मायानगरी -6

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   मायानगरी-6

    होस्टल के कमरे में रंगोली रोती बैठी थी और झनक की समझ से बाहर था कि आखिर ऐसी कौन सी बात हो गयी जो रंगोली ऐसे धुंआधार रोये पड़ी है।

” अरे कुछ बता भी दो यार रंगोली! हुआ क्या? क्या रैगिंग वाली बात से परेशान हो ? ये सब बहुत कॉमन है यार। इसके लिए इतना टेंशन लेने की ज़रूरत नही है। बस कुछ दिनों की बात है फिर यही सीनियर्स खूब हेल्प करेंगे। ले पानी पी और अब चुप हो जा।”

   पानी पीकर रंगोली थोड़ा संभली और अपनी परेशानी उसने कहनी शुरू की…-“झनक यार इस लड़के ने मुझे कहीं का नही छोड़ा।”
  झनक चौन्क कर रंगोली को देखने लगी, उसे रंगोली की बात एकदम से समझ में नही आई…-” किस की बात कर रही है तू ?”
“वही इंजीनियरिंग वाला। कहाँ से आकर गले पड़ गया यार। अब क्या करूँ। ये तो हर जगह मुझे बदनाम करने में लगा हुआ है। सीनियर्स पर प्रोफेसर्स पे मेरा कितना खराब इम्प्रेशन पड़ेगा, सोच तो!”
” अरे यहाँ ये सब कोई नही सोचता!”
“सभी जगह सोचते हैं यार! बस कहने की बात है कि नही सोचते। आज तक मेरे स्कूल में मेरी इतनी अच्छी इमेज थी इसने सब सत्यानाश कर दी। एक नम्बर का बेवकूफ है , अरे भई मैंने मांगी तुझसे हेल्प तो तू क्यों हर जगह मेरा गार्जियन बनकर घूम रहा  है।”
” गार्जियन नही पति!” झनक ने चुटकी ली और रंगोली एक बार फिर नाराज़ होकर रोने लगी…-“यार प्लीज़ मत बोल ऐसा। इस लड़के से ऐसी नफरत हो रही है ना कि सामने आ जाये तो गला दबा दूँ। इसने सब जगह मेरा नाम खराब किया है।”.
” तो अब कर भी क्या सकते हैं यार। छोड़ ना। तू क्या उससे माफी मंगवायेगी?”
” हाँ ! बिल्कुल मंगवाऊंगी। जिस जिस से जाकर उसने खुद को मेरा पति बोला है उस हर एक के सामने जाकर हाथ जोडकर माफी मांगेगा और माफी जब तक नही मिलेगी हमारे सीनियर्स के पैरों पड़ा रहेगा।”
” तेरी मर्ज़ी! लेकिन मुझे नही लगता वो हीरो तेरी बात मानेगा।”
” झनक तू बस ये सोच की हम उससे कहाँ मिल सकतें हैं । मुझे उससे अकेले में बात करनी है।”
” हम्म इंजीनियरिंग वाला बंदा है, कैंटीन में सुट्टा मारते मिल ही जायेगा। नाम गांव कुछ पता है उसका?”
” नाम अभिमन्यु बताया था और मैकेनिकल पांचवे सेम का स्टूडेंट है। यार एक तो मुझे पढ़ाई की इतनी ज्यादा टेंशन हो गयी है कि हर वक्त पेट में अजीब सी गुड़गुड़ होती रहती है ऊपर से इस ने और नाक में दम कर दिया।”
” पढ़ाई की टेंशन अभी से क्यों?”
” बुक्स देखीं हैं। इतनी मोटी मोटी की लगता है मुझे खा जाएंगी। ये फिजियो की “गायटन एंड हाल” और ये ग्रे की एनाटॉमी। पता नही कुछ मेरे पल्ले भी पड़ेगा कि नही। मुझे तो ये सब पढ़ने के लिए डिक्शनरी लेकर बैठना पड़ेगा यार। मेरी स्कूलिंग हिंदी मीडियम थी ना!”
” अबे ये बात! इसलिए इतना डर रही तू। सुन किताबें तो यहीं हैं जो तीर्थ है हमारा ! लेकिन हमें तीर्थ पूरा करवातें हैं चौरसिया जी और जैन साहब।”
” मतलब?”
” मतलब फिजियो की हम पढेंगे जैन और एनाटॉमी में पढ़ेंगे बी डी चौरसिया। ये हमारी भाषा की किताबें हैं। यानी है तो इंग्लिश में लेकिन हमारी आसान सी इंग्लिश में। और फिर जो समझ न आये उसके लिए मैं हूँ ना। “
” हम्म ! मैं पास तो हो जाऊंगी ना!”
” तुझे रंगोली बस रोने की बीमारी है क्या? अब तक उस छछूंदर के नाम पर आँसू बहा रही थी, अब पढ़ाई के नाम पर।”
” यार झनक क्या करूँ? यहाँ रैगिंग के सिवा कुछ होता ही नही तो मज़ा कैसे आएगा। मुझे तो हॉन्टेड कैसल लग रहा है ये मायानगरी।”
” चल नीचे चलते हैं। कुछ अच्छा सा खाएगी तो दिमाग काम करेगा और फिर तुझे उस रितिक रोशन से लड़ने भी तो जाना है ना?”
” छोड़ यार! किसी ने उससे बात करते देख लिया तो और मुसीबत हो जाएगी। जाने दे। बस भगवान से प्रार्थना है अब मेरी पढ़ाई पूरी होते तक उसकी शक्ल न देखने को मिले।
“आमीन !! नही मिलेगी।”

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  रंगोली जो कुछ देर पहले अभिमन्यु को पानी पी पीकर कोस रही थी, अब उसे भूलभाल कर नीचे होस्टल मेस में जाने की तैयारी कर रही थी।
    झनक के साथ रंगोली नीचे पहुंची तो पता चला आज किन्हीं कारणों से मेस बंद रहेगा। उन लोगों के पास ऊपर कमरे में भी कुछ खाने को नही था। झनक के कहने पर दोनों हॉस्टल के बाहर बनी कॉमन कैंटीन में आ गईं।
   
     अभिमन्यु भी अधीर को साथ लिए रंगोली को ताड़ने के बहाने हैं मेडिकल कॉलेज की तरफ पडने वाली कैंटीन में आकर बैठा था कि उसी वक्त रंगोली झनक के साथ कैंटीन में दाखिल हुई।
   उसे देखते ही खुशी से चौक कर वो खड़ा हो गया और तुरंत रंगोली के पास पहुंच गया ” हेलो कैसी हैं आप? मैं अभिमन्यु!”
   अभिमन्यु को वहां आया देख रंगोली के तन बदन में आग लग गई। उसे पिछले चार-पांच दिन से जो चल रहा था वह सब एकदम से याद आ गया और वह बुरी तरह से अभिमन्यु पर भड़क उठी।
” तुम समझते क्या हो खुद को और मुझे क्या समझ रखा है? यह कोई फिल्म चल रही है कि तुम हीरो और मैं हीरोइन बन गई।
  देखो मिस्टर अच्छे से इस बात को समझ लो, कि मैं सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई करने यहां आई हूं! तुम मेरे नाम के साथ अपना नाम इस तरह से जोड़ दोगे तो मैं तुम्हारी डायरेक्ट कंप्लेन अपनी डीन से कर दूंगी। डीन से यह बात सीईओ मैडम तक पहुंची तो तुम्हें सीधे रस्टिकेट कर दिया जाएगा। अब तुम फोर्थ सेमेस्टर में रहो चाहे फिफ्थ सेमेस्टर में, तुम्हारी पूरी की पूरी पढ़ाई डब्बा हो जाएगी। समझ में नहीं आता  की तुम्हें कॉलेज में पढ़ाई करना है या बस हीरोगिरी करने आए हो। क्या इधर-उधर घूम घूम के लड़कियों को परेशान करना , सिर्फ यही काम है तुम्हारा।
मेरी सारी इमेज खराब कर दी । पता नहीं मेरे सीनियर क्या सोचेंगे कि कल कि आई जूनियर अफेयर चला रही है।
   देखो तुम होगे किसी रईस बाप की बिगड़ी औलाद , तुम्हारे लिए पढ़ाई करना एक शौक होगा। तुम्हें रुपए पैसे कमाने से कोई लेना-देना नहीं होगा लेकिन मैं ऐसी नहीं हूं। मैं हद दर्जे की मिडिल क्लास लड़की हूं। रुपए पैसों से भी और फैमिली वैल्यूज से भी।
    मैं इतनी मिडिल क्लास हूं कि मेरे विचार भी मेरे जैसे ही मिडिल क्लास हैं। मेरे लिए मेरा कैरेक्टर सबसे बड़ी बात है, मैं यहां सिर्फ और सिर्फ पढ़ने आई हूं । पढ़ाई करके मुझे एक अच्छा डॉक्टर बनना है। अपना क्लीनिक डालना है खूब पैसे कमाने हैं। अपने मम्मी पापा को खुश रखना है। उनके आज तक के जो सपने पूरे नहीं हो पाए उन्हें पूरा करना है। मेरे पास प्यार इश्क मोहब्बत करने के लिए बिल्कुल वक्त नहीं है।
    तुम सोच भी नहीं सकते कि तुमने मेरा कितना बड़ा नुकसान किया है। मैं माफी मांगती हूं मुझसे गलती हो गई कि मैंने रैगिंग से बचने के लिए आकर तुम्हें गलती से प्रपोज कर दिया और वह सिर्फ और सिर्फ रैगिंग थी उसके लिए मुझे माफ करो। और प्लीज मेरी जिंदगी से दूर हट जाओ।
   हो सके तो अब जब तक मैं इस कॉलेज में हूं मुझे अपनी शक्ल मत दिखाना । प्लीज तुम्हारे हाथ जोड़ती हूं, क्योंकि तुम मेरे लिए यह तो करोगे नहीं कि मेरे सारे सीनियर से जाकर यह बात कहो कि तुम जो भी कह रहे थे वह गलत था, झूठ था, मजाक था। पहले मेरी सारी सीनियर्स मैडम के सामने तुमने मेरी इमेज खराब की, बाद में मेरे सीनियर सर लोगों के सामने भी तुमने वही कर दिया। अब मेरे पूरे कॉलेज में सब मुझे तुम्हारी गर्लफ्रेंड समझ रहे हैं। जबकि ऐसा कुछ है नहीं और तुम शायद नहीं जानते प्रोफेशनल कॉलेज में कैरेक्टर बहुत ज्यादा मैटर करते हैं।
   तुम्हें शायद नहीं पता होगा लेकिन मेरे मार्क्स पर भी इस बात का असर पड़ेगा । मेरे प्रैक्टिकल मार्क्स तो ज़ीरो ही हो गए क्योंकि प्रोफेसर एक कैरक्टरलेस लड़की को कभी भी अच्छे मार्क्स नहीं देते।”

   बोलते बोलते रंगोली की आंखों से आंसुओं की धार बहने लगी झनक उसे संभाली हुई थी। और बार-बार शांत करवा रही थी लेकिन अभिमन्यु रंगोली के इस रूप को देखकर दिल से घबरा गया था। रंगोली के आंसू उसकी आंखें भिगो गए थे । उसने सोचा भी नहीं था कि जिस बात को वह आज तक इतना कैजुअल ले रहा था वो रंगोली के लिए इतनी बड़ी बात हो सकती है, उसने तुरंत अपने दोनों हाथ जोड़  दिए।

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“मुझे माफ कर दो रंगोली मैं तुम्हारे हर एक सीनियर से मिलकर माफी मांग लूंगा। और तुम बेहिचक पढ़ाई करो मैं अब तुम्हें कभी डिस्टर्ब करने नहीं आऊंगा।”

  अभिमन्यु अपनी आंखें पोंछता वहां से बाहर निकल गया अधीर भी उसके पीछे भागता चला गया।

  वह तो अच्छा था कि इस कैंटीन में ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं थी और यह लोग दरवाजे पर ही टकरा गए थे इसलिए किसी ने भी इन लोगों पर ध्यान नहीं दिया लेकिन रंगोली को अब बस यही महसूस हो रहा था कि हर किसी की निगाहें उसी की तरफ़ है। उसने झनक का हाथ पकड़कर धीमे से कहा कि “अब मैं अंदर नहीं जा सकती मुझे वापस कमरे में जाना है” झनक उसकी हालत समझ गई थी इसलिए उसे साथ लेकर वह हॉस्टल वापस चली आई।

   लुटा पिटा सा अभिमन्यु भी अपने हॉस्टल पहुंच गया अधीर ने उससे खाने के लिए भी पूछा लेकिन अब उसकी भूख प्यास सब उड़ गई थी।
   उसने अपने कमरे का दरवाजा खोला तो देखा सामने सीपी सर बैठे हैं।
“सर आप यहां? मुझे बुला लिया होता।”

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“अब का कांड कर दिए हो मिसिर जी?”

“क्या बात हो गई सर मैं समझा नहीं?”

“मेडिकल में जाकर कुछ हंगामा किए हो भाई?”

“आपसे किसने कहा?”

“ऋषि खुराना की टीम सीईओ मैडम के पास गई थी! तुम्हारी शिकायत लेकर। बुलावा आया है, वाशिंग पाउडर के ऑफिस में।
      कल मैडम ने तुमको याद किया सुबह सुबह पहुंच जाना नौ बजे। हम भी चलेंगे तुम्हारे साथ हम जानते हैं तुम कुछ गलत काम तो कर नहीं सकते। पर यार थोड़ा तो सोचा करो निरमा मैडम के पास हम ही लोग गए थे यह फरियाद लेकर कि स्टूडेंट्स का अपनी परिधि को लांघना बंद करवा दीजिए। उन्होंने बंद करवाने की कोशिश शुरू की कि हमारा यह लड़का मेडिकल में पहुंच गया। “

अभिमन्यु को बीते दिन वाली सारी बातें याद आ गई और उसने अपने सर पर अपना हाथ मार लिया

“अब याद आया! तो वह साला इस चक्रव्यूह में फंसाने की बात बोल रहा था। उस कमीने को तो मैं देख लूंगा सिपी सर।”

“अरे हटाओ छोड़ो यार ! उसको तो हम एक साथ सब देख लेंगे, उसकी चिंता छोड़ो। फिफ्थ सेम के एग्जाम की डेट आ गई है। उस पर भी फोकस करो। इस बार तुम्हारा चांस है अगर इस बार टॉप कर लिए तो अगले सेमेस्टर बुक बैंक फ्री मिलेगा तुमको।

“यह बढ़िया बात बताएं सर आप। एग्जाम कब से हैं?”

“2 हफ्ते बाद की डेट आई है बेटा! कभी थोड़ा लाइब्रेरी के बाहर लगे नोटिस बोर्ड पर भी नजरें फिरा लिया कीजिए। वैसे तो आप दोनों बहुत ही ज्यादा व्यस्त रहते हैं! लेकिन अपने व्यस्त शेड्यूल से थोड़ा टाइम निकाल कर नोटिस बोर्ड पर भी नजर डाला कीजिए।”

  अभिमन्यु और अधीर झेंप कर इधर-उधर देखने लगे।
सीपी उठकर अभिमन्यु के बालों पर हाथ रख कर बाहर निकल गया दरवाजे से पलट कर एक बार फिर उसने अभिमन्यु को आवाज लगा दी…- घबराओ मत ऋषि खुराना की तो खबर हम सब मिल कर लेंगे! अभी फिलहाल कल जाकर मैडम के पैर पकड़ लेना कि तुम को सस्पेंड ना करें! 2 हफ्ते बाद एग्जाम हैं। इस बात की भी दुहाई दे देना जिससे तुम्हें माफ कर दें। आई बात समझ में?”

  अभिमन्यु ने झुक कर सीपी सर के पैर छू लिये। और सीपी  ने उसे ऊपर उठा कर अपने कलेजे से लगा लिया…-” छोटे भाई हो बे हमारे।’

******

   अगली सुबह निरमा के ऑफिस के बाहर अभिमन्यु इधर से उधर चक्कर काट रहा था कि तभी निरमा के ऑफिस का दरवाजा खुला और एक लंबे चौड़े डील डौल वाला स्मार्ट सा बंदा एक बच्ची का हाथ पकड़े बाहर निकल आया…
   हड़बड़ी में अभिमन्यु उससे टकराते टकराते बचा…-” सॉरी सर! वो ज़रा दिमाग घुमा हुआ है ना। इसलिए कुछ सूझ नही रहा और आपसे टकरा गए।”
” कोई बात नही। “
वो व्यक्ति आगे बढ़ने को था कि उस बच्ची ने अभिमन्यु के हाथ में थमा गुलाबों का बुके देख उसे पाने की ज़िद शुरू कर दी।
   और अभिमन्यु उस लड़की से बचाने के लिए गुलाब इधर उधर छुपाने लगा…
  ” नो मीठी! अभी यहाँ से चलो तुम्हें शाम में पापा रोज़ेज़ दिलवा देंगे।”
” आप भूल जातें हैं पापा।”


   उस व्यक्ति ने मुस्कुरा कर अभिमन्यु की तरफ देखा…-“तुम परेशान मत हो। जाओ अंदर मैं इसे सम्भाल लूंगा। “
  अभिमन्यु विनम्रता से दुहरा होता उसी आदमी से अपने मन की बात कहने लगा….
” ये असल में मैडम के लिए लेकर आया हूँ।”
  सामने खड़े आदमी की भौहें ज़रा तन गयीं। उसके चेहरे के भाव देख अभिमन्यु को लगा ये आदमी भी अंदर बैठी औरत से परेशान ही होगा , वो अपनी लय में कहता चला गया।
  ” क्या बताऊँ सर। इतनी कड़क हैं ये मैडम की आपकी गलती न भी हो तो भी आपको सॉरी बुलवा कर रहेंगी।”
   सामने खड़े उस आदमी ने अभिमन्यु का कंधा थपथपा दिया…-“समझ सकता हूँ। और ये बात मुझ से बेहतर कौन जानेगा।”
” सर इतनी स्ट्रिक्ट है मैडम की पहला तो इन्हें देखते ही हम क्या कहने आये थे वो भूल जातें हैं। दूसरा ये अपनी मीठी ज़बान से हमें ऐसे लपेटतीं हैं कि जो वो करवाना चाहतीं हैं फिर वही होता है।
   आप कितने पापड़ बेल लो होगा वही जो इन्होंने सोच रखा होगा। इन्हें कोई फर्क नही पड़ता की पढ़ने में कैसे हैं? आपके एम्बिशन क्या हैं? हम सब इनके लिए सिर्फ गधे हैं। बल्कि इन्हें यह लगता है कि इनके इस केबिन के बाहर हर कोई गांव है यह अकेली हिटलर है।
   हिटलर नहीं बल्कि यह तो मुझे तुगलक लगती है। बिना सर पैर के फरमान जारी कर दिया तो कर दिया। अब तुम फॉलो करते हो तो ठीक और अगर नहीं की तो तुम्हारा सर कलम कर दिया जाएगा।
   अच्छा सदियों से यह परंपरा रही है कि कितना भी खडूस राजा रहा हो,सर कलम करने से पहले आप की आखिरी इच्छा जरूर पूरी करने के लिए पूछता था। लेकिन यह ऐसी है कि आप की आखिरी इच्छा भी नहीं पूछेंगी सीधे खटाक।

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“बहुत सताए हुए लग रहे हो इनके।”

” क्या करें इनसे ज्यादा हम अपनों के सताए हुए हैं।अपने कॉलेज के लौंडो की मदद करने के चक्कर में बुरी तरह से फंसे बैठे हैं। पता है अंदर जाएंगे तो मैडम सूली पर चढ़ा ही देंगी।”

“एक बार बात करके देखो दोस्त ! हो सकता है तुम्हारी सुन ले।”

अभिमन्यु ने लाचारगी से ना में से सिर हिला दिया…

“अभी 2 दिन पहले तो इनसे बात करके गए हैं सर जी। कैंपस में इधर-उधर लड़के ना घूमे उसके लिए आकर बड़े प्यार से इन से बात की कि आर्ट्स एंड स्पोर्ट्स वाले लड़कों का इधर-उधर घूमना बंद करवा दें। वह लड़के वैसे भी वाहियात हैं। अब कल तो हम किसी काम से मेडिकल गए थे अब वहां के कुछ लड़कों ने आकर आग लगा दी! अब मैडम जी हमारे नाम से फतवा जारी कर चुकी हैं। हमें इसीलिए बुलवाया गया है कि हमारे नाम का सस्पेंशन लेटर हमारे हाथ में रख दिया जाए ,क्योंकि मैडम ने आदेश पारित कर दिया था। और वह आदेश भी ऐसा वैसा नहीं कि दो से तीन बार वार्निंग दी जाएगी फलाना ढिकाना। बल्कि आदेश यह था कि अब से अगर कोई भी लड़का किसी दूसरे कैंपस में नजर आया तो उसे तुरंत सस्पेंड कर दिया जाएगा। एक महीना के लिए। अब बोलिए 15 दिन बाद हमारे एग्जाम होने हैं। यह हमें सस्पेंड कर देंगी तो हम तो पूरा एक सेमेस्टर पीछे हो जाएंगे ना। “

“बात तो चिंता की है! पर तुम ऐसा करना, जाते साथ पहले मैडम से यह सारी बातें बोल देना। हो सकता है सुन ले, वैसे कभी-कभी सामने वाले की भी सुन लेती हैं। स्ट्रिक्ट तो हैं लेकिन अगर कोई अपनी सच्चाई पर अडिग रहे तो उसे माफ भी कर देतीं हैं।’

“पापा चलो न देर हो जाएगी। फिर मम्मी आपको डांट लगाएंगे कि मीठी को लेट करवा दिया।”

अभिमन्यु ने प्यार से उस बच्ची के सर पर हाथ फेरा और मुस्कुरा कर उसके पास झुक कर बैठ गया …-“हां बेटा जाओ घर पर आपकी मम्मी वेट कर रही होगी ना।”

“नहीं भैया! मम्मी तो अंदर बैठी हैं ।यह मम्मी का ही ऑफिस है। और स्कूल ले जाने के पहले पापा मुझे मम्मी से मिलवाने लाते हैं।”

   अभिमन्यु खट से खड़ा हो गया। उसने घबराते हुए सामने खड़े आदमी की तरफ देखा…-” आई एम सॉरी सर। मुझे पता नहीं था कि आप….”
    वह कहते कहते रुक गया कि प्रेम ने उसके सामने हाथ बढ़ा दिया…-” मैं प्रेम सिंह चंदेल हूँ। अंदर आपकी जो हिटलर मैडम बैठी हैं हमारी ही शरीक-ए-हयात हैं।
   और वैसे इतनी भी खडूस नहीं है वो। नाम क्या बताया तुमने अपना?”

“सर अभिमन्यु! अभिमन्यु मिश्रा मेकेनिकल 5th सेमेस्टर में पढ़ता हूं।”

“अरे जन्मकुंडली नहीं पूछी भाई । जाओ जाओ अंदर जाओ । मैडम ने ग्रीन बत्ती जला दी है।”

  अपने बालों पर हाथ फेरता झूमता हुआ सा अभिमन्यु निरमा की केबिन में दाखिल हो गया और प्रेम मीठी का हाथ  थामे उसके स्कूल के लिए निकल गया।

******

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    कैंटीन से लौटती रंगोली और झनक हॉस्टल पहुंचे कि देखा एक पुलिस की गाड़ी उनके कम्पाउंड में खड़ी है, और आसपास काफी सारी भीड़ भाड़ जमा हो रखी है।
    वो लोग भी धीमे से घुस कर भीड़ का एक हिस्सा हो गए। आसपास खुसफुसाहट चल रही थी,ध्यान लगा कर सुनने में भी कुछ समझ नही आ रहा था। झनक ने साथ खड़ी एक लड़की से ” माज़रा क्या है?”पूछ ही लिया।
  उसने जो बताया वो सुन कर रंगोली और झनक के होश उड़ गए।
    उन्हीं के हॉस्टल में किसी लड़की ने फंदे से लटक कर आत्महत्या कर ली थी……

क्रमशः

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aparna..

मायानगरी -5

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मायानगरी – 5

      मेरे पास आओ मेरे
     दोस्तों एक किस्सा सुनो
       मेरे पास आओ मेरे
     दोस्तों एक किस्सा सुनो

    कई साल पहले की ये बात है
      बोलो ना चुप क्यों हो गए
         भयानक अंधेरी
        सी यह रात में
       लिए अपनी बन्दूक
             मैं हाथ में……

   ” अबे सालों बस सुनने आये हो क्या? साला आज कल के लड़कों को कोई तमीज ही नही है। हम सीनियर होकर हम ही गाना भी सुनाए। शर्म करो कुत्तों। ये मैं गुनगुना रहा था कमीने कान गड़ाए खड़े हैं।”

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     इंजीनियरिंग कैम्पस में कंप्यूटर साइंस के जूनियर्स को मैकेनिकल के सीनियर्स धरे बैठे थे कि कंप्यूटर वाले सीनियर्स वहीं चले आये…

” अरे सीपी यार इन लोगो को काहे दबोच रखे हो, हमारे वाले हैं ये। “

” निशांत यार हम भी जानते हैं । लेकिन देखो, शुरू से ही हमारे कॉलेज में फैकल्टी वाइज कभी फसाद नही हुआ। हम अगर तुम्हारे बंदों को रैंग करते है तो तुम्हे भी तो खुल्ली छूट है यार हमारे बंदों को नोचने की।

“भाई वो बात नही है यार। इस बार की बैच में ज़रा हाई फाई लड़के भी हैं। मैनेजमेंट कोटा खूब भरा है।”

” अरे तो क्या हुआ? मैनेजमेंट कोटा से आने वालों को क्या हम तमीज नही सिखाएंगे। भाई ये हमारी ही नैतिक जिम्मेदारी है कि लड़कों को लड़का बनाया जाए। अब स्कूल से ये क्या सिख पढ़ कर आते हैं। कुछ नही। सिर्फ होर्लिक्स पी लेने से टॉलर स्ट्रॉन्गर और स्मार्टर नही बना जाता। हम ही हैं जो इन टोडलर्स को चलना सिखाते हैं।
  कायदे से यही वो जगह है जहाँ इन जाहिलों को इंसान बनाया जाता है।”
  तभी सीपी की नज़र एक जूनियर पर पड़ी जो थर्ड बटन से सर ऊपर कर के देखने की कोशिश कर रहा था कि सीपी का जोरदार तमाचा उसके चेहरे को लाल कर गया।
   जोश ही जोश में तमाचा इतना ज़ोर का पड़ा की लड़का घूम कर ज़मीन पर गिरा और बेहोश हो गया…

  वहीं चबूतरे पर बैठे अभिमन्यु और बाकी लड़के भी भाग कर देखने चले आये।
  लड़कों में हड़कंप मच गया। कम्प्यूटर वाले लड़के डर के मारे अपनी बिल्डिंग को खिसक लिए। सीपी को लगा नही था कि उसका पंजा ऐसा फौलाद का है। आश्चर्य से वो कभी उस बेहोश जूनी को तो कभी अपने हाथ को देख रहा था कि अभिमन्यु ने लड़के को उठाया और अपने कंधे पर डाल मेडिकल की तरफ भाग चला।
   अधीर भी उसके पीछे हो लिया।

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   लंबा चौड़ा अभिमन्यु उस नाजुक दुबले पतले से जूनियर लड़के को कंधे पर लिए बिल्कुल साक्षात सती को कंधो पर लिये महादेव सा चला जा रहा था।

  मेडिकल में गेट पर  से घुसते ही बायीं ओर कॉलेज का हॉस्पिटल था। अभि उसी तरफ निकल गया…

“ला यार थोड़ी देर मैं भी पकड़ लूँ। “

  अधीर के इस प्रोपोजल के आते में ही मेडिकल कैम्पस में खड़ी स्ट्रेचर लिए वार्डबॉय भागा चला आया…

” क्या हुआ है लड़के को? “

  डॉक्टर के सवाल पर अभिमन्यु ने ही जवाब दिया..

” बेहोश हो गया है। “

” वो तो दिख रहा है। बेहोश कैसे हुआ? “

  अभि और अधीर एक दूसरे को देखने लगे। डॉक्टर के सामने ये बताना कि रैगिंग में पड़े थप्पड़ ने ये हाल किया है महंगा पड़ सकता था।

” इसने ब्रेकफास्ट नही किया था डॉक्टर!”

ड़ॉक्टर ने अजीब सी नज़रों से अभि को घूर कर देखा और लड़के को साथ लिए अंदर चला गया।

  अभी और अधीर के पीछे सीपी और उसके 1-2 चेले भी भागते हुए मेडिकल चले आए। सीपी और चेले वहीं बाहर बैठ गए।

   अभि और अधीर इधर उधर भटकते उस लड़के के होश में आने का इंतज़ार कर रहे थे कि कहीं से मधुर सी गाने की आवाज़ चली आयी। दोनों उसी दिशा में बढ़ चले…

  मेडिकल प्रथम वर्ष के छात्रों का आज अस्पताल विज़िट करने का पहला दिन था और आज ये नन्हे-मुन्ने बच्चे रेजिडेंट डॉक्टर्स के हत्थे चढ़ गए थे।
   असल में इन्हें इनके कुछ सीनियर्स ने अस्पताल की ओपीडी से कुछ आवश्यक सामान लाने का बेइंतिहा गैरजरूरी काम दिया था।
   इसी चक्कर में ये चार पांच लड़के लड़कियां यहाँ फंस गए थे।
वैसे रेजिडेंट डॉक्टर्स इतना व्यस्त होते थे कि वो जूनियर्स की रैगिंग लेते नहीं थे। लेकिन पिछले दिन की हेक्टिक शेड्यूल की थकान उतारने के लिए आज उनके पास जूनियर्स नाम का एंटरटेनमेंट मौजूद था। और बस इस एंटरटेनमेंट की बहार देखते हुए रेजिडेंट डॉक्टरों का भी उ ला ला करने का मन करने लगा।
  डॉक्टर्स ड्यूटी रूम में इन जूनियर्स की रैगिंग चल रही थी।
  इत्तेफाक से रंगोली ही उस रैगिंग की सबसे पहली शिकार बनी थी। सीनियर से उसे गाना सुनाने को कहा था और वह अपने गले को साफ कर गाना शुरू कर चुकी थी।

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देख लो हमको करीब से
आज हम मिले हैं नसीब से
     यह पल फिर कहां
    और यह मंजर फिर कहां
  गजब का है दिन सोचो जरा
   यह दीवानापन देखो जरा
तुम भी अकेले हम भी अकेले मजा आ रहा है कसम से…..

   कमरे के ठीक बाहर खड़े अभिमन्यु और अधीर के कानों तक भी यह स्वर लहरी पहुंच चुकी थी। आवाज का नशा अभिमन्यु पर ऐसा छाया कि बेहोशी के आलम में उसने दरवाजा धीरे से खोल दिया…
उसके दरवाजा खोलते ही सारे सीनियर्स अपनी जगह से उठकर खड़े हो गए। जूनियर्स पहले ही खड़े थे जो थर्ड बटन में थे   वह लोग भी दरवाजे की तरफ देखने लगे । अभिमन्यु और अधीर को ऐसे सामने खड़े देख एक सीनियर रेजिडेंट ने उन लोगों से पूछ लिया…-” आप लोग कौन हैं यहां क्या कर रहे हैं?”

“हम इंजीनियरिंग के हैं ,एक मरीज लेकर आए थे।”

“मरीज लेकर आए थे? क्या हुआ तुम्हारे मरीज को?”

“जरा चक्कर आ गया था।”

“हां तो ठीक है! लेकिन यहां क्या कर रहे हो? मरीज को भर्ती करवा दिया है ना ड्रिप चढ़ेगी शाम तक बंदा अपने पैरों पर चलकर इंजीनियरिंग कैम्पस वापस आ जाएगा इसलिए अब  फुटो यहां से।”

अभिमन्यु ने रंगोली को देखा रंगोली ने अभिमन्यु को और अभिमन्यु के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कुराहट आ गई!  पास खड़ी झनक ने रंगोली को तुरंत कोहनी मारी….-” देख आखिर तेरा पति  तुझे ढूंढता यहाँ तक चला आया।
“चुप कर बकवास मत कर।”
रंगोली  जितना धीमा बोल सकती थी उतना धीमा बोली लेकिन उसने इतना धीमा बोल दिया कि पास खड़ी झनक तक को सुनाई नहीं दिया और झनक ने इतनी जोर से “क्या” कहा कि सारे रेजीडेंट डॉक्टर उन दोनों को देखने लगे।

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  उसी वक्त बाहर से गुजरते मृत्युंजय की नजर डॉक्टर्स ड्यूटी रूम पर पड़ गई। वह अभिमन्यु और अधीर को हाथ से हटा कर दरवाजे से भीतर चला आया…-” क्या हो रहा है यहां पर?”
सारे जूनियर रेजीडेंट डॉक्टर घबराकर एक तरफ खड़े हो गए …-“कुछ नहीं सर! वह बस जरा यह फर्स्ट ईयर जूनियर्स हैं इन्हें एनाटॉमी पढ़ा रहे थे।”
“एनाटॉमी पढ़ाना है, तो लैब में पढ़ाया करो। यहां बिना बोन और बिना किसी ऑर्गन के तुम लोग एनाटॉमी कैसे पढ़ा रहे हो?”
मृत्युंजय ने जूनियर की तरफ देखा और उन्हें वहां से जाने की इजाजत दे दी।

  उस कमरे से बाहर निकलते ही जूनियर्स ने चैन की सांस ली… -“यहां तो यार हर मोड़ पर आतंक छाया हुआ है! वह गाना आज मेरी समझ में आ रहा है, यहाँ रोज-रोज हर मोड़ मोड़ पर होता है कोई ना कोई हादसा।  बस उन्हीं हादसों का अड्डा है हमारा कॉलेज। क्लास में बैठते हैं तो फँस जाते हैं। लैब में जाते हैं तो फँस जाते हैं। हॉस्पिटल आते हैं तो भी फँस जाते हैं। जहां देखो वहां सीनियर का आतंक है। आखिर कब बच पाएंगे हम लोग।”
   झनक की बात पर साथ चल रहा लड़का राहुल हंसने लगा…-” तुम लोग तो फिर भी लड़कियां हो यार! तुम बच जाती हो, हम लोगों के साथ हॉस्टल में भी इतनी ज्यादा अति होती है कि हम बता नहीं सकते।”
  “प्लीज बता ना क्या रैगिंग होती है तुम लोगों के साथ।”
  ” चुप कर! नहीं बताना।”
“अरे ऐसा क्या करते हैं भई सीनियर बता ना प्लीज।”
“होती है बॉयज वाली रैगिंग! जैसे तुम्हारी गर्ल्स प्रॉब्लम तुम हमसे शेयर नही कर सकती, हम भी नही कर सकते ।”
” बड़ा आया। मत बता।”
   वो लोग बातें करते अगर बढ़ ही रहे थे कि पीछे से उन्हें आवाज़ लगाते अभिमन्यु और अधीर चले आये…
” एक्सक्यूज मी गाइज़! आप लोग मेडिकोज हैं?
   अभिमन्यु के सवाल पर रंगोली के अलावा बाकी लोगों ने उसे घूर कर देखा..-” हां जी आपको क्या प्रॉब्लम है?”
“नो नो! कोई तकलीफ नहीं है । एक्चुली मैं कुछ जानना चाहता था मेडिकल टर्म्स में।”
राहुल ने उसे बिल्कुल ही हिकारत भरी नज़रों से घूर कर देखा।
” भाई मेरे! ऐसे घूर कर मत देख! मैं भी कोई ऐवें नहीं हूं। इंजीनियरिंग कर रहा हूं, मेकेनिकल से। और उम्र के लिहाज से देखा जाए तो तुम सबसे दो-तीन साल बड़ा ही हूंगा। और प्रोफेशनल कॉलेज के हिसाब से देखा जाए तो यूनिवर्सिटी सीनियर हूं तुम्हारा।”
अबकी बार जवाब राहुल की जगह अतुल ने दिया…-” जी कहिए क्या पूछना है आपको।”

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“दोस्त कहीं आराम से बैठ कर बात कर सकते हैं । ज़रा सीरियस मुद्दा है।”
“ओके बाय गाइज़। तुम लोग बैठ कर बातें करो मैं और रंगोली चलते हैं।” झनक रंगोली का हाथ थामे आगे बढ़ने लगी कि अभिमन्यु उन दोनों के सामने अचानक से जाकर खड़ा हो गया….-” अरे मैडम! प्लीज रूके ना आप चार डॉक्टर रहेंगे, तो मेरी समस्या को आप लोग आसानी से समझ कर सुलझा सकते हैं । आप मेडिकल की पढ़ाई करने आई हैं। आप लोगों का तो पेशा ही है लोगों के दुख दर्द सुनना।”
   झनक ने एक नजर अभिमन्यु को देखा और हां में सर हिला दिया।
   रंगोली का वहां रुकने का बिल्कुल मन नहीं था वह झनक का हाथ पकड़े बार-बार उसके हाथ पर दबाव बनाती वहां से निकल चलने की गुजारिश कर रही थी।
    उन चारों डॉक्टरों के साथ अभिमन्यु और अधीर मेडिकल कैंटीन में पहुंच गए।
  वह चारों अभी फर्स्ट ईयर में थे इसलिए कायदे से उन्हें कैंटीन जाना अलाउड नहीं था। और यह बात उन चारों को मालूम नही थी, अनभिज्ञता में वह चारों अभिमन्यु के साथ कैंटीन में प्रवेश कर गये।
   कैंटीन में काम करने वाला लड़का झाड़न अपने कंधे पर लटकाए उन तक चला आया…-‘ फर्स्ट ईयर के लगते हो आप लोग।”
  झनक ने उसे घूर कर देखा…-” हां तो!”
“तो यह कि अगर सीनियर्स ने देख लिया कि फर्स्ट ईयर में वेलकम पार्टी मिले बिना आप लोग कैंटीन चले आए हो तो…?”
“तो क्या बे? हम लोगों को सिखा रहा है!” अबकी बार राहुल उलझ पड़ा।
“मैं क्या सिखाऊंगा? आप लोगों को रात में वह सामने पीपल पर लटकी उल्टी चुड़ैल सब कुछ सिखा देगी।”
“अरे गुरु घंटाल! यह लोग खुद से नहीं आए मैं इन लोगों को लेकर आया हूं! और मैं फिस्थ सेमेस्टर में हूं यानी कि सीनियर बन चुका हूं यूनिवर्सिटी का । और यूनिवर्सिटी के हर कैंटीन में हमें जाना अलाउड है, आई बात समझ में।”

अजीब सा मुहँ बनाकर उनके टेबल पर झाड़न मार कर वह लड़का जाने लग गया….-” अबे जाते-जाते ऑर्डर तो ले जा।”
“क्या लोगे आप लोग?” उसने एक नजर सब को घूर कर फिर पूछा….
” तेरे यहां का सबसे स्वादिष्ट व्यंजन क्या है ?”
“इस वक्त सिर्फ मैगी और सैंडविच मिलेगा।”
“और पीने के लिए ?”
   अभिमन्यु ने मुस्कुराते हुए पूछा…
” आप जो पीते हो वो कतई नही मिलेगा।
उस लड़के ने एक नज़रअभिमन्यु को देखा और अपनी ही कही बात संभाल ली…-” स्ट्रौबरी शेक।”
अभिमन्यु का मुंह बन गया उसने कहा …-“इन चारों के लिए वही ले आ।”
“अब बोलो? कौन सी  मेडिकल इमरजेंसी के बारे में पूछना था तुम्हें? झनक के सवाल पर अभिमन्यु मुस्कुराने लगा।
“अबे ओए टॉम क्रूज दांत बाद में दिखाना पहले फटाफट बता तेरी प्रॉब्लम क्या है ?” अबकी बार राहुल लपका
“वह प्रॉब्लम यह है कि मेरा एक दोस्त है उसकी याददाश्त जरा गुम होने लगी है! सुबह ब्रश किया है कि नहीं उसे कुछ याद नहीं रहता।  कई बार रात में सोता है लेकिन सुबह उठने पर फिर कहता है मैं तो रात भर सोया ही नहीं। नहा कर आता है, और फिर नहाने चला जाता है। खाने का तो पूछो ही मत जितनी बार दे दो हर बार खा जाता है। क्योंकि वह यही भूल चुका होता है कि वह खा चुका है। और तो और कई बार यह भी भूल जाता है कि वह सुसु पॉटी करके आ चुका है। इस प्रॉब्लम का इस समस्या का कोई समाधान है आप लोगों के पास डॉक्टर?”
“अबे यार कौन है यह नमूना? “
अभिमन्यु ने अधीर की तरफ इशारा कर दिया अधीर ने उसे घूर कर देखा और अपनी जगह से खड़ा हो गया…
” शरमा गया बेचारा। क्या है ना ऐसी समस्या है कि बाहर किसी से डिस्कस नहीं कर सकते, आप लोगों को देखकर लगा जैसे दिल से आपसे रिश्ता है। इसीलिए आपसे यह तकलीफ कह गया।”

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    अभिमन्यु अपनी बात कहते हुए रंगोली को देखता रहा। रंगोली ने घबराकर पलके नीचे कर ली। वह झनक का हाथ इतनी जोर से पकड़ी हुई थी, कि अब झनक को हाथ में दर्द होने लगा था। झनक अपनी जगह से खड़ी हो गई…-” चल रंगोली अब हम वापस जाते हैं हॉस्टल के लिए लेट हो रहे हैं।’
   वह दोनों वहां से निकलने को ही थी कि चार पांच सीनियर लड़कों की टोली उनका रास्ता रोक खड़ी हो गयी…
” फर्स्ट ईयर? “उनमें से एक ने कड़क कर पूछा।
“यस सर!” मिमियाती सी आवाज़ में राहुल ने जवाब दिया
” वेलकम पार्टी के पहले कैंटीन जूनीज़ के लिए अलाउड नही है। तुम लोगो को मालूम नही था।”
” वी आर सो सॉरी सर। हमें वाकई मालूम नही था। “
” अच्छा बेटा! और फर्स्ट मन्थ में ही तितलियों को लेकर कैंटीन घूम रहें हो। “
  रंगोली के लिए तितली सम्बोधन सुन अभिमन्यु का खून खौल उठा…-“माइंड योर लैंग्वेज, व्हाटएवर इस योर नेम? “
” तू कौन है बे? बीच में बोलने वाला? मेडिको तो नही है!”
” मेकेनिकल इंजीनियरिंग थर्ड ईयर का स्टूडेंट हूँ,नाम अभिमन्यु है। “
” तो बेटा अभिमन्यु तेरे गुर्दो में दर्द क्यों हो रहा जब हम अपने बच्चों को डांट रहे। “
” डाँटो लेकिन तमीज से। अगर गर्ल्स के लिए कोई बदतमीजी करोगे तो मैं सहन नही करूँगा। “
” क्यों बे तेरी सेटिंग है क्या ये। ” उसने रंगोली की तरफ इशारा किया..
” हां है। और आज के बाद इसे परेशान किया तो नाम याद रख लेना अभिमन्यु से बुरा कोई नही होगा।”
  अभिमन्यु उसे धमका कर निकल गया,अधीर भी उसके पीछे गिरता पड़ता भाग गया।
   इतनी सारी बहस के बीच पीछे खड़े सीनियर्स के इशारे पर वो सारे जूनियर्स भी वहाँ से खिसक लिए।
” वेलकम बेटा अभिमन्यु! मेडिकल के चक्रव्यूह में तुम्हारा स्वागत है। जानते नही हो तुम, तुम्हारा पाला ऋषि खुराना से पड़ा है।”
   खून का घूंट पीकर ऋषि खुराना भी अपनी गैंग के साथ निकल गया।

   वहीं पीछे एक सबसे किनारे की टेबल पर गौरी बैठी अपनी नोटबुक में कुछ लिख रही थी।
  उसकी एकमात्र खास सहेली प्रिया किसी काम से स्टाफ रूम गयी थी। उसी का इंतज़ार करती गौरी अपनी नोटबुक खोली बैठी थी कि तभी विधायक नारायण दत्त का लड़का वेदांत वहाँ अपनी टोली के साथ चला आया।
   यही वो लड़का था जिसके इधर उधर तफरीह करने से परेशान सीपी सर अभिमन्यु और बाकियों को लिए निरमा से मिलने गए थे।
   कैंटीन में सारे टेबल भरे थे। गौरी के सामने तीन कुर्सियां खाली पड़ी देख वेदांत ने एक कुर्सी पकड़ कर पीछे खींची और बैठने को था कि मृत्युंजय आकर उस कुर्सी पर बैठ गया।
    मृत्युंजय ने वेदांत को देख उसे थैंक्स बोला और गौरी की तरफ देखने लगा।
  गौरी वेदांत के व्यवहार को देखते हुए अचरज में थी कि मृत्युंजय आ गया और उसे देख गौरी के चेहरे पर सुकून लौट आया।
   उन दोनों को एक दूसरे को देखते देख वेदांत वहाँ से हट गया कि तभी उसके एक चेले ने उसे आवाज़ लगा दी…-” गुरु यहाँ टेबल खाली है। आ जाओ।”
   एक नज़र गौरी को घूर कर वेदांत आगे बढ़ गया…

“, थैंक यू सर। आप हमेशा मेरी परेशानी में मेरा साथ देने खड़े रहते हैं।”
” इट्स माय प्लेजर गौरी। और बताओ कैसी हो तुम?”
“ठीक हूँ । अभी एक हफ्ते से मेडिसिन बंद की है। और मुझे नींद भी सही या रही है।”
” इट्स गुड! लेकिन एकदम से विड्रॉ नही करेंगे। धीरे धीरे ही मेडिसिन छोड़ना।”

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” जी सर। “
” कॉफी लोगी? “
गौरी ने हाँ में सिर हिला दिया…
दोनो साथ बैठे कॉफी पीते इधर उधर की बातें करते रहे।
     जय के साथ होने पर गौरी के चेहरे पर काफी समय बाद मुस्काने लौटने लगीं थीं…..

क्रमशः

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aparna…

मायानगरी -1





   

       ओम गणपतये नमः


             मायानगरी :–

         इंजीनियरिंग कैम्पस के खचाखच भरे कॉरिडोर में विद्यार्थी अपनी अपनी क्लास रूम का नम्बर देखने या फिर फीस अमाउंट का पता लगाने लाइन में लगे थे।
   कुछ बाहर गार्डन में इधर उधर घूमते अपने कॉलेज को आंखों ही आंखों में आंकने की कोशिश में थे…..
 
   कुछ लड़के एक ओर जमा इधर उधर की बातों में लगे थे कि एक लड़की भागती सी उनके पास चली आयी।
   आते ही उसने एक लड़के को पीछे से कंधो से पकड़ अपनी ओर घुमाया और फटाफट बोलना शुरू कर दिया…

” कहाँ थे अब तक। तुम्हें पता है कितनी देर से तुम्हें ढूंढ रही थी मैं ? “

   लड़का उस अनजानी लड़की को अपनी बड़ी बड़ी आंखें फैला कर  देख सोचने लगा। दूर दूर तक दिमाग के घोड़े दौड़े लेकिन खाली हाथ वापस चले आये…

” आप जानती हैं मुझे? “
 
इस सवाल को पूछते ही लड़के के चेहरे पर एक लंबी सी मुस्कान छा गयी..
    लड़की तो पहले ही मुस्कुरा रही थी…

” हाँ फिर? मेरे दिल ने तुम्हारी रूह को पहचाना है। हम जन्म जन्म से एक हैं। “

“अच्छा ! और कुछ बोलिए ना।  अच्छा लग रहा है एक सुंदर लड़की का मुझे लाइन मारना । ”

” ये रूहानी मुहब्बत है पागल? बोलो क्या तुम मुझसे शादी करोगे ? क्योंकि मैं तुमसे शादी करना चाहती हूँ। “

” हाँ करूँगा ! ज़रूर करूँगा !हर जन्म में करूँगा । बार बार करूँगा। अब तो तुम मना भी कर दो तब भी करूँगा। ”
    वो शायद और भी कुछ कहता रहता , लेकिन तब तक वो लड़की अपने दुपट्टे को संभालती वहाँ से वापस निकल गयी…..

    और लड़का अपने बालों पे हाथ फिराता उसके कदमों के निशान देखता रह गया….
  
******


       ये हैं कहानी के नायक अभिमन्यु मिश्र ! मध्यम वर्गीय परिवार के सबसे बड़े लड़के। जिनके कंधो पर जन्म के साथ ही ढेरों ज़िम्मेदारियों का बोझ आ जाता है,कुछ उसी तरह के।।
    लेकिन अपने बेलौस और बेपरवाह स्वभाव के कारण ये किसी बात को बहुत ज्यादा दिल से नही लगाते।
   इंजीनियरिंग भी इन्होंने तुक्के में ही जॉइन कर डाली। गणित कुछ ज्यादा ही अच्छी थी,आसपड़ोस के लोगों ने आर्यभट्ट बुलाना शुरू कर दिया। और बस आर्यभट्ट जी ने खुद को नवाजे इस नाम को इतना सीरियसली लिया कि ग्यारहवीं में गणित ले बैठे।
    पढ़ाई लिखाई में दीदे लगते न थे। स्कूल के शुरुवाती दो महीने स्कूल से चोरी छिपे भाग कर फिल्में देखने में या स्कूल के पीछे की तलैया में दोस्तों के साथ बैठ सिगरेट फूंकने में निकाल दिए।
   तीसरे महीने फर्स्ट टर्म्स के इम्तिहान होने पर नानी दादी सब एक साथ याद आ गयी।
    रिजल्ट्स बुरे नही बेहद बुरे आये। नतीजा ये हुआ कि मार्कशीट घर पर पिता जी को दिखाने से उतारी जाने वाली चप्पलों की आरती से बचने का एकमात्र उपाय यही दिखा की आर्यभट्ट जी ने अपने पिता के नकली साइन मारे और परीक्षाफल जमा कर दिया।

    अब ये छोटी मोटी सी गलती कोई पाप तो है नही की जिसके लिए नरक की अग्नि में जलाने की सज़ा दी जाए। लेकिन यही समझ जाती तो प्रिंसिपल इंसानियत के दायरे में न आ जाती।
  पर उसे तो खून पीने वाली चुड़ैल का ही टाइटल भाता है। आर्यभट्ट बाबू के पिता श्री अनिल मिश्र जी के साईन होने के बाद भी धड़धड़ा के मिश्र जी के ऑफिस के लैंडलाइन पर फ़ोन दे मारा और उन्हें उनके लख्ते जिगर का कांड कह सुनाया वो भी सारी लगाई बुझाई के साथ।
    अब जब छौंक ही मिर्ची हींग की लगी हो तो स्वाद मीठा कैसे आये?
   उस रात घर के बड़े राजकुमार की जबरदस्त पिटाई हुई। एक मिडल क्लास बाप अमूमन जो जुमले सुनाता है वो सब मिसिर जी ने कह सुनाए…
    और उस रात स्वाभिमानी बेटा बिना कुछ खाये ही सो गया।  अगले दिन उठते ही उसने एक कसम ले ली कि अब इस साल चाहे विषय कठिन से कठिनतम हो जाये पढ़ कर ही पास होना है।
    इस बार न तो फर्रे बनाये जाएंगे और न ही स्कूल बाथरूम की दीवारों को रंगा जायेगा।
   अभिमन्यु का अभिमान जागा था आखिर!

   ग्यारहवीं वो अच्छे नंबरों से पास हो गया। अब क्लास के होशियार लड़कों से ज़रा सी दोस्ती बढ़ी और दोस्ती के साथ बढ़ता गया छिटपुट ज्ञान।
   बारहवीं के लड़कों के जिस ग्रुप में अभिमन्यु शामिल हुए वहाँ आये दिन एन आई टी , आई आई टी , आर आई टी के चर्चे होने लगे। और फिर अभिमन्यु को दिखा अपनी आजादी का पहला रास्ता।
    पहले तो उसने कभी अपनी आगे की पढ़ाई को लेकर कुछ सोचा ही नही था।
    लेकिन अब उसे अंधियारे में एक हल्की सी रोशनी दिखने लगी थी।
   उसके सारे दोस्त इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे थे। उन लोगों के मुताबिक अच्छे सारे कॉलेज उनके शहर से दूर थे और बस यही तो उसे चाहिए था। अपने शहर से दूर , अपने घर से दूर कोई ठिकाना जहाँ वो पढ़े न पढ़े पर सुकुन से रह तो सकें।
     यहाँ घर में तो उसका जीवन कतई अस्थिर हो रखा था। पिता जी की प्रोमोशन पेंडिंग है अभी को मार लो, किसी से कहा सुनी हो गयी अभी को मार लो। मतलब अभी उनका बेटा न हुआ डस्टर हो गया जब तब हाथ साफ कर लो।
  माँ अक्सर उसके पक्ष में बोलती ” जवान लड़का है उस पर हाथ न छोड़ा करें । किसी दिन गुस्से में घर छोड़ गया तो? ”
   पर मिसिर जी हर बार कोई ऐसी कैफियत दे जाते की उन दोनों का झगड़ा बढ़ता चला जाता और अभिमन्यु चुपचाप घर से निकल सड़क पर चला आता।
  वो भी अपने परिवार की समस्या को समझता था। कमाने वाला एक और खाने वाले पांच। घर चलाना भी तो मुश्किल था। उसके पीछे उसके एक भाई और जो था। उसके बाद वाला उससे डेढ़ साल ही छोटा था।
  मतलब उसकी कॉलेज की पढ़ाई तक ये  भी तैयार हो जाना था।
   उसे इतना तो समझ आ ही गया था कि ज़िन्दगी की खींच तान में थोड़ा आगे बढ़ना है,  तो उसे इंजीनियरिंग में प्रवेश लेना ही पड़ेगा।

   और बस उसने तैयारी शुरू कर दी थी। उसकी तैयारी और उसके गणित का ज्ञान देख उसके एक करीबी दोस्त ने उसे आई आई टी और बाकी बड़े महाविद्यालयों के फार्म भी भरने की सलाह दी थी। लेकिन महंगे फॉर्म्स के साथ ही महंगे कॉलेज की फीस सुन उसकी घर पर बात करने की हिम्मत ही नही हुई ।

    बारहवीं के साथ ही उसने इंजीनियरिंग का इम्तिहान दे दिया  और जिसमें उसका चयन भी हो गया ।
  काउंसिलिंग के बारे में घर पर उसने डरते डरते ही बताया था…
     क्योंकि अब तक फार्म भरने से लेकर इम्तिहान देने तक का काम उसने अपने पिता हिटलर मिश्रा जी से छिप कर अपने छोटे मामा की सहायता से ही किया था।
  अभिमन्यु का डर सही साबित हुआ। आज तक पापा किसी बात से खुश या संतुष्ट हुए थे जो आज होते?  जहाँ उसके दोस्तों के पिता बेटों के सेलेक्शन पर मिठाई बाँट रहे थे अभि के पिता का अलग ही राग चल रहा था।

” क्या ज़रूरत थी इंजीनियरिंग की? चार साल बर्बाद करने के बाद जाने कब नौकरी मिले? आजकल इंजिनिंयर्स ढेरों हो गए हैं, सरकारी नौकरियों के लाले पड़े हैं। इससे अच्छा तो तीन साल की ग्रेड्यूएशन की डिग्री लेकर पी सी एस कर लेना था। “

  पिता जी की नाराजगी इस बार अभि के समझ से बाहर थी।
  काउंसिलिंग के दौरान वो कॉलेज चुन पाता इसके पहले ही कॉलेज ने उसे चुन लिया था।

*****

   मायानगरी विश्वविद्यालय ने खुलने के साथ ही अपने कैम्पस में हर एक डिग्री के कॉलेज की स्थापना कर रखी थी। इसके साथ ही सभी कॉलेज में विद्यार्थियों के लिए भी फ्री सेलेक्शन, स्कॉलरशिप  के साथ ही मैनेजमेंट कोटा भी रख छोड़ा था।
   कुछ बच्चे अपने दम पर सेलेक्ट होकर आते थे तो कुछ मैनेजमेंट सीट से। उनके अलावा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स की टीम अलग अलग जगह की काउंसिलिंग में घूम कर कुछ विशेष होशियार बच्चों को छात्रवृत्ति देकर भी अपने विश्वविद्यालय का हिस्सा इसीलिए बना रही थी कि विश्वविद्यालय का नाम  हो सके।

  विश्विद्यालय की मेहनत का नतीजा था कि ” मायानगरी ” अपने खुलने के पांच ही सालों में पढ़ने और पढ़ाने वालों के बीच अपना अच्छा नाम बना चुकी थी।

    अभिमन्यु को यहाँ चुन कर लाया गया था। और ये विश्विद्यालय खुलने के तीसरे साल से यहाँ मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ रहे हैं।
     अभी इनका पांचवा सेमेस्टर चल रहा है। और अब ये वापस अपने पुराने रंग में आ चुके हैं।
  
    वही बेफिक्री वहीं बेपरवाही का आलम है । न इन्हें किताबो से मुहब्बत है ना किताबों को इनसे। इनका इंजीनियरिंग में घुसने का मुख्य उद्देश्य था अपने घर से दूर भागना जो पूरा हो चुका था इसलिए अब इनका पढना लिखना भी दो साल से लगभग बंद ही है।
 
      वो तो दिमाग ऐसा पैना है बंदे का की कोई भी सेमेस्टर हो और कोई भी पेपर इनका रिकॉर्ड रहा है सिर्फ एक रात दिन की पढ़ाई में ही इन्होंने अपनी नैय्या तो पार लगाई ही है अपने आगे पीछे आजु बाजू वालों को भी वैतरणी पार कराई है।
   इसलिए भाई साहब का नाम चल गया है, लेकिन सिर्फ इनकीं ब्रांच में। यहाँ तक कि इनकी ब्रांच के बाहर भी लोग इन्हें ज्यादा नही जानते पहचानते।
   
   पर फिर भी ये अपने चेलों यानी दोस्तों को जमा कर जब तब ज्ञान देते ही रहतें हैं।
  कॉलेज का नया नया सत्र शुरू ही हुआ है और अभी उसी पर कुछ ज्ञान गंगा बह रही थी कि बिल्कुल किसी आंधी सी वो आयी और तूफान सी लौट गई…

और अभिमन्यु मिश्रा बस उसे देखते ही रह गए..

” अबे थी कौन ये?”

   आंधी सी आने वाली का नाम था रंगोली…..
रंगोली तिवारी !! ये मेडिकल प्रथम वर्ष की छात्रा हैं। दिखने में नाजुक सी खूबसूरत सी रंगोली का कॉलेज का पहला दिन बहुत बुरा बीता।

********

    बारहवीं के बाद मेडिकल सेलेक्शन लिस्ट में उसका नाम नदारद था । तो वैसे ही उसने रो रोकर घर सर पर उठा लिया था कि ठीक अगले दिन एक और नई लिस्ट आयी जिसमें वेटिंग लिस्ट वालों के नाम थे और यहाँ सातवें नम्बर पर रंगोली तिवारी का नाम और अनुक्रमांक मिल गया।
   बस घर वालों की खुशी का ठिकाना नही रहा लेकिन रंगोली को हर काम जब तक पूरा न हो जाये विश्वास नही होता था।
  उसने कितनी मेहनत की थी ये वही जानती थी। रात दिन एक कर उसने पढ़ाई की थी। किताबों को ऐसे रट घोंट लिया था कि उसे सपने भी एग्जाम हॉल और पेपर के ही आते थे।
  तैयारी बहुत अच्छी होने के बावजूद वो पेपर बनाते समय एंजाइटी की शिकार हो गयी और अच्छा खासा बनता पेपर थोड़ा सा बिगाड़ आयी।
     पेपर्स के बाद उसका पूरे एक हफ्ते का शोक चला जिसमें अपनी खिड़की पर खड़ी वो बाहर लगी रातरानी की बेल सूंघती अपने लैपटॉप पर आबिदा परवीन की गज़लें सुन सुन कर रोने की कोशिश में लगी रहती।

   लेकिन ज़िन्दगी कब तक उदास बैठेगी। रंगोली की मीठी सी कमज़ोरी आइसक्रीम को उसकी माँ ने औजार बना कर उपयोग किया और दुखियारी के सामने चार दिन बाद उसकी पसंदीदा आइसक्रीम पेश कर दी।
     रंगोली की पसंदीदा नॉवेल उसके हाथ में देकर मम्मी ने अपने हाथो से उसे आइसक्रीम खिलाई और बस रंगोली अपना गम भूल गयी।

मम्मी ने एक अच्छा सा ऑप्शन भी रख दिया..” बेटा अगर इस साल सेलेक्शन नही भी हुआ तो कोई नही। ड्राप लेकर अगले साल कर लेना तैयारी। मुझे पूरा विश्वास है मेरी बेटी अव्वल दर्जे की डॉक्टर बनेगी। चाहे कितना भी समय ले लेना बेटा पर हिम्मत नही हारना। “

   रंगोली माँ के सीने से लग गयी। उसके कमरे के बाहर खड़े उसके पापा उसके चेहरे की खोई मुस्कान वापस पा कर खिल उठे।
   दो महीने बाद रिज़ल्ट आया और वेटिंग लिस्ट में ही सही रंगोली का सेलेक्शन हो गया।

   परिणामों के दो हफ्ते बाद ही एक शाम जब पूरा परिवार साथ बैठे चाय की चुस्कियों के साथ गप्पे मारने में लगा था कि रंगोली के पिता जी के मोबाइल पर किसी अनजान नम्बर से फोन आया…

” तिवारी जी बोल रहे है .?

” जी हाँ ! कहिये कौन काम है हमसे ?”

” आपकी बिटिया का सलेक्सन नही हुआ महाराज ?”

” तो तुमको इससे क्या लेना देना भाई? “

” लेना देना है ना तिवारी जी। आपकी बिटिया आई है वेटिंग में सातवें स्थान पर। अब मान लीजिए छै तक आकर सेलेक्सन रुक गया तो क्या करेंगे। का बिटिया का एक साल फिर बर्बाद कर देंगे।

“तुम हो कौन और कहना क्या चाहते हो? “

” नाम में हमारे कोई खास बात नही जो हम बताएं। पर जो बताने जा रहे वो बहुत खास है। आप पांच लाख तैयार रखियेगा हम नार्मल सीट से सेलेक्शन करवा देंगे।

” पगला गए हो क्या ? इत्ता पैसा देना होगा तो मैनेजमेंट सीट नही खरीद लेंगे। “

” पगला तो आप गयें हैं गुरु। मेडिकल की सीट वो भी मैनेजमेंट सीट! कम से कम तीस पैंतीस लाख लगेगा। घर द्वार बेच के बिटिया को पढ़ाएंगे का? और फिर रंगोली के पीछे एक और गुड़िया भी तो है ना मेहंदी। उसके लिए क्या बचाएंगे। पांच लाख बहुत सस्ता ऑफर दिए हैं हम। वो तो बिटिया आपकी होशियार है वरना हम किसी को सामने से होकर फ़ोन नही करते। जिसको सीट चाहिए वो खुद ही हमें ढूँढ़ लेता है। समझे? “

  तिवारी जी ने खिसिया कर फोन पटक दिया। ठीक था वो घर से सम्पन्न थे , अच्छी नौकरी में थे। पर थे तो मध्यम वर्गीय ही। तीस लाख तो पूरी उम्र कमाई कर जोड़ लेंगे तब भी शायद ही जोड़ पाएं। और फिर रंगोली के पीछे ही मेहंदी भी थी। वो गणित लिए तैयार खड़ी थी।
   इस साल रंगोली का किसी अच्छे कॉलेज मे सेलेक्शन हो जाता तो दो साल बाद मेहंदी के लिए सोचना शुरू करना था उन्हें ।
    वो सोच ही रहे थे कि रंगोली ने उनकी मुश्किल आसान कर दी…

” ड्राप ले लुंगी पापा। आप चिंता न करो। ऐसे किसी को पैसे क्यों दे हम। जाने कहाँ का फ्रॉड हो ये। “

  बिटिया की समझदारी भरी बात पर पापा मुस्कुरा उठे लेकिन फ़ोन वाली बात उनके दिमाग से गयी नही।
  कुछ दो दिनों के बाद ही काउंसिलिंग लेटर आ गया और घर की रौनक वापस आ गयी।
  रंगोली अपने पिता के साथ काउंसिलिंग में आ गयी। एक से एक बड़े बड़े चिकित्सा महाविद्यालयो की भीड़ में उसे दो महाविद्यलयों में आखिरी की दो तीन बची सीट मिल रही थी।
  सीट तो भाई शुरू की मिले या आखिरी की मेडिकल सीट मेडिकल सीट होती है।
  रंगोली बुरहानपुर की सीट के लिए हां कहने वाली थी कि उसके सामने बैठे व्यक्ति के पीछे की स्क्रीन जिस पर सीट्स और कॉलेज दिखाए जा रहे थे में एक नए चिकित्सा महाविद्यालय का नाम सात खाली सीट्स के साथ नज़र आया ” रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह चिकित्सा महाविद्यालय ” …
   ये नाम देखते ही रंगोली ने सामने बैठे व्यक्ति के सामने टेबल पर अपने फॉर्म पर एकदम से हाथ रख दिया…

“वेट सर ! सर ये बाँसुरी मेडिकल कॉलेज कौन सा है? “

सामने बैठे व्यक्ति ने अपने एक किनारे रखे ब्रोशर को उठा कर उसके सामने कर दिया…

” मायानगरी विश्वविद्यालय का एक कॉलेज है। मायानगरी में भी बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की तर्ज़ पर एक ही कैम्पस में लगभग सारे कॉलेज खोल रखें हैं। अभी नया बना विश्विद्यालय है लेकिन रेप्युटेशन अच्छी हैं।।
  यहाँ मेडिकल में सात सीट उपलब्ध है। “

” सर मुझे यही एडमिशन लेना है। “

” आर यू श्योर ? “

” डेफिनेटली सर ” मुस्कुरा कर रंगोली पीछे स्क्रीन पर चमकते नाम को देख मुस्कुरा उठी।
   कौन सा मुझे एम्स या ए एफ एम सी मिल रहा था। बुरहानपुर की सीट से तो यही भला है। कम से कम कॉलेज का नाम तो सुंदर है।
   रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह मेडिकल कॉलेज। यानी मेडिकोज की भाषा में R B A S medical collage….

क्रमशः

aparna …….


  
  

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मायानगरी -4




   मायानगरी -4



       वो एक अंधेरा सा कमरा था। कमरे में टीवी फुल वॉल्यूम में चल रहा था और बस टीवी से निकलने वाली रोशनी उस कमरे में फैली हुई थी….
   कमरा बहुत खूबसूरती से सजा था। हर चीज़ अपनी जगह पर मौजूद थी। कमरे में एक तरफ बड़ी सी लकड़ी की अलमीरा में खूब सारे सॉफ्ट टॉयज सजे थे….
    उनमें से एक टेडी बियर नीचे गिरा पड़ा था। बाहर तेज़ बारिश का शोर था और अंदर टीवी पर चलते किसी शो का ।
      इसलिए शायद रसोई से आती सिसकारी की आवाज़ साफ नही सुनाई पड़ रही थी…
  लेकिन बहुत ध्यान से सुनने पर लग रहा था जैसी कोई बच्ची रो रही हो…
   उसी वक्त सीढ़ियों पर किसी के तेजी से चढ़ने की आवाज़ आयी।
   कोई लगभग दौड़ते हुए सीढियां चढ़ कर बाहर के बड़े से दरवाज़े को ठेलते हुए बाहर के ही जूतों के साथ भाग कर रसोई में चला आया…

” ये क्या कर रही हो देविका ? बच्ची है वो उसे छोड़ दो। “

” मेरी भी तो बच्ची है। सिर्फ तुम्हारी तो नही। “

” हाँ तुम्हारी ही है, फिर क्यों उस पर इतना ज़ुल्म कर रही हो। उसे छोड़ दो प्लीज़। तुम जो कहोगी मैं मानने को तैयार हूँ। “

  ” प्रॉमिस करो। गौरी के सर पर हाथ रख कर कसम खाओ पहले ।

  वो आदमी जैसे ही एक कदम आगे बढ़ा उस औरत ने उसे वापस रोक दिया..

“नही तुम वहीं रहो , इधर मत आओ। “

  उस औरत जिसे वो आदमी देविका कह रहा था ने अपनी आठ साल की मासूम सी बच्ची को रसोई गैस के सिलेंडर से बांध रखा था। हाथ में दियासलाई पकड़े वो उस आदमी यानी अपने पति से किसी बात को मनवाने की ज़िद कर रही थी।

   आखिर सामने खड़े पूरी तरह से मज़लूम और बेसहारा से दिखते उस आदमी ने उस औरत के सामने अपने हाथ जोड़ दिए…..

” तुम जो कहोगी मुझे सब मंज़ूर है। लाओ दो मुझे कहाँ रखें हैं तलाक के पेपर्स। “

देविका ने आंखों से पीछे  रखे टेबल की ओर इशारा किया। जयेश टेबल की ओर लड़खड़ाते हुए मुड़ा ही था कि देविका का पैर सिलेंडर से उलझा और वो सामने की ओर गिर पड़ी….
   देविका के गिरते ही सन्तुलन बिगड़ने से सिलेंडर भी अपनी जगह से लड़खड़ा कर गिरने ही वाला था कि उससे बंधी बच्ची ज़ोर से चिल्ला उठी… ” पापा..”

   गर्ल्स हॉस्टल के कमरा नम्बर 10 में अपने बेड पर बैठी गौरी पसीना पसीना हो चुकी थी। वो नींद से जाग चुकी थी… तो अब तक जो चल रहा था वो ?
   हाँ वो सपना ही तो था…. वही सपना जो उस भयानक रात के बाद उससे जैसे चिपक सा गया था…
   ये सपना बचपन से उसका पीछा कर रहा था। अक्सर वो अपने कड़वे बचपन को इसी तरह सपने में देख चौन्क चौन्क कर आधी रात को जाग जाया करती थी, और फिर घंटो उसे नींद नही आती थी…

    आज भी वो समझ गयी कि अब उसे नींद नही आनी है…. उसने अपने बिस्तर के बाजू में रखी टेबल पर पड़ा लैम्प जला लिया और गाइनेकोलॉजी की किताब खोल कर पढ़ने बैठ गयी।
    यही रात दिन की पढ़ाई ही तो उसके टॉपर होने का कारण थी। लोग परीक्षाओं में आगे बढ़ने के लिए पढ़ते थे और वो खुद से जंग लड़ने के लिए पढ़ती थी।
पढ़ते पढ़ते ही भोर हो गयी थी….  खिड़की से आती रोशनी देख उसने खुद के लिए चाय चढ़ाई और मुहँ हाथ धोने वॉशरूम में चली गयी….
    चाय लिए  बालकनी में खड़ी गौरी की नज़र बाहर कैम्पस में जॉगिंग करते मृत्युंजय पर पड़ गयी… वो उसे देख ही रही थी कि उसने भी उसे देख लिया और हाथ के इशारे से बाहर बुलाने लगा।
   हाँ में सर हिला कर वो बाहर चली गयी….

” ये क्या जॉगिंग वाला ट्रैक सूट क्यों नही पहना। नाइट सूट में ही बाहर चली आयीं।”

  अब गौरी को होश आया कि वो जैसे खिड़की पर खड़ी थी, वैसे ही बाहर चली आयी थी…

” वो ध्यान ही नही रहा सर ! आज जॉगिंग करने का मूड भी नही है। “

  जय को समझ में आ गया था कि गौरी ने आज फिर वही सपना देखा है।
   जय यानी मृत्यंजय उपाध्याय अभी मेडिकल कॉलेज में हाउस सर्जन शिप समाप्त करने के बाद  मनोरोग में पीजी कर रहा था। फिर भी जूनियर्स में वो हाउस सर्जन के पद से ही जाना जाता था।
   गौरी और मृत्युंजय की मुलाकात भी इत्तेफाक से हुई थी…. दोनो के बीच अफेयर जैसी बात फिलहाल नही थी लेकिन मेडिकल कॉलेज ऐसी जगह होती हैं जहाँ बिना आग के ही धुंआ उड़ता है।
   लोग बस धुंआ देख बात उड़ा देते हैं ये जाने बिना की धुँआ सिर्फ आग का ही नही  सिगरेट का भी हो सकता है…..

    मृत्युंजय गौरी का सिर्फ ट्रीटमेंट कर रहा था जिसके कारण गौरी को अक्सर मृत्युंजय की ओ पी डी जाना होता था और बस वहीं से दोनो के बीच कुछ चक्कर चल रहा है कि लहर सारे कॉलेज में बह चली। गौरी से तो किसी ने नही पूछा लेकिन जय को अक्सर उसके दोस्त इस बात पर छेड़ जाते और वो चुपचाप मुस्कुरा कर रह जाता……
   
     ऐसे ही थोड़े न मेडिकल कॉलेज अपने कांडो को लेकर बदनाम था…


*****

    फर्स्ट ईयर की पहली क्लास सेमिनार हॉल में लगी थी। सारे जूनियर्स कतार में बैठे प्रोफेसर का इंतेज़ार कर रहे थे कि धड़धड़ाते हुए सीनियर लड़कियों की टोली अंदर चली आयी….
   आते ही दरवाज़ा बंद कर दिया गया….

   सामने मंच पर कुछ सीनियर्स सवार हुई तो कुछ जूनियर्स के आगे पीछे कहीं न कहीं व्यवस्थित हो गईं…

  सारे जूनियर्स सांस रोके थर्ड बटन हो चुके थे।

” क्यों भई कौन है वो श्रीदेवी जिसने कॉलेज में पहले ही दिन कांड कर दिया ? “

  एक सिनीयर की तेज कड़कती आवाज़ पर भी सब चुप खड़े थे। ऐसा सन्नाटा पसरा था कि सुई भी गिरे तो टन्न की आवाज़ हो…

” काहे भाया सांप सूंघ गया ? ये जब से आमिर ताऊ ने बताया है कि म्हारी छोरियां छोरों से कम है के? तब से इस बात को मेडिकल की छोरियों ने कुछ ज्यादा ही सिरियसली ले लिया है!”

   अब जूनियर्स की सांसो की आवाज़ भी आनी बंद हो गयी थी….

” क्या हुआ? मैं पागल लग रही हूँ तुम लोगों को जो किसी के मुहँ से जवाब नही फूट रहा। अरे बको न कौन थी भई सलीम की अनारकली जो पहले ही दिन जाकर इंजीनियरिंग के लड़के को प्रोपोज़ कर आई? “

   रंगोली के आजू बाजू खड़े लोगों ने धीरे से उसकी तरफ उंगली से इशारा कर दिया….

” ओहो तो आप हैं वो मधुबाला! आइये ज़रा सामने, हम भी तो दीदार करें।
   भई शक्ल से तो सीधी सूदी दिख रही है फिर कैसे इत्ता बड़ा कांड कर आई।
  एक तो प्रोपोज़ कर दिया वो भी इंजीनियरिंग वाले बंदे को। कमाल है यार! अब वो बंदा तुझे ढूंढता यहाँ हनीमून मनाने आ गया न तो हमारे पास आकर रोने मन बैठ जाना।”

एक ने अपनी बात पूरी भी नहीं कि की दूसरी पट से बोल पड़ी…..

” यार और कोई नहीं मिला तुझे।  प्रपोज ही करना था तो अपने कॉलेज के किसी बंदे को कर देती। मिला भी तो इंजिस!
    लानत है यार लानत!  तुझे पता भी है सबसे घटिया बंदे पढ़ते इंजीनियरिंग कॉलेज में….
   फर्स्ट ईयर से क्या-क्या कांड नहीं करते हैं। रोंगटे खड़े हो जाएंगे अगर हम उनकी रैगिंग के किस्से तुम सबको  सुना दे तो ।
   आई बात समझ में?  हम तो पहले दिन से ही लड़कियों को आगाह कर देते हैं कि भैया एक बार को चलती ट्रेन में भले चढ़ जाना लेकिन इंजीनियरिंग कॉलेज के लड़कों के सामने मत पड़ना। यह इतने गए बीते होते हैं ना कि तू सोच भी नहीं सकती।
   लड़कों की सबसे घटिया जमात इन्हीं कॉलेज में इकट्ठा होती है ।
    फर्स्ट ईयर से इन्हें रैगिंग में सुट्टा मारना और दारु पीना सिखाया जाता है। यह होती है इनकी आगे की ट्रेनिंग। समझ रही है सेकंड ईयर थर्ड ईयर तक पहुंचते-पहुंचते   तो बंदा बिल्कुल ही पुरखा हो जाता है । गांजा हशीश चरस डोप क्या नहीं ट्राई करते हैं ये लोग।
  यह साले इतने स्लेविश होते हैं इतने स्लेविश होते हैं कि इनकी कमिनाई पर पूरा ग्रंथ लिख डालो। आई बात समझ में ? तो बेटा तुझे इतनी बड़ी माया नगरी में इंजीनियरिंग के अलावा और कोई बंदा ही नहीं दिखा।
आंखें ठीक तो है ना तेरी चश्मा वश्मा तो नहीं चढ़ा रखा।”

” अबे ये भी तो हो सकता है कि ये उसी की बंदी हो। दोनों की पहले ही डिंग डाँग चल रही हो। सीनियर्स ने रैंग किया तो चली गयी अपने पिया जी को बताने। ”

  रंगोली की सांस अटकी पड़ी थी और ये सीनियर उसे और डराये जा रही थी….

” नो मैम ! ऐसी कोई बात नही है। मैं तो यहाँ किसी को नही जानती। “.

” तो इतनी होशियारी मारने की क्या ज़रूरत थी?
पहले दिन आकर हमने रूल्स बताए नही और तुम लोग कूद पड़ीं। अरे क्या ज़रूरत थी सीनियर लड़को को रैगिंग देने की। हमारा कॉलेज एन्टीरैगिंग है इतना भी नही पता? “

“जाने दे सुचित्रा , हमें क्या ? हम तो इन नौनिहालों को बचाना चाहतें हैं और ये लोग है कि वो ऋषि एंड टीम के सामने सरेंडर कर गयीं।
  क्यों ऋषि खुराना ने रैंग किया है ना? “

  तभी एक जूनियर ने धीमे से गुनगुना कर कोई दूसरा नाम पुकार लिया…

” नो मैंम। अधिराज सर ने!”

” ओह्ह तो अधिराज के हत्थे चढ़े हो बेटा। मतलब अब तक ऋषि के साथ इंट्रो नही हुआ । ऋषि खुराना से बच के रहना, हम लोग एन्टीरैगिंग वाली हैं ना इसलिए पहले से खबरदार कर रहीं हैं। बाद में मत कहियो की मैडम ने बचाया नही। “

” मैम प्लीज़ हेल्प कर दीजिए। कैसे बचना है ऋषि सर से। “

   ” देखो भई मैं बहुत बड़े दिल वाली हूँ। परमार्थ में बहुत विश्वास है मेरा। बिना किसी स्वार्थ के बता रही हूँ। आज के आज फटाफट शाम में सारी गर्ल्स हमारे कमरों में आकर असाइनमेंट ले जाना और हफ्ते भर में लिख कर हमें वापस दे देना । “

“पर मैंम उससे हम सर लोगों की रैगिंग से कैसे बचेंगे?”

” अबे बता रहीं हूँ ना ज़रा सांस ले लूँ।”

” जी मैंम!”

  “एंड यू बॉयज, तुम लोगों के हॉस्टल में फर्स्ट फ्लोर के कमरा नम्बर 5 में अध्यक्ष का कमरा है। अध्यक्ष मतलब स्टूडेंट्स यूनियन मेडिकोज का अध्यक्ष।
   उसके पास तुम सारे लड़के पहुंच जाना। घर से जो भी खाना खज़ाना लेकर आये हो ना जैसे लड्डू चकली , निमकी .. सारी चीज़ें अध्यक्ष को पहुंचा देना। ये उनसे मिलने की फीस है। बस उसके बाद अध्यक्ष सर सब संभाल लेंगे। ”

” चल शर्मिला आज के लिए बहुत ज्ञान हो गया…”

” अरे हां मुमताज ! तूने सही कहा , चल अब निकलें वरना कहीं चतुर्वेदी आ गया न तो लेने के देने पड़ जाएंगे। “

  सारी की सारी सीनियर्स जैसे आयीं थी वैसे ही बाहर निकल गईं….

   उनके जाते ही जूनियर लड़के शाम को अध्यक्ष से मिलने जाने के मनसूबे तैयार करने लगे।

******

  सीपी सर की अगुआई में अभिमन्यु , अधीर और बाकी लोग सीईओ यानी निरमा से मिलने निकल गए।
  अभिमन्यु ने 400 की जगह 499 हस्ताक्षर तैयार कर लिए थे जिनमें कुछ नकली तो कुछ असली भी थे।

” अबे 499 का क्या फंडा है बे? या तो 400 रखता या 500,। 450 भी चल जाता । पर ये कुछ आधा अधूरा सा नही लगता। “

“सर जी यही तो फंडा है। जैसे मॉल और बड़े ब्रांड्स अपनी ब्रांडिंग करते हैं ना 499 लिख कर। देखने वाले का फोकस 4 पर ही जाता है दिमाग में आता है 400 कि रेंज का सामान है जबकि असल रेट तो 500 है। बस वहीं बात यहाँ लागू होगी।
  निरमा मैडम जब 499 देखेंगी तो उनके दिमाग मे  400 की रेंज आएगी और वो आसानी से सारे हस्ताक्षर मान जाएंगी।
   हम 10 लोग 500 के साइन लेकर जाते तो वो बिना पढ़े ही फाड़ के फेंक देती। इसलिए ऐसा किया। और जब उनकी टीम काउंटिंग में जाएगी तब 500 हस्ताक्षर एक बड़ा पैमाना बन जायेगा हमारी बात को प्रूव करने का। “

” अरे वाह अभिमन्यु। तुम तो यार बहुत ही बेकार सा ज्ञान दे डाले। चलो अब वहीं देखा जाएगा , क्या होता है?

  सारे लड़के निरमा के चेम्बर के बाहर खड़े थे। अंदर निरमा किसी मीटिंग में थी।
   लगभग घंटे भर बाद कमरे के अंदर से फैकल्टी मेंबर बाहर निकल आये।
  उनके बाहर आते ही निरमा ने पियोन से कह कर उन लड़कों को बुलवा भेजा…

“बैठिये आप लोग। “

  सामने रखी कुर्सियों पर सबके बैठते ही निरमा ने अपने सामने रखी फाइल को धीरे से बंद कर एक किनारे कर दिया..

   सारे लड़के उसे ही देख रहे थे। निरमा ने बीच में बैठे सीपी से इशारे से ही सवाल कर लिया…

” कहिये क्या तकलीफ है आप लोगों की?”

  सीपी ने साथ रखा पर्चा उसके सामने कर दिया… आंखों पर चश्मा सही करते हुए निरमा उनके द्वारा प्रस्तुत किये आवेदन को पढ़ने लगी। पढ़ते हुए उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ कर चली गयी..
  

” ओके । तो आप लोग चाहतें है सारे कैम्पस में बेरियर लगवा दिए जाएं।”

  ” नही मैम । नॉट बैरियर । पर लोगों का यहाँ वहाँ टहलना बंद हो जाये। “

“देखो वो तो ऐसा है की अगर आप सब अपनी अपनी क्लास में मन लगा कर पढ़ेंगे तो बाहर निरर्थक टहलने का किसी को वक्त ही कहाँ मिलेगा? “

” जी मैंम हम तो शिद्दत से पढ़ते ही है लेकिन आर्ट्स एंड स्पोर्ट्स कॉलेज के लड़के हमारे कैम्पस में खूब चक्कर लगातें हैं मैम।
  उन लोगो का चक्कर मेडिकल में भी खूब लगता है।”

“और आप लोग अपने ही कैम्पस में रहतें हैं? “

निरमा के सवाल पर सभी ने राजा बेटा बन कर हां में सर हिला दिया..

” गुड। लेकिन जब आप लोग अपने कैम्पस से निकलते नही तो ये कैसे पता चला कि वो लोग मेडिकल के भी चक्कर लगातें हैं।”

“मैडम ये सब तो पता चल ही जाता है।”

” अच्छा ! कैसे लेकिन? मैं तो देखो सारे कैम्पस में घूम सकती हूँ पर जब तक आप लोग न बताएं मुझे ये सब पता ही नही चलता। खैर…
   आप लोग अपनी पढ़ाई के लिए इतने कटिबद्ध है कि बाहर से आने वाले बच्चों के कारण डिस्टरबेंस फील करते हैं इससे आपको असुविधा हो रही है। ये बात सही नही है। अब ऐसे में मुझे कोई निर्णय तो लेना ही पड़ेगा।
  मैं ऐसा करती हूँ कल ही इंजीनियरिंग कैम्पस की बाउंड्री वाल को ऊंचा करवा देती हूँ। और आपका गेट परमानेंट लॉक करवा देती हूँ।
  वैसे भी आपके कॉलेज कैम्पस में ही आपकी फैकल्टी का भी हाउसिंग है, और आप लोगो का होस्टल भी।
  तो मेन गेट लॉक करवा देते हैं। न आप लोग बाहर आ सकेंगे न बाहर से कोई अंदर जा सकेगा।  
  इज़ इट ओके?”

“नो मैंम ! बिना बाहर निकले तो काम नही बनेगा। और बाउंड्री ऊंची हो गयी तो हवा कैसे आएगी? “

अभिमन्यु की बात सुन निरमा को ज़ोर से हंसी आ गई..

” फिर ? बोलो क्या करना चाहिए। “

” आप मेडिकल और हमारा कैम्पस ओपन रखिये बस आर्ट्स वालो का यहाँ  आना बंद करवा दीजिये।”

” नो ये तो पॉसिबल नही है। अगर खुले रहेंगे तो सारे खुले रहेंगे और अगर बंद किया तो सभी को बंद करवा दूँगी।
   एक बात और! मैं रोज़ रोज़ नए नियम अप्लाई करने में यकीन नही रखती। अगर एक बार निर्णय ले लिया तब फिर आप लोग मुझे मेरे निर्णय बदलने के लिए नही कह पाएंगे।
  इसलिए अभी एक हफ्ते के लिए सभी कैम्पस में कर्फ्यू कर लेते हैं।
कोई अपने कैम्पस से बाहर कहीं नही जाएगा। अगर ये ट्रायल सफल हुआ तो यही कार्यप्रणाली आगे अपनायी जाएगी वरना देखा जाएगा।
  पर इस एक हफ्ते की समयावधि में आप लोग ये इंश्योर कर लेना कि आप में से कोई किसी और कैम्पस में न दिखे वरना मैं फिर उसे सीधा रेस्टीकेट ही करूँगी।”

  निरमा की बातों को मंज़ूर कर वो लोग खड़े हो गए। निरमा को नमस्ते कर सभी बाहर निकल गए..

” यार ये तो पूरी डॉन है। पहले कैसे स्माइल देकर मीठी मीठी बातें कर एकदम से छुरी मार दी।मतलब हद है , अब आप इंजीनियरिंग वालों को भी  रूल्स बताएंगे। “

” सीपी भाई उनके लिए तो हम सब बराबर ही हैं। वो कौन सा इंजिस से खौफ खाएंगी। खैर चलो एक हफ्ते का ही सही कर्फ्यू तो लगा । अब देखते है वो जूनियर विधायक कैसे हमारे कैम्पस में फटकता है…..
   साला एक हफ्ते नही आएगा तो खुद यहाँ का रास्ता भूल जाएगा….”

  निरमा के ऑफिस से बाहर निकले वो लोग अपने कैम्पस की ओर बढ़ रहे थे कि अभिमन्यु ने अधीर को धीरे से पीछे खींच लिया…

” क्या हुआ? “

” यार आज मंगल है? “

” हाँ तो । तुम्हारा तो सब मंगल ही है। “

” अबे आज मंगलवार है तो आज के दिन मैं थोड़ा पुण्य कमा लेता हूँ न। मैं फटाफट यूनिवर्सिटी के मन्दिर से दर्शन कर के आता हूँ। तू कहाँ मिलेगा? “

” अबे और कहाँ, वहीं मिलूंगा अड्डे पे।

” चल ठीक है मैं  आता हूँ। इन गँवारू लोगो से कुछ मत कहना मैं कहाँ गया। “

” हाँ मेरे शाहरुख तू जा। जी ले अपनी ज़िंदगी। बस कोई नई सिमरन मत पटा कर आना। “

  अपने बालों पर हाथ फिराते हंसते गुनगुनाते अभिमन्यु यूनिवर्सिटी के अंदर की तरफ बने मंदिर की ओर चल पड़ा।
   बाहर जूते खोल वो फटाफट मंदिर में दाखिल हो गया…
   भगवान की मूर्ति के सामने आंखे बंद कर हाथ जोड़े वो मन ही मन में उनसे बातें करता रहा। होंठ धीमे से कुछ बुदबुदा रहे थे और उसने धीमे से आंखें खोल लीं। उसके ठीक सामने खड़ी लड़की ने भी शायद उसी वक्त आंखें खोली और पंडित जी के कहने पर नीचे झुक कर उसने सिंदूर उठा कर अपने माथे पर छोटा सा तिलक करने के बाद अपने साथ खड़ी अपनी सहेली को तिलक करने मुहँ पीछे घुमाया और ठीक सामने पड़ गए अभिमन्यु  के माथे पर तिलक की लंबी रेखा खींच दी।
    इतनी जल्दी ये सब हुआ कि वो लड़की और अभिमन्यु दोनो ही कुछ नही समझ पाये…

” आई एम सॉरी , आई एम सॉरी । मैंने तो झनक समझ कर तिलक आपको लगा दिया। “

” नो इट्स ऑलराइट । एब्सोल्यूटली ऑलराइट ! “

  अभिमन्यु तिलक पोंछने ही जा रहा था कि पंडित जी ने टोक लगा दी…

” अरे बेटा इतनी जल्दी मंदिर का लगा तिलक नही पोंछते। घर जाकर मुहँ धोओगे तो चेहरा साफ हो ही जायेगा…”

  हाँ में सर हिला कर उसने पंचामृत के लिए हाथ बढ़ा दिया।।उसके बाजू से ही  उस लड़की ने भी हाथ आगे कर दिया…
  अब तक में अभिमन्यु उस लड़की को पहचान चुका था।
   ये वही उस दिन वाली लड़की ही थी।
उस दिन तो लंबे लंबे बाल लहराती सुंदर सी कॉलेज फर्स्ट ईयर की लगती ये लड़की आज किसी शिशु मंदिर की गयरहवीं की छात्रा लग रही थी।
  नीला कुरता,सफेद सलवार, सफेद थ्री पिन की हुई चुन्नी पर ऊपर की ओर लाल रिबन से बंधी दो चोटियां।
   पर जो भी हो प्यारी बहुत लग रही थी।

  अभिमन्यु उसे देखता उसके पीछे मंदिर की सीढ़ियां उतर गया। वो अंतिम सीढ़ियों पर खोले अपने जूते पहन रही थी..

” हेलो ! माइसेल्फ अभिमन्यु … अभिमन्यु मिश्रा इंजीनियरिंग मैक फिफ्थ सेम। ”

  उस लड़की ने अपनी बड़ी बड़ी आंखें ऊपर कर उसे देखा , और सर नीचे किये जाने के लिए मुड़ गयी…

” अरे इत्ती घनघोर बेइज्जती । अपना नाम तो बताती जाओ यार। इतनी भी कर्टसी नही है? “

” रंगोली नाम है उसका और मैं हूँ झनक। मेडिकल फर्स्ट ईयर।
   हो गया इंट्रो अब हम लोग जाएं?”

  पानी पीकर आयी झनक ने अभिमन्यु की बात सुन ली थी। उसने रंगोली का हाथ पकड़ा और उसे खिंचती अपने साथ लिए आगे बढ़ गयी…

” रंगोली पहचाना इस लड़के को? “

  रंगोली के ना में सर हिलाते ही झनक हँसने लगी…

” अरे तेरा पति है ये। वही बंदा है जिसे तूने उस दिन प्रोपोज़ किया था।”

  झनक की बात सुन रंगोली का दिल धक से रह गया। कहीं सीनियर्स की कही बातें सच न हो जाएं। उसके मज़ाक को कहीं इसने सीरियसली ले लिया तो?
  उसका तो जीना दूभर हो जाएगा। पहले ही लड़कों को देख कर उसकी सिटी पिट्टी गुम हो जाती थी, और यहाँ तो उसने खुद आगे बढ़ कर कुल्हाड़ी में अपना पांव दे मारा था।
   उसने धीमे से पीछे मुड़ कर देखा वो वहीं हाथ बांधे खड़ा अपनी गहरी आंखों से उसे ही देख रहा था….

क्रमशः



aparna….
   

मायानगरी -3







  मायानगरी -3


      इंजीनियरिंग कैम्पस में भी नई नई चिड़िया चहक रहीं थीं वहीं कुछ कौए भी फुदक रहे थे…
   एक तरफ एक छोटा सा गार्डन बना था, जहाँ एक बड़े से बरगद के पेड़ पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था..
   “यहाँ रैगिंग करना सख्त मना है”

   उसी पेड़ के नीचे बैठे कुछ लड़कों ने उधर से गुजरते कुछ कौवों यानी  कुछ नए लड़कों को आवाज़ देकर बुला लिया..

” फर्स्ट ईयर? “

” यस सर !”

” बेटा पहले दिन ही जीन्स? और ये क्या बाल बना रखें हैं? खुद को नागराज समझते हो? “

” नो सर!”

” तो ये जो बालों का फुग्गा दिख रहा है ना कल कटवा के आना समझे। कल गंगाधर विद्याधर मायाधर ओंकारनाथ शास्त्री बन के आ जाना समझे।”

” ये सारे लोगों जैसा बन कर आना है सर? “

” अबे शक्तिमान नही देखे क्या बे ? हो सकता है तुम्हारे पैदा होने के पहले का सीरियल हो? अबे गूगल कर लेना।  .. और सुनो आज रात आठ बजे होस्टल नम्बर 5 में आ जाना। चलो फूटो अब…

   वो लड़के जान बचा कर भाग खड़े हुए। उन्हें यूँ भागतें देख सभी सीनियर्स में हंसी की लहर दौड़ गयी।
   
        तभी उस लड़की के प्रोपोजल से हैरान परेशान अभिमन्यु वहाँ चला आया। अभिमन्यु के साथ उसका दोस्त अधीर शर्मा भी था…
   दोनो बातें करते गार्डन में पहुंच गए…

” काहे इत्ता सोच विचार रहे हो अभि कोई नई चिरैया होगी आर्ट या कॉमर्स वाली, बेचारी रैगिंग की शिकार !”

” हाँ होगी तो रैगिंग की शिकार ही लेकिन सोचने वाली बात ये है कि उसने इतने लड़कों में मुझे ही प्रोपोज़ किया? “

” अबे ओए तू कोई जॉन इब्राहिम नही है समझा। जो सामने पड़ गया उसे प्रोपोज़ कर चलती बनी, अब इतना मत सोच , भूल जा उसे। “

” हाँ यार !मैं कौन सा सिरियस हूँ। बस ये पता चल जाये कि बंदी है किस फैकल्टी की। वैसे शक्ल सूरत से इतनी खूबसूरत सी थी पक्का आर्ट्स वाली होगी। है ना?

” कॉमर्स या साइंस ग्रैजुएट भी हो सकती है। सभी सुंदर लड़कियां आर्ट्स ही लें ये ज़रूरी तो नही? “

” हाँ यार वैसे बी एस सी में भी अच्छी लड़कियां आती हैं। एक हमारे हिस्से ही दुनिया भर की शशिकला और टुनटुन पता नही क्यों आती हैं। पता नही ये मैथ्स वाली लड़कियां इतना पढ़ती क्यों हैं कि अपने थोबड़े का भूगोल ही गड़बड़ा देती हैं। “

” मैथ्स बिना पढ़े निकलता भी तो नही भाई, अब हर कोई तेरे जैसा अनाप शनाप दिमाग तो नही पाए बैठा है ना?

” हाँ बात में तो दम है तेरी। वैसे तुझे वो पिछले साल की बी एस सी वाली याद है?

” कौन रूही ? जिसके चक्कर में तू उसके बॉयफ्रेंड से पिटने वाला था।

” अबे मैं नही पिटने वाला था, उल्टा उस साले को मैं पीट देता लेकिन रूही का चेहरा देख कर छोड़ दिया। अब यार जब मैं उसके चक्कर लगा रहा था तब वो कमबख्त भी तो फुल लाइन देती थी,मुझे क्या पता था मज़े ले रही है । अपने बॉयफ्रेंड की ताकत नापने का ये कौन सा तरीका होता है भाई। पहले खुद लाइन दो और फिर बॉयफ्रेंड से पिटवा दो।

  अधीर का हँस हँस कर बुरा हाल था…

” और वो याद है तुझे क्या नाम था “भाषा ” क्या स्मार्ट लड़की थी यार वो। मैथ्स ऑनर्स कर रही थी ना।”

  भाषा नाम सुनते ही अभिमन्यु के चेहरे पर चौड़ी सी मुस्कान चली आयी …..

” कैसे भूल सकता हूँ यार। इतनी टैलेंटेड बंदी सच आज तक नही देखी। अब कैंटीन में जब मैं उसे देखता वो भी मुझे देख मुस्कुरा देती। मुझे लगा पट गयी है। फिर धीरे धीरे मुझसे ज्यादा तो वो ही मुझे ताड़ने लगी थी …

” हाँ और फिर आया वो मनहूस दिन!”   अधीर अभिमन्यु की बात आगे बढ़ाता हँसने लगा…

“हम्म ! अबे कैंटीन में राखी लेकर कौन आता है यार!”

” हाँ सारे बवाल तेरे ही हिस्से लिखें हैं। तुझे उसकी आँखों में ममता नज़र नही आई थी जो लाइन मार रहा था। साले वो तुझमें अपना गुमशुदा भाई देखा करती थी और तू…”

” अब मैं क्या करूँ यार। इतनी प्यारी सी लड़की अगर मुझमें अपना भाई देखेगी तो फिर ज़िंदगी ही खत्म अपनी। अच्छा हाँ इसी बात से याद आया, आज भाषा की सहेली धरा छुट्टियों के बाद वापस आ रही है, उसे लेने स्टेशन जाना है मुझे।”

“हां अब बहन बन गयी है तो पूरी शिद्दत से भाई धर्म निभा तू। कब जाना है तुझे स्टेशन? अकेली आ रही है क्या”

” रात में ट्रेन है उसकी। अकेली ही होगी तभी तो भाषा ने स्पेशली फोन कर के कहा कि स्टेशन लेने चले जाना। “

“और ये नही कहा कि अपनी आदत से मजबूर लाइन मत मारना शुरू कर देना। “

  अभिमन्यु नीचे सर किये हँसता अपने बालों पर हाथ फिराता रहा….

” खैर अब भूल जा सुबह वाली को ,चल लाइब्रेरी चलते हैं। अबे यार….. सुबह वाली लड़की मेडिको भी तो हो सकती है। “

” तौबा तौबा , ऐसी नाजुक लड़की डॉक्टर नही बन सकती यार। डॉक्टर लड़कियां न अजीब छिपकली होती हैं पढ़ पढ़ कर इनके चेहरे सड़ जातें हैं, आंखों के नीचे काले घेरे और उस पर मोटा सा चश्मा लगाने वाली लड़कियां, डेडबॉडीज़ को चीरती फाङती लड़कियां , उफ्फ। मुझे तो इनमें चुड़ैल नज़र आती है। दुनिया में आखरी लड़कीं भी बची होगी न तब भी डॉक्टरनी से कभी प्यार नही करूँगा।”

“वैसे लड़कियों के मामले में तूने जो अभूतपूर्व ज्ञान कमाया है उसे देख कर समझ सकता हूँ तू सही ही कह रहा होगा।
   दर्जन भर तो तेरी सिर्फ ए अल्फाबेट से दोस्त रही होंगी , अवनी अनामिका,अनिका, आँचल, आरुषि ,अनन्या अपूर्वीनी और क्या थी वो चैताली मिताली … हे भगवान!

” बस करो यार। जलो मत तुम बराबरी करो। समझे। “

  दोनो बातें करते आगे बढ़ रहे थे कि सामने से एक हैरान परेशान लड़का चला आया…

“”अरे ज्ञानी भैया क्या हुआ ? बड़े टेंशनियाए घूम रहे हो। “

” यार अभिमन्यु सेमेस्टर शुरू हुआ नही की ये प्रोफेसर्स की किचकिच शुरू हो जाती है।

” अब क्या जुल्म हो गया गुरु?

” अब क्या बताएं यार , पिछले सेमेस्टर का बकाया मांग रहे हैं सारे। “

” ओहहो जे बात। चलिए लाइब्रेरी में चलिए कोई उपाय निकालतें हैं ज्ञानी जी।

  ज्ञानी जी का असली नाम हर्षवर्धन गेरा है। दिल्ली के रहने वाले हर्षवर्धन के पापा का रेस्टोरेंट है लेकिन वो अपने लड़के को सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनाना चाहते हैं। बड़े घिस तिस कर हर्षवर्धन को इंजीनियरिंग कॉलेज पहुंचाया गया था। इनके बारे में किवदंती ये है कि मैनेजमेंट कोटा के लिए आवश्यक मिनिमम मार्क्स भी ये नही ला पाए थे। मैनेजमेंट कोटा की मोटी धनराशि पर अपने रेस्टोरेंट की काजू कतली की रुपहली पतरी चिपका कर ही इन्हें इनके पिता ने पार लगवाया था।
पहले जैसे इनके रहने से इनका स्कूल धन्य हुआ पड़ता था अब कॉलेज का वही माहौल था यह कहने को तो पांचवे सेमेस्टर में पहुंच चुके थे लेकिन हर एक सेमेस्टर में कोई ना कोई विषय इन्हें मुंह चढ़ाता वहीं खड़ा रह गया था ।
    कहां जाता है इन्होंने फर्स्ट ईयर की पढ़ाई दो बार पढ़ी सेकंड ईयर की पढ़ाई भी दो बार पढ़ चुके हैं और अभी पांचवें सेमेस्टर में होते हुए भी पिछले सेमेस्टर के कुछ विषय लटके पड़े ही हैं।

     इतनी गहन पढ़ाई के कारण ही इंजीनियरिंग के बच्चों में यह ज्ञानी नाम से सुप्रसिद्ध हैं, अभिमन्यु का साथ मिलने पर उसने इन्हें रात-दिन एक करके पढ़ाया और यह किसी तरह सेमेस्टर की वैतरणी पार कर आगे बढ़ गए इसीलिए यह अभिमन्यु को बहुत माना करते हैं।
      दिल का साफ अभिमन्यु इन्हें सीनियर्स की तरह आदर भी देता था और एक मित्र की तरह प्रेम भी किया करता है अभिमन्यु और अधीर के साथ ही ज्ञानी जी भी इनके रूम मेट है।

  कुछ प्रोफेसर ज्ञानी जी के पांचवे सेमेस्टर में जाने के खिलाफ थे उनका कहना था कि ज्ञानी जी पहले सारे पुराने सेमेस्टर क्लियर कर लें तभी आगे बढ़े इसी बात के फसाद पर ज्ञानी जी अभी अभी किसी से उलझ कर बाहर चले आ रहे थे जिन्हें वापस समझा-बुझाकर अभिमन्यु ने लाइब्रेरी के लिए मोड़ लिया था।

नया सत्र शुरू हुआ था इसीलिए अभिमन्यु को किताबें अलॉट करवाने की जल्दबाजी थी, उसके पास इतने पैसे तो होते नहीं थे कि वह हर एक महंगी किताब खरीद सके, इसीलिए सबसे पहले लाइब्रेरी पहुंच कर अपने काम की किताबें  अलॉट कर के रख लिया करता था।
   भले पढ़ाई से कोई नाता नहीं था लेकिन एग्जाम में फेल होना उसके जमीर को गवारा नहीं था इसीलिए एग्जाम्स में पास होने किताबें और नोट्स उसके पास होना बहुत जरूरी हुआ करता था।
    सीनियर्स भी इस मैजिक माइंड लड़के से प्रभावित थे इसलिए अपने सबसे ज़रूरी नोट्स संभाल कर रखते और सेमेस्टर क्लियर होते ही अपनी वसीयत अभिमन्यु के नाम कर दिया करते।

वहां पहुंचे वह लोग किताबें अलॉट करवा ही रहे थे कि उन लोगों के भी सुपर सीनियर 5-6 के ग्रुप में वहां चले आए उन सभी को हैरान परेशान देख अभिमन्यु और अधीर एक दूसरे को देखने लगे यह सभी ज्ञानी के साथ ही इस कॉलेज को ज्वाइन किए हुए थे इसलिए सभी ज्ञानी को अच्छे से जानते थे वह लोग ज्ञानी और अभिमन्यु के पास ही चले आए।
    उन्हीं में से एक थे सीपी भाई !

  सीपी भाई का पूरा नाम था चंद्रप्रताप सुबोधन। ज्ञानी जी के साथ ही इन्होंने भी कॉलेज में कदम रखा था। पर जहाँ सीपी भाई सारे जहान के जोड़ घटाव गुणा भाग कर कैसे भी कर के पास होते चले गए ज्ञानी जी वहीं उसी सेमेस्टर में रहकर अपना ज्ञान सिंचित करते रहे।

सीपी (c p) ने अपने साथ रखा एक पर्चा अभिमन्यु की तरफ बढ़ा दिया …..

” यह क्या है सीपी सर ?”

” ध्यान से देख ले, पढ़ ले!”

अभिमन्यु उस पर्चे को ध्यान से देखने लगा और उन लड़कों में से एक लड़का उस पर्चे के बारे में बताने लगा ….

” यार अब हद होने लगी है ! ठीक है, माया नगरी एक पूरी यूनिवर्सिटी है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि किसी भी फैकल्टी का कोई भी बंदा कहीं भी घुस जाएगा।”
  हमारे इंजीनियरिंग केंपस में कुल जमा 3 कैंटीन। है कि नहीं?  यह राजा युवराज सिंह आर्ट्स एंड स्पोर्ट्स अकैडमी वाले लड़के जब देखो तब हमारी कैंपस की कैंटीन में चले आते हैं। एक तो साला उनमें विधायक का लड़का है अपनी जीप में धूल उड़ाता फिरता है । सारा वक्त अपनी एसयूवी में सवार रहता है अपने चेलों से घिरा खुद को पता नहीं कहां का राजा समझता है?

    माया नगरी में पढ़ रहा है तो उसे लगता है कि वह खुद भी राजा अजातशत्रु बन गया है। अरे ऐसे कोई थोड़ी अजातशत्रु बन सकता है।
     पता नहीं लीचड़ आदमी खुद को क्या समझता है? जब देखो तब हमारी कैंटीन में चलाएगा और हमारे कैंपस की लड़कियों को छेड़ता रहेगा। इसी सबके लिए यह पेपर लिखा गया है।  इस पेपर को हम डायरेक्ट यूनिवर्सिटी के चेयर पर्सन के पास देने वाले हैं । इसमें यह लिखा है कि जो जिस फैकल्टी का स्टूडेंट है उसी कैंपस में रहे , और उसे किसी और कैंपस में घुसने की मनाही कर दी जाए । हमारी ब्रांच के लड़के इसमें साइन कर चुके हैं। अभी 4 ब्रांच और बची हैं , वहां के भी सारे बच्चों के साइन होने के बाद काफी सारे लोग हमारे फेवर में आ जाएंगे , इसके बाद हम अपने कॉलेज के लेक्चरर और प्रोफेसर के साइन लेने के बाद सीधा माया नगरी की सीईओ के पास जाएंगे।”

” सर पता भी है मायानगरी की सीईओ है कौन?”

“हां पता है ना! वैसे तो माया नगरी के कर्ता-धर्ता राजकुमार विराज सिंह है लेकिन हम डायरेक्टली उनके पास नहीं पहुंच सकते ऑफिस मैनेजमेंट देखने के लिए ऑफिस सीईओ के पास ही हमें जाना पड़ेगा। और सीईओ है श्रीमती निरमा प्रेम सिंह चंदेल ।
      सुनने में आया है थोड़ी स्ट्रिक्ट है मैडम लेकिन है बहुत अच्छी । यह भी सुना है कि स्टूडेंट्स के भविष्य से वह कभी खिलवाड़ नहीं होने देती। कोई भी परेशानी हो वह दोनों पक्षों को सुनकर समझ कर वही निर्णय लेती हैं जिसमें विद्यार्थियों का भला हो।  मुझे तो भरोसा है कि वह हमारी बात सुनेंगे और समझेंगे और उस विधायक के लड़के को भी सही मजा चखा देंगे,  तो बेटा अभिमन्यु साइन कर दो इसमें।

“जी सर!   सर साइन ही नहीं करेंगे बल्कि मैडम के पास चलेंगे भी…
     हम जितने ज्यादा लोग जाएंगे उतना ज्यादा असर पड़ेगा। जाहिर सी बात है कि हमारे कैंपस में सिर्फ इंजीनियरिंग वाले लड़के लड़कियां ही रहें। ना तो आर्ट्स वाले यहां आएँ और ना ही साइंस वाले ।और  मेडिकल वाले भूत तो बिल्कुल ही न आ सकें। सबको अपनी अपनी फैकल्टी अपने अपनी ब्रांच दी गई है सभी के कैंपस सफिशिएंट बड़े हैं। सभी को कैंटीन की सुविधा लाइब्रेरी की सुविधा दी गई है । फिर क्यों इधर-उधर मारे मारे फिरना । सर मैं बिल्कुल आपके साथ चलने को तैयार हूं।

“गुड तुमसे यही उम्मीद थी।  तुम्हारे दोस्त भी बहुत सारे हैं,  तो सब के सब का साइन ले लेना इसमें। ठीक है ?यह पेपर रखो शाम को हमें दे देना

“सर मैं आज शाम तक इसमें 400 लोगों के साइन ले कर आ जाऊंगा भरोसा रखिए…

“गुड तुमसे यही उम्मीद थी ..अब हम चलते हैं बाकी जगह भी जाना है!

उन लोगों के वहां से जाते ही ज्ञानी और अधीर अधीरता से अभिमन्यु का चेहरा देखने लगे।

” अभी 400 साइन कहां से लेकर आएगा तू ?  कुछ ज्यादा ही फेकू नही है ? कुछ भी कह देता है….”

” अबे सिर्फ साइन लेने के लिए 400 लोगों के पास जाने की क्या जरूरत है? भगवान ने मुझे दो दो हाथ  और 10 उंगलियां दी है।
      इन दोनो हाथों की  उंगलियों से ऐसे ऐसे कारनामे करूंगा ना कि 400 ही नही 800 साइन बना लूंगा और किसी को पता भी नहीं चलेगा। “

“अबे साले हद फर्जीवाड़ा है तू। अपना सारा दिमाग बस इसी सब में झोंक दे। सही से पढ़ लिख लेता ना तो कलेक्टर बन जाता कहीं का।”

“कितना कंफ्यूज है यार तू और मुझे भी करता है। इंजीनियरिंग कर के मैं कलेक्टर काहे बन जाता भला? “

” चल अब चलें कम से कम आठ दस साइन तो असली वाले ले ले फिर रात में हॉस्टल रूम में बैठ कर बनाते रहना फर्जी सिग्नेचर। कल मैडम से मिलने भी जाना है।”

अभिमन्यु अधीर और ज्ञानी कैंटीन की ओर चल पड़े…..

**********

रंगोली तैयार होकर अपने गांधी झोले में किताबें और नोटबुक डाल रही थी कि झनक भी नहा कर निकल आयी…

” रंगोली तू तैयार नही हुई अब तक? “

” हो तो गयी हूँ। और क्या तैयार होना बाकी है।?”

” ओए मैडम हम फुज़ी हैं, हमें ये ऊंची सी पोनी टेल , ये चटकीले रंगों के कपड़े और ये स्टाइलिश सी जूतियां अलाऊ नही हैं। समझी।

” ओह्ह ! फिर ।।”

” फिर ? तुझे एडमिशन के समय मेधा रानी ने कुछ बताया नही क्या ? अजब डंबो है यार तू। ये सब तो हमें एडमिशन के साथ ही उसने बता दिया था।

” अब ये मेधा रानी कौन है? “

झनक ने अपने माथे पर हाथ मारा और फटाफट अपनी अलमीरा से एक जोड़ा यूनिफॉर्म निकाल कर रंगोली को थमा दिया…

” मेधा रानी मैडम कॉलेज में फीस कलेक्शन के बाहर इधर उधर भटकती आत्मा के समान टहलती रहतीं हैं। सेकंड ईयर स्टूडेंट हैं, हॉस्टल रूम अलॉटमेंट के साथ ही सारे नियम भी फटाफट बता देती हैं। असल में हर साल सेकंड ईयर की एक लड़की को इस काम के लिए चुना जाता है। जो जूनीज़ को पकड़ कर नियम रटवा दें।
  अब तू पूछेगी नियम क्या हैं। तो बेबी पहला तो हमें दो चोटियां बनानी है , वो भी रेड रिबन लगा कर ऊपर बांधनी हैं। दूसरा यूनिफॉर्म में यही नीला कुर्ता और सफेद सलवार पहनना है ,चुन्नी थ्री पिन करनी है। और पैरों में बिना हील्स के हद दर्जे के बोरिंग पंप शूज़।
  ये सिमिज़ की जलन है बस। क्योंकि हर नई खेप के साथ सीनियर लड़के क्लास में अपने लायक जूनी ढूंढने ही तो आते हैं। इसलिए ये लोग हमें ऐसे नमूना बनवा कर रखतीं हैं।

  झनक की बातों के दौरान ही रंगोली भी तैयार हो गयी।
  दोनो फटाफट अपने गांधी झोले टांगे कॉलेज के लिए भाग चले….

” जल्दी जल्दी कदम बढ़ा, आज सबसे सामने बैठना है एनाटॉमी लैब में। “.

“हां यार मुझे भी अच्छे से पढ़ाई करनी है, सामने बैठेंगे तभी तो समझ आएगा। “

” पढ़ाई वढ़ाई का कोई चक्कर नही है मेरे साथ…. वो तो आज मृत्युंजय सर क्लास लेने वाले हैं, उन्हें ताड़ना है बस इसलिए सामने बैठना है…”

रंगोली फिर आंखों में सवाल लिए झनक को देखने लगी…
  
  झनक रंगोली को देख मुस्कुरा उठी….

” ऑब्विसली तू मृत्युंजय सर को भी नही जानती होगी। हाउस सर्जन हैं अपने यहाँ , क्या डैम हैंडसम बंदा है यार उफ्फ, और जब कभी ब्लैक शर्ट में आता है ना कसम से कितनी लड़कियां तो ऐसे ही कत्ल हो जाती होंगी। वो साउथ का हीरो है ना सुधीर बाबू, वो भी फेल है मृत्युंजय सर के सामने।  ये ब्लैक शर्ट का किस्सा सिमिज़ के मुहँ से ही सुना था, अब तक देखने का सौभाग्य नही मिला। “

  झनक की बातें सुनती हंसती रंगोली झनक को गहरी आंखों से देखने लगी…

” बाकियों का पता नही तू तो अभी से फ्लैट हो गयी ,लग रहा है…”

” अरे कहाँ यार। सर की तो सेटिंग है पहले से। हम तो बस आंखों को सुकून मिले ऐसी चीज़ें देखनी चाहिए, इसलिए देख लेते हैं।”

” ओह्ह तो सर की सेटिंग किससे है? “

” गौरी मैम ! उस दिन दिखी थी न होस्टल में, वही हैं……

  




क्रमशः

aparna …

मायानगरी -2

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  मायानगरी -2



     काउंसिलिंग से वापस लौट कर रंगोली के पैर जमीन पर नही पड़ रहे थे। चार दिनों में वहाँ जाने रहने की सारी तैयारियां पूरी कर रंगोली बिल्कुल किसी राजकुमारी सी अपने घर से पहली बार विदा हुई।
   सत्रह की अल्हड़ उम्र में पहली बार अपनी माँ पापा बहन को छोड़ कर जाना उसके लिए बहुत मुश्किल था।
  यही हाल उसकी माँ का हो रहा था। उनकी कनक कलेवर लड़की जिसको मेडिकल की तैयारी के कारण उन्होंने ज़मीन पर पैर नही रखने दिए थे आज खुद अपनी ज़िम्मेदारी बन कर उनसे दूर जा रही थी।
   पिछले चार दिनों से वाकई रंगोली के जाने की ऐसी तैयारियां की जा रहीं थी जैसे वो घर से अपने ससुराल विदा हो रही हो।
   भर भर के रिश्तेदार रंगोली से मिलने आ रहे थे, आखिर घर परिवार से पहली बार कोई डाक्टरी पढ़ने बाहर जा रही थी।
  मामी जी किलो भर पिन्नियों के साथ चने के पापड़  ले आयीं तो वहीं ताई जी दो जोड़ी नए सूट के कपड़े लेती आयीं।
   सबसे खुशी खुशी मिलती रंगोली चहक रही थी…

” अरे बड़ी अम्मा इसकी क्या ज़रूरत थी? ” बोलते हुए भी उसने फटाफट पन्नी में से निकाल कर बंधेज का गुलाबी कुर्ता गले से लगा लिया..

” पर है बहुत सुंदर। थैंक यू !!!”

” अच्छे से पढना बेटा। फिर वापस आकर मेरे घुटनों का तू ही इलाज करना। मुये इनके मारे कही आना जाना मुश्किल हो रखा है ।”

” अरे अभी तो कॉलेज तक भी नही पहुंची है ये। ड़ॉक्टरी पढ़ने में बहुत समय लगता है अम्मा ? सिर्फ एम बी बी एस से कुछ नही होना जाना, उसके बाद पीजी भी तो करना पड़ेगा। पता नही ये झकली वहाँ क्या करेगी। ठीक से बोल तक तो पाती नही है। कोई ज़ोर से कुछ बोल भर दे तुरंत आंखों में आंसू चले आते हैं। ”

  मेहंदी की बात सुन रंगोली ज़रा सी रुआँसी हो गयी। बात तो सही थी। वो भले ही मेहंदी से दो साल बड़ी थी पर मेहंदी जैसी तेज़ तर्राट नही बन पाई थी।
   अपने विषय से इतर कुछ भी बोलने में उसे झिझक सी महसूस होती थी। पढ़ाई में अच्छी होने पर भी वाइवा में हमेशा पिछड़ जाया करती। कितनी भी अच्छी तैयारी हो वो सिर्फ लिख सकती थी,जवाब बोल कर बताना उसके लिए बहुत कठिन हो जाता था।
   अब तक तो चयन हो जाने की संतुष्टि में झूम रही थी लेकिन मेहंदी की बात ने उसे यथार्थ के धरातल पर पटक दिया था।
   वहाँ ढेर सारे सीनियर्स और टीचर्स के बीच वो कैसे और क्या करेगी।
  
  ” डरा क्यों रही है यार मेहंदी ? चल पैकिंग करवा मेरी। “

” मैं क्या पैकिंग करूँ। मम्मी तो ऐसा लग रहा है पूरा बाजार पैक कर चुकी हैं तेरे लिए। “

  मेहंदी की बात सुन सामान के पैकेट्स कमरे में लेकर जाती रंगोली की माँ उसकी तरफ पलट गई..

” मेहंदी बेटा! वहाँ से ज़रा वो बड़ा पैकेट भी इधर ले आना।।”

  सुबह से चल रही पैकिंग से परेशान मेहंदी ने पैकेट उठा कर पलंग पर पटका और अपना रैकेट उठाये बाहर निकल गयी, जाते जाते रंगोली के कान में एक और ज़हरीला तीर छोड़ गई….

” मम्मी का बस चले तो इस घर में चक्के लगा कर भेज दे तेरे साथ!”

” तुझे क्यों जलन हो रही है? दो साल बाद ऐसे ही तेरी भी पैकिंग होगी। समझी । “

” नही समझना मेरी माँ। ये सारा घरेलू सामान तुझे मुबारक। मैं दो साल बाद कॉलेज पढ़ने जाऊंगी, तेरे जैसे गृहस्थी बसाने नही। “

   अपने रैकेट को हवा में लहराती हंसती खिलखिलाती मेहंदी बाहर निकल गयी और रंगोली मुस्कुरा कर अपनी माँ से लिपट गयी…

” मम्मी हर सैटरडे मुझसे मिलने आ जाओगी न? मैं रह नही पाऊँगी आपके बिना!”



“हर शनिवार तो मुश्किल होगा बेटा लेकिन महीने में एक बार जरूर कोशिश करेंगे कि मैं ना भी आ पाऊं तो तेरे पापा को ही भेज दूं।”

  मुस्कुरा कर माँ बेटी दोनो ने अपने आंसू पोंछ लिए!

बड़े धूम धड़ाके से रंगोली की विदाई हो गयी। रंगोली को बात बात पर छेड़ने वाली उसकी छोटी बहन ही उस की विदाई पर उसके गले लग सबसे ज्यादा रोई और रंगोली अपने पापा के साथ पूरे  चार घंटों का लंबा सफर तय कर मायानगरी पहुंच गई…

   वहाँ रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह मेडिकल कॉलेज में उसके प्रवेश की सारी औपचारिकताएं पूरी कर उसके पिता ने उसके होस्टल आदि की व्यवस्था देखने के बाद उसका सामान उसके कमरे में रखवाया और उसे साथ ले बाहर शहर घूमने निकल गए। उनकी वापसी  रात की थी। इसी से बेटी को बाहर खिला पिला कर वापस कॉलेज कैम्पस में छोड़ वो बाहर निकल गए।
   रंगोली पापा के सीने से लगी बिलख उठी। उसे लगा ये मेडिकल सीट ये कॉलेज सब उसके ममी पापा के सामने बकवास है। वो क्यों चली आयी इससे अच्छा अपने ही शहर में कुछ पढ़ लेती। बी एस सी में भी तो आजकल कितनी सारी ग्लैमरस ब्रांच हो गईं हैं। माइक्रोबायोलॉजी है और …और… और उसे कुछ याद ही नही आया। उसकी आदत ही थी खुद में कुछ भी सोचते हुए खो जाने की। और अक्सर ऐसे खो कर वो बात की मुख्य जड़ ही भुला बैठती।
   उसके पापा ने उसके सर पर प्यार से हाथ फेरा और बाहर निकल गए। पापा का ऑटो आंखों से ओझल होने तक उन्हें बाय करती वहीं खड़ी रही फिर थके कदमों से अपने कैम्पस की ओर बढ़ गयी…

   अपने होस्टल पर पहुंच कर अपना कार्ड गार्ड भैया को दिखा कर वो सीढ़ियों की ओर धीमे कदमों से बढ़ी चली जा रही थी…

” बिटिया कोई ज़रूरत हो तो पूछ लेना हमसे। डरना बिल्कुल मत!”

  पीछे मुड़ कर एहसान भरी आंखों से उन्हें देख हाँ में सर हिलाती वो सीढियां चढ़ने लगी।
   फ़र्स्ट ईयर की लड़कियों के कमरे ऊपर ही थे , नीचे सीनियर्स के थे। डरना बिल्कुल मत ऐसा क्यों बोला उन्होंने ? कुछ देर सोच कर वो गर्दन को झटक कर ऊपर चढ़ती गयी। दूसरी मंजिल पर उसे कमरा मिला था।
   वो ऊपर जा रही थी कि सामने से उतरती दो लड़कियां टकरा गई…” फुजी है ? “
रंगोली चौन्क कर सामने देखने लगी…”जी ?”

” जी जी क्या बे? फुजी है तू? “

” फूजी मतलब ? “

” मतलब फर्स्ट ईयर जूनियर। “

” जी हाँ !”

” कौन सा कमरा अलॉट हुआ है?

” सत्रह नम्बर सी विंग में!”

  दोनो लड़कियां चौन्क कर एक दूसरे को देखने लगी…

” हद करती है यार ये हिटलर!मतलब क्या इस बार ग़दर मच गया कि हॉन्टेड रूम को भी लड़कियों को दे मारा।

“हम्म सुनने में तो आया है इस बार मैनेजमेंट कोटा से भीड़ आयी है…

” अरे तो इसका मतलब भुतहा कमरा भी उठा कर रहने दे दोगे। “

  दोनो लड़कियों की बातें सुनती रंगोली घबरा कर खड़ी रह गयी….

” सुन बहन कोई परेशानी हुई तो तुरंत कमरे से बाहर भाग निकलना। बस कुछ भी हो जाये उस कमरे की खिड़की से नीचे मत झांकना और ऊपर लगे फैन को मत देखना और हाँ सुन कान में रुई डाल कर पड़ी रहना जैसे कोई आवाज़ सुनाई नही दे रही हो। एक बात और सुन,अरे एक मिनट नाम क्या है तेरा? “

” जी रंगोली , रंगोली तिवारी। “

” ओहो बढ़िया है जेम्स बांड स्टाइल में नाम बता रही है। वैसे मेरा नाम वृंदा है और ये है भूमि। हम दोनों तेरी करंट सीनियर हैं। और हम एंटी रैगिंग वाले ग्रुप के हैं। किसी सीनियर ने सताया तुझे तो तुरंत हमारे पास आना। समझी?

हां में सर हिला कर रंगोली मुड़ कर जाने लगी…

“जा बेटा महादेव का नाम लेकर चुपचाप कान में रुई डाले सो जाना।”

  रंगोली पहले ही हद दर्जे की डरपोक थी। उसे रात में उठ कर वॉशरूम जाना हो तब भी वो मेहन्दी को उठा लेती थी। अब ऐसे में कमरे में अकेले रहना उसके लिए बहुत मुश्किल था। हालांकि कमरा एलॉट करते समय उसे होस्टल इंचार्ज सर ने कहा था कि कल से एक लड़की और उसके साथ आ जायेगी रहने। लेकिन आज की रात उसे अकेले ही रहना था।

   ताले में चाभी घुमाती  वो धीमे से अंदर घुस गई। कमरा छोटा ही था। दो अलग अलग दीवारों पर छोटी छोटी कैंप कॉट पड़ी थी, बिन चादर के गद्दे और और बिना लिहाफ के तकिए के साथ। उसी के एक ओर एक टेबल कुर्सी और लैम्प था, जिससे लग कर एक आलमारी खड़ी थी।
पहली नज़र में ऐसा डरावना नही था कमरा। सामान तो वो सुबह ही ऊपर भेज चुकी थी। गार्ड भैया के हाथ से। कमरे की चाबियां भी गार्ड के पास ही छोड़ दी थीं जो अभी उन्हीं से लेकर वापस आ रही थी।

   चाबी अंदर टेबल पर रख वो अपने बैग से टॉवेल और नाइट सूट निकाल कर नहाने वॉशरूम में घुस गई।
     बाल्टी में पानी लगा कर कपड़े टांगते वो वापस अपने खयालों में खो गयी थी। घर से निकलते समय उसकी सहेलियों ने उसे समझाया था, हॉस्टल के कमरे बाथरूम सब जगह कैमेरा चेक कर लेना। आजकल ज़माने का भरोसा नही रहा, उसी बात को याद कर वो बाथरूम में कैमेरा चेक करती रही कि बाल्टी के भरने की आवाज़ पर जैसे ही नल बंद करने उसने हाथ बढ़ाया चौन्क कर एक कदम पीछे हट गई। बाल्टी में पूरा लाल पानी भरा था,और वैसा ही खूनी पानी नल से आ रहा था।
   खून!!! उसके मुहँ से चीख निकल गयी, बड़ी मुश्किल से हाथ बढ़ा कर जैसे तैसे नल बंद कर वो बाहर भागी तो देखा पूरे कमरे में हल्का  धुंआ सा है… दोनो बेड पर सलीके से चादरें बिछी हैं और कमरे में किसी के गुनगुनाने की धीमी सी आवाज़ आ रही है पर नज़र कोई नही आ रहा…
    ” झूम झूम ढलती रात, लेके चली मुझे अपने साथ झूम झूम ढलती रात …”

  डर के मारे रंगोली की आत्मा शरीर छोड़ने को थी कि उसके दिमाग ने गोता खाया और उसे लगा ये सब रैगिंग का हिस्सा भी हो सकता है।
  वो धीमे कदमों से आगे बढ़ती एक बेड के पास रुकी जहाँ से गाने की आवाज़ें आ रही थी। ध्यान से देखने पर उसे लगा वहाँ क्विल्ट ओढ़े कोई लेटा है। उसने धीरे से चादर हटा दी और एक तेज़ चीख उसके मुहँ से निकल गई….

   सामने एक पूरा का पूरा कंकाल पड़ा था।

  उसकी चीख के साथ ही उस कमरे की बुझी हुई बत्तियां जल गई और एक साथ कई जोड़ी हंसती हुई आंखें उसके सामने चली आयीं।

” वेलकम वेल्कम रंगोली , रंगोली तिवारी उर्फ जेम्स बांड !

  बेहोश होने जा रही रंगोली जैसे होश में आ गयी.. उसने देखा सामने सीढ़ियों पर मिली उसकी करंट सीनियर्स खडी थीं वृंदा और भूमि मैंम। इनके अलावा वो किसी का चेहरा नही पहचानती थी।

   उसके माथे पर पसीने की बूंदे छलक आयीं, डर से गला सूख रहा था कि एक  लड़की पानी की बोतल लिए उस तक चली आयी…

” ले पानी पी ले। “

  कृतज्ञता से उसे देख रंगोली ने बोतल हाथ में ले ली, जाने कहाँ से दिमाग का फ्यूज बल्ब जल गया और उसने सीनियर्स से पानी पीने की परमिशन मांग ली…

” मैम क्या हम पानी पी सकतें हैं? “

” ज़रूर पियो, लेकिन हम में कौन कौन शामिल है भईया ? पूरा रामगढ़ साथ लिए घूमती हो क्या? “

” जी नही तो!”

“तो हम हम क्या लगा रखा है। सिंगुलर के लिए “मैं” यूज़ किया जाता है,नही मालूम क्या? ग्रामर भी सीखानी पड़ेगी ? “

” नो मैम!”

” तो आइंदा ये हीरोइनों वाली होशियारी मत मारना। चलो अब निकल लो तुम दोनों , जाओ सारे तीरथ कर आओ। फूटो अब यहाँ से। हम अपने कमरे में जा रहे। काम निपटा कर हमारे कमरे में आ जाना। समझीं !

” जी मैम ! ” रंगोली ने अपने साथ खड़ी लड़की की तरफ देखा , उसके आंखों के इशारे पर दोनों बाहर निकल गईं…

  कमरे से बाहर निकलते ही रंगोली ने चैन की सांस ली…

” बहुत घबरा गयीं थीं क्या?”

” हाँ फिर? कोई गधा ही होगा जो  ऐसे प्रैंक से नही घबराएगा ?

“मैं नही घबराई थी। मुझे समझ आ गया था ये प्रैंक है जो ज्यादातर मेडिकल कॉलेज होस्टल में किया ही जाता है। पहले सिर्फ बॉयज हॉस्टल में होता था अब गर्ल्स हॉस्टल में भी होने लगा है।”

” ओह्ह ! रियली?”

” यस!बाय द वे मेरा नाम झनक है, मैं तुम्हारी रूम मेट हूँ। “

” पर नीचे गार्ड भैया ने तो कहा कल आएगी रूममेट। “

” शायद कल कोई और भी आएगी। फिर उसके लिए भी बेड डल जाएगा । यहाँ वेल्कम करने का यही तरीका है।

” खतरनाक तरीका है यार। ऐसे हड्डियों वाला कंकाल दिखा कर कौन डराता है भला?”

” यार तू सच इतनी इनोसेंट है?  पागल लड़की वो कंकाल हमें गिफ्ट किया है वृंदा मैम और भूमि मैम ने, वो भी फ्री में।

” मतलब ?”

“मतलब फर्स्ट ईयर में एनाटॉमी पढ़नी पड़ती है ना जिसके लिए बोन सेट चाहिए होता है। वो इन दोनों ने हमें दे दिया।
  हॉस्टल में ऐसे ही होता है, आपके सीनियर्स आपको चुन लेते हैं उसके बाद आपकी जम के रैगिंग भी लेते हैं, अपने असाइनमेंट लिखवातें हैं और वक्त पड़ने पर आपकी मदद भी करतें हैं। मुझे लगता है तुझे कुछ नही पता। चल कोई नही मैं बताती जाऊंगी। तीन फ्लोर में सबसे ऊपर हम जूनीज़ और हमारे नीचे वाले में थर्ड एंड सेकंड ईयर और सबसे नीचे फायनल प्रोफ की मैम लोग रहतीं हैं।
  तीर्थ करना मतलब हमें हर किसी के रूम को नॉक करना है डोर खुलते ही चाइनीज़ लोगों की तरह हमें झुक कर उन्हें विश करना है वो भी तीन बार। फिर अगर सिमी ( सीनियर मैम) हमारा नाम पूछतें हैं तब अपना नाम बताना है और फिर से विश करके निकल जाना है। “

” ओह्ह ! तो ये हैं तीरथ ? “

” हाँ जी! ” किसी को सामने से आते देख झनक फटाफट रंगोली का हाथ पकड़ सामने वाली को झुक कर विश करने लगी। रंगोली भी उसकी देखादेखी वैसे ही कर के खड़ी हो गयी।

  सामने से गुजरती सीनियर ने बड़ी प्यारी सी मुस्कान दी और सीढियां चढ़ कर ऊपर चली गयी…

” कौन थी यार ये। बड़ी मीठी सी थीं? “

रंगोली के सवाल पर झनक मुस्कुरा उठी….

“हमारे कॉलेज की शान हैं ये। इनके जूनीज़ इन्हें ऐश्वर्या रॉय का टाइटल दे चुके हैं। देखा न तूने कितनी ज्यादा खूबसूरत हैं।
   जहाँ से निकल जाएं लोग इन्हें देखते रह जातें हैं। सब कहतें हैं इनके मरीज़ तो इन्हें देख कर ही ठीक हो जाएंगे। थर्ड ईयर में हैं  , इनका नाम है गौरी मैम।

” वाकई बहुत सुंदर हैं। मैं तो खुद उन्हें देख कर खो गयी। ”

” हम्म पढ़ने में भी अच्छी हैं। अगर फायनल ईयर में भी इनका रिज़ल्ट ऐसे ही आया तो हाउस सर्जन शिप पक्की है इनकी। देख लेना फर्स्ट अटेम्प्ट में ही पीजी क्लियर कर लेंगी। चल फटाफट , आगे बढ़े….

  दोनों भागती दौड़ती हर एक के कमरे पर नॉक कर विश करती अपने कमरे में लौट आईं….

” बाकी के हमारे साथ वाले कहाँ हैं? “

” सब आजू बाजू के कमरों में ही हैं। सुबह मिल लेंगे। चल अब फटाफट सोतें हैं, सुबह 7 बजे से एनाटॉमी की क्लास रहेगी। ”

  अपने बेड पर बिछे कंकाल को उठा कर रंगोली ने धीरे से एक तरफ रखा और एक बार गौर से अपने बिस्तर को देख लेट गयी…

” क्या हुआ डर तो नही लग रहा, की जिस बिस्तर पर अब तक कंकाल सोया था वहाँ सोना पड़ रहा है?

रिरियाती सी आवाज़ में नहीं बोल रंगोली ने अपनी चादर सर तक तान ली। अगली सुबह उसका कॉलेज का पहला दिन जो था….

  सुबह सवेरे भागती दौड़ती दोनों एनाटॉमी लैब पहुंच गई। पहला ही दिन था , कोई पढ़ाई लिखाई नही हुई। सभी विद्यार्थी आपस में एक दूसरे का परिचय पाते रहे…
   तभी कहीं पीछे से एक आवाज़ आयी  “गांव वालों तैयार रहना गब्बर की सेना कभी भी हमला बोल सकती है”

  रंगोली ने पीछे मुड़ कर आवाज़ को पहचानने की कोशिश शुरू की ही थी कि धड़धड़ाते हुए दस बारह लड़कों का एक जत्था लैब में घुसता चला आया। आते ही उन्होंने मुख्य दरवाज़े को बंद किया और क्लास के सामने खड़े हो गए।
   झनक ने रंगोली का हाथ खींच उसे नीचे देखने कहा और खुद भी सर झुका कर खड़ी हो गयी…

” थर्ड बटन हो जा रंगोली , यमदूतों की टोली आ गयी है। ये करंट सीनियर्स सर लोग है । हम इन्हें नही देख सकते लेकिन ये लोग अपनी आंखों से ही हमारा एक्स रे स्कैन सब कर लेंगे। “

धीमे से फुसफुसा कर झनक ने रंगोली के कान में कहा और वो दोनों भी बाकियों की तरह थर्ड बटन हो गईं।

  ” ओह हेलो ! क्या नाम है तुम्हारा? सेकंड रो में लेफ्ट से थर्ड ? “

  सब धीरे से इधर उधर देखने लगे। पर झुके सरों में देखना मुश्किल था तभी रंगोली को पीठ पर किसी ने पेन चुभाई और धीमी सी आवाज़ आयी ” तुम्हें ही बुला रहें हैं, जाओ आगे!”

  रंगोली अपनी जगह से थोड़ा आगे बढ़ गयी…

” इन के पीछे वाले सर आप भी आइये। ” उसी पेन वाले लड़के को जिसने रंगोली को आगे भेजा था भी बुला लिया गया। एक एक कर पांच छै लोगों जिनमें झनक भी शामिल थी को चुन कर सीनियर्स अपने साथ बाहर ले गए…

  “चलो बेटा एक एक कर अपना इंट्रो दो। ” सबके अपना परिचय देने के बाद सीनियर्स अपनी मस्ती में चले आये।
  मेडिकल कॉलेज गेट के ठीक बाहर बड़ा सा गार्डन था,वहीं सब ने महफ़िल जमाई थी।  कुछ सीनियर्स किनारे बनी रेलिंग पर पैर लटकाये बैठे थे तो कुछ जूनियर्स के चारों ओर घूम घूम कर उन्हें  घूरते हुए गाने गवा रहे थे…

” अबे सुनो जिसको गाना सुनाना है  तनिक चार कदम यहाँ सामने आ जाओ। “

रंगोली को छोड़ कर बाकी सारे चार कदम पीछे सरक गए, पर रंगोली को चुपचाप अपनी जगह खड़ा देख वही लड़का वापस चार कदम आगे बढ़ गया…

” क्या बात है फुज़े ! पहले ही दिन सेटिंग। जय हो!!
     अब बेटा सामने आ ही गए हो तो हमारी शान में ज़रा कुछ सुना दो !”

” सर गाना सुनाऊं?”

” हाँ बेटा गाना ही अच्छा लगेगा अब मेरे ऊपर निबंध सुनाएगा तो ये लोग तुझे ज़िंदा नही छोड़ेंगे न। चल शुरू हो जा, पर होना मेरे लिए चाहिए…

  कुछ देर सोचने के बाद उसने गाना शुरू कर दिया…

  “नफ़रत से देखना पहले अंदाज प्यार का है ये
   कुछ है आँखों का रिश्ता गुस्सा इकरार का है ये 
   बड़ा प्यारा है तेरा जुल्म , सनम तेरी कसम…
   कितने भी तू कर ले सितम हँस हँस के सहेंगे हम
    ये प्यार ना होगा कम, सनम तेरी कसम…”

” बस बस बेटा , गज़ब खुश कर दिए तुम तो। माहौल बना दिये यार,अब तो एकदम रोमैंटिक मूड बन गया है। अब कुछ यहाँ शादी ब्याह हो जाये बस, पिंक सूट वाली मैडम ज़रा अब आप आगे आइये…

  घबराती हुई रंगोली दो कदम आगे बढ़ गईं….

” यहाँ जो लड़का पसंद आ रहा है उसे आपको शादी के लिए प्रोपोज़ करना है। अगर तुम्हारे कहने पर उसने पलट कर ये कह दिया कि वो तुमसे शादी के लिए तैयार है तो मैं अभिराज सिंह तुम्हारा करंट सीनियर शपथ लेता हूँ कि पूरा साल तुम्हारी रैगिंग नही करूँगा। “

खुशी से रंगोली के चेहरे पर मुस्कान चली आयी… पर उसे झनक ने बताया था कि सीनियर्स के सामने बत्तीसी किसी हाल में मत दिखाना वरना कमीने कहर तोड़ने से बाज नही आएंगे।
  अपनी खुशी अपने अंदर संभालती रंगोली ने हाँ में सर हिला दिया…

” तो वेट किसका है? जस्ट गो एंड प्रोपोज़ योर ड्रीमबॉय!”

काहे का ड्रीमबॉय रंगोली को तो बस ये रोज़ रोज़ के तमाशे से छुटकारे का रास्ता मिल गया था। उसने धीमे से नज़रे उठायी, उनसे ज़रा दूर लड़कों का एक झुंड खड़ा था,वो उसी तरफ तेज़ी से बढ़ गयी।
       ग्रे शर्ट पहने उस लड़के की न रंगोली ने कभी पहले शक्ल देखी थी न उस लड़के ने रंगोंली को देखा था।
   उसे एक झटके से अपनी तरफ घुमा कर जो दिमाग में आया उल्टा पुलटा बोल कर वो वापस भाग गई। उस लड़के ने भी वही जवाब दे दिया था जो रंगोली को चाहिए था, वो वापस भागती सी अपने ग्रुप के पास पहुंच गई…

” आई एम इम्प्रेस्ड डॉक … क्या नाम बताया था अपना?

” सर रंगोली , रंगोली तिवारी !”

“तिवारी जी… ओके गुड लक। आज के लिए बहुत हो गया, अब निकलो सब के सब। वरना फिजियो की पहली क्लास मिस हो जाएगी।
   लीला पांडेय के कहर से बचना मुश्किल ही नही नामुमकिन है।

   सीनियर्स की आज्ञा मिलते ही सारे जूनियर अंदर की तरफ भाग चले।
    वही क्लास जो सुबह रंगोली को बड़ी मनहूस लगी थी , अब सुकून और शांति का ठिकाना लग रही थी।
  क्लास में पहुंचतें ही अपनी बेंच पर बैठते ही उसने राहत की सान्स ली कि अचानक उसे वो पेन वाला लड़का याद आ गया।
   कौन था वो ,जो बेचारा पहले दिन ही मदद के चक्कर में खुद फंस गया।

  उसने अपने पीछे मुड़ कर देखा। कोई एक लड़का नही पीछे बंदरों सी पूरी फौज थी। सीनियर्स के सामने विनम्रता और शिष्टाचार की मूर्ति बने खड़े लड़के अब अपने असली रंग में उन्हीं सीनियर्स को गालियों से नवाज़ते उनके नए नए नाम रख रहें थे…..
    उन्हें  देखती मुस्कुराती रंगोली सामने मुड़ गयी। कल झनक से पूछ लुंगी, सोच रही थी कि झनक उसके पास आकर खड़ी हो गयी…
   चल फिजियोलॉजी लैब में चलना है अब!”

  हां में सर हिलाती रंगोली झनक के साथ बाकी क्लास के पीछे लैब की तरफ बढ़ गयी…..


क्रमशः …..




दिल से…


   मायानगरी का भाग आने में ज़रा देर हो गयी, कारण ये था कि मुझे लगा मालूम नही ये कहानी आप लोगों को पसन्द आएगी भी या नही। क्योंकि अधिकतर प्रेम कहानियों में कॉलेज वाला एंगल कॉमन ही होता है। अगर किसी भी आदरणीय लेखक की किसी कहानी से मेरी कहानी का कोई हिस्सा मिलता सा लगे तो ये एक इत्तेफाक ही है।

  तो कहीं ये भी कॉमन सी न लगे….

  एक और बात आप में से बहुतों को लग रहा ये मेरी कहानी है, तो उसके लिए मैं ये कहना चाहूंगी कि ये मेरी कहानी बिल्कुल भी नही है।
    हां कहानी में कुछ मेरे कॉलेज के वहाँ की पढ़ाई के, रैगिंग , पार्टिस , कलचरल्स के अनुभव शामिल हो सकतें हैं लेकिन कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है।

   कहानी में ढेर सारे किरदार होंगे जिनमें से मुख्य किरदारों के आसपास घूमती कहानी से बाकियों की कहानियां जुड़ती चली जाएंगी। बाकी बातें आप लोगों को आगे के भागों में पढ़ने मिल ही जाएगी।

  मुझे पढ़ते रहने के लिए आप सभी का दिल से आभार व्यक्त करती हूँ।
   हार्दिक धन्यवाद !!!!

aparna …..


   

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