नाम…..

    ”  नाम “
       बचपन में रानी गुड़िया गोलू बिटिया छुटकी लाडो जाने कितने लाड भरे नाम सुनते हुए बड़ी हुई।
     कुछ और बड़ी हुई तो घर पर काम करने वाले अर्दली और चाकर बेबी साहब कहने लगे।
     कॉलेज फर्स्ट ईयर में पहुंचते ही ‘ हे यू थर्ड बटन”या फिर “राइट से सेकंड” “पीछे की लाइन में सबसे आखिरी वाली” या ” मिड लाइन की यू दो चोटी” इसी तरह के शब्दों से नवाजी गई।।
    सीनियर बनते ही सारे जूनियर मैडम कहने लगे।।

   शादी हुई ससुराल गई, नाम किसी और के नाम के साथ जुड़ गया, पर वहां भी बहुत से अलग-अलग नामों से पुकारा गया नानी सास जब तक जीवित रही बहुरिया ही कहती रही, कोई दुल्हनिया कोई बहू कोई बहुरानी कहता रहा।।

     नौकरी भी लग गयी ,और एक बहू मैडम बन गयी,।
     उम्र और पदवी के हिसाब से हर दफा नाम बदलता गया,,कब गुड्डे-गुड़िया के साथ खेलने वाली छुटकी मैडम बन गयी पता ही नही चला।।
      छोटे-छोटे बच्चों की माँ बनते ही दुनिया भर की आँटी भी बन गयी।।
      समय गुज़रता गया और हर एक नये नाम के साथ अपने हस्ताक्षर चेहरे पर खिंची झुर्रियों मे करता गया।।

    बहुत से रिश्ते भी जुडे ,चाची ताई मामी मासी ,जिसकी जो ज़रूरत थी उसी नाम से पुकारा।

    भारतीय समाज और इसके संस्कार बड़े गहरे हैं, हाथ भरी लाल हरी चूडियां खनकाने वाली, मांग भर सिन्दूर माथे पर चमकाने वाली आँटी ही होती है भले वो महज़ इक्कीस की हो फिर भी सिर्फ छै महीने छोटा लड़का भी बड़े अदब से आँटी का तमगा लगा निकल लेता है,पहले पहले सुन कर खीझ होती थी,फिर मुस्कुराने लगी,अब तो हँसी आती है,और आदत भी पड़ गयी है।।
      कुछ एक तो मन्दिर की लाइन मे आजकल अम्मा जी ज़रा हटिये कहने से भी गुरेज़ नही करते।।
    पैंतालीस की उमर में अम्मा जी!! किस एंगल से इन  नासपीटों को अम्मा लगतीं हूँ,जी में आता है चीख चीख के कहूं__” अम्मा होगी तेरी माँ ” फिर खुद पर ही फिक्क से हँस देती हूँ ।।
    सुबह बैंक के लिये तैय्यार होते समय कई बार मांग पर के कच्चे सफेदी छूते बालों को करीने से काले बालों से ढांप चुकी हूँ,अब तो कई बार ये भी कह देते हैं ” बालों को रन्गना क्यों नही शुरु कर देती??”

   पर मैं ही डर जाती हूं,,बालों को रंगना मतलब पक्का बुढ़ापा!!” क्यों क्या बूढ़ी लगने लगी हूँ जो बालों को रंगना शुरु कर दूं।”

   औरत का सबसे बड़ा डर __” बुढ़ापा “
             अब तो उसी आँटी शब्द से प्यार होने लग गया है जो कभी बेहद नागवार था।ऐसा लगता है,चलो किसी को तो अब भी आँटी ही लगती हूँ,दादी अम्मा नही।।
      वर्ना कोई भरोसा नही मर्दूद ज़माने का!! कल को अचानक सब के सब माँ जी,अम्मा जी, दादी जी  कह कर टूट पड़ेंगे ,फिर कहाँ जाऊंगी,किस किस से कहूँगी _” दादी मत कहो ना!”
     कभी यही एहसास होता था ,मन टूक टूक चिल्लाता था __” आँटी मत कहो ना”

   पर उस शाम गज़ब हो गया__ ऑफिस का समय समाप्त होने को एक डेढ़ घंटा ही शेष था ,,चपरासी सबकी टेबल पर गरम गरम चाय की प्याली रख कर गया था,,अपनी प्याली से उठते धुयें को देख ही रही थी कि बाजू वाली लता ने टोक दिया” आपकी टेबल पर ही आ रहा है मैडम,,अब तो आपकी चाय गयी काम से,ठंडी हो जायेगी,इशारा कर दो कि चाय पीने के बाद ही आये।”

    पर जब तक लता की बात समझ उस लड़के को बैठ कर इन्तजार करने का इशारा कर पाती वो मेरी विंडो के सामने था।
    बड़ी अदा से मेरी डेस्क पे मेरी नेम प्लेट को ध्यान से देखने के बाद उसने कहा__” चित्रा!! क्या आप मुझे बता सकती हैं कि ये पेपर्स मैं कहाँ सबमिट करुँं।।”

चित्रा!! चित्रा!! चित्रा!!
    मैं आज भी चित्रा हूँ।। एक बेटी ,पत्नि,बहु,माँ, भाभी, ननद ,एक बैंक ऑफीसर इन सब से इतर मेरा वजूद आज भी मेरा नाम है,,चित्रा!!
    ऐसा नही था कि एक तीस साल के लड़के के मुहँ से अपना नाम सुन कर मन बावरा हुआ जा रहा था।।
      ये खुशी मन की थी,अपने उसी स्कूली नाम को वापस किसी के मुहँ से सुनने की खुशी,अपने बचपन की यादों मे उलझे अपने नाम को सुनने की खुशी।।
    सिर्फ अपने नाम को सुनने की खुशी।।

अपनी खुशी छिपाते हुए मैने उसे डेस्क न 5 पर भेज दिया।।
    शाम को जाकर पतिदेव के लिये क्या पकाना है, सासु माँ की दवा खतम हो गयी वो लेते हुए जाना है, बेटे की कराटे क्लास की फ़ी भेजनी है ,सारी चिंताएं कुछ पलों के लिये चाय के कप से उठते धुयें के साथ उड़ चली थी ,मन फूल सा हल्का हो चला था…..

    और कहीं दूर एक गाना चल रहा था__ मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया,हर फिक्र को धुयें में उड़ाता चला गया…..

aparna..