गुल्लक-3 ……

मेरी नजर से….. समीक्षा

आजकल के कानफोड़ू गाली गलौज और वीभत्स रस के स्पष्ट उदाहरण कहीं जा सकने वाली भयंकर एक्शन से सजी महा पकाउ और बोरिंग एक जैसी ढेर सारी वेब सीरीज के बीच मिडल क्लास फैमिली की सौम्य शांत और सभ्य कहानी गुल्लक आपके मन को मोह लेगी…

Advertisements

गुल्लक टीवी पर चलती ढेर सारी सीरीज के बीच में बिल्कुल वैसी ही लगेगी जैसी तेज गर्मी में गन्ने के रस की रसवती फुहार या फिर बादलों की ओट से झांकती रिमझिम बारिश…

निखिल विजय की कहानी पर अमृत राज गुप्ता के निर्देशन में सजी गुल्लक सीजन 3 को tvf ने प्रस्तुत किया है सोनी लाइव पर 7 अप्रैल से यह सीजन ऑन एयर हो चुका है…

कहानी एक महा मिडल क्लास फैमिली की है। कानपुर का रहने वाला मिश्रा परिवार।

जहां एक पिता है संतोष मिश्रा, जो विद्युत विभाग में कार्यरत हैं… इनके दो बेटे हैं बड़ा अन्नू मिश्रा..जो इस सीजन में नौकरी पा चुका है और नौकरी भी उसने टिपिकल मध्यमवर्गीय पाई है। एमआर की पोस्ट पर काम करने वाला अन्नू मिश्रा तरह-तरह की जुगत लगा कर अपने कंपनी की सेल्स बढ़ाना चाहता है, और इसमें उसका साथ देते हैं उसके तीन और दोस्त! कहानी के तीसरे मुख्य किरदार है अन्नु मिश्रा के छोटे भाई अमन मिश्रा। जिन्होंने दसवीं में तीसरी रैंक कमाई है, और इसी कमाई के कारण इनके गुरु जी और परिवार वाले इन्हें साइंस दिलवाना चाहते हैं …लेकिन अमन मिश्रा जी की दिली ख्वाहिश है कि वे आर्ट स्ट्रीम को चुने और उपन्यासकार बने। कहानी की सबसे मुख्य पात्र है घर भर को अपने तानों से अशांत बनाए रखने वाली हमारी गृहिणी शांति मिश्रा जी, जिन्हें जब अपनी परेशानियों से निकलने का कोई रास्ता नहीं नजर आता तभी बड़े मंदिर के पंडित जी को बुलवाकर शांति पाठ रखवा लिया करती हैं….

Advertisements

गुल्लक एक साधारण से सामान्य से परिवार की कहानी है जो देखते हुए आप बिल्कुल ऐसा महसूस करते हैं कि यह तो हमारे अपने घर की कहानी है… किरदारों के बीच के डायलॉग बहुत सिंपल से हैं लेकिन भाव से भरे हुए हैं…

सीजन 3 के पहले एपिसोड में अमन के स्कूल की लंबी चौड़ी फीस देखकर परेशान मिश्रा दंपति जब अपने बड़े कमाऊ पूत से पैसों के बारे में बात करने में हिचकते हैं तो उन्हें टीवी पर देखते हुए कई जोड़ा मां-बाप की आँखें उनकी उस पीड़ा को देख बरस पड़ती है..जब बड़ी मुश्किल से वह दोनों अपनी पूरी हिम्मत जुटाकर अन्नू से अमन की फीस के बारे में बात करते हैं तो अन्नू अपने महंगे ब्रांडेड जूते खरीदने के सपने को 1 महीने के लिए पोस्टपोन करके अमन के लिए अपनी जेब खाली कर देता है, लेकिन इसका बदला वो जल्दी ही अमन के बालों को नाई के पास ले जाकर कटवा कर पूरा भी कर लेता है… लेकिन इस सारे सीन में दोनों भाइयों के बीच की केमिस्ट्री बहुत लाजवाब ढंग से निखर कर आती है.. इसी के बाद किसी एपिसोड में जब छोटा भाई अमन अपने केमिस्ट्री लैब के फेलियर को अपने बड़े भाई के सामने स्वीकार करता है और साथ ही उसके सामने अपने मन की यह बात रखता है कि वह विज्ञान नहीं पढ़ना चाहता बल्कि आर्ट्स लेना चाहता है तब उसके सामने बैठा बड़ा भाई अन्नू अपने चेहरे के भावों से यह स्पष्ट कर देता है कि “कोई बात नहीं छोटे तुझे जो करना है वह कर तेरे ऊपर मेरा हाथ हमेशा था, है…और रहेगा।

कहानी के छोटे छोटे हिस्से इतनी बारीकी से रचे गए हैं जो बाप बेटे भाई भाई और माता पिता के आपसी संबंधों की मजबूती को बहुत अच्छे से और सुंदर तरीके से चित्रित करते हैं। कहानी में एक और मुख्य किरदार है बिट्टू की मम्मी जिन्हें इस ढंग से रचा गया है कि उनकी एंट्री पर ही हम और आप हंसने को मजबूर हो जाते हैं…

Advertisements

सुनीता राजधर एक लाजवाब एक्टर है… बहुत बार वह बिना डायलॉग बोले सिर्फ अपने चेहरे के एक्सप्रेशन और अपनी बॉडी लैंग्वेज से ही दर्शकों को गुदगुदा जाती हैं। बिट्टू की मम्मी का किरदार एक बहुत खास किरदार है जो अक्सर गली मोहल्लों में हमारे अड़ोस पड़ोस में देखने को मिल ही जाता है…

कहानी की एक खास बात और है कि इस कहानी में घर की गृहिणी कभी अड़ोस पड़ोस में ताका झांकी करके गॉसिप नहीं करती। इस काम का भार पूरी तरह से घर के बड़े लड़के अन्नू के कंधों पर है… जैसे ही कोई भी घर का सदस्य किसी बात को जानना चाहता है और गलती से भी पूछ लेता है ,तो हमारे अन्नु मिश्रा जी पूरी तरह से तैयार होकर रामायण बांचने का काम शुरू कर देते हैं… अपने गली मोहल्ले के बारे में उनका नॉलेज अगाध है और अपने इस अभूतपूर्व नॉलेज को वह समय समय पर अपने परिवार के सदस्यों से बांटते रहते हैं…

सीजन 3 का मुख्य प्लॉट था मध्यमवर्गीय परिवार की इमानदारी!!! उस ईमानदारी के वास्ते अपने रास्ते पर सीधे चलते संतोष मिश्रा जी को जब सस्पेंशन लेटर थमा दिया जाता है तब घर के सभी सदस्य यह सोचना छोड़कर कि संतोष मिश्रा जी मन में क्या सोच रहे होंगे? यह सोचने लगते हैं कि अब घर का खर्च कैसे चलेगा? इतनी ढेर सारी प्रैक्टिकैलिटि भरी है इस सीरिज में की आनंद आ जाता है..

बाकी मध्यमवर्गीय परिवारों में ऐसा ही तो होता है, लोग भावुक बहुत ज्यादा होते हैं लेकिन प्रैक्टिकल होना उनकी मजबूरी हो जाती है । कहानी के अंतिम एपिसोड में जब घर का मुखिया कमरे का दरवाजा बंद कर बेहोश हो जाता है तब उस वक्त उनके दोनों बेटे और पत्नी भावुकता में बहते कैसे उन्हें अस्पताल तक लेकर जाते हैं भर्ती करवाते हैं और किस ढंग से उनका उपचार करवाते हैं यह देखने वालों को हर बार रुला जाता है…. उसी एपिसोड में जब अन्नू अपने पिता को गोद में उठाकर बाहर की तरफ भागता है और उसके पीछे उसकी मां भी उस कमरे से बाहर निकल जाती है, तब चुपचाप खड़ा अमन धीरे से जाता है और अपने पिता की चप्पले उठाकर अपने सीने से लगाए घर से बाहर निकल जाता है इस छोटे से सीन में अमन ने इतना भावपूर्ण अभिनय किया है कि हर बेटा अपने पिता की चप्पलों की तरफ देख कर एक बार को नतमस्तक जरूर होता है…

Advertisements

कहानी के तीसरे एपिसोड में अगुआ की कहानी भी बताई गई है .. अगुआ गांव का वह पुरुष होता है जो अपने नाते रिश्तेदारों दोस्तों यारों के बीच किसी भी निर्णय को लेने के लिए सर्वाधिक सक्षम होता है और बाकी सभी लोग उसके निर्णय को सर्वमान्य मानकर उसकी कहीं बात पर अपनी मुहर लगा देते हैं… संतोष मिश्रा का कोई भूला बिसरा मित्र अपनी बेटी की शादी की बातचीत मिश्रा जी के घर से करने के लिए उनके घर में बेटी पहुंच जाते हैं और इस पूरे आयोजन में संतोष मिश्रा जी की धर्मपत्नी और उनके मित्र की बेटी के बीच एक बहुत ही ममतामई रिश्ता बन जाता है जिसमें शांति मिश्रा जी फुर्तीली से स्पष्ट रूप से कहती हैं फुर्तीली भी इस रिश्ते में अपने मन की बात जरूर रखें….

अभीनय की बात करें तो सभी कैरेक्टर लाजवाब है… संतोष मिश्रा के रोल में जमीन खान हो या शांति मिश्रा जी के रोल में गीतांजलि कुलकर्णी हो, अनु के रोल में वैभव राज गुप्ता या अमन के रोल में हर्ष मायरो सभी ने अपने अभिनय से हंसाया भी है और रुलाया भी है… कुल मिलाकर यह एक फैंटास्टिक फोर सीरीज है जिसे अगर आपने अब तक नहीं देखा तो जरूर देखिए इसके पिछले 2 सीजन भी बेहद शानदार है और अगर आपने पिछले दोनों नहीं देखे तो गुल्लक फर्स्ट सीजन से शुरू कीजिए….

Advertisements

दो आने ,चार आने ,आठ आने की पुलक

छोटे-छोटे किस्सों से भर गयी ये गुल्लक।।

Advertisements

aparna…..

शेन वार्न…..

धुंआधार बॉलर जिन की बॉल से दुनिया का हर बैट्समैन खौफ खाता था शेन वार्न..

महज 52 साल की उम्र में 4 मार्च 2022 को थाईलैंड के अपने विला में शेन ने अंतिम सांस ली… मौत का कारण हार्ट अटैक बताया जा रहा है… दुनिया भर के बल्लेबाजों के दिल को अपनी तेज गेंद से धड़का कर रख देने वाले शेन वार्न आखिर मौत की नींद सो गए…

Advertisements

लंबे चौड़े सुंदर और प्रभावशाली व्यक्तित्व के शेन वॉर्न ने इंडिया के खिलाफ 1992 में क्रिकेट मैच खेलना स्टार्ट किया था। अपने खेल जीवन में जितना वह अपनी क्षमताओं के कारण जाने गए उतना ही विवादों के कारण भी…

विवाद और वार्न:-

Advertisements

1996 में शेन पर ड्रग्स लेने का आरोप लगा, जिसके बाद उन्हें अपनी उप कप्तानी से हाथ भी धोना पड़ा, कुछ सालों बाद सन 2000 में जब वह एक अस्पताल में भर्ती थे तब किसी नर्स को आपत्तिजनक संदेश भेजने का आरोप लगा ।

उन्होंने स्टीव वा पर स्वार्थी इंसान होने का आरोप लगाया तो वही रिकी पोंटिंग को असफल कप्तान बताया…

Advertisements

उनके दिमाग में हमेशा एक कीड़ा कुलबुलाता चलता था, जो कहीं ना कहीं उनकी अपार क्षमता और अथक ऊर्जा को भी दिखाता था। उनका एकमात्र नाइट मेयर सचिन तेंदुलकर रहे। कहा जाता है कि जब बल्लेबाज सपने में शेन वॉर्न की बॉल को देखकर घबराया करते थे, उस वक्त शेन सपने में यह देखा करते थे कि सचिन तेंदुलकर उनकी हर बॉल को हिट कर रहे हैं। हालांकि ग्राउंड के बाहर उनकी और सचिन की दोस्ती देखने लायक थी, दोनों ही एक दूसरे के प्रति बहुत ही आत्मीय और इमानदार मित्र थे…..

सचिन और शेन

2008 में राजस्थान रॉयल्स की तरफ से पहली आईपीएल ट्रॉफी बटोरने वाले शेन वॉर्न आज हमारे बीच नहीं है… लेकिन वह जहां भी होंगे वहां से अपने हरफनमौला अंदाज मे मुस्कराते नजर आयेंगे…

ईश्वर आपको खुश रखें शेन

Advertisements

Rest in peace शेन वार्न….

दिल से….

dear दोस्तों

Advertisements

कैसे हैं आप सब ..? बहुत दिनों से ब्लॉग पर कोई हलचल नहीं थी , मैं जानती हूं आप लोग भी परेशान हो रहे होंगे कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि मेरी कहानियां मैंनें ब्लॉग से हटा ली..तो आज मैं इसका कारण आप सभी से शेयर करना चाहती हूं…

जैसा कि आपमे से ज्यादातर लोग जानते ही हैं कि मैं ने प्रतिलिपि से ही लिखना शुरू किया था ..फिर बाद में मुझे लगा कि मुझे मेरा ब्लॉग भी शुरू करना चाहिए और आप सब की मदद से मेरा ब्लॉग बस कुछ ही महीनों में चल प़डा …

लेकिन प्रतिलिपि ने मेरी कुछ कहानियों को अनुबंधित करना चाहा और उसके लिए मैंने भी स्वीकृति दे दी , उसी अनुबन्ध के कारण अब उन कहानियों को मैं प्रतिलिपि के अलावा कहीं और प्रकशित नहीं कर सकती ..और इसी कारण मुझे “जीवनसाथी “, “शादी.कॉम ” और “समिधा ” को यहां से हटाना पड़ा….

Advertisements

मायानगरी हालांकि अब तक अनुबंध मे शामिल नहीं है लेकिन जल्दी ही हो भी सकती है ….

लेकिन आप सभी के लिए भी मेरे पिटारे में बहुत कुछ है…. मेरी नयी कहानियां जो प्रतिलिपि पर नहीं है उन्हें यहां शुरू करूंगी …और जल्दी ही एक नयी कहानी ” वापसी ” की शुरुआत मेरे ब्लॉग पर होगी..

आप सभी ने हमेश मेरा साथ दिया है इसलिए उम्मीद है हमारा साथ यूँ ही बना रहेगा ….और पढ़ते लिखते ये सफर कट जाएगा …..

मुझे पढ़ने और सराहने के लिए हृदय से आपका आभार धन्यवाद ….

aparna

दिल से…

Advertisements

बॉक्सर आमिर खान  अक्षय कुमार से पूछते हैं ” हे ब्रो!! एंजॉइंग? और खिलाड़ी कुमार अपने मस्तमौला अंदाज में जवाब देते हैं येह एंजॉइंग ! बेटर लक नेक्स्ट टाइम!!!
   ये सारा स्पोर्ट्समैनशिप इमानदारी की हार बेईमानी की जीत, अलाना फलाना सब कुछ हम भूल जाते हैं जब इंडिया पाकिस्तान के खिलाफ मैच खेलती है।

Advertisements


   इतना तो कल दिन भर व्रत रखने के बाद औरतों का खून कम नहीं हुआ होगा जितना इंडिया की हार से हो गया।
  

Advertisements

अगली बार जीत के आना है बता देती हूं( फ्रॉम अनुष्का)

#दिल से देसी❤️
#छोटी सी भड़ास

खुरापातें….

Advertisements

Son :- मॉमा s e r लिखुँ या s r e ? सर की स्पेलिंग के लिए?

मॉम:- sir …..😡😡😡

#online classes rocks

#kids rockstars…

Originally mine u can share it…😂😂

Advertisements

aparna …

कुछ खुरापातें…

She posted a ‘roti aloo ki sbji and dal ki thali ” photo on her wall and wrote …

Friday lunch….

खुरापाती ख्याल आया कि लिख दूँ

–चल finally तुझे खाना तो मिला।

पर मन की मन में रह गयी,नही लिख पायी, संस्कार बहुत है न मुझमें।

Next day she again posted her photo and wrote .. gain half kg after eating my favorite panipuri…

एक और खुरापात आई दिमाग में …

अच्छा हुआ बहन कुछ तो गेन किया वरना जिस ढंग से तू डाइट कर के पतली हो रही है, यूनेस्को वाले तुझे देख हमारे यहाँ अकाल न घोषित कर दें।

पर कह नही पायी क्योंकि संस्कार बहुत है ना मुझमें।

बहुत नाइंसाफी है…

Advertisements

मनचाहा पति पाने के लिए –
हरतालिका, तीज, करवाचौथ, सावन सोमवार, शिवरात्रि व्रत आदि।।

और मनचाही पत्नी पाने के लिए —
CAT, UPSC, NEET, GRE, GMAT आदि।।

बहुत नाइंसाफी है ।।।

🤔🤔🙄🙄

Copy paste

Once in a blue moon!!!

Once in a blue moon – रिश्ता.कॉम

Advertisements

    डिनर की प्लेट इन्हें थमा कर मैं वापस रसोई की ओर मुड़ गयी, रसोई साफ़ करने और बरतन धोने।।…..
 
     हम औरतें काम भी सारा ऐसे करती हैं जैसे कोई जंग लड़ रही हों, हाथ काम निपटाते हैं और दिमाग में युद्ध चलता रहता है, कभी सामने वाली पड़ोसन की लाल लपटें मारती नयी साड़ी, कभी सास बहू का ना देख पाया सिरियल, कभी सखी सहेलियों का फॉरेन ट्रिप तो कभी किसी खास मौके पर मायके ना जाने पाने की पीड़ा….

    लेकिन अभी तो वक्त ऐसा चल रहा कि हर औरत के दिमाग में एक ही शमशीर लहरा रही है__ हे प्रभु और कितना काम करवाओगे?? कब खुलेगा लॉकडाऊन? कब दर्शन देगी वो जिसे देखने की राह तकते तकते आंखें पथराने लगी हैं।। इतना ढ़ेर सारा काम तो अपनी आज तक की जिंदगी में कुल जमा नही किया होगा जितना इन एक महिने में कर लिया, भगवान जाने ये कोरोना हम औरतों से किस जनम का बदला ले रहा है??

    यही सब सोचते हुए मैं भी काम में लगी रहती हूँ, लेकिन इसके साथ ही पतिदेव को आराम से सोफे पर पैर पसारे हाथ में थामे रिमोट के साथ मटरगश्ती करते देख अन्दर से सुलग जाती हूँ __ इन्हीं का जीवन सही है, कोई फेर बदल नही हुआ, उल्टा वर्क फ्रॉम होम के नाम पर जल्दी उठने और भागादौड़ी से राहत मिल गयी, कोई मदद नही करेंगे बस सोफे पर लेटे लेटे ऑर्डर पास करतें जायेंगे__” मैडम समोसे खाये बहुत दिन हो गये ना? तुम बनाती भी अच्छा हो, आज शाम ट्राई कर लो फिर!!

  कभी कहेंगे __” सुनो इतना बड़ा सा तरबूज़ ले आया हूँ, सड़ा कर फेंक मत देना, ना खा पाओ तो सुबह शाम मुझे जूस बना कर दे देना”

   अब झाड़ू पोन्छा बरतन कपड़े से कुछ राहत मिले तब तो कोई एक्स्ट्रा काम करे, उस पर इनकी फ़रमाइशें…..

बेचारे फ़रमाइश एक दिन करतें हैं और उसे पूरी कर मैं सात दिन तक उसको पूरा करने की पीड़ा में सुलगती हूँ …..

Advertisements

  ऐसी ही किसी बिल्कुल ही फ़िज़ूल सी इनकी इच्छा पर मेरे दिल दिमाग में द्वंद चल रहा था और मैं समेट कर सारे धोने लायक बरतन सिंक में जमा कर चुकी थी कि  साहब अपनी प्लेट थामे रसोई में चले आये__ “पनीर पसन्दा बनाने में तुम्हारा कोई जवाब नही, बहुत यमी था, अरे इतने बरतन , लाओ आज मैं साफ़ कर देता हूँ “

   पहला तो खाने की तारीफ कर दी और दूजा मेरे हाथ से धोने के लिये थामी कटोरी छीन ली…..

   ” जाओ जाओ तुम भी खाना खा लो, मैं ये सब निपटाता हूँ ।”

   हाय कहाँ संभालू इतना प्यार……. मैंने प्यार भरे गुस्से से इन्हें देखा और कटोरी वापस ले ली__

  ” आप भी ना!!! जाओ आप न्यूज़ देखो मैं ये ज़रा से तो बरतन हैं , निपटा कर आती हूँ “
   एक तरह से धकिया कर मैने इन्हें रसोई से बाहर कर दिया….. ये काउच पे मैं रसोई में , कुछ देर पहले दिमाग में जो ज्वालामुखी फटने को तैयार था वहाँ मनभावन सावन की बूंदे बरस कर उसे शांत कर चुकी थी, अपने मोबाईल पर अपने पसंदीदा गानों को सेट कर मैंने चलाया और मुस्कुराते हुए काम पर लगा गयी__

   ” मेरे यारा तेरे सदके इश्क सीखा,
         मैं तो आई जग तज के इश्क सीखा,
               जब यार करे परवाह मेरी…..”

  मधुर रोमांटिक गानों के साथ बरतन धोने का मज़ा ही अलग है, बरतन धो कर पोंछ कर करीने से जमा कर , सारा सब कुछ यथावत कर अपनी चमकीली रसोई की नज़र उतार ली।

       चेहरे पर एक मुस्कान चली आयी, काम कुछ किया नही बस मुझे रिझा कर सब करवा लिया…… साहब भी ना पक्के मैनेजर हैं , इन्हें अच्छे से पता है किस लेबर से कब और कैसे काम  निकलवाना है , अब प्राईवेट सेक्टर के बंदे लेबर से कम तो होते नही और उनके सर पर बैठे मैनेजर ठेकेदार!! खैर …..

मैंने  अपनी प्लेट लगाने के लिये केसरोल खोला कि देखा रोटी तो है ही नही__उस समय ये सोच कर नही सेंकी थी कि काम निपटा कर गरमा गरम फुल्के सेंक लूंगी, पर अब मन खट्टा सा हो रहा था, एक ही तो रोटी खानी है , सेंकू या रहने दूँ, दूध ही पीकर सो जाऊंगी…..दिमाग का ज्वालामुखी वापस प्रस्फ़ुटित होने जा ही रहा था कि साहब वापस रसोई में चले आये__
      ”  लाओ ये बेलन दो मेरे हाथ में ” मैं इनकी बात समझ पाती कि तब तक ये मेरे हाथों से बेलन ले चुके थे….

” अब तुम जाओ मैडम!! जाकर सोफे पर आराम फर्माओ, मैं तुम्हारी थाली परोस कर लाता हूँ ।”
    मेरे कुछ कहने से पहले एक तरह से जबर्दस्ती धकिया के इन्होंने मुझे अपने आसन पर बैठा दिया और खुद गुनगुनाते हुए रसोई की ओर चल पड़े

Advertisements

  ” रोज़ तो तुम्हारा खाना ठंडा हो जाता है, आज मेरे हाथ से गरमा गरम फुल्के खा ही लो।”

  ” पर सुनो एक ही बनाना!!”

  ” क्यों?? आज के लिये ये कैलरी काउंटींग छोड़ो, एक की जगह तीन रोटियाँ ना खा ली तो मेरा नाम बदल देना।”

   कुछ इनकी रसीली बातें और कुछ गरम स्वाद भरा खाना , मैं सच थोड़ा ज्यादा ही खा गयी, चेहरे पर बिल्कुल वही संतुष्टी थी जो दिन भर थक हार के काम से लौटे मजदूर के हाथ में रोटी होने से होती है…..

    पर दिल के आगे एक दिमाग भी है, जिसने तुरंत सोचना शुरु कर दिया था, पर उसी समय मैंने मन ही मन एक छोटी सी कसम ले ली कि ऐसी शानदार थाली परोसने के बदले में पतिदेव ने किचन स्लैब और गैस चूल्हे का जो सत्यानाश किया होगा चुपचाप बिना किसी हील हुज्जत के झेल लूंगी, एक बार फिर सफाई कर लूंगी लेकिन इनके इतने ढ़ेर सारे प्यार के बदले कोई ज़हर नही उगलूंगी…..
     अपनी कसम मन ही मन दुहराती प्लेट रखने रसोई में आयी की मेरी आंखे फटी की फटी रह गईं…….

…..ये क्या मेरे स्वामी तो लिक्विड सोप स्प्रे कर कर के स्लैब को रगड़ रगड़ कर साफ़ कर चुके थे, सारा काम समेट कर गुनगुनाते हुए वो हाथ धो रहे थे, पूरे 20 सैकेण्ड से और मैं उन्हें देखती सोच रहीं थी__

   हाय मैं वारी जांवा , शायद इसे ही कहतें हैं once in a blue moon……….

aparna…..

घरवाली

Advertisements

            “अरे कहाँ व्यस्त हो भाई लोग ,,सब के सब ऐसा क्या देख रहे कम्पयूटर पे…जरा हम भी तो देखें ।।””
    ” अरे कुछ नही रवीश ,ये मेरी एक दोस्त है ,उसने अपनी पार्टी की फोटो पे मुझे टैग किया है ,फेसबुक पे,तो बस वही देख रहे ,हम दोनो।”
     रवीश भी देखने लगा। कुछ आठ दस लड़कियों का ग्रूप फोटो था,सबने अजीब आढे टेढे मुहँ बना रखे थे,सबसे बीच मे एक निहायत ही खूबसूरत लड़की खड़ी थी ,फ्लाइंग किस करती।
 
       रवीश की आंखे अटक गई ,घूम फिर के बार बार वही चेहरा देखने का मन कर रहा था।
     रवीश एक 25  26साल का सॉफ़्टवेयर इंजीनियर है ,पुणे मे वाकड़ मे खुद का फ्लैट ले चुका है,दिखने मे भी ठीक है,घर वाले अब चाहते हैं,वो शादी कर ले……आज तक उसे अपनी आजादी बहुत प्यारी थी,हफ्ते मे 5दिन काम करो,और 2दिन आराम से दोस्तों के साथ पार्टी करो
  घर मे पानी की बोतल से ज्यादा बीयर की बोतलें पड़ी होती हैं, कोई टोकने वाली तो है नही।
  सामने वाली करंजकर आंटी की बाई आकर साफ सफाई कर जाती है।खाना कभी कैंटीन मे खा लेता है,कभी मैगी से काम चल जाता है।बिल्कुल राजा महाराजा सा जीवन है……पर आज एक अदद फोटो ने सारा खेल बिगाड़ दिया।

Advertisements

      आज अचानक रवीश को अपने आप पर बहुत तरस आने लगा,कोई नही है ,जो फ़ोन करके पुछे,घर कब आ रहे…..अच्छा सुनो खाने मे क्या पका लूं ….बेचारा! इतवार की रात का कितना भी हैंगओवर हो अगले दिन सुबह खुद ही उठ के नीम्बू पानी बनाना पड़ता है।
      अब उसकी भी उमर हो रही है,उसे भी अब शादी कर के घर बसा लेना चाहिये,हर चीज़ वक्त पे हो जाये तभी अच्छा है….
           आज रवीश को अपनी आज़ादी बहुत खल रही है ।
        एक बार फिर तस्वीर पे उड़ती सी नज़र डाली और अपने क्यूबिक मे आके बैठ गया।

       ऐसा नही था की रवीश की जिन्दगी मे कभी कोई लड़की नही आई,स्कूल कॉलेज मे छोटे मोटे अफेयर हो चुके थे,पर दोनो ही पक्ष बहुत सीरियस नही थे….हाँ दो साल पहले ऑफ़िस मे एक नई लड़की आई थी,रूही…..वो उसे बड़ा भा गई थी।
         वो अक्सर अपने काम के लिये रवीश की राय लेती थी,कभी कभी दोनो साथ ही लंच भी किया करते थे…..उसे रूही अच्छी लगने लगी थी।
     एक शाम तो वो बाँका ज्वेलर्स भी पहूंच गया था,हीरे की अंगूठी लेने,सोचा अंगूठी देके ही प्रोपोस करूंगा ,पर तभी नासपीटे लोकेश का फ़ोन आ गया।
     “यार कहाँ है तू,जल्दी आ जा,,आज तेरी भाभी अपनी बहन के घर रुकेगी….अमित और विक्की भी आ रहे…party करेंगे।”
     “बस यही  ‘पार्टी करेंगे’ एक ऐसा शब्द है जिसे सुन के मरता हुआ लड़का भी जी उठे,और यमराज से लड झगड़ के अपने मित्रों के पास पहुंच जाये।
     बस वही रवीश के साथ हुआ,,हीरे की अंगूठी तो कभी भी आ जायेगी,पर भाभी जी रोज रोज तो मायके जाती नही,बेचारा लड़का पार्टी की तैय्यारियो मे चला गया।
         फिर एक शाम टी ब्रेक मे रूही और रवीश कैन्टीन मे थे -“अरे रवीश तुम्हे मैने बताया नही ना….मेरे मॉम डैड मक्का जा रहे”।
     “मक्का ! वहाँ क्यों? वहाँ तो मुस्लिम जातें हैं ना ?”
    “हाँ तो ! मैं मुस्लिम ही तो हूँ,मेरा पूरा नाम नही पता क्या?  रूही अंसारी।”
   “या अल्लाह! रवीश त्रिपाठी जी किस दुनिया मे रहतें हैं आप ! “
       रवीश चुपचाप मुस्कुराता रहा,चाय पीता रहा।उसे एक महिने मे कभी पता ही नही चला की रूही मुसलमान थी,,अच्छी बहुत लगती थी पर इतना भी नही की अपने घर वालों से शादी के लिये लडता झगड़ता।
     “यार लोकेश बचा लिया यार तूने, 38000बह जाते अंगूठी मे।”
        अभी 6महिने पहले हंसती खिलखिलाती रूही उसे अपने निकाह का कार्ड थमा गई तब उसकी जान मे जान आई,हालांकी रूही के मन मे ऐसा कभी कुछ नही था,फिर भी कार्ड पाके उसे बहुत खुशी हुई।

        पर इस बार बात हर बार से अलग थी,लड़की ऐसी थी की जिसके लिये सारे संसार से लड़ा जा सकता था,इस बार उसे जाति धर्म कुछ नज़र नही आ रहा था।
         बड़ी हिम्मत करके उसने अमित से उस लड़की के बारे मे पूछ ही लिया।
    “मुझे नही पता यार,वो तो रेणू मेरी स्कूल की दोस्त है,उसिने फोटो भेजी थी।”
    “हाँ तो उसी रेणू से पूछ ले”।
“पागल हो गया है क्या,,मरवायेगा तू….रेणु मेरी और मेरी बीवी दोनो की दोस्त है,उससे कुछ पूछा ना तो मेरे घर जाके आग लगा आयेगी।”
   “यार अमित अपने भाई के लिये इतना नही कर सकता तू।”
“और कहीं फिर से लड़की मुसलमान या किरिस्तांन निकली तो?? तेरे अन्दर का पण्डित फिर जाग जायेगा।”
    “नही भाई ,इस बार मुझे सच मे प्यार हो गया है,प्लीज उसका पता कर दे,तेरा अहसान जिंदगी भर नही भूलूंगा।”
       दो दिन बाद अमित ने रवीश को एक फ़ोन नम्बर दे दिया।
     “देख यार,रेणु खुद उस लड़की के बारे मे कुछ नही जानती,रेणु की पार्टी मे उसकी किसी सहेली के साथ ही ये आई थी,,नाम तक नही पता।अब तू जान ,कैसे बात करेगा,क्या करेगा।”

      खुशी से अमित को गले से लगा लिया रवीश ने ,घर जाते समय उसकी कार मे ‘लम्बोर्गिनी ‘बज रहा था,उसने ट्रैक बदल दिया और सोनू निगम का “अब मुझे रात दिन तुम्हारा ही खयाल है” सुनते सुनते घर पहुँचा।
          घर पहुच्ंते ही नम्बर सेव किया और वॉट्सएप्प पे तुरंत डी पी देखा।
     उफ्फ ,कैसा सलोना चेहरा है,कितनी मासूम है,
कितनी प्यारी मुस्कान है,,चेहरे से तो ब्राम्हण ही लग रही,पर चलो नही भी हुई तो भी कोई बात नही।
    अब शादी तो इसी से करनी है,चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाये……बहुत हिम्मत कर के अपने दिल को समेट के रवीश ने उसे मैसेज किया
  “हेल्लो ,कैसे हो आप।”
   “Sorry …who is this ?
” hi ,myself Raveesh …मै अमित का दोस्त हूं ।”
   “कौन अमित “?
“आपकी दोस्त है ना रेणु ,,उसी रेणु का दोस्त है अमित।”
“ओह्ह्ह्ह अच्छा आप रेणु के दोस्त हैं।”
“हांजी ,ऐसा ही समझ लिजिये,,क्या मै आपसे कुछ देर बात कर सकता हूँ,आप फ़्री हैं अभी?”
  “असल मे मै,मेरे बेटे का होमवर्क करा रही हूँ,तो अभी तो बात नही कर पाऊंगी।”
   “अच्छा ,बेटा भी है आपका।”और पति ?
  उफ्फ घबराहट मे ये क्या बोल गया….
“Obviously, पति भी है,और बेटा भी।आपको अगर कोई ज़रूरी काम नही है तो हम बाद मे बात करते हैं।”
   रवीश बेचारा रो पड़ा,तुरंत फ़ोन काटा और नम्बर डिलीट किया…..
      उसे बहुत बहुत ज़ोर का गुस्सा आ रहा था,थोड़ा सा रोना भी आया,पर हद है…..लड़कियों को शादी करने  का भी बड़ा शौक है,और शादीशुदा नही दिखने का भी।
         कहीं से भी फोटो मे समझ ही नही आ रहा की कम्बख्त बाल बच्चों वाली है…..पहले का समय अच्छा था कम से कम देख के समझ तो आता था की लड़की शादीशुदा है,किसी की घरवाली है।
            बेचारा रवीश !अपना गम गलत करने एक बार फिर अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने चल दिया।।।।

aparna ….

Advertisements

Yes I am spexcy …..

मासूम मुहब्बत ….
           ऐनक की…..

  आज का टॉपिक मासूम देख कर मुझे मेरी बचपन की मासूम मुहब्बत याद आ गयी…
बड़ी अजीब सी मुहब्बत थी ये … चश्मों की मुहब्बत…

  कॉलेज सेकंड ईयर में पहुंचते ही हम सब एकदम से सीनियर्स बन गए, और कॉलेज में आई जूनियर्स की बहार…

  एक सतर पंक्ति में सर झुकाये चलती फर्स्ट ईयर की लड़कियों में चौथे या पांचवे नम्बर पर उसे देखा मैंने…
  सुंदर सी मासूम सी लड़की और उसकी छोटी सी नाक पर टिका ब्लैक प्लास्टिक फ्रेम का बड़ा सा चश्मा..
पर सच कहूँ तो ये समझना मुश्किल था कि चश्मा लगा कर वो ज्यादा खूबसूरत लगने लगी या उसके लगाने से चश्मा सुंदर हो गया..
  मेरी एक दोस्त ने कहा भी” हाय कितनी सुंदर है और अभी से चश्मा चढ़ गया”
  ” अच्छी तो लग रही है। और चश्मा तो सुपर है। “

मेरी दोस्त ने मुझे अजीब नज़रों से घूर कर देखा…

  और मुझे मेरे बचपन का पागलपन यानी चश्मे से प्यार याद आ गया…

  घर पर कोई भी मेहमान आये मैं उनका टेबल पर रखा चश्मा चुपके से ले उड़ती…….
   फिर अपने कमरे में वो चश्मा अपनी नाक पर चढ़ाये आड़े तिरछे मुहँ बना कर खुश होती रहती…
  मेहमानों के जाने के पहले चुपके से वापस चश्मा रख आती…
   जिन्हें चश्मा लगा होता उनके लिए मन में एक अलग सा सम्मान पैदा हो जाता, यूँ लगता इनसे सिंसियर कोई हो ही नही सकता।
  घर पर मम्मी पापा दोनो को चश्मा लगा था…शायद इसलिए चश्मे के लिए आदर भाव था…
    स्कूल में पसंदीदा टीचर भी चश्मे पहनते थे, पर लाख कोशिशों के बावजूद मुझे चश्मा नही लग पा रहा था।

मम्मी अक्सर कहतीं “मोनी रात में लैम्प जला कर मत पढ़ा करो बेटा चश्मा लग जाएगा और मैं सोचती काश लग जाये…

पापा अक्सर सुबह सूरज की रोशनी में पढ़ने की सलाह देते…आंखों की ज्योति बढ़ती है सुबह उगते सूर्य के दर्शन करो, आंखों में पानी के छींटे डाला करो, सुबह सवेरे नंगे पैर गीली घास पर चलो, ओस से पैर भीगते हैं तो आंखों की रोशनी बढ़ती है।
    और मैं सोचती क्या पैर के तलुओं से ओस आंखों तक पहुंच पाएगी( इस बात पर भरोसा करना मुश्किल होता) लेकिन पापा ने कहा है तो कोई लॉजिक तो होगा इसलिए इस बात को पूरी तरह नकारा भी नही जा सकता था..
   यही सोच कर पापा के नेत्र ज्योति बढ़ाने वाले कोई उपाय नही करती, मुझे  चश्मा जो चाहिए था…

  पर लगातार पढ़ने, टीवी देखने के बावजूद मुझे चश्मा नही लगा…
   लेकिन मेरी बहुत प्यारी सहेली को चश्मा लग गया और उस रात मैं फुट फुट कर रोई…
तब तक शाहरुख खान ने बताया नही था कि जिस चीज़ को शिद्दत से चाहो कायनात उसे आपसे मिलने…. वगैरह वाला डायलॉग..
    पर कुछ दिनों बाद एक चमत्कार हुआ…
, उस वक्त बारहवीं जमात में थी, शायद पढ़ाई या मेडिकल एंट्रेंस का टेंशन था।  हफ्ते भर से सर का दर्द जाने का नाम नही ले रहा था…
  आखिर पापा डॉक्टर के पास ले गए… आंखों की जांच हुई और डॉक्टर ने पापा को अगले दिन अकेले बुला लिया…

डॉक्टर से मिल कर पापा वापस आये और मुझे अपने पास बुला कर बिठा लिया, प्यार से सर पर हाथ फेरते मुझे समझाने लगे…

” बेटा परेशान होने की बिल्कुल ज़रूरत नही है!”

  मैं घबरा गई,लगा अभी तो एंट्रेंस दिया भी नही रिज़ल्ट भी आ गया…
  पापा फिर धीरे से आगे बढ़े, पापा को बहुत धीमी गति से बोलने की आदत है और उनकी स्पीड पर मैं कई बार इमपेशेंट हो जाती हूँ……

” देखो बेटा डॉक्टर ने कहा है….

  मेरा दिल शताब्दी से होड़ लगाने लगा, मुझे एक पल को लगा मुझे ब्रेन ट्यूमर तो नही हो गया जो पापा इतनी भूमिका बांन्ध रहे।
   मुझे ब्रेन ट्यूमर से ज्यादा चिंता ट्रीटमेंट के लिए मुंडाए जाने वाले बालों की होने लगी कि पापा ने बात आगे बढ़ाई…

” डॉक्टर का कहना है लगातार लगाओगी तो एनक उतर जाएगी।”

हाय! बस अब और कुछ नही चाहिए उस ऊपर वाले से। उसने मेरी झोली चश्मे से जो भर दी….
  इधर मेरी खुशी सम्भल नही रही थी, उधर पापा की समझाइश खत्म नही हो रही थी……

  फ़ायनली वो ऐतिहासिक दिन मेरे जीवन में भी आ गया जब मैं अपने शहर के सबसे बड़े चश्मे के शो रूम में खड़ी थी। चारो तरफ चश्मे ही चश्में देख कर मेरे चेहरे की मुस्कान जा नही रही थी और मुझे मुस्कुरातें देख पापा के चेहरे पर राहत थी…
हालांकि इतने शौक से बनवाया मेरा पहला सुनहरी फ्रेम का पतला सा चश्मा सिर्फ छै महीनों में उतर गया…
मैं तो उतारना नही चाहती थी पर पापा की ज़िद  थी आंखे चेक करवाओ…
   और एक बार फिर मेरा दिल हार गया और आंखें जीत गयी..
   और मेरी मासूम मुहब्बत मेरा चश्मा जाने कहाँ खो गया….

कभी कभी कुछ बेमतलब की बातें कुछ बेखयाली खयाल भी लिख लेने चाहिए….
    बस ऐसे ही लिख दिया… कुछ बेसर पैर का…

aparna

संविधान

” मैं नही खाती नॉनवेज !! मुझे पसंद नही।”

” जब कभी खाया ही नही तो कैसे पता कि पसंद नही आयेगा।”
   कुछ देर सोच कर मैने कहा__

” हिंदू हूँ,पंडिताईंन!! मेरे धर्म में  नही खाते ,इसिलिए नही खाती, समझे!!”

  अपनी ज्ञान भरी बात पर मैं इठला गयी,पर तभी उसने कुछ ऐसा कहा कि एक ग्लेशियर पिघल गया, एक पतझर झर गया और एक सावन बह गया ….

” मैं भी नही खाता,इसलिये नही क्योंकि मेरा धर्म कहता है मत खा! मै इसलिये नही खाता क्योंकि मैं किसी जीव को अपने मुहँ के स्वाद के लिये मार नही सकता…सिर्फ कुछ एक मांस पेशियों की मज़बूती के नाम पर एक लाश पका कर नही खा सकता,,मैं नही खा सकता क्योंकि मैं मानवता को सर्वोपरी मानता हूँ, वही है मेरा धर्म, मानव धर्म!!

   ये मेरे जीवन का संविधान लिखा था उसने ,जिसके बाद मैं उसकी हो गयी,, और हमेशा हमेशा के लिये मेरी स्वतंत्रता छिन गयी….
       उसके बंधन जो बंध गयी थी।।

aparna…

बेबात की बात:–

ये जो बात बात पर लोग स्टेटस अपडेट करतें हैं ना, बेबात की बात है….         सारी ज्ञान की बातें सोशल मीडिया पर बहातें हैं ना, बेबात की बात है…..      वक्त पड़ने पर वहीं बांटा ज्ञान भूल जातें हैं , बेबात की बात है…..   आजकल तो पोहा भी बनाये लड़कियाँ तो ऐसे स्टेटस अपडेट करेंगी जैसे उदयपुर की राजकुमारी हों और पहली बार अपने महल के खानसामा के हाथ से कलछी छीन कर कुछ बनाया हो, देखा जाए तो ये सबसे बड़ी बेबात की बात है…. अजूबी हेयरस्टाइल हो या नया हेयरकट, कोई डिश हो या नए जूते हर बात की अपडेट उफ्फ कतई बेबात की बात है….  तो दोस्तों आपस में स्टेटस का आदान प्रदान नही बल्कि बातें करों क्योंकि यही बातें आगे यादें बनने वालीं है बेबात की बात तो हर कोई भूल ही जायेगा….