिखा दिया और विराट वो तो कभी भी इन सब के लिए तैयार ही नही हुआ।
    जो औरत ज़िन्दगी भर अपने बेटों के राजा बनने का सपना देखती रही उसके लिए इससे बड़ी कोई सज़ा नही हो सकती कि उसके दोनो ही लड़के निकम्मे निकले।
   अब रही बात ठाकुर साहब की ये वो इंसान हैं जिन्हें मैं अपने जीवन में कभी माफ नही कर सकता। इनके लिए चाहे मैं जितना सोच लूँ मेरे मन में माफी की कोई भावना कभी जन्म ले ही नही सकती।
    नीति भी कहती है कि हर एक व्यक्ति का मूल्यांकन एक सा नहीं किया जा सकता। व्यक्ति के व्यक्तित्व के आधार पर उसकी सजा मुकर्रर की जाती है और ठाकुर को उसकी सजा मैं खुद दूंगा।
    आखिर राजपूत हूँ जब तक मेरी तलवार दुश्मन के खून से रंगेगी नही तब तक मेरी पगड़ी का रंग सजेगा नही।

आदित्य ने आगे बढ़ कर राजा के पैर छू लिए , राजा ने आगे बढ़ उसे गले से लगा लिया।

” चलो अब जनदर्शन के लिए चलतें हैं। वैसे भी महल के मुख्य द्वार पर सिक्योरिटी का इंतज़ाम खुद प्रेम देख रहा है । उसे चकमा देकर अंदर दाखिल होना ठाकुर साहब के लिए एक तरह से असम्भव है। प्रेम की टीम पूरी तरह से वहाँ तैनात है, तो अब डर की कोई बात नही हमें चलना चाहिए वैसे भी समर और प्रेम के रहते राजा को मारना इतना आसान नही है और अब तो आदित्य भी आ गया है अपने बड़े भाई की रक्षा करने। “

” जी भैया!”

  आदित्य के चेहरे पर संतोष तो था फिर भी उसके मन से शंका का पूरा नाश नही हुआ था।
  वो समर और राजा के साथ जनदर्शन के लिए निकल गया।

   ऑफिस से बाहर निकलते ही दरवाज़े के ठीक बाहर प्रेम अपने चार आदमियों के साथ उन लोगों का ही रास्ता देख रहा था।
   उन तीनों के बाहर निकलते ही प्रेम और उसके लोगों ने राजा के चारों ओर सुरक्षा घेरा बना लिया। और राजा को उस सुरक्षा घेरे में लिए आगे बढ़ गए।
   समर और आदित्य उनके पीछे आने लगे, और उन दोनों के पीछे और आजू बाजू प्रेम की टीम के बाकी लोग आगे बढ़ गए।
   महल के बाहर जनदर्शन के लिए अस्थायी मंच बनाया गया था। लोगों का हुजूम उमड़ा पड़ा था, एक तरह से पूरी रियासत वहाँ मौजूद थी।
     महल के बाहर का ये वही मैदान था जहाँ हर साल दशहरा के अवसर पर जलसा रखा जाता था। इसलिए स्टेडियम की तरह अंडाकार आकृति में बने उस मैदान में लगभग दस हज़ार से अधिक लोगों के बैठने की सुविधा भी थी।
  उसमें एक तरफ काफी वृहदाकर मंच बना था लेकिन  उसकी जगह आज के जनदर्शन के लिए मैदान के बीचोबीच एक गोलाकार अस्थायी मंच बना दिया गया था।
  राजा अपने लाव लश्कर के साथ जब वहाँ पहुंचा तब तक महाराज रानी माँ युवराज भैया काका साहेब समर के पिता दीवान साहेब आदि महल के बड़े पहुंच चुके थे और अपनी जगह ले चुके थे।
  राजा के वहाँ पहुंचते ही एक बार फिर जयकारे लगने शुरू हो गए….

  राजा अजताशत्रु की जय हो!!
 
   हाथ में जिनके चमके तलवार
  शेर सा दिल है वो घोड़े पे सवार।।
  जिसका नही शत्रु कोई पैदा हुआ
  ऐसे अजातशत्रु की जयजयकार…
                    जयजयकार ……

  
     ******

   राजा जब समर और आदित्य के साथ निकला तब उसने जाते जाते बाँसुरी को जनदर्शन के लिए तैयार होने भेज दिया था
   राज तिलक के लिए बाँसुरी ने दादी साहब की इच्छा का मान रखते हुए उनकी पोशाक पहन रखी थी।
   दादी सा का कहना था जब उनके पति राजगद्दी पर बैठे तब रियासतों का दौर खत्म होने चला था और अंग्रेज और उनके बाद वाली हिंदुस्तानी सरकार का यही दबाव रहता था कि आप रियासत चलाने के योग्य नही हैं।
    तब उन सब की हेकड़ी दूर करने और अपना शक्ति प्रदर्शन करने उस समय महाराज ने अपने और अपनी महारानी के लिए बनारस और मदुरै से कारीगर बुलवा कर राजतिलक के कपड़े तैयार करवाये थे।
   शुद्ध बनारसी कपड़ो में मदुरै के कारीगरों ने खालिस सोने की ज़री का काम किया था।
   बेलबूटे सजाते काढ़ते नही नही में महारानी के लहंगे में तीन हज़ार तोला सोना गुंथा गया था। लगभग तीस किलो के उस लहंगे को संभाले महारानी ने अपने पति के राजतिलक में उनके माथे पर तिलक लगाया था। वही कुछ हाल महाराज का भी था।
    उनकी सफेद जूतियों पर भी असली सोने की जारी के साथ माणिक मुक्ता पटे पड़े थे।
  महाराज की शेरवानी और जूतियां तो दादी साहेब के कमरे में कांच की अलमीरा में टंगी आने जाने वालों को हतप्रभ कर जाती थी लेकिन उनका खुद का लहंगा उन्हें अति प्रिय था और वही लहंगा उन्होंने अपने सबसे लाड़ले पोते की पत्नी को भेंट स्वरूप दे दिया था।
   आज राजा के राजतिलक के दिन दादी साहब ने एक शाम  पहले उसे और राजा को बुलाकर बाँसुरी से यही निवेदन किया था कि वही लहंगा वो भी अपने पति के राजतिलक में पहने।
इसी से उस भारी लहंगे में सजी बाँसुरी को जनदर्शन में होने वाली असुविधा से बचाने राजा ने उसे कपड़े बदल कर आ जाने को कहा और आदित्य के साथ आगे निकल गया।

    सत्य तो यही था कि उस तीस किलो के भारी लहंगे में असी फंसी बाँसुरी भी चाह रही थी कि कुछ हल्का सा पहन लिया जाए।
   वो निरमा और अपनी सहायिका के साथ अंदर अपने कमरे में चली गयी।

  फटाफट लहंगा बदल उसने धानी रंग की शिफॉन की पोशाक पहन ली….

  ” चंपा सुनो मेरे और निरमा के लिए फटाफट चाय बना कर ले आओगी क्या? “

” जी हुकुम अभी लायी!”

  सहायिका के जाते ही कमरे का दरवाजा बंद कर बाँसुरी निरमा का हाथ थाम कर बैठ गयी…

” जाने क्यों नीरू आज बहुत घबराहट सी हो रही है? “

” क्यों बंसी? अब तो सब ठीक हो गया। राजा भैया वापस गद्दी पर बैठ गए, तू महारानी बन गयी। तेरे जीवन का तो ये मधुरतम क्षण होना चाहिए।”

” हाँ होना तो चाहिए और हैं भी। पर कल शाम से ही अजीब सी बेचैनी ने घेर रखा था, रात भर मैं ठीक से सो भी नही पायीं हूँ, और तुझे बताऊं सुबह सुबह ही ज़रा आंख लगी और सुबह सुबह ही मैंने बहुत बुरा सपना देख लिया ।”

” क्या देखा बंसी? बता दे, बता देने से सपना पूरा नही होता। “

” नीरू इतना बुरा सपना है कि मैं बता भी नही सकती। मैंने साहेब के बारे में देखा है और इतना बुरा की …

बाँसुरी कहते कहते रुक गयी..

” मैं समझ गयी। तुझे कुछ कहने की ज़रूरत नही है बंसी। मामी कहतीं हैं जिसके बारे में ऐसा देख लो उसकी सारी अला बला उतर जाती है और उसकी उम्र भी बढ़ जाती है। अब तू चिंता मत कर तेरे साहब की बला उतर गयी ,समझी! निश्चिन्त रह।

   निरमा से बात कर बाँसुरी को थोड़ा हल्का महसूस होने लगा, इतनी देर में सहायिका चाय भी ले आयी..

” राजतिलक होने तक मेरा उपवास था न इसलिए कुछ नही खाया था, इसलिये चाय की तलब सी लगने लगी थी।”

” अच्छा तो तिलक होने तक राजा रानी कुछ नही खाते हैं क्या? “

” राजा नही सिर्फ रानी नही खाती है। हमें व्रत करना होता है पति का राजतिलक होने के बाद ही हम खा सकतीं हैं। लेकिन साहेब को तो राजतिलक के पहले महल की सभी औरतें अपने हाथ से एक एक निवाला खिलाती हैं। खास माँ और भाभियां। तो आज साहेब को रूपा भाभी , जया भाभी, काकी माँ, पिंकी और फूफू साहेब ने अपने हाथों से फल और मिठाईयां खिलाई हैं।
     रानी माँ ने तो इनके लिए अपने हाथों से खीर भी बनाई थी। और सबसे अंत में इन्हें उन्होनें अपने हाथों से खीर खिलाई भी है। तो इनका तो पेट भरा  है। ”

  बाँसुरी की बात सुन निरमा ज़रा सोच मन पड़ गयी। उसे जब से यह बात मालूम चली थी कि बाँसुरी के दूध में दवा मिलाने वाली केसर थी लेकिन उसे भी रानी माँ का पूरा संरक्षण मिला हुआ था, तभी से वो जाने क्यों रानी साहब से मन ही मन ज़रा द्वेष रखने लगी थी।
   अब भी मालूम नही क्यों वो रानी माँ पर पूरी तरह यकीन नही कर पाती थी।
   
” बुरा मत मान जाना बंसी पर एक बात पूछ सकती हूँ?”

“कैसी बात कर रही है नीरू। ये भी कोई पूछने वाली बात है? बोल ना क्या सोच रही है?”

” तूने खीर पहले किसी से चखवाई थी या सीधे राजा भैया को खिला दी? “

  निरमा के सवाल पर बाँसुरी चौन्क कर निरमा को देखने लगी..
  उसे भी रानी माँ के बारे में कुछ थोड़ा बहुत आभास तो था लेकिन बावजूद उसके दिमाग मे एक बार भी ये क्यों नही आया कि खीर को एक बार किसी और को चखवाने के बाद ही राजा को खिलाने देना चाहिए था।

  बहुत ज्यादा तो नही लेकिन रानी माँ के बारे में इतना तो वो भी जानती थी कि वो विराज को गद्दी पर बैठाना चाहती थीं, और इसलिए तो इतना सब तामझाम हुआ। ये और बात है कि विराज खुद ही संभाल नही पाया और गद्दी छोड़ गया पर रानी माँ की तमन्ना तो यही थी आखिर।
  तो कहीं ऐसा तो नही की खीर में ज़हर मिला कर राजा को उन्होंने खिला दिया और …

  अपने मन में बातें गूंथती बाँसुरी सोच में डूबी खड़ी थी कि उसकी सहायिका बाहर से तेज़ कदमों से भागती चली आयी और ज़ोर ज़ोर से बाँसुरी को पुकारने लगी…

” महारानी हुकुम जल्दी चलिए, वहाँ राजा अजातशत्रु गिर  …”

   बाँसुरी सहायिका की बस इतनी ही बात सुन पायी और पहले से दिमाग में चलती उसकी उलझनो ने एक कहानी सी बुन ली, उसने मन ही मन सहायिका की बात को आधा ही सुन ये सोच लिया कि राजा अजातशत्रु गिर गए हैं और बस इतना सुनते ही बाँसुरी खुद बेहोश होकर गिर पड़ी….

क्रमशः


aparna ….

  

जीवनसाथी- 100




                    जीवन साथी –100


राजा और बांसुरी के साथ प्रेम और निरमा भी रियासत वापस आ चुके थे। इतने दिनों की वापसी के बाद कुछ दिन तो निरमा को घर की साफ सफाई करने में ही निकल गए।
     घर को एक बार फिर रहने लायक बनाने के बाद आज निरमा थोड़ी कम व्यस्त थी। निरमा और प्रेम भी खुश थे क्योंकि आज राजा का राजतिलक होना था। सुबह से सारी तैयारियां करने के बाद जब प्रेम रियासत के लिए निकलने वाला था तब निरमा  आरती सजाकर उसके सामने ले आई। प्रेम की आरती उतारने के बाद उसने थाली नीचे रखी और कटोरी में रखा दही प्रेम के सामने कर दिया… अपने मुहँ के सामने चम्मच देख प्रेम मुस्कुरा उठा…

  “यह क्या नया नया शुरू कर दिया?  यह सब तो पहले नहीं करती थी तुम ?”

” मैं नहीं करती थी तो क्या हुआ?  मुझे पता है तुम्हारी मां तुम्हारे पिता को हमेशा घर से निकलने से पहले दही खिलाया करती थी।
     कहते हैं किसी भी शुभ काम के लिए निकलो तो दही और चीनी खाकर निकलना चाहिए,  उस काम में सफलता मिलती है।”

” अच्छा तो यह बात है।  अपने भाई के सफलता के लिए अपने पति को दही चीनी खिलाई जा रही है? क्यों सही कहा न?”

” बिल्कुल राजा भैया की सफलता क्या हमारी सफलता नहीं है?  आखिर आज बाँसुरी और उनक़ी दोनों की तपस्या पूरी हुई।
     श्री राम ने त्रेता युग में 14 वर्ष का वनवास जिया था और इन दोनों ने कलयुग में जी लिया। ठीक है इन्हें सिर्फ दो तीन साल ही बाहर रहना पड़ा लेकिन वह दो तीन साल भी दोनों ने अलग-अलग रहकर तपस्या ही तो की है आज उनकी तपस्या सफल होने का दिन आया है।
    इसीलिए तो मैं इतनी खुश हूं अपनी सखी के लिए।”

” जब तुम इतनी खुश हो तो तुम भी साथ क्यों नहीं चलती? आखिर तुम्हारी सहेली बांसुरी भी तो आज रानी बनेगी.!

” तो क्या मैं भी चलूं साथ ?

” बिल्कुल!! मैंने कब मना किया है ? चलो।”

निरमा फटाफट कपड़े बदल कर तैयार होने चली गई मीठी को तैयार कर उसने अम्मा के हाथ में दिया और खुद प्रेम के साथ महल के लिए निकल गई ।

  महल में वो सबसे पहले बाँसुरी के पास ही पहुंची थी। बाँसुरी की सहायिकाएं उसे तैयार कर रहीं थीं कि अपने पीछे निरमा को खड़े देखा बाँसुरी खुशी से उससे लिपट गयी….

” अभी फुरसत मिली है तुझे? लो बोलो ये हैं मेरी पक्की सहेली!”

  बाँसुरी के बनावटी गुस्से पर मुस्कुराती निरमा ने अपने पर्स से एक छोटा सा बॉक्स निकाला और बाँसुरी को थमा दिया…

” इसमें क्या है निरमा? “

” गिफ्ट है तेरे लिए। खोल कर देख तो सहीं?”

  बाँसुरी ने बॉक्स खोला, उसके अंदर लाल पत्थर से सजी खूबसूरत सी सोने की अंगूठी थी..

” ये तो माणिक है ? ये तो वही माणिक है जो मैं और तू साथ लेने गए थे ना? तूने ये शायद प्रताप …

  आगे की बात बाँसुरी पूरी नही कह पायी, बोलते बोलते वो खुद ही रुक गयी….

” हाँ वही है। तूने पहचान लिया? “

” कैसे नही पहचानूँगी नीरू । तूने अपनी तीन महीने की जमापूंजी लगा दी थी इसमें। और इतनी चाव से खरीदी गई इतनी महंगी अंगूठी तू मुझे क्यों दे रही है?

  ” अंगूठी तो पहनने वाले के हाथ से महंगी सस्ती होती है बंसी। तेरे हाथों में शोभित होकर ये लाखों की अंगूठी अनमोल हो जाएगी।”

” चुप बकवास मत कर। चुपचाप अपने पास रखी रह, प्रताप की निशानी ही समझ कर रख ले। ”

” प्रताप की निशानी के लिए मुझे अब कुछ भी रखने की ज़रूरत नही है बंसी। उसके साथ जिया हर पल कीमती है मेरे लिए। लेकिन उसकी यादों से कहीं ज्यादा कीमती चीज़ वो मुझे देकर चला गया। अपना भाई !
     प्रेम जी के प्यार में अब ऐसी रंग चुकी हूँ बंसी की अब कोई भी पुरानी याद आंखों में आंसू नही लाती चेहरे पर मुस्कान ले आती है।
  शादी के बाद शुरुवाती दिनों में ज़रूर मैं प्रताप और उसकी यादों को जानबूझ कर अवॉयड करने की कोशिश करती थी, मुझे लगता था कहीं प्रेम जी को बुरा न लग जाये। लेकिन अब साथ रहते रहते समझ आ गया कि उनका प्यार जलन ईर्ष्या दुर्भाव इन बातों से कहीं ऊपर है।
   उन्होंने जितनी शिद्दत से मुझे प्यार किया और मेरे साथ बंधे रिश्ते को निभाया है मुझे उनकी इन्ही बातों से प्यार हो गया।
  शुरू शुरू में लगता भी था कि मैं कितनी अजीब औरत हूँ। पहले किसी और से प्यार किया फिर किसी और से किया!क्या किसी औरत को दो बार इतना सच्चा प्यार हो सकता है!
   फिर लगा हाँ हो सकता है। अगर आपका हमसफ़र प्रेम जी जैसा हो तो किसी को भी उनसे दुबारा प्यार हो सकता है।
   अब तो मेरे संकोच की रही सही बेड़ियां भी कट गयीं है। अब मैं इनके सामने ही प्रताप की फ़ोटो पर दिया भी जला लेती हूँ, मीठी के हाथ जुड़वा कर प्रार्थना भी कर लेती हूँ। क्योंकि जानती हूँ उनका प्यार इतना छोटा नही है, जो इन बातों से प्रभावित हो जाएगा। ये अंगूठी प्रेम जी को नही पहनाने का कारण उनकी राशि है।
   तू तो जानती है मैं इन पत्थरों माणिक मुक्ता पर कुछ ज्यादा ही भरोसा करती हूँ। इसलिए ये अंगूठी प्रेम जी को नही पहनाई क्योंकि उनकी राशि को माणिक सूट नही करता।
   लेकिन मेरी प्यारी सहेली तो सिहं राशि की शेरनी है माणिक पहन कर और तहलका मचाएगी इसलिए तेरे लिए ले आयी।
    तेरी पुरानी माणिक गुम भी तो हो गयी थी ना! “

” हाँ मेरी माँ ! गुम गयी थी और तू बिल्कुल मेरी माँ बनकर मुझे अंगूठियां पहनाती रहा कर। वैसे मैं तो इतना ज्यादा ये सब नही मानती पर तु कहती है तो ज़रूर पहन लुंगी।

” पहन लुंगी नही, तू अभी पहन लें। मैं दूध में रात भर भिगो कर सुबह सुबह सूर्य देव के सामने इस अंगूठी को धोकर सूर्य दर्शन करवा कर लायी हूँ। आज अच्छा दिन है, ईश्वर करे तेरे रास्ते की हर रुकावट भगवान साफ करते चलें। राजा भैया के साथ तू सदा सदा खुश रहे।”

” बस कर , इतना आशीर्वाद देगी तो मैं झुक कर कहीं तेरे पैर न छू लूँ। ला तू ही पहना दे। “

निरमा ने मखमली डिब्बे से अंगूठी निकाली और बाँसुरी की उंगली में पहना दी। उसी वक्त सहायिका उन दोनों के लिए शर्बत लेकर आ रही थी, की सामने से आती दूसरी सेविका को देख नही पायी और दोनो की टक्कर में ट्रे हाथ से छूट गयी। कांच के गिलास कांच की ट्रे के साथ ज़ोर की आवाज़ करते चकनाचूर हो गए।

   बाँसुरी और निरमा दोनो ही चौन्क कर उधर देखने लगीं। राज्याभिषेक के लिए दोनो को निकलना था कि दरवाज़े पर ही कांच टूट कर बिखर गया। उसी वक्त दोनो को साथ  लेने आए रूपा भी दरवाज़े पर ठिठक गयी….

“चलिए आप दोनो हमारे साथ। हम आप लोगो को लेने ही आये थे। और ये कांच के टूटने से परेशान मत होना। कोई बला थी सर पर बाँसुरी  जो कांच टूट कर बिखर गई। अब कोई भय कोई चिंता नही है। कांच टूटना तो अच्छा माना जाता है ऐसा हमारी दादी साहेब कहतीं थीं।”

  निरमा ने आगे बढ़ कर रूपा के पैर छू लिए….

” सदा सौभाग्यवती रहिये आप निरमा!”

  बाँसुरी और निरमा को साथ लिए रूपा भी राज्याभिषेक के लिए निकल गयी।
    दीवान खाने में राजा उन्ही लोगो का इंतेज़ार कर रहा था। वहाँ राजा के पास बाँसुरी को छोड़ रूपा निरमा के साथ आगे बढ़ गयी।
   और राजा बाँसुरी का हाथ थामे उनके पीछे चल पड़ा।
   
   
**********
    


     जहाँ महल के एक हिस्से में राजा का राजतिलक हो रहा था, पंडितो के आशीर्वचनों की अमृतवर्षा से वो सिक्त हो रहा था वहीं दूसरी ओर आदित्य केसर की बातें सुन सुन कर बौखलाता जा रहा था।
    उसे यकीन नही हो रहा था कि इतने बड़े महलों में रहने वाले लोगों के दिल इतने छोटे हैं कि सिर्फ सत्ता के लोभ में वो ऐसी जालसाजियां करते जा रहें हैं।

   ” केसर जो तुम कह रही हो क्या ये झूठ नही हो सकता? “

” नही आदित्य ! हमारी कही एक एक बात सच है। युवराज और अजातशत्रु की माँ साहेब के बीमार पड़ जाने के बाद हर चीज़ पर छोटी रानी का हक होने लगा। महल के अंत:पुर की हर छोटी बड़ी बात का निर्णय उनके हाथों में पहुंच गया।
   उनकी देवरानी यानी पिंकी की माँ को सब कुछ समझ में तो आता ही था लेकिन वो बेचारी अपनी उधड़ी गृहस्थी की तुरपन में ही लगी रहतीं थीं। उनका जीवन भी सुखमय न रहे इसके लिए भी इन लोगों ने चाल चली।
   तुम्हारी माँ की दूसरी शादी हो चुकी है, और वो तुम्हारे पिता को भूल चुकी हैं ऐसा बता कर पहले तुम्हारे पिता को गुमराह किया। वो अपनी उदासी में गुम थे कि उन्हें उनके बड़े भाई ने विदेश भेज दिया। इसी सब के बीच तुम पैदा हुए।
    तुम्हारे पैदा होने के आसपास ही राजा साहब ने तुम्हारे पिता की शादी तय की और उन्हें विदेश से वापस बुलवा कर उनकी शादी कर दी।
   लेकिन उन्होंने पहली रात ही अपनी पत्नी को तुम्हारी माँ और तुम्हारे बारे में सब बता दिया। उन दोनों की गृहस्थी शुरू होने से पहले ही चटक जाती लेकिन रो धोकर अपना गुस्सा और नाराज़गी उतार लेने के बाद पिंकी की माँ अपने मायके चली गयी। जब उनकी नाराज़गी कुछ कम हुई तब वो वापस चली आयी और तुम्हारे पिता से तुम्हें वापस ले आने की गुज़ारिश की। तब तक तुम्हारे पिता ठाकुर साहब से एक बार मिल कर आ चुके थे। ठाकुर साहब ने उनकी मिन्नतों को नकारते हुए उन्हें तुम्हे देने से इनकार कर दिया था।
   पर पत्नी के कहने पर और उनका सहयोग पा कर वो एक बार फिर ठाकुर साहब के पास पहुंच गए, लेकिन इस बार फिर ठाकुर साहब ने बहुत से गणमान्य लोगों के सामने उनकी खूब बेइज़्ज़ती की और उन्हें धक्के मार कर निकाल दिया।
    इस सब का परिणाम यह हुआ कि अपनी बेइज़्ज़ती और तुम्हारी माँ और तुम्हें भुलाने वो शराब में डूबते चले गये ।

   पिंकी की माँ ने उन्हें संभालने की कोशिश भी की लेकिन छोटी रानी सा कोई न कोई नया पैंतरा चल कर पिंकी की माँ को ऐसे व्यस्त रखती की वो अपने पति पर ही ध्यान नही दे पाती, और इधर तुम्हारे पिता के पास अपना ऐसा खास आदमी नियुक्त कर दिया जो उन्हें पैग पर पैग बना कर उन्हें बुरी तरह शराब में डुबोएं रखता।
     इसी सब के बीच तुम्हारा पालन तुम्हारे नाना घर में होता रहा, और उधर पिंकी का भी जन्म हो गया।
    तुम्हारे दूसरे जन्मदिन पर महल से बहुत से तोहफे भेजे गये , तुम्हारे पिता तुम्हे भूल नही पा रहे थे, और वो सुकून से रह सकें इसलिए उनकी पत्नी भी तुम्हें वापस पाना चाहती थीं, लेकिन ठाकुर साहब ने तोहफे लेकर जाने वाले आदमी का सर काट कर तोहफों के साथ वापस भेज दिया।
    राजा साहब को जैसे ही ये बात पता चली उनका खून खौलने लगा। वो नाराज़गी से अपने भाई को डांटने डपटने जाने ही वाले थे कि बड़ी रानी ने उन्हें रोकने का प्रयास किया।
    इसी सब प्रयास और बतकही में बात बिगड़ने लगी। बात बिगड़ने के साथ ही बड़ी रानी की तबियत भी बिगड़ने लगी , लेकिन उनकी बिगड़ती तबियत पर बिना ध्यान दिए राज साहब अपने छोटे भाई के कमरे में पहुंच गए, उस दिन पहली बार छोटे भाई ने भी अपने बड़े भाई को पलट कर जवाब दिया और परिणाम हुआ कि दोनों के बीच ज़ोरदार झगड़ा हो गया।
   कहासुनी आगे बढ़ती जा रही थी कि रनिवास से खबर आई कि बड़ी रानी की तबियत बहुत बिगड़ गयी है। जब तक बाकी लोग वहाँ पहुंचे बड़ी रानी का स्वर्गवास हो चुका था।
     राजा साहब टूट पाते कि उन्हें संभालने के लिए छोटी रानी आगे बढ़ गयी। वक्ति तौर पर राज साहब जज़्बाती हो रहे थे,भावुक थे, उन्हें रानी साहब के जाने के बाद अपनो की ज़रूरत थी और उसी वक्त छोटी रानी ने लगाई बुझाई कर उनके छोटे भाई के खिलाफ राजा साहब के और कान भर दिए। परिणाम यह हुआ कि बड़ी रानी की तेरहवीं निपटने के अगले दिन बिना किसी से कुछ कहे सुने राजा साहब के छोटे भाई अपनी पत्नी और नन्ही सी बेटी को साथ लिए विदेश चले गए।
   अब छोटी रानी का रास्ता साफ था। बड़ी रानी मर चुकी थी, राजा साहब के छोटे भाई का परिवार वहाँ से जा चुका था अब उन्होंने अपना निशाना साधा राजा साहब पर।
     उनके एक पुराने डॉक्टर मित्र की सलाह पर राजा साहब को भी उन्होंने कुछ दवा खिलानी शुरू कर दी जिसके कारण अब राजा साहब का स्वास्थ्य नरम गरम रहने लगा।
   और इसी के साथ सिलसिला शुरू हुआ राजकुमार अजातशत्रु पर हमलों का।
    अब तक राजा साहब के बेटे बड़े हो चुके थे । कुछ शारीरिक त्रुटि और कुंडली दोष के कारण युवराज का गद्दी पर बैठना असम्भव था इसी लिए छोटी रानी के निशाने पर अब अजातशत्रु था।
    उनका पूरा लक्ष्य यही था कि किसी तरह राजा साहब बीमार होकर गुजर जाएं और ठाकुर साहब उनकी जगह गद्दी पर बैठ जाएं लेकिन वक्त बीतने के साथ शायद छोटी रानी के मन के भाव बदलने लगे।
    इसके साथ ही उम्र भी कुछ ढलने लगी थी और साथ ही इतने सालों का वैवाहिक जीवन राजा साहब के साथ बिता लेने के बाद अब शायद उनके मन में राजा साहब को मारने का विचार बदलने लगा था । और इसी सब में राजा साहब को दी जाने वाली दवाएं उन्होंने बंद कर दी।
   उस वक्त उनका और ठाकुर साहब का बहुत बड़ा झगड़ा भी हुआ। लेकिन फिर दोनो के बीच एक अनदेखा सा समझौता हो गया कि गद्दी पर ठाकुर साहब न भी बैठे तो उनका पुत्र यानी विराज तो बैठ ही सकता है।
   और बस विराज के गद्दी पर बैठने के लिए ये सारा चक्रव्यूह रचा गया।
  कभी पागल घोड़े की सवारी अजातशत्रु से करवा दी गयी कभी सलाना जलसे में उस पर भाले और तीरों से वार हुआ। कभी दोस्तो के साथ कि पिकनिक में उसकी गाड़ी के ब्रेक फेल किये गए कभी बनारस के घाट पर उन पर गोलियां चलाई गई लेकिन कहा जाता है ना जाको राखे साइया मार सके न कोई। वैसे ही अजातशत्रु भी हर कठिनाई से जूझता बचता चला गया।
   तब ठाकुर ने अगली और सबसे खतरनाक चाल चली। अपने एक परिचित डॉक्टर का अपॉइंटमेंट रानी साहब की सहायता से उनके अस्पताल में करवा लिया और अजातशत्रु को गलत दवाएं देने लगा।
   लेकिन अजताशत्रु को भी बनाने वाले ने कुछ अजब ही बनाया है, जिन दवाओं के छै महीने लगातार प्रयोग से याददाश्त कमजोर होकर दिमाग धीरे धीरे काम करना बंद कर देता है और आदमी पैरालाइज हो जाता है उन्हीं दवाओं को अजातशत्रु एक साल से अधिक समय से ले रहें थे और अब तक उन पर उसका असर नही हुआ….
     ऐसा लगता है जैसे अजातशत्रु को बनाने वाली मिट्टी में अमृत घोल दिया है उस ऊपर वाले ने। “

    केसर की बातें सुनते आदित्य को पता भी नही चला कि कब उस जैसा पत्थर दिल इंसान इतना कमज़ोर पड गया कि उसकी आंखों से ऑंसू बहने लगे।
    अपने आंसू पोंछ वो बस इतना ही कह सका….

” भैया को भगवान हर बुरी नज़र से बचाये। “

” भैया ? तुम अजातशत्रु को भैया कब से कहने लगे? खैर जवाब बाद में देना। अभी मेरी पूरी बात सुनो। ठाकुर साहब यहाँ से फरार होकर वहीं महल पहुंचने वाले हैं।
   उन्हें वहाँ का एक एक कार्यक्रम पता है, वहाँ शायद कोई कार्यक्रम होना तय है ? “

” हाँ भैया का राजतिलक होना है। ”

“हां तो उसके बाद शायद राज अजातशत्रु जनदर्शन के लिए बाहर जाने वाले हैं , और उसी समय ठाकुर साहब उन पर गोली चलाने वाले हैं।

“क्या? लेकिन क्यों ? “

” इतनी बातें सुनने के बाद भी अभी भी तुम्हारे पास क्यों बचा ही है। एक तो ठाकुर साहब शुरू से चाहते थे कि उनका बेटा विराज गद्दी पर बैठे लेकिन अब जब विराज ने खुद इनकार कर दिया तब अजातशत्रु को मारने के अलावा और क्या चारा बचा। बताओ आखिर  अब अजातशत्रु के मरने पर ही विराज या विराट गद्दी पर बैठ सकते हैं।
   दूसरी बात अजातशत्रु की पत्नी बाँसुरी ने उनके सारे काले कारनामे सबूत सहित खंगाल लिए और सारा सब पुलिस के हवाले कर दिया ,अब इस बात से वो और ज्यादा चिढ़ बैठे। अब तो वो दोनो से ही बदला लेना चाहतें हैं।
    उनका मुख्य उद्देश्य एक ही है कि किसी तरह उनके बेटों में से कोई राजा बन जाये।”

” एक बात बताओ अगर विराज उनका बेटा है तो रेखा कौन है? हमारा मतलब वो किसकी बेटी है? “

” रेखा उनके मुनीम की बेटी थी। ठाकुर साहब की पत्नी जब शादी के काफ़ी सालों में भी माँ नही बन पायीं तब उन्होंने बच्चा गोद लेना चाहा , उस वक्त ठाकुर साहब ने तुम्हें गोद लेने की बात भी रखी। लेकिन ठकुराइन चाहती थी कि उनके गोद लेने वाली बात किसी को मालूम न हो तब घर पर सबसे यह कह कर की वो माँ बनने वाली हैं और उनकी अच्छी तबियत के लिए उनका पहाड़ों पर रहना माफिक होगा, ठाकुर साहब उन्हें लेकर दून चले आये।यहीं उस वक्त उनके मुनीम की पत्नी भी गर्भवती थी। उनके एक संतान पहले ही थी, और ये दूसरी संतान वे पहले अपने बिगड़े स्वास्थ्य के कारण नही चाहती थी लेकिन ठाकुर साहब की पत्नी और वो दोनो अच्छी सखियां थी इसलिए वो ठाकुर साहब की पत्नी को अपना दूसरा बच्चा देने को तैयार हो गईं।
     उनके पहले ही से एक बेटी थी, अगली संतान शायद बेटा हो इसी आस में उन्हें दूसरी संतान चाहिए थी और जब दूसरी के वक्त ठकुरानी ने बच्चे को मांग लिया तो उन्हें भी एक संतोष सा हुआ कि उनकी संतान जो भी हो एक अच्छे घर मे पल बढ़ जाएगा।
   अगली संतान रेखा के रूप में पैदा हुई और उसे ठाकुर साहब और ठकुरानी ने अपनी संतान बना कर ही सबके सामने प्रस्तुत किया।
  ठाकुर साहब की पत्नी ठाकुर साहब के  बच्चों विराज और विराट के बारे में नही जानती थी। उन्होंने बड़े लाड़ प्यार से रेखा को पाला पोसा, यहाँ तक कि अट्ठारह की होने के बाद भी उसे उसके असली माता पिता के बारे में नही बताया।
   ठाकुर साहब के कारनामो के बारे में उनका मुनीम सब कुछ जानता था, उन्हें लगा  कहीं वो अपना मुहँ न खोल दे इसलिए एक बार उनकी गाड़ी का भी एक्सीडेंट करवा दिया , जिसमे मुनीम की पत्नी यानी रेखा की माँ मारी गयी और मुनीम जी हमेशा के लिए अपाहिज हो गए । “

” तुम इतना सब कैसे जानती हो?”

” क्योंकि उन मुनीम की बड़ी लड़की यानी रेखा की बड़ी बहन हम ही हैं।”

” क्या ? “

” हां ! रेखा हमसे सिर्फ चार साल छोटी है।हम इतने छोटे थे कि हमें मालूम ही नही चला की कब हमारी बहन ठाकुर साहब की बेटी बन गयी। उसके बाद ठाकुर साहब रेखा को साथ लेकर अपने घर चले गए।उनके मुनीम यानी हमारे पिता भी उनके साथ ही काम करते थे।
   पहले पहले सब अच्छा था। फिर धीरे धीरे ठाकुर साहब के कारनामे एक एक कर हमारे पिता की नज़रों में आने लगे तब उन्होंने कई बार ठाकुर साहब को समझने की कोशिश की लेकिन वो कुछ समझना ही नही चाहते थे।
तब तक हम और रेखा भी कुछ बड़े हो गए थे। और तभी एक बार किसी विवाद के बाद जब पिता जी माँ के साथ कहीं बाहर गए थे तब लौटते में उनकी गाड़ी का एक्सीडेंट हुआ और बस पिता जी बचे।
    तब हम यही कोई सोलह सत्रह साल के थे। उस वक्त ठाकुर साहब ने ऐसे दिखाया जैसे उनसे बड़ा हमारा शुभचिंतक कोई नही है और हमारा एडमिशन राजा साहब के राजसी स्कूल में करवा दिया, और हमारे पिता को एक जमी जमाई कंपनी का मालिक बना कर राजा साहब की रियासत में भेज दिया और फिर जैसे बचपन से तुम्हारे दिमाग मे ज़हर भरते रहे, हमारे दिमाग मे भी बहुत कुछ भर दिया।।
   हमारे पिता का अच्छे से अच्छा ट्रीटमेंट करवाने के लिए उन्हें विदेश भेजा और एक बार फिर हमारे पिता अपने पैरों पर खड़े हो सके। उन्हें उस वक्त ठाकुर साहब की चालें नही समझ आयी और वो अपनी कंपनी और उसकी डील के लिए राजा साहब और अजातशत्रु से उलझ पड़े। असलियत में वो नही जानते थे कि उन सारी डील्स से फायदा सिर्फ ठाकुर साहब का था, उनका कोई फायदा उसमे था ही नही।
   तब तक हम भी बड़े और समझदार हो चुके थे। अजातशत्रु अपने पिता का बिजनेस देखने के साथ ही रियासत के काम भी देखने लगे थे। उन्होंने हमारे पिता की सारी डील्स कैंसल कर दी और हमारे सरकारी टेंडरों पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया।
       इस सब मे पिता जी की तबियत और बिगड़ी और हमे लगा उनकी तबियत बिगड़ने के पीछे अजातशत्रु का हाथ है।
   उसके बाद हम पर कुछ आदमियों ने हमला किया। उनमें से किसी ने बिल्कुल अजातशत्रु की आवज़ में हमसे कुछ कहा , हमें एक बार फिर धोखा हुआ कि हमारे साथ गलत करने वाला अजातशत्रु ही है।
   हमें हर बार अजातशत्रु के खिलाफ ठाकुर साहब ही भड़काते रहे। हम उन्हें अपना सबसे भरोसेमंद करीबी माना करते थे पर हमें नही पता था कि हमारे साथ हुए सारे काम उन्हीं के कारण हुए हैं।
     उन्होंने हमारे अंदर अजातशत्रु से बदला लेने की ऐसी चिंगारी जलाई की हम खुद आग हो गए।
    हमारे दिल दिमाग पर ऐसी पट्टी बंधी की उससे बदले की आग में जलते हम कुछ भी सोचने लगे। हमें लगा अगर उसकी पत्नी को हम बीमार कर दें तो वो दुखी होगा। जब बच्चे के लिए उसकी बीवी तरसेगी तब वो दुखी होगा। जब तिल तिल उसकी बीवी घुल घुल कर तड़प तडप कर उसके सामने मरेगी तब वो दुखी होगा ।
   पर हाय री हमारी किस्मत!
  उससे बदला लेने हम उसके महल में घुसे और उसे बदले के रंग में  रंगने से पहले हम उसके रंग में रंग गए।
    उसकी संगत में रह कर ही जाना कि इंसान क्या होतें हैं।
   उसकी संगत में रह कर जाना कि भगवान क्या होतें हैं।

” तुमने बहुत कुछ सहा है केसर। पर अब और नही सहन करना होगा।तुम हमारा इंतज़ार करना, हम तुम्हें लेने ज़रूर आएंगे। अभी फिलहाल हम बाहर जा रहें हैं। शंख ध्वनि सुनाई दे रही है इसका मतलब ये है कि भैया का राजतिलक हो चुका है और वो जनदर्शन को जाने ही वाले होंगे। हमे उनके महल से निकलने के पहले ही वहाँ पहुंचना होगा जिससे हम उन्हें बचा सकें।
  केसर हम वापस लौट कर तुम्हें फ़ोन करते हैं…

” ठीक है आदित्य ,हम इंतेज़ार करेंगे। “

“और सुनो केसर एक बात और कहनी थी।

” हाँ कहो। “

” प्लीज़ मरना मत! हम आएंगे तुम्हे लेने।”

   दूसरी तरफ से कोई आवाज़ नही आई। पर आदित्य ने महसूस किया कि केसर ने एक गहरी सांस ली है।

  आदित्य ने फोन बंद कर जेब के हवाले किया और तुरंत आगे बढ़ गया।

********

     राजतिलक सम्पन्न होते ही ग्यारह पंडितो ने एक साथ शंख बजाना शुरू कर दिया।
   राजा अपनी जगह पर खड़ा हो गया। उसे राजधर्म की शपथ लेनी थी।
  अपनी जगह से थोड़ा आगे बढ़ कर उसने अपनी शपथ वहाँ बैठे सभी अतिथियों और राजमहल के रहवासियों के समक्ष दुहराई और महाराज और रानी माँ से आशीर्वाद लेने आगे बढ़ गया। उनके बाद काका साहब और युवराज भैया का आशीर्वाद लेने के बाद वहीं एक ओर बैठी महल की औरतों की तरफ राजा बढ़ गया। रूपा के चरणों में झुक कर आशीर्वाद लेने के बाद उसने अपना हाथ बाँसुरी की तरफ बढ़ा दिया।
बांसुरी चौन्क कर इधर उधर देखने लगी। रूपा ने मुस्कुरा कर बाँसुरी को खड़े होने कहा और धीमे से बाँसुरी खड़ी हो गयी।
    बाँसुरी का हाथ थामे राजा उसे अपनी गद्दी तक ले आया….

” इस राजगद्दी का अधिकारी अकेला मैं नही हूँ। अगर मुझे ये गद्दी संभालनी है तो मैं अपने पूरे व्यक्तित्व के साथ अपने पूरे चरित्र के साथ इस गद्दी पर बैठूंगा। और जैसा कि यहाँ उपस्थित आप सभी जानतें है कि बाँसुरी मेरी वामा यानी वामांग है मेरी अर्धांगिनी है तो अपने आधे हिस्से को खुद से दूर रख कर मैं कैसे सम्पूर्ण रूप से इसमें बैठ पाऊंगा।
   मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व इन्हीं के साथ है तो अब से बाँसुरी आप मेरे साथ यहाँ बैठेगी। ”

  बाँसुरी आश्चर्य से आंखें फाड़े कभी राजा को तो कभी रानी माँ को देख रही थी। युवराज भैया की तरफ देखने पर उन्होंने भी बाँसुरी को वहाँ बैठने का इशारा किया, और उनका इशारा पाते ही वो राजा के साथ उसकी राजगद्दी पर बैठ गयी।

   दोनो के एक साथ राजगद्दी पर बैठते ही दोनो के नाम का जयकारा लगने लगा…
    राजा अजातशत्रु की जय हो!!
     रानी बाँसुरी अजातशत्रु की जय हो!!

और इसके साथ ही अंग्रेज़ो के समय की प्रथा को निभाते हुए वहाँ बैठे सभी अतिथियो ने एक साथ तीन बार तालियां बजायी और तालियों के थमते ही वीणा की तान पर महल की राजकीय धुन बजने लगी।

  सामने अतिथियों में बैठा शेखर उस प्यारी सी राजसी जोड़ी को देखता मन ही मन सोचता रह गया…

” चाँद पाने की ज़िद तो हर बच्चा कभी न कभी ज़रूर करता है पर चाँद हर किसी को नसीब हो ये ज़रूरी तो नही? ”

  शेखर के साथ बैठे आदमी ने उससे पूछ ही लिया” क्या हो गया कलेक्टर साहब ?

” कुछ नही बस ज़रा सा इश्क़ हो गया है। ” शेखर धीमे से अपनी बात कह मुस्कुराता रह गया। उसकी बात साफ न सुन पाने के कारण वो व्यक्ति भी दूसरी तरफ देखने लगा…..


क्रमशः


aparna ……


 
  

जीवनसाथी – 99




   जीवनसाथी — 99


    

        महल पूजा पाठ में लगा हुआ था। पूजा का आज अंतिम दिन था। इक्यावन पंडित जाप में लगे थे । जाप सम्पन्न होने के बाद हवन होना था। हवन समाप्ति के बाद होने वाले प्रसाद वितरण के लिए पूरी रियासत की जनता को निमंत्रण दिया गया था।
   पांच दिन की पूजा पाठ सम्पन्न होने जा रही थी, और अगले दिन राजा का राजयाभिषेक होना था। ये पांच कठिन दिन जो पंडित जी के अनुसार अगर निकल गए तो काफी हद तक राजा की कुंडली सुरक्षित थी लगभग निकल चुके थे।
    महाराज और रानी माँ ने बाहर किसी को भी कुंडली और उसकी पूजा के बारे में नही बताया था, यहाँ तक कि राजा को भी यही लग रहा था कि पूजा पाठ का कारण राज्याभिषेक ही है।

   पूजा समाप्ति की ओर थी कि समर  भी तेज कदमों से पूजा स्थल पर चला आया।
    पूजा में महाराज और रानी माँ के साथ ही राजा और बाँसुरी भी थे। समर ने आते ही राजा के कान में कुछ कहा और राजा का चेहरा खिल उठा…
    पिछले दस दिन से सुध बुध खो चुकी दादी साहेब को होश आ गया था….

    महाराज और रानी माँ भी यह सुन आश्चर्य मिश्रित खुशी से खिल उठे ।
   समर राजा से कुछ देर बात करने के बाद उठने लगा तो पंडित जी ने उसे रोक उसके हाथ में हल्दी से पीले किये चावलों के साथ फूल दिए और हवन के शुरू होने पर सींचने कह दिया,समर का बाहर कुछ काम बाकी था, वो बस दादी साहेब के बारे में बताने आया था। उसने चुपचाप चावल हाथ में रख लिए, उसी वक्त उसका फ़ोन खनखनाने लगा।

   एक हाथ मे चावल लिए दूसरे हाथ से उसने फ़ोन उठाया, फ़ोन पिया का था…
   समर ने पंडित जी की ओर देख बाहर जाने की इजाज़त मांगी और उनके हाँ में सर हिलाते ही वो वहाँ प्रणाम कर बाहर निकल गया।

   ऑफ़िस में दादी साहेब की रिपोर्ट्स के साथ पिया के हाथ में कुछ और कागज़ भी थे।
   समर के आते ही उसने वो कागज़ उसकी ओर बढ़ा दिए। समर हाथ मे रखे चावल कहाँ रखूं यही सोच रहा था कि पिया ने हाथ बढ़ा दिया, उसके हाथों में चावल रख समर ने उसी के दुपट्टे से हाथ पोंछे और वो कागज़ खोल देखने लगा….

” मेरा सफेद दुपट्टा पीला कर दिया..”

  मुस्कुरा कर उसे देखते समर ने हाँ में सर हिला दिया..

” मुझे दे दो, तुम्हारे दुपट्टे को भी खूब सारे रंगों से रंग दूंगा, फिर इस सफेद कुर्ते के साथ रंगीन दुपट्टा ओढ़ा करना। “

  पिया मुस्कुरा कर रह गयी.. ” आखिर उस दिन का बदला ले ही लिया मंत्री जी!
  मंत्री जी आपको याद है उस दिन हम अस्पताल गए थे उस डॉक्टर की खबर लेने। उसने  आपके डर से कहिये या अपने कन्फेशन के लिए कहिये पर उसने हुकुम को दी जाने वाली गलत दवाओं के बारे में सारी जानकारी बना कर मुझे मेल कर दी।
  मैं वही सब हार्ड कॉपी में निकाल लाइ हूँ, इसके अलावा उन डॉक्टर साहब को अब इतना बुरा लग रहा था कि वो पुलिस के सामने समर्पण को भी तैयार हैं। लेकिन अगर वो पुलिस के सामने जातें हैं तब उनका केस मेडिकल काउंसिल तक चला जायेगा और उसके बाद मेडिकल काउंसिल क्या एक्शन लेती है ये नही कहा जा सकता। हो सकता है इनकी डिग्री और लाइसेंस रद्द कर दिए जाएं।
  इसलिए मैंने उन्हें अभी रुकने और आपसे मिलने कहा है।
  तो अगर आप फ्री हैं तो हम उन से मिल लेते हैं। वो बेचारे बहुत ज़्यादा डिप्रेशन में आ गए हैं। कहीं कुछ गलत कदम न उठा लें।

  समर ने फौरन उन कागज़ों को समेट कर अपने पास रखा और पिया के साथ उन डॉक्टर साहब से मिलने निकल गया।


  ********


    केसर को अस्पताल ले जाने के बाद से उसकी हालत में कुछ सुधार दिखने लगा था, लेकिन अब तक उसकी बात आदित्य से नही हो पाई थी। 
   बात करने में वो अभी भी कुछ थकान सी महसूस कर रही थी, लेकिन जो बात उसे मालूम चली थी, उसे वो जल्दी से जल्दी अदित्य को बताना चाहती थी। क्योंकि केसर से जितनी देर होती जाती राजा के लिए खतरा उतना ही बढ़ता जा रहा था।

    लेकिन अस्पताल में मौजूद डॉक्टर और नर्सेज की निगरानी में केसर का फ़ोन भी उससे छीन लिया गया था।

   रात के दूसरे पहर जब पूरा अस्पताल थक कर सोया पड़ा था, किसी तरह केसर ने अपने तकिए के नीचे से छिपा कर रखा मोबाइल निकाल लिया।
   सुबह आदित्य के आदमियों में से एक से उसने चुपचाप अपना मोबाइल मंगवा कर छिपा लिया था। उसने फ़ोन करने के लिए आदित्य का नंबर लगाया ही था कि दो रिंग जाने के बाद ही मोबाइल बंद हो गया। पिछले तीन चार दिनों से मोबाइल उसी के कमरे में एक अलमीरा में बेजान सा पड़ा था, जब उपयोग ही नही हो रहा था तो चार्ज करने की कौन सोचता?
   खीझ कर केसर ने मोबाइल वापस छिपाया और सोने की कोशिश करने लगी। हालांकि उसके दिमाग मे अब भी यही सब चल रहा था कि कल किसी तरह उसे आदित्य से बात करनी ही पड़ेगी….

  *******

    पूजा समाप्त होते ही राजा बाँसुरी, महाराज और रानी माँ के साथ दादी साहब का आशीर्वाद लेने चल पड़े।
     प्रसाद वितरण के लिए भले ही रियासत की सारी जनता को बुलाया गया था लेकिन राजा के लिए चिंतित महाराज ने उसका जनदर्शन का कार्यक्रम आज की जगह कल पर टाल दिया था।
   पंडित जी के अनुसार भी पांच दिन अधिक कष्टदायी थे , हालांकि ऐसा नही था कि उसके बाद राजा पूरी तरह सुरक्षित था लेकिन इन पांच दिनों की अपेक्षा नुकसान कम होने की संभावना थी।

   दादी साहब उन सभी को एक साथ देख मुस्कुरा उठी…

” हमें जिला( जीवित ) ही दिया कुमार आपने ! सिर्फ आपके बच्चे को देखने का मोह था जो हम संसार से विरक्त हो जा नही पाए। यमराज ने प्रयास पूरे किए लेकिन हमारी लालच की डोर आप दोनो से ऐसी बंधी है कि हम वहाँ पहुंच कर भी वापस चले आये।”

“आप को कुछ नही होगा दादी साहेब, अभी आपको शतक पार करना है।”

   राजा ने हंसते हुए उनके दोनो हाथ पकड़े और उनके पास ही बैठ गया।
    उसे पास बुला कर उसके माथे को चूम कर दादी साहेब रानी माँ को देखने लगी…

” कल किस वक्त का मुहूर्त है रज्याभिषेक का? हम भी कुमार को टीका लगाना चाहतें हैं!”

  ” सुबह नौ बजे कर तीस मिनट का मुहूर्त है माँ साहेब। लेकिन आप इस अवस्था में वहाँ कैसे जा पाएंगी? “

” कोई बात नही मॉम, दादी साहब वहाँ नही आ पाएंगी तो मैं यहाँ आ जाऊंगा। ”

  दादी साहेब एक बार फिर मुस्कुरा उठी…

” कुमार हमें सच में तुम्हारे राजकुमार को देखने का बहुत मन है। हम देखना चाहतें हैं कि वो अपने पिता पर जाता है या अपनी माँ पर ..”

  पास खड़ी बाँसुरी शरमा कर दूसरी तरफ देखने लगी…

आज महल में खाने की टेबल पर सभी खुश नजर आ रहे थे, एक तो अगले दिन महल का चिरप्रतीक्षित दिन था राजा का दुबारा  रज्याभिषेक होना था और दूसरा सही समय पर दादी साहब भी ठीक हो गईं थीं।
   
     सभी के चेहरों पर उल्लास भरा स्मित था, रूपा भाभी और जया बाँसुरी और रेखा के साथ चुहल करने में लगी थी, जिसमें पिंकी भी उनका पूरा सहयोग कर रही थी।
   रेखा का बेटा बाँसुरी की ही गोद में था,बाँसुरी अपनी प्लेट से उसे भी खिलाती जा रही थी। उसे देख पिंकी का बेटा भी आदित्य के पास जाने की ज़िद करने लगा, पिंकी ने दो एक बार उसे समझाने की कोशिश की लेकिन बच्चे की ज़िद के आगे जब उसकी न चली तो उसने बच्चे को ज़ोर से डपट दिया।
   राजा रतन युवराज को सब समझ आ रहा था लेकिन सभी पिंकी के स्वभाव से परिचित थे।।
रतन और राजा को पता था कि जितनी तेजी से पिंकी का गुस्सा उबाल मारता था उतनी ही तेज़ी से शांत भी हो जाता था, इसी से सब उसके सामान्य होने का इंतज़ार कर रहे थे।
   आदित्य के दिमाग मे अलग ही कुछ चल रहा था, इसलिए वो अपनी परेशानी में गुम न पिंकी की तरफ ध्यान दे पा रहा था और न उसके बच्चे की तरफ।

   अगली सुबह महल के लिए खास थी।
सूर्योदय नई उमंगों, नई योजनाओं और नए हौसलों के साथ हुआ था।।
   यूँ लग रहा था महल की सुबह होली और रात दीवाली की हो गयी हो जैसे। और सिर्फ महल ही क्यों सारी रियासत में रंग बिखरे पड़े थे। लोगों में अजब उत्साह नज़र आ रहा था। दादी साहेब के ठीक होने से कार्यक्रम एकदम से बदल गया था। जो कार्यक्रम सादा सा होने वाला था अब परिवर्तित हो गया था एक चमकीले कार्यक्रम में।
    महल में होने वाले सारे कार्यक्रम का सीधा प्रसारण बाहर जनता के लिए दिखाया जाने वाला था।
और राज्याभिषेक होने के बाद राजा का जनदर्शन कार्यक्रम था।
    सभी अतिथि महल के सभागार में पहुंच चुके थे। यही वो जगह थी जहाँ आज भी पुराने राजे महाराजों के समय की तरह ही शाही गद्दियाँ, ऊंचे ऊंचे झाड़फानूस , पैर धंसते कालीन बिछे पड़े थे। राजगद्दी के दोनों और दो सिपाही खड़े थे।
   राजगद्दी के एक ओर महाराज और रानी माँ के बैठने के लिए आसन थे , दूसरी तरफ युवराज और काका साहेब की जगहें थीं।
   उसके साथ ही सभागार में दोनों ओर महल के बाकी सदस्य और सम्मानित अतिथि विराजित हो चुके थे।
    राजा और बाँसुरी भी अपने निर्धारित समय पर धीमे कदमो से सभागार में प्रवेश कर गए। उनके सामने सेविकाएं फूल बिछाती चल रही थीं।
    दोनो के मंच पर पहुंचते ही करतल ध्वनि के साथ उनका स्वागत होते ही रानी माँ ने आगे बढ़ कर राजा का हाथ थाम लिया और उसे राजगद्दी तक ले चली। बाँसुरी भी उनके पीछे से सीढ़ियां चढ़ ऊपर चली गयी, एक ओर खड़ी रेखा रूपा और जया के साथ वो भी खड़ी हो गयी।
     पंडितों ने मंत्रोच्चाण शुरू किया और औपचारिक रूप से राजा का राज्याभिषेक शुरू हो गया।
    सभी वहीं थे खुश थे। आदित्य भी मुस्कुराता खड़ा सब कुछ देख रहा था कि उसके फ़ोन पर रिंग होने लगी।
      ऐसे कार्यक्रम से उठ कर चले जाना अच्छा नही लगता ये सोच कर उसने धीमे से फ़ोन को देखा, कोई अनजाना नम्बर था। वो बंद हो चुके नम्बर को पहचानने की कोशिश कर रहा था कि वापस उसी नम्बर से कॉल आना शुरू हो गया, इस बार बिना इधर उधर देखे आदित्य तुरंत फोन उठाये बाहर निकल गया…

   फ़ोन केसर का ही था….

” आदित्य सुनो , पहले हमारी पूरी बात सुन लेना, उसके बाद ही कुछ बोलना या पूछना! हमारे पास वक्त बहुत कम है। यहाँ हमसे हमारा फ़ोन छीन लिया गया है, हमें तो लगता है ये लोग भी ठाकुर साहब के ही लोग है,वो तो तुम्हारे आदमियों के डर से हमे कुछ कर नही पा रहे लेकिन हमें ऐसा लगता है जल्दी ही ये लोग हमें ज़हर देकर मार डालेंगे। अभी भी जाने कैसी दवाएं देते हैं कि हमें सारा दिन नींद आती रहती है, जिससे हम तुम्हे क्या किसी को भी ठाकुर साहब की सच्चाई न बता पाए।
   एक दिन तुम्हारे ही एक आदमी को बताने की कोशिश भी की लेकिन ज़बान ऐसी लड़खड़ाने लगी कि हम क्या बोल रहे थे न हम समझ पा रहे थे न वो।
  जाने कैसी दवाये हैं। हम ये नही कह रहे कि सारे डॉक्टर वैसे हैं लेकिन कुछ एक पर तो हमे पूरा संदेह है।
   अच्छा अब वो बात सुनो जो बेहद ज़रूरी है। ठाकुर साहब के ऊपर जब बाँसुरी ने ढेर सारे चार्जेस लगा कर उन्हें अरेस्ट करवाना चाहा तब वो वहाँ से भाग खड़े हुए।
    वहाँ से फरार होने से पहले वो किसी से फ़ोन पर बात कर रहे थे ….. जो हमने छिप कर सुन ली थी।
हम चुपचाप वहाँ से निकलने वाले थे कि उन्होंने हमें देख लिया और हमारे पीछे अपने गुंडे छोड़ दिये।
   हम भाग कर किसी ऐसी जगह छिप जाना चाहते थे जहाँ से तुम्हे सब कुछ सच सच बता सकें।
    तुम तो जानते हो हमारे भी दादा सा का घर वही तुम्हारे मामा के घर से कुछ दूरी पर ही है, लेकिन हम वहाँ भी नही जा सकते थे।
    पर इत्तेफाक से दादा सा की गाड़ी हमारे पास थी , हम उसी में वहाँ से निकल गए। लेकिन ठाकुर साहब के गुंडे हमारा पीछा करते रहे। पहाड़ों पर वैसे भी गाड़ी चलाना कम सरदर्द नही है उस पर वो लोग ट्रक और जीप दोनो से हमारा पीछा कर रहे थे। किसी तरह हम अपनी गाड़ी भगाते रहे और आखिर एक मोड़ पर उन लोगों की गाड़ी ने हमें टक्कर मार ही दी।
    हमारी गाड़ी लुढ़कते हुए खाई मे गिरने लगी। तब ऊपर खड़े उन लोगों ने निशाना साध कर हम पर गोलियाँ भी चला दी।
    उन्हें लगा इतनी ऊंचाई से हमारे गिरने से हमारी जान चली ही गयी होगी, और वो लोग लौट गए।”

  अब तक सारी बातें सुनते आदित्य का सब्र का बांन्ध छलक उठा…

” तुमने बात क्या सुनी थी केसर ?”

” हाँ हम बता रहें हैं आदित्य! हम जब छिप कर सुनने की कोशिश कर रहे थे तब ठाकुर साहब अजातशत्रु के  महल के किसी सदस्य से बात कर रहे थे – उन्होंने कहा अगर मेरा बेटा गद्दी पर नही बैठा तो मैं उस पूरी रियासत को उजाड़ दूंगा। उस खानदान का कोई इंसान ज़िंदा नही बचेगा। न वो राजा अजातशत्रु , न उसका बड़ा भाई युवराज और न उन लोगो की बहन भुवनमोहिनी ।
    मैं उस घमंडी महाराज और उसके छोटे भाई को भी चिता पर चढ़ा कर ही मानूंगा। अगर इतना सब करने के बाद भी मेरा बेटा गद्दी पर नही बैठ पाया तो क्या मतलब हमारे इतना करने का। “

” मामा जी ओह्ह यानी ठाकुर साहब का बेटा है कौन ? “


” विराज ! असल में विराज उनका दामाद नही बल्कि बेटा है , रेखा उनकी बेटी नही है। और ये बात विराज और रेखा दोनो ही नही जानते। “

” ये क्या बकवास है? “

“बकवास नही आदित्य यही असली सच्चाई है। उस रियासत के पीछे चलने वाले हर षड्यंत्र का कारण यही है बस । और इस सारे षड्यंत्र में ठाकुर साहब की सहभागी है वहाँ की रानी माँ।
  वहाँ उस दिन की ठाकुर साहब की बातें सुनने के बाद हमें काफी कुछ समझ आ गया था लेकिन हम वहाँ से भागते तब तक में उनके एक आदमी ने हमें पकड़ लिया और ठाकुर साहब के सामने ले गया और तब उन्होंने अपने मुहँ से हमें सब कुछ कह सुनाया। सब सुनाने के बाद वो हँसने लगे कि अब हमें मार देंगे तो ये सारे राज़ भी हमारे साथ दफन हो जाएंगे लेकिन उनके गन हम पर तान कर चलाने से पहले ही हम उन्हें ज़ोर का धक्का देकर वहाँ से भाग गए।
   उनकी ये कहानी शुरू होती है जब राजा अजातशत्रु के पिता और ठाकुर साहब कॉलेज में पढ़ते थे। कॉलेज के अंतिम वर्ष में राजा साहब का विवाह एक नामी रियासत की राजकुमारी से उनके पिता ने तय कर दिया। उस समय राजा साहब की रियासत डगमगाने लगी थी और उनके पिता को इसी बात की चिंता थी कि ऐसा ही रहा तो रियासत का मोह छोड़ना पड़ेगा तब भैरवगढ़ के राजा ने अपनी बेटी के साथ विवाह के बाद अपनी सारी रियासत राजा साहब को भेंट करने का प्रस्ताव रखा और राजा साहब के पिता यानी अजातशत्रु के दादा सा ने ये बात मान ली।
    विवाह हो गया, और भैरवगढ़ की राजकुमारी राजा साहब की पत्नी बन रियासत में चली आयीं।
   सब कुछ अच्छा ही चल रहा था, ठीक ग्यारह महीने बाद युवराज का जन्म भी हो गया। अब दो रियासतो के मिल जाने से राजा साहब के पिता का रुतबा बढ़ चुका था, और वो अपना सुप्रशासन कायम किये थे। इधर राजा साहब अपनी पत्नी और संतान को यहीं छोड़ आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज वापस चले गए।

     कॉलेज में उनके सहपाठी थे ठाकुर साहब जिनकी आपस में कभी नही जमी। कॉलेज का कोई भी काम हो इन दोनों ने हमेशा एक दूसरे को नीचा ही दिखाना चाहा।
   यूथ फेस्ट हो या कोई सेमिनार ये लोग हर जगह उलझ पड़ते।
  उसी समय ठाकुर साहब की पूर्व परिचित परिवार से वहाँ एक नई लड़की ने एडमिशन लिया। ठाकुर साहब ने हर जगह उसे अपनी महिला मित्र बोल कर प्रचारित करना शुरू कर दिया।
   ठाकुर साहब को चिढ़ाने के लिए राजा साहब भी उस लड़की से दोस्ती की पींगे बढ़ाने लगे और एक बार फिर ठाकुर साहब और राजा साहब उस लड़की को लेकर उलझ पड़े।
   अब तक तो बातें छोटे मोटे पैमानों पर होती थी लेकिन इस बार बात ज़रा बढ़ गयी।
  अब दोनो ने ही उस लड़की से दोस्ती को अपना जीवन मरण का सवाल बना लिया, प्रेम तो शायद ही कोई करता रहा हो उससे लेकिन अब उसका साथ पाना इन दोनों के लिए प्रेस्टीज इश्यू बन गया।
    आये दिन ये लोग किसी न किसी बहाने से उसे लेकर झगड़ पड़ते और फिर अचानक ठाकुर साहब किनारे हो गए।
   उन्हें किनारे होते देख राजा साहब को लगा वो जीतने लगे हैं इसी उत्साह में वो पूरे दम खम से उस लड़की के पीछे लगे रहे। राजा साहब के मित्रों ने उन्हें उकसाना जारी रखा, और धीरे धीरे वो लड़की भी राजा साहब की ओर ही झुकने लगी।
       इसी बीच राजा साहब की एक और संतान भी हो चुकी थी, वो गद्दी पर बैठ चुके थे। कॉलेज की बातों के साथ ही वो लड़कीं और उसकी यदि भी पीछे छूटने लगी थी, कि राजा साहब के छोटे भाई और ठाकुर साहब की बहन के रिश्ते चर्चा में  आने लगे। पहले ही राजा साहब से चिढ़े बैठे ठाकुर साहब ने अपनी बहन को आश्वासन दिया कि वो उसकी और राजा साहब के छोटे भाई की शादी करवा देंगे , और दोनो को मंदिर बुलवा कर उनका कत्ल करने की साज़िश रची लेकिन जब उन्हें ये मालूम चला कि ये दोनों पहले ही शादी कर चुके हैं और उनकी बहन तीन महीने के गर्भ से है तब उनका गुस्सा सांतवे आसमान पर पहुंच गया और एक बार फिर वो कुछ नए मंसूबे बनाने लगे। वो वापस राजा साहब के पास गए कि उनकी बहन का विवाह राजा साहब के भाई के साथ हो जाये लेकिन राजा साहब ने एक बार फिर उन्हें अपमानित कर निकाल दिया और अपने भाई को विदेश भेज दिया।
   नाराज़गी में वापस लौट कर वो अपनी बहन को मारने वाले थे लेकिन घर के बाकी लोगों ने जैसे तैसे उसे बचा लिया।
     इधर अपमान की आग में सुलगते ठाकुर साहब ने अपनी उसी दोस्त के साथ मिलकर एक चाल वापस चली।
  
    राजा साहब की एक विवादित ज़मीन पर कोई  कब्जा किये बैठा था। उस से निपटने राजा साहब ने बहुत बार अपने आदमियों को भेजा लेकिन उसके गोल मोल जवाब से राजा साहब संतुष्ट नही हो पा रहे थे। ज़मीन का टुकड़ा कीमती था, और आखिर एक बार राजा साहब जब उसकी हवेली पहुंचे तो उसने अपनी प्राचीन संपदा का ऐसा बखान किया कि राजा साहब प्रभावित हो गए। सब कुछ कोर्ट कचहरी में फंसा है , पट्टे की ज़मीन,नेपाल की तराई में बसी छोटी सी रियासत और ढेर सारा सोना।
      सब कुछ वापस मिलते ही आपकी ज़मीन का कब्ज़ा भी आपको मूल्य चुका कर लौटा दूंगा , की सिफारिश करते व्यक्ति के पास कौन सी ऐसी मूल्यवान वस्तु अभी हो सकती है जिससे उसका ऋण चूक सके , राजा साहब यही सोच रहे थे कि सेविका के हाथ से चाय की ट्रे भेज पीछे उस आदमी की बेटी भी आ खड़ी हुई।
  ये तो वही कॉलेज वाली लड़की थी जिससे राजा साहब के मधुर संबंध रह चुके थे।
   राजा साहब और वो एक दूसरे को पहचान कर बातों में लग गए और उसके पिता को उम्मीद की किरण अपनी बेटी में नज़र आने लगी।
   सामने वाले ने जब अपनी इकलौती कन्या से विवाह प्रस्ताव रखा तो राजा साहब सहर्ष तैयार हो गए। जब वो उससे पहली बार मिले तो उनकी खुशी का ठिकाना नही रहा था आखिर ये वही कॉलेज वाली लड़की जो थी, जिसे एक तरह से वो ठाकुर साहब से जीत चुके थे।
   उन्होंने ज़मीन के सारे मसलों के कागज़ उनके हवाले किये और उनकी बेटी से विवाह कर उसे अपने महल में ले आये।
    और महाराज यहीं चूक गए।

   वो नही समझ पाए कि उनके साथ कितना बड़ा धोखा हो चुका था। उनकी शादी जब उस लड़की से हुई तब वह दो महीने की गर्भवती थी, और उसके गर्भ में ठाकुर साहब की संतान थी।
   पहले तो उन दोनों ने यही सोच रखा था कि किसी तरह राजा साहब को रास्ते से हटाने के बाद रानी के गर्भवती होने की बात फैला कर उनसे दूसरा विवाह कर ठाकुर साहब उनके पति बन गद्दी के हकदार हो जाएंगे लेकिन उनके मंसूबे कामयाब नही हो पाए।
   विवाह के ठीक सात साढ़े सात माह के बाद विराज और विराट का जन्म हुआ। जुड़वा बच्चे होने से समय से पहले हुए प्रसव पर किसी का ध्यान नही गया।
   और बस तभी से ठाकुर साहब ने कसम खा ली कि राजा साहब की कोई संतान गद्दी पर नही बैठने पाएगी बल्कि उनकी जगह उनके खुद की संतान यानी विराज या विराट ही गद्दी का अधिकारी होगा।

  राजा साहब से जलन और चिढ़ ने उनके अंदर की कुंठा को इस हद तक बढ़ा दिया कि अब रात दिन उनकी आंखों में इस पूरी रियासत की तबाही का स्वप्न ही पलता रहा।
    इसके लिए वो जो जो चालें चल सकते थे समय समय पर चलते रहे।


” ये सब क्या कह रही हो केसर? ”

” हम हर एक बात सही कह रहे हैं। हमारे पिता भी बहुत सी बातें जानतें हैं इनके बारे में। उनके एक्सीडेंट में भी इन्ही का हाथ था जो हमे बाद में पता चला। इन दोनो ने न सिर्फ हमें अपना मुहरा बनाया बल्कि तुम भी उनकी बिसात के मोहरे ही भर हो। “

” हम्म वो तो हम कब का समझ चुके थे केसर!और क्या किया इन्होंने?

” हम सारी बातें सिलसिलेवार तुम्हें बताते जा रहें हैं। ध्यान से सुनना। इन दोनों की साज़िशें यहीं थमी नही बल्कि साज़िशें यहाँ से शुरू हुई।
    एक एक कर इन दोनों ने महल के अंदर घुन बन कर सबको खाना शुरू कर दिया…
तुम्हें क्या लगता है अजातशत्रु की माँ की मौत कैसे हुई? “

” क्या उन्हें भी इन्हीं लोगो ने  मारा? “

“हां और वो भी ऐसे की किसी को शक तक नही हुआ, ये लोग अपना हर काम ऐसे करते चले गए कि महल में घट रहा सब कुछ सभी को बहुत स्वाभाविक लगता चला गया…..
    एक शाम छोटी रानी ने बड़ी रानी को महल की छत पर बुलावा भेजा और सबसे किनारे की मुंडेर के पास नीचे काफी सारा तेल जैसा कुछ फैला दिया।
   छत पर दासियां और सेविकाएं दोनो महारानियो की सेवा में तैनात थी। चाय की टेबल सजी थी,मौसम खुशगवार था, की छोटी रानी ने बड़ी रानी से मुंडेर तक चल कर नीचे फैली रियासत देखने का प्रस्ताव रखा..
   बड़ी रानी सहमति जताते हुए आगे बढ़ गईं, उनके पीछे चलती छोटी रानी ने ठीक मुंडेर तक पहुंच कर उनके दुपट्टे पर हौले से अपना पैर रख दिया, हड़बड़ी में आगे बढ़ती रानी साहेब का संतुलन बिगड़ गया और वहीं पर फैले पड़े तेल पर उनका पैर पड़ा और वो फिसल कर मुंडेर से नीचे गिर गईं।
    उनकी रीढ़ की हड्डी में  गंभीर चोटें आईं जिसका परिणाम यह हुआ कि वो पूरी तरह से लाचार बिस्तर पर पड़ गईं, ये सब इस ढंग से हुआ कि सीधे सीधे छोटी रानी पर कोई उंगली नही उठा सका।

” इसका मतलब बड़ी रानी सा की जान जाने के पीछे छोटी रानी का हाथ था? “

” सिर्फ इतना ही नही और भी बहुत कुछ किया है इन्होंने! इनके पाप की गठरी इतनी छोटी नही है…
  बस तुम सुनते जाओ आदित्य, आगे और भी ऐसे खुलासे होते जाएंगे कि तुम चौन्क जाओगे….

क्रमशः

aparna…..

 
    
   


   

जीवनसाथी-98




जीवनसाथी 98



उन सब को दौड़ाने के बाद भी उसके मन में अभी भी हलचल मची थी कि किसी तरह केसर की जान बच जाए, आखिर इतनी सारी राज़ की बातें बताने के बाद अब और कौन सी ऐसी बात बची रह गयी थी जो वो उसे बताना चाह रही थी……

    आदित्य ने फ़ोन वापस रखा और कमरे के अंदर चला गया। अब तक सभी चुपचाप बैठे खाना खा रहे थे। पिंकी का बेटा पीछे सहायिका की गोद में खेल रहा था,  आदित्य को देखते ही उसने जैसे उसे पहचान लिया हो ऐसे आदित्य की गोद में जाने को मचलने लगा।
      आदित्य ने बच्चे को गोद में लेने  से पहले एक नज़र पिंकी पर डाली, पर वो नाराज़गी से अपनी प्लेट ही देख रही थी, रतन ने मुस्कुरा कर इशारा दिया तब जाकर आदित्य ने बच्चे को गोद मे लेकर खिलाना शुरू कर दिया।

     आदित्य बच्चे के साथ खेल तो रहा था लेकिन उसके दिमाग मे केसर और केसर की बातें ही घूम रहीं थीं।

********

   दादी साहब की तबियत में कुछ खास सुधार नही था, वो अपनी बेहोशी में गुम थीं और डॉक्टर्स ये बताने में असमर्थ थे कि वो कब तक जाग पाएंगी।
   राजमहल के सभी पंडित गुरुजन साथ बैठ कर राजा की कुंडली के अनुसार राज्याभिषेक के शुभ मुहूर्त पर चर्चा कर रहे थे।
    जैसी महल और दादी साहब की स्थिति थी , ऐसे में कब और कैसे निर्णय लिया जाए ये भी विचारणीय प्रश्न था। उसके लिए भी सभी आपस मे परामर्श कर रहे थे।
   महाराज ने सिर्फ पांच दिनों का ही समय दिया था और वो चाह रहे थे कि उसके बाद राजा गद्दी पर बैठ जाये, जिससे उनका तनाव कुछ कम हो पाए।

    राजा दीवानखाने में युवराज भैया और बाकी लोगों के साथ था कि तभी बाहर से एक सहायक चला आया। आते ही सबको प्रणाम कर उसने बताया कि कोई शेखर साहब राजा से मिलना चाहतें हैं।

शेखर को अपने ऑफिस की तरफ लेकर आने का निर्देश देकर राजा ने एक दूसरे सहायक को बाँसुरी को बुलाने भेजा और खुद ऑफ़िस की तरफ निकल गया।

    ऑफिस में राजा का इंतज़ार करता बैठा शेखर राजा को आया देख अपनी जगह पर खड़ा हो गया…

” अरे जिलाधीश महोदय बैठिए बैठिए, क्या लेंगे आप? चाय या कॉफी या कुछ और? “”

” आपका थोड़ा सा वक्त चाहिए था राजा साहेब!”

” जी बिल्कुल ! पर प्लीज़ इतना फॉर्मल मत रहिये। ”

” जी शुक्रिया!” राजा से शेखर पहले भी मिल चुका था लेकिन महल के तामझाम के बीच राजा अपने पूरे रुतबे के साथ ऐसा जंचता था कि किसी की भी आंखें उसके व्यक्तित्व के सामने झुक जाएं।
   उन दोनों की बातों के बीच बाँसुरी भी चली आयी..

” कैसे हैं आप शेखर जी!”

अचानक से बाँसुरी को सामने देख और उसकी आवाज़ सुन वो कोई जवाब नही दे पाया। बस हाँ में सर हिला कर बैठा रह गया।

  ” हम दोनों भी सोच रहे थे कि आपसे मिलने आपके ऑफ़िस आएंगे अच्छा हुआ आप ही चले आये। “

  “, जी असल  में कुछ ज़रूरी बातें थी जिसके लिए आया था।
    अब मैं तो ठहरा प्रशासन का आदमी , मुझे सरकार और उसके हुकुम बजाने ही हैं। मैं जो बताने आया हूँ वो ज़रा ध्यान से सुनियेगा। मैं आपको किसी भी तरह से डराने नही आया लेकिन जो भी अंदर की बातें पता चली है,मुझे लगा वो आपको भी बता दूं। ये सारी बातें आपको भी पता होनी चाहिए जिससे आपके पीछे हो रहे षडयंत्रों के बारे में आप जान सकें और पहले से सतर्क रहें।
       बात ये है राजा साहब की आप और आपका नाम आपकी रियासत में भगवान की तरह पूजा जाता है। पहली बार आपसे मिलने पर मुझे भी नहीं पता था कि यहाँ आपको इस कदर माना जाता है।
    प्रभावित तो आपसे पहली बार मिलने पर ही मैं हो गया था लेकिन आपका वर्चस्व और आपकी शख्सियत क्या है वो यहाँ आने पर मालूम चली। ज़मीनी तौर पर कई काम हम लोगों को गांवों के बीच आम लोगों के साथ मिल कर करना होता है , वहाँ मैंने करीब से आपके नाम की ताकत को देखा है। महसूस किया है।
     सबसे पहले तो आपके इन ढेर सारे कामों के लिए आपको सैल्यूट करता हूँ।
   
     राजा साहब आपकी पॉपुलैरिटी से चिढ़ कर या जलन के कारण जो भी कह लीजिए लेकिन अब सरकार आपकी राजशाही पूरी तरह से खत्म करने की तैयारी में है।
                 ये अंदर की बात है, लेकिन मेरे भी कुछ विश्वासपात्र हैं जिन्होंने सब बातें पता कर बतायीं हैं। असल में आपकी वापसी से आपकी रियासत की जनता खुश ही नही बहुत खुश है। पहले भी रियासत के लोग अपने हर काम के लिए आपके पास अर्जी लगा देते थे जिसे सरकार से लड़ झगड़ कर या अपने बूते पर आप करवा लिया करते थे। अब तक ये लोग आपके पारिवारिक झगड़ो के कारण निश्चिंत थे लेकिन आपकी घर वापसी इनके गले का फंदा बनती जा रही है। माफ कीजिये आपके पारिवारिक मामलों में बोलने की जुर्रत की मैंने लेकिन जो बाहर माहौल चल रहा है वो आपको बताना भी तो ज़रूरी है।
     सरकार के लोग आपका पत्ता काटने की तैयारी में बैठे हैं। ये लोग पहले तो एक मोटी रकम के बदले आपसे रियासत और उसकी पद प्रतिष्ठा खरीदने की कोशिश करने वाले हैं, पर अगर आप इस बात के लिए तैयार नही हुए तो किसी भी तरह के गलत आरोप लगा कर और पुराने  कायदों की नियमावली दिखा कर आपको आपकी जगह से हटा देंगे।
   क्योंकि अब राजा की जगह पर आपका बना रहना इन लोगों के लिए सरदर्द बनता जा रहा है।
   इन लोगो का मानना है कि आप खुद अपनी छोटी सी सरकार चला रहे हैं। आसपास के गांवों में इनमें से कोई सुविधा नही है जो आपकी रियासत के लोगों को मिली हुई है।
  आपकी रियासत का हर बच्चा स्कूल जाता है, लगभग हर एक परिवार के पास अपनी रोजी रोटी का सुप्रबन्ध है, घरेलू औरतें भी पढ़ी लिखी हैं, अपने हक और कर्तव्य जानती हैं। रियासत के लिए आपने सर्वसुविधायुक्त अस्पताल खोल रखा है। बैंक की ब्रांच से लेकर , स्कूल कॉलेज सब कुछ आपकी रियासत में है। गांव में बिना ज़रूरत न तो बिजली की कटौती होती है न पानी की किल्लत। इसलिए तो आपकी जनता आपसे इतना प्यार करती है कि बात बात पर आपकी तरफ से सरकार के खिलाफ खड़ी हो जाती है।
    आपने महल छोड़ने से पहले शायद मेडिकल, इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने का प्रस्ताव भी सरकार के पास भेजा था जो अब तक वहीं अटका पड़ा है। बाँसुरी ने एक बार पहले मुझे बताया था। मैंने अभी उस प्रस्ताव को निकलवा कर देखा , उसे निकलवाने के चक्कर मे इतनी सारी बातें मुझे पता चली।
  आपका ये यूनिवर्सिटी प्रोजेक्ट बहुत शानदार है राजा साहब! अगर ये सफल हो गया तो आसपास के ऐसे विद्यार्थियों को इससे बहुत फायदा मिलेगा जो पैसों आदि की कमी से बाहर कहीं दूर पढ़ने नही जा पाते थे। और इसलिए इस प्रोजेक्ट पर अड़ंगा लगाया जा रहा है।
     असलियत ये है कि सरकार आपसे डरी हुई है कि कहीं इसी रफ्तार से आप काम करते रहे तो पूरा हिंदुस्तान आपको राजा न मान ले। लोकतंत्र की समाप्ति न हो जाये, हालांकि ऐसा होना असम्भव है लेकिन फिर भी इनकी सरकार के पैरेलल राजा अजातशत्रु अपनी एक सरकार चला रहे हैं यही सोच उन लोगो की नींद उड़ाए हुए है।

” ये तो बहुत चिंता की बात है। ” बाँसुरी की चिंता देख कर भी राजा के चेहरे पर चिंता की कोई लकीर नही थी…

” रियासत की जनता की मदद करने के लिए मुझे राजशाही की ज़रूरत है भी नही। दिल में जज़्बा होना ही काफी है क्यों बाँसुरी ?”

” बात तो सही है आपकी लेकिन सरकार ऐसा कैसे कर सकती है? आज तक आपने हमेशा सबके बारे में सोचा, सबका भला किया और आज ये लोग आपकी मदद करने की जगह आपकी गद्दी छीनने की सोच रहें हैं। इसका कोई उपाय तो होना चाहिए। शेखर जी आप क्या सोचतें हैं इस बारे में। ”
 
   शेखर ने तो पहले ही उपाय सोच रखा था, वो असल में समस्या नही बल्कि उपाय ही बताने आया था…
   बाँसुरी की बात पर सहमति में सर हिलाते वो राजा की ओर देख अपनी बात कहने लगा…

” मेरे पास इसका एक उपाय है राजा साहब! अगर आप इजाज़त दें तो मैं कहूँ ?”

” अरे शेखर जी इतना फॉर्मल क्यों हो रहे है आप? कहिये जो भी कहना चाहतें हैं।”

” सरकार आपका राजतंत्र खत्म करना चाहती है , क्योंकि उन्हें आपसे डर है। आप एक काम क्यों नही करते, कि राजतंत्र छोड़िए और खुद सरकार में आ जाइये। “

   बाँसुरी शेखर का चेहरा देखने लगी…. उसे देखते हुए शेखर वापस बोलने लगा…

” मैंने एक बार पहले भी ये प्रस्ताव रखा था कि आप चुनाव लड़िये। आज भी यही प्रस्ताव लेकर आया हूँ। इत्तेफाक से चुनाव सर पर हैं और इसलिए सभी राजनैतिक पार्टियां अपने अपने प्रचार में लगी हैं। अब पक्ष हो या विपक्ष जो भी पार्टी इस क्षेत्र में प्रचार के लिए जाती है उनसे ज्यादा जयकारा तो आपके नाम का लगता है , ये भी एक वजह है उन लोगों की आपके खिलाफ होने की।
     तो मेरा ये कहना है कि वो लोग आपको हटाये इसके पहले अपनी पार्टी बना कर आप चुनाव लड़े और पक्ष विपक्ष दोनो का ही सफाया कर दें।

   शेखर की बात पर राजा विचार कर रहा था कि बाँसुरी बोल पड़ी…

” साहब मैं चाहतीं हूँ एक बार युवराज भैया और समर को भी यहाँ बुला लीजिये। उनके सामने भी ये बात हो जाए , सब क्या सोचतें हैं ये जानना भी ज़रूरी हैं।

  राजा के हाँ में इशारा करते ही बाँसुरी ने सहायक से कह कर उन दोनों को बुलवा भेजा। उन दोनों ने भी पूरी बात सुन कर शेखर की बात पर सहमति दे दी।।

  ” लेकिन भैया मैं ये सोच रहा हूँ, कि मैं किस पार्टी से चुनाव लड़ूंगा? मैं किसी पार्टी का कार्यकर्ता नही हूँ, आखिर मुझे कोई भी पार्टी टिकट क्यों देगी

” आपकी लोकप्रियता इतनी अधिक है हुकुम कि अगर आप ये कहेंगे कि आप चुनाव लड़ना चाहतें हैं तो पार्टियां आपको खुद बुला कर टिकट देंगी। वैसे राष्ट्रपति द्वारा मनोनित राज्यसभा सदस्य तो आप अब भी बन सकतें हैं लेकिन आपके काम करने का तरीका जैसा है आपको लोकसभा की सीट के लिए ही चुनाव लड़ना चाहिए। ”

  समर की इस बात का समर्थन युवराज ने भी किया…

” लेकिन कुमार हम चाहतें हैं तुम खुद अपनी पार्टी बनाओ। “

” लेकिन भैया इतनी जल्दी पार्टी बनाना उसे अप्रूव कराना ये सब कहाँ सम्भव है?”

” हुकुम आपके नाम से एक पंजीकृत पार्टी है। कॉलेज के समय पर आपने एक “युवा जनशक्ति” पार्टी बनाई थी, उस वक्त जाने क्या सोच कर आप और आपके कुछ मित्रों ने उसे पंजीकृत भी करवा लिया था। अब भी उस पार्टी से आपके कई मित्र जुड़े हुए हैं जो आसपास के गांवों में ज़रूरतमंदों के लिए काम करतें हैं। आपने खुद उस पार्टी के फंड के लिए सालाना नियमित रूप से राशि तय कर रखी थी, जो आज भी  भेजी जाती है। “

” अरे हाँ मैं तो भूल ही गया था उस पार्टी के बारे में।”

राजा की बात पूरी होने पर शेखर बोल उठा…

” अरे वाह ! ये तो अच्छी बात है तब तो फिर राजा साहब उसी पार्टी से चुनाव लड़िये । “

” शेखर सही कह रहे है कुमार! आखिर आज नही भी किया गया तो कभी न कभी तो हमारा राजतंत्र खत्म हो ही जायेगा। और दूसरी बात अभी भी तुम कई ऐसे काम करना चाहते हो जिसमें तुम्हें सरकार की मंजूरी की आवश्यकता होती है और उसी वजह से तुम्हारा वो काम अटक जाता है।
    जैसा कि शेखर कह रहे हैं अगर वाकई सरकार तुमसे नाराज़ हो गयी तो इसमें हमारी रियासत का भी नुकसान होगा।”

” युवराज सा बिल्कुल सही कह रहे हैं हुकुम। आप खुद देखिए आपने मेडिकल कॉलेज यूनिवर्सिटी का जो प्रस्ताव बना कर भेजा था वो पूरी तरह सही होने के बावजूद पांच साल से अटका पड़ा है। हर बार वहाँ से कोई न कोई शिकायत या समस्या आ ही जाती है , और इसी अड़ंगे के कारण हम उस प्रोजेक्ट को शुरू नही कर पा रहे।
    एक दो बार नही कई बार उस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए मुझे रिश्वत तक देनी पड़ी पर फिर वही ढाक के तीन पात वाली बात हो जाती है।
    जब अगली बार जाओ तो पैसे खा कर डकार चुके ऑफिसर की बदली हो चुकी होती है, और नया ऑफिसर अपना मुहँ खोले बैठा होता है।
     शेखर जी की बात बिल्कुल सहीं हैं, अगर हम खुद सरकार में होते तो क्या उन लोगों की इतनी जुर्रत होती?
    हुकुम अब आप अधिक मत सोचिये, बस हाँ कह दीजिये फिर कहाँ से किसे टिकट देनी है, किन किन को चुनाव में खड़ा करना है ये सब मैं , युवराज भैया, प्रेम देख लेंगे। और अब तो कलेक्टर साहब का भी साथ है। ”


” राजा साहब प्लीज़ हम सब की बात मान लीजिए। क्योंकि यही एक रास्ता नज़र आ रहा है। बात को समझिए, आप जिस ढंग से सामाजिक कार्य करतें हैं और आगे करना चाहतें हैं,  अगर आप सरकार में आ गए तभी आप अपने कार्यों में पूरी तरह सफल हो पाएंगे। वरना इन लोगों के षड्यंत्र तो अंदर अंदर चल ही रहे हैं।
    

  राजा अब भी शेखर की बात मानने को तैयार नही था, लेकिन शेखर समर और युवराज भैया के बार बार समझाने पर वो उन लोगों की बात मान ही गया।

  राजा की रज़ामन्दी मिलते ही समर आगे की तैयारियों के लिए शेखर के साथ निकल गया। शेखर ने जाने से पहले एक नज़र बाँसुरी को देखा…

” कब तक कि छुट्टी पर हो बाँसुरी?”

” पांच दिनों की ही ली थी पहले, लेकिन पांच दिन तो पलक झपकते ही बीत गए। अभी दादी साहेब की तबियत भी बिगड़ गयी है इसलिए छुट्टी बढ़ा ली है मैंने। “

  हां में सर हिला कर शेखर उन सभी से इजाज़त ले समर के साथ बाहर निकल गया।
   समर का काम बढ़ गया था। उसे अब राजा के उन सभी मित्रों से संपर्क करना था जो अब भी उस पार्टी से जुड़े हुए थे। इसके अलावा पार्टी के चुनाव के लायक बनने की जो भी तैयारियां थी वो सब भी शुरू करनी थी।
    इसके अलावा पांच दिन बीत चुके थे, इसी से अगले दिन राज्याभिषेक भी प्रस्तावित था। उसकी तैयारियां महल में चल ही रहीं थी।
  
     राज्याभिषेक के लिए ग्यारह पंडित पूजा पाठ और अभिषेक की तैयारियों में थे। राज्याभिषेक के बाद होने वाला जलसा फिलहाल दादी साहेब की तबियत के कारण नही किया जाना था लेकिन जनता के प्रिय राजा अजातशत्रु के गद्दी पर वापस बैठने की खुशी जनता के लिए इतनी बड़ी थी कि सभी इस ऐतिहासिक क्षण के गवाह बनना चाहते थे। जनता का उत्साह देख कर ही महाराज ने राज्याभिषेक के बाद राजा का जनदर्शन का कार्यक्रम भी रखवा दिया था।

    ग्यारह पंडितों में से कुछ राजा की कुंडली के अनुसार शुभ मुहूर्त देखना चाहते थे लेकिन महाराज इन सब औपचारिकताओं के लिए भी रुकना नही चाह रहे थे। लेकिन फिर रानी माँ की समझाइश पर वो भी मान गए।
     पंडितों ने विघ्नहर्ता गणेश का नाम लेकर पत्रा देखना शुरू कर दिया ….
   एक बार फिर दूसरी बार देखने पर भी कुंडली में लिखी बातें पढ़ पंडित जी के माथे पर शिकन चली आयी।
   उन्होंने अपने सहयोगियों से चर्चा शुरू की और एक बार फिर कुंडली बाँचने में लग गए।
  सभी तरह के जोड़ घटाव के बाद भी कुंडली में जो लिखा था बदला नही जा सकता था, उनके चेहरे पर खींची चिंता की लकीरें देख रानी माँ ने पूछ ही लिया..

” क्या बात है पंडित जी?आप कुछ चिंतित से लग रहे है ? कुमार की कुंडली में सब ठीक है ना? “

” जी रानी साहेब ,बात ये है …”

पंडित जी भी एकाएक अपनी बात कहने की हिम्मत नही कर पा रहे थे, उनका असमंजस देख रानी माँ ने उन्हें समझाते हुए अपनी बात कहनी जारी रखी..

” पंडित जी ऐसे अधूरी बात छोड़ कर हम सभी को डराइये मत। आप साफ शब्दों में कहिये की बात क्या है?

  पांच पंडितों के अलावा वहाँ महाराज और रानी माँ ही थे।
   पंडित जी ने अपनी सारी हिम्मत समेट कर आखिर अपने सामने फैली रखी कुंडली कहनी शुरू कर दी..

” रानी साहेब ! क्षमा कीजियेगा लेकिन कुमार की कुंडली में इस वक्त मारकेश योग दिखा रहा है। “

” इसका मतलब क्या होता है? हम समझे नही।।”


” मारकेश का मतलब होता है ,मृत्यु या मृत्यु तुल्य कष्ट!”

  पंडित जी की बात सुन महाराज जो अभी तक अधलेटे से उनकी सारी बातें सुन रहे थे, तमक कर सीधे बैठ गए…

” ये क्या कह रहे हैं आप पंडित जी? होश में तो हैं आप? कुमार की अभी उम्र ही क्या है? ऐसा नही हो सकता। मरना तो हमें है, उसे कुछ नही होना चाहिए। आपकी कुंडली क्या हमेशा ऐसे ही उलट पुलट ज्ञान देती है? कभी कोई अच्छी बात भी कहती है या बस यही ऊलजलूल।
   नही अजातशत्रु को कुछ नही हो सकता। हमारा बेटा बचपन से ही जिस स्नेह का हकदार था वो हमसे उसे कभी मिला ही नही। युवराज को कम से कम उसकी माँ का स्नेह तो मिल पाया कुमार को तो वो भी नही मिला।
   सारी जिंदगी उसने संघर्ष ही तो किया है। और अब जब उसके संघर्षो पर विराम लगने का समय आया , तब आपका यह गृहविज्ञान उसकी कुंडली में मारकेश दिखा रहा है।
  ये तो सरासर गलत है, ईश्वर का अन्याय है ये। हम ऐसा नही होने देंगे।
  कुंडली में ऐसा लिखा है तो इसका कोई काट भी तो होगा? आप वह देखिए न,बैठे क्या हैं!
   हमारे पुत्र राजा अजातशत्रु को कुछ नही हो सकता। हे ईश्वर ! क्या क्या सोच कर हमने उसका नाम अजातशत्रु रखा था, और विडंबना देखो उसी के शत्रुओं की कमी नही है।
   हमने भी तो अपनी युवावस्था में अपने बच्चों के साथ अन्याय ही किया है। ना उन्हें वो स्नेह दे सके और न ही वक्त।
अब आज जब हम खुद अशक्त पड़े हैं तब हमें अपने कार्यों का लेखाजोखा स्मरण हो रहा है और स्मरण मात्र से ही हम बार बार सोचने पर विवश हो रहे है कि हमने अपने बच्चों के साथ ऐसा क्योँ किया।
  
   महाराज के मन में वर्षों से जमी बर्फ जैसे राजा के प्रेम से पिघलने लगी थी। उन्हें अपना जीवन नज़र आ रहा था कि कैसे अपनी दूसरी रानी के मोह में उन्होंने जाने कितनी बार युवराज की माँ का अनादर किया,जाने कितनी ही बार राजा और युवराज के बचपन से खिलवाड़ किया। उन्होंने उनके बचपन को कभी एक स्नेहसिक्त छांव दी ही कहाँ?

  कहतें हैं बच्चे माता पिता का प्रतिरूप होते हैं। जैसा स्नेह और ममता बचपन में उन पर उनके माता पिता लुटाते हैं उसी का प्रतिदान बच्चे बड़े होने और उन्हें लौटातें हैं।
 
    लेकिन युवराज की माँ के दिये संस्कार ही तो थे कि उनके द्वारा किये इतने अन्यायों के बाद भी उनके बच्चों के मन मे उनके लिए अब भी स्नेह आदर मौजूद था।
   महाराज के मन में चलते विचारों से रानी माँ भी विलग नही थीं। वो भी उतनी ही विचलित थीं। उन्होंने भी राजा और युवराज का बचपन खराब ही किया था। सिर्फ बचपन ही नहीं उन्होने तो……..
    अपने ही विचारों को पूरी तरह सोचने में भी रानी माँ को डर सा लग गया कि कहीं कोई उनका मन पढ़ न ले। और अगर किसी ने उनका मन पढ़ लिया तो फिर महाराज , युवराज, अजातशत्रु इनमें से कोई भी उन्हें माफ कर पायेगा?
    शायद नही। उनका पाप था भी तो इतना बड़ा।

   उन्होंने हर कदम पर विराज और कुमार में प्रतिद्वंदिता रखी लेकिन आज जब उनके अपने खून ने उन्हें कई बार तिरस्कृत किया तब उन्हें युवराज और अजातशत्रु की कद्र महसूस हो रही थी।

     अपने मन में चलते द्वंद से दोनो ही लोग परेशान थे।आखिर रानी माँ ने ही पंडित जी के सामने सवाल रखा….

” इसका कोई उपाय तो होगा पंडित जी? “

” जी मारकेश टाला नही जा सकता रानी साहेब, लेकिन एक काम किया जा सकता है कि ऐसी सारी परिस्थितियों का निर्माण किया जाए जिससे राजा अजातशत्रु सुरक्षित रहें।
   हमारा कहना है कि जब राज्याभिषेक पांच दिन टाल दिया तो तीन चार दिन और आगे कर दीजिए। अभी दो चार दिनों का समय अधिक कष्टप्रद है। तो इस समय में राज्याभिषेक न कर के हम सब महामृत्युंजय जाप अनुष्ठान में लग जातें हैं।
  बाहर किसी से आप लोगों को कुछ कहने की आवश्यकता भी नही है।
सबको यही लगेगा कि अभिषेक से पहले की पूजा अर्चना है।
   चार दिन के अनुष्ठान के बाद पांचवे दिन राजा अजातशत्रु का राज्याभिषेक किया जाएगा, तब तक इस सारी पूजा से कुंडली का प्रभाव कुछ हद तक ही सही कम तो हो जाएगा।
   एक बार ये सप्ताह निकल गया फिर थोड़ी चिंता कम हो जाएगी।

  पंडित जी की बातों से हैरान परेशान महाराज और रानी माँ के पास अब कोई चारा भी नही बचा था।
उन्होंने राज्याभिषेक वापस चार पांच दिन आगे बढ़ाने का संदेश युवराज के पास भिजवा दिया था।
   महाराज स्वयम भी पूजा पाठ का हिस्सा बनना चाहते थे इसलिए पंडित जी की बताई सभी बातों का अनुसरण करते हुए वो भी तैयार थे, अगले दिन से शुरू होने वाली पूजा का हिस्सा बनने को।
    
    कुछ घंटों पहले जो तैयारियां राज्याभिषेक की होने जा रहीं थी वहीं अब महामृत्युंजय जाप की होने लगी।
महल द्वारा फिर से घोषणा करवा दी गयी कि अभिषेक कुछ पांच दिनों के लिए आगे सरका दिया गया है।


   *********

   समर और शेखर के जाते ही युवराज भैया भी महाराज के बुलावे पर उनके कक्ष की ओर बढ़ चले। उनके जाते ही राजा और बाँसुरी भी ऑफिस से बाहर निकल गए।

     रात के खाने का वक्त हो चला था। सभी का एक साथ वहाँ मौजूद होना आवश्यक होने पर भी अभी राजमहल के नियमों में कुछ छूट हो गयी थी।
    खाने की टेबल पर राजा बाँसुरी के अलावा पिंकी रतन, पिंकी के माता पिता के अलावा फूफू साहब का परिवार ही मौजूद था।
    युवराज रातों रात पार्टी के काम से समर के साथ दिल्ली रवाना हो गया था।
    सभी कुछ न कुछ हल्की फुल्की बातों में लगे थे कि आदित्य भी वहीं चला आया। उसे आते देख अब तक चहक कर बातें करती पिंकी चुप हो गयी। उसे एक नज़र देख आदित्य ने एक किनारे की कुर्सी खींची और चुपचाप बैठ गया।
     आदित्य के मन में जैसा कोलाहल मचा था केसर को लेकर, वो बाकी किसी बात पर ध्यान ही नही दे पा रहा था।

    वो आकर बैठा ही था कि उसके सुरक्षा कर्मी का फ़ोन आ गया।
  वो फ़ोन लिए बाहर निकल गया….

” हाँ कहो। केसर का कोई पता चला?”

“जी सरकार ! केसर सा हमें मिल गयी लेकिन जिस हालत में मिली है उनका बचना मुश्किल लग रहा है।”

” क्या बात कर रहे हो? कहाँ है इस वक्त वो? “

“जी उन्हें आपके ऑफिस गोडाउन में छुपा रखा है। हम लोग जब उनकी तलाश में निकले तब पूरे शहर और आसपास का चप्पा चप्पा ढूंढने पर भी जब वो नही मिली तब अपने मुखबिरों से पता करवाया , तब किसी के बताने पर पता चला कि पहाड़ी से शहर की तरफ के रास्ते पर एक कार का कुछ देर पहले भयानक एक्सीडेंट हुआ है।
  हम लोग वहां पहुंचे तो देखा कार केसर बाई सा की ही थी।
  वो शायद शहर की ओर भागना चाह रही थी लेकिन किसी बड़ी गाड़ी की टक्कर से उनकी कार पहाड़ी से पलटती खाई में गिरी। जाने कितने घण्टे उन्होंने वहीं गुज़ार दिए होंगे। जब हम लोग वहाँ पहुंचे उनकी सांस चल रहीं थीं।
   हमनें उन्हें तुरंत उस गाड़ी से निकाला और अपनी गाड़ी में डाल कर ऑफिस के लिए निकल गये। जाते जाते उनकी गाड़ी को आग के सुपुर्द कर गए जिससे इन्हें नुकसान पहुंचाने वाले को ये लगे कि गाड़ी के साथ साथ वो भी नही बची।
   गाड़ी का एक्सीडेंट देख कर समझ आ गया था कि किसी ने जानबूझ कर गलत ओवरटेक कर उन्हें टक्कर मारी है।
   
  ” अभी केसर कैसी हैं? होश में हैं या नही?”

  ” सरकार होश में आ चुकीं हैं केसर सा। डॉक्टर उनकी तीमारदारी में लगें हैं। किसी भी हॉस्पिटल इस वक्त ले जाना हमें सुरक्षित नही लगा इसलिए हम लोगो ने ऑफ़िस में ही पूरी व्यवस्था करवा ली। आपने पहले ही बता दिया था कि उनकी जान को खतरा है।
  अभी भी डॉक्टर यही कह रहे है कि इनकीं जान यहाँ बचाना मुश्किल है और उन्हें तुरंत किसी अस्पताल में शिफ्ट करना ज़रूरी है। यही पूछने के लिए आपको फ़ोन किया था कि क्या किया जाए। ”

” इसमें पूछने की क्या बात है, तुरंत केसर को वहाँ के सबसे सुविधायुक्त और अच्छे अस्पताल में शिफ्ट करवा दो। और तुम सब वहीं बने रहना क्योंकि जिसने एक बार हमला किया वो दुबारा भी कर सकता है, बल्कि करेगा ही।” 

“जी सरकार।”

” अब ऐसा करो सबसे पहले उसे शिफ्ट करवाओ। केसर का ज़िंदा रहना बहुत ज़रूरी है।

” सरकार वो आपसे कुछ कहना चाहती हैं..”

उसने इतना कह कर केसर के मुहँ के पास फ़ोन का स्पीकर ऑन कर रख दिया।

” आदित्य…. बहुत मुश्किल से केसर के मुहँ से बस आदित्य का नाम निकल पाया।।

” केसर आप आराम कीजिये । हम यहाँ से निकल कर तुरंत वहाँ आ रहे, लेकिन हम आपसे दूर भी बहुत है हमें वहां पहुंचने में वक्त लगेगा तब तक आपको अपना ध्यान रखना होगा आप हमें जो कुछ भी बताना चाहती हैं वह आप तब ही बता पाएंगी जब आप पूरी तरह स्वस्थ हो जाएंगी। इसलिए थोड़ा धैर्य रखिए और मजबूत बने रहिए आप को स्वस्थ होना पड़ेगा।

” आदित्य ! हमारे पास समय कम है। आपके मामा ठाकुर साहब रेखा के असली पिता नही हैं।हम आपको सारी बात बता देना चाहतें हैं…
    आप सुन रहें हैं ना…”

सिर्फ इन दो तीन पंक्तियोँ को कहने में ही ऐसा लगा जैसे केसर को बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही थी।

  रेखा ठाकुर साहब की बेटी नही है तो फिर किसकी बेटी है?
आखिर ठाकुर साहब चाहतें क्या हैं?और ऐसी कौन सी बात है जो केसर उसे बताना चाहती है?

  आदित्य कुछ पूछता इसके पहले ही डॉक्टर ने फ़ोन केसर के हाथ से छीन कर एक तरफ फेंक दिया, लेकिन फ़ोन कटा नही था इसी से आदित्य को वहाँ की बातें सुनाई दे रहीं थीं।

  ” व्हाट द हेल इस दिस? पेशेंट कोलैप्स  हो रही है और आपको अभी भी फ़ोन कॉल्स दिख रहे हैं। पहले तो इतने सिरियस पेशेंट को घर पर ही ट्रीट करने बुलवा लिया अब आप लोग उनसे फोन भी करवा रहे। हद है!!
   कल को वो मर गयी तो ज़िम्मेदार हमें समझ कर हमारा कॉलर पकड़ लेना,हमारे साथ मारपीट शुरू कर देना। आप लोग हर चीज़ को इतना फिल्मी क्यों समझ लेते हैं।

” इन्हें अस्पताल शिफ्ट कर सकतें हैं ,अभी अभी सरकार से बात हुई। उन्होंने मंजूरी दे दी है।”

” थैंक गॉड! आपके सो कॉल्ड सरकार ने मंजूरी दी। अब चलिए फटाफट इन्हें शिफ्ट करने में मदद कीजिये, एंड मैडम प्लीज़ आप अब कहीं बात चीत नही करेंगी । आपको सिडेटिव्स दिए गए हैं अगर इसके बावजूद आप जागती रहीं तो आपको दूसरे कॉम्प्लीकेशंस शुरू हो जाएंगे।

   डॉक्टर की आधी ही बातें केसर के कानों में पड़ी और वो फिर एक बार नीम बेहोशी मे चली गयी….


क्रमशः

aparna….


  दिल से ….


  

aparna …..

 




 

जीवनसाथी-97

    जीवनसाथी – 97


  
    महाराज ने अपने मन की बात रख दी थी , और उस वक्त कमरे में मौजूद सभी लोगों ने राजा को राजगद्दी देने वाली बात पर मुहर भी लगा दी थी।
  
     सब कुछ अच्छा होता सा लग रहा था लेकिन इस सब के बीच कुछ तो था जो राजा के मन में खटक रहा था। अपने मन की बेचैनी दूर करने वो बाँसुरी के पास चला आया।

   बाँसुरी कक्ष के ठीक बाहर महल की बाकी महिला सदस्यों के साथ ही थी, राजा के चेहरे पर खींची परेशानी और चिंता की लकीरें देख उसने इशारे से ही पूछा और न में सर हिलाता राजा उन लोगों के पास आकर खड़ा हो गया….

“हम तो आपसे बेहद नाराज है कुंवर सा?”

” क्यों भाभी साहेब! अब मैंने ऐसा क्या कर दिया?

” इतने दिनों बाद हमारी रूठी हुई देवरानी को मना कर लाएं हैं, ये भी कोई बात होती है?

” ये खुद रूठी बैठी थी तो क्या करता? मानने को ही तैयार नही थी, बस झगड़ा किये जा रही थीं और मेरी कोई बात ही नही सुन रही थीं।”

“क्या ये सही बोल रहे हैं? ” राजा की बात सुन रूपा ने आंखे गोल गोल कर बाँसुरी की ओर देखा… बाँसुरी मुस्कुरा कर राजा की ओर देखने लगी…

  “साहेब और इनकी बातें ! पहली बात तो ये मुझे मनाने आये ही नही , एक बार भी नही। बस जब मिले हुकुम सुना दिया कि साथ चलो, और मैं चुपचाप इनके पीछे चली आयी। आपके देवर ने बहुत डरा कर रखा है मुझे भाभी सा। ”  

रूपा आश्चर्य से कभी राजा को कभी बाँसुरी को देख रही थी, उसे इन दोनों की ही बातों में विश्वास नही हो रहा था।

  ” फिर इतने दिनों तक तुम अकेली थीं कहाँ? ”  रूपा के सवाल पूछते में युवराज भी चला आया…

  ” पहले दिल्ली में रह कर पढ़ाई की बाद मे देहरादून से ट्रेनिंग ली और अब आई ए एस बाँसुरी अजातशत्रु सिंह तुम्हारे सामने खड़ी है। ”

   युवराज की इस बात पर रूपा, रेखा, जया बुआ जी सभी ठगी सी खड़ी रह गयी।

    क्या वाकई बाँसुरी कलेक्टर बन गयी है? सबने वापस एक पूरी नज़र से बाँसुरी को देखा, अब उसमें और उसके व्यक्तित्व में एक अलग ही चमक दिख रही थी।
    अचानक वहाँ खड़ी औरतें जो अब तक रूपा की झिड़कियो का लुत्फ उठा रही थीं, खुद में हीन सी भावना लिए रह गईं। बाँसुरी अब तक भी वहाँ सज रही थी लेकिन उसका पद जानते ही वो और चमकने लगी थी। ये और कुछ नही वहाँ खड़े लोगों की नज़रों का फेर था क्योंकी बाँसुरी पहले भी उसी सौम्यता में लिपटी खड़ी थी जिसमें अब।
    रूपा के आश्चर्य का ठिकाना नही था कि उसके पति यानी युवराज भी सब जानते थे तो आज तक कुछ बताया क्यों नही। उसने जलती हुई आंखों से अपना सवाल युवराज पर दाग दिया, उसकी आंखें देख युवराज ने हंसते हसंते कान पकड़ लिए…


” अरे बाबा ये दोनों नही चाहते थे कि पोस्टिंग होने से पहले महल में किसी को पता चले बस इसलिये नही बताया। खासकर तुम्हें सरप्राइज देना चाहते थे। “

” आप ने भी हमें पराया कर दिया कुंवर सा? “रुपा के सवाल पर राजा ने अपने दोनो कान पकड़ लिए…

  ” भाभी सा आप भी जानती हैं कि आप मेरे लिए कितनी आदरणीय है , कितनी प्यारी हैं। असल में हम दोनों यही चाहते थे कि सब अच्छी तरह से निपट जाए, बाँसुरी को पोस्टिंग मिल जाये फिर सबसे पहले आपको ही बताएंगे लेकिन ऐसा मौका ही नही मिल पाया , और अचानक ही हम दोनों को डैड की तबियत बिगड़ने पर वापस आना पड़ गया, वरना तो युवराज भैया का प्लान आपको लेकर देहरादून आने का था, जहां बाँसुरी की पोस्टिंग है। ”

  ” झूठे कहीं के। बातें बनाना कोई आप दोनो भाइयों से सीखे। खुद अकेले अकेले हनीमून मना रहे थे और कहतें हैं आपको बुलाने का प्लान था। सोचा होगा कहीं रूपा भाभी आ गयी तो कबाब में हड्डी न बन जाएं , बस इसीलिए नही बताया ना। सब समझतें हैं हम। “

  “हा हा हा! आप तो सब समझ जातीं हैं मेरी प्यारी भाभी। अब जरा दादी साहेब से मिल आऊँ, कल रात ही उन्हें  सपने में देखा था, तभी से उनसे मिलने के लिए बेचैनी सी थी मन में।”

रूपा की लाड़ भरी नाराज़गी का मीठा सा जवाब देकर राजा दादी साहेब के कमरे की ओर बढ़ने लगा। उसे आगे जाते देख बाँसुरी भी रूपा और बाकी लोगो को प्रणाम कर उन से आज्ञा लिए आगे बढ़ गयी।
    वो लोग जा ही रहे थे कि बाँसुरी के फ़ोन पर किसी का कॉल आ गया, बाँसुरी ने फ़ोन उठाया, फ़ोन उसके ऑफिस से था। उसने जल्दी जल्दी सामने वाले को कुछ समझाया और फ़ोन रख दिया।
      राजा की सवालिया नज़रें देख बाँसुरी उसे बताने लगी __ ” ठाकुर साहब के सभी अनैतिक कामों को बंद करने और उनके सारे टेंडर कैंसिल करने के आदेश जारी किए थे। तो ठाकुर साहब कमिश्नर और आई जी के पास अर्जी देने गए थे। कल ही कमिश्नर साहब का फोन आया था, पर मैंने अपना आदेश वापस नही लिया, आज कमिश्नर ऑफिस से भी उन्हें लीगल नोटिस चला गया और साथ ही उन्हें गिरफ्तार करने पुलिस भी उनके आवास पर पहुंच गई।
    लेकिन उन्हें। पता नही कैसे पता चल गया, और वो फरार हो गए।
   अभी कमिश्नर ऑफिस से उनकी तस्वीर और बाकी जानकारी अस पास के सभी थानों और दूसरे स्टेट भेज दी गयी है।
   लेकिन इस सब की शुरुवात चूंकि कलेक्टर आदेश से हुई थी इसलिए मुझे भी एक चिट्ठी बना कर भेजनी पड़ेगी। दादी साहेब से मिल कर निकलने के बाद मैं लेटर मेल कर दूंगी।”

” मतलब ठाकुर साहब को अब जेल के अंदर डाले बिना मानेंगी नही हुकुम?

  ” बिल्कुल नही। उनकी हिम्मत कैसे हुई आप पर बुरी नज़र डालने की, वो भी एक बार नही कई बार। आप पर गोली चलवाने से लेकर..

  ” बस बस हुकुम! जो बातें दिल को कचोटती हैं उन्हें भूल जाना ही अच्छा है। ”

बाँसुरी मुस्कुरा उठी..

  ” इसलिए मैं सिर्फ आपको याद रखतीं हूँ साहेब, बाकी दुनिया भूल ही तो चुकी हूँ।”

   मुस्कुराते हुए दोनो दादी साहेब के कक्ष में पहुंच गए।
दादी सा उन दोनों को देखते ही मुस्कुरा कर उठने की कोशिश करने लगी, उनकी सहायिका ने धीरे से पकड़ कर उन्हें  उठा कर पलंग के पिछले भाग से लगा कर बैठा दिया।
      राजा दादी साहेब को देखता ही रह गया। दादी साहेब बेहद कमजोर  और बीमार नज़र आ रहीं थीं।
उन्होंने आगे बढ़ कर पैर छूते राजा और बाँसुरी को गले से लगा लिया …

  “ये क्या हाल बना रखा है आपने दादी साहब !”

  ” सब आपका किया धरा है। ना आप दोनो इस तरह रूठ कर महल से जाते और न हमारा सबका ये हाल होता। अपने पिता से मिल कर आ रहे हो न? वो भी तो तुम्हारे जाने के बाद से ही घुले जा रहे थे। और आखिर देखो बिस्तर पकड़ ही लिया।
  हम तो बस ये चाहतें हैं कि अब हम चलें जाएं ऊपर। अब हम और कुछ नही देखना चाहते बस एक इच्छा बाकी रह गई है कि आपके नन्हे से राजकुमार को बस एक नज़र देख लें , फिर आंखें मूंद लेंगे। “

  ” आप भी कैसी बातें कर रहीं हैं दादी साहब ! आंखें मूंदे आपके दुश्मन , आपको तो अभी सेंचुरी लगानी है। “

  “उड़ा लो मज़ाक ! एक तो तुम जानते हो तुम्ही में हमारी जान बसती है कुमार! और तब भी तुम हमें छोड़ कर चले गए, एक बार भी नही सोचा कि तुम्हारे बाद हमारा क्या होगा? खैर अब तुमसे क्या शिकायत करें जब तुम्हारे दादा हुकुम ने ही नही सोचा तो और कोई क्या सोचेगा…
    दादी सा का प्रलाप चलता ही रहा , उनकी नर्स ने धीमे से उन दोनों को इशारा कर दिया कि वो दोनो चाहे तो बाहर जा सकते हैं। पर राजा बाँसुरी वहीं बैठे दादी सा की बातें सुनते रहे।
    दादी सा की बातें कभी उनके अपने ज़माने में पहुंच जाती, कभी आज़ादी की लड़ाई के बारे में तो कभी दादा हुकुम द्वारा बनवाये शाही महल के बारे में बताती दादी सा कभी बच्चों सी किलकारी मार हँसने लगती कभी दुखी हो ऑंसू बहाने लगती।
   उन दोनों को ही समझ आ गया था कि दादी सा के दिमाग पर उनकी उम्र ने हस्ताक्षर कर दिए हैं। अब वो कहते कहते बातें भूलने लगीं थीं।
    कभी उन्हें लगता दादा हुकुम ज़िंदा हैं और उन्हें शाम की चाय पीने बुला रहे हैं, कभी लगता सभी बच्चे एक साथ पिकनिक पर जाने वाले हैं जिनके लिए उन्हें विदेशी तरीके के हैम सैंडविच और मिल्कशेक तैयार करवाना है और वो एलिस को आवाज़ लगाने लगती। एलिस उनके ज़माने में उनकी एंग्लोइंडियन कुक थी जो उनके पति के लिए तरह तरह के विदेशी पकवान तैयार किया करती थी।
    आखिर इतनी सारी बातें कहते कहते थक कर वो सो गयीं।
    उनके सोने के बाद नर्स ने राजा और बाँसुरी की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक तरह से निवेदन था कि अब आप लोग जाएं तो हम लोग भी आराम कर लें।
   क्योंकि उन दोनों को वहाँ बैठे दो घंटे से ऊपर हो चुके थे पर इतनी देर में न राजा ने वहाँ से उठने की जहमत की और न बाँसुरी ने।

   दादी सा के सोते ही राजा ने उठ कर उनका माथा चूमा और भारी मन से बाहर निकल गया।

बाँसुरी जानती थी कि वो दादी सा से बहुत प्यार करता है, राजा की बाहें थामे वो उसे आंखों ही में ढांढस बंधाती अपने कमरे की ओर बढ़ चली।

  *******

    समर राजा से मिलने के बाद अपने कमरे में लौटा ही था कि उसकी माँ ने उसे रोक लिया…
   आज महल में सभी खुश थे , राजा की वापसी ने सभी के चेहरों पर मुस्कन बिखेर दी थी। समर की माँ जिन्हें राजा काकी बुलाया करता था भी राजा और बाँसुरी से मिल कर लौट चुकी थीं।
  समर को वापस आया देख वो और खुश हो गयी…

” समर बेटा वो एक काम था तुमसे । पर रहने दो काम तो साधारण सा ही है, नौकर चाकर भी कर ही लेंगे। तुम जाने दो बहुत व्यस्त लग रहे हो। “

  “नही माँ आपसे बढ़ कभी कुछ ज़रूरी हुआ है क्या? काम बताइये अगर मेरा करना ज़रूरी हुआ तो मैं कर दूंगा वरना किसी से करवा लूंगा। “

  “हाँ वही तो हम कह रहे। अस्पताल वाली डाक्टरनी से हमारी दवाएं मंगवानी थी। खैर तुम रहने दो हम किसी से कह कर मंगवा लेंगे। “

” मैं ले आता हूँ। “

“नही तुम अभी अभी तो आये हो, आराम कर लो…”

  माँ की बात पूरी होने से पहले ही मैं बस यूं गया और यूँ आया कहता समर अस्पताल की ओर निकल गया।

समर अस्पताल पहुंचा, रिसेप्शन पर पता करने पर पता चला कि डॉ पिया की ड्यूटी खत्म हो चुकी है लेकिन वो ड्यूटी रूम में इस वक्त कुछ बहुत ज़रूरी काम निपटा रहीं हैं।
       वो सीढ़ियां चढ़ता ऊपर बने ड्यूटी रूम की ओर बढ़ चला। कमरे का दरवाजा हल्का खुला सा था, समर ने धीमे से नॉक किया लेकिन भीतर से कोई आहट नही हुई।
    उसने आगे बढ़ अंदर झांक कर देखा पिया ज़मीन पर बैठी किसी पेंटिंग में रंग भर रही थी। कानों में इयर फ़ोन लगाए वो गाने सुनती पूरी तल्लीनता से रंग भरने में व्यस्त थी।
   समर ठीक उसके पीछे खड़ा उसे और उसकी पेंटिंग को ही देख रहा था। पिया ने क्या बनाया था वो समझने की कोशिश कर रहा था कि पिया हाथ में रंग की डिब्बी थामे ही खड़ी हुई और जैसे ही पीछे मुड़ी सामने खड़े समर से हुई ज़ोरदार टक्कर में उसके हाथ में पकड़ रखा रंग सामने खड़े समर की सफेद शर्ट पर गिर गया और जगह जगह पर रंग के धब्बे से पड़ गए।

   पिया ने चौन्क कर अपने कान से इयर फ़ोन हटाया और रंग एक तरफ रख समर से माफी मांगने लगी। हड़बड़ी में अपने रुमाल से उस रंग को साफ करने के चक्कर में उसने रंग को और फैला दिया। समर की सफेद शर्ट पर नीले बड़े बड़े धब्बे फैल गए…

. ” सॉरी सॉरी ! वो मैंने देखा ही नही। आई एम सो सॉरी …

  ” देखा क्या आपने तो सुना भी नही। ”

  ” क्या नही सुना ? “

  ” मेरी आवाज़ ! मैंने पहले दरवाज़े के बाहर से आपको आवाज़ दी, फिर अंदर आने के बाद भी आपका नाम पुकारा लेकिन आप जाने कहाँ व्यस्त थीं। “

  पिया ने शरमा कर आंखें नीची कर लीं…

  ” वो एक्चुली आई लव पेंटिंग्स, मैं जब पेंट कर रही होती हूँ तब इतनी तल्लीन हो जातीं हूँ कि आसपास क्या घट रहा पता ही नही चलता। “

  समर ने बाजू में रखे इयर फ़ोन की तरफ देखा उसे उधर देखते देख पिया भी उधर देखने लगी, हंसते हुए झेंप कर उसने कान पकड़ लिए…

” सॉरी बाबा!! गाने भी सुन रही थी इसलिए और कुछ नही पता चला। चलिए आप फटाफट अपनी शर्ट उतार कर दीजिये मैं इसे साफ कर देती हूँ।

  पिया की बात सुन समर हँसने लगा…

” बस इसी बात का इंतेज़ार था मुझे कि तुम कब शर्ट उतारने कहोगी मुझसे। ” समर की शरारती हंसी देख पिया मुस्कुराने लगी..

” ज्यादा दिमाग चलाने की ज़रूरत नही है। मैं शर्ट साफ कर के तुरंत आपको दे दूंगी। ”

“नही कोई जल्दी नही है, आप आराम से भी दे सकती हैं… ” समर मुस्कुराते हुए अपनी कमीज के बटन खोलने लगा

“ओह गॉड ! ये तो अभी ही शर्ट उतारने लगा’ मन ही मन बुदबुदाती पिया के देखते देखते समर ने कमीज उतार कर उसके हाथ में रख दी ….
 
  ” मेरे कहने का मतलब था आप घर जाकर फिर शर्ट भिजवा देते तो मैं अच्छे से धोकर साफ कर देती,  सारे दाग भी निकल जाते।”

” ओह अच्छा ! मुझे तो लगा दाग अच्छे हैं, खैर! तो आपका ये मतलब था पर मैंने तो गलत समझ लिया। चलो कोई बात नही अब आप धोकर साफ कर दो, मैं वेट कर लेता हूँ। ”

  समर ड्यूटी रूम में रखी कैंप कॉट पर आराम से टांगे फैलाये दीवार से टिक कर बैठ गया।

  मन ही मन कुछ जोड़ घटाव करती पिया के दिमाग में कुछ चल रहा था। उसे ये डर भी था कि अस्पताल का कोई कर्मी ऊपर चला आया और बिना कमीज के उसके कमरे में समर को देख लिया तो वो क्या कहेगी। किस किस को जवाब देगी ?इसके साथ ही दिमाग मे ये बात भी थी कि बिना मशीन के अभी शर्ट हाथ से धोने पर सूखेगी नही तो समर कब तक आखिर उसके कमरे में बैठा रहेगा?
   आखिर उसे उपाय सूझ ही गया।

   वो कमीज थामे नीचे बैठ गयी , और सामने रखे रंगों से कमीज पर जगह जगह रंगों के छींटे मार उसने उस सफेद कमीज को ढेर सारे रंगों की छींट वाली कमीज बना दी। रंग भरते समय नीचे अखबार रख लेने से रंग भी जल्दी सूखते चले गए, और कुछ ही मिनटों में शर्ट एक नए कलेवर में सामने थी।
    समर की आंखों के सामने मोबाइल ज़रूर था लेकिन उसकी निगाहें पिया पर ही टिकी थी। रंगों से खेलती , कभी अपनी ज़िद्दी लटों को पीछे करती पिया उसे बेहद प्यारी लग रही थी। वो उसे देख ही रह था कि पिया ने एकदम से सर उठा कर उसे देखा और समर झेंप कर मोबाइल देखने लगा।
   मुस्कुराती हुई पिया ने शर्ट उसके सामने फैला दी

  “बताओ अब कैसी लग रही है शर्ट? ”

  ” हम्म ठीक ही हैं। मुझे तो व्हाइट पसन्द है। ”

  ” मालूम है इसलिए तो सबसे ज्यादा वाइट ही में नज़र आते हो , कभी ऑफ व्हाईट, कभी डस्क व्हाइट कभी पर्ल व्हाइट कभी प्योर व्हाइट ..

” अरे बाप रे! व्हाइट के भी इतने शेड्स होते हैं क्या ? सच मे तुम लड़कियां भी कमाल होती हो, किसी भी बात की तह तक चली जाती हो। मतलब व्हाइट के भी छप्पन शेड । हे भगवान ! कहाँ से इतना दिमाग भरा है इनके अंदर। “

   उसकी बात सुन पिया हँसने लगी

“अब जल्दी से अपनी कमीज पहन लो , कोई आ गया तो क्या सोचेगा ? “

” क्या सोचेगा पिया।”

” सोचेगा पता नही ये दोनों यहाँ कर क्या रहें हैं वो भी आप बेयर बॉडी…

  पिया अपनी बात पूरी करती झेंप गयी और समर ने मुस्कुराते हुए शर्ट पहन ली…

   “वैसे आप यहाँ आये कैसे थे?”

“अरे हाँ मैं बताना ही भूल गया। माँ की कुछ दवाएं कम थी, तुम कुछ नई दवा लिखने वाली थीं ?”

   हाँ में सर हिलाती पिया ने वहीं टेबल पर रखे अपने प्रिस्क्रिप्शन पैड पर एक दो दवाओं के नाम लिखे और साइन कर समर को थमा दिया।
   उसी समय दरवाज़े पर नॉक करती आया दीदी उन दोनों के लिए दो कप में चाय ले आयीं।

  पिया ने सामने खड़े समर की ओर चाय बढाते हुए कमरे में रखी एकमात्र कुर्सी पर उसे बैठने का इशारा किया और अपनी चाय लेकर बेड पर बैठ गयी….

“तो आखिर आ गए आज आपके हुकुम!”

” हाँ ! पर तुम्हें किसने बताया? ”

” मिसेस सिंह , आई मीन आपकी मॉम ने। आज फ़ोन किया था उन्होंने, इन्ही दवाओं के लिए। बहुत खुश लग रहीं थीं, बहुत ज्यादा। “

“हम्म !”

” आज तो आप भी बहुत खुश होंगे। “

  ” हाँ हूँ तो!”

” आपको देख कर ही लगा, वरना इतनी जल्दी मेरी कोई बात आप आसानी से मानते नही।

  समर सवालिया निगाहों से पिया को देखने लगा…

  ” और क्या ? कोई और दिन रहा होता तो आपकी शर्ट पर कलर गिराने के लिए मेरी क्लास ले ली होती!”

” हाँ और आज तुमने मेरी पूरी शर्ट ही बरबाद कर दी लेकिन मैंने कुछ नही कहा। जबकि पहले जो कलर गिरा था उसे तो मैं धुलवा कर साफ करवा सकता था लेकिन अब इस शर्ट का कुछ नही हो सकता..

” क्या मतलब ? ये अब आपके पहनने के लायक नही रही ? “

  ना में सर हिलाते हुए भी समर मुस्कुराता रहा, नाराज़ सी पिया खिड़की से बाहर देखते हुए खुद में ही बड़बड़ाने लगी…

  ” एक तो इतना आर्टिस्टिक कर दिया शर्ट को, ऊपर से इनके नखरे देखो। कैसी बोरिंग व्हाइट पहने रहतें हैं और सोचतें हैं बड़े हैंडसम लग रहे। दुनिया मे इतने रंग बने हैं पर नही इन्हें सिर्फ व्हाइट पसन्द है। “

  ” क्या कह रही हो ज़रा आवाज़ डाल के कहो तो मुझे भी सुनाई दे, खुद में बड़बड़ करोगी तो कैसे सुन पाऊंगा। ”

  समर पिया को परेशान कर रहा था कि समर के फ़ोन पर किसी का कॉल आने लगा, उसने फ़ोन उठाया और बात करते हुए बाहर निकल गया।
    बात कुछ गंभीर थी, बातें करते हुए समर सीढ़ियां उतर कर सीधे महल की ओर निकल गया..

  ” हद है ! एक बार बाय तक नही बोला और चले गए। ”

   पिया ने बाहर रखी समर की चाय की कप उठायी और अंदर ले आयी, समर इतनी हड़बड़ी में निकल गया था कि उसकी चाय कप में ही रह गयी थी। मुश्किल से दो तीन घूंट ही उसने भरे थे। पिया वापस आकर उसी कुर्सी पर बैठ गयी जिसमें समर बैठा था , और अपनी सोच में गुम पिया खिड़की से बाहर मौसम बदलते देखती हुई समर वाली कप से चाय पीने लगी।
    बाहर बादलों के आ जाने से ठंडी हवाएं बहने लगी थी और मौसम खुशगवार सा हो चला था। पिया ने एक बार कप की ओर देखा , उसका चाय का कप बेड के कॉर्नर टेबल पर रखा था, वो अब तक बैठी समर की कप से चाय पी रही थी ये ध्यान आते ही उसके चेहरे पर एक लंबी सी मुस्कान चली आयी।
    उसी समय कमरे के दरवाज़े पर समर वापस आ गया…

  ” वो मैं माँ की दवाएं ले जाना भूल गया था। ”

  उसके आते ही पिया चौन्क कर खड़ी हो गयी। उसके हाथ मे अपना बाहर भुला हुआ कप और बेड के किनारे पड़ा कप देख समर को सारी बातें समझ में आ गईं….
   वो मुस्कुरा कर अंदर आ गया…

” ये ले जाऊँ? ” पर्ची और दवाएं उठा कर उसने पूछा, पिया ने हाँ में सर हिला दिया…

मुस्कुराते हुए समर दवाएं उठाये बाहर निकल गया, खिड़की पर बैठी पिया समर को जाते हुए देखती रही।
   जाते जाते समर ने एक नज़र ऊपर कमरे की ओर उठायी, वहाँ बैठी पिया उसे ही देख रही थी, हाथ हिला कर उसे बाय करता समर अपनी गाड़ी की ओर बढ़ गया।।

**********

  महल में अगले दिन राजा का राज्याभिषेक होना था, लेकिन दादी साहेब की तबियत बहुत बिगड़ गयी थी। दादी सा को दौरे से पड़ने लगे थे, वो कभी सब कुछ भूल जाती , कभी पुरानी पुरानी बातें याद करने लगती, इसी सब में दिमाग पर ज़ोर पड़ने के कारण वो अचानक ही बेहोशी में चली गईं…
    डॉक्टर्स के अनुसार वो कोमा में चली गईं थीं….
महल के नियमों के अनुसार अगर महल का कोई भी सदस्य किसी गहन रोग की अवस्था में हो तो बिना उसकी सहमति के राज्याभिषेक नही हो सकता था। इसलिए अगले दिन होने वाले कार्य को पांच दिनों के लिए टाल दिया गया।
  महाराज को जल्दबाजी थी क्योंकि उनके अनुसार उनकी तबियत भी कुछ ढीली ही चल रही थी, और वो अपने सामने ही राजा को गद्दी सौंप देना चाहते थे।

  इसी सारी उहापोह में राजा भी उलझा बैठा था।
अब उसे अपनी बेचैनी का कारण समझ आने लगा था। उसे अंदर ही अंदर एक डर एक घबराहट सी थी , जैसे वो किसी अपने बहुत करीबी को खो देगा। अपनी परेशानियों में खोया वो चुपचाप अपने कमरे में बैठा अपना पुराना फैमिली एलबम देख रहा था, की बाँसुरी कमरे में चली आयी…

” क्या हुआ साहेब! बड़े गुमसुम से लग रहे आप?

  ” कुछ नही बाँसुरी ! आओ बैठो यहाँ। ”

   ” एक बात बतानी थी साहेब! आप तो जानते ही हैं कि मैंने ठाकुर साहब को नोटिस भेजा था, उसी सब आधार पर जब पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने गयी तब तक वो वहाँ से फरार हो चुके थे। अभी पुलिस उन्हें ढूंढने में लगी है लेकिन उनका कोई अता पता नही है।”

” हम्म !”

  राजा के इस छोटे से जवाब से ही उसे समझ में आ गया कि वो कुछ गहरी चोट लिए बैठा है वरना उसकी बताई किसी भी बात पर इतना ठंडा सा जवाब नही देता। वो उसके पास उसके कंधे पर सिर टिका कर बैठ गयी..

” बहुत परेशान लग रहे साहब!”

राजा चुप ही था, शायद वो भी अपनी घबराहट को शब्द नही दे पा रहा था। ऐसे समय मे अक्सर वो कुछ देर के लिए खुद में गुम हो जाया करता था, आंखों से लगातार खुले आसमान की ओर ताकते और होंठों में कुछ बुदबुदाते राजा को देख बाँसुरी समझ गयी कि वो अभी अपने भगवान से बातें करने में लगा है।
   उसके साथ चुपचाप बैठी बाँसुरी उसके साथ बैठी उसका इंतेज़ार करती रही।

   फ़ोन की रिंग बजने से वो अपने खयालों से बाहर आ गयी। उसने देखा फ़ोन शेखर का था…

” कैसे हैं शेखर जी? “

” ठीक ही हूँ, आप कैसी हैं? आपके लिए एक शानदार खबर है। वैसे मुझे पता चल गया है कि आप हमारे शहर वापस आ चुकीं हैं।

” हाँ अभी छुट्टी पर हूँ। आप बताइए क्या खबर है?

” राजा साहब और आपसे मिलने पर ही बताऊंगा। “

बाँसुरी ने  राजा की तरफ देखा, फ़ोन की आवाज़ से उसकी विचार श्रृंखला भी टूट गयी थी, वो भी बाँसुरी की तरफ ही देख रहा था, उससे इशारों में अनुमति लेकर बाँसुरी ने शेखर को अगली सुबह महल में बुला लिया, हालांकि महल के जैसे हालात थे और जिस तरह से दादी सा और महाराज की तबियत थी, महल में भी सभी डरे सहमे से थे लेकिन महल पर आवाजाही तो नही रोकी जा सकती थी, यही सोच कर राजा ने भी उसे आने की इजाजत दे दी।
    शेखर से बात कर रखने के बाद बाँसुरी राजा का हाथ थामे बैठी रही,वो भी उसके मन में चलते द्वंद को समझ रही थी। बिना कुछ कहे वो चुप बैठी रही…

” बाँसुरी ! ”

” हाँ कहिये। ”

” अपना ध्यान रखा करो। आजकल जाने क्यों मुझे अंदर से बहुत डर सा लगने लगा है कि जैसे मैं किसी करीबी को खो न दूँ । हालांकि जानता हूँ दादी सा को ऐसी हालत में देखने के कारण या डैड की बातें सुनने के कारण ही ऐसा लग रहा है, लेकिन क्या करूँ  एक अजीब सा डर बैठ गया है मन में।”

” डरिये घबराइए मत, जो होना है वो तो होकर ही रहेगा, हमारे सोचने से कुछ बदलेगा नही साहब। इसलिए वर्तमान में रहिए,भविष्य मे क्या होगा  ये सोच सोच कर दुखी मत रहिये।”

” हाँ शायद तुम ठीक कह रही हो, मुझे सोचना कम चाहिए। ”

बाँसुरी ने कॉफी का कप राजा की ओर बढ़ाया और खुद अपना कप लिए उसके पास सरक आयी।
  कहने को उसने राजा से कह तो दिया लेकिन खुद उसके मन को जो डर की छूत लग गयी थी उसका वो क्या करे उसकी समझ से परे था।

   रात का खाना महल के नियमों से हुआ तो नीचे ही, सभी एक साथ थे, बस दादी सा और महाराज की कुर्सियां खाली थी, लेकिन खाया किसी से नही जा रहा था।
   आज लगभग पूरा परिवार साथ था, पिंकी रतन के सामने ही आदित्य बैठा था। आदित्य के बारे में जानने के बाद रतन तो आदित्य से बड़ी जिंदादिली से मिला लेकिन पिंकी ने अपना मुहँ फेर लिया था।
      हालांकि पिंकी की माँ भी अपने शांत सौम्य स्वभाव के बावजूद आदित्य को इतनी जल्दी मन से नही अपना पा रही थी, लेकिन उन्होंने अपनी नाराजगी सभी के सामने दिखाई भी नही थी। आदित्य राजा के बाजू में बैठा धीरे धीरे खा रहा था। युवराज उसका विशेष ध्यान रखे था। सभी शांत बैठे थे जैसे खाने का सिर्फ अभिनय करना हो कि उस शांत माहौल में आदित्य के मोबाइल की घंटी ने सभी का ध्यान तोड़ दिया…

  आदित्य ने देखा फ़ोन केसर का था, उसने काट दिया। काटते ही फिर केसर का कॉल आने लगा । आखिर चार बार फ़ोन काटने के बाद वो धीरे से फ़ोन उठाये  कमरे से बाहर निकल गया…
     केसर की घबराई सी आवाज़ उसके कानों में पड़ी.

” आदित्य प्लीज़ हमारी बात सुने बिना फ़ोन मत काटना..”

” जल्दी बोलो , क्या कहना चाहती हो।

“हमारी जान खतरे में है,.. हम सारी बात तुमसे कहना चाहतें हैं ,ध्यान से सुनना।
   हमारे साथ साथ अजातशत्रु की भी…

  केसर इसके आगे अपनी बात पूरी नही कर पाई, वो जहाँ से बात कर रही थी, वहाँ हो रही तूफान और बारिश में वैसे ही उसकी आवाज़ ठीक से सुनाई नही पड़ रही थी , और उस पर बात आधी ही रह गयी और उसका फ़ोन कट गया।
   आदित्य ने वापस डायल किया लेकिन केसर का नम्बर बंद आता देख वो फ़ोन जेब में डाले वहीं चहलकदमी करने लगा ।

  वो वहाँ  केसर की बातों पर गौर करने की कोशिश कर रहा था, उसने अपनी जान खतरे में बताई और साथ ही राजा अजातशत्रु की भी?
  अगर केसर की जान खतरे में है तो वो यहाँ बैठे कैसे उसे बचा सकता है?
   उसने तुरंत अपने सुरक्षा कर्मियों की टीम को फ़ोन लगाया और केसर का नम्बर ट्रेस करने बोल उसको ढूंढ निकालने की आज्ञा दे दी, उसके पास भी सुरक्षा गार्ड्स की लंबी चौड़ी फौज थी, और सभी आदित्य के एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार थे।
   उन सब को दौड़ाने के बाद भी उसके मन में अभी भी हलचल मची थी कि किसी तरह केसर की जान बच जाए, आखिर इतनी सारी राज़ की बातें बताने के बाद अब और कौन सी ऐसी बात बची रह गयी थी जो वो उसे बताना चाह रही थी……


क्रमशः


aparna……




aparna.. 

       



       

जीवनसाथी-96

जीवनसाथी -96




            बाँसुरी ऑफ़िस निकलने तैयार हो रही थी, राजा बाहर बाँसुरी के ड्राइवर के पास खड़ा उसके हाल चाल पूछ रहा था। आदित्य अपने कमरे में खिड़की पर खड़ा चाय पीते हुए बाहर खड़े राजा की सरलता को देख रहा था।
    बताओ ये किसी रियासत के राजा जी हैं जो अपनी पत्नि की गाड़ी के ड्राइवर से उसकी गृहस्थी के बारे में जानकारी ले रहे हैं।
   क्या इतना सरल भी कोई हो सकता है।

  राजा का फ़ोन अंदर ही पड़ा था, समर का फ़ोन राजा के फ़ोन में आने लगा।

     घर पर काम करने वाली मेड ने फोन उठाया और बाहर लाकर राजा को थमा दिया….

  ” हुकुम कैसे हैं आप? “

  ” ठीक हूँ समर! तुम बताओ। वहाँ क्या हाल हैं? महल में सब ठीक हैं?”

” हुकुम आपकी घर वापसी का समय हो गया लगता है। “

” क्या हुआ समर ? “

” महाराज हुकुम की तबियत कुछ ठीक नही लग रही, आपको बहुत याद कर रहें हैं। रानी माँ साहेब ने तुरंत आपको बुलाने कहा है। ”

   राजा की समर से बात हो ही रही थी कि युवराज का भी फ़ोन आने लगा। राजा समझ गया कि बात कुछ अधिक ही गंभीर है अन्यथा समर और युवराज एक साथ उसे कभी फ़ोन नही करते।
    समर से बात कर उसने फ़ोन रखा और तुरंत बाँसुरी को बताने भीतर चला गया।

   राजा के बाँसुरी से बात करते में आदित्य भी चला आया। राजा और बाँसुरी के चेहरों का रंग देख उसे भी समझ आ गया था कि कोई बड़ी बात है वरना छोटी मोटी बातों को तो ये राजसी जोड़ी यूँ ही हवा में उड़ा दिया करती थी।

   आखिर उससे रहा नही गया और उसने खुद से होकर राजा से पूछ ही लिया….

  ” कोई प्रॉब्लम है क्या? “

  राजा ने आदित्य की ओर देखा और हाँ में सर हिला दिया..

  ” मेरे डैड यानी महल के महाराज हुकुम की तबियत ठीक नही है। ऐसे कुछ छोटा मोटा होता तो डैड मुझे कभी नही बुलाते लेकिन वो और मॉम मुझे वापस बुला रहे यही सोचने वाली बात है।
   खैर ! बाँसुरी तुम फटाफट पैकिंग कर लो मैं तब तक देखूँ की समर ने टिकट्स करवा दिए या नही। तुम्हें अपने ऑफिस में छुट्टी भी तो डालनी पड़ेगी न! “

  ” उसकी आप चिंता न करें, मैंने तो ऑलरेडी छुट्टी डाल रखी थी आपके पास आने के लिए, बस उसे थोड़ा प्रीपोन कर लुंगी। आप जाइये टिकट्स देखिए, पैकिंग हुई जाती है।”

आदित्य को एक ही रात में इस जोड़े से लगाव से हो गया था, उसे इस तरह इन दोनों का चले जाना रास नही आ रहा था। मन ही मन वो चाह रहा था कि किसी तरह ये दोनों रुक जाएँ । वो उनकी संगत से इतनी जल्दी दूर नही होना चाहता था।
   और आखिर भगवान ने उसकी सुन ली।

  ” आदित्य !”

  ” जी भैया! ” आदित्य खुद राजा के पुकारे जाने पर अपने इस तरह से राजा को संबोधित किये जाने से चौन्क कर शर्मिंदा हो गया…

  ” सॉरी गलती से मुहँ से निकल गया। ”

  ” अरे इसमें क्या गलत हुआ। तुमसे बड़ा हूँ और भाई भी हूँ तो इस नाते भैया ही तो बुलाओगे न।”

  ” जी ! ”

  ” अच्छा सुनो। किसी से कह कर अपना सामान भी पैक करवा कर् मंगवा लो।”.

  ” जी? ”

  आदित्य के चेहरे पर खिंचे सवाल देख राजा हल्के से मुस्कुरा उठा

  ” तुम भी हमारे साथ चल रहे हो आदित्य!”

  “पर !”

  ” पर वर किंतु परन्तु कुछ नही चलेगा। महल अपने छोटे राजकुमार का इंतेज़ार कर रहा है । समझे। फटाफट समान मंगवा लो, कुछ घंटों में हमारी फ्लाइट है।

आदित्य को अब भी झिझक हो रही थी,पर राजा और बाँसुरी के बहुत जोर देने पर उसने किसी को फ़ोन कर अपना सामान मंगवा लिया।

    समर ने राजा के कहने पर टिकट्स की व्यवस्था की कोशिश जरूर की लेकिन तुरंत ही कोई फ़्लाइट न होने से समर ने महल से चॉपर ही भेज दिया।
   राजा को शुरू से ही अपने खुद पर निरर्थक खर्च किया जाना कभी पसन्द नही था, लेकिन अभी कोई और उपाय न होने से उसने समर की बात मान ली और चॉपर के आते ही तीनो लोग वहाँ से महल के लिए निकल गए।

    राजा को फ़ोन करने के साथ ही समर प्रेम को भी फ़ोन कर चुका था, वैसे तो प्रेम राजा को कहीं अकेले जाने नही दिया करता था पर राजा के बहुत जोर देने पर ही अपने दो अनुचरों को सादे कपड़ों में राजा के साथ भेज कर भी प्रेम संतुष्ट नही था और उसी शाम वो खुद राजा के पास निकलने की तैयारी में था कि समर का बुलावा आ गया और राजा से बात कर वो भी निरमा को साथ ले महल के लिए निकल गया।


  ********


    रतन अपने ऑफिस पहुंचा ही था कि उसके फ़ोन पर भी समर का फ़ोन चला आया। और वो फटाफट एक आध काम निपटा कर घर निकल गया।
      उसकी ज़िद्दी राजकुमारी जो शादी से पहले अपने महल और उसके कायदों से तंग आ कर उनका मजाक उड़ाया करती थी, अब बात बात पर उसी महल के उन्हीं कायदों को अपनी छोटी सी दुनिया में निभाती वापस महल की लाडली राजकुमारी बन बैठी थी, ऐसे में महल से जुड़ी कोई भी दुख भरी बात पिंकी के लिए पहाड़ समान थी ये जानते हुए भी उससे किसी प्रकार का दुराव छिपाव किये बिना रतन ने उसे महाराज की नाजुक हालत बता कर तुरंत महल के लिए निकलने की व्यवस्था करने निकल गया।
    ऑंसू बहाती पिंकी फटाफट कपड़े समेटने और पैकिंग करने में लग गयी।

******

        भास्कर अपने किसी आर्टिकल को लिखने में व्यस्त था कि अदिति दो कप में चाय और कुकीज़ लिए चली आयी…

” क्या बात है, आज तो बड़े ध्यान से कुछ लिखा जा रहा है? “

   भास्कर ने एक नज़र अदिति को देखा और वापस लिखने लग गया…

  ” टॉपिक क्या है ये तो बताईए ज़नाब! ऐसे क्या डूबे जा रहे? “

  ” संडे स्पेशल लिख रहा हूं, टॉपिक है ‘ मायानगरी ‘

  ” मायानगरी ? ये कैसा टॉपिक है? “

  ” ये एक्चुली कोई टॉपिक नही है, ये एक नॉवेल का नाम है..
     उसी नॉवेल का रिव्यू मुझे लिखने दिया गया है।।

  ” तो ऐसा है क्या इस नॉवेल में? “

  ” ये कहानी एक मध्यमवर्गीय लड़के और लड़की की कहानी है जिसमें लड़की बहुत पढ़ लिख कर मेहनत से मेडिकल की सीट पर आती है , जहाँ मेडिकल कॉलेज में आने के बाद उसे मेडिकल सीट्स की धांधलियों का पता चलता है, अस्पताल में चल रही अव्यवस्थाओं का पता चलता है, उन सब से अकेली लड़ती वो सिस्टम के खिलाफ खड़ी होने की कोशिश करती है जहाँ उसकी मदद करता है वो लड़का जो उसके कैम्पस के ही इंजीनियरिंग का छात्र है।शुरू में होने वाली हल्की फुल्की नोंक झोंक आगे चल कर गहरे प्यार में बदल जाती है।

   ” ह्म्म्म कहानी रोचक लग रही है।”

   ” कहानी आगे और भी रोचक हो जाती है जब लड़का इंजीनियरिंग के बाद अहमदाबाद के एम्स से ही एम बी ए के लिए दो बार तैयारी करता है लेकिन अहमदाबाद में सीट नही मिलती।
   तब वो इंजीनियरिंग विद्यार्थी वहाँ कॉलेज के बाहर पड़े पड़े एक दिन वहीं अपना छोटा सा टी स्टॉल डालता है और एक दिन अहमदाबाद के सबसे बड़े टी कॉर्नर का मालिक बन उसी बिज़नेस मैनेजमेंट कॉलेज जिससे मैनेजमेंट की डिग्री लेने का उसका सपना होता है में विद्यर्थियों को मैनेजमेंट के गुर सिखाने जाता है। ये तो मैंने मोटा मोटी सुनाया है, कहानी के अंदर बहुत से मोड़ आते है जो कहानी को कभी पहाड़ों की ऊंचाई पर तो कभी समंदर की गहराइयों तक ले जातें हैं।ऐसे सारे मोड़ो पर भी उन दोनों का प्यार कम नही होता।
   यही है मायानगरी का सच और किस्सा!

  ” है किसकी कहानी? “

  ” वो तो तुम मेरे रिव्यू में ही पढ़ लेना। फिलहाल आओ चाय पी ली जाएं। अरे ये कागज़ कैसे रखें हैं ट्रे में।”

  ” कुछ लीगल नोटिस आया है तुम्हारे नाम का?”

  “व्हाट ! पहले क्यों नही बताया? कब आया ये नोटिस? ऐसा मैने क्या कर दिया जो मुझे नोटिस आ गया? “

  घबरा कर आदित्य जल्दी जल्दी उन कागजों को खोल पढ़ने लगा…

   ” अब जो भी है , तुम्हारा किया धरा है, तभी तो तुम्हे नोटिस भेजा गया पड़ोसी को नही।”

  अब तक में आदित्य उन कागजों को पढ़ चुका था और उसके चेहरे पर एक सुकून भरी प्यारी सी मुस्कान फैल चुकी थी।

   ” तो ये नोटिस सिर्फ होने वाले पप्पा के लिए है ऐसा क्यों? होने वाली मम्मा के लिए क्यों नही? “

  ” क्योंकि मम्मा को तो पहले ही पता चल गया था।”

   मुस्कुरा कर अदिति ने अपनी सोनोग्राफी की रिपोर्ट्स उठा ली और वापस खोले देखने लगी।

  ” लव यू अदिति। पहले क्यों नही बताया मुझे।”

‘ पहले बता देती तो चेहरे की ये वाली चमक और मुस्कान कहाँ देखने मिलती मुझे।

    हँस कर भास्कर ने अदिति को गले से लगा लिया..

  ” तो मैडम एडिटर कब से छुट्टी लेना चाहती हैं। ”

  ” मैं बिल्कुल कोई छुट्टी नही लेना चाहती , अपने काम और प्रेग्नेंसी दोनो में बैलेंस बना कर दोनो को एन्जॉय करना चाहती हूँ।”

   ” ओके मैंम , जैसा आप ठीक समझें। तो कल चले डॉक्टर के पास।  एक बार मेरे साथ चल कर भी रूटीन टेस्ट करवा लीजिये। ”

   अदिति ने मुस्कुरा कर हाँ में सर हिला दिया,भास्कर ने उसके माथे पर प्यार से हाथ फिराया और अपनी माँ को ये खुशखबरी सुनाने चला गया।।  
    आखिर पहले अपनी माँ को ही खुशखबरी देंगे , ये नही की मेरी माँ को पहले बता दें। पर चलो कोई नही यही तो अंतर होता है एक पति और एक बेटे में।
    मन ही मन सोचती अदिति मुस्कुरा कर अपनी माँ को फ़ोन लगाने चली गयी।


   ********


        राजा बाँसुरी के चॉपर से उतर कर गाड़ी तक बढ़ने में ही रियासत की जनता ने राजा अजातशत्रु की जय के नारे लगाने शुरू कर दिए, महल के राजा और रानी पर बरसते फूलों के साथ ही दोनों की सलामती की दुआएं भी हवाओ में बहने लगी थी….
    बाँसुरी तो अब रियासत की जनता के राजा के प्रति लगाव से परिचित थी लेकिन आदित्य के लिए ये सब कुछ एकदम नया था।
    बहुत हद तक जानने के बाद भी हर बार राजा अजातशत्रु का कोई न कोई पक्ष उससे छूटा रह ही जाता था।
     राजा अजातशत्रु के लिए लोगो के मन का प्यार देख वो आश्चर्यचकित था, क्या आज की मतलबी दुनिया के लोग इस हद तक अपने राजा से प्यार कर सकते हैं?
  जैसे जैसे वो लोग आगे बढ़ते जा रहे थे, कोई राजा के सामने प्रणाम की मुद्रा में पूरा का पूरा झुकता चला जा रहा था तो कोई दंडवत प्रणाम कर रहा था, अधिकतर लोग अपने साथ लाये दूध या पानी को उसके पैरों में चढ़ा कर एक ओर खड़े होते जा रहे थे।
   इतनी भीड़ थी, हज़ारों लोग थे, कोई पुलिस या व्यवस्थापक नही थे लेकिन सब कुछ व्यवस्थित था। इस पूरी भीड़ ने जैसे खुद ही में एक अनुशासन बनाये रखा था कि उनके कारण उनके प्रिय राजा और रानी को कोई कष्ट न हो।
     एक छोटी सी बालिका गुलाब लिए राजा के पास चली आयी… गुलाब लेकर राजा ने उसे गोद में उठा कर प्यार किया और नीचे उतार कर अपनी आदत से मजबूर अपने गले से अपनी सोने की चेन उतारने को अपना हाथ बढ़ाया, लेकिन गले में कोई चेन थी ही कहाँ?
    राजा जी तो महल से जाते हुए सब यहीं उतार कर चले गए थे…
    हाथ का सोने का मढ़ा रुद्राक्ष बस बाकी था, वो उसे खोलने जाने ही वाले थे कि उनका हाथ थाम बाँसुरी ने उन्हें रोक दिया , अपने गले मे  पड़ी सोने की चेन उतार उसने उस बच्ची के गले में डाल दी।
     जयकारों की गूंज कुछ और तेज़ हो गयी, आदित्य इस राजसी जोड़ी के आपसी तालमेल , समझ बूझ को देखता और भी ज्यादा इनके प्रति श्रद्धा से भरता चला गया…

   महल में राजा के पहुँचते में ही कुछ आगे पीछे समय अनुसार प्रेम निरमा , पिंकी रतन सभी पहुंच गए।
  महाराजा जी की तबियत कुछ ज्यादा ही खराब थी,  उन्होंने जैसे ये मान लिया था कि उनका अंतिम समय आ चुका है, और वो एक बार अपने सभी बच्चों से मिलना चाहतें हैं।
     राजा के साथ बचपन से वो थोड़े सख्त रहे थे, लेकिन जैसे जैसे राजा बड़ा होता गया था उन्हें उसी में अपना और रियासत का भविष्य दिखने लगा था, और एक समय ऐसा भी आ गया था जब राजा उनकी आंखों का तारा बन चुका था।
    राजा के जाने के बाद विराज के शासन में मची अफरातफरी उनके साथ साथ रानी माँ ने भी देखी थी और अब तक विराज की पक्षधर रही रानी माँ भी कहीं न कहीं विराज के निकम्मेपन से अंदर से दुखी थी, अब वो भी मान चुकी थी कि गद्दी विराज के बस की बात नही है, और इसी से उनसे सलाह मशविरा कर महाराजा जी ने एक कठोर निर्णय ले रखा था।

    सबके उनके कमरे में पहुंचते ही उन्होंने युवराज राजा विराज और विराट को अपने पास बुला लिया, अपने चारों पुत्रो के साथ वो कुछ चर्चा करना चाहते थे।
      कुछ देर में ही रानी माँ और बाकी लोगों को भी अंदर बुला लिया गया और महाराज हुकुम ने अपना निर्णय वहाँ खड़े सभी को सुना दिया…

  ” जैसा कि आप सभी जानते हैं, गद्दी के उत्तराधिकारी की दौड़ में हमारे बेटों में जो भी आगे पीछे रहा हो लेकिन कुमार के बाद गद्दी में विराज को भी बैठने का मौका दिया गया, जिस मौके में वो पूरी तरह असफल रहा और इस बात को स्वयं विराज भी स्वीकार करते है। कुछ ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से युवराज गद्दी पर नही बैठना चाहते ।
     हर बात पर विचार करने के बाद सर्वसम्मति से यही निर्णय सही बैठता है कि राजा अजातशत्रु वापस अपनी जगह अपनी गद्दी संभाल लें।
    हम अपने जीवन काल में अपनी आंखों के सामने रियासत की गद्दी किन्ही होनहार हाथों में सौंपना चाहतें हैं जिससे हम चैन से मर सकें। अजातशत्रु के जाने के बाद रियासत और यहाँ की जनता को कई तरह की अव्यवस्थाओं का सामना करना पड़ा और इसके अलावा अपने राजा के बिना गद्दी अनाथ सी हो जाती है। उसे किन्हीं लायक हाथों में सौंपना भी हमारी जिम्मेदारी है। अगर किसी को भी हमारे निर्णय से आपत्ति है तो अभी अपनी आपत्ति मय कारण दर्ज करे जिससे उसकी शंका का समाधान किया जा सके, वरना आज ही रियासत राजा अजातशत्रु को सौंप दी जाएगी।

      सभी शांत थे सभी के चेहरों पर एक संतोष था। वही रानी माँ जो किसी वक्त अपने साथ हुई अनदेखी का बदला राजा से लेने के लिए और अपने बेटे को राजगद्दी पर बैठाने के लिए जी जान से प्रयासरत थी आज अपने किये कर्मो पर पश्चाताप करती खड़ी थीं।
  राजा ने उनसे बिना कुछ बोले ही उन्हें समझाने की लाख कोशिशें करने के बाद आखिरी उपाय यही अपनाया था कि उनकी इच्छानुसार गद्दी विराज को दे दी थी , और बस इन्हीं चंद महीनों में रानी माँ को भी अपनी भूल समझ आ गयी थी।
    उन्हें रह रह के वो समय याद आने लगा था जब एक बार उन्हें किसी कार्य के लिए कुछ मोटी रकम की ज़रूरत पड़ी थी और उन्होंने अपने सहायक से राजा को संदेश बस भिजवाया था कि आधे घंटे के अंदर राजा समर के साथ रुपयों का बैग लिए खुद रानी माँ के सामने मौजूद था…

  ” कुमार आप खुद क्यों चले आये? किसी के हाथ भिजवा देते। चलिए आप आ ही गए हैं तो हम इन पैसों की क्या ज़रूरत है वो भी आपको बता देते हैं। ”

   पैसों को एक ओर रख राजा ने झुक कर रानी माँ को प्रणाम किया और एक तरफ बैठ गया…

  “आपका आदेश पत्थर की लकीर है मॉम! आपको ज़रूरत है यही सबसे महत्वपूर्ण है। आप माँ है जो कभी गलत नही होती, क्या इन थोड़े से रुपयों का भी अब मैं आपसे हिसाब लूंगा।
    बस एक बात की शिकायत करूँगा वो ये की मैं भले ही सारी रियासत के लिए राजा हूँ लेकिन आपका तो बेटा ही हूँ फिर अपनी जरूरत के लिए मुझसे कैसा आग्रह? आप तो आदेश किया कीजिये।
   और फिर तिजोरी का रखवाला ये खड़ा है समर। आपको जब जितना चाहिए आप सीधे समर को आदेश करें वो आप तक खुद लेकर आ जायेगा,मैं आप दोनो के बीच आने वाला कौन होता हूँ। ”

  उस वक्त रानी माँ मुस्कुरा कर रह गयी थी, और राजा अजातशत्रु पैसो को वहीं छोड़ अपने मंत्री के साथ एक बार फिर उन्हें प्रणाम कर बाहर निकल गए थे।

    राजा के जाने के बाद एक बार जब उन्होंने पैसों के लिए समर से कहा तो राजा की बात याद रख समर पैसे लिए रानी माँ के कमरे की ओर जा रहा था कि विराज ने उसे टोक दिया था…

   ” समर हम से बिना पूछे इतने रुपये कहाँ ले जा रहे हो?”

  ” जी वो रानी माँ हुकुम ने मंगवाए हैं!”

” इतने रुपये ! ऐसा क्या काम पड़ गया माँ साहब को ? तुमने पूछा नही? “

” जी नही राजा साहेब ! मैं उनसे सवाल करने वाला कौन होता हूँ? “

  ” हम तो पूछ सकते हैं, अभी आप माँ साहेब को फ़ोन लगाइए। ”

  विराज के कहने पर समर ने रानी माँ को फ़ोन लगा कर विराज को थमा दिया और उसने उनसे सारा हिसाब किताब पूछने के बाद भी तिजोरी पर पड़ने वाले अतिरिक्त भार के कारण भेजे जाने वाले रुपयों का पूरा हिसाब किताब माँगते हुए उसमें से आधी राशि ही रानी माँ के पास भेजी…
    विराज की उस हरकत पर रानी माँ हतप्रभ थीं पर उनसे उस वक्त कुछ कहते नही बना, अपना सा मुहँ लिए वो न समर से कुछ कह पायीं और न ही विराज से।

   बस मन में एक लहर सी उठ कर चली गयी और वो एक आह भर कर रह गईं।

   आज जब महाराजा हुकुम ने वापस राजा को गद्दी पर बैठाने की बात रखी तो वो सारी पुरानी बातें उनकी आंखों के सामने से आकर चली गईं।
    

  ” कुमार अब हमारे सब के साथ रियासत की जनता भी बेचैन होने लगी है। आप अपनी गद्दी संभाल लीजिये बेटा। ”

  रानी माँ के मुहँ से ऐसा सुनते ही वहाँ खड़े सभी लोगों के साथ साथ विराज ने भी एक बारगी चौन्क कर अपनी माँ को देखा और वापस राजा की ओर मुड़ गया…

  ” कुमार आपकी गद्दी आपके बिना उदास है। अब माफ कीजिये हमें। हम फ़िज़ूल ज़िद पकड़े बैठे थे,  खुद को साबित करना चाहते थे कि हम भी आपसे कम नही हैं। लेकिन सच कहें तो आपका हमारा कोई मुकाबला ही नही। आप आप हैं, आपकी जगह इस जन्म में तो हम कभी नही ले सकते। अब आपकी जगह अगर कोई लेगा तो वो आपका बेटा ही हो सकता है और कोई नही। ”

   विराज की बात का समर्थन वहाँ खड़े युवराज ने भी कर दिया ..

  “अब वापस आ जाओ कुमार !”

  ” जी भैया! बस मैं डैड से कुछ मांगना चाहता हूँ। ”

   अबकी बार महाराजा हुकुम के माथे पर सवालिया निशान उभर आये..

  ” राजगद्दी पर किसी और को बैठाने की शर्त के अलावा आप कुछ भी मांग सकते हैं अजातशत्रु। ”

” जी जैसी आपकी इच्छा !”

” बोलिये क्या मांगना चाहतें हैं। ”


   राजा ने वहाँ बैठे सभी लोगों को अदित्यप्रताप के बारे में सब कुछ बता दिया। वहाँ उपस्थित लोग वैसे भी ठाकुर साहब को अच्छे से जानते थे, लेकिन वो इस तरह से आदित्य को मोहरा बना कर उनके पूरे खानदान को खत्म करने की सोच सकते हैं ऐसा किसी ने नही सोचा था।
    विराज गुस्से में तमकता रेखा से झड़प करने उठ बैठा उसे युवराज ने वापस बैठा दिया…

  ” इसमें रेखा की क्या गलती विराज? हो सकता है इतना सब उसे पता ही न हो। तुम एक बार शांत मन से बता कर तो देखो, उसके बार उसके चेहरे पर आने वाले भाव स्पष्ठ कर देंगे कि वो क्या और कितना जानती हैं। अनजाने में ही उसे कोई कष्ट न दो। ”

  युवराज की बात सुन विराज चुप बैठ गया। आदित्य के बारे में जान कर सभी के चेहरों पर हल्की सी दुख की परछाई आयी और चली गयी। राजमहलों में दो तीन शादियां होना वैसे भी कोई बड़ी बात नही थी, और फिर आदित्य के जन्म के बाद तो उसके पिता उसे अपनाना भी चाहते थे। उन्होंने आदित्य के बारे में सुन राजा को गले से लगा लिया…

” जो हम अपनी पूरी ज़िंदगी नही कर पाए, आपने इतनी आसानी से कर दिया कुमार !
    अभी कहाँ हैं आदित्य? “

  राजा उसे अपने कमरे में ही छोड़ कर आया था। उसने महाराज से पूछ कर उसे बुलाने किसी को भेज दिया….
  बड़े संकोच के साथ ही आदित्य उस कमरे तक आया और राजा ने उसे हाथ पकड़ सबके पास खींच लिया।
    सब एक दूजे को देखते बैठे थे कि महाराजा जी का क्या निर्णय होता है। उनकी आज्ञा के बिना आदित्य को परिवार में मिलाना मुश्किल ही था।

   कुछ तो अपना अंत समय देखते हुए महाराजा जी शिथिल पड़ चुके थे और कुछ उनकी रियासत को राजकुमारों की आवश्यकता भी थी। बात जो भी रही हो महाराज साहेब ने आदित्य को अपने परिवार में सम्मिलित करने की आज्ञा दे दी।
   उनकी आज्ञा मिलते ही काका साहेब ने उठ कर आदित्य को गले से लगा लिया…

  ” बेटा कहाँ कहाँ नही ढूंढा तुम्हे। जाने कितनी बार तो  तुम्हारे मामा के घर जा चुका था तुम्हें पूछने, पर न उन्होंने तुमसे मिलने दिया और न तुम्हारा कोई अता पता बताया। एक बेटे के मोह में तड़पते पिता का क्या हाल होता है तुम सब नही समझ सकते। ”

    आदित्य को सीने से लगाए खड़े काका साहेब के ऑंसू लगातार बहते रहे। उन्हें कंधो से थपथपा कर शांत करते युवराज ने उन्हें  सम्भाल कर एक ओर बैठा दिया।

   युवराज ने भी आदित्य को गले से लगा लिया..

” परिवार में आपका स्वागत है छोटे राजकुमार !”

  उसके बाद तो एक एक कर सभी आकर आदित्य से मिलते चले गए। रानी माँ के आशीर्वाद के बाद सभा समाप्त कर दी गयी ।
   समर और युवराज अगले दिन होने वाले राजतिलक की तैयारियों में चले गये……..

    लेकिन इतना सब सही हो जाने पर भी अभी भी कुछ तो था जो राजा को बेचैन किये था, उसके मन मे खटक रहा था,वो अपने मन की बेचैनी दूर करने बाँसुरी के पास चला गया….

   क्रमशः



   aparna…











        

जीवनसाथी-95

जीवनसाथी– 95


       आदित्य की गाड़ी रास्ते के उतार चढ़ाव देखे बिना बस भागती चली जा रही थी।
   राजा ने अपनी गाड़ी उसी के पीछे भगा दी।
मौसम भी साथ नही दे रहा था, तेज़ आंधी पानी ने रास्ते की भयावहता को और बढ़ा दिया था ।
तेज़ी से आगे बढ़ती आदित्य की गाड़ी एक अंधे मोड़ पर तेज़ी से मुड़ी और गाड़ी पर से कंट्रोल खो जाने से एक ज़ोर की पलटी खा कर कुछ दूर लुढ़कती चली गयी।
      राजा की गाड़ी पीछे ही होने से उसके सामने ही ये हादसा हुआ और वो तुरंत आदित्य की गाड़ी के पास पहुंच गया।
   गाड़ी में अंदर फंसे हुए आदित्य को बाँसुरी की मदद से निकाल कर राजा को अपनी गाड़ी में डालते हुए एक नज़र देखने के बाद आदित्य ने आंखे मूंद ली।

    पुलिस को दुर्घटना की जानकारी देने के बाद आदित्य को अपनी गाड़ी में डाले दोनो वहाँ से सीधे अस्पताल निकल गए।
   अस्पताल पहुंचने तक मे आदित्य को होश भी आ चुका था। बाँसुरी के क्रेडेंशियल्स पाते ही डाक्टरों ने तुरंत ही आदित्य का प्राथमिक उपचार शुरू कर दिया।
    कुछ सामान्य चोटों के अलावा कोई अंदरूनी और गहरी चोट न होने से कुछ दर्द निवारक दवाओं के साथ ही आदित्य की छुट्टी हो गयी।
        राजा डॉक्टर से बात कर आदित्य के कमरे में वापस आया तब तक आदित्य अपने बेड पर चुपचाप बैठा अपने विचारों में मग्न था।
   राजा के अंदर आते ही वो खुद में संकुचित सा चुप बैठा रहा। राजा उसके स्वभाव को अब तक भली तरह समझ चुका था, इसलिए ज्यादा कुछ कहे बिना उसके सामने आ कर खड़ा हो गया..

” घर चलें आदित्य? “

  राजा के मुहँ से अपना नाम सुन आदित्य के अंदर भी कुछ पिघल सा गया, उसे लगा वो आगे बढ़ कर राजा के सीने से लग जाये और अपने इतने सालों के गुस्से को रो धोकर बहा दे, लेकिन उसने ऐसा नही किया। चुपचाप अपनी जगह से वो खड़ा हुआ ही था कि राजा ने कॉर्नर टेबल पर रखी उसकी दवाएं उठा कर साथ रख ली। वापस मुड़ कर उसने आदित्य के कंधे पर हाथ रखा …

” चले? “हाँ में सर हिला कर आदित्य उसके पीछे चल पड़ा। बाहर ही काउंटर पर बिल भरती बाँसुरी उन लोगो का ही इंतेज़ार कर रही थी।
   उन लोगो को आते देख वो भी उन लोगो के साथ आगे बढ़ गयी।
    बाहर अपनी गाड़ी न देख आदित्य राजा की तरफ देखने लगा। उसे उंगली के इशारे से राजा ने अपनी गाड़ी की तरफ मोड़ दिया

  ” तुम्हारी गाड़ी को तुमसे कहीं ज्यादा मरम्मत की ज़रूरत थी, उसे सर्विस सेंटर भेज दिया है। एक हफ्ते में गाड़ी वापस आ जायेगी। अब चलें।”

  आदित्य की समझ से परे था कि ये दोनों उसे कहाँ लेकर जाने वाले हैं पर इस वक्त उसकी जो मानसिक स्थिति थी वो चुपचाप गाड़ी में बैठ गया।
  राजा ने उसके बैठते ही गाड़ी बाँसुरी के सरकारी बंगले की ओर भगा दी।

     बंगले के पोर्च में गाड़ी खड़े कर राजा गाड़ी से उतरा और आदित्य की तरफ का दरवाजा खोल दिया, बड़े संकोच से ही आदित्य नीचे उतर गया..

” इतना परेशान मत होना आदित्य, ये तुम्हारी भाभी का घर है यानी इनका बाँसुरी अजातशत्रु सिंह का। ”

  राजा भी समझ चुका था कि आदित्य सब जान चुका है।

   आदित्य को अंदर बैठा कर बाँसुरी सबके लिए कॉफी बनाने अंदर चली गयी।
   राजा आदित्य के करीब चला आया…

” मैं जानता हूँ अब तक तुम मेरा परिचय जान ही चुके हो, तुम्हारे मन में भी कई सवाल आ रहे होंगे? देखो मेरा शुरु से इस बात पर यकीन है कि रिश्तों को बचाये रखना है तो बातें बहुत ज़रूरी हैं। जहाँ अबोला होता है वहाँ फिर गलतफहमियां पैदा होती जाती हैं और ये गलतफहमी की बेल अगर एक बार मन मे मजबूती से जम गई फिर शक और शुबहों कि खाद इसे ऐसे सींच देती है कि हर बात बेमानी लगने लगती है।
     तुम हमारे परिवार के लिए कभी गैर नही रहे, बल्कि सच कहूं तो हम सब आज तक तुम्हारे अस्तित्व से ही अनजान थे।
मुझे नही लगता कि काका साहेब ने तुम्हे जान बूझ कर छोड़ा होगा ,ज़रूर कुछ तो गलतफहमी उन्हें भी हुई होगी वरना वो ऐसा कभी नही कर सकते आदित्य। विश्वास करो मेरा। मैंने उन्हें बहुत करीब से देखा है, तुम्हारी माँ के जाने के गम को वो अब तक नही भुला पाए हैं और खुद को तिल तिल मारते चले आ रहें हैं आज तक।
   अगर तुम उनके जीवन मे वापस आ जाओ तो हो सकता है उनका बचा खुचा जीवन संवर जाए।”

  ” पर वो हमें आखिर क्यों अपनाएंगे? “

  ” क्योंकि तुम उनके बेटे हो, उनका अपना खून हो। हमारे खानदान का खून हो। ”

” और उनकी पत्नी? उनकी बेटी? “

.” हर कोई तुम्हे अपना लेगा, तुम एक कदम आगे बढ़ा कर तो देखो मेरे भाई , परिवार तुम्हारी तरफ चार कदम बढ़ाएगा और तुम्हे गले से लगा लेगा। यही तो रिश्ते होतें हैं। ”

  ” आप हम पर इतने मेहरबान क्यों हैं भला? हमने आज तक आपका कोई भला नही किया? उल्टा आप हमारे ऑफिस में भी हमारा अच्छा ही सोच रहे थे कर रहे थे। क्यों ? “

” हर सवाल का जवाब नही होता आदित्य! साहेब ऐसे ही हैं। ये क्या करते हैं? क्यों करतें हैं इन बातों के जवाब हम साधारण बुद्धि के जीव नही समझ सकते क्योंकि इनकी अप्रोच ही अलग होती है।
    इन्हें जैसे ही ये पता चला कि काका साहब का बेटा इनके महल से दूर अलग अकेला पड़ा है , अपने उस अकेले छोटे भाई को मना  कर लाने ये महल से निकल गये, और उसी समय अपने दूसरे छोटे भाई के ऊपर सारी जिम्मेदारी डाल गए जिससे इनके तुम्हें लेकर लौटने तक में या तो वो शासन करना सीख जाए और या फिर हार कर उनके लौटने पर सब कुछ बाइज्जत इन्हें वापस कर दे, जिससे आगे राजगद्दी का क्या करना है ये सब ये सभी बड़े बुज़ुर्ग मिल कर तय कर सकें।”

   बाँसुरी ने कॉफी आदित्य के हाथ में पकड़ाई और अपनी कॉफ़ी लिए राजा के बगल में जा बैठी।

  आदित्य कॉफी पीते पीते उन दोनों की सारी बातें सुनता रहा, कुछ अपनी भी कहता रहा, और इस सारी बातों में धीरे धीरे उसके मन का मैल घुलता चला गया। वैसे तो वो बहुत सी बातें कहना चाहता था, मामा जी की साज़िशें, उसके मन में बचपन से भरी गयी कालिख लेकिन अपने संकोची स्वभाव से वो उतना ही कह पाया जितना उसे ज़रूरी लगा।
   उन दोनों को बात करते छोड़ बाँसुरी उठ कर भीतर चली गयी। सोने के कमरे में आदित्य के लिए प्रबंध कर वो वापस बाहर चली आयी। दोनो भाइयों को बातों में उलझा देख उसने धीमे से आदित्य के सोने के कमरे की ओर इशारा किया और वापस अंदर चली गयी।
    कुछ आधे घण्टे बाद वो एक बार फिर कमरे का चक्कर लगा गयी।
     कुछ देर बाद फिर वो वापस आयी तो आदित्य से बात करते राजा ने आदित्य के पीछे की ओर खड़ी बाँसुरी की ओर एक नज़र देखा और मुस्कुराते हुए आदित्य की बात का जवाब देता रहा। बाहर दरवाज़े से टिक कर खड़ी बाँसुरी राजा को देख मुस्कुराती रही….

  “आदित्य अब तुम्हें भी सोना चाहिए, रात बहुत हो गयी है। बाँसुरी आदित्य के सोने की व्यवस्था कहाँ की है? ”

बाँसुरी पीछे चुपचाप खड़ी थी उसे नही लगा था कि राजा एकदम से उसका नाम ले लेगा, वो अचकचा गयी, आदित्य को भी बाँसुरी पीछे खड़ी है ये पता नही था, वो भी उसे देख चौन्क गया।

  ” जी ! किस तरफ जाऊँ मैं?”

  आदित्य ने बाँसुरी से पूछा और बाँसुरी ने गलियारे के एक ओर बने कमरे की ओर इशारा कर दिया।
   आदित्य उठ कर उसी कमरे की ओर बढ़ गया, उसके जाते ही राजा मुस्कुरा कर बाँसुरी की तरफ बढ़ गया..

  ” ऐसे अचानक उसे सोने जाने के लिए कहने की क्या ज़रूरत थी? पता नही क्या सोच रहा होगा? “

” सोच रहा होगा उसके भैया भाभी बहुत रोमांटिक हैं. और क्या? “

” वही तो। कुछ भी उटपटांग सोचेगा अब। मैं तो बस ऐसे ही आकर खड़ी थी, आपने तो फंसा ही दिया साहेब।

  ” तो तुम सच मे बस ऐसे ही आकर खड़ी थीं तो मैं जाऊँ आदित्य के कमरे में ही हमारी बची खुची बातें पूरी करने? “

” ये थोड़े न कहा मैंने? उसे भी तो आराम की ज़रूरत है। आपका क्या है, आप तो हैं ही निशाचर। न रात को नींद आती आपको न दिन में। बस रात दिन आपसे काम करवा लें कोई। सच में साहब ! थकते नही हैं आप।

  ” थकते हैं हुकुम ! लेकिन आपको देख कर सारी हिम्मत वापस जुड़ जाती है। एक बार अपनी पूरी रियासत और पूरे खानदान को जोड़ लूँ बस उसके बाद सुकून ही सुकून है।  अब पास आ जाओ, अब इतनी दूर क्यों खड़ी हो , और ये हाथ में क्या छिपा रखा है दिखाओ?”

    राजा ने बाँसुरी के हाथ आगे कर खोल दिये, उसके हाथों में कैंची थी। वो अपनी हथेली पर कैंची रखे मुस्कुरा उठी..
    राजा ने ये क्यों का इशारा किया और बाँसुरी ने उसकी बेतरतीब मूंछों की ओर इशारा कर दिया…

” ये आपके झाड़ झंखाड़ थोड़े सेट कर लूं। ”

” इतनी रात में मूंछें कौन सेट करता है हुकुम? “

  ” अच्छा खासा क्लीन शेव्ड हो गए थे, फिर से क्या ज़रूरत थी इन जंगल झाड़ियों की? “

” स्टाइल है हमारा। और वैसे सच कहूं तो थोड़ा समय भी नही मिला कि बार्बर बुला कर सेट करवा ली जाए। अब तुम अभी कहाँ ये सब ले बैठी हो, अभी छोड़ो मैं कल सुबह सुबह करवा लूंगा। ”

” नही कम से कम थोड़ा सा सेट कर दूंगी, आपकी बेतरतीब मूंछे डिस्टर्ब करती हैं।”

  एकबारगी राजा को समझ नही आया, और फिर समझ आते ही वो ज़ोर से हँसने लगा,हंसते हंसते उसने आगे बढ़ बाँसुरी को अपनी बाहों में भींच लिया

” तो ये बात है। हुकुम को गड़ती हैं हमारी शानदार मूँछे।”

  ” हाँ बाल भी तो साही के कांटो से हैं आपके।”

  बाँसुरी की बात सुन हँसते हँसते उसने बाँसुरी को अपनी बाहों में भर लिया….
      दीन दुनिया से बेखबर दोनो खुद में खोए जाने कब तक जागते रहे…..


   *********

    सुबह सुबह समर जोगिंग कर के वापस लौट रहा था कि पिया अपनी स्कूटी खड़खड़ाती चली आयी।
उसे आते देख वो एक तरफ हो गया, अपनी गाड़ी खड़ी कर पिया उसके पास चली आयी।

  ” आइये अंदर चलतें हैं।”

हाँ में सर हिलाती वो उसके साथ महल के अंदर चली गयी।
   महल के पिछले हिस्से में जिस तरफ समर के परिवार का निवास था, समर उसी ओर बढ़ गया, पिया भी उसके पीछे पीछे चली गयी।
    अंदर हॉल में ही समर की माँ और उसके पिता बैठे थे, दोनो को नमस्ते कर पिया आगे बढ़ने लगी, लेकिन कुछ सोच कर वो समर की माँ के पास रुक गयी…

” अब आपकी तबियत कैसी है मिसेस सिंह? “

  ” मैं ठीक हूँ डॉक्टर! आप कैसी हैं? “

” एकदम मस्त ! आज मंत्री जी को कुछ बहुत ज़रूरी दिखाना था उसी कारण सुबह सुबह आयी हूँ। ”

” ओह्ह ! ऐसी बात है क्या? जाओ जाओ फिर मंत्री जी को बता दो। ”

  समर की माँ मुस्कुरा उठी, उनके पास बैठे समर के पिता भी हल्के से हँस दिए।
   समर ने दोनों को देख कर न में सर हिलाया और अंदर चला गया, उसके पीछे पिया के जाते ही समर के पिता ने उसकी माँ से ही पूछ लिया

  “है कौन ये लड़की ? ”

  समर की माँ मुस्कुरा उठी

  “अभी तक तो हमारी डॉक्टर ही है। अब आगे कहीं तुम्हारे मंत्री की की मंत्राणी जी न बन जाये? “

  ” पर तुम्हारा लड़का तो उस केसर के चक्कर में फंसा हुआ है। ”

” कौन बोलता है। हम हमारे बेटे को अच्छे से जानते हैं, उसे वो केसर कभी पसन्द ही नही आई।

  ” लेकिन युवराज सा तो उसी के लिए बात करने आये थे, रूपा बाई सा भी साथ थी याद नही है क्या आपको?

” हमें याद है लेकिन आपके बेटे का स्वभाव भी हम जानते हैं। केसर जैसी से आपका सनकी कभी शादी नही करने वाला। और वैसे जैसा इसका स्वभाव है हमे तो लगता था ये कभी शादी वादी में उलझेगा ही नही। पता नही अजीब ही लड़का है आपका, बस सारा समय इसे काम की पड़ी रहती है। जाने इतना काम करके करना क्या है इसे?

  ” आप समझती नहीं हैं उसका प्यार ये महल और इसकी सेवा नही है बल्कि उसका असली लगाव अपने भाइयों के प्रति है, चाहे वो युवराज सा हों या राजा अजातशत्रु।
    आजातशत्रु में तो तुम्हारे बेटे के प्राण बसते हैं, जानती नही हो क्या? बचपन से ही तो ऐसा है तुम्हारा बेटा। हमसे ज्यादा उन्ही की सुनता है , और उन दोनों भाइयों ने भी कभी उसे खुद से कम समझा है क्या? हमेशा अपने सगे छोटे भाई सा प्यार दिया है।

  “हाँ अब राजा ही इसका ब्याह भी करवाएंगे। बस जल्दी से जल्दी वापस आ जाये। उनके बिना महल महल नही लगता। कोई रौनक नही रही महल में। अब बहुत दिन हो गए महल के राजा रानी को वापस लौट आना चाहिए।  चलिए आप अपना अखबार पढ़िए मैं होने वाली बहु के लिए चाय कॉफी कुछ भिजवा दूं। ”

  ” वाह मतलब आपने मान लिया कि यही आपके सनकी सम्राट की रानी हैं। “

  ” क्यों इसके पहले किसी लड़की को आज तक आपके बेटे ने अपने कमरे तक जाने दिया भी है? आपके नमूने के लिए ऐसी नमूनी ही चलेगी, दोनों अलग तरह के सनकी हैं। ”

  ” क्यों लड़की तो अच्छी खासी लगी हमे। “

  ” पहली नज़र में अच्छी खासी लगती है पर है वो भी अपने तरह की सनकी।

  दोनो पति पत्नी आपस मे बातें करते हँस पड़े, समर की माँ उठ कर सहायिका के हाथों उन दोनों के लिए कुछ भेजने भीतर चली गयी।

इधर समर के साथ गयी पिया समर के इशारे पर एक ओर बैठ गयी….

“जी डॉक्टर साहिबा , तो कल रात क्या बताने वाली थी आप? “

” मैं ? मैं आपको कुछ बताने वाली थी, अरे हाँ याद आया है। असल में मेरे साथ ये होता है कि जो जिस वक्त सामने आता है ना उसकी बातें दिमाग में घूमने लगती हैं।
  अभी आपकी मॉम को देखा तो उनकी तकलीफ याद आ गयी।
  हाँ तो मैं आपको राजा अजातशत्रु जी के बारे में बताना चाहती थी।

  ” हाँ ये तो कल रात भी आपने कहा था। ”

  ” जी मैं ये बताना चाहती थी कि जैसा मुझे लगा था वही हुआ है। अजातशत्रु जी को मल्टीविटामिन्स के नाम पर कुछ गलत दवा दी जा रही है। और इन्ही दवाओं के साइड इफेक्ट के कारण वो अचानक से कुछ बातों को भूल जाते हैं,दरअसल ये दवा दिमाग पर काम करती है और इसलिए दिमाग का वो हिस्सा जो मैमरी के लिए जवाबदार होता है की कोशिकाओं को कमज़ोर कर याद्दाश्त में परिवर्तन ले आता है।
   सीधे सपाट शब्दों में मैमरी लॉस का कारण बनता है।

  ” तो इसका मतलब ये परमानेंट डैमेज नही करता है।”

  ” बिल्कुल करता है। अगर ये दवाएं एक साल से अधिक समय तक कोई लेता रहे तो उसके दिमाग पर ये गंभीर असर पैदा करता है। आपको क्या लगता है आपके हुकुम कब से ये दवाएं ले रहे थे?”

  ” उन्हें एक बार हाथ में गोली लगी थी, उसके लगभग कुछ महीनों बाद से ही उनकी दवाएं शुरू हुई थी। कुछ ज़रूरी विटामिन्स और बाकी की दवाएं। “

” कौन सा डॉक्टर देख रहा था उन्हें?”

” हमारे फ़ैमिली डॉक्टर पहले देख रहे थे,बाद में उनके रिफरेंस में एक दूसरे डॉक्टर उन्हें देखने लगे । “

” हम्म हो सकता है, उन्हीं दूसरे डॉक्टर ने कुछ दवाओं में  फेर बदल किया हो। आप उनसे ज़रा कड़ाई से पूछताछ कीजिये। ”

  समर के चेहरे का रंग बदलने लगा। वो उसी वक्त अपनी कुर्सी से उठ गया, उसे इतना नाराज़ होते देख पिया ने उसके कंधे पर हाथ रख उसे वापस बैठा दिया…

  ” शांत रहिए मंत्री जी!, मैंने हुकुम की दवाओं के सैम्पल लैब से टेस्ट करवा लिए थे, उनकी रिपोर्ट्स है मेरे पास। उन डॉक्टर ने कहीं कोई प्रेस्क्रिप्शन तो दिया नही था, उनके पास से पूरे महल के लिए अलग अलग दवाओं के पैकेट्स आया करते थे,  उसी में हुकुम की दवाओं में ये दवा भी थी।
    मैं चूंकि उसी अस्पताल में काम करती हूँ इसलिए मैंने उन डॉक्टर साहब पर नज़र रखनी शुरू की और साथ ही उन्हें थोड़ा विश्वास में लेकर पूछताछ भी की।
वैसे ऐसा कुछ खास तो नही पता चला लेकिन एक बात जरूर समझ आ गयी कि वो किसी को यहाँ की सारी रिपोर्ट्स भेजतें रहते हैं।
   एक बात और आश्चर्य करने वाली है कि आपके हुकुम महल से बहुत समय से बाहर हैं इसके बावजूद उन तक दवाएं कैसे पहुंच पा रहीं हैं।
   आप शांत दिमाग से बैठ कर ये सोचिए कि उस डॉक्टर से कैसे आप ये राज़ कुबूल करवाएंगे , क्योंकि अगर उसे आभास हो गया कि आप उससे कुछ पूछताछ करने वाले हैं तो वो रातोरात यहाँ से भाग खड़ा होगा और उसके बाद उसे ढूंढना या इस राज़ का खुलना मुश्किल हो जाएगा। “

  ” हम्म सही कह रही हैं आप डॉक्टर साहिबा! इस वक्त वो डॉक्टर साहब कहाँ होंगे? “

” हॉस्पिटल में ही होंगे, उस वक्त वो वहीं होतें हैं। एक बात और उनके बारे में  मुझे पता चली है वो ये है कि ये डॉक्टर साहब देहरादून के रहने वाले हैं, वहीं कहीं से इन्होंने पढ़ाई भी की है। “

  ” जी मुझे पूरा यकीन था ये वहीं कही से होंगे। अब काफी बातें क्लियर हो गईं है। आपका भी बहुत शुक्रगुज़ार हूँ आपने बहुत मदद की मेरी डॉक्टर साहिबा।”

” ये क्या डॉक्टर साहिबा लगा रखा है। मेरे मॉम डैड ने भी मेरा एक खूबसूरत सा नाम रखा है और मुझे मेरे नाम से बुलाये जाना ही पसंद आता है ना कि मेरे पद से। ”

  ” अच्छा जी तो क्या मेरा नाम खराब है। ” समर की बात सुनते ही पिया अपनी जीभ काट कर रह गयी

  ” मेरे भी माँ पापा ने बड़े प्यार से और चाव से मेरा नाम रखा समर सिंह और आपने अच्छे खासे नाम पर मेरी पद प्रतिष्ठा को रख दिया,मुझे मंत्री जी बुलाने लगीं। “

” सॉरी सॉरी मंत्री जी! असल में आपकी पर्सनैलिटी इतनी दमदार है ना कि मुहँ से खुद ब खुद मंत्री जी निकल आता है, वैसे तो आप भी कहीं के राजे महाराजे से ही लगते हैं पर मंत्री जी सूट्स यू। ”

  ” एंड डॉक्टर साहिबा सूट्स यू!”  समर की बात सुन पिया मन ही मन कुछ सोचती धीमे से बड़बड़ा उठी

  ” हद दर्जे का हाज़िर जवाब है, कम्बख़्त का जब तक मैं नाम नही लुंगी ये मुझे ऐसे ही छेड़ता रहेगा।

  पिया की धीमी सी गुनगुनाहट सुन समर ने उसकी ओर कान लगा दिए

” कुछ कहा आपने डॉक्टर? “

” जी नही तो। मैं ये कह रही थी कि मैंने अपने प्रोफेशन से हट कर जासूसी का काम भी किया है इसके लिए मुझे कोई एप्रिसिएशन या कोई फ्रीबिज़ कुछ और नही  मिलेगा ?”

   समर मुस्कुरा कर अपनी जगह से उठ कर पिया तक चला आया, धीमे से उसके चेहरे पर वो झुका ही था कि पिया ने आंखें बंद कर ली। लगभग पांच मिनट तक जब समर की तरफ से कोई हरकत नही हुई तो पिया ने आंखे  खोल दी, समर उसकी कुर्सी से एक ओर हटकर टेबल के सहारे हाथ बांधे खड़ा उसे ही एकटक देख रहा था, पिया ने आंखें फाड़े उसे देखा तो समर ने आंखों के इशारे से उसकी गोद की ओर इशारा कर दिया।
    पिया ने देखा उसकी गोद में एक छोटा सा डॉक्टर टेडी बियर रखा था, जिसके गले में एक स्टेथो लटक रहा था। उसे देखते ही पिया के चेहरे पर एक लंबी सी मुस्कान खींच गयी….

  ” अरे वो क्या है ना !अभी कुछ दिन पहले एक मूवी में देखा था कि ऐसे ही एक डॉक्टर एक पुलिस वाले कि मदद करती है और जैसे ही बदले में कुछ मांगती है पुलिस वाला जो कि उस फिल्म का हीरो भी था वो आकर उस हीरोइन को किस कर लेता है और कहता है ये एप्रिसिएशन चलेगा या और कुछ चाहिए। तो बस मुझे वही सीन याद आ गया था…”

   बोलने को तो पिया बोल गयी लेकिन बोलते बोलते ही उसे ध्यान आ गया कि वो क्या बोलना चाहती थी और क्या बोल गयी। उसकी बात सुन समर मुस्कुरा कर नीचे देखने लगा और उसकी इस हरकत को देख पिया और भी शरमा गयी।

  ” सॉरी सॉरी मैं क्या बोलना चाहती थी और क्या बोल गयी।  आप प्लीज़ मुझे गलत मत समझियेगा। मैं असल मे कहना ये चाहती थी कि उस फिल्म में…

  पिया बोल रही थी कि समर उसके करीब चला आया, उसके गालों पर धीरे से उसने अपने होंठ रख दिये।
    पिया बोलते बोलते एकदम से खामोश रह गयी। कुछ सेकण्ड्स को उसकी धड़कने उसे खुद अपने कानों में सुनाई पड़ने लगीं , वो अपनी सुध बुध खोती इसके पहले ही उसके कानों में समर की आवाज़ गूंज उठी…

  ” चले अब जरा उन डॉक्टर साहब की खबर भी ले ली जाए? “

  बिना कुछ कहे पिया चुपचाप समर के पीछे बाहर निकल गयी।

  “अरे तुम दोनों कहाँ चल दिये, मैं कॉफी लेकर आ रही थी। ”

  ” अभी नही पी पाऊंगा माँ,कुछ बहुत ज़रूरी काम से जाना है। आकर पी लूंगा। ”

  समर ने पीछे मुड़ कर पिया को देखा और आंखों ही आंखों में उससे इशारे से पूछ लिया

  “तुम्हे  तो नही पीना कॉफी पिया। ”

  जल्दी जल्दी न में सर हिला कर वो भी उसके पीछे आगे बढ़ गयी….

  ” ये इतनी सी देर में ऐसा क्या हो गया जो डॉक्टर साहिबा पिया बन गयी? ” समर के पिता के सवाल पर उसकी माँ मुस्कुराने लगी…

” बस अब देखते जाइये, जल्दी ही यही डॉक्टरनी आपकी बहु भी बन जाएगी।”

  दोनो हंसते हुए अपनी चाय पीने लगे।

**********

   राजमहल में विराज दीवानखाने में गांव के किसी मुद्दे पर दोनो पक्षों की बातें सुन रहा था। कभी एक पक्ष हावी हो जाता तो कभी दूसरा लेकिन इसी बहसबाजी का नतीजा ये हो रहा था कि उन दोनों पक्षों की बातें विराज के सर के ऊपर से निकल रहीं थीं।
     युवराज भैया काका साहेब के साथ ऑफिस में बैठे विदेशों से जुड़े अपने व्यापार का लेखा जोखा देख रहे थे। समर अस्पताल के लिए निकल चुका था, ऐसे में अकेले विराज से कुछ संभाला नही जा रहा था कि उसी वक्त विराज के फ़ोन पर महल से रेखा का फ़ोन चला आया।
    महाराजा हुकुम की तबियत कुछ बिगड़ने के कारण रेखा विराज को तुरंत उनके कमरे में बुला रही थी।
     विराज ने सभा को कुछ समय के लिए रोका और समर को फ़ोन लगाते हुए महाराज के कमरे की ओर निकल गया।

    समर अस्पताल पहुंचा और तेज़ कदमों से भीतर चला गया। उसके पीछे ही पिया भी जल्दी जल्दी अंदर चली आयी।
    डॉक्टर साहब के केबिन के बाहर कुछ मरीज़ बैठे इंतेज़ार कर रहे थे।
   समर और पिया को देखते ही केबिन के बाहर बैठा पियोन अंदर डॉक्टर को जानकारी देने चला गया।  समर और पिया अंदर गए तब डॉक्टर साहब किसी से फोन पर बात कर रहे थे, दोनो को बैठने का इशारा कर उन्होंने फ़ोन रखा और समर की ओर मुड़ गए…

” जी समर जी कहिये अब आपकी मदर कैसी हैं? “

  “” ठीक हैं डॉक्टर साहब! आज तो मैं आपसे हुकुम की दवाएं लेने आया था। दवा खत्म हो गयी है उनकी। ”

  ” इतनी जल्दी कैसे खत्म हो गयी? अभी तो मैंने महीने भर की दवा भेजी थी। ”

  ” कहाँ भेजी थी आपने। मेरे पूछने का मतलब ये है कि हुकुम तो किसी एक जगह रह नही रहे हैं अभी , ऐसे में आप किस पते पर दवा भिजवातें हैं।”

  समर की बात सुन डॉक्टर मुस्कुरा उठा…

” जैसे आपको आपके हुकुम की चिंता है और कोई भी है जिन्हें उनकी बहुत चिंता है, उन्होंने अपनी पत्नी के घर का पता हमें दे रखा था, की हुकुम की दवाएं एक दिन भी नागा हुए बिना पहुंच जाएं। तो बस मैं उसी पते पर दवाएं भेज दिया करता था। अब वहाँ से उनकी पत्नी के घर वाले कहाँ भेजतें है ये नही पता लेकिन मैं बीच बीच में प्रेम साहब से जानकारी ले लिया करता था कि हुकुम दवाएं ले रहे है या नही? “

समर समझ गया कि प्रेम को दवाओं की असलियत के बारे में कोई जानकारी नही है…

  ” ये हमारे प्रेम साहब जी को बस पता चले कि ये चीज़ हुकुम के लिए सहीं हैं बस वो बिना संजीवनी पहचाने पूरा पहाड़ उठा  लाएंगे। क्या करूँ मैं इस आदमी का? “

समर ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा लेकिन पिया तक उसकी आवाज़ पहुंच ही गयी…

” आपका भी हाल कुछ कुछ वैसा ही है। अब इनका क्या करना है वो सोचिए। ” 

डॉक्टर दोनो की बातें सुनने की कोशिश में कुछ आगे झुक गया..

  ” बताएंगे बताएंगे डॉक्टर साहब । आपको भी सब बताएंगे लेकिन पहले आपको बताना पड़ेगा, एक एक बात हमें सच सच बतानी होगी।।

  ” क्या बताना होगा समर साहब। “

  ” यही की हुकुम को कौन सी दवा आप दे रहे और क्यों दे रहे? “

  ” जी मैं तो बस कुछ सप्लीमेंट्स ही दे रहा हूँ। “

  ” ऐसे कौन से सप्लीमेंट्स हैं जो दिमाग को सुन्न किये जा रहे, याददाश्त को मिटाए जा रहे।

  ” नही ऐसा तो कुछ … समर के तेज तेवर देख डॉक्टर ज़रा घबरा गया और उसकी ज़बान लड़खड़ाने लगी

  ” सर आपने जो दवाएं महल भेजनी थी और जो आप हुकुम के नाम पर पार्सल करने वाले थे मैंने उन सभी से थोड़ा सा सैम्पल निकाल कर लैब में टेस्ट करवा लिया है।
   मेरे पास लैब के टेस्ट रिपोर्ट्स भी हैं, तो अब ऐसे में कोई भी नया झूठ बोल कर अपनी जान आफत में मत डालिये।
   ये जो सामने खड़े हैं ना ये समर वैकेशन वाले हल्के फुल्के मज़ेदार समर नही बल्कि युद्ध वाले हैवी समर हैं। आप सब कुछ सच बता दें उसी में सब की भलाई है।”

   पिया की बात सुन समर जहाँ उसकी समझदारी से प्रभावित होने जा रहा था कि उसकी समर वेकेशन वाली बात सुन इतने गुस्से में भी उसे हंसी आ गयी। लेकिन समर के तेवर देख डॉक्टर के चेहरे पर फिर हंसी नही आई….

    वो बार बार अपनी बात दुहराता खड़ा रहा कि वो कुछ नही जानता, तभी पिया ने अपने बैग से निकाल रिपोर्ट्स उसके सामने की टेबल पर पटक दी। रिपोर्ट्स देख डॉक्टर के माथे पर पसीने की बूंदे छलक आयी…

   वो रिपोर्ट्स को देख रहा था कि समर ने वो सारे कागज़ उठा कर उसके हाथ में थमा दिए..

  ” ध्यान से देख लो डॉक्टर, तुम्हारी ही भाषा में लिखा है, अब तुम्हारी वाली अंग्रेज़ी मुझे तो आती नही लेकिन इन डॉक्टर साहिबा ने मुझे मेरी बोली में सब समझा दिया है। तुम्हें अब भी अगर समझ नही आ रहा तो अब मैं मेरी बोली और भाषा में समझाना शुरु करूँगा और अगर मैं मेरी बोली पर आ गया तो फिर तुम्हें ब्रम्हा भी नही समझा पाएंगे। समझे कि मैं क्या कहना चाहता हूँ।”

  डॉक्टर तुरंत समर के पैरों पर गिर गया…

  ” मुझे माफ़ कर दीजिए समर सा। बस कुछ पैसों के लालच में मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी। मल्टीविटामिन्स के डिब्बे में मैं दूसरी दवा डाल कर पैक कर प्रेम साहब को भेज दिया करता था। उन्हें पूरी तरह से विश्वास में ले रखा था कि ये दवा खाना हुकम के लिए बहुत ज़रूरी है और इसी को खा कर हुकुम ठीक हो जाएंगे, लेकिन उन्हें कभी आभास नही होने दिया कि ये गलत दवा है। ये सब मैंने ठाकुर साहब के कहने पर किया, असल में उनके हमारे परिवार पर बहुत एहसान है। मेरे पिता के खेत उन्हीं के पास रहन पड़े थे, उस पर जब मेरी मेडिकल की पढ़ाई के लिए मेरे पिता और कर्ज़ लेने गए तब उन्होंने उन चंद रुपयों के बदले मेरे पिता से साधिकार मुझे खरीद लिया।
   उस समय मेरी ज़िद थी कि मुझे मेडिकल की पढ़ाई किसी भी कीमत पर करनी है। खुद का बंधुआ होना ऐसा भी हो सकता है ऐसा मैंने कभी नही सोचा था। मुझे लगता था ज्यादा से ज्यादा अपने महल की गुलामी या अपने किसी अस्पताल की देखभाल में लगा देंगे।
   लेकिन उन्होंने मेरी पांच साल की पढ़ाई के दौरान मुझे कभी किसी चीज़ की कमी नही होने दी। और उल्टा मेरे पिता के खेत भी वापस कर दिए,रुपये पैसों से मेरी मदद भी की।
  लेकिन डिग्री पूरी कर के आते ही उन्होंने एक एक कर अपने सारे एहसानों का बदला वसूलना शुरू कर दिया।
    उनके एक कोई बिज़नेस राइवल थे, मुझसे पूछ कर उनकी शराब में कभी कोई दवा मिलवा दी तो कभी अपने किसी और दुश्मन के खाने में कुछ मिलवा दिया।
   पहले के ज़माने में कहते थे न कि राजा महाराजा लोग अपने पास विशेषज्ञ चिकित्सक रखा करते थे और उनसे सलाह कर अपने दुश्मनों का सफाया दवाओं के द्वारा भी किया करते थे, बस वैसा ही कुछ इन ठाकुर साहब का भी हिसाब है। उन्होंने आपके हुकुम की तबियत बिगड़ती चली जाए इसलिए उन्हें भी दवा खिलवानी शुरू कर दी।
   मैं तो पूरी तरह से उनके हाथ की कठपुतली हूँ, वो जो कहते हैं वही करता हूँ क्योंकि आज भी मेरा परिवार तो उनका बंधुआ मजदूर ही है। मेरे द्वारा ये सब करने के बाद अब वो बाबू को कुछ कहते नही लेकिन उनके सामने बार बार मेरी पढ़ाई लिखाई करवाने के किये एहसान ज़रूर जता जातें हैं। अब बाबू कहाँ जानते हैं कि मेडिकल की पढ़ाई के बदले उनका लड़का कहाँ और कैसे फंस गया है।

  “तुम ठाकुर साहब की बात काट भी तो सकते थे ना?”

  ” कैसे काटता? वो तो साफ सपाट शब्दों में मेरे बाबू और इजा को मारने की धमकी दे चुके हैं। मेरा उनके खिलाफ खड़ा होना यानी मेरे बाबू की जान पर…

   डॉक्टर बोलते बोलते चुप रह गया…

  “” हम्म ठीक है। तुम्हें और तुम्हारे परिवार को कुछ नही होगा लेकिन यही सब तुम पुलिस के सामने कबूल कर सकते हो?

  “” जी अगर मेरा परिवार सुरक्षित है तो मैं पुलिस के सामने सब कबूल कर लूंगा। ”

  ” ठीक है हम लोग कोशिश करेंगे कि तुम्हारी डिग्री पर आंच न आये । कोशिश यही रहेगी कि तुम्हारी पहचान छिपी रहे। ”

  डॉक्टर चुपचाप हाँ में सर हिलाए खड़ा रहा। वो आगे कुछ कहता कि समर के फ़ोन पर विराज का फ़ोन चला आया।
    विराज से बात होते ही समर हड़बड़ा कर महल की ओर निकल गया, लेकिन जाते जाते वो एक बार फिर उस डॉक्टर को धमका गया…

  ” अगर आज की यहाँ की बात इस कमरे से बाहर गयी तो समर की गोली होगी और तेरा सर। याद रखना जब तक नाराज़ नही होता तभी तक मैं सही बंदा हूँ एक बार दिमाग किसी पर सटक गया फिर तो गन में साइलेंसर लगाने की भी नही सोचता सीधा शूट कर देता हूँ।
   वैसे चाहूं तो अभी के अभी तुझे पुलिस के हवाले कर सकता हूँ लेकिन तेरी कही हर एक बात पर विश्वास कर रहा हूँ और तुझे यहीं छोड़ जा रहा हूँ। अगर कोई भी होशियारी करने की कोशिश की तो याद रखना समर की नज़र तुझ पर ही है।”

  “मैं कोई बात बाहर नही जाने दूंगा समर सा। मैं यहीं हूँ आप जैसे ही बुलाएंगे मैं साथ चलने को तैयार हूँ। ”

  समर डॉक्टर को धमका कर बाहर निकल गया।
गाड़ी तक पहुंचते पहुंचते उसने राजा को फ़ोन लगा लिया।
    महाराज हुकुम की तबियत बिगड़ी थी और इस वक्त वो अपने सारे बच्चों को अपने पास देखना चाह रहे थे।
   उन्हीं की इच्छा पर उधर उनके पास खड़े युवराज और इधर महल की ओर तेज़ी से बढ़ते समर ने भी राजा को फ़ोन लगा दिया ….

  क्रमशः

aparna …

  

 

जीवनसाथी -94


   जीवनसाथी –94



कलेक्टर परिसर में पहुंचने के बाद उसने मामा जी से अपने लाव लश्कर को बाहर ही छोड़ अकेले अंदर चलने की गुज़ारिश की लेकिन न मामा जी को मानना था न वो माने।
   लगभग आठ दस आदमियों के साथ ठाकुर साहब केबिन में प्रवेश कर गए।
   अंदर बैठी कलेक्टर साहिब पर नज़र पड़ते ही ठाकुर साहब चौन्क गए…
   ये तो उनकी बेटी रेखा की जेठानी यानी अजातशत्रु की पत्नी और महल की पूर्व महारानी रानी बाँसुरी थी।
    सामने टेबल पर कलेक्टर की नेम प्लेट रखी थी..

   बाँसुरी अजातशत्रु सिंह ।।

  सामने बैठी बाँसुरी को देख ठाकुर साहब के चेहरे पर चमक चली आयी, उन्हें लगा आज का उनका काम तो ऐसे ही हो गया।
  बाँसुरी उनकी रिश्तेदार है और रिश्तेदार होते हुए क्या वो उन्हें ही परेशान करने की भूल करेगी।
   ठाकुर साहब कुछ देर को खड़े रह गए, उन्हें लगा बाँसुरी अपनी जगह से खड़े होकर उनका अभिवादन करेगी लेकिन वो सर झुकाये अपने सामने पड़े दस्तावेज़ देखती रही।
   कुछ सेकण्ड्स में ही उसने ऊपर सर कर उन्हें देखा, ठाकुर साहब ने उसे देखा कि पीछे से उनका एक सेवक बोल पड़ा…

” ठाकुर साहब हैं , खुद चल कर आये हैं यहाँ तक ..

  अभी वो अपनी बात पूरी करता कि बाँसुरी ने झांक कर उसे देखा और वापस ठाकुर साहब की ओर देखने लगी।
   ठाकुर साहब को पहचान कर उसने उनके सामने हाथ जोड़ दिए , विनम्रता से उन्हें नमस्कार कर उसने उन्हें बैठने कहा, उसके निवेदन पर गौरवांवित ठाकुर साहब बैठ गए। बैठने के साथ ही उन्होंने पीछे पलट कर देखा और बाकियों को भी जगह देख बैठने का इशारा कर दिया। उनका इशारा पाते ही सब बैठने लगे

  “आप सब बाहर इंतेज़ार कीजिये। ”

बाँसुरी की आवाज़ सुन ठाकुर साहब चौन्क गए …

.” लेकिन ये सब मेरे साथ ही हैं.!”

” जी ! इसलिए इन्हें बाहर इंतज़ार करने कह रही हूँ। जाइये आप लोग बाहर बैठिए। ”

पीछे बैठे सारे एक एक कर उठते चले गए, आदित्य भी उन लोगो को देख उठने लगा , उसे उठते देख इशारे से बाँसुरी ने बैठने कहा और फिर ठाकुर साहब की ओर घूम गयी…

” जी ! ठाकुर साहब आपके खिलाफ शिकायत आयी है,बस उसी निराकरण के लिए आपको बुलाना पड़ा। ”

  अब तक शांत बैठे ठाकुर साहब के चेहरे पर उनका गुस्सा छलकने लगा…

” शिकायते तो आनी जानी है उनसे हमारा कभी कुछ बिगड़ा है भला? “

” लेकिन बिगड़ सकता है। इस बार जो शिकायत आयी है उसमें वादी ने दावा किया है कि आपने उन्हें जान से मारने की धमकी दी है?”

” ये क्या बकवास है। गुस्से में तो हम कुछ भी बोल देते हैं ? इसका मतलब कोई भी मुहँ उठाये हमारी शिकायत कर जाएगा क्या?

  ” गुस्से में जिस तरह आप कुछ भी बोल जाते हैं उसी तरह सामने वाले ने गुस्से में आपकी शिकायत भी कर दी। और सिर्फ इतना ही नही बहुत कुछ है यहाँ पर। किसी की शिकायत है कि आप उन्हें उनकी ही ज़मीन पर बने गार्डन को हथियाने के पीछे पड़े हैं, किसी की शिकायत है आप उनकी घर के पीछे बची जमीन को हड़प कर उस पर बैडमिंटन कोर्ट बनवा चुके हैं।। एक किसी की शिकायत तो ये भी है कि आपने एक अनजान पड़ी ज़मीन जिसका कोई मालिक पता नही चल रहा था को चारों तरफ से घिरव कर अपने कब्जे में ले लिया है।”

” ये सब शिकायतें करता कौन हैं? “

“” जी जनता ही है जो करती है। उन लोगो का यह भी कहना है पिछले कलेक्टर से भी शिकायतें की थी लेकिन कोई फायदा नही हुआ , आपने मामला दबवा दिया था?

  ” आप तो सारी तैयारी कर के आयीं हैं? “

  ” जी मैं बिना तैयारी के कुछ नहीं करती। ”

  “खैर वो सब छोड़िए आप हमारी बेटी की जेठानी है इस नाते हमारी भी बेटी जैसी हुई । हैं कि नही?

  बाँसुरी ने मुस्कुरा कर हाँ में सर हिला दिया…

  “तो अब जब हमारी रिश्तेदारी है तो मामले को रफा दफा करिये आप। कुछ कम ज्यादा लगे तो बताइयेगा हम आपके घर पहुंचा देंगे। ”

  ” ठाकुर साहब रिश्तेदारी देखते हुए ही आपसे इतनी विनम्रता से बात कर रही हूँ वरना जितनी शिकायतें है आपके ऊपर इतने में तो मुझे आपको सीधा पुलिस के हवाले करना था। समझे आप? और रही बात कम ज्यादा लगने की तो आप गौर से मुझे एक बार देख लीजिए कि मैं कौन हूँ? राजा अजातशत्रु सिंह की पत्नी से आप ये पूछ रहे हैं कि जो कम ज्यादा लगे वो आप मेरे घर पहुंचा देंगे। गौर से जांच लीजियेगा क्या आपका खज़ाना इतना बड़ा है कि आप राजा अजातशत्रु की पत्नी की जरूरतें पूरी कर सकें? और अगर नही तो आइंदा मुझे ऐसे प्रलोभन मत दीजिएगा वरना एक चार्ज और लग जायेगा आप पर, कलेक्टर को रिश्वत देने का।
 
  बाँसुरी और ठाकुर साहब की बात सुन आदित्य को समझ आ गया था कि सामने बैठी कलक्टरनी अजातशत्रु की पत्नी है।

  ” हम शराफत से बात कर रहे तो आप तो सर पर चढ़ी जा रहीं हैं। धमकी दे रहीं है आप हमें? “

” नही ! कोरी धमकी नही है ये ठाकुर साहब। आपके खिलाफ बहुत कुछ है मेरे पास , और इन सब के आधार पर आप जल्दी ही सलाखों के पीछे होंगे। वादा करती हूँ।
  जहाँ तक है बात रिश्तेदारी की तो वो मैं शुरू से ही देखती आ रही हूँ कि आपने कितनी शिद्दत से मेरे पति के साथ अपनी रिश्तेदारी निभाई है, सब सूद समेत मैं आपको वापस कर दूंगी।
   एक बात और, मैं कभी अपनी काम वाली जगह पर अपना परिचय अपने पति का परिचय को देना पसन्द नही करती और न ही देती हूँ लेकिन क्या करूँ आप हमारे पुराने रिश्तेदार जो ठहरे इसलिए ऐसा करना पड़ा।
   आशा करती हूँ आप मेरी बातों को और मुझे अच्छे से समझ गए होंगे तो अब इजाज़त दीजिये।

” हद है मतलब हम तमीज़ से बात कर रहे तो तुम बदतमीज़ी पर उतर आई। अभी जानती नही हो कि हम क्या हैं इसलिए इतना उड़ रही हो। एक झटके में तुम्हारे पंख काट कर नीचे फेंक न दिया न तो हमारा नाम भी…

  ” बदलने की तैयारी कर लीजिए !”

  ” क्या ? ” ठाकुर साहब की गर्जना पर बाँसुरी की मुस्कान भारी पड़ गयी..

  ” अपना नाम ठाकुर साहब। आप यही तो धमकी दे रहे है ना । तो वहीं कह रहीं हूँ कि बदलने की तैयारी कर लीजिए और अपने लिए एक दूसरा नाम भी सोच लीजिये।
    अभी तो उड़ान भरना शुरू किया है ठाकुर साहब, अभी तो बहुत ऊंचा उड़ना है, सारा आकाश बाकी है। आप अभी से पंख कतरने चले आये,वैसे आप के पास वो औजार होगा भी नही जो मेरे पंख कतर सकें। हो सकें तो अपने सारे इधर उधर के इलीगल धंधों के सही सफेद पेपर्स तैयार करवा लीजिये वरना आपकी मुश्किल बढ़ सकती है। जेल से बचने के लिए कमर कस लीजिये आप क्योंकि आपको जेल के हवाले करने मैंने कमर कस ली है।
      वो कहतें हैं ना … सौ सुनार …

  बाँसुरी की बात आधी ही हुई कि खुद ठाकुर साहब बीच में बोल पड़े … एक लुहार की। ”

  ” जी सही कहा! चाय कॉफी कुछ लेंगे आप ? “

  मुस्कुराती बांसुरी ने उनकी तरफ देखा लेकिन उनकी आंखों से बहते नफरत का लावा चाय कॉफी की गर्मी से बढ़ना ही था,वो गुस्से में अपनी जगह से उठ खड़े हुए..

  ” देख लेंगे आपको भी बाँसुरी जी, कितने दिन बजेंगी आप! अच्छे अच्छे हमारे सामने नही टिक पाए, आप किस खेत की मूली हैं? “

” मुझे किसी के खेत की मूली समझने की गलती भी मत कीजियेगा ठाकुर साहब… आपके घरों में लड़कियां खेतों की मूलियां होती होंगी, मुझे मेरे मायके में मेरे पिता ने राजकुमारी बना के पाला और ससुराल में पति ने रानी बना कर रखा है। अच्छे से देख और जान लीजिए मुझे। ”

  ” आपका इतना बोलना मंहंगा पड़ेगा आपको।”

  ” जबसे साहब से शादी हुई है शौक बड़े महंगे हो ही गए हैं मेरे। क्या करूँ? अब कोई सस्ती चीज़ भाती ही नही… न सस्ते लोग न सस्ती बातें।”

  बाँसुरी के अपनी जगह खड़ी होते ही ठाकुर साहब तेज़ कदमो से बाहर निकल गए। उनके पीछे आदित्य भी बाहर निकल गया।
   बांसुरी अपने किसी काम से वहाँ से निकलने ही वाली थी कि दरवाज़े से आदित्य पलट कर वापस आया और बाँसुरी के ठीक सामने आकर एकदम से रुक गया।
   बाँसुरी जब तक कुछ समझ पाती आदित्य ने झुक कर उसके पैर छुए और वापस खड़ा हो गया। बाँसुरी अचानक उसके इस कारनामे पर चौन्क गयी…

  ” जी ये हमारे मामा जी थे। हम रेखा बाई सा के भाई हैं। आप रेखा सा की जेठानी है ,इस नाते…

  आदित्य की बात समझ कर बाँसुरी मुस्कुरा कर रह गयी… “” खूब खुश रहिए …”

  नाम के लिए बाँसुरी को अटकते देख आदित्य ने उसे अपना नाम बता दिया..

  ” आदित्य अदित्यप्रताप ! नाम है हमारा।

  “खुश रहिए आदित्य। ”

  आदित्य बाहर निकल गया। उसके मन में अजीब सी बेचैनी हो रही थी, आखिर उसके मन को कौन नचा रहा था और क्यों?
    उस अजातशत्रु ने किस तरह उसके मन को सम्मोहित कर लिया था कि इतने सालों से उसके मामा के सींचे पौधे में फूल अजातशत्रु के नाम के महकने लगे थे।
   बाँसुरी के लिए मन में उठी श्रद्धा के पीछे भी कहीं न कहीं वही तो खड़ा था,राजा अजातशत्रु , उसका बड़ा भाई!

   वो परेशान हाल मामा जी के पीछे चलता बाहर निकल गया।
  मामा जी की सच्चाई उसके सामने आ चुकी थी, और अजातशत्रु के व्यवहार की सच्चाई भी।
  अब उसे तय करना था कि उसे आखिर करना क्या है? उसे किसे चुनना है? एक तरफ बरसों से उसे पालती पोस्ती बेईमानी की रात थी तो दूसरी तरफ उसकी तरफ हाथ बढ़ाता सवेरा था। ये अब पूरी तरह उस पर था कि वो इनमें से किसे चुनता है?

  हवेली में पहुंचने के बाद भी आदित्य खुद में परेशान सोचता रहा। उसे चैन नही था।
   उसके सामने जो भी उदाहरण आ रहे थे उनके कारण वो और उलझता चला जा रहा था।
  उसके सामने एक उदाहरण विभीषण का था जिसने ऐसे तो श्री राम का साथ दिया सच्चाई का धर्म का साथ दिया बावजूद अपने सगे भाई से किये धोखे के कारण आज भी उसे घर का भेदी ही पुकारा जाता था।
  वहीं दानवीर कर्ण को हमेशा ही उसकी अच्छाई और इम्णादारी के लिए ही याद किया जाता है क्योंकि उसने अपने नमक का कर्ज जो अदा किया। आखिर दुर्योधन के उसी कर्ज़ को निभाने अपने भाइयों की सच्चाई जानने के बाद भी वो उनके सामने अडिग खड़ा रहा और दुर्योधन का साथ देता रहा।
   
    आज वो भी उसी दुविधा में खड़ा है आखिर, एक तरफ उसके भाई अजातशत्रु युवराज हैं तो दूसरी तरफ उसको पालने वाले उसके मामा। भले ही उनके मन में जो भी रहा हो , और एक समय भले ही वो उसे मारना चाहते रहें हों लेकिन आख़िर आज वो जो है उसे ये बनाने में भी तो उन्हीं का हाथ है। लेकिन अब उसका मन क्यों उनके साथ काम करने की गवाही नही दे रहा।
   लेकिन मन की गवाही का क्या? मन तो उसका चाह रहा कि आजातशत्रु के पास चला जाये पर ऐसे उसके चले जाने से क्या वो लोग उसे अपना लेंगे? उसके पिता उसे अपना लेंगे?

  सोचते सोचते उसके सर में दर्द होने लगा। कुछ देर अपने कमरे मे टहलने के बाद जाने क्या सोच कर वो अपने कमरे से निकल गया। अपनी गाड़ी उठाये वो एक अनजान सफर पर निकल पड़ा ।

  *******


   बाँसुरी को कुछ मीटिंग्स निपटानी थी। अपनी मीटिंग्स पूरी कर वो शाम ढले अपने सरकारी आवास पहुंची तब तक अंधेरा हो चुका था।
    शाम के समय में उसने सभी नौकरों को छुट्टी दे रखी थी।
   रात का खाना बना कर डायनिंग टेबल पर रख कर उसने उषा को भी जाने कह दिया था।
गेट पर के गार्ड के अलावा उषा की ही मासी बाँसुरी के साथ रात में रुक जाया करती थी। दो दिन से बुखार होने से वो भी छुट्टी पर थी। चार दिन बाद ही बाँसुरी भी छुट्टी पर अपने साहब के पास जाने वाली थी इसलिए उसका उत्साह आज देखते ही बन रहा था।
   घर पहुंच कर नहा धोकर उसने सुबह वाली ठाकुर साहब की फाइल निकाल ली।
  उसने सुबह ही सारी फाइल पढ़ ली थी लेकिन लंच के बाद जब वो अपने ऑफिस में आई तब उसके टेबल पर उसी फाइल में  कुछ दस्तावेज़ और भी रखे थे। इसके अलावा उसने एक बात और गौर की थी कि जब वो अपने ऑफिस से राज भवन मीटिंग के लिए जा रही थी तब उसे ऐसा लगा जैसे एक जोड़ी आंखें उसका पीछा कर रहीं हैं।
   अपने आजू बाजू देखने पर उसे ऐसा कोई संदिग्ध नज़र नही आया था।
    शाम में ऑफिस से निकलते समय भी उसे ऐसा लगा कोई तो है जो उसे घूर रहा है। लेकिन इस बार भी उसे कोई नज़र नही आया था।
    उसे चार दिन पहले की उषा की बताई बात याद आ गयी।
  उषा असल में एक अच्छे सम्पन्न घर की बेटी थी पर जल्दी ब्याह हो जाने से न पढ़ पायी न और कुछ सीख पायी। संयुक्त परिवार में जब तक सब साथ रहे किसी को रोटी पानी की किल्लत नही आई लेकिन एक बार सासु माँ ने डेढ़ होशियारी में अपने जीते जी सबका हिस्सा बांटा बांट दिया और उसके बाद उसके जीवन मे भी तकलीफें शुरू हो गयी। उसका पति भाइयों में सबसे छोटा था सो घर की कमाई के एकमात्र साधन परचून की दुकान पर ही भाइयों का साथ दिया करता था लेकिन बंटवारे में मिले कमरे और आंगन के बदले उसे दुकान पर अपना हिस्सा छोड़ना पड़ा और उषा की किस्मत उसे उसी आंगन में बड़िया और पापड़ सुखाने को मजबूर कर गयी।
    जब बड़े भाइयों ने छोटे को दुकान से धक्के मार निकाल बाहर किया तब उषा ने अपने पति को न सिर्फ ढांढस बंधाया बल्कि बड़ी पापड़ अचार बना कर घर घर बेच उसकी मदद भी करने लगी। उसी समय किसी कलेक्टर निवास के अर्दली ने उसे बाँसुरी के घर खाना बनाने का काम दिलवा दिया।
   अपने सुस्वादु खाने से भी स्वादिष्ट बातों के लच्छे बनाती उषा बाँसुरी को रोज़ शाम रात के खाने के साथ आजू बाजू के किस्से भी परोसती चलती।
    कभी किसी ऊंची पहाड़ी से बारातियों की बस पलटने और उस हादसे में सब के मर जाने के बावजूद उधर से गुजरते लोगों को लाल जोड़े में हाथ भर चूड़ियां पहनी नई दुल्हन के भूत का सब को रोक रोक कर अपने पति के लिए पूछताछ करना या फिर अपनी मीठी बातों के जाल में फांस कर अपनी ही बीवी को मार कर अपने गार्डन की मिट्टी के गमलों में दफनाई बीवी को ढूंढने के दिखावे को जब पुलिस भी नही पकड़ पायी तो कैसे बीवी का भूत आकर उसे अपने साथ ले गया। उषा के पास एक से बढ़कर एक किस्सों की पोटली थी। उसके डरावने किस्सों को सुन अक्सर बाँसुरी हँसने लगती और उषा मुहँ बना लेती…

  ” क्या दीदी आपको तो हम पर भरोसा ही न है। मेरी आमा ने ये किस्सा कहा था घर पर यानी मेरे मैत( मायके) में सुना था ये किस्सा।”

  ” उषा तुझे सारे डरावने किस्से ही क्यों भाते हैं?

  उषा बाँसुरी की बात पर लजा गयी थी।

“पता नही दीदी। शायद यहाँ पहाड़ों पर भूत ज्यादा होते हैं ना इसलिए हमें भूतों के ही किस्से सुनाए जाते हैं। वही सुनते सुनते अच्छे लगने लगते हैं। “

  ” मुझे लगता है इन इतने ऊंचे पहाड़ों पर खेलने कूदने में बच्चों के साथ हादसे न हो और वो पहाड़ों से दूर रहे इसलिए ऐसे खतरनाक किस्से गढे जाते हैं गढ़वाल में। तुम गढ़वाल से हो न? “

  ” ना दीदी मैं तो कुमाऊँ से हूँ पिथौरागढ़ की लड़की हूँ। ब्याह कर यहाँ आ गयी टिहरी गढ़वाल। ”

  ” ओह्ह ! भई हमारे लिए तो पूरा उत्तराखंड एक ही है। “

  ” वो तो अच्छी बात है दीदी। लेकिन भूतों को मानना भी ज़रूरी होता है नही ये आपसे गुस्सा हो जातें हैं। आप सच्ची भूत प्रेत नही मानती? “

  ” नही मानती उषा !”

  आज बाँसुरी को घर पर अकेले जाने क्यों उस शाम की उषा की बातें याद आ रही थीं। उस रोज वो बेवकूफ लड़कीं बात बात पर उसे भूतों के अस्तित्व की कैफियत ऐसे देती रही जैसे उसे भूतों का एक्सिसस्टेन्स साबित करने पर नोबल प्राइज मिल जाएगा। और इसी चक्कर में एक के ऊपर एक डरावनी कहानी उसे सुनाती चली गयी थी।।वैसे तो बाँसुरी को डर नही लगता था लेकिन आज की शाम इत्तेफाक से वो घर पर अकेली थी। पहाड़ों पर की सर्द रात उसे और उसके आवास को एक अलग ही नीरवता प्रदान कर रही थी।
    टेबल पर सामने रखी फाइल को बंद कर वो अपने लिए कॉफी बनाने चली गयी, उसी वक्त उसे लगा जैसे उसके कमरे की खिड़की के बाहर कोई खड़ा उसे देख रहा था। वो जब तक पलटी कोई तेज़ी से वहाँ से चला गया।

  *******

   नए कलेक्टर के रंग ढंग विराज को बिल्कुल भी पसन्द नही आये थे। विराज के अनुसार रत्ती भर का भी दिमाग उस नौसिखिए के पास नही था बस अपने पद का रौब दिखा रहा था। अगर वो उसकी रियासत में आया होता तो उसे मज़ा चखा के रहता विराज।
    लगातार चार दिनों तक भी जब विराज के दिमाग से नए कलेक्टर का भूत नही उतरा तब मां साहेब को युवराज और समर को बुला कर पूछ ताछ करनी पड़ी। उन दोनों के मुहँ से सब सुन माँ साहेब चिंतित हो उठी।
      रियासत के काम न कर सकने की असमर्थता के कारण या रियासत की जनता के असन्तोषी स्वभाव के कारण लेकिन जो भी हो अब विराज खुद चिंतित रहने लगा था।
   रातों को सोते में चौंक चौंक कर उठने लगा था। ऐसे ही एक रात कुछ तो भी बुरे सपने ने उसकी नींद तोड़ दी। परेशान हाल विराज उठ कर बैठा तो देखा सामने ही आरामकुर्सी पर रेखा गहरी नींद में डूबी पड़ी थी।
   उसे अपने कमरे में देख वो अचरज में पड़ गया। बहुत समय से वो और रेखा अलग कमरों में रह रहे थे। रेखा को ऐसे कुर्सी पर हाथ पांव सिकोड़े सोते देख उसे अच्छा नही लगा, उसने जाकर रेखा को जगा दिया..

“यहाँ क्यों सो रही हैं आप? “

  नींद से एकाएक जागी रेखा को एकदम से कुछ समझ नही आया। कुछ देर में सामान्य होते ही उसने विराज की ओर देखा..

” आप जाग कैसे गए? कुछ चाहिए आपको?

  न में सर हिला कर विराज ने वापस अपना सवाल पूछ लिया…

  ” जी आजकल आप नींद से चौंक चौंक कर जागते हैं, सपनो में बड़बड़ाते रहतें हैं। ऐसा लगता है जैसे आपके ऊपर बहुत ज्यादा दबाव है। अपने दबाव में आप इतने अधिक परेशान हो गए है कि आपको अपने आसपास की भी सुध नही रही। अभी अपने जय हमारे बेटे के बारे में भी पूछा कि उसे मैं कैसे अकेला छोड़ आई, वो तो चल भी नही पाता, जबकि राजा साहब आपका बेटा तीन साल का हो चुका है। चलने फिरने क्या दौड़ने भी लगा है।

  ” अच्छा ! कहाँ है अभी ?”

  ” हमारे कमरे में सो रहा है अभी। आप कहें तो हम सुबह ले आएंगे उसे। “

” रेखा ऐसा करतें हैं कल कहीं बाहर घूमने चलतें हैं। दो चार दिन ज़रा बाहर रह कर आएंगे तो हम लोग भी फ्रेश महसूस करेंगे। है ना? “

“जैसा आपको सही लगे। हमारी एक बात मानेंगे? “

” हाँ बोलो ?

” नही कुछ नही। जाने दीजिए, कभी और हम कहेंगे।

  विराज ने हाँ में सर हिलाया और एक सिगरेट सुलगाये खिड़की पर जाकर खड़ा हो गया।
  उसके कमरे से अजातशत्रु का कमरा नज़र आता था। कमरे की बुझी हुई बत्तियां और वीरान पड़ा कमरा देख उसे अजीब से सुनेपन ने घेर लिया। वो वहीं खड़े बाहर देखता कुछ सोच में डूब गया।


********

  कॉफी बना कर बाँसुरी लौटी तब तक में टेबल पर रखी फाइल वहाँ से गायब हो चुकी थी। बाँसुरी को समझ आ गया कि ये जो कोई भी है यहाँ उसके घर इस फ़ाइल को ही चुराने आया था।
   वो तुरंत खिड़की पर पहुंच कर बाहर झांकने लगी,लेकिन कोई नज़र नही आया। वो भाग कर बाहर वाले दरवाज़े पर पहुंच गई, लेकिन वो दरवाज़ा भीतर से बंद था। इसके अलावा एक दरवाज़ा पीछे की तरफ था, वो उस तरफ भी लपक कर पहुंच गई। वो दरवाज़ा वो खुद अंदर से बंद कर के गयी थी,वो वैसे का वैसा था।
    छत पर से भी कोई नीचे उतर सकता था लेकिन छत का दरवाजा भी अकेले रहने पर शाम से पहले ही वो बंद करवा दिया करती थी।
   उसकी समझ से बाहर था जब सारे दरवाज़े अंदर से बंद है तो कोई अंदर आया कैसे?
    वो वापस अपने कमरे में चली आयी। फ़ोन उठाये वो अपने सिक्योरिटी गार्ड को फ़ोन लगाने जा रही थी कि अचानक पावर कट हो गया।
    और उसकी एक घुटी हुई सी चीख निकल गयी। रह रह के अब उसे उषा पर गुस्सा आने लगा था,अपने डर की छूत उसे भी लगा गयी थी। वैसे उसे भूतों से डर नही लगता था लेकिन अकेले ऐसी सर्द रात में बिना रोशनी के ऐसा डरावना माहौल तैयार हो गया था कि कोई भी डर जाए।
   भूतों से ज्यादा उसे सुबह की ठाकुर साहब की धमकी याद आ रही थी,कहीं उन्होंने ही किसी को भेज उसकी फाइल गायब तो नही करवा दी।
   फ़ोन पर की टॉर्च लाइट जलाए वो बाहर गार्ड को आवाज़ देने जा रही थी कि पर्दे के पीछे खड़ी किसी लंबी चौड़ी आकृति से टकरा कर गिरने को हुई और एक जोड़ी बाजुओं ने उसे कस कर थाम लिया।

    बिना सामने वाले को देखे भी उस खुशबू को उस एहसास को उन बाजुओं को उसने पहचान लिया, और  खुशी से वो उससे लिपट गयी।

  ” आप कब आये साहब ? “

  “मैं तो सुबह से आपके घर पर हूँ हुकुम। सुबह से आपका रास्ता देख रहा हूँ,लेकिन आप व्यस्त थीं।”

” अरे तो मुझे फ़ोन करना था न,मैं आ जाती। ”

” मैं चाहता ही नही था कि तुम काम छोड़ कर आओ। इसलिए आराम से तुम्हारा रास्ता देख रहा था। “

  ” मेरे वापस आते साथ भी तो सरप्राइज दिया जा सकता था न । इतनी देर क्यों लगा दी आपने? “

  “तुम्हे देख रहा था, तुम्हारा काम करते हुए। कैसे तुम हर बात पर मुझे मिस करती हो ये देखना बहुत अच्छा लग रहा था। मेरे यहाँ न होने पर भी हर बात मुझे बताती हुई तुम बहुत प्यारी लग रही थीं। “

” क्या क्या सुन लिया आपने छिप कर।”

” वही सब जो उस फाइल के बारे में बोल रहीं थी, उसके बाद ठाकुर साहब के बारे में, किसी उषा के बारे में भी, उसकी कहानियों के बारे में … बहुत कुछ सुना। “

” हे भगवान ! मैं कहीं पागल तो नही होने लगी हूँ। ऐसे अकेले में बड़बड़ाते मुझे कोई देखेगा तो पागल ही सोचेगा। ”

” हाँ और इसीलिए मैंने सोच लिया है अब मैं यहीं तुम्हारे पास रहूँगा जिससे तुम्हे बात करने को कोई मिलता रहे वरना अपने इमेजनरी साहब से बातें करती हुई तुम्हे कोई देख लेगा तो वाकई पागल सोचेगा।

  बाँसुरी राजा की बात पर खिलखिला कर हँस पड़ी, और उसका हाथ थामे उसे डायनिंग में ले आयी..

” चलिए खाना खा लेते हैं!”

  राजा भी उसके साथ आकर एक कुर्सी खींच बैठ गया…

   डोंगे खोल बाँसुरी ने देखा आज सब कुछ उषा ने उसकी ही पसंद का बनाया था। गट्टे की सब्जी,भरवां बैंगन और बूंदी का रायता। उसने वापस पलट कर राजा की ओर देखा…

” तो आपने बनवाया है ये सब ? “

” जी बिल्कुल! जब तुम मेरी पसन्द का ध्यान रख खाना बनवाती हो तो मैं क्यों नही? “

  मुस्कुराते हुए बाँसुरी खाना परोसने लगी। खाना खाते हुए दोनो बातों में लगे रहे। बाँसुरी ने सुबह ठाकुर साहब से हुई मुलाकात के साथ ही आदित्य के बारे में भी राजा को बता दिया।
   आदित्य के उस व्यवहार को सुन राजा भी अचंभित था क्योंकि उसने आज तक आदित्य का बेशुमार गुस्सा ही देखा था।
    बाँसुरी आदित्य को पहचान नही पायी थी, इसलिए सिर्फ रेखा के भाई होने से उसका इस तरह बाँसुरी को आदर देना बाँसुरी के भी समझ से परे था। बाँसुरी की परेशानी देख राजा ने आदित्य के बारे में शुरू से लेकर अंत तक सारी बातें उसे बता दी।
     सारी बातें सुनने के बाद बाँसुरी और भी आश्चर्य में डूब गई , जो लड़का उसके पति से बेइंतिहा नफरत अपने सीने में पाले बैठा था वो उसे कैसे इतने हक से सम्मान दे गया।
   उसका बांसुरी के पैरों पर झुकना कहीं से भी उसे रेखा का भाई नही बता रहा था। उस वक्त आदित्य की आंखों में जो बाँसुरी को दिखा था वो तो देवरानी होते हुए भी आज तक रेखा की आंखों में न देख पायी थी।

     दोनो बातें करते हुए घर से बाहर निकल आये। बाहर की सीढ़ियों में बैठे दोनो अपनी बातों में खोए थे कि सामने के रास्ते से एक बड़ी सी लैंड रोवर निकल गयी।
   गाड़ी इतनी तेज स्पीड में निकली की उसे देख दोनो ही घबरा गए..

  ” ये गाड़ी तो आदित्य की लग रही थी। पहाड़ी रास्तों पर ये ऐसे गाड़ी क्यों भगाता जा रहा है? “

  ” मुझे सुबह भी ये कुछ परेशान लग रहा था, एक बात और जो मैं बताना भूल गयी वो ये की ठाकुर साहब के निकलने के बाद जब ये वापस अंदर आया तब एक पल को लगा ये मुझसे कुछ कहना चाहता है लेकिन फिर ये बिना कुछ बोले ही चला गया। “

” हम्म चलो मेरे साथ। ”

  राजा ने गाड़ी निकाली और बाँसुरी को साथ लिए आदित्य की गाड़ी के पीछे निकल गया।

      ******

       समर गहरी नींद सोया था कि फ़ोन की बेल से उसकी नींद खुल गयी…
    फ़ोन पिया का था…

” हेलो!”

” मंत्री जी ! सो रहे थे क्या ?

  समर ने बेड के बाजू में रखी घड़ी पर समय देखा , रात के साढ़े बारह बजे थे !

” नही फ़ुटबॉल खेल रहा था, क्यों आप सो गयीं थी क्या?

” क्या ? इस वक्त आप फुटबॉल खेल रहें हैं? आपकी तो बात ही निराली है।”

  नींद से बेहाल समर को झुंझलाहट तो हुई लेकिन अपने स्वर को जितना हो सके उतना शांत रख उसने बात आगे बढ़ाई

“वैसे इतनी रात गए मेरी याद क्यों आने लगी आपको। “

” मंत्री जी मेरा डाउट सही निकला। मैंने एक बहुत ज़रूरी बात बताने के लिए आपको कॉल किया है। “

“क्या बताने कॉल किया आपने? “

” मेरा शक एकदम सही निकला है?”

” वो तो ठीक है लेकिन किस बारे में?  क्या कह रही है आप? “

” आपको अब तक समझ में नही आया?

” आधी नींद से उठा कर आप मेरे साथ सस्पेंस पज़ल खेलेंगी तो मुझे समझ भी क्या आएगा ? मैं ये जान  गया हूँ कि आप सस्पेंस क्वीन हैं प्लीज़ अब असली बात बता दीजिए।”

“नही वो तो मैं कल सुबह बताऊंगी। कल सुबह आपके महल  आती हूँ , वही बताऊंगी।”

” तो अभी क्यों कॉल किया यार ? अच्छी खासी नींद खराब …

” ओह्ह मतलब आप सच मे  सो रहे थे? “

” रात में बारह बजे कोई और क्या कर सकता है भला? वैसे आप क्या करती हैं उस वक्त? “

” मैं तो पढ़ाई करती हूँ। इसी वक्त सबसे अच्छी पढ़ाई होती है , पूरा माहौल शांत जो रहता है। आपको पता है बहुत से लोग मेडिकोज को उल्लू इसलिए ही तो कहतें हैं , एक कारण हमारा रातों को जाग कर पढना और दूसरा लोगो को लगता है लक्ष्मी जी हमारे ऊपर ही सवार होकर भ्रमण करती हैं।”
   अपनी बात पूरी कर पिया खिलखिला उठी लेकिन दूसरी तरफ से उसे समर की कोई आवाज़ नही सुनाई दी, बल्कि हल्के खर्राटे सुन वो आश्चर्य से फोन देखने लगी..


” अजीब लड़का है, बात करते करते अचानक सो गया। ऐसा कौन करता है भला? “


    अगले दिन सुबह महल जाना है ये सोच पिया भी सोने चली गयी। अगले दिन उसे समर को न सिर्फ सच्चाई बतानी थी बल्कि उसके सबूत जो उसके पास आ चुके थे भी समर को सौंपना था।

  क्रमशः

  aparna ….

 










 


जीवनसाथी -93


    जीवनसाथी — 93



     विराज के तैयार होकर आते में समर ने सारे कागज़ वगैरह भी तैयार कर लिए।
    विराज समर और युवराज सा नए आये जिलाधीश से मिलने पहुंच गए…
   कलेक्टर ने जैसे ही सुना कि स्वयं राजा साहब मिलने आये हैं उसने तुरंत उन्हें अंदर बुलवा लिया…

    कलक्ट्रेट परिसर काफी बड़ा था, खूब सारे आम , बकुल नीम के पेड़ों से घिरे परिसर में एक लाइन से कई ऑफिस बने रखे थे।
    लंबा गलियारा पार करते विराज समर और युवराज अंदर बढ़ते चले गए।
   कलेक्टर साहब के कमरे के दरवाज़े के बाहर खड़े अर्दली ने एक बार फिर उन्हें हाथ बढ़ा कर रोक दिया, तब तक में उनके साथ बाहर से आ रहा अर्दली एक पर्ची उसके हाथ में रख गया।
   पर्ची देख उस ने उन सभी को नमस्कार कर दरवाज़ा खोल दिया….

      ऐसी जगहों पर आकर ही सही अर्थों में समझ आता है कि वाकई अब राजशाही का कोई अस्तित्व इन सरकारी महकमो में नही रह गया है। यहाँ पूर्ण लोकतंत्र ही नज़र आता है।
     सरकार सुचारू रूप से चलाने में सहायक चाणक्यों को भले भी कड़ी परीक्षाओं की अग्नि से जल कर निकलना पड़ता हो लेकिन सरकार चलाने वाले साफ तौर पर जनता के चुने प्रत्याशी ही थे। ऐसे में जब जनता अपना हक जानती है तो वो क्यों अब राजशाही झेलेगी , वो तो अपना चुना प्रत्याशी ही अपने सर पर बैठाना चाहेगी।

   समर के पीछे विराज और युवराज भी भीतर चले आये।
   सामने बैठा सजीला तरुण किसी भी कोने से इतने बड़े पद का अधिकारी नही लग रहा था। ज़ाहिर है अपनी मेहनत से छोटी उम्र में ही उसने इतना ऊंचा पद प्राप्त कर लिया था।
   कलेक्टर भी लगभग समर का ही हमउम्र लग रहा था…
   सामने टेबल पर नाम की तख्ती रखी थी, लिखा था..
              शेखर मिश्रा !!

  ” जी कहिये ?” उसने समर की ओर देख कर ही सवाल किया..
   समर ने विराज की ओर देखते हुए उसका और युवराज का परिचय दिया और बात आगे बढ़ा दी..

  ” जी ये हमारी रियासत विजयराघवगढ़ के राजा है राजा विराज सिंह और ये इनके बड़े भाई राजा युवराज सिंह!”

  युवराज का परिचय पाते ही शेखर के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान चली आयी। तो ये राजा के बड़े भाई साहब थे यानी बांसुरी के जेठ!!
   बाँसुरी से जुड़ी हर बात उसे मीठी लगती थी चाहे वो उसके ससुराल के लोग ही क्यों न हो!
    उसने युवराज के सामने हाथ जोड़ दिए …

  ” कहिये मैं आप लोगों की क्या सेवा कर सकता हूँ।”

  “कलेक्टर साहब , हमारी रियासत की जनता ने हमें त्रस्त कर रखा है। हम पूरी कोशिश करतें हैं उनकी हर समस्या को सुलझाते चलें लेकिन ये लोग हमेशा और एक नई समस्या लिए सामने खड़े हो जातें हैं। अबकी बार तो सब ने मिल कर हंगामा ही कर दिया है।”

  विराज की बात पर शेखर ने दराज़ से एक चिट्ठी निकाली और सामने रख दी …

” जी राजा साहब , मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूँ। ये चिट्ठी आपकी रियासत की ही जनता द्वारा भेजी गई है। गज़ब का असंतोष नज़र आ रहा है लोगों में। वो लोग किसी हाल में आपको राजा मानने को तैयार नही हैं। उनका कहना है कि अब सरकार ही पूरी तरह से आपकी रियासत को अपने अधीन ले ले, और आप जानते ही होंगे कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कोई रियासत सरकार के बिना नही चल रही।
   हालांकि आपकी रियासत भी सरकार के अधीन ही थी लेकिन आपसे पहले आपके दादा फिर आपके पिता और आपके भाई ने जिस ढंग से शासन चलाया उसमें सरकार और जनता किसी को आपत्ति नही थी लेकिन अब जनता आप पर अपना विश्वास खो बैठी है।
   देखिए शुरू से ही सिर्फ इसी एक शर्त पर आपकी रियासत का सम्पूर्ण संविलयन नही किया गया था, कि आप लोग जनता के चहेते थे।
    इसी शर्त पर आपको शासन की अनुमति प्राप्त थी लेकिन अब जब जनता खुद ऐसा नही चाहती तो मैं कुछ नही कर सकता।
   मैं खुद सरकार का आदमी हूँ, और प्रशासन जो चाहेगा मुझे वही निर्णय लेना होगा। मैं अकेला जाकर कुछ नही कर सकता।
    मेरे भी हाथ बंधे हैं आप समझ सकते हैं।”

  विराज अंदर से फूटने को तैयार था लेकिन उसे वहाँ आने से पहले ही समर और युवराज ने पूरे रास्ते यही समझाया था कि कलेक्टर कुछ भी कहे हमें चुप रह कर ही सुनना होगा।
    विराज ने लाचारगी से समर की ओर देखा जो शांति से बैठा शेखर की बात सुन रहा था …

  ” कुछ ले देकर अगर मामला निपटा सकें तो? “

  विराज के सवाल पर शेखर ज़ोर से हँस पड़ा …

  ” कितना देंगे राजा साहब ?”

  शेखर के सवाल पर विराज ने मुस्कुरा कर समर की ओर देखा , उसे लगा उसने बड़ी आसानी से बाज़ी जीत ली…
   समर मुस्कुरा कर रह गया…

  ” आप अपना भाव तो बताइए कलेक्टर साहब, हम पूरा का पूरा खरीद लेंगे आपको। आपकी ज़िंदगी भर की कमाई का चार गुना आपको मिल जाएगा। बीवी बच्चे सब खुश हो जाएंगे। ”

” राजा साहब मैं बड़ा महंगा पडूंगा आपको, और ये सौदा भी खरा नही निकलेगा।
   रही बात बीवी बच्चों की तो इस जन्म तो मुश्किल ही है।

  विराज शेखर की बात समझे बिना ही उससे भाव ताव करने में लगा था…

  ” कितने महंगे पड़ेंगे बताइये तो सही? “

  अब तक चुप बैठे युवराज ने आखिर विराज को हल्की सी झिड़की दे ही दी..

” विराज बिना सोचे समझे आप ज्यादा न बोलें , और शान्ति से बैठ कर वो क्या कहना चाहतें है समझिए। ”

  युवराज ने लगभग विराज के कान में ही कहा था क्योंकि किसी के भी सामने राजा की बात काटना उनके नियमों में नही था। लेकिन तब भी बात शेखर के कानों तक पहुंच ही गयी थी।

  ” ये आपके बड़े भाई साहब है ना? इनकी बातें सुनिए और मानये वही अच्छा रहेगा। दूसरी बात मैंने यहाँ जॉइन करते ही साथ अपने कक्ष के साथ सारे परिसर में कैमेरा लगवा लिया था जिससे मुझे रिश्वत ऑफर करने वाला पहली ही बार में पकड़ा जाए , लेकिन आप खुद राजा हैं इसलिए आपके साथ पहली बार में रियायत बरती जायेगी वरना रिश्वत देने वालों की तो खैर नही है यहाँ..

  विराज आश्चर्य से आंखें फाड़े इधर उधर देखने लगा…

  ” मत ढूँढिये आपको कैमेरा नज़र नही आएगा। तो आइए हम बात आगे बढ़ातें हैं।
   मैं साफ शब्दों में आपको बताता हूँ, आपसे पहले आपकी जनता आकर मुझस मिल चुकी है। मानना पड़ेगा आपको राजा साहेब गज़ब का असंतोष है आपकी जनता में।
   अब अगर आप अपनी राजगद्दी बचाना चाहतें हैं तो आपके पास बस दो ही उपाय हैं ……
   अब या तो राजा बने रहिए और जनता की अप्रसन्नता झेलते रहिए पर इसमें ये होगा कि जिस दिन जनता एकदम ही दुखी हो गयी आपकी सत्ता पलट देगी । अब उस स्थिति में आपको जनता की बात माननी पड़ेगी, जैसे अगर वो आपको राजगद्दी से हटा कर किसी और को बैठाना चाहें तो आपको उनकी बात मंज़ूर करनी पड़ेगी वरना जनता बगावत पर उतर आएगी…
   या फिर आप एक काम और कर सकतें हैं, कि आप इस बार चुनाव लड़ लीजिये। इससे ये होगा कि आप प्रत्यक्ष रूप से सरकार का हिस्सा बन जाएंगे तब ऐसे में जनता अगर अविश्वास प्रस्ताव लाती भी है तो भी सरकार आपकी तरफ से  कम से कम सोचेगी ज़रूर क्योंकि जब तक विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव नही लाता आपका कोई कुछ नही बिगाड़ पायेगा।
   आशा करता हूँ आप मेरी बात समझ गए होंगे। ”

  विराज ने बड़ी लाचारगी से समर की ओर देखा …

  शेखर अपने सामने फैली पड़ी फाइल्स एक तरफ करने लगा…

” आप लोगों के लिए कुछ मंगवाऊ ? चाय या कॉफी? “

  विराज ने एक भर नज़र शेखर को देखा और उठ गया..

  ” हम सोच कर आपको जवाब देंगे। ”

  विराज की बात पर शेखर मुस्कुरा कर रह गया..

  ” जी बिल्कुल! आराम से सोच लीजिये। मैं भी अभी तुरंत आप पर कोई कार्यवाही नही करने या रहा। आपकी शिकायत वैसे भी जनता ने मौखिक ही कि है। और जब तक मेरे पास लिखित में कुछ नही आ जाता मुझे कोई हड़बड़ी नही है।
पर कहूंगा यही की अपनी जनता को समझाने की कोशिश कीजिये क्योंकि अगर किसी ने आपके खिलाफ कुछ भी लिखा पढ़ी कर दी तब मैं आपको किसी हाल में नही बचा पाऊंगा। ”

  विराज अपनी जगह से उठ कर बाहर निकल गया, उसके बाहर जाते ही समर और युवराज भी उठ गए। युवराज के खड़े होते ही शेखर भी अपनी जगह पर खड़ा हो गया।
   उसने एक बार फिर युवराज के सामने हाथ जोड़ दिए।
  समर एक बार पहले भी दून वाले महल में राजा के जन्मदिन के मौके पर शेखर से मिल चुका था, और उसके बाद से ही दोनो में कभी कभी बात चीत हो जाया करती थी, लेकिन आज शेखर का युवराज सा को सम्मान देना समर की भी समझ से बाहर था।
   शेखर से हाथ मिला कर वो भी युवराज के पीछे वहाँ से बाहर निकल गया।


   बाहर गाड़ी में बैठा विराज अब भी गुस्से में था…

  ” ये दो कौड़ी का कलेक्टर समझता क्या है खुद को?”

” कलेक्टर समझता है राजा साहब और देखा जाए तो प्रैक्टिकली उनकी बातें सहीं भी हैं। चलिए आराम से ऑफिस में बैठ कर बात करतें हैं। ”

  समर के कहने पर ड्राइवर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी।

********


      आदित्य कुछ दिन तक तो शांति की तलाश में उधर उधर भटकता रहा और फिर आखिर मामा जी के पास पहुंच ही गया।
    मामा ने पूरी गर्मजोशी से उसका स्वागत किया, केसर को भी वहीं हवेली में देख आदित्य चौन्क गया। केसर ने अपने काम का हवाला दे कर उसे एक सटीक सा कारण दे दिया।
   आदित्य वैसे भी मामा जी के मामलों में ज्यादा बोलता नही था।
   केसर को वो कॉलेज के समय से जानता ज़रूर था लेकिन उससे भी उसकी कोई बहुत ज्यादा दोस्ती नही थी।
  वो वैसे भी जिस स्वभाव का था लड़को से ही ज्यादा नही बोला करता था तो लड़कियां तो फिर दूर की बात थी। मिमिक्री करने के अलावा उसका मुहँ कम ही खुला करता।
       मामा जी ने उसे देखते ही गले से लगा लिया..

  ” ऐसे अचानक आदित्य ? आने से पहले बताया भी नही। हमारे आदमी तुम्हें लेने चले आते ? “

“, बस मामा जी। आप सब की याद आ रही थी तो चला आया। पहले से कोई प्लान था नही इसलिए बिना बताए ही चला आया।

    ” सफर की थकान होगी तुम ऐसा करो आराम करो , हम ज़रा अपने काम से बाहर जा रहें हैं। जल्दी ही आकर मिलतें हैं।”

  ” जी हम भी ठीक हैं, आपके साथ ही चलतें हैं।”

   आदित्य भी मामा के साथ निकल गया। ठाकुर साहब का पहले ही किसी से मिलने का कार्यक्रम तय था,अपने लाव लश्कर के साथ वो निकल गए। एक के पीछे एक लगभग नौ दस गाड़ियां लाल टिब्बा के लिए निकल गईं।
     वहाँ ठाकुर साहब ने पहले ही किसी को मिलने बुला रखा था।
      किसी ज़मीन की सौदेबाज़ी की बात होनी थी।
वहाँ पहुंचते ही सामने बैठा व्यक्ति ठाकुर साहब की लंबी चौड़ी सेना देख पहले ही घबरा गया लेकिन चेहरे पर ऐसे कोई भाव दिखाए बिना वो शांति से बैठा रहा।
   ठाकुर साहब ने उसके सामने की कुर्सी खींची और बैठते हुए उसके सामने सारे कागज़ फैला दिए।

  ” लीजिये नेगी जी ! आपको तकलीफ न हो इसलिए हम सारे कागज़ तैयार कर लाये। बस अब आप आराम से इनमें साइन कीजिये और छुट्टी कीजिये। “

” ठाकुर साहब आपको सौ बार बता चुका हूँ कि मैं उस जमीन को किसी कीमत पर बेचना नही चाहता।”

” हमने आपकी इच्छा अनिच्छा तो पूछी ही नही। अरे पूछना चाहिए था क्या? देखिए नेगी जी , आपकी ज़रा सी ज़मीन से  लगी हमारी ज़मीन पर हमारा काम चल रहा है। अब हमारे लंबे चौड़े काम के बगल में आपकी ज़मीन की कोई पूछ परख तो होगी नही इससे अच्छा है हमसे कुछ पैसे लेकर उसे हमारे नाम कर दो वरना ..”

“वरना क्या ठाकुर साहब ?”

” वरना कल किसने देखा है ? ना आपने न हमने। हो सकता है यहाँ से लौटते वक्त आपकी गाड़ी किसी दुर्घटना का शिकार हो जाये और आप अपनी ज़मीन देखने के लिए बचें ही नही ..

  ” ये क्या बात हुई ठाकुर साहब, ये तो ऐसा हुआ जैसे आप हमें धमकी दे रहें हैं? “

” जी बिल्कुल सही समझे आप , हम आपको धमकी ही दे रहें हैं!”

” और अगर हम आपकी बात मानने से इनकार कर दें तो? “

” तो क्या क्या हो सकता है ये आप सोच भी नही सकते।”

  मुस्कुराते हुए ठाकुर साहब ने अपनी छोटी सी गन निकाल कर सामने टेबल पर रख दी।
   आदित्य के लिए ये सब पहले बहुत सामान्य सी बातें थी, उसका इन धमकियों से आये दिन सामना होता था,  लेकिन अभी कुछ महीनों से राजा अजातशत्रु की संगत में उसका भी काम करने का तरीका बदलने लगा था।
     उसे कुछ दिन पहले की अपनी एक डील याद आ गयी।
   उस डील के लिए वो अजातशत्रु के साथ ही गया था, कुछ इसी तरह की परिस्थितियां वहाँ भी निर्मित हो गईं थी…..
    उसकी मॉल बनाने वाली ज़मीन से लगी हुई लगभग दो एकड़ की ज़मीन सिंघानिया की थी और वो किसी हाल में वो ज़मीन देने को तैयार न था और उस वक्त अजातशत्रु ने कितनी आसानी से सब कुछ हल कर दिया था…

” देखिए सिंघानिया साहब , आपकी ये ज़मीन सिर्फ दो एकड़ की है। एक तरफ से ये आदित्य प्रताप फर्म की ज़मीन से घिरी है तो दूसरी तरफ सरकारी जमीन से, अब ऐसे में आप एक व्यापारी के दिमाग से सोच कर देखिए कि आप इस जमीन के टुकड़े को कैसे उपयोग में ला पाएंगे।
   आज आप इस टुकड़े को हमें बेचने को तैयार नही हैं लेकिन कल जब यहाँ इनका मॉल बन जायेगा तब हर तरह की दुकानें , शॉपिंग सेंटर रेस्तरां सब कुछ मॉल में उपलब्ध होगा उस वक्त आप इस मॉल के सामने क्या और कैसे खड़े कर पाएंगे।
   आज तो आपको फिर भी काफी अच्छे दामों में डील मिल रही हैं क्योंकि अब तक मॉल का काम शुरू नही हुआ इसलिए इन्हें भी लग रहा कि आपकी और इनकी ज़मीन पर एक साथ मिल कर काम करने पर काफी अच्छे तरीके से काम हो जाएगा ।
   इनका तो कम लेकिन इस जमीन के टुकड़े को बेचने पर आपका ही फायदा अधिक है।
  विश्वास कीजिये बाद में ये ज़मीन आपके किसी काम की नही रह जायेगी और तब उतना दाम भी नही मिलेगा जितना अभी मिल रहा।
   एक काम और हो सकता है वो ये की आप ये सारी ज़मीन खरीद लें और आप ही इस सारी ज़मीन का सदुपयोग कर लें। ”
   उस आखिरी बात को सुनते ही आदित्य एक पल को सकपका कर अजातशत्रु की तरफ देखने लगा था कि ये सरफिरा क्या बोल गया? कहीं उस सिंघानिया के बच्चे ने वाकई उसकी जमीन भी मांग ली तो? लेकिन राजा भी कोई कच्चा खिलाड़ी तो था नही…. कुछ समय सोचने के लिए मांगने के बाद आखिर तीसरे ही दिन सिंघानिया ने उस जमीन को आदित्य की फर्म के नाम बेच दिया था।
   बिना किसी हल्ले गुल्ले और शोर शराबे के अजातशत्रु ने कैसे उसका काम आसान कर दिया था। और एक यही काम क्या, जाने कितनी सारी डील्स उसने उसके पक्ष में करवा दी थीं वो भी पूरी ईमानदारी से।
     उसके साथ इतने दिनों से काम करते हुए आदित्य को भी तो उसका काम करने का तरीका ही पसन्द आने लगा था। जब ईमानदारी और सच्चाई के साथ भी व्यापार किया जा सकता था तो आख़िर मामा जी के तरीके अपनाने की क्या ज़रूरत ?

  लेकिन अभी मामा जी को इस बारे में टोकना सही नही होगा यही सोच वो चुप रहा।
    इतनी देर से मामा जी के साथ रहते हुए भी उसका मन अजातशत्रु और पिंकी के बारे में बताने का नही हुआ और वो चुप ही रह गया।
   ठाकुर साहब उस आदमी को थोड़ा और डराते धमकाते कि आदित्य ने उन्हें यह कह के रोक दिया कि सामने वाले को कम से कम दो दिन का वक्त दे दीजिए। हो सकता है अकेले में सोचने के बाद उसे भी लगे कि उसे ज़मीन का सौदा कर लेना चाहिए। आश्चर्य से अपने भांजे को देखते मामा जी ने गन उठाकर वापस रख ली।
    ना ठाकुर साहब को ही समझ आ पा रहा था और न आदित्य को कि उसने क्यों इतनी रहमदिली दिखाई।
खैर कुछ और चीखा चिल्ली मचा कर ठाकुर साहब वहाँ से निकल गए।

    हवेली पहुंचने के बाद खुद में खोया सा आदित्य अपने कमरे में चला गया।

    अपने कमरे में बैठा आदित्य सही और गलत में फर्क नही कर पा रहा था। आखिर जब वो बच्चा था और जब उसे सहारे की ज़रूरत थी तब कहाँ था अजातशत्रु का परिवार। कायदे से तो वो उसी का अपना परिवार था और उन लोगों को उसे अपनाना चाहिए था फिर भी उन लोगों ने उसे खुद से दूर कर दिया, उसे दूध की मक्खी सा अपने जीवन से निकाल फेंका, उस समय यही मामा जी तो थे जिन्होंने उसे पाला पोसा और इस लायक बनाया।
     और आज जब वो खुद सोचने समझने के लायक हुआ तब आ गया अजातशत्रु , उसकी थोड़ी सी सहायता कर उसपर अपना रंग चढ़ाने। क्या इतनी आसानी से वो मामा जी के एहसान भूल कर इस परिवार की ओर चला जायेगा?
   नही कभी नही।
आदित्य उसी समय उठा और मामा जी के कमरे की ओर बढ़ चला। गुस्से में उसका पारा उबल रहा था, कनपटी पर जैसे कोई हथौड़े चला रहा हो।
   आधी रात का वक्त हो चला था लेकिन अपने जुनून में जैसे उसे समय का होश ही नही था।
    तेज़ कदमों से अदित्यप्रताप मामा जी की स्टडी की ओर बढ़ने लगा था। उसे पता था मामा जी रात बारह साढ़े बारह तक वहीं हुआ करते थे।
   हवेली का कोना कोना उसका परिचित था। मामी जी इस वक्त शहर से बाहर अपनी बहन के घर गयी हुई थीं इसलिए भी मामा जी का स्टडी में होना पक्का था।

कमरे का दरवाजा बाहर से उड़का हुआ था, हल्के से दरवाज़े को अंदर की ओर धकेल आदित्य भीतर घुस गया।
   बड़े से हॉल के एक तरफ ढेर सारी बड़ी बड़ी आलमारियों में वकालत की मोटी मोटी किताबें सजी थी वहीं दूसरी ओर शीशम की लकड़ी का बड़ा सा सेलर सजा था।
   ठीक बीच में एक कमरा था जो मामा जी का ऑफ़िस कम आरामगाह भी था।
  उस कमरे के दरवाज़े पर पहुंचते ही उसे अंदर से किसी की आवाज़ें आनी लगी।
   वो एकाएक अंदर जाने की जगह वहीं थम कर खड़ा रह गया। नशे में लड़खड़ाती ज़बान से मामा जी किसी से बातों में लगे थे…

  “तुमने अपना काम तो पूरा किया नही ,फिर किस बात के पैसे केसर ? “

  ठाकुर साहब की बातें केसर से हो रहीं थीं… केसर ने कोई जवाब दिया लेकिन वो बाहर खड़े आदित्य को सुनाई नही पड़ा, वो दरवाज़े के और करीब चला आया।
   दरवाज़े से कान लगाए वो आगे सुनने की कोशिश करने लगा कि मामा जी किसी बात पर ज़रा ज़ोर से केसर पर बरस पड़े। और उनके बरसते ही केसर भी उतनी ही तेज़ आवाज़ में गरजने लगी और बाहर खड़े आदित्य को उन दोनों की बातें साफ साफ सुनाई पड़ने लगी….

“तो हम क्या करते ठाकुर साहब ! महल में घुस कर अजातशत्रु को मारा नही जा सकता था? “

  “हमने  तुरंत मारने कहा भी कब था लेकिन जो जो काम किया तुमने सब सत्यानाश कर दिया। जो दवा अजातशत्रु को पिलाने दी थी वो तुम उसकी बीवी को क्यों देने लगी? “

  ” आपसे किस ने कहा कि हमने अजातशत्रु की दवा उसकी बीवी को दी थी? उसकी बीवी के लिए तो हम अलग ही दवा लेकर आये थे और अजातशत्रु की दवा उसे अभी भी दी जा रही है। ”

  ” झूठ पर झूठ बोलती हो केसर? जब अजातशत्रु महल में है ही नही तो उसे दवाएं कैसे दे रही हो? और उसकी बीवी को दवा देने का क्या मामला है? “

” वो सब हम बताएंगे पहले आप ये बताइये की हमसे आदित्य वाली कहानी समर को सुनाने आपने क्यों बोला था? वो भी झूठी कहानी? हमें आज तक लगता था कि आप बस अजातशत्रु को मारना चाहतें हैं लेकिन अब लगता है आपका इरादा इससे भी कहीं अधिक खतरनाक है! आखिर क्या चाहतें हैं आप? “

” हाँ इरादे तो खतरनाक ही हैं हमारे। और सिर्फ अजातशत्रु ही नही उस पूरे परिवार को खत्म करना है हमें।
    हमारे दिल में जो ये आग लगी है आज की नही है। अजातशत्रु के पिता शुरू से ही अति महत्वाकांक्षी थे। उसने अपने सामने कभी किसी को कुछ समझा ही नही। हर जगह अपने अभिमान से हमारा सर झुकाते ही रहे।
    जब हम सभी की रियासत का संविलयन होता जा रहा था उनके पिता ने गहरी चाल चल अपनी बातों में उलझा कर अंग्रेजों से अपनी रियासत बचा ली। उसके बाद जब हम और वो शासन में आये तब हमने उसकी तरफ बहुत बार मैत्री प्रस्ताव रखा पर उसने हमेशा एक दूरी बनाए रखी।
      जब कभी हम दो चार दोस्त साथ बैठा करते वो अक्सर ही हमारी रियासत का, हमारा मज़ाक बनाये रखता।
   धीरे धीरे हमें उसके स्वभाव के कारण उससे चिढ़ होने लगी। उसी समय हमारी बहन और उसके भाई के सम्बन्धों के बारे में हमें पता चला,हमने सोचा अब इसे हराया जा सकता है। अगर हमारी बहन उनके महल पहुंच जाती तो किसी भी तरह से हम उसे गद्दी पर से हटवा कर उसके भाई को गद्दी पर बैठा देते और फिर उस रियासत पर हमारी बहन का राज़ होता, और फिर धीरे से हम उस रियासत को अपनी रियासत में मिला लेते।
   लेकिन यहाँ भी बाज़ी उल्टी पड़ गयी। उसका डरपोक भाई हमारी बहन का साथ नही दे पाया और उसे अकेला छोड़ गया वो भी ऐसी हालत में कि उसके पास मरने के अलावा कोई चारा नही बचा। फिर भी हमारी बहन सख्त जान थी, उसने मरना नही चुना बल्कि अपने बच्चे को जन्म देकर अकेले ही उसे पालने पोसने का निर्णय लिया।
   उस वक्त भी हमने बहुत कोशिश करी कि वो कलंकिनी ज़िंदा न बचे लेकिन कहतें हैं ना जिसे भगवान बचाना चाहतें है उसे फिर कोई नही मार सकता बस वैसे ही कुछ उसके और उसके होने वाले बच्चे के साथ हुआ।
   उसे हर दो महीने में गर्भपात की हेवी डोज़ दवाएं देने के बाद भी उसके बच्चे पर कोई असर नही हुआ और नौ माह पूरे कर वो बच्चा पैदा हो गया।
   लेकिन उन दवाओं का असर था कि बच्चे को जन्म देने के बाद वो मर गयी।
    पर सोचो स्वाभिमानी ऐसी थी कि अपनी अवस्था का पता चलते ही वो हमारी हवेली भी छोड़ गई थी। पढ़ी लिखी होशियार थी ही , सिर्फ नौ महीनों में उसने अपना काम भी जमा लिया था, कभी कभार आदित्य का पिता भी उससे मिलने आया करता था  इसलिए तो उसे अपनी पूरी गर्भावस्था में हम लोगो की कोई ज़रूरत नही पड़ी। तब तक हमारी माँ साहेब भी जीवित नही थी वरना बेटी के प्यार में वो ज़रूर उनके पास चली जाती, लेकिन उन्हें दवाएं देते रहने के लिए हमारी पत्नी ने उनके साथ हवेली की एक पुरानी नौकरानी को भेज दिया था।
    आदित्य का पिता मानसिक रूप से इतना कमजोर था कि उसकी अपने बड़े भाई से बात करने की हिम्मत ही नही थी और  उसने ये सोच रखा था कि बच्चे के पैदा होते ही बच्चे के साथ ही सुमनलता को भी लेकर महल चला जायेगा। बच्चे का मुहँ देख फिर शायद उसके बड़े भाई की उसे नकारने की हिम्मत नही होगी।
    लेकिन उसी समय किसी काम से आदित्य के पिता को इंडिया से बाहर जाना पड़ा, वो आदित्य की माँ से जल्दी लौटने का वादा कर गया था लेकिन उसके वापस आने के पहले ही आदित्य पैदा हो गया और उसकी माँ चल बसी।
     हवेली की नौकरानी ने जैसे ही आदित्य के जन्म और उसकी माँ के मरने की खबर हमें दी हमने उसे तुरंत ही बच्चे को भी मार कर कहीं फेंक आने को कहा लेकिन इतने दिनों में शायद हमारी बहन के साथ रहते हुए उसे उन लोगों से सहानुभूति हो गयी थी या शायद उसी की दी हुई गलत दवाओं से हुई सुमनलता की मौत का पश्चाताप था कि उसने उस नवजात को मारा नही और हमारी हवेली में ले आयी। यहाँ हमारे पिता उस वक्त जीवित थे उन्हें बच्चे ने मोह लिया और उन्होंने उसे मारने से इनकार कर दिया। अब हमारे पास कोई और चारा नही बचा था।
   उसके कुछ दिनों बाद आदित्य का बाप हमारे पिता के पास चला आया,वो अपने बच्चे को लेकर जाना चाहता था। उसके अनुसार उसके बच्चे का मुहँ देख उसके बड़े भाई उसे माफ कर देंगे लेकिन तब तक हमारे दिमाग मे। एक योजना तैयार हो चुकी थी।
   हमें अब उस नन्हे से बच्चे में अपना चमकता भविष्य नज़र आने लगा था। और तभी हमने ठान लिया कि इस बच्चे के मन में उस महल और महलवासियों के लिए जितना हो सके ज़हर भरना ही है।
    हमारे पिता हालांकि इस काम में हमारी मदद नही किया करते थे ,वो उसे बैठा कर उसकी रियासत के गुणगान सुनाया करते लेकिन उनकी पाठशाला ज्यादा समय तक चली नही जल्दी ही उनका देहांत हो गया एक बार फिर वो बच्चा अनाथ हो गया।
    

  “लेकिन ठाकुर साहब आपने इतना सब किया क्यों?”

  ” अरे इतनी आसान सी बात समझ नही आई आपको। हमने आदित्य को शुरू से अजातशत्रु के खिलाफ खड़ा करने की ट्रेनिंग दी, उसके मन में उस महल के लिए इतना ज़हर बो दिया किवो अजातशत्रु के खून का प्यासा हो गया। उसे अपने पिता के साथ साथ अपने बड़े पिता यानी युवराज और अजातशत्रु के पिता से भी हद दर्जे की नफरत हो गयी, क्योंकि उसके प्रति उसके पिता की कोमल भावनाएं हमने उसे कभी पता ही नही चलने दी।
     अब इसका ये फायदा होगा कि आदित्य अपनी नफरत में खुद ब खुद अजातशत्रु को मार देगा, उसे मारने के बाद युवराज को और उसके परिवार को रास्ते से हटाना उतना मुश्किल न था।
     लेकिन इस सब में कहीं आदित्य के बारे में  उसके पिता को पता चल जाता तो आदित्य गद्दी का अगला उत्तराधिकारी हो जाता क्योंकि आखिर उसके पिता ने उसकी माँ से शादी तो की ही थी इस लिहाज से वो उनकी पहली पत्नी थी।
  इसलिए तुम्हारे ज़रिए अजातशत्रु के उस चालाक मंत्री को उलझाने की कोशिश की, और तुमसे आदित्य के बारे में झूठी कहानी उसे सुनाई जिससे आदित्य का सच जानकर अजातशत्रु भी उसके खिलाफ हो जाये।
   और इस तरह ये सारे भाई आपस में एक दूसरे को मार गिराए और उस गद्दी में बैठने के लिए कोई नही बचे।

” और आपकी बेटी का पति गद्दी पर बैठ जाये।”

  ” गद्दी पर तो विराज सा ही बैठे हैं फिलहाल। और हम यही चाहते थे। जानते है कि उनमें दम नही है कि पूरी रियासत को संभाल सकें। एक तो वो वैसे ही कमज़ोर सिपाही दूसरा अजातशत्रु के बाद गद्दी पर बैठे इसलिए जनता में असंतोष तो होना ही है।
  अब बस हमें इस बात का फायदा उठाना है और उनकी रियासत को अपनी रियासत में मिलाना है।
रेखा की शादी उस निकम्मे विराज से करवाने का यही कारण तो था। हमें पता था कि या तो अजातशत्रु को आदित्य मार देगा जिसके बाद विराज गद्दी पर बैठ सकेगा या फिर विराज अपनी माँ का इतना दिमाग खराब कर देगा कि वो अजातशत्रु से बात कर विराज को गद्दी दिलवा देगी।
   

  “आपकी चाल तो आसान हो गयी क्योंकि अजातशत्रु खुद गद्दी छोड़ कर कहीं चला गया। हमें तो लगता है अपनी बीवी को साथ लिए कहीं दूर चला गया होगा। ”

  ” हाँ उसे वैसे भी राजपाट को कोई रुचि नही थी वो तो उसकी काबिलियत के कारण उसके पिता उसे ही राजगद्दी देना चाहते थे इसी कारण एक बार को हमें रेखा का रिश्ता उसके लिए भेजना पड़ा लेकिन उस लड़की के चक्कर में एक बार फिर उसने हमारा अपमान कर दिया।
   खैर देर से ही सही अब हमारा काम आसान हो गया है। विराज की हालत किसी से छिपी तो है नही। तुम वहाँ रह कर वहाँ की सारी खबरें दे ही रहीं थी। तो अब बस वक्त आ गया है कि इस सारे नाटक को खत्म कर दिया जाए।”

” वो कैसे ?”

  ” अजातशत्रु खुद हमारे रास्ते से हट गया है। अब विराज जब कहीं ठौर नही पायेगा तब हमारे ही पास तो आएगा।”

” और आदित्य ?”

“उसके अंदर तो हमने वैसे भी खूब ज़हर भर रखा है,बवाल है वो। अभी उसके नाम से अजातशत्रु को और भड़का के उन दोनों को आपस में भिड़ा कर दोनो को ही मरवाना है । बस उसके बाद हम अकेले बादशाह रह जाएंगे।”

   बाहर खड़ा आदित्य मामा जी और केसर की बातें सुन कर अपनी जगह पर खड़े खड़े ही बुत बन गया था। उसे समझ नही आ रहा था कि आज तक मामा जी का जो रूप उसके सामने था वो सहीं था या ये रूप असली था,जिसमें उसमें उनके मन की इतनी सारी सच्चाई जान ली थी।
    उसे लग रहा था जैसे किसी अदृश्य ताकत ने उसकी सारी शक्ति सोख ली थी। फिर भी अपनी सारी बची ताकत समेट कर भारी तन और मन से अपने कमरे की ओर बढ़ गया।
   हालांकि अब न वो कमरा और न ये हवेली उसे अपनी लग रही थी।
   उसने सोच लिया था कि अगली सुबह ही वो वहाँ से निकल जायेगा हालांकि जाएगा कहाँ ये अभी तक सोच नही पाया था।

  *****


  अगली सुबह उसके कमरे के दरवाज़े के बाहर से उसे कोई तेज़ी से आवाज़दे रहा था।
  आदित्य ने लपक कर दरवाज़ा खोल दिया ,सामने मामा जी का खास सहायक खड़ा था…

  ” जी आपको साहेब ने तुरंत अपने ऑफिस में बुलाया है।”

  मन तो नही था लेकिन अभी इस वक्त आदित्य मामा जी से कुछ कहना भी नही चाहता था। हाथ मुहँ धो कर वो मामा जी के ऑफिस की ओर बढ़ चला…

  ” जी आपने बुलाया? “

” आओ आदित्य ! ये देखो ये क्या आया है? “

   आदित्य ने सामने टेबल पर पड़े पर्चे को उठा लिया, और उसे पढ़ने लगा….
  कलेक्टर का नोटिस आया था और ठाकुर साहब को तुरंत कलेक्टर ने तलब किया था।
  एक दिन पहले ठाकुर साहब जिसे धमका कर आये थे उसकी शिकायत पर ही ये आदेश पारित हुआ था।
  ठाकुर साहब ने आदित्य को तैयार होने कहा और चिंतित से खुद भी तैयार होने चले गये।

  आदित्य भी कमरे में चला आया,कमरे में पहले से केसर उसकी राह देख रही थी…

  ” हमने कहा था न, लेकिन तुम्हें हमारी बात पर भरोसा नही था। इसलिए कल तुम्हें वहाँ कमरे के बाहर बुलाया था । हम माफी चाहतें हैं आदित्य लेकिन जब से उस महल में हमारा रहना हुआ है और हमने जब से अजातशत्रु को करीब से जाना है हम उस पर का अपना सारा गुस्सा भूल गए।
    हमें तुम्हारे मामा ने अपनी चाल में वैसे ही फंसाया जैसे तुम्हें। हमारे पिता के दोस्त होने का ढोंग, हमारी मदद का ढोंग कर कर के हमारे हितैषी बनते रहे । उन्हें भी पता था कि हम भी अजातशत्रु के खिलाफ हैं इसलिए हमें भी अपने जाल में फांस कर अपना काम निकाल लिया।
   लेकिन जब तुम्हारे साथ उनका किया अन्याय देखा और वहाँ महल के लोगों को भी करीब से देखा तो समझ आ गया कि अच्छे लोगों के दुश्मन बहुत होतें हैं। तभी सोच लिया था कि तुम्हें इस सब की सच्चाई से परिचित करा कर ही रहेंगे चाहे इस सब मे हमारी जान ही क्यों न चली जाए।

  केसर की बात सुनता आदित्य हैरान परेशान सा वहीं अपना सर पकड़ कर बैठ गया…

” केसर हमारी समझ में नही आ रहा कि कल मामा जी के ऑफिस के बाहर बुलाने के लिए तुम्हें धन्यवाद कहूं या तुम्हारा गला दबा दूं। हम आज तक कम से कम इस मुगालते में तो थे इस लंबी चौड़ी दुनिया मे कम से कम मामा जी तो हमारे अपने हैं। कल वो गलतफहमी भी दूर हो गयी। अब तो इस सारी दुनिया में न कोई हमारा रहा न हम किसी के।”

” ऐसे मत कहिये आदित्य। अगर एक रास्ता बंद हो जाये तो कई रास्ते खुल भी जातें हैं। अभी हम ज्यादा देर यहाँ नही रुक पाएंगे वरना ठाकुर साहब या और किसी को शक हो जाएगा। हम चलतें हैं आप अपना ध्यान रखिएगा।”

   केसर के बाहर जाते ही आदित्य कमरे का दरवाजा बंद कर रो पड़ा। इतनी आसानी से उसके ऑंसू निकलते नही थे लेकिन आज जाने क्यों वो अपने ऑंसूओं को रोक ही नही पा रहा था।अपनी माँ की तसवीर हाथ मे लिए वो काफी देर तक बैठा रह गया। आखिर उसके पिता भी तो उसे अपने साथ ले कर जाना चाहते थे फिर क्यों मामा जी ने उसे बचपन में ही उसके पिता के हवाले क्यों नही कर दिया?

  खैर वो मुहँ हाथ धोकर तैयार हो गया। मामा जी के साथ कलेक्टर ऑफिस जाते वक्त भी सारा समय मामा जी परेशानी में उससे कुछ न कुछ कहते रहे और वो चुपचाप बैठा रहा।

  कलेक्टर परिसर में पहुंचने के बाद उसने मामा जी से अपने लाव लश्कर को बाहर ही छोड़ अकेले अंदर चलने की गुज़ारिश की लेकिन न मामा जी को मानना था न वो माने।
   लगभग आठ दस आदमियों के साथ ठाकुर साहब केबिन में प्रवेश कर गए।
   अंदर बैठी कलेक्टर साहिब पर नज़र पड़ते ही ठाकुर साहब चौन्क गए…
    सामने टेबल पर कलेक्टर की नेम प्लेट रखी थी..

   बाँसुरी अजातशत्रु सिंह ।।

क्रमशः

aparna….

 
 
 




जीवनसाथी -92


जीवनसाथी — 92



      फ़ोन रख कर मुड़ते ही अपने आस पास अस्पताल और इधर उधर भागती दौड़ती नर्सो को देख कर राजा सोच में डूब गया कि आख़िर वो अस्पताल आया किस लिए है?
   उसे लगा जैसे वो सोच ही नही पा रहा कि वो यहाँ क्यों आया और कैसे आया?
   एक किनारे की बेंच पकड़ कर वो चुपचाप बैठ गया।
अपने दिमाग पर ज़ोर डालने की कोशिश करता वो सोचने लगा कि सुबह से लेकर अब तक उसने क्या क्या किया और आखिर यहाँ तक कैसे पहुंचा।।
  इतना सोचने पर भी उसे कुछ देर को कुछ भी याद नही आ पा रहा था, उसने अपना मोबाइल निकाला और ऑन कर लिया,स्क्रीन पर ही बाँसुरी की मुस्कुराती तस्वीर थी।
    उस तस्वीर को देखते ही राजा भी मुस्कुराने लगा …

  ” चाहे सारी दुनिया भूल जाऊँ लेकिन आपको कभी नही भूल सकता हुकुम।”

  मोबाइल स्क्रॉल करते हुए उसकी नज़र अदित्यप्रताप के नम्बर पर चली गयी, उसी वक्त भीतर से बाहर आती रीमा राजा के पास चली आयी। उसे आदित्य की बेहतरी के समाचार देकर वो कैंटीन की ओर कॉफी लेने चली गयी, और राजा को अचानक सब कुछ याद आ गया।
   वो भी एक ओर लगे वॉशबेसिन की ओर मुहँ हाथ धोने चला गया।
    अस्पताल से उसी रात आदित्य की छुट्टी हो गयी। उसे उसके घर पर छोड़ कर राजा अपने घर के लिए निकल गया।
   समर अपना काम पूरा कर अगली सुबह राजा से मिलने आने वाला था।

*****


  अगली सुबह समर कुछ जल्दी ही चला आया। काफी देर इधर उधर की बातें करने के बाद समर राजा को साथ लिए निकल गया।
   प्रेम को उसने कह दिया था कि राजा को वो किसी डॉक्टर से मिलवाने लेकर जा रहा है उन्हें लौटने में रात भी हो सकती है।
   प्रेम की राजा के प्रति चिंता से वो भी परिचित था।

    उन सब के जाने के बाद नाश्ते की प्लेट्स उठाये निरमा रसोई में चली गयी। बाजू वाले घर में रहने वाली हमउम्र बच्ची के साथ मीठी की भी दोस्ती हो गयी थी, उसके बुलाए जाने पर मीठी उसके साथ खेलने चली गयी थी।
  घर पर निरमा और प्रेम ही थे। प्रेम मीठी के किसी खिलौने को ठीक करने में लगा था और निरमा प्रेम को छेड़ने के लिए कुछ गुनगुनाते हुए काम भी करती जा रही थी…

   
    ”  अब के सजन सावन में
       आग लगेगी बदन में
     घटा बरसेगी, मगर तरसेगी नज़र
         मिल न सकेंगे दो मन
           एक ही आँगन में
        अब के सजन सावन…

     दो दिलों के बीच खड़ी कितनी दीवारें
      कैसे सुनूँगी मैं पिया प्रेम की पुकारें
    चोरी चुपके से तुम लाख करो जतन, सजन
        मिल न सकेंगे दो मन…”

  धीमी धीमी गुनगुनाहट का स्वर इतना तेज़ था कि प्रेम के कानों तक उसकी आवाज़ पहुंच जाए…

   प्रेम ने निरमा के गाने पर ध्यान दिए बिना ही अपना काम जारी रखा, उसे उसी तरह उदासीन देख निरमा वापस बाहर के कमरे में आकर साफ सफाई करने लगी। सफाई करते हुए भी उसका गाना शुरू था…


        आजा पिया, तोहे प्यार दूँ
         गोरी बैय्याँ, तोपे वार दूँ
        किसलिए तू, इतना उदास?
     सूखे सूखे होंठ, अखियों में प्यास
          किसलिए, किसलिए?
                 आजा पिया…

      होने दे रे, जो ये जुल्मी है, पथ तेरे गाँव के
     पलकों से चुन डालूँगी मैं, कांटे तेरे पाँव के
         लट बिखराए, चुनरियाँ बिछाए
              बैठी हूँ मैं, तेरे लिए
                    आजा पिया…

  गाने के बोल सुनते ही प्रेम ने एक नज़र निरमा को देखा और वो एकदम से चुप हो गयी।
   प्रेम ने सही किया खिलौना एकतरफ रखा और अपना मोबाइल उठाये एक तरफ लेट गया। निरमा समझ गयी कि अब प्रेम या तो कुछ पढ़ रहा होगा या गूगल पर कुछ सर्च कर रहा होगा….
     वो अंदर से सब्जियां उठा लायी और कुछ गुनगुनाते हुए सब्जी काटने में लग गयी….

       ओ मियां हमसे न छिपाओ
     हो बनावट कि सारी अदाएं लिये