चंदा

चंदा:   “अरे कहा मर गई,चंदा जल्दी कर।””जल्दी जल्दी हाथ चला भाई,चाय नाश्ता लगा दे टेबल पे,साहब का ऑफ़िस का समय हो गया है।”

चंदा:   “अरे कहा मर गई,चंदा जल्दी कर।””जल्दी जल्दी हाथ चला भाई,चाय नाश्ता लगा दे टेबल पे,साहब का ऑफ़िस का समय हो गया है।”    “बस अभी आई दीदी।” रसोई से ही चंदा ने आवाज लगायी और अपने काम मे जुट गई।ये शिल्पा मेहरा के घर का रोज का सीन है,सुबह साढे आठ से नौ के बीच इनके घर इसी तरह का तूफान मचा रहता है।    शिल्पा के पति मिस्टर मेहरा के ऑफिस निकलने के बाद शिल्पा और उनका बेटा नाश्ता करते हैं और फिर चंदा।  इधर कुछ दिनो से शिल्पा रोज नाश्ते के बाद अपने बेटे को बैठा के कुछ ना कुछ पढाती रहती हैं।अभी तक उनका बाल गोपाल उनकी  कॉलोनी के ही किंडरगार्टन मे पढता आया था,अब तीसरी कक्षा के लिये ,उसे शहर के सबसे महंगे और बड़े स्कूल मे भर्ती कराने ही  रोज ये कवायद की जा रही है।        सेंट स्टीफेंस वहाँ का सबसे बड़ा और शानदार कॉन्वेन्ट है,जहां भर्ती की अनिवार्य शर्त है,वहाँ के कड़े इम्तिहान मे पास होना।स्कूल महंगा भी है पर अगर कोई विद्यार्थी उनके पर्चे मे पूरे नंबर ले आये तो उसकी पूरी पढाई स्कूल की तरफ से मुफ्त होती है।”शिल्पा यार मत सोच वहाँ का,ऐसा जब्बर पेपर होता है की कोई बिरला ही निकाल पाता है,मेरी तनु तो देखा ही है तूने कितनी होशियार है,कहाँ क्लीयर कर पायी।””हाँ अनिता ,बात तो सही है तेरी।एक बार मै भी प्रयास कर ही लेती हूं,वर्ना तेरी तनु के साथ के वी मे ही डाल दूंगी।”   “ये क्या बात हुई,उसकी तनु का नही हुआ तो क्या   विहान का भी नही होगा,मेरा तो दिमाग खराब हो गया,अब तो ऐसे तैय्यारी कराउन्गी की मेरा बच्चा फर्स्ट आयेगा वहाँ,देख लेना।”   ” हाँ ,बाबा करा लो तैय्यारी,इतना क्यों कुढ रही हो।तुम्हारी ही प्रिय सखी हैं अनिता जी।”और विवेक ज़ोर से हंस पड़ा पर शिल्पा का दिमाग अलग ही उधेड़बुन मे उलझा था।बस दूसरे दिन से ही युद्धस्तर पर तैय्यारियाँ शुरु हो गई,  नौ साल के बच्चे पर हर तरह का अत्याचार हुआ। 15तक की टेबल,हिन्दी मे गाय पे निबंध, सामान्य ज्ञान मे सारा जो कुछ शिल्पा को पता था सब रटवाया गया,अन्ग्रेजी तो पुछो मत,क्या क्या नही पढाया,गनीमत रही टॉलस्टॉय तक नही पहुची शिल्पा ।    दस दिन बाद एक छोटा मोटा सा पेपर बना के विवान को पकड़ा दिया,”बेटा देखो सिर्फ एक घन्टे मे ये पेपर बना के दे दो,इसमे पास तो कल का एग्ज़ाम भी पास कर लोगे।”     शिल्पा अनिता से फ़ोन पे लग गई,एक घंटा पलक झपक के बीत गया।”मम्मा लो मैने पेपर कर लिया।”मम्मा ने पेपर देखा और बेटे को गले लगा लिया,आंखों मे खुशी के आंसू आ गये,पर आंसू देख विवान पिघल गया।”मम्मा पेपर मैने नही चंदा ने बनाया है,आप बात कर रही थी ,तो मै शिन चेन देखने लगा ,मम्मा सॉरी ” शिल्पा ने चन्दा को देखा ,चन्दा ने अपनी माल्किन को।”चांद तुझे कैसे ये सब आ गया ,तू तो कभी स्कूल गई ही नही।””तो क्या हुआ दीदी,आपको विवान भईय्या को पढाते तो देखते थे ना ,,बस सीखते गये।””अरे पर तू तो बड़े अच्छे से लिख लेती है,अच्छा 7का टेबल सुना।”चंदा ने सुना दिया,उसके पीछे 9का फिर 13का और आखिर मे 15का भी सुना दिया।शिल्पा का कुछ देर पहले का चन्दा पर का गुस्सा उड़न छू हो गया।मुस्कुराते हुए उसने एक निर्णय ले लिया।    दूसरे दिन शिल्पा विवान और चंदा दोनो बच्चों को इम्तिहान दिलाने ले गई।   2दिन बाद ही रिजल्ट भी आ गया,अनिता रिजल्ट जानने को सबसे ज्यादा उत्सुक थी,,दौडी दौडी आई।   “क्या हुआ शिल्पा ,हुआ कुछ विवान का।””हाँ अनिता तेरी बात ही सही निकली यार,पेपर वाकई जब्बर था। विवान को तो अब के वी ही डालूंगी पर।””पर क्या शिल्पा बोल ना ”  “पर ये  की चंदा का सेंट स्टीफेंस मे चयन हो गया है,और वो भी प्रथम स्थान के साथ,विवान से एक साल ही तो बड़ी है,उसका एडमिशन मैनें वहाँ करा दिया। साल भर की सारी फीस भी भर आई और उसकी माँ को बता भी दिया की अब चंदा स्कूल जायेगी,काम नही करेगी।”      अनिता भी मुस्कुरा उठी “शिल्पा यार अब तेरे घर चाय कौन बनाएगा ।”  “”चंदा की अम्मा “”हँसते हुए शिल्पा चाय बनाने रसोई मे चली गई।इति।मेरी ये कहानी एक छोटा सा प्रयास है उन बच्चियों के लिये जिन्हे उनका हक नही मिलता,बचपन नही मिलता ,इतनी छोटी उम्र की बच्चियों से घर पे काम करा कर हम उनका कोई भला नही करते ,सिर्फ उनका बचपन छीन लेते हैं।।अपर्णा…

कोहिनूर !

रूही, प्लीज़ रुक जाओ। प्यार करता हूँ तुमसे”|

छी! गटर कहीं के! अपनी शक्ल देखी है कभी?”   

“हाँ कई बार! तुमसे ज़रा कम ही हूँ।”      

रूही ज़ोर से हँस पड़ी ” देख रिहाना ये मुहँ और मियाँ मिट्ठू। सुन घर जाकर अपनी अम्मा से पूछ कहीं कोयला खा के तो पैदा नही किया तुझे। पूरी शक्ल में जैसे कोलतार पुता है, छी मुझे तो देख कर ही घिन आती है, कैसे कोई इतना काला हो सकता है।”  रूही मटक कर चली गई …      

” क्यों इतनी जिल्लत सहता है भाई, तू बोल एक बार डी बी लैब का मजूमदार दोस्त है अपना, ऐसा स्ट्रांग एसिड ला दूंगा कि फिर ये घमंडी कबुतरी अपनी ही आँख नाक देख डर ना गयी तो नाम बदल देना भाई का।”           

“भाई बस रंग का काला हूँ ईमान का नही जो अपने इश्क़ को तेज़ाब से रंग दूं। माफ करना, लेकिन वो जो अभी अभी कर गयी वो मैं उसके साथ कभी नही कर पाऊंगा।” 

  दोस्त ने दोस्त को गले से लगा लिया__  ” अंधी है कम्बख्त, कोयले के पीछे छिपा कोहिनूर नज़र नही आया उसे…..सही कहा है किसी ने हीरे की परख सिर्फ जौहरी को ही होती है।

aparna….

 इतिहास

मैं छोटी थी उस समय ,उमर तो याद नही पर शायद नौ या आठ बरस की रही होंगी।     मेरे घर की छत से लगी छत थी उनकी,उनके घर के अमरूद मेरी छत पर झांकते थे और मेरे घर के गुलमोहर उनकी बालकनी पर….. रोजाना शाम में मैं उनकी बातें सुनने कभी उनकी कहानियां सुनने छत पर चली जाती थी,असल में उन्हे सुनना नही देखना मेरा मकसद होता था,वो थी ही इतनी खूबसूरत,,पूरे मोहल्ले की क्लियोपेट्रा!!       ताज़गी भरा गुलाबों सा चेहरा,होंठ ऐसे थे जैसे भगवान ने उन्हें पर्मानेंट लिपस्टिक लगा कर भेजा हो , लाख कोई ढूंढना चाहे उनके चेहरे पे कोई एब ना ढूँढ पाये ऐसा नूरानी चेहरा था,और वैसी ही चटकीलि बातें।।       नाम था नितेश!!   रज्जू दा अक्सर मुझे नितेश दीदी के लिये कुछ रंग बिरंगे परचे दिया करते थे,जिन्हे एक छोटी सी एक्लेयर के बदले मैं सात तालों में छिपाकर दीदी तक पहुंचा दिया करती थी    वो मोहल्ले के जुलियस सीज़र थे, इन्जीनियरिन्ग द्वितीय वर्ष के घनघोर जुझारू विद्यार्थी,मैं उन्हें अक्सर ड्राफ्ट और स्केल दबाये शाम को कॉलेज से हारा थका लुटा पिटा घर लौटते देख कर सोचा करती कि ये महापुरुष आगे चल कर कोई ना कोई इतिहास ज़रूर लिख जायेगा     इतिहास का तो पता नही पर उन्होने चिट्ठियां बहुत लिखी,गुलाबी लिफाफे मे गम से चिपका कर अच्छी तरह सील पैक कर के ही मुझे देते थे और जब मैं डाकिए का सीरियस रोल अदा कर चिट्ठी को माफिक जगह पहुंचा आती तब एक एक्लेयर पकड़ा देते…..    …..पहले पहले मिलने वाली एक्लेयर बाद मे दस रुपये की डेरी मिल्क में बदली और डाकिए के पद से मेरे त्यागपत्र देने के ठीक पहले मुझे रोस्टेड एल्मंड मिलने लगी थी।।    समय के साथ ये प्रेम कहानी भी अपने अंजाम को पहुंच गयी ,डीग्री के बाद रज्जू दा एम टेक करने बाहर चले गये……          विरह मे विरहणी भी कितना रास्ता तकती ,बी ए,एम ए सब हो चुका था,घर वालों ने रिश्ता ढूँढ़ा,फेरे हुए और नितेश दी हम सब को छोड़ कर आस्ट्रेलिया उड़ गयी।।।   *   अब ससुराल नौकरी सब से फुरसत ही नही होती की मायके में रुक पाऊँ,पर इत्तेफ़ाक़ से वैलेन्टाइन वीक पर ही घर पर भी कुछ आयोजन में आना और रुकना हुआ ।।।       शाम को मोहल्ले के गणपति मन्दिर में आरती के लिये गयी,वहाँ से लौट ही रही थी कि रज्जू दा के घर की ओर नज़र चली गयी,एक चौदह पन्द्रह साल का लड़का बालकनी मे खड़ा मेरी छत की तरफ देख रहा था,मैने ध्यान से उसकी निगाहों पे गौर किया ,उसकी आंखे मेरी छत से लगी दुसरी छत पर टिकी थी जहां नितेश दीदी की बिटिया अपने नाना की छत पर टहल रही थी….     ध्यान आ गया की माँ ने सुबह ही बताया था नितेश दीदी के भाई के बेटे का मुंडन संस्कार होना है जिसमें वो भी सपरिवार आई हुई हैं।।    चेहरे पर अनायास ही मुस्कान चली आयी,सच कहा है किसी ने “इतिहास खुद को दोहराता है”।aparna…