टायफाइड – लक्षण और उपचार

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टायफाइड:—

    टाइफाइड एक बैक्टीरिया से फैलने वाली  ऐसी बीमारी है जो ज्यादातर दूषित पानी और दूषित भोजन के कारण मनुष्य की आंतों में असर कर पूरे शरीर में लक्षणों को उत्पन्न करती है। टाइफाइड मुख्य रूप से एक तरह का ऐसा बुखार है जो कि बैक्टीरिया के संक्रमण से उत्पन्न होता है।
    टाइफाइड की उत्पत्ति में कारक है सालमोनेला टायफिमयूरीयम।
सालमोनेला पैराटायफी भी टाइफाइड की उत्पत्ति में सहयोगी बैक्टीरिया है।

    मुख्य रूप से बाहर के खाने पीने दूषित जल संक्रमित भोज्य पदार्थ आधे पके भोज्य पदार्थ, सड़े और पर्युषित खाने से टाइफाइड की उत्पत्ति होती है। टाइफाइड का बैक्टीरिया मनुष्य की आंत में संक्रमण उत्पन्न कर मुख्य रूप से पेट से संबंधित लक्षणों को उत्पन्न करता है। इंफेक्शन बढ़ने पर मनुष्य में सर्व शरीर गत लक्षणों की उत्पत्ति होती है, जिनमें मुख्य रुप से बुखार आना सिर में दर्द बना रहना सारे शरीर में दर्द बना रहना आदि प्रमुख लक्षण  हैं।

    टाइफाइड का इनक्यूबेशन पीरियड लगभग 1 से 2 सप्ताह है जब की बीमारी की अवस्था तीन से 4 सप्ताह तक बनी रहती है।

    टाइफाइड के लक्षण सामान्यता दवा शुरू करने के बाद 3 से 5 दिन में समाप्त हो जाते हैं कभी-कभी किसी केस में यह लक्षण 2 से 3 सप्ताह तक भी पाए जाते हैं ।
    सही चिकित्सा और पथ्य अपथ्य के अभाव में बहुत बार लक्षणों में जटिलताओं की उत्पत्ति होने के कारण टाइफाइड पलट कर दोबारा हो जाता है। बहुत बार एंटीबायोटिक का कोर्स करना टाइफाइड में जरूरी होता है कोर्स कंप्लीट नहीं करने पर भी टाइफाइड दुबारा पलटकर हो सकता है। टाइफाइड को गंभीर बीमारी माने जाने का मुख्य कारण यही है कि अगर पूरी तरह से बैक्टीरिया का सफाया ना किया जाए तो यह बार-बार होने वाली बीमारी में से एक है जो कि आगे चलकर आंतों को कमजोर कर देता है। इसीलिए टाइफाइड के लिए कहा जाता है कि बीमारी से बचाव अधिक कारगर है। टाइफाइड से बचाव आसान है पानी उबालकर पीना, साफ सफाई रखना और शुद्ध और गर्म भोज्य पदार्थों का सेवन करना हमेशा टाइफाइड से सुरक्षा का कारण बनता है।

  टाइफाइड के लक्षण:–

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बुखार या ज्वर टाइफाईड का सर्वप्रमुख लक्षण है।

-जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता जाता है वैसे-वैसे ही भूख भी धीरे-धीरे कम होती जाती है।

-टाइफाइड से ग्रस्त रोगी को सिर दर्द होता है।

-शरीर में दर्द का बने रहना, वेदना होना।

-ठण्ड तथा कंपकपी  की अनुभूति होना।

– शरीर में सुस्ती एवं आलस्य का अनुभव होना।

-शरीर में कमजोरी का बने रहना।

•- दस्त होना।

•-उल्टी होना।

कब जाने कि रोगी को डॉक्टर के पास जाना चाहिए?

टाइफाइड के रोगी को अगर बुखार लगातार बना हुआ है, सर में दर्द है खाने का मन नहीं करता तो ऐसे में रोगी को बिना देर किए डॉक्टर के पास चले जाना चाहिए । क्योंकि टाइफाइड का इन्फेक्शन बहुत देर तक आंतों में रहने पर आंत्रशोथ की स्थिति उत्पन्न करता है ऐसे में आंतों में घाव बनकर छेद हो जाते हैं यह टाइफाइड की वह गंभीर स्थिति है जिसमें मल त्याग के समय रोगी को कई बार रक्तस्त्राव भी हो सकता है। यह स्थिति आगे चलकर कई विषमताओं को उत्पन्न करती है, इसलिए समय रहते टाइफाइड के रोगी को लक्षणों के नजर आते ही डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

टाइफाइड एक ऐसी बीमारी है जिसमें चिकित्सा से बेहतर बचाव है आइए जानते हैं टाइफाइड के बचाव के उपायों के बारे में:–

खान पान में बदलाव कर:–

हमेशा हल्के और सुपाच्य आहार का सेवन करें।

ताजा और गर्म भोज्य पदार्थ ही सेवन करें

पानी उबालकर पिए अथवा फिल्टर कर अथवा बोतलबंद पानी का या केमिकल युक्त पानी का सेवन करें।

डिब्बाबंद भोज्य पदार्थ, बाहर की खाने-पीने की वस्तुएं, तथा बासी भोजन पदार्थों का सेवन ना करें।

अत्यधिक प्याज लहसुन आदि तेज गंध युक्त भोज्य पदार्थ अधिक मसालेदार अधिक तैलीय चटपटा मिर्च मसालेदार सिरका युक्त भोज्य पदार्थों का त्याग करे।

मांसाहार के सेवन से दूर रहें।

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पचने में भारी और गरिष्ठ सब्जियां और फल जैसे अनानास कटहल आदि का प्रयोग कम करें।

देर से पचने वाले आहार ओं का सेवन कम करें और अत्यधिक पेट भर कर कोई भी चीज ना खाएं

शराब सिगरेट चरस गुटका तंबाकू पान इत्यादि का सेवन न करें।

अन्य सावधानियां:–

भोजन से पहले हमेशा हाथों को गर्म पानी से धोएं।

खाने से पहले फलों और कच्ची सब्जियों को धोकर ही खाएं।

हमेशा साफ पानी का प्रयोग ब्रश करने चेहरे और हाथों को साफ करने तथा सब्जियों फल आदि को धोने के लिए करें।

कैसा भोजन करें:–

टाइफाइड में क्योंकि रोगी के शरीर में डिहाइड्रेशन के कारण बहुत बार कमजोरी पैदा हो जाती है इसलिए उस कमजोरी को दूर करने के लिए उच्च कैलोरी युक्त उच्च कार्बोहाइड्रेट से भरपूर भोजन को सम्मिलित करना चाहिए। इसके साथ ही शरीर में हुई जल धातु की कमी को पूरा करने के लिए तरल वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए। जैसे पतली खिचड़ी, फलों के रस ,सब्जियों के सूप इत्यादि के प्रयोग से रोगी के शरीर से हुई तरल की कमी को पूरा किया जा सकता है। टाइफाइड के रोगी को रोग से उठने के बाद उच्च मात्रा में डेरी प्रोडक्ट दूध दही पनीर अंडे अर्थात उच्च प्रोटीन का भी सेवन करना चाहिए।

  ओमेगा 3 फैटी एसिड से युक्त आहार शरीर में उत्पन्न सूजन को कम करने में सहायक होते हैं। टाइफाइड बुखार से होने वाली हानि को सही करने के लिए सही मात्रा में खनिज इलेक्ट्रोलाइट और ओमेगा 3 फैटी एसिड की भी आवश्यकता होती है।

टायफाइड की चिकित्सा:

   टाइफाइड बुखार की चिकित्सा मुख्य रूप से संक्रमण को रोककर या एंटीबायोटिक दवाओं द्वारा संक्रमण के उपचार को करके की जाती है।
   टाइफाइड संक्रमण को रोकने के लिए दी जाने वाली एंटीबायोटिक दवाइयों के नाम हैं 1)अमाक्सीसिलिन
2)एंपीसिलीन
3)क्लोरेंफेनीकोल
4)ट्राइमेथोप्रिम
5) सल्फेमेथाक्साजोल इत्यादि….

अगर रोगी दवाओं के साथ भोजन करने में समर्थ है तो तरल पदार्थों खिचड़ी फलों का जूस इत्यादि का सेवन दवाओं के साथ करवाना उचित रहता है। किंतु कई अन्य रोगी इस तरह के होते हैं जिनमें उल्टी की समस्या बहुत अधिक होती है ऐसे में वह मुख द्वारा कोई भी दवा लेने में अक्षम होते हैं ऐसे रोगियों को एन एस फ्लूइड पर रखकर इंजेक्टबल दवाओं का प्रयोग किया जाता है बहुत सारे उपद्रव से ग्रस्त टाइफाइड के रोगी में बहुत बार पित्ताशय की थैली सर्जरी करके निकालनी भी पड़ सकती है।

टायफाइड की रोकथाम :–

टाइफाइड से सुरक्षा का सर्वश्रेष्ठ उपाय है स्वच्छता के नियमों का पूर्ण पालन करना।

1) भोजन पकाने हेतु और फलों और सब्जियों को धोने के लिए सदा साफ और बहते जल का प्रयोग करें।

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2) घर पर पानी के जिस बर्तन में पानी को स्टोर किया जाता है हमेशा ढक कर रखें।

3) पीने के पानी को हो सके तो हर मौसम में उबालकर पीएं अथवा कम से कम बारिश के मौसम में उबालकर ही प्रयोग में लाएं ।

4)वाटर फिल्टर का प्रयोग भी किया जा सकता है।

5) भोज्य पदार्थ हमेशा गर्म और तुरंत पकाए हुए ही प्रयोग करें पर्युषित सड़ा गला अधपका खाना ना खाएं।

6) बाहर के भोज्य पदार्थों को चाट के ठेले गली नुक्कड़ के भुज पदार्थों को खाना अवॉइड करें।

7) घर पर पानी के निर्गमन और संधारण का प्रबंध स्वछता पूर्वक करें ।

8)भोजन बनाने वाले बर्तनों की सफाई पर भी उचित

ध्यान रखें।

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9) खाना हमेशा हाथ धोकर खाएं.. शौच के पश्चात घर में बाहर कहीं से आने के पश्चात और भोजन से पूर्व तथा भोजन के पश्चात हमेशा हाथ किसी मेडिकेटेड सॉप से धोना सुनिश्चित करें।

10) समय-समय पर हैंड सैनिटाइजर का प्रयोग भी करें।

11) टाइफाइड के लिए टीका भी उपलब्ध है जो लगभग 2 वर्षों तक प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखता है टीके का प्रयोग करके भी टाइफाइड से बचा जा सकता है।

टायफाइड में घरेलू उपाय:–

कई अन्य ऐसे घरेलू उपाय हैं जिनके प्रयोग से टाइफाइड से बचा जा सकता है यह उपाय निम्न है:–

1) फलों का रस:– मौसमी फलों का जूस निकालकर टाइफाइड के रोगी को दिया जा सकता है संतरा मोसंबी अनार आदि के जूस टाइफाइड में शरीर में होने वाली तरल की हानि को दूर करते हैं।

2) सेब का रस:– सेब के रस में समान मात्रा में अदरक का स्वरस मिलाकर रोगियों को देने से पद्य का कार्य करता है।

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3) तुलसी :– आयुर्वेद के अनुसार तुलसी पत्र स्वरस का प्रयोग भी किया जाता है।

4)लौंग:– आयुर्वेद के अनुसार लौंग का ताजा निर्मित क्वाथ भी टाइफाइड में दिया जाता है। इसमें लगभग 2 गिलास पानी में 4 लौंग डालकर इसे इतना उबालना है कि वह एक चौथाई शेष रह जाए तब  इसका पान करना है।
    सुबह और शाम समान मात्रा में एक कप लौंग का पानी अत्यधिक फायदेमंद है।

5) शहद :– गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद मिलाकर रोगी को दिया जा सकता है।

6 ) लहसन ;– आयुर्वेद मतानुसार 6 से 7 कच्ची लहसुन को कुचलकर लहसुन कल्क बनाकर सेंधा नमक के साथ मिलाकर टाइफाइड के रोगी को बुखार में दें।

7) कुछ आयुर्वेद औषधियां जैसे विषम ज्वरहरलोह ज्वरअंकुश रस ज्वर मुरारी इत्यादि ऐसी औषधियां है जो टाइफाइड के रोगी में बुखार को उतार कर उसके इम्यून सिस्टम को  मजबूत करती हैं।

8) आयुष 64 के कैप्सूल भी दिए जा सकते हैं।

  इस प्रकार सही समय पर टाइफाइड के लक्षणों को पहचान कर अगर रोगी डॉक्टर के पास पहुंच जाता है और उचित दवाओं के साथ पथ्य अपथ्य का भी सेवन करता है तो इस रोग को आसानी से पराजित कर सकता है और स्वास्थ्य लाभ पा सकता है।

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डॉ अपर्णा मिश्रा







सफेद दाग : छूने से नही फैलता!!

सफेद दाग छूने से नही फैलता: शरीर में असामान्य रूप से छोटे बड़े ऐसे दाग जो दिखने में पूरी तरह से सफेद होते हैं इन्हें सफेद दाग कहा जाता है।

सामान्य तौर से सफेद दागों को लोग कुष्ठ की बीमारी समझ लेते हैं लोगों को यह लगता है कि यह छूने से फैलता है। यह सिर्फ एक भ्रांति है ऐसा कुछ नहीं होता।यह एक प्रकार का ऑटोइम्यून डिसऑर्डर है जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण त्वचा के रंगों में परिवर्तन होने लगता है त्वचा में सफेद रंग के चकत्ते पड़ने लगते हैं। शरीर के इम्यून सिस्टम की प्रणाली में बाधा होने से त्वचा में उपस्थित रंग का निर्धारण करने वाला तत्व मेलानोसाइट्स कई जगहों से गायब हो जाता है जिसके कारण उस जगह की त्वचा विवर्ण हो जाती है और त्वचा की रंगत सामान्य की तुलना में सफेद हो जाती है ऐसे चकत्तों पर उपस्थित बालों का रंग भी सफेद हो जाता है इसे सामान्य रूप से विटिलिगो या सफेद दाग कहा जाता है। कई बार लोग इसे कुष्ठ की प्रारंभिक अवस्था समझ कर डर भी जाते हैं लेकिन यह एक सिर्फ भ्रांति है यह कुष्ठ ना होकर सिर्फ एक तरह का त्वचारोग है। यह मुख्य रूप से होठों चेहरे की त्वचा हाथों पैरों से शुरू होता है । बहुत से लोगों में यह हाथों पैरों की त्वचा में होकर रुक जाता है लेकिन कई लोगों में यह पूरे शरीर में फैल जाता है। इसके होने के कारणों का पूरी तरह से पता नहीं होने के कारण ही बहुत बार चिकित्सा में भी असमर्थता मिलती है। कई बार ये जेनेटिकल कारणों से भी होता है। यह रोग छूने से बिल्कुल भी नहीं फैलता है। यह एक प्रकार का चर्म रोग है जिससे शरीर के किसी अंदरूनी हिस्से को कभी कोई नुकसान नहीं पहुंचता है। यूरोपीय देशों में इतना सामान्य रूप से पाया जाता है कि वहां इसे रोग की संज्ञा भी नहीं दी जाती है।

बहुत बार डेढ़ से 2 साल की अवधि में विटिलिगो चिकित्सा से ठीक हो जाता है लेकिन बहुत बार यह ठीक नहीं होता। जैसे जैसे समय बढ़ता जाता है वैसे वैसे इसके ठीक होने की संभावनाएं कम होती जाती हैं। विटिलिगो के मरीज को चिकित्सा के दौरान डॉ अल्ट्रावायलेट रेस से बच के रहने की सलाह देते हैं।
विश्व भर में .5 से 1% की आबादी विटिलिगो से प्रभावित है वही हमारे देश भारत में 8.8% आबादी विटिलिगो से प्रभावित है।
आमतौर पर यह समस्या बचपन में ही शुरू हो जाती है अधिकतर 20 साल से पहले की उम्र में विटिलिगो के लक्षण शुरू हो जाते हैं बहुत कम केसेस में 40 की उम्र में भी लक्षणों की शुरुवात हो सकती है।
आमतौर पर विटिलिगो में मरीज को किसी भी तरह की जलन खुजली या कोई और समस्या नहीं होती इस तरह के त्वचा रोग से ग्रस्त व्यक्ति को सूर्य की किरणों से एलर्जी की समस्या कभी कभार हो सकती है।

कारण :–आमतौर पर देखा जाता है कि अगर माता या पिता किसी को भी विटिलिगो का संक्रमण है तो उनके बच्चों में भी विटिलिगो पाया जा सकता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि माता या पिता के विटिलिगो होने पर बच्चे को होना जरूरी ही हो।

जिन रोगियों में एलोपेसिया की समस्या पाई जाती है उनमें भी आगे चलकर विटिलिगो डिवेलप हो सकता है। कुछ बच्चों में जन्मजात पाए जाने वाले बर्थ मार्क पर भी आगे चलकर सफेद दाग की समस्या जन्म ले लेती है।केमिकल्स के कारण उत्पन्न होने वाले विटिलिगो में सामान्यता एक ही जगह पर अगर कोई वस्तु लगातार प्रयोग की जाती है तो उसके कारण वहां की त्वचा में एक अलग सा श्वेत वर्ण उत्पन्न होता है, जैसे लगातार केमिकल वाले गम युक्त बिंदियों के प्रयोग से माथे की त्वचा पर सफेदी उत्पन्न होना।

कीमोथेरेपी के बाद भी पाया जाता है।

प्लास्टिक फैक्ट्री या केमिकल फेक्ट्री में काम करने वालों में भी पाया जाता है।

संतुलित आहार की कमी से भी बहुत बार शरीर पर कुछ दूर सरवन के चक्के बन जाते हैं यह पूरी तरह से सफेद तो नहीं नजर आते लेकिन फिर भी इन्हें भी एक तरह से त्वचा रोग माना जा सकता है।

कुछ विशेष विटामिंस की कमी से भी सफेद दाग उत्पन्न होता है।

थायराइड के मरीजों में पाया जाता है।

सामान्य रूप से लिवर की कमजोरी के कारण भी श्वेत दाग की समस्या उत्पन्न होती है।

बहुत सी तरह के फंगल इनफेक्शन भी सफेद दाग पैदा करते हैं।

त्वचा बालों हो तो आधी को रंग प्रदान करने वाली मेलानोसाइट्स कोशिका जब अचानक काम करना बंद कर देती है तब मुख्य रूप से श्वेत दाग उत्पन्न होते हैं।

जलने या चोट लगने से।

पाचन तंत्र खराब होने से।

शरीर में कैल्शियम की कमी होना।

बच्चों के पेट में कृमि।

आयुर्वेद में चिकित्सा:– आयुर्वेद के अनुसार रंजक पित्त त्वचा में उपस्थित वर्ण के लिए उत्तरदाई होता है। जब कभी शरीर में रंजक पित्त की कमी हो जाती है, तब विटिलिगो की समस्या उत्पन्न होती है। पित्त वर्धक आहार-विहार का सेवन करने वाले रोगियों में यह समस्या अधिक रूप से पाई जाती है। इसके अलावा विरुद्ध आहार का सेवन जैसे मछली और दूध, घृत और शहद इत्यादि का एक साथ सेवन करना भी हानिकारक होता है। आयुर्वेद में चिकित्सा के लिए पंचकर्म थेरेपी अपनाई जाती है। पंचकर्म द्वारा शरीर का अंतर शोधन और बाह्य शोधन किया जाता है जिससे त्वचा के वर्ण में असमानता को दूर किया जा सकता है। इसके अलावा कई अन्य औषधियां हैं जिनका एकल या संयुक्त प्रयोग विटिलिगो में आराम पहुंचाता है ।

एकल औषधियों में प्रमुख है :–
1) खदिर
2) बाकुची
3) आरगवध
4) दारुहरिद्रा
5) करंज

इसके अलावा संयुक्त मेडिसिन भी दी जाती है जैसे:- 1)गंधक रसायन
2) रस माणिक्य,
3)मंजिष्ठादि काढ़ा,
4)खदिरादि वटी
5) त्रिफला भी काफी असरदार है।

अन्य उपाय :–
1)तांबे के बर्तन में पानी को 8 घण्टे रखने के बाद पीना चाहिए।
2)हरी पत्तेदार सब्जियां, गाजर लौकी, सोयाबीन, दालें ज्यादा खाना चाहिए।
3) पेट में कीड़ा न हो, लीवर दुरुस्त रहे, इसकी जांच कराएं और डॉक्टर की सलाह के मुताबिक दवा लें। 4)एक कटोरी भीगे काले चने और 3 से 4 बादाम हर रोज खाएं।
5) ताजा गिलोय या एलोवेरा जूस पीएं। इससे इम्यूनिटी बढ़ती है।

6)इससे ग्रस्त व्यक्ति को करेले की सब्जी का ज्यादा से ज्यादा सेवन करना चाहिए।
7)साबुन और डिटरजेंट का इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए।
8)फल – अंगूर, अखरोट, खुबानी, खजूर, पपीता।
9)सब्जियां – मूली, गाजर, चुकंदर, मेथी, पालक, प्याज, फलियाँ।
10)अन्य खाद्य पदार्थ – गेहूँ, आलू, देशी घी, लाल मिर्च, चना, गुड़, पिस्ता, बादाम।

घरेलू लेप:–

1) हल्दी और सरसों के तेल को मिलाकर बनाया गया मिश्रण दाग वाली जगह लगाने से दाग कम होने लगता है। इसके लिए आप एक चम्मच हल्दी पाउडर लें। अब इसे दो चम्मच सरसों के तेल में मिलाए। अब इस पेस्ट को सफेद चकतों वाली जगह पर लगाएं और 15 मिनट तक रखने के बाद उस जगह को गुनगुने पानी से धो लें। ऐसा दिन में तीन से चार बार करें। इससे आराम मिलेगा।

2) घोड़वच , पठानी लोध्र और खड़ी मसूर समान भाग में लेकर पीसकर इसका पेस्ट दाग में लगाने पर आराम मिलता है।

3) खड़ा धनिया और खड़ी मसूर का पेस्ट भी लाभप्रद है।

4) नीम पत्ती और शहद भी लाभप्रद हैं।

5)सफेद दाग से ग्रस्त व्यक्ति को रोज बथुआ की सब्जी खानी चाहिए। बथुआ उबाल कर उसके पानी से सफेद दाग वाली जगह को दिन में तीन से चार बार धोयें। कच्चे बथुआ का रस दो कप निकालकर उसमें आधा कप तिल का तेल मिलाकर धीमी आंच पर पकायें जब सिर्फ तेल रह जाये तो उसे उतारकर शीशी में भर लें। इसे लगातार लगाते रहें।

एलोपैथी चिकित्सा :–

सामान्य रूप से एलोपैथी चिकित्सा में विटिलिगो के मरीजों को अगर किसी मल्टी विटामिन की कमी से यह रोग हुआ है तो उस मल्टीविटामिन के सप्लीमेंट दिए जाते हैं इसके अलावा कुछ लिवर टॉनिक और साथ ही स्टेरॉयड का ट्रीटमेंट दिया जाता है।

आयुर्वेद के अनुसार भी सफेद दाग के मरीजों में लीवर कमजोरी की संभावना अधिक रहती है। इसलिए चिकित्सा एलोपैथी हो या आयुर्वेद या होम्योपैथिक अगर रोगी को उसके सारे ट्रीटमेंट के साथ लिवर टॉनिक और मल्टीविटामिंस दिए जाएं तो रोग के जल्दी ठीक होने की अधिक संभावना होती है।

रोग अधिक पुराना करने या बढ़ाने से अच्छा है, समय रहते डॉक्टर के पास जाकर इलाज शुरू करवाना। समय रहते इलाज शुरू हो जाने से रोग के पूरी तरह ठीक होने की पूरी संभावना रहती है।

डॉ अपर्णा मिश्रा

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साबूदाना : स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है या नही?

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  साबूदाना:-



    साबूदाना नाम लेते ही हमारे सामने उपवास से भरे दिन के बाद की सजी हुई थाली नजर आने लगती हैं साबूदाना हमारे हिंदुस्तान का एक बहुत प्रचलित खाद्य पदार्थ है।
     उत्तर भारत हो मध्य भारत हो या महाराष्ट्र उपवास में मुख्य रूप से खाए जाने वाले आहार का हिस्सा है साबूदाना। साबूदाना से तरह-तरह की चीजें बनाई जा सकती हैं चाहे वह साबूदाना की खिचड़ी हो साबूदाना के बड़े हो या खीर ।
यह सारे ही भोज्य पदार्थ पोषकता के मानकों पर खरे उतरते हैं।

   व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में इधर कुछ दिनों से साबूदाने के ऊपर लंबे चौड़े वीडियोज़ रहे हैं कि इन्हें पशुओं की चर्बी से पॉलिश किया जाता है या साबूदाना बनाने में एनिमल फैट प्रयोग किया जाता है तो इन्हें उपवास में प्रयोग में कैसे लाया जाए?

सबसे पहली बात तो यह है कि बिना किसी विश्वसनीय साइट के आप सिर्फ व्हाट्सएप के वीडियोस के आधार पर कोई भी भ्रांति मन में ना पाले यह एक तरह से अफवाहों का अड्डा ही है कोई अफवाह चल गई तो ट्रेंड में आ जाती है और लगातार लगातार उस वीडियो को देखते हुए आप अपने मन में एक धारणा तैयार कर लेते हैं।

  साबूदाना का इतिहास खंगाला जाए तो यह मालूम पड़ता है कि यह हमारे परंपरागत आहार का हिस्सा नहीं था। यह मुख्य रूप से अफ्रीका में होने वाली टैपिओका की प्रजाति है।
    भारतवर्ष में इसे लाने का श्रेय त्रिवेंद्रम के राजा जी को जाता है। कई जगह इतिहास में यह भी वर्णित है कि साबूदाना की खेती सबसे पहले तमिलनाडु में शुरू की गई लेकिन बहुत सी जगह पर इसकी खेती सबसे पहले केरल में किए जाने के सबूत भी मिलते हैं।

साबूदाना पूरी तरह से वानस्पतिक आहार है। वनस्पतियों के रस से बनाया आहार उपवास के लिए पूरी तरह शुद्ध और सात्विक होता है।

  आइए देखते हैं साबूदाना बनता कैसे हैं…

भारतवर्ष में साबूदाना मुख्य रूप से टेपियोका की जड़ से बनाया जाता है सबसे पहले खेती वाली जगह से सारी टेपियोका की जड़ों को एक साथ निकाल लिया जाता है। यह जड़ें निकालते समय कुछ-कुछ मूली की तरह नजर आती हैं। बड़ी-बड़ी मशीनों में इन्हें डाल कर अच्छे से इनकी मिट्टी साफ कर ली जाती है तेज पानी की धार में धुली हुई यह जड़ें मशीन में आगे पहुंचती हैं। जहां पर इन्हें पील कर दिया जाता है, यानी कि इनके ऊपर का छिलका उतार दिया जाता है। छिलका उतारने के बाद एक बार फिर इन जड़ों को तेज पानी की धार से निकाला जाता है जिससे इन में लगी थोड़ी बहुत भी मिट्टी हो तो वह साफ हो जाती है। इसके आगे मशीनों में लगे चौपर से गुजरते हुए टेपियोका कि यह जड़ें छोटे-छोटे टुकड़ों में कट जाती हैं आगे एक बार फिर इन टुकड़ों को क्रश किया जाता है जिससे इन जड़ों का दूध पूरी तरह से निकाला जा सके। टेपियोका की जड़ों से निकाला गया यह दूध फिर सेट होने के लिए रख दिया जाता है।
क्योंकि यह दूध टैपिओका की जड़ से निकाला हुआ स्टॉर्च है कुछ देर तक स्थिर रखने से यह जम जाता है। अच्छी तरह जम जाने के बाद इसे वापस बड़े बड़े टुकड़ों में तोड़ लिया जाता है अब इन बड़े टुकड़ों को बहुत बारीक पीस लिया जाता है। इस पाउडर को वापस मशीनों की सहायता से आगे बढ़ाया जाता है कि यह छोटे-छोटे पारदर्शी गोलों में बदल जाते हैं।

  इस सारी तकनीक के बाद साबूदाना के दाने तैयार हो जाते हैं साबूदाना की यह मोती जैसे दाने मुख्य रूप से 2 तरह की साइज में उपलब्ध होते हैं।
    अब बाजार में तो वही बिकता है जो दिखता है इसीलिए साबूदाना के इन दानों को पॉलिश कर लिया जाता है। इस तरह यह साबूदाना के दाने आप की प्लेट में आने के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं। आइए अब देखते हैं कि साबूदाने की न्यूट्रीशनल वैल्यू क्या होती है?

  साबूदाना मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट का सोर्स माना जाता है। कार्बोहाइड्रेट के अलावा कैलशियम पोटैशियम और अन्य मिनरल्स और खनिज भी इसमें पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं।

  उपवास में क्यों है ये मुख्य आहार:-

साबूदाना उपवास का सर्वप्रमुख आहार है इसका मुख्य कारण साबूदाने का कार्बोहाइड्रेट रिच होना ही माना जाता है। जब पूरा दिन उपवास करने के बाद शरीर की शक्ति कम होने लगती है तब हमारे शरीर को कार्बोहाइड्रेट से मिलने वाली ऊर्जा की आवश्यकता होती है। पूरा दिन उपवास करने के बाद  अनाज नहीं लेना चाहिए और सिर्फ फलाहार करना चाहे तब ऐसे में साबूदाना सबसे अच्छा ऑप्शन माना जाता है। साबूदाना को अनाज में नहीं गिना जाता लेकिन बावजूद उसमें काफी मात्रा में कार्बोहाइड्रेट पाए जाते हैं जो उपवास से होने वाली थकान और ऊर्जा की क्षति को पूरा कर देते हैं।

वजन बढ़ाने में सहायक :– साबूदाना में पाए जाने वाला फैट और कार्बोहाइड्रेट दुबलेपन से ग्रस्त लोगों में वजन बढ़ाने के लिए उपयोग में लाया जाता है।  इसीलिए काफी समय पहले टीबी सेनेटोरियम में साबूदाने की खीर सभी मरीजों को आवश्यक रूप से बांटी जाती थी इसका मुख्य उद्देश्य टीबी के मरीजों में वजन को बढ़ाना ही होता था।

हड्डियों के लिए लाभदायक:-  साबूदाना में पाए जाने वाले पोषक तत्व हमारे शरीर की हड्डियों के वर्धन में सहायक हैं । साबूदाना में कैल्शियम आयरन और मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। साबूदाना में पाए जाने वाला कैल्शियम जहां हड्डियों के वर्धन और विकास के लिए सहायता करता है । वही इस में उपस्थित आयरन ऑस्टियोपोरोसिस को रोकने में भी सहायक होता है ।  इसके साथ ही साबूदाना में पाए जाने वाला मैग्नीशियम आज समय में होने वाले हड्डियों के रोगों से भी लड़ने में सहायक होता है । यह हड्डियों को मजबूत बनाता है और फिट रखता है।

ऊर्जा देने में सहायक:– साबूदाने में उपस्थित कार्बोहाइड्रेट आपके शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है अगर आप किसी काम से थके हुए हैं और आपके शरीर का एनर्जी लेवल नीचे गिरा हुआ है, तब ऐसे में साबूदाने का सेवन आपके एनर्जी लेवल को सुधार कर आपको तुरंत ताकत और बल प्रदान करता है।

मेटाबोलिज्म के संतुलन में सहायक :-   गर्मी के दिनों में जब हमारे शरीर को ग्लाइकोजन की अतिरिक्त आवश्यकता होती है उस समय साबूदाने में उपस्थित कार्बोहाइड्रेट और फैट ग्लूकोस में बदलकर हमारे शरीर को तुरंत शक्ति प्रदान करता है और शरीर में उपस्थित गर्मी को दूर करता है इसीलिए ताप से जुड़ी बीमारियों में भी साबूदाने को खीर के रूप में या पानी के साथ उबालकर रोगियों को दिया जाता है।

उच्च रक्तचाप में साबूदाना:–   साबूदाना में पोटैशियम और फास्फोरस प्रचुर मात्रा में पाया जाता है इसके कारण यह शरीर में बढ़ने वाले उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायता करता है साबूदाना में सोडियम की मात्रा काफी कम पाई जाती है जिसके कारण इसके सेवन से रक्तचाप बढ़ने की समस्या नहीं होती इसके अलावा इसमें पाए जाने वाले फास्फोरस और पोटेशियम के कारण बढ़ा हुआ रक्तचाप कम होता है तथा उच्च रक्तचाप के मरीजों के लिए यह एक उचित नाश्ते का विकल्प माना जाता है।

रक्ताल्पता में इसका प्रयोग:– शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी को एनीमिया माना जाता है। एनीमिया से ग्रस्त रोगी को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। साबूदाना में उपस्थित आयरन लाल रक्त कणिकाओं की वृद्धि कर खून की कमी को दूर करता है। शोध द्वारा यह मालूम चला है कि साबूदाने में बहुत अधिक मात्रा में आयरन नहीं पाया जाता इसलिए एनीमिया के लिए सिर्फ साबूदाने का सेवन पर्याप्त नहीं है , साबूदाने के साथ ही अन्य आयरन युक्त आहार अधिक लाभप्रद माना जाता है।


मस्तिष्क के लिए उपयोगी:- साबूदाना में प्राकृतिक रूप से फॉलिक एसिड भी पाया जाता है। इसमें पाए जाने वाला फॉलिक एसिड शारीरिक रोगों के साथ-साथ मानसिक रोगों में भी लाभप्रद है मस्तिष्क में उत्पन्न विकारों में साबूदाना एक उचित आहार होता है।


रक्त परिसंचरण में लाभप्रद:– साबूदाना में पाए जाने वाला आयरन और फोलिक एसिड रक्त धमनियों में जाकर रक्त के परिसंचरण को सुगम बनाता है।
   

अतिसार में लाभदायक :– किसी कारण से दस्त हो जाने या अतिसार में भी बिना दूध के पकाया हुआ साबूदाना बहुत लाभप्रद होता है।

गर्भावस्था में :- गर्भावस्था में गर्भ में पल रहे शिशु के पर्याप्त पोषण हेतु भी साबूदाना उपयुक्त आहार माना जाता है। साबूदाना में लौह और खनिज तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जातें हैं जो शरीर की बढ़त के लिए अति आवश्यक हैं।

   इसके अलावा साबूदाना का फेस पैक त्वचा में कसाव लाकर त्वचा को चमकदार बनाने में भी सहायक होता है।

   साबूदाना के इतने सारे लाभ जान कर अब आप भी इसे अपने रोजाना के आहार का हिस्सा बना सकतें हैं।  ये एक उच्च ऊर्जायुक्त सुपाच्य आहार है जिसके फायदे अनेक हैं।

  डॉ अपर्णा मिश्रा

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माइग्रेन लक्षण और उपचार


   कुछ दिनों से जया ने महसूस किया कि उसे तेज धूप से वापस आते हैं सर में एक तरफ दर्द का अनुभव होता है इसके अलावा बहुत बार तेज चलता टीवी भी उसके दर्द को बढ़ा देता है कई बार वह इतनी विचलित हो जाती है कि टीवी का रिमोट उठाकर टीवी म्यूट ही कर देती है…..आखिर जब उसकी सिर दर्द की समस्या बढ़ती गई और उसकी खीझ और झुंझलाहट बढ़ती ही गयी  तब उसने डॉक्टर से सलाह लेना मुनासिब समझा और डॉक्टर से मिलने के बाद उसे मालूम चला कि ये रोज़ रोज़ का उठने वाला दर्द माइग्रेन है…..

   माइग्रेन आज के समय में पाई जाने वाली एक ऐसी समस्या जिससे परेशान होने वाला इंसान ही उसकी तकलीफ समझ सकता है ।
    माइग्रेन एक ऐसा दर्द है जो सिर के आधे हिस्से में अमूमन पाया जाता है, लेकिन बहुत बार अपनी क्रिटिकल कंडीशन में यह पूरे सिर को भी अपने कब्जे में कर लेता है। माइग्रेन को बहुत जगह अधकपारी भी कहा जाता है।
      माइग्रेन एक तरह का हल्का अथवा कष्टदायक सिर का ऐसा दर्द है जिस में झनझनाहट वाला तेज दर्द रोगी को महसूस होता है, बहुत बार सिर के दर्द के साथ मतली उलटी आदि के लक्षण भी पाए जाते हैं। इसके साथ ही रोगी प्रकाश अथवा ध्वनि के प्रति भी अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है। तेज सूर्य की रोशनी अथवा तेज बजती हुई ध्वनियां सिर के दर्द को प्रभावित करती हैं ऐसे समय में किसी अंधेरे कमरे में शांति से लेटना या सोना आश्चर्यजनक रूप से सर के दर्द को कम कर देता है आइए जानते हैं माइग्रेन है क्या?
    इसके कारण लक्षण उपचार और  रोकथाम आदी।

माइग्रेन का दर्द एक ऐसा  दर्द है जो आपके जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है, यह आपके सामान्य दैनिक गतिविधियों को करने से आपको रोकता है। अक्सर यह दर्द लोगों को कुछ घंटों से लेकर कई दिनों तक बना रहता है ।
माइग्रेन का दर्द ऐसा दर्द है, जो बहुत बार एक periodic session  में यानी कुछ कुछ समय अंतराल के बाद आता है , और कई बार non-periodic भी होता है.. यानी बिना किसी तय समय के भी रोगी इससे व्यथित हो सकता है। माइग्रेन का दर्द सामान्यता 4 घंटों से तीन-चार दिन तक भी लगातार बना रह सकता है लेकिन यह बढ़ती अवधि व्याधि को बढ़ा  जाती है, और रोगी को बहुत ज्यादा तकलीफ में डाल देती है ।

माइग्रेन के मुख्य लक्षण:-
      आमतौर पर माइग्रेन का सबसे पहला और सर्व प्रमुख लक्षण सिर के एक और तीव्र शूल का होना है। सिर में किसी एक तरफ दाहिने या बाई और पूरे आधे हिस्से में अनियंत्रित और कष्टदायक दर्द होता है। कई बार यह सिर को पूरी तरह भी कवर करके हो सकता है। यह दर्द अमूमन झनझनाहट वाला होता है जो सिर को हिलाने से या सिर में हलचल उत्पन्न करने से बढ़ जाता है।
    आयुर्वेद में इसे अर्धावभेदक की भी संज्ञा दी गयी है।

माइग्रेन की कुछ अतिरिक्त लक्षण है मतली का होना उल्टी होना, ध्वनि तथा प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता होना। कुछ अन्य लक्षणों में है शरीर में और चेहरे पर पसीने का आना , मन में व्यग्रता का उत्पन्न होना, गर्म और ठंडा पता चलना।  कई बार माइग्रेन के लक्षण में पेट में दर्द भी होता है और जिसके बाद दस्त का भी अनुभव हो सकता है।
   हमारे देश में लगभग 5 में से 1 महिला तथा 15 में से एक पुरुष माइग्रेन के दर्द से पीड़ित होते हैं। माइग्रेन के लक्षण कई तरह के हो सकते हैं:-
पूर्वाभास युक्त माइग्रेन
पूर्वाभास रहित माइग्रेन
सिरदर्द रहित माइग्रेन के लक्षण और
सतत माइग्रेन के लक्षण…

बहुत बार रोगी इस बात को नहीं समझ पाते कि उन्हें डॉक्टर के पास कब जाना चाहिए अमूमन सर के दर्द में किसी भी तरह का पेन किलर खा कर व्यक्ति अपना काम चला लेते हैं लेकिन इस तरह खाए जाने वाले पेन किलर के लेने के भी कुछ तरीके होते हैं।

     किसी भी तरह का पेन किलर 1 महीने में 10 दिन से ज्यादा की अवधि में नहीं लिया जाना चाहिए।
इससे ज्यादा लेने पर यह आपके लीवर और फिर किडनी पर बुरा प्रभाव डाल सकता है।

     माइग्रेन के दर्द के साथ अगर आपको एक अथवा दोनों बाजू में झनझनाहट महसूस हो, दोनों में से किसी भी एक हाथ को उठाने में तकलीफ हो, चेहरे पर एक और लकवे के लक्षण दिखाई दें, आपकी जबान लड़खड़ाए अथवा स्पष्ट बोली ना निकले ,आंखों के आगे अंधेरा छाने लगे, आंखों में दोहरी दृष्टि दिखाई दे, सिर दर्द के साथ तेज बुखार आए या गर्दन में अकड़न हो, मन में तेज व्याकुलता हो, दौरा पड़े तो ऐसी सारी कंडीशन में आपको तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। यह लक्षण सिर्फ माइग्रेन के नहीं माइग्रेन के साथ जुड़े मेनिनजाइटिस या स्ट्रोक के हो सकते हैं ऐसे लक्षणों को नकारना सही नहीं है यह लक्षण भविष्य में व्याधि की तीव्रता की ओर संकेत करते हैं।

आईये जानते हैं माइग्रेन होने के कारणों के बारे में:–

कारण:–
        1 ) — वैसे माइग्रेन के उत्पन्न होने के कारण पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है, कहा जा सकता है कि कारण अस्पष्ट हैं, परंतु जो मुख्य रूप से कारण समझ में आते हैं वह है मस्तिष्क में पाए जाने वाले रसायन वहां की नाड़ियों और रक्त कोशिकाओं में पाए जाने वाले कुछ परिवर्तन ही माइग्रेन के दर्द के कारण होते हैं।
    
   2) — इसके अलावा कुछ एक लोगों में वंशानुगत कारण भी देखे गए हैं ।
  
    3)–कुछ महिलाओं में माहवारी के पहले एस्ट्रोजन लेवल में बदलाव के कारण भी माइग्रेन का दर्द उत्पन्न होता है।

  4)–  इसके अलावा मानसिक तनाव

     5)–शारीरिक थकावट और

     6) —कुछ विशिष्ट प्रकार के आहार विहार पेय आदि भी माइग्रेन के दर्द का कारण बनते हैं।

पूर्वाभास युक्तलक्षण:–‘
               पूर्वाभास युक्त इस माइग्रेन के लक्षणों में सर्व प्रमुख लक्षण है दृष्टि संबंधी लक्षण, इसमें माइग्रेन का दर्द शुरू होने के पहले आंखों के सामने टिमटिमाते प्रकाश जैसी रेखाएं नजर आती हैं, कई बार कुछ टेढ़ी-मेढ़ी पैटर्न या फिर बिंदु दिखाई देते हैं।
   इसके अलावा चेहरे होठों और जीभ में सुई चुभने जैसी सिहरन महसूस होती है इन लक्षणों के साथ चक्कर का आना शरीर का बैलेंस बिगड़ना, बोलने में कठिनाई होना तथा कई बार बेहोशी छा जाना भी पूर्वाभास युक्त माइग्रेन के लक्षण है।

पूर्वाभास रहित माइग्रेन:-
       इस प्रकार में माइग्रेन के लक्षण अचानक ही उत्पन्न होते हैं तेज प्रकाश में बाहर निकलने पर अथवा तेज ध्वनि सुनने पर इस तरह के लक्षण अपने आप बिना किसी पूर्वाभास के पैदा हो जातें हैं।

बिना लक्षणों का माइग्रेन :–
        बिना लक्षणों के माइग्रेन में बहुत बार सर में दर्द ना होने के बावजूद मतली या उल्टी होना तथा ध्वनि अथवा प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता होना जैसे लक्षण लिखे जाते हैं इनमें माइग्रेन का मुख्य लक्षण अर्थात सिर में दर्द होना नहीं पाया जाता।

सतत लक्षण:–
     इसमें व्यक्ति माइग्रेन के सारे लक्षणों से सतत बने रहने के कारण हमेशा तकलीफ की अवस्था महसूस करता है इसमें माइग्रेन के लक्षण तीन चार घंटों से लेकर तीन चार दिनों तक व्यक्ति में पाए जाते हैं तथा हफ्ते में दो से तीन बार माइग्रेन का अटैक व्यक्ति को झेलना पड़ता है इसलिए यह एक कष्टदायक स्थिति निर्मित हो जाती है।

माइग्रेन प्रेरक:-
      कुछ ऐसे कारण जिनसे माइग्रेन का दर्द उभरता है निम्नानुसार है:–
1) हार्मोनल — सामान्यता महिलाओं में माहवारी के पहले एस्ट्रोजन हार्मोन के स्तर में बदलाव के कारण इस समय पर माइग्रेन का अटैक महसूस किया जाता है यह सामान्यतः महावारी के 2 दिन पूर्व से 3 दिन बाद तक होता है कई महिलाओं में मेनोपॉज के बाद इस तरह का माइग्रेन का दर्द स्वत ही समाप्त हो जाता है।

2) भावनात्मक– मानसिक तनाव उत्सुकता अत्यधिक स्ट्रेस या टेंशन मानसिक आघात उत्तेजना आदि कारण भावनात्मक ट्रिगर का कार्य करते हैं।

3) शारीरिक:– शरीर का आवश्यकता से अधिक कार्य करना शरीर की मांसपेशियों में थकान , नींद की कमी, शिफ्ट ड्यूटी के कारण नींद के समय में परिवर्तन होते रहना,  गलत मुद्राओं में बैठना- लेटना आदि, गर्दन तथा कंधों में होने वाला खिंचाव, लंबे विदेशी सफर के कारण उत्पन्न होने वाला जेट लेग।
   क्षमता से अधिक किया कठोर व्यायाम तथा शरीर में रक्त शर्करा की कमी अर्थात हाइपोग्लाइसीमिया की कंडीशन यह सारे कुछ शारीरिक कारण हैं जिनके कारण माइग्रेन का दर्द अनुभव होता है।

4)आहार– अनियमित और अपथ्य आहार का सेवन डिहाइड्रेशन अत्यधिक मदिरापान खाद्य योजना इरिन,  कैफीन का अत्यधिक प्रयोग चॉकलेट खट्टे फल पनीर इत्यादि के प्रयोग से भी बहुत सी महिलाओं और पुरुषों में माइग्रेन का दर्द उभरता है। हालांकि कई मायनो में डार्क चॉकलेट का सेवन बहुत बार माइग्रेन के रोगियों को आराम भी पहुंचाता है।

पर्यावरण:- व्यक्ति के आसपास का माहौल उसका पर्यावरण भी बहुत बार माइग्रेन के लक्षणों के तीव्रता और कमी का कारक होता है। अत्यधिक तेज प्रकाश अथवा गर्मी तेज ध्वनि कंप्यूटर स्क्रीन से निकलती टिमटिमाती रोशनी आसपास धूम्रपान के धुएं का होना अत्यधिक शोर का होना , तेज या तीखी गंध से भरा माहौल, बहुत घुटन भरा वातावरण जहां ऑक्सीजन की कमी हो ऐसे सब इस प्रकार के  कारक माइग्रेन के दर्द को बढ़ाते हैं।

औषधियां:– व्यक्ति द्वारा प्रयोग की जाने वाली नींद की गोलियां संयुक्त गर्भनिरोधक गोलियां अथवा हार्मोनल प्रतिस्थापन औषधियां यह कुछ इस तरह की औषधियां हैं जो माइग्रेन के दर्द को समय-समय पर बढ़ाती  रहती हैं।

निदान:–
     माइग्रेन के रोगी में माइग्रेन के कारण का सही प्रकार से पता लगाकर लक्षणों का उपचार किया जाए तो माइग्रेन को सही किया जा सकता है।
      वैसे माइग्रेन का कोई भी उपचार नहीं है सिर्फ माइग्रेन के लक्षणों को औषधियों और आहार-विहार के माध्यम से कम किया जा सकता है, अगर व्यक्ति उचित दिनचर्या के साथ पथ्य का पालन करें तो माइग्रेन से बहुत हद तक आराम मिल सकता है। अधिकतर डॉक्टर माइग्रेन के ट्रीटमेंट के लिए रोगी को एक माइग्रेन डायरी मेंटेन करने की सलाह देते हैं इसमें रोगी को एक डायरी बनाकर अपने दर्द  के कारण उनके लक्षण उनके समय को एक चार्ट में बनाना चाहिए।
   
     माइग्रेन डायरी में लिखी जाने वाली मुख्य बातें हैं।     

–तिथि,
–माइग्रेन के दर्द उठने का समय,
–माइग्रेन का दर्द जिस वक्त आरंभ हुआ उस समय रोगी क्या कर रहा था ?
–माइग्रेन का दर्द कितने समय तक महसूस किया गया?
— इस दर्द की अवधि में अनुभव के अन्य लक्षण क्या थे?
–और औषधि के प्रयोग से कितनी देर में माइग्रेन का दर्द शांत हुआ?
    
      माइग्रेन डायरी के नाम से जाने जाने वाली यह चिकित्सा पद्धति माइग्रेन के रोगियों में औषधियों के प्रयोग में चमत्कारी सफलता दिलवा रही है किसी भी तरह का कि दर्द निवारक औषधि प्रत्येक माह 10 दिन से अधिक नहीं दी जानी चाहिए।

उपचार :–
   माइग्रेन में मुख्य रूप से लाक्षणिक चिकित्सा की जाती है इसमें मुख्यता दर्द निवारक औषधियों का प्रयोग किया जाता है दर्द निवारक औषधियों में।  

  1) पैरासिटामोल
   2)एस्पिरिन या
   3)आइबूप्रोफेन

का प्रयोग किया जाता है।
    सामान्य दर्द निवारक औषधियों से यदि मरीज को आराम नहीं होता तब उसे टिपटोस  दिया जाता है टिपटोस औषधि सेवन के साथ कुछ एक उसके साइड इफेक्ट्स जुड़े हुए हैं जो रोगी दवा लेने के साथ ही महसूस कर सकता है टिपटोस के प्रयोग के साथ शरीर में गर्मी लगना, त्वचा में कसाव आना, झनझनाहट होना, चेहरे का तमतमाना तथा मांस पेशियों में भारीपन का अनुभव होता है ।
टिपटोस के अलावा दी जाने वाली दवाई एंटी सिकनेस टेबलेट होती हैं यह एक तरह से मितली या उल्टी को रोकने वाली दवाइयां होती हैं इन्हें एंटीमेटिक ड्रग कहा जाता है।
     दवाइयां गोली इंजेक्शन तथा नेजल स्प्रे इन तीनों रूपों में पाई जाती हैं।

दर्द निवारक औषधियों के अलावा एक्यूपंचर भी एक टेक्निक है, जिसके द्वारा कई चिकित्सक माइग्रेन के लक्षणों की चिकित्सा करते हैं ।
         NICE द्वारा एक्यूपंक्चर की विधि को भी माइग्रेन के उपचार के लिए प्रस्तावित किया गया है…. इसमें 5 से 8 सप्ताह तक 10– 10 के सत्र में एक्यूपंक्चर द्वारा बिना किसी औषधि के प्रयोग से माइग्रेन का इलाज किया जाता है।

ट्रांसक्रेनियल मैग्नेटिक स्टिमुलेशन इस पद्धति को टीएमएस भी कहा जाता है….NICE  के द्वारा प्रस्तावित इस पद्धति में मुख्यतः  माइग्रेन के रोगियों में माथे पर सिर के दोनों तरफ मैग्नेटिक बेल्ट लगाकर ट्रांसक्रेनियल मैग्नेटिक स्टिमुलेशन दिया जाता है जिससे पूरी तरह अथवा जड़ से तो नहीं लेकिन माइग्रेन के लक्षणों में बहुत राहत अनुभव करते हैं सीएमएस की यह विधि गर्भवती माताओं और शिशु वती माताओं जो कि अभी बच्चों को दूध पिलाते हैं मैं नहीं प्रयोग की जाती।

आयुर्वेद उपचार:-
      आयुर्वेद में माइग्रेन के उपचार के लिए औषधियों और कुछ टॉनिक के साथ पंचकर्म चिकित्सा पद्धति का भी वर्णन है।
    प्रयोग की जाने वाली औषधियों में प्रमुख हैं:–
  1) शिर:शूलादिवज्र रस
   2) पथ्यादी काढा
    3) मान्स्यादी क्वाथ
    4) ब्राम्हि रसायन।
   5) शंखपुष्पी आसव
    6) मधुकारिश्ट
    7) पथ्यादी मोदक आदी

इसके अलावा पंचकर्म में:–

  1) अणु तैल नस्य
  2) तक्र धारा
   3) दुग्धधारा
   4) तृफला से शिरो धारा।

उपचार किसी भी पद्धति से किया जाए माइग्रेन के रोगियों के लिए उपचार के दौरान यह अवश्य करना है कि उन्हें अंधेरे कमरे में कुछ देर आराम करने दिया जाए पथ्य आहार के सेवन के साथ अपथ्य को त्यागकर कर अगर वह कुछ देर के लिए अंधेरे कमरे में लेटे आंख बंद करके तो उन्हे माइग्रेन के लक्षण में आराम मिलता है। कई ऐसी ऐसी औषधियां हैं जिन्हें उचित मात्रा में ही प्रयोग किया जाना चाहिए जैसे एस्पिरिन 16 वर्ष से कम उम्र के बालकों में नहीं प्रयोग की जा सकती ।
   इसी तरह पेरासिटामोल को भी बहुत अधिक मात्रा में प्रयोग करने से लीवर पर उसका असर पड़ता है आइबूप्रोफेन के साथ भी यही बात है। इसलिए माइग्रेन के शुरुआती लक्षण में बहुत हल्के दर्द निवारक जैसे पेरासिटामोल से ही रोगियों के लक्षणों के इलाज की शुरुआत करते हैं…

  माइग्रेन एक ऐसी तकलीफ है जो आपकी रोजमर्रा के जीवन को बुरी तरह से प्रभावित कर जाती है। इसलिए आवश्यक है कि इसके शुरुआती लक्षणों में ही इसे पहचान कर इसके कारणों और लक्षणों का समुचित उपाय किया जाए तथा माइग्रेन से मुक्ति पाई जाए।अपर्णा