दहकते पलाश …

कुछ मोहब्बतें वक्त की मोहताज नही होतीं…

दहकते पलाश

बालकनी के ग्लास डोर के पास रखे कैनवास पर जंगलों में बेतरतीब दहकते पलाश उकेरते हुए माया इतनी मगन हो गयी थी कि सरु की लायी हुई दुसरी कॉफ़ी भी रखे रखे ठंडी हो गयी।

उसके टोकने पर जब ध्यान गया तब उसे एक और कॉफ़ी लाने बोल बाहर बालकनी में आकर खड़ी हो गयी, वही महीना, वही फ़ाग, वही सिन्दूरी पलाश … उसका कितना कुछ जुड़ा था इन सब से, और वैसे सोचा जाये तो कुछ भी नही जुड़ा था, बस कशिश का आसमान था और शिद्दत सी ज़मीन, पर किस्मत थी कि ना आस्माँ मिला ना ज़मीं ।।

उसे सब कुछ ऐसे याद है जैसे सब कल की ही बात हो, लगता ही नही कि पन्द्रह साल बीत गये उस होली को।
आज भी उस दिन की एक एक बात याद थी, सारा कुछ जैसे अब भी आंखों के सामने एक फिल्म की तरह चल रहा हो…..

कितनी चहल पहल होती थी उन दिनों उस मोहल्ले में। उसकी उम्र के ढ़ेर सारे बच्चे इधर उधर तूफान मचाए घूमते थे, और वो था इन सब का सरगना।
जाने कहाँ से ढूँढ ढूँढ के शरारतें लाता था, सारा मोहल्ला उसका सताया हुआ था,कभी किसी की छत पर सूखने वाले पापड़ चकनाचूर कर जाता, कभी किसी की पानी की टंकी में रंग घोल जाता, इन्हीं सारे बेमतलब के कामों में दिल लगता उसका, पढ़ाई लिखाई से दूर, अपने और अपनी मस्तियों में मगन ।
उसकी पक्की सहेली का भाई ना होता तो कभी उसका चेहरा तक ना देखती, पर ऐसा सोचना आसान था करना कठिन, क्योंकि उस निर्मोही को एक नज़र देखने के बाद कोई बिरला ही होगा जो उसका लुभावना चेहरा भूल सके, गोरे रंग पे काली बड़ी बड़ी आँखें और उनसे टक्कर लेता चौड़ा माथा, उसके लिये अक्सर माया की दादी कहा करती _” जे मिसराईन के घर कोई यक्ष गन्धर्व पैदा हुआ है, तभी हम मानुसों से नही निभे है इस खर्राट की। कितना हडकंप मचाए रखता है पर जे के लाने कितना भी गुस्सा हो मन में, इसकी मुस्कान देख सब उड़ जाती है बहुरिया।।
अगर कुछ पढ लिख जाये, नौकरी पा जाये तो कल अपनी माया के लिये हाथ पसार कर मिसराईन से इस छोरे को मांग लूंगी।”

” आप भी अम्मा, सुबह सुबह कलेस मचाई रहती हो, लक्षण देखें है रावण है पूरा, और फिर माया भी तो…..

माया की माँ ने तो बात वही खत्म कर दी पर उसके मन में कोई बीज जम ही गया था, जो होली के दिन खाद पानी पाकर बेल सा लहलहाने लगा था।।

सभी रंग गुलाल में डूबे थे, बस वही साफ सुथरी अपनी छत पर खड़ी मोहल्ले की भीड़ भाड़ देख देख कर हँस रही थी, तभी नीचे उसकी सहेलियों का झुंड गुज़रा और सब उससे नीचे आने का आग्रह करने लगे, सब की बात और थी पर उन सभी में उसकी पक्की सहेली रोली भी थी, उसकी बात काटना माया के लिये कठिन था, अपनी सोच में डूबी माया को उसकी दादी ने समझा बुझा कर नीचे भेज ही दिया था।
सारी सखियाँ माथे पर टीका लगा के उससे गले मिल रही थी कि किसी के मज़बूत हाथों ने उसे पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया, और उसका पूरा चेहरा गुलाल से भर दिया।
वो अबीर था!! जिसके कुँवारे हाथों ने माया के गालों पर जाने कितने दहकते पलाश खिला दिये थे।
उसके कानों में चुपके से “हैप्पी होली” बोल वो एक बार फिर अपनी टोली में मगन हो गया था।।

वो होली बीत गयी पर उसके लिये छोड़ गयी थी ढ़ेर सारे एहसास, जिन्हें वो चाह कर भी किसी से साझा नही कर सकती थी।
उसे हमेशा से खुद पर और अपनी किस्मत पर तरस आता था, पर अब एक नाराज़गी थी क्यों भगवान ने उसकी किस्मत ऐसी काली स्याही से लिख दी थी जिसे वो चाह कर भी मिटा नही पा रही थी।
उसके दादा और उनके बचपन के दोस्त का अपनी बचपन की दोस्ती को पक्का करने का निर्णय उसकी जीवन नैय्या डूबा गया था, सिर्फ सात बरस की तो थी जब मृत्यशैय्या पर लेटे उसके दादा ने अपनी आखिरी इच्छा के तौर पर अपने दोस्त के पोते से उसके फेरे फिरवा दिये थे, उस समय बाल विवाह होना बन्द हो चुका था पर अक्षय तृतीया के ही दिन उसके घर वालों ने उसे भी गड्डे गुडियों सा ब्याह दिया था, उसके विवाह को एक माह भी नही बीता की उसके दादा जी सिधार गये पर घर वालों के मन में एक संतुष्टी छोड़ गये थे अपनी अन्तिम इच्छा पूरी कर पाने की।

उसके ब्याह को दो साल हुआ ही था कि, किसी बीमारी की चपेट में आकर उसका पति भी नही रहा और ना रहे उसके दादा ससुर।
नौ साल की उम्र में जब उसे शादी और ससुराल का मतलब तक पता नही था, सुहागन का मतलब पता नही था, वो विधवा हो चुकी थी।।
माँ और दादी उसे गले से लगाये बिलखती रहीं, और कुछ देर सहने के बाद कसमसा कर उसने खुद को उनसे छुड़ाया और खेलने बाहर भाग गयी।।

धीरे धीरे समय के साथ उसे अपनी काली किस्मत का लेखा जोखा समझ आने लगा था, और जैसे ही उसने अपनी किस्मत से समझौता करने की सोची अबीर किसी खुशबूदार हवा के झोंके सा उसके जीवन की नीरस बगिया में फूल खिलाने धंसता चला आया था।

उस होली के बाद अबीर के एग्ज़ाम्स हुए और आगे की पढ़ाई के लिये वो बाहर चला गया था, वो शाम भी वो कैसे भूल सकती थी, रोली से उसे पता चल ही चुका था कि उसके अबीर भैया कोटा जा रहें हैं पढ़ने, उसके निकलने के समय पर वो चुपके से अपनी छत पर जा खड़ी हुई थी, उसे एक बार पूरी नज़र देखने के लिये!!
अपना सारा सामान कार की डिक्की में भरने के बाद उसने पलट कर एक बार उसकी छत की तरफ देखा भी था और घबराहट में माया दीवार की ओट में हो गयी थी, उसे देखने की अधूरी आस लिये ही वो चला गया था।
वो तो उसके जाने के बाद उसके जाने का असली कारण माया को पता चला था, जब एक शाम वो स्कूल से लौटी और अपनी माँ और दादी को बातें करते सुना__” क्या ज़रूरत थी अम्मा उनके घर जाने की, ऐसा भी लड़के में कौन सा हीरे मोती जड़ें हैं, ना होगी माया की शादी तो ना होगी, मैं अपनी बेटी को जीते जी कोई दुख ना होने दूंगी।”

” और तुम्हारे बाद उसका क्या होगा बहुरिया?? यही सोच कर तो जी घबराता है कि हम सब के बाद उस बेचारी का क्या होगा?”

” पढ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो जायेगी अम्मा, वो खुद अपना सहारा बनेगी।। आइंदा आप किसी के घर माया का रिश्ता लेकर ना जाना, देखा नही मिश्राइन ने कैसे रातों रात लड़के को पढ़ाई के नाम पर बाहर भेज दिया जैसे हमारी माया की छूत लग जायेगी अगर यहाँ रहा तो।”

उसका कलेजा धक से रह गया था, तो इसलिये उसे बाहर भेज दिया!!
उस दिन के बाद से उसने रोली के घर आना जाना बिल्कुल बन्द कर दिया था, रोली ही क्या धीरे धीरे अपनी हर सखी सहेली से दूरी बना ली थी, और उसी समय उसकी मासी उसके लिये देवदूत बन कर आ गयी__
” दीदी माया का हाथ बहुत साफ है, बहुत अच्छी पेंटिंग करती है , इसे फाइन आर्ट्स में क्यों नही भेज देतीं ।”

और फिर सारे घर भर को मना मुनु के आखिर मासी उसे अपने साथ ले ही गयी थी। वल्लभ एकेडमी ऑफ़ आर्ट्स में प्रवेश लेते ही उसका जीवन बदलने लगा था, अपनी फाइन आर्ट्स की डीग्री पूरी कर स्कॉलरशिप लेकर वो वेनिस से भी कोई एक्स्ट्रा डिप्लोमा कर आयी थी।।

रंगों से खेलती उसकी तुलिका अब उसके कैनवास में ही जीवन ढूँढने लगी थी।
रंग बिरंगे रंगों से सजी उसकी पेंटिंग्स देख कर कोई उसके बिना रंगों के जीवन को सोच भी नही सकता था।।

” दीदी कॉफ़ी पी लो वर्ना फिर ठंडी हो जायेगी।”
सरु की आवाज सुन वो वापस वर्तमान में लौट आयी, अगले हफ्ते ठीक होली से एक दिन पहले उसकी पेंटिंग एक्सीबिशन होनी थी, उसी के लिये वो तन मन से जुटी थी।।

मासी के साथ उसके जाने के चार महीने बाद ही उसके पापा का ट्रांसफर भी दूसरे शहर हो गया था और उस शहर उस गली से सारे नाते छूट गये थे, बस नही छूटा था अबीर का लगाया वो रंग जो अब भी माया अपने गालों पर महसूस कर पाती थी।।

*******

शाम हो चुकी थी, लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी, लोग घूम घूम कर अपनी पसंद की पेंटिंग्स देख रहे थे, उनमें से कुछ खरीद भी रहे थे, एक्सीबिशन हॉल के एक ओर बने छोटे से ऑफिस में माया अपनी साथी पेंटर के साथ बैठी कुछ ज़रूरी बातों में लगी थी कि उनकी एक हेल्पर ने अन्दर आ कर उन्हें बताया कि कोई एक आदमी है जो माया की वो पेंटिंग खरीदने की ज़िद पर अड़ा है जो वहाँ बेचने के लिये रखी ही नही गयी।।

” उनसे कह दो, वो पेंटिंग बिकाऊ नही है, उसे बस “एज़ अ मास्टर पीस” रखा है।”

” पर मैडम वो समझ ही नही रहे, कह रहे जब बेचना नही था तो यहां रखने की क्या ज़रूरत थी?”

” कौन सी पेंटिंग माया ‘ दहकते पलाश’?

” हाँ नेहा! मैं उसे किसी कीमत पर बेचने को तैय्यार नही हूँ, पता नही कौन रईसजादा है, जो ऐसे ज़िद पर अड़ा है।”

” हम्म तुम्हारा चेहरा पसंद आ गया होगा, तुम्हारे जैसी ही तो लगती है वो पेंटिंग, भले ही तुमने खूब सारे रंगों से चेहरे को रंग दिया है बिल्कुल जैसे किसी ने होली पर चेहरे पर खूब सारा अबीर गुलाल छिड़क दिया हो, बस हँसते हुए दांत नज़र आते हैं पर पेंटिंग लाजवाब है।”

” मैडम जी आप ही बात कर लो एक बार, हमारी तो सुन नही रहे वो साहब”

माया और नेहा ऑफिस से बाहर निकल आये, माया ने आगे बढ़ कर उस आदमी से कुछ कहना चाहा ही था कि पेंटिंग को देखता वो पलट कर माया के सामने हो गया, दोनो कुछ देर एक दूसरे को देखते ही रह गये।।

” मैं कैसे समझ नही पाया कि ये तुम हो माया।”
अबीर की बात पर माया ने शरमा कर आंखे नीची कर लीं….

” बहुत खूबसूरत पेंटिंग है, बिल्कुल तुम्हारी तरह, अभी तक समझ नही पा रहा था की बनाने वाला इसे बेचना क्यों नही चाहता, पर अब तुम्हें देख कर समझ आ गया…..”

” कैसे हो अबीर?”

” बिल्कुल वैसा ही जैसे पहले था, तुम कैसी हो?”

उसके सवाल पर वो मुस्कुरा उठी__

” क्या समझ गये? मैं आखिर क्यों नही बेचना चाहती इस पेंटिंग को?”

“बस उसी कारण जिसके लिये मैं इस पेंटिंग को खरीदना चाहता था, पर खैर अब मैं नही खरीदूंगा, तुम्हारी यादें तुम्हें मुबारक!! हाँ अगर तुम्हारी जगह किसी और ने ये बनाया होता तो किसी भी कीमत पर खरीद ही लेता, मेरी वाईफ को पेंटिंग्स का बहुत शौक है माया, आज अपनी सालगिरह पर सोचा उसे उसकी पसंद का तोहफा दूंगा पर यहाँ इस पेंटिंग ने मुझे रोक लिया, इसके आगे और कुछ देख ही नही पाया, इस पेंटिंग में मुझे तुम नज़र आई थी, पर जब ये देखा कि बनाने वाली भी तुम ही हो तो सब समझ आ गया मुझे।।”

उन दोनों को बातें करता छोड़ नेहा और बाकी लोग वहाँ से जा चुके थे….

” तुमने शादी की माया?”

” नही!! पहली टिकी नही और जब दूसरी करनी चाही तो जिससे चाहा वो जाने कहां गुम हो गया।”

” एक बार मुझसे कहा तो होता?”

” कब कहती, कैसे कहती? अगर तुम्हारी ‘ना’ होती तो मैं जीते जी मर जाती, अब तक जी रहीं हूँ और तुम्हारे दिये उन रंगों से ही अपना कैनवास भर रही हूँ, इतना काफी है अबीर , तुम मेरी तरफ से ये पेंटिंग रख लो।”

” मिलना नही चाहोगी मेरी वाईफ से?”

” वो भी आईं हैं क्या यहाँ?”

” हम्म !!, वो तुम्हारा ऑफिस है शायद।”

” अरे हाँ!! आओ उन्हें भी बुला लो, मैं तब तक कॉफ़ी के लिये बोलती हूँ!” कह कर माया आगे बढ़ गयी, उसके पीछे अबीर भी उसके ऑफिस में प्रवेश कर गया…..

” कहाँ हैं?? तुम्हारी वाईफ अन्दर नही आई??”

” मिलवाता हूँ, पहले चैन से बैठ तो जाऊँ!! इतने सालों की कितनी सारी बातें हैं, मेरे कोटा जाने के कुछ समय बाद तुम्हारा परिवार वो शहर ही छोड़ गया….
पहले तो रोली से तुम्हारे बारे में कुछ सुनने को भी मिल जाता था पर तुम लोगों के शहर छोड़ने के बाद तो तुम लोगों से सम्पर्क के सभी साधन बन्द हो गये, रोली को भी तुम्हारी कोई खबर ना थी, खुद को कहाँ कैद कर रखा था माया?”

” पता नही अबीर!! पर तुम्हारे घर से ना सुनने के बाद मेरी भी हिम्मत चूक गयी थी, और शायद घर वालों की भी, दादी तो अब रहीं भी नही, मेरे घर भर में सबसे ज्यादा उन्हें ही तुम पसंद थे।”

” और तुम्हें??”

अबीर की बात अनसुनी कर माया ने कॉफ़ी उसके आगे बढ़ा दी__” अब मिलवा भी दो अपनी वाईफ से।”

अबीर ने हाँ में सिर हिला कर अपने जेब से अपना वॉलेट निकाला और खोल कर माया के सामने कर दिया, उसमें उसकी वही पन्द्रह साल पुरानी रंगों से भीगी मुस्कुराती तस्वीर लगी थी__” ये कब निकाल ली थी तुमने ?”

” रोली को कह कर तुम्हें नीचे बुलाने से लेकर मोहित से छिप कर तस्वीर खिंचवाने तक की प्लानिंग थी मेरी, वो तो उसके बाद मैं पढ़ने बाहर चला गया वर्ना ….”

अबीर अपनी बात पूरी भी नही कर पाया था कि नेहा हाथ में गुलाल से भरी प्लेट थामे दोनो के पास चली आयी …..
” आप दोनों को होली की शुभ कामनाएँ “

अबीर ने मुस्कुरा कर माया को देखा__” उस दिन एक काम अधूरा रह गया था माया”

प्लेट से ढ़ेर सारा गुलाल उठा कर अबीर माया की तरफ बढ़ा ही था कि माया ने अपने हाथों से गुलाल अबीर के गालों पर मल दिया ” उस दिन अधूरा रह गया था ये अरमान!! हैप्पी होली अबीर!!

aparna….

वो सात दिन …. एक प्रेम कहानी

प्यार में ज़रा सी दूरियां भी हैं ज़रूरी….

      रोहित और नीता की शादी तय हो चुकी है,सब कुछ बहुत- बहुत अच्छा चल रहा है,आज शाम को दोनों की शादी की डेट  भी निकल आयेगी।
    
           “हेलो ,रोहित! क्या कर रहा था मेरा शोना ?”
   “कुछ नही नीत ,बस अभी फ्रेश होके आया,अब डिनर करने जा रहा।”
“ओ के बेबी,अच्छा सुनो आज मम्मा-पापा ने पण्डित जी को बुलाया था ,आज से ठीक 45दिन बाद का मुहूर्त निकला है,28जनवरी का।
   “मम्मा ने तुम्हारी मॉम को भी फ़ोन कर दिया है ,अभी अभी,,बस तुम्हारी मॉम का भी तुम्हारे पास फ़ोन आने ही वाला होगा।”
” yeah off course! बल्कि आने ही लगा ,चलो मै मॉम से बात करके तुम्हे कॉल करता हूँ,बाय।”

      रोहित भोपाल का रहने वाला स्मार्ट खूबसूरत बन्दा था,एन आय टी से इंजीनियरिंग करने के साथ ही कैम्पस सेलेक्शन होके पुणे आ गया।’पटनी ‘ मे कुछ समय काम करने के बाद उसने अपने कैरिअर को देखते हुए कंपनी बदल दी,अपने तेज दिमाग और कार्य कुशलता के कारण 5साल मे ही टी एल बन गया ।
        
         नीता ने जब उसी कंपनी मे काम शुरु किया तब पूरे ऑफिस मे जैसे बहार सी आ गई।
हंसती खिलखिलाती नीता ने जैसे सारे ऑफ़िस मे जादू सा कर दिया,पर इस जादू का सबसे ज्यादा असर दिखा रोहित पे।

       रोहित और उसके दोस्तों मे होड़ सी लग गई नीत से दोस्ती करने की,रोहित जिस प्रोजेक्ट मे टीम लीड था,उसी प्रोजेक्ट मे नीता भी थी,बस रोहित ने बाजी मार ली।।आधी जंग तो उसने उसी दिन जीत ली,दोस्त बेचारे अपना सा मुहँ लेके रह गये।
 
      पर लड़के एक बात मे मानने लायक होते हैं,चाहे एक ही लड़की के पीछे सारे पड़े हों ,पर जब ये नज़र आता है की उस लड़की का उनमे से किसी एक की तरफ झुकाव है,तो सारे एक साथ मिल के अपने दोस्त की मदद मे जुट जातें हैं,बस वही हुआ।

     अब सारे मिल कर रोहित के लिये फील्डिंग करने लगे और उसे मैच जीता दिया,रोहित को ऐसा लगने लगा था की नीता नही मिली तो वो जी नही पायेगा,कुछ ना नुकुर के बाद नीता ने भी हाँ कर दी।

      अब रोहित को असल मे समझ आया की जीवन क्या है? बेचारा पांच साल से बैचलर जिंदगी जी रहा था,अपने मन का आप मालिक था ,मन किया तो खाया वर्ना सारा दिन सिर्फ चिप्स ठूंसते और टीवी पे मैच देखते निकाल दिया। घर पूरा अस्तव्यस्त पड़ा रहता और वैसा ही अस्तव्यस्त सा उसका जीवन भी पड़ा था।
    
     नीता के आने से उसके अन्धेरे जीवन मे रौशनी आ गई,पतझर मे जैसे बहार आ गई।
     उसने सीसीडी मे नीता से प्यार का इजहार किया और नीता ने हाँ कह दिया,उसके बाद वो उसे  घर तक छोडने गया,गाड़ी मे बजते ‘बादशाह’ को बदल कर नीता ने ‘तुम जो आये जिंदगी मे बात बन गई ‘  चला दिया,रोहित को बहुत पसंद आया ये गाना।
    “बहुत प्यारा सॉन्ग है,तुम्हारा फेवरेट है?”
“मुझे सारे रोमांटिक सॉंग्स बहुत पसंद हैं ।”और तुम्हे क्या पसंद है रोहित?”
“मुझे तुम पसंद हो ……नीत।”

    इसके बाद रोहित के संसार मे नीता घुलती चली गई।
    “हेल्लो ,रोहित क्या कर रहे हो? अभी तक उठे नही,बेबी आज रविवार है,मै तो सोच रही थी हम लंच साथ करेंगे।”
“हां करेंगे ना जान,तुम “सिगडी “पहुचों,मै बस तैय्यार होके आता हूँ ।”
” ओए ,मै तो सोच रही थी,तुम्हारे रुम पे आके कुछ बनाऊं और तुम्हे खिलाऊ ।”
      हे भगवान ! नीता रुम पे क्यों आना चाहती है,कल ही शनिवार था,और सारे यारों दोस्तों के साथ मिल कर जम के पार्टी की थी,सारी बोतलें कमरे मे ही पड़ीं हैं,हडबड़ा के उठा और घर की सफाई मे लग गया।

        घर ऐसे चमका दिया की रोहित को खुद पे ही नाज होने लगा,नहा धो के तैय्यार हुआ की नीता आ गई।
     “हेलो,ओह्ह ये रुम है तुम्हारा,रोहित कैसे रहते हो यहाँ पर,कितना मैसी है ,उफ,चलो मै ही कुछ करती हूँ ।”
    नीता ने खिड़की खोल दी ,और एक बार फिर घर समेटने मे लग गई,साफ सफाई कर के कॉफ़ी बनायी और लेके आई,रोहित दिल जान से नीता पे फिदा हो गया,घर अब वास्तव मे साफ हो गया था।

     रोहित को सब कुछ अच्छा लगता ,नीता का बहुत केयर करना,उसे बेबी बुलाना,मीटिंग मे कौन सी शर्ट पहनना है,ये बताना,और सबसे अच्छा लगता जब वो अपने दोस्तों के साथ रहता तब बार बार फ़ोन करके समय पे घर जाने,और कम पीने की सलाह देना।।

    रोहित और नीता बहुत खुश थे,दोनो के मॉम डैड भी पुणे आके मिल चुके थे,सब तरफ से सब अच्छा था,और अब दोनो की शादी की तारीख भी तय हो गई। पर अब अचानक ……

…..रोहित को कभी कभी डरावने सपने आने शुरु हो गये,वो नींद से चौंक के उठता,और घबरा जाता।
     पता नही कैसा अन्जाना सा डर उसके चारों ओर व्याप्त होने लगा,उसे खुद से डर लगने लगा था,उसे डर था की वो नीता को खुश रख पायेगा या नही,,असल मे उसे शादी से डर लगने लगा था।

      नीता हर बात मे पर्फेक्ट थी,समय की पाबंद, साफ सफाई पसंद,अच्छी कुक,इन्टीरियर डिजाइनर    ये,वो ……कोई ऐसा ज्ञान नही था जिसकी जानकारी नीता को नही थी,टी वी धारावाहिक मे क्या चल रहा है,से लेकर देश की राजनीति मे किसने कब कहाँ हलचल मचाई ,सब कुछ उसके जिव्हाग्र पे होता…….और जैसा की अक्सर इतने ज्ञानी लोगों के साथ होता है,ये लोग अनजाने ही अपने साथ वालों की हर बात मे दखल देने लगते हैं,उन्हे हर छोटी से छोटी बात भी सिखाने लगते हैं,बस वही हुआ…..

       ” रोहित !……ये क्या पहन के आ गये,आज तो गुरुवार है,मैने कहा था ना पीली शर्ट पहनना, तुम ब्लैक मे आ गये।”
      “रोहित! …… सुनो आज शनि देव पे तेल चढा देना,तुम्हारा शनि थोड़ा भारी है ना।”
      “रोहित!  वो तुम्हारा सुनील मुझे फूटी आँख नही भाता,उससे दूर रहा करो बाबू।खुद तो दिन भर पीने के बहाने ढूंडता है,और तुम्हे भी अपने साथ भिड़ाये रखता है।”
        ऐसे ही सुबह गुड मॉर्निंग से शुरु हुआ पीटारा रात मे एक झिड़की के साथ ही बन्द होता
    “तुम अभी तक ऑनलाइन हो,रात के साढे ग्यारह बज गये,चलो अच्छे बच्चों की तरह सो जाओ।”
      बेचारा रोहित डर के मारे ये भी नही बोल पाता की तू खुद ऑनलाइन नही होती तो मुझे ऑनलाइन पकड़ती कैसे मेरी माँ ।

     जहां प्यार होता है वहाँ भय नही होता,और अगर कही किसी के हृदय मे भय आ जाये तो उसका प्रेम महल हवा के झोंको से ही हिलने लगता है।

      नीता का मानना था की प्यार मे कोई दुराव छिपाव नही होना चाहिये,इसीसे वो कभी रोहित का फ़ोन भी खोल के उसके मैसेज पढ़ने लगती।
      एक बार ऐसे ही उसने सुनील का मैसेज पढ़ लिया।
   “अच्छा तो तुम्हारे ये सिरफिरे दोस्त मुझे हिटलर बोलते हैं।”
     “नो बेबी! किसने कहा तुमसे।”
   “मुझसे कौन कहेगा? हिम्मत है किसी की,वो तो तुम्हारा मैसेज पढा,तो पता चला की मैं हिटलर हूँ ।”

     “तुम्हे कोई हिटलर नही बोलता बेबी,वो तो सिर्फ सुनील कभी कभी मजाक मे……”
     नीता जितनी शिद्दत से रोहित से प्यार करती थी,उससे भी कहीं ज्यादा शिद्दत से सुनील से नफरत करती थी,और कुछ वैसी ही भावना सुनील की थी,नीता के लिये।वो भी रोहित को नीता के खिलाफ भडकाने का कोई मौका नही छोड़ता ।

    रोहित ये करो,वो मत करो,ऐसे खाओ,वैसे ना खाओ,योगा करो,जिम जाओ……ये,वो……रोहित रोहित रोहित।।।।।
     
     रोहित थकने लगा था,प्यार उसे अब भी था,पर जाने कैसी बेचैनी और उदासी उसके अन्दर भरने लगी थी।

      वो दोनो साथ ही शादी की शॉपिंग पे जाते पर एक तरफ जहां नीता चहक चहक के लेह्ंगो के ट्रायल लेती,वो चुपचाप बैठा,कुछ सोचता रहता, उसकी शेर्वानी भी नीता ने ही पसंद की अपने लहन्गे के कोन्ट्रास्ट मे।

      फिर एक दिन नीता ने रोहित को बताया कि उसे 7दिनों के लिये सिंगापुर जाना पड़ेगा,कुछ ऑफ़िस प्रोजेक्ट है,बताते समय लग रहा था,नीता रो ही पड़ेगी,पर इधर रोहित के मन मे तो बांसुरी बज रही थी।
        रोहित को खुद पे गुस्सा भी आ रहा था कि उसे दुखी होना चाहिये पर वो तो खुश है,,खुश भी नही बहुत खुश है।

      रोहित को तमाम बातें सिखा पढा के नीता बड़े बोझिल कदमों से फ्लाइट लेने चल दी,और अचानक रोहित ने महसूस किया ,की इतने दिनों से जो अजीब सा बोझिल पन था,वो खतम हो गया।
    सारे मनहूस काले बादल बरस गये,हर तरफ रोशनी फैल गयी,और उस रोशनी मे रोहित चमकने लगा।

       वो गाता गुनगुनाता वहाँ से सीधा सुनील को साथ लिये अपने कमरे मे पहुँचा,जी भर के दोनो ने बियर पी ,खूब उल्टा सुल्टा खाया,और मैच देखते पड़े रहे।
  दूसरे दिन इतवार था,रोहित की नींद फ़ोन की घंटी से ही खुली,नीता का फ़ोन था।
   “अभी तक सो रहे हो ना,अच्छा सुनो कल बहुत लेट पहुंची ,इसीसे तुम्हे फ़ोन नही किया,सोचा सुबह ही बता दूंगी ,गुस्सा तो नही हो ना।”
     उफ्फ रोहित को तो खयाल ही नही रहा था की उसे नीता से पूछना था की वो कब पहुंची।

     दो दिन बड़े आराम से सूकून भरे गुज़रे, मंगल को रोहित की क्लाइंट मीटिंग थी,तैय्यार होते होते उसने अपनी आलमारी खोली,उसे सुझा ही नही की क्या पहनूँ ।
     तुरंत नीता को फ़ोन लगाया,पर नीता ने फ़ोन काट दिया,दो बार रिंग करने पर उसका मैसेज आया।
  “I’m in meeting,call u later.”
    बेचारा कुछ तो भी पहन के चला गया।।।

मीटिंग्स में ऐसा उलझा की शाम के 7 बजे घर पहुँचा,सोचा एक कॉफ़ी बना लूं,पूरी रसोई छान मारी पर उसे चीनी का डब्बा नही मिला,फिर फ़ोन किया,नीता ने फ़ोन नही उठाया।

    दो दिन से जिस आज़ादी का जश्न मना रहा था आज उसी आज़ादी से कोफ्त हो गयी।

     समय काटने के लिये टी वी लगा लिया,,कुछ न्यूज़ सुनी,कुछ बहस सुनी,,पर मन कही नही लग रहा था,सुनील को फ़ोन किया,
    “कहाँ है भाई,घर आजा कोई मूवी देखेंगे।”
   “अरे नही रोहित ,तेरी भाभी को शॉपिंग पे ले के आया हूँ,यहीं से हम खाना खाते हुए ही घर जायेंगे,तू एन्जॉय कर भाई।”

   खाक एन्जॉय करुँ,खुद तो मुझे नीता के लिये भड़काता फिरता है और यहां अपनी बीवी से चिपका घूम रहा है।

    रात हो गयी ,नीता का कोई फ़ोन नही ,कोई मैसेज नही,रोहित ने फ़ोन उठाया वॉट्सएप्प खोला
  नीता ऑनलाइन थी
“हेल्लो जान ! सुबह से कहाँ बिज़ी हो यार।”
नीता का कोई रिप्लाई नही आया।
” ओ मैडम कहाँ हो भाई”
कोई रिप्लाई नही।
“नीता r u there? “
कोई रिप्लाई नही।अब तो हद ही हो गयी,यहाँ थी तो पीछे पीछे घूमती रहती थी,और अब देखो,दो दिन हुए की भूल गयी।

रोहित ऑफलाइन हो गया,और चादर ओढ कर सो गया,पर नींद खुद के चाहने से ही आ जाती तो प्यार करने वाले नींदों की शिकायत क्योंकर करते।

    आधे घन्टे बाद फिर फ़ोन खोला और देखा
नीता अब भी ऑनलाइन थी।।।।।

  अगले दिन सुबह नीता के गुड मॉर्निंग मैसेज से उसकी नींद खुली,एक प्यारी सी मुस्कान आ गयी चेहरे पे,तुरंत नीता को फ़ोन किया।
“हेल्लो कल कहाँ गायब थी?सारा दिन कोई मैसेज नही।”
“आज भी बिज़ी रहूंगी रोहित,हमारा टी एल है ना चैन्ग, बड़ा ही अनोखा बन्दा है,दिन भर काम करता भी है कराता भी है,पर ऐसे की कोई शिकायत ही ना कर पाये ।
  माहौल इतना स्पोर्टि कर देता है की लगता ही नही बॉस है।क्या नोलेज है बन्दे को ,क्या बताऊँ तुम्हे।”
“और तुम्हे पता है ,He just love Indian food”
उसे कुकिंग भी आती है,बिल्कुल मेरे जैसा पुलाव बनाता है……इसके बाद पूरे 5मिनट तक नीता चैन्ग के बारे मे ही बताती रही,पर अब रोहित को कुछ सुनाई नही दे रहा था।

    शाम को नीता को फ़ोन लगाया,उसने नही उठाया,अब तो रोहित को ऐसा लगा तुरंत उड़ के सिंगापुर पहुंच जाये और चैन्ग को गोली मार दे।
   पर हर बार मन का हो जाता तो मनमीत का दिल दुखे ही क्यों।

   क्या क्या सोचा था रोहित ने,उसे लगने लगा था की वो नीता के हाथ की कठपुतली बन गया है,शादी के नाम से इसीलिये तो डरने लगा था,उसे लगा नीता कुछ दिन के लिये चली जायेगी तो वो आज़ादी की खुशबू महसूस कर सकेगा ,पर जितना सराबोर होकर वो आज़ादी की महक सूंघना चाहता था,उससे कही ज्यादा वो नीता की खुशबू मिस कर रहा था।

     अभी तो नीता को गये सिर्फ 3 दिन हुए थे,और उसका ये हाल हो गया था।

     सुबह जल्दी नींद खुल गयी उसने,फेसबुक खोल लिया,नीता का प्रोफाइल फोटो बदला हुआ था,
     फोटो मे चार पांच लड़के लडकियां खड़े थे,सबसे बीच मे नीता ही थी,गुलाबी टॉप मे मुस्कुराती हुई कितनी प्यारी लग रही थी,और उसके बाजू मे उसके कन्धों पर हाथ रखा एक गोरा खड़ा था।
    ओह्ह्ह्ह तो यही है चैन्ग।,मुझे तो ये सारे चिंकी एक ही जैसे लगते हैं,पर ये नीता के कन्धे पर हाथ क्यों रखे खड़ा है।

   नीता को इस बारे मे कुछ भी टोकना प्रलय को दावत देना था,बेचारे का पूरा दिन खट्टा हो गया।चौथा दिन भी बीत गया।

  अगले दिन सुबह ऑफ़िस के लिये तैय्यार होने के बाद रोहित ने नीता को वीडियो कॉल किया, दोनो एक दूजे को देख के खिल गये मुस्कुरा उठे,तभी रोहित ने देखा नीता ने काफी छोटी ड्रेस पहनी थी,उसने पुछा,तो नीता ने कहा,”यहाँ तो यही फॉर्मल्स कहलाते हैं बाबू,मै तो सारी जीन्स ही लेके आई थी,आज पार्टी है तो कल ये चैन्ग के साथ जा के खरीद के लायी हूँ,उसी की पसंद है,मैने बहुत कहा पर देखो ना उसने मुझसे ड्रेस के पैसे भी नही लिये।”
     रोहित को पैर से सर तक आग लग गयी,यही काम है इन गोरों का ।।बस लड़की देखी की फिसले ,और खास कर शादीशुदा या एंगेज्ड लड़कियों पे तो ये कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो जातें हैं,अरे अपने जैसी ढूँढ ना भाई अपने लिये,मेरी वाली के पीछे क्यों पड़ा है,और चलो चैन्ग को मारो गोली ,ये नीता के उसूल कहाँ तफरीह करने चले गये,आज तो बात कर के रहूँगा।।

   पर पांचवा दिन भी बीत गया। रात बाकी थी………जो बिल्कुल नही बीत रही थी,बार बार नीता से पेहली मुलाकात,उसकी बातें,उसकी हंसी सब कुछ याद आ रहा था,वो दोनो जब भी लॉन्ग ड्राइव पे जाते हमेशा नीता एफ एम बन्द करके खुद ही कुछ गुनगुनाने लगती थी,कितना प्यारा गाती है,और कितना सारा गाती है,सोच के रोहित के चेहरे पे मुस्कान आ गयी…….
…………..क्यों बिना वजह इतना डर रहा था,नीता के बिना जीना तो ज्यादा मुश्किल है,उसके साथ डर डर के जीने से।।मॉम की कितनी फिक्र रहती है उसे
डैड को भी फ़ोन कर कर के अपना बी पी ,और शुगर समय समय पे चेक करवाने की हिदायत देती रहती है,,अब बेचारी ओवर परफ़ेक्ट है तो इसमें उसकी क्या गलती।
   रोहित का मन फूल सा हल्का होने लगा,उसने अपने तकिये को अपने सीने से लगाया और नीता को सोचते हुए सो गया।

  शुक्रवार को रोहित ने जल्दी जल्दी ही सारे काम निपटाए ,सुनील को लिये घर पहुँचा ,दोनो ने मिल के घर की सफाई की ,नीता के पसंदीदा ग्लौडियस फूलदान मे सजाये,और उसके बाद भीमजी भाई की दुकान पहुंच गये।

    शनिवार नीता की फ्लाइट आने के आधे घन्टे पहले ही दोनो दोस्त एयरपोर्ट पहुंच गये।
     रोहित का दिल ऐसे धड़क रहा था,जैसे आज पहली बार नीता को देखने वाला है,जैसे पहली बार नीता से बोलने वाला की वो उससे सच मे कितना प्यार करता है।
     नीता आई ,और दौड़ के रोहित के गले लग गयी,उफ्फ कितना सुकून,कितनी शान्ती,कितना प्यार है इस मिलन मे….
   “अब मुझे छोड़ के कही मत जाना नीत,मर जाऊंगा तुम्हारे बिना।” और फिर नीता की उंगली मे हीरे की अंगूठी पहना दी।
“अबे अगर नीता तुझे छोड़ के जाती नही तो तुझे पता कैसे चलता की वो क्या है तेरे लिये,चलो भाई अब मै चला अपने घर,शाम को मिलते हैं फिर,ओके नीता।”
  “जी भाई साहब ! शाम को भाभी जी को भी लेकर आना।”
   रोहित को समझा नही की अचानक नीता सुनील को भाई साहब क्यों कहने लगी।
  खैर वो दोनो बाहों मे बाहें डाले बाहर की तरफ बढ़ चले,जाते जाते नीता ने पलट के सुनील को देखा और आंखो ही आंखो मे आभार प्रकट किया,सुनील ने भी हल्के से मुस्कुरा के आभार ग्रहण कर लिया।।।

aparna…..

संस्कारी बहु

उन्होंने यामिनी को ऊपर से नीचे तक देखा, नीचे से उपर तक देखा, पूरी नज़र से देखा….

      संस्कारी बहू–

अटारी  आस पास के सभी गावों मे सबसे बड़ा गांव माना जाता है,जैसा ही भरा पूरा गांव,वैसे ही भले लोग यहाँ रहते हैं ।
      ज्यादातर घरों के बच्चे पढ़ने लिखने लखनऊ,या कानपुर ही जाते हैं,और जो चिरैय्या एक बार घोंसले से उडी वो फिर नही लौटती।।

     दीनदयाल बाजपाई जी का बड़ा नाम हैं,गांव मे। नाम होने लायक सज्जन हैं भी वो….उनकी श्रीमती कमला और उन्होनें बड़ी खूबसूरती से अपनी गृहस्थी सजाई है।
      
             गांव भर की औरतें सामने तारीफ करती नही थकती,और पीठ पीछे जल भुन के कोयला होती रहतीं हैं ,कारण भी है….उनके 4सुशील पुत्र और 4संस्कारी पुत्रवधुएं ।।
          आज के युग मे  सुशील पुत्र मिलना तो फिर भी आसान है,पर संस्कारी बहू मिलना….
       कोई कोई औरत तो दिल मे बड़ा सा पत्थर रख के कई बार बोल भी चुकी “हाय कमला बहन ,कितने पुण्य किये हैं जी तुमने,एक बहू भी ऐसी नही की कोई उंगली उठा दे।”
 
     “सारी की सारी अभी इस जमाने मे भी देखो सर पे पल्लू रखे साडी मे ही सरसराती रहती हैं ।एक हमारी आई की शादी की दुजी सुबह ही अन्ग्रेज मेमो सा गाऊन पहने रसोई मे आ धमकी….. कहती है मम्मी जी इनकी चाय दे दो।”

  “अब मैं क्या बोलूं,बहुयें तो सच मेरी खरा सोना हैं,पर सच्ची बात बोलू ,सब कुछ बेटे पे रहता है,हमने तो भाई बचपन से ही चारों को ये बात भले से समझा दी थी की संस्कार बहुत ज़रूरी है बेटा।”
     “अब जब बेटा ही राजी ना होगा तो बहू को मानना ही पड़ेगा ना।””वैसे भी इन सब मे रखा क्या है।”

     ‘सही कह रही कमला,अब मेरी वाली तो विदेश जा बसी है,पिछली छुट्टियों मे मै गई थी,महीना भर के लिये,एक दिन कपड़े तह किये और बहू को दिये की पोते की पैंट को रख ले,तो वो हंस पड़ी,बोलती है ,अरे मम्मी जी ये हाफ पैंट तो मेरी है।”

     पूरी महिला गोष्ठी खिलखिला के हंस पड़ी।।

    अटारी मे सारे आमोद उत्सव साथ ही मनाये जाते,लगभग सभी बाम्हण परिवार ही थे,इक्का दुक्का लाला भी थे ।।
     
      अबकी बार फाग की धूम थी,बाजपेयी जी के आंगन ही सारा आयोजन था,चारो दशरथ नन्दन इधर से उधर भागते सारा काम धाम देख रहे थे,आंगन खचाखच भरा था,,एक तरफ खाने पीने का आयोजन,दुसरी तरफ रंग गुलाल ।।

        कुल मिलाकर पूरा माहौल अबीरी हो गया था,शाम को फागोत्सव हुआ,,खूब गाना बजाना हुआ,,महिलायें भी एक आध कविता पाठ कर लेती थी।   कमला जी की बड़ी बहू यामिनी को पढ़ने लिखने का खूब शौक था,कुछ कभी लिख भी लेती थी,उसे बड़े इसरार से उसकी सास ने बुलाया,बहुत धीमे से अपना घूंघट संभालती वो आई ,पायल की रूनझुन सुनाती ,,हाथ भर चूडियां बजाती आई और एकदम ही हल्के हाथों से अपने पति से माईक लिया और माँ सरस्वती पे लिखी अपनी कविता सुना दी।

     तालियों की गूँज से आसमान फटने लगा,दीनदयाल जी के कन्धे कुछ और तन गये,कमला जी भी सगर्व मुस्कुराने लगी,और यमिनी के पति का तो पूछो मत।।

     होली के दूसरे दिन सभी बच्चे लखनऊ कानपुर लखीमपुर लौट गये।

       यामिनि के बेटे का इसी वर्ष स्कूल मे प्रवेश हुआ है,,लखनऊ के सिटी मोन्टेसरी मे नही भाई एक दूसरे कॉन्वेन्ट में ।

      सुबह सुबह 7 बजे बच्चे को स्कूल पहुचाने माता पिता  दोनो भागे भागे गये…..प्रथम दिवस…. प्रथम प्रयास ….प्रथम अनुभव….प्रथम तो प्रथम ही होता है,,एक ही बार आता है,,इसी से देर ना हो जाये ऐसा सोच के यामिनी ने कुर्ता पहनने मे भी अपना अमुल्य समय नष्ट नही किया।

        बच्चे को खूब लाड़ लड़ा के चूम चाट के माँ ने मदर के हवाले किया ,,और भारी मन से कार मे आ बैठी ,पतिदेव ने कार चलाते हुए पेशकश रखी की कही रास्ते मे ही रुक के नाश्ता कर लिया जाये,क्योंकि घर पहुंच के नाश्ता बनाने खाने मे ऑफ़िस के लिये देरी की सम्भावना है।

        दोनो रास्ते के किनारे पे खड़ी गुमडी अर्थात ठेले पे रुक गये,पतिदेव ने दो प्लेट दोसा बोला लाने को…..यामिनि ने खाने से मना किया कहा पैक करवा लो मै घर जाके ही खाऊंगी ।
           पतिदेव दोसे के स्वाद मे डूबे खाने लगे ,तभी यामिनि के पीछे किसी को आते देख उन्होने बड़ी शालीनता से नमस्ते की……..यामिनी ने पीछे मुड के देखा और धक!
        वही गांव वाली पड़ोसन बुआ जी अपनी बिटिया के साथ उन्ही की तरफ बड़ी तेज रफ्तार से दौडी चली आ रही थी…..
          यामिनी को काटो तो खून नही…….गौतम कुल गोत्रोत्पन्ना सरयूपारिण पण्डित श्रीपति शुक्ला की कन्या ,बीस बीसवा कान्यकुब्ज सर्वश्रेष्ठ सर्वोत्कृष्ट श्री बाजपेयी की सबसे बड़ी कुलवधू सरेआम लखनऊ की सड़क पे जीन्स और टी शर्ट पहने एक ठेले पे खड़ी थी।

        यामिनी को लग रहा था,,हे धरती मैय्या जैसे वैदेही के लिये फट पड़ी वैसे ही आज मुझे भी अपनी गोद मे समा लो !!,
             हे सूर्य देवता !कुछ देर को कही जाके छिप जाओ ,थोड़ा अन्धेरा ही कर दो की मै भाग सकूं ।

        पर सिर्फ सोच लेने से ही समाधान नही होते ,ना धरती फटती है ना सूर्य चमकना छोड़ देता है।
        बुआ जी पास आई,यामिनी को नीचे से ऊपर फिर ऊपर से नीचे देखा,पूरी नज़र से देखा,जी भर के देखा और बोली
           “अरे हम तो कार्तिक को पहचान के यहाँ आई,ये बोलने की घर चलो ,हमारी रत्ना का घर यही तो पीछे है बेटा।”

      “अरे नही नही बुआ जी ,,मुझे तो बस ऑफ़िस के लिये देर हो रही थी,तो सोचा यही खा लूं ।”
    “आज अथर्व का स्कूल का पहला दिन था ना ,तो उसे छोडने गया था,बस वही से लौट रहा।”

      यामिनी को समझ आ गया था ,जेलर की पकड़ तेज़ है,रिहाई मुश्किल है,उसने बुआ जी के पैर छुए और रत्ना जिज्जी के भी।
    “अरे भाभी तुम हो,हमे तो लगा भईय्या जाने किसके साथ खड़े बतिया रहें हैं ।”

      यामिनी और कार्तिक बड़ी ही कठिनाई से मुस्कुरा पाये,दोनों माँ बेटी बड़ी देर तक निरर्थक बातें बनाती रही और आंखों ही आंखों में संस्कारी बहू को पीती रही।
       “देखा माँ,ना तो हाथों मे चूडियां थी ना मंगल सूत्र,अरे ठीक है जीन्स पहनी तो क्या बिन्दी भी ना लगायेंगी,,ना बिन्दी ना सिन्दूर….इन्हें देख किसी को समझ भी आयेगा की शादीशुदा ,बाल बच्चे वाली है। ….”
        
        और इधर कार मे घर वापस होते हुए दोनो पति पत्नी का अलग ही राग छिड़ा हुआ था।बेचारी यामिनी मुहँ लटकाये बैठी थी,और कार्तिक का हंस हंस के बुरा हाल था…
          “वो तो अच्छा हुआ यामिनी तुमने खाने से मना कर दिया ,वर्ना सोचो इतनी संस्कारी बहू इतने सारे मर्दों के बीच जीन्स पहनी ठेले पे खड़े होके खा रही …..कितना अजूबा हो जाता ,नहीं …..”
   कार्तिक ने फिर एक ज़ोर का ठहाका लगाया और गाड़ी आगे बढा दी।।
       

उधेड़बुन

एक छोटी सी प्रेम कहानी

‘उधेड़बुन ‘
          
           आज सुबह से ही धानी बड़ी व्यस्त है, कभी सलाईयों में फंदे डाल रही है,कभी निकाल रही है,कल ही से उसने नयी नयी बुनाई सीखना शुरू किया है॥  

अहा!  कितना मजे का समय है ये,,बुनाई कितनी कलात्मक होती है,,और भी कलायें होतीं हैं संसार में ,पेटिंग करना,कढ़ाई करना,पॅाट बनाना,वास बनाना पर ये सब एक हद तक सिर्फ अपने शौक पूरे करने जैसा है।बुनाई ही एक ऐसी कला दिखती है जिसमें कलाकार अपने सारे प्रेम को निचोड़ कर रख देता है।
              कुछ फंदे सीधे कुछ उल्टे बीनना ,कहीं फंदा गिराना कही फंदा उठाना,उफ पूरा गणित है बुनाई भी॥ और इतनी त्याग तपस्या के बाद बुना स्वेटर जब हमारा करीबी कोई पहनता है तो कितना गर्व होता है बनाने वाले को खुद पर। ऐसे ही बहुत सारे मिले जुले भावों के साथ धानी ने भी अपना पहला स्वेटर बुनना शुरू किया था,,पिंटू दा के लिये।
        
               स्वेटर बुनते हुये कितनी प्रसन्न कितनी विभोर थी धानी,अपने उपर अचानक मान भी होने लगता कि कोई भी नया काम हो वो कितनी जल्दी सीख लेती है।खाना बनाने में तो उसे महारथ हासिल है,कैसी भी पेचीदगी भरी जटिल रसोई हो,वो आधे घण्टे में सब सुलझा के रख देती है,चने की भाजी बनाना हो या मटर का निमोना उसके बायें हाथ का खेल है बस । कचौडि़याँ और मूंग का हलवा तो घर पे वही बस बनाती है,,मां को रसोई मे इतनी देर खड़ा होने मे थकान होने लगती है। घर को सजा  संवार केे रखना कपड़़ोंं को सहेजना,रसोई  बनााना इन सारे नारी सुलभ गुणोंं की खान है धानी।
              
           बस एक ही चीज है जो उसे बिल्कुल नही सुहाती ,वो है पढ़ाई। जाने कैसे लोग किताबों में प्राण दिये रहतें हैं,ना उसे पढ़ना पसंद है ना लिखना,,नापंसदगी की हद इतनी है कि लड़की गृहशोभा,गृहलक्ष्मी जैसी गृहिणियों की पहली पसंद रही किताबों पर भी आंख नही देती।

            आलम ये है कि दो बार में ही सही धानी ने बारहवीं पास कर ली ,उसके बाद होम साईंस लेकर अभी कालेज का सेकण्ड इयर पढ़ रही है,वो भी दुबारा। पढ़ाई से इतनी वितृष्णा का कारण भी बहुत वाजिब है,धानी की अम्मा ने अपने जमाने में बी.ए. किया था ,उसके बाद उनकी शादी हो गयी।मन में तरह तरह के सपने सजाये धानी की मां ससुराल आई तो उन्हे पता चला कि उस घर में उनकी डिग्री की कोई कीमत नही। वो अपने पैरों पर खड़ा होना चाहतीं थीं,एक अच्छी सरकारी नौकरी करना चाहतीं थीं पर उनकी पढ़ाई उनका ज्ञान उनके चौके तक ही सिमट कर रह गया। इसी कारण उन्होंने बचपन से ही धानी के मन में ये बात भली प्रकार बैठा दी जैसे तैसे वो थोड़ा बहुत पढ़ लिख ले फिर उसकी अच्छे घर में शादी करनी हैं।

                   बालिका धानी के मन में ये बात अच्छे से पैठ गयी की उसे सारा ज्ञान ऐसा ही अर्जित करना है,जिससे उसकी एक अच्छे घर में शादी हो सके।  उसी ज्ञान का नया सोपान था बुनाई।

           बहुत खुश और खुद मे मगन थी धानी बुनाई सीखते हुये।पड़ोस में रहने वाली लाली दीदी मायके आई थीं दो महीनों की लम्बी छुट्टी पर,बस उन्ही से ये गुरू ज्ञान मिला था,वो अपने पति के लिये बुन रही थी और धानी अपने पिंटू दा के लिये।
   
             पिंटू दा ! पिंटू दा से धानी की मुलाकात यही कोई 7-8 साल पहले हुई थी, तब वो स्कूल जाती थी,शायद नौंवी या दसवीं में थी,। पिंटू दा ने उसी साल ईंजिनियरिंग काॅलेज में प्रवेश किया था,दोनो सेमेस्टर पास करने के बाद की छुट्टियों में अपनी मामी के घर आ गये थे घूमने।
   
         पहली मुलाकात में ही उसे पिंटू दा बहुत भा गये थे,,कितने लंबे थे, चौड़ा माथा ,घने बाल,गोरा रंग,और गहरी आवाज ॥ कोई भी बात कितना समझा के बोलते थे,कि सामने वाला उनकी हर बात मान जाये।

               उस दिन मां ने धानी के हाथ से साबुदाने के बड़े भिजवाये थे रीमा चाची के घर,,बड़े लेकर जब धानी वहांं पहुंची तब चाची चाय चढा़ रहीं थीं,उसे देखते ही खिल गयीं ” आ तू भी चाय पी ले।”
     “नही चाची मैं तो बस ये देने आयी हूं,मां ने रज्जू दा के लिये भेजा है।”
       “अरे दिखा जरा क्या भेजा है जिज्जी ने,वाह साबुदाने के बङे।” 
      ” अच्छा रूक जरा मैं ये चाय भी साथ ही छान देतीं हूं,तू जरा ऊपर रज्जू के कमरे तक पहुचां दे ।”        “ये चाय के दो कप क्यों चाची,मैं तो नही पियूंगीं।” “हां बिटिया ये दूसरा कप पिंटू के लिये है,कलकत्ता वाली ननंद का बेटा।” “बहुत होशियार लड़का है,पहली बार में ही वो क्या कहते हैं आई.आई.टी. निकाल लिया उसने,,कानपुर में पढ़ रहा अभी।”
    “अच्छा मैं चाय दे के आती हूं।”
           
                  धानी का आज अपनी सहेली ममता के साथ पिक्चर जाने का प्लान था,ममता सज धज के उसके घर पहुंच चुकी थी,वो दोनो निकलने ही वाली थीं कि माता जी का फरमान सुनाई दिया ,
           ” बिट्टो जा जरा जाते जाते ये बड़े रीमा के यहां दे जा।”
           “क्या मां तुम भी ना,बनाने का इतना शौक है तो पहुंचाया भी खुद करो ,मुझे वैसे ही देर हो गयी है।”
        “अरे जा ना धनिया दे आ,पांच मिनट लगेगा मुश्किल से” भुनभुनाती पैर पटकती धानी वहां गयी तो रीमा चाची ने एक नया काम पकड़ा दिया। ऊपर पहुंच कर कमरे के दरवाजे को खटकाने जा ही रही थी कि दरवाजा खुल गया, पर सामने रज्जू दा तो नही थे,ये तो कोई और था। तब तक सामने खड़े आगंतुक ने हाथ बढ़ाकर धानी के हाथ से ट्रे ले ली ,और वापस अंदर मुड़ गया।अच्छा तो यही था पिंटू,,चाची का आई आई टियन भांजा।

                 धानी वापस मुड़ कर जाने लगी तो पीछे से एक थैंक्यू सुनाई दिया,मुड़ कर मुस्कुरा कर वो जल्दी जल्दी नीचे उतर गयी।
                             यही थी वो मुलाकात जिसके बाद धानी का मन  “मैनें प्यार किया “देखने मे भी नही लगा,कितने मन से आयी थी ,और यहां सारा वक्त उसी के बारे मे सोचते गुजर गया।

                   इसके दो तीन दिन बाद धानी दोपहर मैं स्कूल से वापस आयी तो रज्जू दा और पिंटू उसके घर पे बैठे खाना खा रहे थे,वो रसोई में गयी तो मां ने बताया कि रीमा चाची की तबीयत कुछ नासाज है इसी से मां ने दोनों को यही बुला लिया खाने पे।

      उसके बाद तो सिलसिला सा चल निकला ,जाने क्यो धानी को पिन्टू दा को छुप छुप के देखना बड़ा भाता था।अपनी छत पे बने लोहे के दरवाजे के ऊपर बनी जाली से वो बीच बीच मे झांक लगा लेती की बाजू वाली छत पे पिन्टू दा आ गये या नही।
   और जैसे ही देखती की आ गये वो झट किसी ना किसी बहाने छत पे आ जाती।
           कभी पहले से पानी मे तर पौधों मे पानी डालती ,कभी सुखे कपड़े पलटने लगती।
    और इन्ही सब के बीच कभी रज्जू दा उसे कैसे छेड़ देते ,कितना गुस्सा आता था उसे।
   “अरी धानी कभी पढ़ लिख भी लिया कर,बस इधर उधर डोलती फिरती है।”इस साल भी फेल होना है क्या।”
     पिन्टू के सामने कट के रह गयी धानी।रज्जू दा भी कभी कैसा बचपना कर जाते हैं ।
   पर पिन्टू उससे हमेशा बहुत प्यार से बात करता ,धानी जी बोलता ,,आप आप कर के उसे किसी राजकुमारी सा अह्सास कराता ।

   अक्सर शाम को उनकी ताश की बाजी जमती।रीमा चाची ,रज्जू दा,वो और पिन्टू।
उसकी और रज्जू दा की जोडी हमेशा ही जीत जाती और वो बड़ी अदा से पिन्टू को देख मुस्कुरा देती।
     एक बार चाची के साथ पकौड़ी तल रही थी,तभी कोई किताब पढते पढ़ते पिन्टू रसोई मे आया,उसे लगा मामी खड़ी है,उसने चट प्लेट से एक पकौड़ा उठाया और मुहँ मे भर लिया।
गरम पकौड़े की जलन से तिलमिला गया की तभी धानी पानी भरा ग्लास ले आयी।
    पिन्टू की जान मे जान आयी “थैंक यू धानी जी! मेरा ध्यान ही नही गया ,पढ़ने मे लगा था ना।”और हँसते हुए पिन्टू वहाँ से चल दिया।
  पर इस खाने पीने के चक्कर मे अपनी किताब भूल गया।
     धानी उसे उठा ले गयी।”मिल्स ऐण्ड बून” !
हे भगवान ! ये प्यार जो ना कराये,,धानी के लिये एक किताब पढ्ना उतना ही दुष्कर था जितना एक लंगडे के लिये रेस मे भागना और एक गून्गे के लिये गीत गाना।
    पर फिर भी बिचारी डिक्शनरी खोल के पढ़ने बैठी।उसकी बुद्धि जितना समझ सकती थी उतना उसने भरसक प्रयत्न किया फिर किताब को पकड़े ही सो गयी।

     कुछ दिन बाद होली थी।इस बार धानी ने अपनी जन्म दायिनी की भी उतनी सहायता नही की जितनी रीमा चाची के घर लोयियाँ बेली,उनके हर काम मे कदम ताल मिलाती धानी यही मनाती की चाची किसी तरह पिन्टू के लिये उसे उसकी माँ से मांग ले।
      होली का दिन आया ,हर होली पे पूरे मोहल्ले को रंगती फिरती धानी इस बार नव वधु सी लजिली बन गयी।उसे एक ही धुन थी।
   पिन्टू रज्जू के साथ उनके घर आया ,उसके माँ बाबा के पैर छुए आशीर्वाद लिया,उसके गालों पे भी गुलाबी रंग लगाया और चला गया।
    बस धानी ने सब जान लिया,उसने प्रेम की बोली अपने प्रियतम की आँखो मे पढ़ ली।

सारे रस भरे दिन चूक गये,और एक दिन पिन्टू कानपुर लौट गया।
      धानी चाची के घर आयी तब चाची ने बताया “अरे धानी ,बेटा एक कप चाय तो पिला दे।”आज सुबह से जो रसोई मे भीड़ि तो अभी फुर्सत पायी है,आज पिन्टू निकल गया ना,उसीके लिये रास्ते का खाना बनाने मे लगी रही।”
” कब निकले पिन्टू दा,कुछ बताया नही उन्होनें ।क्या अचानक ही जाना हुआ क्या उनका।”
    अपनी आवाज की नमी को छिपाते हुए उसने पुछा।
“रिसेर्वेशन तो पहले ही से था ना लाड़ो,इतनी दूर कही बिना रिसर्वेशन जाया जा सकता है क्या।”

हाँ जाया तो नही जा सकता पर बताया तो जा सकता है,इतनी भी ज़रूरत नही समझी,की मुझे बता  के जायें।
 
            ठीक है कभी हमने एक दूसरे से नही कहा लेकिन क्या हम दोनो ने एक दूसरे की आंखो मे प्यार देखा नही।
     
                 एक 14वर्ष की किशोरी दुख के अथाह सागर मे डूबने उतराने लगी।उसका पहला प्यार उससे बहुत दूर चला गया था,पर उसे अपने प्यार पे विश्वास था,एक दिन  उसका प्यार अपने पैरों पे खड़ा होके उसके घर बारात लिये आयेगा और उसे चंदन डोली बैठा के ले जायेगा।

     पिन्टू धानी के हृदय की कोमलता से सर्वथा अनभिज्ञ था,वो छुट्टियां मनाकर वापस लौट अपनी पढाई मे व्यस्त हो गया।

    समय बीतता गया,जीवन आगे बढता गया,पर धानी के मन से पिन्टू नही निकल पाया।

     धानी ने बहुत सुन्दर स्वेटर बुना है,जाने कब मिलना होगा पिन्टू से,पर जब भी होगा तभी वो अपनी प्रेम भेंट उसे देगी।ऐसा सोच कर ही धानी गुलाबी हो जाती।

    रज्जू के दादा 89बरस के होके चल बसे,पूरा घर परिवार शोकाकुल है,धानी भी,पर बस एक खयाल उसे थोड़ा उत्फुल्ल कर रहा की अब तो पिन्टू आयेगा।
        पिन्टू आया,पूरे 8बरस बाद!  धानी का पहला प्यार वापस आ गया।
     रीमा चाची के घर पूजा पाठ संपन्न हो रहा,तेरह बाम्हण जिमाने बैठे है,धानी दौड दौड कर सारे कार्य कर रही जैसे उसके खुद के ससुराल का काम है।अभी तक पिन्टू की झलक नही मिली पर उसी इन्तजार का तो मज़ा है।
      सारे काम निपटा के चाची बोली “जा धानी पिन्टू उपर रज्जू के कमरे मे है,जा ये थाली वहाँ दे आ।”
     थाली लिये राजकुमारी चली।मन ऐसे कांप रहा की अभी गिर पड़ेगी ।थाली ऐसी भारी लग रही की कही हाथ से छूट ना जाये,घबड़ाहट से हथेलियों मे पसीना छलक आया है,दिल की धड़कन तो धानी खुद सुन पा रही है।
   
             उफ्फ कैसा होगा वो समय ! जब वो पिन्टू को देखेगी ,उसे स्कूल मे पढी एक कविता की लाइन याद आ रही।
    ‘”चित्रा ने अर्जुन को पाया,शिव से मिली भवानी थी”।
   प्रेम का अपना अनूठा ही राग होता है वीर रस की कविता मे भी शृंगार रस की एक ही लाइन याद रही लड़की को।
  
  धडकते हृदय और कांपते हाथों से द्वार पे दस्तक दी उसने।
  “दरवाजा खुला है”वही भारी आवाज,सुनते ही धानी का हृदय धक से रह गया।धीरे से किवाड़ धकेल उसने खोला।
    
   अन्दर कुर्सी पे बैठा पिन्टू कुछ पढ़ रहा है,हाँ पिन्टू  ही तो हैं।पिन्टू ने आँख उठा कर धानी को देखा, धानी ने पिन्टू को, नजरे मिली,पिन्टू मुस्कुराया, पूछा
“कैसी है धानी ?” धानी के गले मे ही सारे शब्द फंस गये ,लगा कुछ अटक रहा है।
  “ठीक हूं पिन्टू दा।आप कैसे हो ?” इतना कह कर थाली नीचे रख धानी वापस सीढिय़ां उतर गयी।
  “मै तो एकदम मस्त ।”पिन्टू की आवाज सीढियों तक उसका पीछा करती आयी।

   हां मस्त तो दिख ही रहे,हे भगवान !कोई आदमी इतना कैसे बदल गया वो भी 8 ही वर्षों मे।
   नही! हे मेरे देवता! कोई मुझे आके बोल दो ,ये पिन्टू नही है।
    धानी को ज़ोर की रुलायी फूटने लगी,वो वहाँ से भागी ,अपने कमरे मे जाके ही सांस ली।
  अपनी आलमारी मे अपने कपडों के बीच छिपा के रखा स्वेटर निकाला और उसे अपने सीने से लगाये रोती रही।
     कितना मोटा आदमी सा हो गया था पिन्टू,पेट तो ऐसे निकल आया था जैसे कोई आसन्न पृसुता है जिसे अभी तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ेगा।उफ्फ सर के घने बाल भी गायब,ये तो बिल्कुल ही गंजा हो गया।
     पूरा चेहरा फूल के कुप्पा हो गया है,इतने लाल से गाल ,गालों का इतना उभरा मांस की बड़ी बड़ी आंखे भी चीनियों सी छोटी दिख रही। पूरी शकल ही बदल गयी जनाब की बस नही बदली आवाज।
     तो क्या आवाज के भरोसे ही शादी कर लुंगी।।
  ” हे भगवान !  बचा लिया मुझे,अच्छा हुआ अपनी बेवकूफी किसी से कही नही मैने।”
   “अपने प्रथम प्रेम को अपने ही मन तक सीमित रखा।”
  
बेचारी धानी जब रो धो के फुरसत पा गयी तब अपने बुने स्वेटर को लेके बैठी,अब उसे उधाड़ना जो था ,ये स्वेटर अब उसका प्रेमी कभी नही पहन पायेगा।।

उधेड़बुन  एक छोटी सी प्यारी सी प्रेम कथा है ,जो किशोर वय के प्रेम को दर्शाती है,जिसमे नायिका को हमेशा ही लगता है, उसका प्रेम बहुत उंचे आदर्शों पे टिका है,जबकी वास्तव मे उसके प्रेम का  आधार सिर्फ रूप ही है,और जीवन की वास्तविकता से दो चार होते ही धानी का गुलाबी प्रेम विलोपित हो जाता है।।।

कहानी को पढ़ने के लिये धन्यवाद!

अपर्णा।
           

जीवनसंगिनी

     आज आंसू हैं की रुकने का नाम ही नही ले रहे,पर उन्हें आंखों मे रोके रहना मजबूरी है,बहुत नज़ाकत से हल्के हाथों से ही टिशू से आँखो की कोर पोंछ रही हूँ ।
     “मानसी no dear ,plz don’t spoil,..पूरा मेकप खराब हो जायेगा।”
   मेरी ब्युटिशियन ,मेरी सखियाँ,सभी समझा रही मुझे,की अपनी शादी के दिन ऐसे कौन रोता है भला।

तभी नीचे से बुलावा आ गया,जयमाला के लिये,मुझे मेरी सखियाँ,बहनें नीचे ले चली।
जयमाला हुई,फेरे फिरे और मेरी मांग मे अनुराग ने सिन्दूर भर दिया।

दुल्हने सतरंगी अरमान लिये जातीं हैं,मैं राहुल की यादों की पोटली लिये ससुराल चली।

शादी के दूसरे दिन सत्यनारायण पूजन मे एक बार फिर गठजोड़ कर के हमे साथ बैठाया गया,तब भी अपने जीवन संगी को अच्छे से देख नही पायी।

फिर घूमने फिरने हमे ऊटी भेजा गया,पहली बार फ्लाइट में इन्हें भर आँख मैने देखा,इनमे ऐसा क्या दिखा मेरे पिता को ,वही ढूंडने की कोशिश करती रही। कहाँ उनकी चम्पा चमेली सी लड़की और कहाँ ये खडूस। समझ आ गया बाबा को सिर्फ लड़के की कलक्टरी ने ही रिझाया था।

   कितने मनोयोग से बी एस सी प्रथम वर्ष मे प्रवेश लिया था,वहाँ पहुचते ही सीनियर की रैगिन्ग का शिकार होना पड़ा,उफ्फ एक गाना ना गा पाने के कारण ही राधिका मैम ने बहुत ज़ोर की लताड़ लगायी,पर तभी किसी की गहरी आवाज कानों मे पड़ी।
“अरे राधा ,उन मोहतरमा को मत परेशान करो भाई,देख नही रही,कितना घबरा गयी है, जाईये जाईये आप अपनी क्लास मे जाईये।”
जान बचा कर जो भागी मैं,पर जाते जाते अपने उस मसीहा को देख लिया मैने ,राहुल!
 
             अन्तिम वर्ष का होनहार छात्र,जितना होशियार उतना ही मनोहारी,गोरा, लम्बा चौड़ा,ऐसे जैसे फिल्मी हीरो ।
   
                 उसके बाद हमारी दोस्ती हो गयी,जो जल्दी ही प्यार मे बदल गयी,सभी सहेलियां राहुल के नाम से छेड़ती ,ऐसा लगता जीवन सफल हो गया मेरा।
  साथ साथ समय बहता गया ,मैं अन्तिम वर्ष मे आ गयी, राहुल एम एस सी करने लगा।मैं  शादी चाहती थी पर राहुल कैरिअर ,सही भी तो था।मै रुकने को तैयार भी थी पर जाने कहाँ से दुर्भाग्य ने जीवन मे दस्तक दे दी।

    मेरी फुफी की बेटी की शादी मे अनुराग की माताजी ने मुझे देखा ,परिवार के बारे मे पता किया और झट रिश्ता भेज दिया।
   बाबा तो फुले नही समाए ,इतने बड़े घर का लड़का वो भी प्रथम प्रयास मे बना कलेक्टर,उनकी नज़र मे तो उनकी पुत्री का सौभाग्य द्वार खुल रहा था।

      ऊटी से लौटने के बाद हम अनुराग की नौकरी वाले शहर मे आ गये,प्रथम नियुक्ति थी इसीसे एक छोटा सा कस्बा ही था,वहाँ भी सारे प्रशासनिक अधिकारियों की एक अलग कॉलोनी थी।

   हमारा जीवन भी चल निकला,बाकी दम्पतियों की तरह,शान्त और सुगम।
   मैने अनुराग से कभी कोई शिकायत नही की ना उन्हें मौका दिया,पर ये आदमी कभी मेरे हृदय मे जगह नही बना पाया।
   
    एक दिन अचानक फोन बजा”हेलो ! मनु मै बोल रहा हूँ राहुल।”
“यार तुमने अपना मोबाईल नंबर भी बदल दिया,हद करती हो,ये भी नही सोचा मेरा क्या होगा?”
“हेलो राहुल,कैसे हो तुम?”
“मै ठीक हूँ,अभी ये बताओ ,तुम हो कहाँ ।मै मिलने आना चहता हूँ ।मिलोगी ना,या शादी हो गयी तो भूल गयी हमे।”
“हां,मिलूंगी। बाद मे बात करती हूँ,अभी दरवाज़े पे कोई है।”
  
  बहाने से फोन काट दिया ,दिल की धडकने इतनी तेज हो गयी की सच मे दरवाजे की आवाज कानो मे नही पड़ी।

    फिर जाने अनजाने राहुल से बाते शुरु हो गयी,छोटे मोटे संदेशों का आदान प्रदान ,फोटो की अदला बदली ,जीवन फिर सुखमय होने लगा।

    एक दिन ऐसे ही राहुल मे खोयी सब्जी काट रही थी,उंगली कट गयी।खुद ही अल्हड़ सी पट्टी  बांध ली।अनुराग ने नाश्ते के बीच पुछा भी “ये क्या लग गया मानसी।”
                   उफ्फ इस आदमी को बात भी तो करना नही आता,कौन आदमी होगा संसार मे जो अपनी रूपसी पत्नी से ऐसे बोलता होगा,मानसी ! अरे मानू बोल लो,मनु बोलो,मोना बोलो पर नही मानसी !
   मैने भी उतनी ही रुखाई से जवाब दिया-“कुछ नही प्याज काटते मे कट गया।”
    इन्होने नाश्ता खतम किया और औफिस चले गये।
    ऐसी आग लगी की क्या कहूँ,मै भी द्वार भिड़ा कर राहुल को संदेश भेजने मे व्यस्त हो गयी।राहुल को इनकी सारी करनी बताती हूँ ।
 
               मुझे अचंभित करते हुए अनुराग दोपहर अचानक घर चले आये,अपना टिफिन डब्बा भी साथ लाये थे। आते ही बोले”मानसी जल्दी तैयार हो जाओ ,मै रास्ता देख रहा हूँ ।”
               “कहाँ जाना है।”पर मेरा सवाल हवा मे ही खो गया,इनका अर्दली इनके सामने मुझसे कही ज्यादा ज़रूरी फाइल खोल चुका था,और ये उसमे डूब चुके थे।
                   मै अन्दर गयी ,मुझे 10मिनट भी नही बीते की इनकी आवाज आयी,”हो गयी तैयार।”।
                     हे ईश्वर क्या करुँ इस आदमी का,इस संसार मे कौन ऐसी स्त्री होगी जो सिर्फ 10मिनट मे तैयार हो जाये।अभी तो मै अपनी आलमारी खोले यही देख रही थी की क्या पहनूँ ।तभी जिलाधीश महोदय फिर गरजे ” मानसी तुम्हे वापस घर छोड़ मुझे टी एल मीटिंग के लिये जाना।जल्दी कर लो।”
    
               लगा आलमारी के दरवाजे पे अपना सर फोड लूँ ।  जैसे तैसे 15मिनट मे तैयार होके बाहर आयी,हमेशा की तरह इन्होने देखना भी ज़रूरी नही समझा ।हम कार मे बैठे चल दिये।
                               कॉलोनी मे ही एक छोटा सा अस्पताल था,गाड़ी वहाँ जाकर रुकी।
                     मै जब तक अपनी गुलाबी सितारों वाली साड़ी  का आंचल बचाती उतरी ये लपक के काऊंटर पर पहुच्ं के कुछ फॉर्म जैसा भरने लगे।
                     उफ्फ अगर किसी मरीज को ही देखने आना था तो एक बार बता ही देते ,मै इतनी गहरी लाल लिपस्टिक तो ना लगाती,मुझे तो लगा कही बाहर लंच पे लेके जा रहे।
                      ये पर्ची लिये एक कमरे मे दाखिल हुए,पीछे मै भी।वहाँ बैठी डॉक्टरनी ने पूछा -“अरे आईये कलेक्टर साहब ,क्या तकलीफ हो गयी आपको।”
   “जी मुझे नही ,इन्हे” “असल मे सुबह इनकी उंगली कट गयी।”
“ओहो वाह is she your wife..she is quite a mouth full “
उस सात्विकी साऊथ कॉटन साड़ी धारिणी के सामने मेरी रेशमी साडी मुझे डंक मारने लगी।
    क्या सोच रहे होंगे सब , टी टी इन्जेक्शन लगवाने   कौन इतना सज के आता है।

   हम घर पहुचें,अनुराग उस दिन बिना खाए ही चले गये,मीटिंग का समय हो गया था।आज की कोई भी बात राहुल को नही बता पायी।

       एक दोपहर माँ का फ़ोन आया”मनु जल्दी आ जा बेटा,तेरे पापा को अस्थमा का दौरा पड़ा है,भर्ती कराना पड़ा ।”
       घबरा कर तुरंत अनुराग को फ़ोन मिलाया पर इनका नंबर व्यस्त आ रहा था,मै जल्दी जल्दी सामान रखने लगी ।  10मिनट बीते की ये दरवाजे पे खड़े थे,”मानसी जल्दी करो”।
    मुझे अच्छा लगा की ये मुझे मायके भेजने तैय्यार हो गये,सामान लेके बाहर आई,तो इनके अर्दली सारा सामान इनकी गाड़ी मे रखने लगे। मै बैठी,और ये भी,मैने इनकी तरफ सवालिया नजरों से देखा “ट्रेन की टिकट नही मिली मानसी,हम दोनो कार से ही चलेंगे।तुम्हे फ़ोन करने के बाद छोटु ने मुझे भी फ़ोन कर दिया था।”
      पहली बार जीवन मे इनके गले से लगने का बहुत मन किया ,पर मैनें खुद को संभाल लिया।
      वहाँ जाकर तो ये मेरे मायके मे ऐसे घुल मिल गये जैसे ये ही उनके बेटे हैं,मै कुछ नही,सारी भाग दौड की और 2ही दिन मे बाबा की छुट्टी करा के हम घर ले आये।
      शाम को माँ मेरी बिदाई की तैय्यारी मे लगी थी “क्या माँ इतना सारा कुछ देने की क्या ज़रूरत,अभी  बाबा के मे भी कितना रुपया खर्च हुआ होगा,रहने दो ना।”
     “कहाँ कुछ खर्च हुआ लाली,सारा बिल तो जमाई जी ने भर दिया,हमे तो देखने तक नही दिया,छोटु ने जबर्दस्ती छीन के देखा 75000का बिल था।”
     “सच बहुत पुण्य किये है लाड़ो तूने,जो ऐसा पति मिला।” उस रात हम वापस आ गये।

      कुछ दिन बाद करवा चौथ का व्रत पड़ा, भारतीय औरतें भले अपने पति से प्यार ना करे पर पति के लिये रखे जाने वाले व्रत उपवासों से उन्हें बहुत प्रेम होता है,मै भी बहुत चहक के करवा चौथ की तैयारियाँ करने लगी।
                         पर करवा चौथ वाले दिन सुबह ही ज़ोर का सर दर्द चढ़ गया,जब तक नहा धो के आई ,ये नाश्ता करके निकलने की तैयारी मे थे,मेरा सूखा  मुह देख के पूछा “क्या हुआ तबियत ठीक नही क्या।”
जवाब मैने नही कामवालि रधिया ने दिया”आज बहुजी का व्रत है साहब ,करवा चौथ।”
               “अच्छा कुछ जूस वूस ही ले लो,तीरथ को भेज के फल वगैरा मंगा लेना।”
       मंगा लेना ,मेरा सर ,कितना रूखा आदमी है ये।
“अरे जूस कहाँ पियेंगी साब ,आज तो बहु जी निर्जला व्रत किये हैं,शाम को चांद की पूजा कर आपके हाथ से ही पियेंगी।”
     पता नही सुने या नही ,चले गये।    मै भी आराम से सोफे पे पसर गयी और राहुल से वाट्स अप पे बात करने लगी।

        राहुल मुझे देखने को कितना उत्सुक रहता था,उसके कारण हर 2दिन बाद डी पी बदलना पड़ता था,लेकिन उसकी एक बात मुझे पसंद नही आती थी,उसका अनुराग की बुराई करना।
    
                   आज भी राहुल इधर उधर की ढेरों बाते बता रहा था,अचानक उसने कुछ ऐसा कहा की मन खट्टा सा होने लगा।
     वो मेरे शहर आके कुछ दिन रुकना चहता था,किसी होटल मे,जहां हम आराम से मिल सके ।
  “मिलने की क्या ज़रूरत है राहुल,दिन भर तो बातें करतें हैं हम।”
   “ज़रूरत है मनु,सिर्फ बातें ही तो सब कुछ नही होती ना।””तुम समझ तो रही हो ना ,मै क्या कह रहा।”
   “मै अच्छे से जानता हूँ,तुम्हारे खडूस पति को,घमंडी है बहुत,सोचता क्या है,कलेक्टर बन गया तो सब उसके गुलाम है।इतनी सुन्दर बीवी को भी नौकर बना रखा है।”
                            “नही राहुल ऐसी तो कोई बात नही,अनुराग ने कभी मुझे कुछ भी करने को विवश नही किया।”
“अरे तो इसका क्या मतलब ,कभी उसने तुम्हारी तारीफ की क्या।”
“नही तारीफ तो नही की,पर बुराई भी तो नही निकाली।बल्कि जब उस दिन उस डॉक्टर ने मेरी तारीफ की तो अनुराग ऐसे लजा गये की मुझे भी हंसी आ गयी।”
                    “क्या बात है मैडम ,आज बड़ा प्यार उमड रहा ऐसे तो बड़ी बुराईयां निकालती हो।”
                               “अच्छा खैर वो सब छोड़ो,सच बताओ ,तुम मिलोगी या नही,,अगर तुम्हारा इससे आगे जाने का इरादा नही है तो कल से ये गप्पे मारना भी बन्द करो यार,बोर कर दिया है तुमने अपना अनुराग पुराण सुना सुना के”।

   कान मे जैसे सीसा पिघल गया,कैसा आदमी था ये राहुल ,कभी तो मै इसकी जान हुआ करती थी,घण्टों मेरी बातें सुनता था,और आज 3ही महिनों मे मै बोर हो गयी। ईश्वर तेरी माया,क्या पुरूषों को बस यही चाहिये।

   फ़ोन बन्द कर मैने आंखे बन्द कर ली,कुछ अच्छा सोचने का मन कर रहा था,पर ये क्या बन्द आंखों मे बार बार अनुराग क्यों चला आ रहा था।

   शाम को कॉलोनी मे एक साथ सभी की पूजन व्यवस्था की गयी थी,मै भी शादी का जोड़ा पहन तैयार हो गयी।
                    आईने मे खुद को देखती ही रह गयी।इतना सुन्दर भी कोई हो सकता है,अपने मे खोयी मुस्कुरा रही थी तभी कमरे के कोने मे मेरे पीछे खड़े अनुराग पे नज़र पड़ी,वो भी मुझे मुग्ध दृष्टी से देख रहे थे ,मुझसे नजरें मिलते ही तुरंत ही अपनी नज़र हटाये हाथ मुह धोने चल दिये।
               और  मैं अपने इस विजय पर्व पर इठलाती बाहर चली आई।रसोई मे रधिया रात के खाने की तैयारी कर रही थी,कढी मैने बना कर रख दी थी,वो पूरिया निकाल रही थी,बोली “बहु जी आज साहब का डिब्बा ऐसे ही आ गया,साहब तो खाना खाए ही नही।”
    अब इस आदमी के लिये उतना रूखापन नही था मन मे ,पर इस निष्ठुर पे पूरी तरह भरोसा भी नही था,की ये आदमी मेरे लिये भोजन त्याग सकता है।

     ये कुर्ता पहने तैयार हो आये,मैरून कुर्ती मे अच्छे लग रहे थे।हम नीचे गये और पूजा निपटा ली।जान बूझ कर तो ये इंसान कर ही नही सकता अनजाने ही हुआ होगा,इन्होनें भी वही रंग पहना जिस रंग की मेरी साडी थी । हम दोनों ने एक से रंग के कपड़े पहने थे,जिसके कारण नीचे सभी हमे छेड़ते रहे।

     मेरी उस दिन के बाद राहुल से  बात चीत काफी कम हो गयी और अब मै पहले से अधिक सावधान थी,सिर्फ हल्की फुल्की बातें ही करती,ज्यादा भावुकता से बचने लगी थी।
    एक दिन इनकी आलमारी जमा रही थी की ऊपर के आले से एक तस्वीर और एक चिट्ठी गिरी ।
तस्वीर निहायत ही खूबसूरत सी एक लड़की की थी,नाम लिखा था लालिमा,वो सच लालिमा ही थी,साथ मे जो चिट्ठी थी उसे मैने पढ्ना शुरु किया।
” माननीय
       आपके घर पर मैनें मेरी बहन के लिये रिश्ते का प्रस्ताव भेजा था,पर आपकी माताजी को कोई और लड़की भा गयी है,हमने उसका सारा कच्चा चिठ्ठा निकाला,उसका उसके ही कॉलेज के किसी लड़के के साथ संबंध है,सुनने मे आया की लड़की भागने को भी तैय्यार थी,वो तो लड़का संस्कारी निकला।
  आपके घर से हमे खोटे सिक्के सा फिरा दिया गया,मैं नही जानता की वो लोग ऐसा क्या दे रहे जिसका लालच आपके घर वालों पे हावी है,पर हम आपको 30 लाख रुपये और बाकी सारा सामान देना चाहतें हैं जब ये प्रस्ताव आपके पिता के सामने रखा तो उन्होने मुझे बाहर का रास्ता दिखा दिया। आजकल के लड़के खुद समझदार हैं स्वयं अपना निर्णय लेने मे सक्षम हैं इसीसे ये पत्र भेज रहाँ हूँ,साथ ही फोटो भी है,पसंद आये तो आप हमे  फ़ोन कर लीजियेगा।
         आपका धरनीधर।”

  मेरा सर घूम गया,कुछ नही सूझा क्या करुँ,मै जाने कब तक वैसे ही बैठी रही,अनुराग कब आये,पता ही नही चला,वो आये ,मेरे हाथ से चिट्ठी ली और फाड़ के फेक दी।
  
                  मैनें आँख उठा कर इन्हे देखा और ज़ोर से रो पड़ी।ये घबरा गये पर वही बैठ कर मुझे सांत्वना देते रहे।

                  “आपने एक बार भी मुझसे कुछ नही पुछा,आप खुद को समझते क्या हैं।क्यों की आपने मुझसे शादी,आज आपको मुझे सब सच बताना ही पड़ेगा।”
               “अरे मानसी क्या बताऊँ ।मैने किसी ज़ोर जबर्दस्ती मे शादी नही की।”देखो जब से नौकरी लगी ,घर पे विवाह प्रस्तावों की बाढ़ सी आ गयी।मै शुरु से ही पढाई मे लगा रहा,कभी जीवन मे कोई लड़की नही आई,माँ से कह रखा था,उनकी पसंद ही मेरी पसंद।”   
       “तो आपको उस चिट्ठी पे विश्वास नही हुआ,की मेरा मेरे कॉलेज मे कुछ…”
           “तुम पागल हो क्या,अरे इस तरह की चिट्ठी पे कौन पुरुष विश्वास करेगा और जो इस पे विश्वास करे उससे बढ़ के मूर्ख मेरी नज़र मे कोई नही।”
      “पर सोचो अनुराग ,अगर ये बात सच होती तो।”
          “तो क्या ,मुझे तो शादी के 5महिनों मे ऐसी कोई कमी मेरी बीवी मे नज़र नही आई, रही बात तुम्हारे पास्ट की ,तो वो हर किसी का एक खुबसूरत पास्ट होता है,पर सच्चा इंसान वही है ,जो सच्चाई से ईमानदारी से अपने जीवन की धारा मे बहता जाये।”
            “हाँ बात वहाँ गलत हो जाती,जब मै या तुम अनिच्छा से इस बन्धन मे बन्धे होते और दुनिया वालों के लिये इस रिश्ते को खीचते चलते,वो मेरी नज़र मे पाप होता,ऐसा कुछ अगर तुम मुझे बताती तो मै दूसरे ही दिन तुम्हे खुद उसके पास पहुँचा देता जिससे तुम असल मे प्यार करती होती।”

     “और हाँ,एक बात और हर इंसान अपने आप मे सम्पूर्ण नही होता,अगर तुम मे कुछ कमियाँ हैं तो मैं तो कमियों की खान हूँ,अगर तुमने मुझे 5 महिने झेल लिया तो पूरा जीवन झेल ही लोगी।”
                “देखो मानसी बहुत लच्छेदार बातें मै नही जानता,मुझे कविताए ना पढना आता ,ना लिखना ,मै एक साधारण सा आदमी हूँ जो अपने परिवार से अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता है,पर मुझसे ये उम्म्मीद ना करना की मै रोज तुम्हारी तारीफ करुँ ।”
               “पर मुझे तो पसंद हैं कवितायेँ “मैं मुस्कुरा उठी,  कितना सरल जीवन परिचय मुझे समझा गये अनुराग,सच तो है जीवन कोई फिल्म नही ,यथार्थ है और यहां मेरे अनुराग जैसे हीरो की ही ज़रूरत है।

   मैं मुस्कुराते हुए रसोई मे चाय चढ़ाने चली गयी,चाय बनाते बनाते ही राहुल को सारा किस्सा कह सुनाया और ये भी बता दिया की वो अब मेरा सिर्फ अच्छा दोस्त है,उससे ज्यादा की मुझसे कोई उम्मीद ना रखे।

    अब मैं अपने रूखे सूखे पति को कैसे अपनी पत्नी को खुश रखना है,कैसे बात करना है,ये सब सब समय समय पे सिखाती रहती हूँ,रोज डे पे मै ही  गुलाब देती हूँ,चॉकलेट डे पे चॉकलेट और वैलेन्टाइन डे पे उन्हे डिनर पे भी ले जाना मेरा ही काम है,,
      हाँ मेरा नीरस कलेक्टर इन सब मौको पे अपना अमुल्य समय मुझे दे देता है,और मेरी इन सब कारगुजरियों पे शरमा के गुलाबी भी हो जाता है,लेकिन आज भी खुल के I love u नही बोल पाता और मै जानती हूं कभी बोल भी नही पायेगा।

इति।

 इतिहास

मैं छोटी थी उस समय ,उमर तो याद नही पर शायद नौ या आठ बरस की रही होंगी।     मेरे घर की छत से लगी छत थी उनकी,उनके घर के अमरूद मेरी छत पर झांकते थे और मेरे घर के गुलमोहर उनकी बालकनी पर….. रोजाना शाम में मैं उनकी बातें सुनने कभी उनकी कहानियां सुनने छत पर चली जाती थी,असल में उन्हे सुनना नही देखना मेरा मकसद होता था,वो थी ही इतनी खूबसूरत,,पूरे मोहल्ले की क्लियोपेट्रा!!       ताज़गी भरा गुलाबों सा चेहरा,होंठ ऐसे थे जैसे भगवान ने उन्हें पर्मानेंट लिपस्टिक लगा कर भेजा हो , लाख कोई ढूंढना चाहे उनके चेहरे पे कोई एब ना ढूँढ पाये ऐसा नूरानी चेहरा था,और वैसी ही चटकीलि बातें।।       नाम था नितेश!!   रज्जू दा अक्सर मुझे नितेश दीदी के लिये कुछ रंग बिरंगे परचे दिया करते थे,जिन्हे एक छोटी सी एक्लेयर के बदले मैं सात तालों में छिपाकर दीदी तक पहुंचा दिया करती थी    वो मोहल्ले के जुलियस सीज़र थे, इन्जीनियरिन्ग द्वितीय वर्ष के घनघोर जुझारू विद्यार्थी,मैं उन्हें अक्सर ड्राफ्ट और स्केल दबाये शाम को कॉलेज से हारा थका लुटा पिटा घर लौटते देख कर सोचा करती कि ये महापुरुष आगे चल कर कोई ना कोई इतिहास ज़रूर लिख जायेगा     इतिहास का तो पता नही पर उन्होने चिट्ठियां बहुत लिखी,गुलाबी लिफाफे मे गम से चिपका कर अच्छी तरह सील पैक कर के ही मुझे देते थे और जब मैं डाकिए का सीरियस रोल अदा कर चिट्ठी को माफिक जगह पहुंचा आती तब एक एक्लेयर पकड़ा देते…..    …..पहले पहले मिलने वाली एक्लेयर बाद मे दस रुपये की डेरी मिल्क में बदली और डाकिए के पद से मेरे त्यागपत्र देने के ठीक पहले मुझे रोस्टेड एल्मंड मिलने लगी थी।।    समय के साथ ये प्रेम कहानी भी अपने अंजाम को पहुंच गयी ,डीग्री के बाद रज्जू दा एम टेक करने बाहर चले गये……          विरह मे विरहणी भी कितना रास्ता तकती ,बी ए,एम ए सब हो चुका था,घर वालों ने रिश्ता ढूँढ़ा,फेरे हुए और नितेश दी हम सब को छोड़ कर आस्ट्रेलिया उड़ गयी।।।   *   अब ससुराल नौकरी सब से फुरसत ही नही होती की मायके में रुक पाऊँ,पर इत्तेफ़ाक़ से वैलेन्टाइन वीक पर ही घर पर भी कुछ आयोजन में आना और रुकना हुआ ।।।       शाम को मोहल्ले के गणपति मन्दिर में आरती के लिये गयी,वहाँ से लौट ही रही थी कि रज्जू दा के घर की ओर नज़र चली गयी,एक चौदह पन्द्रह साल का लड़का बालकनी मे खड़ा मेरी छत की तरफ देख रहा था,मैने ध्यान से उसकी निगाहों पे गौर किया ,उसकी आंखे मेरी छत से लगी दुसरी छत पर टिकी थी जहां नितेश दीदी की बिटिया अपने नाना की छत पर टहल रही थी….     ध्यान आ गया की माँ ने सुबह ही बताया था नितेश दीदी के भाई के बेटे का मुंडन संस्कार होना है जिसमें वो भी सपरिवार आई हुई हैं।।    चेहरे पर अनायास ही मुस्कान चली आयी,सच कहा है किसी ने “इतिहास खुद को दोहराता है”।aparna…