दिल से…. चिट्ठी आप सबों के नाम!

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प्यारे दोस्तों।

सबसे पहले तो आप सभी का शुक्रिया अदा करती हूं कि मेरे एक बार बोलने पर आप सभी मेरे ब्लॉग पर चले आए। पर यहां मेरे ब्लॉग पर भी आप सब मुझे सपोर्ट कर रहे हैं। मैं जानती हूं आप सब के दिल में यह भी चल रहा होगा कि आखिर मैंने अपना ब्लॉग लिखना क्यों शुरू किया। देखा जाए तो यह जरूरी था बेहद जरूरी। सिर्फ मेरे लिए ही नहीं मेरे जैसे उन ढेर सारे लेखकों के लिए भी जो ढेर सारी मेहनत करके लिखते तो हैं लेकिन उनके लिखेगा प्रतिसाद उन्हें नहीं मिल पाता।

मैं यहां किसी भी प्लेटफार्म की बुराई नहीं करूंगी। सभी प्लेटफार्म अपनी अपनी जगह सही है चाहे वह ऑनलाइन लेखन के प्लेटफार्म हों या ऑडियो स्टोरी सुनाने के प्लेटफार्म। हर एक प्लेटफार्म अपने आपके लिए काम करता है। अपनी ग्रोथ के लिए अपनी खुद की टीम के लिए । अगर हम लेखक उन प्लेटफार्म से जुड़ते हैं तो कहीं ना कहीं हमारा भी अपना एक लालच होता है कि हमें पाठक मिले। हमारी कहानियों को श्रोता मिले। आज बहुत से लेखक ऐसे हैं जो 1 से अधिक प्लेटफार्म पर काम कर रहे हैं। और यह लेखक लगातार काम कर रहे हैं। किसी प्लेटफार्म पर कहानियां लिखते हैं तो किसी दूसरे ऑडियो प्लेटफॉर्म के लिए भी अपनी कहानियां देते हैं। आप सोचिए उन लेखकों के दिन में भी 24 घंटे ही हैं। और वह उस टाइम को मैनेज करके लगातार मेहनत करते हैं। सिर्फ इसलिए कि उनकी कहानियों से उनकी कोई कमाई हो सके। लेकिन सच कहूं तो कोई भी प्लेटफार्म लेखकों को उनके परिश्रम के मुताबिक पारिश्रमिक नहीं देता। शायद इसीलिए लोगों को लेखन में कैरियर बनाने के लिए बहुत सोचना पड़ता है। ना ही इस क्षेत्र में जल्दी पैसा मिलता है और ना ही नाम। बावजूद लेखक के अंदर की भूख उसे लिखने के लिए बाध्य करती हैं। और यह भूख पैसों की भूख से कहीं ज्यादा तीव्र होती है । यह भूख होती है कि उसके लिखे को कोई पढ़े सराहे। अगर किसी लेखक को ढेर सारे पाठक मिलते हैं तो भले ही कमाई ना हो लेकिन वह उसी में संतुष्ट हो जाता है यह मेरा व्यक्तिगत विचार है जरूरी नहीं कि हर लेखक मेरे विचारों से सहमत हो।

अब मैं बात करती हूं अपने ब्लॉग और प्रतिलिपि की।

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मैं सच कहूं तो प्रतिलिपि की शुक्रगुजार हूं क्योंकि प्रतिलिपि ने ही मुझे वह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म दिया जहां आप सब से मेरी मुलाकात हो पाई। आज से ढाई साल पहले मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं लेखक भी बन सकती हूं । तब तक मैं सिर्फ और सिर्फ एक पाठक थी। प्रतिलिपि पर मैंने कभी कोई कहानी पढ़ कर लिखना नहीं सिखा। जैसा कि बाकी लेखक कहते हैं कि वह अपने शुरुआती दिनों में प्रतिलिपि पर पढ़ा करते थे और यही पढ़ते हुए उन के मन में लेखक बनने का विचार जागा। मैं बचपन से ही पाठक थी और वह भी जबरदस्त पाठक । पढ़ने का इस कदर शौक था कि मैं रोज घर पर आने वाले दोनों न्यूज़पेपर पूरे चट कर जाने के बाद सारे एडवर्टाइजमेंट और यहां तक कि निधन वाले कॉलम भी पढ़ लिया करती थी। जब कभी बचपन में मैं अपनी अलमारी जमाया करती तो कहीं भी अगर न्यूज़ पेपर बिछाने की पारी आती तो मैं उस पेपर को खोलकर घंटों तक पढ़ती रह जाती। मेरे इसी पढ़ने के शौक में जाने कितनी बार मेरी चाय के बर्तन को दूध की गंज को जला दिया। कॉलेज के दिनों में भी मेरा यही हाल था। संडे हमारा एक टाइम फीस्ट होने के कारण शाम के समय हमारा टिफिन नहीं आया करता था और तब पारी पारी से हम सहेलियां सबके लिए मेगी बनाया करती थी। जिस दिन मेरी पारी होती थी आप सोच ही सकते हैं कि मैं कितना बंटाधार करती रही होंगी। मैंगी चढ़ा कर वहीं खड़े-खड़े मैं कोई ना कोई किताब खोल कर पढ़ने लग जाया करती थी और मैगी की जलने की खुशबू सूंघकर मेरी सहेलियां दौड़कर रसोई में भागती थी कि आज फिर मैंने उनके डिनर को जला दिया।

पढ़ने के इतने जल्लादी शौक के बाद भी मुझे लेखन हमेशा से रॉकेट साइंस लगा करता था। मैं जब भी अपने पसंदीदा लेखकों को पढ़ती थी तो यही सोचती थी कि लिखना बहुत मेहनत का काम है। कैसे कोई लेखक इस कदर हमारी भावनाओं को अपने पन्नों पर उतार लेता है। और कैसे हम उसके लिखे को पढ़कर बिल्कुल वही महसूस करने लगते हैं। उसके लिखे शब्दों के साथ हंसते हैं और उसी के लिखे शब्दों को पढ़कर रोते हैं। ऐसा कैसे संभव हो सकता है? मेरे लिए लेखक हमेशा से परम श्रद्धेय थे अब भी हैं और हमेशा रहेंगे!

आप में से कई लोग बहुत बार यह सवाल भी कर चुके हैं कि मैं प्रतिलिपि पर इन लेखकों को पढ़ती हूं तो मैं आपको बताना चाहती हूं कि मैं जिम साहित्यकारों को पढ़कर बड़ी हुई हूं और जिनकी रचनाएं आज भी समय निकालकर पढ़ती हूं उनमें से प्रेमचंद शरतचंद्र ममता कालिया आदि के अलावा शायद ही किसी की रचना प्रतिलिपि पर मौजूद हो।

प्रतिलिपि पर आज के नए लेखकों की भरमार है और सभी बेहद खूबसूरत लिखते हैं। लेकिन इनमें से किसी को भी पढ़ने का अब तक सौभाग्य नहीं मिल पाया और इसका कारण उन लेखकों की कमी नहीं बल्कि मेरे पास वक्त की कमी है। जब थोड़ा सा समय मिलता है आप सभी के लिए कुछ ना कुछ लिखने की कोशिश करती हूं और इसी कोशिश में किन्ही भी नए लेखकों को नहीं पढ़ पाती हूँ।

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प्रतिलिपि पर जब से मोनेटाइजेशन शुरू हुआ लेखकों के बीच भी एक होड़ सी लग गई अपने सब्सक्राइबर्स बढ़ाने की होड । पर देखा जाए तो इस बात पर हम लेखकों का कोई कसूर भी नहीं आज तक निशुल्क लिखी रहे थे लेकिन जब कहानी पर कमाई का जरिया मिला है तो कोई भी क्यों छोड़ना चाहेगा।

इसके बाद बात शुरु हुई पाठकों की नाराजगी की । सब्सक्रिप्शन से हटाने के लिए लोगों ने इनबॉक्स में भूकंप ला दिया। पहले पहल मैंने भी सोचा कि मैं अपनी कहानियों को सब्सक्रिप्शन से हटा लूंगी लेकिन फिर यह महसूस हुआ कि अगर मैं ऐसा करती हूं तो मेरे साथ के बाकी लेखक ऐसा नहीं करते तो जाहिर सी बात है कि उनके ऊपर और भी ज्यादा दबाव डाला जाएगा कि देखिए उन्होंने तो अपनी कहानी से सब्सक्रिप्शन हटा लिया फिर आप क्यों इतना लालच कर रही हैं। जाहिर है यह कंपैरिजन नहीं होना चाहिए लेकिन होगा। अगर मैं सब्सक्रिप्शन हटाती हूं तो इसमें मेरे साथी लेखकों की तो कोई गलती नहीं है अगर वह अपनी कहानी उसे अपनी मेहनत से कोई कमाई करना चाहते हैं तो इसमें वह कोई गुनाह नहीं कर रहे बल्कि मैं पूरी तरह से उन सभी के सपोर्ट में हूं कि ऐसा करना ही चाहिए।

और इसीलिए मैंने अपनी कहानियों से सब्सक्रिप्शन नहीं हटाया। बल्कि बीच का यह रास्ता चुना कि मैं ब्लॉग पर भी अपनी कहानियां उसी समय पोस्ट कर सकूं। जिससे जो लोग सब्सक्रिप्शन लेकर नहीं पढ़ना चाहते वह मेरे ब्लॉग पर आकर उसी दिन निशुल्क उस कहानी को पढ़ सकते हैं।

इतना शानदार ऑफर देने के बावजूद अब तक बहुत से लोग प्रतिलिपि पर ही मुझे पढ़ना चाहते हैं । मैं उन पाठकों की इस बात को भी पूरी तरह समझती हूं मैं विज्ञान की विद्यार्थी हूं और अच्छे से जानती हूं कि मोमेंट ऑफ इनर्शिया यही होता है। जी हां इसे जड़त्व का नियम भी कहा जाता है इसका अर्थ है जब हम चलते रहते हैं तो हम चलना ही चाहते हैं रुकने के लिए हमारा शरीर हमारा विरोध करता है इसीलिए जब हम चलती हुई बस से उतरते हैं तो हम एकदम से स्थिर नहीं हो सकते हमें थोड़ी देर तक अपने शरीर को बस के साथ ही दौड़ आना पड़ता है या गति में रखना पड़ता है।

बस यही मोमेंट आफ इनर्शिया प्रतिलिपि पर पढ़ने वाले पाठकों के साथ भी हैं । उन्हें लगता है प्रतिलिपि पर पढ़ना आसान है। इसके अलावा कहीं भी और जाकर वह पढ़ना नहीं चाहते। मैं भी किसी पर दबाव नहीं बनाना चाहती लेकिन इसी कारण अब मुझ पर दबाव बढ़ने लग गया है । दो प्लेटफार्म पर एक साथ एक ही कहानियों को चलाना बेहद मुश्किल और तनाव भरा है। कब किस जगह पर कौन सी कहानी पोस्ट की थी। किस प्लेटफार्म पर अभी कहानी का अगला कौन सा भाग डालना है यह सब बहुत जटिल हो गया है।

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और इसीलिए अब यह सोचा है कि कुछ कहानियां सिर्फ अपने ब्लॉग पर ही लिखूंगी।

ब्लॉग पर लिखने से मुझे क्या फायदा है अब मैं उसके बारे में आप सभी को बताना चाहती हूं। पहली बात ब्लॉग पर आप सभी निशुल्क मुझे पढ़ सकते हैं दूसरी बात मेरे ब्लॉग पर अगर 1000 से ज्यादा फॉलोवर्स होते हैं तो वर्डप्रेस ब्लॉग मुझे मेरा ब्लॉग लिखने के लिए आप सब से कोई शुल्क लिए बिना मेरे अकाउंट को बिजनेस अकाउंट बना देता है और जिससे मुझे लाभ मिलता है। इसके अलावा मेरी कहानियों पर गूगल ऐड जो भी एडवर्टाइजमेंट डालता है उससे भी मुझे रेवेन्यू जेनरेट होता है यानी कि मेरी कमाई होती।

अब आप सोचिए कि ये आपके और मेरे दोनो के लाभ का सौदा है। आपको कुछ नहीं करना सिर्फ आकर मुझे पढ़ना है वह भी पूरी तरह से निशुल्क और उसके बदले मुझे गूगल से और वर्डप्रेस से पैसे दिए जाएंगे क्योंकि मेरा पेज बार-बार खोला जा रहा है और मेरे पेज पर एडवर्टाइजमेंट नजर आ रहे हैं।

क्योंकि यह मेरा पर्सनल ब्लॉग है और यह गूगल पर है तो इसलिए 1000 फॉलोअर्स से अधिक होने पर गूगल भी मुझे कुछ निश्चित राशि देना शुरू करेगा। मैं मानती हूं यह राशि बहुत कम है ।रेवेन्यू बहुत ज्यादा जनरेट नहीं होता लेकिन फिर भी मुझे मंजूर है। क्योंकि यहां मेरे पाठकों को मुझे पढ़ने के लिए कुछ भी खर्च करने की जरूरत नहीं है। लेकिन मुझे फायदा बढ़ाने के लिए आप यह जरूर कर सकते हैं कि मेरी कहानियों को आप अपनी सोशल अकाउंट पर शेयर कर सकते हैं। मेरे इस पेज यानी अनकहे किस्से को आप ज्यादा से ज्यादा अपने इंस्टाग्राम फेसबुक आदि अकाउंट पर शेयर कर सकते हैं। अगर आप सभी के फेसबुक पर 100 दोस्त भी हैं, और अगर उन्हें मेरी कहानी पढ़ना पसंद आता है ।तो वह मेरे ब्लॉग पर आकर मुझे फॉलो कर सकते हैं और इस तरह मेरे फॉलोवर्स की संख्या बढ़ सकती है। और साथ ही बढ़ सकते हैं मेरी रोजाना के व्यूज। आपको इस सम्बंध में कोई भी डाउट है तो आप समीक्षा में मुझसे खुल कर पूछ सकते हैं।

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वैसे यह आप सभी का प्यार ही था कि पहले महीने में ही मेरे ब्लॉग पर लगभग रोज के 1000 से ज्यादा व्यूज आने लग गए थे। लेकिन आप सभी को एक बार फिर अपना प्यार साबित करना पड़ेगा मेरे फॉलोवर्स बढ़ाने में और मेरे व्यूज बढ़ाने में सिर्फ आप सभी मेरी मदद कर सकते हैं।

प्रतिलिपि और मेरी मोहब्बत कितनी तगड़ी है यह तो आप सब जानते हैं । वहाँ पर ढेर सारे लेखक अपने कुकू एफएम पॉकेट एफएम के पोस्ट शेयर करते रहते हैं लेकिन उनसे प्रतिलिपि को कोई परेशानी नहीं है। और मैं ने जैसे ही अपने ब्लॉग के बारे में लिखा मुझे तुरंत नोटिस जारी कर दिया। इसलिए अब वहां मैं अपनी कोई पोस्ट शेयर नहीं कर सकती। हो सकता है कि कई पाठकों को शायद यह पता ही नहीं कि मैं अब मेरे ब्लॉग पर भी लिखती हूं तो दोस्तों हो सके तो आप सभी के सोशल अकाउंट पर मेरी कहानियों या मेरे पेज का प्रचार करने में मेरी मदद करें।

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बाकी तो आप सभी जानते हैं कि मैं संस्कारी बहुत हूं इसलिए पंगों से दूर ही रहती हूं। पर अब जाने क्यों आप सभी ब्लॉगर जो मेरे ब्लॉग पर मुझे फॉलो करते हैं से एक अलग से जुड़ाव हो गया है आप लोगों के सामने तो दिल खोल कर मैं अपनी भड़ास निकाल सकती हूं। तो बस मुझे दिवाली तक में 1000 फॉलोअर्स चाहिए और साथ ही चाहिए डेली के 2000 प्लस व्यूज भी।

वहां 22000 लोग फॉलो करते हैं पर पता नहीं क्यों फॉलो करते हैं। मेरी बात सुनते तो है नहीं पर चलो कोई नहीं। जो सुनते हैं वह लोग भी अगर मान गए तो भी बहुत बड़ी बात है।

एक और बात कहनी थी आप 297 फॉलोअर्स यहां मौजूद हैं। क्या आप सभी को मेरी हर पोस्ट की नोटिफिकेशन मिलती है। अगर आप लोगों को नोटिफिकेशन नहीं मिलती तो प्लीज प्लीज प्लीज मुझे इस पोस्ट पर मैसेज करके बताइए। मेरा टेलीग्राम चैनल और फेसबुक पेज की लिंक भी मैं आपसे शेयर करूंगी। आप हो सके तो मेरे फेसबुक पेज को भी फॉलो कर सकते हैं और टेलीग्राम चैनल को भी। जिससे मैं हर कहानी की पोस्ट का लिंक वहां शेयर कर सकूं।

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और अगर आप इतना सारा मेरे लिए करेंगे तो मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं नई नई अनोखी और अलग हटकर कहानियां आप लोगों के लिए सिर्फ आप लोगों के लिए अपने ब्लॉग पर लिखती रहूं।

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आप सभी की संस्कारी लेखिका

aparna…..

50% सेल

    ये सोमवार की सुबह आती क्यों  है?ये सिर्फ स्नेहा के लिये ही इतनी टॉर्चर होती है ,या सभी का यही हाल होता है,मालूम नही!
      तरुण को सिर्फ ये पता है की उसे ठीक 8बजे ऑफ़िस निकलना ही हैं,चाहे शहर मे कर्फ्यू लग जाये,देश मे  इमरजेन्सी आ जाये,पर 8 मतलब 8।
     स्नेहा नाश्ता बना पायी तो ठीक वर्ना ऑफ़िस कैन्टीन जिन्दाबाद।

      जैसा की दुनिया के हर मर्द को लगता है,की उसकी बीवी सबसे निकम्मी है,तरुण को भी पूरा विश्वास है,इस बात पर।
    और वो अपनी निकम्मी बीवी के टाईम मैनेजमेंट से तो कतई खुश नही रहता।

    “क्या करती रहती हो दिन भर ,एक फ़ोन नही संभाल पाती हो,,ऊपर से सारा सब कुछ अपने सर ले लोगी।”
    “क्या ज़रूरत थी नये प्रोजेक्ट पे हाथ मारने की,आराम से बैंच पे थी,,कोई काम नही ,प्रेशर नही,बस जाओ ,और आओ।”
      “अच्छा सुनो अगर आहान और ऑफ़िस एक साथ नही कर पा रही तो कुछ दिन के लिये माँ  को बुला लेते हैं,तुम्हे भी सुविधा हो जायेगी।”
        “नही नही माँ को बुलाने की ज़रूरत नही,मै कर लुंगी।”

      बस मर्दों के पास यही एक हथियार हैं,पता है सास को बुलाने के डर से बीवी हथियार डाल ही देगी। और बिना कोई और शिकायत किये चुप लगा जायेगी।

        पुरूषों के लिये उनका कैरीयर सब कुछ होता है,उनका बॉस ही उनका भगवान और ऑफ़िस ही उनका मदीना।पर औरत के लिये ! सिर्फ उसके समय काटने का ज़रीया।।
       ये बात पुरूषों के मन में भी गहरी बैठी होती है और ऑफ़िस ना जाने वाली महिलाओं के भी।

      “बैंच पे अच्छी थी……कैसे भला? किसको पसंद है काम पे भी जाओ और काम भी ना करो।”
“अरे जब अहान के लिये क्रच मिल ही गया,और ऑफ़िस शुरु कर ही दिया तो खाली क्यों बैठूँ ।”

      स्नेहा अपने विचारों मे उलझी खुद ही बडबड करती काम भी निपटाती जाती है।
     वैसे सभी औरतों मे एक ईश्वर प्रदत्त शक्ती होती है,तीन चार काम एक बार मे कर लेने की,,,लैंड लाईन से बहन से बात भी कर लेंगी,मोबाइल पे ज़रूरी मेल और मैसेज भी चेक होता रहेगा,,और साथ ही सब्जी भी कटती जायेगी,और सबसे ज़रूरी क्राईम पैट्रोल का एपिसोड साथ ही देख लेंगी।

      क्या करें,भगवान ने औरत को बनाया एक पर काम दिये अनेक।
     ऐसे ही स्नेहा खूब हडबडी मे रोज सारा काम निपटाती है,और फिर रात के खाने पे अपने पति से यही सुनती है,कि तुम दिन भर करती क्या हो?

    रोज सुबह 10बजे अहान को क्रच छोड़ कर उसे ऑफ़िस जाना होता है,इतनी हाय तौबा होती है सुबह की पूछो मत। इसी हाय तौबा मे उसने एक बार अपना मोबाइल गलती से कपडों के साथ वॉशिंग मशीन मे घुमा दिया।
       कपडों के साथ उनसे भी ज्यादा साफ सुथरा मोबाइल निकला,और स्नेहा सन्न रह गई,वो तो अच्छा था की उसके मेल पे सारे नम्बर सुरक्षित थे।

     अगली बार अहान का दूध गरम करते मे मोबाइल जाने कैसे अवन मे रखा गया,असल मे उस दिन शाम को तरुण के एक परिचित खाने पे आने वाले थे,क्या बनाऊं,क्या ना बनाऊं की उधेडबुन मे फसीं स्नेहा फ़ोन मे अपनी सहेली से इसी संबंध मे कुछ अति आवश्यक परिचर्चा मे व्यस्त थी ,तभी अहान के लिये दूध गिलास मे निकाला और अवन खोला और कान पर से मोबाईल निकाल के अवन मे रख दिया।

       अबकी बार खूब ठोंक बजा के अहान के पापा ने महंगा सा आई फोन खरीदा,उनका अटूट विश्वास  था की औरतों को सामान से ज्यादा उसकी कीमत से प्यार होता है।बस उनका आईडिया काम कर गया।

     छह महीनों मे दो स्मार्ट फोन गवां चुकी स्नेहा को   स्वयं भी आत्मग्लानी थी। अब वो अहान से भी ज्यादा फ़ोन को संभालती,पर हाय रे फूटी किस्मत!

       वही मनहूस सोमवार का दिन फिर आ गया,,दो दिन की लम्बी छुट्टी के बाद ये दिन बहुत जानलेवा होता है,खासकर नौकरीपेशा औरत के लिये।

      तरुण को नाश्ता करा के भेजा और अपने काम पे लग गई,कामवाली को जल्दी जल्दी काम समझा के अहान को तैय्यार किया और खुद नहाने घुस गई।
       स्नेहा नहा के आके जल्दी जल्दी तैय्यार होने लगी,उसने क्रीम हाथों पे निकाली ही थी की विलासिनी ज़ोर से चिल्लाई “दीदी बाबा ने पॉटी कर ली।” अब स्नेहा जब तक क्रीम को हाथों मे समेटे वहाँ पहुचीं तभी तरुण का फोन आने लगा,तरुण का फोन नही उठाने से जनाब एकदम से चिढ जाते हैं,इसलिए फोन उठाना भी आवश्यक था।
       फ़ोन को कन्धे और कानो के बीच फसाये स्नेहा ने जैसे तैसे बात करी और अहान को वैसे ही उठा बाथरूम मे ले गई।

        अहान को साफ सुथरा कर बड़े प्यार से गोद मे लिया और गर्दन सीधी कर ली,इसी बीच स्नेहा का जानी दुश्मन उसका फोन बड़ी चालाकी से उसे अंगूठा दिखा गया……और 40000 के आई फ़ोन ने ना आव देखा ना ताव कमोड मे कूद कर आत्महत्या कर ली।

   ‘छपाक ‘ इस आवाज के साथ ही स्नेहा का दिल डूब गया,आंखों मे मोटे मोटे आंसू आ गये।
    “हे भगवान! मेरे साथ ही क्यों?”
    “अब क्या मुहँ दिखाउन्गी तरुण को,उनको तो और मौका मिल गया,आज तो जान ही ले लेंगे मेरी।
सही कहते हैं,एक फ़ोन भी संभाल के नही रख सकती। क्या करुँ,कैसे बचू,कोई उपाय।”
       ” सही कहता है तरुण ,मै किसी लायक नही हूँ,ना घर सम्भालना आता ,ना ढंग से खाना बनाना ,कोई काम तो होता जो मै परफेक्टली कर पाती,ऊषा ,नीरू,चंचल ये सब कितने अच्छे से सब कर लेती हैं ।”
     जब कभी इंसान से ऐसी कोई गलती हो जाती है जो कुछ ज्यादा ही महंगी हो,तब उसे अपना असल चरित्र समझ आ जाता है,उसी समय उसे अपने सारे गुण दोष नज़र आने लगते है,अपनी भयानक भूल का पश्चाताप होने लगता है,और जाने अनजाने ही कितनी मन्नते हो जाती हैं…..पर यही कुछ समय बाद वो अति आवश्यक मन्नतें,बिल्कुल ही अनावश्यक होकर मन से निकल भी जाती हैं ।
     “गणेश जी इस बार तरुण के गुस्से से बचा लो ,आपको सवा किलो लड्डू भोग लगाउन्गी वो भी पैदल दगडू शेठ आके”
        (  दगड़ू शेठ पुणे का बहुत प्रसिद्ध गणपति मन्दिर है,जहां लेखक की स्वयं बहुत आस्था है।)
       
           ईश्वर हर असहाय की मदद करतें हैं…..उसी समय लैंड लाइन पे घंटी बजी ,,स्नेहा को पता था ,तरुण का फ़ोन है,,भारी कदमों से जा के बोला “हेल्लो ।”
    “स्नेहा क्या हुआ ,बात करते मे ही अचानक आवाज आनी बन्द हो गई। आहान तो ठीक है ना,अरे बोलती क्यों नही…..मेरा दिल घबरा रहा है जान ,तुम ठीक तो हो ना।”
     डांट पड़ने का डर था ,पर यहाँ तो गहरी सांत्वना वाले शब्द थे,भावुक होकर स्नेहा रो पड़ी।
      ऐसा रोयी ,ऐसा रोयी की हिचकी बँध गई,,बेचारी खुद चुप होना चाहती थी पर रुलायी थी की रुक ही नही रही थी।

    “रुको ,मै अभी आया।” “नही तुम मत आओ,सब ठीक है,,आहान एकदम ठीक है।”
    “वो असल मे मेरा फ़ोन ……कमोड …..”
“ओह्हो अहान ने तुम्हारा फोन कमोड मे गिरा दिया क्या?  अरे कोई बात नही ,तुम तो ऐसे रोयी की मै घबरा ही गया था।”
“फ़ोन के लिये इतना परेशान हो रहा था मेरा बेबी,कोई नही स्वीटहार्ट शाम को चलेंगे नया फ़ोन ले लेना।”
     
    इतनी देर से छाये ऊमस भरे बादल बरस गये,चारों ओर हरियाली छा गई,मयूर नाच उठे,कोयल गाने लगी,सारा संसार खूबसूरती की चादर मे मुस्कुराने लगा और……….स्नेहा की जान मे जान आई …
          …..सच कहतें हैं लोग,बच्चे भगवान का रूप होते हैं,,”आज मेरे बालगोपाल ने मुझे बचा ही लिया।
    वर्ना सच्चाई पता चल जाती तो तरुण ऑफ़िस से ही मुझे गोली मार देता।”

        थोडी देर पहले का गहन दुख दूर हो गया और गुनगुनाते हुए स्नेहा रसोई मे तरुण का मनपसंद खाना बनाने चली गई,,ऑफ़िस से छुट्टी ले ली।।

      खाना बनाते मे उसे अचानक याद आया की ऑनलाइन शॉपिंग की सेल का आज आखिरी दिन था,और उसने ढेर से कपड़े ऑर्डर करने के लिये जमा कर रखे थे, पर हाय री किस्मत !
              50परसेन्ट सेल उसके हाथ से फिसल के कमोड मे गिर चुकी थी……..और स्नेहा एक बार फिर गहन अवसाद मे घिर चुकी थी।

aparna….