जीवनसाथी -125

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जीवनसाथी – 125

   
   

जल्दी जल्दी हाथ चलाती पिया घर समेट रही थी कि दरवाज़े पर दस्तक हो गयी। और उसका दिल धक से रह गया।
   ” नहीईईई ….  उसे सरप्राइज देने के लिए कहीं मंत्री जी अस्पताल में पता करके उसे ढूंढते यहाँ तो नही चले आये।
   हे भगवान! ऐसे फ़िज़ूल स्यापे उसी की किस्मत में क्यों लिखें हैं।।।
    अब इतना तबाहो बर्बाद घर देख कर समर के दिल का रोमांस हवा न हो जाये।
  वो सोच ही रही थी कि वापस कॉल बेल बज गयी….
  उसने धड़कते दिल से जाकर दरवाज़ा खोल दिया…
  सामने समर खड़ा था!!!
 
   ” मुझसे तो कहा कि एक केस है और वक्त लगेगा?”

समर के सवाल पर पिया ने उसे आंखे तरेर कर देखा..

” हाँ तो जब मैंने ऐसा कहा फिर आप अस्पताल क्या करने आ गए?”
“माँ को लेकर आया था। फिर वहां पता चला कि तुम अभी ही घर निकली हो तो माँ का चेकअप करवाने के बाद उन्हें घर छोड़ सीधा फ्लैट पर चला आया।”
  
बात करते करते वो भीतर चला आया, और अंदर का नज़ारा देख वो चुटकी में सब समझ गया।

” अच्छा तो डॉक्टर साहिबा इसलिए भाग कर घर चली आयीं?”
   पिया अपना सा मुहँ लेकर रह गयी।
” अरे इतना सोचने और परेशान होने की बात नहीं है चलो हम मिलकर सफाई करते हैं। मैं वैसे भी साफ सफाई में मास्टर हूं।”
” आप तो हर काम में मास्टर हैं मंत्री जी। गधी तो मैं ही हूँ। मन ही मन सोच कर ऊपर से पिया कुछ बोल नही पायी।
   उसने लाचारगी से समर को देखा और झाड़ू उसके हाथ में थमा दी।
     डस्टिंग झाड़ू पोंछा कर दोनों ने मिलकर सारे घर को चमका दिया।
   दो बड़े गार्बेज बैग तैयार कर पिया ने पीछे की बालकनी में रखे और अपने ही फ्लैट को निहारती खड़ी रह गयी।
   मंत्री जी ने तो वाकई उसका घर संवार दिया था।
वह मुस्कुराकर हाथ बांधे खड़े अपने घर को देख रही थी कि समर ने आकर उसके कंधे पर हाथ रख दिया…
” क्या हुआ किस सोच में गुम हो गई? “
  ना में सर हिला कर पिया ने मुस्कुरा कर उसे देखा……-” आप यहां बैठिए मैं बस यूं गई और यूँ आई।”
” अब कहाँ चल दीं आप?”
” सुबह से भाग दौड़ रही हूं। अब थोड़ी थकान सी लग रही है । बस फ्रेश होकर नहा कर आती हूं। आप बैठिये आकर आपको एक बेहतरीन सी कॉफी पिलाऊंगी।”
   हां में सिर हिला कर समर वहीं सोफे पर पसर गया और सामने रखे टीवी को चला लिया। मुस्कुराती गुनगुनाती हुई पिया बाथरूम में घुस गई।
     नहा कर तैयार होकर अपने गीले बालों को झाड़ती पिया बाहर चली आई…. समर उसे देख शरारत से मुस्कुरा उठा। पिया ने उसे बैठने का इशारा किया और रसोई में घुस गई अभी वह कॉफी फेंट रही थी कि समर ने आकर उसे पीछे से अपनी बाहों में समेट लिया।
” थोड़ा तो इंतेज़ार कीजिये।”

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“इतनी देर से और क्या कर रहा था? तुमने क्या सोचा, मैं तुम्हारे घर पर क्राइम पेट्रोल देखने आया हूँ।”
बाँसुरी अपनी जीभ काट कर रह गयी। और उसकी तरफ मुहँ फेर कर उसे अपनी बाहों में भर लिया। समर ने पिया का चेहरा अपने हाथों में लिया ही था कि समर का फोन बजने लगा। समर ने पिया को बाहों में कैद किये हुए ही अपनी जीन्स की जेब से फोन निकाला और फ़ोन पर आ रहे नम्बर को देखते ही जैसे उसे कुछ बेहद ज़रूरी सी बात याद आ गयी।
उसने फ़ोन कान से लगाया और झटके से पिया को छोड़ बात करते हुए बाहर आ गया।
  समर ने फोन पर बात करने के बाद फोन रखा और पलट कर उसकी तरफ देख कर कंधे उचका दिए….
” अब तो जाना पड़ेगा डॉक्टर साहिबा एक बहुत जरूरी फोन कॉल था तुरंत पहुंचना है मुझे। “
” अरे यार यही तो सही नहीं लगता मुझे। आपके काम का कोई टाइम है या नहीं। बस वक्त बेवक्त कभी भी फोन चला आता है। एक मजदूर के भी काम करने का एक वक्त तय होता है उसके बाद मजदूर को भी छुट्टी दे दी जाती है।”
” काश हम भी मजदूर होते लेकिन हम मजदूर नहीं मंत्री जी हैं तो जाहिर है जिम्मेदारियां भी थोड़ी ज्यादा तो होंगी ही। “
” नहीं अभी नहीं जाएंगे आप प्लीज मंत्री जी, थोड़ा तो रुक जाइए बस कॉफी भी रेडी है।”
” तुम कॉफी पी लो तब तक मैं आता हूं। “
” पक्का वापस आएंगे आप।
” हां हां पक्का! आधी रात भी हो गई ना तब भी आऊंगा बस इंतजार करते रहना।”
पिया के माथे को चूम कर समर बाहर निकल गया। और उसके लिफ्ट में दाखिल होते तक पिया वहीं दरवाज़ा पकड़े खड़ी रह गयी।
     
शाम ढली रात हुई और पिया इंतजार करती रह गई। उसके दिल के किसी कोने को भी मालूम था कि समर इतनी व्यस्तता में भी उससे मिलने के लिए थोड़े से सुकून के पल चुरा कर ले जरूर आया था, लेकिन वह वापस उन पलों को इतनी जल्दी नहीं ला पाएगा।
   मुस्कुरा कर उसने एक बार अपने सारे घर को देखा और टीवी चला कर बैठ गई थैंक्यू मंत्री जी कम से कम आपने आकर मेरे घर को संवार तो दिया। 
कहते हैं औरत लक्ष्मी का रुप होती है और जिस घर में जाती है उसे संवार देती हैं । लेकिन आप साक्षात विष्णु जी का रूप है मेरे घर में आए और उसे संवार कर चले गए।

बहुत देर तक यहाँ वहाँ समय गुजारने के बाद आखिर पिया ने फ्रिज से एक कोल्डड्रिंक की बोतल निकाली एक चिप्स का पैकेट खोला और अपनी फैंसी सी ड्रेस बदल कर नाइट सूट में सोफे पर कूद गई।
टीवी पर इधर से उधर टहलती पिया आखिर अपने प्रिय शो पर आकर ठहर गयी।
और शो का एंकर चिल्ला चिल्ला कर कहता रहा …सावधान रहिये ! सुरक्षित रहिये!!



*****


वक्त बीतते वक्त नही लगता।

रेखा ने पूरी शिद्दत से अपनी बहन का करोबार संभाल लिया। ज़मीन की खरीद फरोख्त में केसर अपने पैसे बढ़ाती ज़रूर थी पर उसका पसंदीदा काम कपड़ो का ही था।
जगह जगह से कच्चा माल लाकर अपने यहाँ कपड़े तैयार करवा कर उन्हें मार्किट में उतारने को उसके अपने शो रूम थे।
रेखा के लिए प्रोडक्शन से लेकर मार्केटिंग सारा कुछ नया था। कई बार वो बुरी तरह थक जाती लेकिन फिर अगले दिन से नए सिरे से अपने आपको बेहतर बनाने में जुट जाती।
जब से उसने खुद को काम में डुबो दिया था, अब उसका ध्यान विराज की बेपरवाही पर भी नही जाता था।
अपना कामकाज और बेटे की परवरिश इससे इतर रेखा ने कुछ भी सोचना छोड़ दिया था और शायद उसके इसी रवैया का विराज पर असर दिखने लगा था।
केसर का काम जमीन की खरीदी का भी था वह अक्सर किसानों से उन्हें उनके हिसाब से अच्छा मूल्य देकर खेती वाली जमीन के बड़े बड़े टुकड़े खरीद लिया करती और फिर उन्हें अलग-अलग टुकड़ों में काटकर बड़े-बड़े लोगों को बेच दिया करती थी। इसी में उसका एक पुराना केस फंसा हुआ था और उसी सिलसिले में एक बार पूछताछ के दौरान रोहित को महल में आना पड़ा।
केस ऐसा कोई बहुत पेचीदा नहीं था क्योंकि जमीन के धंधे में यह अक्सर देखा जाता है कि किसान अपनी रोड पर से जुड़ी जमीने निकालकर पीछे की तरफ नहर या नदी तरफ की जमीन खरीदने में ज्यादा रुचि दिखाते हैं । और इसी बात का फायदा जमीन का धंधा करने वाले उद्योगपति उठा लेते हैं।
गलती यहां केसर की नहीं बल्कि केसर से जमीन को खरीदने वाले लोगों की थी जिन्होंने जमीन के कुछ कागजातों में कुछ गड़बड़ी की थी।
रोहित किसी तरह भी यह नहीं चाहता था कि रेखा इन सब मामलों में फंसे और उसे थाने कचहरी के चक्कर लगाने पड़े और इसीलिए वह एक बार में उससे मिलकर सारे लीगल कागज जांच परख लेना चाहता था।
और इसीलिए रोहित को रेखा से मिलने महल में आना पड़ा हालांकि रेखा से मिलने के बाद उसे यह समझ में आया कि रेखा उन जमीन से जुड़े कागजातों के बारे में कुछ भी नहीं जानती…-” सीरियसली रोहित हम इन जमीनों के बारे में कुछ भी नहीं जानते…. अभी हमने केसर दीदी का कारोबार संभालना शुरू ही किया है! और अभी तो हमारा पूरा फोकस उनके कपड़े के कारोबार पर ही है। हां इस बारे में पिता साहेब तुम्हारी शायद कोई मदद कर सके।”

” इस वक्त कहां मिलेंगे वह?”

” पिता साहब भी इसी शहर में है और वह अपने घर में शिफ्ट हो चुके हैं। तुम चाहो तो हम तुम्हें वहाँ लेकर चल सकते हैं।”

” श्योर!! तो अगर इस वक्त बिजी नहीं हो तो क्या हम अभी चल सकते हैं?”

” हां!! हम अभी ऑफिस के लिए ही निकल रहे थे। चलो तुम्हें पहले पिता साहेब से मिलवा देते हैं उसके बाद हम ऑफिस निकल जाएंगे।”

” हम्म लेट्स गो।”

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रूपा भाभी से अनुमति लेकर रेखा रोहित के साथ घर से निकल गई। उसी वक्त विराज कहीं से घूम घाम कर वापस आ रहा था। उसने एक नजर रेखा के साथ जाते रोहित को देखा और वापस मुड़कर अपने कमरे में चला गया। फिर जाने क्या सोचकर वह वापस निकल आया और अपनी गाड़ी में बैठा उनकी गाड़ी का पीछा करने लगा।

रेखा को अपनी गाड़ी खुद चलाना पसन्द था, और इसलिए वो ड्राइवर को साथ नही लिया करती थी। उस दिन भी रोहित को साथ लिए रेखा ने अपनी गाड़ी निकाल ली…-” मैं ड्राइव कर सकता हूँ?”
” क्यों हमारे साथ बैठने में डर लग रहा है ?”
मुस्कुरा कर रोहित ने ना में सिर हिला दिया….
“तुमसे एक बात पूछ सकता हूँ रेखा?”
” इतने फॉर्मल क्यों हो रहे हो रोहित?”
” इसलिए क्योंकि अब तुम शादीशुदा हो, तुम्हारा बच्चा है , बावजूद अगर कभी तुम्हें ये लगे कि तुम अपने पति से परेशान हो और अपनी ज़िंदगी में उसे छोड़ आगे बढ़ना चाहती हो तो बेझिझक आगे बढ़ जाना, मैं अगले मोड़ पर तुम्हारा इंतेज़ार करता मिलूंगा।”
रेखा ने रोहित को देखा…-” थैंक्स रोहित! अब तक हमसे प्यार करने के लिए। लेकिन सच कहें तो अब हमें किसी के कंधों की सहारे की ज़रूरत नही रही। प्लीज़ इसे हमारा घमंड मत समझना लेकिन जाते जाते हमारी दीदी सा ने हमारी ज़िंदगी भर का इंतज़ाम कर दिया। अब हम खुद में और अपने काम में इतने व्यस्त हो गए हैं कि विराज की तरफ ध्यान ही नही जाता। “
” पर ये भी तो गलत है ना? तुम दोनों ऐसे कैसे सारी जिंदगी गुज़ारोगे?”
” होता है, बहुत बार ऐसे जोड़े भी बन जाते हैं जिन्हें नही बनना था। लेकिन ज़िन्दगी सिर्फ इश्क़ मुहब्बत में डूबे रहने का ही तो नाम नही है ना। हमें अब अपने काम से मुहब्बत हो गयी है, और हम तुम्हें यकीन दिलातें हैं अगर विराज हमारी तरफ एक कदम भी बढ़ा सकें तो हम दस कदम उनकी तरफ बढ़ा लेंगे।
” गुडलक रेखा। तुम्हें ऐसे आत्मनिर्भर देख बहुत खुशी हुई। “

बातों ही बातों में केसर का घर भी आ गया।

विराज उनकी गाड़ी का पीछा ही कर रहा था। विराज ने वहीं अपनी गाड़ी थोड़ा दूर पर ही लगा दी और उन दोनों पर नजर रखे रहा। वह दोनों साथ ही अंदर गए और ठीक पांच मिनट बाद ही रेखा वहां से बाहर निकल आई और अपने ऑफिस के लिए निकल गयी। विराज वहीं रुका रहा और रोहित पर नजर रखे रहा आधे घंटे बाद रोहित भी वहाँ से निकल गया । विराज ने वापस रोहित का पीछा किया लेकिन उसका यह पीछा करना किसी मतलब का नहीं रहा । रोहित रेखा के पिता के घर से निकलकर सीधे अपने थाने पहुंच गया।
विराज बुझे मन से महल वापस लौट गया। उसका एक मन खुश था कि रेखा उसे धोखा नहीं दे रही। लेकिन दूसरा मन रेखा और रोहित को साथ देखकर खुश नही हो पा रहा था।
उसने आज तक रेखा के लिए कभी ऐसा कुछ भी महसूस नहीं किया था और इसीलिए उसने अपने सर को झटका दिया और वापस महल पहुंचने के बाद अपने आप को शराब में डूबोने के लिए पैग तैयार करने लगा। फिर जाने उसके मन में क्या आया, की उसने वो गिलास उठा कर बाहर फेंका और बाथरूम में नहाने घुस गया।
नहा कर उसे कुछ ठीक लग रहा था, और अब वो भी राजा के ऑफिस पार्टी मीटिंग में जाने को तैयार था।
आईने के सामने खड़े विराज ने हाथों में घड़ी बांधते हुए खुद को देखा। आखिर क्या कमी है उसमें? उसके जैसी ज़िन्दगी पाने के लिए भी लोग तरस कर रह जातें हैं।
उसने एक बार फिर खुद को देखा और पार्टी कार्यालय के लिए निकल गया।
एक ही बार में उसका पूरी तरह बदल जाना मुमकिन नही था लेकिन एक छोटी सी शुरुवात हो चुकी थी।

******

पिंकी को महल से वापस लौटे एक लंबा समय बीत चुका था। घर परिवार और बच्चे में वह इतनी व्यस्त हो गई थी कि उसके पास खुद के लिए समय बचना बंद हो गया था। और इसी वजह से शायद वह रतन पर बिना बात के बेवजह नाराज होने लगी थी।
उस शाम भी रतन थका हारा अपनी टीएल मीटिंग से वापस आया ही था कि पिंकी ने गोलू की शिकायतें लगाना शुरू कर दिया…-” हमारी कोई बात नहीं सुनता है यह लड़का इतना जिद्दी हो गया है । सारा दिन इधर से उधर भागता रहेगा और हम इसके पीछे इसका खाना लेकर भागते रहते हैं। “

रतन ने आगे बढ़कर अपने बेटे को गोद में उठा लिया और प्यार से उसे डांट लगाने लगा…-” बहुत शरारती हो गए हो आप देखो मॉमा क्या कह रही है?”

बच्चे को इन सब से क्या लेना देना था? और उसे क्या समझ आना था। उसके लिए तो अभी सारा संसार उसके खेल का मैदान था और हर सामने आने वाली वस्तु उसका खिलौना। वह अपने पापा के साथ भी खेलने लगा और उसे इस तरह हंसते मुस्कुराते देख रतन भी उसके साथ खेल में लग गया। उसने रतन की पेन जेब से निकाल कर फेंकी जो सीधा जाकर पिंकी के माथे पर लगी और पिंकी एक बार फिर उन दोनों पर नाराज होने लगी…-” हद करते हैं आप दोनों बस कीजिए हमें जोर से लग गई है। ”
पिंकी की आंखों से आंसू छलक आए और वह अपना माथा थामे वहीं सोफे पर बैठ गई। रतन पिंकी की ऐसी हालत देख घबरा गया और तुरंत बच्चे को नैनी के हाथों में सौंप कर उसके पास आकर बैठ गया…-” पिंकी एक बात कहूं बुरा तो नहीं मानोगी। ”
पिंकी डबडबाई आंखों से रतन को देखने लगी और इशारे से ही सिर हिला कर उसे कहने की इजाजत दे दी।
” मैं यह कहना चाहता हूं मेरी जान, कि तुमने अपना यह क्या हाल बना रखा है? तुम ऐसी तो कभी नहीं थी। महलों में पली हुई राजकुमारी जिसका एकमात्र सपना था कलेक्ट्री, वह अपना सपना भूल कर अपने आप को एक सामान्य सी औरत कैसे मान बैठी है? देखो अगर तुम अपनी हाउसवाइफ की जिंदगी में भी खुश रहती तो तुम मेरे लिए सामान्य नहीं विशिष्ट होती! लेकिन क्योंकि तुम खुश नहीं हो इसलिए मैं तुमसे कह रहा हूं कि तुम्हें अपनी खुशी के लिए कुछ ना कुछ जरूर करना चाहिए।

अपनी बड़ी-बड़ी पलके झपकाती पिंकी रतन को देखने लगी…-” मैं सही कह रहा हूं बाबू । तुम खुद सोचो कि हमारा मिलना भी तुम्हारे सपने के कारण ही तो हुआ था। अगर तुम कलेक्टर नहीं बनना चाहती, तुम उस कोचिंग इंस्टिट्यूट में दाखिला नहीं लेती तो हम और तुम कभी मिल भी नहीं पाते। लेकिन हमारे उस मिलन का फल क्या निकला ? मैंने तो अपना सपना पूरा कर लिया लेकिन तुम्हारा सपना मेरे सपने के कारण शहीद हो गया। तुमने मेरा घर संवारने के लिए, मेरे कैरियर के लिए, मेरे बच्चे की परवरिश के लिए, अपने कैरियर को दांव पर लगा दिया। लेकिन मैं ऐसा नहीं चाहता पिंकी! मैं आज भी चाहता हूं कि तुम पढ़ाई करो। मैं तुम्हें अपनी बराबरी पर बैठे देखना चाहता हूं । बल्कि मैं तो तुम्हें अपने आप से आगे खुद से आगे जाते हुए देखना चाहता हूं ।
मेरी इस बात का यह मतलब हरगिज़ ना निकालना कि तुम हाउसवाइफ हो तो मैं तुम्हें खुद से कमतर समझ रहा हूं। तुम आज भी मेरे बराबर बल्कि कहना चाहिए मुझ से कहीं आगे हो । क्योंकि तुमने एक साथ ढेर सारी जिम्मेदारियां संभाल रखी है। और मैं तुम पर एक और जिम्मेदारी लाद देना चाहता हूं । तुम्हारी अपनी खुद की जिम्मेदारी। तुम्हारे सपनों को साकार करने की जिम्मेदारी।
और बाबू !! मैं तुमसे प्रॉमिस करता हूं कि इस पूरे वक्त में जब तुम अपने एग्जाम की तैयारी करोगी, तुम्हें घर की या बच्चे की कोई जिम्मेदारी उठाने की जरूरत नहीं है। मैं हर उस जगह पर मौजूद रहूंगा जहां तुम्हारी सबसे ज्यादा जरूरत होगी।
तुम मुझ पर विश्वास कर सकती हो पिंकी प्लीज मेरे विश्वास को ही एक मौका दे दो। “

पिंकी के मन में भी शायद कहीं दबा छिपा यही जख्म था….. जो उसने अपनी शादी के बाद कहीं गहरे अपने दिल में दबा दिया था। और जो नासूर बनकर अब उसकी रोजमर्रा की जिंदगी में जहर घोलने लगा था। लेकिन वह नासूर रिसते हुए आंसुओं के रास्ते बह गया और उसने आगे बढ़कर रतन को गले से लगा लिया….-” तुम इतने अच्छे क्यों हो रतन? इतना तो हम खुद को नहीं समझ पाते जितना तुम हमें जानते हो। “

” इसीलिए तो प्रिंसेस , तुम्हारे पति हैं हम। तो मैं यह मान लूं कि अब इससे ज्यादा मुझे तुम्हें कुछ भी समझाने की जरूरत नहीं है, अब तुम मेरी बातों को समझ चुकी हो और कल से ही अपनी पढ़ाई में जुट जाओगी। “

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हॉं में सिर हिलाती पिंकी आंसू पोंछती रसोई में जाने के लिए खड़ी हो गई और रतन ने वापस उसकी बांह थाम ली…-” अब कहां चल दी मेरी प्रिंसेस ? मेरे लिए चाय बनवाने?
पिंकी ने जैसे ही हां में सिर हिलाया रतन ने अपना सर ना में हिलाते हुए अपना हाथ माथे पर मार लिया…-” बुद्धू राम यही तो समझा रहा हूं कि घर के हर एक काम को अपने सिर पर मत लादो । तुम यहां बैठे-बैठे भी हमारे बटलर को हुकुम दे सकती हो ना? इसके लिए रसोई में जाकर एक-एक बात समझाने की जरूरत नहीं है। और इतने सारे हेल्पर के बाद भी तुम्हें लगता है कि तुम्हें और कामगारों की जरूरत है तो बताओ हम अरेंज कर लेंगे । लेकिन अब गंभीरता से अपनी पढ़ाई को अपना लक्ष्य बनाओ और अपने सपने को पूरा करने जुट जाओ। क्योंकि अब मैं तुम्हें सिर्फ एक साल का वक्त दे रहा हूं और इस साल में मुझे मेरी प्रिंसेस कलेक्टर की कुर्सी पर ही चाहिए। “

हां में सिर हिला कर मुस्कुराती पिंकी रतन के गले से लग गई । रतन ने उसे कसकर अपनी बाहों में भींच लिया।

*****

प्रेम गाड़ी पार्किंग में डालकर अंदर घुस ही रहा था कि निरमा की तेज आवाज उसके कानों में पड़ी और वह घबराकर चौक गया। एक बार अपने कपड़ों पर एक पूरी नजर डालकर उसने अपनी जेबें तलाश की उसका मोबाइल भी मौजूद था। कपड़े भी उतने गंदे नहीं थे। फिर निरमा किस पर चिल्ला रही थी? यह सोचता हुआ वह अंदर दाखिल हुआ कि उसे बाहर वाले कमरे को देख कर ही समझ में आ गया कि माजरा क्या था?
आज फिर से मीठी की क्लास लगी थी। जरूर निरमा या तो उसका होमवर्क कराने बैठी थी, या फिर मीठी के किसी यूनिट टेस्ट के नंबर या कॉपी निरमा के हाथ लग गई थी और इसीलिए वह बुरी तरह से मीठी पर बरस रही थी….-” करती क्या हो तुम क्लास में? दिमाग कहाँ घास चरने चला जाता है तुम्हारा मीठी? पढ़ाई लिखाई में बिल्कुल दिल नहीं लगता तुम्हारा। ऐसे लिखता है कोई? यह तुम्हारी हिंदी की हैंडराइटिंग है? ऐसा लग रहा है मकड़ी को इंक में डूबा कर कॉपी पर छोड़ दिया गया और वह कहीं पर भी चलती हुई आगे बढ़ गई और तुम्हारी हिंदी की लिखाई बन गई। इससे तो मैं लेफ्ट हैंड से लिखूं तो ज्यादा सुंदर लिख लूँ।”

” लिख कर दिखाओ मम्मा। “

” यह देखो.. और निरमा फटाफट अपने लेफ्ट हैंड से मीठी की होमवर्क की कॉपी में लिखने लग गई उसने लगभग एक पेज लिख दिया और मीठी बैठे-बैठे मुस्कुराती रही। मीठी की नजर पीछे खड़े प्रेम पर भी पड़ गई। दोनों पापा बेटी ने एक दूसरे को आंखों ही आंखों में कुछ इशारा किया और दोनों चुपचाप मुस्कुराने लगे।
प्रेम ने मीठी को चुप रहने का इशारा किया और दबे पांव भीतर आकर निरमा के पीछे खड़ा हो गया….-” कौन कहता है कि मेरी बेटी का दिमाग कम है?

” अरे आप कब आए ?” निरमा में प्रेम को देखकर एक रूखा सा सवाल किया।

” आए तो बस अभी-अभी हैं लेकिन ऐसी क्या बात हो गई जो आप इतना रूठी हुई है, कि हमारे आने से आपको कोई खुशी भी नहीं हुई। ना चाय पूछा ना पानी? “

” हम्म ! क्या लेंगे आप चाय या कॉफी?” पूछ कर बिना प्रेम का जवाब सुने निरमा उठकर रसोई से पानी से भरा गिलास ले आई और प्रेम के सामने बढ़ा दिया….

निरमा के हाथ से पानी का गिलास लेकर प्रेम ने दो घूंट भरा और मुस्कुराते हुए निरमा को देखने लगा..-” अब तो बता दो किस बात पर इतनी नाराज हो?”

” आपकी शहजादी स्कूल में जो कारनामा करके आइ है ना आप भी सुनेंगे तो पानी पानी हो जाएंगे।”

” तब तो जरूर सुनना चाहूंगा।”

” आज इनकी क्लास में हिंदी लिखने का एग्जाम था! एक पेज इन्हें दिया गया था और बच्चों को बस उस पेज को अपनी कॉपी में उतारना था आधे घंटे के समय में इन मैडम ने ऐसी कॉपी उतारी है आप देखिए क्या आप कुछ भी पढ़ पा रहे हैं एक शब्द भी पल्ले पड़ रहा है। दस नम्बर में से इन्हें डेढ़ नम्बर मिलें हैं वो भी शायद कागज़ कोरा नही छोड़ा इसलिए।”

प्रेम ने आंखें छोटी छोटी करके उस पेज को देखने की कोशिश की और जोर-जोर से ना में सिर हिला दिया

“तो अब बताइए इसे डाँटना चाहिए या नही? मेरी जगह कोई और मां होती ना, तो अब तक इसे कूट के रख देती।
हमारे बचपन का वक्त अलग था। हम तो बिना बात के भी पिट जाया करते थे। लेकिन आजकल के बच्चे इन पर तो हाथ उठाना भी मुसीबत है।”

बहुत गंभीर सा चेहरा बनाकर प्रेम ने हाँ में गर्दन हिला दी और मीठी को देखने लगा। मीठी अपनी स्टडी चेयर पर मजे से झूमती आगे पीछे हो रही थी। और हाथ में पकड़े खिलौने को गोल गोल घुमा कर खेलती जा रही थी।
उसी के पेपर के बारे में उसकी मां इतनी चिंतित थी कि उसके पिता से बहस पर बहस किए जा रही थी। और वह इस बहस से निर्लिप्त अपने में मगन खेल रही थी। और उसकी इसी निर्लिप्तता को देखकर प्रेम को जोर से हंसी आ गई और निरमा का गुस्सा एक बार फिर भड़क उठा…-” हंस लीजिए। खूब हंस लीजिए। लेकिन कल को जब आप की राजदुलारी फेल होकर घर आएगी ना तब मुझसे आकर शिकायत मत कीजिएगा कि निरमा तुमने अपनी बेटी को कुछ नहीं सिखाया कुछ नहीं पढ़ाया।
उस वक्त फिर मुझे ताने नहीं सुनने की इतनी बड़ी यूनिवर्सिटी मायानगरी चला ले रही हो लेकिन अपने बच्चे को देखने की फुर्सत नहीं है !यह मैं नहीं सुनना चाहूंगी।”

” निरमा ! हमारे जमाने में पढ़ने लिखने वाले होशियार बच्चे एक या दो होते थे । उसके बाद एवरेज 75% बच्चे होते थे। और 25% बच्चे बिलो एवरेज। लेकिन आज की जनरेशन ऐसी है इसमें 75% बच्चे एक्स्ट्राऑर्डिनरी इंटेलिजेंट होने लगे हैं। और जो 25% बचते हैं उसमें से भी 15% एवरेज में आ जाते हैं और बचे 5% ये आते है स्पेशल केटेगरी यानी कलाकार बच्चे। जो अब भी रोबोट नही बने हैं। जो अब भी गुल्ली डंडा, आइ स्पाई, कैरम खेलना चाहते हैं। और सच कहूं तो अगर मेरी मीठी उन पांच प्रतिशत में आती है तो मैं खुशी से उसे गले लगा लूंगा, और कहूंगा बेटा मुझे तुझ पर गर्व है। तुझे जो बनना है बन, जो पढना है पढ़ बस किसी अंधी रेस का हिस्सा मत बनना।”

निरमा ने घूर कर प्रेम को देखा ..-“जरूरी है आपका हर बात में ऐसे इमोशनल हो जाना”

प्रेम ने धीरे से गर्दन ऊपर नीचे की और मुस्कुराकर सिर हिला दिया। निरमा आकर धीरे से उसके कंधों पर सिर टिका कर बैठ गई। दोनों को प्यार से ऐसे साथ में बैठे देख मीठी भी दौड़ कर अपने पापा की गोदी में चढ़ गई…-” मैं कहे दे रही हूं बहुत ज्यादा सर चढ़ा कर रखा है आपने अपनी बिटिया को। “

” हां तो कहो ना । मैंने कब सुनने से मनाही की है। मैं तो पैदा ही तुम्हारी सुनने के लिए हुआ हूँ।।

” अच्छा तो आप कहना चाहते हैं कि मैं इतनी खराब हूं कि दिन भर आपको सुनाती रहती हूं।

” नहीं बिल्कुल नहीं। मैं बस यही कहना चाहता हूं कि भगवान ने मुझे एक मुहँ और दो कान इसलिए दिए हैं कि, मैं कम बोलूं और ज्यादा से ज्यादा सुनूं वह भी सिर्फ अपनी खूबसूरत सी प्यारी सी बीवी की बातें।”

” बस बातें बनवा लो इनसे।”
बनावटी गुस्से के साथ प्रेम को देखती निरमा उठकर रसोई में चाय चढ़ाने चली गई और प्रेम एक बार फिर मीठी के साथ खेलने में लग गया।

*******

जिलाधीशों के लिए तबादले एक बहुत सामान्य बात होती है। बांसुरी को भी ऑफिस ज्वाइन करके थोड़ा वक्त बीत चुका था और इसी बीच उसका वापस दूसरी जगह तबादला कर दिया गया था।
वह अपने ऑफिस में बैठी अपना काम संभाल रही थी की उसका फोन बजने लगा उसने मोबाइल देखा उसकी मां का फोन था….- ” बंसी कहां है बेटा?”

” ऑफिस में हूं माँ। बोलो क्या हुआ?”

” तेरे पापा की तबीयत अचानक बिगड़ गई है। मैं डॉक्टर के पास ले कर आ गई हूं बेटा। हो सके तो तू आजा। वीना भी पास में नहीं है, वह अपने ससुराल यानी पुश्तैनी घर गई हुई है। वहां से उसे आने में बहुत वक्त लग जाएगा।”

” अरे मां इतना परेशान क्यों हो रही हो मैं बस तुरंत पहुंचती हूं तुम चिंता मत करो।”

” हां बेटा जल्दी आ जाओ डॉक्टरों को अंदेशा है कि शायद उन्हें दिल का दौरा….”
इसके आगे बांसुरी की मां की आवाज सिसकियों में डूब कर रह गई। बांसुरी ने देखा फोन कट चुका था। वह अभी राजा को फोन लगाने ही जा रही थी कि, दूसरी तरफ से उसके ऑफिस संबंधी किसी कार्यवश कोई फोन आने लगा। उसने जैसे तैसे उस फोन को निपटाया और और वापस राजा को फोन लगाने लगी। पर अब राजा का फोन व्यस्त आने लगा था। वह परेशान होकर अपनी कुर्सी से उठी, एक छुट्टी की अर्जी वहां छोड़कर अपना बैग थामे घर के लिए निकल गई।
उसने घर जाते जाते ही मोबाइल पर फ्लाइट का समय और टिकट की उपलब्धता आदि देख ली थी।
अभी वह क्योंकि विजयराघवगढ़ से दूर एक दूसरे जिले में पदस्थ थी इसलिए वह अपने कलेक्टर निवास में ही रहा करती थी।
रास्ते भर हैरान-परेशान बांसुरी की आंखों से आंसू बहे चले जा रहे थे। आज भले ही वह किसी रियासत की रानी थी, किसी जिले के जिलाधीश थी। लेकिन अपने माता-पिता के लिए तो वह आज भी एक नन्हीं सी बांसुरी ही थी। और उसके लिए उसके माता-पिता उसका सारा जहान थे। सारी बचपन की यादें आंखों के सामने से गुजरती चली जा रही थी। कैसे उसके पिता उसके सपनों को पूरा करने के लिए कई बार अपनी रातों की नींद और दिन के चैन को कुर्बान कर दिया करते थे।
अपना वह बचपन जिसे याद कर करके वह हमेशा खिल उठा करती थी आज वही बचपन उसकी आंखों को बार-बार भिगोए दे रहा था।
उसका ड्राइवर भी उसे ऐसी हालत में देख कर परेशान था। और इसीलिए तेजी से चलाते हुए गाड़ी को सीधा घर के मुख्य द्वार पर जाकर ही रुका।
बाहर राजा की गाड़ी खड़ी देख बांसुरी का माथा ठनका वो तुरंत अपनी गाड़ी से उतर घर के अंदर की तरफ भागी।
उसका अंदेशा सही था राजा उसके घर पर मौजूद था…-” साहेब आप यहां?”

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” हां बांसुरी। तुमसे बात करने के बाद तुम्हारी मां बहुत परेशान थी और उन्होंने शायद वीना दीदी को भी फोन लगाया था। मुझे वीना दीदी ने ही फोन करके सब बताया। इत्तेफाक से देखो मैं आज तुमसे मिलने आ ही रहा था। मैं लगभग यहां पहुंचने को था कि वीना दीदी का फोन आ गया और मुझे पापा जी की तबीयत के बारे में पता चल गया और इसीलिए मैंने आकर फटाफट तुम्हारी और शौर्य की पैकिंग करवा ली। चलो टिकट भी बुक कर ली है हमें इसी वक्त रायपुर निकलना होगा। ”

बांसुरी ठगी से खड़ी राजा को देखती रह गई। यह आदमी है ,या चमत्कार ?
जब कभी वह किसी मुसीबत में पड़ती है और अपने भगवान को याद करती है, कि भगवान मुझे इस मुसीबत से बाहर कर दो। वह तुरंत राजा को भेज देते हैं।
मन ही मन अपनी किस्मत को काला टीका लगाकर बांसुरी घर के भीतर दाखिल हो गई। उसने हाथ पांव धोकर गणेश जी के सामने एक दीपक जलाया और उनसे सब कुछ सही रखने की गुजारिश करके राजा के साथ घर से निकल गई।

शाम होते-होते वो लोग रायपुर के उस अस्पताल में पहुंच चुके थे, जहाँ बांसुरी के पिता को भर्ती किया गया था। डॉक्टरों के अनुसार उन्हें दिल का दौरा ही पड़ा था और बिना देरी किए डॉक्टरों ने उनका इलाज शुरू कर दिया था।
अगले 24 घंटे जरूर थोड़ा भारी थे लेकिन उसके बाद डॉक्टर सही स्थिति मरीज के घर वालों को बता सकते थे।
बांसुरी और राजा के वहां पहुंच जाने से बांसुरी की मां को भी बहुत सहारा हो गया था। आईसीयू के बाहर बैठे सभी परिजन बेहद परेशान थे। चिंतातुर थे। लेकिन इस सारे धीर गंभीर समय में भी छोटे से शौर्य की चुलबुली हरकतें, उसकी मोहक मुस्कान सभी के चेहरे पर मुस्कान ले आ रही थी।

कुछ देर बाद एक डॉक्टर बाहर चला आया और उसने बताया की बांसुरी के पिता को खून चढ़ाने की आवश्यकता है। और उसने उनका ब्लड ग्रुप लिखकर एक पर्ची में उन लोगों के हाथ में रख दिया…-” जरा रेयर ब्लड ग्रुप है , इसलिए हमारे अस्पताल के ब्लड बैंक में नहीं मिलेगा। लेकिन हमारे यहां के ब्लड बैंक से आपको एक नंबर मिल जाएगा। उस नंबर पर फोन करके आप इस ब्लड ग्रुप के बारे में पता कर सकते हैं। शायद वह आपके लिए खून अरेंज कर दें। ”

राजा और बांसुरी के साथ ही बांसुरी के ताऊ जी का बेटा भी दौड़ पड़ा। वह लोग तुरंत ब्लड बैंक में पहुंचकर पतासाजी करने लगे और आखिर उन्हें वह नंबर मिल ही गया।
उस नंबर पर बात करने पर सामने वाले ने उन्हें तुरंत ही अपने ब्लड बैंक का पता ठिकाना बताया और बुला लिया….
अमूमन हर ब्लड बैंक में एक ही नियम अपनाया जाता है कि, जितना पॉइंट आपको जिस ब्लड ग्रुप की आवश्यकता हो उतने पॉइंट आपको अपना खून वहां डोनेट करना पड़ता है। या फिर कई बार आप कुछ मूल्य देकर भी खून को खरीद सकते हैं।

बावजूद आज भी मेडिकल लाइन में खून के बदले खून के नियम को ही अपनाया जाता है, जिससे खून जैसी जिंदगी की चीज का कोई मोल ना लगा सके।


राजा और बांसुरी दोनों ही ब्लड बैंक में खून देने को राजी थे लेकिन वहां रिसेप्शन पर बैठे लड़के ने मना कर दिया….-” आपको जो रेयर ब्लड ग्रुप चाहिए उसके लिए आप बस यह फॉर्म भर दीजिए। उसके बाद आपको जितना ब्लड चाहिए हमारे यहां से आप लेकर जा सकते हैं। ”

” ओके थैंक यू! आप हमें प्राइस भी बता दीजिए और पैसे कहां देने है ये भी।”

” आपको कहीं कोई पैसे देने की जरूरत नहीं है। हमारा यह ब्लड बैंक सिर्फ और सिर्फ लोगों की मदद करने के लिए ही खोला गया है। इसीलिए हमने ज्यादातर सरकारी और बड़े अस्पतालों में अपना नंबर दे कर रखा हुआ है। जिससे असली जरूरतमंदों को हम निशुल्क और पूरी तरह से सुरक्षित खून मुहैया करवा सकें। हम सब एक एनजीओ के तहत काम करते हैं। “

” आप सभी तो बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। “


उस लड़के ने मुस्कुरा कर राजा को देखा और ब्लड का पाउच उसकी तरफ बढ़ा दिया। राजा बांसुरी और बांसुरी के भैया वहां से वापस लौट आए।

अगली सुबह पिछली रात से जरा सुकून भरी थी। बांसुरी के पिता की हालत में भी काफी सुधार आ चुका था, और अब डॉक्टरों ने उन्हें खतरे से बाहर करार दे दिया था। घर के सभी लोगों के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी।
बांसुरी की माँ ने रात उसे जबरदस्ती घर भेज दिया था। अगली सुबह नहा धोकर बांसुरी और राजा अस्पताल पहुंचे तो अस्पताल में बैठा आदित्य उन्हीं दोनों का इंतजार कर रहा था…-” अरे आदित्य तुम कब आए?”

” मैं जब कल महल वापस लौट कर आया तो पता चला आप लोग यहाँ के लिए निकल गए। कल रात में तो कोई फ्लाइट थी नहीं इसलिए आज सुबह-सुबह आया। “

” हां लेकिन इतना हड़बड़ा कर आने की क्या जरूरत थी, मेरे भाई। तुम कल ही तो मलेशिया से वापस लौटे हो?”

” राजा भैया!! मैं कौन सा पैदल वापस लौटा हूं? फ्लाइट से ही आया था! और ऐसी कोई थकान भी नहीं थी! वह तो अगर कल रात की कोई फ्लाइट मिल जाती तो मैं कल यहां पहुंच चुका होता। वैसे अब अंकल कैसे हैं?”

” पहले से काफी ठीक है !”
जवाब बांसुरी ने दिया। सभी लोग साथ बैठे बांसुरी के पिता की तबीयत के बारे में चर्चा में लगे रहे। बांसुरी और राजा के साथ आदित्य भी दो दिन वही रह गया। अस्पताल की भाग दौड़ में अपने राजा भैया को इधर से उधर परेशान देखना जाने क्यों आदित्य को रास नहीं आ रहा था। और इसीलिए वह हर कदम पर राजा से पहले खुद खड़े हो जाया करता था। इधर राजा की यह परेशानी थी कि अब वह एक पब्लिक फिगर था, इसलिए वह कहीं पर भी खुलेआम ना घूम सकता था ना बैठ सकता था। और इसलिए अस्पताल में भी उसका ज्यादा देर तक रुकना मुश्किल हो जाया करता था।
इन्हीं सब उलझनों के बीच चार दिन बीत गए और बांसुरी के पिता की अस्पताल से छुट्टी हो गई। अब वह पहले से काफी स्वस्थ अनुभव कर रहे थे। उन्हें लेकर सब घर निकलने को थे कि बांसुरी को अचानक कुछ याद आ गया…-” मुझे लगता है हमें एक बार उस एनजीओ में जाकर अपनी तरफ से ही सही कुछ डोनेशन दे देना चाहिए । उन्होंने हमारी जरूरत के वक्त ना तो हमसे खून लिया और ना ही कोई पैसा रूपया। मैं मानती हूं कि वह निस्वार्थ भाव से यह सेवा कर रहे हैं । लेकिन इसके लिए भी तो पैसे लगते ही होंगे, अगर हम जैसे कुछ और लोग उन्हें सहायता करने लगे तो उनका यह परोपकार का काम और भी ज्यादा बढ़ जाएगा ऐसा नहीं लगता आपको?”

” अगर आपको ऐसा लगता है, तो हमें भी ऐसा ही लगता है। हुकुम अगर आप चाहती हैं , तो हम जरूर पहले उस एनजीओ ही जाएंगे उसके बाद घर चलेंगे।”

राजा ने अपने ड्राइवर से कहकर गाड़ी उस एनजीओ की तरफ मुड़वा ली। राजा और बांसुरी के साथ ही आदित्य भी था।
वह सारे लोग उस एन जी ओ में दाखिल हुए और रिसेप्शन में बैठे उस लड़के के पास जाकर उन्होंने अपना मंतव्य उस पर जाहिर किया….

” सर लोग डोनेशन देते तो है लेकिन उससे पहले वो लोग मैडम से बात करते हैं। एक बार मैं भी मैडम से पूछ कर आता हूं, अगर वह तैयार होंगी तो आप लोगों को उनसे डायरेक्ट ही मिलवा दूंगा। फिर आप यह डोनेशन वाली बात भी उनसे ही कर लीजिएगा।”

राजा और बांसुरी ने हां में सर हिला दिया! लेकिन आदित्य को अब तक उनकी एक भी बात पल्ले नहीं पड़ी थी….. उसने प्रश्नवाचक आंखों से उन दोनों की तरफ देखा और वह दोनों उसे देखकर मुस्कुराने लगे…-” आप लोग बताएंगे भी कि यह क्या है? कौन सा एनजीओ है? और आखिर हम यहां क्यों खड़े हैं?”

बांसुरी ने पिताजी के लिए जरूरी रेयर ब्लड ग्रुप का यहां से मिलना और बाकी सारी बातें आदित्य को बता दी और इसके साथ ही यह भी कि वह लोग अभी इस ब्लड ग्रुप की ऑनर को शुक्रिया अदा करने आए हैं।

वह लोग आदित्य को साथ लिए उनके केबिन की ओर बढ़ चले।
केबिन का डोर नॉक करते ही अंदर से एक बहुत जानी पहचानी सी आवाज आई…. “अंदर आ जाइए!” बांसुरी और राजा एक तरफ खड़े रह गए और आदित्य ही पहले अंदर चला गया।
अंदर जाते ही आदित्य की आंखें आश्चर्य से फटी रह गई….-‘ केसर तुम यहां?”

केसर खुद आदित्य को अपने सामने देख चौक गई “आदित्य तुम यहां कैसे? “

आदित्य ने एक सांस में सारी बात कह सुनाई और वापस पलट कर उसने केबिन का दरवाजा खोल दिया। राजा और बांसुरी अब भी बाहर खड़े मुस्कुरा रहे थे। आदित्य ने आंखें तरेर कर बांसुरी की तरफ देखा और बाँसुरी मुस्कुराते हुए राजा को धक्का देते हुए अंदर ले आई….” यह सब क्या है भाभी साहेब? आपको कैसे पता चला कि केसर यहां मौजूद है?”

” मुझे नहीं आपके भाई साहब को पता चला। यह सब इनकी करामाती आंखों की जासूसी है। मैं तो पहले ही जानती थी इनकी आंखों में एक्सरे फिट है। केबिन के दरवाजे के आर पार भी देख लेते हैं, के अंदर कौन साहब बैठें है?”

केसर अब भी राजा और बांसुरी को देखकर अवाक खड़ी थी। उसे इस तरह हड़बड़ाया हुआ देख राजा ने उसे आराम से बैठने के लिए कहा और खुद भी सामने रखी कुर्सी पर बैठ गया।

” उस दिन जब हम लोग इनके पिताजी के लिए खून लेने यहां आए थे, तब बाहर बैठे उस लड़के ने इस एनजीओ के बारे में हल्की फुल्की की जानकारी दी। और उसके अनुसार यह एनजीओ ना तो खून के बदले खून लेता था और ना ही पैसा इसका मतलब यह एनजीओ पूरी तरह से निस्वार्थ भाव से चलाया जा रहा था। यह सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। मैं टहलते टहलते कॉरिडोर से निकल रहा था कि मैंने एक जगह केसर के पिता की तस्वीर देख ली। और पता नहीं क्यों मुझे अंदर से लगा कि हो ना हो केसर ही है जो यहां बैठकर अपना एनजीओ चला रही है।
बस अगले दिन भी मैं अस्पताल से घर जाते समय एक बार फिर यहां आया और इस पूरे एनजीओ का चक्कर लगाने पर मैंने केसर को भी एक झलक यहां देख लिया। तब तक तुम भी आ ही गए थे, तो सोचा कि अब तुम्हें भी केसर से मिलवा ही दूँ।”

चुपचाप बैठी कैसर ने आंखें उठाकर राजा को देखा और राजा बांसुरी की तरफ हाथ जोड़ दिया।

“अब बस भी करो केसर इतनी तो तुमने गलतियाँ भी नहीं की जितनी माफी मांग चुकी हो । “

” गलतियां नहीं हमने गुनाह किए हैं बांसुरी और जिनकी कोई माफी नहीं हमें तो सजा मिलनी चाहिए सजा।”

” जरूरी नहीं कि हर गुनाहगार को कानून ही सज़ा दे, और जेल ही उसका मुकद्दर हो। तुम्हें अपनी गलतियों का एहसास हुआ और उसके बाद तुमने अपनी जिंदगी उन गुनाहों के बोझ तले रो रो कर काटी है। यही तुम्हारा पश्चाताप है केसर! तुम्हें हम सब हमारा पूरा महल दिल से माफ करता है अब वापस आ जाओ।”

राजा की बात पर केसर की आंखों से आंसू बह चले….-” मेरा उद्देश्य जिसके लिए मैंने आप का महल छोड़ दिया था वह अब तक पूरा नहीं हुआ बस वह पूरा हो जाए उसके बाद मैं वापस आ जाऊंगी।”

” ऐसा तुम्हें लगता है कि पूरा नहीं हुआ लेकिन मुझे तो लगता है कि वह तेज़ी से पूरा होने की कगार पर ही है। रेखा ने पूरे मन से तुम्हारे काम को संभाल लिया है। और अब वह अपने आप को समझने लगी है जानने और पहचानने लगी है, यही तो तुम चाहती थी ना?

” हां हम चाहते थे कि रेखा अपनी कदर करना सीख ले। और हम जानते हैं जिस दिन रेखा अपनी खुद की इज्जत करना सीख जाएगी, अपनी कदर करना सीख जाएगी। उस दिन विराज भी उसकी कदर करने लगेंगे बस उसी दिन का इंतजार है आदित्य। उसके बाद हम वापस आ जाएंगे।”

” और तब तक?

” तब तक हम यही है आपका जब भी मन करें आप हमसे मिलने चले आइएगा।”

“अच्छी बात है, लेकिन अभी तो हमारे साथ घर चलो।”

राजा की बात का मान रखते हुए केसर भी उन सब के साथ बांसुरी के घर चली गई।

बांसुरी के पिता अपने कमरे में आराम कर रहे थे। उनका खाना पीना और उनकी दवाइयां उनके कमरे में पहुंचाने के बाद बांसुरी की मां बाहर आकर बांसुरी की सहायता से सब का खाना परोसने लगी…. सारे लोगों ने एक साथ मिलजुल कर खाना खाया और वहीं बैठे बातों में लग गया….-” अरे बांसुरी तुम्हारे शहर हम बड़े सालों बाद आए हैं, तो क्यों ना उस झील पर भी चले जिसकी तुम बहुत बातें किया करती हो?

” यह भी कोई पूछने की बात है? मैं तो कब से तड़प रही हूं अपने शहर की उस खूबसूरत सी झील के किनारे बैठने के लिए।”

बांसुरी के हामी भरते हैं वह सारे लोग उठ कर तैयार हो गए ।
बांसुरी के ताऊ जी का भी पूरा परिवार इस वक्त बांसुरी के घर पर ही मौजूद था । उसके सभी भाई भाभी उनके बच्चे, बांसुरी राजा आदित्य और केसर सारे लोग दो-तीन गाड़ियों में भरकर झील की तरफ बढ़ चले।
आज बड़े सालों के बाद राजा बिना अपने बॉडीगार्ड के निकला था हालांकि इसके लिए उसे प्रेम को बहुत हाथ जोड़कर मनाना पड़ा था।
वह भी एक सामान्य गृहस्थ होने का मजा लूटना चाहता था।
राजा को तो शुरु से ही अपनी राजशाही से नफरत थी । बावजूद उसकी किस्मत उसे हमेशा एक ऊंचे पद पर ही बैठाती आई थी…
आज बड़े दिनों बाद वह अपनी जेड प्लस सिक्योरिटी को भी घर पर पीछे छोड़ कर चुपचाप अपने परिवार को साथ लेकर निकल गया था। ये और बात थी कि बड़े भारी गॉगल्स दाढ़ी मूछों और कैप के साथ उसने अपने चेहरे को आधे से ज्यादा छुपा रखा था। बाकी का खुद को छुपाने के लिए उसकी गोद में नन्हा मुन्ना शौर्य था ही।
झील पर पहुंचकर सब वहां की चमकीली सीढ़ियों पर इधर-उधर बैठ गए।
सामने कल कल की आवाज के साथ पानी इधर से उधर बह रहा था। किनारों पर लगी रोशनियां पानी पर अलग-अलग चित्र उकेर रहीं थीं। सारे लोग अपनी अपनी बातों में लगे हुए थे ।
शौर्य बार-बार राजा की गोद में उछल कूद मचाते हुए उसकी टोपी को उठा उठा कर फेंक रहा था। और राजा वापस सीढ़ियों पर गिरी टोपी उठाकर अपने सर पर रख लेता। शौर्य को इस खेल को खेलने में बड़ा मजा आ रहा था, किलकारियां भरते हुए वह बार-बार अपने पिता को परेशान कर रहा था लेकिन वह नासमझ यह नहीं जानता था कि एक पिता के लिए यह परेशानी कितनी मीठी है।
झील के आसपास से निकलने वाले हर एक गुमटी वाले को रोक रोक के शौर्य को कुछ ना कुछ चाहिए था। अमूमन इतने छोटे बच्चों को देख प्लास्टिक के रंगीन खिलौने बेचने वाले, बलून बेचने वाले ऐसे जोड़ों के आसपास घूमने लगते हैं । यही वहां भी हुआ और देखते ही देखते शौर्य ने वहां मौजूद हर एक प्लास्टिक की गुमटी से अपनी एक लंबी चौड़ी रियासत तैयार कर ली। छोटे छोटे लाल पीले हरे प्लास्टिक के खिलौने रंग-बिरंगे बलून देख देख कर वह छोटा शहजादा अपनी मिल्कियत में फूला नहीं समा रहा था। और उसकी खुशी देखकर उसके माता-पिता फूले नहीं समा रहे थे, कि उसी वक्त किसी ने राजा के कंधे पर हाथ रख दिया…-” राजा अजातशत्रु!”

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राजा तो राजा बांसुरी राजा से ज्यादा घबरा गई। क्योंकि अब राजा के साथ रहते रहते उसे भी राजा की चिंता होने लगी थी। और इस बार राजा बिना किसी सिक्योरिटी के उसके साथ चला आया था। दोनों ने जैसे ही पीछे देखा आश्चर्य से दोनों की आंखें खुली की खुली रह गई…-” अरे आप दोनों यहां?”

बांसुरी के सवाल पर भास्कर मुस्कुराने लगा…-“आप भूल जाती है रानी साहिबा सिर्फ आपका ही नहीं मेरा भी मायका रायपुर ही है। ”

बांसुरी ने मुस्कुराकर “हां” में सिर हिलाया और अदिति की तरफ बढ़ गई….. अदिति ने एक छोटी सी बच्ची का हाथ पकड़ रखा था। बच्ची बड़ी प्यारी थी लेकिन उसका चेहरा न भास्कर जैसा था और ना अदिति जैसा…-” बहुत प्यारी बच्ची है। आप दोनों को ढेर सारी बधाइयां।”

” थैंक्यू!! थैंक्यू बांसुरी!! तुम्हारा बेटा भी बहुत प्यारा है क्या नाम रखा है इसका?”

अदिति के सवाल पर बांसुरी भी मुस्कुरा उठी उसने मुस्कुराकर शौर्य को अपनी गोद में ले लिया…-” शौर्य प्रताप सिंह! आप की गुड़िया का नाम क्या है?”

” ओशिन! हमने इसका नाम ओशिन रखा है! एक्चुली मुझे कहना चाहिए कि इसका नाम ओशीन ही था तो हम भी अब इसे इसके उसी नाम से बुलाते हैं। “

” मतलब आप कहना क्या चाहते हो अदिति मैं समझी
नही।”

” कुछ खास नहीं बाँसुरी! मेरी बात का मतलब यह है कि हमने ओशिन को अडॉप्ट किया है। एक्चुअली मैं अपने कैरियर को लेकर और पेरेंट्स को लेकर बीच में बहुत ज्यादा चिंतित हो गई थी। इसी सब में कभी अपनी फैमिली बढ़ाने का हम सोच ही नहीं पाए। और जब बेबी के लिए सोचना शुरू किया तब मुझे कुछ प्रॉब्लम होने लग गई। तब ऐसे में कंसीव करके मैं कोई भी रिस्क नहीं लेना चाहती थी। इसलिए हमने यह डिसाइड किया कि हम एक बेबी गर्ल अडॉप्ट कर लेंगे। जब यह डिसाइड किया उसी के कुछ समय बाद आई लॉस्ट माय मॉम।
वह कमी मेरी जिंदगी में बहुत गहरी हो जाती, अगर ओशिन नहीं होती। बस उसके बाद कोई सवाल जवाब हमारे बीच नहीं बचा और हमने तुरंत ही जाकर एक ओरफेनेज से ओशिन को गोद ले लिया। और सच मानो ऐसा लगता ही नहीं कि ओशिन को हमारी जरूरत थी बल्कि मुझे लगता है कि हमें, हम दोनों को ओशिन की बहुत जरूरत थी।
उसके आ जाने से हमारी जिंदगी में रंग भर गए। ऐसा नहीं था कि बिना बच्चे के हम दोनों खुश नहीं थे। ऐसा भी नहीं था कि अगर हम प्रयास करते तो मैं मां नहीं बन पाती, लेकिन जाने क्यों ऐसा लगा कि हमें बच्चा गोद ही लेना चाहिए।
पापा अब हमारे साथ ही रहते हैं। और ओशिन के कारण हर वक्त उनका मन लगा रहता है।
ओशिन छोटी थी इसलिए उसे लेकर ट्रेवल करना मुझे सही नहीं लगता था और इसीलिए बहुत दिनों से मैं यहां ससुराल नहीं आ पाई थी। मौके बे मौके भास्कर अकेला ही आया करता था, इसलिए इस बार मेरी सासू मां ने जिद करके हमें बुलाया। क्योंकि वह भी अपनी पोती के साथ खेलना चाहती थी।
उनकी स्पेशल रिक्वेस्ट थी कि उनकी पोती की मुंह दिखाई करनी है उन्हें, और इसके लिए उन्होंने एक बहुत शानदार पार्टी दी।
सच कहूं तो मम्मी जी से मुझे इतने सारे प्यार की उम्मीद नहीं थी। एक अडॉप्टेड बच्चे के साथ उसके पेरेंट्स हमेशा समाज में उस बच्चे को कैसे सेट करेंगे इसी बात को लेकर सबसे ज्यादा परेशान रहते हैं। लेकिन मेरी वह परेशानी मेरे ससुराल वालों ने बहुत आसानी से दूर कर दी।
सासु मां ने तो इसे इतने प्यार से अपना लिया कि उनसे मेरे जो भी गिले-शिकवे थे ना सारे मैं भूल गई”।

“अच्छा मैडम ऐसे क्या गिले-शिकवे थे आपके? जो आप भूल गई? “

अदिति मुस्कुराकर भास्कर की तरफ देखने लगी..-” अब मेरा मुंह मत खुलवाओ , आखिर जनरेशन कोई भी हो अगर बहू सास की बुराई ना करें तो वह बहू बहू कैसीन क्यों बांसुरी?” “

” आप बहुत प्यारी है अदिति!”

बातों ही बातों में चलते चलते वह चारों लोग झील के किनारे काफी दूर तक बढ़ गए। वही खड़े आइसक्रीम वाले से शौर्य और ओशिन आइसक्रीम खिलाने की जिद कर बैठे। उन लोगों के हाथों में आइसक्रीम दे कर वह चारों एक बार फिर अपनी बातों में डूब गए।

इन सब से दूर झील की सबसे निचली सीढ़ियों पर केसर और आदित्य पानी में पैर डाले बैठे थे…

” क्या वाकई तुम हमारे साथ नहीं चलोगी? “

” नहीं आदित्य हमारी बात समझने की कोशिश करो। अगर हम अभी पहुंच गए तो रेखा जिस जद्दोजहद से अपने आप को खड़ा करने की कोशिश में लगी है, उसकी वह सारी मेहनत खत्म हो जाएगी। क्योंकि सहारा पाते ही वह एक बार फिर कमजोर पड़ जाएगी। “

” पर मुझे लगता है अगर तुम उसके साथ खड़ी होगी तो वह ज्यादा बेहतरी से काम कर पाएगी।”

“नहीं वह मेरी बहन है। मैं उसे बचपन से जानती हूं! उसकी रग रग से वाकिफ हूं, अगर उसके सर पर पहाड़ ना टूटे तो वह एक कदम भी ना उठाएं ।करने दो उसे अभी अपने बलबूते पर सब कुछ।
आज तक उसने अपनी बहन के सहारे ही सब कुछ पाया है। लेकिन अब उसकी बारी है। उसे गिरने दो, उठने दो, संभलने दो और फिर भागने दो । एक दिन ऐसा आएगा जब लगातार भागेगी। बिना गिरे, बिना रुके, बिना अटके। और उस दिन जब भागती हुई थकेगी तो उसे सहारा देने के लिए हम बाहें पसारे उसके सामने खड़े मिलेंगे ।”

“मतलब तुम्हारी जिंदगी का जो भी निर्णय है, वह सब कुछ सिर्फ रेखा से ही जुड़ा हुआ है! और किसी से तुम्हारा कोई जुड़ाव, लगाव नहीं है?”

केसर में आदित्य को बड़ी अजीब नजरों से घूर कर देखा.. एकसक्यूज़ मी ! प्यार मोहब्बत करने वाली लड़की नहीं है हम। आप अच्छे से जानते हैं हमें आदित्य। “

” ओके! ओके बाबा!! मैं तो बस मजाक कर रहा था एक बात पूछ सकता हूं? “

फिर एक बार आदित्य को अजीब से नजरों से घूर कर केसर ने देखा और उसके पूछने से पहले ही उसके सवाल का जवाब दे दिया…..-” हां आप यहां हमसे मिलने आ सकते हैं लेकिन कभी-कभी।”

मुस्कुराकर आदित्य ने अपनी पलके झुका ली अपने बालों पर खुद ही हाथ फिरा कर वह मुस्कुरा कर झील के पानी में धीरे-धीरे कंकड़ फेंकने लगा….

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*******

निरमा की आवाज से चौक पर प्रेम बिस्तर पर उठ बैठा।

” क्या हुआ निरमा तुम ने आवाज लगाई क्या? “

” अब तुम मुझसे यह पूछ रहे हो कि मैंने तुम्हें आवाज लगाई या नहीं? “



प्रेम गहरी नींद से सुबह सुबह उठा था। उसे अचानक समझ नहीं आया कि निरमा क्या बोल रही है? उसने अपने बाजू में देखा मीठी गहरी नींद सो रही थी! इसका मतलब मीठी ने कोई शरारत नहीं की थी। अब बचा वो खुद।
प्रेम गहरी सोच में डूब गया। घर में निरमा तभी चिल्लाया करती थी , जब या तो उससे खुद से (प्रेम) कोई गलती होती थी , या मीठी से। क्योंकि निरमा का यह मानना था कि वह खुद बहुत पर्फेक्ट थी और उससे कभी कोई गलती नहीं हुआ करती। गलतियों का सारा ठीकरा या तो प्रेम के सिर फुटा करता था या मीठी के।
आज सुबह-सुबह बाथरूम के सामने खड़े होकर निरमा के चिल्लाने का कारण प्रेम की समझ से बाहर था।
” क्या हुआ निरमा कुछ परेशान हो क्या? “

” परेशान नहीं होंगी तो और क्या होंगी यह देखो।” और निरमा ने अपने हाथ में पकड़ी प्रेगनेंसी किट प्रेम के सामने रख दी।
एकाएक प्रेम को यही नहीं समझ में आया कि निरमा ने उसके सामने क्या रखा है ? वह थोड़ी देर तक आंखें मलते उसे देखने लगा….

” अरे इतना आंखें फाड़ के देखने की क्या जरूरत है? मुझे कोई अवार्ड नहीं मिला है। प्रेगनेंसी किट है यह। “

” ओह्ह मतलब !”
प्रेम को हल्का फुल्का मतलब तो समझ आने लगा था पर फिर भी एक आशंका तो मन में थी ही, इसलिए उसने निरमा से इतना खतरनाक सवाल पूछ लिया!

” मतलब ? अब इतने भोले तो नही हैं आप की इसका मतलब समझाना पड़े..

” अरे ये नही। मेरा पूछने का मतलब था कि …

” आपके पूछने का जो भी मतलब रहा हो, मेरे कहने का ये मतलब है कि यूनिवर्सिटी के साथ साथ मुझे मीठी को भी संभालना है। इसलिए मैं दूसरे बेबी के लिए नही सोच सकती…

” लेकिन निरमा सुनो तो सही….

“कुछ नही सुनना मुझे …”

” पर सुनो तुम ही तो कहती थी कि तुम्हे एक छोटा प्रेम चाहिए…!”

” कहती थी, पर अब नही कहती … और सुनो…

और निरमा बिना प्रेम की पूरी बात सुने अपनी ही लय में भुनभुनाती हुई अंदर चली गयी।
और प्रेम उसके पीछे उसे मनाने भीतर चला गया….!

****

महल वापस लौट चुके बाँसुरी और राजा अपने कमरे में थे। बाँसुरी की सहायिका उसका सामान बांध रही थी, और उदास सी बाँसुरी उसे क्या क्या रखना है बताती जा रही थी। रायपुर से वापसी के बाद दोनो साथ ही महल चले आये थे। बाँसुरी की छुट्टियाँ खत्म हो चुकी थी और अगले ही दिन उसे वापस लौटना था, इसलिए वो उदास थी और उसका मन किसी काम में नही लग रहा था। राजा वहीं बैठा शौर्य के साथ खेल रहा था कि कमरे पर दस्तक हुई और समर हाथों में कोई कागज़ थामे भीतर चला आया।
उसने आकर वो कागज़ राजा के हाथ में रखे और वापस जाने को था कि बाँसुरी ने उसे टोक दिया….-” आप कब शादी का लड्डू खिला रहें हैं समर सा? अब तो कोर्टशिप को आपके वक्त हो चला है। शादी कर लीजिए!”

” जी रानी साहिबा !! अगली फुरसत में सबसे पहले शादी ही करूँगा। अभी तो हुकुम के साथ ही हूँ।”

” हम्म अच्छा है। कम से कम आप और प्रेम भैया इनके साथ हैं तो मैं थोड़ा निश्चिंत रह पाती हूँ । मुझे तो इनके साथ रहने का मौका ही कम मिल पाता है।”

” मैंने तो आपसे कहा था कि आपका स्थानंतरण करवा लिया जाएगा पर आप ही इस तरह से तबादले के लिए तैयार नही होतीं।

” हम्म हो जाएगा, तबादला भी एक दिन हो ही जायेगा। आप बोलिये क्या लेंगे चाय या कॉफी?”

” अभी कुछ नही लूंगा रानी साहिबा। अभी तो बस ये सरकारी कागज़ हुकुम के हवाले करना था। और अगर हुकुम इजाज़त दें तो मैं शाम भर की छुट्टी लेना चाहता हूँ। “

बाँसुरी खिलखिला उठी…-“इतना सर पर मत बिठाइए अपने हुकुम को। जाइये आपको इजाज़त है आप आराम से जाइये। वैसे जाना कहाँ हैं? पिया को शॉपिंग करवाने ? “

समर मुस्कुरा कर अपने बालों पर हाथ फिराता उन दोनों को झुक कर प्रणाम कर बाहर चला गया।

बाँसुरी मुस्कुरा कर राजा के पास आ बैठी…;” क्या हुआ? आज कुछ ज्यादा ही उदास लग रही हो?”

” आपको छोड़ कर जाने का बिल्कुल मन नही कर रहा।’

“तो मत जाओ।”

“फिर मेरी नौकरी, मेरा काम?”

“मेरे साथ रह कर लो।”

“आप जानते है ये मुमकिन नही है।”

राजा ने उसकी गोद में वो कागज़ डाल दिया।

बांसुरी ने उसे खोला और फटाफट पढने लगी…. उसके स्थानांतरण का पत्र था और अब उसकी नई नियुक्ति सचिवालय में कर दी गयी थी।
बाँसुरी खुशी से राजा के गले से लग गयी…-” मतलब अब मैं हमेशा आप के पास रहूंगी। “

“बिल्कुल ! और अब हमारी हुकुम वहाँ हमारे ऑफ़िस में भी अपनी तानाशाही चलाएंगी।”

” मैं तानाशाह हूँ। ” बनावटी गुस्से से बाँसुरी ने राजा को घूर कर देखा…..

” और नही तो क्या एक अच्छे खासे राजा को मंत्री बना कर छोड़ा, अब बोलो तानाशाह नही हो।”

बाँसुरी आगे बढ़ कर राजा के सीने से लग गयी…. खिड़की पर उतरा चांद भी उन दोनों को साथ देख मुस्कुराने लगा!!!

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इति !!!



दिल से ……


आज सोचा कहानी बहुत बड़ी हो गयी है इसलिए दिल से न लिखूं लेकिन आज का भाग बिना मेरे इस कॉलम के अधूरा सा लगता।

लगभग दस हज़ार शब्दों में आज का भाग सिमट पाया। लिखते समय फिर एक बार दिल में आया कि इसे अगले तीन भागों में खत्म करूँगी, पर फिर लगा कि अब अगर इस भाग को पूरा एक बार में नही लिखा तो जाने कब तक लिखना पड़ जायेगा।

हमारे राजा रानी थे ही इतने प्यारे की उनके बारे में जितना लिखूं मुझे कम ही लगता था, लेकिन ऐसा होता तो नही है ना।
अगर लेखक बिना पाठकों की इच्छा सोचे लिखता रहा तो कहानी बहुत बार पथ से भटक जाती है।

हर कहानी का एक अंत होता ही है। और ये भी इस कहानी का अंत है राजा अजातशत्रु और रानी बाँसुरी मेरी अगली कहानी मायानगरी में साथ चलते रहेंगे। सो आप उनके बारे में निश्चिंत रहे, आप लोगों की उन सबसे मुलाकात होती रहेगी।


इस भाग के बाद कहानी से जुड़ी कई बातों के लिए एक विशेष भाग ज़रूर लिखूंगी , उसमें कहानी से जुड़ी कई बातें होंगी।
अगर आप लोगो के मन में भी कहानी को लेकर कोई शक शुबहा या सवाल हों तो समीक्षा में लिख सकतें हैं।

आप सभी ने जीवनसाथी के उस प्यार भरे सफर में बहुत साथ दिया और इसके लिए मैं आप सभी की हृदय से आभारी हूँ।

एक अच्छा लेखक वह है जिसके पाठक बहुत अच्छे हों और किस्मत से मुझे एक विशेष बुद्धिजीवी वर्ग पढ़ता है और इसके लिए आप सभी की एहसानमन्द हूँ।

बस अब और ज्यादा लिखूंगी तो भावुक हो जाऊंगी।

इस भाग का “दिल से” क्रमशः रहेगा….

आप सभी की मुहब्बत के लिये दिल से आभार शुक्रिया नवाज़िश !!!


आपकी !!!

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aparna ……































   
   



जीवनसाथी-124

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  जीवनसाथी-124

       राजा साहब के कार्यालय में मीटिंग पर मीटिंग चल रही थी अब लगभग उनके मंत्रिमंडल का गठन हो चुका था और शपथ ग्रहण का समय भी आ गया था।

     अगला दिन बहुत महत्वपूर्ण था राजा के लिए। राजनीति में उसकी पारी की शुरुवात होने जा रही थी। आज तक वो अपने महल और रियासत की साज सम्भाल करता आया था लेकिन अब वो सरकार बनाने जा रहा था। अब वो पूरे एक राज्य को संभालने जा रहा था।
    अपने काम समेट कर वो कमरे में पहुंचा तब बाँसुरी बच्चे को गोद में लिए इधर से उधर टहलती उसे सुलाने की कोशिश कर रही थी।
   बाँसुरी ने राजा को देखा और मुस्कुरा उठी…-“आजकल तो राजा साहब के दर्शन मिलने कठिन हो गए हैं। “
  राजा मुस्कुरा कर हाथ मुहँ धोने चला गया… उसके बाहर आते ही बाँसुरी एक बार फिर शुरू हो गयी…
” कल रात आप सोने भी नही आये? कहाँ रह गए थे?

राजा ने अपने बाल पोंछते हुए उसे देखा और फिर बच्चे को गोद में ले लिया…-” कल काम बहुत ज्यादा था। सारा काम निपटाने के बाद आदित्य, रेखा और केसर के पिता से मिलने की ज़िद लिए भी बैठा था तो रात में सारा काम में निपटने के बाद समर और आदित्य के साथ रेखा के पिता से मिलने चला गया था। हालांकि वह खुद भी यही सोच रहे थे कि वह एक-दो दिन में महल आएंगे, लेकिन हम लोगों के जाने से वो खुश नजर आए। वह अपने घर वापस लौटना चाहते थे उन्होंने अपने मन की बात हम लोगों के सामने ही कहीं तो आदित्य ने उसी समय कह दिया कि चले हम आप को छोड़ देते हैं। उसके बाद उन्हें लेकर उनके घर तक गए। वहां पर नौकरों से कहकर सब कुछ ठीक-ठाक करवाया फिर वहां से वापस लौटते में हम लोगों को बहुत देर हो गई थी। रात में दो बजे फिर मैंने सोचा तुम्हें आधी नींद से जगाना सही नही होगा इसलिए ऑफिस में ही सो गया।”

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” हम्म ! मैं परेशान न हो जाऊं इसलिए ऑफिस में ही सो गए! मैं तो इस बात से और ज़्यादा परेशान हो गयी। रात में उठ उठ कर आपको रिंग करती रही। “

राजा को याद आया उसका फ़ोन बंद हो चुका था..-” ओह्ह मेरा तो फ़ोन ही बंद पड़ा था।”
” जी हाँ! अब आप मुझे अपना फ़ोन असिस्टेंट ही बना लीजिए। आपके कॉल्स देखा और संभाला करूँगी। “
” अभी तो बस मुझे संभाल लीजिये हुकुम। उतना ही काफी है।”
  राजा ने सो चुके शौर्य को बिस्तर पर रखा और बाँसुरी को बाहों में भर लिया। दोनों खिड़की पर खड़े बाहर निकलते चांद को देख रहे थे। बाँसुरी की कुछ उलझी सी लटें उसके माथे पर इधर उधर हवा से उड़ कर उसे परेशान कर रहीं थीं। राजा ने उन्हें उंगली से उसके कान के पीछे समेट दिया… उसकी उंगलियां बाँसुरी की गर्दन पर फिसलने लगी कि उनका नन्हा राजकुमार नींद में कोई सपना देख डर के मारे चिल्ला कर रोने लगा, और बाँसुरी राजा को एक तरफ कर बच्चे के पास भाग गई…
” आजकल हमारी हुकुम के पास हमारे लिए वक्त नही है।”
“हाँ जैसे आपके पास ढेर सारा वक्त है।”
” नन्हे नवाब नही चाहते कि प्रोपर्टी में उनका कोई हिस्सेदार आ जाये। बस जैसे ही पापा मम्मी पास आये की बुक्का फाड़ दहाड़ लगातें हैं।”
  राजा की बात सुन बाँसुरी ने मुस्कुरा कर शौर्य को गोद में लिया और वापस उसे सुलाने की कोशिश में लग गयी…-“साहब सो मत जाना। मैं बस इसे सुला कर अभी आयीं।”
   बाँसुरी ने इधर उधर टहलते हुए आखिर बच्चे को सुला ही लिया।
   वो उसे बिस्तर पर रखने आई की देखा राजा गहरी नींद में डूबा किसी मासूम बच्चे सा नज़र आ रहा था। उसका माथा चूम कर वो कमरे की बत्तियां बुझाने चली गयी।

****

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          अगली सुबह राजा का पूरा दिन व्यस्त गुजरना था।
   शपथ ग्रहण होना था। इसी से वो तैयार होकर सुबह ज़रा जल्दी ही निकल रहा था। उसके साथ उसके मंडल के बाकी सदस्य और समर प्रेम भी थे। युवराज और आदित्य भी उनके साथ हो लिए थे।
   विराज के पास भी और कोई चारा नही बचा था।  रूपा ने ही राजा को टीका लगाया,बाँसुरी उसके पास खड़ी मुस्कुरा रही थी।
  रेखा भी वहीं थी…-“तुमसे एक बात पूँछे बाँसुरी?”
” हाँ पूछो रेखा।”
” राजा साहब को तुमने बताया क्यों नही कि आज तुम्हे शौर्य को वैक्सीन लगवानी है? क्या अकेले ही वैक्सीन लगवाने जाओगी। “
“वैसे जाना क्यों पड़ेगा भला ? तुम्हारे बुलाने पर डॉक्टर यहीं आ जाएंगे। “रूपा ने रेखा की बात पर बाँसुरी की तरफ देख कर कहा। अब तक राजा और उसकी सेना वहाँ से निकल चुकी थी।
  ” जी भाभी साहब ! पिया से बात कर लुंगी, वो भेज देगी किसी को। और जहाँ तक साहब को रोकने की बात है रेखा, वो मैंने जानबूझ कर नही किया।
  हम औरतों से यहीं तो गलती हो जाती है। जब हमारे पति हमसे और हमारे बच्चे से अधिक समय अपने काम को देने लगतें हैं तब हम उनकी मजबूरी समझे बिना ज़बरदस्ती उन पर अपने काम लादते चले जाते हैं! बस फ़िज़ूल की अपनी महत्ता दिखाने! और ऐसे में होता कुछ नही बस सामने वाले का तनाव बढ़ता है । हम हमेशा अपने आप को महत्वपूर्ण दिखाने के लिए पतिदेव के कामों को समझे बिना उन पर अपना बोझ भी ला देते हैं और मुझे यह हम औरतों की बेवकूफी लगती है।
   मुझे तो शुरु से पता था कि आज शपथ ग्रहण है । इसलिए साहब के पास वक्त नहीं होगा इत्तेफाक से आज ही शौर्य की वैक्सीनेशन की डेट भी है। अब अगर मैं इस वक्त साहब से यह उम्मीद करूं कि पहले वह मेरे साथ बच्चे को वैक्सीनेट करवाएं और उसके बाद सदन में जाएं तो यह तो गलत उम्मीद है ना।
मैं यह भी जानती हूं कि अगर मैं साहब को बता देती तो उनका मन शपथ ग्रहण में नहीं लगता। और बार-बार उनका मन उनके लाडले की तरफ लगा रहता।  ऐसे में परेशान होकर वह मुझे फोन करते और अपना खुद का वक्त भी बर्बाद करते , इसीलिए मैंने उनसे कुछ कहा ही नहीं। और फिर मेरे साथ रूपा भाभी साहब है, तुम हो, फिर मुझे किस बात की चिंता?”

” तुम्हारी बातें सुनकर हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है बांसुरी! हमने पति पत्नी के रिश्ते को कभी इस नजरिए से देखा ही नहीं। हमने हमेशा यही सोचा कि हमारा सबसे पहला हक है विराज सा पर और बाकियों का हमारे बाद। लेकिन तुमने अपने राजा साहब पर सारी दुनिया को हक जताने दिया, और खुद हर वक्त उनके किनारे खड़ी रही, उनका सहारा बनकर। और इसीलिए तो आज इतनी सारी जिम्मेदारियां होने के बाद भी राजा साहब सब कुछ मुस्कुराते हुए निभा ले जाते हैं।
      तुम दोनों सच्चे अर्थों में “जीवन साथी” हो ! ऐसे साथी जिनके जुड़ने से एक दूसरे का जीवन संवर गया।”

” धन्यवाद रेखा।  ऐसा तुम्हें लगता है कि हम दोनों बहुत परफेक्ट है। पर ऐसा नहीं है । हम दोनों में भी कमियां हैं , और थोड़ी  नहीं बहुत सारी हैं। लेकिन हमने एक दूसरे को एक दूसरे की कमियों के साथ स्वीकार किया है। और मजे की बात यह है कि हम एक दूसरे की कमियों को सुधारने की कोई कोशिश नहीं करते। क्योंकि जब हम सामने वाले की कमियों को सुधारने की कोशिश करने लगते हैं, तो हम उसे बदलने की कोशिश करने लगते हैं। और यहीं पर जाकर बातें बिगड़ जाती हैं । जो जैसा है अगर हम उसे वैसे ही स्वीकार लें, और पूरे मन से स्वीकार लें तो हमारी जिंदगी आसान हो जाती है।
    और दूसरी बात एक दूसरे की कमियां सुधारने की जगह अगर हम अपनी कमियों पर काम करना शुरू कर दें तो जिंदगी और आसान हो जाती है।  मैं तुमसे बहुत दिनों से एक बात कहना चाह रही थी पता नहीं तुम मेरी बात समझ पाओगी या नहीं।”

“कहो ना बाँसुरी! बेझिझक कहो क्योंकि अब हम देवरानी जेठानी से ज्यादा सहेलियां बन गई हैं।”

” बस उसी सहेली वाले रिश्ते के लिए तुमसे कह रही हूं कि केसर ने तुम्हारे लिए जो सोच रखा है उसे पूरा करने के लिए कोशिश तो करके देखो।

“पर हमने आज तक कोई काम नहीं किया बांसुरी हमें किसी भी चीज का कोई अनुभव नहीं है।”

“अनुभव लेकर कोई भी पैदा नहीं होता रेखा। अनुभव काम करने से आता है , तुम्हें क्या लगता है मुझे कलेक्ट्री का बहुत अनुभव था। कुछ भी नहीं था। मैंने बहुत सारी गलतियां की हैं लेकिन अपने काम में  डटी रही। “

“अरे हां तुम्हारी छुट्टियां कब तक है?”

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“पूरे 6 महीने की छुट्टियां मिली है मुझे! और इन छुट्टियों में यह छोटा सा नन्हा सा राजा साहब भी संभलने लायक तो हो ही जाएगा। उसके बाद देखूंगी अगर यह छोड़कर जाने लायक हुआ तब तो ऑफिस ज्वाइन करूंगी वरना एक दो महीने की और छुट्टियां बढ़ा लूंगी। अब कल से तुम भी एनजीओ का काम देखना शुरू करो। “

  रेखा को खुद के ऊपर इतना भरोसा तो नहीं था लेकिन बांसुरी की बात सुनकर उसे लगा कि उसे वाकई अपने और अपनी केसर दीदी के लिए कुछ करना ही होगा।


*******

दिन बीतते देर नहीं लगती और खासकर जब कोई किसी काम में व्यस्त हो तब तो समय का पता भी नहीं चलता ।
   आदित्य ने केसर की बॉडी के बारे में रेखा से कोई अधिक चर्चा नहीं की थी क्योंकि वह नहीं चाहता था कि वो रेखा को किसी भी तरह की उम्मीद दे । क्योंकि अगर यह वाकई केसर की बॉडी होगी और वह रेखा से यह कह जाएगा कि यह केसर नहीं है तो रेखा फिर से एक उम्मीद में जी उठेगी और कहीं उसकी उम्मीद पूरी नहीं हुई तो वह वापस टूट पड़ेगी इसलिए आदित्य ने इस बारे में रेखा से कुछ भी नहीं कहा।
   
     विराज अपने कामों में व्यस्त था और अब रेखा ने उससे किसी भी तरह की कोई भी उम्मीद रखनी छोड़ दी थी। रेखा का बेटा अब स्कूल जाने लगा था और इसलिए रेखा के पास भी वक्त था और इसलिए उसने केसर के दिए सारे कागजों को सरसरी तौर पर देखना शुरू किया।
      रेखा अक्सर केसर की यादों में डूब जाया करती थी। उसे हमेशा लगता कि केसर दुनिया के लिए बेशक गलत थी लेकिन अपने खुद के परिवार के लिए उसने कितना कुछ किया था। आज तक देखा जाए तो रेखा ने अपने पिता के लिए कुछ भी नहीं किया था। क्योंकि केसर ने उसे करने का कुछ मौका ही नहीं दिया। और अब जब रेखा के पास मौका था कि वह केसर और अपने पिता के लिए कुछ कर सकती थी तब भी केसर उसके लिए ही इतना कुछ छोड़ कर चली गई ।
        ऐसे ही एक शाम जब रेखा केसर को बहुत याद कर रही थी, तब अपने पिता से मिलने चली गई उसके पिता भी रेखा को देखकर खुश हो गए और उन्होंने केसर के सारे बिजनेस के पेपर और एनजीओ के कागज भी रेखा के हवाले कर दिए…;” अब हमसे यह सब संभाला नहीं जाता बेटा, अगर हो सके तो तुम अपना यह बिजनेस ही संभाल लो। हम जानते हैं तुम महलों की रानी हो। तुम्हें काम करने की कोई जरूरत नहीं है लेकिन फिर भी घर का बिजनेस है हमसे अब सम्भल नहीं पा रहा।  केसर ने बड़े प्यार से संवारा था इस सारे काम को तो अगर तुम चाहो…

रेखा ने अपने पिता की बात आधे में ही काट दी… “जी पिता साहेब आप चाहते हैं तो हम यह काम कल से ही संभाल लेंगे। बस एक बार घर पर सभी से पूछ लें।”

   रेखा ने वापस लौट कर बांसुरी से इस बारे में बात की। बांसुरी और रूपा यह सुनकर बहुत खुश हुए। वहाँ तो सभी ये चाहते थे कि रेखा अपने खोल से बाहर निकले।
    उसी शाम खाने की मेज पर रेखा ने अपने काम को शुरू करने की बात वहां मौजूद सभी लोगों के सामने रखी और युवराज से आग्रह किया कि वह उसे अपना काम करने की अनुमति दें। युवराज इस बात पर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने रेखा  के सिर पर हाथ रख दिया…-” आप हमारी छोटी बहन जैसी है रेखा! आपको कहीं किसी मोड़ पर भी हमारी जरूरत पड़े तो आप बेझिझक कहिएगा ! हम जानते हैं कि केसर ने बहुत मजबूती से अपना बिजनेस खड़ा किया है, आप उस बिजनेस को बहुत आगे ले जाएंगी। हमारा आशीर्वाद आपके साथ है।
   एक तरह से अब उस परिवार में युवराज ही सबसे बड़ा था और उस से अनुमति लेने के बाद ही वहां के सारे कार्य संपन्न होते थे। रानी मां की मौत के बाद महाराजा साहब अब खाने की टेबल पर नहीं आया करते थे। उनका खाना हर वक्त उनके कमरे में पहुंचा दिया जाता था। दादी साहब भी बहुत बुज़ुर्ग हो गई थी। इसलिए उनका भी कमरे से बाहर आना जाना कम ही हुआ करता था। खाने की टेबल पर बाकी सभी लोगों के साथ अब महाराजा साहब की कुर्सी खाली जरूर होती थी लेकिन उनकी बाजू वाली कुर्सी पर युवराज ही बैठा करता था।
   राजा अजातशत्रु अब मुख्यमंत्री बन चुके थे और इसलिए उनकी व्यस्तताएं अलग तरीके से बढ़ गई थी। कई बार कार्य की अधिकता के कारण उन्हें अपने मुख्यमंत्री आवास पर ही रुकना पड़ता था। तब ऐसे में वह अपने ड्राइवर को भेजकर बांसुरी और अपने छोटे नवाब को भी अपने पास बुला लिया करते थे। और दो-चार दिन के काम को निपटाने के बाद उनका परिवार वापस महल आ जाया करता था।
    बहुत बार जब वह दूसरे प्रदेशों के दौरे पर होते थे तब बांसुरी महल में ही रहा करती थी।
  ऐसा ही कोई जरूरी काम था जिसके सिलसिले में राजा अजातशत्रु को दिल्ली के दौरे पर जाना पड़ा था। उन्होंने विराज से भी साथ चलने की गुजारिश की थी लेकिन विराज उनके साथ नहीं गया था। महल में होने के बावजूद वह रात्रि के सह भोज में कभी भी समय पर नहीं पहुंचा करता था जब उसका मन किया करता वह सब के साथ खाने चला आता और कभी अपने कमरे में ही अपना खाना मंगवा लिया करता था।
   आज भी जब रेखा ने सबके सामने अपना काम शुरू करने की बात रखी विराज अपने कमरे में बैठा शराब में डूबा पड़ा था। सब का आशीर्वाद और सहमति देखा प्रसन्नता से विभोर होती वह अपने कमरे में चली गई थी।
 
            विराज को एक तरफ सोफे पर बेसुध पड़ा देख उसका मन वितृष्णा से भर गया।
क्यों उसका मन अपने ही पति के लिए स्नेह से नहीं भर उठता है। उसकी समझ से परे था। ऐसा तो नहीं था कि उन दोनों के बीच हमेशा सिर्फ तकरार और लड़ाई झगड़े ही हुआ करते थे। कुछ प्यार भरे लम्हे भी तो बीते थे उनके बीच, और आज भी बीतते थे।  जब कभी विराज नशे में नहीं होता था तब वह रेखा से बहुत प्यार से पेश आता था।
   तब उसे रेखा बहुत सुंदर भी नजर आती थी। रेखा कि हर बात भी अच्छी लगती थी। लेकिन अक्सर उनके साथ होता था कि जब वह शांत बैठे बातचीत करने लगते थे तो जाने कैसे बातें ऐसा मोड़ ले लेती थी कि दस मिनट में ही उनकी बातों में टकराव आ जाता था कभी रेखा भड़क उठती थी तो कभी विराज।
   शायद इसी को कहते हैं मन का मेल ना हो पाना। तन तन से जुड़ चुके थे। दोनों की अपनी ज़रूरतें थी और उन्हें पूरा भी कर लिया जाता लेकिन मन का मेल कभी नहीं हो पाया था और शायद इस जीवन में अब कभी होना भी नहीं था।
    रेखा की सहायिका उसके बेटे को सुला कर जा चुकी थी। विराज की बोतल एक तरफ लुढ़की पड़ी थी। उसकी आधी खाई प्लेट भी एक ओर पड़ी थी। रेखा ने सहायिका से कह वो सब साफ करवा दिया। विराज सोफे पर ही सो चुका था।
   रेखा भी कपड़े बदल कर सोने चली गयी। अगले दिन से उसका काम शुरू होना था।

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     बड़े दिनों के बाद समर को फुरसत मिली थी उसने पिया को कॉल लगा लिया…-“क्या बात है? आज मंत्री जी ने खुद फ़ोन किया है? कुछ तो गड़बड़ है।”
” क्या यार शर्मिंदा मत करो। मैं तो हमेशा कॉल करना चाहता हूँ,मिलना चाहता हूँ पर जानती तो हो वक्त की कितनी कमी है।”
“जानती हूँ तभी तो मैं भी सुबह शाम फोन कर कर के परेशान नही करती। वरना मन तो मेरा भी करता है कि मैं अपने क्यूट बेबी से रोज़ पूंछू ” मेरे शोना बाबू ने खाना खाया!”
” ओह्ह रियली ! तुम्हें ऐसा बोलना अच्छा लगता है?”
” ऑफकोर्स ! गलत क्या है इसमें। इट्स क्यूट यार। अब आजकल सोशल मीडिया पे बाबू शोना का मज़ाक उड़ाने का ट्रेंड चल रहा है, जिसे देखो वही “बाबू शोना ” जोक्स बना रहा मीम्स बना रहा, इसका मतलब ये थोड़े न हो गया कि मुझे अच्छा नही लगता। और एक मज़े की बात ये जो लोग आज ऐसी बातों का मज़ाक बनाने वाले ही कभी खुद ऐसी बातें करते रहें होंगे। खैर वो छोड़िए मंत्री जी आप बताइए कैसे फ़ोन किया ?”
” मिलना था तुमसे।”


” अरे वाह! तो आ जाइये फिर !”
” अभी तो हॉस्पिटल में होंगी ना?”
” हॉं ! बस दस मिनट में वापस निकलूंगी। किसी कॉफी शॉप में मिल लें।”
” न न ! अकेले मिलना है। तुम्हारे रूम पर आ जाऊँ?”
” बड़े शरारती हो रहें हैं आप। क्या बात है?”
” बस वही, जो तुम समझ रही हो।”
” आज कॉफी शॉप पे मिल लेतें हैं। बहुत दिन से साथ में कोल्ड कॉफी नही पी।”
“मतलब तुम नही चाहती कि मैं तुम्हारे रूम पर आऊं?”
“अरे नही बाबा! ऐसा कुछ नही है, चलिए ठीक है रूम पर ही आ जाइये। कब तक आएंगे।
” दस मिनट में पहुंचता हूँ। आज ज़रा फ्री हूं तो सोचा तुम से ज़रा अच्छे से मिल लिया जाए।
” दस मिनट बस ! नही रुकिए , आप बीस मिनट में आइये। तब तक मैं भी पहुंच जाऊंगी। “
” अरे मैं तुम्हें लेता हुआ चलता हूँ ना। क्या प्रॉब्लम है? “ओके!”
   पिया ने तुरंत फ़ोन रखने के बाद अपनी काम वाली दीदी को फ़ोन लगाया। वो चार दिन से नदारद थी। पिया के अस्पताल की सीनियर डॉक्टर छुट्टी पर गयी थीं, इसी से अस्पताल में भी भारी मगजमारी हो रही थी। और घर की साफ सफाई नही हो पा रही थी।
छोटा सा फ्लैट था। चार दिन से वो खुद बर्तन ज्यादा न निकलें इसलिए कभी मैगी तो कभी सैंडविच पर गुज़ारा कर रही थी। और चारो दिन के बर्तन सिंक पर पड़े अपनी किस्मत को रो रहे थे।
   घर के कामों से उसे वैसे भी मौत आती थी। उसकी मेड ही सुबह उसका बिस्तर ठीक करने से लेकर साफसफाई बर्तन खाना बनाना सब किया करती थीं।
  पिया को घबराहट सी होने लगी। समर ऐसे उसके साथ गया तो उसका कबाड़ घर देख कर क्या सोचेगा? उसे लगेगा छि कितनी गंदी है। जब घर सही नही रख सकती तो शादी क्या निभाएगी।
   मेड को दो बार पूरी रिंग देने पर भी उस नामुराद ने फ़ोन नही उठाया।
  गिरती पड़ती पिया अपना एप्रन उठाये वहाँ से घर के लिए भागी…
   उसका फ्लैट दो गलियों के बाद ही था, वैसे वो कई बार पैदल ही आ जाया करती थी पर अधिकतर स्कूटी से ही आती थी। आज स्कूटी भी उसकी सामने रहने वाली आँटी का बेटा मांग कर ले गया था।
    जान हथेली पर लेकर वो मरती पड़ती अपने फ्लैट की तरफ भागी। जाते जाते ही उसने समर को मैसेज कर दिया कि एक केस आ गया है, आधा घंटा लगेगा।
   भाग कर वो घर पहुंची, दरवाज़ा खोलते ही उसका सिर घूम गया।
   दो दिन के धुले कपड़े सामने काउच पर अंबार लगाए पड़े थे। सामने टेबल पर एक तरफ किताबें, न्यूजपेपर्स,  चिप्स के पैकेट्स, कुछ अधखुली बिस्किट्स के रैपर, कोल्ड ड्रिंक्स के कैन पड़े हुए थे।

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    उसे भी तो अजीबोग़रीब शौक थे। सुबह उठ कर उसे रनिंग भी करनी होती थी लेकिन रातों को उल्लू के समान जाग कर टीवी पर आंखें भी फोड़नी होती थी। और मूवीज़ के साथ उसके मुहँ कान चलते ही रहते थे।  फटाफट खुद पर बड़बड़ाती पिया इधर उधर फैला कबाड़ समेटने में लग गयी कि उसका फ़ोन बजने लगा….-” मैनूं डर जेहा लगदा ए, दिल टूट न जाये वेचारा।” उसने तुरंत कॉल लिया और स्पीकर में डाल दिया।
  ” क्या कर रही थी मेरी बच्ची?”
” मम्मी घर साफ कर रही थी यार, प्लीज़ अभी फ़ोन रखो बिज़ी हूँ।”
” हैं ? तू घर साफ कर रही थी? झूठ मत बोल!”
” सच्ची कह रही हूँ मम्मी।”
” सुन सुन फ़ोन न रखियो ,मैं वीडियो कॉल ट्रांसफर कर रही हूँ। एक बार न तुझे घर साफ करते देखने की बड़ी तमन्ना है।”
” हद करते हो यार मम्मी आप? दुनिया की कौन सी माँ होगी जो अपनी बच्ची को काम करते देख खुश होती है?”
” बेटा जी। ये हम माओं से पूछो, हर माँ के कलेजे में ठंडक पड़ जाती है जब उसकी बेटी अपने हाथ से पानी लेकर पीती है। सच्ची स्वर्ग का सुख मिल जाता है।”
” ओह्ह मेरी फेकता भरपूर माँ! अपने डायलॉग अपने पास संभाले रखो और मुझे काम करने दो।”
” पर ये तो बता आज सूरज पश्चिम से निकला क्या जो तू साफ सफाई में लगी है।अच्छा अब समझी पक्का समर आने वाला होगा मिलने।”
   पिया अपनी जीभ काट कर रह गयी। ये मम्मी हर बात समझ कैसे जाती है।
” अच्छा सुन तू अपना काम निपटा ले , और सिर्फ हॉल की सफाई करके छोड़ न दियो, अपना कमरा रसोई और बाथ रूम भी साफ कर लेना।”
अब यार ये मम्मी ने अलग ही पेंच डाल दिया। अब बाथरूम साफ करने की क्या ज़रूरत?
   इतनी सारी सफाई के बाद उसे खुद भी तैयार होना था और वापस अस्पताल भागना था, जिससे समर के साथ फ्लैट पर वापस आये तो समर भी उसका चमकीला घर देख कर खुश हो जाये, लेकिन अभी तो हॉल भी साफ नही हो पाया था। वो धड़ाधड़ हाथ चला रही थी कि दरवाज़े पर बेल बज गयी और उसका दिल धक से रह गया।
    ” नहीईईई ….  उसे सरप्राइज देने के लिए कहीं मंत्री जी अस्पताल में पता करके उसे ढूंढते यहाँ तो नही चले आये।
   हे भगवान! ऐसे फ़िज़ूल स्यापे उसी की किस्मत में क्यों लिखें हैं।।।
    अब इतना तबाहो बर्बाद घर देख कर समर के दिल का रोमांस हवा न हो जाये।
  वो सोच ही रही थी कि वापस कॉल बेल बज गयी….

क्रमशः

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aparna

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दिल से ……

       कैसे है आप सब दोस्तों!!
  
   कल हमारे  समाज की अंताक्षरी प्रतियोगिता में भाग लेने का मौका मिला। और क्या कहूँ इतना मज़ा आया।
    गानों के साथ वैसे भी मेरा कनेक्शन बड़ा पक्का है। बॉलीवुड तो लगता है मेरे खून में घुला है।
    हमारी पांच लोगों की टीम थी, खूब धमाल हुआ खूब मस्ती की। कुल जमा 17 टीम्स थी। एक से एक धुरंधर पुराने गानों के सुर सम्राट टाइप।
  लेकिन  हम दूसरी पोजीशन के साथ जीत गए। इक्कीस सौ रुपये हमने जीते। और सासु माँ ने सभी के सामने बड़े लाड़ से प्यार भरा आशीर्वाद दिया। मौसी सास और मामी सासों ने आकर गले से ही लगा लिया।
    ज़माना बदल गया है भाई, अब बहु को रोटी बनानी न भी आये तो सासु जी बड़े प्यार से सम्भाल लेती हैं। अरे बेचारी को किताबों से फुर्सत मिलती तब तो रोटी बेलना सीखती।
   न ऐसा नही है कि कुछ नही आता।
   लेकिन जिन चीजों पर मास्टरी है वो किसी काम की नही हैं।

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    मेरे साथ अक्सर होता है कि जब तक मैं रसोई पर खड़ी उबलते दूध पर नज़र रखी होतीं हूँ, सीधे सादे बच्चे सा चुपचाप पड़ा रहता है। और जैसे ही फोन की बीप सुन बाहर निकलती हूँ, कमबख्त सुनामी से टक्कर लेता उफान मार मार के गिर पड़ता है।
    क्या आपके साथ भी होता है?

  चलिये जल्दी ही मिलतें है कहानी के अगले भाग के साथ तब तक पढ़ते रहिये ….
 
   मैंने किसी ज़माने में एक फ़िज़ूल सी हॉरर भी लिखी थी ” थैंक यू” अगर आप लोग चाहे तो वो भी पलट सकतें हैं। ( उनके लिए जो मुझसे हॉरर लिखने की गुज़ारिश करतें हैं)

   आपके ढेर सारे प्यार, समीक्षा स्टिकर्स के लिए दिल से आभार , शुक्रिया नवाज़िश

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aparna ….


    

जीवनसाथी -123

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  जीवनसाथी -123

     अस्पताल से लौटने के बाद भी आदित्य को जाने क्यों इस बात पर यकीन नही हो रहा था कि वो बॉडी केसर की थी।
    वो बिना किसी से कहे चुपचाप अपने कमरे में चला गया। ये पूरा दिन महल के लिए कठिनता भरा रहा था। केसर का इस तरह महल से गायब होने के बाद उसकी लाश मिलने के साथ ही “मायानगरी” मेडिकल छात्रा की आत्महत्या ने भी महल को एकबारगी हिला कर रख दिया था।
   अपने कमरे में नाराज़ युवराज  विराज को बुला कर यूनिवर्सिटी के बारे में पूछताछ करना चाहता था। उनका और राजा का देखा सपना  ये तो नही था फिर कैसे उनकी बनाई यूनिवर्सिटी में ये सब हो रहा था। युवराज यही सोच रहा था कि यूनिवर्सिटी का पूरा दारोमदार विराज के कंधों पर सौंप कर उन्होंने और राजा ने सही किया या नही। उन्होंने सभी से कह कर अभी उस लड़की की आत्महत्या वाली बात राजा तक पहुंचने नही दी थी। 
 
        वैसे भी राजा की परेशानी के और भी कई कारण थे।

   युवराज ने किसी काम से समर को बुलाया और उसके बुलावे पर समर तुरंत चला आया।
   यूनिवर्सिटी सुसाइड केस पर कुछ देर बातचीत करने के बाद वो राजा के कमरे की तरफ चला गया।

    अगले दिन की रूपरेखा उसे बताने के बाद राजा से आराम करने कहा और खुद किसी बेहद ज़रूरी काम से निकलने लगा कि राजा ने उसे रोक लिया …-” सच सच बताओ समर ! तुम कहाँ व्यस्त हो? कल चुनाव के नतीजे भी आ रहें हैं। मैं जानता हूँ तुम्हारे दिमाग में कुछ न कुछ तो चल रहा है।”
  समर ने मुस्कुरा कर ना में सिर हिलाया..-” नही हुकुम अभी इस वक्त कुछ नही चल रहा है। बस कल सुबह हमें शहर ज़रा जल्दी निकलना होगा,वही सोच कर आपको आराम करने कह रहा था।”  

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   राजा ने समर को देखा वो उसे एक बार झुक कर प्रणाम कर बाहर निकल गया। राजा भी समझता था कि उसे जिताने को समर ने रात दिन एक कर रखा था।

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अगली सुबह राजा समर के साथ निकल गया । युवराज आदित्य और प्रेम भी उनके साथ थे लेकिन विराज उन लोगों के साथ नहीं गया।
      परिणाम पहले ही सभी लोगों को पता था राजा और उसके साथ के लोग भारी मतों के साथ विजयी हुए थे।  पक्ष और विपक्ष दोनों ही राजा को अपनी और मिलाने के लिए आतुर थे और जिसके लिए उन लोगों की बात समर से चल भी रही थी।
    विराज ने वही किया जिसका समर को डर था।  विराज अपने दो लोगों के साथ राजा को छोड़ एक दूसरी पार्टी में जाकर मिल गया और अपना विश्वास मत उस पार्टी को सौंप दिया।
     राजा वैसे तो किसी भी पार्टी के साथ हाथ नहीं मिलाना चाहता था लेकिन उनमें से एक पार्टी ऐसी थी जिसे कुछ हद तक राजा सपोर्ट कर रहा था। यह बात अच्छे से जानते हुए भी विराज ने दूसरी पार्टी के पक्ष में जाकर अपना विश्वास मत प्रस्तुत कर दिया था।
     समर के द्वारा रखी शर्त कि राजा को मुख्यमंत्री बनाया जाए तभी राजा अपने लोगों के साथ उस पार्टी को अपना बहुमत देगा इस बात पर राजा ने सहमति नहीं जताई।
   समर में राजा को समझाने की कोशिश भी की। युवराज प्रेम सभी लोग समर की तरफ से राजा को समझाने खड़े हो गए….

” तुम समझ नहीं रहे हो कुमार तुम्हारा एक ऊंचे पद पर होना बहुत जरूरी है। अगर तुम मुख्यमंत्री बनते हो तो यह पूरा राज्य तुम्हारा होगा और तब तुम इस पूरे राज्य के लिए कार्य कर सकते हो। “

” मैं आपकी बात समझता हूं भाई साहब। लेकिन इस बार अगर मेरे लोग सिर्फ इतनी ही सीटों पर विजेता रहे हैं तो मुझे सिर्फ विधायक बन कर भी खुशी है। और मैं विधायक बनके भी अपने सारे कार्यों को अंजाम दे सकूंगा आप चिंता ना करें। “

” हमें चिंता तुम्हारे मिलने वाले पद की नहीं तुम्हारी कार्यक्षमता की है। अभी सिर्फ तुम एक शहर के लिए कार्य कर सकते हो लेकिन अगर तुम मुख्यमंत्री बनते हो तो तुम्हें पूरे राज्य के लिए कार्य करने का अवसर मिलेगा। तो तुम पांच सालों के लिए इस अवसर को क्यों गंवाना चाहते हो? यह हमारी समझ से परे है।”

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” भाई साहब मैं अपनी पार्टी छोड़कर और किसी की पार्टी में नहीं मिलना चाहता हूं। मुझे मुख्यमंत्री का पद तभी मिलेगा जब मैं अपने साथियों को लेकर उस पार्टी के साथ हाथ मिला लूँ। संभावना यह भी है कि वह लोग अभी हमें यह लालच दे कि वह मुझे मुख्यमंत्री का पद देंगे लेकिन अंदर ही अंदर वह लोग क्या तय करते हैं, यह हम अभी नहीं समझ सकते। राजनीति बहुत कठिन कार्य है यहां लोग हमारे सामने कुछ नजर आते हैं लेकिन हो कुछ और जाते हैं। इसलिए मैं मुझे जो पद मिल रहा है उसी में खुश हूं ,संतुष्ट हूं । हां पांच सालों में अपनी पार्टी पर इतना कार्य अवश्य करूंगा कि मेरी पार्टी इतनी बड़ी हो जाए कि मैं अपनी जीत के बलबूते किसी और के विधायक चुराए बिना मुख्यमंत्री पद पर काम कर सकूं। “

” जैसी तुम्हारी मर्जी कुमार! वैसे हमें हमारे छोटे भाई पर बेहद गर्व है और हमें पूरा विश्वास है कि इन पांच सालों में तुम अपनी मेहनत से वह पद पा ही लोगे जिसके तुम हकदार हो। “

     भवन का कार्यक्रम शुरु हो चुका था स्पीकर के आते ही सभी अपनी अपनी जगह पर खड़े गए।
  राज दल पार्टी और जन जागरण पार्टी में कड़ी टक्कर थी। दोनों में से किसी भी पार्टी ने इतनी बड़ी जीत हासिल नहीं की थी कि उनमें से चुनकर मुख्यमंत्री का पद दिया जा सके। सारा दारोमदार राजा की पार्टी पर था।
    माननीय स्पीकर महोदय ने भी राजा की पार्टी से सवाल किया कि वह अपने जीते हुए लोगों को लेकर किस पार्टी का सहयोग करना चाहते हैं? और किस पार्टी को सहमति देते हैं?
   अब तक राजा युवराज प्रेम विराज आदि बाकी लोगों को यही लग रहा था कि समर की बात राज दल पार्टी से चल रही है।
    और सिर्फ राजा की खिलाफत करने के लिए ही विराज ने जन जागरण पार्टी के साथ हाथ मिला लिया था। राजा के कुल जीते हुए लोगों में से विराज दो लोगों को लेकर जन जागरण दल से हाथ मिला चुका था।
  स्पिकर महोदय के कहने पर कि किसी एक पार्टी से ही नेता चुना जाएगा आप सभी आपस में मिलकर यह निर्णय ले लीजिए।
   दोनों पार्टी के लोगों के आरोप प्रत्यारोप शुरू हो गए। लेकिन इसी सबके बीच कुछ ऐसा हुआ कि वहां उपस्थित सभी लोगों की आंखें फटी की फटी रह गई।
  जन जागरण पार्टी के जीते हुए लोग एक-एक करके राजा की पार्टी की तरफ आने लग गए। यह देखकर राज दल पार्टी वाले भी चौक कर रह गए।
  यहां तक कि जन जागरण दल के मुखिया राजेश्वर सिंह भी इस बात से अनजान थे, कि उनके ही दल के लोग राजा की टीम से जाकर हाथ  मिला रहे हैं।
    कुछ दस मिनट ही बीते होंगे कि अब उस सभागार का सीन बदल चुका था। जहां पहले दो मुख्य दल जन जागरण पार्टी और राज दल प्रमुखता से एक दूसरे के सामने खड़े थे। और राजा की पार्टी एक छोटी सहयोगी पार्टी के रूप में नजर आ रही थी। वही जन जागरण दल के लगभग 80% लोगों के राजा की पार्टी में आकर मिल जाने से राजा की पार्टी अपने आप वहां सबसे बड़ी और प्रमुख पार्टी के रूप में नजर आने लग गई थी।
    इस बारे में राजा अजातशत्रु को स्वयं कोई खबर नहीं थी उन्होंने आश्चर्य से समर की तरफ देखा समर होंठो ही होठों में धीमे से मुस्कुराता स्पीकर महोदय की तरफ मुंह करके खड़ा हो गया। उसने उनसे कुछ कहने की आंखों ही आंखों में इजाजत मांगी।
  स्पीकर महोदय की सहमति मिलते ही समर ने अपनी बात रखनी शुरू की…-” जैसा कि आप सभी जानते हैं बहुमत मिलने वाली पार्टी ही विजेता पार्टी होती है। और फिर उस पार्टी में से चुना गया नेता मुख्यमंत्री का पद संभालता है । वैसा ही कुछ अभी इस सभा भवन में देखने को मिल रहा है। अब तक दो विजेता पार्टियों में से एक पार्टी जन जागरण दल के 80% लोग राजा अजातशत्रु सा  की पार्टी का समर्थन करने चले आए हैं। और अब इस प्रकार यहां मौजूद सभी राजनीतिक पार्टियों में राजा अजातशत्रु सिंह की पार्टी सबसे अधिक बहुमत के साथ बनी विजेता पार्टी के रूप में उभर कर आ रही है। तो अब ऐसे में स्पीकर महोदय से प्रार्थना है कि कि वह एक बार फिर अपने शब्दों में विजेता पार्टी का नाम संबोधित करें। “

   सुबह से चल रहा वहां का सारा फसाद एकाएक शांत हो गया सबके देखते ही देखते सारा सब बदल गया।
     राजा अजातशत्रु की वह छोटी सी पार्टी जिस में से कुल 11- 12 लोग ही चुनाव में खड़े हुए थे। हालांकि ये और बात थी कि निर्विवाद रूप से यह सभी खड़े हुए प्रत्याशी भारी बहुमत से विजेता हुए थे । लेकिन यह पार्टी इतनी छोटी थी कि किसी अन्य पार्टी को सपोर्ट करके ही अपना पद विधानसभा में पा सकती थी।
     पहली बार शायद इतिहास में ऐसी कोई घटना घटी थी कि एक सहयोग कर सकने वाली छोटी पार्टी में अचानक से बड़ी पार्टी के इतने सारे विजई प्रत्याशी शामिल होकर उस छोटी पार्टी को एक बड़ी पार्टी में रूपांतरित कर गए थे।
     जन जागरण दल के मुखिया के पास अब कोई चारा नहीं बचा था। गिने-चुने प्रत्याशियों के साथ वह सरकार बनाने में असमर्थ थे। और अगर वह अपने इन गिने  चुने प्रत्याशियों को लेकर राजा के खिलाफ जाकर राज दल पार्टी से हाथ भी मिला लेते, तब भी यह जाहिर था की राजा की पार्टी ही सरकार बनाती और ऐसी स्थिति में अपने दुश्मन टीम के साथ हाथ मिलाकर विपक्ष में बैठने का कोई खास लाभ नहीं था।
   जन जागरण दल के नेता राजेश्वर सिंह जी के चेहरे का रंग उड़ चुका था । लेकिन वह जानते थे कि अब उनके पास राजा को पूरी तरह से समर्थन देने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था। क्योंकि राजा से हाथ मिलाने का मतलब था सरकार बनाना और अगर सरकार बनती है तो भले ही मुख्यमंत्री का पद ना मिले लेकिन कैबिनेट में कोई एक सशक्त पद के दावेदार तो वह बन ही सकते थे। इतनी तो उम्मीद वो राजा अजातशत्रु से कर ही सकते थे। हालांकि उनके मंत्री यानी समर पर उन्हें अब रत्ती भर भी भरोसा नहीं रह गया था।
    उन्हें कितने दिनों में कभी भी समर पर जरा सा भी अविश्वास नहीं हुआ था। वह लड़का जो बार-बार उन्हें यह आश्वासन दे रहा था कि राजा अजातशत्रु अपनी टीम के साथ उन्हें ही सहयोग और समर्थन देंगे बस बदले में उन्हें राजा अजातशत्रु को मुख्यमंत्री का पद देना होगा।
    वह आज तक समर को कम उम्र का अनुभवहीन लड़का समझ कर उसके ऊपर रौब ऐंठते आ रहे थे। उसका फोन रखने के बाद अक्सर वह अपने चमचों के सामने समर का मजाक उड़ाया करते थे, कि बताओ सिर्फ दस  लोगों की जीती हुई टीम को लेकर यह लड़का अपने राजा साहब को मुख्यमंत्री बनाने के सपने देख रहा है।
    उसका इस तरह मजाक उड़ाते समय उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि यह लड़का अचानक इस सभा भवन में इस ढंग से उनका मजाक बना जाएगा। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनकी नाक के नीचे से उनके इतने सारे विधायकों को यह लड़का इस तरह ले उड़ेगा।
    सभी तरफ से निरुपाय हो उन्होंने अपने बाकी बचे प्रत्याशियों के साथ जाकर राजा अजातशत्रु से हाथ मिला लिया।


   
       भारी जोश खरोश से और भारी बहुमत से राजा अजातशत्रु की पार्टी विजेता घोषित कर दी गई। यह ऐलान होते ही कि राजा अजातशत्रु की टीम सरकार बनाएगी बाहर खड़े उनके समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। टीवी पर अलग-अलग चैनलों में दो दिन से चलती वाद विवाद की लहर एकाएक उस समय थम कर रह गई जब एक छोटी और नई बनी राजा अजातशत्रु की पार्टी को सरकार बनाने के लिए मौका दिया गया।
     जहां एक तरफ लोग राजा अजातशत्रु की भलमनसाहत के किस्से गा रहे थे, तो वही कुछ उनके विरोध में भी बोल रहे थे कि उन्होंने अपने राजा होने का लाभ उठाते हुए खूब रुपए पैसे देकर जन जागरण दल के लोगों को अपनी तरफ मिला लिया। लोगों के बोलने से ना समर का कुछ बिगड़ना था और ना राजा अजातशत्रु का।

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     वैसे तो विजेता दल का चुनाव होने के बाद सरकार बनाने को लेकर विजेता दल को समय दिया जाता है। लेकिन यहां पर राजा अजातशत्रु के दल में इतना उत्साह था कि निर्विवाद रूप से वहां उसी समय राजा अजातशत्रु को भावी मुख्यमंत्री के पद के लिए चुन लिया गया।
      अब यह पार्टी उनकी थी आलाकमान भी वह स्वयं थे और मुख्यमंत्री के दावेदार भी।
    स्पीकर महोदय के द्वारा राजा अजातशत्रु को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करते ही पूरे सभा भवन में करतल ध्वनि गूंज उठी। राजा अजातशत्रु का प्रभाव ही ऐसा था कि विपक्षी टीम के भी सारे सदस्यों ने टेबल बजाकर राजा अजातशत्रु के मुख्यमंत्री पद को स्वीकारने के लिए सहमति जताई।
    स्पीकर महोदय द्वारा राजा अजातशत्रु को एक हफ्ते का समय दिया गया। जिसमें राजा अजातशत्रु अपनी कैबिनेट के मंत्रियों का चुनाव कर सकें। लगभग हफ्ते भर बाद की तारीख शपथ ग्रहण के लिए सुनिश्चित करने के बाद सभा स्थगित कर दी गई।

    इस सारे हो हल्ले में पूरा दिन निकल गया। सभा विसर्जित होने के बावजूद राजा अजातशत्रु से व्यक्तिगत रूप से मिलकर सभी उन्हें बधाइयां देने में लगे रहे बधाइयों का भार ग्रहण करते-करते राजा अजातशत्रु थक कर चूर होने लगे थे।
   शाम ढल चुकी थी। और उन सभी को अभी महल पहुंचने में घंटे भर का और समय लगना था। विराज एक बार फिर मुंह की खा चुका था उसने जो सोचा उसका बिल्कुल उलट हुआ था।
   उसने सोचा था वो राजा अजातशत्रु के विपरीत जाकर उस पार्टी से हाथ मिलाएगा जिससे राजा अजातशत्रु का बैर है लेकिन उसे नहीं मालूम था कि यह बैर सिर्फ उसे दिखाने के लिए ही समर ने रचा था असल में अंदरूनी तौर पर समर पहले ही जन जागरण दल के प्रत्याशियों को अपनी तरफ मिलाने का काम शुरू कर चुका था।
    समर जानता था राजनीति ऐसी दलदल है जहां पर कमल खिलाने के लिए उस दलदल में स्वयं गहरे तक उतरना पड़ता है। और उसी गहराई में उतरने के लिए उसे उस दलदल का एक हिस्सा बनना पड़ा था। विराज को धोखा देने के लिए उसने विराज की ही तरह झूठी चाल चली थी।
    वह शुरू से विराज के सामने इसी तरह दिखाता रहा जैसे वह राज दल पार्टी की तरफ है। क्योंकि समर का यह मानना था कि अगर लोगों के सामने यह बात जाती है कि महल के राजा अजातशत्रु और उनका भाई विराज एक दूसरे के खिलाफ हैं, तो उससे राजा अजातशत्रु की राजनीतिक छवि पर असर पड़ सकता है । और उस छवि को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक था कि लोगों के सामने यह नजर आए कि विराज राजा अजातशत्रु के समर्थन में खड़ा है। इसीलिए जैसे ही विराज अपने लोगों को लेकर जन जागरण दल की तरफ गया। वहां के सारे लोग विराज और उसके लोगों को लेकर राजा अजातशत्रु की तरफ चले आए । विराज को यही लगता रहा कि वह जन जागरण दल की तरफ है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से वह राजा के ही दल का सदस्य हो गया था।
     और अब जब राजा अजातशत्रु का दल सरकार बनाने जा रहा था तब ऐसे में राजा को छोड़कर विपक्ष से हाथ मिलाने की हिम्मत विराज में नहीं थी।
    खून के घूंट पीकर आखिर विराज भी राजा को बधाई देने चला आया…-“बधाई हो अजातशत्रु! आखिर जीत ही गए तुम!”
” मेरी यह जीत मेरी अकेले की नहीं है विराज इसमें तुम और तुम्हारे साथियों का भी अभूतपूर्व योगदान है जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता।”
  राजा ने आगे बढ़कर विराज को गले से लगा लिया।
युवराज ने भी विराज के कंधे थपथपाये…-” तुम दोनों भाइयों को मिलकर सरकार चलाना है। कैबिनेट में कौन सा स्थान तुम्हारे लिए सही रहेगा पहले ही तय करके कुमार को बता देना कहीं ऐसा ना हो बाद में इसी बात पर तुम दोनों में कोई कलह क्लेश हो जाए। अब हम नहीं चाहते कि हमारे भाइयों के बीच किसी भी तरह की कोई गलतफहमी हो।”

” जी भाई साहब जैसी आपकी आज्ञा।” ऐसा कहकर विराज ने युवराज के पैर छू लिये।

    सारे के सारे लोग एक साथ महल की तरफ निकल पड़े।
    लगभग 10 गाड़ियों में अपने अपने बॉडीगार्ड के साथ वो लोग महल की ओर आगे बढ़ रहे थे कि प्रेम के पास  निरमा का फोन आने लगा…-“कहाँ है आप ? अभी घर पहुंचने में और कितना वक़्त लगेगा?”
” अभी तो निकलें ही हैं। अभी तो वक्त लगेगा। हुकुम की मुख्यमंत्री की सीट पक्की हो चुकी है। बाहर पार्टी कार्यकर्ताओं से भी मिलते हुए आना होगा ना। “.
” ये तो बहुत खुशी की बात है कि राजा भैया जीत गए। खैर उन्हें ही जीतना भी था। “
” तुम बताओ,फ़ोन कैसे किया? कोई ज़रूरी खबर ?”
” हम्म ! है तो ज़रूरी बात,लेकिन वापस आ जाओ फिर बताती हूँ।”
” क्या हुआ है ? कुछ परेशान लग रही हो।  “
” वही मायानगरी के केस के बारे में बताना था। जिस लड़की ने सुसाइड किया था, उसके बारे में मालूम चल चुका है। आप आ जाओ फिर बात करतें हैं। मैं सोच रही कि अभी ये बात राजा भैया तक न पहुंचे तो अच्छा है।”
” हम्म ! ठीक है।” प्रेम ने फ़ोन रख तो दिया लेकिन उसके दिमाग में वही केस चक्कर काटने लगा। अभी तक इस बात को यूनिवर्सिटी से बाहर नही जाने दिया गया था।”

  महल पहुँचने से पहले समर ने गाड़ियां पार्टी कार्यालय की तरफ मुड़वा ली थीं।  वहाँ राजा के समर्थक उसका इंतजार कर रहे थे। बाजे गाजों और ढेर सारी आतिशबाजी के साथ राजा का धूमधाम से स्वागत करने के बाद कार्यकर्ताओं ने पारी पारी से सभी का सम्मान किया और सभी अंदर चले गए…
   राजा  समर को देख मुस्कुरा उठा…-” आखिर कर के ही मानते हो अपने मन की। मैंने तो कहा था मैं इस साल विधायक बन कर भी खुश हूं। पर तुमने ठान रखी थी कि मुझे मुख्यमंत्री बना कर ही मानोगे।”
राजा की बात पर युवराज ने भी मुहर लगा दी…-“बिल्कुल सही! हमें भी जिस ढंग से समर ने बताया था हम यही सोच रहे थे कि तुम कभी मुख्यमंत्री बनने के लिए अपनी पार्टी जनजागरण पार्टी से मिलवाने के पक्ष में नही रहोगे। और तब हमने भी यही कहा था  समर से कि अपनी पार्टी का विलय करके जीत हासिल करने वालों में तुम नही हो!”
” बस आपकी इसी बात के बाद मैंने ये दूसरा तरीका अपनाया हुकुम!”
” तुम तो हो ही पैन्तरेबाज़। कोई वहाँ सोच भी नही सका होगा कि एकदम अंत में जाकर ऐसा कुछ हो जाएगा। पर जो भी हो समर तुमने जो किया वो और कोई नही कर सकता था।”
   प्रेम की इस बात के बाद राजा एक एक कर के सभी कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत रूप से मिलने के बाद वहां से वापस महल के लिए निकल गया।

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       प्रेम को घर पहुंचने में रात हो गयी थी। मीठी को सुला कर निरमा बाहर हॉल में बैठी उसका रास्ता देख रही थी, इसके साथ ही वो कुछ कागज़ हाथों में थामें पढ़ भी रही थी।
   प्रेम की गाड़ी आ कर रुकते ही वो दरवाज़े पर भाग कर चली आयी..
   प्रेम ने अंदर आकर निरमा को देखा..-“अरे अब तक जाग रही हो। रात के ढाई बज गए हैं। तुम्हें सो जाना चाहिए था न। फिर सुबह सुबह तुम्हें काम पर भी जाना होता है। “
   निरमा मुस्कुरा कर रसोई से पानी ले आयी। प्रेम के हाथ में गिलास थमा कर वो कहने लगी…-“आप अच्छे से जानतें हैं जब तक आप आ नही जाते मुझे नींद नही आती है। और फिर आज थोड़ा कुछ काम भी था। इसलिए काम निपटा रही थी। “
” अच्छा हाँ! तुमने फ़ोन भी तो किया था? क्या थी वो ज़रूरी बात?”
“अभी आप थक कर आएं हैं मैं सुबह बताती हूँ। आप जाइये फ्रेश हो लीजिये ,मैं खाना गरम कर लूं। “
” नही खाना नही खाऊंगा।” कहता प्रेम नहाने चला गया। उसके बाथरूम से बाहर आने पर भी निरमा किसी काम में लगी थी। उसे इतना व्यस्त देख वो भी परेशान हो उठा…-“क्या बात है निरमा? तुम अब भी सोने नही आ रही।”
उसके हाथ मे दूध का गिलास थमा कर उसने अपने कागज़ समेट लिए।।
” बताओ न क्या बात है? “
” मुझे लगता है , मेडिकल में कुछ गड़बड़ चल रही है। यूनिवर्सिटी इतनी बड़ी है कि हर वक्त सभी तरफ ध्यान देना मुश्किल होता है।  दूसरी बात अभी यूनिवर्सिटी अपने स्थापना के दौर में ही तो है, इस समय हम सबका काम वैसे भी बढ़ा हुआ है। “
” क्या हुआ , काम का तनाव ज्यादा लग रहा है क्या? “
” नही! ऐसी बात नही है। असल में मेरे नीचे और ऊपर भी कई लोग काम करते हैं तो बस वही समझ से बाहर हो रहा है कि कहां पर गड़बड़ हो रही है।
   पहले ही इतने सारे मामले होते हैं उस पर ये आत्महत्या का मामला आ गया। उस लड़की और उसके घर वालों के लिए बहुत दुख हो रहा है। मैंने उसके घरवालों को कल बुलवाया है। उनसे मिल कर उसके बारे में और भी बातें पता चलेगी की आखिर माज़रा क्या था? क्यों उसे आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा। “
” कहीं कोई रैगिंग का चक्कर तो नही है ना? और वैसे भी ये राजा अजातशत्रु की बनाई यूनिवर्सिटी है । यहाँ तो रैगिंग होनी ही नही चाहिए। “
” आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि एक आदर्श यूनिवर्सिटी में सिर्फ सीधे सच्चे लोग पढ़ें। कोई रैगिंग न हो ,सब शराफत से साथ चलें तभी वो एक आदर्श विश्वविद्यालय होगा। ऐसा नही है प्रेम बाबू। रैगिंग भी कॉलेज की पढ़ाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए मैं रैगिंग के पूरी तरह खिलाफ भी नही हूँ। बस किसी तरह का शारीरिक उत्पीड़न न हो।
  आपको मालूम है ये बच्चे जब स्कूल की पढ़ाई पूरी कर के हमारे पास पढ़ने आते हैं तब इन्हें किसी तरह का सामाजिक व्यवहारिक ज्ञान नही होता। इनके साथ होने वाली छोटी मोटी रैगिंग इन्हें उस व्यवहारिक ज्ञान को सिखाने का माध्यम है।
   बच्चे मानसिक रूप से भी स्ट्रांग होतें है और प्रैक्टिकल नॉलेज में भी।
  पर ये लड़की वाला मुझे रैगिंग का मामला नही लग रहा। अब कल सुबह ही मालूम चलेगा कि सारा मुद्दा क्या है आखिर। आप भी स्पोर्ट्स फैकल्टी इंचार्ज हैं तो कल आपको भी मीटिंग में आना होगा।”
” जो हुकुम आपका। वैसे कितने बजे तक पहुंचना होगा। “
” लंच के बाद ही मीटिंग रखी जायेगी। मैं आपको समय मेसेज कर दूँगी। हमारी कोशिश तो यही है कि ये बात राजा भैया तक  न जाये।”
” इतनी बड़ी बात हुई है। ये उनसे छिपाई नही जा सकती। उन्हें बता देना ही सही रहेगा। “
” हम्म !”
   खिड़की पर खड़ी निरमा अपनी सोच में गुम हो गयी। रह रह कर उसकी आंखों में उस बच्ची का चेहरा और बेजान शरीर तैरता जा रहा था….
   और वो और अधिक उदासी में डूबती जा रही थी।

क्रमशः

दिल से…

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       ढेर सारी मतलब, वाकई ढेर सारी बातें हैं दिल से कहने के लिए बस समझ में नहीं आ रहा कहां से शुरू करूं ।
    
        सबसे पहले तो असत्य पर सत्य की विजय का अनूठा पर्व विजयादशमी  हम सब मना चुके हैं और आप सभी को इस पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।
  
      श्री राम तो मन प्राण में बसे हुए हैं और उनका नाम ही पर्याप्त है अपने पाप काटने के लिए।

    अब बात करते हैं कहानी की। जैसा कि मैंने पहले कहा था जीवनसाथी समाप्त होने के बाद भी माया नगरी के साथ चलती रहेगी लेकिन इसी बीच मायानगरी शुरू कर दी। अब मायानगरी में मैंने 5 साल का लेग दिखाया था।
   लेकिन ये लैग, जेटलैग में बदल गया ।
  खैर !!
   
   तो हुआ ये की जीवनसाथी में भी मुझे ये पांच साल का गैप दिखाना था। लेकिन कहानी मर्ज करने के चक्कर में बिना टाइम गैप के कहानी मिल गयी।
   आप लोगों को भी नज़र आ रहा है कि मैं कितनी फुर्ती से जीवनसाथी समेटने में लगी हूँ बस इसलिए गलती से मिस्टेक वाली सिचुएशन तैयार हो गयी।

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  तो साथियों अब यहाँ से दोनो कहानियों को बिना टाइम ट्रेवल किये ही हम साथ में लेते चलेंगे। दिमाग में कोई डाउट आये तो आप बेशक पूछ लीजियेगा अगर मुझे जवाब समझ आ गया तो मैं ज़रूर आपकी शंका का समाधान करूँगी।
   
  आपमें से बहुत से लोग प्रेम और निरमा की कहानी भी अलग से पढना चाहते थे। तो मैं वो भी लिखने की सोच रहीं हूँ। हालांकि अब जब तक पुरानी कहानियां नही खत्म होंगी। कोई नई कहानी नही शुरू करूँगी।
  जैसे शादी.कॉम शुरू की थी जीवनसाथी के रूप में कुछ अलग फ्लेवर और अलग कलेवर में । बस ऐसे ही प्रेम निरमा की नई कहानी भी काफी अलग सी होगी। प्लॉट वही होगा लेकिन इस बार फ्लेवर और कलेवर फिर से अलग होंगे। तो अगर पढना चाहतें है तो समीक्षा में हाँ ज़रूर लिखियेगा । अगर सौ लोगों ने भी हामी भर दी तभी इस कहानी पर काम शुरू करूँगी वरना कुछ दूसरा भी चल रहा है दिमाग में।
   
    लेखकों के साथ बड़ी मुसीबत होती है। सामने कोई बैठा आपसे अपना दुख दर्द बांट रहा होता है और आप उसमें छिपा अपना किरदार तलाश रहे होते हैं।
    वो तो अच्छी बात है कि मेरे बहुत कम रिश्तेदार मुझे पढ़ते हैं वरना मेरी जो खबर ली जाती कि क्या कहूँ।
    हालांकि अब कुछ बेहद करीबी रिश्तों में भनक लगने लगी है।
   अभी कुछ दिन पहले ही मेरी एक जेठानी सा का फ़ोन आया। कुछ इधर उधर की बातों के बाद उन्होंने मुझे पूछा कि ” देवरानी जी! तुम डॉक्टरी के अलावा भी कुछ करती हो क्या?” मैंने कहा – नही तो। तब उन्होंने वापस पूछा -“हमारा मतलब है कुछ कहानियां भी लिखती हो क्या? “
मन ही मन सोचा – “गए बेटा । पकड़ी गई। मैंने कहा हाँ जीजी लिखती हूँ। बस ऐसे ही थोड़ा बहुत।”
उन्होंने कहा-“हम सारी बहने प्रतिलीपी पर हैं। मेरी दीदी शायद तुम्हें ही पढ़ती हैं। तुमने जीवनसाथी के नाम से कुछ लिखा है क्या? “
मैंने कहा -“हाँ दी ! लिखा है बल्कि अब भी लिख रहीं हूँ।”
उन्होंने तुरंत कहा-“यार ये तो बता दो की बाँसुरी कैसे इतनी केयरलेस हो गयी। उसने अपना फोन कहाँ गंवा दिया। तो मतलब बाँसुरी और राजा वाली अपर्णा तुम ही हो। “
मैंने कहा – ” हाँ दी ! मैं ही हूँ।” और दिल में आ रहा था, हे भगवान मैंने कुछ ऐसा वैसा न लिख दिया हो कि अपनी प्यारी जेठानी से नज़रे न मिला पाऊं।
  लेकिन उसके बाद उन्होंने फ़ोन पर इतना सारा प्यार बरसाया की क्या कहूँ।
” अब तो भई जल्दी ही तुमसे मिलने आएंगे। अपनी देवरानी से नही राजा और बांसुरी वाली अपर्णा से।”
   मैंने भी सहर्ष स्वीकृति दे दी। बातें तो फिर ढ़ेर सारी हुई, लेकिन सब बताने बैठी तो आप बोर हो जाएंगे जैसे अभी हो रहे।
   वैसे इतना तो बनता है।

      अभी पुरानी कहानियों को खत्म करने के बाद ही कुछ नया लिखूंगी प्रतिलीपी पर।

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   बाकी किस्से शुरू हो जाएंगे दीवाली के बाद से।
दो नए रूपों में…. वापसी और … एक सरप्राइज!

आजकल कुछ ज्यादा ही पहेलियों में बात करने लगीं हूँ शायद। पर सच कहूं तो मुझे खुद कोई और पूछे तो पहेलियों के जवाब मालूम नही होते।
 
   मेरे दिमाग के घोड़े दौड़ते कम हैं, ज्यादातर एक ही जगह खड़े खड़े सोचते रहतें हैं, मेरी तरह ।
  और दौड़ना भूल जातें हैं।

  आज तो ढ़ेर गपशप हो गयी। अब जल्दी ही मिलतें हैं बाकी कहानियों के साथ।
  पढ़तें रहिये, खुश रहिये…

मुझे पढ़ने और सराहने के लिए हॄदयतल से आभार आप सभी का।
  आपकी मुहब्बत है कि लिख रही हूँ।।

aparna..

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दिल से…. चिट्ठी आप सबों के नाम!

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प्यारे दोस्तों।

सबसे पहले तो आप सभी का शुक्रिया अदा करती हूं कि मेरे एक बार बोलने पर आप सभी मेरे ब्लॉग पर चले आए। पर यहां मेरे ब्लॉग पर भी आप सब मुझे सपोर्ट कर रहे हैं। मैं जानती हूं आप सब के दिल में यह भी चल रहा होगा कि आखिर मैंने अपना ब्लॉग लिखना क्यों शुरू किया। देखा जाए तो यह जरूरी था बेहद जरूरी। सिर्फ मेरे लिए ही नहीं मेरे जैसे उन ढेर सारे लेखकों के लिए भी जो ढेर सारी मेहनत करके लिखते तो हैं लेकिन उनके लिखेगा प्रतिसाद उन्हें नहीं मिल पाता।

मैं यहां किसी भी प्लेटफार्म की बुराई नहीं करूंगी। सभी प्लेटफार्म अपनी अपनी जगह सही है चाहे वह ऑनलाइन लेखन के प्लेटफार्म हों या ऑडियो स्टोरी सुनाने के प्लेटफार्म। हर एक प्लेटफार्म अपने आपके लिए काम करता है। अपनी ग्रोथ के लिए अपनी खुद की टीम के लिए । अगर हम लेखक उन प्लेटफार्म से जुड़ते हैं तो कहीं ना कहीं हमारा भी अपना एक लालच होता है कि हमें पाठक मिले। हमारी कहानियों को श्रोता मिले। आज बहुत से लेखक ऐसे हैं जो 1 से अधिक प्लेटफार्म पर काम कर रहे हैं। और यह लेखक लगातार काम कर रहे हैं। किसी प्लेटफार्म पर कहानियां लिखते हैं तो किसी दूसरे ऑडियो प्लेटफॉर्म के लिए भी अपनी कहानियां देते हैं। आप सोचिए उन लेखकों के दिन में भी 24 घंटे ही हैं। और वह उस टाइम को मैनेज करके लगातार मेहनत करते हैं। सिर्फ इसलिए कि उनकी कहानियों से उनकी कोई कमाई हो सके। लेकिन सच कहूं तो कोई भी प्लेटफार्म लेखकों को उनके परिश्रम के मुताबिक पारिश्रमिक नहीं देता। शायद इसीलिए लोगों को लेखन में कैरियर बनाने के लिए बहुत सोचना पड़ता है। ना ही इस क्षेत्र में जल्दी पैसा मिलता है और ना ही नाम। बावजूद लेखक के अंदर की भूख उसे लिखने के लिए बाध्य करती हैं। और यह भूख पैसों की भूख से कहीं ज्यादा तीव्र होती है । यह भूख होती है कि उसके लिखे को कोई पढ़े सराहे। अगर किसी लेखक को ढेर सारे पाठक मिलते हैं तो भले ही कमाई ना हो लेकिन वह उसी में संतुष्ट हो जाता है यह मेरा व्यक्तिगत विचार है जरूरी नहीं कि हर लेखक मेरे विचारों से सहमत हो।

अब मैं बात करती हूं अपने ब्लॉग और प्रतिलिपि की।

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मैं सच कहूं तो प्रतिलिपि की शुक्रगुजार हूं क्योंकि प्रतिलिपि ने ही मुझे वह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म दिया जहां आप सब से मेरी मुलाकात हो पाई। आज से ढाई साल पहले मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं लेखक भी बन सकती हूं । तब तक मैं सिर्फ और सिर्फ एक पाठक थी। प्रतिलिपि पर मैंने कभी कोई कहानी पढ़ कर लिखना नहीं सिखा। जैसा कि बाकी लेखक कहते हैं कि वह अपने शुरुआती दिनों में प्रतिलिपि पर पढ़ा करते थे और यही पढ़ते हुए उन के मन में लेखक बनने का विचार जागा। मैं बचपन से ही पाठक थी और वह भी जबरदस्त पाठक । पढ़ने का इस कदर शौक था कि मैं रोज घर पर आने वाले दोनों न्यूज़पेपर पूरे चट कर जाने के बाद सारे एडवर्टाइजमेंट और यहां तक कि निधन वाले कॉलम भी पढ़ लिया करती थी। जब कभी बचपन में मैं अपनी अलमारी जमाया करती तो कहीं भी अगर न्यूज़ पेपर बिछाने की पारी आती तो मैं उस पेपर को खोलकर घंटों तक पढ़ती रह जाती। मेरे इसी पढ़ने के शौक में जाने कितनी बार मेरी चाय के बर्तन को दूध की गंज को जला दिया। कॉलेज के दिनों में भी मेरा यही हाल था। संडे हमारा एक टाइम फीस्ट होने के कारण शाम के समय हमारा टिफिन नहीं आया करता था और तब पारी पारी से हम सहेलियां सबके लिए मेगी बनाया करती थी। जिस दिन मेरी पारी होती थी आप सोच ही सकते हैं कि मैं कितना बंटाधार करती रही होंगी। मैंगी चढ़ा कर वहीं खड़े-खड़े मैं कोई ना कोई किताब खोल कर पढ़ने लग जाया करती थी और मैगी की जलने की खुशबू सूंघकर मेरी सहेलियां दौड़कर रसोई में भागती थी कि आज फिर मैंने उनके डिनर को जला दिया।

पढ़ने के इतने जल्लादी शौक के बाद भी मुझे लेखन हमेशा से रॉकेट साइंस लगा करता था। मैं जब भी अपने पसंदीदा लेखकों को पढ़ती थी तो यही सोचती थी कि लिखना बहुत मेहनत का काम है। कैसे कोई लेखक इस कदर हमारी भावनाओं को अपने पन्नों पर उतार लेता है। और कैसे हम उसके लिखे को पढ़कर बिल्कुल वही महसूस करने लगते हैं। उसके लिखे शब्दों के साथ हंसते हैं और उसी के लिखे शब्दों को पढ़कर रोते हैं। ऐसा कैसे संभव हो सकता है? मेरे लिए लेखक हमेशा से परम श्रद्धेय थे अब भी हैं और हमेशा रहेंगे!

आप में से कई लोग बहुत बार यह सवाल भी कर चुके हैं कि मैं प्रतिलिपि पर इन लेखकों को पढ़ती हूं तो मैं आपको बताना चाहती हूं कि मैं जिम साहित्यकारों को पढ़कर बड़ी हुई हूं और जिनकी रचनाएं आज भी समय निकालकर पढ़ती हूं उनमें से प्रेमचंद शरतचंद्र ममता कालिया आदि के अलावा शायद ही किसी की रचना प्रतिलिपि पर मौजूद हो।

प्रतिलिपि पर आज के नए लेखकों की भरमार है और सभी बेहद खूबसूरत लिखते हैं। लेकिन इनमें से किसी को भी पढ़ने का अब तक सौभाग्य नहीं मिल पाया और इसका कारण उन लेखकों की कमी नहीं बल्कि मेरे पास वक्त की कमी है। जब थोड़ा सा समय मिलता है आप सभी के लिए कुछ ना कुछ लिखने की कोशिश करती हूं और इसी कोशिश में किन्ही भी नए लेखकों को नहीं पढ़ पाती हूँ।

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प्रतिलिपि पर जब से मोनेटाइजेशन शुरू हुआ लेखकों के बीच भी एक होड़ सी लग गई अपने सब्सक्राइबर्स बढ़ाने की होड । पर देखा जाए तो इस बात पर हम लेखकों का कोई कसूर भी नहीं आज तक निशुल्क लिखी रहे थे लेकिन जब कहानी पर कमाई का जरिया मिला है तो कोई भी क्यों छोड़ना चाहेगा।

इसके बाद बात शुरु हुई पाठकों की नाराजगी की । सब्सक्रिप्शन से हटाने के लिए लोगों ने इनबॉक्स में भूकंप ला दिया। पहले पहल मैंने भी सोचा कि मैं अपनी कहानियों को सब्सक्रिप्शन से हटा लूंगी लेकिन फिर यह महसूस हुआ कि अगर मैं ऐसा करती हूं तो मेरे साथ के बाकी लेखक ऐसा नहीं करते तो जाहिर सी बात है कि उनके ऊपर और भी ज्यादा दबाव डाला जाएगा कि देखिए उन्होंने तो अपनी कहानी से सब्सक्रिप्शन हटा लिया फिर आप क्यों इतना लालच कर रही हैं। जाहिर है यह कंपैरिजन नहीं होना चाहिए लेकिन होगा। अगर मैं सब्सक्रिप्शन हटाती हूं तो इसमें मेरे साथी लेखकों की तो कोई गलती नहीं है अगर वह अपनी कहानी उसे अपनी मेहनत से कोई कमाई करना चाहते हैं तो इसमें वह कोई गुनाह नहीं कर रहे बल्कि मैं पूरी तरह से उन सभी के सपोर्ट में हूं कि ऐसा करना ही चाहिए।

और इसीलिए मैंने अपनी कहानियों से सब्सक्रिप्शन नहीं हटाया। बल्कि बीच का यह रास्ता चुना कि मैं ब्लॉग पर भी अपनी कहानियां उसी समय पोस्ट कर सकूं। जिससे जो लोग सब्सक्रिप्शन लेकर नहीं पढ़ना चाहते वह मेरे ब्लॉग पर आकर उसी दिन निशुल्क उस कहानी को पढ़ सकते हैं।

इतना शानदार ऑफर देने के बावजूद अब तक बहुत से लोग प्रतिलिपि पर ही मुझे पढ़ना चाहते हैं । मैं उन पाठकों की इस बात को भी पूरी तरह समझती हूं मैं विज्ञान की विद्यार्थी हूं और अच्छे से जानती हूं कि मोमेंट ऑफ इनर्शिया यही होता है। जी हां इसे जड़त्व का नियम भी कहा जाता है इसका अर्थ है जब हम चलते रहते हैं तो हम चलना ही चाहते हैं रुकने के लिए हमारा शरीर हमारा विरोध करता है इसीलिए जब हम चलती हुई बस से उतरते हैं तो हम एकदम से स्थिर नहीं हो सकते हमें थोड़ी देर तक अपने शरीर को बस के साथ ही दौड़ आना पड़ता है या गति में रखना पड़ता है।

बस यही मोमेंट आफ इनर्शिया प्रतिलिपि पर पढ़ने वाले पाठकों के साथ भी हैं । उन्हें लगता है प्रतिलिपि पर पढ़ना आसान है। इसके अलावा कहीं भी और जाकर वह पढ़ना नहीं चाहते। मैं भी किसी पर दबाव नहीं बनाना चाहती लेकिन इसी कारण अब मुझ पर दबाव बढ़ने लग गया है । दो प्लेटफार्म पर एक साथ एक ही कहानियों को चलाना बेहद मुश्किल और तनाव भरा है। कब किस जगह पर कौन सी कहानी पोस्ट की थी। किस प्लेटफार्म पर अभी कहानी का अगला कौन सा भाग डालना है यह सब बहुत जटिल हो गया है।

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और इसीलिए अब यह सोचा है कि कुछ कहानियां सिर्फ अपने ब्लॉग पर ही लिखूंगी।

ब्लॉग पर लिखने से मुझे क्या फायदा है अब मैं उसके बारे में आप सभी को बताना चाहती हूं। पहली बात ब्लॉग पर आप सभी निशुल्क मुझे पढ़ सकते हैं दूसरी बात मेरे ब्लॉग पर अगर 1000 से ज्यादा फॉलोवर्स होते हैं तो वर्डप्रेस ब्लॉग मुझे मेरा ब्लॉग लिखने के लिए आप सब से कोई शुल्क लिए बिना मेरे अकाउंट को बिजनेस अकाउंट बना देता है और जिससे मुझे लाभ मिलता है। इसके अलावा मेरी कहानियों पर गूगल ऐड जो भी एडवर्टाइजमेंट डालता है उससे भी मुझे रेवेन्यू जेनरेट होता है यानी कि मेरी कमाई होती।

अब आप सोचिए कि ये आपके और मेरे दोनो के लाभ का सौदा है। आपको कुछ नहीं करना सिर्फ आकर मुझे पढ़ना है वह भी पूरी तरह से निशुल्क और उसके बदले मुझे गूगल से और वर्डप्रेस से पैसे दिए जाएंगे क्योंकि मेरा पेज बार-बार खोला जा रहा है और मेरे पेज पर एडवर्टाइजमेंट नजर आ रहे हैं।

क्योंकि यह मेरा पर्सनल ब्लॉग है और यह गूगल पर है तो इसलिए 1000 फॉलोअर्स से अधिक होने पर गूगल भी मुझे कुछ निश्चित राशि देना शुरू करेगा। मैं मानती हूं यह राशि बहुत कम है ।रेवेन्यू बहुत ज्यादा जनरेट नहीं होता लेकिन फिर भी मुझे मंजूर है। क्योंकि यहां मेरे पाठकों को मुझे पढ़ने के लिए कुछ भी खर्च करने की जरूरत नहीं है। लेकिन मुझे फायदा बढ़ाने के लिए आप यह जरूर कर सकते हैं कि मेरी कहानियों को आप अपनी सोशल अकाउंट पर शेयर कर सकते हैं। मेरे इस पेज यानी अनकहे किस्से को आप ज्यादा से ज्यादा अपने इंस्टाग्राम फेसबुक आदि अकाउंट पर शेयर कर सकते हैं। अगर आप सभी के फेसबुक पर 100 दोस्त भी हैं, और अगर उन्हें मेरी कहानी पढ़ना पसंद आता है ।तो वह मेरे ब्लॉग पर आकर मुझे फॉलो कर सकते हैं और इस तरह मेरे फॉलोवर्स की संख्या बढ़ सकती है। और साथ ही बढ़ सकते हैं मेरी रोजाना के व्यूज। आपको इस सम्बंध में कोई भी डाउट है तो आप समीक्षा में मुझसे खुल कर पूछ सकते हैं।

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वैसे यह आप सभी का प्यार ही था कि पहले महीने में ही मेरे ब्लॉग पर लगभग रोज के 1000 से ज्यादा व्यूज आने लग गए थे। लेकिन आप सभी को एक बार फिर अपना प्यार साबित करना पड़ेगा मेरे फॉलोवर्स बढ़ाने में और मेरे व्यूज बढ़ाने में सिर्फ आप सभी मेरी मदद कर सकते हैं।

प्रतिलिपि और मेरी मोहब्बत कितनी तगड़ी है यह तो आप सब जानते हैं । वहाँ पर ढेर सारे लेखक अपने कुकू एफएम पॉकेट एफएम के पोस्ट शेयर करते रहते हैं लेकिन उनसे प्रतिलिपि को कोई परेशानी नहीं है। और मैं ने जैसे ही अपने ब्लॉग के बारे में लिखा मुझे तुरंत नोटिस जारी कर दिया। इसलिए अब वहां मैं अपनी कोई पोस्ट शेयर नहीं कर सकती। हो सकता है कि कई पाठकों को शायद यह पता ही नहीं कि मैं अब मेरे ब्लॉग पर भी लिखती हूं तो दोस्तों हो सके तो आप सभी के सोशल अकाउंट पर मेरी कहानियों या मेरे पेज का प्रचार करने में मेरी मदद करें।

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बाकी तो आप सभी जानते हैं कि मैं संस्कारी बहुत हूं इसलिए पंगों से दूर ही रहती हूं। पर अब जाने क्यों आप सभी ब्लॉगर जो मेरे ब्लॉग पर मुझे फॉलो करते हैं से एक अलग से जुड़ाव हो गया है आप लोगों के सामने तो दिल खोल कर मैं अपनी भड़ास निकाल सकती हूं। तो बस मुझे दिवाली तक में 1000 फॉलोअर्स चाहिए और साथ ही चाहिए डेली के 2000 प्लस व्यूज भी।

वहां 22000 लोग फॉलो करते हैं पर पता नहीं क्यों फॉलो करते हैं। मेरी बात सुनते तो है नहीं पर चलो कोई नहीं। जो सुनते हैं वह लोग भी अगर मान गए तो भी बहुत बड़ी बात है।

एक और बात कहनी थी आप 297 फॉलोअर्स यहां मौजूद हैं। क्या आप सभी को मेरी हर पोस्ट की नोटिफिकेशन मिलती है। अगर आप लोगों को नोटिफिकेशन नहीं मिलती तो प्लीज प्लीज प्लीज मुझे इस पोस्ट पर मैसेज करके बताइए। मेरा टेलीग्राम चैनल और फेसबुक पेज की लिंक भी मैं आपसे शेयर करूंगी। आप हो सके तो मेरे फेसबुक पेज को भी फॉलो कर सकते हैं और टेलीग्राम चैनल को भी। जिससे मैं हर कहानी की पोस्ट का लिंक वहां शेयर कर सकूं।

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और अगर आप इतना सारा मेरे लिए करेंगे तो मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं नई नई अनोखी और अलग हटकर कहानियां आप लोगों के लिए सिर्फ आप लोगों के लिए अपने ब्लॉग पर लिखती रहूं।

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आप सभी की संस्कारी लेखिका

aparna…..

जीवनसाथी- 122

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    जीवनसाथी -122

      गाड़ी खाई से निकाली जा चुकी थी। गाड़ी महल की ही थी, जो विराज के नाम से थी लेकिन उसमें विराज नही था।
         गाड़ी में केसर थी, लेकिन उसके पिता नदारद थे। सड़क पर आते जाते लोगों का भी मजमा लगा हुआ था। पुलिस की गाड़ी के साथ ही एंबुलेंस भी लगी खड़ी थी।
  भीड़ को चीरते महल के लोग भी वहाँ पहुंच गए थे। समर और आदित्य के साथ ही युवराज भी आ चुका था।
रेखा को बाँसुरी ने महल में ही रोक लिया था। इतना सब हो हल्ला होते देख विराज को ढूंढ़वाने युवराज ने पहले ही अपने लड़कों को दौड़ा दिया था।
    विराज के बरामद होते ही युवराज ने उससे फ़ोन में बात कर सारी बातें उसे बता दी थी और तुरंत महल वापसी का फरमान सुना दिया था।
    अजातशत्रु से विराज का बैर अलग था लेकिन युवराज के लिए उसके मन में सम्मान था और इसी कारण वो उससे दबता भी था।
    बिना कोई बहाना किये  वो कुछ देर में ही महल चला आया था।
   उसे सामने सही सलामत देख रेखा की जान में जान आ गयी थी।
   ” बाँसुरी हमें लगता है गाड़ी में केसर दीदी और पिता साहब रहें होंगे।”
    रेखा का शक सहीं भी साबित हुआ था।

*****

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    गाड़ी की हालत बहुत खराब थी, और उससे भी ज्यादा गाड़ी में मिलने वाली लाश की। सिर्फ कपड़ों के रंग, जूतों और हाथ में बंधी महंगी घड़ी से ही लाश की पहचान केसर के रूप में हो पाई थी।
   गाड़ी का भयानक एक्सीडेंट हुआ था इसलिए लाश का पोस्टमार्टम होना बहुत जरूरी था इसीलिए एंबुलेंस में उसे डालकर अस्पताल की और भेज दिया गया। पंचनामा करने के बाद पुलिस बाकी औपचारिकताओं को पूरा करने चली गई महल से सारे लोग वापस लौट आए लेकिन समर आदित्य के साथ अस्पताल चला गया था।
       महल में यह खबर पहुंचते ही कि केसर जिस गाड़ी से जा रही थी वही गाड़ी दुर्घटनावश या किसी बड़ी गाड़ी की चपेट में आकर खाई में गिर चुकी थी, एक बार फिर दुख का माहौल बन गया था ।
रेखा पिछले कुछ दिनों में इतनी बार रो चुकी थी कि अब उसके आंसू थम गए थे। वह समझ गई थी कि उसकी केसर  दी अब हमेशा हमेशा के लिए उसे छोड़ कर जा चुकीं थीं, लेकिन एक बात थी कि जाने से पहले उन्होंने उसे एक रास्ता दिखा दिया था अपनी जिंदगी का रास्ता।
     केसर वहां से जाने से पहले रेखा से मिलकर अपनी प्रोजेक्ट की सारी डिटेल उसे समझा चुकी थी। इसके साथ ही उसने सारे कागज पत्तर रेखा के हवाले कर दिए थे।
   रेखा ने केसर से मिलकर उसे रोकने और समझाने की बहुत कोशिश की थी। लेकिन केसर रेखा को ही अपनी बातें समझा गई थी।
     केसर ने रेखा से स्पष्ट कहा था कि वह यहां से निकलकर अपनी नई जिंदगी जीना चाहती है। अब तक कि उसकी जिंदगी में शायद उसे कुछ भी वैसा नहीं मिला जिसकी उम्मीद थी लेकिन अब वह अपनी जिंदगी अपने हिसाब से बनाना चाहती है। उसने जाने से पहले अपने पिता साहब के एक मित्र का जिक्र भी किया था कि उनसे एक बार मिलने की इच्छा है तो हो सकता है हम लोग महल से निकलने के बाद उनसे मिलने जाए।
    
    जब बांसुरी निरमा और बाकी लोग रेखा को सांत्वना देते उसके आंसू पोंछ रहे थे उसी वक्त उनमें से किसी ने बताया कि वहां केसर की ही लाश मिली थी और रेखा के पिता साहब वहां मौजूद नहीं थे।
   यह सुनते ही रेखा को केसर की वह बात याद आ गई थी और उसने तुरंत युवराज भाई साहब को अपने पिता के उन मित्र का पता ठिकाना और फोन नंबर दे दिया था।
   रेखा का सोचना सही निकला युवराज ने उस नंबर पर फोन कर जब पतासाजी की तो पता चला रेखा के पिता वहीं मौजूद थे।
  उनसे बात करने पर सारी बातें और स्पष्ट हो गई थी उन्होंने बताया कि रेखा उन्हें वहां छोड़कर अकेली ही अपनी हवेली के लिए निकली थी और उसका कहना था कि दो दिन में हवेली साफ करवा कर अपने पिता को वहां बुला लेगी।
    रेखा को अब सारी बातें समझ में आने लग गई थी। उसकी केसर दीदी बहुत दिन से परेशान थी। उसे और उसके आत्मसम्मान को अब इस महल में रहना पसंद नहीं आ रहा था। रेखा यह सब जानते समझते हुए उसे भी यही समझाती रहती थी कि महल के लोग उसके बारे में अब कुछ नहीं सोचते लेकिन इतना समझाने के बावजूद केसर के मन में जो चल रहा था आखिर उसने अपना निर्णय उसी आधार पर लिया।
    इसलिए ही तो रेखा के इतना ज़िद करने पर भी उसने ड्राइवर साथ लेकर जाने से इंकार कर दिया था और कह दिया था कि हवेली में पहुंचने के बाद वह अपने सबसे भरोसेमंद आदमी के हाथों गाड़ी वापस भिजवा देगी।
    जाने  केसर के दिमाग में यह सब कब से चल रहा था। क्योंकि उसने कुछ समय पहले ही बिजनेस के सारे लीगल पेपर रेखा के नाम से तैयार करवा लिए थे। यहां तक कि एनजीओ में भी अपने नाम के साथ साथ रेखा का भी नाम हर जगह डलवाया था। रेखा को याद आने लगा कि उसने इस बात पर आपत्ति भी की थी….-” सारा काम तो आप करेंगी जीजा साहब फिर नाम हमारा क्यों डाला है? इसका मतलब मेहनत करें आप और प्रॉफिट में हिस्सेदार हों हम! यह कैसा न्याय हैं आपका। “
   तब  केसर ने बड़े प्यार से रेखा के सर पर हाथ फेर कर उसे अपने गले से लगा लिया था…-” हमारा सब कुछ आपका ही तो है। इस जिंदगी में और कुछ कमाया हो या ना कमाया हो। रुपए तो हमने बहुत कमा लिया आपके लिए रेखा। यह सब कुछ आपका ही है, बस यह याद रखना कि आपको इस सब की सार संभाल करनी है। “
” हमसे यह सब नहीं होगा जीजा साहेब। हम अपने घर परिवार और बच्चे में ही खुश हैं हमारी जिंदगी तो बस इतनी ही है इन्हीं सबके बीच।”
” नहीं अब तुम्हारा बेटा भी बड़ा होने लगा है इसलिए घर परिवार की परिधि से भी बाहर खुद को पहचानो रेखा। “
     रेखा को अब केसर कि कहीं हर बात धीरे-धीरे समझ में आ रही थी मतलब इतने दिनों से वह जो प्रोजेक्ट तैयार कर रही थी वह पूरी तरह से रेखा को खड़े करने के लिए था । उसने अपनी हवेली, बिज़नेस सभी में रेखा का नाम जुड़वा दिया था। और इतना सब करने के बाद पिता साहब को लेकर निकल गयी।
   उन्हें उनके सबसे करीबी दोस्त कम पार्टनर के घर छोड़ वो अकेली ही अपनी मंज़िल तय करने निकल गयी।
     यानी केसर महल से निकलते समय ही ये तय कर चुकी थी कि उसे अब ज़िंदा नही रहना।
   उसकी गाड़ी वाकई किसी बड़ी गाड़ी से टकरा कर असंतुलित हो खाई से गिर गई या उसने जानबूझकर उस खतरनाक मोड़ पर अपनी गाड़ी खाई में गिरा दी, यह राज अब केसर के साथ ही हमेशा हमेशा के लिए चला गया।

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     रेखा ने आंसू भरी आंखें उठा कर ऊपर देखा समर और आदित्य भी वापस चले आए थे। आदित्य भरी आंखों से आकर रेखा के पास बैठ गया उसने रेखा के दोनों हाथ थाम लिए।
    आज भले ही उन दोनों का देखा जाए तो कोई रिश्ता नहीं था। लेकिन आज से 6 महीने पहले तक दोनों भाई बहन के रिश्ते में बंधे थे। और दिल से आज भी आदित्य रेखा को अपनी छोटी बहन ही मानता आया था । जाते-जाते केसर ने उसके ऊपर रेखा की जिम्मेदारी भी डाल दी थी।
   वो मज़बूत था। उसकी आँखों में बहुत जल्द ऑंसू नही आया करते थे। और आज भी उसने अपने दिल में बहते आंसूओं को बाहर आने से रोक लिया था।
     
     विराज भी भागता दौड़ता वापस आ गया था। उसे भी अब तक रेखा और केसर की सच्चाई मालूम हो चुकी थी,  रेखा के पास बैठे आदित्य को देख वो दूसरी तरफ आ कर बैठ गया।

” खुद को सम्भालिए रेखा, ये वक्त मज़बूत होने का है न कि कमज़ोर होकर बिखर जाने का। आपके पिता साहब को हम महल वापस ले आते हैं। चलिए …”!

  रेखा आश्चर्य से विराज को देखती रह गयी… उसने धीरे से मना कर दिया…-” ,हमारी बात हुई थी उनसे। अभी वो वहीं रहना चाहतें हैं।
 
“ठीक है जैसी उनकी मर्जी। वैसे आप चाहें तो हम चलतें हैं आपके साथ। केसर बाई सा की बॉडी लाने…”

  रेखा पर एक के बाद एक बम फूट रहे थे, उसकी समझ से बाहर था कि आज विराज को हो क्या गया था।
    उसने धीरे से सिर हिला कर मना कर दिया। उसकी हिम्मत नही थी अपनी केसर दीदी को वैसे देखने की। पुलिस ने पंचनामा करने के बाद वैसे भी बॉडी को अस्पताल भेज दिया था,पोस्टमॉर्टम के लिए।
    रेखा ने आदित्य की तरफ देखा, वो खुद खोया सा बैठा बाहर कहीं दूर देख रहा था।
  समर धीमे कदमों से आकर आदित्य के पास खड़ा हो गया। उसने धीरे से उसके कंधों पर हाथ रख दिये, आदित्य समझ गया कि समर उससे कुछ कहना चाहता है…
   आदित्य के समर की ओर देखते ही समर ने अपनी बात कह दी…-” हमें वापस अस्पताल जाना होगा आदित्य! उन्हें कोई कंसेंट फॉर्म भरवाना है।”
   आदित्य ‘हाँ’ में सिर हिला कर खड़ा हो गया। उसने आंखों ही आंखों में रेखा की तरफ देखा और चलने के लिए इशारों में ही पूछ लिया। रेखा ने सिर हिला कर मना कर दिया।
    आदित्य और समर अस्पताल निकल गए…

  अस्पताल में समर आदित्य को साथ लिए पिया के केबिन के बाहर पहुंचा की बाहर खड़ी नर्स ने समर को पहचान कर केबिन का दरवाजा खोल दिया…-” आप अंदर बैठिये सर। मैडम एक डिलीवरी में हैं। निपटा कर यहीं आएंगी। आप लोगों के लिए चाय ले आऊं तब तक? “
    ‘न’ में सिर हिला कर दोनों थके हारे से वहीं बैठ गए। आदित्य का मन बेचैन सा हो रहा था, उसे बार-बार यही लग रहा था कि केसर ऐसा कदम नही उठा सकती। या तो उसके किसी दुश्मन ने ऐसा किया या केसर के किसी दुश्मन ने। पर कौन हो सकता है।
   वो सोचता सोचता टहलते हुए दरवाजे तक पहुंचा ही था कि एक झटके से दरवाज़ा खुला और एक औरत उसके सामने चली आयी…-” सर ! मैं आपसे रिक्वेस्ट करती हूँ, उस फूल सी बच्ची का पोस्टमार्टम मत कीजिये। प्लीज़ हो सके तो उसकी बॉडी हमें वापस कर दीजिए। हम लोग वैसे भी बहुत शर्मिंदा हैं कि उसके माँ …
    नीली आसमानी साड़ी में अपने लंबे बालों को करीने से पीछे बांध माथे पर छोटी सी बिंदी लगाए वो औरत अपने चश्में के भीतर से उसे घूरती कहने लगी कि उसकी बात आदित्य ने काट दी…

” जी आप किसकी बात कर रहीं हैं? मैं शायद नही समझ पा रहा। मैं इस शहर से भी नही हूँ…”
  आदित्य कुछ कह पाता कि वो एक बार फिर वही सब कहने लगी…-” देखिए वो बच्ची परेशान थी। लेकिन उसकी परेशानी का कारण “मायानगरी” नही है। वो असल में उसने मुझसे सारी बात बताने की कोशिश की थी,कुछ थोड़ा बहुत मैं जानती भी हूँ…

उनकी बातों के बीच ही कमरे का दरवाजा खोले पिया भीतर चली आयी।
   वो उस दूसरी खड़ी औरत की तरफ देखते ही सब समझ गयी। उसने अपनी टेबल से पानी का गिलास उठा कर उसकी तरफ बढ़ा दिया…-” जैसा आप सोच रहीं हैं मैडम वैसा नहीं है यह डॉक्टर नहीं है यह खुद भी एक….”
   आगे की बात पिया भी नहीं कह पाई उसने उस औरत को एक कुर्सी पर बैठाया और खुद जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गई समर और आदित्य की तरफ उसने कुछ पेपर्स बढ़ा दिये….

” केसर जी की पहचान सिर्फ उनके कपड़ों और उनके हाथ में बंधी इस घड़ी से हो पाई है। अगर आप लोगों को ये शंका हो कि ये केसर नही कोई और है तो हम लोग डी एन ए टेस्ट करवा सकते हैं।”

” क्यों केसर का चेहरा…?”

” एक्सीडेंट में बुरी तरह से खराब हो चुका है। आप देख कर शायद ही पहचान पाएं। वैसे अगर आप लोग देखना चाहतें हैं तो देख सकते। हैं। अभी उनका पोस्टमार्टम किया जा रहा है।
   मैं तो यही कहूंगी की आप लोग उन्हें घर लेकर जाने की जगह यही उनका क्रिमेशन भी करवा दें। क्योंकि उनकी बॉडी की जो हालत है , वो घर लेकर जाने लायक नही है।”

“मैं फिर भी एक बार देखना चाहता हूँ..”

  आदित्य के ऐसा कहते ही पिया ने समर की तरफ देखा और आदित्य को देख “हाँ” में सिर हिला दिया। वो अपनी जगह से उठ खड़ी हुई। उसके पीछे ही समर आदित्य और वो दूसरी औरत भी चल पड़ी।
   मॉर्ग( मुर्दाघर) में पिया बेधड़क अंदर घुस गई लेकिन समर बाहर ही खड़ा रह गया। आदित्य धीरे से अंदर चला गया। पिया ने केसर के चेहरे पर पड़ी चादर हटा दी। और उसे देख साथ खड़ी मैडम ने अपना सिर थाम लिया, उसी की बाजू वाली बेड पर उस लड़की की लाश पड़ी थी। उसकी बंद आंखे  और चेहरा देख मैडम खुद को संभाल नही पायी और सिसक कर रो पड़ी। उनका रोना बढ़ते बढ़ते तेज़ होता चला गया और उनकी हिचकियाँ बंध गयीं।

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   पिया को आकर उन्हें संभालना पड़ा…-“मैडम प्लीज़ खुद को संभालिए। मैं समझती हूं वह आपकी यूनिवर्सिटी की लड़की थी पर इस वक्त उसके माता-पिता को इनफॉर्म करना बेहद जरूरी है। “
   पिया उन सब से बात कर रही थी कि बाहर से वॉर्ड बॉय ने पिया को पुकार कर कहा कि पुलिस की गाड़ी बाहर आई है।
    उसकी बात सुन पिया अपने कमरे की तरफ बढ़ गयी। उसके पीछे ही आदित्य और वो मैडम भी चली आयीं।
    समर पहले ही आकर उसके केबिन में बैठ चुका था। उसे जाने क्यों मुर्दाघर के बाहर पहुंचते ही अजीब सी घुटन महसूस हो रही थी। उसकी बिगड़ी शक्ल देख पिया ने उसकी तरफ पानी का गिलास बढ़ाया ही था कि उसके दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी और दरवाजा खोल कर दो पुलिस के अधिकारी अंदर चले आए।  उनके आते तक में पिया ने अस्पताल में उस वक्त मौजूद बाकी दोनों सीनियर डॉक्टर्स को भी बुलवा लिया था।
  पिया ने उन दोनों में अधिकारियों का अभिवादन कर उन दोनों को बैठने के लिए जगह दी इसके साथ ही वह समर और आदित्य की तरफ घूम गई….
” अगर आप लोगों की इजाजत हो तो हम अस्पताल की तरफ से केसर….. केसर जी का क्रीमेशन कर देंगे! आप लोगों को ये कंसेंट फॉर्म भर कर साइन करना होगा। “
    समर को भी उस वक्त पिया की बात सहीं लगी। उसने आदित्य के कंधे पर हाथ रखा। आदित्य ने नीचे सिर किए हुए ही  “हां” में सर हिला दिया !समर ने पिया को इजाजत दे दी।
    पिया उन पुलिस वालों से बातों में लग गई” सर आप लोग चाय या पानी कुछ लेंगे”
  ” नहीं डॉक्टर पिया इस वक्त हम सिर्फ उस लड़की के बारे में पूछताछ करने आए हैं। आप उनके बारे में क्या बता सकती हैं?”
” सर ये मैडम माया नगरी यूनिवर्सिटी के मेडिकल कॉलेज में लैब अटेंडेंट हैं, वह लड़की जिसने मेडिकल कॉलेज में सुसाइड किया है इनकी रिश्तेदार थी उसके बारे में यह ही आपको बता सकती हैं। “

   उन दोनों में से एक पुलिस वाले ने उन मैडम की तरफ देख कर अपना हाथ आगे बढ़ा दिया” जी नमस्कार मैं इंस्पेक्टर रोहित हूं। पहले बनारस में काम कर रहा था अभी ट्रांसफर में यहां 2 महीने पहले ही ज्वाइन किया है। आप तफ्सील से मुझे उस लड़की का नाम ?वह क्या पढ़ती थी? क्या करती थी? सारी बातें बता सकती हैं। “

” जी इंस्पेक्टर साहब नमस्ते। मेरा नाम रागिनी श्रीवास्तव है! मैं मायानगरी यूनिवर्सिटी के रानी बांसुरी मेडिकल कॉलेज के फिजियोलॉजी डिपार्टमेंट में लैब अटेंडेंट का काम करती हूं। यह लड़की दूर के रिश्ते में मेरी भतीजी होती थी। अभी सेकंड ईयर में थी। मेरा मतलब है फर्स्ट ईयर पास करके सेकंड ईयर में आई ही थी। “

” इसने क्यों सुसाइड किया? क्या आप इन बातों पर रोशनी डाल सकती हैं?”

” सर ये यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में ही रहा करती थी। इसलिए मैं ज्यादा कुछ तो नहीं बता सकती, लेकिन यह बता सकती हूँ, कि लड़की पढ़ने में बहुत होशियार थी। मध्यम वर्गीय परिवार की लड़की थी सर । इसने ऑल इंडिया मेडिकल एंट्रेंस में टॉप किया था। टॉप फिफ्टी में जगह बनाई थी सर।  और खुद ही मायानगरी का चुनाव कर के यहां आई थी।
      सर आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि उसके शरीर के साथ छेड़छाड़ मत करवाइए।  उसके माता-पिता उसे इस हालत में नहीं देख पाएंगे । उनके सपनों को पूरा करने ही वो यहां आई थी। उनके लिए यह सदमा बहुत बड़ा है, कि उनकी बेटी अब नहीं रही। सर आपसे एक रिक्वेस्ट और है , डॉक्टर मैडम से गुजारिश करके उसका पोस्टमार्टम रुकवा दीजिए।
      सर मैं बताना चाहती हूं कि उसके सुसाइड में हमारे मायानगरी का कोई हाथ नहीं है। वह किसी तरह की उलझन या परेशानी में नहीं थी। क्योंकि अभी लगभग एक हफ्ते पहले ही मेरी उससे बात हुई थी। और वह काफी खुश लग रही थी।
   वह शायद अपने साथ वाले बच्चों को और कुछ मेडिकल के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाना शुरू कर चुकी थी। क्योंकि उसने मुझसे कहा था कि मेरी कमाई शुरू हो गई है। बहुत खुश थी वह। मैंने कभी नहीं सोचा था कि वह ऐसे सुसाइड कर लेगी।”

  रोहित ने मुड़कर पिया की तरफ देखा….-” डॉक्टर साहब क्या बिना पोस्टमार्टम के बॉडी इन के हवाले की जा सकती है?

पिया ने “ना” में सिर हिला दिया…-” सर हमें मौत का कारण कैसे पता चलेगा? “
” जी आपकी बात भी सही है। ” रोहित वापस उन मैडम की तरफ मुड़ गया…-” मैं देखता हूं क्या हो सकता है। और यह कहना चाहता हूं कि मुझे अभी इसी वक्त आपकी यूनिवर्सिटी का चक्कर लगाना पड़ेगा। “
“सर आप बिल्कुल हमारी यूनिवर्सिटी में आ सकते हैं! पर मैं फिर आपसे गुजारिश करूंगी कि अगर आप लोग सादे कपड़ों में आकर पूछताछ करें तो ज्यादा अच्छा रहेगा । असल में हमारे यहाँ मैनेजमेंट सीट के भी बहुत सारे बच्चे हैं तो इसलिए हमारी रेपुटेशन का भी थोड़ा…

” जी मैं समझता हूं।” रोहित ने उसकी बात बीच में ही काट दी और समर की तरफ मुड़ गया…-” समर जी यह राजा अजातशत्रु की बनाई यूनिवर्सिटी ही तो नहीं है कहीं। “

समर और रोहित आपस में परिचित थे। फिर अभी कुछ दिन पहले ही दून वाले केस के समय भी रोहित ने समर की बहुत मदद की थी। आज भी यहां मिलते ही दोनों एक दूसरे को पहचान कर अभिवादन कर चुके थे।
  समर के हाँ में सिर हिलाते ही रोहित चौक कर अपनी जगह से खड़ा हो गया। और अचानक उसका ध्यान इस बात पर गया कि अस्पताल में समर और आदित्य मौजूद है।

“क्या आप दोनों भी उसी केस के सिलसिले में यहां आए हुए हैं।”

” ना ” में सिर हिलाकर समर केसर के साथ घटी वारदात रोहित को बता गया रोहित चौक कर आदित्य की तरफ देखने लगा…

“यह केसर कहीं रेखा की बड़ी बहन तो नहीं? “

आदित्य के हां कहते ही रोहित के चेहरे पर परेशानी के भाव झलकने लगे । वह अपनी जगह से उठकर बाहर निकल गया। बाहर निकलते हुए उसने अपने साथ वाले पुलिस वाले को भी बाहर बुला लिया। उनसे कुछ देर बात करने के बाद वह वापस समर की तरफ बढ़ गया…-” अगर आप लोग बुरा ना माने तो क्या मैं आप लोगों के साथ एक बार महल चल सकता हूं।”

समर और आदित्य के हाँ कहते ही वो पिया के पास पहुंच गया…-” डॉक्टर साहब मैं एक बहुत जरूरी काम निपटा कर महल से वापस आता हूं! उसके बाद आगे की तफ्तीश करूंगा!  तब तक के लिए अगर हो सके तो आप पोस्टमार्टम शुरू मत करवाइएगा।
    रोहित ने  एक नज़र उन मैडम की तरफ देखा। मैडम ने उसकी तरफ देखकर दोनों हाथ जोड़ दिये।  रोहित समर और आदित्य के साथ बाहर निकल गया।

   समर ड्राइविंग सीट पर बैठ गया आदित्य उसके साथ वाली सीट पर और रोहित पीछे बैठ गया।

  ” मैं समझता हूं तुम बहुत परेशान हो आदित्य।  लेकिन भगवान के रचे  खेल को कोई नहीं समझ सकता । जिसका जितना साथ होता है वह उतना ही साथ देता है।”

  समर की बात सुनकर आदित्य उसकी तरफ देखने लगा….-” क्या तुम्हें पूरा भरोसा है कि वह केसर की ही बॉडी थी? “

  समर आश्चर्य से आदित्य की तरफ देखने लगा-” तुम कहना क्या चाहते हो? “

” वह केसर नहीं थी। मैं जानता हूँ,वो केसर नही थी।”
  अपनी बात कह कर आदित्य चुपचाप सामने देखने लगा समर ने कुछ सोचते हुए गाड़ी और तेजी से महल की तरफ दौड़ा दी।

क्रमशः

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दिल से….

     प्यारे दोस्तों कैसे हैं आप सब?  पिछली तीन चार दफा से ऐसा हो रहा था कि, आप सब मुझसे शिकायत कर रहे थे कि आपको “दिल से” पढ़ने नहीं मिल रहा! तो यह भी एक कारण था आज “दिल से” लिखने का और दूसरा कारण था कहानी में आई नई गुत्थियों को आपके सामने थोड़ा सा सुलझा सकूं।
  
      मेरे जो पाठक सिर्फ जीवनसाथी पढ़ रहे हैं। उन्हें यह सुसाइड वाला एंगल शायद समझ में नहीं आ पाया होगा, लेकिन मैंने पहले भी कहा था कि जीवन साथी खत्म होने के बाद वह माया नगरी के साथ चलती रहेगी तो बस यही बात है।
    मायानगरी के छठवें  भाग के अंत में मेडिकल कॉलेज हॉस्टल में एक लड़की ने सुसाइड कर लिया था।  वही कड़ी जीवनसाथी के इस भाग में जोड़ी गई है। लेकिन आप लोग निश्चिंत रहिए जो पाठक सिर्फ जीवनसाथी पढ़ रहे हैं, उन्हें निराश होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि इस सुसाइड केस से जुड़ी जितनी भी बातें मायानगरी की है वह जीवन साथी के अगले भाग में आपको पढ़ने मिल जायेंगी।
    दूसरी बात माया नगरी में भी इस मर्डर मिस्ट्री को सुलझाया जाएगा लेकिन वह कॉलेज और वहां के स्टूडेंट के पॉइंट ऑफ व्यू से होगा। रंगोली और अभिमन्यु के नज़रिए से।
      दोनों ही कहानियों में किसी तरह का कोई रिपीटेशन नहीं होगा। बावजूद जो पाठक जीवनसाथी पढ़ रहे हैं वह भी संतुष्ट रहेंगे और जो मायानगरी पढ़ रहे हैं वह भी संतुष्ट रहेंगे।
     और जो पाठक दोनों कहानियां पढ़ रहे हैं उनकी तो फिर बल्ले-बल्ले है।
    तो आप सब पढ़ते रहिए त्योहारों को एंजॉय करते रहिए।
   

    और एक छोटी सी बात …..
    …..   याद रखें नवदुर्गा 9 दिन बैठती हैं हम उन्हें नौ दिन पूजते हैं । लेकिन उनका आदर हमें साल के 365 दिन करना है , अपने आसपास रहने वाली बच्चियां लड़कियां युवतियां औरतें प्रौढा वृद्धाएं सभी में वही नवदुर्गा है बस नजर और नज़रिए का अंतर है।

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    हमारी तरफ तो खूब गरबा और डांडिया होता है। आपकी तरफ भी होता होगा तो लगे रहिए झूम झूम कर करते रहिए और एक दूसरे के साथ त्योहारों का आनंद लीजिए…

          पेथल पुरमा सुनले ओ छोरिया
           झूमे नगरिया जब जब ये घूमे
             कमरिया रे थारी कमरिया
             कमरिया रे थारी कमरिया….

    शुभो नवरात्रि !!!

   मुझे पढ़ने और सराहने के लिए आप सबों का हार्दिक आभार प्रियजनों!!!

aparna…..

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जीवनसाथी-121

विराज की गाड़ी में कौन था। क्या भगवान उसे उसकी गुनाहों की सज़ा दी रहे

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   जीवनसाथी -121

         आदित्य पिंकी के बेटे को बाहों में लिए बगीचे में घूम रहा था कि ऊपर खड़ी केसर पर उसकी नज़र पड़ गयी। केसर उसे ही देख रही थी। आदित्य ने उसे भी इशारे से नीचे बुला लिया लेकिन केसर ने ना में सिर हिला दिया।
   कुछ समय बाद केसर अपना फ़ोन लिए उसमें कुछ करने लगी कि आदित्य के फ़ोन पर मैसेज की बीप आयीं।
   उसने तुरंत फ़ोन निकाला, मेसेज देखा… केसर का ही था…-“तुमसे कुछ बेहद ज़रूरी बात करनी है। कुछ देर के लिए हमारे कमरे में आ सकते हो?”
   आदित्य ने ऊपर देख कर हां में सिर हिला दिया। कमरे में वापस जाकर उसने बच्चे को पिंकी को थमाया और उल्टे पैरों वापस लौट रहा था कि पिंकी ने उसे टोक दिया…-“आदित्य भैया हमारे साथ चाय ले लीजिए।”
  आदित्य मना नही कर पाया, आखिर पिंकी ने पहली बार उससे कुछ मांगा था। वो वहीं उन लोगों के साथ बैठ गया।
   काकी सा और पिंकी के साथ बैठ आदित्य चाय तो पी रहा था लेकिन उसका दिमाग केसर की तरफ ही था।
  इधर काकी सा ये सोच कर की आदित्य उन सब के साथ सहज हो जाए उससे  बातें किये जा रहीं थीं। पिंकी के बचपन की बातों से लेकर, अपने जोड़ों की तकलीफ अपनी वेनिस की यात्रा तक सब कुछ उसे सुना दिया।
    बातों ही बातों में वक्त बीतता जा रहा था, आखिर आदित्य अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ।

  ” काकी सा हमें ज़रा कुछ काम है , हमें निकलना होगा।”
” हॉं ठीक है आप निकल जाये आदित्य लेकिन अब अगर आप हमें काकी सा की जगह  माँ बुलाएंगे तो हमें ज्यादा खुशी होगी।”
  आदित्य ने मुस्कुरा कर उनके पैर छू लिए…-“आप वाकई हमारी माँ ही तो हैं। हमने उनकी सिर्फ तस्वीर ही देखी है। रोज़ हमारी सुबह उनकी तस्वीर से ही हुआ करती थी, लेकिन अब से आप भी हैं जो हमारी सुबह को रोशन बना देंगी। “

  काकी सा ने उसके सिर पर हाथ फेरा और वो बाहर निकल गया। तेज़ कदमों से चलते हुए वो केसर के कमरे तक पहुंच गया…
… लेकिन केसर वहाँ नही थी। रेखा उसके कमरे में  आँसू बहाती खड़ी खिड़की से पार कुछ देख रही थी।
” रेखा  क्या हुआ ? केसर कहाँ है?”
रेखा ने आदित्य को देखा और वापस रोने लगी। रोते रोते उसने एक चिट्ठी आदित्य की ओर बढ़ा दी…

  आदित्य ने धीरे से चिट्ठी खोली चिट्ठी केसर की ही थी जो उसने आदित्य के लिए लिख छोड़ी थी…

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   आदित्य,

  वैसे तो हमने सोचा था तुमसे मिलकर हर एक बात तुमसे सामने बैठकर कहेंगे लेकिन जाने क्यों हमारी हिम्मत ही नहीं हुई और इसीलिए हमने कल रात ही ये चिट्ठी लिखी।
   सोचा था तुम्हें अपने हाथ से यह चिट्ठी दे देंगे और तुम अपने कमरे में जाकर तफसील से इसे पढ़ कर इस चिट्ठी का जवाब दे देना।
   हमने जिंदगी में बहुत सारे गलत काम किए हैं बल्कि अगर हम यह कहें कि हमने सिर्फ गलत काम किए हैं तो भी गलत नहीं होगा। लेकिन तुमने हमेशा हमारा साथ दिया।  उस वक्त जब तुम और हम दोनों किसी के हाथ का मोहरा थे तब भी तुमसे जब बन पड़ता था हमारी मदद किया करते थे। और बाद में जब हम इस बात को जान गए कि हम किसी के हाथों का मोहरा है उस वक्त भी तुमने हमारा साथ नहीं छोड़ा।
  ठाकुर साहब के आदमी जब हमारी जान के पीछे पड़े हुए थे। उस वक्त एक तुम ही थे, जो हमें उन सब से बचाकर सुरक्षित महल तक ले आए। हम यह बिल्कुल नहीं कहेंगे कि इसमें तुम्हारा कोई स्वार्थ था क्योंकि भले ही हम ठाकुर साहब के गुनाहों का सबूत थे लेकिन हम जानते हैं तुम ने हमें बचाया है तुम्हारे दिल में छिपी इंसानियत के कारण। तुम वाकई दिल का हीरा हो।
   हम भी औरों की तरह राजा अजातशत्रु से बहुत प्रभावित थे, लेकिन हमारे मन में उनके लिए जो झूठी कड़वाहट भरी गई थी उसके कारण कुछ समय के लिए ही सही हमें उनसे नफरत हो गई और उनसे और उनकी बीवी से बदला लेने के लिए हम इस हद तक नीचे गिर गए कि हमने कुछ हत्याएं भी की ।
      इतने बड़े गुनाहों की सजा इतनी आसानी से नहीं मिलती आदित्य।
     हम मानते हैं कि राजा अजातशत्रु और बांसुरी ने हमें माफ कर दिया। हम यह भी जानते हैं कि तुम भी हमें माफ कर चुके हो लेकिन हमारा जमीर हमारी आत्मा हमें माफ नहीं कर रही।
   जिस वक्त हम राजा अजातशत्रु को धोखा दे रहे ,थे उस वक्त भी वह हमारे पिता के स्वास्थ्य के लिए, उनकी जिंदगी के लिए चिंतित थे। वो हर पल हमारी खुशी के लिए दुआएं मांग रहे थे, और ऐसे भले इंसान को हमने धोखा दिया है।
    कभी-कभी यही सब सोचकर हमारा ज़मीर हमें कचोटने लगता है कि आज भी हम उन्हीं लोगों के महल में पड़े हैं , कभी जिनकी जिंदगी हम छीन लेना चाहते थे।
   आदित्य हमारे गुनाहों की सजा यह नहीं है, कि हमें माफ कर दिया जाए। क्योंकि आप लोगों की माफी हमारे दिल को अंदर तक और ज्यादा मरोड़ उठती है।
हमें माफ करने की जगह अगर राजा अजातशत्रु और तुमने हमें कोई सजा दी होती ना, तो हमारी आत्मा का बोझ शायद उतर गया होता । लेकिन तुम लोगों ने हमारे हर गुनाह बख्श दिये और हमें गले से लगा कर माफ कर दिया।
    जिस वक्त हम जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे तुमने इतने प्यार ,इतनी शिद्दत से हमारी सेवा की, कि हम उसका एहसान अपनी सारी जिंदगी नहीं उतार पाएंगे। हमारे साथ कुछ वक्त बिताने के बाद तुम्हें मालूम चल ही गया होगा कि लड़कियों वाला कोई अच्छा गुण हममें मौजूद नहीं है। बावजूद तुमने कदम कदम पर हमारी मदद की। चाहे रसोई में  रोटियां सेकने की बात हो या सब्जी बनाने की। चाहे घर की सफाई हो या कपड़े धोने की। हर काम हम बिगाड़ कर रख देते थे, और तुम उसे वापस तरतीब से सही कर दिया करते थे।
    आखिर क्या क्या करोगे आदित्य हमारे लिए और क्यों किया इतना सब हमारे लिए?
           हम इस लायक नहीं है। बिल्कुल भी नही।
   देखा जाए तो हम इस लायक कभी थे ही नहीं और ना अब है।
   हम जानते हैं हमारी जगह कोई और लड़की होती तब भी आप उसकी ऐसे ही मदद करते, क्योंकि यह मदद का जज्बा आपके खून में है। आखिर आप राजा अजातशत्रु के ही तो भाई है ना । आप सभी भाइयों में चाहे युवराज सा हों, या अजातशत्रु, आप हो या विराट आप सभी में आप लोगों का राजसी खून नजर आता है।
    आप सभी वाकई राजपूतों की शान है, और आप सभी की यह शान हमेशा बरकरार रहे। हम जिंदगी भर भी आप लोगों के लिए दुआ करेंगे तो भी वह कम ही होगा । जिस ढंग से आप लोगों ने हमारे पापा साहेब को बीमारी में मदद की, उनकी सेवा का इंतजाम करवाया, उसके लिए हम दिल से आप सब के आभारी रहेंगे।
   विराज और रेखा एक ऐसा जोड़ा है आप के महल में जो कभी एक साथ सुखी नहीं रह सकता। अभी भी जब से हम इस महल में आए हैं रेखा को हमेशा परेशान ही देखते आ रहें हैं। हमारी छोटी बहन है।  उसकी चिंता हमें लगी ही रहती है। जब से हम यहां महल में आए हमने रेखा को हमेशा हमारे पिता साहब की सेवा करते पाया। उसे भी तो अभी-अभी ही मालूम हुआ है कि उसके जीवन की कड़वी सच्चाई क्या है? पर फिर भी रेखा अपनी परिस्थितियों से समझौता करने में हम से कहीं ज्यादा कुशल है हम शायद अब थकने लगे हैं।
   आप लोगों ने विराज और रेखा के मामले में भी हमेशा रेखा का साथ दिया। और विराज को सही रास्ते पर लाने के लिए राजा अजातशत्रु आज भी प्रयासरत हैं। विराज का स्वभाव चाहे कितना भी कसैला क्यों ना हो लेकिन राजा अजातशत्रु इतने मीठे हैं कि वह एक ना एक दिन विराज को भी सुधार ही लेंगे । हमें पूरा विश्वास है। और इसी विश्वास के कारण हम अपनी बहन रेखा को आप लोगों के पास छोड़े जा रहे हैं।
    हम अपने पिता को अपने साथ लिए जा रहे हैं।  क्योंकि पहले तो ऐसा लगा था कि हम उन्हें भी रेखा के साथ आप लोगों के पास, आप लोगों के सहारे ही छोड़ कर आप सब की दुनिया से कहीं दूर चले जाएंगे। लेकिन फिर लगा कि उनकी सेवा करने का सौभाग्य हमें मिला है, और उस सौभाग्य को हम आप लोगों को सौंप देंगे तो आप लोगों के हम पर और भी एहसान चढ़ते चले जाएंगे ।
     यही सोचकर हम अपने पिता साहब को अपने साथ लेकर जा रहे हैं। आप लोगों ने हमारे बुरे कामों के बावजूद हम पर जो एहसान किए हैं और जो एहसान लगातार करते चले जा रहे हैं, उसके लिए हम आप सभी के शुक्रगुजार हैं। लेकिन अब इन एहसानों का बोझ हम पर भारी होने लग गया है। अगर हम यही महल में रुक गए तो कहीं इन एहसानों के बोझ तले दबकर मर ना जाए, इसलिए आप सब को छोड़कर जा रहे हैं। हमारा खुद का जमा जमाया बिजनेस है हमें उसे भी देखना है ।
  भले ही आज तक हम ठाकुर साहब के हाथ की कठपुतली थे, लेकिन हमारा एक छोटा सा ही सही अपना व्यक्तित्व था जो कहीं दबा छुपा सा रह गया था।

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    हमें मालूम है हमारा खत पढ़ते वक्त आपको शायद ऐसा लगा हो कि हम अपनी जिंदगी से बेज़ार होकर अपने आप को खत्म करने ना चले जाएं, लेकिन नहीं आदित्य।
     आपके साथ रहकर हमने इतना तो समझ लिया है कि कोई इंसान अंदर से कितना भी टूटा हुआ हो, जिंदगी हमेशा उसे जुड़ने का मौका जरूर देती है।
अगर हमने हमारी जिंदगी में बेइंतिहा दुख देखे हैं तो आपने कौन सा कम देखें । आपका टूटा हुआ बचपन बिखरी हुई जवानी सभी को समेटकर आज भी आप जिंदगी से जूझ रहे हैं , लड़ रहे हैं। जिंदगी को जी रहे हैं। आप देखिएगा आदित्य एक दिन खुशियां आप के गले लग जाएंगी।
    आप जो चाहते हैं अपनी जिंदगी में, आपको वह सब मिलेगा। आपका परिवार आपके पिता साहब आपकी छोटी बहन पिंकी सब कुछ।
  हम सिर्फ इन बातों की दुआ कर सकते हैं और हमेशा करते रहेंगे आपके लिए।
     हम जितना राजा अजातशत्रु से प्रभावित थे कहीं उतना ही आपसे भी प्रभावित हो चुके हैं ।आप पहली नजर में जितने संगदिल और गुस्सैल नजर आते थे आप अंदर से वैसे बिल्कुल भी नहीं है।
   आप सब ने तो अपने आप को दुनिया के सामने साबित कर दिया है पर हमें आज तक मौका नहीं मिला। अब हम भी जा रहे हैं खुद को साबित करने, लेकिन दुनिया के सामने नहीं अपने आप के सामने।
    आज तक हम जो करते आ रहे थे किसी और के लिए करते आ रहे थे और इसीलिए शायद सही और गलत का फर्क नहीं समझ पा रहे थे लेकिन अब हम जो करेंगे अपने लिए करेंगे अपनी बहन के लिए करेंगे।

   इतने दिन महल में रहते हुए हमने एक निर्णय लिया था जिसके बारे में हम आपसे चर्चा करना चाहते थे। लेकिन वक्त ही कुछ ऐसा चल रहा था कि हमारा कुछ ज्यादा बोलने का मन ही नहीं किया करता था हमने एक निर्णय लिया है आदित्य।
   हम हमारे जैसे बेचारे बच्चों के लिए एक बाल आश्रम खोलने की सोच रहे हैं।
   हमारे पास तो फिर भी हमारे पिता साहब थे बावजूद हम भटक गए। लेकिन बहुत से ऐसे बच्चे होते हैं जो अच्छी परवरिश ना मिल पाने के कारण कम उम्र में भटक जाते हैं। गलतियां करने लगते हैं। और बाद में उनके पास पछताने या आत्महत्या करने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचता।
    जिन बच्चों के पास उनके मां बाप नहीं है , उनके लिए तो फिर भी ढेर सारे आश्रम खुले हुए हैं लेकिन कई बच्चे ऐसे भी होते हैं जो मां बाप के होते हुए भी उनकी कमी महसूस करते हैं। हम ऐसा ही एक आश्रम बनाएंगे जहां ऐसे बच्चों की काउंसलिंग के लिए डॉक्टर मौजूद रहेंगे।
   किशोरवय के वह बच्चे जो किन्हीं भी कारणों से भटक गए हैं । कम उम्र में ड्रग्स लेने लग गए हैं, या बुरी आदतों के शिकार हो गए हैं। उनके लिए हमारा यह आश्रम होगा। , जहां अनुभवी चिकित्सकों की देखरेख में इन बच्चों को उनकी नशे की नशे की लत और बाकी बुरी लतों से निजात दिलाई जाएगी।
   हम जब से आप के साथ थे इसी प्रोजेक्ट को करने में व्यस्त होते थे। अब जाकर हमारा सोचा हुआ प्रोजेक्ट पूरा हुआ है । कुछ 2-4 में प्रायोजकों से भी बात चल रही थी जिन्होंने अपनी सहमति दे दी है। बाकी तो हमारा खुद का बिजनेस भी है। जिसका एक मोटा पैसा हम यहां पर लगाएंगे हमारे पिता साहब और रेखा भी इस प्रोजेक्ट में हमारा साथ देने तैयार है।
     तो अब तुम समझ ही गए होंगे कि हमने अपनी जिंदगी ढूंढ ली है अब हम यह खत लिखना बंद करते हैं कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया है ।
  लेकिन क्या करें बातें भी तो इतनी ढेर सारी थी।
हम तुम्हारे सामने ज्यादा कुछ बोल नहीं पाते हैं। लोगों को लगता है हम बहुत गुस्सैल हैं, घमंडी हैं, बदतमीज है । हो सकता है लोगों को सही लगता हो। शायद हम ऐसे ही हैं लेकिन हम जो भी हैं अपने आप में खुश हैं। और अब अपने इस काम के साथ  हम नई शुरुआत करने के लिए अपने पिता साहब को लेकर निकलने की सोच चुके हैं। हमारा इस शहर में भी बंगला है और दून में भी। आप जहां भी चाहे आकर हमसे मिल सकते हैं फिलहाल हम आपके ही शहर में यानी यही रहेंगे।
    आप जब हमारी जरूरत महसूस करें हम बस एक फोन कॉल की दूरी पर ही है। वैसे तो आप के आस पास आपके अपने मौजूद हैं। तो जाहिर है आपको हमारी कमी नहीं खलेगी, लेकिन कभी अगर किसी भी मौके पर आपको यह लगे कि हम आपकी मदद कर सकते हैं , तो प्लीज हमें याद करने में गुरेज मत कीजिएगा।बिना कोई दूसरा विचार मन में लाए सीधे हमें बुला लीजिएगा हम तुरंत आपके पास मौजूद रहेंगे।
   हमारी एक छोटी सी जिम्मेदारी रेखा को हम आपके पास छोड़ कर आए हैं। उसका ध्यान रखिएगा आदित्य। अब खत लिखना बंद करते हैं कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया।

  केसर !!!

   केसर के खत को पढ़ने के बाद आदित्य ने मोड़ कर अपनी जेब में रख लिया। वह खत पढ़ते-पढ़ते कमरे से जरा बाहर आ गया था उसने मुड़कर देखा दरवाजे पर खड़ी रेखा ने अपने आंसू पोंछ लिए…-” आप जाएंगे क्या दीदी से मिलने?”

” जरूर जाऊंगा! आपकी दीदी से मिलने भी और उन्हें वापस लेकर आने भी।”

रेखा ने हां में सर हिलाया और वापस अंदर चली गई। उसे उस वक्त जाने क्यों बांसुरी के पास बैठने का मन कर रहा था, अंदर से निकल अपने बेटे का हाथ थामे वह बांसुरी के कमरे की तरफ चली गई।

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  रेखा बांसुरी के कमरे में पहुंची तो उसने देखा वहाँ निरमा पहले ही मीठी को साथ लिए बैठी थी। दोनों सखियों को साथ देख रेखा वापस मुड़कर जाने लगी कि बांसुरी ने उसे आवाज देकर अंदर बुला लिया।

“अंदर आ जाओ रेखा बाहर से क्यों जा रही हो।”

सकुचाती हुई वह भीतर चली आई निरमा ने भी आगे बढ़कर रेखा का अभिवादन किया।

   बांसुरी के बच्चे को गोद में लिए रेखा प्यार से देखने लगी…-‘ कितना मिलता है ना इसका चेहरा हुकुम से!”

” सही कहा बच्चे अधिकतर अपने पिता की ही तो परछाई होते हैं ।कहा जाता है ना कि गर्भावस्था में मां जिसका चेहरा सबसे ज्यादा देखती है, उसी की छाप बच्चे पर पड़ती है। और जाहिर है एक पत्नी अपने पति को ही तो सबसे ज्यादा देखती है । और दिल से चाहती है कि उसी की परछाई उनकी संतान बने। “

निरमा की बात पर रेखा ने मुस्कुराकर हामी भर दी…-” लेकिन निरमा तुम्हारी मीठी प्रेम भैया जैसी बिल्कुल नहीं लगती। “

  कुछ पलों को निरमा हड़बड़ा कर चौन्क गयी कि तभी बांसुरी ने मुस्कुराकर बात ही बदल दी।

” हां भई कुछ बच्चे मां पर भी तो पड़ेंगे वरना औरतें नाराज़गी में मां बनने से इस्तीफा नहीं दे देंगी। “

  तीनों सखियां हंसती खिलखिलाती बातचीत में लग गई । बच्चे भी आपस में खेल रहे थे। बांसुरी का बेटा उसकी गोद में ही था कि कुछ देर में ही रेखा के फोन की घंटी बजने लगी….

रेखा ने फोन उठाया, दूसरी तरफ से जाने किसका फोन था लेकिन रेखा फोन में बात करते हुए काफी घबरा गई….” क्या लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? नहीं ऐसा नहीं हो सकता वह किसी और की गाड़ी होगी। अभी कुछ देर पहले ही तो ….” अपनी बात पूरी करने से पहले ही वो फफक पड़ी।

  “क्या हुआ रेखा किसका फोन था? “

बांसुरी के सवाल पर रेखा जोर से रोने लगी।  रोते रोते ही उसने फोन पर हुई बातचीत बांसुरी और निरमा को बता दी फोन पुलिस चौकी से किन्ही पुलिस वाले का था।
   शहर से बाहर जाने वाले हाईवे पर एक एक्सीडेंट हुआ था।  गाड़ी पलट कर नीचे खाई में गिर गई थी। गाड़ी को ऊपर निकालने की कोशिश की जा रही थी। ऊपर से देखने पर गाड़ी का जो नंबर समझ में आया उसको ट्रैक करने पर मालूम चला कि गाड़ी महल की ही थी और विराज के नाम से रजिस्टर्ड थी।
      महल की गाड़ी जो विराज के नाम से रजिस्टर्ड थी, इतना  पता चलने पर पुलिस वालों ने विराज के नंबर पर कॉल लगाया लेकिन विराज का नंबर लगातार बंद आ रहा था इसलिए पुलिस वाले ने रेखा के नंबर पर फोन लगा लिया था।
    बांसुरी और निरमा को यह सब बताते हुए रेखा की हिचकियां बंध गई।
    बांसुरी ने तुरंत अपना फोन उठाया और समर को फोन लगा दिया उधर निरमा भी अब तक प्रेम को फोन लगा चुकी थी।
    अपने आंसू पूछती खुद को संभालती रेखा भी विराज को फोन लगाने कांपते हाथों से उसका नंबर डायल करने लगी……

क्रमशः

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aparna….

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जीवनसाथी -120

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   जीवनसाथी – 120

     चुनाव के नतीजे आने लग गए थे रुझानों से साफ जाहिर था कि राजा और उसकी टीम ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया था। राजा की जीत तो पहले ही 100% तय थी।
समर अपने ऑफिस में बैठा हुआ इन्हीं सब जोड़ घटाव को देख रहा था कि मंत्री जी का फोन आ गया।

   समर उनसे बात कर ही रहा था कि आदित्य भी ऑफिस में चला आया। इस सारी प्रक्रिया में आदित्य ने भी समर का पूरा पूरा सहयोग किया था। वह हर जगह राजा के छोटे भाई की हैसियत से उस का साथ निभाता जा रहा था।
   राजा को उसने एक पल को भी अकेला नहीं छोड़ा था। आज तक जहां समर और प्रेम राजा के दाएं और बाएं हाथ थे अब आदित्य भी उनकी टीम में शामिल हो गया था।
    अब धीरे-धीरे महल आदित्य को भी अपनाने लग गया था। युवराज भैया, रूपा, जया, जय, विराट यह सभी लोग जहां आदित्य को पूरी तरह दिल खोलकर अपना चुके थे, वही पिंकी आज भी आदित्य से कुछ हद तक नाराज ही लगा करती  थी।
     राजा के बेटे यश के कार्यक्रम में शामिल होने आई पिंकी को उसकी मां ने कुछ समय के लिए महल में ही रोक लिया था।
    पिंकी और उसके बेटे के रुकने से पिंकी की मां को भी सहारा हो जाता था। अपनी जेठानी की मौत के बाद से वह कुछ ज्यादा ही डूबा हुआ सा महसूस करने लगी थी। आदित्य के बारे में पता चलने के बाद उनकी जो थोड़ी बहुत बातचीत अपने पति से हुआ करती थी, वह भी पूरी तरह से बंद हो चुकी थी। बल्कि अभी पिछले कुछ समय से उन्होंने हरिद्वार जाकर रहने का मन बना लिया था लेकिन पिंकी और राजा ने उन्हें किसी तरह रोक लिया।

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   आजकल उनकी तबीयत भी कुछ ऊपर नीचे ही रहा करती थी।
   उन्हीं के बारे में सोचते विचारते आदित्य समर के ऑफिस में प्रवेश कर गया। समर को चिंतित सा फोन में बात करता देख आदित्य भी उसके सामने बैठ गया।

“क्या हुआ समर कोई चिंता की बात है?”

“हां! ऐसा ही कुछ समझ लो।”

“हुआ क्या? चुनाव के नतीजे तो कल घोषित होने वाले हैं! और जहां तक मुझे लगता है राजा भैया और उनके सारे लोग जितने ही वाले हैं।”

“जितने ही वाले हैं कि बात नहीं आदित्य।। यह सभी लोग जीत चुके हैं।”

” ये तो बड़ी अच्छी बात है। फिर किस बात की चिंता में इतना विचार मगन बैठे हो।”

“इसी बात की चिंता है ! मैं नहीं चाहता था कि यह सारे लोग एक साथ जीते।”

“यह क्या कह रहे हो समर? होश में तो हो?”

“मेरा कहने का यह मतलब है, कि मैं नहीं चाहता था कि विराज भी जीते! लेकिन हुकुम का प्रभाव ही ऐसा है, कि उनके आस पास खड़ा हर व्यक्ति उनके प्रभाव के कारण हर जगह सफल हो ही जाता है।
   विराज अपने बलबूते तो कभी यह चुनाव नहीं जीत सकता था लेकिन लोगों ने  उसे हुकुम की टीम है यह मानकर विराज को भी जिता दिया और वह भी भारी बहुमत से।”

“मेरे ख्याल से तो यह खुश होने की बात है।”

“खुश होने की बात होती आदित्य अगर विराज हमारे सब के लिए लॉयल होता।”

“मतलब विराज आज हमारे लिए लॉयल नहीं है।”

“नहीं बिल्कुल भी नही। बात दरअसल यह है की हुकुम और उनके आदमी इतनी ज्यादा संख्या में नहीं थे कि सरकार बना सकें, लेकिन हुकुम और उनके सारे लोग अपने अपने जगह से चुनाव जीत चुके हैं। अब अगर हमें सरकार में शामिल होना है, तो हुकुम को अपने सारे जीते हुए विधायकों के साथ सरकार से हाथ मिलाना होगा यानी पक्ष या विपक्ष से हाथ मिलाना होगा।
   मैं खुद अब तक यही सोच रहा था की किसी एक पार्टी से तो हमें हाथ मिलाना ही पड़ेगा तो जिस पार्टी से हाथ मिला कर हमें अधिक लाभ हो उसी पार्टी से मैं चाहता था कि हुकुम हाथ मिला ले।
    मैं उस पार्टी के सामने यही शर्त रखने वाला था कि भले ही कम सदस्यों के कारण हुकुम अपनी सरकार नहीं बना सकते लेकिन जैसे चुनाव के नतीजे घोषित हुए हैं उससे यही साबित होता है कि जनता हुकुम को अपने मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है तो हम हुकुम को मुख्यमंत्री के पद पर देखने की शर्त पर ही अपने सारे विधायक किसी भी एक पार्टी को देते। हम उसी पार्टी की तरफ जाते जो हुकुम को मुख्यमंत्री का पद देगी।”

“पर यह तो बहुत बड़ी शर्त हो जाती ।  इस बात के  लिए तो वो लोग शायद ही तैयार हों।”

“देखो हमेशा यह होता है, कि जीती हुई पार्टी ही सरकार बनाती है !अभी हुकुम की पार्टी के अलावा बाकी दोनों बड़ी पार्टीयों में बहुत ज्यादा संख्याओं का अंतर नहीं है हुकुम जिस पार्टी की तरफ जाएंगे वही पार्टी सरकार बनाएगी तो ऐसे में हुकुम का पद बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।
   वैसे मुख्यमंत्री पद तो जीतने वाली पार्टी से ही चुना जाता है और हमारे विधायक सिर्फ उनकी पार्टी की संख्या बढ़ाने वाले विधायक ही कहलाएंगे । लेकिन हमारे राजा साहब कोई ऐसे साधारण व्यक्ति तो है नहीं। और न ही वह कोई साधारण विधायक हैं।  उनके साथ जनता का बेशुमार प्यार है।
    बात ऐसी थी कि उनकी पार्टी नई पार्टी थी इसलिए उन्होंने कम जगह से लोगों को खड़ा किया। अगर बड़ी पार्टी के समान इतनी बड़ी संख्या में वो अपने लोगों को चुनाव लड़वा पाते और अपने लोगों को खड़े कर पाते तो बेशक भारी बहुमत के साथ हमारे हुकुम की निर्विवाद रूप से सरकार बनती और हमारे हुकुम बिना किसी शक शुबहें के मुख्यमंत्री होते।
       पार्टी और प्रत्याशी तो बहुत से खड़े हुए लेकिन अभी हमारे सामने जो दो मुख्य पार्टी खड़ी हैं उनमें से एक है राजदल  पार्टी और दूसरी है जन जागरण दल।
दोनों ही तरफ के नेताओं का लगातार मेरे पास फोन आ रहा है, कि मैं हुकुम की तरफ से सारे विधायकों को उनके सपोर्ट में भेज दूं। जिससे कि वह सरकार बना सके और मैंने अभी-अभी राजदल पार्टी से कह दिया है कि अगर वह हम से हाथ मिलाना चाहते हैं तो यह मेरी शर्त है कि हमारे राजा साहब ही मुख्यमंत्री बनेंगे।
    देखो जाहिर सी बात है कि जैसे ही हम किसी पार्टी से हाथ मिलाते हैं हम सारे मिलकर एक पार्टी बन जाएंगे और उस समय मुख्यमंत्री उस पूरी पार्टी में से किसी को भी चुना जा सकता है। इसलिए राजा साहब एक बार फिर निर्विवाद रूप से मुख्यमंत्री पद के दावेदार बन जाएंगे।”

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“क्या यह सारी बातें राजा भैया जानते हैं।”

“अब तक तो नहीं जानते।”

“हां मुझे भी यही लगा था। क्योंकि मुझे नहीं लगता राजा भैया किसी दूसरी पार्टी से हाथ मिलाने के लिए तैयार होंगे। उन्हें मुख्यमंत्री बनने का कोई लालच नहीं है। वह तो विधायक बन कर भी अपने क्षेत्र की सेवा कर ही लेंगे। भगवान ने चाहा तो अगले चुनाव तक उनकी पार्टी इतनी सक्षम हो जाएगी कि वह अपने बलबूते पर बिना किसी से हाथ मिलाए मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी कर सकते हैं।”

“तुम्हारी कहीं एक एक बात बिल्कुल सही है आदित्य। राजा साहब को जब मेरा यह प्लान पता चलेगा तो वह मुझ पर बहुत नाराज होंगे , लेकिन इसीलिए मैंने यह सोच रखा है कि यह सारी बातें उनसे युवराज भैया कहेंगे मैं नहीं। दूसरी बात राजनीति ऐसी काजल की कोठरी है जिसमें आप अंदर घुसकर बिल्कुल बेदाग बाहर नहीं आ सकते।
  राजा साहब फिर भी बेदाग हैं। उनके सारे दाग मैं अपने ऊपर लेने को तैयार हूं। लेकिन उनके राजनैतिक कैरियर के लिए फिलहाल किसी एक पार्टी से हाथ मिलाना बेहद जरूरी है।
   हां यह किया जा सकता है कि एक बार मुख्यमंत्री बनने के बाद राजा साहब अपने कार्यों से वैसे भी जनता का दिल इतना जीत ही लेंगे कि अगले 5 सालों में उनकी अपनी नई पार्टी बना कर वो अलग हो जाएं।”

“तुम्हें लगता है कि अगर राजा भैया एक बार किसी पार्टी से जुड़ गए तो कभी भी उस पार्टी को छोड़ेंगे?”

“नही छोड़ेंगे!,मैं जानता हूँ इस बात को। इसलिए ऐसी पार्टी से हुकुम को जुड़वाने की कोशिश में हूँ जो बाकी राजनैतिक पार्टियों से ठीक हो। बाकी तो हुकुम वो पारस हैं कि जिस पत्थर को छू ले वह सोना बन जाए! जाहिर है वो जिस पार्टी से जुड़ेंगे उस पार्टी को भी अपने मुताबिक बना ही लेंगे।”

“सही कह रहे हो समर! लेकिन अब भी मुझे इस बात पर यकीन करना मुश्किल लग रहा है कि राजा भैया अपनी पार्टी को किसी और पार्टी से मिला लेंगे।”

“कोशिश करने में क्या बुराई है आदित्य?”

“बिल्कुल कोशिश तो हम सब करेंगे ही। अभी यह बताओ कि मंत्री जी से बात करने के बाद तुम इतने चिंतित क्यों हो गए थे। और यह विराज की धोखा देने वाली क्या बात है?”

“मैं चाह रहा था कि राजा साहब राज दल पार्टी के साथ हाथ मिला लें। यह बात विराज को मालूम चल गई हैं। और अब वह जन जागरण दल से बातचीत करने में लगा हुआ है। तुम जानते ही हो कि राजा साहब के अलावा कुल 11 सीटों पर हमारे लोग खड़े हुए थे, यानी राजा साहब को मिलाकर हमारे पास कुल 12 विधायक हैं। इनमें से तीन लोग विराज के खास हैं। अगर विराज अपने उन तीन लोगों को लेकर जन जागरण दल की तरफ चला जाता है, तो हमारे विधायक कम हो जाएंगे और ऐसे में राज दल पार्टी के ऊपर प्रेशर बनाने में हमें समस्या खड़ी हो जाएगी।”

“यह तो बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर दी विराज ने! अगर वह अपने तीन लोगों को साथ लेकर जाता है, इसका मतलब हमारी पार्टी से कुल चार लोग कम हो जाएंगे और सिर्फ आठ लोग ही बचेंगे राज दल पार्टी से जुड़ने के लिए।”

“बिल्कुल सही समझे आदित्य! अब अगर सिर्फ आठ लोगों के साथ हम हाथ मिलातें हैं तो मेरा गणित वापस गलत हो जाएगा और मैं दबाव बनाने में असमर्थ हो जाऊंगा।

“तो अब क्या सोचा है आगे?”

“सोचा तो यही है कि आज विराज के उन तीन लोगों से जाकर मीटिंग करता हूं। पहले तो रुपए पैसे देकर ही उन्हें अपनी तरफ मिलाने की कोशिश करूंगा और अगर नहीं तैयार होते हैं तो…”

” तो उस सूरत में क्या करोगे?”

समर ने अपनी जेब से गन निकल कर सामने टेबल पर रख दी।

“उस सूरत में बस एक ही उपाय बचेगा मेरे पास।”

“यह क्या समर तुम लोगों को जान से मारने की धमकी दोगे।”

“देना ही पड़ेगा आदित्य और कोई चारा भी नहीं है! राजनीति रुपया या खून मांगती ही है। मेरे पास और कोई उपाय नहीं है अगर विराज के वह तीन विधायक हमारी तरफ आ गए तो फिर विराज अकेला कुछ नहीं कर पाएगा। मन मार कर ही सही उसे हमारी तरफ आना ही पड़ेगा। “

“सही कह रहे हो। “

“कौन सही कह रहा है और क्या सही कह रहा है आदित्य?”

आदित्य और समर अपनी बातों में लगे थी कि राजा और युवराज भी उस कमरे में चले आए। राजा के इस सवाल पर आदित्य मुस्कुराकर समर की ओर देखने लगा।

“आपके अलावा और कौन हर वक्त सही हो सकता है हुकुम?”

“यह तो गलत बात है समर ! हमारे अलावा एक और इंसान है, जो हर वक्त सच्चाई और ईमानदारी पर अडिग खड़ा रहता है। और वह है हमारे बड़े भाई युवराज सा।”

“जी सही कहा हुकुम! इन की तो बात ही निराली !है आप लोगों के लिए चाय या कॉफी कुछ मंगवाया जाए।”

“हां मंगवा लो! उसके बाद जरा रियासत के दौरे पर जाना है। “
   राजा के ऐसा कहते ही समर ने बैल बजा कर बाहर खड़े सहायक को अंदर बुला कर कॉफी के लिए कह दिया।
    राजा इस वक्त रियासत के दौरे पर निकलने वाला है यह सुनकर समर के चेहरे पर मुस्कान खिल गई… क्योंकि उसे युवराज से बात करने के लिए वैसे भी एकांत चाहिए था।

   सबके साथ कॉफी पीने के बाद राजा प्रेम के साथ रियासत के दौरे पर निकल गया! उसने जाती बेला आदित्य से भी पूछा, आदित्य उनके साथ जाने को तैयार था, लेकिन निकलते वक्त अचानक उसका पैर हल्का सा मुड़ा और मोच खा गया। जिसके कारण वह वही बैठ गया। उसकी हालत देख राजा ने उसे आराम करने की सलाह दी और प्रेम के साथ बाहर निकल गया।
     समर युवराज से क्या बातें करना चाहता है यह आदित्य जान ही चुका था इसीलिए उन दोनों को कमरे में छोड़ वह भी बाहर निकल गया । समर ने उसके जाते ही अपने ऑफिस के बाहर खड़े सहायक से कह दिया कि किसी भी हाल में अगले दो घंटे तक वह उसे और युवराज को डिस्टर्ब ना करें।

    आदित्य अपने कमरे की तरफ जा रहा था कि उसे पिंकी की माँ के कमरे से कुछ अजीब सी आवाज़ें सुनाई पड़ीं।
  उसे एकाएक समझ नही आया कि हुआ क्या है?और ये आवाज़ कैसी आ रही है?
    उसे एकाएक अंदर जाने में भी संकोच सा लग रहा था। झिझकते हुए उसने दरवाज़े पर दस्तक दी लेकिन अंदर से कोई जवाब नही आया। उसने दो तीन बार दस्तक देने के बाद उसने आवाज़ लगा दी, लेकिन जब अंदर से कोई आवाज़ नही आई तब वो दरवाज़े को हल्का सा धक्का दिए भीतर चला गया।
    आश्चर्य की बात ये थी कि कमरे में अंदर कोई नही था,एक नौकर तक नही।
   आदित्य ने बाथरूम का दरवाजा खटकाना चाहा वो खुला हुआ ही था। उसने धीरे से झाँक कर देखा अंदर कोई नही था।
   उसे अब वो आवाज़ बड़ी करीब से सुनाई दे रही थी, जैसे कोई रोते हुए हिचकियाँ ले रहा हो। आवाज़ की दिशा में उसने आगे बढ़ना शुरू किया तो आवाज़ और साफ सुनाई पड़ने लगी।
    आवाज़ बालकनी की तरफ से आ रही थी।

   वो धीरे से बालकनी में पहुंच गया। उसने देखा बालकनी की एक तरफ बनी मेहराब पर जाने कैसे पिंकी का बेटा चढ़ गया था, और अब वहां की जालीदार लकड़ियों पर खुद को संभालने की कोशिश में सिसक रहा था।
   आदित्य ने उसे देखने के बाद एक बार नीचे झाँक कर देखा और उसका सिर घूम गया। कमरा तो पांचवी मंज़िल पर ही था लेकिन आदित्य को अलटोफोबिया था यानी उसे ऊंचाई से डर लगता था। डर भी कोई सामान्य डर नही बेहद घबराहट और रक्तचाप बढ़ा देने वाला डर।
     उसे इतनी ऊंचाई पर चक्कर से आने लगते थे। उसने अपनी आंखें एक पल को बंद की और एक गहरी सांस भरी।
   आंखें खोल कर वो बिना दुबारा नीचे देखे बच्चे की तरफ बढ़ने लगा बच्चा उसे देखकर घबराहट में कहीं अपना संतुलन ना बिगाड़ बैठे इसलिए आदित्य एकदम शांति से बिना कोई शोर किए उस कंगूरे तक पहुंच गया।  बहुत धीमे से उसने बिना आवाज किए पास रखे मोढ़े को कंगूरे तक रखा और उस  पर चढ़ गया।  धीरे से अपना एक पैर बालकनी के किनारे बनी रेलिंग पर रख वह उस रेलिंग पर कंगूरे को पकड़कर चड गया। अब उसका एक हाथ बच्चे तक आसानी से पहुंच पा रहा था। अपने दूसरे हाथ से कंगूरे को पकड़े हुए उसने एक हाथ से बच्चे को धीमे से अपनी गोद में उठाना चाहा। बच्चा आदित्य को देख कर और जोर से रोने लगा। आदित्य ने बहुत कोमलता से उसका जाली में फंसा पैर बाहर निकाला और एक हाथ से ही बच्चे को गोद में लेकर अपनी तरफ खींच लिया।  इस झटके में एक बार उसका खुद का संतुलन बहुत बुरी तरह से बिगड़ गया लेकिन उसने दूसरे हाथ से कंगूरे को इतनी जोर से थाम रखा था कि वह गिरने से बाल-बाल बच गया। अगर इस वक्त आदित्य वहां से गिरा होता तो वह पांचवीं मंजिल से सीधे महल की पथरीली जमीन पर गिरता।
भगवान का शुक्र मनाते आदित्य ने बच्चे को कस कर पकड़ा और वापस मोढ़े की सहायता से बालकनी में उतर गया।
   
     आदित्य जिस वक्त बालकनी में आया था उसी वक्त काकी साहब की सहायिका उस कक्ष में कुछ सामान रखने आई थी। उसने आदित्य को बालकनी की तरफ जाते देखा तो आदित्य को क्या चाहिए यह पूछने वह भी उसके पीछे-पीछे बालकनी तक चली आई और जैसे ही उसने बच्चे को कंगूरे पर लटके देखा वह तुरंत भाग कर बगल वाले कक्ष में बैठी पिंकी और काकी साहब को बताने चली गई थी।
   
आदित्य जैसे ही बच्चे को लेकर बालकनी के फर्श पर बैठा उतने में ही एक किनारे सांस रोके खड़ी पिंकी आदित्य तक चली आई और रोते-रोते उसने अपने बच्चे को आदित्य की गोद से ले लिया।
    पिंकी के पीछे काकी साहब भी आदित्य तक चली आई।  उसके बालों में हाथ फेर कर उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया और उसके सामने अपने दोनों हाथ जोड़ दिये।
    वह उनके हाथ थाम कर सिर हिला कर उन्हें मना करने की कोशिश में था कि उसकी आंखें बंद हुई और वह बेहोश होकर वहीं गिर पड़ा।
     घबराई हुई पिंकी ने तुरंत पास खड़ी सहायिका से पानी का गिलास मंगवाया और उसे डॉक्टर को इत्तिला करने के लिए भेज दिया। काकी साहब ने आदित्य का सिर अपनी गोद पर रख लिया। आदित्य के माथे पर पसीने की बूंदें छलक आई थी । पिंकी ने ग्लास से पानी निकालकर आदित्य के चेहरे पर छींटना शुरू किया। कुछ देर में ही सहायिका ने दो और सहायकों को बुला लिया। जिन लोगों की सहायता से काकी साहेब ने आदित्य को अंदर कमरे में ले जाकर अपने पलंग पर लेटा दिया । कुछ देर में ही डॉक्टर साहब भी चले आए। आदित्य की जांच करने के बाद उन्होंने एक गोली उसकी जीभ के नीचे रख दी और काकी साहब और बाकी लोगों की तरफ मुड़ गए।
    पिंकी के पिता भी इतनी देर में आकर पीछे हाथ बांधे खड़े हो गए थे

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“अरे ये तो दिल्ली वाले आदित्य सिंह है ना। मैं जानता हूँ इन्हें। मुझे लगता है शायद स्ट्रेस के कारण इनका बीपी बहुत ज्यादा बढ़ गया है। बीपी कम करने के लिए फिलहाल मैंने एक गोली इन्हें  खिला दी है। जैसे ही स्ट्रेस थोड़ा कम होता है इन्हें होश आ जाएगा। बेहोश हो जाने का फिलहाल यही एक कारण मुझे समझ में आ रहा है। मैं यह कुछ दवाइयां लिख कर दिए जा रहा हूं, इनके होश में आने के बाद आप इन्हें   खिला दीजिएगा और कल एक बार इन्हें मेरी क्लीनिक पर भेज दीजिएगा मैं एक बार फिर से सारी जांच कर लूंगा।”

पिंकी डॉक्टर साहब के सामने हाथ जोड़ें अनुनय करने लगी …-“डॉक्टर साहब कोई घबराने की बात तो नहीं है।”

“अरे नहीं बिल्कुल घबराने की बात नही है। असल में आदित्य जी अलटोफोबिक हैं। इन्हें ऊंचाई से डर लगता है, लेकिन जब इन्होंने बच्चे को कंगूरे पर फंसा देखा तो अपने डर को एक तरफ कर यह बच्चे को बचाने के लिए जुट गए और बस उसी सब में इन्होंने इतना ज्यादा स्ट्रेस ले लिया कि इनका बीपी एकदम से शूट कर गया। बच्चे को बचाने के बाद यह अपने उसी बढ़े हुए बीपी के कारण बेहोश होकर गिर गए। “

   डॉक्टर की बातें सुन पिंकी आश्चर्य से सामने लेटे आदित्य को देखने लगी। उसे यकीन नहीं आ रहा था कि जिस आदमी से वह सिर्फ इस वजह से नफरत किया करती थी कि वह उसके पिता की ही अवैध संतान है, वही लड़का अपनी जान की परवाह किए बिना अपने डर को एक तरफ रख उसके बच्चे को बचाने के लिए जी जान से जुट गया । अगर कहीं डर के कारण वह अपना संतुलन खो कर जमीन पर गिर जाता तो उसकी जान भी जा सकती थी। लेकिन उसके बेटे को बचाने के लिए आदित्य ने अपनी जान की भी परवाह नहीं की।
      और वह आदित्य की कोई गलती ना होने पर भी बिना वजह उसे सजा दिए जा रही थी। क्या आदित्य वाकई उसके भाई होने का हक नहीं रखता?
   क्या आदित्य महल का उत्तराधिकारी होने का हक नहीं रखता?
    और यह सब सोचने और तय करने वाली वह खुद होती कौन है? एक तरह से देखा जाए तो आदित्य उसके पिता की पहली पत्नी की संतान है इस हिसाब से वह अवैध कैसे हुआ?
   सिर्फ सोचने का ही तो फर्क है। आखिर उसके बड़े पिता साहेब ने भी दो-दो शादियां की। क्या राजा भैया और युवराज भाई साहब ने विराज और विराट को नहीं अपनाया?
   युवराज भाई साहब ने तो आज तक विराज विराट और राजा भैया में कोई अंतर ही नहीं किया और यही हाल राजा भैया का भी है। तो उन दोनों भाइयों के संरक्षण में पली वह खुद कैसे इतनी कठोर ह्रदय हो गई?
   पिंकी को अपने आप पर बहुत ज्यादा शर्मिंदगी महसूस होने लगी। उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह चली! पिंकी की मां ने आकर उसे प्यार से अपनी बाहों में समेट लिया…-” मत रोइये बेबी! आपके भाई को कुछ नहीं होगा।”
अपनी मां के मुंह से आदित्य के लिए यह संबोधन सुन वह अपनी मां के गले से लग गई। मां और बेटी दोनों ही एक साथ जी भर कर रो लेना चाहती थी।  उन दोनों को रोते देख पिंकी के पिता भी उनके पास आकर बैठ गये। पिंकी की मां ने पिंकी को शांत करवाने के बाद उसके पिता के हाथों पर अपना हाथ रख दिया….-” आप चिंता मत करिए! आदित्य को कुछ नहीं होगा! हम हमारे बेटे को कुछ भी नहीं होने देंगे।”

    पिंकी के पिता की आंखों में खुशी की दो बूंदें छलक आई। कुछ देर में ही आदित्य को होश आ गया। उसने आंखें खोली, सामने पिंकी बैठी थी। पिंकी को देखते ही उसे उसके बच्चे का ध्यान आया और उसने तुरंत आसपास नजरें दौड़ानी शुरू की। तभी पिंकी की मां ने आगे बढ़कर आदित्य के सर पर हाथ रख दिया। उसके माथे पर हाथ फेरते हुए वह प्यार से कहने लगी…-“घबराइए मत आदित्य। आपका भांजा बिल्कुल सही सलामत है ।”
  पिंकी ने सहायिका की तरफ इशारा किया। सहायिका उसके बेटे को गोद में लिए उस तक चली आई । पिंकी ने अपने बेटे को अपनी गोद में बैठाया और आदित्य की तरह उसका चेहरा कर दिया…-” बेटा मामा जी को नमस्ते करो!”
    पिंकी के मुंह से अपने लिए ऐसा प्यार भरा संबोधन सुनकर आदित्य का भी दिल भर आया। धीरे से उठकर आदित्य तकिए का सहारा लिए पलंग पर टिक कर बैठ गया। उसके आसपास उसकी बहन पिंकी , उसकी माँ और उसके पिता खड़े थे। और इन सब के पीछे अदृश्य रूप से खड़े मुस्कुरा रहे  थे राजा अजातशत्रु सिंह!! जो आदित्य को उसका हक दिलवाने के लिए इस महल में लेकर आए थे। आज उनका वह सपना सही अर्थों में पूरा हो रहा था।
आदित्य के पिता ने सामने बढ़कर आदित्य को गले से लगा लिया…-” हमें  हमारी हर गलती के लिए माफ कर दो बेटा और पूरी तरह से वापस लौट आओ।”
  काकी साहब ने भी अपने पति की हां में हां मिलाई…-” आदित्य बेटा! आज तक हमें कभी बेटे की कमी महसूस नहीं हुई, क्योंकि पिंकी के साथ ही युवराज, कुमार,  विराज विराट सभी हमें भी छोटी मां का दर्जा ही देते आए हैं। लेकिन आज तुम्हें पाकर हमारा वह स्थान और थोड़ा ऊंचा हो गया है। तुम पिंकी के बड़े भाई थे, और सदा रहोगे। अब इस महल से वापस लौटने की कभी सोचना भी मत।”

  पिंकी का बेटा आदित्य की गोद में जाने के लिए  मचलने लगा। आदित्य ने प्यार से हाथ बढ़ाकर उसे गोद में ले लिया।

“आदित्य भैया संभल कर यह बहुत शैतान है! आपको परेशान कर देगा।”

पिंकी के मुंह से खुद के लिए भैया शब्द सुन आदित्य मुस्कुराने लगा बच्चे को गोद में लिए ही वो बाहर निकल गया।
   उसका दिल इस वक्त मिली खुशियों से ऐसा भर आया था कि कहीं उसकी आंखें छलक ना आए, इसी डर से वहां बैठे सब लोगों को छोड़ यह खुशखबरी फोन पर राजा अजातशत्रु को सुनाने ही वहां से बाहर निकल गया…..

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क्रमशः

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aparna …….


जीवनसाथी -119

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  जीवनसाथी – 119

    
     सगाई निपट चुकी थी सभी लोग इधर-उधर घूमते हुए आपस में बातें करते खाते-पीते मसरूफ थे, और समर और पिया बाकी लोगों से अलग एक दूसरे में खोए हुए एक किनारे बैठे थे।

“अब बताइए डॉक्टर साहिबा! यह किस का आईडिया था?”
“अब यह भी आपको बताना पड़ेगा! अब भी आप समझ नहीं पाए कि यह सारा किस का आईडिया हो सकता है?”
“रानी साहिबा का!”
“जी हां! बिल्कुल! असल में रानी साहिबा अपने रूटीन चेकअप के लिए जिस दिन मेरी ओपीडी में आई, उसी वक्त मेरी मम्मा मुझे सरप्राइस देने मौसी और बाकी रिश्तेदारों के साथ सीधे अस्पताल में ही धमक पड़ी! मम्मी ने अनजाने ही रानी साहेब के सामने मेरी सगाई की बात बोल दी। वह सुनते ही रानी साहब का दिमाग ठनका, और उन्होंने मुझे सगाई की बधाई दे दी । लेकिन जाते-जाते यह भी बता गयीं कि तुम इस शहर में नहीं हो। बल्कि राजा साहब का केस लड़ने दून गए हुए हो । बस उस एक वाक्य से ही मेरी सारी गलतफहमी दूर हो गई । अब आगे क्या करूं क्या ना करूं यही सोच रही थी। क्योंकि मैं खुद ही अपने बनाए जाल में फंस चुकी थी। लड़का और उसके घर वाले पहले ही यहां मौजूद थे। सगाई से बचने का जब कोई उपाय नहीं दिखा तो मैंने खुद उस लड़के से मिलकर उसे सारी सच्चाई बता दी एंड रेस्ट इज हिस्ट्री।”
“मुझे लगा ही था कि यह सब रानी साहब का ही कारनामा है। “
“वह तो भला हो रानी साहेब का। जुग जुग जिए वो। उनके कारण कम से कम तुमने इजहार तो किया वरना मैं वाकई सगाई करके चली जाती और तुम हाथ मलते रह जाते। “
“ओ मैडम! ऐसा भी नहीं है , लड़कियों की कोई कमी नहीं है हमारे लिए। “
“मालूम है मालूम है! अच्छे से जानती हूं।”
दोनों एक दूसरे से बातें करते एक दूसरे की बाहें थामे भवन के बाहर बगीचे में टहलते हुए जरा दूर तक निकल आए। दोनों आगे बढ़ते जा रहे थे कि सामने से एक गाड़ी आकर अचानक रुकी। गाड़ी का दरवाजा खुला और उसमें से रेवन बाहर निकल आई।

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      रेवन ने समर को देखा और समर ने रेवन को।
  मुस्कुराती  रेवन समर की ओर आगे बढ़ने लगी उसे आगे बढ़ते देख मुस्कुराते हुए समर भी आगे बढ़ गया और अनजाने ही उसके हाथों  में थमा पिया का हाथ उससे छूट गया।
   रेवन आगे बढ़ कर उसके गले से लग गयी…- हाय हॉटी हॉउ आर यू?”
   इतने दिनों बाद अचानक रेवन को सामने देख समर की भी खुशी का ठिकाना नहीं था। दोनों एक दूसरे का हालचाल लेने में पास खड़ी पिया को कुछ देर के लिए भूल कर ही रह गए। कुछ देर बाद पिया खुद उन दोनों के पास चली आई। समर ने पिया को देखते ही रेवन से मिलवाया।
  “ओह्ह !सो शी इज योर फियांसी?”
  समर ने हां में  सिर हिला कर पिया के कंधों पर हाथ रख कर उसे अपने से सटा लिया। रेवन और समर एक बार फिर अपनी बातों में डूब गए और पिया वहां खड़ी होने के बावजूद उनके बीच से गायब सी हो गई।

*****

     रेवन का थीसिस का काम पूरा हो चुका था और उसी के फाइनल सबमिशन के लिए वह यहां वापस आई थी।
   उसने आने से पहले समर को अपने आने के बारे में बताया था और समर ने ही उसे अपने शहर बुला लिया था।
   लेकिन समर को खुद अपनी सगाई के बारे में मालूम नहीं था । जब वो वहां सगाई के बाद पिया के साथ बैठा था तभी रेवन का मैसेज आया कि वह इस वक्त कहां है? और समर ने उस बात को अधिक गंभीरता से लिए बिना सीधे रेवन को अपना पता ठिकाना भेज दिया और रेवन उसी वक्त वहाँ उससे मिलने पहुंच गई।
   समर के लिए ये एक सामान्य सी बात थी लेकिन पिया के लिए ये उतनी भी सामान्य बात नही रह गयी थी।

******

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   दिन बीतते वक्त नही लगता। देखते ही देखते राजा और बाँसुरी के राजकुमार को पैदा हुए बारह दिन बीत भी गए।
    बारहवें दिन पर महल की प्रथानुसार बच्चे को सूर्यदर्शन करवा कर नाम रखा गया…
  नाम क्या रखना है इसी सिलसिले में पिछले बारह दिन से बाँसुरी और राजा की बातचीत चल रही थी। बाँसुरी को कोई नाम पसन्द ही नही आ रहा था।  और राजा बाँसुरी की तरह फैंसी नाम सोच ही नही पा रहा था। आखिर पूजा वाले दिन बच्चे को पूजा सम्पन्न करने के बाद घर से बाहर ले जाया गया और उसके बड़े पिता यानी युवराज ने उसे गोद में लेकर उसके कान में धीरे से रूपा द्वारा उसके लिए चुना गया नाम उसे बता दिया ….” राजकुमार शौर्य सिंह”! क्यों कुमार ठीक है ना?”
राजा मुस्कुरा उठा…-“जी भैया , मैं इसमें कुछ और जोड़ना चाहता हूँ। इसका नाम होगा ‘शौर्य प्रताप सिंह’
क्यों प्रेम ठीक है? “
   प्रेम ने मुस्कुरा कर अपने दोनों हाथ जोड़ दिए। पिंकी ने आगे बढ़ कर अपने प्यारे से भतीजे को गोद में ले लिया…-” बिल्कुल अपने पापा जैसे ही बनना मेरे लाडेसर! तुम्हें तुम्हारी फुई की उम्र लग जाये। ” पास रखे कजरौटा से काजल निकाल कर उसकी आँखों में आंज पिंकी ने बुआ का नेग पूरा किया और बांसुरी ने रूपा के हाथ से लेकर एक नवलखा हार पिंकी के गले में डाल दिया।
   बच्चे को आशीर्वाद देने सभी उस पर अक्षत बरसाने लगे।
      शाम में बच्चे के आने की खुशी में लंबा चौड़ा कार्यक्रम था। बाकी लोग उन्हीं तैयारियों में लगे थे और घर की बुज़ुर्ग महिलाएं सोहर गाने वालों को बुलवाए शगुन के गीत सुन रही थीं।
         रूपा और जया बाकी सारी तैयारियों में लगीं थीं, पिंकी ने बांसुरी को उसके कमरे में भेज दिया।
        बाँसुरी की रात से नींद पूरी नही हुई थी। रात भर उसका नन्हा उसे जगाए रखता था। और सुबह से पूजा पाठ के कारण भी उसे आराम नही मिल पाया था। वैसे तो राजमहल में नौकरों की कमी नही थी, लेकिन उसकी ताई ने उसे छोटे बच्चे को हर किसी के हाथ में न सौंपने की ताकीद कर रखी थी।  फिर उसका खुद का भी माँ का दिल था,ऐसे कैसे किसी के भी पास छोड़ कर आराम कर लेती , आज बच्चा कुछ ज्यादा ही  रो भी रहा था।
   उसे गोद में लिए इधर से उधर चलती वो कुछ गाकर उसे चुप कराने की कोशिश में थी कि राजा भी कमरे में चला आया।
   राजा की तरफ देखे बिना ही वो राजकुंवर को चुप कराती रही…-“क्या बात है हुकुम? कुछ नाराज़ हो क्या? “
  राजा की बात सुनते ही उसकी आँखों में आँसू आ गए…-“अरे ये क्या? इसमें  रोने की क्या बात है? हुआ क्या बताओ तो सही।”


  बाँसुरी क्या बताती? जब उसे कुछ खुद समझ आ पाता तब तो वो राजा से कुछ कहती। सब कुछ तो अच्छा ही हो रहा था बिल्कुल किसी सपने के पूरे होने जैसा…
   मनभावन पति, खुशहाल परिवार, स्वस्थ और सुंदर बच्चा! किसी भी औरत के जीवन में इस से इतर और क्या चाहिए। यहाँ तक कि वो तो खुद अपने पैरों पर भी खड़ी थी। एक राजपरिवार की बहू होते हुए भी उसका खुद का आत्मसम्मान था और अपने पूरे वजूद के साथ वो वहाँ की जिलाधीश थी। बावजूद उसके आंसूओं की धार रुकने का नाम नही ले रही थी कि राजा ने तुरंत जाकर उसकी गोद से बच्चे को अपनी गोद में लिया और बाँसुरी को पानी का गिलास पकड़ा दिया।
   पानी पीकर उसे थोड़ी राहत मिली तो वो हाथ मुहँ धोने चली गयी।
   उसी बात का फायदा उठा कर राजा ने तुरंत पिया को फोन लगा लिया।
      बांसुरी से जुड़ी सारी बातें उसे बता कर राजा परेशान हो उठा…-“,वो कुछ कह भी नही रही बस रोये जा रही है पिया। क्या करूं?”
” आपको बिल्कुल भी घबराने की ज़रूरत नही है राजा साहेब! ऐसा होता है। इसे पोस्टपार्टम डिप्रेशन कहा जाता है।
  ये लगभग अस्सी से नब्बे फीसदी औरतों में होता है। असल में इस वक्त शरीर में हार्मोनल लेवल इतना ऊपर नीचे होता है कि औरतें बेहद भावुक हो जातीं हैं। शरीर में इतने बदलाव के साथ ही न ठीक से खाना हो पाता है और न नींद इसलिए बहुत सी औरतो में  चिड़चिड़ापन भी आ जाता है। पर ये कोई बहुत घबराने की बात नही है। ये समस्या क्षणिक होती है। इसे मूड स्विंग भी कहा जाता है। पल में नाराज़ पल में खुश।
   अभी देखिएगा वो कुछ थोड़ा बहुत खा पी लेंगी तो बिल्कुल ठीक महसूस करने लगेंगी। हो सकता है उनकी नींद पूरी न हुई हो, तो अगर दस मिनट की भी झपकी लेंगी तो फ्रेश लगेगा उन्हें । इस वक्त उन्हें आपके प्यार और सपोर्ट की बहुत जरूरत है। हो सकता है वो आप पर नाराज़ भी हो बैठें। पर आपको थोड़ा धैर्य से काम लेना पड़ेगा।”
  दरवाजे पर खटका होते ही राजा ने” ठीक है मैं सब समझ गया!” कह कर फोन रख दिया। बांसुरी के बाहर आते ही उसने बांसुरी को अपने पास बुला लिया।
बांसुरी बैठना नहीं चाह रही थी। उसे हड़बड़ी थी, ढेर सारे काम निपटाने थे। लेकिन राजा ने उसे अपने पास बैठा कर उसका सर अपनी गोद में रख लिया। बच्चे को वह पहले ही बिस्तर पर लेटा चुका था।
” क्या कहना चाह रहे हैं आप ? अभी मैं बिल्कुल नहीं बैठूंगी! वक्त नहीं है शाम की पार्टी के लिए तैयार भी होना है।”
“मेरी हुकुम को तैयार होने की कोई खास जरूरत नहीं है ! सिर्फ 10 मिनट में तुम पार्टी के लिए रेडी हो जाऊंगी मेरे पास आओ तो सही।”
बड़े इसरार से राजा ने उसे अपने पास बैठा लिया और धीरे से उसके सिर को पकड़ कर अपनी गोद में रख लिया। उसके बालों में हाथ फिराते वो इधर उधर की बातें करता रहा। मुश्किल से दो मिनट में बांसुरी मीठी नींद में खो गई।
  राजा उसे देख कर मुस्कुरा उठा।
यह औरतें भी ना, इन्हें मालूम होता है कि इन्हें क्या समस्या है। और उसका समाधान क्या है। लेकिन समस्या का समाधान करने की जगह यह सिर्फ नाराजगी व्यक्त करतीं हैं।
  बांसुरी इतनी मीठी नींद में सो रही थी कि उसका सिर उठाकर नीचे रखने का राजा को मन नहीं किया।
उसने वहीं बैठे बैठे समर को फोन लगा लिया और अगले हफ्ते होने वाले चुनावों की तैयारियों का जायजा लेने लगा।
    घंटे भर बाद बांसुरी की आंख खुली, और वो एकदम चौक कर हड़बड़ा कर उठ बैठी…-” अरे आपने मुझे जगाया क्यों नहीं? मैं सो क्यों गई ? मुझे तैयार होना था।”
“जानबूझकर नहीं जगाया! तुम्हारी नींद ही नहीं पूरी हो रही है। तुम्हें भी तो जरूरत है, अपना ख्याल रखने की। ऐसे ही चलता रहा तो बीमार पड़ जाओगी।”
“जी !  दुनिया की हर मां अपने बच्चे के लिए अपनी नींदे गंवाती ही है, लेकिन कोई बीमार नहीं पड़ती।”
“सही कह रही हो तुम । इसीलिए तो मां का दर्जा सबसे ऊपर है। अब वह सब छोड़ो, अब बातों में वक्त जाया मत करो। हाथ मुहँ धो कर फटाफट तैयार हो जाओ। तुम्हारी ब्यूटीशियन दो बार आकर दरवाजे से वापस लौट चुकी है।”
“मुझे बहुत देर हो जाएगी रूपा भाभी जया भाभी सब लोग तैयार हो गए होंगे।”
“अभी कोई भी तैयार नहीं हुआ! सब हो रहे हैं ।और तुम तो रानी साहेब हो। तुम्हें इतना हड़बड़ाने की कोई जरूरत नहीं ।कार्यक्रम आठ  से है, हम आराम से पहुंच जाएंगे ।”
“आपके पैरों में दर्द नहीं हुआ, मैं लगभग घन्टे भर से आपके पैरों में सर रख के सो रही थी।”
“तुम्हारे पास रहने से कभी मुझे दर्द हो सकता है भला?”
      राजा मुस्कुराकर अपने काम से बाहर निकल गया। उसके जाते ही बांसुरी की ब्यूटीशियन अंदर आ गई। बांसुरी मुस्कुराते हुए पार्टी के लिए तैयार होने लगी।

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   राज महल का कार्यक्रम शुरु हो चुका था । नए राजकुंवर की अगुवाई में सारा महल रोशनी से जगमग आ रहा था ढेर सारे अतिथियों के साथ राज महल के लोग मिलते जुलते सबकी बधाइयां और आशीर्वाद ग्रहण करते खुश नजर आ रहे थे।
   बांसुरी के चेहरे की चमक आज कुछ अलग ही कहानी कह रही थी। राजा हमेशा की तरह भले ही बांसुरी से दूर खड़ा था और दूसरों से बातचीत में लगा था लेकिन बीच-बीच में उसका ध्यान बांसुरी पर चला ही जाता था । वह इधर उधर से किसी भी तरीके से समय निकालकर बांसुरी के पास पहुंचकर उसका हालचाल ले लिया करता। कभी किसी वेटर के हाथों उसके लिए कुछ खाने की चीज भेजता या फिर कभी कोई जूस भेज देता। बांसुरी दूर से ही उसे देखकर मीठी सी झिड़की से उसे नवाज़ जाती।
     दूर बैठी पिया बांसुरी और राजा को देख-देख कर मुस्कुरा रही थी। तभी समर हाथ में दो गिलास थामे वहां चला आया। एक गिलास पिया के सामने रखते हुए वहीं उसके पास कुर्सी खींच कर बैठ गया…-” क्या बात है बहुत मुस्कुरा रही हो?”
“आपकी राजा साहेब और रानी बांसुरी की जोड़ी एकदम परफेक्ट है। वो कहते हैं ना मेड फॉर ईच अदर वही कपल हैं। !”
“कह तो सही रही हो! वैसे हमारा भी ऐसा ही कुछ कपल बनने वाला है।”
“वह तो वक्त ही बताएगा! वैसे आप राजा साहिब जितने सीधे सच्चे नहीं लगते मुझे।”
“क्यों भाई अब मुझ में क्या खराबी दिख गई तुम्हें? देखो मेरा जो भी पास्ट था, मैंने सब कुछ पूरी सच्चाई से तुम्हारे सामने रख दिया था उसके बाद तुमने निर्णय लिया है।”
“हां ! तो मैं कहां कुछ कह रही हूं आपके पास्ट के लिए। बल्कि मैं ऐसा कहने वाली कोई होती भी नहीं! क्योंकि मेरा खुद का भी एक खूबसूरत पास्ट था।”

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    समर की ड्रिंक उसके हाथों से छलकती जरा सी नीचे गिर गई ।वह चौक कर पिया की तरफ देखने लगा   ” क्या कहा तुमने?”
“यही कि मेरा भी एक खूबसूरत सा पास्ट था।”
“कौन था वह? क्या करता था? कहां मिला था तुम्हे?”
“बताया तो था एक बार।”
“नहीं! मुझे तो कुछ याद नहीं”।
“मेरे कॉलेज में ही था। डॉक्टर था। मुझसे सीनियर था। कॉलेज में ही हम पहली बार मिले, दोस्ती हुई और दोस्ती प्यार में बदल गई। जब मैं फाइनल ईयर में पहुंची तब वह हॉस्टल छोड़कर एमडी की तैयारी के लिए रूम लेकर रहने लगा तब मैं भी उसके साथ ही शिफ्ट हो गई थी।”
“व्हाट डु यू मीन तुम उसके साथ लिव इन थीं।”
“हां! अब  एक ही फ्लैट में रहते थे तो लिव इन ही कहा जाएगा ना!”
“मतलब कैसे रहते थे? मेरा मतलब कैसे रिलेशन थे तुम दोनों के?”

     पिया के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई वह मुस्कुराते हुए अपनी कहानी आगे बताने लगी…..
   “वैसे ही रिलेशन थी जैसे एक प्रेमी और प्रेमिका के बीच होते हैं! एक नॉर्मल कपल के बीच जो रिलेशन होता है वही कपल जो जल्दी शादी करनेवाला हो।”
“तुम दोनों शादी करने की सोच रहे थे।”
“सोच रहे थे लेकिन कर नहीं पाए!”
“क्यों जब इतना आगे बढ़ गए थे तो शादी कर लेनी थी।”
“वह बहुत एंबिशियस था! उसे एम एस करने के लिए यूएस जाना था। और उसे यूएस के सबसे बड़े बोस्टन हॉस्पिटल  में सर्जन बनना था। वह चाहता था मैं भी उसके साथ चलूं।”
“तो चली जाना था ना।”
“ऐसे कैसे चली जाती? मेरे मम्मी पापा की तो मैं अकेली बेटी हूं। उन्हें छोड़कर उनसे इतनी दूर अमेरिका कैसे चली जाती? और फिर दूसरी बात अमेरिका चली जाती तो तुम से कैसे मिलती?”

समर मुंह बनाकर दूसरी ओर देखने लगा पिया ने छुप कर अपनी हंसी छुपा ली।

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“उसके बाद उसने बहुत कोशिश की कि मैं मान जाऊं, लेकिन मैं अपना देश अपने पेरेंट्स को छोड़ने के लिए बिलकुल राजी नहीं थी, और उसने मुझे छोड़ दिया। वह मुझे छोड़ कर अमेरिका चला गया। सच कहूं तो उस वक्त बहुत टूट गई थी। मुझे लगा मैं फाइनल ईयर पास भी कर पाऊंगी या नहीं। लेकिन फिर मेरा एक दोस्त मेरा क्लासमेट था, उसने पढ़ाई में मेरी बहुत मदद की और सच कहूं तो फाइनल ईयर मैं उसी की मदद के कारण पास कर पाई।”
“अब ये दूसरा कौन है यार?”
“अरे नहीं उसके साथ वैसा कोई रिलेशन नहीं था! यह बहुत प्यारा दोस्त था अक्सर मेरे कमरे में आया करता था मुझे पढ़ाने।”
“फिर वहीं रुक तो नहीं जाता था।”
“यार तुम तो जादूगर निकले! बिल्कुल रुक ही जाता था। ऑब्विसली  हमारी पढ़ाई काफी टफ  होती है। कि हम रात रात भर पढ़ते हैं तो जब रात में चार चार बजे तक मेरे साथ पढ़ता था तो  उतनी सुबह उठकर घर कहां जाता मेरे कमरे में ही सो जाया करता था।”

“हद है  यार पिया! तुम्हारी क्लास में कोई लड़की नहीं थी जो तुम्हें पढ़ा सके! तुम्हारी पढ़ाई में मदद कर सके?”
“बहुत सारी थी। लेकिन लड़कियों में जलन की भावना बहुत होती है ना। जानते तो हो मैं वैसे भी शुरू से टॉपर टाइप की लड़की थी। तो सारी लड़कियां तो बहुत खुश थी इस बात से कि मेरा ब्रेकअप हो गया, और मैं पढ़ाई में मन नहीं लगा पा रही हूं। इसलिए कोई भी मेरी मदद करने क्यों आता भला? बस यही था अरविंद जो मेरी मदद करता रहा।”
“अच्छा तो इसका नाम अरविंद था।”
“हां बहुत पढ़ाया उसने मुझे । एक तरह से कहूं तो
मेरा गार्जियन कम गाइड कम दोस्त कम…”
“बस बस समझ गया! तो अभी कहां है ये तुम्हारा अरविंद?”
“पता नहीं यार बहुत समय से कांटेक्ट में नहीं हूं।”
“क्यों ऐसा क्या हो गया?”
“कुछ नहीं मेरी क्लास का एक दूसरा लड़का था शरभ वह भी अच्छा था। वह एक्चुली मेरे शहर का था। तो जब भी वह घर से आता जाता था तो मेरी मम्मी उसके हाथ से सामान भेज दिया करती थी। बस इसी बात पर अरविंद और शरभ का कुछ पंगा हो गया था।”
तुम्हारी मम्मी शरभ के हाथ से तुम्हारे लिए सामान भेजती थी इस बात पर अरविंद को क्या दिक्कत हो गयी यार?”
“शरभ ने एक बार सामान के साथ एक लव लेटर मुझे दे दिया बस अरविंद को सहन नहीं हुआ।”
“हे भगवान ! तो ये शरभ भी लाइन में था।”
“जब अरविंद ने उसकी खूब पिटाई की तब मुझसे मेरी कुछ सहेलियों ने कहा कि असल में अरविंद भी मुझे पसंद करने लगा था। “

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   समर अब अपना सर पकड़ कर बैठ गया…-” यह कितना घुमा रही हो यार पिया? यह सब पहले क्यों नहीं बताया?”
“क्यों? पहले बता देती तो तुम मुझसे शादी नहीं करते?”

   समर पिया को देखता रहा  और प्रिया जोर जोर से हंसने लगी समर को अचानक सब कुछ समझ में आ गया।

“उल्लू बना रही थी ना मेरा इतनी देर से।”

पिया जोर-जोर से हंसने लगी…-” हां जी बिल्कुल उल्लू ही बना रही थी । मैं बस यही देखना चाहती थी कि लड़के कितने बायस होते हैं न। जब अपनी होने वाली बीवी को अपने प्रेम प्रकरण सुनाते  हैं तो पूरे गर्व से सुनाएंगे। और साथ ही कहेंगे देख लो भाई मैंने तुम्हें सब बता दिया है। क्योंकि वह जानते होते हैं कि सामने वाली लड़की उनसे इतना टूट कर प्यार करती है कि उनके पास्ट को सुनकर भी सब कुछ सह कर भी उन्हें अपना लेगी।
     लेकिन लेकिन जब वही काम हम लड़कियां करती हैं तो तुम लड़कों के तन बदन में आग लग जाती है। तुम्हारे दिमाग में ऊटपटांग ख्याल आने लगते हैं ।यह रिलेशन में थी मतलब जरूर कुछ ना कुछ गड़बड़ होगी और तब तुम हमें एक्सेप्ट करने से पहले सौ बार सोचने लगते हो?
आखिर क्यों इतना सोचना। जब तुम शादी से पहले के अपने रिलेशंस के लिए खुद को माफ कर सकते हो तो अपनी होने वाली बीवी को क्यों नहीं? और अगर तुम्हारी होने वाली बीवी को तुम उसके पास्ट के लिए माफ नहीं कर सकते तो अपने आप को कैसे इतना साफ सुथरा मान लिया मिस्टर मंत्री जी?”
समर ने पिया के सामने कान पकड़ लिये…- मैं हार मानता हूं डॉक्टर साहिबा!! आपके सामने मैं वाकई हार मानता हूं! अरे यार बस मेरी लाइफ में लड़कियां आई और गई। कहीं भी मैं किसी सीरियस रिलेशनशिप में नहीं था। और दूसरी बात दोस्ती से आगे मेरा कोई भी रिलेशनशिप नहीं गया, नॉट इवन विद रेवन।
   तुम चाहो तो खुद रेवन से पूछ लो।”

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“मुझे किसी से नहीं पूछना। तुम पर भरोसा है बहुत भरोसा। आंख मूंदकर तुम्हारी हर बात पर विश्वास करती हूँ।  लेकिन शादी के बंधन में बंधने से पहले मैं बस एक बार अपने मन की यह बात तुमसे कहना चाहती थी जो आज मैंने कह दी। मैं प्यार तो तुमसे बहुत करती हूं समर बहुत ज्यादा लेकिन हमेशा तुम मेरे लिए मेरे पति ही रहोगे मैं कभी भी भगवान का दर्जा तुम्हें नहीं दे पाऊंगी। एक और बात मैं कभी भी अपने माता-पिता को तुम्हारे लिए नहीं छोडूंगी मेरे लिए हमेशा उनकी जगह सबसे ऊपर है ।जब कभी भी उन्हें मेरी जरूरत होगी मैं उनके एक फोन कॉल पर दौड़ी चली जाऊंगी उस वक्त प्लीज मुझे कोई भी दुहाई देकर रोकने की कोशिश मत करना। और तीसरी और सबसे बड़ी बात जितना प्यार और विश्वास मैं तुमसे करती हूं उतने ही प्यार और विश्वास की तुम से भी उम्मीद करती हूं। आज हालांकि एक झलक मैंने देख ली कि कहीं ना कहीं तुम्हारे अंदर भी लड़कों वाला वह ईगो छिपा हुआ है कि मेरी वाइफ….
      पर मैं समझती हूं ऐसा सभी के साथ होता है। और इसीलिए कह रही हूं कि मुझ पर अपना विश्वास कभी मत खोना । शादी का बंधन प्यार से भी ज्यादा विश्वास पर टिका होता है और अगर दोनों में से किसी भी एक के मन में विश्वास की वो डोर  टूट गई तो उसे जोड़ना बहुत मुश्किल होता है।

“विश्वास रखिये डॉक्टर साहिबा! यह मंत्री जी आपके विश्वास को जिंदगी भर टूटने नहीं देंगे।”
बातें करते हुए दोनों महल के भवन से बाहर बगीचे की तरफ चले आए थे। वही बनी एक झील के किनारे बैठे दोनों अपने भविष्य के प्यारे सपने बुनते रहे अगले दिन से समर को होने वाले चुनावों की रणभूमि में जो कूदना था।

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     चुनाव का एक हफ्ता देखते देखते ही बीत गया राजा समर युवराज विराट आदित्य प्रेम सभी इन कामों में ऐसे व्यस्त हो गए थे कि घर परिवार की तरफ किसी का ध्यान ही नही रहा।
    अपने समय पर चुनाव भी हो गए। सत्तारूढ़ पार्टी और विपक्ष दोनों ने ही वह सारे तामझाम किए जिनसे वोटर्स को अपनी तरफ खींचा जा सके ।
   कोई मुफ्त की दारू बांट रहा था तो कोई मुफ्त के कंबल लेकिन सभी किसी न किसी तरह का प्रलोभन ही दे रहे थे एकमात्र राजा की पार्टी ही ऐसी थी जो इस बार पूरी इमानदारी से लड़ रही थी।
     बेईमानी की इंतहा यह थी कि किसी किसी बूथ पर पार्टी के लोग खुद बैठकर सामने से लोगों को तोहफे देते हुए अपनी पार्टी के प्रत्याशी को वोट देने की गुहार कर रहे थे लेकिन लोग भी अब इतने नासमझ और अनपढ़ नहीं रह गए थे खासकर राजा की रियासत के लोग।

    चुनाव समाप्त होते ही वोटों की गिनती प्रारंभ हो चुकी थी।
    वोटों की गिनती में कोई गड़बड़ ना हो सके इसलिए बाहर राज्य से भी लोगों को बुलाया गया था रुझान आने शुरू हो गए थे और रुझानों के मद्देनजर राजा की पार्टी के प्रत्याशी जिस जगह से भी खड़े हुए थे वहां उन्हीं की जीत दिखाई देने लगी थी हालांकि अभी पूरा परिणाम आने में समय था लेकिन फिर भी राजा के पास पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ के ही फोन बजने लगे थे।
  इस सब के बावजूद समर मन ही मन अब भी शंकित था। उसे जब तक परिणाम सामने न आ जाये किसी पर भी विश्वास नही था कि उसके पास नेता जी का फोन चला आया…
   उनका फ़ोन रखते ही उसके माथे पर चिंता की लकीरें दिखने लगीं थीं…

क्रमशः

aparna …

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  दिल से….

  न हो पाया भई, मैंने कोशिश बहुत करी की ये अंतिम पार्ट लिख लूँ पर नही हो पाया।
अब तो मुझे लग रहा ये कहानी नही बल्कि पीपल वाली चुड़ैल है जो मुझसे चिपक गयी है और मुझे छोड़ कर जाने को तैयार ही नही।
  कहती है तू भले और कुछ भी लिख ले पर ये कहानी तो तुझे आजीवन लिखनी पड़ेगी।
  
     जब तक तेरी कहानी चलेगी तब तक तेरी सांस चलेगी टाइप्स!!!

  हे भगवान ! ये तो किसी हॉरर कहानी का प्लॉट सा बन गया है।
  लिख लूँ क्या एक हॉरर भी।
कमेंट में ज़रूर बताना आप लोग। और आजकल प्रतिलिपी पर आप लोगों के कमेंट्स छोटे होने लगें हैं। मैंने तो पहले भी कहा था कि मुझे आप लोगों का नाइस, वेरी स्वीट, सुपर्ब स्टोरी भी चल जाता है लेक़िन आप ही लोगों ने समीक्षा में बड़ी बड़ी पोथियां लिख कर शेरनी के मुहँ में खून लगा दिया, अब आप लोगों की छोटी समीक्षा दिल में ठक सी लगती है कि क्या मैं अच्छा नही लिख रही कि मुझे इतने छोटे कमेंट मिल रहे।
   तो दोस्तों पढ़ने के साथ लिखते भी रहें।
मतलब मुझे पढ़ें और मेरी रचना पर कमेंट लिखें।।
   जस्ट जोकिंग। आप सभी को पढ़ने के लिए स्वतंत्र हैं पर ….
…. बस ज्यादा खुल कर मैं नही लिखती….
… कारण आप सब को पता ही है…
         … संस्कार बहुत है ना मुझमें❤️

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aparna….
    

जीवनसाथी- 118

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  जीवनसाथी – 118




     अस्पताल में बांसुरी के कानों में चुपके से कुछ कह कर पिया वहां से बाहर निकल गई बांसुरी में समर की तरफ देखा वह पिया को ही देख रहा था पिया के जाने के बाद उसने सर झुका लिया।

” क्या हुआ समर सा कुछ उदास लग रहे हैं आप?

“ऐसी तो कोई बात नहीं रानी साहेब! मैं तो बहुत खुश हूं। आपने इतनी बड़ी खुशखबरी दी है मेरे हाथों में।

“तो आप हम सब को कब मौका दे रहे हैं खुश होने का।”

बाँसुरी के सवाल पर समर मुस्कुरा कर चुप रह गया।

“नहीं! अब ऐसे चुप रहने से काम नहीं चलेगा! आपको याद है एक दिन आपने मुझसे कहा था, कुछ गिफ्ट के लिए, और मैंने कहा था वक्त आने पर मांग लूंगी! तो क्या आज मैं अपना तोहफा मांग सकती हूं!”

” आप रानी है हुक्म कीजिये।”

” पहली बात कि आप मुझे बार-बार रानी साहेब कहना बंद कीजिए। मैं आपको अपना देवर मानती हूँ इस लिहाज से आप मुझे भाभी सा कहिये तभी मैं अपना तोहफा माँगूँगी। “

  समर मुस्कुरा उठा..-” ठीक है भाभी साहब! आप बताइए । “

” अब आप भी शादी कर लीजिए। कब तक ऐसे मारे मारे फिरते रहेंगे। आपके राजा साहब अपने अलावा और किसी की तरफ ध्यान देते ही नही। “

” ये बड़ी ज्यादती है। अगर वो खुद किसी बंधन में बंधना नही चाहता तो मैं कैसे उसे पकड़ कर उसकी शादी कर दूं। “
   राजा के जवाब पर समर बाहर की तरफ देखने लगा। उसे देखकर बांसुरी वापस मुस्कुरा कर उसे छेड़ने लगी…-” क्या हुआ कमरे से बाहर की तरफ आप देख रहे हैं? किसी का इंतजार कर रहे हैं या किसी के पीछे जाना चाहते हैं।”

“जी ऐसा तो कुछ भी नहीं है।”

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“क्यों अपने आप से झूठ बोल रहे हैं? अब इस कमरे में आपके राजा साहब और मेरे अलावा कोई नहीं है! आप हम दोनों को तो सच बता ही सकते हैं।”

“कैसा सच भाभी साहब?”

“यही कि आप पिया से प्यार करते हैं!”

“ऐसा किसने कहा आपसे! क्या पिया ने कुछ कहा?”

“जी नहीं आप एक नमूना हैं तो वह डबल नमूना है। उसने भी कुछ नहीं कहा । यही तो मैं कह रही हूं कि ना आप कुछ कहेंगे ना वह कुछ कहेगी और बस इसी अनकही में कहीं यह ना हो जाए कि वह शादी करके उस डॉक्टर का नर्सिंग होम संभालने चली जाए ! तब बैठे रहिएगा अपनी मंत्रीगिरी संभालते हुए यहां।
  और एक बात कहूं! आज नहीं तो कल काकासाहेब आपकी शादी कर ही देंगे ! किसी ना किसी के साथ तो जिंदगी आपको भी बितानी ही है, तो अगर मौका मिल रहा है कि आप अपनी पसंद की लड़की के साथ अपनी पूरी जिंदगी बिता सकते हैं, तो उस मौके को क्यों यूं ही गवा रहे हैं?
  आखिर अब आपको किस बात का इंतजार है? देखिए आपकी सगाई हुई थी केसर से। पर यह हम सब जानते हैं कि वह सगाई कितनी सच थी और कितनी झूठ।
यह आप भी जानते हैं और केसर भी। अगर आप यह सोच कर बैठे हैं कि उस झूठी सगाई के बाद भी केसर की सारी जिम्मेदारी आपके ऊपर है तो यह गलत है। केसर खुद पश्चाताप में  डूबी है कि मुझसे और राजा साहब से बदला लेने के लिए उसने आपको मोहरा बनाया। यह बात आप भी जानते हैं। इसलिए केसर की तरफ से अपने मन में किसी भी तरह का कोई गिल्ट मत रखिएगा ।
  अपनी जिंदगी संवारने का, उसे सजाने का मौका हाथ से मत जाने दीजिए समर सा, क्योंकि अगर आप जिससे प्यार करते हैं वह आपके साथ नहीं है तो जिंदगी बहुत कठिन हो जाती। हमने यह बात बहुत करीब से महसूस की है रेखा को देखते हुए।
और अगर आपने जिससे प्यार किया वह आपका हमसफर बन कर आपका जीवन साथी बन कर आपके ज़िन्दगी के सफर में साथ चलता रहे तो इस जिंदगी के सफ़र से खूबसूरत कोई सफर नहीं रह जाता, यह हमसे ज्यादा और कौन जानता है।



“एक और भी कोई है जो यह बात जानता है।”

राजा की बात पर बांसुरी मुस्कुरा कर वापस समर को देखने लगी…-” देख लीजिए अपने राजा साहब को और हमें!
क्या हम दोनों की जोड़ी देखकर आपको यह नहीं लगता कि आपकी भी ऐसी ही एक जोड़ी होनी चाहिए! अभी भी वक्त है जाइए और रोक लीजिए अपनी पिया को, वरना वह इतनी ज़िद्दी है, कि अगर आपने उसे नहीं रोका तो वह वाकई उस लड़के से सगाई करके शादी करके आप की दुनिया से दूर चली जाएगी।”

” जाने दीजिए! अगर वह जिद्दी है, तो मैं उससे बड़ा जिद्दी हूं।”

“अगर आपकी ज़िद से किसी का फायदा होता तो मैं आपको इस ज़िद से पीछे हटने नहीं देती। लेकिन आप दोनों की यह फिजूल तानाशाही और यह फिजूल की सनक एक दूसरे की जिंदगी बर्बाद कर देगी। इतना कहने पर भी आप मेरी बात नहीं सुन रहे हैं इसका मतलब है, कि आपकी जिंदगी में मेरी कोई अहमियत नहीं है। चलिए कोई बात नहीं अगर आप नहीं चाहते तो मैं आपको बिल्कुल भी फोर्स नहीं करूंगी।”

“यह क्या कह दिया आपने भाभी साहेब। हुकुम का और आपका स्थान मेरे जीवन में मेरे माता-पिता के समान है! आपकी आज्ञा मेरे सर माथे। मैं अभी जा रहा हूं ,उसके पीछे।  उसे पकड़ कर वापस आपके सामने पेश करता हूं।”

“जी नहीं! उसे इस तरह से पकड़ जकड़ कर मेरे सामने लाने की जरूरत नहीं है। आज उसकी सगाई है आप जाइए उसकी सगाई होने से पहले -पहले उसके घरवालों से उसका हाथ मांग लीजिए।
लेकिन उसके पहले मेरी एक बात सुनिए।”

“जी आज्ञा दीजिए आप।”

“आप वाकई पिया से प्यार तो करते हैं ना?”

समर बांसुरी से नजर चुरा कर इधर-उधर देखने लगा और उसे इधर उधर देखते हुए बांसुरी खिलखिला कर हंस पड़ी…-” देखिए यह हमारा छोटा शैतान भी खुश हो रहा है अपने चाचा को शर्माते हुए देखकर। वैसे एक बात कहूं आप की बोलती कोई बंद नहीं करा पाता है। एकमात्र पिया है जिसके सामने आप चुप खड़े रह जाते हैं और वह सरपट बोलती चली जाती है। मैंने तो पहली बार ही आप दोनों को देख कर समझ लिया था कि यह राम मिलाई जोड़ी है।”

“देखा समर कितनी समझदार है हमारी हुकुम। दूसरों के सब मामले में इनकी समझदारी ऐसे ही फूट-फूटकर बहती है, और हमारे मामले में इन्हें मुझसे मिलने के बाद यह समझ आने में कि मैं ही इनका जीवन साथी हूं महीनों लग गए।”

“होता है ऐसा भी हो जाता है कभी-कभी!
वैसे समझ में तो तब भी मुझे आ गया था, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। और खासकर आपका यह बड़ा सा महल देखने के बाद तो रही सही थोड़ी सी हिम्मत भी चूक गई थी।”

“चलो अब हम दोनों बातों में नहीं लगते समर कि यहां से छुट्टी करते हैं जिससे वह जाकर अपनी जीवनसंगिनी को रोक सके ! “
राजा की बात पर बांसुरी ने हां की मुहर लगाई और समर को उन दोनों ने वहां से बाहर भेज दिया।

समर कमरे से बाहर निकल कर गाड़ी की तरफ बढ़ा और जैसे ही ड्राइविंग सीट पर दरवाजा खोलकर अंदर बैठा बाजू वाली सीट पर प्रेम आकर बैठ गया। उसी वक्त पीछे के दोनों दरवाजे खुले और आदित्य और विराट भी अंदर आकर बैठ गए। समर उन सब को चौक कर देखने लगा…-” आप सब अचानक एक साथ यहां कैसे?”

“भाई दुल्हन लेने जा रहे हो तो बाराती तो साथ चलेंगे ना।

प्रेम की बात पर समर एक बार फिर चौन्क कर प्रेम को देखने लगा। प्रेम भी उसे देखते हुए हंस दिया….-” अरे पहली बार जा रहे हो बात करने उनके घर, अकेले जाना शोभा देता है क्या? हम सब तुम्हारे भाई बनकर मिलेंगे उनसे, और जब बातचीत पक्की हो जाएगी तब काका और काकी से मिलवा देना।”

प्रेम की बात पर हामी भरते हुए आदित्य और विराट भी हंसने लगे।
“समर गाड़ी तुम चलाओगे या मैं चला लूं? वैसे दूल्हा खुद ड्राइव करता हुआ जाए ये अच्छा नहीं लगता। तुम पीछे आ जाओ मैं ड्राइविंग सीट पर आता हूं ।”
समर में एक नजर आदित्य को देखा और वापस गाड़ी गियर में डाल दी।
“मैं देख रहा हूं जैसे ही किसी की कोई नाजुक रग दूसरों को पता चलती है सब बड़े मजे लेने लगते हैं।’

“हम सब तो मजे लेंगे ही, तुम हो ही ऐसे कमाल के। पूरी दुनिया को सुधारने चले हो और अपनी जिंदगी का कबाड़ कर रखा है। अरे जब अच्छी-खासी लड़की मिली हुई है ,तो उससे शादी करने की जगह उसे प्रपोज करने की जगह तुम दून जाकर में कोर्ट केस में जिरह कर रहे हो।”

“वह भी तो जरूरी था दोस्त।”

समर की बात पर आदित्य ने हंसकर ठप्पा लगा दिया ….-“और यह भी बहुत जरूरी है।”

हंसते मुस्कुराते चारों लड़के पिया के घर पहुंच गए।
पिया के घर के सामने समर ने जैसे ही गाड़ी रोकी प्रेम तिरछी नजरों से समर को देखने लगा …-“अच्छा तो तुम्हें घर भी पता है।”

“अरे यार अब इसमें कौन सी बड़ी बात हो गई, घर तो पता होगा ही।”

समर की बात सुन पीछे बैठा आदित्य भी दिल खोल कर हंसते हुए बोलने लगा…-” और क्या प्रेम भैया आप तो ऐसे पूछ रहे हैं? अब इतनी बार आना जाना हुआ होगा तो समर सा को घर तो याद होगा ही।”

समर ने एक नजर मुड़ कर आदित्य को देखा और गाड़ी से उतरकर मेन गेट की तरफ बढ़ गया। मेन गेट पर बैठे गार्ड से समर ने ऊपर पिया के फ्लैट में जाने के लिए बताया तो गार्ड ने उल्टा उन्हें अचंभित कर दिया…..-” नहीं साहब ! प्रिया मेम साहब के घर पर तो इस वक्त कोई नहीं है सब लोग शादी भवन गए है।”

“शादी भवन ! लेकिन वहां क्यों गए हैं?”

“आज पिया मैडम की सगाई है ना।”

गार्ड से पता ठिकाना पूछ कर वह चारों वापस गाड़ी में जा बैठे! आदित्य एक बार फिर समर को छेड़ने लगा……-” शादी भवन गए हैं, सुनकर तो मुझे लगा पिया सगाई छोड़ कर सीधे शादी करने को ही तैयार हो गई है। वैसे भी समर बाबू ने जितने झटके दिए हैं, उस हिसाब से अगर मैं पिया की जगह होता तो आज सुबह ही शादी कर चुका होता । वह तो बेचारी अब तक बैठी राह देख रही होगी।”

विराट भी आदित्य के साथ जुगलबंदी में लग गया….-” ठीक कह रहे हो आदित्य! मुझे भी यही लगा कि कहीं पिया की शादी तो नहीं हो रही । फिर जब गार्ड ने कहा सगाई है, तब मेरी सांस में सांस आई। और मैंने देखा समर ने भी बहुत चैन की सांस ली।”

“मैं देख रहा हूं आजकल तुम दोनों की कुछ ज्यादा ही नजर है मुझ पर।”

एक तो पिया की हरकतों से समर वैसे ही नाराज था। दूसरा आदित्य और विराट उसका इतनी देर से मजाक उड़ा रहे थे। उसका गुस्सा और बढ़ता जा रहा था कि तभी समर की बात पर प्रेम चहक उठा।

“उन दोनों की ही नहीं मेरी भी नजर है तुम पर।”

प्रेम के ऐसा बोलते हैं आदित्य और विराट जोर से हंस पड़े….

“ज्यादा हंसिए मत आदित्य बाबू अब इसके बाद आपकी ही पारी है।”

विराट की बात पर समर ने भी हामी भर दी और आदित्य खिड़की से बाहर देखने लगा! उसी वक्त प्रेम के फोन पर घंटी बजने लगी प्रेम ने फोन उठाया फोन निरमा का था।

“सुनिए कहां है इस वक्त आप ?”

“मैं जरा काम से बाहर था बोलो क्या हो गया ?”

“आते वक्त याद से मीठी के स्कूल के क्राफ्ट के लिए क्राफ्ट का सामान लेते आइएगा। भूलिएगा मत। कल भी आप निकले थे, तब भी आपको मैसेज किया था और आप भूल भाल कर घर वापस आ गए थे।”

“सॉरी बाबा नहीं भूलूंगा।”

“बस कहते तो ऐसा है जैसे एक मेरे और मीठी के अलावा दुनिया में आपको कुछ याद नहीं, और हम ही दोनों की सारी चीजें आप भूल जाते हैं। अभी के अभी लिखकर रख लीजिए कि नहीं भूलना है, वरना अगर आज बिना भूले वापस आए ना तो।”

“तो क्या खाना नहीं दोगी?”

“खाना तो दूंगी, लेकिन अकेले सोना पड़ेगा।”

प्रेम के गले में कुछ अटक गया और उसे हल्की सी खांसी आ गई….” चलो रखता हूं अभी आसपास लोग हैं।”

प्रेम के फोन रखते ही एक जोर का ठहाका गाड़ी में गूंज उठा और चारों लड़के मंगल भवन की तरफ आगे बढ़े चलें।

   मंगल भवन बाहर से बहुत खूबसूरती से सजा था। गेंदे और गुलाब की मालाओं से सजा हुआ था , जिनमें बीच बीच में रोशनी की झालर लगी थीं।
इतनी खूबसूरती से पूरा परिसर बाहर से सजा सँवरा दिख रहा था की एक पल को समर को लगा कि यहां आकर कोई गलती तो नहीं हो गई ।उसने प्रेम की तरफ देखा प्रेम ने उसे कंधे थपथपा कर इशारा किया और खुद आगे बढ़ गया समर ने बड़ी हिम्मत करके कदम आगे बढ़ाया।
    मुख्य दरवाजे के दोनों तरफ बड़े-बड़े कलसो में पानी भर कर रखा था जिनमें गुलाब की पंखुड़ियां तैर रही थी। सामने फूलों से सुस्वागतम लिखा हुआ था। और एक बड़ी सी फूलों की रंगोली बनी थी। एक तरफ बड़े से पानी के कलसे मैं खूब सारी खुशबूदार मोमबत्तियां जल रही थी। सब कुछ बहुत सुहावना लग रहा था। लेकिन मन ही मन समर को अजीब सा डर लग रहा था कहीं इतनी सारी तैयारियां के कारण इतने सारे लोगों के बीच पिया ने उसका साथ देने से मना कर दिया तो?
इतने सारे लोगों के बीच पहले से तय सगाई को तोड़ने की हिम्मत पिया कैसे कर पाएगी? यह कोई फिल्म तो है नहीं कि हीरो मौके पर पहुंचा और हीरोइन ने अपनी सगाई तोड़ दी, और हीरो के साथ चली गई!
ऐसा सिर्फ फिल्मों में कल्पनाओं में और कहानियों में होता है वास्तविक जिंदगी ऐसी तो नहीं होती ना।

यही सब सोचकर वह दरवाजे से ही वापस जाने लगा कि प्रेम ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया…-” क्या हुआ समर अब भी किसी सोच विचार में हो?”

“मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं सही कर रहा हूं या गलत।”

“क्यों इसमें क्या सोचने वाली बात है?”

“सोचने वाली बात यह है कि आज तक ना मैंने, ना पिया ने एक दूसरे से प्यार का इजहार किया। और मैं आज अचानक यहां उसकी सगाई में चला आया। अब अगर मैं उससे यह कहूं भी कि पिया मैं तुमसे प्यार करता हूं तुमसे शादी करना चाहता हूं। तो वह उस लड़के को इनकार करके आखिर क्यों मेरी बात मानेगी? और चलो एक बार को पिया मुझे स्वीकार भी कर ले, तब भी इस सब में उस लड़के का क्या कसूर? अगर मैं सही समय पर पिया से अपने मन की बातें नहीं कर पाया , और पिया ने जल्दबाजी में उस लड़के से शादी के लिए हां कह दी तो इस सब में वह बेचारा तो बुरी तरह से फंस गया? अब वह और उसका परिवार यहां इतने तामझाम के साथ सगाई करने आए हैं .. ऐसे में अगर पिया उस लड़के को ठुकरा देती है तो वह बेचारा क्या करेगा कहां जाएगा?

“और तुम! तुम्हारा क्या होगा ? तुम अपने बारे में भी तो सोचो ना।” आदित्य ने समर से ही उल्टा सवाल कर दिया

“मेरा क्या है दोस्त !मैंने तो आज तक कभी शादी के लिए सोचा ही नहीं था। ऐसा तो है नहीं कि मेरे जीवन में कभी लड़कियां थी नहीं। पर मैं शादी ब्याह कर जिम्मेदारी से भरी जिंदगी जीने वाला लड़का हूँ ही नहीं।  मेरे लिए यह सगाई शादी यह सारे चोंचले नहीं बने।

“ऐसा तुम्हें लगता है, समर पर ऐसा है नहीं। शादी सिर्फ जिम्मेदारियों को उठाना नहीं होता। अगर तुम सामने वाली की जिम्मेदारी उठा रहे हो, तो वह लड़की भी तो तुम्हारी जिम्मेदारी बराबरी से उठाती है। यह क्यों भूल जाते हो। शादीशुदा जिंदगी हर हाल में एक कुंवारे की जिंदगी से कहीं बेहतर है। एक बार जी कर तो देखो अपनी जिम्मेदारियों से मत डरो। अगर आज तुम पिया से बिना मिले यहां से निकल गए तो याद रखना जिंदगी भर पछताओगे।
   अगर तुम ने सच में कभी भी उससे प्यार किया है तो एक बार जाकर उसे बता दो। फिर जो होगा उसे अपना नसीब मान लेना। “

   प्रेम की बात मान कर समर एक बार फिर अंदर की ओर बढ़ चला, उसके पीछे ही वो तीनों भी बढ़ गए। लेकिन दरवाजे पर पहुंचकर उसकी हिम्मत फिर चूकने लगी वह वापस मुड़ा ही था कि प्रेम ने उसे पकड़ लिया …-” इतना घबराओ मत समर। अपने जीवन के समर में तुमने अब तक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। फिर अपने प्रेम के समर में पीछे क्यों हट रहे हो?

  समर कोई जवाब देता है इसके पहले ही दरवाजे से उसे किसी ने आवाज लगा दी….
“आइए आइए ! आप सभी तक चले आइए आप लोगों का स्वागत है।”

पिया के माता-पिता अभ्यागतों के स्वागत के लिए दरवाजे पर ही खड़े थे। उन लोगों ने उन चारों को आते देख कर रोक लिया और अंदर बुला लिया। अब समर के पास अंदर जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। वह चारों जैसे ही अंदर की तरफ प्रवेश करने लगे, पिया की मासी और उनकी बेटी ने उन लोगों के ऊपर गुलाब जल छिड़क कर चारों के माथे पर कुमकुम का तिलक लगा दिया।
    “यहां कुछ ज्यादा ही स्वागत नहीं हो रहा है?” विराट ने धीरे से आदित्य के कान में कहा जिसे समर और प्रेम ने भी सुन लिया कि तभी पिया की मां हाथ में थाली लिए चली आई और समर की आरती उतारने लगी। समर ऐसा होते देख हड़बड़ा कर एक कदम पीछे हट गया।

“अरे घबराइये मत बेटा हमारे यहां ऐसे ही आगंतुकों का स्वागत किया जाता है। आइये अब आप चारों अंदर पधारे।”

अंदर की रौनक देखते ही बन रही थी। समर ने आज तक पिया के रहन सहन की तरफ ध्यान नही दिया था, उसे हमेशा उसकी सादी कुर्तियों और जीन्स के पहनावे को देख यही लगता था कि वो एक मध्यमवर्गीय परिवार की सीधी सी लड़की है। इतना तामझाम और चकाचौंध देख उसे अपने महल के कार्यक्रमों की याद आ गयी। तभी उसकी नज़र सामने से आते युवराज पर पड़ गयी….-” युवराज सा आप यहाँ ?”

“हाँ क्यों ? हम नही आ सकते यहाँ। “

युवराज के सवाल पर समर खिसिया गया तभी रूपा भी चली आयी…-” हम तो पूछने वाले थे आप यहाँ कैसे? “

समर रूपा की बात का क्या जवाब देता? क्योंकि उसके मन में खुद यही उथल पुथल थी कि युवराज और रूपा को पिया भला कैसे जानती है?

वो अभी क्या कहूँ सोच रहा था कि रूपा ने जैसे उसके मन की बात ताड़ ली…-“आप शायद यह सोच रहे की हम लोग यहाँ कैसे? “

” हाँ बिल्कुल मैं यही…” अपने उतावलेपन पर समर एकाएक बोलते बोलते रुक गया… उसकी ये हालत देख रुपा को हंसी आ गयी…- पिया आपकी माँ यानी काकी सा की जांच और इलाज के लिए महल आती थी न तभी उससे हमारी जान पहचान हुई थी। इसलिए उसने अपनी सगाई में हमें बुलाया। और हम ही क्या काकी सा भी आयीं हैं।”

समर पर एक के बाद एक बम फूट रहे थे। उसके लिए ये बहुत आश्चर्य की बात थी कि उसकी माँ जो महल के अलावा बाहरी किसी कार्यक्रम में कभी शामिल नही होती वो भी पिया के बुलावे पर यहाँ चली आयीं हैं।
वो इधर उधर अपनी माँ को ढूंढ रहा था कि प्रेम ने उसे एक तरफ इशारा कर दिखा दिया। उसकी माँ आराम से सोफे पर बैठी किसी औरत के साथ बातचीत में लगी थीं।
समर को पिया के ऊपर एक बार फिर गुस्सा आने लगा…-” हद करती है ये लड़की। एक तो किसी और से सगाई कर रही उस पर मेरे सारे खानदान को बुला रखा है। और अब जाने कहाँ छिपी बैठी है। ये भी नही हो रहा कि बाहर आ जाये। “

वो इधर उधर पिया को ढूंढ रहा था कि उसकी नज़र अपनी माँ से मिली उन्होंने भी उसे उसी वक्त देखा और हाथ के इशारे से अपने पास बुला लिया।

वो भारी कदमों से उन तक पहुंच गया… – ” ये मेरा बेटा है समर! समर इनके पैर छुओ बेटा ये पिया की दादी हैं। “
समर आश्चर्य से उन्हें देख उनके पैरों में झुक गया। उन्होंने भी उसे आशीर्वाद देने के बाद हाथों से ही उसकी बलैय्या ले लीं..-” बहुत सुंदर है आपका बेटा !”
समर को ऐसे अपनी तारीफ सुनना बड़ा अजीब लग रहा था, वो वहाँ से खिसकने के बहाने सोचने लगा…-” पापा साहेब भी आये हैं क्या?”
“हाँ फिर !हम अकेले किसके साथ आते?”

समर का जी कर रहा था चीख चीख कर पूछे जब कहीं और नही जाती तो यहाँ अपने बेटे का तमाशा देखने का ही क्या शौक चढ़ा था? लेकिन वो बिना कुछ बोले एक तरफ को जाने लगा कि उसकी माँ ने उसे हाथ पकड़ कर रोक लिया और एक तरफ इशारा कर कुछ दिखाने लगी….- ” वो देख! ऑर्केस्ट्रा आया है, जा न तू भी कुछ गा ले।।”

समर को अब अपनी माँ के बचपने पर गुस्सा आने लगा था। जिसे देखो वही खुश नजर आ रहा था लेकिन जिसके लिए ये सारा तामझाम था वही कहीं नजर नही आ रही थी।
उसे ढूंढता समर आगे बढ़ रहा था कि सामने से आती एक दुबली सी लड़की उससे टकराते बची…-” ओह्ह सॉरी जीजू!” लेकिन दूसरे ही पल समर को देख वो जीभ काट कर रह गयी..
” जीजू?” समर के ऐसा बोलते ही उस लड़की ने एक किनारे बने स्टेज की तरफ इशारा कर दिया। वहाँ दो चार लड़के खड़े थे।
समर को उस लड़की का इशारा समझ में नही आया। उसकी आँखों में सवाल देख वो लडकी जल्दी जल्दी बोलने लगी…-“मैं पिया दी कि मासी की बेटी हूँ। अभी हड़बड़ी में मुझे लगा मैं मेरे जीजू से टकरा गई , यानी उनसे । फिर चेहरा देखने पर समझ आया कि आप तो कोई और है।”

समर को समझ आ गया कि यह पिया की छोटी बहन है और यह ही इस वक्त पिया का पता बता सकती है। वह जाने लगी तो उसे आवाज देकर समर ने रोक लिया…-” सुनो एक मिनट! क्या तुम मुझे बता सकती हो कि पिया इस वक्त कहां मिलेगी?”

उस लड़की ने भौंहे चढ़ाकर समर को देखा..-” आप उनसे मिलना चाहते हैं?”

“हां! कुछ बहुत जरूरी काम है!”

“ओके! यह पीछे वाली सीढ़ियां चढ़कर ऊपर चले जाइए। पहला ही कमरा पिया दीदी का है। वह अपने रूम में सगाई के लिए तैयार हो रही है।”

आगे बिना कुछ सुने समर सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया। अपने बालों पर हाथ फिराते हुए यही सोच रहा था कि पिछले 1 घंटे से तो वो इस हॉल में इधर से उधर भटक रहा है। जाने और कितना पिया तैयार होने वाली है? ऊपर पहुंच कर उसने पहले वाले कमरे के दरवाजे पर लगी बेल बजा दी…

” एक मिनट रुको अभी आई।”


अंदर से पिया की आवाज आई और कुछ देर में ही दरवाजा खुल गया। पिया ने समर को देखा, समर ने पिया को और दोनों कुछ देर के लिए एक दूसरे को देखते रह गए। पिया की आंखों में आंसू झिलमिलाने लगे…-” अब क्या यही खड़े रखोगी। अंदर भी नहीं आ सकता मैं?”

पिया एक एक तरफ हो कर खड़ी हो गई। समर अंदर चला आया, पिया ने दरवाजा बंद किया, और समर से आगे बढ़ गयी।
” पिया बिना मुझसे कुछ बोले तुमने ऐसे कैसे सगाई के लिए हां कर दी?”

बिना किसी भूमिका के समर सीधे मुद्दे पर चला आया….

“तुमसे क्या पूछना और क्या बोलना था समर?'”

“तुम्हें सच में इस बात की जरूरत नहीं लगी, कि एक बार मुझे बता दो कि तुम सगाई करने जा रही हो!”

“मुझसे यह सवाल पूछने से पहले अपना फोन चेक करके देखो।”

“उस वक्त व्यस्त था मैं। फोन नहीं उठा पाया। फोन चार्ज भी नहीं कर पाया ,और मेरा फोन बंद हो गया था। लेकिन तुम एक मैसेज तो डाल ही सकती थी मुझे।”

“क्या फर्क पड़ जाता समर, क्या तुम अपना काम छोड़कर मेरे लिए आ जाते?”

“नहीं आता! लेकिन तुमसे मेरा इंतजार करने तो कह देता।”

“देखा !! अभी भी तुम्हारी अकड़ कम नहीं हुई ना। अभी भी मुझसे ज्यादा तुम्हें तुम्हारे काम से प्यार है।”

समर मुस्कुराने लगा। उसने आगे बढ़कर पिया को पकड़ लिया…-” मतलब मानती हो ना कि मुझे तुमसे प्यार है!”

समर की बात सुन पिया गुस्से में दूसरी तरफ मुंह फेर कर खड़ी हो गई।

“अब यह नाराजगी कैसी ? मैं जानता हूं ,तुम मुझसे प्यार करती हो।”

“पर मैं नहीं जानती कि तुम मुझसे प्यार करते हो या नहीं?”

“करता हूं यार बहुत प्यार करता हूं । लेकिन हर बात बताने की तो नहीं होती ना। लेकिन तुमने हड़बड़ी में आकर यह जो निर्णय ले लिया क्या यह तुम्हें सही लग रहा है।”

“अब मैं सही हूं या गलत लेकिन यही मेरी किस्मत है।”

“मैं जानता हूं तुम जिद्दी हो! अपनी बात से पीछे नहीं हटोगी । लेकिन बस यह कहना चाहता हूं कि एक बार सोच लो जिंदगी बहुत खूबसूरत हो जाती है, अगर वह उसके साथ गुजरे जिसे आपने सबसे ज्यादा प्यार किया हो।”

“किस ने सिखा कर भेजा यह सब मंत्री जी! क्योंकि आप तो बही-खाते हिसाब वकालत इनसे ज्यादा कुछ बोल ही नहीं पाते।”

“जब अपने प्यार को अपने अलावा किसी और का जीवन साथी बनते देख रहा हूं तो सब कुछ बोलना आ ही गया। बस एक मौका दे दो पिया मुझे। मैं तुम्हें कभी निराश नहीं करूंगा । तुम्हारी जिंदगी के सुख-दुख, हर मोड़ पर, हर ऊंचाई और हर गहराई पर तुम्हारे साथ रहूंगा। बोलो पिया मेरी जीवन साथी बनोगी?’

समर ने पिया की तरफ हाथ बढ़ा दिया, पिया ने धीरे से उसके हाथ में हाथ रख कर कहा…-” लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है मंत्री जी। अब कुछ नही हो सकता।”

“तुम हां तो कहो मैं सब सही कर लूंगा।”

पिया कुछ कह पाती उसके पहले ही दरवाजे पर किसी ने दस्तक देनी शुरू कर दी। पिया घबराकर दरवाजा खोलने जा ही रही थी कि, समर ने पीछे से पकड़ कर उसे अपनी बाहों में ले लिया। उसके कानों के पास जाकर एक बार फिर गुनगुनाना गया…-” सोच लो पिया किसी और की बाहों में मुझे याद करती रहोगी उससे बेहतर है कि मेरी बाहों में जिंदगी भुला दो।”



“अब तुम पागल हो रहे हो छोड़ो मुझे।” समर की बाहों से खुद को छुड़ा कर पिया ने दरवाजा खोल दिया। सामने उसकी मौसेरी बहन और बाकी सहेलियां खड़ी थी सब उसे लेने आई थी। चहचाहती हुई सारी की सारी पिया का हाथ थामे उसे बाहर ले गईं।
समर उस कमरे में अकेला रह गया। कुछ देर वहीं बैठने के बाद वह फिर तेज कदमों से कमरे से निकलकर सीढ़ियां उतरता नीचे हॉल में पहुंच गया….
आखिरी सीढ़ी पर उसका कदम जैसे ही पड़ा सारे हॉल की बत्तियां बुझ गयीं। और वो एकदम से चौक कर इधर-उधर देखने लगा कि, यह हुआ क्या ? तभी एक गोल रोशनी का घेरा सिर्फ उसके ऊपर पड़ने लगा। उसे कुछ समझ में आता तभी एक दूसरा गोल रोशनी का घेरा हॉल के दूसरी तरफ खड़ी पिया के ऊपर उसी तरह पड़ने लगा।
उसने पिया को देखा वो मुस्कुरा कर उसी की तरफ देख रही थी।
पिया धीरे धीरे आगे बढ़ने लगी, उसे अपनी तरफ आते देख समर भी उसकी तरफ बढ़ने लगा।
दोनों के एक दूसरे के सामने आते ही एक गुलाब की पंखड़ियों से सजी प्लेट उनके सामने किसी ने कर दी। उसमें दो अंगूठियां रखी थीं ।
पिया ने मुस्कुरा कर एक अंगूठी उठा ली और बड़ी हसरत से समर की ओर देखने लगी। समर उसे देख रहा था कि समर के कानों में उसकी माँ की आवाज़ पड़ी..-“अब तुम भी उठा लो अंगूठी। और पहना दो हमारी होने वाली बहु को।”
समर ने चौन्क कर देखा, उसके ठीक बाजू में उसकी माँ खड़ी थीं।
समर ने अंगूठी पिया की उंगली में पहनाई और पिया ने समर की उंगली में।
तालियों के शोर के साथ ही कमरे में रौशनी की चकाचौंध फैल गयी…
दोनों के ऊपर ढेर सारे गुलाबों की पंखुड़ियां बरसने लगी। पिया ने आगे बढ़ कर समर के माता पिता के पैर छुए तब कहीं जाकर समर को होश आया कि यहाँ क्या हो रहा है।
उसने भी अपने माता पिता के साथ ही बाकियों का आशीर्वाद लिया और युवराज सा के पैर छूने के बाद प्रेम की ओर बढ़ गया। प्रेम के पैर छूने वो जैसे ही पिया के साथ झुकने को हुआ कि प्रेम ने उसे उठा कर सीने से लगा लिया…- ” पैरों में नही तुम्हारी जगह यहाँ हैं।”

” तो तुम सब कुछ जानते थे न प्रेम ?”

समर के सवाल पर प्रेम ही नही बाकी लोग भी मुस्कुरा उठे, की प्रेम के पीछे से राजा अजातशत्रु भी आगे निकल आये…-“हुकुम आप यहाँ? “

” क्या करें? तुम्हारी भाभी सा का हुक्म था कि समर की सगाई का सारा ड्रामा उन्हें लाइव देखना है। तो बस यहाँ खड़े खड़े उन्हें सब कुछ लाइव दिखा रहे थे। “

समर मुस्कुराने लगा …-” अब तो कोई बता दो की ये सारा माजरा क्या है? और अब उस लड़के का क्या होगा जिससे पिया की सगाई…”

समर की बात आधे में ही काट कर पिया ने उसकी बाहें थामते हुए उसका चेहरा स्टेज की तरफ घुमा दिया…- ” जिनसे मेरी सगाई होने वाली थी, उन्हें कल रात मैंने सारी बातें कह सुनाई। वो हमारे रास्ते से हटने को तैयार थे कि मौसी जी ने अपनी बेटी की शादी का प्रस्ताव उनके जीजा और जीजी के सामने रख दिया। वहीं तुरन्त दोनों का मिलना और बातचीत हुई और दोनो ने ही एक दूसरे को पसन्द कर लिया।
अब स्टेज पर उन्हीं दोनो की सगाई है। “

समर ने देखा स्टेज पर वही लड़कीं थी जो कुछ देर पहले उससे टकरा कर उसे सॉरी जीजू बोल गयी थी।
सारी बातें समझ में आते ही समर ने पास खड़ी पिया को देखा और धीरे से उसे अपनी बाहों के घेरे में समेट लिया…

क्रमशः

दिल से …

क्या करूँ भाग इतना लंबा हो रहा था कि इसे अंतिम भाग नही लिख पायी। एक और भाग लिखवाना चाहतें हैं अजातशत्रु जी।
तो इंतज़ार रहेगा आपको भी और मुझे भी अगले भाग का।
जल्दी ही मिलतें हैं…!!

aparna …







  



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जीवनसाथी-117

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            जीवनसाथी -117

     
    
  उनके सवाल पर समर एक किनारे खड़ा मुस्कुराता रहा… उसने पीछे देखा, कोर्ट रूम के दरवाजे पर एक आदमी अपना चेहरा आधा ढके खड़ा था उसने आंखों ही आंखों में समर को अभिवादन किया समर ने भी धीरे से बाकियों की नजर बचाकर उसके अभिवादन को स्वीकार किया और मुस्कुराकर ठाकुर साहब की तरफ देखने लगा।
   यह वही आदमी था जिसे समर ने 1 दिन पहले फोन करके ठाकुर साहब को कोर्ट तक पहुंचाने की बात कही थी……
….

     ठाकुर साहब का वकील एक तरफ चुप बैठ गया था। वो अब एक बार फिर नए सिरे से अपने कागज़ देख रहा था कि किस तरह अब कोर्ट में पहुंच चुके ठाकुर साहब को बचाया जाए। इसी बीच ठाकुर साहब को पुलिस ने कस्टडी में लिया और एक तरफ को लेकर आगे बढ़ गए, इसके साथ ही समर की जिरह भी शुरू थी।
     ठाकुर साहब के गुस्से का वारापार नही था। समर ने कहना जारी रखा….-“मैं अदालत में इनके काले कारनामों के सबूत पेश कर ही चुका हूँ। इसके साथ ही इन्होंने अपने कार्यालय से निकलते समय रानी बाँसुरी पर जो हमला करवाया उसकी भी तस्वीरें मेरे पास मौजूद हैं, जिन्हें मैं आपके समक्ष प्रस्तुत करने वाला हूँ।
    मारने काटने में ही तो इन्होंने पी एच डी कर रखी है न्यायधीश महोदय। जब जहाँ जी किया किसी पर उठा कर गोली चला दी। ये राजा अजातशत्रु के कार्यक्रम में भी इसलिए ही आये थे कि वहाँ इन्हें मार दिया जाए लेकिन इन्हें पहले ही राजमाता ने देख लिया। अब चूंकि इन्हें उस समय जेल में होना चाहिए था लेकिन ये जेल से फरार थे इसलिए राजमाता समझ गयीं की ये आदमी कुछ तो गड़बड़ करने के उद्देश्य से ही वहाँ आया है। उन्होंने ध्यान से देखा तो इनके हाथ की गन भी नज़र आ गयी , और उसी समय इन्होंने गन निकाल कर राजा अजातशत्रु पर निशाना साधा और राजमाता बीच में आ गईं और उन्हें गोली लग गयी जिसके बाद उनका देहांत हो गया। तो महोदय इन पर दो बार राजा अजातशत्रु पर हत्या के प्रयास और राजमाता की हत्या का आरोप लगता है…”

  समर की बात बीच में ही काट कर बचाव पक्ष का वकील कूद पड़ा…-” हत्या नही गैर इरादतन हत्या का प्रयास कहिये।”
” जी वो सारे चार्जेस तो अभी लगेंगे ही। वैसे भी जितने सबूत हमारे पास मौजूद हैं अब ठाकुर साहब को फांसी से बचा पाना आपके लिए बहुत मुश्किल होगा वकील साहब। आप ज़रूर कह रहे थे कि आप आज तक कोई केस नही हारे हैं, लेकिन अब ये केस आपके हाथ से निकलता दिख रहा है। मुझे तो समझ में नही आ रहा कि आपने इतने पारदर्शी और साधारण से केस को क्यों इतना घुमाया। ठाकुर जैसा लीचड़ और गिरा हुआ आदमी इस लायक ही नही की आप जैसा बुद्धिमान व्यक्ति इनकी पैरवी करे, और…
   समर की बात पूरी होने से पहले ही ठाकुर साहब ने पास खड़े पुलिस वाले कि गन निकाल कर राजा अजातशत्रु की तरफ मोड़ दी। उन्हें ऐसा करते देख उनका वकील ज़ोर से ” ऐसा मत कर दीजिएगा ठाकुर साहब ! आप अदालत में खड़े हैं, आपको कोई नही बचा पायेगा।” कहते उनकी तरफ भागे की हड़बड़ाहट में ठाकुर साहब का हाथ सामने से आते वकील साहब की ओर घूम गया।
   ठाकुर साहब का हाथ ट्रिगर पर ही था, उनके हाथ से गन चल गई लेकिन उतनी ही देर में किनारे खड़े समर ने वकील साहब को एक ओर खींच कर दूसरे हाथ से गन उन तक उछाल दी।
   ये सब इतनी जल्दी जल्दी हुआ कि किसी के कुछ सोच समझ पाने से पहले ही वकील साहब के हाथ में आई गन उन्होंने चला दी और गोली ठाकुर साहब को जा लगी।
   गोली ठाकुर साहब के माथे के ठीक बीचों बीच जाकर लगी और वो वहीं ढेर हो गए। उनका वकील कुछ समझ पाता कि तब तक पुलिस उन तक चली आयी।


    ठाकुर साहब के वकील ने समर की तरफ लाचारगी से देखा समर में दोनों कंधे ऊपर उठाकर ना में सर हिला दिया और राजा अजातशत्रु की ओर देख कर मुस्कुरा दिया।
कोर्ट ने अपनी कार्यवाही आगे बढ़ाने के पहले तुरंत ही डॉक्टर को तलब किया डॉक्टर ने आते ही ठाकुर साहब की जांच करके उन्हें मृत घोषित कर दिया! उनके वकील को पुलिस कस्टडी में ले लिया गया और यह सब देखते हुए कोर्ट ने तारीख आगे बढ़ा दी। राजा अजातशत्रु समर और आदित्य के साथ बाहर निकले ही थे कि फोन की घंटी बजने लगी…… फोन राजा के बड़े भाई युवराज का था…-” कहां हो कुमार?
” जी बस अभी अभी कोर्ट से बाहर निकला हूं आप बताइए क्या बात है भाई साहब?”
” तुम्हें मुबारकबाद देने के लिए फोन किया था। तुम पापा और हम बड़े पापा बन गए हैं। बांसुरी ने एक छोटे राजा अजातशत्रु को जन्म दिया है। मां और बच्चा दोनों ही स्वस्थ हैं अब जितनी जल्दी हो सके उड़कर यहां पहुंच जाओ।”

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   खुशी के अतिरेक में राजा से कुछ कहा ही नहीं गया। खुश होकर उसने अपने बाजू में खड़े समर की तरफ पलट कर देखा, समर और आदित्य उसे प्रश्नवाचक निगाहों से देख रहे थे? और राजा के चेहरे की मुस्कान ही गायब नहीं हो पा रही थी, कि समर ने फोन लेकर युवराज भैया से ही बात कर ली।
   खुशखबरी सुनते ही समर भी खुशी से उछल पड़ा लेकिन उसने राजा से कितना भी प्रेम किया हो उसके मन में राजा के लिए सम्मान बहुत अधिक था। इसलिए अपने संकोच में वह आगे बढ़कर राजा के गले से नहीं लग पाया लेकिन अपनी खुशी व्यक्त करने के लिए उसने साथ खड़े आदित्य को गले से लगा लिया…-” बधाई हो दोस्त हम चाचा बन गए हैं!”,
आदित्य को अब जाकर माजरा समझ में आया उसने झट आगे बढ़कर राजा के पैर छूकर उसे बधाई दे डाली। राजा ने आगे बढ़कर आदित्य और समर दोनों को गले से लगा लिया…-” अब यहां मेरा मन नहीं लगेगा, अब तुरंत वापस चलो समर।”

“लेकिन राजा साहब! केस अभी खत्म नहीं हुआ भले ही ठाकुर साहब नहीं रहे तो क्या हुआ पर उन पर लगे आरोपों को सिद्ध करके….”

   समर अपनी बात पूरी करता इसके पहले ही राजा ने उसकी बात आधे में ही काट दी …-“वह सब अब मैं कुछ नहीं जानता! तुम वकील हो अब तुम जानो तुम्हें क्या करना है? तुम्हारे पास सबूत भी हैं और गवाह भी लेकिन अब मुझे मेरे घर पहुंचना है।”
समर ने मुस्कुराकर हां में सर हिलाया और आगे बढ़कर गाड़ी का दरवाजा खोल दिया।
गाड़ी में पीछे बैठते ही राजा ने तुरंत बांसुरी के फोन पर रिंग कर दी।
थोड़ी देर फोन बजने के बाद फोन उठा लिया गया.. राजा ने धीरे से अपने मन की बात कह दी..-” थैंक यू सो मच हुकुम! आई लव यू अ लॉट!”
“आई लव यू टू कुंवर सा। आपकी हुकुम नहीं बल्कि आपकी भाभी रूपा बोल रहे हैं हम। कभी हमें भी याद कर लिया कीजिए हमसे भी बातें कर लिया कीजिए।’

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“भाभी साहब आप तो ह्रदय में बसती है आप छोटी मां है हमारी।”
“बस बातें बना लीजिए! आप आप दोनों भाइयों को और आता क्या है? वैसे हम आपका ज्यादा समय खराब नहीं करेंगे, लीजिये हम फोन बांसुरी को दे देते हैं।”
रूपा ने बांसुरी के सामने फोन रख कर फोन स्पीकर में डाल दिया राजा ने शरमाते हुए बांसुरी को थैंक यू कहा और आगे की बात उसे बताने लगा…-” मुझे लगा फोन तुम ने उठाया है और मैं भाभी साहब को जाने क्या-क्या कह गया? पता नहीं वह भी क्या सोच रही होंगी?”
“क्या सोच रही होंगी, यही सोच रही होंगी कि राजा साहब बावले हो गए हैं खुशी के मारे।”
“बात तो सौ टका सच है! राजा साहब खुशी के मारे बावले ही हो गए हैं। लेकिन बावजूद मैं कुछ का कुछ बोल गया और भाभी साहब ने सब सुन लिया।”
“साहब !  भाभी साहब तो अभी भी सब कुछ सुन रही हैं। आपका फोन स्पीकर में है, और इस कमरे में मेरे अलावा भाभी साहब, निरमा और पिया तीन और लोग भी हैं। और इन तीनों के अलावा आपका छोटा सा राजकुमार भी टुकुर टुकर पलके झपकाते हुए आपकी सारी बातें सुन रहा है।”
“तुम भी हद करती हो बांसुरी! मैंने फोन किया और तुमने स्पीकर में डाला हुआ है। मैं रख रहा हूं फोन।”

“अरे मैंने स्पीकर में नहीं डाला बाबा! भाभी साहब ने स्पीकर में डाल कर दिया, लेकिन सुनो तो सही बेबी मेरी गोद में है! मैं फीड कराने की कोशिश कर रही हूं उसको। अब ऐसे में आप फोन करोगे तो मैं कैसे बात करूं भला?”
“ओ ओ एम सॉरी! यह बात है तो पहले बताना चाहिए था ना। तुम्हें तो बड़ी मुश्किल हो रही होगी, चलो फोन रखो मैं बस जल्दी से तुम्हारे पास पहुंचता हूं।”
“कैसे बताती? बताने के लिए भी तो फोन उठाना ही पड़ता और फोन उठाते ही आपने आई लव यू की जो झड़ी लगाई कि भाभी साहब शरमा कर पानी पानी हो गई और उन्होंने फोन मेरी तरफ कर दिया।”
राजा ने शरमा  कर हंसते हुए फोन रख दिया। समर ने गाड़ी सीधे एयरपोर्ट की तरफ घुमा ली और फोन पर ही प्रेम को केसर को साथ लेकर एयरपोर्ट आने कह दिया।

कई बार जीवन में हर गुत्थी सुलझ जाए ऐसा नहीं होता। ठाकुर साहब के केस की गुत्थी उनकी अचानक मृत्यु से अनसुलझी रह गई थी। लेकिन हर गांठ अपने वक्त पर सुलझ जाए ऐसा हर बार संभव नहीं होता। ठाकुर साहब का केस पेचीदा था कठिनाइयों से भरा था। बावजूद समर ने जी-जान लगाकर उस केस को इमानदारी से लड़ने की कोशिश की। यह जानते हुए भी कि ठाकुर साहब का ईमानदारी से कोई दूर-दूर तक नाता नहीं है। उन्होंने शुरू से लेकर अपने जिंदा रहते तब हमेशा हर एक इंसान का फायदा उठाने की कोशिश की, चाहे वह उनकी पत्नी हो उनकी पुत्री हो या उनका भांजा।
   इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए समर यह जानता था कि ईमानदारी से ठाकुर साहब के खिलाफ अगर वह केस लड़ने गया तो सदियां लग जाएंगी। लेकिन केस निपटेगा नहीं। हालांकि इससे ना राजा का कुछ बिगड़ना था, ना बांसुरी का। लेकिन मन में अशांति और वैमनस्य तो उपजता ही है।
    इसीलिए समर ने शुरू से कोर्ट केस को इस ढंग से तैयार किया कि ठाकुर साहब और उनके वकील को लगे कि केस उनके पक्ष में जा रहा है। और बाद में हुई गड़बडियाँ इसी बात की लिए थी कि ठाकुर साहब हड़बड़ा कर कोई ऐसा कदम उठाएं कि अपने आप को बचाते हुए कोई उन्हें गोली मार दे।

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     समर केस के बीच के ब्रेक में मौका लगते ही  ठाकुर साहब के वकील के कान इसी बात से भरे की ठाकुर साहब बेहद सनकी, जिद्दी और घमंडी इंसान हैं। उनका कोई भरोसा नहीं है अगर वह बौरा गए तो भरी सभा में किसी पर भी गोली चला सकते हैं। इन बातों को बार-बार सुनकर ठाकुर साहब के वकील के दिमाग में यह बैठा हुआ था कि अगर ठाकुर साहब के हाथ में गन आ गई, तो हो सकता है वह अपने गुस्से के कारण अपने ही वकील पर भी गोली चला दे।  इसी बात से भयभीत वकील साहब ने जैसे ही ठाकुर साहब के हाथ में गन देखी घबरा कर उन्हें रोकने के लिए भागे और इस भागमभाग का फायदा उठाते हुए समर ने पहले से अपने पास छुपा कर रखी गन उनके हाथों में उछाल दी। उनके हाथ में गन देखते ही ठाकुर साहब के हाथ से ट्रिगर चल गया और खुद को बचाते हुए उनके वकील ने ठाकुर साहब पर गोली दाग दी। किया कराया सब कुछ समर का था। गोली तो असली में समर ने चलाई थी बस गन किसी और हाथ में थी।

   “मान गए समर सा आपकी बुद्धि और आपकी विद्वत्ता को।” आदित्य की इस बात पर केसर उसे सवालिया नजरों से देखने लगी तब आदित्य ने केस की उस दिन की सारी कार्यवाही प्रेम और केसर को कह सुनाई।
  प्रेम सब कुछ सुनने के बाद समर की तरफ देख कर मुस्कुराने लगा…-” यह इनकी की हुई पहली कारस्तानी नहीं है! यह इसी तरह के वकील है जो केस शुरू होने से पहले ही केस की हर चाल तय कर लेते हैं। अपनी तरफ की भी और विपक्षी की भी। उसके बाद सारी चाले समझने के बाद इस ढंग से अपनी गोटियां चलते हैं कि सामने वाला उन चालों को काटने के लिए अपने प्यादों को इस ढंग से चले कि समर की चाही हुई चाल सामने वाला खुद ब खुद चल जाए और सामने वाले को बिना यह समझ में आए कि वह हार रहा है वह हारता चला जाए।”

  “वह सब तो ठीक है पर आप लोगों ने सुबह से कुछ खाया पिया नहीं है अब कुछ खा पी लीजिए।” केसर की बात पर राजा मुस्कुरा के खिड़की से बाहर देखने लगा…-” अब तो हम अपने छोटे से राजकुमार का मुंह देखने के बाद ही कुछ खाएंगे पिएंगे।”

******

एयरपोर्ट से राजा की गाड़ी महल की जगह अस्पताल की ओर ही मुड़ गयी। अस्पताल ने भी राजा जी के स्वागत की पूरी तैयारी कर रखी थी……
    फूलों गाजों बाजों के साथ राजा का स्वागत हुआ और राजा समर प्रेम आदित्य केसर सारे लोग एक साथ अस्पताल में अंदर पहुंच गए।
   केसर कुछ थकी हुई थी और साथ ही मन ही मन बांसुरी का सामना करने के लिए शायद डर भी रही थी! उसने धीरे से आदित्य की तरफ देखा आदित्य उसकी मन की बात समझ गया…-” राजा भैया अगर आप बुरा ना माने तो हम केसर को महल छोड़कर फिर वापस आ जाते हैं। “
  राजा के दिमाग में इस समय सिर्फ और सिर्फ बांसुरी से और अपने बेटे से मिलने की ललक थी। उसे ना तो कुछ सुनाई दे रहा था ना दिखाई दे रहा था उसने आदित्य से तुरंत “हां” कहा और तेजी से अंदर की ओर बढ़ गया! आदित्य केसर को लेकर बाहर से ही महल की ओर निकल गया। समर और प्रेम राजा के पीछे पीछे ही कमरे तक चले आए।


    राजा ने कमरे के दरवाजे पर थाप दी। अंदर से “चले आइए” की आवाज सुनकर राजा ने दरवाजा खोला और भीतर दाखिल हो गया।
    बांसुरी की ठीक बगल में उसका नन्हा राजकुमार लेटा हुआ था।  बाँसुरी की आँख लग गयी थी। रूपा कुछ देर पहले ही महल लौटी थी। निरमा भी रात से ही बाँसुरी के साथ होने के कारण मीठी को देखने घर गयी हुई थी। बाँसुरी की दो सहायिकाओं के साथ ही पिया उस वक्त बाँसुरी की दवाओं का जायज़ा लेने वहीं मौजूद थी।
   राजा को देख उसने मुस्कुरा कर उसका अभिवादन किया कि उसकी नज़र राजा के ठीक पीछे खड़े समर पर पड़ गयी, और अब तक कि सारी बातें भूल उसे बस समर का सीधे मुहँ बात न करना ही याद आ गया और उसने समर को पूरी नज़र देखे बिना ही प्रेम की तरफ मुहँ फेर लिया…-” नमस्ते भैया। “
    बाँसुरी को सोते देख एक झलक नन्हे राजकुमार को देख कर प्रेम तुरंत ही बाहर मुड़ गया। उसके पीछे ही समर भी बाहर जाने को हुआ कि बाँसुरी की आंख खुल गयी…
   राजा अब तक धीमे से अपनी उंगलियों से अपने बेटे के चेहरे को टटोल रहा था… वही नाक, वही माथा और वही गोल गोल पलकों के साथ काली मोटी मोटी आंखे।
   उसी का तो रूप था हूबहू। राजा की आंखों में खुशी के आँसू छलक आये ….
  राजा ने झुक कर उसका माथा चूम लिया..-” गोद में ले सकते हैं आप इसे साहब!”
  बाँसुरी की आवाज़ सुन राजा ने आंखें उठा कर उसे देखा…-“अरे तुम जाग गयीं।”
” मैं तो रास्ता ही देख रही थी,पता नही कब आंखें लग गईं। “
पिया ने धीरे से बच्चे को उठा कर कोमलता से राजा के हाथों पर रख दिया। राजा अपनी बाहों में अपने कलेजे के टुकड़े को समेटे विस्मित सा खड़ा था…-” आज तक बहुत से बच्चों को गोद में लिया है और सच कहूं तो दुनिया का हर बच्चा बहुत प्यारा होता है। लेकिन अपने खुद के बच्चे को अपने अंश को अपनी बाहों में लेना अद्भुत है। इससे सुंदर एहसास आज तक नही महसूस किया। किन शब्दों में तुम्हें थैंक्स कहुँ बाँसुरी। यूँ लग रहा मेरा बचपन तुमने मुझे वापस कर दिया।”

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” सही कह रहे हो कुमार! अब इसमें हम सब को तुम्हारा बचपन वापस जीने मिल गया।” युवराज ने कमरे में प्रवेश किया और राजा को आगे बढ़ कर गले से लगा लिया। अब तक राजा के हाथ से बच्चे को गोद में लेकर समर उसे देख मुस्कुरा रहा था कि रुपा पिया को वहाँ खड़ी देख चौन्क गयी…-“अरे डॉक्टर साहिबा आप अब तक यहीं हैं? आज शाम तो आपकी सगाई थी ना। आप गयीं नहीं अब तक। हम तो हमारी सगाई वाली शाम में सुबह से ही पार्लर में थे। “
  रुपा ने हंसी हंसी में अपनी बात कही और सहायिकाओं की सहायता से सबके लिए नाश्ता और चाय निकलवाने चली गयी, लेकिन सगाई वाली बात सुनते ही समर ने तुरंत पिया की ओर देखा और पिया संकोच में उसकी तरफ देख ही नही पायी। किसी ने समर की गोद से बच्चे को लेकर बाँसुरी को दे दिया। समर पिया से सब कुछ जानना पूछना चाह रहा था लेकिन पिया उससे नज़रें चुराती धीरे से बाँसुरी के कान में कुछ कह कर बाहर निकल गयी….

क्रमशः

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दिल से….

  त्योहारों की व्यस्तता के कारण इस भाग में देर हो गयी,लेकिन अब मेरी सारी कहानियां अपनी गति से आगे बढ़ती जाएंगी। समिधा और मायानगरी भी।
   जीवनसाथी का अगला भाग इस पूरी कहानी का सार सम्पूर्ण भाग होगा।
  मुझे पढ़ते रहने के लिए आप सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ

aparna….



जीवनसाथी -116

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   जीवनसाथी – 116

        कोर्ट से मिले 2 दिन पलक झपकते कब बीत गए समर को पता ही नहीं चल पाया केस से संबंधित कागजों की तैयारी में ही उसके दिन और रात निकल गए।
         अगले दिन सुबह की तारीख उन्हें कोर्ट की तरफ से मिली हुई थी। अगले दिन ही जज साहब बचाव पक्ष के वकील द्वारा प्रस्तुत सबूतों को देखने वाले थे। हालांकि समर इस बात से परिचित था कि उस लिफाफे में सबूत नहीं होंगे, फिर भी वह अपनी तरफ से कोई पेंच खाली नहीं छोड़ना चाहता था। उसने अपने वाद और सबूतों को एक साथ कर रखा था।
     अगले दिन केस की सारी तैयारी करने के बाद उसने दून की हवेली के नंबर से किसी को फोन किया…-” ध्यान रहे ये बात इस तरह से उनके कान में पड़नी चाहिए कि वो खुद कोर्ट के लिए रवाना हो जाएं, उन्हें हरगिज़ ये पता न चल पाये की तुम मेरे लिए काम कर रहे हो । “

  इतना कहकर समर ने फोन रख दिया और राजा से मिलने उसके कक्ष की ओर चला गया।

********

   पिया की मां ने पिया से अगले दिन ही उसके पास पहुंचने का वादा जरूर किया था लेकिन  उन्हें टिकट नहीं मिल पाने के कारण उनका आना दो दिन बाद का तय हुआ था…
    इसी बीच बाँसुरी अपने रूटीन चेकअप के लिए पिया के पास आ गयी…-“कैसी हो पिया?”

पिया ने मुस्कुरा कर हाँ में सिर हिला दिया और बाँसुरी का बीपी जांचने लगी।
बाकी जांचों के बाद उसे बांसुरी पूरी तरह सामान्य लग रही थी…-“आप पूरी तरह से फिट हैं रानी साहेब, और अब बस कुछ ही दिनों में आप खुशखबरी दे सकती हैं।”

” वो तो ठीक है पर तुम्हारे चेहरे पर ऐसे बारह क्यों बजे हैं? सब ठीक है ना? “

” हाँ सब ठीक है! आपके लिए कुछ मंगवाऊँ? चाय कॉफी या ज्यूस? “

” नही ! तुम्हारे घर पर थोड़े न आई हूँ। ये अस्पताल है यहाँ मेहमाननवाजी की ज़रूरत नही है। घर भी तो तुम्हारा यहीं कहीं पास ही है ना? “

” हां जी !” उदास सी पिया ज्यादा कुछ बोल नही रही थी, और उसे ऐसे देख बाँसुरी को समझ में आ गया था कि पिया अंदर ही अंदर परेशान है , पर कुछ कहेगी नही। उसी वक्त पिया का फ़ोन घनघना उठा, फोन उसकी माँ का था….
    पिया अपनी माँ को अपना हालचाल बता रही थी कि उसके केबिन पर किसी ने दस्तक दी और दरवाज़ा हल्का सा खुल गया, पिया की माँ उसकी मासी , उनके बच्चे सब धड़धड़ाते हुए अंदर घुसते चले आये… पीछे पिया के पापा और बाकी लोग थे। उन सब को एक साथ देख पिया आश्चर्य में डूबी अपनी जगह पर खड़ी रह गयी कि उसकी माँ ने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया…-” कैसा लगा हमारा सरप्राइज? हम सारे लोग एक साथ चले आये। “

  पिया कुछ कह पाती की मौसी ,फूफी सारे बच्चे उसके गले से लग उसे बधाइयाँ देने लगे, और वो हड़बड़ाई सी कभी किसी को तो कभी किसी को देख मुस्कुराती रही…-” एक बार बताना तो था मम्मी कि आप इतने लोग आ रहे हो। मेरा सिर्फ दो कमरों का घर है, सब के बैठने पर ही भर जाएगा। सब सोएंगे कहाँ?”

” अरे तू उसकी चिंता मत कर। जिस होटल में तेरी सगाई होनी है ना वहीं हम सब के लिए कमरे भी बुक हैं। और फिर ज्यादा रुकने भी कौन वाला है। कल शाम सगाई निपटेगी ,परसों आस पास थोड़ा घूम लेंगे और उसके अगले दिन ही हम सब की वापसी की फ्लाइट है।”

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शाम ढलती देख बाँसुरी भी वापसी के लिए उठ खड़ी हुई…-“बधाई हो पिया! वैसे तुमने बताया नही सगाई के बारे में।”

  पिया ने बाँसुरी की तरफ देखा और फिर अपनी माँ की तरफ देखने लगी…..-“जी संकोची बहुत है हमारी पिया। वैसे आप…

  माँ कुछ और कह पाती इसके पहले ही पिया ने उन्हें टोक दिया…-“मम्मी ये रानी बाँसुरी साहेब हैं। ये अस्पताल इन्हीं का बनाया हुआ है। “

” अरे मेरा बनवाया नही है, मेरे साहब का है। ” बाँसुरी ने पिया की माँ के सामने हाथ जोड़ दिये, बाँसुरी वहाँ की रानी है ये सुनते ही पिया की माँ के चेहरे पर एक लंबी सी मुस्कान चली आयी…

” माफ कीजियेगा मैं आप को पहचान नही पायी। आप भी सादर आमंत्रित है पिया की सगाई में। “

” जी !तबियत सही रही तो ज़रूर आऊंगी, और अगर कल शाम तक केस का निपटारा हो गया तब तो साहब भी वापस लौट चुके होंगे, उन्ही के साथ आ जाऊंगी।”

  पिया हां में सिर हिला कर एक तरफ खड़ी रह गयी, बाँसुरी ने पिया को देखा और मुस्कुरा कर वापस कहने लगी…-” राजा साहेब एक केस के सिलसिले में दून गए हुए हैं। समर सा भी साथ है। ” समर का नाम आते ही पिया बाँसुरी की ओर देखने लगी….-” ये लोग काम में ऐसे व्यस्त हैं कि किसी को अपने फ़ोन तक का होश नही है। साहब का फोन बंद आ रहा था तो मैंने समर के फोन पर कॉल किया,पता चला उसके दोनों ही नम्बर बंद आ रहे हैं। काम के चक्कर में भूख प्यास भूल जातें हैं ये लोग, फोन क्या चीज़ है।”

  पिया को अब तक समर यहाँ नही है ये बात पता ही नही थी। वो किसी ज़रूरी काम से बाहर गया है और इसी कारण उसका फोन भी बंद आ रहा है। मतलब ये भी तो हो सकता है कि उसने पिया के मैसेज देखे ही न हों।
   पिया के मन में घबराहट सी होने लगी कि काश किसी तरह एक बार समर से बात हो जाती। वो अपनी सोच में थी कि बाँसुरी ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखा और बाहर निकल गयी…

   उसके जाते ही पिया ने अपने घर वालों की तरफ देखा,सभी अति उत्साहित थे। सब उसे घेर घार कर अपने साथ घर ले गए।
       घर पर त्योहार जैसा माहौल हो गया था। पिया को एकांत ही नही मिल पा रहा था कि वो वापस समर को फ़ोन लगा सके। दूसरी बात वो ये भी जान चुकी थी कि उसका फोन बंद आ रहा है। उससे कैसे सम्पर्क करें पिया अभी यही सोच रही थी कि दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी….
   वो दरवाज़े तक जाती कि उसके पहले ही उसकी मौसी की बेटी ने जाकर दरवाज़ा खोल दिया…-“अरे जीजू आप यहाँ? आइये आइये। ” 
    पिया की जिससे अगले दिन सगाई होनी थी,वो लड़का और उसकी बड़ी बहन और जीजा दरवाज़े पर खड़े मुस्कुरा रहे थे।
   पिया ने मन ही मन अपना सिर पीट लिया। वैसे ही भीड़ भाड़ कम थी क्या उसके छोटे से घर में जो ये लोग भी चले आये।
  वो अपनी माँ से बात करने की भी सोच रही थी कि सगाई करने की इतनी क्या जल्दी है? लेकिन इन लोगों के आ जाने से अब वो बात भी टल गई थी।
    वैसे उसने खुद ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी थी, बल्कि कहा जाए कि रखी कुल्हाड़ी पर जाकर पैर ही दे मारा था तो और सही होता।
   ” आप क्या सोचती खड़ी हैं पिया जी। इनसे मिलिए ये मेरी दीदी और ये जीज़ हैं!”
   लड़के ने आंखों से पिया को दीदी के पैर छूने का इशारा किया जिसे समझते हुए भी पिया नासमझ बनी रही…-“जीज़? “उसके सवाल पर लड़का और भी चहक कर उसे समझाने लगा…-“जीजा जी साउंड्स प्रिटी ओल्ड नो? इसलिए जीज़ बोलता हूँ। “
   धीमे से सिर हिला कर पिया अंदर जाने लगी कि लड़के की दीदी ने टोक दिया…-” कहाँ जा रहीं हो पिया? आओ हमारे साथ बैठो!”
” जी दीदी ! आप लोगों के लिए चाय बनाने जा रही थी, आप सब आराम से बैठ कर बातें कीजिये मैं चाय लेकर आती हूँ।”
    रसोई में जाते जाते पिया ने एक नज़र अपनी माँ पर डाली की वो भी उसके साथ रसोई में चली आएं तो वो उनसे खुल कर सगाई की डेट आगे बढ़ाने को कह सकें, लेक़िन वो भी पिया के इशारे समझे बिना वहीं लोगों की भीड़भाड़ में बैठी हंसी मजाक में उलझी रहीं!

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    चाय के साथ ही सबने बाहर खाने जाने का कार्यक्रम भी बना लिया। पिया की माँ ने उसे तैयार होने अंदर भेज दिया और खुद मेहमानों के साथ बैठी रही। मन ही मन खीझती पिया के पास चुपचाप तैयार होने के अलावा और कोई चारा नही था।
   अब उसे हर किसी पर गुस्सा आ रहा था,माँ पर मौसी पर, उस लड़के पर और सबसे ज्यादा समर पर। हद से ज्यादा खड़ूस है, एक बार बता कर भी तो जा सकता था, पर नही अपनी राजशाही दिखानी है ना। इतना घमंडी लड़का उसने अपने जीवन में कभी नही देखा था, हद दर्जे का अकड़ू,घमंडी, सिरफिरा और महा बदतमीज।
   लेकिन इतनी सारी बुराइयों के बाद भी क्यों पिया का दिल उसी पर अटका जा रहा था ये उसकी समझ से परे था।
   पिया का एक मन बोलता..-” हां है अकड़ू, और थोड़ा बहुत नही बल्कि बहुत ज्यादा है। ऐसे लड़कों के साथ निभाना आसान नही होता। कोई बात हुई पहले ही मुहँ फुला लेगा फिर मनाते रहना ज़िन्दगी भर। इससे अच्छा है ऐसे लड़के को उसकी अकड़ और ज़िद के साथ छोड़ दो और उसे चुन लो जो तुम्हें ज़िन्दगी भर खुश रख सके। तुमसे प्यार कर सके, तुम्हारे गुस्से को झेल कर ज़िन्दगी भर तुम्हें मनाने की चाह रखे। भूल जा पिया उस सनकी सम्राट को और आगे बढ़ जा।
   मम्मी का चुना लड़का डॉक्टर है, ज़िन्दगी सेट हो जाएगी। जमा जमाया अस्पताल मिलेगा, वेल ट्रेंड स्टाफ मिलेगा, जमे जमाये मरीज़ होंगे और ज़िन्दगी बेहद आसान हो जाएगी…
….. इतना सब सोचते ही पिया का दूसरा मन बगावत पर उतर आता…-इतना सब तो रहेगा मगर दिल का चैन, सुकून वो सब कहाँ से खरीद पाओगी पिया मैडम। समर से अगर शादी नही हुई तो क्या इतनी आसानी से उसे भूल पाओगी।
   और मान लो कहीं नही भूल पायीं तो??

  ये “तो” उसे चैन नही लेने दे रहा था कि मम्मी आ गयी…-” बेटा तैयार हो गयी, चल बाहर सब इंतेज़ार कर रहें हैं। अरे ये क्या जीन्स पहनी है तूने। ” पिया की माँ ने अपने माथे पर हाथ मारा और आलमारी से एक हरी सी लहरिया निकाल उसके हाथ में रख दी…
…-“ससुराल वालों के साथ डिनर पर पहली बार जा रही है बेटा! साड़ी पहन कर चल, उन्हें भी अच्छा लगेगा।”
    पिया ने मुहँ बनाकर साड़ी ली और बदलने चली गयी…

******

   अगले दिन सुबह कोर्ट के समय से कुछ पहले ही समर राजा और आदित्य कोर्ट में पहुंच चुके थे। कुछ देर में ही ठाकुर साहब के वकील भी अपने लाव लश्कर के साथ वहां पहुंचकर समर की ओर देखते हुए उन्होंने एक अजीब सी मुस्कान उसे दी और अपने कागज पत्तर सही करने लग गए।
   न्यायाधीश महोदय के आते ही न्यायालय की कार्य प्रक्रिया शुरू हो गई। आज सबसे पहले ठाकुर साहब के वकील के द्वारा जमा किए गए सबूतों को कोर्ट द्वारा अवलोकन करना था।
    न्यायाधीश महोदय के सामने जैसे ही सबूतों को रखा गया उन्होंने देखा कि वह लिफाफा पूरी तरह से खाली था। न्यायाधीश महोदय ने सवालिया नजरों से ठाकुर साहब के वकील की तरफ देखा ठाकुर साहब के वकील पहले ही इस बात के लिए तैयार बैठे थे….-” देख लिया न्यायाधीश महोदय मैंने पहले ही कह रखा था ठाकुर साहब के खिलाफ वाद दायर करने वाली पार्टी कोई ऐसी वैसी पार्टी नहीं है। राजा अजातशत्रु का नाम यूं ही नहीं लिया जाता, इन्होंने एक बार फिर अपनी चाल चली और उनके वकील ने मेरे द्वारा जमा किए सारे सबूतों को गायब करवा दिया है।”

समर इस बात के लिए पहले ही तैयार बैठा था उसके चेहरे पर एक मुस्कुराहट खिल गई।

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ठाकुर साहब के वकील अपनी रौ में बोलते चले गए…..-” हुजूर मैं बचाव पक्ष का वकील हूं इसलिए आपकी और मेरे अजीज दोस्त समर की नजरें मुझ पर गड़ी हुई हैं, कि मैं किस तरह से अपने मुवक्किल ठाकुर साहब का बचाव करता हूं। लेकिन इसके पहले मैं यही कहना चाहूंगा कि हम जिनके खिलाफ खड़े हैं वह काफी मजबूत पक्ष है। ठाकुर साहब जैसे व्यक्तित्व को डिगाने के लिए उन्हें गिराने के लिए किसी बहुत मजबूत इंसान का उनके सामने खड़ा होना बहुत जरूरी है। जैसा कि आप जानते हैं ठाकुर साहब एक इमानदार और कर्मठ व्यक्तित्व हैं इसलिए उनके समक्ष खड़े होने के लिए समर और उनके मुवक्किल राजा अजातशत्रु सिंह और रानी बांसुरी अजातशत्रु सिंह को इस हद तक नीचे गिरना पड़ा कि मेरे द्वारा लाए सबूतों को भी उन लोगों ने गायब कर दिया। अब इसी से आप यह अंदाजा लगा सकते हैं कि राजा अजातशत्रु के मन में हार का कितना भय हैं । उन्हें लगा कि इन्होंने जो भी एलिगेशन मेरे मुवक्किल ठाकुर साहब पर लगाए हैं वह सत्य तो प्रमाणित हो नहीं पाएंगे उल्टा रानी बांसुरी पर मैंने प्रतिवाद दायर कर दिया, जिसका अब तक इनकी तरफ से कोई भी सही जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया है। अब ऐसे में इन लोगों का डर कर मेरे द्वारा दाखिल किए गए सबूतों को गायब कर देना यही दिखाता है कि हमारी जीत पक्की है हुजूर। मैं आपसे गुजारिश करता हूं कि  मुझे सबूत इकट्ठा करने में कुछ और वक्त लगेगा इसलिए केस की अगली तारीख को कुछ महीनों के लिए मुल्तवी कर दिया जाए।”

  समर जानता था कि ठाकुर साहब के वकील का मुख्य उद्देश्य सिर्फ केस को जितना हो सके उतना लंबा खींचना था जिससे कि केस लंबा चलता रहे और ठाकुर साहब आराम से बाहर तफरीह कर सकें….
  समर अपनी जगह से उठ कर खड़ा हो गया..-” माननीय न्यायाधीश महोदय अब मैं अपने विचार आपके सम्मुख रखना चाहता हूं। हमारी वकालत के भी कुछ नियम होते हैं वैसे वकील साहब का अनुभव मेरी उम्र से भी कहीं ज्यादा है तो यह मुझसे कहीं ज्यादा इस बात को समझते होंगे कि जब हम न्यायालय में सबूत प्रस्तुत करते हैं तब उन साक्ष्य की दो से तीन प्रतियां बनवाई जाती हैं। एक प्रति हम अपने पास सुरक्षित रखते हैं एक प्रति अपने मुवक्किल के मार्गदर्शन में उनके ऑफिस में जमा की जाती है। एक प्रति हमारे खुद के ऑफिस में जमा होती है। और इसके साथ ही 2 प्रतियां न्यायालय में हम जमा करते हैं । ऐसा करने का कोई स्थिर प्रोटोकॉल हमें नहीं दिया जाता यह हम करते हैं सिर्फ अपनी सुविधा के लिए।
    ऐसा हम इसीलिए करते हैं जिससे अगर कोई भी प्रति कहीं गुम हो जाए तो बाकी प्रतियों के सहायता से कोर्ट में केस आगे बढ़ाया जा सके और कोर्ट का समय खराब ना हो। इसी बाबत मैं वकील साहब से जानना चाहता हूं कि उन्होंने अगर एक प्रति न्यायालय में जमा की थी तो बाकी की प्रतियां उनके पास मौजूद होनी चाहिए तो ऐसे में वह अपनी बाकी की प्रतियों को यहां जमा कर सकते हैं जिससे कि माननीय न्यायालय का समय खराब ना हो और कोर्ट केस को आगे बढ़ाया जा सके।
    लेकिन अगर इस वक्त वही कहते हैं कि उनके पास सबूतों और साक्ष्यों की एक ही प्रति मौजूद थी जो उन्होंने न्यायालय में जमा कर दी थी तो इसे उनकी गैर जिम्मेदाराना हरकत मानते हुए कोर्ट उन पर भी सवाल लगा सकता है।
          जहां तक यह बार-बार ठाकुर साहब को एक कर्मठ और इमानदार व्यक्तित्व बता रहे हैं, तो इस हिसाब से हिंदुस्तान ही नहीं सारी दुनिया के वह सारे खूनी हत्यारे ड्रग डीलर और गुनाहगार बेगुनाह साबित हो जाते हैं और ईमानदार और कर्मठ साबित हो जाते हैं ,क्योंकि उन लोगों ने भी हत्याएं जरूर की चोरी डकैती जरूर किए गुनाह जरूर किए लेकिन वह अपने स्वयं के लिए तो इमानदार ही थे। उन्होंने अपने आप से तो कभी कोई बेईमानी नहीं की। अपने परिवार के लिए वो सदा कर्मठ रहे और इसीलिए पैसे कमाने की ललक और जुनून ने उन्हें गुनाहों के दलदल में धंसा दिया ।
     तो इस तरह से ठाकुर साहब वाकई एक कर्मठ और इमानदार व्यक्तित्व हैं। उन्होंने भले ही कितनी भी नृशंस हत्याएं की  लेकिन यह खून उन्होंने अपने खुद के व्यापार को बढ़ाने के लिए किए। उन्होंने जहरीली शराब  जरूर बनाकर बेची लेकिन इसे बेचने के पीछे उनका उद्देश्य था पैसों की कमाई और पैसों की कमाई इसलिए जरूरी थी कि उन्हें अपने घर परिवार को पालना था।
  उन्होंने गैर कानूनी ढंग से हथियारों को खरीदा और बेचा लेकिन यह भी उनके व्यापार का एक हिस्सा था और अपने व्यापार को चलाने के लिए व्यापारी किसी भी हद तक बेईमानी कर सकता है और इस तरह की बेईमानी बेईमानी नहीं मानी जाती बल्कि ठाकुर साहब तो एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तित्व बनकर उभरे।
    उनका साथ देने वाले जिन व्यापारियों की फौज वकील साहब ने खड़ी की है वह सारे के सारे ठाकुर साहब की ही तरह ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति हैं। न्यायाधीश महोदय मैं आपसे बताना चाहता हूं कि शहर और आसपास के इलाकों में जितनी भी गुंडागर्दी गैरकानूनी ढंग से हथियारों और ड्रग्स की सप्लाई आदि इत्यादि के काम फैले हुए हैं इन सब के पीछे ठाकुर साहब और इनकी सेना का ही नाम है। मैं यह लिखित में साक्ष्य आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं । जिन्हें पढ़कर आप मेरी बात को और भी अच्छे से समझ सकते हैं। इन सभी में ठाकुर साहब के किए कानूनी गैरकानूनी धंधों का कच्चा चिट्ठा तो है ही लेकिन इसके साथ ही वह सारे व्यापारी जो रानी बांसुरी के खिलाफ एकजुट होकर ठाकुर साहब के पास मदद मांगने गए थे उनके भी कारोबार का कच्चा चिट्ठा लिखा हुआ है। रानी बांसुरी जब दून में एडिशनल कलेक्टर बनकर आई तो उन्होंने आते ही पूरे जिले की बागडोर संभाल ली । यहां आते ही जैसे ही उन्हें इन व्यापारियों के गैरकानूनी धंधों के बारे में पता चला उन्होंने सभी के सब को एक साथ नोटिस जारी कर दिया।
   एक औरत जैसे ही कानून का सहारा लेकर इन सभी के गैरकानूनी कामों के सामने आकर खड़ी हुई तो वह इन सब की आंखों में चुभने लगी, वह रोड़ा बन गई इन लोगों के कामों के लिए और इसीलिए उन्हें फंसाने के लिए यह लोग एक पर एक चाल चलने लगे। रानी बांसुरी का कार्यकाल इतना साफ और सफेद था कि उन पर दाग लगाना इतना आसान भी नहीं था। और इसीलिए यह सब मिलकर ठाकुर साहब को साथ ले रानी बांसुरी के खिलाफ जंग लड़ने को निकल पड़े। यह लोग इतने गिरे हुए हैं न्यायाधीश महोदय कि इन्होंने रानी बांसुरी पर जानलेवा हमला करने से पहले भी नहीं सोचा कि वह एक औरत को उसके कर्तव्यों से डिगाने के लिए उसकी जान भी ले सकते हैं ।
    लगभग दो तीन बार रानी बांसुरी पर ऑफिस आते और जाते समय प्राणघातक हमला ठाकुर साहब द्वारा करवाया गया  और इस दौरान ठाकुर साहब खुद वहाँ मौजूद थे जिसके सबूत मेरे पास हैं।

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   समर ने एक और लिफाफा न्यायाधीश महोदय की ओर बढ़ा दिया लेकिन उसके ऐसा करते  ही कोर्ट में पीछे कहीं बैठे ठाकुर साहब अपना कंबल हटा कर जोर से चिल्ला उठे….-” इसकी बातों में कोई सच्चाई नहीं है हुजूर। इसकी सारी बातें गलत है । झूठ है, यह ना जाने कहां से फर्जी और झूठे सबूत उठाकर ले आया है। मैंने आज तक ऑफिस से आते और जाते वक्त बांसुरी पर जानलेवा हमला नहीं करवाया। समर मेरे केस को कमजोर करने के लिए सिर्फ मनगढ़ंत बातें कर रहा है और आपके सामने नकली सबूत पेश कर रहा है मैं जानता हूं अच्छे से…

अपनी बात पूरी करते हुए अचानक ठाकुर साहब चुप हो गए।उन्हें  समझ आ गया था कि उनसे बहुत बड़ी गलती हो गयी है।अब तक उनके पीछे से उनकी पीठ पर पुलिस वाले अपनी गन तान चुके थे। और उन्हें हाथ से पकड़ कर कोर्ट के सामने  लाकर खड़ा कर चुके थे।
    ठाकुर साहब के वकील ने ठाकुर साहब को इस तरह कोर्ट की कार्यवाही के बीच कूदते देखा और अपने सर पर हाथ मार कर एक तरफ बैठ गया। उसे महसूस हो गया था कि वो समर के जाल में फंस चुके है। ठाकुर साहब की अनुपस्थिति को वह अब तक राजा अजातशत्रु पर इल्जाम के रूप में लगाते आये थे,अब ठाकुर साहब के अचानक इस तरह यहाँ प्रस्तुत हो जाने से उन्हें इस केस से बचाने का उसका काम अधूरा रह जाने वाला था। उसने समर की ओर देखा, समर ने उन्हें देख कर अपने हाथ जोड़ दिये और धीमे से गुनगुना कर कुछ कह गया…-” वो क्या है ना आपका अनुभव कहीं अधिक है मेरी उम्र से लेकिन मेरी उम्र कमबख्त बावली और सिरफिरी है।”
वकील साहब भी उसे देख मुस्कुरा उठे…-” आज के पहले तो ये यहाँ नही आये, आज इन्हें यहाँ तक कैसे पहुंचा दिया? “
               उनके सवाल पर समर एक किनारे खड़ा मुस्कुराता रहा… उसने पीछे देखा, कोर्ट रूम के दरवाजे पर एक आदमी अपना चेहरा आधा ढके खड़ा था उसने आंखों ही आंखों में समर को अभिवादन किया समर ने भी धीरे से बाकियों की नजर बचाकर उसके अभिवादन को स्वीकार किया और मुस्कुराकर ठाकुर साहब की तरफ देखने लगा।
   यह वही आदमी था जिसे समर ने 1 दिन पहले फोन करके ठाकुर साहब को कोर्ट तक पहुंचाने की बात कही थी……
….

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क्रमशः

aparna….
    

जीवनसाथी – 115

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     जीवनसाथी 115

   वकील साहब ने अपनी जिरह समाप्त करने के बाद एक सबूतों का लिफाफा न्यायाधीश महोदय की तरफ बढ़ा दिया, लेकिन सुबह से चल रही जिरह में कोर्ट का समय समाप्त हो चुका था। उन सबूतों को कोर्ट में ही संभाल कर रख लिया गया। और न्यायाधीश महोदय ने कोर्ट की समय समाप्ति की घोषणा कर दी। केस की अगली तारीख दो दिन बाद के लिए तय करके न्यायाधीश महोदय ने उस दिन के समापन की घोषणा कर दी।

   राजा समर और आदित्य के साथ बाहर चला आया। यह तीनों लोग हवेली के लिए निकल गए….
आदित्य के चेहरे से नजर आ रहा था कि वह बहुत गुस्से में था । उसने समर की तरफ देखा और बोलना शुरु कर दिया…-” हद दर्जे का बदतमीज वकील था। जिस तरह से भाभी साहेब के लिए उल्टा सीधा कह रहा था मुझे तो डर था कहीं राजा भैया उठ के वही उसका मुंह ना तोड़ दें।”
” राजा अजातशत्रु हैं यह! हर काम अपने पद की गरिमा अनुरूप ही करते हैं। “
समर के जवाब पर राजा मुस्कुराने की कोशिश करने के बावजूद मुस्कुरा नहीं पाया…-” तुम सही कह रहे हो आदित्य! बांसुरी पर लगाए झूठे आरोप सुन सुनकर मुझे भी बहुत बुरा लग रहा था। लेकिन कोर्ट की कार्यवाही के बीच  मेरा कुछ भी कहना सही नहीं होता।”
राजा की बात पर आदित्य ने हां में सिर हिला दिया…-” जी आप सही कह रहे हैं भैया! लेकिन समर अब क्या सोचा है आगे इनके लिए?”
“तुम परेशान मत हो आदित्य! इनकी एक-एक बात झूठी और खोखली है। इनकी बातों का कोई साक्ष्य कोई सबूत इनके पास नहीं है। इसलिए बड़ी चालाकी से वकील साहब ने कोर्ट रूम की समय समाप्ति तक उल्टी सीधी दलीलें देकर समय को खींचा, और उस समय अपने सबूत पेश किए जिस वक्त कोर्ट के पास सबूत देखने का वक्त ही नही बचा।
  इसका कारण यही है कि वकील के पास कोई सबूत हैं ही नही। लेकिन इतनी लंबी चौड़ी कहानी के साथ सुबूत तो देने ही पड़ते हैं। सो दे दिये , अब जब अगली तारीख पर सबूत खुलेंगे, तब ये वकील साहब एक बार फिर वहीं नाटक करेंगे जो आज ठाकुर साहब की अनुपस्थिति के लिए किया …
  इनका कहना होगा कि मैंने तो रखे थे, जाने सारे सबूत गायब कहाँ से हो गए?”
   आदित्य ध्यान से समर की बातें सुन रहा था!
” लेकिन ये तो बहुत बड़ा रिस्क ले लिया वकील साहब ने। क्योंकि अगर जज साहब लिफाफा खोल लेते तो?”
” अगर उसी वक्त लिफाफा खुलता तब भी ये वहाँ यही एक्टिंग करते कि अरे सबूत कहाँ गए? मैंने तो यहीं रखे थे। ये सब इनकी चाल है और इनकी ही चाल से हमें इन्हे मात देनी है। वैसे भी सोच कर देखो उनके पास किस बात का सबूत होगा? जब उनकी कोई बात तथ्यपरक है ही नही…
         न रानी बाँसुरी की आई ए एस की परीक्षा पर उन्होंने सच बोला! न उनके और राजा साहब के विवाह पर। खैर एक बात जरूर उनकी सच थी, लेकिन अफसोस की बात है कि उसके लिए भी उनके पास सबूत नही है। “
   बातों ही बातों में वो लोग हवेली पहुंच चुके थे..
“उनकी कौन सी बात सच थी समर? “
आदित्य के सवाल पर समर मुस्कुराने लगा…. -” पहले कुछ खा पी तो लीजिये राजकुमार आदित्य ! फिर आपको सारी बातें बता दूंगा। “
राजा भी आदित्य की तरफ देखने लगा जैसे उसे भी समर की कोई बात समझ में न आई हो ….
समर मुस्कुरा कर एक तरफ बैठ गया…-” हुकुम सुबह से आपने भी कुछ नही खाया पिया है। मुझे लगा नही था कि ठाकुर साहब का वकील बात को इतना लंबा खींच लेगा। आपको वहाँ तकलीफ हुई उसके लिए माफी चाहता हूँ। आप लोग जल्दी ही कुछ खा पी लीजिये फिर आप लोगों को किसी से मिलवाना है।”
   आदित्य और राजा आश्चर्य से उसे देखने लगे… केसर और प्रेम भी आ चुके थे।
राजा कुछ और पूछ पाता कि बाँसुरी का फ़ोन आ गया, उसका हालचाल लेने के बाद उसने फोन ज़रूर रख दिया लेकिन उसके चेहरे से ज़ाहिर हो रहा था कि उसे इस वक्त बाँसुरी के साथ न रह पाना मन ही मन कितना साल रहा है। सबका खाना पीना निपटते ही आदित्य एक बार फिर समर की तरफ देखने लगा…- “छोटे कुंवर सा उतावले बहुत हैं। “और समर मुस्कुरा कर अपनी जगह पर खड़ा हो गया.. आदित्य की समझ से परे था कि इतने खराब दिन के बावजूद समर मुस्कुरा कैसे ले रहा है?
   -” आइये हुकुम आपको और बाकी लोगों को मुझे कुछ दिखाना है? आप सभी के लिए तोहफा है। “

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   समर के पीछे सभी उठ गए …
हवेली बहुत पुरानी बनी थी। उस ज़माने में हवेली जितनी सतह से ऊपर नज़र आती थी उतनी ही भीतर भी होती थी। एक तरह से तहखाने की शक्ल में ! समर आगे सीढियां उतरता तहखाने की तरफ बढ़ गया…-“कहाँ लेकर जा रहे हो समर?” राजा के सवाल पर वो मुस्कुरा उठा…-” आप सभी के सवालों के जवाब से मिलवाने!”
   तहखाने में अलग अलग कई कमरे थे। एक कमरे के बाहर मोटे कांच की दीवार थी जिसके उस पार बाहर खड़ा इंसान तो देख सकता था लेकिन भीतर रहने वाले को कुछ नज़र नही आता।
    ऐसी ही एक दीवार के सामने समर खड़ा हो गया। उसके पीछे आये सभी उसके आसपास खड़े आश्चर्य से कमरे के अंदर का हाल देख रहे थे।
  अंदर ठाकुर साहब बैठे मज़े से खाना खा रहे थे..-” ये क्या समर? तो इसका मतलब ये यहाँ हैं। इसका मतलब इनका वकील सही कह रहा था कि इन्हें हम लोगों ने किडनैप कर रखा है। “
” अब जो सोच लीजिये आप लोग। हमने किडनैप कर रखा है या ये खुद अपने शौक से यहाँ है!”
” क्या मतलब ? समर मैं भी तुम्हारी बात नही समझा?” राजा के सवाल पर समर ने एक नज़र ठाकुर पर डाली और बोलने लगा…-” ठाकुर साहब को साथ लेकर पुलिस वाले जब दून आ रहे थे। तब हम सभी जानते ही थे कि वो पुलिस कस्टडी से भागेंगे ही। इसी तरह वो भी जानते थे कि हम उन्हें भागने नही देंगे। तब उन्होंने एक पुलिस वाले को पैसों का लालच देकर अपनी तरफ मिलने का ऑफर दिया। उन्हें इसमें सफलता मिल गयी। उस पुलिस वाले ने उनसे हाथ मिला लिया। जब ठाकुर साहब ने उससे कहा कि दूर जाते समय वह किसी भी तरह बीच रास्ते से भाग निकलेंगे तब उस पुलिस वाले ने एक मोटी रकम के बदले उनसे वादा किया कि वह उनके भागने में उनकी पूरी मदद करेगा।
ठाकुर साहब यही चाहते थे क्योंकि उन्हें मालूम था अगर वह पुलिस कस्टडी में रहेंगे, तो उन पर केस भी बनेगा और कोर्ट में उन्हें पेश भी होना पड़ेगा।  ऐसे में सारे सबूतों के आधार पर कोर्ट उनके खिलाफ ही  फैसला देगी। क्योंकि  जिस वक्त ठाकुर साहब पुलिस के द्वारा पकड़े गए उस वक्त भी वह राजा अजातशत्रु के ऊपर गोली चलाने के लिए ही वहां खड़े थे ,और उनकी चलाई गोली से राजमाता की मृत्यु हो गई थी। तो असल में पहला मुद्दा कोर्ट पर पेश करने का तो यही है क्योंकि इस केस में राजमाता की मृत्यु भी हुई है। इसलिए वह सीधे-सीधे हत्या के आरोपी कहलाते हैं । इसके अलावा रानी बांसुरी के तैयार किए गए केस भी उन पर चलने ही थे। इन सभी से एक साथ बचने का उपाय उन्हें यही लगा कि वह पुलिस की कस्टडी से भाग जाएं और कहीं गुमनाम ज़िन्दगी जियें। जब मामला ठंडा पड़ जाता, तब वह एक बार फिर अपने कारनामों में लिप्त हो जाते ।
   जैसा जैसा उन्होंने प्लान किया था सब कुछ वैसा ही होता गया। उन्होंने उस पुलिस वाले की सहायता से अपने कुछ आदमियों से बात की और एक जगह निश्चित कर उन्हें उनका इंतजार करने को कहा। उसी वक्त पर अपने प्लान के मुताबिक वह ट्रेन से उतर कर भाग गये। पुलिस वाले ने वाकई उनकी बहुत मदद की थी । तयशुदा जगह पर ठाकुर साहब के आदमी अपनी गाड़ी में उनका इंतजार कर रहे थे। ठाकुर साहब उन दोनों आदमियों को पहचानते तो नहीं थे, लेकिन उन्हें अपने आदमियों पर पूरा विश्वास था। वह निश्चिंतता के साथ उनकी गाड़ी में बैठकर निकल गये। ठाकुर साहब को मालूम नहीं था कि शुरू से उनके इस प्लान में मैं उनका साथ दे रहा था, क्योंकि मैं चाहता था कि वह पुलिस कस्टडी से भाग जाएं।
  वह पुलिस वाला जिसने ठाकुर साहब की मदद की, असल  में मेरा आदमी था। ट्रेन से उतरने के बाद ठाकुर साहब को भागने में मदद करने वाले सारे लोग मेरे ही थे । ठाकुर साहब के आदमी उन्हें उन्हीं के अनुसार खुफिया जगह पर ले आए।
    आज भी ठाकुर साहब यहां बड़े मजे से हैं। उनके आदमियों ने उन्हें यही कहा है कि सुरक्षा कारणों के कारण ही उन्हें ऐसी खुफिया जगह में रहना पड़ रहा है। इस जगह की सबसे अच्छी बात यह है कि ठाकुर साहब के पास मोबाइल होते हुए भी उनका नेटवर्क यहां पर काम नहीं करता , लेकिन आप लोगों का नेटवर्क काम नहीं कर रहा है ऐसा नहीं है। उनके नेटवर्क को मैंने जाम कर रखा है। ठाकुर साहब को यह नहीं लगना चाहिए कि मैंने उन्हें किडनैप किया है। उन्हें अब भी यही लगता है कि वह अपने आदमियों के साथ हैं, और पूरी तरह सुरक्षित हैं। और उनका हम लोग कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।
  यहां पर बैठे ठाकुर साहब अपना मास्टर प्लान बना रहे हैं।  और वह यह नहीं जानते कि उनका मास्टर प्लान असल में मेरा मास्टर प्लान है।”
” पर वह इन अनजान लोगों पर भरोसा कैसे कर बैठे?”
” भरोसा ना करने का कोई कारण ही नहीं बनता। एक तो इन लोगों में से दो-तीन लोग उनके पुराने खास हैं। जिन्हें मैंने अपनी तरफ मिला लिया था। बाकी के लोग मेरे हैं, जिनके बारे में ठाकुर साहब को यह लगता है कि यह नए रिक्रूट किये बंदे हैं।
हुकुम मुझे माफ कीजिएगा मैं जानता हूं आप सारी लड़ाइयां नियम कायदे कानूनों में रहकर लड़ना चाहते हैं। लेकिन कुछ ऐसे लोग आज भी जमाने में हैं जिनके लिए हमें भी नियम कायदों से अलग हट कर चलना पड़ता है।
” वह तो ठीक है समर लेकिन इन्हें इस तरह यहां रखने का क्या औचित्य है? मेरा मतलब है इससे हमें क्या फायदा होगा?”
” कोर्ट की अगली तारीख पर आप लोगों को फायदा भी समझ में आ जाएगा। आइये तब तक बाहर चलतें हैं। “
” पर समर तुमने ये सब किया कब और क्यों? “राजा के सवाल पर समर मुस्कुरा उठा…-“बस कर लिया हुकुम! आप राजा हैं। आपके लिए नीति नियमों का पालन करना आवश्यक है लेकिन मैं मंत्री हूँ, मुझे बस मेरे राजा के हितों को ध्यान में रख कर काम करना होता है। और मैं उसके लिए किसी भी हद तक जा सकता हूँ। आपके लाभ के लिए मुझे कुछ भी करने से परहेज़ या गुरेज नही है। आइये अब हम सब ऊपर ही चलतें हैं। अगली तारीख पर मुझे मौका मिलेगा मेरी बात रखने का। तब आप लोग समझते जाएंगे कि मेरे ऐसा करने के पीछे क्या कारण है। तब तक चलिए आप लोग भी आराम कीजिये….

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   अगली सुबह भी समर कुछ कामों में व्यस्त था.. उसका फ़ोन लगातार बज रहा था लेकिन किसी भी तरह का व्यवधान न आये इसलिये उसने फ़ोन को साइलेंट में रखा हुआ था।
  पिया ने उसे मेसेज भेजा था , जिसे अब तक समर ने नही देखा था… -”   मैं जानती हूँ, तुम मुझे जानबूझ कर अवॉयड कर रहे हो ना! मैंने तुम्हारा मेसेज समय पर नही देखा, इसलिए तुम भी मेरे साथ वही कर रहे हो ना।
  समर प्लीज़ मेरा कॉल तो उठा लो।”

  कोर्ट केस के पेपर्स ,वकील साहब के सिलसिलेवार जवाब तैयार करने में समर अपने फ़ोन पर ध्यान ही नही दे पाया। उसका एक और नम्बर था जो सिर्फ राजमहल के लोगों को मिलता था और जिससे राजमहल के लोगों से सम्पर्क में रहा जा सकता था! ये नम्बर सुरक्षा कारणों से बाहर वालों को नही दिया जाता था। इसी नम्बर पर फिलहाल समर ने अपनी माँ से बात कर उन्हें अपनी जानकारी दे दी थी। लेकिन पिया को बताना उसके दिमाग से निकल गया था। फ़ोन चार्ज नही होने के कारण पिया के इक्कीस मिस्ड कॉल्स के साथ ही समर का फोन बंद हो गया और समर पिया के मैसेज भी नही पढ़ पाया।
   पिया भी कुछ अधीर थी, अपना फ़ोन उठाये जाते न देख कर उसने एक आखिरी मेसेज और भेज दिया…
“अब अगर तुमने मेरे इस मैसेज का भी कोई जवाब नही दिया तो मैं उसी लड़के को शादी के लिए हाँ कह दूँगी जिसे उस दिन मेरे साथ देख कर तुम जल भुन गए थे।
   प्लीज़ समर एक बार तो फ़ोन उठा लो। आखिर किस बात की इतनी नाराज़गी है। “

   पिया ने मेसेज भेजने के बाद कई बार देखा जांचा लेकिन समर का कोई जवाब नही आया। पिया को लगा नाराज़गी में समर जवाब नही दे रहा।
आखिर वो भी कब तक रास्ता देखती गुस्से में उसने अपनी माँ को फ़ोन लगा लिया….- ” मम्मी आपने जिस लड़के के लिए मुझे कहा था न ,उसके लिए मैं तैयार हूँ। “

पिया की माँ की आंखे आश्चर्य से खुली रह गयीं। उन्होंने नही सोचा था कि उनकी नखरीली इतनी आसानी से उनके पसन्द किये रिश्ते के लिए हाँ बोल देगी….-” क्या ? तू सच तो बोल रही है ना? फिर कहीं ये मत कर देना की मैं लड़के वालों के घर हाँ बोल दूँ और तू मुकर जाए। “
” नही माँ ! तुम हाँ बोल दो। अब नही मुकरना मुझे। बस अब ज़िन्दगी तुम्हारे फैसलों के हिसाब से चलेगी।”

” क्या हुआ पिया ? तू कुछ परेशान लग रही है। वहाँ अस्पताल में कुछ हुआ क्या?”

” हाँ यही समझ लो । अब बहुत परेशान हो गईं हूँ। वहीं बीमारियां, उदासियां, कलपते तड़पते लोग। मैं भी कितना सहूँ , मेरी भी तो सहनशीलता की एक सीमा है ना। मैं अब थकने लगीं हूँ माँ। हो सके तो मेरे पास आ जाओ। “
” ठीक है बेटा! तू परेशान न हो मैं और तेरे पापा कल ही तेरे पास आ जातें हैं। पंडित जी से मुहूर्त निकलवा कर आऊंगी, जिससे वहीं तेरी सगाई भी निपटा लें। अपना ख्याल रखना पिया।”
      मन में समर से नाराज़गी थी और उसी नाराज़गी में पिया ने बिना सोचे समझे इतना बड़ा निर्णय ले लिया।
   समर क्या सोच रहा है, उसने क्यों फ़ोन नही उठाया, उसने क्यों किसी मेसेज का जवाब नही दिया, बिना सच जाने पिया ने अपना रास्ता ही बदलने का फैसला ले लिया था। और उसके इस फैसले से अनजान समर वहाँ अपने केस की तैयारियों में लगा था….

क्रमशः

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दिल से….

   प्यारे दोस्तों आप सभी के मुझ पर प्यार और विश्वास ने मुझे खुद पर भरोसा करना भी सीखा दिया। आप सबने जिस तरह मेरे ब्लॉग पर आकर मेरा हौसला बढ़ाया है उसके लिए वाकई मेरे पास शब्द नही है। देखा जाए तो असली सुपर फैन्स के टैग आप सभी को मिलता है।
  हम जब किसी मज़बूत प्लेटफॉर्म पर लिखते हैं तब हमें काफी सारी चीज़ें वहाँ अपने आप मिल जाती हैं लेकिन जब हम अपना पर्सनल ब्लॉग लिखना शुरू करतें हैं तब काफी सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। लेकिन आप सब के साथ ने मुश्किलों को बहुत आसान कर दिया।
जिसके लिए आप सब की शुक्रगुज़ार हूँ।
एक और बात आप सब से कहनी थी, वो ये की अब मेरे ब्लॉग के बारे में मैं प्रतिलिपी पर चर्चा नही कर सकती लेकिन आप सब तो स्वतंत्र हैं क्योंकि आप वहाँ के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है । जी हाँ क्योंकि आप पाठक हैं। और एक पाठक के बिना न लेखक का कोई अस्तित्व है और न ही किसी लेखन प्लेटफार्म का।
  आपको ज्यादा कुछ नही करना है। अगर आपको मेरा ब्लॉग पर लिखना गलत नही लगता तो आप अपने बेहद करीबी दोस्तों से भी मेरा ब्लॉग लिंक शेयर कर सकतें हैं।
   आप लगभग 250 लोग हैं , अगर आप सब 5-5 लोगों को भी जोड़ सकें तो काफी लोगों को यहाँ पहुंचने में मदद मिल सकती है।
प्रतिलिपी नही छोड़ना चाहती क्योंकि वहाँ भी पाठक हैं और कुछ ऐसी आदरणीया पठिकाएँ  भी हैं जो नए नए एप पर आकर मुझे नही ढूंढ सकती।
  इसलिए लिखती वहाँ भी रहूंगी लेकिन सबसे पहले सारी रचनाएं सिर्फ मेरे ब्लॉग पर ही प्रकाशित होंगी।
  एक बार फिर आप सभी का हृदयतल से आभार व्यक्त करती हूँ।

आपकी
aparna…..

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जीवनसाथी -114

कोर्ट केस

        जीवनसाथी – 114

   अपनी बात कहते कहते वकील साहब कुछ देर को थम गए और अपनी टेबल पर जाकर पानी का गिलास उठा लिया, समर ने उनकी तरफ घूर कर देखा और न्यायधीश महोदय से कुछ कहने ही वाला था, कि वकील साहब ने अपनी बात आगे बढ़ कर फिर रख दी..

  ” समर बाबू अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई है।  आपकी मुवक्किल रानी बांसुरी ने जो भी और जितने भी आरोप ठाकुर साहब पर लगाएं हैं उन सारे आरोपों का जवाब एक-एक कर दूंगा आप बस सुनते रहिए……
      हां तो माननीय न्यायाधीश महोदय इनकी मुवक्किल रानी बांसुरी ने वही काम किया है जिसके लिए मैं कहना चाहूंगा उल्टा चोर कोतवाल को डांटे।
  
   रानी बांसुरी ने जितने भी आरोप-प्रत्यारोप ठाकुर साहब पर लगाए उन सभी का एक मुख्य कारण तो मैं आपको बता ही चुका हूं, वह है अपनी रियासत की तिजोरी भरना। लेकिन इस सबके पीछे रानी बांसुरी के दिमाग के भीतर चल रहा जो षड्यंत्र था, अब मैं जरा उस पर नजर डालना चाहूंगा। बात जरा पुरानी है न्यायाधीश महोदय।
    हुआ यूं कि ठाकुर साहब के संबंध रियासत के महाराजा जी के साथ बहुत ही गहरे और अच्छे थे। इन दोनों मित्रों ने अपनी मित्रता को रिश्तेदारी में बदलने का सपना संजोया था। उस सपने को पूरा करने के लिए महाराज ने स्वयं आगे बढ़कर ठाकुर साहब की बेटी का रिश्ता अपने बेटे राजा अजातशत्रु के लिए मांग लिया था।
   रिश्ता रियासत की तरफ से ठाकुर साहब के घर गया था । इतने बड़े लोगों का रिश्ता पाकर ठाकुर साहब खुद को भी सम्मानित महसूस कर रहे थे। उनके पास मना करने का कोई भी कारण नहीं था। बेहद खुशी के साथ उन्होंने अपनी बेटी रेखा का रिश्ता राजा अजातशत्रु से तय करने को अपनी सहमति दे दी।
   लेकिन इस सबके बीच में रानी बांसुरी अचानक से किसी पके हुए फल की तरह टपक पड़ी।
   एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की होते हुए भी उन्होंने राजकुमार अजातशत्रु को अपने रूप से अपने प्रेम जाल में फंसा लिया। उसके बाद उन पर भावुकता से इतना दबाव बनाया कि राजकुमार अजातशत्रु  बांसुरी के अलावा किसी और के बारे में सोच भी ना पाए।
    उस वक्त राजकुमार अजातशत्रु बेहद परेशान थे, क्योंकि वह अपनी रियासत के खिलाफ भी नहीं जाना चाहते थे और बांसुरी को भी नहीं छोड़ पा रहे थे। क्योंकि आखिर वह है तो राजपूती खून , अपनी जबान से फिरना उन्होंने सीखा नहीं इसीलिए उनसे धोखेबाजी नहीं हो पा रही थी।
    उन्होंने अपने मन की इस पीड़ा को अपनी मां से साझा किया, तब उनकी मां, वह स्वयं और महाराजा जी मंत्रियों के साथ बैठकर परिचर्चा में लग गए। वह सभी ऐसा कोई उपाय निकालना चाहते थे कि ठाकुर साहब के साथ बना रिश्ता भी ना टूटे और राजकुमार अजातशत्रु का दिल भी ना टूटे।
   बड़ी अजीब सी मुश्किल परिस्थितियों में महल का भविष्य अटका पड़ा था। तब महारानी ने यह फैसला निकाला की राजकुमार अजातशत्रु की शादी बांसुरी से जरूर कर दी जाएगी लेकिन उसके बदले में राजकुमार अजातशत्रु को अपनी गद्दी छोड़नी पड़ेगी। जिससे गद्दी पर उनके छोटे भाई राजकुमार विराज सिंह को बैठाया जाए और ठाकुर साहब की बेटी रेखा की शादी विराज सिंह के साथ कर दी जाए , जिससे ठाकुर साहब को भी अपमानित ना होना पड़े क्योंकि भले ही अजातशत्रु से ना हो लेकिन अगर उनकी बेटी का विवाह रियासत के होने वाले राजा से हो जाए तो ठाकुर साहब को दिए गए वचन का पालन भी हो जाएगा।

  महारानी जी ने अपनी कुशाग्र बुद्धि का परिचय देते हुए बहुत ही त्वरित और बहुत सुंदर निर्णय लिया था। इस निर्णय पर महल में किसी को आपत्ति नहीं थी। स्वयं राजकुमार अजातशत्रु को भी आपत्ति नहीं थी, लेकिन जब बांसुरी जी को इस बारे में पता चला तो वह तिलमिला गई क्योंकि उस साधारण से मध्यमवर्गीय लड़की का मुख्य उद्देश्य तो इस रियासत की महारानी बनना ही था। राजकुमार अजातशत्रु से शादी होते ही अजातशत्रु की गद्दी विराज के हाथों सौंप दी जाती और उस स्थिति में बांसुरी कभी भी रानी बांसुरी नहीं बन पाती लेकिन उस वक्त परिस्थितियां इतनी उलझ गई थी कि बांसुरी से कुछ और करते नहीं बना और उन्होंने राजकुमार अजातशत्रु से विवाह कर लिया।

विवाह होते ही उन्होंने अपना असली रंग दिखाना शुरू किया। बात बात पर राजकुमार अजातशत्रु से बहस करना लड़ाई झगड़ा करना उनकी रोज की आदतों में शुमार होने लग गया था। हालांकि उसी वक्त इनके घर पर दादी साहब की तबीयत बहुत बुरी तरह से बिगड़ गई और उन्होंने अजातशत्रु को राजा की गद्दी पर बैठे देखने की चाह सबके सामने रखी, उस वक्त महल में गुपचुप तरीके से एक छोटा सा सहमति पत्र तैयार किया गया। जिसके अनुसार राजा अजातशत्रु सिर्फ एक वर्ष के लिए गद्दी पर बैठेंगे और उसके तुरंत बाद उन्हें वह गद्दी विराज को सौंपने पड़ेगी।
   यह बात महल में बहुत ही कम लोगों को मालूम थी। लेकिन राजा अजातशत्रु ने अपनी पत्नी बांसुरी पर पूरा विश्वास करते हुए उन्हें इस बात के बारे में बता दिया था। राजा अजातशत्रु का राज्य अभिषेक हो गया। राजतिलक होने के साथ ही राजा अजातशत्रु गद्दी में बैठ गए बांसुरी प्रसन्न तो थी लेकिन मन ही मन में एक डर बना हुआ था कि कहीं एक साल बाद राजा जी की गद्दी न छीन जाए । राजा जी की गद्दी छीनते ही बांसुरी भी महारानी नहीं रह जाती और इसीलिए बांसुरी बेचैन रहने लगी। उसे पहले लगा था कि राजकुमार अजातशत्रु निर्विवाद रूप से गद्दी के उत्तराधिकारी हैं, और वही राजा बनेंगे लेकिन जब इस तरह के पेंच उन्होंने देखें तो वह तिलमिला गई उन्हें यह लगने लग गया कि साल भर के बाद गद्दी वापस विराज के पास चली जाएगी । कुछ समय तक तो बांसुरी अपने महल में प्रसन्न  थी लेकिन जैसे-जैसे 1 वर्ष की अवधि पूरी होने का समय आने लगा उनके मन की बेचैनी बढ़ने लगी। और वह बात-बात पर अपने पति से ही झगड़ा करने लग गई। इनके बीच के झगड़े फसाद इस कदर बढ़ने लग गए कि एक बार महल में किसी समारोह के दौरान भरी सभा में ढेर सारे लोगों के बीच रानी बांसुरी ने अपने ही पति पर कोई लांछन लगाया और उनसे रूठ कर महल छोड़कर निकल गई। उन्हें लगा था कि राजा अजातशत्रु और महारानी साहिबा उन्हें मनाने आ जाएंगे और महल वापस वह इसी शर्त पर लौटेंगी कि राजा अजातशत्रु ही सदा सर्वदा गद्दी पर बैठे रहे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, ना ही राजा अजातशत्रु उनके पीछे गए और ना महारानी साहेब!
    बांसुरी ने अपना फेंका पांसा उल्टा पड़ते देखा तो वह और भी तिलमिला गई लेकिन अब उनके पास और कोई चारा नहीं बचा था। महल से एक बार निकलने के बाद अब वह किस मुंह से महल वापस लौटती जबकि उन्हें महल से कोई वापस बुलाने नहीं गया था।

  नाराजगी में वह अपने मायके चली गई। रूठ कर वह अपने मायके में बैठी रही। लेकिन उन्हें पूछने वहां कोई नहीं आया। तब उन्होंने वापस अपना जाल फेंकना शुरू किया, और राजा अजातशत्रु को एक बार फिर अपने मोह पाश में बांधने की कोशिश शुरू कर दी। लेकिन दुनिया के सामने वह यह नहीं जताना चाहती थी कि वह अपना गुस्सा भूल कर राजा अजातशत्रु के पास वापस चली आई है। इसलिए वह अपने मायके में ही बनी रही, राजा अजातशत्रु पहले ही अपने सियासी कामों में व्यस्त थे उस पर पत्नी का इस तरह रूठना मनाना उनसे संभव नहीं हो पा रहा था। तब उन्होंने रानी बांसुरी के सामने महल वापस लौट आने की बात कही इस पर बांसुरी ने कहा कि वह कलेक्टर बनना चाहती हैं अगर राजा अजातशत्रु उन्हें कलेक्टर बनवा दें तो वह जरूर वापस लौट आएंगी। इसके बाद ही रानी बांसुरी को कलेक्टर बनवाने की कवायद शुरू हुई। इस सारे पचड़े में रानी बांसुरी के दिमाग में यह बात पूरी तरह से बैठ गई कि अगर ठाकुर साहब और उनकी बेटी नहीं होते तो विराज को गद्दी पर बैठाने की नौबत भी नहीं आती। अगर ठाकुर साहब के साथ महाराजा जी की कोई बातचीत नहीं हुई रहती तो वह बड़े आराम से अपने पति के साथ महल में राज कर सकती थी। बांसुरी के दिमाग में यह बुरी तरह से बैठ गया कि ठाकुर साहब और उनकी पुत्री रेखा दोनों ही बांसुरी और अजातशत्रु के दुश्मन हैं। यही बात बांसुरी ने राजा अजातशत्रु के दिमाग में भरनी शुरू कर दी। वह महल से और अपने पति से दूर जरूर थी लेकिन इस बीच भी वो राजा अजातशत्रु के दिमाग में ठाकुर साहब के खिलाफ जहर भरती रही, जबकि ठाकुर साहब ने हर कदम पर राजा अजातशत्रु की मदद करनी चाहिए लेकिन अजातशत्रु की आंखों पर बांसुरी नाम की पट्टी बंधी थी।
    अपने मन में सोच सोच कर ही रानी बांसुरी ने ठाकुर साहब के लिए जहर का घड़ा भर लिया। इसके बाद वह एक-एक कर ठाकुर साहब के अच्छे कामों में भी गलतियां निकालने लगी, और अपने आसपास के लोगों के मन में भी ठाकुर साहब के खिलाफ जहर भरने लगी।
     कलेक्टर बनने के बाद तो रानी बांसुरी के सपनों को पंख मिल गए उन्होंने जैसे कसम ही खा ली कि ठाकुर साहब को वो समूल  यहां से उखाड़ फेकेंगी।
    और ना सिर्फ ठाकुर साहब को बल्कि उनके सारे परिवार का अंत करने की इन्होंने ठान ली । माननीय न्यायाधीश महोदय आप सोच भी नहीं सकते कि इनकी भोली भाली शक्ल के पीछे कितनी चालाक औरत खड़ी है । अब आज भी देखिए कायदे से उन्हें यहां मौजूद होना चाहिए लेकिन अपनी गर्भावस्था का बहाना कर उन्होंने कोर्ट परिसर में आने से मना कर दिया।
   जबकि मैं आपके संज्ञान में यह बात लाना चाहता हूं कि अभी पिछले महीने तक वह यही दून में मौजूद थी। और लगभग 15 दिन पहले ही यहां से रियासत के लिए उनकी रवानगी हुई है। तो क्या कोर्ट के केस के बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी ?और जब वह 15 दिन पहले तक यहां थी, तो अभी इन 15 दिनों में ही ऐसा क्या हुआ कि उन्हें रियासत पहुंचने की हड़बड़ी हो गई? वह छुट्टियां लेकर यहां पर भी रुक कर केस का इंतजार कर सकती थी । लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि वह खुद जानती हैं कि वह खुद भी गलत है।
ठाकुर साहब को केस में उलझाने के बाद उन्होंने उनकी पत्नी पर नजर रखना शुरू किया और एक दिन किसी अनजान नंबर से अनजान आदमी से उनकी पत्नी को कॉल करवा कर एक सुनसान जगह पर बुलवाया और उनकी गाड़ी पर एक ट्रक चढ़वा दिया। यह सब कुछ रानी बांसुरी के आदेश पर किया गया है। उस हादसे में ठाकुर साहब की पत्नी जिंदा नहीं बची यहां भी लाने बांसुरी का षड्यंत्र यही था कि ठाकुर साहब की धर्म पत्नी की मौत के बाद जब ठाकुर साहब उनके अंतिम दर्शन के लिए आएंगे तब ठाकुर साहब का भी काम तमाम कर दिया जाएगा।

अब आप खुद सोचिए माननीय न्यायाधीश महोदय कि अगर रानी बांसुरी जैसे लोग प्रशासनिक अधिकारी होंगे और प्रशासन और न्यायपालिका में इस तरह के लोग शामिल हो जाएंगे तो न्याय व्यवस्था का क्या होगा ? यह लोग न्याय व्यवस्था को अपनी उंगलियों पर चलने वाले कठपुतलियां समझते हैं और अपने पैसे और पद के मद में चूर होकर कुछ भी निर्णय लेते हैं।

न्यायाधीश महोदय मैं आपसे बस ये गुजारिश करना चाहता हूं की रानी बांसुरी ने जरूर ठाकुर साहब पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए हैं लेकिन मेरे मुवक्किल ठाकुर साहब निर्दोष हैं। और जिनके मैं सारे सबूत आपके पास जमा करने के लिए तैयार हूं। इसके साथ ही रानी बांसुरी द्वारा लगाए गए आरोपों के खिलाफ मैं उन पर ठाकुर साहब की तरफ से मानहानि का मुकदमा भी दर्ज करना चाहता हूं। रानी बांसुरी ने ठाकुर साहब के खिलाफ जो आरोप पत्र तैयार करवाया है, मैंने उस आरोप पत्र का जवाब लिखित में भी आपके समक्ष प्रस्तुत कर दिया है। यह जवाब लगभग एक सौ तेरह पन्नों का है और जिसे पढ़ने के लिए आपको कम से कम पंद्रह दिन का समय जरूर चाहिए। तो मैं यही कहूंगा कि आप अगली कोई तिथि तय करके हमें दे दीजिए। जिससे मैं उस तिथि तक पुलिस की सहायता लेकर अपने मुवक्किल ठाकुर साहब को खोज कर निकाल सकूं। मुझे जाने क्यों पूरा विश्वास है कि उनके गुमशुदगी के पीछे भी रानी बांसुरी और राजा अजातशत्रु का ही हाथ है।
   मैं एक बात और कहना चाह रहा था, वह कि श्रीमती बांसुरी ना तो कलेक्टर बनने के योग्य है और ना रानी लेकिन क्योंकि उन्होंने इतने सारे षड्यंत्र सिर्फ रानी के पद के लिए किए इसीलिए मैं उनके नाम के साथ बार-बार रानी लगा रहा हूं क्योंकि कहीं ना कहीं दिल से मैं यही चाहता हूं कि इस केस के खत्म होने तक रानी बांसुरी के नाम के साथ यह पद हमेशा के लिए समाप्त हो जाए। उनके जैसी षड्यंत्रकारी औरत मैंने अपनी जीवन में कभी नहीं देखी । लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि जहां रियासतें हैं वहां षड्यंत्र भी हैं। और इन ऊंची ऊंची रियासतों के षडयंत्रों के पीछे हमेशा से औरतों के ही हाथ रहे हैं। आज फिर इतिहास खुद को दोहरा रहा है। और एक औरत ने इतनी बड़ी रियासत को हिला कर रख दिया है । देखा जाए तो राजा अजातशत्रु की स्वयं की कोई बुद्धि ही नहीं है। यह एक बुद्धिहीन व्यक्ति हैं जो पूरी तरह से अपनी पत्नी के हाथों की कठपुतली हैं। जिनकी पत्नी इन्हें चलने कहती है तो यह चलते हैं बैठने कहती हैं तो बैठते हैं। ऐसे व्यक्ति को राजा बना कर क्या रियासत की जनता ने सही किया है? खैर यह तो बाद में पूछे जाने वाले प्रश्न है । सबसे पहले तो हमें यही जानना है कि ठाकुर साहब के ऊपर जो यह गलत इल्जाम लगाए गए हैं उनके क्या और कितने सबूत रानी बांसुरी हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। माननीय न्यायाधीश महोदय मैं यह भी जानता हूं कि मेरे काबिल दोस्त समर सिंह ने आपके पास बहुत सारे लीपापोती वाले पत्र भेजे हैं। इसके साथ ही उन्होंने दो से तीन बार आपसे मुलाकात भी कर ली है । मैं यह भी समझता हूं कि हो सकता है एक सॉफ्ट कॉर्नर ऐसे में क्रिएट हो जाता है, लेकिन बावजूद आप न्याय की सबसे ऊंची वेदी पर बैठे हैं। जहां आंखों पर काली पट्टी बांधे आप सिर्फ न्याय को ही तौलेंगे। बाकी सारी बातें एक तरफ हो जाती है और इसलिए हमारी न्यायपालिका पर मुझे और मेरे मुवक्किल ठाकुर साहब को अटूट विश्वास है। मैं एक बार फिर आप से गुजारिश करता हूं कि केस को कुछ वक्त के लिए मुल्तवी किया जाए और मुझे कुछ दिनों के बाद की कोई तारीख दे दी जाए जिससे मैं ठाकुर साहब को खोज कर आपके सामने प्रस्तुत कर सकूं। “

   न्यायधीश महोदय ने सारी बातें सुनने के बाद समर की तरफ देखा…” अब आप इस केस पर क्या प्रकाश डालेंगे!”

समर ने मुस्कुराकर वकील साहब को देखा फिर न्यायाधीश महोदय को देखने के बाद अपनी बात शुरू की…-” माननीय न्यायाधीश महोदय अभी तक तो इन्होंने सिर्फ किस्से ही किस्से गढ़े हैं । प्रकाश तो अब मैं ही डालूंगा । क्योंकि जितनी भी सारी बातें मेरे मित्र वकील साहब ने कहीं, यह सब पूरी तरह से बेबुनियाद हैं। इन्होंने सोच समझकर एक अच्छी सी कहानी रची और उस कहानी को आपके सामने प्रस्तुत कर दिया। सच कहूं तो इस पूरी कहानी में सच का लवलेश मात्र भी नहीं है। रानी बांसुरी के बारे में राजा अजातशत्रु के बारे में इनकी रियासत के बारे में जो सब भी बताया है वह सब का सब झूठ है।
   जो भी व्यक्ति राजा अजातशत्रु को करीब से जानते हैं उन्हें वकील साहब के द्वारा लगाए गए एलिगेशन सुनकर ही हंसी के दौरे पड़ने लगेंगे। क्योंकि देखा जाए तो वकील साहब ने जैसी जैसी बातें राजा अजातशत्रु और रानी बांसुरी के बारे में कहीं हैं कोई बच्चा भी समझ जाए कि सारे के सारे दोष झूठे और कतई बेबुनियाद है।
   इनके दोषारोपण और वाद पर मैं शुरुआत से एक-एक बिंदु का उत्तर देता चलता हूं सबसे पहले उन्होंने कहा कि रानी बांसुरी अजातशत्रु सिंह जो कि विजय राघव गढ़ की रियासत के राजा अजातशत्रु की धर्मपत्नी है ने आईएएस की परीक्षा अपनी बुद्धिमत्ता और ईमानदारी के बल पर नहीं बल्कि राजा अजातशत्रु के पद की गरिमा की बदौलत प्राप्त की है। इस बारे में मैं यही कहूंगा कि हमारा देश चलाने वाली सरकार वकील साहब की तरह चश्मा नहीं लगाती। लोकतंत्र का समय है और हमारा देश आजाद हो चुका है ।ऐसे में कुछ एक रियासतें ही बची हैं उनमें से विजय राघव गढ़ भी एक है।
       न्यायधीश महोदय आप भी जानते हैं कि जब रियासतों का विलय हो रहा था उस समय राजा अजातशत्रु के पूर्वजों की नेकनामी की बदौलत और उनकी जनता का उनके प्रति प्रेम के कारण ही उनकी रियासत को छोड़ दिया गया था।  इसके बावजूद विजय राघव गढ़ की रियासत ने कभी भी अपने प्रिविपर्स या किसी और रियासती मुद्दे पर सियासी हुए बिना सरकार को समर्थन दिया। अब ऐसे में जब हर जगह इस रियासत ने अपनी इमानदारी और प्रभुता के डंके बजाये तब सिर्फ एक अदद पोजीशन के लिए क्या राजा अजातशत्रु अपनी नेकनामी को यूं ही बह जाने देंगे। सोचने वाली बात यह है की जिलाधीश का पद महत्वपूर्ण जरूर है लेकिन उस पद में आने के बाद व्यक्ति का कोई व्यक्तिगत जीवन नहीं रह जाता । उन्हें अपने जिले अपने संभाग अपनी जनता के बारे में सोच समझकर ही निर्णय लेना पड़ता है ऐसे में सिर्फ एक पद के लिए राजा और रानी अलग क्यों रहना चाहेंगे ।
   जाहिर है कि सिर्फ पद के लालच में रानी बांसुरी ने आईएएस का एग्जाम नहीं दिया। मैं यह जरूर मानता हूं कि वह एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की रही थी और इसीलिए शायद उनके अंदर मध्यमवर्गीय मूल्यों का खजाना भरा था। उन्होंने हमेशा से अपने आत्मविश्वास को सर्वोपरि रखा।
     एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की के लिए उसकी शिक्षा-दीक्षा सर्वदा सबसे महत्वपूर्ण होती है। इस बात का जीता जागता उदाहरण रानी बांसुरी हैं। राजा अजातशत्रु से विवाह के पूर्व भी वह एक नामचीन अखबार में बहुत ही ऊंचे पद पर एक उचित पारिश्रमिक के साथ काम कर रही थी।
और राजा अजातशत्रु से विवाह के बाद भी उनके मध्यमवर्गीय मूल्यों में कोई परिवर्तन नहीं आया। अपनी शिक्षा दीक्षा को उन्होंने हमेशा सर्वोपरि रखा और इसीलिए विवाह के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी।
   एक बात जरूर वकील साहब ने सही कही वह यह है कि राजा अजातशत्रु की धर्मपत्नी अगर पढ़ाई कर कर कुछ बनना चाहे तो उनकी गरिमा के अनुरूप ही पद स्वीकार करना उन्हें शोभा देता है। अब वह हमारी और आपकी तरह वकालत करेंगी तो यह उन पर क्या शोभा ड़ेंगे?  इसलिए उन्होंने जिलाधीश का पद सोचा! पूरी मेहनत और लगन और ईमानदारी से उन्होंने इस परीक्षा के लिए तैयारियां की और परिणाम आप सबके सामने हैं । न्यायाधीश महोदय आप चाहे तो उनके  मेंटर और उनके साथी काम करने वाले उनके साथ पढ़ने वाले उनके दोस्तों को न्यायालय में अगली तारीख पर मैं प्रस्तुत कर दूंगा।
     अगला बिंदु जो वकील साहब ने रानी बांसुरी के कलेक्टर बनने के प्रति दिया था । वह यह था कि कलेक्टर बनने के बाद रानी बांसुरी यहां से धनराशि खींचकर अपनी रियासत की तिजोरी भरेंगी। यह बात सुनने में ही इतनी हास्यास्पद है कि इस पर मैं क्या कहूं मेरी समझ से परे है। जितनी धनराशि वो यहां एक जिले से खींच सकती हैं उससे दोगुनी राशि तो राजा अजातशत्रु अपनी रियासत की जनता में यूं ही बांट देते हैं । असल में वकील साहब दून से बाहर कभी गए नहीं तो इन्हें पता कैसे चलेगा।  वह कहते हैं ना कि कुएं के अंदर जो मेंढक रहता है, उसके लिए उसकी सारी दुनिया वह कुआं ही होता है। उसे मालूम ही नहीं होता कि कुएं के बाहर दुनिया कितनी खूबसूरत है।
मैं वकील साहब से गुजारिश करूंगा कि एक बार ही सही वह विजय राघव गढ़ की रियासत जरूर घूम कर आएं। उनका लगाया यह आरोप की रानी बांसुरी ने दून के खानदानी रईस और उद्योगपतियों आदि से रिश्वत ली और उससे अपनी तिजोरी भरी यह मेरे हिसाब से इतना बचकाना आरोप है, कि इस पर मैं उन्हीं से कहूंगा कि वह सबूत पेश कर दें। क्योंकि इतने निम्न स्तरीय आरोप पर कोई जवाब देना मैं रानी बांसुरी का अपमान समझता हूं।

” जब कोर्ट में केस लगा है तो आरोप और प्रत्यारोप तो लगेंगे ही इनमें क्या उच्च स्तरीय और क्या निम्न स्तरीय आपको जवाब तो सारे देने ही पड़ेंगे।”

  “मैंने कब यह कहा कि मैं जवाब नहीं दूंगा मैंने बस यह कहा कि आप सबूत तो पेश कीजिए। बातें, किस्से कहानियां तो कोई भी कर लेता है लेकिन जब तक उन किस्सों के उन कहानियों के पूरे साक्ष्य प्रस्तुत नहीं करेंगे आपकी बात पर कोई यकीन नही करेगा।

      मैं जानता हूं जितनी मेरी उम्र है उतने सालों का तो आपका अनुभव है। आप मुझसे कहीं ज्यादा जानकार हैं तो आप कोर्ट की कार्यवाही भी मुझ से कहीं बेहतर जानते हैं। आप हर बात का अपने हर बिंदु का साक्षी ले आइए मैं उन्हें काटता जाऊंगा दूसरी बात जिन बिंदुओं को अभी मैंने कहा है इनके साक्ष्य मेरे पास पहले से मौजूद हैं और जो मैं कोर्ट में दाखिल कर चुका हूं….

  न्यायधीश महोदय ने हाँ में सिर हिला कर दोनों ही पक्षों को साक्ष्य प्रस्तुत करने कह दिया…

  … ठाकुर साहब का वकील जैसे इसी प्रतीक्षा में था, उसने एक बड़ा सा लिफाफा जज साहब की तरफ बढ़ा दिया…
    उसके चेहरे की कुटिल मुस्कान बता रही थी कि उसकी कहानी की तरह उसके सबूत भी थे……

क्रमशः

aparna…….

जीवनसाथी -113

      जीवनसाथी – 113

     समर कुछ देर को वहीं खड़ा रह गया। फिर खुद को और अपने  गुस्से को संभालते हुए पिया से कभी ना मिलने की कसम खाते हुए वहां से बाहर निकल गया।

  गुस्से में समर मुड़कर जैसे ही आगे बढ़ा कि सामने से आते हुए वेटर से टकरा गया और वेटर के हाथ की ट्रे पूरी की पूरी नीचे गिर पड़ी । जिसके कारण वहां मौजूद सभी लोगों का ध्यान समर और उस वेटर की तरफ चला गया। पिया ने भी समर को देख लिया समर ने एक नजर मुड़ कर पिया को देखा और वहां से बाहर निकल गया। पिया हैरान-परेशान सी उसके पीछे उठकर जाने को हुई कि, सामने बैठे लड़के ने उसे टोक दिया….-” आप कहां चली जा रही है?”

पिया ने उसे देखा..-” एक बहुत इमरजेंसी केस है! अगर नहीं गई तो मरीज की जान चली जायेगी, मर जाएगा वो।

और पिया समर के पीछे निकलने लगी लेकिन दो कदम आगे बढ़ कर ही एक बार फिर वापस मुड़ कर आई…-” एक बात और कहनी थी आपसे! मैं अभी शादी नहीं कर सकती! आई एम सो सॉरी! मेरी मम्मी ने अगर पहले मुझसे पूछ लिया होता तो आपको यहां तक आने की जहमत ही नहीं उठानी पड़ती।  
     सॉरी!

           टेबल पर रखा अपना पर्स उठाकर पिया तेज कदमों से समर के पीछे निकल गई । लेकिन पिया के बाहर आते तक समर अपनी गाड़ी निकाल कर वहां से जा चुका था।
    पिया ने वक्त देखा उसके अस्पताल जाने का समय हो चुका था अब मुड़कर उस रेस्टोरेंट में जाने की उसकी इच्छा नहीं हुई।  वह गुस्से में सीधे अपने अस्पताल की ओर चल पड़ी उसे समर का व्यवहार समझ ही नहीं आ रहा था।

     पिया के फोन पर किसी का मैसेज आया और पिया ने इनबॉक्स देखा उसमें एक रोज पहले का समर का भी मैसेज पड़ा था।
    अब पिया को समझ में आया कि क्या बात हुई थी? उसने व्यस्तता में समर का मैसेज ही नहीं देखा था! उसे पता ही नहीं था कि समर ने उसे आज मिलने के लिए बुलाया है, उसने तुरंत समर के मैसेज का जवाब दिया और मुस्कुरा कर अपनी गाड़ी निकाल कर अस्पताल की ओर चली गई।

  अस्पताल पहुंचकर पिया ने समर को कई बार फोन किया, लेकिन समर फोन नहीं उठा सका।  वह पूरा दिन व्यस्तता में बीत गया। शाम में समर आदित्य केसर और राजा,प्रेम के साथ दून  के लिए निकल गया।

  जाने से पहले राजा बांसुरी के पास मिलने चला आया…..

” मैं जल्दी वापस आ जाऊंगा तब तक अपना और मेरी नन्ही बांसुरी का ख्याल रखना।

“आपसे किसने कह दिया कि आप की नन्हीं बांसुरी आने वाली है?”

“उसी ने कहा है जो आने वाली है।। एक दिन सपने में आई थी, और कहने लगी पापा मैं जल्दी से आपकी गोद में खेलने के लिए आने वाली हूं।”

राजा की बात पर बांसुरी मुस्कुराने लगी…-” कुछ भी बातें मत बनाइए, मैं जानती हूं बांसुरी नहीं आने वाली। बल्कि मेरे पास छोटा सा राजा अजातशत्रु आने वाला है।”

“अब तुम्हें कैसे पता कि राजा अजातशत्रु आने वाले हैं तुम्हारे पास।”

“सारी हरकतें बंदरो वाली है इसकी। अंदर ऐसी-ऐसी खुरापातें मचाता है, कि समझ आ जाता है, कि आपका बेटा ही है ।
      अगर अंदर बेटी होती तो मेरी जैसी शांत सुशील गंभीर और प्यारी सी होती। बेटा है इसीलिए आपके जैसा है। खुरापाती बदमाश और शैतान! 

“ओहो शांत सुशील और गंभीर! जरा देखूं चेहरा कितनी गंभीर हैं आप? “

“चलिए जाइए अब वरना आपको देर हो जाएगी!”

“बात तो आपकी सही है हुकुम! अगर समय पर नहीं निकला, तो समर फिर ऐसे कार भगाएगा की सीधे दून में जाकर रुकेगा।
    बल्कि फिर ऐसा होगा कि यहां से फ्लाइट लैंड बाद में करेगी समर की गाड़ी वहां पहले पहुंच जाएगी।”

    राजा की बात पर बांसुरी खिलखिला कर हंस पड़ी…-” बहुत छेड़ते हैं आप हम सभी को।  क्या मैं क्या समर और क्या प्रेम भैया किसी को नहीं छोड़ते।”

“क्यों छोडूँ?  मैं तुम तीनों में से किसी को कभी छोड़ना ही नहीं चाहता! और अगर भगवान की मर्जी रही तो कभी छोड़ना भी नहीं पड़ेगा। साथ जिएंगे साथ मरेंगे। “

बांसुरी ने मुस्कुराकर पास रखी प्लेट से कुमकुम का तिलक राजा के माथे पर लगाया और छोटी सी कटोरी से दही चीनी निकालकर राजा को खिला दिया….-” अब यह किसलिए हुकुम? पहले तो कभी दही नहीं खिलाई तुमने। “

“जी !क्योंकि पहले यह काम मां साहेब किया करती थी।  आप कहीं भी बाहर जाने वाले होते थे, तो वह हमेशा आपके माथे पर  तिलक लगा कर और दही चीनी खिलाकर ही आपको बाहर भेजती थीं। उनकी रीत उनकी बहू को निभानी ही होगी ना। “

राजा ने मुस्कुराकर बांसुरी के माथे पर अपना प्यार अंकित किया उसे कुछ घड़ी निहार कर बाहर निकल गया।

   *******

   अगले दिन सुबह से ही कोर्ट परिसर में आवाजाही बनी हुई थी अलग-अलग जगहों पर छोटी छोटी सी टेबल पर छतरी लगाएं और  कुर्सी सजाए वकील बैठे अपने लिए केस ढूंढने में व्यस्त थे।

    ठाकुर साहब का केस लग चुका था ठाकुर साहब को कोर्ट में मौजूद रहने के लिए समन जारी किया जा चुका था, लेकिन ठाकुर साहब उस वक्त जो भागे थे वो अब तक नदारद थे ।
   उनकी तरफ से जिरह करने उनका वकील मौजूद था अपने केस का नंबर आने पर राजा समर और आदित्य के साथ कोर्ट परिसर में पहुंच गया | केसर को वो लोग जानबूझ कर उसकी सुरक्षा के लिए साथ लेकर नही आये थे।

    अब क्योंकि समर ने वकालत कर रखी थी और उसके पास बाकायदा प्रैक्टिस के लिए लाइसेंस भी था, इसलिए ठाकुर साहब के खिलाफ बाँसुरी की तरफ से केस वही लड़ रहा था।
   
      बांसुरी के द्वारा तैयार किए गए सारे मसले जो ठाकुर साहब के खिलाफ थे को पूरी तरह से चांदी के वर्क से सजाकर समर ने कोर्ट में पेश कर दिया था।
  ठाकुर साहब के लीगल और इलीगल सारे धंधों  का कच्चा चिट्ठा उस फाइल में मौजूद था। उनके सारे कारनामों की लिस्ट तारीख के साथ वहां दर्ज थी। इन सारे कागजातों को कोर्ट में पेश करने से पहले ही इनकी एक सीडी बनाकर पहले ही जमा की जा चुकी थी।
      बहुत बार ऐसा भी होता है कि कुछ माननीय जज महोदय फैसला देने से पहले और कोर्ट में आने से पहले अपना होमवर्क करके आते हैं। अक्सर ऐसे माननीय कोर्ट केस से संबंधित फाइलों का अध्ययन घर पर ही कर कर आना पसंद करते हैं। ऐसे ही लोगों में एक थे माननीय न्यायाधीश  श्री दिनकर सूरी जी!!
   उन्होंने ना सिर्फ केस की फाइलें पढ़ ली थी, बल्कि ठाकुर साहब के बारे में अपने लेवल पर जाकर काफी कुछ जान समझ भी लिया था।
   समर भी इस बार कोई पेंच खाली नहीं छोड़ना चाहता था। इसलिए केस लगने से पहले ही जज के बारे में मालूमात करके वह उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलकर सारी बातें समझा चुका था।

     ऐसा प्रतीत हो रहा था कि केस एकतरफा हो चुका था। ठाकुर साहब के खिलाफ जितने सारे सबूत जमा थे, वे उन्हें सलाखों के पीछे ले जाने के लिए काफी थे। बावजूद गुनहगार ही वहां मौजूद नहीं था। कोर्ट के द्वारा पूछे जाने पर ठाकुर साहब के वकील ने उनकी गुमशुदगी के बारे में कोर्ट को जानकारी दे दी।

  वैसे तो ठाकुर साहब  के कारनामे गिनती से बाहर के थे लेकिन जिस बात पर उन पर बांसुरी ने केस लगाया था वह था-‘ बनारस में राजा पर हुआ जानलेवा हमला।”

    उस हमले से संबंधित सारी बातें और सारे गवाह बांसुरी ने समर को हस्तांतरित कर दिए थे। बनारस में उस वक्त जब राजा को गोली लगी थी घाट में बांसुरी के अलावा पांडे और उसकी महिला मित्र सुमन मौजूद थे। बांसुरी के बताए अनुसार और रोहित की मदद से समर ने उन दोनों को भी ढूंढ निकाला था।
      फिलहाल पांडे जी अपने पुश्तैनी व्यापार को आगे बढ़ा रहे थे यानी कि उसी यमराज के खौलते कड़ाहे में समोसे तल रहे थे, जिसे देखकर कभी वह डर जाया करते थे। और सुमन उनके घर पर उनकी रसोई संभाल रही थी दोनों का एक डेढ़ साल का बेटा भी था।
    हंसता खेलता यह परिवार समर को देख कर चौंका जरूर था। लेकिन जब समर ने राजा और बांसुरी की बात उन्हें याद दिलाई तो, उन दोनों को बनारस के घाट की वह शाम जब राजा और बाँसुरी को दशाश्वमेध घुमा कर और गंगा आरती दिखा कर पांडेय ने अपनी प्रेयसी सुमन से मिलवाया ही था और चारों खड़े घाट पर हँस बोल रहे थे कि राजा के कंधे पर दूर से किसी ने गोली चला दी थी। वो सारा वाकया वो सब कुछ उन दोनों को याद आ गया था । और वह दोनों केस की तिथि पर बुलाए जाने पर वहां उपस्थित थे। राजा से एक बार फिर मिलकर दोनों खुश थे। पांडे ने आगे बढ़कर राजा के चरण स्पर्श किए और राजा ने उसे गले से लगा लिया ।
    इन दोनों के अलावा लल्लन यानी कि इंस्पेक्टर रोहित भी वहां मौजूद था।

जिन दो लोगों ने गोलियां चलाई थी उन्हें भी पुलिस पकड़ चुकी थी।
  लेकिन वे दोनों सिर्फ भाड़े के टट्टू थे। और उन्होंने ठाकुर साहब के कहने पर ही गोली चलाई थी, इस बात को इन लोगों ने पुलिस के सामने तो कबूल कर लिया था लेकिन अगर यह लोग कोर्ट में मुकर जाते तो केस उल्टा भी पड़ सकता था।
    हालांकि अब तक की सारी बातें और सबूतों के आधार पर यही लग रहा था कि केस का फैसला राजा के पक्ष में आएगा और ठाकुर साहब को कड़ी से कड़ी सजा सुनाई जाएगी।
   
    माननीय न्यायाधीश के आदेश पर कोर्ट की प्रक्रिया शुरू हो गई।
    समर ने सारे केस को एक सरसरी तौर पर कोर्ट के समक्ष रखा और केस आगे बढ़ाने के लिए अनुमोदन किया ।
   माननीय न्यायाधीश के द्वारा ठाकुर साहब के वकील को केस को आगे बढ़ाने की बात कहने पर, उनके वकील ने अपना पक्ष रख दिया।
  
   ठाकुर साहब का वकील पुराना अनुभवी खिलाड़ी था। अब उसने ठाकुर साहब का पक्ष रखना शुरू किया…

    “हिज हाइनेस ! आप जानते ही हैं कि, न्यायालय की समस्त प्रक्रिया के लिए मेरे मुवक्किल का यहां मौजूद होना जरूरी है। अब क्योंकि मुवक्किल ही गायब है इसलिए ऐसे समय में केस को फिलहाल रद्द करके किसी और दिन के लिए मुल्तवी कर दिया जाना चाहिए…. मैं कोर्ट से दरख्वास्त करता हूं की अगली तिथि तक इस केस को मुल्तवी किया जाए”!

   वकील की इस बात पर समर भड़क उठा….

“कायदे से आपको आपके मुवक्किल को यहां पेश किया जाना चाहिए था। अगर आपके मुवक्किल समय पर उपस्थित नहीं होंगे, तो क्या केस इसी तरह तिथि पर तिथि में मुल्तवी किया जाता रहेगा? जैसा कि आप खुद जानते हैं कि रियासत के राजा साहब वर्सेस ठाकुर साहब वाद हैं। ऐसे में राजा साहब अपने सारे महत्वपूर्ण कामों को छोड़कर इस केस के लिए यहां उपस्थित हुए हैं। रानी बाँसुरी चूंकि अपने पूरे समय से हैं और अब उनकी सेहत के लिए उनका यात्रा करना उचित नही है इसलिए उनकी अनुपस्थिति के लिए पहले ही न्यायाधीश महोदय को आवेदन देकर आज्ञा ले ली गयी थी।
   इसलिए रानी बाँसुरी की जगह उनके पति राजा अजातशत्रु सिंह यहाँ मौजूद हैं तब क्या ऐसे में आपके मुवक्किल यानी के ठाकुर साहब को यहां समय पर उपस्थित नहीं होना चाहिए? वह भी तब जब उन्हें समन जारी किया जा चुका है।”

समर की बात पर वकील मुस्कुराने लगा …-“जी माननीय न्यायाधीश महोदय! मेरे काबिल दोस्त बहुत सही बात कह रहे हैं। मैं भी न्यायालय का  इसी बात पर ध्यान दिलवाना चाहता था के आखिर कोर्ट के केस की तारीख मालूम होने के बावजूद मेरे मुवक्किल कोर्ट में पेश क्यों नहीं हो पाए? “

” जी हां बिल्कुल कारण बताइए हम सब भी जानना चाहते हैं।

  “माननीय न्यायाधीश महोदय! मैं आपसे कहना चाहता हूं कि ठाकुर साहब को किसी ने किसी षड्यंत्र के तहत अगवा कर कहीं छिपा कर रख छोड़ा है। वरना आप सोचिए, वह इस शहर की जानी मानी हस्ती हैं । अगर यहां की कलेक्टर उन पर कोई वाद दायर करती हैं, तो वह सामने से आकर उस वाद का प्रतिवाद कर सकते हैं। आप जानते ही हैं कि शहर के जाने-माने पुराने रईसों में से एक है ठाकुर साहब ।आज तक कभी किसी की उनके खिलाफ खड़े होने की हिम्मत नहीं हुई।
   फिर आज महज एक झूठे केस से भागने के लिए वह क्यों  न्यायालय की अवमानना करेंगे?
     उनका व्यक्तित्व इतना असाधारण है , कि वह ऐसे छोटे-मोटे दोषारोपण से डरने वालों में से नहीं है। अब इस केस का मैं मेरा पक्ष आपके समक्ष रखता हूं।
   माननीय न्यायधीश महोदय बात सिर्फ इतनी थी, कि शहर में कुछ दिनों पहले एक नई कलेक्टर साहिबा ने अपना पदभार संभाला।
    कलेक्टर साहिबा का नाम भी मैं बताना चाहूंगा, श्रीमती बांसुरी अजातशत्रु सिंह। नाम से ही जाहिर है कि श्रीमती बांसुरी भोपाल के पास की रियासत विजय राघव गढ़ के राजा श्री अजातशत्रु सिंह की धर्मपत्नी है। अब ऐसे में आप खुद समझ सकते हैं कि उनकी चयन प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रही होगी।
  अगर राजा साहब की धर्मपत्नी कलेक्टर बनना चाहेंगी तो कौन होगा जो उन्हें रोक सकता है।
    पहले पहल जब वह फील्ड ट्रेनिंग में थी, तब उन्होंने ठाकुर साहब के कुछ व्यापार पर गैर जरूरी अध्यादेश जारी किए और उनके कामों को रोकने का प्रयास किया।  जब ठाकुर साहब इस सिलसिले में उनसे मुलाकात करने गए तब बांसुरी देवी ने उनसे मिलने से इंकार कर दिया। शहर की जानी मानी हस्ती अगर स्वयं मिलने आए तो इस तरह का घमंड दिखाना कहां की होशियारी मानी जाती है?
     खैर ठाकुर साहब इसमें भी नाराज नहीं हुए क्योंकि दूर के रिश्ते से श्रीमती बांसुरी उनकी रिश्तेदारी में भी आती थी।
  ठाकुर साहब ने श्रीमती बांसुरी देवी के घमंडी रवैया और उनके सनकीपने को उनका बचपना मानते हुए माफ कर दिया।  लेकिन बांसुरी देवी यहीं रुकने वालों में से नहीं थी उन्हें अभी अपनी अकड़ दिखानी बाकी थी।
   कुछ दिनों बाद जब उन्होंने दून में एडिशनल कलेक्टर का पदभार ग्रहण किया।  तब एक बार फिर वह ठाकुर साहब के कामों के पीछे पड़ गई।
   ठाकुर साहब इस बार फिर उनके कार्यालय में खुद उनसे मिलने गए लेकिन उस घमंडी और नकचढ़ी औरत ने उनसे वापस मिलने से इंकार कर दिया । तीन से चार बार जब ठाकुर साहब ने उन्हें संदेश भिजवाए तब श्रीमती बांसुरी देवी उनसे मिलने को तैयार हुई।
    माननीय न्यायधीश महोदय आपको बताते हुए मुझे खुद को अच्छा नहीं लग रहा लेकिन यह आजकल की रियासतें और राजा-महाराजा सिर्फ दिखावे के रह गए हैं।
    आप और हम सभी भली प्रकार जानते हैं कि अब आज के जमाने में राजा महाराजाओं का समय जा चुका है। अब देखा जाए तो इन पुराने रजवाड़ों में सिर्फ ऊंचे महल की दीवारें और इनके लंबे चौड़े नाम के अलावा इनके पास कुछ नहीं रह गया है।  आमदनी के साधन भी इनके पास सीमित हो गए हैं । लेकिन दिखावा आज भी मौजूद है। बड़ी-बड़ी गाड़ियां हाथी घोड़े पालकियां….. इनकी शान-ओ-शौकत किसी भी चीज में कम नहीं होनी चाहिए। लेकिन इस सबके लिए उनके पास पैसे तो होते नहीं है, इसलिए अब यह लोग व्यापार में उतरने लगे हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि अधिकतर पुराने राजा महाराजा अपने महलों….

    वकील अपनी बात पूरी नहीं कर पाया था कि समर गुस्से में खड़ा हो गया और उसने न्यायाधीश को वकील की बात काटने के लिए गुजारिश की….-” माननीय न्यायाधीश महोदय! इन सब बातों से राजा अजातशत्रु और रानी बांसुरी का कोई लेना देना नहीं है।”

  “वकील बाबू संयम रखिये। जितनी अभी आपकी उम्र है उतने सालों का अनुभव है मेरा।  इसलिए मेरी बातों को ध्यान से सुनिए, मेरी सारी बातें आपस में एक दूसरे से जुड़ी हुई है।
     हां तो माननीय न्यायाधीश महोदय! मैं यह कह रहा था कि यह राजे महाराजे अपनी शानो शौकत को छोड़ तो सकते नहीं है, लेकिन उस शानो शौकत को बनाए रखने के लिए इनके पास रुपयों की भी कमी होने लगी है ।इसीलिए इनमें से अधिकतर लोग अब व्यापार में कूद रहे हैं ।कुछ लोग नौकरियों में भी जा रहे हैं । लेकिन नौकरी में जाना यानी किसी की नौकरी करना इनके लिए थोड़ा छोटा काम हो जाता है।
   तो यह लोग नौकरी भी अपनी शान के हिसाब से चुनते हैं। जैसे राजा साहब की रानी को अगर नौकरी करनी हो तो सिर्फ एक जिलाधीश का पद ही तो बचता है उनके लिए। अब रानी साहिबा जिलाधीश तो बन गई लेकिन जिलाधीश बनने भर से क्या होगा। उन्हें तो इस पद से अपनी तिजोरी भरनी थी। तो रानी साहिबा ने चुन चुन कर शहर के रईसों का कच्चा चिट्ठा निकालना शुरू किया। जितने भी शहर के जाने-माने रईस थे सबके व्यापार में इन्होंने अपनी टांग अड़ानी शुरू कर दी । किसी के अच्छे खासे चलते काम में टेंडर रोक दिया, तो किसी के कारखानों पर बंदिश लगवा दी।
   माननीय न्यायाधीश महोदय ऐसा कोई एक व्यक्ति होता तो , हम यह सोच भी सकते थे कि वह इंसान गलत है, और रानी साहिबा सही।
     लेकिन ऐसे दर्जन भर लोग इस शहर में मौजूद हैं।  यह सभी लोग अपनी अपनी शिकायतें लेकर ठाकुर साहब के पास पहुंचे। तब ठाकुर साहब को मालूम हुआ कि सिर्फ उन्हीं के कामों में रोड़ा नहीं लगाया जा रहा बल्कि यहाँ तो सारा व्यापारी वर्ग इन बातों से परेशान हैं।
    तब ठाकुर साहब ने अपना बड़ा दिल दिखाते हुए उस सारे व्यापारी वर्ग की समस्याओं को अपने सर माथे पर ले लिया।  सभी को आश्वासन दिया कि वह जल्द ही इस बारे में जिलाधीश महोदया से चर्चा करके कोई ना कोई रास्ता निकाल लेंगे। इन सारे लोगों की समस्याओं को एक साथ लेकर ठाकुर साहब एक बार फिर रानी बांसुरी से मिलने उनके ऑफिस पहुंचे। और आप जानते हैं न्यायाधीश महोदय इस बार रानी बांसुरी ने उन्हें मिलने के लिए बुला लिया, रानी बांसुरी ने अपने कार्यालय में उनका बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया।
    क्योंकि असल में रानी बांसुरी चाहती ही यहीं थी। उन्होंने जैसा जो प्लान सोच रखा था सब कुछ बिल्कुल वैसा ही हो रहा था। अब ठाकुर साहब अपने सारे व्यापारी वर्ग की समस्याओं के साथ उनके सामने बैठे थे उन्होंने एक-एक कर अपने सारे मित्रों की समस्याओं को रानी बांसुरी के सामने रख दिया। बांसुरी जी तो बस इसी मौके की तलाश में थी, उन्होंने सारी बातें सुनी और ठाकुर साहब के सामने इन सारी समस्याओं से निकलने का उपाय रख दिया।

      उन्होंने साफ सफेद शब्दों में कह दिया कि अगर उनकी मुंह मांगी रकम ठाकुर साहब और उनकी मंडली ठीक दो दिन के भीतर रियासत में पहुंचा देती है, तो रानी बांसुरी इन सब के ऊपर लगे हुए एलीगेशन्स हटा लेंगी, और इन सभी को काम करने का पूरा अवसर दिया जाएगा ।

  इसके साथ ही रानी बांसुरी ने यह भी कहा कि यह एक बार की रकम नहीं होगी हर छै महीने में यह रकम उन तक पहुंच जानी चाहिए। अगर इस रकम में कुछ भी कम ज्यादा होता है तो इसके लिए जिम्मेदार ठाकुर साहब होंगे।
    ठाकुर साहब भी पक्के  व्यापारी थे, उन्हें मालूम ही था कि अगर काम सरकारी है और सरकार की मदद से चलाना है तो इस तरह छोटी मोटी भेंट तो देवी को अर्पण करनी ही पड़ती है उन्होंने बहुत खुशी से बाँसुरी देवी की वह बात स्वीकार कर ली…

   ” इनका एक-एक शब्द झूठ है माननीय न्यायाधीश महोदय रानी बांसुरी अजातशत्रु सिंह से ईमानदार अधिकारी और कोई नहीं हो सकता। “

” वकील बाबू आप रानी बांसुरी के वकील है तो आप तो उनके पक्ष में ही कहेंगे! जिस तरह आप एक ईमानदार और अपने काम से काम रखने वाले साफ सुथरी छवि के व्यापारी पर आरोप लगा रहें हैं , मैंने तो फिर भी वही कहा जो सत्य है और जो सारा शहर कह रहा है।  न्यायाधीश महोदय अगर मैं आपको वह राशि बताऊंगा तब आप भी एकबारगी सोच में पड़ जाएंगे।
   लगभग चालीस करोड़ की राशि के बारे में रानी बाँसुरी ने ठाकुर साहब से कहा । ये राशि हर छै महीने मे उनकी रियासत में पहुंचा दी जानी चाहिए । ऐसा उनका हुकुम था।
  ठाकुर साहब इस बात पर भी तैयार थे, लेकिन इसी बीच ठाकुर साहब के साथ जुड़े व्यापारी वर्ग में असंतोष फैल गया।वो लोग इतनी अधिक धनराशि देने को तैयार नही थे।
   जब ये बात ठाकुर साहब ने रानी बांसुरी के सामने रखी तो रानी साहब ने उनकी बात मानने से साफ इंकार कर दिया उन्होंने कहा या तो इस राशि को देना स्वीकार कीजिए और या फिर मैं इसी तरह आप लोगों के काम को अटकाती रहूंगी और सरकार से मिलने वाली धनराशि आप तक पहुंचने नहीं दूंगी। एक तरह से रानी बांसुरी ने अपना असली रंग दिखा दिया था ।उसके बाद किसी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए ठाकुर साहब को रानी बांसुरी ने स्वयं अपनी रियासत में आमंत्रित किया।
    जहां उन पर इस बात का झूठा आरोप लगाकर कि वह राजा अजातशत्रु पर हमला करने वाले थे रानी बांसुरी ने और राजा अजातशत्रु में उन्हें पकड़वा लिया। अब ठाकुर साहब के पास वैसे भी हमेशा से ही गन रहती ही है और उस वक्त भी उनके पास उनकी गन मौजूद थी जिसका लाइसेंस भी उनके पास है। अब उस लाइसेंस शुदा गन के उनके पास मिलने से यह तो जाहिर नहीं होता कि वह उस वक्त वहां राजा अजातशत्रु पर जानलेवा हमला करने आए थे ,बावजूद वहां की पुलिस ने और प्रशासन ने राजा अजातशत्रु के भय से ठाकुर साहब को गिरफ्तार कर लिया।
   थाने में रखने पर भी रानी बांसुरी के आदेश के कारण और राजा साहब की पोजीशन से डरकर पुलिस वालों ने ठाकुर साहब पर ना चाहते हुए भी अत्याचार किए।
   हुजूर सिर्फ इतने से ही रानी बांसुरी का मन भर जाता तो और बात थी लेकिन रानी बांसुरी इतने में ही खुश नहीं थी उन्होंने इसके बाद दून पहुंचकर एक और काम किया।
    ठाकुर साहब ने क्योंकि इतनी बड़ी धनराशि एक बार में देने में असमर्थता जताई थी इसलिए इस बात से रानी बांसुरी बहुत अधिक नाराज हो चुकी थी। वह ठाकुर साहब और उनके परिवार पर इतनी क्रोधित थी कि उनसे बदला लेने के लिए एक तरफ तो ठाकुर साहब को उन्होंने झूठे आरोप लगाकर पुलिस के हवाले करवा दिया दूसरी तरफ ठाकुर साहब की धर्मपत्नी पर भी जानलेवा हमला करवा दिया। और उस हमले से ठाकुर साहब की पत्नी नहीं बच सकीं।

     जब जेल में ठाकुर साहब को इस बारे में पता चला तो वह बहुत दुखी हुए , वह तुरंत अपनी पत्नी के अंतिम दर्शनों के लिए दून पहुंचना चाहते थे। वह चाहते थे कि अपनी पत्नी का अंतिम संस्कार वह अपने हाथों से करें , लेकिन एक बार फिर राजा अजातशत्रु और रानी बांसुरी के कहने पर पुलिस वालों ने कुछ ऐसा स्वांग रचा कि ठाकुर साहब तुरंत नहीं पहुंच पाए। जब तीन दिन बाद ठाकुर साहब को लेकर पुलिस दून के लिए रवाना हुई तो एक बार फिर आश्चर्यजनक रूप से ठाकुर साहब वहां से गायब हो गए।
   इस बात पर पुलिस ने यह रिपोर्ट तैयार की, कि ट्रेन से ठाकुर साहब पुलिसवालों को चकमा देकर भाग निकले लेकिन यह बात पूरी तरह बेबुनियाद है।
  पचपन साल की उम्र में पुलिस के हट्टे कट्टे जवानों को धोखा देकर चलती ट्रेन से फरार होना बिल्कुल उसी तरह असंभव है जैसे मीठी और स्वादिष्ट खीर से शक्कर का अचानक गायब हो जाना। “

  अपनी बात कहते कहते वकील साहब कुछ देर को थम गए और अपनी टेबल पर जाकर पानी का गिलास उठा लिया, समर ने उनकी तरफ घूर कर देखा और न्यायधीश महोदय से कुछ कहने ही वाला था, कि वकील साहब ने अपनी बात आगे बढ़ कर फिर रख दी..

  ” समर बाबू अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई है।  आपकी मुवक्किल रानी बांसुरी ने जो भी और जितने भी आरोप ठाकुर साहब पर लगाएं हैं उन सारे आरोपों का जवाब एक-एक कर दूंगा आप बस सुनते रहिए……

क्रमशः

  aparna….
    
  
   
 
  
  
   

जीवनसाथी- 112

जीवनसाथी – 112




मुस्कुराती हुई पिया अपनी गाड़ी उठाये महल की तरफ बढ़ गई उसे पता था कि समर इस वक्त अपने घर पर ही मिलेगा।
महल में पहुंचने के बाद वह सीधे समर के कमरे की तरफ बढ़ गई।
समर अपने कमरे में बैठा चार पांच लोगों से किसी बात पर सलाह मशवरा कर रहा था….
चुनाव को अब बहुत कम समय बाकी रह गया था, और इसलिए समर की व्यस्तता भी बहुत ज्यादा बढ़ गई थी।
मुस्कुराकर पिया भी उसकी कुर्सी के ठीक सामने कुर्सी खींच कर बैठ गयी।
समर में एक नजर उसे देखा और वापस अपनी फाइलों के पन्ने पलटने लगा।
वह अपने साथ के लोगों के साथ बातें करने और काम करने में इतना व्यस्त था कि पिया की तरफ ध्यान ही नही दे पाया।
कुछ देर तक पिया वहां बैठी उसे देखती रही, पर जब समर ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तब उसे भी गुस्सा आने लगा।

वह चुपचाप उठी और मुड़कर वापस जाने लगी । उसे जाते देख समर ने अपने साथ बैठे लोगों को इशारे से बाहर भेज दिया …- ” कहां चली जा रही हो?

समर के सवाल पर पिया चौक कर उसे देखने लगी-” अरे आप की मीटिंग खत्म हो गई मंत्री जी।

‘खत्म तो नहीं हुई लेकिन खत्म करनी पड़ी, अब बोलो कैसे आना हुआ यहां?’

“वाह आप पूछ तो ऐसे रहे जैसे जानते ही नहीं।”

” ओह्ह रियली! मैं नहीं जानता कि आप अपना कीमती वक्त निकालकर यहां किस लिए आई है?”

“ओह! तो यह बात है! मतलब मंत्री जी नाराज हो गए हैं! मैं कॉफी शॉप पर समय में नहीं पहुंच पाई इसलिए ना।

“किसने कहा मैं नाराज हो गया हूं? जिन लोगों को वक्त की कदर नहीं, मैं भी उनकी कदर नहीं करता।

“ओहो फिलॉस्फर जी सुनिए! वक्त की कदर और बेकद्री वाली कोई बात ही नहीं थी। मैं निकल ही रही थी कि एक इमरजेंसी केस चलाया, अब पेशेंट को एकदम इमरजेंसी में अकेला छोड़ कर तो मैं नहीं आ सकती ना!”

“तो आप क्यों आई हो? अभी भी पेशेंट के पास ही रहना था। मैंने तो नही बुलाया।”

“अब वह स्टेबल है, उसे मेरी जरूरत नहीं थी इसलिए मैं आ गई।”

“इसका मतलब आप के मरीज ही आपके लिए सबसे पहले हैं। जब उन्हें आपकी जरूरत नहीं होगी तभी आप बाकी लोगों पर ध्यान दे पाएंगी।”

“नहीं मेरा यह मतलब तो नहीं था!”

“तो और क्या मतलब है आपका?”

“मंत्री जी! हो क्या गया है आपको ? आप भी तो अपने कैरियर के लिए बहुत कॉन्शियस हैं। आपके लिए भी तो आपका काम ही सबसे पहले हैं। तो अगर मेरे लिए मेरा काम इंपॉर्टेंट हो गया तो आपको इतनी नाराजगी क्यों हो रही है ।यह तो गलत बात हुई ना आपके अपने खुद के लिए अलग रूल्स और मेरे लिए अलग रूल्स।”

“तुम्हारे लिए रूल्स बनाने वाला मैं होता कौन हूं? तुम्हारी लाइफ है तुम्हारे रूल्स तुम जो चाहे वह करो! जैसे चाहे वैसे रहो। बड़ी से बड़ी बातें मुझसे छुपा जाओ। मैं कौन होता हूँ तुम्हें कुछ बोलने वाला?”

“मैंने कौन सी बड़ी बात छुपा ली? “

पिया का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था उसकी चाची अभी कुछ दिन पहले ही उसकी मां के पास एक रिश्ता लेकर आई थी! लड़का रिश्तेदारी में ही था। डॉक्टर था और दिल्ली में अच्छी खासी प्रैक्टिस थी।
पिया का परिवार पिया के पीछे लगा हुआ था कि वह एक बार हां बोल दे तो चट मंगनी पट ब्याह कर उसके घर के लोग गंगा नहा लेंगे। वह तो पिया ही थी कि कोई ना कोई बहाना बनाकर अब तक उस रिश्ते के लिए टालती चली आ रही थी।
उसे अचानक से लगा कि कहीं समर को इस रिश्ते के बारे में कोई खबर तो नहीं हो गई।

“मैं तुम्हें बताने ही वाली थी लेकिन मौका ही नहीं मिला।”

“क्या बताने वाली थी?”

“यही कि घर पर रिश्ता देखा जा रहा है, और इस बार…..

समर ने पिया की बात आधे में ही काट दी, अब उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच चुका था। अब तक तो वह बांसुरी की बात छिपाए जाने से ही नाराज था, लेकिन अब पिया ने जो बात बोली थी उसे सुनकर समर का दिमाग उड़ चुका था।

“क्या इस बार तुम हां करने वाली हो, तो जाओ कह दो किसने रोका है तुम्हें। तुम वैसे भी अपनी मर्जी की मालिक हो। नए जमाने की लड़की हो। तुम्हें किसी का बंधन क्यों पसंद आएगा भला?”

“यह कैसी बातें कर रहे हो समर?”

“कैसी बातें कर रहा हूं? बिल्कुल सही बातें कर रहा हूं! कौन है वह जहाँ तुम्हारा रिश्ता तय हो रहा है?”

“डॉक्टर ही है दिल्ली में है प्रैक्टिस करता है।”

“बस और क्या चाहिए? लड़के का अच्छा जमा जमाया अस्पताल है। शादी के बाद तुम दोनों हस्बैंड वाइफ मिलकर उस अस्पताल को चलाना।”

बातों का रुख कड़वाहट की ओर मुड़ता देख पिया ने सोचा कि कुछ हल्का-फुल्का मजाक करके बातों को हल्का बना लिया जाए!
वो हंसने लगी- ” हां बिल्कुल मैं और मेरा हस्बैंड अस्पताल खोलेंगे! और तुम जब भी जरूरत हो इलाज करवाने चले आना। तुम्हारा पूरा इलाज फ्री में होगा। और सुनो तुम्हारे साथ साथ तुम्हारे मॉम डैड तुम्हारे सारे परिवार का भी इलाज मेरे अस्पताल में फ्री हो जाएगा।”

समर का दिमाग इस वक्त इतना खराब था कि उसे यह लगा ही नहीं कि पिया ने सिर्फ मजाक के तौर पर यह कहा है !
समर चुपचाप उठकर अपने कमरे से बाहर निकल गया। पिया ने उसे रोकने और मनाने की कोशिश भी की ,वह इसके पीछे भागी लेकिन समर ने पलट कर उसे जोर से डांट लगा दी-” खबरदार जो मेरे पीछे आने की कोशिश की, इसी वक्त निकलो और अपने अस्पताल घर जहाँ जाना है चली जाओ। बस मुझे नज़र मत आना।”

आश्चर्य से समर को देखती पिया तेज तेज कदमों से वहां से बाहर निकल गई।

वह अपने काम के कारण ही तो लेट हुई थी कोई जानबूझकर तो उसने देर की नहीं थी। फिर समर इतना नाराज क्यों था? उसे समर की नाराजगी का कोई कारण समझ नहीं आया ?आंखों में मोटे मोटे आंसू लिए वह अपनी बाइक चलाती अपने हॉस्टल की तरफ बढ़ गई आज उसका मन बहुत ही खट्टा हो गया था।

वह घर पहुंची ही थी कि उसकी मां का फोन चला आया। मां बड़े उत्साह से उसे उसके होने वाले ससुराल वालों के बारे में बता रही थी। मां से कुछ देर बातें करने के बाद उसका मन थोड़ा हल्का होने लग गया था। लेकिन अब भी उसे समर के ऊपर बहुत तेज गुस्सा आ रहा था।

यह कैसा बचपना था समर का? बाकी पूरी दुनिया के लिए तो वह बहुत समझदार बन जाता था, फिर उसी के लिए इतना नासमझ इतना बच्चों सा क्यों हो जाता था?
कि तभी पिया की मां ने एक और विस्फोट कर दिया

“बेटा अमोल तुझसे मिलना चाहता है। मैंने तेरे शहर का पता बता दिया है वह कल सुबह तुझसे मिलने आ रहा है।
देख अब की बार कोई भी उटपटांग हरकत मत करना। इस बार संभाल लेना। वह दो दिन रुकेगा। कल रात में उसकी वापसी की फ्लाइट है। बस दो दिन अच्छे से बन संवर के उसे थोड़ा वक्त दे देना। क्योंकि बेटा यह रिश्ता तेरे पापा जी को और मुझे बहुत पसंद है। सब कुछ एकदम सही है किस्मत से ऐसे अच्छे रिश्ते मिलते हैं अब तो कोई नाटक या नखरा मत करना समझी।”

“अरे मां !!यह क्या किया? यहां क्यों भेज रही हो? यहां कहां रुकेगा वह? “

“वहां उसकी दीदी और जीजाजी रहते हैं। उनके घर पर रुकेगा । तुझसे बस मिलने आएगा, तो तू कल उसके मिलने आने के हिसाब से अपनी ड्यूटी देख लेना समझी।

“हां डॉक्टर थोड़ी ना हूं! मैं तो कलेक्टर हूं यहां कि।
मेरे से मिलने जुलने वालों के आधार पर ही मेरी ड्यूटी का टाइम डिसाइड करती है सरकार है ना।”

“अब वह सब मैं नहीं जानती, लेकिन लड़कियों के लिए पढ़ाई लिखाई जितनी जरूरी है उतना ही सही समय पर शादी पर हो जाना भी बहुत जरूरी है।
निम्मी की बुआ याद है? पढ़ाई पर पढ़ाई पढ़ाई पर पढ़ाई , इतनी पढ़ाई कर ली, उन्होंने कि उनके डिग्री के हिसाब से लड़का ही नहीं मिला।
सरोज आंटी की बेटी याद है पहले एमबीबीएस किया फिर उसके बाद रूरल सर्विस की उसके बाद एमडी किया। इसके बाद भी उसका मन नहीं भरा लड़की पीएचडी भी करना चाह रही थी अब देखो कुंवारी बैठी क्लिनिक में बस मरीजों के साथ टाइम पास करती है।
इसीलिए बड़े बुजुर्ग कह गए हैं लड़की अगर डॉक्टर बने तो पढ़ाई के बीच में ही उसको ब्याह दो, तभी वह ज्यादा सफल होती है । और सच मान पिया यह टोटका भी है पढ़ाई के बीच में शादी हो जाए तो पढ़ाई में भी इजाफा होता है। नौकरी भी जल्दी लगती है। और हर तरफ से बरकत होती है। और वो याद है तुझे, रुक्मिणी बुआ की मंझली बहु के चाचा की लड़कीं। अब तो वो क्या कहतें हैं ….

“मम्मी कहां से लाती हो यार ऐसे फंडे ! पहले ही दिमाग खराब हुआ पड़ा है और तुम हो कि के बी सी खेल रही हो।रुक्मिणी फुई की बहु के चाचा की लड़की कौन थी पहचाने और जीतें पचास हज़ार रुपये। “


” वो सब छोड़ , कल तू उससे मिलने चली जाना ,समझी? “

एक छोटा सा “हम्म” बोल कर उसने फ़ोन रख दिया।

*****

चुनाव की तैयारियां अपने अंतिम पड़ाव पर थीं। अब सभी की व्यस्तता बढ़ चुकी थी।
इसके साथ ही मायानगरी में भी दाखिले शुरू हो गए थे। निरमा पिछले कुछ समय से खाली भले ही बैठी रही हो लेकिन उसमें अपने काम को सम्पूर्णता से करने का जज़्बा था। राजा भैया के इतने विश्वास से दिए पद की गरिमा उसे बनाये रखनी थी। वो पूरे जोश से अपने काम में डूब गई थी।

ऐसे ही एक शाम वो अपना लैपटॉप खोले काम कर रही थी…
उसी वक्त अम्मा ने मीठी के लिए दूध बनाने गैस पर चढ़ा रखा था। बाहर ज़रा मौसम खराब होता देख अम्मा ने घर निकलने की इच्छा जताई जिसे निरमा ने मान लिया…

“बहुरिया खाना बना कर रख दिये हैं और बिटिया के लिए दूध बना कर भी रख दिये हैं। थोड़ा ठंडा हो जाये तब पिला देना। “

“ठीक है अम्मा ! “लैपटॉप से नज़र हटाये बिना ही निरमा ने जवाब दिया और वापस काम में लग गयी।
अम्मा अपने घर के लिए निकल गईं। मीठी वहीं इधर उधर खेलती बैठी रही।
मीठी कुछ देर में खेलते कूदते उसी टेबल तक पहुंच गईं जहाँ अम्मा जाते वक्त दूध रख गयीं थीं। दूध ज़रा किनारे ही रखा था।
मीठी अब चलने फिरने लगी थी वह टेबल पर के सामान इधर-उधर करती खेल रहे थी। दूध का गिलास गर्म था उसमें से धुआं निकल रहा था, मीठी उस गिलास तक पहुंचने ही वाली थी कि, तभी बाहर से प्रेम भागता हुआ भीतर चला आया। उसने टेबल पर रखा दूध का गिलास उठाया और उसे जरा भीतर की तरफ रख दिया। और तुरंत मीठी को गोद में उठा लिया…
प्रेम के कुछ इस तरह आने और मीठी को उठाने तक में निरमा का ध्यान भी उन दोनों पर चला गया वह भी चौक कर उन दोनों के पास चली आई।
उसने तुरंत मीठी को गोद में ले लिया….

निरमा की इस सब में कोई गलती नहीं थी , लेकिन फिर भी उसे आत्मग्लानि ने घेर लिया ।। वो मीठी को गोद में लिए एक किनारे जाकर बैठ गई ।उसने डरते हुए प्रेम की तरफ देखा…-” आई एम सॉरी प्रेम जी ! मैं अपने काम में इतनी मग्न हो गई थी, कि मेरा ध्यान ही नहीं गया कि ग्लास टेबल पर एकदम किनारे रखा है। और मीठी का हाथ पड़ कर गिर सकता है। मीठी उस दूध से जल सकती है। आइंदा मैं इस बात का पूरा ध्यान रखूंगी।”

प्रेम भी निरमा के पास आकर बैठ गया…-” इसमें तुम्हें सॉरी बोलने की क्या बात है निरमा? अब तुम्हें बस इतना करना कि अगली बार से गिलास मीठी की पहुंच से थोड़ा दूर रखा हो।

निरमा आंखें फाड़े प्रेम को देखती रह गई। कोई और आदमी होता तो अभी अपनी पत्नी को उसके इस तरह काम में मगन रहकर बच्चे की तरफ ध्यान ना देने के लिए सौ बातें सुना चुका होता। पुरूष का सहज स्वभाव यही तो होता है। गलती किसी की भी हो लेकिन उसका ठीकरा वह अपनी पत्नी के माथे ही फोड़ते हैं। उसने खुद अपने आसपास आज तक यही देखा था।

अगर औरत नौकरी कर रही है। घर से बाहर जाकर काम कर रही है, तब भी ज्यादातर घरों में पुरुष उन्हें इसी शर्त पर बाहर जाकर काम करने देते हैं, कि वह अपने घर के कामों में किसी भी तरह की कोई कोताही नहीं करेंगी।
जैसे बाहर जाकर काम करना स्त्रियों का कोई शौक हो। बाहर उन्हें काम करना ही नही पड़ता हो।
वो तो महज मौज मस्ती करने निकलती हों। वही काम अगर पुरुष बाहर जाकर करता है तो शाम को लौट कर वह इतना थक जाता है की फ्रेश होने के लिए उसे तुरंत गर्म चाय पानी सब कुछ सोफे पर ही चाहिए। लेकिन उसी काम को कर के बाहर से लौटी स्त्री घर भर में किसी से एक ग्लास पानी की भी उम्मीद नहीं कर सकती। चाहे उसने ऑफिस में कितनी भी मेहनत की हो कितना सारा भी काम किया हो,लेकिन शाम को थक कर लौटने के बाद उसे चाय भी पीनी हो तो खुद ही बनाना पड़ता है ।
अगर पुरुष ऑफिस में कुछ अधिक वक्त तक रुक कर काम करें तो वह उसका ओवरटाइम कहलाता है। लेकिन अगर कभी किसी औरत को ओवरटाइम करने रुकना पड़ जाए तो बेचारी मन ही मन घबराने लगती है कि घर जाने के बाद पति को क्या कहकर सफाई देगी।
बिना किसी गलती के वो हर पल एक अग्निपरीक्षा में जलती रहती है कि जाने उसकी किस चूक पर घर में बवाल मच जाए।
यही तो आज तक उसने अपने आसपास देखा था। उसकी पड़ोसन रीमा भाभी का यही हाल था। बेचारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाया करती थी। सुबह 8:00 बजे के स्कूल के लिए निकलने से पहले घर भर का लंच और नाश्ता तैयार करके , पति, बच्चों को टिफिन देकर अपना टिफिन लेकर निकलती। दोपहर तीन बजे आने के बाद अपनी इतनी थकान के बावजूद एक कप चाय पीकर और आधे घंटे का आराम लेकर वो रात के खाने की तैयारी में जुट जाती। इसके बावजूद अक्सर भाई साहब को यही कहते सुना कि-” भई हमारे ऑफिस की थकान की बात ही अलग है। जबकि वह दस बजे ऑफिस जाते और शाम पांच बजे वापस आ जाते। इस जाने और आने के पहले और बाद में उन्हें कोई एक्स्ट्रा काम नहीं करना पड़ता था। रीमा भाभी जाने से पहले उनके ऑफिस के कपड़े रुमाल मोज़े सब कुछ सलीके से पलंग पर निकाल कर रख जाती। उनके लौट कर आने के बाद हाथ मुंह धोने तक में गरम नाश्ता और चाय टेबल पर सजा चुकी होती। लेकिन इस सबके बावजूद उनके घर में कभी किसी ने रीमा भाभी के काम को कोई महत्व नहीं दिया। रीमा भाभी ऐसी अकेली औरत नहीं थी, बल्कि निरमा ने तो अपने आसपास अपने ऑफिस में कई महिलाओं को ऐसे ही खटते देखा था।

उसे हमेशा यही लगता था, जब एक आदमी नौकरी करता है तो उसके साथ उसका पूरा परिवार उसकी नौकरी करता है। सुबह उसके ऑफिस जाने के पहले से लेकर उसके ऑफिस से लौटने के बाद तक हर कोई उस आदमी के पीछे हाथ बांधे दौड़ता रहता है। लेकिन जब एक औरत नौकरी करती है तो वह अकेले अपनी नौकरी करती है। उसका साथ देने के लिए ना तो उसका पति होता है और ना ही बच्चा।

निरमा को अपने ख्यालों में खोए देख प्रेम उसके पास सरक आया।

“तुम कुछ ज्यादा ही घबरा गई हो शायद! ऐसी कोई बहुत बड़ी बात नहीं हो गई है निरमा। छोटे बच्चों के घर में इस तरह के छोटे मोटे हादसे होते रहते हैं। और फिर यहां तो कोई हादसा हुआ ही नहीं। मैंने पहले ही गिलास हटा दिया था। फिर क्यों इतनी परेशान हो? “

निरमा प्रेम के गले से लग कर सिसक उठी। वाकई प्रेम औरों से अलग था। बेहद अलग।
और इसीलिए शायद निरमा की जिम्मेदारियां भी बढ़ गई थी। उसने मन ही मन यह कसम उठा ली कि अब चाहे कितनी भी व्यस्तता हो लेकिन वह आइंदा ऐसी लापरवाही कभी नहीं करेगी। अगर उसे घर से बाहर जाकर काम करना है, तो उस काम के प्रति लगन में वह कभी भी अपने घर पति और बच्चे की उपेक्षा नही करेगी।
ऐसा करने में मेहनत जरूर थोड़ी ज्यादा हो जाएगी, लेकिन प्रेम जैसा पति अगर हर कदम पर उसकी सहायता करने को तैयार बैठा है, तो वह भी हर कठिनाई को पार करते हुए खुद को साबित करके रहेगी।

प्रेम के सीने से लगी निरमा ने खुद को थोड़ा सा और प्रेम में समेट लिया।

*******

सुबह-सुबह बांसुरी बालकनी में बैठी सामने के कमरे को देख रही थी। उसे वह पल याद आ रहे थे जब वह पहली बार पिंकी और राजा के साथ महल में आई थी। राजा के कमरे के ठीक सामने की तरफ़ उसे कमरा मिला हुआ था। वह जब भी अपने कमरे की बालकनी में आती वहां से अक्सर वह छुप-छुपकर राजा को देखा करती थी। और आज वह उसी कमरे की मालकिन बनी बैठी थी। खुद में कोई मुस्कुराती हुई बांसुरी अपनी सोच में गुम थी, कि राजा ट्रैक सूट और स्पोर्ट्स शूज पहने वहाँ चला आया…- ” यहां बैठे-बैठे क्या मुस्कुरा रही है मैडम! चलिए उठिए । वॉक पर चलना है।”

बांसुरी ने अलसाई हुई नजरों से उसे देखा-” हूं मुझे नहीं जाना!”

” ऐसे कैसे नहीं जाना? जाना ही होगा।
यह पूरा समय तुमने अपनी मर्जी से बिताया है। अब ये आखिर का जो थोड़ा सा वक्त बचा है, इसे तो मेरे हिसाब से जी लो।”

“बिल्कुल नहीं! कहा जाता है प्रेगनेंसी में सब कुछ मां की मर्जी से होना चाहिए।”

“लेकिन ऐसे में तो हमारा बच्चा जिद्दी हो जाएगा। अगर मेरे जैसा नहीं हुआ तो मेरी तो कोई बात ही नहीं सुनेगा फिर!”

“क्यों? क्या मैं आपकी बातें नहीं सुनती?”

” वही बातें सुनती हो जो तुम्हारे काम की होती है !जो तुम्हारे काम की नहीं होती उन्हें यूं ही उड़ा देती हो।”

“ऐसा कब किया मैंने राजा साहब जरा बताइए तो!”

“आप अभी क्या कर रही हैं हुकुम आप बताइए तो।”

“आप बहुत जिद्दी हैं साहब ! जाइए ना अपने चुनाव का काम देखिए!”

“पूरा दिन पड़ा है उसी काम के लिए!
यह सुबह का ही तो वक्त है, जब हम साथ में इस प्यारे से बगीचे में घूमते हुए टहलते हुए अपने बच्चे के बारे में बातें कर सकते हैं । चलिए हुकुम बहुत सुंदर मौसम है आइए मेरे साथ।”

और एक तरह से जबरदस्ती बांसुरी का हाथ थामे राजा अपने साथ वॉक करने ले गया। शुरू में थोड़ी देर आलस से चलने वाली बांसुरी कुछ देर बाद ही अपने अंदर ढेर सारी ऊर्जा महसूस करने लगी। बगीचे का एक लंबा चक्कर लगाने के बाद एक जगह बांसुरी को लेकर राजा नीचे ही घास पर बैठ गया।
बांसुरी के सामने बैठे राजा ने उसे अलग अलग तरीके से ध्यान लगाने की विधियां सिखाई और उसके साथ ही खुद भी ध्यान लगाने लगा।
एक डेढ़ घंटे का समय यूं ही बीत गया कि तभी राजा के फोन पर किसी का मैसेज आने लगा।

राजा ने देखा समर का मैसेज था।

ठाकुर साहब के कोर्ट केस के लिए आदित्य और केसर को साथ लेकर समर को दून के लिए निकलना था वह निकलने से पहले एक बार राजा से मिलना चाहता था।

“मैं भी साथ चलूंगा!”

राजा के इस मैसेज पर समर में बांसुरी की हालत का जिक्र किया लेकिन ना राजा को मानना था और न वह माना।

शाम को ही उन लोगों को वहां से निकलना था बांसुरी से इस बारे में जब राजा ने बात की तो बांसुरी ने सहर्ष सहमति दे दी..-” आप मेरी चिंता मत कीजिए साहब! यहां रूपा भाभी जया भाभी फूफू साहेब दादीसा तभी तो हैं। और फिर मम्मी भी तो रुक गई हैं। आप जल्दी से अपना काम निपटा कर आ जाइए । तब तक मैं और आपका छुटकू हम दोनों ही आपका इंतजार करेंगे।

मुस्कुराकर राजा बांसुरी के पास ही बैठ गया।

समर अपने कमरे से निकलकर ऑफिस की तरफ बढ़ गया जाते-जाते उसने पिया को फोन लगा लिया।

सुबह का वक्त था पिया कहीं व्यस्त थी। वह फोन नहीं उठा सकी। समर ने उसे एक मैसेज ड्रॉप कर दिया।

“आज रात की फ्लाइट से दून निकल रहा हूं । उसके पहले एक बार मिलना चाहता हूं। हो सके तो दो घंटे बाद उसी कॉफी हाउस में मिलना।”

पिया ने बांसुरी की हालत के बारे में समर से भी कुछ नहीं बताया था। और बांसुरी की ऐसी हालत के कारण ही उसके राजा साहब परेशान हो उठे थे, इसीलिए समर पिया से नाराज़ बैठा था। लेकिन गुजरते वक्त के साथ यह नाराजगी भी कम हो गई थी। उस दिन के किए अपने अशिष्ट आचरण के कारण उसे खुद भी मन ही मन ग्लानि से हो रही थी। इसलिए वह पिया से एक बार मिलकर माफी मांगना चाह रहा था। मैसेज छोड़ने के बाद वह अपनी तैयारीयों में जुट गया।

अपना सारा काम निपटा कर और सारी तैयारियां समेटकर समर कॉफी हाउस के लिए निकल गया। समय का पाबंद तो वो था ही, अपने तय समय में उसने कॉफी हाउस का दरवाजा खोला और अंदर हॉल में सभी तरफ नजर दौड़ा ली। हॉल में एक तरफ उसे पिया बैठी दिख गयी। मुस्कुराकर वो उसकी तरफ बढ़ा ही था कि, उसने देखा पिया अकेली नहीं थी। उसके साथ एक लड़का भी बैठा था।

समर बहुत धीमे कदमों से उस टेबल तक बढ़ ही रहा था कि उसने देखा उस लड़के ने अपने पास से एक गुलाब उठाकर पिया की तरफ बढ़ा दिया। पिया ने गुलाब को देखा और धीरे से हाथों में ले लिया। पिया और उस लड़के की नजर समर पर नहीं पड़ी थी।

समर कुछ देर को वहीं खड़ा रह गया। फिर खुद को और अपने गुस्से को संभालते हुए पिया से कभी ना मिलने की कसम खाते हुए वहां से बाहर निकल गया।

क्रमशः

aparna….









जीवनसाथी – 111

बाँसुरी की गोद भराई


जीवनसाथी -111



बाँसुरी ने जैसे ही अपने कमरे से बाहर कदम रखा उसकी आंखें आश्चर्य से चौड़ी हो गईं…..
    उसके सामने पूरे रास्ते गुलाबों की पंखडियाँ बिखरी पड़ी थी…
   एक तरफ फूलों से सजी पालकी तैयार रखी थी। पालकी के कहारों की जगह पर प्रेम, विराट और बाँसुरी के ताई जी के दोनों बेटों के साथ ही रेखा भी खड़ी थी।
  बाँसुरी आश्चर्य से भरी उन सभी को देखती खड़ी ही रह गयी….

    वो आगे कदम बढ़ाने ही वाली थी कि उसके ताई के बेटे उसके भैया आगे चले आये। अपनी बहन का हाथ पकड़े उन्होंने उसे आगे ले जाकर पालकी में बैठा दिया…

    रेशमी तोशक के ऊपर भी हर तरफ गुलाबी पंखुड़ियां बिखरी पड़ी थीं।
  मुस्कुरा कर बाँसुरी अंदर बैठ गयी। वो बैठी ही थी कि पालकी का रेशमी पर्दा ज़रा सा खुला और निरमा का चेहरा बाँसुरी को नज़र आ गया…
     निरमा ने झुक कर बांसुरी के माथे पर छोटा सा तिलक किया और उसकी आरती उतार कर साथ खड़ी सहायिका को थाल पकड़ा दी…

   नज़र का काला टीका बाँसुरी के कान के पीछे लगाने के बाद निरमा ने पालकी वापस ढाँक दी।
    प्रेम विराट और ताई के बेटों ने बहुत संभाल कर धीरे से उस चंदन डोली को उठा लिया….

  पालकी अपनी मंज़िल की ओर चल पड़ी। बाँसुरी को वापस अपनी शादी वाली रात याद आने लगी थी….
ऐसे ही पालकी में तो वो स्टेज तक लायी गयी थी।

   यहाँ भी वो उन रेशमी पर्दों से बाहर देख पा रही थी…

   आस पास लोगों को देख उसे समझ आ गया था , कि महल ने इस बार काफी बड़ा आयोजन कर रखा था….

   पालकी आखिर एक जगह जाकर रुक गयी…

  पालकी में से बाहर आने की वो सोच ही रही थी कि रुपा भाभी और जया ने उसके पर्दे खोल दिये और उसका हाथ पकड़ कर उसे बाहर उतार लिया…

   सुनहरी और हरे रंग की पोशाक में बाँसुरी बहुत खिल रही थी।
  उसने सामने देखा, लोगों का हुजूम उसे देखते ही खड़ा हो गया। वो धीरे से अपने सर का घूंघट संभाले आगे बढ़ने लगी… दोनो तरफ खड़े लोग उस पर फूल बरसाते रहे।
  रूपा भाभी और जया उसे साथ लिए मंच तक चले आये।
   वो पैर आगे बढ़ा कर सीढ़ियों पर रखने ही वाली थी कि उसका संतुलन बिगड़ा और गिरने से पहले ही उसे दो मज़बूत बाहों ने थाम लिया।

  उसका सन्तुलन बिगड़ता देख शेखर फौरन अपनी जगह से खड़ा होकर उस तक पहुंचता की राजा अजातशत्रु ने अपनी हुकुम को अपनी बाहों में थाम लिया।

  उसे साथ लिए राजा मंच पर ले चला।
मंच पर लगे सोफा के पास ही बाँसुरी की माँ पिता और ताई के साथ ही बाकी रिश्तेदार खड़े थे। सबको एक साथ खड़े देख बांसुरी आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी में डूब गई। वो जाकर अपनी मां के सीने से लग गई एक-एक कर सब से मिलते हुए उसके चेहरे की मुस्कान जा ही नहीं रही थी। उसने राजा की तरफ शर्माते हुए देखा और आंखों में आंखों में उसे धन्यवाद अर्पित कर दिया। राजा ने भी पलके झुका कर अपनी हुकुम का अभिवादन कर दिया…

” आपने बताया ही नहीं मां!-आप सब यहां आ रहे हैं?

” लाड़ो! कुंवर सा ने हम लोगों को भी तो मना कर दिया था। वह तुझे सरप्राइस देना चाहते थे। इतनी किस्मत वाली है मेरी गुड़िया रानी । अब जल्दी से एक नन्हा सा राजकुमार ले आ और सब कुछ अच्छे से हो जाए , फिर तुम दोनों को साथ ले कर माता वैष्णो देवी के दर्शन के लिए जाऊंगी।”

बाँसुरी ने शरमा कर धीरे से हाँ में सर हिलाया और चुपचाप नीचे बैठ गई। पंडित जी ने विधि विधान से पूजा पाठ प्रारंभ कर दी।

पूजा समाप्त होते ही पंडित जी ने एक-एक कर महल की सभी महिलाओं को आगे बुलाना शुरू कर दिया…

सबसे पहले काकी साहेब यानी पिंकी की मां आगे चली आई । सहायिका के हाथ से गहने का डिब्बा लेकर उन्होंने बांसुरी की गोद में रखा इसके साथ ही फल मिठाई नारियल सब कुछ बांसुरी की गोद में डालकर उन्होंने उसे मन भर कर आशीर्वाद दे दिया।

माथे पर छोटा सा सिंदूर का तिलक लगाकर उसके कान में चुपके से कुछ कहा और मुस्कुरा कर एक ओर खड़ी हो गई।
बांसुरी ने झुककर उन से आशीर्वाद लिया और मुस्कुराती बैठी रही…
  
मायके और ससुराल की महिलाएं एक-एक कर आती रही और बांसुरी की गोद में मिठाई फल मेवे मिष्ठान्न गहने जेवर डालकर उसे आशीर्वाद देती रहीं।

रूपा भाभी जया, रेखा, पिंकी इन सब के निपटते ही रूपा ने निरमा को भी खींच कर आगे खड़ा कर दिया। राज महल की गोद भराई में निरमा संकोच वश एक तरफ पीछे खड़ी थी। उसे लग रहा था रानी की गोद भराई करने की उसकी औकात है या नहीं लेकिन रूपा उसे दोनों कंधों से पकड़ कर सामने ले आई ।

निरमा भी अपनी प्यारी सहेली के लिए एक तोहफा लेकर आई थी। उसने बांसुरी की गोद में फल मिठाइयां डालने के बाद अपने पर्स से एक मखमली डिब्बी निकाली और उसमें से एक पतली सी चेन निकालकर बांसुरी के गले में डाल दी।
चेन में लगे छोटे से लॉकेट में राजा की तस्वीर बनी हुई थी। बांसुरी ने तोहफा देखा और भावुकता में उसकी आंखों से दो बूंदें छलक पड़ीं। उन आंसुओं में छिपे प्रेम को देख भावुकता और कृतज्ञता से निरमा की आंखों से भी दो बूंद आंसू छलक पड़े।

“अरे कोई मुझे भी तो बताओ कि आप सब बांसुरी के कान में कह क्या रही हो?”

राजा के सवाल पर रूपा जया निरमा सभी राजा को छेड़ने लगीं….

” यह बातें आपसे कहने की नहीं है। वैसे तो गोद भराई की रस्म में ज्यादातर औरतें ही सम्मिलित होती है, लेकिन आपकी जिद थी कि आप अपनी हुकुम की गोद भराई खुद देखना चाहते हैं, तो आइए अब आप भी गोद भर दीजिए।

राजा भी मुस्कुरा कर आगे बढ़ गया।

मुस्कुराते हुए बांसुरी को देखते हुए उसने भी वहां रखे सारे सामान को बांसुरी की गोद में डाला और वापस उसे देख छेड़ने लगा…

” मैं तो आपके लिए कोई तोहफा ही लाना भूल गया हुकुम । कल रात तक काम में इतना व्यस्त था कि दिमाग से उतर गया।”

बांसुरी ने भी हंसकर राजा को देखा

“कोई बात नहीं साहब! आपसे तो मैं कभी भी तोहफा ले लुंगी। “

बाँसुरी ने मुस्कुरा कर उसे देखा कि तभी समर भी वहाँ चला आया…

“तोहफा मैं लेता आया हूँ हुकुम आपकी तरफ से।”

और आगे बढ़ कर उसने कुछ पेपर्स राजा के हाथ में रख दिए….

  राजा ने पेपर्स पर नज़र डाली और मुस्कुरा उठा। बाँसुरी के ट्रांसफर के पेपर्स थे यानी  उसे अब वापस दून जाने की ज़रूरत नही थी।

मुस्कुराकर राजा ने वह पेपर बांसुरी की गोद में डाल दिया…

” अब हमारी हुकुम को हमसे दूर जाने की जरूरत नहीं है!”

समर भी मुस्कुराने लगा….
बांसुरी ने समर की तरफ देखा- ” आप कोई गिफ्ट नहीं लाए मेरे लिए?”

समय ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया-” मैंने तो अपने पूरे के पूरे राजा साहब आप को तोहफे में दे रखे हैं! रानी हुकुम इससे बढ़कर कीमती मैंने अपने जीवन में और कुछ नहीं देखा। और जो सबसे कीमती चीज देखी वह आप के हवाले कर दी अब इससे कम क्या तोहफा दे आपको?”

“बस आप लोगों से कोई बातें बनवा ले। हमारे साहेब की तरह ही आप भी बातें बनाने में बहुत एक्सपर्ट हो गए हैं। आप का तोहफा ड्यू रहा। समय आने पर मांग लूंगी, याद रखिएगा।”

“जी रानी साहेब बिल्कुल याद रखूंगा!”

राजा के कान में धीरे से कुछ कहकर समर वहां से निकल गया।
  कार्यक्रम जोर-शोर से शुरू था गोद भराई की रस्म के साथ ही गाना बजाना भी शुरू हो गया था।


    सोलह सिंगार करके गोदी भराई ले,
सोलह सिंगार करके गोदी भराई ले,
सइयां, सइयां, सइयां, सइयां,
सइयां से खेली बहुत अब छोटू को खिलाई ले,
सोलह सिंगार करके…


    एक के बाद एक गोद भराई गीतों में बेहतरीन प्रस्तुतियां चलती रही।
रूपा और जया ने सहायिकाओं से अपना और बांसुरी का खाना वही मंगवा लिया । इतनी भीड़ भाड़ के बीच बांसुरी से हालांकि कुछ भी खाया नहीं जा रहा था। दूसरी बात उसे यह भी लग रहा था कि राजा वहां से निकलना चाह रहा है।
   समर ने जाते वक्त जाने क्या कहा राजा के कान में कि उसके बाद से राजा का वहां मन ही नहीं लगा…
आखिर राजा ने बांसुरी की तरफ देखकर आंखों ही आंखों में उससे वहां से जाने की अनुमति मांगी और बिना खाए ही निकल गया।

   *****

तेज कदमों से चलते हुए राजा कार्यक्रम क्षेत्र से निकलकर अपने ऑफिस की तरफ बढ़ चला उसी वक्त विराज अपने कमरे से निकलकर कहीं जा रहा था राजा से टकराते टकराते बचा….

“आराम से चलो विराज !- अभी उठे हो सो कर?

“हां! जिसकी रातों की नींद गायब हो वह सुबह तो देर से ही सो कर उठेगा | सबकी किस्मत तुम्हारी जैसी नहीं होती है ना अजातशत्रु!”

विराज को कोई जवाब देने का राजा का मन नहीं था| वह चुपचाप ऑफिस की तरफ निकल गया और विराज अपने दोस्तों की मंडली से मिलने निकल गया|

ऑफिस के बाहर ही दरबान खड़ा था। राजा अजातशत्रु के वहां पहुंचते ही उसने बड़े अदब से झुक कर प्रणाम किया और दरवाजा धीरे से खोल दिया। अजातशत्रु के अंदर पहुंचते ही उसकी आंखें आश्चर्य से खुलकर चौड़ी हो गई, और उसने तुरंत जाकर आदित्य को अपने सीने से लगा लिया…

” कहां चले गए थे भाई? तुम्हारी बहुत फिक्र हो रही थी!”

आदित्य को पहली बार किसी ने इस तरह प्यार दिया था। उसकी आंखें छलक उठी। अजातशत्रु के सीने से लगे हुए उसने अपने बड़े भाई को और भी जोर से जकड़ लिया।

कुछ देर इसी तरह खड़े रहने के बाद वह अलग हुआ और उसने झुक कर राजा के पैर छू लिये। तफ़सील से बैठकर उसने दून से भागने से लेकर अब तक की सारी कहानी अजातशत्रु को कह सुनाइ।

केसर की हालत अब भी पूरी तरह से तो नहीं सुधरी थी, लेकिन वह पहले से अब काफी बेहतर थी। उसे आदित्य ने एक आरामदायक सोफे पर टेक लगा  कर बैठा दिया था।

“आप कैसी हैं केसर ?”

राजा ने केसर की तरफ देखा और शर्मिंदगी से केसर ने आंखें झुका ली आखिर वह किस तरह राजा से आंखें मिलाती?

राजा का नुकसान करने के लिए जाने उसने क्या-क्या नहीं किया था। ठाकुर साहब ने उसे एक मोहरा बनाकर राजा की जिंदगी में जहर घोलने को भेज दिया था। राजा और बांसुरी को अलग करने के षड्यंत्रों के अलावा भी उसने बहुत कुछ किया था। और इस सब के बाद भी यह राजसी जोड़ी उसकी जान बचाने के लिए लगी हुई थी। उसे अब अपनी तुच्छ बुद्धि पर तरस आने लगा था। क्यों उसने कभी भी सही और गलत को नहीं पहचाना ? क्यों उसने समय रहते ही ठाकुर साहब से कन्नी नहीं काटी? क्यों उसने इतने दिनों तक ठाकुर साहब की बातें मानी।

देर से ही सही उसे अकल तो आ ही गई थी। आखिर आदित्य का साथ उसे सही रास्ते पर ले ही आया ।उसने तो आदित्य को फंसाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
ठाकुर साहब तो यही चाहते थे कि भाई-भाई आपस में एक दूसरे के दुश्मन हो जाए! और पूरा परिवार एक दूसरे को मारकर तबाह हो जाए। उसने इस जलती आग में घी का काम किया था । लेकिन बावजूद आज राजा अजातशत्रु ही नहीं राजकुमार आदित्य भी उसकी जान बचाने में लगे हुए थे। तो क्या बदले में उसका कोई फर्ज नहीं बनता था उनके प्रति।

अपनी जगह से खड़े होकर वह भी राजा अजातशत्रु तक चली आई और उनके पैरों पर झुक गई….

” अरे अरे यह क्या कर रही है आप? हमारे यहां औरतें इस तरह पैरों में नहीं झुकती उठिए बाईसा!”

“आप हमें इतना सम्मान मत दीजिए राजा साहिब !हम इस के अधिकारी नहीं हैं। बहुत पाप किए हैं हमने अपने जीवन में बहुत गलतियां की हैं ।और अब उन गलतियों के पश्चाताप का समय आ गया है।”

राजा ने केसर को हाथ पकड़ कर सामने सोफे पर बैठा दिया और पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ा दिया।

“राजा साहेब हम बातों को घुमा कर और उलझायेंगे नहीं। हम साफ़ सपाट शब्दों में कहना चाहते हैं, कि आज तक हमने जो भी गलतियां की हैं उनके पीछे हम खुद हैं।
क्यों हमारा दिमाग सही और गलत के बीच भेद नहीं कर पाया? क्यों हम ठाकुर साहब के कहने में आ गए? आखिर क्यों हमने उनकी हर गलत बात को मंजूर किया? असली दोषी तो हम ही हुए ना ! और अब हम अपनी सारी गलतियों को सुधारना चाहते हैं।
अब तक तो आप जान ही गए होंगे कि रेखा हमारी छोटी बहन है और वह ठाकुर साहब की बेटी नहीं है! ठाकुर साहब ने हमारे माता-पिता से रेखा को गोद ले लिया था और उसके बाद रेखा की जिंदगी को बेहतर बनाए रखने की शर्त पर वह हमसे कितना कुछ करवाते रहें! उनकी शर्तें तो खैर बहुत सारी होती थी, लेकिन अब उन पुरानी बातों का क्या रोना? अब हम आपसे सिर्फ यह कहना चाहते हैं। ठाकुर साहब की पत्नी की मौत में बांसुरी का कोई हाथ नहीं है हम खुद इसके चश्मदीद गवाह हैं।
जैसे ही ठाकुर साहब की पत्नी का केस फाइल होता है हम गवाह के तौर पर वहां जरूर जाएंगे, और ठाकुर साहब और उनकी पत्नी का सारा कच्चा चिट्ठा सबके सामने खोल देंगे।
आप निश्चिंत रहें राजा साहेब अब आपकी बांसुरी को हम कुछ नहीं होने देंगे।

“बहुत-बहुत शुक्रिया तुम्हारा केसर ।उनका केस लग चुका है । और परसों ही सुनवाई है हमें आज रात ही दून के लिए निकलना होगा।”

समर की बात पर केसर ने समर की तरफ देखा और एक बार फिर उसकी पलकें झुक गई- ” समर तुम भी हमें माफ कर देना हमने जो सब किया…

समर ने केसर की बात आधे में ही काट दी..-” कोई बात नहीं केसर ! अब इन सब बातों का कोई मतलब नहीं । हम सब समझते हैं तुम्हारी भी कुछ मजबूरियां थी।
वह कहते हैं ना सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते। बस वही बात तुम्हारे साथ भी है। अब तुम हम सबकी नजरों में भूला नहीं हो।
तुमने अपनी गलतियां मान ली और तुम अपनी गलतियों का पश्चाताप भी करना चाहती हो यही सबसे बड़ी बात है।
वैसे तो अब सब सही ही होता दिख रहा है, लेकिन जाने क्यों मेरे दिमाग की घंटी बार-बार इस बात पर बज रही है कि ठाकुर साहब का कोई अता पता नहीं चला है। उन्हें अपनी पत्नी से भी ऐसा कोई प्रेम तो था नहीं । उन्होंने खुद ही अपनी पत्नी के ऊपर हमला करवाया था। यह भी मालूम चल चुका है और इसी सब को साबित करने के लिए केसर तुम्हारा कोर्ट में पेश होना बहुत जरूरी है।”

“तुम्हारी बात बिल्कुल सही है समर ! हम सब आज ही दून के लिए निकल जाएंगे! पर फिर भी मैं यह जानना चाहता था कि आखिर तुमने मुझे और केसर को ढूंढ कैसे निकाला?

उसी वक्त युवराज का सहायक राजा को बुलाने चला आया। कोई बहुत जरूरी बात होने से ही युवराज इस तरह से मीटिंग के बीच से राजा को बुला सकता है यह सोचकर राजा तुरंत वहां से निकल गया।

“आदित्य सा बस यही मत पूछिए बहुत मुश्किल था मेरा आपको और केसर को ढूंढना।
आप दोनों के ही फोन बंद थे हालांकि फोन आप लोगों के साथ होते तो फिर भी किसी तरह से मैं ट्रैक कर लेता लेकिन फोन भी आपके पास नहीं थे ! सबसे पहले मैंने यही गणित लगाना शुरू किया कि, अगर दून से आप उस वक्त पर भागेंगे तो किस दिशा में भाग सकते हैं। मुझे लगा आप बस रूट की जगह ट्रेन रूट को फॉलो करेंगे, क्योंकि अगर आप ट्रेन में चढ़ते हैं तो ठाकुर साहब के गुंडों का लंबी सी ट्रेन में आप को पकड़ना मुश्किल होगा। उसकी जगह एक छोटी सी बस से निकलना आप लोगों के लिए ज्यादा सुरक्षित नहीं रहता। मैंने आप लोगों के भागने के वक्त से डेढ़ से दो घंटों के भीतर की सभी ट्रेनों को खंगालना शुरू किया। उन सारी ट्रेन रूट्स को पता करने के बाद मुझे सबसे करीबी ट्रेन मध्य प्रदेश जाने वाली लगी। और मैंने अपने जासूसों को उस रूट की ट्रेन के सभी छोटे स्टेशंस पर दौड़ा दिया । मुझे बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। आप जब भिंड में थे वहां भी मैं पहुंच चुका था, लेकिन मेरे पहुंचने से पहले ही ठाकुर के गुंडे वहां पहुंच गए और आपको वहां से निकलना पड़ गया।
बस उसके बाद तो मुझे यह समझ आ ही गया था, कि आप यहां से बहुत ज्यादा दूर नहीं गए होंगे। क्योंकि आपके वहां से भागते ही उन गुंडों को मेरे आदमियों ने पकड़ लिया था, और पुलिस के हवाले कर दिया था। तो मुझे पता चल चुका था कि केसर बाईसा को गोली लगी है बस उस जगह के आसपास की जगह पर आदमी दौड़ाने से मुझे आपके बारे में खबर मिल गई।
    हालांकि इस सब दौड़ भाग में भी मुझे महीना भर लग ही गया और उस पूरे महीने आपको और केसर सा को उस छोटी सी जगह में बिना किसी सुविधा के गुजारना पड़ा जिसके लिए मुझे बहुत खेद है। क्योंकि मैं इससे ज्यादा कुछ कर नहीं पाया आपके लिए।
आप दोनों का यूँ एक साथ मिल जाना हमारे लिए बहुत खुशी की बात है। आप नहीं जानते- आपके गायब होने के बाद से ही राजा साहब बहुत परेशान थे। किसी भी बात में उनका मन नहीं लग रहा था। आप जानते ही हैं कि राजा साहब चुनाव की तैयारियों में भी व्यस्त हैं । इसके साथ ही रानी साहब भी अब अपने पूरे दिनों से हैं। ऐसे में इन्हें अपने छोटे भाई की बहुत जरूरत थी। विराज का हाल तो आप जानते ही हैं उनसे किसी भी तरह की कोई उम्मीद नहीं है।”

समर की बात सुनकर आदित्य भी मुस्कुराने लगा । केसर की तरफ उसने नज़र डाली।
उसे वाकई उम्मीद नहीं थी कि इतने कम समय में महल उसे इतने प्यार से अपना लेगा।

“चुनाव की तिथि क्या है समर?”

उसके सवाल पर समर ने कुछ कागजात उसके सामने बढ़ा दिये…-” बस बहुत ही जल्दी!
नामांकन भरा जा चुका है। और चुनाव की सारी तैयारियां अपने चरम पर है! ठीक पंद्रह दिन बाद चुनाव होने हैं। अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। सिर्फ इन दो हफ्तों में हमें ऐसा कुछ करना है कि जितनी सीट पर भी हुकुम और उनके कैंडिडेट खड़े हैं, वह सीटें हम भारी मतों से जीत सकें।

“बेशक हम ही जीतेंगे। एक बात और हम यह भी जानना चाहते थे समर! की इतनी कम सीट्स में जीतने के बावजूद भैया किसी भी ऊंचे पद को पा तो नहीं पाएंगे। क्योंकि सत्ता में तो वही पार्टी आएगी जिनके सबसे ज्यादा उम्मीदवार जीतेंगे और हमारे उम्मीदवार पक्ष और विपक्ष दोनों के ही उम्मीदवारों से आधे से भी कम है संख्या में।”

“आप सही कह रहे हैं आदित्य! इसीलिए चुनाव में मैं ऐसी तैयारी कर रहा हूं कि हमारे राजा साहब भारी मतों से जीतेंगे भी और बाकी के पक्ष और विपक्ष और बाकी पार्टियां बुरी तरह से हारेंगी भी।
दोनों पार्टी में अगर जीत हार का फैसला नहीं हो पाता है तब उसका पूरा फायदा हुकुम की पार्टी को मिलेगा और बस यही मेरी योजना है।
    मतदान ऐसे संपन्न होना चाहिए कि हुकुम की पार्टी के सभी लोग जीते और बाकी पार्टी के लोग ऐसे आंकड़ों से जीते कि जिस भी पार्टी को सत्ता में आना हो उसे हुकुम से हाथ मिलाना ही पड़े, और उस वक्त हुकुम को सर्वश्रेष्ठ पद देने की शर्त पर ही हम अपने जीते हुए कैंडिडेट के साथ उन से हाथ मिलाएंगे।”


“कहना तो तुम्हारा सही है समर लेकिन क्या भाई साहब इस बात के लिए तैयार होंगे?”

“राजा अजातशत्रु यानी हमारे हुकुम इस बात के लिए कभी तैयार नहीं होंगे। उन्होंने आज तक अपनी जिंदगी में हर जंग पूरी इमानदारी से जीती है, और आज भी वह मेरी इस बात के लिए तैयार नहीं होंगे। लेकिन इसीलिए मैं उन्हें यह सब बिना बताए करने वाला हूं आपसे भी उम्मीद करता हूं कि आप मेरी यह बात हम दोनों के बीच ही रखेंगे।
   फिलहाल राजा जी से कुछ भी कहने का कोई मतलब नहीं है अभी तो पंद्रह दिन बाकी है। उसके बाद देखते हैं आगे की रणनीति क्या होती है?
अभी तो नहीं लेकिन जीतने के बाद किसी भी तरीके से मुझे राजा साहेब को इस बात के लिए मनाना ही पड़ेगा।”


“आप बिल्कुल सही कर रहे हैं हम भी आपके पक्ष में हैं।

केसर की बात पर समर और आदित्य दोनों ने ही सहमति दे दी….-“अब आप दोनों भी कुछ खा पी लीजिए ! बहुत थके हुए हैं आप लोग अब अपने कमरे में जाकर आराम कर लीजिए। इस महल में अब आप पूरी तरह सुरक्षित हैं । विराज सा को अब तक आप दोनों के यहां पहुंचने की जानकारी नहीं दी गई है। हालांकि मैं यह जानता हूं कि विराज कितना भी बुरा हो लेकिन उसे अपनी और ठाकुर साहब के बीच के रिश्ते के बारे में मालूमात नहीं है । और इसीलिए ठाकुर साहब के गुंडों से भी उसका कोई लेना-देना नहीं है। पर फिर भी आप दोनों की सुरक्षा मेरे जिम्मे है। आप लोग ऑफिस के सामने वाले दरवाज़े से निकल कर अपने कमरों की ओर जाने की जगह इसी ऑफिस में पीछे की तरफ एक खुफिया दरवाजा है जो अंदर ही अंदर महल के सभी कमरों से जुड़ा हुआ है, वहाँ से अंदर जाएंगे।
उस दरवाजे से होकर आगे बढ़ते ही चौथे नंबर का कमरा आपका रहेगा आदित्य और सातवें नंबर पर आपका कमरा है केसर सा!
आप दोनों का खाना पीना और बाकी सारी आप की सुविधाओं की चीजें आपके कमरों में मेरे बहुत खास और विश्वासपात्र नौकरों के हाथ से मैं भिजवा दूंगा।
  अब मैं चलता हूं मुझे भी कुछ जरूरी काम है और इससे साथ ही आप लोग भी थोड़ा आराम कर लीजिए….


समर की बात मानकर आदित्य और केसर खुफिया दरवाजे की तरफ़ बढ़ गये समर भी साथ ही गया ।
ऑफिस में पीछे की तरफ एक बड़ी सी दीवार में बहुत ही बड़ी बुक्शेल्फ थी जिसमें किताबें भरी हुई थी । उस बुक्शेल्फ के एक तरफ एक छोटा सा ऐसा बटन था जो आसानी से नजर नहीं आ रहा था उस बटन को हल्के से दबाते ही वह बुक्शेल्फ एक तरफ को खिसक गई और सामने एक दरवाजा नजर आने लगा । उस दरवाजे को खोलते ही एक छोटा सा गलियारा बना हुआ था। समर वहां से आदित्य और केसर को लेकर अंदर चला गया। उन दोनों को उन के कमरों में छोड़कर वह बाहर निकल ही रहा था कि उसके फोन पर किसी का मैसेज चला आया- मैसेज पिया का था ….

” आजकल कहां भटक रहे हैं मंत्री जी नजर ही नहीं आते?”

“आप देखना चाहे तब तो नजर आएंगे?”

“मतलब इसमे भी मेरी गलती है?”

“मैंने ऐसा तो नहीं कहा।”

“तो जो कहा उसका क्या मतलब है?”

“इसका मतलब यह है कि आप इस वक्त कहां मिलेंगी मैं आ रहा हूं?

“क्या बात है मुझसे मिलने आ रहे हो?”

“नहीं मिलने नहीं तुम्हारी खबर लेने आ रहा हूं।”

“क्या मतलब?”

“आकर समझाता हूं पहले बताओ कहां मिलोगी?”

“अस्पताल के आगे वाले कॉफी शॉप पर आ जाओ!”

एक छोटा सा “हम्म” करके समर ने फोन जेब में डाला और बाहर निकल गया ।समर से बात करते हुए पिया को लगा भी कि समर और दिनों की तरह चुलबुला और मस्तीखोर लगने की जगह कुछ ज्यादा ही गंभीर लग रहा था। पिया को जाने क्यों ऐसा लगा जैसे समर उससे कुछ नाराज सा है। फिर भी अपने मन को समझा कर पिया कॉफी शॉप की ओर निकलने के लिए अपने केबिन से बाहर आ गई।

अस्पताल से वो निकल ही रही थी कि एक अर्जेंट डिलीवरी का केस चलाया। केस पास के ही गांव का था ।
गांव की किसी दाई ने बच्चा पैदा करवाने की कोशिश करी थी।
    गांव पर काम करने वाली दाईयां वैसे तो इन सब कामों में अनुभवी और कुशल होती हैं ,लेकिन उस दिन बच्चे का सिर बाहर नहीं आ पाने के कारण उस दाई ने जो भी दवाइयां प्रयोग की उसके कारण प्रसूता की हालत बिगड़ती चली जा रही थी।
बच्चा सही तरह से निकल नहीं पा रहा था और प्रसूता का दर्द के मारे बुरा हाल था। आनन-फानन में उसे लेकर गांव के लोग भागते हुए अस्पताल पहुंचे थे। उस प्रसूता की हालत देखकर पिया का उसे जूनियर डॉक्टर के सहारे छोड़ कर निकलने का मन नहीं हुआ और वह तुरंत अपना एप्रिन पहने ऑपरेशन थिएटर की ओर भाग चली।
   केस कॉम्प्लिकेटेड हो गया था। दर्द ले लेकर सात से आठ घंटों में प्रसूता पूरी तरह से थक चुकी थी। और अब उस पर बेहोशी छाने लगी थी। बच्चे का सिर इस तरह से फंसा हुआ था कि वो न तो सामान्य प्रसूति से निकल सकता था और ना ही ऑपरेट करके।

केस को देखकर पिया के भी हाथ-पांव फूल गए थे।

एक बार को उसे लगा कि अपने कच्चे अनुभव से क्या वह इतनी जटिल प्रसूति करवा पाएगी? लेकिन फिर भगवान का नाम लेकर उसने हाथ जोड़ें और अपने स्टाफ की सहायता से काम में जुट गई।
लगभग एक डेढ़ घंटे के अथक प्रयास के बाद एक नन्हा सा रोता हुआ बालक पैदा हो गया। पूरे अस्पताल में खुशी की लहर दौड़ गयी।
उस महिला के परिजनों की जान में जान आयी। वह दाई माँ जो घबरा कर एक किनारे जमीन पर चुपचाप बैठे भगवान का नाम जप रही थी, खुश होकर पिया के पैरों पर गिर पड़ी। अगर मां और बच्चे को कुछ भी हो जाता तो उस दाई का पूरा नाम खराब हो जाना था पिया ने उसे उठाकर उसके कंधे पर थपकी दी और उसे सामने कुर्सी पर बैठा दिया।

उस औरत के परिजनों से बात कर और उन्हें सारी बातें अच्छे से समझा कर पिया एक बार फिर कॉपी शॉप के लिए निकल गई।
निकलते हुए उसे ध्यान आया कि उसे इस सारे झंझट और फसाद में समर को फोन करके बताना तो याद ही नहीं रहा कि वह लेट हो जाएगी। उसने तुरंत अपने पर्स में से अपना फोन निकाला और समर को फोन लगाने के लिए फोन हाथ में लिया ही था कि देखा समर की पांच मिस कॉल मौजूद थीं। मुस्कुरा कर उसने समर का नंबर जैसे ही डायल किया नंबर व्यस्त बताने लगा।

दो तीन बार डायल करने के बाद भी समर ने फोन नहीं उठाया तो परेशान होकर पिया ने फोन अपने पर्स में डाला और कॉफी शॉप की तरफ निकल गई । जैसा कि उसे उम्मीद थी समर कॉफी शॉप पर मौजूद नहीं था। वहां पूछताछ करने पर पता चला कि कोई लड़का आधा पौना घंटा वहां किसी का इंतजार करता रहा और कॉफी पीकर कुछ समय पहले ही वहां से निकल गया।

पिया समझ गई कि वहां बैठ कर इंतजार करने के बाद जब उसने समर के द्वारा फोन लगाए जाने पर भी फोन रिसीव नहीं किया, तो झुंझला कर समर वहां से निकल ही गया होगा। जाहिर है वह इतना व्यस्त रहता है, ऐसे में उसका कितनी देर इंतजार करता? पिया ने अपना फोन वापस पर्स में डाला और समर के घर की तरफ निकल गई…….

क्रमशः

aparna ….










   

जीवनसाथी – 110





  जीवनसाथी – 110


कोई ट्रेन उसी वक्त स्टेशन से छूट रही थी। आदित्य और केसर प्लेटफॉर्म पर पहुंचे की उन गुंडों पर इन लोगों की और गुंडों की इन पर नज़र पड़ गयी…
    उनमें से एक ने अपनी गन उठा कर उन लोगों की तरफ तानी ही थी कि चलती ट्रेन में भाग कर आदित्य चढ़ा और केसर को भी अंदर खींच लिया, लेकिन उसी वक्त उस गुंडे ने गोली चला दी। साइलेंसर लगी होने के कारण बिना आवाज़ के वो गोली केसर के कंधे की हड्डी पर जा लगी……

    केसर कसमसा कर रह गई आदित्य ने तुरंत उसे संभाल लिया कंधे पर से खून की धार बह निकली और पीड़ा में तड़पती केसर ने अपने मुंह में चुन्नी ठूंस कर अपनी रुलाई रोकने की नाकाम सी कोशिश की लेकिन दर्द इतना भी कम नहीं था कि उसे आसानी से सह लिया जाए ।
   उस ट्रेन की एक अच्छी बात ये थी कि उस डिब्बे में उस वक्त बहुत कम लोग मौजूद थे। रात का वक्त होने से सवारियां और भी कम थी ।अनारक्षित डिब्बा था इसलिए अधिकतर सवारियां कामगार मजदूरों की थी…. उस पूरे डब्बे में मुश्किल से चार या पांच सवारी थी वह भी सारे मजदूर ही थे । जो सुबह से काम कर करके इतना थक चुके थे अब कि अपने गमछे से अपना चेहरा ढके खिड़कियों के सहारे टिक कर गहरी नींद सो चुके थे। ट्रेन चलने के साथ ही बाहर से मीठी हवा के झोंके आ रहे थे जो थके हारे लोगों को सुलाने के लिए काफी थे।  केसर को दरवाजे के पास ही नीचे बैठाकर आदित्य एक बार पूरे कूपे का चक्कर लगा आया। ज्यादातर लोग दूर-दूर ही बैठे थे और झपकी ले रहे थे। एक सुरक्षित जगह देखकर आदित्य ने केसर को उठाया और उस सीट पर ले गया केसर को नीचे की सीट पर सुलाने के बाद उसने अपनी जींस की जेब से एक छोटा सा पैना औजार निकाल लिया। ऊपर से देखने में वह नेल कटर जैसा लग रहा था लेकिन उसे खोलने पर अंदर से एक तीखी छुरी नजर आने लगी।
     अपनी जेब से ही रूमाल निकाल कर उसने उसे पानी से अच्छी तरह भिगो लिया और निचोड़ कर ले आया । केसर को उसने पेट के बल लिटा कर उसकी गोली लगी बाजू को देखा….. अब उसका गोली लगा कंधा आदित्य के सामने था। आदित्य ने केसर की चुन्नी का गोला सा बनाकर केसर के मुंह में रख दिया दोनों दांतों  के बीच चुन्नी को दबाए केसर चुपचाप पड़ी रही।
    आदित्य केसर के बालों में हाथ फेरने लगा और बहुत धीमे और प्यार भरे शब्दों में उसे समझाने लगा  ….

    “केसर बाईसा मेरी बात ध्यान से सुनना, अगर यह गोली आज के आज अभी नहीं निकाली गयी, तो उसका जहर पूरे शरीर में फैल जाएगा। मुझे नहीं पता यह ट्रेन कहां तक जाएगी , और कब रुकेगी ।    
   अस्पताल का इंतजार करने में कहीं देर ना हो जाए, मैं जानता हूं तुम्हारे भीतर भी राजपूती खून है। और तुम इस छोटे से दर्द को सह लोगी।गोली बहुत भीतर तक नहीं गई है ऊपर ही है। मुझे नजर आ रही है बस मेरे ऊपर विश्वास रखना। “

   धीमे धीमे बातें करते हुए आदित्य ने उस पैने औजार से कंधे पर जहां गोली लगी थी वहां आसपास जगह बनानी शुरू कर दी थी।  केसर को दर्द हो रहा था…. बहुत दर्द लेकिन शायद उसकी जिंदगी में जितने दर्द उसे मिले थे उससे यह दर्द थोड़ा कम ही था… वह चुपचाप अपनी चीख रोकने का प्रयास करती पड़ी रही। आदित्य ने एक दो बार उस घाव के आसपास कट बढ़ाने की कोशिश की और तीसरी बार में गोली की भीतरी सतह पर चाकू अटा कर उसे तेजी से ऊपर की ओर निकाल दिया।

एक झटके में गोली बाहर चली आई। उस गोली के निकलते ही खून का सैलाब सा बह निकला। आदित्य ने पानी से भीगे अपने रुमाल को छोटे से घाव में भर दिया। खून के कारण सफेद रुमाल रंग कर गुलाबी और फिर लाल हो गया…..
    
  केसर के ही दुपट्टे के दोनों छोर मिलाकर आदित्य ने उसके कंधे पर जोर से बांध दिया । इस सबके अलावा उन दोनों के पास कोई उपाय भी नहीं बचा था। दर्द के अतिरेक से केसर को बेहोशी छाने लगी। दर्द सहते सहते धीरे-धीरे उसने अपनी आंखें मूंद ली लगभग आधी रात के वक्त किसी स्टेशन पर गाड़ी धीमी हुई और आदित्य बेहोश केसर को उठाए स्टेशन पर उतर गया । सामान तो दोनों के पास भी कुछ नहीं था बस आदित्य की जेब में कुछ पैसे पड़े थे और उसके सारे क्रेडिट और डेबिट कार्ड पड़े थे। स्टेशन पर उतर कर धीरे-धीरे उसे साथ लिए आदित्य बाहर निकल गया। लगभग आधी रात का वक्त था पूरा स्टेशन सुनसान विरान पड़ा हुआ था। मुख्य द्वार से बाहर एक रिक्शावाला अपने रिक्शा में बैठा सो रहा था।
अपने चेहरे को अपने ही गमछे से ढके वह गहरी नींद में सोया पड़ा था कि आदित्य ने धीमे से उसे हाथ देकर जगा दिया।
    
” आस-पास कोई अस्पताल है तो ले चलो भैया।

  नींद से जागे रिक्शा वाले की नजर साथ खड़ी केसर पर नहीं पड़ी। उसने उनींदी सी नजर आदित्य पर डाली और बोल पड़ा

” ₹200 लगेगा!”

” हां जो लगेगा ले लेना फिलहाल इस वक्त अस्पताल ले चलो।”

रिक्शा वाले ने उसे बैठने का इशारा किया और पैडल मारने को हुआ कि तभी उसकी नजर केसर पर भी पड़ गई…

” दो सवारी है 300 लगेगा।”

“हां जो भी लगे ले लेना … लेकिन यहां का जो सबसे बड़ा अस्पताल है वहां ले चलो।”

“बड़ा छोटा सब एक ही है बाबूजी! यहां इस शहर में सिर्फ एकमात्र सरकारी अस्पताल है.. वही ले चलता हूं भगवान की कृपा हुई तो डॉक्टर साहब मिल जाएंगे वरना आपकी किस्मत।”


“ठीक है भाई जहां जो है ले चलो!”

रिक्शेवाले ने उन दोनों को रिक्शा में बैठा कर रिक्शा आगे बढ़ा दिया।  धीरे धीरे चलता रिक्शा कच्ची पक्की सी सड़क से होते हुए एक छोटे से सरकारी अस्पताल के सामने जाकर रुक गया। रात के 2:00 बज रहे थे अस्पताल का दरवाजा बंद था रिक्शा वाले ने उन दोनों को उतारा और जाने को हुआ कि, जाने कुछ सोचकर रुक गया और अस्पताल के दरवाजे पर जाकर उसने दरवाज़े पर लगी सांकल खटखटा दी…
  उसके खटखटाने के कुछ देर बाद अंदर से आवाज आई

“इतनी रात गए कौन है?”

” मैं हूं डॉक्टर साहब बिहारी अक्सर आपसे दवा लेकर जाता हूं!”

“इतनी रात में क्या हुआ बिहारी? क्या जरूरत पड़ गई?

आवाज अंदर से ही आ रही थी बिहारी ने फौरन उत्तर दे दिया …

“डॉक्टर साहब कोई मजलूम बाहर से आए हैं। स्टेशन से उन्हें लिए आ रहा हूं । शायद ट्रेन में पत्नी की तबीयत बिगड़ गई आप जरा देख लीजिए एक बार…

अबकी बार दरवाजा खुल गया नाइट सूट पर ओवरकोट डाले एक मध्यम उम्र के डॉक्टर साहब बाहर चले आए ।रिक्शेवाले को देखकर उन्होंने मरीज को लेकर अंदर आने का इशारा कर दिया । उनका इशारा पाते ही आदित्य केसर को लिए अंदर चला आया ।
    यह छोटी सी सरकारी डिस्पेंसरी थी, जिसमें बहुत ज्यादा सुविधाएं नहीं थी। रेजिडेंशियल डिस्पेंसरी होने से ओपीडी के पिछले हिस्से में जो दो कमरे थे उन्हीं में डॉक्टर ने अपना आवास भी बना रखा था। रात के समय अक्सर मरीज नहीं आया करते थे, इसलिए सिस्टर और बाकी स्टाफ की डॉक्टर साहब छुट्टी कर दिया करते थे। डॉक्टर का खुद का परिवार शहर में बसा हुआ था। वह अकेले अपनी सरकारी डिस्पेंसरी में पड़े रोगियों की सेवा में अपना वक्त बिताया कर रहे थे।

          केसर को मरीजों की जांच वाली टेबल पर लेटाने के बाद वह आदित्य की तरफ घूम गए …

  “हुआ क्या? मतलब क्या तकलीफ है इन्हें?”

    उनके सवाल पर आदित्य ने धीरे से रिक्शा वाले की तरफ देखा और डॉक्टर के पास चला आया । उनके कानों में फुसफुसाकर धीरे से उन्हें बता दिया..

  ” कंधे पर गोली लगी है ।”

डॉक्टर के हाथ से स्टेथोस्कोप छूटते छूटते बचा , उन्होंने रिक्शा वाले को देखा और रिक्शा वाले ने उन्हें और दोनों  एक साथ आदित्य को देखने लगे।

” गोली कैसे लगी? आप लोग हैं कौन? ये तो मेडिकोलीगल है फिर?”

डॉक्टर की बातें सुन आदित्य समझ गया था सब कुछ सच बताना उन दोनों के लिए खतरनाक होगा, लेकिन कुछ तो बताना ही होगा।  आदित्य आगे कहने लगा

“मैं आपको सब कुछ सच-सच बता दूंगा डॉक्टर साहब…. फिलहाल उनकी जान बचाने पर फोकस कीजिए।”

   “पर यह पुलिस का मामला है । इन्हें गोली लगी है, मुझे पुलिस को इनफॉर्म करना पड़ेगा। और इस कस्बे में कोई पुलिस थाना नहीं है। पुलिस को इनफॉर्म करके बुलाने में सुबह हो जाएगी।”

” जी डॉक्टर साहब आप घबराइए मत। हम दोनों खुद पुलिस के अधिकारी हैं। यह जो आपके सामने लेटी हैं यह खुद एक आईपीएस ऑफिसर हैं। हम एक केस सॉल्व करके लौट रहे थे, लेकिन हमने जो सबूत जमा कर रखे थे उन्हें हमसे छिनने के लिए ही हम पर गोलियां चलाई गई। और यह मैडम गोलियों का शिकार हो गई। आप चाहे तो मैं मेरे सबोर्डिनेट से आपकी बात करवा सकता हूं। लेकिन फिलहाल मेरे पास मेरे परिचय का कोई सबूत नहीं है। लेकिन यकीन मानिए आप हमारी मदद करके किसी भी तरीके की परेशानी में नहीं फसेंगे।”

आदित्य का लंबा चौड़ा डील डॉल देखकर उसकी बात पर यकीन नहीं कर पाने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। वह तो पैदाइशी पुलिस वाला दिख ही रहा था।

    केसर की भी लंबाई चौड़ाई और उसके चेहरे की मजबूती देखकर आसानी से आदित्य की बात पर यकीन किया जा सकता था, कि केसर कोई आईपीएस अधिकारी है। आदित्य ने सोच रखा था कि अगर डॉक्टर और भी ज्यादा सबूत मांगेंगे तो फिर समर के फोन पर कॉल करके वह उससे डॉक्टर की बात करवा देगा क्योंकि हाल फिलहाल और तो किसी का फोन नंबर उसे याद नहीं था। समर और अजातशत्रु के अलावा किसी के फोन नंबर उसे याद नहीं थे। अपनी इस परेशानी के लिए राजा  अजातशत्रु को परेशान करना उसे सही नहीं लगा। वह समर को फोन करने के बारे में आगे सोचता इसके पहले ही डॉक्टर ने केसर के कंधे पर बंधा दुपट्टा खोल दिया उसने आदित्य और रिक्शे वाले को बाहर जाने को कहा और केसर की चिकित्सा में लग गया।

गोली तो आदित्य ने पहले ही निकाल दी थी उस घाव की अच्छे से ड्रेसिंग करके टिटनेस का और बाकी पेन किलर आदि का इंजेक्शन देने के बाद डॉक्टर ने केसर को नींद की दवा देकर सुलाया और बाहर चला आया।

   आदित्य के सामने दवाइयों का पर्चा रखकर डॉक्टर अपनी कुर्सी में बैठ गया….

  “यहां से कहां जाना है अब आप लोगों को? “

आदित्य को तो यह भी नहीं पता था कि यह जगह कौन सी थी डॉक्टर को कुछ जवाब तो देना जरूरी था आदित्य ने दिल्ली कह दिया डॉक्टर कुछ देर उसका चेहरा देखता रहा फिर सोच में पड़ गया।

  ” आप दोनों की पोस्टिंग दिल्ली है तो आप वहां से इतनी दूर मध्य प्रदेश के मुरैना में क्या कर रहे हैं?”

” जी आपसे बताया ना हम यहां एक केस की तफ्तीश करने आए थे बस सबूत समेटकर निकलने ही वाले थे, कि उन लोगों को हम पर शक हो गया… आप तो जानते ही हैं चोर और पुलिस के बीच छत्तीस का आंकड़ा होता है जब जिसे मौका मिल जाए वह दूसरे पर गोली चला ही देता है।
कभी हम अपने दुश्मनों को ढेर कर जाते हैं, तो कभी वह हम पर भारी पड़ जाते हैं। हमारे साथ यह दिक्कत हुई कि हम भेस बदलकर उनके अड्डे पर गए थे, जिसके कारण हमारे पास ना तो इस वक्त हमारी यूनिफार्म है और ना ही सर्विस रिवाल्वर। यहाँ तक की हमारा परिचय पत्र भी हमने साथ नही लिया था। बल्कि सब कुछ हमने सुरक्षित होटल में छोड़ रखा था।”

“जी मैं समझ सकता हूं आपकी बात लेकिन सर्विस रिवाल्वर भी छोड़ दी। बिना रिवाल्वर के ही दुश्मन के अड्डे पर जाना कहां की बुद्धिमानी है?

“आप सही कह रहे हैं डॉक्टर साहब! लेकिन बहुत बार ऐसी मजबूरी का सामना हम लोगों को करना ही पड़ता है फिर भी कुछ ना कुछ औजार तो हम अपने पास रखते ही हैं । “

        कहकर आदित्य ने अपनी छिपी हुई कटारी निकालकर डॉक्टर के सामने रख दी…
  अपनी रॉयल गोल्डन ईगल गन उसने बड़ी चतुराई से ही छिपा रखी थी। वैसे दिखा तो सकता था लेकिन पुलिस की सर्विस  रिवॉल्वर और उसकी गन का अंतर बच्चा भी आसानी से पकड़ सकता था।
   और उस गन के सामने आते ही अपनी पहचान छिपाना बहुत मुश्किल हो जाता।

” यह देखिए …इसी की मदद से कुछ समय पहले इनकी कंधे पर लगी गोली निकाल चुका हूं।”

    डॉक्टर ने एक नज़र कटार पर डाली और हां में सर हिला कर चुपचाप बैठ गया

   “आप कुछ लेना चाहेंगे चाय या फिर कॉफी?”

आदित्य को चाय की तलब तो लगी थी लेकिन उस डॉक्टर पर पूरी तरह विश्वास भी नहीं कर पा रहा था। मुरैना शहर से लगा यह कोई छोटा सा कस्बा था जो मुरैना जिले के अंतर्गत आता था। अब तक वही एक किनारे जमीन पर बैठे रिक्शा वाले की भी नींद उड़ चुकी थी वह आदित्य से बुरी तरह प्रभावित नजर आ रहा था ।
   अब वह आदित्य के सामने हाथ जोड़े खड़ा हो गया…..

   ” हुजूर बाहर गुमटी से चाय लेता आऊं?”

आदित्य ने डॉक्टर की तरफ देखा और फिर रिक्शा वाले की तरफ घूम के हां में सर हिला दिया।
रिक्शावाला तुरंत मफलर से खुद को ढंकता बाहर निकल गया ।
डॉक्टर की तरफ घूम कर आदित्य ने एक बार फिर देखा और अपनी बात कहने लगा…

  ”  डॉक्टर साहब मैं जानता हूं मेरी बात पर विश्वास करना मुश्किल है, आप चाहे तो अब भी मैं किसी से भी आपकी बात करवा सकता हूं ।अगर आप चाहे तो मैं यही विजय राघव गढ़ के कलेक्टर शेखर जी,  शेखर मिश्रा जी से भी आपकी बात करवा सकता हूं।”

“आप शेखर मिश्रा को कैसे जानते हैं?

  डॉक्टर पढ़ा लिखा और जानकार आदमी था वह अपने प्रदेश के जिला अधिकारियों के बारे में जानता था उसकी यह नब्ज़ पकड़ में आते ही आदित्य के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान चली आई…

” जी शेखर मिश्रा ही क्या मैं तो बांसुरी अजातशत्रु सिंह जी को भी जानता हूं। फिलहाल दून में एडीएम के पद पर काम कर रही हैं। उन्हीं के साथ लीना जी भी हैं जो आईपीएस हैं। जी उनकी पहली पोस्टिंग मध्यप्रदेश में ही कही हुई थी।”

  “लीना मैडम को भी आप जानते हैं… चंबल में बहुत थोड़े वक्त के लिए पोस्टिंग थी उनकी।
एक बार उनकी भी बांह में गोली छूकर निकल गई थी उस वक्त यही से गुजर रही थी वो।  हमारे पास यही आयीं रहीं वो मरहम पट्टी करवाने।”

“अरे क्या बात कर रहें है डॉक्टर साहब! लीना मैडम आपके पास आई थीं?  हम सब ने एक साथ ही ट्रेनिंग कंप्लीट की है… लीना मैडम और यह जो अंदर लेटी हुई है ना  केसर मैडम इन दोनों ने साथ में आईपीएस की ट्रेनिंग पूरी की है।”

  अधिकारियों के नाम बुलाए जाने से अब डॉक्टर के चेहरे पर थोड़ा-थोड़ा भरोसा आदित्य को नजर आने लग गया था। आदित्य ने मन ही मन बांसुरी का शुक्रिया अदा किया” थैंक यू भाभी आज आप के और आपके दोस्तों के कारण जान जाते-जाते बची है।”

   सुबह तक में केसर की हालत में काफी सुधार आ गया था कुछ जरूरी दवाइयां अपने पास से ही देकर डॉक्टर ने आदित्य और केसर को विदा कर दिया! केसर को साथ लिए आदित्य उसी रिक्शे में बैठ कर एक बार फिर निकल गया।

  उस कस्बे में आस पास रुकने के लिए कोई लॉज या धर्मशाला नहीं थी।
   रिक्शेवाले से कहकर आदित्य ने उसे शहर जाने वाली किसी बस में बैठाने के लिए कह दिया ।छोटे से बस स्टैंड पर आदित्य और केसर को उतारकर वो रिक्शावाला वहां से चला गया । केसर को अच्छी तरह से शॉल में लपेटकर एक चाय की गुमटी में बैठाकर आदित्य वहां से निकल गया।

   कस्बा बहुत ज्यादा बड़ा तो नहीं था लेकिन घना बसा हुआ था। वहां जाकर 1-2 घर देखने के बाद ही आदित्य को अपने रहने लायक ठिकाना मिल गया.. मकान मालिक से चुपके से बात कर उसने तुरंत ही 2 महीने का एडवांस पेमेंट किया और केसर को लेने निकल गया दोपहर के वक्त जब पूरी बस्ती अपने अपने घरों में दुबकी पड़ी थी, चुपके से केसर को लिए सीढ़ियां चढ़ पर अपने कमरे में चला गया । इस बार उसने सोच लिया था कि केसर उसके साथ रहती है ये बात आसपास किसी को पता नहीं चलने देगा, क्योंकि जाहिर था ठाकुर के गुंडे उन दोनों को ढूंढ रहे थे इसलिए वह जहां भी पूछताछ करते वहां एक आदमी और एक औरत के रहने का ठिकाना ही पता करते । और अगर  केसर के साथ रहने के बारे में किसी को मालूम ही ना चले तो आदित्य के बारे में की हुई पूछताछ से भी गुंडे उन तक नहीं पहुंच पाएंगे। उसे बस अब केसर के ठीक होने का ही इंतजार था। उसे उम्मीद थी 10 से 15 दिनों में केसर ठीक हो जाएगी, लेकिन उसकी उम्मीद यहां गलत साबित हुई 2 दिन पूरी तरह से बेहोश रहने के बाद आखिर केसर को होश आ गया लेकिन होश में आने के बावजूद वह अपनी जगह से उठने और बैठने में लाचार महसूस कर रही थी। गोली उसकी हड्डी में जाकर लगी थी और शायद इसीलिए उसकी रीढ़ की हड्डी पर भी कुछ असर हो गया था। उसे सीधे बैठने उठने चलने फिरने सब में तकलीफ हो गई थी।
    आदित्य अकेला ही घर से बाहर जाता। जरूरत भर का सामान लेकर वापस आ जाता। उसने मकान मालकिन के बार बार पूछने पर भी काम वाली बाई के नाम पर मनाही कर दी थी।
    दो कमरे और एक रसोई का मकान था।  वह इन कमरों को खुद ही साफ कर लिया करता। यहां शिफ्ट होने के बाद घर की साफ सफाई और जरूरत भर के बर्तन वह खरीद लाया था। दूध वाले को भी ऊपर चढ़कर आने की उसने मनाही कर रखी थी। दूध के समय वह खुद नीचे बर्तन लिए चला जाता।

कुछ एक बार मकान मालकिन ने उसकी तरफ दोस्ताना हाथ बढ़ाने के लिए उसके दरवाजे पर ठकठक भी की लेकिन आदित्य ने कुछ ना कुछ बहाना बनाकर उनके बढ़े हुए दोस्ती के हाथ को हमेशा ही झटक दिया।
    वह वहां उन सभी से केसर को छुपाए रखना चाहता था । कपड़े भी अक्सर रात में धोया करता और सुखा दिया करता। सुबह बाकी लोगों के जागने से पहले ही वह कपड़े निकाल कर अंदर ले आता।
     खाना बनाना उसे नहीं आता था, लेकिन जो जितना आता वैसा ही कुछ भी बनाकर वह अपना और केसर का पेट भर लेता।

उसे लगा था पंद्रह दिन में केसर की हालत में इतना सुधार तो हो ही जाएगा कि वह समर को फोन कर अपने बारे में सूचना दे दे लेकिन पंद्रह दिन बस पलक झपकते बीत गए।
    केसर बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी। केसर की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी ।उसकी कमजोरी बढ़ती जा रही थी। आदित्य को समझ नहीं आ रहा था कि उसे क्या करना चाहिए? क्योंकि इस हालत में केसर को यहां से  लेकर निकलना उसकी जिंदगी से खिलवाड़ ही था… आखिर एक दिन वह केसर को वहीं छोड़ कर शहर चला गया। शहर में एक अच्छे डॉक्टर से मिलकर उसने उन्हें केसर से जुड़ी परेशानियों से अवगत कराया और डॉक्टर की सलाह पर जरूरी दवाइयां और जरूरी मल्टीविटामिन साथ लिए चला आया। डॉक्टर के अनुसार केसर को फिजियोथैरेपी की जरूरत थी लेकिन आदित्य किसी भी तरीके से फिजियोथैरेपिस्ट को अपने कमरे पर नहीं बुला सकता था ।
      आखिर उसने खुद ही कुछ आयुर्वेदिक तेलों की सहायता से केसर की मालिश शुरू कर दी ।
     उसकी रीढ़ की हड्डी पर की जाने वाली मालिश का धीरे-धीरे असर दिखने लगा और हफ्ते भर में केसर बिना किसी सहारे के धीरे से उठकर बैठने लगी….. आदित्य की सेवाओं का असर था कि केसर अब धीरे से अपने दोनों पैर जमीन पर रख बिना सहारे के धीरे-धीरे ही सही चलने लगी थी।
   हालांकि अपनी इस कोशिश में वह दो तीन बार अपना संतुलन बिगाड़ कर गिर चुकी थी, कई बार वह चलते हुए रो पड़ती लेकिन अक्सर आदित्य कुछ ना कुछ बहाना बनाकर उसे चलाने के लिए खड़ा कर ही देता।
   सुबह शाम उसे सहारा देकर वो अब रोज़ ही उसे चलाने लगा था।
   लेकिन अब कभी कभी वो उसे चलाने के लिए खड़ा करके कोई बहाना लगा कर अंदर भाग जाता और अंदर से छुप छुप कर वो केसर को देखा करता ।

  शुरू शुरू में आदित्य जब ऐसा करता तो केसर वापस मुड़कर अपने बिस्तर पर ही जाकर बैठ जाना चाहती, उस वक्त उसे वो दो कदम का फासला भी बहुत ज्यादा लगता। उतना सा चलना भी उसके लिए  भारी पड़ जाता, लेकिन धीरे-धीरे शायद केसर को भी समझ आने लग गया था कि आदित्य उसके साथ ऐसा क्यों कर रहा है ?और अब केसर भी अपनी सारी ताकत समेटकर इस जिद में आ गई थी कि अब उसे अपने पैरों पर चलना ही है।

उनकी मकान मालकिन और उनके आसपास की सखियों के लिए आदित्य अजूबा ही था। एक ऐसा लड़का जो रहता तो अकेले था लेकिन हर सामान हमेशा दो की संख्या में खरीदा करता था। सब्जियां भी हर रोज ताजी लिया करता अंडे भी रोज  लिया करता । दूध  दो लीटर लेता था। मकान मालकिन की समझ से परे था कि अकेला छह फुटिया लड़का कैसे रोज़ छह अंडे और 2 लीटर दूध पूरा का पूरा गप कर जाता है।

समय बीतता जा रहा था और उन्हें वहां रहते कुछ महीने गुजर चुके थे। अब तक आदित्य ने केसर को बाहरी दुनिया से छुपा कर ही रखा हुआ था।  केसर को भी उसने समझा दिया था कि वह खिड़की से बाहर ना झांके। कहीं किसी ने देख लिया तो मुश्किल हो सकती है। केसर अब आदित्य की हर बात चुपचाप मानने लग गई थी।

   आदित्य बाहर से कुछ सामान लेकर लौटा ही था कि दूध वाले का समय हो गया। वह सीढ़ीयां उतरता नीचे पहुंचा ही था कि आजू-बाजू की सभी महिलाओं को अपनी सीढ़ियों के पास ही मकान मालकिन से गप्पे मारते देख लिया उसने दूध लिया और वापस ऊपर मुड़ गया।

   रसोई में खड़ा वो चाय चढ़ा ही रहा था कि दरवाजे पर किसी ने ठकठक की। उसे समझ आ गया था कि इतने महीनों से जिन औरतों को वह मूर्ख बनाता आ रहा था आज उन सभी ने गोष्ठी करके उसका कच्चा चिट्ठा जानने  का मन बना ही लिया था।

उसने दरवाज़ा धीमे से खोल ही दिया….

… सामने समर खड़ा था…

******

     बांसुरी की महल वापसी के साथ ही महल में उसकी गोद भराई की तैयारियां शुरू हो गई थी।
शुभ तिथि मुहूर्त निकाल कर बाँसुरी की दोनो जेठानियाँ तैयारियों में लग गयी थीं।
    गोद भराई वाले दिन सुबह राजा को साथ लिए रूपा और जया कुल देवी के मंदिर में पूजा करवाने चली गईं थीं।
  गर्भावस्था में आठवें महीने के बाद मंदिर प्रवेश नहीं करने के नियम के कारण बाँसुरी नही जा पायी थी।  रेखा बाँसुरी के कमरे में ही उसके पास रुक गयी थी….   उसका बेटा वहीं पास ही खेल रहा था…..

” क्या हुआ रेखा आप कुछ परेशान हो?”

वहीं पास ही खेलते अपने बेटे को देखती बैठी रेखा ने आंखें उठा कर बाँसुरी को देखा और उसकी गीली आंखें देख बाँसुरी घबरा गयी..

” क्या हुआ ? आप तो रो रही हैं!”

  ” कितनी अजीब किस्मत है हमारी बाँसुरी। सोचो तुम्हारी और हमारी शादी एक ही दिन एक ही मुहूर्त में हुई उसके बावजूद कितना अंतर है हमारे वैवाहिक जीवन में। “

  बाँसुरी भी विराज के स्वभाव से परिचित थी। वो चुप ही बैठी रही…

” हम जानती हैं राजा साहब और विराज सा के स्वभाव में बहुत फर्क है !लेकिन फिर भी..
       सब कहते हैं अग्नि के फेरे जिंदगी बदल देतें हैं, फिर उन्हीं अग्नि के पवित्र फेरों में घूमने के बाद तुम्हारी जिंदगी इतनी संवरी हुई , और हमारी जिंदगी इतनी बिखरी हुई क्यों है ? बांसुरी यह मत सोचना कि हमे तुमसे जलन हो रही है.. हमने तुम्हारी तपस्या भी देखी है, समझी है । तुम्हारे और हमारे स्वभाव में भी अंतर है यह भी जानते हैं,लेकिन आखिर किस बात की सजा हमें हमारी  किस्मत दे रही है?
   बचपन से जिस घर को हमने अपना माना जिस राजपूताने की शान में अभिमान से भरे घूमा करते थे वह एक झटके में ही हमसे अलग हो गया।
   ना वह माता-पिता हमारे रहे और ना वो राजपूताना। उसके जाने के साथ ही हमारा अहंकार भी चला गया।
ब्याह हुआ और राज महल में चले आए कुछ समय के लिए रानी की पदवी भी मिली , लेकिन वह भी श्रापित।
   ऑंसू में लिपटी हुई कितनी रातें हमने सिसक सिसक कर अकेले अपने बिस्तर पर गुजार दी यह सोचते हुए कि जाने हमारे राजा जी कहां भटक रहे होंगे। हमारी तकलीफ कौन समझेगा?
   किसी समय हमारी भी यही चाहत थी कि हम रानी बने लेकिन शादी के बाद हमें समझ में आ गया कि हर एक पत्नी यही चाहती है कि उसका पति भले ही राजा ना हो लेकिन दिल से उसका पति ही बना रहे। काश विराज सा हमारी बात को समझ पाते। काश कभी वह हमें समझ पाते ।
    काश उनके अंदर का पुरुष हमारे अंदर की स्त्री को देख पाता लेकिन उनकी आंखों पर जाने किस बात की पट्टी बंधी है।
    विराज सा आज भी उसी झूठे अभिमान में डूबे बैठे हैं जिसमें कभी हम डूबे बैठे थे। लेकिन आज देखो जिंदगी की कड़वी सच्चाईयों ने हमें कहां लाकर पटक दिया । आज हमारे पास ना मायका ही बचा ना ससुराल। रानी मां थी तब तक एक आस थी कि हम भी इस महल का एक हिस्सा है, हमें भी यहां सम्मान मिलेगा लेकिन अब उनके जाने के बाद वह आस भी चली गई।”

” प्लीज ऐसा मत बोलिए रेखा। और किसी पर आप भरोसा करें या ना करें लेकिन हमारे साहब पर आप आंख मूंद कर भरोसा कर सकती हैं। जब तक वह गद्दी पर हैं आपको इस महल में आपका पूरा सम्मान मिलेगा। आप ऐसा क्यों सोचती हैं कि आज आप रानी नहीं है तो आपका सम्मान चला गया। अरे आप इस महल की एक सम्माननीय सदस्या तो हैं ही, इस महल के राजकुमार विराज सा की धर्मपत्नी भी हैं। आपने अपने आप को इतना कम क्यों आंक लिया। और सबसे बड़ी बात एक औरत की पहचान वह खुद होती है ।
    उसके अभिभावक उसका पति या उसका घर नहीं।

    आपकी भी अपनी खुद एक पहचान है, मैं तो यही कहूंगी कि आप अपने नाम से पहचानी जाये। इससे बढ़कर  कोई और बात नहीं।
    
     मुझे मेरे साहब से बहुत प्यार है, मैं अपने नाम के साथ हमेशा उनका नाम जोड़ कर रखना चाहती हूं। लेकिन अपना नाम खोना नहीं चाहती। मुझे मेरे नाम से भी उतना ही प्यार है। मैं सिर्फ रानी अजातशत्रु सिंह ही नहीं कहलाना चाहती मैं बांसुरी अजातशत्रु सिंह के नाम से पहचानी जाना चाहती हूं। और आपसे भी यही कहती हूं कि आप अपने आप को पहचानिए। आपके अंदर भी कोई तो बात है आप अपने उस हुनर को अपनी इस काबिलियत को पहचान कर अपने आप को खड़ा करने के लिए क्यों नहीं सोचती भला?
     आप क्यों हमेशा विराज सा का चेहरा देखती हैं, कि वह आप को सहारा दे।
      सिर्फ शादी हो जाने से ही यह तो नहीं हो जाता की पत्नी पति से अलग कुछ कर ही नहीं सकती? आखिर जिस ईश्वर ने आपके पति को यहां जन्म दिया उसी ईश्वर ने आपको भी तो गढ़ा है।
    तो आप अपने अस्तित्व को कैसे सिर्फ अपने पति के अस्तित्व में घोलकर खुद को भूल जाने पर आमादा है।
  अपने आप को पहचानिए रेखा, अपने आत्मविश्वास को जोड़िए। इस तरह आंसू बहाने से और किस्मत पर रोने से कुछ नहीं मिलने वाला। अपने हक के लिए आपको खुद आवाज उठानी होगी और मैं तो ये भी कहूंगी कि अगर आप विराज सा के साथ खुश नहीं है तो आप उनसे अलग हो सकती हैं।”

बांसुरी की कही अंतिम बातें सुन रेखा चौन्क कर उसकी तरफ देखते हुए मन ही मन सोचने पर  मजबूर हो गई …..क्या विराट से अलग होना उसके लिए इतना आसान होगा?
     वह अपनी सोच में गुम थी की सहायिकाये दोनों को बुलाने चली आयीं। रूपा और जया ने सारी तैयारियां कर रखीं थी।
बांसुरी को कार्यक्रम के लिए तैयार होने छोड़कर रेखा अपने कमरे में चली गई ।कुछ देर बाद ही रनीवास का दीवान खाना महल की औरतों और सेविकाओं से भरा हुआ था।
     रानी माँ को गुज़रे साल नही पूरा था इसी से कार्यक्रम सादा और पूरी तरह निजी रखा गया था….
   बाँसुरी ने जैसे ही अपने कमरे से बाहर कदम रखा उसकी आंखें आश्चर्य से चौड़ी हो गईं…..
    उसके सामने पूरे रास्ते गुलाबों की पंखडियाँ बिखरी पड़ी थी…
   एक तरफ फूलों से सजी पालकी तैयार रखी थी। पालकी के कहारों की जगह पर प्रेम, विराट और बाँसुरी के ताई जी के दोनों बेटों के साथ ही रेखा भी खड़ी थी।
  बाँसुरी आश्चर्य से भरी उन सभी को देखती खड़ी ही रह गयी….

  उसने सोचा ही नही था कि उसकी गोद भराई की रस्म इतनी भव्य होने जा रही है….
   उसे लगा था सिर्फ राजपरिवार की औरतें और कुछ खास आमंत्रित अतिथियों के साथ ही कार्यक्रम कर लिया जायेगा इसलिये उसने अपने मायके को बुलाने की इच्छा भी ज़ाहिर नही की थी…..
     लेकिन राजा अजातशत्रु तो राजा अजातशत्रु हैं, बाँसुरी के मन की बात कैसे नही समझते…..
   अपने मायके के लोगों को देखते ही बाँसुरी के चेहरे पर चमक चली आयी……
   

क्रमशः

दिल से….

   अभी पिछले कई भाग थोड़ा सिरियस मोड में चले गए थे, इसलिए अगले भाग में एक छोटे हिस्से में बाँसुरी की गोद भराई की रस्म होगी, जिसमें हम सब थोड़े मज़े कर पाएंगे। इसके साथ ही बाकी की कहानी आगे बढ़ेगी।

  राम जी से प्रार्थना है कि मेरी कहानी को बीरबल की खिचड़ी बनने से  बचा लो…
    पिछले पांच भाग से मैं ये सोच कर बैठी थी कि कहानी को 110वे भाग में समाप्त कर दूँगी लेकिन राजा अजातशत्रु जी तो अपनी कहानी समाप्त ही नही करने दे रहे।
  पर ऐसे कैसे चलेगा राजा जी? कही तो विराम लेना पड़ेगा।

  अभी फिलहाल सोच रहीं हूँ अगले चार या पांच भाग में कहानी को समेट लूँ,बाकी आगे जैसी राम जी की इच्छा।

     नई कहानी के बारे में भी एक प्लॉट सोच रखा है उसे जल्दी ही एक छोटी सी पाती (पत्र) के रूप में आपसे रूबरू करवाउंगी।

  तब तक सोचते रहिये की वैक्सीन लगवाना ज़रूरी है कि नही….
   … इसी बात पर एक खुरापाती किस्सा मेरी डिस्पेंसरी से ….

   एक महिला आयीं उन्होंने अपनी तकलीफ बताई और मैंने दवा लिख दी।
  फिर उन्होंने मुझसे सवाल किया…

” मैडम ये वैक्सीन लगवाने से हमारे पड़ोस की एक औरत खत्म हो गयी? तो कैसे वैक्सीन लगवाएं मैडम ?

   इसका जवाब देते वक्त मेरा खुरापाती दिमाग शैतानी पर उतर आया…

  क्या आप बता सकते हैं कि मैंने क्या जवाब दिया ?

  जवाब देते वक्त याद रखियेगा , संस्कारी बहुत हूँ मैं…

aparna …..




 
  







  

 

जीवनसाथी – 109




जीवनसाथी-109



उन दो कमरों के घर मे रहते हुए उसे और केसर को कुछ दिन ही बीते थे और आदित्य समर को फ़ोन करने की सोच ही रहा था  कि केसर सीढ़ियों पर से गिर कर चोट लगवा बैठी।
   
   भगवान जाने क्या किस्मत में लिखा बैठे थे कि वो चाह कर भी उस छोटी सी जगह से निकल कर सुरक्षित अपने घर नही पहुंच पा रहा था……

    मकान मालकिन उन दोनों को शादीशुदा जोड़ा समझ गाहे बगाहे केसर से इधर उधर की गप्पे मारने में  लगी रहती लेकिन केसर का ठंडा बर्ताव उनके जोश पर घड़ों पानी डाल देता।
   वो भी जुझारू महिला था इतनी जल्दी हिम्मत नही हारने वाली थी….
   कभी वो कढ़ी लेकर ऊपर पहुंच जाती तो कभी चने की भाजी। उन्हें अपने हाथों पर पूरा विश्वास था। उनके हाथों की बनी कढ़ी अच्छे अच्छों को पिघला सकती थी, फिर ये किस खेत की मूली थी…
   ऐसे ही एक शाम वो गरमागरम समोसे लिए ऊपर पहुंच गईं….
   केसर खिड़की से बाहर देखती चुपचाप बैठी कुछ सोच रही थी कि ये धमक पड़ीं…

” ये लो , हम सहीं वक्त पर पहुंचीं हैं ना! “

” कैसे ? ” केसर को बातें घूमा कर करने की आदत तो थी नही, उसके लट्ठमार जवाब पर वो दुगुने जोश से भर गयीं।

” अरे चाय का वक्त हो रहा ना, हमें लगा तुम मियां बीवी चाय पी रहे होंगे , समोसे पहुंचा दें… तुम्हारी चाय का स्वाद बढ़ जाएगा।

  केसर ने एक नज़र उन्हें देखा और मुस्कुरा कर समोसे की प्लेट लेकर रख ली, लेकिन वो अब भी खड़ी हीं थीं…

” ले तो ली आपसे प्लेट! अब जा सकती हैं आप!”

  ऐसे जवाब की आस तो नही थी उन्हें पर वो कौन सा जंग हारने आयी थी यहाँ..

” खाली समोसे देकर थोड़े न निकल जाएंगे, अब तुम दोनों की चाय बनाओगी ही तो हमारी भी चढ़ा लो..!

  गुस्से में उन्हें घूरती केसर प्लेट पकड़े रसोई की ओर चली गयी और जाते जाते भी एक चिंगारी छोड़ ही गयी….

” चाय नही पीते हम लोग। हम कुछ और पीते हैं , पियेंगी?”

  केसर को लगा नही था कि उन्होंने सुन लिया होगा, पर आशा के विपरीत वो सुन चुकी थीं…..

” चाय नही पीती तो क्या पीती हो? काफी…हम काफी भी पी लेंगी!”

  केसर ने रसोई में घुस कर अपना माथा पीट लिया, कि तभी बाहर से आदित्य अंदर चला आया… सीढियों पर ही उसे आवाजें सुनाई पड़ चुकी थी। मकान मालकिन को नमस्ते कर वो फटाफट रसोई में घुस गया…
    रसोई में केसर बर्तन इधर उधर करती गुस्से में खड़ी थी… उसे समझ ही नही आ रहा था कि करे क्या?
  आदित्य ने फटाफट एक बर्तन लिया और पानी गैस पर चढ़ा दिया…आदित्य को देख उसके चेहरे पर राहत चली आयी..

” हम क्या करें आदित्य? हमें तो चाय तक बनानी नही आती? और ये मुटल्लो धमक पड़ी चाय पीने। हद हैं यार ये औरतें भी। समोसे जैसी जेओमेट्री बना सकती हैं तो चाय भी खुद क्यों नही बना ली। जब समोसा ला  ही रही थी चाय भी ले आतीं।”

  आदित्य को हंसी आ गयी…

” मिडिल क्लास में ऐसा ही होता है केसर! “

” व्हाट द .. ” केसर कुछ बोलते बोलते रुक गयी और वहीं किनारे रखी वाइन उठा कर गिलास में डालने वाली थी कि आदित्य ने हाथ बढ़ा कर उससे छीन लिया….

“अभी मत पियो केसर, वो बैठीं हैं बाहर। उन्हें समझ आ जायेगा? “

” तो क्या हुआ? हमें कोई फर्क नही पड़ता? “

” पड़ता है। हमें अभी फर्क पड़ता है। हम ठाकुर के गुंडो से छुप कर रह रहें हैं।अगर कही से भी भनक पड़ गईं उन लोगो को तो हमारा बचना मुश्किल हो जाएगा।
   इसलिए हमें यहाँ यहीं के लोगो जैसे रहना होगा। “

  केसर ने बोतल वापस रख दी…

” क्या कह रहे थे तुम? ये मिडिल क्लास क्या होतीं हैं ?

  चाय खौल चुकी थी, उसे छानते हुए आदित्य मुस्कुरा उठा…” चलो बढ़िया है कि तुम इनके बारे में जानना चाहती हो। इनसे ज्यादा इरिटेट मत होना। ये मध्यम वर्गीय परिवार और खास कर इनके घरों की औरतें ऐसी ही होती हैं। हर किसी से घुल मिल जाती हैं। इनके लिए एक तरफ तो इनका घर परिवार ही पूरी दुनिया है दूसरी तरफ पूरी दुनिया को ये अपना परिवार मान लेती हैं।
  ये सभी के लिए इतनी ही स्वीट होतीं हैं। कोई अनजान आदमी भी इनके घर आएगा, तो ये उसे चाय पिलाये बिना जाने नही देती।
   इनके लिए प्यार जताने का सबसे सामान्य तरीका है उसे खिलाना पिलाना।
  ये तुमसे दोस्ती करना चाहती हैं इसलिए तुम्हारे लिए हमेशा कुछ न कुछ बना कर लाती रहतीं हैं। और तुम अपने घमंड में उनके लाये सामान फेंकती रहती हो!

” घमंड में नही फेंकते। हमसे वो सब अजूबा खाया ही नही जाता!”

” तुमने चख कर देखा भी है कभी वो अजूबी चीजें? जो उनका स्वाद जानोगी? आजतक नौकरों के हाथ का बना ही तो खाती आयी हो… अब पहली बार कोई तुम्हारे लिए स्पेशली कुछ बना कर ला रहा तो उसकी ज़रा सी कदर कर लो..
  चलो आओ उनके साथ ही बैठ कर चाय के साथ ये समोसे खा कर देखो!”

” पर सुनिए आदित्य, ये समोसे वो सिर्फ हम दोनों के लिए लाई हैं वो बस चाय पियेंगी। ऐसा उन्होंने ही कहा।”

” भले ही ऐसा उन्होंने कहा हो लेकिन अंदर से वो चाहती हैं हमारे साथ बैठ कर खाना। वरना देखो क्या इतने समोसे तुम् खा पाओगी। चिड़िया सी तो तुम्हारी डाइट है और जब से यहाँ आयी हो, सिर्फ प्रोटीन शेक पर ही ज़िंदा हो। खैर आज मैं राशन का सामान ले आया हूँ। आज रात में कुछ बना कर खाएंगे। मैं ये रोज़ रोज़ अंडा ब्रेड और मिल्क शेक पी पीकर थक गया हूँ।”

  आदित्य ने ट्रे केसर के हाथ में दी और उसे बाहर निकलने को पीछे से हल्का सा धक्का दे दिया…
   केसर को बहुत अजीब लग रहा था, वो कभी ऐसे ट्रे लिए नही चली थी। उसने फटाफट बाहर जाकर ट्रे टेबल पर पटक दी…
   मकान मालकिन के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी…
आदित्य ने चाय का कप उठा कर उनके हाथ में दिया और खुद अपनी चाय लिए एक कुर्सी पर बैठ गया। केसर आदित्य की तरफ देखने लगी…

” बहुरिया को चाय नही पकड़ाई तो देखो कैसे नाराज़ हो गईं हैं…!”

आदित्य भी मुस्कुरा उठा, उसने एक समोसा उठा लिया… ” खुद ले लेगी”!

  आदित्य को एक नज़र घूर कर केसर ने भी एक समोसा उठा लिया। समोसा मुहँ में रखते ही उसकी आंखें चौड़ी हो गयी…
   ऐसा अमृत सा स्वाद भी हो सकता है किसी वस्तु का , उसने आज तक सोचा ही नही था।
   सालों से उसका एक बंधा बंधाया नाश्ता था। जिम करने के बाद वह अक्सर अंडे और प्रोटीन शेक ही पिया करती थी, इसके अलावा उसने कई सालों से कोई और नाश्ता किया ही नहीं था। दोपहर के खाने में भी वह अक्सर नॉनवेज ही खाया करती थी वही हाल रात के खाने का भी था।
   अपनी अब तक की जिंदगी में उसने समोसे शायद पहली बार ही खाए थे एक खत्म कर उसने दूसरा उठा लिया।
    खुद में मगन केसर को समोसे खाते देख आदित्य को हंसी आ गई…. ” समोसों के साथ चाय भी पीकर देखो। और मज़ा आएगा!”

  आदित्य की बात सुन समोसे के साथ ही चाय पीने के चक्कर में हड़बड़ाहट में केसर ने अपना मुंह जला लिया । समोसे का तीखापन उस पर गर्म चाय! वो अपने हाथों से मुहँ के सामने हवा कर रही थी कि हंसते हुए आदित्य ने उसे पानी की ग्लास पकड़ा दी..

” ज़रा सब्र कर के खाओ। सारे तुम्हारे ही हैं। ” आदित्य का हँस हँस कर बुरा हाल था, उसे हंसते देख मकान मालकिन भी मुस्कुरा उठी…
    अपनी चाय खत्म कर उन्होंने कप नीचे रखी और प्रशंसात्मक दृष्टि से केसर को देखने लगी….

” चाय बड़ी बढ़िया बनाई है बहुरिया ने। खाना वाना तो बढ़िया बनाती ही होगी? “

  आदित्य ने मुस्कुरा कर हां कह दिया…

मकान मालकिन को मुस्कुराते देखा आदित्य ने एक छौंक और लगा दी….

” जल्दी ही कुछ बनाकर पहुंचाएगी आपके पास किसी दिन।”

अब तक दो समोसे टिका चुकी केसर ने घूर कर आदित्य को देखा और खुद को चाय के कप में डूबा दिया। उसे चाय पीते देख मकान मालकिन वहाँ से उठ गयीं….

“हम चलतीं हैं अब शाम के खाने की तैयारी भी करनी हैं। आज मंगोड़ी बनानी है। आप लोग खाते हैं क्या? अगर पसन्द है तो हम भेज देंगी। ”

” हम सांप और चमगादड़ छोड़ कर सब खा लेते हैं.”

  आदित्य की बात पर हंसते हसंते वो नीचे चली गयी…
”  कुछ भी बोल देता है यह लड़का, बड़ा मजाकिया है।”

  उनके जाते ही आदित्य ने दरवाज़ा बंद किया और अंदर चला आया..

” क्यों कैसे लगे समोसे केसर बाई सा? “

  आदित्य अब भी मुस्कुरा रहा था, केसर ने एक नज़र उसे घूरा फिर वापस समोसे की प्लेट देखने लगी..

“नो ! तीसरा खाने की सोचना भी मत। अभी तुम्हारे लिए दो ही बहुत हैं। कुछ समय पहले ही बिस्तर से उठी हो।अभी अपने पाचन तंत्र पर ज्यादा लोड मत दो चाय खत्म कर लो फिर ये बर्तन अंदर रखा आना।”

” माय फुट! हम नही रखने जा रहे कुछ अंदर!”

” ओह बाई सा! यहाँ कोई आपका नौकर नही है।।अपने काम खुद ही करने पड़ेंगे। “

  केसर ने दूसरी तरफ मुहँ फेर लिया और आदित्य हंसते हुए सारे बर्तन समेटे रसोई में चला गया….
आदित्य के बर्तनों को साफ करने की आवाज़ सुन नाराज़गी से केसर भी अंदर चली आयी और उसके हाथ से बर्तन ले लिए…

” जाइये इतना भी एहसान करने की ज़रूरत नही है हम पर। हम धो लेंगे। “

” आपको बर्तन धोने आतें हैं। सिर्फ पानी से साफ नही करना है। वो जो सोप रखा है ना उसे भी लगाइए … हाँ ठीक ऐसे ही, अब पानी से साफ कर लीजिए। “

  नाराजगी से कुढ़ती केसर बर्तन साफ करती रही और आदित्य एक समोसा उठाये गुनगुनाता हुआ बाहर चला गया….

*******

  चुनाव की तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी थीं । आज शाम राजा के ऑफिस में उम्मीदवारों के नामो की घोषणा होनी थीं।
   किस किसको उम्मीदवार घोषित किया जाना था और किस जगह से उन्हें चुनाव लड़ना था यह सारी घोषणाएं आज शाम होनी तय थी। राजा ने विराज को भी बुला रखा था।
            इसके साथ ही 2 दिन बाद माया नगरी विश्वविद्यालय का उद्घाटन भी होना था। सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं….
   यहाँ तक कि अलग अलग महाविद्यालयों का नामकरण भी हो चुका था। वाणिज्य और कला संकाय का नाम जहाँ रानी रूपमती कला महाविद्यालय था वहीं राजा युवराज सिँह क्रीड़ा महाविद्यालय था…
  रानी बाँसुरी अजात शत्रु सिंह जहाँ चिकित्सा महाविद्यालय था वहीं राजा अजातशत्रु सिंह अभियांत्रिकी महाविद्यालय था।
    महाराज के नाम पर विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी का नामकरण हुआ था तो रानी माँ के नाम पर कला वीथिका नामांकित थी।
    कॉमर्स कॉलेज जहाँ विराज के नाम पर था वहीं फोटोग्राफी से सम्बंधित कॉलेज का नाम विराट पर था।
    बराबरी से सभी को कार्यभार दिया गया था। चिकित्सा महाविद्यालय के लिए जहाँ पुराने और अनुभवी डॉक्टरों की टीम मुहँमांगी कीमत पर आयात की गई थी वहीं अभियांत्रिकी महाविद्यालय के लिए भी नवरत्न कंपनियों के रिटायर्ड इंजिनिंयर्स और बड़े नामचीन महाविद्यालयों के प्रोफेसर और लेक्चरर आदि थे।
    इसी तरह से सारे महाविद्यालयों के लिए लेक्चरर और प्रोफेसर इकट्ठे किए गए थे। हर एक महाविद्यालयों की अपनी-अपनी प्रशासनिक कार्य प्रणाली और टीम अलग अलग थी लेकिन उन सब के ऊपर भी एक टीम बनाई गई थी जिस टीम में अधिकतर सदस्य राजमहल से थे कुछ अन्य अधिकारी भी थे।
विश्वविद्यालय का मुख्य कर्ताधर्ता विराज को बनाया गया था इसके साथ ही उसकी सहायता के लिए युवराज समर और खुद अजातशत्रु भी मौजूद थे। विश्वविद्यालय की सीईओ के पद के लिए चुने गए नामों में जब मतदान करवाया गया तो सबसे अधिक मतों के साथ निरमा उस पद के लिए चयनित हुई थी। निरमा को भी चयन के पहले तीन तरह के साक्षात्कार के दौर से गुजरना पड़ा था उसके बाद ही उसे उस पद के उपयुक्त पाया गया था। दो दिन बाद सभी पदाधिकारियों को भी अपनी पदों की शपथ लेनी थी। महल में सभी व्यस्त थे राजा शाम की मीटिंग के लिए पहुंच