शादी.कॉम- 28

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  शादी डॉट कॉम-28

     खाना खा कर सब एक साथ बैठे गप्पे मारते रहे ,इसी बीच सिद्धार्थ की माँ सबके लिये दक्षिण भारतीय फिल्टर कॉफ़ी बना कर ले आईं ।
   स्टील की छोटी छोटी ग्लास में सबको सर्व करती वो जब राजा के सामने पहुंची तब बांसुरी अचानक कह उठी__

बांसुरी– आँटी ये कॉफ़ी नही पीते।।

   बांसुरी की बात सुन उन्होनें मुस्कुरा कर कॉफ़ी का गिलास राजा के हाथ मे थमा दिया __” ये कोई ऐसा वैसा कॉफ़ी नही है बेटा ये हमारा साऊथ का स्पेशल फिल्टर कॉफ़ी,,एक बार पी कर तो देखो,,अमृत है अमृत ।सिड के नाना (पिता) तो डेली सुबह एक बड़ा गिलास भर के पीते थे।।

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बांसुरी– अंकल को क्या हुआ था आंटी  हमारा मतलब क्या उनकी तबीयत खराब थी।।

  बांसुरी की बात सुन सिद्धार्थ की मां मुस्कुराते हुए बांसुरी की तरफ देखने लगी उसे देखते हुए उन्होंने ना में सिर हिलाते हुए कहा
      “ओह नो नो  उनका तबीयत ठीक है वह दिल्ली में अपना प्रैक्टिस कर रहे हैं वकालत की।।
  एक्चुली हम सेपरेट हो गए।। सिड के होने के बाद मुझे और सिड  को उनकी जितनी जरूरत थी वह उतना समय हम दोनों को नहीं दे पाते थे उनका सारा समय उनके केस और अदालत ही ले जाते थे घर पर आने के बाद भी सारा समय केस से जुड़ी फाइलें पढ़ना उस पर काम करना यही उनका काम था।।
     मैं अकेले घर और बच्चे को संभालते हुए फ्रस्ट्रेट होने लगी थी इसीलिए हमारे बीच झगड़े बढ़ने लगे और लड़ झगड़ के साथ रहने से हमने अलग हो जाना ज्यादा सही समझा।। वह वहां रहते हैं ,, मंथ में कभी एक दो बार हमसे मिलने आते हैं अभी भी लीगली हम हस्बैंड वाइफ ही हैं।।।

    उनकी बात सुन बांसुरी झेंप के रह गई क्योंकि अब तक वो यह सोचा करती थी कि सिद्धार्थ के पिता किसी रोग या बीमारी के कारण चल बसे हैं।। आज सिद्धार्थ की मां से यह सच्चाई सुनकर उसे अपने उतावले पन पर शरम सी आ गई इस शर्मिंदगी से बचने के लिए उसने घड़ी की तरफ देखा और सिद्धार्थ की मां से घर वापस जाने की गुजारिश कर दी।।

    शाम के 5:00 बज रहे थे राजा बांसुरी और माला सिद्धार्थ से विदा लेकर उसके घर से निकल पड़े घर से निकलने के पहले बांसुरी ने जैसे ही सिद्धार्थ की मां के पैर छूने चाहे उसी समय राजा भी उनके पैर छूने को झुका दोनों को एक साथ ही अपने दोनों हाथ से आशीर्वाद देते हुए सिद्धार्थ की मां ने कहा “हमेशा खुश रहो”

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    वहां से निकलने के बाद माला का विचार फ्लैट पर वापस जाने का था लेकिन बांसुरी ने उसे भी अपने साथ ले लिया तीनो के तीनो वहां से कैब बुक करके फिनिक्स मॉल के लिए निकल गए।

     मॉल में एक जगह से दूसरी जगह घूमते ,हर दुकान के चक्कर लगाते  और गप्पे लड़ाते तीनों घूमते रहे माला ने उन दोनों से कहा कि “जब हम मॉल आए ही हैं तो तुम दोनों अपनी शादी की शॉपिंग भी क्यों नहीं कर लेते,, माला का यह आइडिया राजा को भी जँच  गया और दोनों के दोनों मान्यवर और मोहि में घुस गए।।
       हालांकि वहां अंदर जाने से पहले बांसुरी ने एक बार राजा से कहा भी कि तारीख तय होने के पहले हमारे यहां कोई भी तैयारी नहीं की जाती तब राजा ने हंसकर कहा__” शादी तो हम दोनों की तय हो चुकी है एकदम पक्की ही समझो !!और तारीख 2 दिन बाद निकलने ही वाली है तो शॉपिंग करने में कोई बुराई तो नहीं ।।”

   राजा की बात पर बांसुरी मुस्कुरा कर रह गई ।।

   राजा के बहुत इसरार करने के बाद भी बांसुरी ने शादी का जोड़ा नहीं खरीदा और ना ही राजा को शेरवानी लेने दी,, पर उसकी जिद मानकर तीन-चार भारी भरकम साड़ियां और राजा के लिए कुछ कपड़े जरूर खरीद लिए।। उसने एक बहुत सुंदर गुलाबी सी साड़ी माला के लिए भी खरीद ली।।

     इतना सब दिलवा कर भी राजा का तो जैसे मन ही नहीं मान रहा था यहां से निकल कर जूते चप्पलों की दुकान में वह बांसुरी को लिए घुस गया।।
     कई जोड़े फुटवियर्स दिलवा कर भी उसे चैन नहीं मिला।।
      एक-एक कर ब्राइडल खरीदारी की सभी दुकानों पर राजा बारी-बारी से बांसुरी को ले जाता गया और शॉपिंग करवाता गया।।

   हर एक साड़ी से मैचिंग सैंडल बालों में लगाने का क्लच, चूड़ियां ,कंगन ,झुमके और भी बहुत कुछ।।

    और सबसे आखिर में वह बांसुरी को लिए गहनों की सबसे बड़ी दुकान में घुस गया बांसुरी के लाख मना करने पर भी उसने एक बहुत सुंदर  जड़ाऊ कंगन खरीद लिया………….और तभी उसकी नज़र माणिक की एक अँगूठी पर चली गयी,,छोटे छोटे माणिको से सजा एक मोर अँगूठी मे बना था,राजा ने उसे भी लपक के बांसुरी के लिये खरीद लिया।।
      बांसुरी ने भी एक सॉलिटियर राजा के लिये खरीद लिया।।

     राजा तो वो अँगूठी वहीं बांसुरी को पहना देना चाहता था,पर  अपने राशिरत्न को बिना सिद्ध किये पहनने को बांसुरी का मन नही माना।।
    राजा ने अपने लिये बांसुरी द्वारा ली गयी अंगूठी भी उसके ही सामान में रखवा दी।।

राजा –बांसुरी अब घूम घूम के बहुत थक गये हैं,कहीं बैठ के कुछ खा लिया जाये।।

माला — गुड आइडिया!! वैसे भी तुम दोनों तो अपनी शादी की तैयारी कर रहे और मेरे पैर बिना मतलब को कबड्डी कबड्डी खेल रहे हैं,यहाँ घुसो वहाँ निकलो बस।।

  माला की बात पर दोनो हंसने लगे।।तीनो वही नीचे बने एक कैफे में चले गये,उसी मे एक तरफ म्युज़िकल नाइट चल रही थी,जिसमें कोई भी जाकर गाना गा सकता था,,एक एक कर वहाँ बैठे लोग उठ के जाते और कुछ भी आड़ा टेढा गा कर आ जाते,,आखिर इन सब को देखने के बाद बांसुरी ने राजा से भी गाना गाने की गुजारिश कर ही दी__

बांसुरी– जाओ ना राजा,प्लीज़ गाओ ना।।देखो कोई भी मख्खीमार यहाँ गा ले रहा है तुम तो सच में बहुत ही अच्छा गाते हो,,जाओ ना ।।
     बांसुरी की बात पर मुस्कुराते हुए राजा उस तरफ बढ गया।।

      चाहे बना दो,चाहे मिटा दो,
      मर भी गये तो देंगे दुआयें ।
      उड़ उड़ के कहेगी खाक सनम
      ये दर्द ए मुहब्बत सहने दो
      मुझे तुमसे मुहब्बत हो गयी है
      मुझे पलकों की छाँव में रहने दो
      एहसान तेरा होगा मुझ पर
      दिल चाहता है जो कहने दो…

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राजा के गाने को खतम करते ही लोगों की तालियाँ गूँज उठी पर बांसुरी का मन जाने कैसा तो हो गया__

बांसुरी– ये मरने जीने वाला गाने की क्या ज़रूरत थी,कुछ और ढंग का नही गा सकते थे।।

राजा– अरे बुद्धू गाने मे प्यार छिपा है वो नज़र नही आया ,बस एक शब्द पकड़ के बैठ जाओगी!  वहमी औरत!! अच्छा तुम्हारे लिये कुछ और भी गा देते हैं,, रुको।।

          सांसो की सरगम ,धड़कन की वीणा
          सपनों की गीतांजली तू
          मन की गली में महके जो हरदम
          ऐसी जुही की कलि तू
          छोटा सफर हो लम्बा सफर हो
          सूनी डगर हो या मेला।।
          याद तू आये मन  हो जाये
          भीड़ के बीच अकेला
         बादल बिजली चंदन पानी जैसा अपना प्यार
         लेना होगा जनम हमें कई कई बार…..
          इतना मदिर इतना मधुर तेरा मेरा प्यार..

************
   अलग अलग बैग्स में ढ़ेर सारा सामान समेटे तीनों वहाँ से निकल गये।।
    मॉल से बाहर निकलते ही माला फ्लैट में जाने के लिये कैब बुक करने लगी__

माला– गाईस मैं बहुत थक गयी हूँ , तुम दोनों का मन तो भरा नहीं होगा ……तो ऐसा करो तुम दोनों साथ साथ घूमो मैं यह सारा सामान लेकर फ्लैट पर जाती हूं, जब तुम लोग घूम कर थक जाओगे तब फ्लैट पर आ जाना।।

   राजा और बांसुरी माला की बात सुनकर मुस्कुराने लगे राजा ने माला को मुस्कुरा कर हामी भर दी।।
    उन दोनों को वहीं छोड़ माला सारा सामान समेटे कैब लेकर फ्लैट के लिए निकल गई राजा और बांसुरी एक बार फिर पिछली रात की तरह हाथों में हाथ डाले सड़क के किनारे किनारे चलते रहे  …..     उनके पास दुनिया जहान की बातें थी जो इतनी जल्दी खत्म नहीं होने वाली थी ,,अभी वह दोनों चल ही रहे थे कि बाजू से दो बाइक पर तीन लड़के गुजरे उन्होंने आगे जाकर बाइक घुमाकर राजा और बांसुरी के सामने लाकर रोक दी।

   उनमें से एक लड़के ने कड़क के उनसे कहा जो जो सामान तुम्हारे पास है जल्दी से निकालो,, तब तक में बाकी दोनों लड़के भी बाइक से उतर के उनके पास चले आए ।। एक तरह से राजा और बांसुरी को तीनों तरफ से उन तीनों मुस्टंडो  ने घेर लिया राजा ने चुपचाप अपने जेब में हाथ डाला वॉलेट निकाला और उन लड़कों के हाथ में रख दिया।
         उनमें से एक लड़के ने बांसुरी की तरफ देखा और उससे कहा
          “तुझे समझाने के लिए क्या अंग्रेजी में बोले जो जो है पर्स में निकाल गले की चेन कानों के टॉप्स अंगूठी सब कुछ हमारे हवाले कर दे।”
 
     ” भाई तमीज से भी तो बोल सकते हो हम तो वैसे ही सब कुछ तुम्हारे हवाले कर रहे हैं बांसुरी दे दो यह जो मांग रहे हैं ,”।।
      उसकी बात सुन राजा ने बांसुरी की तरफ देख कर कहा।
   बांसुरी ने राजा की तरफ देखा राजा ने आंखें झुका के उसे वैसा ही करने के लिए कहा बांसुरी  ने एक-एक कर अपने कान के टॉप्स अंगूठी यहां तक की अपनी घड़ी भी उतार कर राजा के हाथ में  रख दी।।

   राजा ने सारा का सारा सामान उनमें से एक लड़के के हवाले कर दिया सामान लेते समय उस लड़के ने  राजा का हाथ पकड़ लिया __
               “वाह बच्चू सबसे कीमती सामान छुपा ले गए यह घड़ी भी हमारे हवाले करो जो तुमने अपने हाथ में बांध रखी है।”

   राजा ने अपनी घड़ी की तरफ देखा और बालों को झटका देकर घड़ी निकालने लगा पर बांसुरी ने राजा का हाथ पकड़ कर रोक दिया __
          “नहीं राजा यह घड़ी तुम नहीं दोगे”

” अरे ओ मैडम बैंडिट क्वीन जब राजा जी खुद अपना खजाना लुटाने को तैयार हैं तो आपको मिर्ची काहे लग रही है जब इतना कुछ दे दिया तो एक घड़ी भी दे दो।”

   उनमें से एक बदमाश ने बांसुरी से कहा।

” राजा हम कह रहे हैं ना तुम किसी भी कीमत पर इस घड़ी को नहीं दोगे। और हां हम हैं बैंडिट क्वीन बोलो क्या करोगे दे तो दिया इतना कुछ,, काफी नहीं है क्या ??चुपचाप लो और रफा दफा हो जाओ वरना तुम जानते नहीं कि हम कौन हैं??

  बांसुरी की बात पर उनमें से एक बदमाश आगे बढ़कर आ गया और डरने के हावभाव  दिखाते हुए हाथ जोड़कर बांसुरी से कहने लगा__
      ” मैं तो डर गया मैडम!! बहुत डर गया अब क्या करूं भाग जाऊं? या तुम्हें भगा के ले जाऊं??

   जब तक वह अपनी बात पूरी करता एक जोर का झन्नाटेदार  तमाचा उसके गाल पर पड़ा ।। वो जब तक अपने गाल को सहलाता तब तक में दूसरे बदमाश के पेट पर एक जोर  का घूंसा पड़ा और तीसरे बदमाश के पैर में बांसुरी की हील वाली सैंडल।।
       
       अभी तीनों लड़खड़ा कर उठ पाते की बांसुरी ने उनके हाथ से जमीन पर गिरा अपना पर्स उठाया और उसमें से एक स्प्रे निकालकर तीनों की आंखों पर जोर से मार दिया तीनों अपनी-अपनी आंखों को मलते जैसे तैसे उठे और बाकी का  सारा का सारा सामान वहां पर पटक कर अपनी अपनी बाइक पर सवार होकर भाग निकले।।
       बांसुरी ने मुड़कर राजा को देखा राजा हाथ बांधे खड़े बांसुरी को मुस्कुराते हुए देख रहा था।।

बांसुरी– तुमने उन बदमाशों को मारा क्यों नहीं ऐसे तो खुद कानपुर  के ईतने बड़े गुंडे हो,, यहां पुणे में आकर सारी हेकड़ी निकल गई।।

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राजा– हम झगड़ा करना ही नहीं चाहते थे बन्सी इसीलिए।।
     हम खुश थे,तुम्हारे साथ…….. इसीलिए लगा वो तीनों भी खुश हो लें ।।अरे हमारा सामान ले जाकर हमें कौन सा गरीब कर जाएंगे पर उन गरीबों का ही थोड़ा भला हो जाता यह सोचकर हम चुप रहे।। पर तुम्हें अचानक क्या हो गया?? इस घड़ी के लिए इतना काहे इमोशनल हो गई??
     और इतना सारा फाइटिंग वाइटिंग कहां से सीख गई??

बांसुरी– काहे तुम भूल गए क्या ये घड़ी तुम्हें कब मिला था?? यह घड़ी तुम्हारे बाबूजी लेकर आए थे जिस साल तुम 12वीं पास किए थे,,, याद है, तुम जिम में कितने खुशी के साथ आए थे ये घड़ी हमें दिखाने।।
       हमें याद है जब तुम हमें ये घड़ी दिखा रहे थे तुम्हारी आंखों में आंसू आ गए थे हमको पता है राजा तुमको घड़ियों का कलेक्शन करने का शौक है और तुम्हारे पास नहीं नहीं में  26 घड़ियां तो होंगी ही,, लेकिन इस घड़ी की कीमत तुम्हारे लिए क्या है यह हम से ज्यादा कौन समझ सकता है??

राजा– क्या बात है!! हमारी बंसी को तो हम से जुड़ी सारी बातें याद है।

बांसुरी– भूला तो उन्हें जाता है जो कोई याद हो!! तुम तो हमारे अंदर ही बसे हुए हो राजा हमसे अलग थोड़े ही हो कि तुम्हें भूल जाएं हमें तो अपने आप को देख कर भी तुम्हारी ही याद आती थी।।।
     और यह फाइटिंग भी तुम्हारे ही चक्कर में सब सीखे।। जब से पुणे आए जिम जाना 1 दिन भी नहीं छोड़ा,  रोज नई कसरत करते थे….. कभी किक बॉक्सिंग कभी वजन उठाना,, और यही सब की प्रैक्टिस करते करते हमारा हाथ साफ हो गया।।। हालांकि आज तक किसी गुंडे मवाली के ऊपर अपना हाथ साफ किया नहीं,, लेकिन आज तुम्हारी इस घड़ी के लिए हमारे अंदर की पुरानी वाली लड़ाकू बांसुरी बाहर निकल आई।।

राजा बांसुरी की बात सुनकर जोर जोर से हंसने लगा उसे देख बांसुरी भी खिलखिलाने लगी दोनों हंसते खिलखिलाते वापस आगे बढ़ गये।।

   दोनों ने कुछ आगे पहुंच कर टैक्सी ली और बांसुरी के फ्लैट की ओर निकल गये,थोड़ा आगे ही बढ़े थे कि राजा का फ़ोन घनघना उठा__

राजा– हेलो कौन??

” राजा हम बोल रहे हैं युवराज!! कहाँ हो तुम?? बॉम्बे पहुंच गये होगे ना?? अभी एक घन्टे बाद की तो तुम्हारी फ्लाईट होगी ना?”

युवराज की आवाज़ सुन राजा ने एक बार फिर फोन की स्क्रीन देखी,पर वहाँ भैया का नम्बर तो नही दिखा रहा था__

” भैय्या ये किसके नम्बर से बोल रहे हैं आप?”

” वो सब हम बाद में बताएंगे,पहले तुम बताओ बॉम्बे एयरपोर्ट मे हो ना।”

” नही भैया !! हम वो पुणे ही रुक गये थे ,असल मे कुछ काम आ गया था,दो दिन बाद यहाँ से निकलेंगे, हम आप को फ़ोन करने ही जा रहे थे कि आपका फोन आ गया।।”

” अरे ऐसे कैसे! ऐसा कौन ज़रूरी काम आ गया? खैर वो सब छोड़ो तुम अभी के अभी बॉम्बे पहुँचो और वहाँ से दिल्ली की फ्लाईट पकड़ कर चले आओ।।हम भी दिल्ली पहुंच गये हैं ।।

” भैया का  बात हो गयी,कुछ तो बताइये ।”

” बस इतना समझ लो,कुछ बहुते जरुरी काम है, अभी किसी को कुच्छो बोलने बतियाने का ज़रूरत नही है,तुरंत जहां हो वहाँ से गाड़ी लो और बाम्बे भागो।”

” पर भैया….”

” राजा समझो बात को ,तुरंत निकलो !अभी और कुछ नही बता पायेंगे ,,बॉम्बे निकलते ही इसी नम्बर पे हमे फोन कर लेना।”

    बांसुरी को भी भैया की कुछ कुछ आवाज़ आ तो रही थी लेकिन कुछ समझ नही आ रहा था,उसने राजा की तरफ देखा__” क्या हो गया।”

” पता नही बंसी !! पर भैया बोले हैं तो हमे अभी के अभी निकलना पड़ेगा,कुछ समझ नही आ रहा कि हुआ क्या है।।”

” सबकी तबीयत तो ठीक है ना??”

” पता नही बंसी पर भैया ने किसी से भी बात करने मना किया है अभी ,तो हम घर पे भी नही पूछ सकते,और तुम तो जानती हो बड़के भैय्या का आदेश हमारे लिये सबसे बड़ा है,तुमको तुम्हारे फ्लैट में उतार कर हमको बॉम्बे निकलना पड़ेगा बंसी ।”

” हमारा दिल बहुत घबरा रहा है राजा !! आज मत जाओ!!”

” अब नही रुक सकते बंसी ,,भैया का कहा किसी हाल मे नही टाल सकते।”

” पर राजा सुबह गणपति मन्दिर मे भी दर्शन नही हुआ ,फिर सोचे थे की परसो मुम्बई में सिद्धिविनायक के दर्शन कर लेंगे उसके बाद फ्लाईट पकड़ेंगे पर तुम अभी निकलोगे तो वो भी नही हो पायेगा।।”

” अरे यार !! तुम भी कहाँ की बात कहाँ जोड़ने लगती हो ।।सुनो निश्चिंत रहो,सिर्फ दर्शन ना कर पाने से भगवान हमसे गुस्सा होके अपने पास नही बुला लेंगे।”

” फिर बकवास शुरु कर दिये,,तुमको मना किये हैं ना राजा ऐसी मरने वरने की बात ना किया करो,,अच्छा सुनो मुम्बई पहुंचते तक पूरे रास्ते हमसे बात करते हुए जाना और जब फ्लाईट पकड़ लोगे तब भी बताना जब दिल्ली मे उतर जाओगे तब भी बताना, समझ गये।”

” हाँ समझ गये बंसी !! इत्ता परेशान ना हो !! तुम तो यार अभी से बिवियों जैसे जासूसी करने लगी।।”

” हाँ तो!! बस फेरे होने से ही बीवी बनूँगी क्या ,मन से तो पति मान ही लिया तुम्हें ।”

          तेरे संग संग राह सारी कट जानी ए
      मै ता तेरे नाल रहना, मान इन्ना मेरा कहना
     मेरी अखियो से होना कदी दूर ना
           तेरे बिन …….तेरे बिन …….
      तेरे बिन नई लगदा दिल मेरा ढोलना
       तेरे बिन नई लगदा दिल मेरा ढोलना
          सब छड जाये तू ना मेनू छोडना
      तेरे बिन नई लगदा दिल मेरा ढोलना….

   टैक्सी में बजते गाने के साथ ही बांसुरी की आंखों से आंसू भी बहते रहे,,उसके फ्लैट के नीचे उसे उतारने के बाद राजा ने उसे एक बार फिर अपनी  बाहों मे भर लिया,,,कुछ देर ऐसे ही रहने के बाद राजा ने बांसुरी को खुद से अलग किया और वापस टैक्सी में बैठने मुड ही रहा था कि बंसी ने उसका हाथ पकड़ उसे रोक लिया__” मत जाओ राजा!! अब तुमसे अलग होकर जी नही पायेंगे।”

   राजा ने अपने आंसू छिपाते हुए बाँसुरी का चेहरा अपने हाथों मे भर लिया__” हम जल्दी वापस आ जायेंगे बंसी ,हमारा रस्ता देखना।।”
     राजा ने एक बार बंसी के माथे को चूमा और वापस टैक्सी में बैठ गया।।

     बांसुरी तब तक वहाँ खड़ी रही,जब तक टैक्सी उसकी आंखों से ओझल नही हो गयी।।

क्रमशः

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शादी.कॉम-27

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शादी डॉट कॉम-27

बांसुरी– नही ,पहले हमारी बात सुनो!! क्या कह रहे थे सिद्धार्थ सर ,मुझसे शादी करेंगे,हो चुकी तब तो।।तुमने कहा नही उनसे कि बांसुरी सिर्फ और सिर्फ राजा की है,और राजा से ही बांसुरी की शादी होगी।।

राजा– नही कहा!! लेकिन कल उनके घर जायेंगे ना तब कह देंगे,,अब खुश!!

बांसुरी– हाँ बहुत बहुत खुश ।।

राजा– तो फिर आओ इधर।

बांसुरी– कब से देख रहे हैं,घूम फिर के एक ही जगह तुम्हारा कांटा अटक जा रहा

राजा– इत्ते साल से इन्तजार भी तो किया है तुम्हारा बन्सी!!!
      मुस्कुराती हुई बांसुरी आगे बढ़ कर राजा के गले से लग गयी,और राजा उसके चेहरे पे झुकता चला गया।।

    आंखो में खो जाये आंखे
    बोले हाथों से हाथ
    बाहों में छिप कर
    सांसों से जैसे डोले रात
    उंगलियों को उंगलियों से
     मौसमों को शोखियों से बात करने दो
     चुप तुम रहो,चुप हम रहें
    खामोशी को खामोशी से
    जिंदगी को जिंदगी से बात करने दो।।

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बांसुरी में धीरे से राजा को अपने से अलग कर दिया

राजा– क्या हुआ बन्सी??

बाँसुरी — कुछ नही बस ऐसे ही।।
   अच्छा सुनो तुमने यहां पर कुछ भी नहीं देखा है ना 4 दिन से तो सिर्फ काम में ही भिडे हो बैंक से होटल होटल से बैंक।। चलो तुम्हें पुणे घूमाती हूं यहां ऐतिहासिक महत्व की बहुत सी चीजें हैं पुराने अंग्रेजों के जमाने के स्मारक हैं शिवाजी महाराज के जमाने के किले हैं बाजीराव मूवी देखी थी ना ,उसमें दिखाया काशीबाई का महल भी यही है शनिवार वाडा में।। पांच नदियां हैं कई ब्रिज है बहुत बड़े-बड़े कॉलेजेस हैं चलो सब तुम्हें दिखाऊं।

राजा– हम जो देखने आए थे वह तो देख लिया बंसी

बांसुरी राजा की बात सुन मुस्कुराने लगी।।

राजा– सुनो अब देखना वेखना छोड़ो यार जोर की भूख लगी है चार-पांच दिन से कुछ ढंग से खाया नहीं कुछ अच्छा सा खिलाओ तो कोई बात बने।।

बांसुरी– कानपुर सी कचौड़ीयां और पकौड़ीयां  तो यहां मिलने से रहीं फिर भी एक अच्छी जगह है एफसी रोड पर वहां चलते हैं वहां की चाट  खिलाती हूं तुम्हें।।

राजा– यहां की चाट से तो तौबा कर ली बंसी हमने। उस दिन तुम्हारे सिद्धार्थ सर तुम्हारी कैंटीन में बड़ी शान से हमारे सामने लेकर आए कहा सर यह चख कर  देखिए हमारे यहां का रगड़ा पेटिस आपके कानपुर की चाट ना भूल गए तो हमारा नाम बदल दीजिएगा।
     वो  चाट खाकर जो जबान का स्वाद बिगड़ा है तो आज जाकर सुधरा है,, अब तब से हम सोच रहे हैं कि तुम्हारे सिद्धार्थ सर को क्या नया नाम दें।।

बांसुरी– तुम नही सुधर सकते।।

राजा– हाँ तो सुधरे भी क्यों,,जैसे हैं अच्छे हैं ।।

बांसुरी– राजा हम चाहते हैं ,यह रात कभी खत्म ना हो बस ऐसे ही चलती रहे और हम दोनों एक दूसरे का हाथ हाथ थामे आगे बढ़ते रहें।

राजा– बंसी हम तो अब तुम्हें एक पल के लिए नहीं खोना चाहते ।।हम तो चाहते हैं __हम कल जल्दी से घर पहुंचे और सबसे, तुरंत अपनी शादी की बात कर ले, और बस एक हफ्ता बीतते  बीतते तुम हमारी दुल्हन बनकर हमारे घर आ जाओ हमेशा के लिए।।

बांसुरी– बड़े बेसबर हो  रहे तुम तो।

राजा– हां तो क्यों ना हो?? इतने साल इंतजार भी तो किया है तुम्हारा….. हमारा बस चले तो अभी यहीं फेरे ले ले तुम्हारे साथ।।
    हम तो कहते हैं बंसी तुम भी हमारे साथ कानपुर चलो ,तुम तुम्हारे घर बात कर लेना…. हम हमारे घर और सब मान गए तो अगले दिन ही शादी कर लेंगे।।

बांसुरी– अरे इतनी शॉर्ट नोटिस पर छुट्टी कहां मिलेगी राजा ऐसे कहां जा पाएंगे हम,, ऐसा करो अभी तुम ही जाओ दो-तीन दिन में सर से बात करके छुट्टियां लेकर हम भी आ जाएंगे और जैसा तुम चाहते हो …भगवान ने चाहा तो 1 हफ्ते में ही तुम्हारी दुल्हन बनकर तुम्हारे घर आ जाएंगे।।

राजा– सोच लो अब हमारे बिना रह पाओगी??

  दोनों इसी तरह हंसते बोलते एक दूसरे का हाथ थामे रास्ते के किनारे किनारे चलते रहे।। इतने सालों के ताने उलाहने, प्यार भरी मीठी झिड़कियां,, सवाल जवाब और ढेर सारी बातें …..न सुलझने वाली समस्याएं और उलझने वाली मीठी-मीठी बातें करते करते दोनों जाने कहां तक चलते चले गए……… जब कहीं थक जाते तो रास्ते के किनारे पड़ी बेंच पर बैठ जाते हैं जो ठेला मिला उससे कुछ खा लिया कहीं चाय मिली वहां पी ली…….. एक पानी की बोतल पकड़े दोनों सारी रात पूरे शहर की खाक छानते रहे।।

     रात के अंधियारे से सुबह हल्की हल्की सी उगने  लगी।।। तब राजा ने बांसुरी को उसके फ्लैट पर छोड़ा और अपने होटल चला गया दोनों ने विदा होते समय सिद्धार्थ के घर एक ही समय में पहुंचने का वक्त तय कर लिया।।।

********

माला– बंसी अरे उठ जा कब तक सोती रहेगी सुबह का 10:00 बज गया है तू कल रात पार्टी में अचानक गायब हो गई रात भर पता नहीं कहां भटकती रही किस समय फ्लैट पर आई मुझे तो कुछ पता ही नहीं चला ??यार यह चल क्या रहा है ??

बांसुरी– सब बता देंगे थोड़ा तो धैर्य रखो पहले 1 कप प्यारी सी चाय पिला दो।।

माला– जो आज्ञा मैडम जी मैं जा रही हूं ,आपके लिए चाय चढ़ाने …..आप ऐसा कीजिए हाथ मुंह धो लीजिए।।

बाँसुरी उठ कर बाथरुम में घुसने ही वाली थी कि दरवाजे पर किसी ने घंटी बजाई, दूध वाला दूध दे चुका,पेपर वाला आ चुका,फिर ये कौन आ गया,,सर को झटक कर बांसुरी बाथरूम में घुस गयी।।

   नहा धोकर निकलकर बालों को झटकते हुए बांसुरी जब बैठक में आई तो वहाँ राजा को बैठे देख आश्चर्यचकित रह गई।।

बांसुरी– अरे तुम!! तुम यहाँ कैसे??

माला– सर बस अभी कुछ देर पहले ही यहां आए हैं बांसुरी,, तुम यहां बैठो मैं सर के लिए कॉफी बना कर लाती हूं।।

राजा– माला जी अगर आपको तकलीफ ना हो तो चाय बना दीजिए कॉफी हमें जरा कम पसंद है।।

माला–  हाँ  बिल्कुल!! तकलीफ क्यों होगी मैं चाय ही बनाकर ले आती हूं।।

   माला अन्दर जाते जाते बांसुरी को भी साथ में खींच ले गयी।।

माला– चल क्या रहा है मैडम कुछ बताइन्गी  आप?? यह आरके सर आखिर हैं कौन?? तुम्हें कैसे जानते हैं?? यह सुबह-सुबह हमारे घर पर क्या कर रहे हैं ??
     और सुन यार तू कॉफी फेंट ले तब तक मैं थोड़ा चेहरे का रंग रोगन कर लूँ  वरना बंदा सोचेगा कैसी वाहियात लड़की है भूतनी बनी घूम रही है घर पर।। सारा इंप्रेशन खराब हो जाएगा।।

बांसुरी– तुमने सुना नहीं उन्हें कॉफी नहीं चाय पीनी है तुम जाओ आराम से तैयार हो जाओ हम तब तक चाय चढ़ातें हैं ।।

दस मिनट में माला तैयार होकर आ गयी,बांसुरी चाय चढ़ा कर राजा के साथ बैठी बातें कर रही थी और चाय खौल खौल कर काढ़ा बन चुकी थी।।

माला– बंसी चाय को छान दूं या थोड़ी और जलानी है।।

बांसुरी माला की आवाज सुन भागती हुई रसोई में आई और चाय को झांक कर देख हंस पड़ी।।

” कुछ ज्यादा ही खौल गई ना” उसने हंस के माला से पूछा

माला– चाय तो जो पकी सो पकी ,,, तुम दोनों के बीच क्या पक रहा है ??अब तो सब सच सच बता दे।

बांसुरी ने तीन कप में चाय छानी एक प्लेट में कुकीज निकाली और माला को साथ लिए बैठक में चली आई।।

बांसुरी– राजा इनसे मिलो यह है हमारी प्यारी सहेली माला।।

राजा — अच्छे से जानते हैं हम।।

मुस्कुराते हुए बांसुरी ने राजा को देखा और कहा

बांसुरी– माला हमारे बारे में सब जानना चाहती है।

राजा– क्यों तुमने आज तक कुछ बताया नहीं चलो कोई बात नहीं…. आइए माला जी आपको हम ही बता देते हैं हमारी और बांसुरी की कहानी।।

माला–  कुछ कुछ समझ तो आने लग गया है कि बांसुरी की अलमारी का वह स्पेशल कोना आप ही हैं।।
जहां  कुछ अजीबोगरीब सामान रखती है ये ।।

राजा– अच्छा!! जैसे क्या क्या रखती है??

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माला– एक रुद्राक्ष की माला,एक जेंट्स परफ्यूम,, एक टूटी से पैन रखी हुई है, एक छोटी सी नोटबुक पड़ी है, एक टी-शर्ट भी है ।।।रुद्राक्ष की माला को कभी-कभी निकाल कर अपने हाथ में लपेट लेती है और फिर वापस निकाल कर वही रख देती है।

राजा– टी-शर्ट कौन सी रखी है तुमने??
 
ऐसा बोलते में उसके हाथ से छलक कर चाय उसकी शर्ट पर गिर गयी।।

बांसुरी– वाह टी शर्ट रखी है,ये सुनते ही शर्ट खराब कर ली।।लायो उतार कर हमे दो,हम साफ करके ले आते हैं ।।

राजा– क्या बात है बंसी !! हमें शर्ट लेस देखने की बड़ी जल्दी है तुम्हें ।।

बांसुरी– बकवास बन्द करो ,और लाओ इधर दो

राजा– पर ये टी शर्ट तुम्हें मिली कहां से??

बांसुरी– और कहां से मिलेगी तुम्हारी जिम से।। जिस दिन हम जॉइनिंग के लिए निकल रहे थे उस दिन जिम गए थे तब प्रिंस से बोलकर तुम्हारे लॉकर से तुम्हारी यह टीशर्ट निकलवा ली थी हमने,, और अपने साथ ले आए इसमें तुम्हारी खुशबू बसी है आज तक वैसी की वैसी रखी है।।

राजा–  छी फिर मैं नहीं पहनूंगा  बिना धुली गंदी टीशर्ट।।

बांसुरी– अरे अपने कपड़ों के साथ इसे भी धोते थे बाबा !! और फिर से तुम्हारा परफ्यूम डालकर आयरन करके वापस रख देते थे,साफ है पहन लो।

राजा ने हंसते हुए कपड़े बदले और माला को अपनी कहानी सुनाने बैठ गया।
      प्रिंस प्रेम और निरमा, पिंकी और रतन, बंटी और रानी,रेखा और लल्लन युवराज भैया रूपा भाभी अम्मा बाबूजी दादी बुआ जी जितने लोग उनकी प्रेम कहानी का हिस्सा थे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सबको दोनों ने याद किया।।। पूरी कहानी में दोनों जाने कितनी बार पागलों की तरह हंसे और बहुत बार दोनों की आंखें  भीग गई।।

बांसुरी– प्रिंस कैसा है राजा?? कानपुर छोड़ने के बाद से तो उसने हमसे कभी बात ही नहीं की!!

राजा– तुम से सब नाराज जो हो गए थे,, तुम उनके हीरो को छोड़कर जो चली आई थी।।

बांसुरी मुस्कुरा कर रह गयी__” बात तो करी जा सकती थी ना!!”

राजा– हां बात तो करी जा सकती थी पर एक-एक कर ऐसी छोटी-छोटी बातें जुड़ती चली गई कि सब का गुस्सा बढ़ता ही चला गया।। उस दिन तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारे एग्जाम वाले दिन हमने चिट्ठी लेकर प्रेम को तुम्हारे सेंटर भेजा था तुमने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि उल्टे पैरों उसे बिना हमारी चिट्ठी पढ़े ही वापस भेज दिया…. इस बात के बाद से हमें तेज बुखार आ गया हमें बुखार में पड़े देखकर अम्मा पसीज गई और तुम्हारे घर गई बंटी को लेकर तुम्हारे और हमारे बारे में बात करने चली गयी।। तुम्हारी बुआ ने हमारी अम्मा को भी खोटे सिक्के सा वापस भेज दिया।।उसके बाद हम बीमार पड़ गए बहुत बीमार पड़ गए थे बंसी !!इतने बीमार कि हमें लेकर युवराज भैया को मुंबई तक दौड़ लगाना पड़ा पर इसके बाद भी तुमने हमारी कोई खोज खबर नहीं ली इस घटना के बाद घर में सब टूट गए हर किसी ने अलग-अलग हमें कसम दे दी कि हम अब तुमसे कोई संबंध ना रखें तुम्हें भूल जाए पर क्या हमारे लिए यह संभव था कि हम तुम्हें भूल जाते ।।

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    अविश्वास से राजा को देखती बांसुरी की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बहती रही जिसे पोंछने की उसने कोई कोशिश नहीं की उसने बहुत धीमी सी आवाज में राजा से पूछा “क्या अम्मा जी खुद हमारे घर आई थी”?

राजा– हाँ अम्मा खुद गयी थी।।

बांसुरी– राजा हमारा विश्वास करो किसी ने इस बारे में हमें कुछ नहीं बताया !!हमें समझ नहीं आ रहा कि हमारी मम्मी तक ने हमें कुछ  क्यों नहीं बताया।। हमसे सच में बहुत भूल हुई हमें दोबारा तुम्हें फोन करना चाहिए था,, कानपुर से निकलने के बाद जब हम पहली बार ज्वाइन करने गए तो हमने एक ही बार तुम्हें फोन किया रूपा भाभी से थोड़ी बहस हो गई…… और फिर हमारा दिमाग गरम हो गया उसके बाद कई बार सोचा और फोन भी उठाया लेकिन हिम्मत ही नहीं पड़ी तुमसे बात करने की….
     हमें माफ कर दो राजा अब तुम रूपा भाभी अम्मा जी कोई हमें कुछ भी कह ले कितना भी सुना ले हम अब तुम्हें छोड़कर कभी नहीं जाएंगे।।

    बांसुरी सर झुकाए रोती रही राजा अपनी जगह से उठकर बांसुरी के पास आया और उसने उसे गले से लगा लिया।। इन दोनों को अपने आंसुओं में भीगा देख माला वहां से उठकर चुपचाप चली गई कुछ देर बाद एक ट्रे में दो गिलास  में पानी और तीन कप चाय लिए वह वापस चली आई।

माला– मुझे लगता है अब हमारे लव बर्ड्स की सारी शिकायतें दूर हो गई होंगी,अब ऐसा करो आंसू पोछो ,चाय पियो और बंसी तैयार हो जाओ ,सिद्धार्थ सर के घर भी तो जाना है।।

  बांसुरी आंखें पोंछ कर तैयार होने अंदर चली गई माला ने रेडियो पर एक गाना ट्यून किया और फोन पर कैब बुक करने दरवाजा खोलकर बाहर निकल गई राजा वहीं सोफे पर दोनों हाथ सीने पर रखें आंख बंद करके लेट गया__

       मोहे लगे प्यारे सभी रंग तिहारे
       सुख दुख में हर पल रहूं संग तिहारे
       मगन अपनी धुन में रहे मोरा सैयां
       पग पग लिए जाऊं मैं तोहरी  बलैया।।

राजा आंखें बन्द किये लेटा रहा और बांसुरी वही खड़ी उसे देखती रही।।गाना खतम होते ही राजा ने आंखें बन्द किये हुए ही कहा__

राजा– मन भर कर निहार लिया हो हमें तो अब जाकर तैयार भी हो जाओ वरना तुम्हारे सिद्धार्थ सर गोली मार देंगे हमें ।।
    बांसुरी लजा कर तुरंत अन्दर चली गयी।।

   कुछ देर बाद तीनो कैब में सवार सिद्धार्थ के घर की ओर निकल पड़े,,रास्ते मे बांसुरी को अचानक कुछ याद आ गया__

बांसुरी– राजा एक बात बोलूं नाराज तो नहीं होंगे

राजा– हां बोलो

बांसुरी– यहां एक गणपति मंदिर है बहुत मानता ( मान्यता) है उनकी!!  बहुत दिनों से हमारी इच्छा थी की कभी जब हमारे बीच सब सुलझ जाए तब तुम्हारे साथ हम उनके दर्शन को जाएंगे क्या हम वहां चल सकते हैं??

राजा– इसमें पूछने की क्या बात है बंसी उन्हीं के कारण तो आज हम एक हो पाए हैं।। हमने भी बड़े हनुमान जी के पास अर्जी लगा रखी थी,, अब जब तुम कानपुर आओगी ना ,तो तुम्हें वहां भी लेकर जाना है।।

   कुछ आगे जाकर उन्होनें कैब छोड़ दी और तीनों मन्दिर के लिये मुड़ गये। तीन चार छोटी छोटी गलियां पार करने के बाद आखिरी गली के छोर पर बड़ा सा गणपति मंदिर था।। तीनों ने वहां के सदर दरवाजे से अंदर प्रवेश किया ,,प्रांगण को पार करते जब वह मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचे तभी पंडित जी ने आगे बढ़कर कपाट बंद कर दिया।।

माला– अरे यह क्या हो गया यह तो अच्छा नहीं माना जाता है।। मंदिर पहुंचो और दर्शन भी ना मिले।। है ना बंसी अपशकुन होता है ना यह।।

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बांसुरी– पंडित जी थोड़ा सा कपाट खोल दीजिए ना हम बस झांक कर ही  दर्शन कर लेंगे और तुरंत चले जाएंगे।
   बांसुरी की बात पर पंडित जी ने कान तक नहीं दिए और अपने काम में लगे रहे। भीड़ एक-एक कर प्रसाद और फूल समेटे छन्टने लगी ।।
      तीनों बहुत देर तक इधर-उधर कोशिश में रहे कि शायद कोई पंडित कपाट खोल दे पर वह बंद कपाट फिर नहीं खुले।।
     ना चाहते हुए भी बांसुरी के मन में अजीब सा संशय घर कर गया,, उसे वह अपशगुन वाली बात अच्छी नहीं लगी।। बार-बार उसके मन में यह डर बैठने लगा कि कहीं फिर से वह राजा को खो ना दे।।

   तीनों वहां से निकल कैब बुक कर सिद्धार्थ के घर पहुंच गए।।
       उनके वहां पहुंचने तक में लगभग सभी मेहमान आ चुके थे ।।अपने साथ के लोगों के साथ राजा भी बातचीत में व्यस्त हो गया।।

नायर– क्या बात है आरके!! तुम तो बहुत पंक्चुअल हो आज कैसे लेट हो गए??

राजा– सर हम निकल तो टाइम पर गए थे पर एक बिल्ली रास्ता काट गई।।

    हँसते हुए राजा ने बांसुरी को देखा और वापस अपने साथियों के साथ बातों में लग गया।।
    बनावटी गुस्सा दिखाते हुए बांसुरी भी माला के साथ रसोई में सिद्धार्थ की माँ की मदद करने चली गयी।।

     रसोई मे तीनों औरते खाने की तैयारियों मे लग गयी,वहीं बातों बातों मे माला ने सिद्धार्थ की माँ को मन्दिर वाला किस्सा भी कह सुनाया जिसे सुन उन्होनें भी माला की अपशगुन वाली बात पर अपनी मोहर लगा दी,इस सब को सुन कर बांसुरी का मन और बुझ गया,अब वो किसी भी हाल में राजा से अलग नही होना चाहती थी….आखिरकार उसने सोच लिया कि किसी तरह आज राजा रुक जाये,क्योंकि ऐसे अपशगुन के साथ यात्रा करना कहीं से भी सही नही रहेगा,,अगर दो दिन राजा रुक जाये तो वो भी छुट्टी लेकर उसके साथ ही कानपुर चली जायेगी।।
    ऐसा सोचने के बाद उसके मन को तसल्ली मिली और एक बार फिर वो पूरे उत्साह से अपने काम में लग गयी।

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        सिद्धार्थ की मां को बांसुरी पहली ही नजर में बहुत भा गई थी वो रसोई में बहुत उत्साह से हर एक दक्षिण भारतीय व्यंजन की रेसिपी और उसके पोषक तत्वों की व्याख्या संदर्भ सहित बांसुरी को समझाती रही।
     सिद्धार्थ को कब क्या खाना पसंद है ,कब ब्लैक कॉफ़ी पीता है कब दूध वाली ,ये सब कुछ सिलसिलेवार बांसुरी को महा उत्साह से बताती उसकी माँ चह्कती रहीं।।बांसुरी के अपने मन में राजा चल रहा था,आगे के दो दिन राजा के साथ कैसे गुजरेंगे उसी खुशी में अपने में मगन बांसुरी भी पूरी लगन से उनकी बातें सुनती रही और कहीं उन्हे ये ना लगे की वो कहीं और खोयी है इसलिये बीच बीच मे अपनी तरफ से सवाल भी करती गयी।।

    जब सारे लोग बैठक में खाने पीने में लगे हुए थे बांसुरी ने इशारे से राजा को बालकनी मे बुलाया और अपनी घबराहट, और उसके दो दिन बाद साथ साथ निकलने वाला प्रस्ताव भी रख दिया, जिसे राजा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया__

राजा– बस इतनी सी बात !! राजा ने मोबाईल निकाल और अपनी शाम की फ्लाइट कैन्सिल कर दी ।।

राजा– अब आज रात को सुकून से बैठ कर दो दिन बाद की तुम्हारी हमारी टिकट बुक कर लेंगे।।अब खुश!!

बांसुरी– बहुत बहुत खुश!!

   बैठक में धीमी धीमी आवाज़ में बजते गाने को सुन अपने धड़कते दिलों  को काबू करते दोनों ही अलग अलग जाकर बैठ गये।।

       ख़्वाब है तू, नींद हूं मैं
        दोनों मिले रात बने
        रोज़ यही मांगूं दुआ
     तेरी मेरी बात बने, बात बने

        मैं रंग शर्बतों का
     तू मीठे घाट का पानी
       मैं रंग शर्बतों का
    तू मीठे घाट का पानी
    मुझे खुद में घोल दे तो
   मेरे यार बात बन जानी

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क्रमशः

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aparna..

जीवनसाथी-124

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  जीवनसाथी-124

       राजा साहब के कार्यालय में मीटिंग पर मीटिंग चल रही थी अब लगभग उनके मंत्रिमंडल का गठन हो चुका था और शपथ ग्रहण का समय भी आ गया था।

     अगला दिन बहुत महत्वपूर्ण था राजा के लिए। राजनीति में उसकी पारी की शुरुवात होने जा रही थी। आज तक वो अपने महल और रियासत की साज सम्भाल करता आया था लेकिन अब वो सरकार बनाने जा रहा था। अब वो पूरे एक राज्य को संभालने जा रहा था।
    अपने काम समेट कर वो कमरे में पहुंचा तब बाँसुरी बच्चे को गोद में लिए इधर से उधर टहलती उसे सुलाने की कोशिश कर रही थी।
   बाँसुरी ने राजा को देखा और मुस्कुरा उठी…-“आजकल तो राजा साहब के दर्शन मिलने कठिन हो गए हैं। “
  राजा मुस्कुरा कर हाथ मुहँ धोने चला गया… उसके बाहर आते ही बाँसुरी एक बार फिर शुरू हो गयी…
” कल रात आप सोने भी नही आये? कहाँ रह गए थे?

राजा ने अपने बाल पोंछते हुए उसे देखा और फिर बच्चे को गोद में ले लिया…-” कल काम बहुत ज्यादा था। सारा काम निपटाने के बाद आदित्य, रेखा और केसर के पिता से मिलने की ज़िद लिए भी बैठा था तो रात में सारा काम में निपटने के बाद समर और आदित्य के साथ रेखा के पिता से मिलने चला गया था। हालांकि वह खुद भी यही सोच रहे थे कि वह एक-दो दिन में महल आएंगे, लेकिन हम लोगों के जाने से वो खुश नजर आए। वह अपने घर वापस लौटना चाहते थे उन्होंने अपने मन की बात हम लोगों के सामने ही कहीं तो आदित्य ने उसी समय कह दिया कि चले हम आप को छोड़ देते हैं। उसके बाद उन्हें लेकर उनके घर तक गए। वहां पर नौकरों से कहकर सब कुछ ठीक-ठाक करवाया फिर वहां से वापस लौटते में हम लोगों को बहुत देर हो गई थी। रात में दो बजे फिर मैंने सोचा तुम्हें आधी नींद से जगाना सही नही होगा इसलिए ऑफिस में ही सो गया।”

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” हम्म ! मैं परेशान न हो जाऊं इसलिए ऑफिस में ही सो गए! मैं तो इस बात से और ज़्यादा परेशान हो गयी। रात में उठ उठ कर आपको रिंग करती रही। “

राजा को याद आया उसका फ़ोन बंद हो चुका था..-” ओह्ह मेरा तो फ़ोन ही बंद पड़ा था।”
” जी हाँ! अब आप मुझे अपना फ़ोन असिस्टेंट ही बना लीजिए। आपके कॉल्स देखा और संभाला करूँगी। “
” अभी तो बस मुझे संभाल लीजिये हुकुम। उतना ही काफी है।”
  राजा ने सो चुके शौर्य को बिस्तर पर रखा और बाँसुरी को बाहों में भर लिया। दोनों खिड़की पर खड़े बाहर निकलते चांद को देख रहे थे। बाँसुरी की कुछ उलझी सी लटें उसके माथे पर इधर उधर हवा से उड़ कर उसे परेशान कर रहीं थीं। राजा ने उन्हें उंगली से उसके कान के पीछे समेट दिया… उसकी उंगलियां बाँसुरी की गर्दन पर फिसलने लगी कि उनका नन्हा राजकुमार नींद में कोई सपना देख डर के मारे चिल्ला कर रोने लगा, और बाँसुरी राजा को एक तरफ कर बच्चे के पास भाग गई…
” आजकल हमारी हुकुम के पास हमारे लिए वक्त नही है।”
“हाँ जैसे आपके पास ढेर सारा वक्त है।”
” नन्हे नवाब नही चाहते कि प्रोपर्टी में उनका कोई हिस्सेदार आ जाये। बस जैसे ही पापा मम्मी पास आये की बुक्का फाड़ दहाड़ लगातें हैं।”
  राजा की बात सुन बाँसुरी ने मुस्कुरा कर शौर्य को गोद में लिया और वापस उसे सुलाने की कोशिश में लग गयी…-“साहब सो मत जाना। मैं बस इसे सुला कर अभी आयीं।”
   बाँसुरी ने इधर उधर टहलते हुए आखिर बच्चे को सुला ही लिया।
   वो उसे बिस्तर पर रखने आई की देखा राजा गहरी नींद में डूबा किसी मासूम बच्चे सा नज़र आ रहा था। उसका माथा चूम कर वो कमरे की बत्तियां बुझाने चली गयी।

****

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          अगली सुबह राजा का पूरा दिन व्यस्त गुजरना था।
   शपथ ग्रहण होना था। इसी से वो तैयार होकर सुबह ज़रा जल्दी ही निकल रहा था। उसके साथ उसके मंडल के बाकी सदस्य और समर प्रेम भी थे। युवराज और आदित्य भी उनके साथ हो लिए थे।
   विराज के पास भी और कोई चारा नही बचा था।  रूपा ने ही राजा को टीका लगाया,बाँसुरी उसके पास खड़ी मुस्कुरा रही थी।
  रेखा भी वहीं थी…-“तुमसे एक बात पूँछे बाँसुरी?”
” हाँ पूछो रेखा।”
” राजा साहब को तुमने बताया क्यों नही कि आज तुम्हे शौर्य को वैक्सीन लगवानी है? क्या अकेले ही वैक्सीन लगवाने जाओगी। “
“वैसे जाना क्यों पड़ेगा भला ? तुम्हारे बुलाने पर डॉक्टर यहीं आ जाएंगे। “रूपा ने रेखा की बात पर बाँसुरी की तरफ देख कर कहा। अब तक राजा और उसकी सेना वहाँ से निकल चुकी थी।
  ” जी भाभी साहब ! पिया से बात कर लुंगी, वो भेज देगी किसी को। और जहाँ तक साहब को रोकने की बात है रेखा, वो मैंने जानबूझ कर नही किया।
  हम औरतों से यहीं तो गलती हो जाती है। जब हमारे पति हमसे और हमारे बच्चे से अधिक समय अपने काम को देने लगतें हैं तब हम उनकी मजबूरी समझे बिना ज़बरदस्ती उन पर अपने काम लादते चले जाते हैं! बस फ़िज़ूल की अपनी महत्ता दिखाने! और ऐसे में होता कुछ नही बस सामने वाले का तनाव बढ़ता है । हम हमेशा अपने आप को महत्वपूर्ण दिखाने के लिए पतिदेव के कामों को समझे बिना उन पर अपना बोझ भी ला देते हैं और मुझे यह हम औरतों की बेवकूफी लगती है।
   मुझे तो शुरु से पता था कि आज शपथ ग्रहण है । इसलिए साहब के पास वक्त नहीं होगा इत्तेफाक से आज ही शौर्य की वैक्सीनेशन की डेट भी है। अब अगर मैं इस वक्त साहब से यह उम्मीद करूं कि पहले वह मेरे साथ बच्चे को वैक्सीनेट करवाएं और उसके बाद सदन में जाएं तो यह तो गलत उम्मीद है ना।
मैं यह भी जानती हूं कि अगर मैं साहब को बता देती तो उनका मन शपथ ग्रहण में नहीं लगता। और बार-बार उनका मन उनके लाडले की तरफ लगा रहता।  ऐसे में परेशान होकर वह मुझे फोन करते और अपना खुद का वक्त भी बर्बाद करते , इसीलिए मैंने उनसे कुछ कहा ही नहीं। और फिर मेरे साथ रूपा भाभी साहब है, तुम हो, फिर मुझे किस बात की चिंता?”

” तुम्हारी बातें सुनकर हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है बांसुरी! हमने पति पत्नी के रिश्ते को कभी इस नजरिए से देखा ही नहीं। हमने हमेशा यही सोचा कि हमारा सबसे पहला हक है विराज सा पर और बाकियों का हमारे बाद। लेकिन तुमने अपने राजा साहब पर सारी दुनिया को हक जताने दिया, और खुद हर वक्त उनके किनारे खड़ी रही, उनका सहारा बनकर। और इसीलिए तो आज इतनी सारी जिम्मेदारियां होने के बाद भी राजा साहब सब कुछ मुस्कुराते हुए निभा ले जाते हैं।
      तुम दोनों सच्चे अर्थों में “जीवन साथी” हो ! ऐसे साथी जिनके जुड़ने से एक दूसरे का जीवन संवर गया।”

” धन्यवाद रेखा।  ऐसा तुम्हें लगता है कि हम दोनों बहुत परफेक्ट है। पर ऐसा नहीं है । हम दोनों में भी कमियां हैं , और थोड़ी  नहीं बहुत सारी हैं। लेकिन हमने एक दूसरे को एक दूसरे की कमियों के साथ स्वीकार किया है। और मजे की बात यह है कि हम एक दूसरे की कमियों को सुधारने की कोई कोशिश नहीं करते। क्योंकि जब हम सामने वाले की कमियों को सुधारने की कोशिश करने लगते हैं, तो हम उसे बदलने की कोशिश करने लगते हैं। और यहीं पर जाकर बातें बिगड़ जाती हैं । जो जैसा है अगर हम उसे वैसे ही स्वीकार लें, और पूरे मन से स्वीकार लें तो हमारी जिंदगी आसान हो जाती है।
    और दूसरी बात एक दूसरे की कमियां सुधारने की जगह अगर हम अपनी कमियों पर काम करना शुरू कर दें तो जिंदगी और आसान हो जाती है।  मैं तुमसे बहुत दिनों से एक बात कहना चाह रही थी पता नहीं तुम मेरी बात समझ पाओगी या नहीं।”

“कहो ना बाँसुरी! बेझिझक कहो क्योंकि अब हम देवरानी जेठानी से ज्यादा सहेलियां बन गई हैं।”

” बस उसी सहेली वाले रिश्ते के लिए तुमसे कह रही हूं कि केसर ने तुम्हारे लिए जो सोच रखा है उसे पूरा करने के लिए कोशिश तो करके देखो।

“पर हमने आज तक कोई काम नहीं किया बांसुरी हमें किसी भी चीज का कोई अनुभव नहीं है।”

“अनुभव लेकर कोई भी पैदा नहीं होता रेखा। अनुभव काम करने से आता है , तुम्हें क्या लगता है मुझे कलेक्ट्री का बहुत अनुभव था। कुछ भी नहीं था। मैंने बहुत सारी गलतियां की हैं लेकिन अपने काम में  डटी रही। “

“अरे हां तुम्हारी छुट्टियां कब तक है?”

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“पूरे 6 महीने की छुट्टियां मिली है मुझे! और इन छुट्टियों में यह छोटा सा नन्हा सा राजा साहब भी संभलने लायक तो हो ही जाएगा। उसके बाद देखूंगी अगर यह छोड़कर जाने लायक हुआ तब तो ऑफिस ज्वाइन करूंगी वरना एक दो महीने की और छुट्टियां बढ़ा लूंगी। अब कल से तुम भी एनजीओ का काम देखना शुरू करो। “

  रेखा को खुद के ऊपर इतना भरोसा तो नहीं था लेकिन बांसुरी की बात सुनकर उसे लगा कि उसे वाकई अपने और अपनी केसर दीदी के लिए कुछ करना ही होगा।


*******

दिन बीतते देर नहीं लगती और खासकर जब कोई किसी काम में व्यस्त हो तब तो समय का पता भी नहीं चलता ।
   आदित्य ने केसर की बॉडी के बारे में रेखा से कोई अधिक चर्चा नहीं की थी क्योंकि वह नहीं चाहता था कि वो रेखा को किसी भी तरह की उम्मीद दे । क्योंकि अगर यह वाकई केसर की बॉडी होगी और वह रेखा से यह कह जाएगा कि यह केसर नहीं है तो रेखा फिर से एक उम्मीद में जी उठेगी और कहीं उसकी उम्मीद पूरी नहीं हुई तो वह वापस टूट पड़ेगी इसलिए आदित्य ने इस बारे में रेखा से कुछ भी नहीं कहा।
   
     विराज अपने कामों में व्यस्त था और अब रेखा ने उससे किसी भी तरह की कोई भी उम्मीद रखनी छोड़ दी थी। रेखा का बेटा अब स्कूल जाने लगा था और इसलिए रेखा के पास भी वक्त था और इसलिए उसने केसर के दिए सारे कागजों को सरसरी तौर पर देखना शुरू किया।
      रेखा अक्सर केसर की यादों में डूब जाया करती थी। उसे हमेशा लगता कि केसर दुनिया के लिए बेशक गलत थी लेकिन अपने खुद के परिवार के लिए उसने कितना कुछ किया था। आज तक देखा जाए तो रेखा ने अपने पिता के लिए कुछ भी नहीं किया था। क्योंकि केसर ने उसे करने का कुछ मौका ही नहीं दिया। और अब जब रेखा के पास मौका था कि वह केसर और अपने पिता के लिए कुछ कर सकती थी तब भी केसर उसके लिए ही इतना कुछ छोड़ कर चली गई ।
        ऐसे ही एक शाम जब रेखा केसर को बहुत याद कर रही थी, तब अपने पिता से मिलने चली गई उसके पिता भी रेखा को देखकर खुश हो गए और उन्होंने केसर के सारे बिजनेस के पेपर और एनजीओ के कागज भी रेखा के हवाले कर दिए…;” अब हमसे यह सब संभाला नहीं जाता बेटा, अगर हो सके तो तुम अपना यह बिजनेस ही संभाल लो। हम जानते हैं तुम महलों की रानी हो। तुम्हें काम करने की कोई जरूरत नहीं है लेकिन फिर भी घर का बिजनेस है हमसे अब सम्भल नहीं पा रहा।  केसर ने बड़े प्यार से संवारा था इस सारे काम को तो अगर तुम चाहो…

रेखा ने अपने पिता की बात आधे में ही काट दी… “जी पिता साहेब आप चाहते हैं तो हम यह काम कल से ही संभाल लेंगे। बस एक बार घर पर सभी से पूछ लें।”

   रेखा ने वापस लौट कर बांसुरी से इस बारे में बात की। बांसुरी और रूपा यह सुनकर बहुत खुश हुए। वहाँ तो सभी ये चाहते थे कि रेखा अपने खोल से बाहर निकले।
    उसी शाम खाने की मेज पर रेखा ने अपने काम को शुरू करने की बात वहां मौजूद सभी लोगों के सामने रखी और युवराज से आग्रह किया कि वह उसे अपना काम करने की अनुमति दें। युवराज इस बात पर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने रेखा  के सिर पर हाथ रख दिया…-” आप हमारी छोटी बहन जैसी है रेखा! आपको कहीं किसी मोड़ पर भी हमारी जरूरत पड़े तो आप बेझिझक कहिएगा ! हम जानते हैं कि केसर ने बहुत मजबूती से अपना बिजनेस खड़ा किया है, आप उस बिजनेस को बहुत आगे ले जाएंगी। हमारा आशीर्वाद आपके साथ है।
   एक तरह से अब उस परिवार में युवराज ही सबसे बड़ा था और उस से अनुमति लेने के बाद ही वहां के सारे कार्य संपन्न होते थे। रानी मां की मौत के बाद महाराजा साहब अब खाने की टेबल पर नहीं आया करते थे। उनका खाना हर वक्त उनके कमरे में पहुंचा दिया जाता था। दादी साहब भी बहुत बुज़ुर्ग हो गई थी। इसलिए उनका भी कमरे से बाहर आना जाना कम ही हुआ करता था। खाने की टेबल पर बाकी सभी लोगों के साथ अब महाराजा साहब की कुर्सी खाली जरूर होती थी लेकिन उनकी बाजू वाली कुर्सी पर युवराज ही बैठा करता था।
   राजा अजातशत्रु अब मुख्यमंत्री बन चुके थे और इसलिए उनकी व्यस्तताएं अलग तरीके से बढ़ गई थी। कई बार कार्य की अधिकता के कारण उन्हें अपने मुख्यमंत्री आवास पर ही रुकना पड़ता था। तब ऐसे में वह अपने ड्राइवर को भेजकर बांसुरी और अपने छोटे नवाब को भी अपने पास बुला लिया करते थे। और दो-चार दिन के काम को निपटाने के बाद उनका परिवार वापस महल आ जाया करता था।
    बहुत बार जब वह दूसरे प्रदेशों के दौरे पर होते थे तब बांसुरी महल में ही रहा करती थी।
  ऐसा ही कोई जरूरी काम था जिसके सिलसिले में राजा अजातशत्रु को दिल्ली के दौरे पर जाना पड़ा था। उन्होंने विराज से भी साथ चलने की गुजारिश की थी लेकिन विराज उनके साथ नहीं गया था। महल में होने के बावजूद वह रात्रि के सह भोज में कभी भी समय पर नहीं पहुंचा करता था जब उसका मन किया करता वह सब के साथ खाने चला आता और कभी अपने कमरे में ही अपना खाना मंगवा लिया करता था।
   आज भी जब रेखा ने सबके सामने अपना काम शुरू करने की बात रखी विराज अपने कमरे में बैठा शराब में डूबा पड़ा था। सब का आशीर्वाद और सहमति देखा प्रसन्नता से विभोर होती वह अपने कमरे में चली गई थी।
 
            विराज को एक तरफ सोफे पर बेसुध पड़ा देख उसका मन वितृष्णा से भर गया।
क्यों उसका मन अपने ही पति के लिए स्नेह से नहीं भर उठता है। उसकी समझ से परे था। ऐसा तो नहीं था कि उन दोनों के बीच हमेशा सिर्फ तकरार और लड़ाई झगड़े ही हुआ करते थे। कुछ प्यार भरे लम्हे भी तो बीते थे उनके बीच, और आज भी बीतते थे।  जब कभी विराज नशे में नहीं होता था तब वह रेखा से बहुत प्यार से पेश आता था।
   तब उसे रेखा बहुत सुंदर भी नजर आती थी। रेखा कि हर बात भी अच्छी लगती थी। लेकिन अक्सर उनके साथ होता था कि जब वह शांत बैठे बातचीत करने लगते थे तो जाने कैसे बातें ऐसा मोड़ ले लेती थी कि दस मिनट में ही उनकी बातों में टकराव आ जाता था कभी रेखा भड़क उठती थी तो कभी विराज।
   शायद इसी को कहते हैं मन का मेल ना हो पाना। तन तन से जुड़ चुके थे। दोनों की अपनी ज़रूरतें थी और उन्हें पूरा भी कर लिया जाता लेकिन मन का मेल कभी नहीं हो पाया था और शायद इस जीवन में अब कभी होना भी नहीं था।
    रेखा की सहायिका उसके बेटे को सुला कर जा चुकी थी। विराज की बोतल एक तरफ लुढ़की पड़ी थी। उसकी आधी खाई प्लेट भी एक ओर पड़ी थी। रेखा ने सहायिका से कह वो सब साफ करवा दिया। विराज सोफे पर ही सो चुका था।
   रेखा भी कपड़े बदल कर सोने चली गयी। अगले दिन से उसका काम शुरू होना था।

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*****

  
     बड़े दिनों के बाद समर को फुरसत मिली थी उसने पिया को कॉल लगा लिया…-“क्या बात है? आज मंत्री जी ने खुद फ़ोन किया है? कुछ तो गड़बड़ है।”
” क्या यार शर्मिंदा मत करो। मैं तो हमेशा कॉल करना चाहता हूँ,मिलना चाहता हूँ पर जानती तो हो वक्त की कितनी कमी है।”
“जानती हूँ तभी तो मैं भी सुबह शाम फोन कर कर के परेशान नही करती। वरना मन तो मेरा भी करता है कि मैं अपने क्यूट बेबी से रोज़ पूंछू ” मेरे शोना बाबू ने खाना खाया!”
” ओह्ह रियली ! तुम्हें ऐसा बोलना अच्छा लगता है?”
” ऑफकोर्स ! गलत क्या है इसमें। इट्स क्यूट यार। अब आजकल सोशल मीडिया पे बाबू शोना का मज़ाक उड़ाने का ट्रेंड चल रहा है, जिसे देखो वही “बाबू शोना ” जोक्स बना रहा मीम्स बना रहा, इसका मतलब ये थोड़े न हो गया कि मुझे अच्छा नही लगता। और एक मज़े की बात ये जो लोग आज ऐसी बातों का मज़ाक बनाने वाले ही कभी खुद ऐसी बातें करते रहें होंगे। खैर वो छोड़िए मंत्री जी आप बताइए कैसे फ़ोन किया ?”
” मिलना था तुमसे।”


” अरे वाह! तो आ जाइये फिर !”
” अभी तो हॉस्पिटल में होंगी ना?”
” हॉं ! बस दस मिनट में वापस निकलूंगी। किसी कॉफी शॉप में मिल लें।”
” न न ! अकेले मिलना है। तुम्हारे रूम पर आ जाऊँ?”
” बड़े शरारती हो रहें हैं आप। क्या बात है?”
” बस वही, जो तुम समझ रही हो।”
” आज कॉफी शॉप पे मिल लेतें हैं। बहुत दिन से साथ में कोल्ड कॉफी नही पी।”
“मतलब तुम नही चाहती कि मैं तुम्हारे रूम पर आऊं?”
“अरे नही बाबा! ऐसा कुछ नही है, चलिए ठीक है रूम पर ही आ जाइये। कब तक आएंगे।
” दस मिनट में पहुंचता हूँ। आज ज़रा फ्री हूं तो सोचा तुम से ज़रा अच्छे से मिल लिया जाए।
” दस मिनट बस ! नही रुकिए , आप बीस मिनट में आइये। तब तक मैं भी पहुंच जाऊंगी। “
” अरे मैं तुम्हें लेता हुआ चलता हूँ ना। क्या प्रॉब्लम है? “ओके!”
   पिया ने तुरंत फ़ोन रखने के बाद अपनी काम वाली दीदी को फ़ोन लगाया। वो चार दिन से नदारद थी। पिया के अस्पताल की सीनियर डॉक्टर छुट्टी पर गयी थीं, इसी से अस्पताल में भी भारी मगजमारी हो रही थी। और घर की साफ सफाई नही हो पा रही थी।
छोटा सा फ्लैट था। चार दिन से वो खुद बर्तन ज्यादा न निकलें इसलिए कभी मैगी तो कभी सैंडविच पर गुज़ारा कर रही थी। और चारो दिन के बर्तन सिंक पर पड़े अपनी किस्मत को रो रहे थे।
   घर के कामों से उसे वैसे भी मौत आती थी। उसकी मेड ही सुबह उसका बिस्तर ठीक करने से लेकर साफसफाई बर्तन खाना बनाना सब किया करती थीं।
  पिया को घबराहट सी होने लगी। समर ऐसे उसके साथ गया तो उसका कबाड़ घर देख कर क्या सोचेगा? उसे लगेगा छि कितनी गंदी है। जब घर सही नही रख सकती तो शादी क्या निभाएगी।
   मेड को दो बार पूरी रिंग देने पर भी उस नामुराद ने फ़ोन नही उठाया।
  गिरती पड़ती पिया अपना एप्रन उठाये वहाँ से घर के लिए भागी…
   उसका फ्लैट दो गलियों के बाद ही था, वैसे वो कई बार पैदल ही आ जाया करती थी पर अधिकतर स्कूटी से ही आती थी। आज स्कूटी भी उसकी सामने रहने वाली आँटी का बेटा मांग कर ले गया था।
    जान हथेली पर लेकर वो मरती पड़ती अपने फ्लैट की तरफ भागी। जाते जाते ही उसने समर को मैसेज कर दिया कि एक केस आ गया है, आधा घंटा लगेगा।
   भाग कर वो घर पहुंची, दरवाज़ा खोलते ही उसका सिर घूम गया।
   दो दिन के धुले कपड़े सामने काउच पर अंबार लगाए पड़े थे। सामने टेबल पर एक तरफ किताबें, न्यूजपेपर्स,  चिप्स के पैकेट्स, कुछ अधखुली बिस्किट्स के रैपर, कोल्ड ड्रिंक्स के कैन पड़े हुए थे।

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    उसे भी तो अजीबोग़रीब शौक थे। सुबह उठ कर उसे रनिंग भी करनी होती थी लेकिन रातों को उल्लू के समान जाग कर टीवी पर आंखें भी फोड़नी होती थी। और मूवीज़ के साथ उसके मुहँ कान चलते ही रहते थे।  फटाफट खुद पर बड़बड़ाती पिया इधर उधर फैला कबाड़ समेटने में लग गयी कि उसका फ़ोन बजने लगा….-” मैनूं डर जेहा लगदा ए, दिल टूट न जाये वेचारा।” उसने तुरंत कॉल लिया और स्पीकर में डाल दिया।
  ” क्या कर रही थी मेरी बच्ची?”
” मम्मी घर साफ कर रही थी यार, प्लीज़ अभी फ़ोन रखो बिज़ी हूँ।”
” हैं ? तू घर साफ कर रही थी? झूठ मत बोल!”
” सच्ची कह रही हूँ मम्मी।”
” सुन सुन फ़ोन न रखियो ,मैं वीडियो कॉल ट्रांसफर कर रही हूँ। एक बार न तुझे घर साफ करते देखने की बड़ी तमन्ना है।”
” हद करते हो यार मम्मी आप? दुनिया की कौन सी माँ होगी जो अपनी बच्ची को काम करते देख खुश होती है?”
” बेटा जी। ये हम माओं से पूछो, हर माँ के कलेजे में ठंडक पड़ जाती है जब उसकी बेटी अपने हाथ से पानी लेकर पीती है। सच्ची स्वर्ग का सुख मिल जाता है।”
” ओह्ह मेरी फेकता भरपूर माँ! अपने डायलॉग अपने पास संभाले रखो और मुझे काम करने दो।”
” पर ये तो बता आज सूरज पश्चिम से निकला क्या जो तू साफ सफाई में लगी है।अच्छा अब समझी पक्का समर आने वाला होगा मिलने।”
   पिया अपनी जीभ काट कर रह गयी। ये मम्मी हर बात समझ कैसे जाती है।
” अच्छा सुन तू अपना काम निपटा ले , और सिर्फ हॉल की सफाई करके छोड़ न दियो, अपना कमरा रसोई और बाथ रूम भी साफ कर लेना।”
अब यार ये मम्मी ने अलग ही पेंच डाल दिया। अब बाथरूम साफ करने की क्या ज़रूरत?
   इतनी सारी सफाई के बाद उसे खुद भी तैयार होना था और वापस अस्पताल भागना था, जिससे समर के साथ फ्लैट पर वापस आये तो समर भी उसका चमकीला घर देख कर खुश हो जाये, लेकिन अभी तो हॉल भी साफ नही हो पाया था। वो धड़ाधड़ हाथ चला रही थी कि दरवाज़े पर बेल बज गयी और उसका दिल धक से रह गया।
    ” नहीईईई ….  उसे सरप्राइज देने के लिए कहीं मंत्री जी अस्पताल में पता करके उसे ढूंढते यहाँ तो नही चले आये।
   हे भगवान! ऐसे फ़िज़ूल स्यापे उसी की किस्मत में क्यों लिखें हैं।।।
    अब इतना तबाहो बर्बाद घर देख कर समर के दिल का रोमांस हवा न हो जाये।
  वो सोच ही रही थी कि वापस कॉल बेल बज गयी….

क्रमशः

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aparna

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दिल से ……

       कैसे है आप सब दोस्तों!!
  
   कल हमारे  समाज की अंताक्षरी प्रतियोगिता में भाग लेने का मौका मिला। और क्या कहूँ इतना मज़ा आया।
    गानों के साथ वैसे भी मेरा कनेक्शन बड़ा पक्का है। बॉलीवुड तो लगता है मेरे खून में घुला है।
    हमारी पांच लोगों की टीम थी, खूब धमाल हुआ खूब मस्ती की। कुल जमा 17 टीम्स थी। एक से एक धुरंधर पुराने गानों के सुर सम्राट टाइप।
  लेकिन  हम दूसरी पोजीशन के साथ जीत गए। इक्कीस सौ रुपये हमने जीते। और सासु माँ ने सभी के सामने बड़े लाड़ से प्यार भरा आशीर्वाद दिया। मौसी सास और मामी सासों ने आकर गले से ही लगा लिया।
    ज़माना बदल गया है भाई, अब बहु को रोटी बनानी न भी आये तो सासु जी बड़े प्यार से सम्भाल लेती हैं। अरे बेचारी को किताबों से फुर्सत मिलती तब तो रोटी बेलना सीखती।
   न ऐसा नही है कि कुछ नही आता।
   लेकिन जिन चीजों पर मास्टरी है वो किसी काम की नही हैं।

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    मेरे साथ अक्सर होता है कि जब तक मैं रसोई पर खड़ी उबलते दूध पर नज़र रखी होतीं हूँ, सीधे सादे बच्चे सा चुपचाप पड़ा रहता है। और जैसे ही फोन की बीप सुन बाहर निकलती हूँ, कमबख्त सुनामी से टक्कर लेता उफान मार मार के गिर पड़ता है।
    क्या आपके साथ भी होता है?

  चलिये जल्दी ही मिलतें है कहानी के अगले भाग के साथ तब तक पढ़ते रहिये ….
 
   मैंने किसी ज़माने में एक फ़िज़ूल सी हॉरर भी लिखी थी ” थैंक यू” अगर आप लोग चाहे तो वो भी पलट सकतें हैं। ( उनके लिए जो मुझसे हॉरर लिखने की गुज़ारिश करतें हैं)

   आपके ढेर सारे प्यार, समीक्षा स्टिकर्स के लिए दिल से आभार , शुक्रिया नवाज़िश

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aparna ….


    

शादी.कॉम – 26

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शादी डॉट कॉम-26


      
     “मल्टीनेशनल बैन्क्स की तर्ज पर खालिस देसी बैंक भी अपने कर्मचारियों को इस तरह की पार्टी और आयोजन का झुनझुना पकड़ा कर अत्यधिक परिश्रम  कार्य से होने वाली  मानसिक और शारीरिक थकान को दूर करने का सरल उपाय सिखाने की आड़ में उन पर क्षमता से अधिक कार्य थोप रहे हैं,” उस विषय पर प्रस्तावित अन्तिम दिन की कार्यशाला में सारे आयोजन उसी हिसाब से रखे गये थे।।

   पांचवे दिन के ट्रेनिंग सेशन के अंत में सभी की डिनर की व्यवस्था पास के ही एक फाईव स्टार होटल  में की गयी थी,हल्की फुल्की साज सज्जा के साथ ही बैंक कर्मियों में से कुछ एक द्वारा गीत संगीत पेश करने की भी तैयारी थी,इसके अलावा सवेरे के विषय को अनुपूरक करने कुछ एक छोटे मोटे सहभागिता गेम्स का भी आयोजन किया गया था।।
ये पार्टी पूरी तरह से पारिवारिक थी जिसमे कर्मचारी चाहें तो अपने परिवार को भी लेकर आ सकते थे।

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     तीसरे दिन के अपने सेशन के बाद लंच किये बिना ही राजा जो गया था वो चौथे दिन भी बांसुरी को नही दिखा था,ये कैसा बदला ले रहा था वो,जब तक लिस्ट मे बांसुरी का नाम नही था वो मौजूद था और उसका नाम जोड़ने के बाद खुद गायब हो गया था।।
     पर अन्तिम दिन सारी टीम की उपस्थिति अनिवार्य थी,इसीसे बांसुरी को उम्मीद थी,कि आज तो वो आयेगा और हुआ भी वही,राजा आ गया।।

     ऐश ग्रे साड़ी में धागे से बने गुलाबी बूटे बहुत सुंदर लग रहे थे,और उस साड़ी में संवरी बांसुरी भी।।
    माला और बांसुरी साथ ही बैठे थे कि माईक हाथ में लिये सिद्धार्थ ने गाना शुरु कर दिया

        कब कहाँ सब खो गयी
      जितनी भी थी परछाईयाँ
      उठ गयी यारों की महफ़िल
         हो गयी तन्हाईयाँ
       क्या किया शायद कोई
         पर्दा गिराया आपने

      दर्द-ए-दिल, दर्द-ए-जिगर
         दिल में जगाया आपने……….

  हर एक अंतरे पर बांसुरी को निहारता सिद्धार्थ बडे लय में अंदाज में  गा रहा था…..
    बांसुरी सोच ही रही थी कि अच्छा है राजा नही है,वरना सिद्धार्थ की इस बेशर्मी पर जाने उसके बारे में क्या कुछ सोच बैठता,अभी ऐसा सोच के उसने अपने बालों को पीछे किया ही था कि उसके पीछे थोड़ा हट के एक टेबल से टिक के खड़े राजा पर उसकी नज़र पड़ गयी।।
      गहरे ग्रे रंग की शर्ट और काली पैंट में खड़े राजा पर से उसकी आंखें एकाएक हट नही पायीं।।
     तब तक में राजा ने भी उसे देख लिया लेकिन तुरंत ही दुसरी तरफ मुहँ फेर किसी से बातों मे लग गया।।

      पहले दूसरे दिन तो ऐसी निर्लिप्तता नही दिखा रहा था,अचानक ऐसा क्या हो गया ….
     आज अन्तिम दिन था,आज के बाद राजा वापस चला जायेगा,आज ही का दिन है और यही कुछ पलछिन जिनमें वो अपनी बिगडी बना सकती है,पर क्या करे?? कैसे कहे?? कि राजा आज भी हमे फर्क नही पड़ता कि तुम बैंक अधिकारी हो गये!! तुम्हारी नौकरी लग गयी!!
    हमारे लिये तो आज भी तुम हमारे कानपुर के हमारी गलियों के वही राजा हो,कभी जिसकी ज़ुल्फों के साथ हमारी सांसे ऊपर नीचे होती थी।।

    अपनी सोच मे गुम बांसुरी को अचानक स्टेज की तरफ जाते राजा दिखा और तभी सिद्धार्थ ने राजा को गाने के लिये माईक थमा दिया,थोड़ी ना नुकुर के बाद राजा ने माईक संभाल लिया__


       बावरा मन राह ताके तरसे रे
      नैना भी मल्हार बन के बरसे रे
    आधे से अधूरे से, बिन तेरे हम हुए
    फीका लगे है मुझको सारा जहां
     बावरा मन राह ताके…

     ये कैसी ख़ुशी है, जो मोम सी है
    आँखों के रस्ते हँस के पिघलने लगी
      मन्नत के धागे, ऐसे हैं बाँधे
   टूटे ना रिश्ता जुड़ के तुझसे कभी
     सौ बलाएँ ले गया तू सर से रे
          नैना ये मल्हार…

गाने के प्रवाह में खोयी बांसुरी की नज़र राजा पर से हट ही नही पा रही थी,और वो था कि गाते समय उसने एक बार भी उसकी तरफ देखना ज़रूरी नही समझा।।

     डिनर के लिये कर्मियों के परिवारों का भी निमन्त्रण था,बहुत से कर्मचारी अपने बीवी बच्चों के साथ आये हुए थे।।
     
   राजा ने अपना गीत समाप्त किया और स्टेज पर से उतर ही रहा था कि उसकी नज़र सिद्धार्थ पर पड़ गयी और एक बार फिर उसके मुहँ मे एक कड़वाहट घुल गयी,सिद्धार्थ अपनी माँ को सबसे मिलवाते हुए बांसुरी की तरफ ही बढ रहा था।
     दक्षिण भारतीय पोचमपल्ली साड़ी में एक साधारण सा जूड़ा बनाई हुई सिद्धार्थ की माँ चेहरे से ही बेहद सुलझी हुई समझदार गृहिणी लग रही थी, अकेले ही ज़माने की ठोकरें खाती बेटे की अकेले परवरिश ने उनके चेहरे को एक दिव्य तेज़ से रंग दिया था।।

     बांसुरी स्टेज के दूसरी तरफ अकेली ही खड़ी थी कि सिद्धार्थ वहाँ पहुंच गया__

सिद्धार्थ- बांसुरी इनसे मिलो,ये मेरी मॉम है,and mom she is bansuri ,I’ve already told u about her..

  सिद्धार्थ की माँ ने मुस्कुरा कर बांसुरी का अभिवादन किया कि अपने उत्तर भारतीय संस्कारों में लिपटी बांसुरी ने झट आगे बढ कर उनके पैर छू लिये।।
     बांसुरी का लपक के इस तरह पैर छूना उन्हें मोहित कर गया,उन्होँने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया,अपनी टूटी फूटी अन्ग्रेजी मिश्रित हिन्दी में उन्होनें अगले दिन सुबह के सह्भोज पर उसे भी आमन्त्रित कर लिया।।

    अगले दिन महीने का दूसरा शनिवार होने से बैंक की छुट्टी थी,इसीसे टीम की वापसी के पहले जितने लोग आज रात की फ्लाईट से नही वापस हो रहे थे उन सब को बड़े इसरार के साथ सिद्धार्थ ने अपने घर सुबह के खाने पर बुला लिया था।।
      राजा ने सिद्धार्थ के आग्रह को सिरे से नकार कर अपने आने की असमर्थता प्रकट कर दी थी।।
     कभी किसी आयोजन का हिस्सा ना बनने वाली सिद्धार्थ की माँ एक तरह से टीम को स्वयं आमंत्रण देने ही आयी थी।।

    बांसुरी से जब तक उनकी बातें होती रही,राजा उन्हें  ही देखता रहा,पर जब उसने देखा की वो बांसुरी को साथ लिये उसी की तरफ आ रही हैं, तो वो एकाएक पलट कर दूसरी ओर देखने लगा।।

    ” हेलो ,कैसे हैं आप??”

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  राजा- जी नमस्कार!!! मैं ठीक हूँ,आप कैसी हैं।

” देखिए आप हमारे घर आये बिना नही जा सकते, मैं स्पेशली आप को इन्वाईट करने ही यहाँ  तक आयी हूँ ,कल का लंच आपको हमारे घर पर ही लेना है।”
    पता नही ये उनका स्नेह भरा आग्रह था या आश्चर्यजनक रूप से उनके व्यक्तित्व की अम्मा से समानता पर उस भद्र महिला के आग्रह को फिर राजा ठुकरा नही पाया, आखिर उसने भी झुक कर उनके पैर छू ही लिये।।

   तभी माला हाथ में स्टार्टर की प्लेट थामे वहाँ चली आयी,चार लोगों के बीच अकेली प्लेट पकड़ी खड़ी खुद को देख उसे अपनी भूल का आभास हुआ,और उसने अपनी प्लेट राजा की तरफ बढ़ा दी__

” सर लिजिये ना,आप कुछ ले ही नही रहे।”

” आप इतने प्यार से देंगी तो कोई लेने से कैसे मना कर सकता है।”
   बांसुरी एक बार फिर बुझ के रह गयी,आखिर हुआ क्या है राजा को।।

    पर बांसुरी को अब हर पल यही लग रहा था कि कैसे भी करके इस गलतफहमी को दूर करना ही पड़ेगा,चाहे इसके लिये उसे किसी भी हद तक जाना पड़े ।।

    माला ने उसी समय माईक बांसुरी के हाथ थमा दिया,बहुत सहम के आखिर उसने गाना शुरु किया

    मैं कागज़ की कश्ती, तू बारिश का पानी
           ऐसा है तुझसे अब ये रिश्ता मेरा
          तू है तो मैं हूँ, तू आए तो बह लूँ
            आधी है दुनिया मेरी तेरे बिना
           जी उठी सौ बार तुझपे मर के रे
                 नैना भी मल्हार…

बांसुरी ने बहुत मन से राजा के गाये हुए गाने को ही आगे बढ़ाया,पर उसके गीत को समाप्त करते में राजा वहाँ से जा चुका था।।

     राजा के जाने के बाद फिर बांसुरी का मन भी उस पार्टी से उचाट हो गया,जैसे तैसे समय काटती आखिर वो भी सर दर्द का बहाना बनाये वहाँ से निकल पड़ी ।।

  पार्टी हॉल में नेटवर्क ना होने से कैब बुक नही हो पा रही थी,इसीसे पैदल मेन रोड पर आगे बढ़ती बांसुरी अपने मोबाइल पर सर झुकाये कैब बुक करने में ही लगी हुई थी__

” अरे सम्भल के,ऐसे चलोगी तो गिर पड़ोगी!!

   राजा की आवाज़ सुन बांसुरी ने झटके से ऊपर देखा,सामने से उसीकी तरफ आते राजा को देख उसका चेहरा खिल उठा__

बांसुरी– ऐसे बीच में पार्टी छोड़ कर कहाँ निकल गये।।

राजा– बहुत बेचैनी सी लगने लगी थी अन्दर, इसिलिए बाहर खुली हवा में सांस लेने निकल गया।

राजा– तुम यहाँ कैसे?? पार्टी तो अभी चल ही रही होगी।।

बांसुरी– हाँ हमें भी थोड़ा अच्छा सा नही लग रहा था,इतनी भीड़ भाड़,हल्ला गुल्ला रास नही आ रहा था।तुमने खाना खाया राजा ??

राजा — खा लेंगे….तुम्हें अचानक हमारी फिक्र कैसे होने लगी।।

बांसुरी– अरे ऐसे क्यों बात कर रहे ,,हम फिक्र नही करेंगे तो और कौन करेगा तुम्हारी??

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राजा — जो हमारे लिये बनी होगी वो करेगी।।

बांसुरी– अच्छा !!! कौन है वो ज़रा हम भी सुनें,तुमने बताया ही नही कि शादी के लिये लड़की भी ढूँढ लिये।।

राजा– हाँ जैसे तुमने तो मिलते साथ ही सब बता दिया।।

बांसुरी– क्या बोल रहे हो तुम?? हमे समझ नही आ रहा,कभी भी साफ साफ बोलने की आदत भी तो नही है तुम्हारी।।

राजा– जैसे तुम सब साफ साफ बोलती हो,जब इतनी ही सफाई है बातो में तो अब तक बताई काहे नही कि उससे शादी करने जा रही हो।।

बांसुरी– पगला गये हो क्या?? किससे शादी करने जा रहे हम??

राजा — बनो मत बांसुरी!! सिद्धार्थ ने हमे सब कुछ बता दिया है।।

बांसुरी– अरे बाबा क्या बता दिया उसने,,हमें भी तो बताओ।।

राजा– यही कि तुम दोनों शादी करने वाले हो।।

बांसुरी– पगला गये हो क्या तुम?? एक बात बोले चाहे तुम कितने बड़े ऑफीसर बन जाओ ,
रहोगे गधे के गधे ,,  उसने कहा और तुमने मान लिया,अरे एक बार हमसे पूछना तो था।।

राजा — सवाल पूछने और जवाब देने का कोई रस्ता पीछे छोड़ गयी थी क्या ,जो हम कुछ पूछ पाते।।

बांसुरी– तुमने भी तो आवाज़ नही दी पीछे से….क्या इतनी सी बात पे कोई ऐसा जीवन भर का बैर मोल लेता है।।कहते कहते बाँसुरी की आंखें भीग गयी

   राजा ने आगे बढ़कर बांसुरी के दोनो हाथ अपने हाथों में ले लिये एक हाथ से उसके बहते आँसूं पोंछ उसकी आंखों में झांकते हुए उसने कहा__

राजा– आज भी तुमसे उतना ही प्यार करते हैं बांसुरी, कभी भूल ही नही पाये तुम्हें ।।
हमारे अनपढ़ होने से हमे छोड़ गयी यही सोच सोच कर पागल हो गये,और तुम्हारे जाने के बाद पढ़ने की ऐसी लत लगी की पागलों के समान किताबों में  ही घुसे रहने लगे,किताबें ही जीवन हो गयी थी हमारे लिये…..तुम्हारे बिन सब कुछ कितना फीका हो गया था ,कितना बेरंग !! चाय भी अच्छी नही लगती थी, फिर भी पीते थे,सिर्फ और सिर्फ तुम्हें याद करने के लिये…..जिम छूट गया!! दोस्त छूट गये!! यहाँ तक की हमारी खुद की तबीयत हमसे रूठ गयी पर तुम नही छूटी,कितना याद किया ये कैसे बताएँ क्योंकि तुम तो हमारे अन्दर ही समा गयी थी,इस कदर हमसे जुड़ गयी थी कि सोते जागते दिमाग में एक ही नाम चलता था ….बांसुरी!!

   बांसुरी के आँसू रूकने के बजाय बहते चले जा रहे थे,और अब राजा के आँसू भी उसका साथ दे रहे थे।।

बांसुरी– तुम्हें क्या लगता है,हम यहाँ बहुत खुश थे,किसी से तुम्हारे बारे में पूछ नही पाते थे,प्रिंस प्रेम सबने हमसे बात करना बन्द कर दिया,यहाँ तक की निरमा ने भी,,बस बुआ की चिट्ठी में कभी कोई हाल तुम्हारा मिला तो मिला,वर्ना कुछ नही।।

राजा– एक बार फोन भी तो कर सकती थी ना, राजा जिंदा है या मर गया,जानने की भी इच्छा नही हुई तुम्हारी ।।

बांसुरी–तुम तो फिर भी अपने अम्मा बाऊजी के साथ थे युवराज भैय्या के साथ थे,,हम तो यहाँ एकदम अकेले हो गये थे!! कभी तुम्हें नही लगा कि अकेले क्या कर रही कैसे जी रही एक बार फोन ही कर लूँ ।।
      कभी कहीं से गुजरते और तुम्हारे पर्फ्यूम की खुशबू आ जाती तो पागलों जैसे इधर से उधर भटकते फिरते,तुम्हें ढूंढते रहते थे,जबकि जानते थे की तुम यहाँ नही हो।।
     हमारे पागलपन की हद बताएँ राजा,तुम्हें हमेशा अपने पास महसूस करने के लिये लड़की होते हुए भी तुम्हारा जेंट्स पर्फ्यूम लगाते हैं,माला जाने कितनी बार इस बात पर हमारा मजाक भी बना चुकी है,पर हमे अपने कपडों से आने वाली तुम्हारी खुशबू ही भाती है ,क्या करें।।

     दोनो एक दूसरे का हाथ थामे एक दूसरे की आंखों में इतने सालों के अपने पलछिन देखते हुए सवाल जवाब में लगे थे कि अचानक राजा बांसुरी के चेहरे पे झुकने लगा__

बांसुरी– क्या कर रहे हो ये राजा ??

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राजा– उस शाम एक काम अधूरा रह गया था बंसी …… आज वही पूरा करने जा रहे …..

मुस्कुराते हुए बांसुरी ने राजा को पीछे धकेल दिया

बांसुरी– इतनी सारी शिकायतें जमा कर रखी है हमने,उन्हें सुनने की फुरसत नही है?? आये बड़े प्यार करने वाले….

राजा– कर लेना बाबा, शिकायतें भी कर लेना,,सब सुन लूंगा……
      राजा ने अपने दोनो हाथों में बड़े प्यार से बांसुरी का चेहरा पकड़ा और….
   ” पहले उस रात का हिसाब तो पूरा कर लेने दो।”

बांसुरी– नही ,पहले हमारी बात सुनो!! क्या कह रहे थे सिद्धार्थ सर ,मुझसे शादी करेंगे,हो चुकी तब तो।।तुमने कहा नही उनसे कि बांसुरी सिर्फ और सिर्फ राजा की है,और राजा से ही बांसुरी की शादी होगी।।

राजा– नही कहा!! लेकिन कल उनके घर जायेंगे ना तब कह देंगे,,अब खुश!!

बांसुरी– हाँ बहुत बहुत खुश ।।

राजा– तो फिर आओ इधर।

बांसुरी– कब से देख रहे हैं,घूम फिर के एक ही जगह तुम्हारा कांटा अटक जा रहा

राजा– इत्ते साल से इन्तजार भी तो किया है तुम्हारा बन्सी!!!
      मुस्कुराती हुई बांसुरी आगे बढ़ कर राजा के गले से लग गयी,और राजा उसके चेहरे पे झुकता चला गया।।

क्रमशः

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aparna..

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जीवनसाथी -123

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  जीवनसाथी -123

     अस्पताल से लौटने के बाद भी आदित्य को जाने क्यों इस बात पर यकीन नही हो रहा था कि वो बॉडी केसर की थी।
    वो बिना किसी से कहे चुपचाप अपने कमरे में चला गया। ये पूरा दिन महल के लिए कठिनता भरा रहा था। केसर का इस तरह महल से गायब होने के बाद उसकी लाश मिलने के साथ ही “मायानगरी” मेडिकल छात्रा की आत्महत्या ने भी महल को एकबारगी हिला कर रख दिया था।
   अपने कमरे में नाराज़ युवराज  विराज को बुला कर यूनिवर्सिटी के बारे में पूछताछ करना चाहता था। उनका और राजा का देखा सपना  ये तो नही था फिर कैसे उनकी बनाई यूनिवर्सिटी में ये सब हो रहा था। युवराज यही सोच रहा था कि यूनिवर्सिटी का पूरा दारोमदार विराज के कंधों पर सौंप कर उन्होंने और राजा ने सही किया या नही। उन्होंने सभी से कह कर अभी उस लड़की की आत्महत्या वाली बात राजा तक पहुंचने नही दी थी। 
 
        वैसे भी राजा की परेशानी के और भी कई कारण थे।

   युवराज ने किसी काम से समर को बुलाया और उसके बुलावे पर समर तुरंत चला आया।
   यूनिवर्सिटी सुसाइड केस पर कुछ देर बातचीत करने के बाद वो राजा के कमरे की तरफ चला गया।

    अगले दिन की रूपरेखा उसे बताने के बाद राजा से आराम करने कहा और खुद किसी बेहद ज़रूरी काम से निकलने लगा कि राजा ने उसे रोक लिया …-” सच सच बताओ समर ! तुम कहाँ व्यस्त हो? कल चुनाव के नतीजे भी आ रहें हैं। मैं जानता हूँ तुम्हारे दिमाग में कुछ न कुछ तो चल रहा है।”
  समर ने मुस्कुरा कर ना में सिर हिलाया..-” नही हुकुम अभी इस वक्त कुछ नही चल रहा है। बस कल सुबह हमें शहर ज़रा जल्दी निकलना होगा,वही सोच कर आपको आराम करने कह रहा था।”  

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   राजा ने समर को देखा वो उसे एक बार झुक कर प्रणाम कर बाहर निकल गया। राजा भी समझता था कि उसे जिताने को समर ने रात दिन एक कर रखा था।

****

अगली सुबह राजा समर के साथ निकल गया । युवराज आदित्य और प्रेम भी उनके साथ थे लेकिन विराज उन लोगों के साथ नहीं गया।
      परिणाम पहले ही सभी लोगों को पता था राजा और उसके साथ के लोग भारी मतों के साथ विजयी हुए थे।  पक्ष और विपक्ष दोनों ही राजा को अपनी और मिलाने के लिए आतुर थे और जिसके लिए उन लोगों की बात समर से चल भी रही थी।
    विराज ने वही किया जिसका समर को डर था।  विराज अपने दो लोगों के साथ राजा को छोड़ एक दूसरी पार्टी में जाकर मिल गया और अपना विश्वास मत उस पार्टी को सौंप दिया।
     राजा वैसे तो किसी भी पार्टी के साथ हाथ नहीं मिलाना चाहता था लेकिन उनमें से एक पार्टी ऐसी थी जिसे कुछ हद तक राजा सपोर्ट कर रहा था। यह बात अच्छे से जानते हुए भी विराज ने दूसरी पार्टी के पक्ष में जाकर अपना विश्वास मत प्रस्तुत कर दिया था।
     समर के द्वारा रखी शर्त कि राजा को मुख्यमंत्री बनाया जाए तभी राजा अपने लोगों के साथ उस पार्टी को अपना बहुमत देगा इस बात पर राजा ने सहमति नहीं जताई।
   समर में राजा को समझाने की कोशिश भी की। युवराज प्रेम सभी लोग समर की तरफ से राजा को समझाने खड़े हो गए….

” तुम समझ नहीं रहे हो कुमार तुम्हारा एक ऊंचे पद पर होना बहुत जरूरी है। अगर तुम मुख्यमंत्री बनते हो तो यह पूरा राज्य तुम्हारा होगा और तब तुम इस पूरे राज्य के लिए कार्य कर सकते हो। “

” मैं आपकी बात समझता हूं भाई साहब। लेकिन इस बार अगर मेरे लोग सिर्फ इतनी ही सीटों पर विजेता रहे हैं तो मुझे सिर्फ विधायक बन कर भी खुशी है। और मैं विधायक बनके भी अपने सारे कार्यों को अंजाम दे सकूंगा आप चिंता ना करें। “

” हमें चिंता तुम्हारे मिलने वाले पद की नहीं तुम्हारी कार्यक्षमता की है। अभी सिर्फ तुम एक शहर के लिए कार्य कर सकते हो लेकिन अगर तुम मुख्यमंत्री बनते हो तो तुम्हें पूरे राज्य के लिए कार्य करने का अवसर मिलेगा। तो तुम पांच सालों के लिए इस अवसर को क्यों गंवाना चाहते हो? यह हमारी समझ से परे है।”

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” भाई साहब मैं अपनी पार्टी छोड़कर और किसी की पार्टी में नहीं मिलना चाहता हूं। मुझे मुख्यमंत्री का पद तभी मिलेगा जब मैं अपने साथियों को लेकर उस पार्टी के साथ हाथ मिला लूँ। संभावना यह भी है कि वह लोग अभी हमें यह लालच दे कि वह मुझे मुख्यमंत्री का पद देंगे लेकिन अंदर ही अंदर वह लोग क्या तय करते हैं, यह हम अभी नहीं समझ सकते। राजनीति बहुत कठिन कार्य है यहां लोग हमारे सामने कुछ नजर आते हैं लेकिन हो कुछ और जाते हैं। इसलिए मैं मुझे जो पद मिल रहा है उसी में खुश हूं ,संतुष्ट हूं । हां पांच सालों में अपनी पार्टी पर इतना कार्य अवश्य करूंगा कि मेरी पार्टी इतनी बड़ी हो जाए कि मैं अपनी जीत के बलबूते किसी और के विधायक चुराए बिना मुख्यमंत्री पद पर काम कर सकूं। “

” जैसी तुम्हारी मर्जी कुमार! वैसे हमें हमारे छोटे भाई पर बेहद गर्व है और हमें पूरा विश्वास है कि इन पांच सालों में तुम अपनी मेहनत से वह पद पा ही लोगे जिसके तुम हकदार हो। “

     भवन का कार्यक्रम शुरु हो चुका था स्पीकर के आते ही सभी अपनी अपनी जगह पर खड़े गए।
  राज दल पार्टी और जन जागरण पार्टी में कड़ी टक्कर थी। दोनों में से किसी भी पार्टी ने इतनी बड़ी जीत हासिल नहीं की थी कि उनमें से चुनकर मुख्यमंत्री का पद दिया जा सके। सारा दारोमदार राजा की पार्टी पर था।
    माननीय स्पीकर महोदय ने भी राजा की पार्टी से सवाल किया कि वह अपने जीते हुए लोगों को लेकर किस पार्टी का सहयोग करना चाहते हैं? और किस पार्टी को सहमति देते हैं?
   अब तक राजा युवराज प्रेम विराज आदि बाकी लोगों को यही लग रहा था कि समर की बात राज दल पार्टी से चल रही है।
    और सिर्फ राजा की खिलाफत करने के लिए ही विराज ने जन जागरण पार्टी के साथ हाथ मिला लिया था। राजा के कुल जीते हुए लोगों में से विराज दो लोगों को लेकर जन जागरण दल से हाथ मिला चुका था।
  स्पिकर महोदय के कहने पर कि किसी एक पार्टी से ही नेता चुना जाएगा आप सभी आपस में मिलकर यह निर्णय ले लीजिए।
   दोनों पार्टी के लोगों के आरोप प्रत्यारोप शुरू हो गए। लेकिन इसी सबके बीच कुछ ऐसा हुआ कि वहां उपस्थित सभी लोगों की आंखें फटी की फटी रह गई।
  जन जागरण पार्टी के जीते हुए लोग एक-एक करके राजा की पार्टी की तरफ आने लग गए। यह देखकर राज दल पार्टी वाले भी चौक कर रह गए।
  यहां तक कि जन जागरण दल के मुखिया राजेश्वर सिंह भी इस बात से अनजान थे, कि उनके ही दल के लोग राजा की टीम से जाकर हाथ  मिला रहे हैं।
    कुछ दस मिनट ही बीते होंगे कि अब उस सभागार का सीन बदल चुका था। जहां पहले दो मुख्य दल जन जागरण पार्टी और राज दल प्रमुखता से एक दूसरे के सामने खड़े थे। और राजा की पार्टी एक छोटी सहयोगी पार्टी के रूप में नजर आ रही थी। वही जन जागरण दल के लगभग 80% लोगों के राजा की पार्टी में आकर मिल जाने से राजा की पार्टी अपने आप वहां सबसे बड़ी और प्रमुख पार्टी के रूप में नजर आने लग गई थी।
    इस बारे में राजा अजातशत्रु को स्वयं कोई खबर नहीं थी उन्होंने आश्चर्य से समर की तरफ देखा समर होंठो ही होठों में धीमे से मुस्कुराता स्पीकर महोदय की तरफ मुंह करके खड़ा हो गया। उसने उनसे कुछ कहने की आंखों ही आंखों में इजाजत मांगी।
  स्पीकर महोदय की सहमति मिलते ही समर ने अपनी बात रखनी शुरू की…-” जैसा कि आप सभी जानते हैं बहुमत मिलने वाली पार्टी ही विजेता पार्टी होती है। और फिर उस पार्टी में से चुना गया नेता मुख्यमंत्री का पद संभालता है । वैसा ही कुछ अभी इस सभा भवन में देखने को मिल रहा है। अब तक दो विजेता पार्टियों में से एक पार्टी जन जागरण दल के 80% लोग राजा अजातशत्रु सा  की पार्टी का समर्थन करने चले आए हैं। और अब इस प्रकार यहां मौजूद सभी राजनीतिक पार्टियों में राजा अजातशत्रु सिंह की पार्टी सबसे अधिक बहुमत के साथ बनी विजेता पार्टी के रूप में उभर कर आ रही है। तो अब ऐसे में स्पीकर महोदय से प्रार्थना है कि कि वह एक बार फिर अपने शब्दों में विजेता पार्टी का नाम संबोधित करें। “

   सुबह से चल रहा वहां का सारा फसाद एकाएक शांत हो गया सबके देखते ही देखते सारा सब बदल गया।
     राजा अजातशत्रु की वह छोटी सी पार्टी जिस में से कुल 11- 12 लोग ही चुनाव में खड़े हुए थे। हालांकि ये और बात थी कि निर्विवाद रूप से यह सभी खड़े हुए प्रत्याशी भारी बहुमत से विजेता हुए थे । लेकिन यह पार्टी इतनी छोटी थी कि किसी अन्य पार्टी को सपोर्ट करके ही अपना पद विधानसभा में पा सकती थी।
     पहली बार शायद इतिहास में ऐसी कोई घटना घटी थी कि एक सहयोग कर सकने वाली छोटी पार्टी में अचानक से बड़ी पार्टी के इतने सारे विजई प्रत्याशी शामिल होकर उस छोटी पार्टी को एक बड़ी पार्टी में रूपांतरित कर गए थे।
     जन जागरण दल के मुखिया के पास अब कोई चारा नहीं बचा था। गिने-चुने प्रत्याशियों के साथ वह सरकार बनाने में असमर्थ थे। और अगर वह अपने इन गिने  चुने प्रत्याशियों को लेकर राजा के खिलाफ जाकर राज दल पार्टी से हाथ भी मिला लेते, तब भी यह जाहिर था की राजा की पार्टी ही सरकार बनाती और ऐसी स्थिति में अपने दुश्मन टीम के साथ हाथ मिलाकर विपक्ष में बैठने का कोई खास लाभ नहीं था।
   जन जागरण दल के नेता राजेश्वर सिंह जी के चेहरे का रंग उड़ चुका था । लेकिन वह जानते थे कि अब उनके पास राजा को पूरी तरह से समर्थन देने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था। क्योंकि राजा से हाथ मिलाने का मतलब था सरकार बनाना और अगर सरकार बनती है तो भले ही मुख्यमंत्री का पद ना मिले लेकिन कैबिनेट में कोई एक सशक्त पद के दावेदार तो वह बन ही सकते थे। इतनी तो उम्मीद वो राजा अजातशत्रु से कर ही सकते थे। हालांकि उनके मंत्री यानी समर पर उन्हें अब रत्ती भर भी भरोसा नहीं रह गया था।
    उन्हें कितने दिनों में कभी भी समर पर जरा सा भी अविश्वास नहीं हुआ था। वह लड़का जो बार-बार उन्हें यह आश्वासन दे रहा था कि राजा अजातशत्रु अपनी टीम के साथ उन्हें ही सहयोग और समर्थन देंगे बस बदले में उन्हें राजा अजातशत्रु को मुख्यमंत्री का पद देना होगा।
    वह आज तक समर को कम उम्र का अनुभवहीन लड़का समझ कर उसके ऊपर रौब ऐंठते आ रहे थे। उसका फोन रखने के बाद अक्सर वह अपने चमचों के सामने समर का मजाक उड़ाया करते थे, कि बताओ सिर्फ दस  लोगों की जीती हुई टीम को लेकर यह लड़का अपने राजा साहब को मुख्यमंत्री बनाने के सपने देख रहा है।
    उसका इस तरह मजाक उड़ाते समय उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि यह लड़का अचानक इस सभा भवन में इस ढंग से उनका मजाक बना जाएगा। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनकी नाक के नीचे से उनके इतने सारे विधायकों को यह लड़का इस तरह ले उड़ेगा।
    सभी तरफ से निरुपाय हो उन्होंने अपने बाकी बचे प्रत्याशियों के साथ जाकर राजा अजातशत्रु से हाथ मिला लिया।


   
       भारी जोश खरोश से और भारी बहुमत से राजा अजातशत्रु की पार्टी विजेता घोषित कर दी गई। यह ऐलान होते ही कि राजा अजातशत्रु की टीम सरकार बनाएगी बाहर खड़े उनके समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। टीवी पर अलग-अलग चैनलों में दो दिन से चलती वाद विवाद की लहर एकाएक उस समय थम कर रह गई जब एक छोटी और नई बनी राजा अजातशत्रु की पार्टी को सरकार बनाने के लिए मौका दिया गया।
     जहां एक तरफ लोग राजा अजातशत्रु की भलमनसाहत के किस्से गा रहे थे, तो वही कुछ उनके विरोध में भी बोल रहे थे कि उन्होंने अपने राजा होने का लाभ उठाते हुए खूब रुपए पैसे देकर जन जागरण दल के लोगों को अपनी तरफ मिला लिया। लोगों के बोलने से ना समर का कुछ बिगड़ना था और ना राजा अजातशत्रु का।

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     वैसे तो विजेता दल का चुनाव होने के बाद सरकार बनाने को लेकर विजेता दल को समय दिया जाता है। लेकिन यहां पर राजा अजातशत्रु के दल में इतना उत्साह था कि निर्विवाद रूप से वहां उसी समय राजा अजातशत्रु को भावी मुख्यमंत्री के पद के लिए चुन लिया गया।
      अब यह पार्टी उनकी थी आलाकमान भी वह स्वयं थे और मुख्यमंत्री के दावेदार भी।
    स्पीकर महोदय के द्वारा राजा अजातशत्रु को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करते ही पूरे सभा भवन में करतल ध्वनि गूंज उठी। राजा अजातशत्रु का प्रभाव ही ऐसा था कि विपक्षी टीम के भी सारे सदस्यों ने टेबल बजाकर राजा अजातशत्रु के मुख्यमंत्री पद को स्वीकारने के लिए सहमति जताई।
    स्पीकर महोदय द्वारा राजा अजातशत्रु को एक हफ्ते का समय दिया गया। जिसमें राजा अजातशत्रु अपनी कैबिनेट के मंत्रियों का चुनाव कर सकें। लगभग हफ्ते भर बाद की तारीख शपथ ग्रहण के लिए सुनिश्चित करने के बाद सभा स्थगित कर दी गई।

    इस सारे हो हल्ले में पूरा दिन निकल गया। सभा विसर्जित होने के बावजूद राजा अजातशत्रु से व्यक्तिगत रूप से मिलकर सभी उन्हें बधाइयां देने में लगे रहे बधाइयों का भार ग्रहण करते-करते राजा अजातशत्रु थक कर चूर होने लगे थे।
   शाम ढल चुकी थी। और उन सभी को अभी महल पहुंचने में घंटे भर का और समय लगना था। विराज एक बार फिर मुंह की खा चुका था उसने जो सोचा उसका बिल्कुल उलट हुआ था।
   उसने सोचा था वो राजा अजातशत्रु के विपरीत जाकर उस पार्टी से हाथ मिलाएगा जिससे राजा अजातशत्रु का बैर है लेकिन उसे नहीं मालूम था कि यह बैर सिर्फ उसे दिखाने के लिए ही समर ने रचा था असल में अंदरूनी तौर पर समर पहले ही जन जागरण दल के प्रत्याशियों को अपनी तरफ मिलाने का काम शुरू कर चुका था।
    समर जानता था राजनीति ऐसी दलदल है जहां पर कमल खिलाने के लिए उस दलदल में स्वयं गहरे तक उतरना पड़ता है। और उसी गहराई में उतरने के लिए उसे उस दलदल का एक हिस्सा बनना पड़ा था। विराज को धोखा देने के लिए उसने विराज की ही तरह झूठी चाल चली थी।
    वह शुरू से विराज के सामने इसी तरह दिखाता रहा जैसे वह राज दल पार्टी की तरफ है। क्योंकि समर का यह मानना था कि अगर लोगों के सामने यह बात जाती है कि महल के राजा अजातशत्रु और उनका भाई विराज एक दूसरे के खिलाफ हैं, तो उससे राजा अजातशत्रु की राजनीतिक छवि पर असर पड़ सकता है । और उस छवि को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक था कि लोगों के सामने यह नजर आए कि विराज राजा अजातशत्रु के समर्थन में खड़ा है। इसीलिए जैसे ही विराज अपने लोगों को लेकर जन जागरण दल की तरफ गया। वहां के सारे लोग विराज और उसके लोगों को लेकर राजा अजातशत्रु की तरफ चले आए । विराज को यही लगता रहा कि वह जन जागरण दल की तरफ है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से वह राजा के ही दल का सदस्य हो गया था।
     और अब जब राजा अजातशत्रु का दल सरकार बनाने जा रहा था तब ऐसे में राजा को छोड़कर विपक्ष से हाथ मिलाने की हिम्मत विराज में नहीं थी।
    खून के घूंट पीकर आखिर विराज भी राजा को बधाई देने चला आया…-“बधाई हो अजातशत्रु! आखिर जीत ही गए तुम!”
” मेरी यह जीत मेरी अकेले की नहीं है विराज इसमें तुम और तुम्हारे साथियों का भी अभूतपूर्व योगदान है जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता।”
  राजा ने आगे बढ़कर विराज को गले से लगा लिया।
युवराज ने भी विराज के कंधे थपथपाये…-” तुम दोनों भाइयों को मिलकर सरकार चलाना है। कैबिनेट में कौन सा स्थान तुम्हारे लिए सही रहेगा पहले ही तय करके कुमार को बता देना कहीं ऐसा ना हो बाद में इसी बात पर तुम दोनों में कोई कलह क्लेश हो जाए। अब हम नहीं चाहते कि हमारे भाइयों के बीच किसी भी तरह की कोई गलतफहमी हो।”

” जी भाई साहब जैसी आपकी आज्ञा।” ऐसा कहकर विराज ने युवराज के पैर छू लिये।

    सारे के सारे लोग एक साथ महल की तरफ निकल पड़े।
    लगभग 10 गाड़ियों में अपने अपने बॉडीगार्ड के साथ वो लोग महल की ओर आगे बढ़ रहे थे कि प्रेम के पास  निरमा का फोन आने लगा…-“कहाँ है आप ? अभी घर पहुंचने में और कितना वक़्त लगेगा?”
” अभी तो निकलें ही हैं। अभी तो वक्त लगेगा। हुकुम की मुख्यमंत्री की सीट पक्की हो चुकी है। बाहर पार्टी कार्यकर्ताओं से भी मिलते हुए आना होगा ना। “.
” ये तो बहुत खुशी की बात है कि राजा भैया जीत गए। खैर उन्हें ही जीतना भी था। “
” तुम बताओ,फ़ोन कैसे किया? कोई ज़रूरी खबर ?”
” हम्म ! है तो ज़रूरी बात,लेकिन वापस आ जाओ फिर बताती हूँ।”
” क्या हुआ है ? कुछ परेशान लग रही हो।  “
” वही मायानगरी के केस के बारे में बताना था। जिस लड़की ने सुसाइड किया था, उसके बारे में मालूम चल चुका है। आप आ जाओ फिर बात करतें हैं। मैं सोच रही कि अभी ये बात राजा भैया तक न पहुंचे तो अच्छा है।”
” हम्म ! ठीक है।” प्रेम ने फ़ोन रख तो दिया लेकिन उसके दिमाग में वही केस चक्कर काटने लगा। अभी तक इस बात को यूनिवर्सिटी से बाहर नही जाने दिया गया था।”

  महल पहुँचने से पहले समर ने गाड़ियां पार्टी कार्यालय की तरफ मुड़वा ली थीं।  वहाँ राजा के समर्थक उसका इंतजार कर रहे थे। बाजे गाजों और ढेर सारी आतिशबाजी के साथ राजा का धूमधाम से स्वागत करने के बाद कार्यकर्ताओं ने पारी पारी से सभी का सम्मान किया और सभी अंदर चले गए…
   राजा  समर को देख मुस्कुरा उठा…-” आखिर कर के ही मानते हो अपने मन की। मैंने तो कहा था मैं इस साल विधायक बन कर भी खुश हूं। पर तुमने ठान रखी थी कि मुझे मुख्यमंत्री बना कर ही मानोगे।”
राजा की बात पर युवराज ने भी मुहर लगा दी…-“बिल्कुल सही! हमें भी जिस ढंग से समर ने बताया था हम यही सोच रहे थे कि तुम कभी मुख्यमंत्री बनने के लिए अपनी पार्टी जनजागरण पार्टी से मिलवाने के पक्ष में नही रहोगे। और तब हमने भी यही कहा था  समर से कि अपनी पार्टी का विलय करके जीत हासिल करने वालों में तुम नही हो!”
” बस आपकी इसी बात के बाद मैंने ये दूसरा तरीका अपनाया हुकुम!”
” तुम तो हो ही पैन्तरेबाज़। कोई वहाँ सोच भी नही सका होगा कि एकदम अंत में जाकर ऐसा कुछ हो जाएगा। पर जो भी हो समर तुमने जो किया वो और कोई नही कर सकता था।”
   प्रेम की इस बात के बाद राजा एक एक कर के सभी कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत रूप से मिलने के बाद वहां से वापस महल के लिए निकल गया।

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       प्रेम को घर पहुंचने में रात हो गयी थी। मीठी को सुला कर निरमा बाहर हॉल में बैठी उसका रास्ता देख रही थी, इसके साथ ही वो कुछ कागज़ हाथों में थामें पढ़ भी रही थी।
   प्रेम की गाड़ी आ कर रुकते ही वो दरवाज़े पर भाग कर चली आयी..
   प्रेम ने अंदर आकर निरमा को देखा..-“अरे अब तक जाग रही हो। रात के ढाई बज गए हैं। तुम्हें सो जाना चाहिए था न। फिर सुबह सुबह तुम्हें काम पर भी जाना होता है। “
   निरमा मुस्कुरा कर रसोई से पानी ले आयी। प्रेम के हाथ में गिलास थमा कर वो कहने लगी…-“आप अच्छे से जानतें हैं जब तक आप आ नही जाते मुझे नींद नही आती है। और फिर आज थोड़ा कुछ काम भी था। इसलिए काम निपटा रही थी। “
” अच्छा हाँ! तुमने फ़ोन भी तो किया था? क्या थी वो ज़रूरी बात?”
“अभी आप थक कर आएं हैं मैं सुबह बताती हूँ। आप जाइये फ्रेश हो लीजिये ,मैं खाना गरम कर लूं। “
” नही खाना नही खाऊंगा।” कहता प्रेम नहाने चला गया। उसके बाथरूम से बाहर आने पर भी निरमा किसी काम में लगी थी। उसे इतना व्यस्त देख वो भी परेशान हो उठा…-“क्या बात है निरमा? तुम अब भी सोने नही आ रही।”
उसके हाथ मे दूध का गिलास थमा कर उसने अपने कागज़ समेट लिए।।
” बताओ न क्या बात है? “
” मुझे लगता है , मेडिकल में कुछ गड़बड़ चल रही है। यूनिवर्सिटी इतनी बड़ी है कि हर वक्त सभी तरफ ध्यान देना मुश्किल होता है।  दूसरी बात अभी यूनिवर्सिटी अपने स्थापना के दौर में ही तो है, इस समय हम सबका काम वैसे भी बढ़ा हुआ है। “
” क्या हुआ , काम का तनाव ज्यादा लग रहा है क्या? “
” नही! ऐसी बात नही है। असल में मेरे नीचे और ऊपर भी कई लोग काम करते हैं तो बस वही समझ से बाहर हो रहा है कि कहां पर गड़बड़ हो रही है।
   पहले ही इतने सारे मामले होते हैं उस पर ये आत्महत्या का मामला आ गया। उस लड़की और उसके घर वालों के लिए बहुत दुख हो रहा है। मैंने उसके घरवालों को कल बुलवाया है। उनसे मिल कर उसके बारे में और भी बातें पता चलेगी की आखिर माज़रा क्या था? क्यों उसे आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा। “
” कहीं कोई रैगिंग का चक्कर तो नही है ना? और वैसे भी ये राजा अजातशत्रु की बनाई यूनिवर्सिटी है । यहाँ तो रैगिंग होनी ही नही चाहिए। “
” आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि एक आदर्श यूनिवर्सिटी में सिर्फ सीधे सच्चे लोग पढ़ें। कोई रैगिंग न हो ,सब शराफत से साथ चलें तभी वो एक आदर्श विश्वविद्यालय होगा। ऐसा नही है प्रेम बाबू। रैगिंग भी कॉलेज की पढ़ाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए मैं रैगिंग के पूरी तरह खिलाफ भी नही हूँ। बस किसी तरह का शारीरिक उत्पीड़न न हो।
  आपको मालूम है ये बच्चे जब स्कूल की पढ़ाई पूरी कर के हमारे पास पढ़ने आते हैं तब इन्हें किसी तरह का सामाजिक व्यवहारिक ज्ञान नही होता। इनके साथ होने वाली छोटी मोटी रैगिंग इन्हें उस व्यवहारिक ज्ञान को सिखाने का माध्यम है।
   बच्चे मानसिक रूप से भी स्ट्रांग होतें है और प्रैक्टिकल नॉलेज में भी।
  पर ये लड़की वाला मुझे रैगिंग का मामला नही लग रहा। अब कल सुबह ही मालूम चलेगा कि सारा मुद्दा क्या है आखिर। आप भी स्पोर्ट्स फैकल्टी इंचार्ज हैं तो कल आपको भी मीटिंग में आना होगा।”
” जो हुकुम आपका। वैसे कितने बजे तक पहुंचना होगा। “
” लंच के बाद ही मीटिंग रखी जायेगी। मैं आपको समय मेसेज कर दूँगी। हमारी कोशिश तो यही है कि ये बात राजा भैया तक  न जाये।”
” इतनी बड़ी बात हुई है। ये उनसे छिपाई नही जा सकती। उन्हें बता देना ही सही रहेगा। “
” हम्म !”
   खिड़की पर खड़ी निरमा अपनी सोच में गुम हो गयी। रह रह कर उसकी आंखों में उस बच्ची का चेहरा और बेजान शरीर तैरता जा रहा था….
   और वो और अधिक उदासी में डूबती जा रही थी।

क्रमशः

दिल से…

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       ढेर सारी मतलब, वाकई ढेर सारी बातें हैं दिल से कहने के लिए बस समझ में नहीं आ रहा कहां से शुरू करूं ।
    
        सबसे पहले तो असत्य पर सत्य की विजय का अनूठा पर्व विजयादशमी  हम सब मना चुके हैं और आप सभी को इस पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।
  
      श्री राम तो मन प्राण में बसे हुए हैं और उनका नाम ही पर्याप्त है अपने पाप काटने के लिए।

    अब बात करते हैं कहानी की। जैसा कि मैंने पहले कहा था जीवनसाथी समाप्त होने के बाद भी माया नगरी के साथ चलती रहेगी लेकिन इसी बीच मायानगरी शुरू कर दी। अब मायानगरी में मैंने 5 साल का लेग दिखाया था।
   लेकिन ये लैग, जेटलैग में बदल गया ।
  खैर !!
   
   तो हुआ ये की जीवनसाथी में भी मुझे ये पांच साल का गैप दिखाना था। लेकिन कहानी मर्ज करने के चक्कर में बिना टाइम गैप के कहानी मिल गयी।
   आप लोगों को भी नज़र आ रहा है कि मैं कितनी फुर्ती से जीवनसाथी समेटने में लगी हूँ बस इसलिए गलती से मिस्टेक वाली सिचुएशन तैयार हो गयी।

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  तो साथियों अब यहाँ से दोनो कहानियों को बिना टाइम ट्रेवल किये ही हम साथ में लेते चलेंगे। दिमाग में कोई डाउट आये तो आप बेशक पूछ लीजियेगा अगर मुझे जवाब समझ आ गया तो मैं ज़रूर आपकी शंका का समाधान करूँगी।
   
  आपमें से बहुत से लोग प्रेम और निरमा की कहानी भी अलग से पढना चाहते थे। तो मैं वो भी लिखने की सोच रहीं हूँ। हालांकि अब जब तक पुरानी कहानियां नही खत्म होंगी। कोई नई कहानी नही शुरू करूँगी।
  जैसे शादी.कॉम शुरू की थी जीवनसाथी के रूप में कुछ अलग फ्लेवर और अलग कलेवर में । बस ऐसे ही प्रेम निरमा की नई कहानी भी काफी अलग सी होगी। प्लॉट वही होगा लेकिन इस बार फ्लेवर और कलेवर फिर से अलग होंगे। तो अगर पढना चाहतें है तो समीक्षा में हाँ ज़रूर लिखियेगा । अगर सौ लोगों ने भी हामी भर दी तभी इस कहानी पर काम शुरू करूँगी वरना कुछ दूसरा भी चल रहा है दिमाग में।
   
    लेखकों के साथ बड़ी मुसीबत होती है। सामने कोई बैठा आपसे अपना दुख दर्द बांट रहा होता है और आप उसमें छिपा अपना किरदार तलाश रहे होते हैं।
    वो तो अच्छी बात है कि मेरे बहुत कम रिश्तेदार मुझे पढ़ते हैं वरना मेरी जो खबर ली जाती कि क्या कहूँ।
    हालांकि अब कुछ बेहद करीबी रिश्तों में भनक लगने लगी है।
   अभी कुछ दिन पहले ही मेरी एक जेठानी सा का फ़ोन आया। कुछ इधर उधर की बातों के बाद उन्होंने मुझे पूछा कि ” देवरानी जी! तुम डॉक्टरी के अलावा भी कुछ करती हो क्या?” मैंने कहा – नही तो। तब उन्होंने वापस पूछा -“हमारा मतलब है कुछ कहानियां भी लिखती हो क्या? “
मन ही मन सोचा – “गए बेटा । पकड़ी गई। मैंने कहा हाँ जीजी लिखती हूँ। बस ऐसे ही थोड़ा बहुत।”
उन्होंने कहा-“हम सारी बहने प्रतिलीपी पर हैं। मेरी दीदी शायद तुम्हें ही पढ़ती हैं। तुमने जीवनसाथी के नाम से कुछ लिखा है क्या? “
मैंने कहा -“हाँ दी ! लिखा है बल्कि अब भी लिख रहीं हूँ।”
उन्होंने तुरंत कहा-“यार ये तो बता दो की बाँसुरी कैसे इतनी केयरलेस हो गयी। उसने अपना फोन कहाँ गंवा दिया। तो मतलब बाँसुरी और राजा वाली अपर्णा तुम ही हो। “
मैंने कहा – ” हाँ दी ! मैं ही हूँ।” और दिल में आ रहा था, हे भगवान मैंने कुछ ऐसा वैसा न लिख दिया हो कि अपनी प्यारी जेठानी से नज़रे न मिला पाऊं।
  लेकिन उसके बाद उन्होंने फ़ोन पर इतना सारा प्यार बरसाया की क्या कहूँ।
” अब तो भई जल्दी ही तुमसे मिलने आएंगे। अपनी देवरानी से नही राजा और बांसुरी वाली अपर्णा से।”
   मैंने भी सहर्ष स्वीकृति दे दी। बातें तो फिर ढ़ेर सारी हुई, लेकिन सब बताने बैठी तो आप बोर हो जाएंगे जैसे अभी हो रहे।
   वैसे इतना तो बनता है।

      अभी पुरानी कहानियों को खत्म करने के बाद ही कुछ नया लिखूंगी प्रतिलीपी पर।

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   बाकी किस्से शुरू हो जाएंगे दीवाली के बाद से।
दो नए रूपों में…. वापसी और … एक सरप्राइज!

आजकल कुछ ज्यादा ही पहेलियों में बात करने लगीं हूँ शायद। पर सच कहूं तो मुझे खुद कोई और पूछे तो पहेलियों के जवाब मालूम नही होते।
 
   मेरे दिमाग के घोड़े दौड़ते कम हैं, ज्यादातर एक ही जगह खड़े खड़े सोचते रहतें हैं, मेरी तरह ।
  और दौड़ना भूल जातें हैं।

  आज तो ढ़ेर गपशप हो गयी। अब जल्दी ही मिलतें हैं बाकी कहानियों के साथ।
  पढ़तें रहिये, खुश रहिये…

मुझे पढ़ने और सराहने के लिए हॄदयतल से आभार आप सभी का।
  आपकी मुहब्बत है कि लिख रही हूँ।।

aparna..

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दिल से…. चिट्ठी आप सबों के नाम!

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प्यारे दोस्तों।

सबसे पहले तो आप सभी का शुक्रिया अदा करती हूं कि मेरे एक बार बोलने पर आप सभी मेरे ब्लॉग पर चले आए। पर यहां मेरे ब्लॉग पर भी आप सब मुझे सपोर्ट कर रहे हैं। मैं जानती हूं आप सब के दिल में यह भी चल रहा होगा कि आखिर मैंने अपना ब्लॉग लिखना क्यों शुरू किया। देखा जाए तो यह जरूरी था बेहद जरूरी। सिर्फ मेरे लिए ही नहीं मेरे जैसे उन ढेर सारे लेखकों के लिए भी जो ढेर सारी मेहनत करके लिखते तो हैं लेकिन उनके लिखेगा प्रतिसाद उन्हें नहीं मिल पाता।

मैं यहां किसी भी प्लेटफार्म की बुराई नहीं करूंगी। सभी प्लेटफार्म अपनी अपनी जगह सही है चाहे वह ऑनलाइन लेखन के प्लेटफार्म हों या ऑडियो स्टोरी सुनाने के प्लेटफार्म। हर एक प्लेटफार्म अपने आपके लिए काम करता है। अपनी ग्रोथ के लिए अपनी खुद की टीम के लिए । अगर हम लेखक उन प्लेटफार्म से जुड़ते हैं तो कहीं ना कहीं हमारा भी अपना एक लालच होता है कि हमें पाठक मिले। हमारी कहानियों को श्रोता मिले। आज बहुत से लेखक ऐसे हैं जो 1 से अधिक प्लेटफार्म पर काम कर रहे हैं। और यह लेखक लगातार काम कर रहे हैं। किसी प्लेटफार्म पर कहानियां लिखते हैं तो किसी दूसरे ऑडियो प्लेटफॉर्म के लिए भी अपनी कहानियां देते हैं। आप सोचिए उन लेखकों के दिन में भी 24 घंटे ही हैं। और वह उस टाइम को मैनेज करके लगातार मेहनत करते हैं। सिर्फ इसलिए कि उनकी कहानियों से उनकी कोई कमाई हो सके। लेकिन सच कहूं तो कोई भी प्लेटफार्म लेखकों को उनके परिश्रम के मुताबिक पारिश्रमिक नहीं देता। शायद इसीलिए लोगों को लेखन में कैरियर बनाने के लिए बहुत सोचना पड़ता है। ना ही इस क्षेत्र में जल्दी पैसा मिलता है और ना ही नाम। बावजूद लेखक के अंदर की भूख उसे लिखने के लिए बाध्य करती हैं। और यह भूख पैसों की भूख से कहीं ज्यादा तीव्र होती है । यह भूख होती है कि उसके लिखे को कोई पढ़े सराहे। अगर किसी लेखक को ढेर सारे पाठक मिलते हैं तो भले ही कमाई ना हो लेकिन वह उसी में संतुष्ट हो जाता है यह मेरा व्यक्तिगत विचार है जरूरी नहीं कि हर लेखक मेरे विचारों से सहमत हो।

अब मैं बात करती हूं अपने ब्लॉग और प्रतिलिपि की।

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मैं सच कहूं तो प्रतिलिपि की शुक्रगुजार हूं क्योंकि प्रतिलिपि ने ही मुझे वह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म दिया जहां आप सब से मेरी मुलाकात हो पाई। आज से ढाई साल पहले मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं लेखक भी बन सकती हूं । तब तक मैं सिर्फ और सिर्फ एक पाठक थी। प्रतिलिपि पर मैंने कभी कोई कहानी पढ़ कर लिखना नहीं सिखा। जैसा कि बाकी लेखक कहते हैं कि वह अपने शुरुआती दिनों में प्रतिलिपि पर पढ़ा करते थे और यही पढ़ते हुए उन के मन में लेखक बनने का विचार जागा। मैं बचपन से ही पाठक थी और वह भी जबरदस्त पाठक । पढ़ने का इस कदर शौक था कि मैं रोज घर पर आने वाले दोनों न्यूज़पेपर पूरे चट कर जाने के बाद सारे एडवर्टाइजमेंट और यहां तक कि निधन वाले कॉलम भी पढ़ लिया करती थी। जब कभी बचपन में मैं अपनी अलमारी जमाया करती तो कहीं भी अगर न्यूज़ पेपर बिछाने की पारी आती तो मैं उस पेपर को खोलकर घंटों तक पढ़ती रह जाती। मेरे इसी पढ़ने के शौक में जाने कितनी बार मेरी चाय के बर्तन को दूध की गंज को जला दिया। कॉलेज के दिनों में भी मेरा यही हाल था। संडे हमारा एक टाइम फीस्ट होने के कारण शाम के समय हमारा टिफिन नहीं आया करता था और तब पारी पारी से हम सहेलियां सबके लिए मेगी बनाया करती थी। जिस दिन मेरी पारी होती थी आप सोच ही सकते हैं कि मैं कितना बंटाधार करती रही होंगी। मैंगी चढ़ा कर वहीं खड़े-खड़े मैं कोई ना कोई किताब खोल कर पढ़ने लग जाया करती थी और मैगी की जलने की खुशबू सूंघकर मेरी सहेलियां दौड़कर रसोई में भागती थी कि आज फिर मैंने उनके डिनर को जला दिया।

पढ़ने के इतने जल्लादी शौक के बाद भी मुझे लेखन हमेशा से रॉकेट साइंस लगा करता था। मैं जब भी अपने पसंदीदा लेखकों को पढ़ती थी तो यही सोचती थी कि लिखना बहुत मेहनत का काम है। कैसे कोई लेखक इस कदर हमारी भावनाओं को अपने पन्नों पर उतार लेता है। और कैसे हम उसके लिखे को पढ़कर बिल्कुल वही महसूस करने लगते हैं। उसके लिखे शब्दों के साथ हंसते हैं और उसी के लिखे शब्दों को पढ़कर रोते हैं। ऐसा कैसे संभव हो सकता है? मेरे लिए लेखक हमेशा से परम श्रद्धेय थे अब भी हैं और हमेशा रहेंगे!

आप में से कई लोग बहुत बार यह सवाल भी कर चुके हैं कि मैं प्रतिलिपि पर इन लेखकों को पढ़ती हूं तो मैं आपको बताना चाहती हूं कि मैं जिम साहित्यकारों को पढ़कर बड़ी हुई हूं और जिनकी रचनाएं आज भी समय निकालकर पढ़ती हूं उनमें से प्रेमचंद शरतचंद्र ममता कालिया आदि के अलावा शायद ही किसी की रचना प्रतिलिपि पर मौजूद हो।

प्रतिलिपि पर आज के नए लेखकों की भरमार है और सभी बेहद खूबसूरत लिखते हैं। लेकिन इनमें से किसी को भी पढ़ने का अब तक सौभाग्य नहीं मिल पाया और इसका कारण उन लेखकों की कमी नहीं बल्कि मेरे पास वक्त की कमी है। जब थोड़ा सा समय मिलता है आप सभी के लिए कुछ ना कुछ लिखने की कोशिश करती हूं और इसी कोशिश में किन्ही भी नए लेखकों को नहीं पढ़ पाती हूँ।

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प्रतिलिपि पर जब से मोनेटाइजेशन शुरू हुआ लेखकों के बीच भी एक होड़ सी लग गई अपने सब्सक्राइबर्स बढ़ाने की होड । पर देखा जाए तो इस बात पर हम लेखकों का कोई कसूर भी नहीं आज तक निशुल्क लिखी रहे थे लेकिन जब कहानी पर कमाई का जरिया मिला है तो कोई भी क्यों छोड़ना चाहेगा।

इसके बाद बात शुरु हुई पाठकों की नाराजगी की । सब्सक्रिप्शन से हटाने के लिए लोगों ने इनबॉक्स में भूकंप ला दिया। पहले पहल मैंने भी सोचा कि मैं अपनी कहानियों को सब्सक्रिप्शन से हटा लूंगी लेकिन फिर यह महसूस हुआ कि अगर मैं ऐसा करती हूं तो मेरे साथ के बाकी लेखक ऐसा नहीं करते तो जाहिर सी बात है कि उनके ऊपर और भी ज्यादा दबाव डाला जाएगा कि देखिए उन्होंने तो अपनी कहानी से सब्सक्रिप्शन हटा लिया फिर आप क्यों इतना लालच कर रही हैं। जाहिर है यह कंपैरिजन नहीं होना चाहिए लेकिन होगा। अगर मैं सब्सक्रिप्शन हटाती हूं तो इसमें मेरे साथी लेखकों की तो कोई गलती नहीं है अगर वह अपनी कहानी उसे अपनी मेहनत से कोई कमाई करना चाहते हैं तो इसमें वह कोई गुनाह नहीं कर रहे बल्कि मैं पूरी तरह से उन सभी के सपोर्ट में हूं कि ऐसा करना ही चाहिए।

और इसीलिए मैंने अपनी कहानियों से सब्सक्रिप्शन नहीं हटाया। बल्कि बीच का यह रास्ता चुना कि मैं ब्लॉग पर भी अपनी कहानियां उसी समय पोस्ट कर सकूं। जिससे जो लोग सब्सक्रिप्शन लेकर नहीं पढ़ना चाहते वह मेरे ब्लॉग पर आकर उसी दिन निशुल्क उस कहानी को पढ़ सकते हैं।

इतना शानदार ऑफर देने के बावजूद अब तक बहुत से लोग प्रतिलिपि पर ही मुझे पढ़ना चाहते हैं । मैं उन पाठकों की इस बात को भी पूरी तरह समझती हूं मैं विज्ञान की विद्यार्थी हूं और अच्छे से जानती हूं कि मोमेंट ऑफ इनर्शिया यही होता है। जी हां इसे जड़त्व का नियम भी कहा जाता है इसका अर्थ है जब हम चलते रहते हैं तो हम चलना ही चाहते हैं रुकने के लिए हमारा शरीर हमारा विरोध करता है इसीलिए जब हम चलती हुई बस से उतरते हैं तो हम एकदम से स्थिर नहीं हो सकते हमें थोड़ी देर तक अपने शरीर को बस के साथ ही दौड़ आना पड़ता है या गति में रखना पड़ता है।

बस यही मोमेंट आफ इनर्शिया प्रतिलिपि पर पढ़ने वाले पाठकों के साथ भी हैं । उन्हें लगता है प्रतिलिपि पर पढ़ना आसान है। इसके अलावा कहीं भी और जाकर वह पढ़ना नहीं चाहते। मैं भी किसी पर दबाव नहीं बनाना चाहती लेकिन इसी कारण अब मुझ पर दबाव बढ़ने लग गया है । दो प्लेटफार्म पर एक साथ एक ही कहानियों को चलाना बेहद मुश्किल और तनाव भरा है। कब किस जगह पर कौन सी कहानी पोस्ट की थी। किस प्लेटफार्म पर अभी कहानी का अगला कौन सा भाग डालना है यह सब बहुत जटिल हो गया है।

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और इसीलिए अब यह सोचा है कि कुछ कहानियां सिर्फ अपने ब्लॉग पर ही लिखूंगी।

ब्लॉग पर लिखने से मुझे क्या फायदा है अब मैं उसके बारे में आप सभी को बताना चाहती हूं। पहली बात ब्लॉग पर आप सभी निशुल्क मुझे पढ़ सकते हैं दूसरी बात मेरे ब्लॉग पर अगर 1000 से ज्यादा फॉलोवर्स होते हैं तो वर्डप्रेस ब्लॉग मुझे मेरा ब्लॉग लिखने के लिए आप सब से कोई शुल्क लिए बिना मेरे अकाउंट को बिजनेस अकाउंट बना देता है और जिससे मुझे लाभ मिलता है। इसके अलावा मेरी कहानियों पर गूगल ऐड जो भी एडवर्टाइजमेंट डालता है उससे भी मुझे रेवेन्यू जेनरेट होता है यानी कि मेरी कमाई होती।

अब आप सोचिए कि ये आपके और मेरे दोनो के लाभ का सौदा है। आपको कुछ नहीं करना सिर्फ आकर मुझे पढ़ना है वह भी पूरी तरह से निशुल्क और उसके बदले मुझे गूगल से और वर्डप्रेस से पैसे दिए जाएंगे क्योंकि मेरा पेज बार-बार खोला जा रहा है और मेरे पेज पर एडवर्टाइजमेंट नजर आ रहे हैं।

क्योंकि यह मेरा पर्सनल ब्लॉग है और यह गूगल पर है तो इसलिए 1000 फॉलोअर्स से अधिक होने पर गूगल भी मुझे कुछ निश्चित राशि देना शुरू करेगा। मैं मानती हूं यह राशि बहुत कम है ।रेवेन्यू बहुत ज्यादा जनरेट नहीं होता लेकिन फिर भी मुझे मंजूर है। क्योंकि यहां मेरे पाठकों को मुझे पढ़ने के लिए कुछ भी खर्च करने की जरूरत नहीं है। लेकिन मुझे फायदा बढ़ाने के लिए आप यह जरूर कर सकते हैं कि मेरी कहानियों को आप अपनी सोशल अकाउंट पर शेयर कर सकते हैं। मेरे इस पेज यानी अनकहे किस्से को आप ज्यादा से ज्यादा अपने इंस्टाग्राम फेसबुक आदि अकाउंट पर शेयर कर सकते हैं। अगर आप सभी के फेसबुक पर 100 दोस्त भी हैं, और अगर उन्हें मेरी कहानी पढ़ना पसंद आता है ।तो वह मेरे ब्लॉग पर आकर मुझे फॉलो कर सकते हैं और इस तरह मेरे फॉलोवर्स की संख्या बढ़ सकती है। और साथ ही बढ़ सकते हैं मेरी रोजाना के व्यूज। आपको इस सम्बंध में कोई भी डाउट है तो आप समीक्षा में मुझसे खुल कर पूछ सकते हैं।

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वैसे यह आप सभी का प्यार ही था कि पहले महीने में ही मेरे ब्लॉग पर लगभग रोज के 1000 से ज्यादा व्यूज आने लग गए थे। लेकिन आप सभी को एक बार फिर अपना प्यार साबित करना पड़ेगा मेरे फॉलोवर्स बढ़ाने में और मेरे व्यूज बढ़ाने में सिर्फ आप सभी मेरी मदद कर सकते हैं।

प्रतिलिपि और मेरी मोहब्बत कितनी तगड़ी है यह तो आप सब जानते हैं । वहाँ पर ढेर सारे लेखक अपने कुकू एफएम पॉकेट एफएम के पोस्ट शेयर करते रहते हैं लेकिन उनसे प्रतिलिपि को कोई परेशानी नहीं है। और मैं ने जैसे ही अपने ब्लॉग के बारे में लिखा मुझे तुरंत नोटिस जारी कर दिया। इसलिए अब वहां मैं अपनी कोई पोस्ट शेयर नहीं कर सकती। हो सकता है कि कई पाठकों को शायद यह पता ही नहीं कि मैं अब मेरे ब्लॉग पर भी लिखती हूं तो दोस्तों हो सके तो आप सभी के सोशल अकाउंट पर मेरी कहानियों या मेरे पेज का प्रचार करने में मेरी मदद करें।

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बाकी तो आप सभी जानते हैं कि मैं संस्कारी बहुत हूं इसलिए पंगों से दूर ही रहती हूं। पर अब जाने क्यों आप सभी ब्लॉगर जो मेरे ब्लॉग पर मुझे फॉलो करते हैं से एक अलग से जुड़ाव हो गया है आप लोगों के सामने तो दिल खोल कर मैं अपनी भड़ास निकाल सकती हूं। तो बस मुझे दिवाली तक में 1000 फॉलोअर्स चाहिए और साथ ही चाहिए डेली के 2000 प्लस व्यूज भी।

वहां 22000 लोग फॉलो करते हैं पर पता नहीं क्यों फॉलो करते हैं। मेरी बात सुनते तो है नहीं पर चलो कोई नहीं। जो सुनते हैं वह लोग भी अगर मान गए तो भी बहुत बड़ी बात है।

एक और बात कहनी थी आप 297 फॉलोअर्स यहां मौजूद हैं। क्या आप सभी को मेरी हर पोस्ट की नोटिफिकेशन मिलती है। अगर आप लोगों को नोटिफिकेशन नहीं मिलती तो प्लीज प्लीज प्लीज मुझे इस पोस्ट पर मैसेज करके बताइए। मेरा टेलीग्राम चैनल और फेसबुक पेज की लिंक भी मैं आपसे शेयर करूंगी। आप हो सके तो मेरे फेसबुक पेज को भी फॉलो कर सकते हैं और टेलीग्राम चैनल को भी। जिससे मैं हर कहानी की पोस्ट का लिंक वहां शेयर कर सकूं।

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और अगर आप इतना सारा मेरे लिए करेंगे तो मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं नई नई अनोखी और अलग हटकर कहानियां आप लोगों के लिए सिर्फ आप लोगों के लिए अपने ब्लॉग पर लिखती रहूं।

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आप सभी की संस्कारी लेखिका

aparna…..

जीवनसाथी- 122

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    जीवनसाथी -122

      गाड़ी खाई से निकाली जा चुकी थी। गाड़ी महल की ही थी, जो विराज के नाम से थी लेकिन उसमें विराज नही था।
         गाड़ी में केसर थी, लेकिन उसके पिता नदारद थे। सड़क पर आते जाते लोगों का भी मजमा लगा हुआ था। पुलिस की गाड़ी के साथ ही एंबुलेंस भी लगी खड़ी थी।
  भीड़ को चीरते महल के लोग भी वहाँ पहुंच गए थे। समर और आदित्य के साथ ही युवराज भी आ चुका था।
रेखा को बाँसुरी ने महल में ही रोक लिया था। इतना सब हो हल्ला होते देख विराज को ढूंढ़वाने युवराज ने पहले ही अपने लड़कों को दौड़ा दिया था।
    विराज के बरामद होते ही युवराज ने उससे फ़ोन में बात कर सारी बातें उसे बता दी थी और तुरंत महल वापसी का फरमान सुना दिया था।
    अजातशत्रु से विराज का बैर अलग था लेकिन युवराज के लिए उसके मन में सम्मान था और इसी कारण वो उससे दबता भी था।
    बिना कोई बहाना किये  वो कुछ देर में ही महल चला आया था।
   उसे सामने सही सलामत देख रेखा की जान में जान आ गयी थी।
   ” बाँसुरी हमें लगता है गाड़ी में केसर दीदी और पिता साहब रहें होंगे।”
    रेखा का शक सहीं भी साबित हुआ था।

*****

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    गाड़ी की हालत बहुत खराब थी, और उससे भी ज्यादा गाड़ी में मिलने वाली लाश की। सिर्फ कपड़ों के रंग, जूतों और हाथ में बंधी महंगी घड़ी से ही लाश की पहचान केसर के रूप में हो पाई थी।
   गाड़ी का भयानक एक्सीडेंट हुआ था इसलिए लाश का पोस्टमार्टम होना बहुत जरूरी था इसीलिए एंबुलेंस में उसे डालकर अस्पताल की और भेज दिया गया। पंचनामा करने के बाद पुलिस बाकी औपचारिकताओं को पूरा करने चली गई महल से सारे लोग वापस लौट आए लेकिन समर आदित्य के साथ अस्पताल चला गया था।
       महल में यह खबर पहुंचते ही कि केसर जिस गाड़ी से जा रही थी वही गाड़ी दुर्घटनावश या किसी बड़ी गाड़ी की चपेट में आकर खाई में गिर चुकी थी, एक बार फिर दुख का माहौल बन गया था ।
रेखा पिछले कुछ दिनों में इतनी बार रो चुकी थी कि अब उसके आंसू थम गए थे। वह समझ गई थी कि उसकी केसर  दी अब हमेशा हमेशा के लिए उसे छोड़ कर जा चुकीं थीं, लेकिन एक बात थी कि जाने से पहले उन्होंने उसे एक रास्ता दिखा दिया था अपनी जिंदगी का रास्ता।
     केसर वहां से जाने से पहले रेखा से मिलकर अपनी प्रोजेक्ट की सारी डिटेल उसे समझा चुकी थी। इसके साथ ही उसने सारे कागज पत्तर रेखा के हवाले कर दिए थे।
   रेखा ने केसर से मिलकर उसे रोकने और समझाने की बहुत कोशिश की थी। लेकिन केसर रेखा को ही अपनी बातें समझा गई थी।
     केसर ने रेखा से स्पष्ट कहा था कि वह यहां से निकलकर अपनी नई जिंदगी जीना चाहती है। अब तक कि उसकी जिंदगी में शायद उसे कुछ भी वैसा नहीं मिला जिसकी उम्मीद थी लेकिन अब वह अपनी जिंदगी अपने हिसाब से बनाना चाहती है। उसने जाने से पहले अपने पिता साहब के एक मित्र का जिक्र भी किया था कि उनसे एक बार मिलने की इच्छा है तो हो सकता है हम लोग महल से निकलने के बाद उनसे मिलने जाए।
    
    जब बांसुरी निरमा और बाकी लोग रेखा को सांत्वना देते उसके आंसू पोंछ रहे थे उसी वक्त उनमें से किसी ने बताया कि वहां केसर की ही लाश मिली थी और रेखा के पिता साहब वहां मौजूद नहीं थे।
   यह सुनते ही रेखा को केसर की वह बात याद आ गई थी और उसने तुरंत युवराज भाई साहब को अपने पिता के उन मित्र का पता ठिकाना और फोन नंबर दे दिया था।
   रेखा का सोचना सही निकला युवराज ने उस नंबर पर फोन कर जब पतासाजी की तो पता चला रेखा के पिता वहीं मौजूद थे।
  उनसे बात करने पर सारी बातें और स्पष्ट हो गई थी उन्होंने बताया कि रेखा उन्हें वहां छोड़कर अकेली ही अपनी हवेली के लिए निकली थी और उसका कहना था कि दो दिन में हवेली साफ करवा कर अपने पिता को वहां बुला लेगी।
    रेखा को अब सारी बातें समझ में आने लग गई थी। उसकी केसर दीदी बहुत दिन से परेशान थी। उसे और उसके आत्मसम्मान को अब इस महल में रहना पसंद नहीं आ रहा था। रेखा यह सब जानते समझते हुए उसे भी यही समझाती रहती थी कि महल के लोग उसके बारे में अब कुछ नहीं सोचते लेकिन इतना समझाने के बावजूद केसर के मन में जो चल रहा था आखिर उसने अपना निर्णय उसी आधार पर लिया।
    इसलिए ही तो रेखा के इतना ज़िद करने पर भी उसने ड्राइवर साथ लेकर जाने से इंकार कर दिया था और कह दिया था कि हवेली में पहुंचने के बाद वह अपने सबसे भरोसेमंद आदमी के हाथों गाड़ी वापस भिजवा देगी।
    जाने  केसर के दिमाग में यह सब कब से चल रहा था। क्योंकि उसने कुछ समय पहले ही बिजनेस के सारे लीगल पेपर रेखा के नाम से तैयार करवा लिए थे। यहां तक कि एनजीओ में भी अपने नाम के साथ साथ रेखा का भी नाम हर जगह डलवाया था। रेखा को याद आने लगा कि उसने इस बात पर आपत्ति भी की थी….-” सारा काम तो आप करेंगी जीजा साहब फिर नाम हमारा क्यों डाला है? इसका मतलब मेहनत करें आप और प्रॉफिट में हिस्सेदार हों हम! यह कैसा न्याय हैं आपका। “
   तब  केसर ने बड़े प्यार से रेखा के सर पर हाथ फेर कर उसे अपने गले से लगा लिया था…-” हमारा सब कुछ आपका ही तो है। इस जिंदगी में और कुछ कमाया हो या ना कमाया हो। रुपए तो हमने बहुत कमा लिया आपके लिए रेखा। यह सब कुछ आपका ही है, बस यह याद रखना कि आपको इस सब की सार संभाल करनी है। “
” हमसे यह सब नहीं होगा जीजा साहेब। हम अपने घर परिवार और बच्चे में ही खुश हैं हमारी जिंदगी तो बस इतनी ही है इन्हीं सबके बीच।”
” नहीं अब तुम्हारा बेटा भी बड़ा होने लगा है इसलिए घर परिवार की परिधि से भी बाहर खुद को पहचानो रेखा। “
     रेखा को अब केसर कि कहीं हर बात धीरे-धीरे समझ में आ रही थी मतलब इतने दिनों से वह जो प्रोजेक्ट तैयार कर रही थी वह पूरी तरह से रेखा को खड़े करने के लिए था । उसने अपनी हवेली, बिज़नेस सभी में रेखा का नाम जुड़वा दिया था। और इतना सब करने के बाद पिता साहब को लेकर निकल गयी।
   उन्हें उनके सबसे करीबी दोस्त कम पार्टनर के घर छोड़ वो अकेली ही अपनी मंज़िल तय करने निकल गयी।
     यानी केसर महल से निकलते समय ही ये तय कर चुकी थी कि उसे अब ज़िंदा नही रहना।
   उसकी गाड़ी वाकई किसी बड़ी गाड़ी से टकरा कर असंतुलित हो खाई से गिर गई या उसने जानबूझकर उस खतरनाक मोड़ पर अपनी गाड़ी खाई में गिरा दी, यह राज अब केसर के साथ ही हमेशा हमेशा के लिए चला गया।

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     रेखा ने आंसू भरी आंखें उठा कर ऊपर देखा समर और आदित्य भी वापस चले आए थे। आदित्य भरी आंखों से आकर रेखा के पास बैठ गया उसने रेखा के दोनों हाथ थाम लिए।
    आज भले ही उन दोनों का देखा जाए तो कोई रिश्ता नहीं था। लेकिन आज से 6 महीने पहले तक दोनों भाई बहन के रिश्ते में बंधे थे। और दिल से आज भी आदित्य रेखा को अपनी छोटी बहन ही मानता आया था । जाते-जाते केसर ने उसके ऊपर रेखा की जिम्मेदारी भी डाल दी थी।
   वो मज़बूत था। उसकी आँखों में बहुत जल्द ऑंसू नही आया करते थे। और आज भी उसने अपने दिल में बहते आंसूओं को बाहर आने से रोक लिया था।
     
     विराज भी भागता दौड़ता वापस आ गया था। उसे भी अब तक रेखा और केसर की सच्चाई मालूम हो चुकी थी,  रेखा के पास बैठे आदित्य को देख वो दूसरी तरफ आ कर बैठ गया।

” खुद को सम्भालिए रेखा, ये वक्त मज़बूत होने का है न कि कमज़ोर होकर बिखर जाने का। आपके पिता साहब को हम महल वापस ले आते हैं। चलिए …”!

  रेखा आश्चर्य से विराज को देखती रह गयी… उसने धीरे से मना कर दिया…-” ,हमारी बात हुई थी उनसे। अभी वो वहीं रहना चाहतें हैं।
 
“ठीक है जैसी उनकी मर्जी। वैसे आप चाहें तो हम चलतें हैं आपके साथ। केसर बाई सा की बॉडी लाने…”

  रेखा पर एक के बाद एक बम फूट रहे थे, उसकी समझ से बाहर था कि आज विराज को हो क्या गया था।
    उसने धीरे से सिर हिला कर मना कर दिया। उसकी हिम्मत नही थी अपनी केसर दीदी को वैसे देखने की। पुलिस ने पंचनामा करने के बाद वैसे भी बॉडी को अस्पताल भेज दिया था,पोस्टमॉर्टम के लिए।
    रेखा ने आदित्य की तरफ देखा, वो खुद खोया सा बैठा बाहर कहीं दूर देख रहा था।
  समर धीमे कदमों से आकर आदित्य के पास खड़ा हो गया। उसने धीरे से उसके कंधों पर हाथ रख दिये, आदित्य समझ गया कि समर उससे कुछ कहना चाहता है…
   आदित्य के समर की ओर देखते ही समर ने अपनी बात कह दी…-” हमें वापस अस्पताल जाना होगा आदित्य! उन्हें कोई कंसेंट फॉर्म भरवाना है।”
   आदित्य ‘हाँ’ में सिर हिला कर खड़ा हो गया। उसने आंखों ही आंखों में रेखा की तरफ देखा और चलने के लिए इशारों में ही पूछ लिया। रेखा ने सिर हिला कर मना कर दिया।
    आदित्य और समर अस्पताल निकल गए…

  अस्पताल में समर आदित्य को साथ लिए पिया के केबिन के बाहर पहुंचा की बाहर खड़ी नर्स ने समर को पहचान कर केबिन का दरवाजा खोल दिया…-” आप अंदर बैठिये सर। मैडम एक डिलीवरी में हैं। निपटा कर यहीं आएंगी। आप लोगों के लिए चाय ले आऊं तब तक? “
    ‘न’ में सिर हिला कर दोनों थके हारे से वहीं बैठ गए। आदित्य का मन बेचैन सा हो रहा था, उसे बार-बार यही लग रहा था कि केसर ऐसा कदम नही उठा सकती। या तो उसके किसी दुश्मन ने ऐसा किया या केसर के किसी दुश्मन ने। पर कौन हो सकता है।
   वो सोचता सोचता टहलते हुए दरवाजे तक पहुंचा ही था कि एक झटके से दरवाज़ा खुला और एक औरत उसके सामने चली आयी…-” सर ! मैं आपसे रिक्वेस्ट करती हूँ, उस फूल सी बच्ची का पोस्टमार्टम मत कीजिये। प्लीज़ हो सके तो उसकी बॉडी हमें वापस कर दीजिए। हम लोग वैसे भी बहुत शर्मिंदा हैं कि उसके माँ …
    नीली आसमानी साड़ी में अपने लंबे बालों को करीने से पीछे बांध माथे पर छोटी सी बिंदी लगाए वो औरत अपने चश्में के भीतर से उसे घूरती कहने लगी कि उसकी बात आदित्य ने काट दी…

” जी आप किसकी बात कर रहीं हैं? मैं शायद नही समझ पा रहा। मैं इस शहर से भी नही हूँ…”
  आदित्य कुछ कह पाता कि वो एक बार फिर वही सब कहने लगी…-” देखिए वो बच्ची परेशान थी। लेकिन उसकी परेशानी का कारण “मायानगरी” नही है। वो असल में उसने मुझसे सारी बात बताने की कोशिश की थी,कुछ थोड़ा बहुत मैं जानती भी हूँ…

उनकी बातों के बीच ही कमरे का दरवाजा खोले पिया भीतर चली आयी।
   वो उस दूसरी खड़ी औरत की तरफ देखते ही सब समझ गयी। उसने अपनी टेबल से पानी का गिलास उठा कर उसकी तरफ बढ़ा दिया…-” जैसा आप सोच रहीं हैं मैडम वैसा नहीं है यह डॉक्टर नहीं है यह खुद भी एक….”
   आगे की बात पिया भी नहीं कह पाई उसने उस औरत को एक कुर्सी पर बैठाया और खुद जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गई समर और आदित्य की तरफ उसने कुछ पेपर्स बढ़ा दिये….

” केसर जी की पहचान सिर्फ उनके कपड़ों और उनके हाथ में बंधी इस घड़ी से हो पाई है। अगर आप लोगों को ये शंका हो कि ये केसर नही कोई और है तो हम लोग डी एन ए टेस्ट करवा सकते हैं।”

” क्यों केसर का चेहरा…?”

” एक्सीडेंट में बुरी तरह से खराब हो चुका है। आप देख कर शायद ही पहचान पाएं। वैसे अगर आप लोग देखना चाहतें हैं तो देख सकते। हैं। अभी उनका पोस्टमार्टम किया जा रहा है।
   मैं तो यही कहूंगी की आप लोग उन्हें घर लेकर जाने की जगह यही उनका क्रिमेशन भी करवा दें। क्योंकि उनकी बॉडी की जो हालत है , वो घर लेकर जाने लायक नही है।”

“मैं फिर भी एक बार देखना चाहता हूँ..”

  आदित्य के ऐसा कहते ही पिया ने समर की तरफ देखा और आदित्य को देख “हाँ” में सिर हिला दिया। वो अपनी जगह से उठ खड़ी हुई। उसके पीछे ही समर आदित्य और वो दूसरी औरत भी चल पड़ी।
   मॉर्ग( मुर्दाघर) में पिया बेधड़क अंदर घुस गई लेकिन समर बाहर ही खड़ा रह गया। आदित्य धीरे से अंदर चला गया। पिया ने केसर के चेहरे पर पड़ी चादर हटा दी। और उसे देख साथ खड़ी मैडम ने अपना सिर थाम लिया, उसी की बाजू वाली बेड पर उस लड़की की लाश पड़ी थी। उसकी बंद आंखे  और चेहरा देख मैडम खुद को संभाल नही पायी और सिसक कर रो पड़ी। उनका रोना बढ़ते बढ़ते तेज़ होता चला गया और उनकी हिचकियाँ बंध गयीं।

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   पिया को आकर उन्हें संभालना पड़ा…-“मैडम प्लीज़ खुद को संभालिए। मैं समझती हूं वह आपकी यूनिवर्सिटी की लड़की थी पर इस वक्त उसके माता-पिता को इनफॉर्म करना बेहद जरूरी है। “
   पिया उन सब से बात कर रही थी कि बाहर से वॉर्ड बॉय ने पिया को पुकार कर कहा कि पुलिस की गाड़ी बाहर आई है।
    उसकी बात सुन पिया अपने कमरे की तरफ बढ़ गयी। उसके पीछे ही आदित्य और वो मैडम भी चली आयीं।
    समर पहले ही आकर उसके केबिन में बैठ चुका था। उसे जाने क्यों मुर्दाघर के बाहर पहुंचते ही अजीब सी घुटन महसूस हो रही थी। उसकी बिगड़ी शक्ल देख पिया ने उसकी तरफ पानी का गिलास बढ़ाया ही था कि उसके दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी और दरवाजा खोल कर दो पुलिस के अधिकारी अंदर चले आए।  उनके आते तक में पिया ने अस्पताल में उस वक्त मौजूद बाकी दोनों सीनियर डॉक्टर्स को भी बुलवा लिया था।
  पिया ने उन दोनों में अधिकारियों का अभिवादन कर उन दोनों को बैठने के लिए जगह दी इसके साथ ही वह समर और आदित्य की तरफ घूम गई….
” अगर आप लोगों की इजाजत हो तो हम अस्पताल की तरफ से केसर….. केसर जी का क्रीमेशन कर देंगे! आप लोगों को ये कंसेंट फॉर्म भर कर साइन करना होगा। “
    समर को भी उस वक्त पिया की बात सहीं लगी। उसने आदित्य के कंधे पर हाथ रखा। आदित्य ने नीचे सिर किए हुए ही  “हां” में सर हिला दिया !समर ने पिया को इजाजत दे दी।
    पिया उन पुलिस वालों से बातों में लग गई” सर आप लोग चाय या पानी कुछ लेंगे”
  ” नहीं डॉक्टर पिया इस वक्त हम सिर्फ उस लड़की के बारे में पूछताछ करने आए हैं। आप उनके बारे में क्या बता सकती हैं?”
” सर ये मैडम माया नगरी यूनिवर्सिटी के मेडिकल कॉलेज में लैब अटेंडेंट हैं, वह लड़की जिसने मेडिकल कॉलेज में सुसाइड किया है इनकी रिश्तेदार थी उसके बारे में यह ही आपको बता सकती हैं। “

   उन दोनों में से एक पुलिस वाले ने उन मैडम की तरफ देख कर अपना हाथ आगे बढ़ा दिया” जी नमस्कार मैं इंस्पेक्टर रोहित हूं। पहले बनारस में काम कर रहा था अभी ट्रांसफर में यहां 2 महीने पहले ही ज्वाइन किया है। आप तफ्सील से मुझे उस लड़की का नाम ?वह क्या पढ़ती थी? क्या करती थी? सारी बातें बता सकती हैं। “

” जी इंस्पेक्टर साहब नमस्ते। मेरा नाम रागिनी श्रीवास्तव है! मैं मायानगरी यूनिवर्सिटी के रानी बांसुरी मेडिकल कॉलेज के फिजियोलॉजी डिपार्टमेंट में लैब अटेंडेंट का काम करती हूं। यह लड़की दूर के रिश्ते में मेरी भतीजी होती थी। अभी सेकंड ईयर में थी। मेरा मतलब है फर्स्ट ईयर पास करके सेकंड ईयर में आई ही थी। “

” इसने क्यों सुसाइड किया? क्या आप इन बातों पर रोशनी डाल सकती हैं?”

” सर ये यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में ही रहा करती थी। इसलिए मैं ज्यादा कुछ तो नहीं बता सकती, लेकिन यह बता सकती हूँ, कि लड़की पढ़ने में बहुत होशियार थी। मध्यम वर्गीय परिवार की लड़की थी सर । इसने ऑल इंडिया मेडिकल एंट्रेंस में टॉप किया था। टॉप फिफ्टी में जगह बनाई थी सर।  और खुद ही मायानगरी का चुनाव कर के यहां आई थी।
      सर आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि उसके शरीर के साथ छेड़छाड़ मत करवाइए।  उसके माता-पिता उसे इस हालत में नहीं देख पाएंगे । उनके सपनों को पूरा करने ही वो यहां आई थी। उनके लिए यह सदमा बहुत बड़ा है, कि उनकी बेटी अब नहीं रही। सर आपसे एक रिक्वेस्ट और है , डॉक्टर मैडम से गुजारिश करके उसका पोस्टमार्टम रुकवा दीजिए।
      सर मैं बताना चाहती हूं कि उसके सुसाइड में हमारे मायानगरी का कोई हाथ नहीं है। वह किसी तरह की उलझन या परेशानी में नहीं थी। क्योंकि अभी लगभग एक हफ्ते पहले ही मेरी उससे बात हुई थी। और वह काफी खुश लग रही थी।
   वह शायद अपने साथ वाले बच्चों को और कुछ मेडिकल के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाना शुरू कर चुकी थी। क्योंकि उसने मुझसे कहा था कि मेरी कमाई शुरू हो गई है। बहुत खुश थी वह। मैंने कभी नहीं सोचा था कि वह ऐसे सुसाइड कर लेगी।”

  रोहित ने मुड़कर पिया की तरफ देखा….-” डॉक्टर साहब क्या बिना पोस्टमार्टम के बॉडी इन के हवाले की जा सकती है?

पिया ने “ना” में सिर हिला दिया…-” सर हमें मौत का कारण कैसे पता चलेगा? “
” जी आपकी बात भी सही है। ” रोहित वापस उन मैडम की तरफ मुड़ गया…-” मैं देखता हूं क्या हो सकता है। और यह कहना चाहता हूं कि मुझे अभी इसी वक्त आपकी यूनिवर्सिटी का चक्कर लगाना पड़ेगा। “
“सर आप बिल्कुल हमारी यूनिवर्सिटी में आ सकते हैं! पर मैं फिर आपसे गुजारिश करूंगी कि अगर आप लोग सादे कपड़ों में आकर पूछताछ करें तो ज्यादा अच्छा रहेगा । असल में हमारे यहाँ मैनेजमेंट सीट के भी बहुत सारे बच्चे हैं तो इसलिए हमारी रेपुटेशन का भी थोड़ा…

” जी मैं समझता हूं।” रोहित ने उसकी बात बीच में ही काट दी और समर की तरफ मुड़ गया…-” समर जी यह राजा अजातशत्रु की बनाई यूनिवर्सिटी ही तो नहीं है कहीं। “

समर और रोहित आपस में परिचित थे। फिर अभी कुछ दिन पहले ही दून वाले केस के समय भी रोहित ने समर की बहुत मदद की थी। आज भी यहां मिलते ही दोनों एक दूसरे को पहचान कर अभिवादन कर चुके थे।
  समर के हाँ में सिर हिलाते ही रोहित चौक कर अपनी जगह से खड़ा हो गया। और अचानक उसका ध्यान इस बात पर गया कि अस्पताल में समर और आदित्य मौजूद है।

“क्या आप दोनों भी उसी केस के सिलसिले में यहां आए हुए हैं।”

” ना ” में सिर हिलाकर समर केसर के साथ घटी वारदात रोहित को बता गया रोहित चौक कर आदित्य की तरफ देखने लगा…

“यह केसर कहीं रेखा की बड़ी बहन तो नहीं? “

आदित्य के हां कहते ही रोहित के चेहरे पर परेशानी के भाव झलकने लगे । वह अपनी जगह से उठकर बाहर निकल गया। बाहर निकलते हुए उसने अपने साथ वाले पुलिस वाले को भी बाहर बुला लिया। उनसे कुछ देर बात करने के बाद वह वापस समर की तरफ बढ़ गया…-” अगर आप लोग बुरा ना माने तो क्या मैं आप लोगों के साथ एक बार महल चल सकता हूं।”

समर और आदित्य के हाँ कहते ही वो पिया के पास पहुंच गया…-” डॉक्टर साहब मैं एक बहुत जरूरी काम निपटा कर महल से वापस आता हूं! उसके बाद आगे की तफ्तीश करूंगा!  तब तक के लिए अगर हो सके तो आप पोस्टमार्टम शुरू मत करवाइएगा।
    रोहित ने  एक नज़र उन मैडम की तरफ देखा। मैडम ने उसकी तरफ देखकर दोनों हाथ जोड़ दिये।  रोहित समर और आदित्य के साथ बाहर निकल गया।

   समर ड्राइविंग सीट पर बैठ गया आदित्य उसके साथ वाली सीट पर और रोहित पीछे बैठ गया।

  ” मैं समझता हूं तुम बहुत परेशान हो आदित्य।  लेकिन भगवान के रचे  खेल को कोई नहीं समझ सकता । जिसका जितना साथ होता है वह उतना ही साथ देता है।”

  समर की बात सुनकर आदित्य उसकी तरफ देखने लगा….-” क्या तुम्हें पूरा भरोसा है कि वह केसर की ही बॉडी थी? “

  समर आश्चर्य से आदित्य की तरफ देखने लगा-” तुम कहना क्या चाहते हो? “

” वह केसर नहीं थी। मैं जानता हूँ,वो केसर नही थी।”
  अपनी बात कह कर आदित्य चुपचाप सामने देखने लगा समर ने कुछ सोचते हुए गाड़ी और तेजी से महल की तरफ दौड़ा दी।

क्रमशः

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दिल से….

     प्यारे दोस्तों कैसे हैं आप सब?  पिछली तीन चार दफा से ऐसा हो रहा था कि, आप सब मुझसे शिकायत कर रहे थे कि आपको “दिल से” पढ़ने नहीं मिल रहा! तो यह भी एक कारण था आज “दिल से” लिखने का और दूसरा कारण था कहानी में आई नई गुत्थियों को आपके सामने थोड़ा सा सुलझा सकूं।
  
      मेरे जो पाठक सिर्फ जीवनसाथी पढ़ रहे हैं। उन्हें यह सुसाइड वाला एंगल शायद समझ में नहीं आ पाया होगा, लेकिन मैंने पहले भी कहा था कि जीवन साथी खत्म होने के बाद वह माया नगरी के साथ चलती रहेगी तो बस यही बात है।
    मायानगरी के छठवें  भाग के अंत में मेडिकल कॉलेज हॉस्टल में एक लड़की ने सुसाइड कर लिया था।  वही कड़ी जीवनसाथी के इस भाग में जोड़ी गई है। लेकिन आप लोग निश्चिंत रहिए जो पाठक सिर्फ जीवनसाथी पढ़ रहे हैं, उन्हें निराश होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि इस सुसाइड केस से जुड़ी जितनी भी बातें मायानगरी की है वह जीवन साथी के अगले भाग में आपको पढ़ने मिल जायेंगी।
    दूसरी बात माया नगरी में भी इस मर्डर मिस्ट्री को सुलझाया जाएगा लेकिन वह कॉलेज और वहां के स्टूडेंट के पॉइंट ऑफ व्यू से होगा। रंगोली और अभिमन्यु के नज़रिए से।
      दोनों ही कहानियों में किसी तरह का कोई रिपीटेशन नहीं होगा। बावजूद जो पाठक जीवनसाथी पढ़ रहे हैं वह भी संतुष्ट रहेंगे और जो मायानगरी पढ़ रहे हैं वह भी संतुष्ट रहेंगे।
     और जो पाठक दोनों कहानियां पढ़ रहे हैं उनकी तो फिर बल्ले-बल्ले है।
    तो आप सब पढ़ते रहिए त्योहारों को एंजॉय करते रहिए।
   

    और एक छोटी सी बात …..
    …..   याद रखें नवदुर्गा 9 दिन बैठती हैं हम उन्हें नौ दिन पूजते हैं । लेकिन उनका आदर हमें साल के 365 दिन करना है , अपने आसपास रहने वाली बच्चियां लड़कियां युवतियां औरतें प्रौढा वृद्धाएं सभी में वही नवदुर्गा है बस नजर और नज़रिए का अंतर है।

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    हमारी तरफ तो खूब गरबा और डांडिया होता है। आपकी तरफ भी होता होगा तो लगे रहिए झूम झूम कर करते रहिए और एक दूसरे के साथ त्योहारों का आनंद लीजिए…

          पेथल पुरमा सुनले ओ छोरिया
           झूमे नगरिया जब जब ये घूमे
             कमरिया रे थारी कमरिया
             कमरिया रे थारी कमरिया….

    शुभो नवरात्रि !!!

   मुझे पढ़ने और सराहने के लिए आप सबों का हार्दिक आभार प्रियजनों!!!

aparna…..

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मायानगरी -6

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   मायानगरी-6

    होस्टल के कमरे में रंगोली रोती बैठी थी और झनक की समझ से बाहर था कि आखिर ऐसी कौन सी बात हो गयी जो रंगोली ऐसे धुंआधार रोये पड़ी है।

” अरे कुछ बता भी दो यार रंगोली! हुआ क्या? क्या रैगिंग वाली बात से परेशान हो ? ये सब बहुत कॉमन है यार। इसके लिए इतना टेंशन लेने की ज़रूरत नही है। बस कुछ दिनों की बात है फिर यही सीनियर्स खूब हेल्प करेंगे। ले पानी पी और अब चुप हो जा।”

   पानी पीकर रंगोली थोड़ा संभली और अपनी परेशानी उसने कहनी शुरू की…-“झनक यार इस लड़के ने मुझे कहीं का नही छोड़ा।”
  झनक चौन्क कर रंगोली को देखने लगी, उसे रंगोली की बात एकदम से समझ में नही आई…-” किस की बात कर रही है तू ?”
“वही इंजीनियरिंग वाला। कहाँ से आकर गले पड़ गया यार। अब क्या करूँ। ये तो हर जगह मुझे बदनाम करने में लगा हुआ है। सीनियर्स पर प्रोफेसर्स पे मेरा कितना खराब इम्प्रेशन पड़ेगा, सोच तो!”
” अरे यहाँ ये सब कोई नही सोचता!”
“सभी जगह सोचते हैं यार! बस कहने की बात है कि नही सोचते। आज तक मेरे स्कूल में मेरी इतनी अच्छी इमेज थी इसने सब सत्यानाश कर दी। एक नम्बर का बेवकूफ है , अरे भई मैंने मांगी तुझसे हेल्प तो तू क्यों हर जगह मेरा गार्जियन बनकर घूम रहा  है।”
” गार्जियन नही पति!” झनक ने चुटकी ली और रंगोली एक बार फिर नाराज़ होकर रोने लगी…-“यार प्लीज़ मत बोल ऐसा। इस लड़के से ऐसी नफरत हो रही है ना कि सामने आ जाये तो गला दबा दूँ। इसने सब जगह मेरा नाम खराब किया है।”.
” तो अब कर भी क्या सकते हैं यार। छोड़ ना। तू क्या उससे माफी मंगवायेगी?”
” हाँ ! बिल्कुल मंगवाऊंगी। जिस जिस से जाकर उसने खुद को मेरा पति बोला है उस हर एक के सामने जाकर हाथ जोडकर माफी मांगेगा और माफी जब तक नही मिलेगी हमारे सीनियर्स के पैरों पड़ा रहेगा।”
” तेरी मर्ज़ी! लेकिन मुझे नही लगता वो हीरो तेरी बात मानेगा।”
” झनक तू बस ये सोच की हम उससे कहाँ मिल सकतें हैं । मुझे उससे अकेले में बात करनी है।”
” हम्म इंजीनियरिंग वाला बंदा है, कैंटीन में सुट्टा मारते मिल ही जायेगा। नाम गांव कुछ पता है उसका?”
” नाम अभिमन्यु बताया था और मैकेनिकल पांचवे सेम का स्टूडेंट है। यार एक तो मुझे पढ़ाई की इतनी ज्यादा टेंशन हो गयी है कि हर वक्त पेट में अजीब सी गुड़गुड़ होती रहती है ऊपर से इस ने और नाक में दम कर दिया।”
” पढ़ाई की टेंशन अभी से क्यों?”
” बुक्स देखीं हैं। इतनी मोटी मोटी की लगता है मुझे खा जाएंगी। ये फिजियो की “गायटन एंड हाल” और ये ग्रे की एनाटॉमी। पता नही कुछ मेरे पल्ले भी पड़ेगा कि नही। मुझे तो ये सब पढ़ने के लिए डिक्शनरी लेकर बैठना पड़ेगा यार। मेरी स्कूलिंग हिंदी मीडियम थी ना!”
” अबे ये बात! इसलिए इतना डर रही तू। सुन किताबें तो यहीं हैं जो तीर्थ है हमारा ! लेकिन हमें तीर्थ पूरा करवातें हैं चौरसिया जी और जैन साहब।”
” मतलब?”
” मतलब फिजियो की हम पढेंगे जैन और एनाटॉमी में पढ़ेंगे बी डी चौरसिया। ये हमारी भाषा की किताबें हैं। यानी है तो इंग्लिश में लेकिन हमारी आसान सी इंग्लिश में। और फिर जो समझ न आये उसके लिए मैं हूँ ना। “
” हम्म ! मैं पास तो हो जाऊंगी ना!”
” तुझे रंगोली बस रोने की बीमारी है क्या? अब तक उस छछूंदर के नाम पर आँसू बहा रही थी, अब पढ़ाई के नाम पर।”
” यार झनक क्या करूँ? यहाँ रैगिंग के सिवा कुछ होता ही नही तो मज़ा कैसे आएगा। मुझे तो हॉन्टेड कैसल लग रहा है ये मायानगरी।”
” चल नीचे चलते हैं। कुछ अच्छा सा खाएगी तो दिमाग काम करेगा और फिर तुझे उस रितिक रोशन से लड़ने भी तो जाना है ना?”
” छोड़ यार! किसी ने उससे बात करते देख लिया तो और मुसीबत हो जाएगी। जाने दे। बस भगवान से प्रार्थना है अब मेरी पढ़ाई पूरी होते तक उसकी शक्ल न देखने को मिले।
“आमीन !! नही मिलेगी।”

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  रंगोली जो कुछ देर पहले अभिमन्यु को पानी पी पीकर कोस रही थी, अब उसे भूलभाल कर नीचे होस्टल मेस में जाने की तैयारी कर रही थी।
    झनक के साथ रंगोली नीचे पहुंची तो पता चला आज किन्हीं कारणों से मेस बंद रहेगा। उन लोगों के पास ऊपर कमरे में भी कुछ खाने को नही था। झनक के कहने पर दोनों हॉस्टल के बाहर बनी कॉमन कैंटीन में आ गईं।
   
     अभिमन्यु भी अधीर को साथ लिए रंगोली को ताड़ने के बहाने हैं मेडिकल कॉलेज की तरफ पडने वाली कैंटीन में आकर बैठा था कि उसी वक्त रंगोली झनक के साथ कैंटीन में दाखिल हुई।
   उसे देखते ही खुशी से चौक कर वो खड़ा हो गया और तुरंत रंगोली के पास पहुंच गया ” हेलो कैसी हैं आप? मैं अभिमन्यु!”
   अभिमन्यु को वहां आया देख रंगोली के तन बदन में आग लग गई। उसे पिछले चार-पांच दिन से जो चल रहा था वह सब एकदम से याद आ गया और वह बुरी तरह से अभिमन्यु पर भड़क उठी।
” तुम समझते क्या हो खुद को और मुझे क्या समझ रखा है? यह कोई फिल्म चल रही है कि तुम हीरो और मैं हीरोइन बन गई।
  देखो मिस्टर अच्छे से इस बात को समझ लो, कि मैं सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई करने यहां आई हूं! तुम मेरे नाम के साथ अपना नाम इस तरह से जोड़ दोगे तो मैं तुम्हारी डायरेक्ट कंप्लेन अपनी डीन से कर दूंगी। डीन से यह बात सीईओ मैडम तक पहुंची तो तुम्हें सीधे रस्टिकेट कर दिया जाएगा। अब तुम फोर्थ सेमेस्टर में रहो चाहे फिफ्थ सेमेस्टर में, तुम्हारी पूरी की पूरी पढ़ाई डब्बा हो जाएगी। समझ में नहीं आता  की तुम्हें कॉलेज में पढ़ाई करना है या बस हीरोगिरी करने आए हो। क्या इधर-उधर घूम घूम के लड़कियों को परेशान करना , सिर्फ यही काम है तुम्हारा।
मेरी सारी इमेज खराब कर दी । पता नहीं मेरे सीनियर क्या सोचेंगे कि कल कि आई जूनियर अफेयर चला रही है।
   देखो तुम होगे किसी रईस बाप की बिगड़ी औलाद , तुम्हारे लिए पढ़ाई करना एक शौक होगा। तुम्हें रुपए पैसे कमाने से कोई लेना-देना नहीं होगा लेकिन मैं ऐसी नहीं हूं। मैं हद दर्जे की मिडिल क्लास लड़की हूं। रुपए पैसों से भी और फैमिली वैल्यूज से भी।
    मैं इतनी मिडिल क्लास हूं कि मेरे विचार भी मेरे जैसे ही मिडिल क्लास हैं। मेरे लिए मेरा कैरेक्टर सबसे बड़ी बात है, मैं यहां सिर्फ और सिर्फ पढ़ने आई हूं । पढ़ाई करके मुझे एक अच्छा डॉक्टर बनना है। अपना क्लीनिक डालना है खूब पैसे कमाने हैं। अपने मम्मी पापा को खुश रखना है। उनके आज तक के जो सपने पूरे नहीं हो पाए उन्हें पूरा करना है। मेरे पास प्यार इश्क मोहब्बत करने के लिए बिल्कुल वक्त नहीं है।
    तुम सोच भी नहीं सकते कि तुमने मेरा कितना बड़ा नुकसान किया है। मैं माफी मांगती हूं मुझसे गलती हो गई कि मैंने रैगिंग से बचने के लिए आकर तुम्हें गलती से प्रपोज कर दिया और वह सिर्फ और सिर्फ रैगिंग थी उसके लिए मुझे माफ करो। और प्लीज मेरी जिंदगी से दूर हट जाओ।
   हो सके तो अब जब तक मैं इस कॉलेज में हूं मुझे अपनी शक्ल मत दिखाना । प्लीज तुम्हारे हाथ जोड़ती हूं, क्योंकि तुम मेरे लिए यह तो करोगे नहीं कि मेरे सारे सीनियर से जाकर यह बात कहो कि तुम जो भी कह रहे थे वह गलत था, झूठ था, मजाक था। पहले मेरी सारी सीनियर्स मैडम के सामने तुमने मेरी इमेज खराब की, बाद में मेरे सीनियर सर लोगों के सामने भी तुमने वही कर दिया। अब मेरे पूरे कॉलेज में सब मुझे तुम्हारी गर्लफ्रेंड समझ रहे हैं। जबकि ऐसा कुछ है नहीं और तुम शायद नहीं जानते प्रोफेशनल कॉलेज में कैरेक्टर बहुत ज्यादा मैटर करते हैं।
   तुम्हें शायद नहीं पता होगा लेकिन मेरे मार्क्स पर भी इस बात का असर पड़ेगा । मेरे प्रैक्टिकल मार्क्स तो ज़ीरो ही हो गए क्योंकि प्रोफेसर एक कैरक्टरलेस लड़की को कभी भी अच्छे मार्क्स नहीं देते।”

   बोलते बोलते रंगोली की आंखों से आंसुओं की धार बहने लगी झनक उसे संभाली हुई थी। और बार-बार शांत करवा रही थी लेकिन अभिमन्यु रंगोली के इस रूप को देखकर दिल से घबरा गया था। रंगोली के आंसू उसकी आंखें भिगो गए थे । उसने सोचा भी नहीं था कि जिस बात को वह आज तक इतना कैजुअल ले रहा था वो रंगोली के लिए इतनी बड़ी बात हो सकती है, उसने तुरंत अपने दोनों हाथ जोड़  दिए।

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“मुझे माफ कर दो रंगोली मैं तुम्हारे हर एक सीनियर से मिलकर माफी मांग लूंगा। और तुम बेहिचक पढ़ाई करो मैं अब तुम्हें कभी डिस्टर्ब करने नहीं आऊंगा।”

  अभिमन्यु अपनी आंखें पोंछता वहां से बाहर निकल गया अधीर भी उसके पीछे भागता चला गया।

  वह तो अच्छा था कि इस कैंटीन में ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं थी और यह लोग दरवाजे पर ही टकरा गए थे इसलिए किसी ने भी इन लोगों पर ध्यान नहीं दिया लेकिन रंगोली को अब बस यही महसूस हो रहा था कि हर किसी की निगाहें उसी की तरफ़ है। उसने झनक का हाथ पकड़कर धीमे से कहा कि “अब मैं अंदर नहीं जा सकती मुझे वापस कमरे में जाना है” झनक उसकी हालत समझ गई थी इसलिए उसे साथ लेकर वह हॉस्टल वापस चली आई।

   लुटा पिटा सा अभिमन्यु भी अपने हॉस्टल पहुंच गया अधीर ने उससे खाने के लिए भी पूछा लेकिन अब उसकी भूख प्यास सब उड़ गई थी।
   उसने अपने कमरे का दरवाजा खोला तो देखा सामने सीपी सर बैठे हैं।
“सर आप यहां? मुझे बुला लिया होता।”

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“अब का कांड कर दिए हो मिसिर जी?”

“क्या बात हो गई सर मैं समझा नहीं?”

“मेडिकल में जाकर कुछ हंगामा किए हो भाई?”

“आपसे किसने कहा?”

“ऋषि खुराना की टीम सीईओ मैडम के पास गई थी! तुम्हारी शिकायत लेकर। बुलावा आया है, वाशिंग पाउडर के ऑफिस में।
      कल मैडम ने तुमको याद किया सुबह सुबह पहुंच जाना नौ बजे। हम भी चलेंगे तुम्हारे साथ हम जानते हैं तुम कुछ गलत काम तो कर नहीं सकते। पर यार थोड़ा तो सोचा करो निरमा मैडम के पास हम ही लोग गए थे यह फरियाद लेकर कि स्टूडेंट्स का अपनी परिधि को लांघना बंद करवा दीजिए। उन्होंने बंद करवाने की कोशिश शुरू की कि हमारा यह लड़का मेडिकल में पहुंच गया। “

अभिमन्यु को बीते दिन वाली सारी बातें याद आ गई और उसने अपने सर पर अपना हाथ मार लिया

“अब याद आया! तो वह साला इस चक्रव्यूह में फंसाने की बात बोल रहा था। उस कमीने को तो मैं देख लूंगा सिपी सर।”

“अरे हटाओ छोड़ो यार ! उसको तो हम एक साथ सब देख लेंगे, उसकी चिंता छोड़ो। फिफ्थ सेम के एग्जाम की डेट आ गई है। उस पर भी फोकस करो। इस बार तुम्हारा चांस है अगर इस बार टॉप कर लिए तो अगले सेमेस्टर बुक बैंक फ्री मिलेगा तुमको।

“यह बढ़िया बात बताएं सर आप। एग्जाम कब से हैं?”

“2 हफ्ते बाद की डेट आई है बेटा! कभी थोड़ा लाइब्रेरी के बाहर लगे नोटिस बोर्ड पर भी नजरें फिरा लिया कीजिए। वैसे तो आप दोनों बहुत ही ज्यादा व्यस्त रहते हैं! लेकिन अपने व्यस्त शेड्यूल से थोड़ा टाइम निकाल कर नोटिस बोर्ड पर भी नजर डाला कीजिए।”

  अभिमन्यु और अधीर झेंप कर इधर-उधर देखने लगे।
सीपी उठकर अभिमन्यु के बालों पर हाथ रख कर बाहर निकल गया दरवाजे से पलट कर एक बार फिर उसने अभिमन्यु को आवाज लगा दी…- घबराओ मत ऋषि खुराना की तो खबर हम सब मिल कर लेंगे! अभी फिलहाल कल जाकर मैडम के पैर पकड़ लेना कि तुम को सस्पेंड ना करें! 2 हफ्ते बाद एग्जाम हैं। इस बात की भी दुहाई दे देना जिससे तुम्हें माफ कर दें। आई बात समझ में?”

  अभिमन्यु ने झुक कर सीपी सर के पैर छू लिये। और सीपी  ने उसे ऊपर उठा कर अपने कलेजे से लगा लिया…-” छोटे भाई हो बे हमारे।’

******

   अगली सुबह निरमा के ऑफिस के बाहर अभिमन्यु इधर से उधर चक्कर काट रहा था कि तभी निरमा के ऑफिस का दरवाजा खुला और एक लंबे चौड़े डील डौल वाला स्मार्ट सा बंदा एक बच्ची का हाथ पकड़े बाहर निकल आया…
   हड़बड़ी में अभिमन्यु उससे टकराते टकराते बचा…-” सॉरी सर! वो ज़रा दिमाग घुमा हुआ है ना। इसलिए कुछ सूझ नही रहा और आपसे टकरा गए।”
” कोई बात नही। “
वो व्यक्ति आगे बढ़ने को था कि उस बच्ची ने अभिमन्यु के हाथ में थमा गुलाबों का बुके देख उसे पाने की ज़िद शुरू कर दी।
   और अभिमन्यु उस लड़की से बचाने के लिए गुलाब इधर उधर छुपाने लगा…
  ” नो मीठी! अभी यहाँ से चलो तुम्हें शाम में पापा रोज़ेज़ दिलवा देंगे।”
” आप भूल जातें हैं पापा।”


   उस व्यक्ति ने मुस्कुरा कर अभिमन्यु की तरफ देखा…-“तुम परेशान मत हो। जाओ अंदर मैं इसे सम्भाल लूंगा। “
  अभिमन्यु विनम्रता से दुहरा होता उसी आदमी से अपने मन की बात कहने लगा….
” ये असल में मैडम के लिए लेकर आया हूँ।”
  सामने खड़े आदमी की भौहें ज़रा तन गयीं। उसके चेहरे के भाव देख अभिमन्यु को लगा ये आदमी भी अंदर बैठी औरत से परेशान ही होगा , वो अपनी लय में कहता चला गया।
  ” क्या बताऊँ सर। इतनी कड़क हैं ये मैडम की आपकी गलती न भी हो तो भी आपको सॉरी बुलवा कर रहेंगी।”
   सामने खड़े उस आदमी ने अभिमन्यु का कंधा थपथपा दिया…-“समझ सकता हूँ। और ये बात मुझ से बेहतर कौन जानेगा।”
” सर इतनी स्ट्रिक्ट है मैडम की पहला तो इन्हें देखते ही हम क्या कहने आये थे वो भूल जातें हैं। दूसरा ये अपनी मीठी ज़बान से हमें ऐसे लपेटतीं हैं कि जो वो करवाना चाहतीं हैं फिर वही होता है।
   आप कितने पापड़ बेल लो होगा वही जो इन्होंने सोच रखा होगा। इन्हें कोई फर्क नही पड़ता की पढ़ने में कैसे हैं? आपके एम्बिशन क्या हैं? हम सब इनके लिए सिर्फ गधे हैं। बल्कि इन्हें यह लगता है कि इनके इस केबिन के बाहर हर कोई गांव है यह अकेली हिटलर है।
   हिटलर नहीं बल्कि यह तो मुझे तुगलक लगती है। बिना सर पैर के फरमान जारी कर दिया तो कर दिया। अब तुम फॉलो करते हो तो ठीक और अगर नहीं की तो तुम्हारा सर कलम कर दिया जाएगा।
   अच्छा सदियों से यह परंपरा रही है कि कितना भी खडूस राजा रहा हो,सर कलम करने से पहले आप की आखिरी इच्छा जरूर पूरी करने के लिए पूछता था। लेकिन यह ऐसी है कि आप की आखिरी इच्छा भी नहीं पूछेंगी सीधे खटाक।

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“बहुत सताए हुए लग रहे हो इनके।”

” क्या करें इनसे ज्यादा हम अपनों के सताए हुए हैं।अपने कॉलेज के लौंडो की मदद करने के चक्कर में बुरी तरह से फंसे बैठे हैं। पता है अंदर जाएंगे तो मैडम सूली पर चढ़ा ही देंगी।”

“एक बार बात करके देखो दोस्त ! हो सकता है तुम्हारी सुन ले।”

अभिमन्यु ने लाचारगी से ना में से सिर हिला दिया…

“अभी 2 दिन पहले तो इनसे बात करके गए हैं सर जी। कैंपस में इधर-उधर लड़के ना घूमे उसके लिए आकर बड़े प्यार से इन से बात की कि आर्ट्स एंड स्पोर्ट्स वाले लड़कों का इधर-उधर घूमना बंद करवा दें। वह लड़के वैसे भी वाहियात हैं। अब कल तो हम किसी काम से मेडिकल गए थे अब वहां के कुछ लड़कों ने आकर आग लगा दी! अब मैडम जी हमारे नाम से फतवा जारी कर चुकी हैं। हमें इसीलिए बुलवाया गया है कि हमारे नाम का सस्पेंशन लेटर हमारे हाथ में रख दिया जाए ,क्योंकि मैडम ने आदेश पारित कर दिया था। और वह आदेश भी ऐसा वैसा नहीं कि दो से तीन बार वार्निंग दी जाएगी फलाना ढिकाना। बल्कि आदेश यह था कि अब से अगर कोई भी लड़का किसी दूसरे कैंपस में नजर आया तो उसे तुरंत सस्पेंड कर दिया जाएगा। एक महीना के लिए। अब बोलिए 15 दिन बाद हमारे एग्जाम होने हैं। यह हमें सस्पेंड कर देंगी तो हम तो पूरा एक सेमेस्टर पीछे हो जाएंगे ना। “

“बात तो चिंता की है! पर तुम ऐसा करना, जाते साथ पहले मैडम से यह सारी बातें बोल देना। हो सकता है सुन ले, वैसे कभी-कभी सामने वाले की भी सुन लेती हैं। स्ट्रिक्ट तो हैं लेकिन अगर कोई अपनी सच्चाई पर अडिग रहे तो उसे माफ भी कर देतीं हैं।’

“पापा चलो न देर हो जाएगी। फिर मम्मी आपको डांट लगाएंगे कि मीठी को लेट करवा दिया।”

अभिमन्यु ने प्यार से उस बच्ची के सर पर हाथ फेरा और मुस्कुरा कर उसके पास झुक कर बैठ गया …-“हां बेटा जाओ घर पर आपकी मम्मी वेट कर रही होगी ना।”

“नहीं भैया! मम्मी तो अंदर बैठी हैं ।यह मम्मी का ही ऑफिस है। और स्कूल ले जाने के पहले पापा मुझे मम्मी से मिलवाने लाते हैं।”

   अभिमन्यु खट से खड़ा हो गया। उसने घबराते हुए सामने खड़े आदमी की तरफ देखा…-” आई एम सॉरी सर। मुझे पता नहीं था कि आप….”
    वह कहते कहते रुक गया कि प्रेम ने उसके सामने हाथ बढ़ा दिया…-” मैं प्रेम सिंह चंदेल हूँ। अंदर आपकी जो हिटलर मैडम बैठी हैं हमारी ही शरीक-ए-हयात हैं।
   और वैसे इतनी भी खडूस नहीं है वो। नाम क्या बताया तुमने अपना?”

“सर अभिमन्यु! अभिमन्यु मिश्रा मेकेनिकल 5th सेमेस्टर में पढ़ता हूं।”

“अरे जन्मकुंडली नहीं पूछी भाई । जाओ जाओ अंदर जाओ । मैडम ने ग्रीन बत्ती जला दी है।”

  अपने बालों पर हाथ फेरता झूमता हुआ सा अभिमन्यु निरमा की केबिन में दाखिल हो गया और प्रेम मीठी का हाथ  थामे उसके स्कूल के लिए निकल गया।

******

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    कैंटीन से लौटती रंगोली और झनक हॉस्टल पहुंचे कि देखा एक पुलिस की गाड़ी उनके कम्पाउंड में खड़ी है, और आसपास काफी सारी भीड़ भाड़ जमा हो रखी है।
    वो लोग भी धीमे से घुस कर भीड़ का एक हिस्सा हो गए। आसपास खुसफुसाहट चल रही थी,ध्यान लगा कर सुनने में भी कुछ समझ नही आ रहा था। झनक ने साथ खड़ी एक लड़की से ” माज़रा क्या है?”पूछ ही लिया।
  उसने जो बताया वो सुन कर रंगोली और झनक के होश उड़ गए।
    उन्हीं के हॉस्टल में किसी लड़की ने फंदे से लटक कर आत्महत्या कर ली थी……

क्रमशः

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aparna..

समिधा -31

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     समिधा – 31

      भगिनी आश्रम एक तीन मंजिला आश्रम था, जिसमें बहुत बड़े बड़े हॉल एक ऊपर एक बने हुए थे। इनमें सबसे ऊपरी मंजिल पर कुछ कमरे और खुली छत थी। ये कमरे भगिनी आश्रम के सामान रखने के लिए उपयोग में लाइ जाती थीं। इन्हीं में एक कमरा चारु दीदी को मिला था,जिसमें वो जब कभी आकर आश्रम की लिखा पढ़ी भी जांच लिया करती थीं।
    एक कमरे में आश्रम की महिलाओं के उपयोग के लिए दानदाताओं द्वारा मिली सामग्री रखी थी तो दूसरे कमरे में पहले कभी सन्यासिनों द्वारा बुने कपडे चटाइयां आदि पड़े थे।
    एक दो कमरे खाली पड़े थे लेकिन बाहर से उन पर ताला पड़ा था। उसकी निचली मंज़िल पर बड़े से हॉल में पारो को साथ लिए सरिता खड़ी थी और उसे सबसे पीछे की तरफ खाली पड़े एक पलंग को दिखा कर इशारा कर दिया, कि वही पलंग उसका है।
    लंबे चौड़े से हॉल में आमने सामने दोनो तरफ दीवार से लग कर पलंग बिछे थे, और हर एक पलंग के पीछे खिड़की खुलती थी। पलंग के बाजू से एक छोटी अलमीरा बनी थी जिसमें साध्वियां अपना सामना, पानी का बर्तन चंदन माला आदि रखा करती थीं।
     उस पूरे हॉल में लगभग बाइस पलंग बिछे थे। हर पलंग के पीछे खिड़की होने से कमरा बहुत ही ज्यादा खुला और हवादार लग रहा था। हॉल के एक तरफ सामने बड़ा सा दरवाजा था जिस के ठीक सामने ही नीचे जाने और ऊपर जाने की सीढ़ियां बनी हुई थी। हॉल के दूसरी तरफ जो दरवाजा खुलता था उसके पीछे  गुसल खाने बने हुए थे।
     ” सुबह उठने के बाद हमें अपनी अपनी जगह की सफाई करने के साथ ही नीचे के हॉल की सफाई करनी होगी। सबसे नीचे खाने का कमरा बना हुआ है। वहां झाड़ू पोछा करने के बाद हमें बाथरूम आदि धोना होता है। और उसके बाद नहा कर हम भजन के लिए मंदिर पहुंच जाते हैं।
      वहां का पूजा पाठ भजन आरती होने के बाद हमें पीछे बनी रसोई की तरफ जाना होता है ।वहां पर दोपहर के खाने की तैयारी करनी होती है। दोपहर का खाना बनने के बाद जब गुरु आचार्य और सभी संतो के लिए भोजन चला जाता है, तब हम सभी बहने अपने हिस्से का भोजन लेकर अपने आश्रम में आ जाती हैं।  वहां सबसे नीचे जो हॉल बना हुआ है वही बैठकर हम सब एक साथ भोजन करते हैं।
    उसके बाद चाहो तो दोपहर में अपने कक्ष में आकर आराम कर सकती हो । शाम को होने वाली संध्या आरती के पहले एक बार फिर हमें फूल तोड़कर उन्हें धोकर मंदिर में पहुंचाना होता है।”

” फूलों की माला नहीं बनानी होती?”

” नहीं फूलों की माला हम नहीं बनाते! फूलों की माला वहीं रहने वाले आचार्य या गुरुवर ही बनाते हैं। क्योंकि फूलों की माला तो सीधे गोपाल जी को चढ़ाई जाती है ना हमारी बनाई माला कैसे चढ़ेगी वहां?”

जाने क्यों पारो का चेहरा कसैला सा हो गया वह चुपचाप सरिता के दिखाए पलंग की तरफ आगे बढ़ गई उसके हाथ में एक ही बैग था। उसने उस बैग को नीचे रखा और उसमें से सामान निकाल कर उस छोटी सी अलमारी में जमाने लग गई।

   ******

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      पारो को आश्रम में आए 2 दिन ही हुए थे कि एक दोपहर जब रसोई में मदद कर रही थी कि तभी ऑफिस से एक लड़का उसे ढूंढता हुआ वहां चला आया….-” पारोमिता दीदी कौन है? “

  वहां काम करती सभी औरतों की आंखें उसकी तरफ उठ गई। आश्रम में मौजूद औरतों के लिए यह बहुत बड़ी बात होती थी, कि बाहर से उनसे कोई मिलने आया है। क्योंकि उनमें से अधिकतर के परिजनों ने तो उन्हें यहां छोड़ने के बाद शायद यह मान लिया था कि वह सब अब उनके लिए हमेशा हमेशा के लिए मर चुकीं हैं। एक बार यहां छोड़कर जाने के बाद ना कोई परिजन मिलने आते थे और ना ही इनमें से कभी किसी को घर बुलाया जाता था।
     उसकी बात सुन पारोमिता धीरे से खड़ी हो गई…-” जी मैं हूँ पारोमिता!”
” दीदी आपको उधर ऑफिस में बुलाया जा रहा है।”
    पारो ने एक नज़र सरिता पर डाली और उन सभी की प्रवर सुलोचना दीदी से आंखों ही आंखों में बाहर जाने की आज्ञा ले बाहर निकल गयी। सरिता ने भी दीदी की तरफ एक बारगी देखा, उन्होंने आंखों से ही उसे भी साथ जाने की इजाज़त दे दी।
   वो खुशी से पारो के साथ हो ली।

   उदयाचार्य जी के साथ ऑफिस में सिर झुकाए दर्शन बैठा था। पारो के वहाँ पहुंचते ही वो झट से खड़ा हो गया…
“कैसी हो बऊ दी!”
   दर्शन को देख पारो की आंखें भर आई उससे एकाएक कुछ कहते नहीं बना उसने अपना सिर झुका लिया। और “हां” में सर हिला दिया।  उसे देखकर दर्शन की भी आंखे भर रही थी लेकिन उसने खुद को संभाल लिया। उसने मुड़कर एक बार सामने बैठे उदयाचार्य जी की तरफ देखा उन्होंने शायद दर्शन का इशारा समझ लिया…-” हां हां आप बिल्कुल आश्रम घूम सकते हैं। सरिता इन्हें और पारो बहन को ले जाओ बाहर हमारी वाटिका और आश्रम घुमा दो।”

    दर्शन ने अपने हाथ में थाम रखी बैग को कस कर पकड़ा और धीमे से बाहर निकल गया । उसके पीछे पारो भी बाहर चली गई । सरिता ने मुड़कर एक बार उदयाचार्य जी को प्रणाम किया और वहां से बाहर निकल गई। उदयाचार्य अजीब सा मुहँ बनाकर वापस अपने रजिस्टर में गड़ गए। उन्हें हमेशा यही लगता कि आश्रम की सबसे मोटी जिम्मेदारियां उन्हीं के कंधों पर हैं और इसीलिए जब भी बाहर से कोई मिलने आता तो उनका सिर दर्द और बढ़ जाता ,क्योंकि आने वाले की पूरी जीवन कुंडली उन्हें एक अलग रजिस्टर में लिखनी पड़ती। कि वह किस से मिलने आया है? जिससे मिलने आया है उनसे वह कैसे परिचित है ?किस समय आया? किस शहर से आया ?कितनी देर यहां रहा? उसने आश्रम में क्या-क्या देखा? आश्रम के किन-किन कमरों में वह गया? और कब वापस लौटा? उसके साथ कोई सामान तो नहीं था? आदि इत्यादि।
    इतनी सारी लिखा पढ़ी का काम करने में अक्सर आचार्य झल्लाते रहते थे।

    उस ऑफिस से निकल कर वह लोग एक तरफ बने रास्ते से चलते हुए आश्रम की वाटिका में पहुंच गए। वहाँ ढेर सारे पेड़ों के बीच कुछ बड़े-बड़े पेड़ भी लगे हुए थे उन बड़े पेड़ों के चारों तरफ गोलाकार चबूतरे बने हुए थे जो साफ-सुथरे उजले थे । वही चबूतरे पर जाकर दर्शन बैठ गया, पारो उसके पास ही खड़ी रही।  सरिता ने दर्शन की तरफ देखा…-” आप आश्रम नहीं देखना चाहते? “
    सरिता भी पारो से कुछ दो-तीन साल ही बड़ी थी और उसकी भी किस्मत काफी कुछ पारो से मिलती जुलती थी। दर्शन ने उसे देखकर “ना” में सर हिला दिया और पारो की तरफ देखने लगा पारो उसके पास ही सर झुकाए खड़ी थी।

“बैठो ना बाउदी। “

  पारो वही चबूतरे पर दर्शन से जरा हट कर बैठ गई।

“क्या हुआ अचानक तुम यहां क्यों चली आई? मैं बस 1 दिन के लिए ही तो दूसरे गांव गया था,बाबा के साथ! और वापसी पर पता चला कि तुम्हारी मां आई थी और उसके बाद तुमने यहां आश्रम आने की जिद पकड़ ली। आखिर ऐसा क्या हुआ बाउदी जो तुम घर छोड़ कर हम सब को छोड़ कर यहां चली आई?

पारो समझ गई थी कि उसके आने का असली कारण किसी ने भी दर्शन को और उसके बाबा को नहीं बताया होगा। सब ने इस बार भी उसके आश्रम आने की जिम्मेदार उसी को ठहरा दिया होगा। वह अपनी किस्मत पर मुस्कुरा कर रह गई।

“बस ऐसे ही दर्शन अब वहां मन नहीं लग रहा था!”

“तो क्या यहां लग रहा है? यहां कैसे रह पाओगी बऊ दी? यहां इतने परायों के बीच जहाँ ना अपनी जमीन है ना अपनी मिट्टी ना ही अपनी बोली ना अपना खान-पान । इन सबके बीच रहना मुश्किल नहीं लग रहा तुम्हें। “

अपनों की आंखों में अपने लिए पारो इतना सारा पराया पन देख चुकी थी कि अब उसके मन ने अपना और पराया सोचना ही छोड़ दिया था।

“ऐसा क्यों सोचते हो दर्शन कि यहां मिट्टी अपनी नहीं है! लोग अपने नहीं हैं ! यह सब हमारी सोच पर ही तो निर्भर करता है, बल्कि यहां तो भगिनी आश्रम में सब मेरे जैसी ही किस्मत की मारी हैं। और हम एक दूसरे के साथ सब अपना दुख भुला लेते हैं, बांट लेते हैं। कुछ अपने आंसू बहा लेते हैं तो कुछ सामने वाले के आंसू पोंछ लेते हैं। मुझे तो यहां अच्छा लग रहा है दर्शन।”

“तुम्हारे चेहरे से तो नहीं दिख रहा कि तुम्हें अच्छा लग रहा है। बउ दी एक बात बोलूं मेरे साथ वापस चलो कम से कम तुम्हें देखकर लगता है, कि  मेरे देव दादा…”

इसके आगे दर्शन कुछ नहीं बोल पाया लेकिन पारो समझ गई कि वह क्या कहना चाहता है।

“नहीं दर्शन अब वापस नहीं जाऊंगी। अब मेरे हिस्से जितनी भी सांसे बची हैं ,वह मुझे यही इसी आश्रम में लेनी है । अब यहां से कहीं नहीं जाऊंगी। एक बात बताओ क्या तुम अकेले आए हो?”

“हां बउ दी , और मेरे साथ कौन आता अकेला ही आया हूं।

पारो के चेहरे पर एक मुस्कान खेल गई।  वह समझ गई कि दर्शन घर पर बिना किसी से कुछ बोले आया है।

“घर पर बिना बताए मुझसे मिलने चले आए हो फिर किसके सहारे मुझे वापस लेकर जाना चाहते हो दर्शन?”

दर्शन पारो की बात पर इधर-उधर देखने लगा। सच ही तो कह रही थी पारो अब इतने दिन में वह भी घर वालों को अच्छे से जानने लग गई थी। जब यहां आने से पहले उसके घर पर बात करने की हिम्मत नहीं हुई तो आखिर किस आधार पर वो पारो को वापस लेकर जाना चाहता है।
   हालांकि वह यही सोच कर आया था कि किसी भी तरीके से पारो को घर वापसी के लिए मना लेगा लेकिन उसके मन में एक शंका यह भी था कि पता नहीं पारो उसके साथ वापस जाना चाहेगी या नहीं और इस लिए….

“मेरे बारे में सोच सोच कर दुखी मत हो दर्शन। मैं यहां बड़े सुख से हूं।”

“हां वह तो देख पा रहा हूं। पहले ही इतनी दुबली थी अब तो ऐसा लगता है जैसे हड्डियां उभर आई हैं।”

उसकी बात सुन पारो खिलखिला कर हंस पड़ी।

“ठीक है अब से खा पीकर थोड़ी मोटी हो जाऊंगी! अगली बार मिलने आओगे तो इससे बेहतर पाओगे मुझे।”

दर्शन ने अपने धोखेबाज आंसुओं को जो उसकी बिना मर्जी के भी उसके गालों पर लुढ़क आये, उन्हें पोंछ लिया और खड़े होकर पारो का हाथ पकड़ लिया।
” बउ दी आपके लिए कुछ सामान लेकर आया हूं मना मत करना।”

“क्या है दिखाओ तो सही।”

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दर्शन ने इतनी देर से अपने कंधे पर टांग रखे बैग को अपनी गोद में रखकर उसकी चेन खोल दी उसमें पारो के लिए किताबें रखी थी।
     घर पर किसी तरह से जुगत लगा कर आखिर दर्शन और आनंदी के जोर देने पर पारो को 11वीं की परीक्षा देने का मौका मिल चुका था।
    पारो के आश्रम आने के बाद ही उसका परीक्षा फल भी आ गया था। और वो अच्छे नंबरों से पास हो चुकी थी।
     दर्शन को जब पारो के परीक्षाफल का पता चला तब वो बाहर ही था, वो खुशी से बांवरा मिठाई लिए जब घर पहुंचा तब उसकी प्यारी बऊ दी उसे घर भर में कहीं नही नज़र आई ।
   जब माँ से उसने पूछा तो माँ ने उसकी पूछताछ से परेशान हो कह दिया…-“मर गयी तेरी बऊ दी” और वो नाराज़ हो घर से बाहर चला गया था।
    गुस्सा उतरने के बाद जब आधी रात वो घर लौटा तब आनन्दी बऊ दी ने खाना परोसते हुए उसे पारो के जाने की सारी बात सिलसिले वार बता दी।
    और अगले ही दिन घर पर बिना किसी से कुछ कहे वो उससे मिलने निकल गया।
    पर जाने क्यों अपनी माँ की बात सुन उसका मन कड़वाहट से भर गया था। बऊ दी से ऐसी भी क्या नाराज़गी। उनकी तकलीफ समझने की जगह हर कोई उनकी तकलीफ बढ़ाने में लगा था।
   रास्ते भर सोच सोच कर उसका सिर फटने लगा था। उसे पारो की घर वापसी का कोई मार्ग दिखाई नही दे रहा था, फिर भी मन ही मन वो उसे वापस ले जाने को मना लेने का एक प्रयास तो करना ही चाहता था।
       पारो के लिए क्या लेकर जाना चाहिए  उसे नही सूझ रहा था कि एकदम से उसे लगा अगर पारो उसके साथ नही भी आई तो कम से कम जहाँ हैं वहीं से अपनी आगे की पढ़ाई ही कर ले। और इसलिए उसने उसके लिए किताबें रख ली थीं, वो भी अगली कक्षा की।
   बैग खोलते ही पारो की नज़र किताबों पर गयी और उसकी आंखें भर आयीं।

“अब इन किताबों का क्या करूँगी ? “

“पढना ! किताबों का भला और क्या किया जाता है? “

   वो दोनों बातें कर रहे थे कि उनके पास से होकर वरुण किसी अन्य आचार्य से बात करता निकल गया। और उसे पीछे से देख दर्शन के मुहँ से बेसाख्ता “देव दादा”निकल गया।
     दर्शन की आवाज़ पर वरुण चौन्क कर पलट गया।

   वरुण ने दर्शन को देखा और दर्शन ने वरुण में छिपे देव को।
   वरुण को देखते ही जाने क्यों दर्शन के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कुराहट चली आई वरुण ने भी दर्शन को पहचान लिया वरुण कदम बढ़ाता दर्शन तक चला आया।

  ” आप तो हमारे घर आये थे ना…?

  ” कैसे पहचान लिया मुझे ?”
वरुण के सवाल पर दर्शन के मुहँ से उसके बिना चाहे भी वो बात निकल गयी जो सुन वहीं खड़ी पारो भी चौन्क गयी
   ” आपको देख बिल्कुल ऐसा लगा जैसे मेरे देव भैया वापस आ गए। बऊ दी ये वहीं तो हैं जो उस वक्त हमारे घर आये थे, जब…। “

  पारो ने बिना वरुण का चेहरा देखे ही उसकी ओर हाथ जोड़ दिए, और इतनी देर में वरुण पारो की सारी आपबीती समझ गया।
   उस दिन पहली बार आश्रम में उसे देखने के बाद एकाएक वो उसे नही पहचान पाया था लेकिन जाने क्यों जब तक वो नज़र आती रही थी उस पर से नज़रे नही हटा पा रहा था।
   बादबाकी उस रात वो अपने इस कृत्य पर बेहद शर्मिंदा भी हुआ था।
   आश्रम में होते हुए वो ऐसे कैसे किसी औरत को अपलक देख सकता था?
आश्रम आने के बाद से ही उसने डॉक्टर की बताई दवाएं भी लेनी छोड़ दी थीं……
   यही सब सोचते सोचते जाने रात की किस पहर उसकी नींद लग गयी थी, सुबह भोर की पहली किरण से जब उसकी नींद खुली तब उसे एहसास हुआ कि कल रात वो जाने कितनी जागती रातों के बाद चैन की नींद सो पाया था….

क्रमशः

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aparna….

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जीवनसाथी-121

विराज की गाड़ी में कौन था। क्या भगवान उसे उसकी गुनाहों की सज़ा दी रहे

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   जीवनसाथी -121

         आदित्य पिंकी के बेटे को बाहों में लिए बगीचे में घूम रहा था कि ऊपर खड़ी केसर पर उसकी नज़र पड़ गयी। केसर उसे ही देख रही थी। आदित्य ने उसे भी इशारे से नीचे बुला लिया लेकिन केसर ने ना में सिर हिला दिया।
   कुछ समय बाद केसर अपना फ़ोन लिए उसमें कुछ करने लगी कि आदित्य के फ़ोन पर मैसेज की बीप आयीं।
   उसने तुरंत फ़ोन निकाला, मेसेज देखा… केसर का ही था…-“तुमसे कुछ बेहद ज़रूरी बात करनी है। कुछ देर के लिए हमारे कमरे में आ सकते हो?”
   आदित्य ने ऊपर देख कर हां में सिर हिला दिया। कमरे में वापस जाकर उसने बच्चे को पिंकी को थमाया और उल्टे पैरों वापस लौट रहा था कि पिंकी ने उसे टोक दिया…-“आदित्य भैया हमारे साथ चाय ले लीजिए।”
  आदित्य मना नही कर पाया, आखिर पिंकी ने पहली बार उससे कुछ मांगा था। वो वहीं उन लोगों के साथ बैठ गया।
   काकी सा और पिंकी के साथ बैठ आदित्य चाय तो पी रहा था लेकिन उसका दिमाग केसर की तरफ ही था।
  इधर काकी सा ये सोच कर की आदित्य उन सब के साथ सहज हो जाए उससे  बातें किये जा रहीं थीं। पिंकी के बचपन की बातों से लेकर, अपने जोड़ों की तकलीफ अपनी वेनिस की यात्रा तक सब कुछ उसे सुना दिया।
    बातों ही बातों में वक्त बीतता जा रहा था, आखिर आदित्य अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ।

  ” काकी सा हमें ज़रा कुछ काम है , हमें निकलना होगा।”
” हॉं ठीक है आप निकल जाये आदित्य लेकिन अब अगर आप हमें काकी सा की जगह  माँ बुलाएंगे तो हमें ज्यादा खुशी होगी।”
  आदित्य ने मुस्कुरा कर उनके पैर छू लिए…-“आप वाकई हमारी माँ ही तो हैं। हमने उनकी सिर्फ तस्वीर ही देखी है। रोज़ हमारी सुबह उनकी तस्वीर से ही हुआ करती थी, लेकिन अब से आप भी हैं जो हमारी सुबह को रोशन बना देंगी। “

  काकी सा ने उसके सिर पर हाथ फेरा और वो बाहर निकल गया। तेज़ कदमों से चलते हुए वो केसर के कमरे तक पहुंच गया…
… लेकिन केसर वहाँ नही थी। रेखा उसके कमरे में  आँसू बहाती खड़ी खिड़की से पार कुछ देख रही थी।
” रेखा  क्या हुआ ? केसर कहाँ है?”
रेखा ने आदित्य को देखा और वापस रोने लगी। रोते रोते उसने एक चिट्ठी आदित्य की ओर बढ़ा दी…

  आदित्य ने धीरे से चिट्ठी खोली चिट्ठी केसर की ही थी जो उसने आदित्य के लिए लिख छोड़ी थी…

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   आदित्य,

  वैसे तो हमने सोचा था तुमसे मिलकर हर एक बात तुमसे सामने बैठकर कहेंगे लेकिन जाने क्यों हमारी हिम्मत ही नहीं हुई और इसीलिए हमने कल रात ही ये चिट्ठी लिखी।
   सोचा था तुम्हें अपने हाथ से यह चिट्ठी दे देंगे और तुम अपने कमरे में जाकर तफसील से इसे पढ़ कर इस चिट्ठी का जवाब दे देना।
   हमने जिंदगी में बहुत सारे गलत काम किए हैं बल्कि अगर हम यह कहें कि हमने सिर्फ गलत काम किए हैं तो भी गलत नहीं होगा। लेकिन तुमने हमेशा हमारा साथ दिया।  उस वक्त जब तुम और हम दोनों किसी के हाथ का मोहरा थे तब भी तुमसे जब बन पड़ता था हमारी मदद किया करते थे। और बाद में जब हम इस बात को जान गए कि हम किसी के हाथों का मोहरा है उस वक्त भी तुमने हमारा साथ नहीं छोड़ा।
  ठाकुर साहब के आदमी जब हमारी जान के पीछे पड़े हुए थे। उस वक्त एक तुम ही थे, जो हमें उन सब से बचाकर सुरक्षित महल तक ले आए। हम यह बिल्कुल नहीं कहेंगे कि इसमें तुम्हारा कोई स्वार्थ था क्योंकि भले ही हम ठाकुर साहब के गुनाहों का सबूत थे लेकिन हम जानते हैं तुम ने हमें बचाया है तुम्हारे दिल में छिपी इंसानियत के कारण। तुम वाकई दिल का हीरा हो।
   हम भी औरों की तरह राजा अजातशत्रु से बहुत प्रभावित थे, लेकिन हमारे मन में उनके लिए जो झूठी कड़वाहट भरी गई थी उसके कारण कुछ समय के लिए ही सही हमें उनसे नफरत हो गई और उनसे और उनकी बीवी से बदला लेने के लिए हम इस हद तक नीचे गिर गए कि हमने कुछ हत्याएं भी की ।
      इतने बड़े गुनाहों की सजा इतनी आसानी से नहीं मिलती आदित्य।
     हम मानते हैं कि राजा अजातशत्रु और बांसुरी ने हमें माफ कर दिया। हम यह भी जानते हैं कि तुम भी हमें माफ कर चुके हो लेकिन हमारा जमीर हमारी आत्मा हमें माफ नहीं कर रही।
   जिस वक्त हम राजा अजातशत्रु को धोखा दे रहे ,थे उस वक्त भी वह हमारे पिता के स्वास्थ्य के लिए, उनकी जिंदगी के लिए चिंतित थे। वो हर पल हमारी खुशी के लिए दुआएं मांग रहे थे, और ऐसे भले इंसान को हमने धोखा दिया है।
    कभी-कभी यही सब सोचकर हमारा ज़मीर हमें कचोटने लगता है कि आज भी हम उन्हीं लोगों के महल में पड़े हैं , कभी जिनकी जिंदगी हम छीन लेना चाहते थे।
   आदित्य हमारे गुनाहों की सजा यह नहीं है, कि हमें माफ कर दिया जाए। क्योंकि आप लोगों की माफी हमारे दिल को अंदर तक और ज्यादा मरोड़ उठती है।
हमें माफ करने की जगह अगर राजा अजातशत्रु और तुमने हमें कोई सजा दी होती ना, तो हमारी आत्मा का बोझ शायद उतर गया होता । लेकिन तुम लोगों ने हमारे हर गुनाह बख्श दिये और हमें गले से लगा कर माफ कर दिया।
    जिस वक्त हम जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे तुमने इतने प्यार ,इतनी शिद्दत से हमारी सेवा की, कि हम उसका एहसान अपनी सारी जिंदगी नहीं उतार पाएंगे। हमारे साथ कुछ वक्त बिताने के बाद तुम्हें मालूम चल ही गया होगा कि लड़कियों वाला कोई अच्छा गुण हममें मौजूद नहीं है। बावजूद तुमने कदम कदम पर हमारी मदद की। चाहे रसोई में  रोटियां सेकने की बात हो या सब्जी बनाने की। चाहे घर की सफाई हो या कपड़े धोने की। हर काम हम बिगाड़ कर रख देते थे, और तुम उसे वापस तरतीब से सही कर दिया करते थे।
    आखिर क्या क्या करोगे आदित्य हमारे लिए और क्यों किया इतना सब हमारे लिए?
           हम इस लायक नहीं है। बिल्कुल भी नही।
   देखा जाए तो हम इस लायक कभी थे ही नहीं और ना अब है।
   हम जानते हैं हमारी जगह कोई और लड़की होती तब भी आप उसकी ऐसे ही मदद करते, क्योंकि यह मदद का जज्बा आपके खून में है। आखिर आप राजा अजातशत्रु के ही तो भाई है ना । आप सभी भाइयों में चाहे युवराज सा हों, या अजातशत्रु, आप हो या विराट आप सभी में आप लोगों का राजसी खून नजर आता है।
    आप सभी वाकई राजपूतों की शान है, और आप सभी की यह शान हमेशा बरकरार रहे। हम जिंदगी भर भी आप लोगों के लिए दुआ करेंगे तो भी वह कम ही होगा । जिस ढंग से आप लोगों ने हमारे पापा साहेब को बीमारी में मदद की, उनकी सेवा का इंतजाम करवाया, उसके लिए हम दिल से आप सब के आभारी रहेंगे।
   विराज और रेखा एक ऐसा जोड़ा है आप के महल में जो कभी एक साथ सुखी नहीं रह सकता। अभी भी जब से हम इस महल में आए हैं रेखा को हमेशा परेशान ही देखते आ रहें हैं। हमारी छोटी बहन है।  उसकी चिंता हमें लगी ही रहती है। जब से हम यहां महल में आए हमने रेखा को हमेशा हमारे पिता साहब की सेवा करते पाया। उसे भी तो अभी-अभी ही मालूम हुआ है कि उसके जीवन की कड़वी सच्चाई क्या है? पर फिर भी रेखा अपनी परिस्थितियों से समझौता करने में हम से कहीं ज्यादा कुशल है हम शायद अब थकने लगे हैं।
   आप लोगों ने विराज और रेखा के मामले में भी हमेशा रेखा का साथ दिया। और विराज को सही रास्ते पर लाने के लिए राजा अजातशत्रु आज भी प्रयासरत हैं। विराज का स्वभाव चाहे कितना भी कसैला क्यों ना हो लेकिन राजा अजातशत्रु इतने मीठे हैं कि वह एक ना एक दिन विराज को भी सुधार ही लेंगे । हमें पूरा विश्वास है। और इसी विश्वास के कारण हम अपनी बहन रेखा को आप लोगों के पास छोड़े जा रहे हैं।
    हम अपने पिता को अपने साथ लिए जा रहे हैं।  क्योंकि पहले तो ऐसा लगा था कि हम उन्हें भी रेखा के साथ आप लोगों के पास, आप लोगों के सहारे ही छोड़ कर आप सब की दुनिया से कहीं दूर चले जाएंगे। लेकिन फिर लगा कि उनकी सेवा करने का सौभाग्य हमें मिला है, और उस सौभाग्य को हम आप लोगों को सौंप देंगे तो आप लोगों के हम पर और भी एहसान चढ़ते चले जाएंगे ।
     यही सोचकर हम अपने पिता साहब को अपने साथ लेकर जा रहे हैं। आप लोगों ने हमारे बुरे कामों के बावजूद हम पर जो एहसान किए हैं और जो एहसान लगातार करते चले जा रहे हैं, उसके लिए हम आप सभी के शुक्रगुजार हैं। लेकिन अब इन एहसानों का बोझ हम पर भारी होने लग गया है। अगर हम यही महल में रुक गए तो कहीं इन एहसानों के बोझ तले दबकर मर ना जाए, इसलिए आप सब को छोड़कर जा रहे हैं। हमारा खुद का जमा जमाया बिजनेस है हमें उसे भी देखना है ।
  भले ही आज तक हम ठाकुर साहब के हाथ की कठपुतली थे, लेकिन हमारा एक छोटा सा ही सही अपना व्यक्तित्व था जो कहीं दबा छुपा सा रह गया था।

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    हमें मालूम है हमारा खत पढ़ते वक्त आपको शायद ऐसा लगा हो कि हम अपनी जिंदगी से बेज़ार होकर अपने आप को खत्म करने ना चले जाएं, लेकिन नहीं आदित्य।
     आपके साथ रहकर हमने इतना तो समझ लिया है कि कोई इंसान अंदर से कितना भी टूटा हुआ हो, जिंदगी हमेशा उसे जुड़ने का मौका जरूर देती है।
अगर हमने हमारी जिंदगी में बेइंतिहा दुख देखे हैं तो आपने कौन सा कम देखें । आपका टूटा हुआ बचपन बिखरी हुई जवानी सभी को समेटकर आज भी आप जिंदगी से जूझ रहे हैं , लड़ रहे हैं। जिंदगी को जी रहे हैं। आप देखिएगा आदित्य एक दिन खुशियां आप के गले लग जाएंगी।
    आप जो चाहते हैं अपनी जिंदगी में, आपको वह सब मिलेगा। आपका परिवार आपके पिता साहब आपकी छोटी बहन पिंकी सब कुछ।
  हम सिर्फ इन बातों की दुआ कर सकते हैं और हमेशा करते रहेंगे आपके लिए।
     हम जितना राजा अजातशत्रु से प्रभावित थे कहीं उतना ही आपसे भी प्रभावित हो चुके हैं ।आप पहली नजर में जितने संगदिल और गुस्सैल नजर आते थे आप अंदर से वैसे बिल्कुल भी नहीं है।
   आप सब ने तो अपने आप को दुनिया के सामने साबित कर दिया है पर हमें आज तक मौका नहीं मिला। अब हम भी जा रहे हैं खुद को साबित करने, लेकिन दुनिया के सामने नहीं अपने आप के सामने।
    आज तक हम जो करते आ रहे थे किसी और के लिए करते आ रहे थे और इसीलिए शायद सही और गलत का फर्क नहीं समझ पा रहे थे लेकिन अब हम जो करेंगे अपने लिए करेंगे अपनी बहन के लिए करेंगे।

   इतने दिन महल में रहते हुए हमने एक निर्णय लिया था जिसके बारे में हम आपसे चर्चा करना चाहते थे। लेकिन वक्त ही कुछ ऐसा चल रहा था कि हमारा कुछ ज्यादा बोलने का मन ही नहीं किया करता था हमने एक निर्णय लिया है आदित्य।
   हम हमारे जैसे बेचारे बच्चों के लिए एक बाल आश्रम खोलने की सोच रहे हैं।
   हमारे पास तो फिर भी हमारे पिता साहब थे बावजूद हम भटक गए। लेकिन बहुत से ऐसे बच्चे होते हैं जो अच्छी परवरिश ना मिल पाने के कारण कम उम्र में भटक जाते हैं। गलतियां करने लगते हैं। और बाद में उनके पास पछताने या आत्महत्या करने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचता।
    जिन बच्चों के पास उनके मां बाप नहीं है , उनके लिए तो फिर भी ढेर सारे आश्रम खुले हुए हैं लेकिन कई बच्चे ऐसे भी होते हैं जो मां बाप के होते हुए भी उनकी कमी महसूस करते हैं। हम ऐसा ही एक आश्रम बनाएंगे जहां ऐसे बच्चों की काउंसलिंग के लिए डॉक्टर मौजूद रहेंगे।
   किशोरवय के वह बच्चे जो किन्हीं भी कारणों से भटक गए हैं । कम उम्र में ड्रग्स लेने लग गए हैं, या बुरी आदतों के शिकार हो गए हैं। उनके लिए हमारा यह आश्रम होगा। , जहां अनुभवी चिकित्सकों की देखरेख में इन बच्चों को उनकी नशे की नशे की लत और बाकी बुरी लतों से निजात दिलाई जाएगी।
   हम जब से आप के साथ थे इसी प्रोजेक्ट को करने में व्यस्त होते थे। अब जाकर हमारा सोचा हुआ प्रोजेक्ट पूरा हुआ है । कुछ 2-4 में प्रायोजकों से भी बात चल रही थी जिन्होंने अपनी सहमति दे दी है। बाकी तो हमारा खुद का बिजनेस भी है। जिसका एक मोटा पैसा हम यहां पर लगाएंगे हमारे पिता साहब और रेखा भी इस प्रोजेक्ट में हमारा साथ देने तैयार है।
     तो अब तुम समझ ही गए होंगे कि हमने अपनी जिंदगी ढूंढ ली है अब हम यह खत लिखना बंद करते हैं कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया है ।
  लेकिन क्या करें बातें भी तो इतनी ढेर सारी थी।
हम तुम्हारे सामने ज्यादा कुछ बोल नहीं पाते हैं। लोगों को लगता है हम बहुत गुस्सैल हैं, घमंडी हैं, बदतमीज है । हो सकता है लोगों को सही लगता हो। शायद हम ऐसे ही हैं लेकिन हम जो भी हैं अपने आप में खुश हैं। और अब अपने इस काम के साथ  हम नई शुरुआत करने के लिए अपने पिता साहब को लेकर निकलने की सोच चुके हैं। हमारा इस शहर में भी बंगला है और दून में भी। आप जहां भी चाहे आकर हमसे मिल सकते हैं फिलहाल हम आपके ही शहर में यानी यही रहेंगे।
    आप जब हमारी जरूरत महसूस करें हम बस एक फोन कॉल की दूरी पर ही है। वैसे तो आप के आस पास आपके अपने मौजूद हैं। तो जाहिर है आपको हमारी कमी नहीं खलेगी, लेकिन कभी अगर किसी भी मौके पर आपको यह लगे कि हम आपकी मदद कर सकते हैं , तो प्लीज हमें याद करने में गुरेज मत कीजिएगा।बिना कोई दूसरा विचार मन में लाए सीधे हमें बुला लीजिएगा हम तुरंत आपके पास मौजूद रहेंगे।
   हमारी एक छोटी सी जिम्मेदारी रेखा को हम आपके पास छोड़ कर आए हैं। उसका ध्यान रखिएगा आदित्य। अब खत लिखना बंद करते हैं कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया।

  केसर !!!

   केसर के खत को पढ़ने के बाद आदित्य ने मोड़ कर अपनी जेब में रख लिया। वह खत पढ़ते-पढ़ते कमरे से जरा बाहर आ गया था उसने मुड़कर देखा दरवाजे पर खड़ी रेखा ने अपने आंसू पोंछ लिए…-” आप जाएंगे क्या दीदी से मिलने?”

” जरूर जाऊंगा! आपकी दीदी से मिलने भी और उन्हें वापस लेकर आने भी।”

रेखा ने हां में सर हिलाया और वापस अंदर चली गई। उसे उस वक्त जाने क्यों बांसुरी के पास बैठने का मन कर रहा था, अंदर से निकल अपने बेटे का हाथ थामे वह बांसुरी के कमरे की तरफ चली गई।

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  रेखा बांसुरी के कमरे में पहुंची तो उसने देखा वहाँ निरमा पहले ही मीठी को साथ लिए बैठी थी। दोनों सखियों को साथ देख रेखा वापस मुड़कर जाने लगी कि बांसुरी ने उसे आवाज देकर अंदर बुला लिया।

“अंदर आ जाओ रेखा बाहर से क्यों जा रही हो।”

सकुचाती हुई वह भीतर चली आई निरमा ने भी आगे बढ़कर रेखा का अभिवादन किया।

   बांसुरी के बच्चे को गोद में लिए रेखा प्यार से देखने लगी…-‘ कितना मिलता है ना इसका चेहरा हुकुम से!”

” सही कहा बच्चे अधिकतर अपने पिता की ही तो परछाई होते हैं ।कहा जाता है ना कि गर्भावस्था में मां जिसका चेहरा सबसे ज्यादा देखती है, उसी की छाप बच्चे पर पड़ती है। और जाहिर है एक पत्नी अपने पति को ही तो सबसे ज्यादा देखती है । और दिल से चाहती है कि उसी की परछाई उनकी संतान बने। “

निरमा की बात पर रेखा ने मुस्कुराकर हामी भर दी…-” लेकिन निरमा तुम्हारी मीठी प्रेम भैया जैसी बिल्कुल नहीं लगती। “

  कुछ पलों को निरमा हड़बड़ा कर चौन्क गयी कि तभी बांसुरी ने मुस्कुराकर बात ही बदल दी।

” हां भई कुछ बच्चे मां पर भी तो पड़ेंगे वरना औरतें नाराज़गी में मां बनने से इस्तीफा नहीं दे देंगी। “

  तीनों सखियां हंसती खिलखिलाती बातचीत में लग गई । बच्चे भी आपस में खेल रहे थे। बांसुरी का बेटा उसकी गोद में ही था कि कुछ देर में ही रेखा के फोन की घंटी बजने लगी….

रेखा ने फोन उठाया, दूसरी तरफ से जाने किसका फोन था लेकिन रेखा फोन में बात करते हुए काफी घबरा गई….” क्या लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? नहीं ऐसा नहीं हो सकता वह किसी और की गाड़ी होगी। अभी कुछ देर पहले ही तो ….” अपनी बात पूरी करने से पहले ही वो फफक पड़ी।

  “क्या हुआ रेखा किसका फोन था? “

बांसुरी के सवाल पर रेखा जोर से रोने लगी।  रोते रोते ही उसने फोन पर हुई बातचीत बांसुरी और निरमा को बता दी फोन पुलिस चौकी से किन्ही पुलिस वाले का था।
   शहर से बाहर जाने वाले हाईवे पर एक एक्सीडेंट हुआ था।  गाड़ी पलट कर नीचे खाई में गिर गई थी। गाड़ी को ऊपर निकालने की कोशिश की जा रही थी। ऊपर से देखने पर गाड़ी का जो नंबर समझ में आया उसको ट्रैक करने पर मालूम चला कि गाड़ी महल की ही थी और विराज के नाम से रजिस्टर्ड थी।
      महल की गाड़ी जो विराज के नाम से रजिस्टर्ड थी, इतना  पता चलने पर पुलिस वालों ने विराज के नंबर पर कॉल लगाया लेकिन विराज का नंबर लगातार बंद आ रहा था इसलिए पुलिस वाले ने रेखा के नंबर पर फोन लगा लिया था।
    बांसुरी और निरमा को यह सब बताते हुए रेखा की हिचकियां बंध गई।
    बांसुरी ने तुरंत अपना फोन उठाया और समर को फोन लगा दिया उधर निरमा भी अब तक प्रेम को फोन लगा चुकी थी।
    अपने आंसू पूछती खुद को संभालती रेखा भी विराज को फोन लगाने कांपते हाथों से उसका नंबर डायल करने लगी……

क्रमशः

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aparna….

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शादी.कॉम-14

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       फेरे पड़ गये,,भान्वर हो गई….वर वधु ने पण्डित जी का आशीर्वाद लिया और अपने गृहस्थ जीवन के शुरुवाती सोपान पर कदम रख दिया।।

     ब्याह निपटने के बाद मन्दिर से नीचे उतर के सभी विमर्श में जुटे कि अब आगे क्या किया जाये।।
  लड़कों का कहना था कि लल्लन के घर जाया जाये,परन्तु अब तक अँग्रेजो के खिलाफ लड़ने वाले क्रान्तिकारियों सी धमक दिखाने वाला लल्लन अब एकदम ही सहमी भीगी बिल्ली बना बैठा था,अब रह रह के उसको गुस्से में चीखते हाँफते अपने बाऊजी और रोती मिमियाती अपनी माँ का करुण चेहरा दिख रहा था,उसकी घर जाने की बिल्कुल हिम्मत नही हो रही थी,उसने प्रस्ताव रखा __

” हम सोच रहे लखनऊ निकल जाते हैं,दो दिन बाद वैसे भी हमारी जॉईनिन्ग है,अम्मा को कह देंगे प्रिंस के साथ कमरा खोजने और बाकी काम निपटाने आये हैं,और अब जॉईनिंग के बाद ही वापस आयेंगे।”

” और बाद में का कहोगे लल्लन?”

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” बाद में कह देंगे काम बहुते जादा है अम्मा,कुछ समय बाद ही घर आ पाएँगे।।”

” कानपुर लखनऊ में दूरी ही कित्ता है,जैसे मथुरा की लड़की वृंदावन ब्याही,बस वैसा ही।।।तुम नही गये तो तुम्हारी अम्मा आ जायेगी तो,तब का करोगे??”

प्रिंस के इस विचारणीय प्रश्न पर सभी सोच में पड़ गये।।

” हमें तो लगता है,लल्लन और रेखा तुम लोग पहले जाओ राजा के घर ,वहाँ सब का आशीर्वाद लो और वहाँ से युवराज भैय्या को साथ लेकर लल्लन के घर जाना,,बड़े भैय्या को सभी मानते हैं,वो जायेंगे तो लल्लन के घर भी कोई परेशानी नही होगी,क्यों ठीक बोले ना राजा।।”

बांसुरी के इस आइडिया पर राजा ने भी हामी भर दी

” ई पनौती फिर बोली,,ई जब जब अपना आइडिया देती है तब तब कोनो का बंटाधार होता है,लिखवा लो हमसे प्रिंस।” प्रेम फुसफुसाया

” अबकी ना होगा,,सही बोल रई बांसुरी!! लल्लन राजा भईया के साथ निकल लो गुरू,अब जादा सोच बिचार में ना पड़ो ।।”

बहुत सारी हिम्मत जुटा के लल्लन रेखा के साथ राजा के घर को निकला,राजा ने बांसुरी को भी साथ ले लिया,प्रिंस और प्रेम पीछे अपनी फटफटी फटफटाते चले आये।।

घर पे पहले ही रूपा के बाऊजी पधारे हुए थे,उनकी अगुआनी में रूपा ऊपर नीचे हो रही थी,तभी दरवाजा खोल के राजा अन्दर आया,आते ही दुबारा उसने भाभी के पिता को चरण स्पर्श किया,और एक कोने में खड़ा हो गया।।

” काहे लल्ला जी,रेखा कहाँ रह गई,आई नई आपके साथ।” रूपा की बात खत्म होते होते बन्सी भी अन्दर आ कर खड़ी हो गई

” अरे इसे ही तो सजाने गई रही,ये यहाँ खड़ी है तो रेखा कहाँ है भई ।।”

रूपा की पृश्नवाचक निगाहों को बांसुरी ने दरवाजे की तरफ घुमवा दिया,दरवाजे से बहुत धीमे से रेखा और उसके पीछे लल्लन आकर अन्दर खड़े हो गये।।

   कई सारे टी वी सीरियल और फिल्मों में नायक नायिका के भाग के शादी करने वाले सीन देख चुकी रुपा ने जब रेखा को फूलों की लम्बी वरमाला पहने और माथे पे पीला सिन्दूर लगाये देखा तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गई।।।आज तक अपनी सास के सामने अपने खानदानी होने और संस्कारी होने की बड़ी बड़ी डीँगे हाँकने वाली रूपा का मुहँ रुआंसा हो गया।।

” रेखा!!!” बस इतना बोल कर अपने सर को पकड़े रूपा धम्म से नीचे गिर पड़ी,हालांकि इस गिरने में बराबर चोट ना लगे इस बात का ध्यान रखा गया, सोफे पर पसरने के बाद रूपा ने आंखे पलट दी,, आसपास के सभी लोग दौड़ पड़े,राजा की दादी जिनका दीवान खाने में एक ओर पर्मानेंट अड्डा था, घबरा कर चीखी__ ” अरे दांत ना जुड़ जई,देखो रे “

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  राजा की अम्मा और शन्नो मौसी पानी की कटोरी लिये दौडे ,जल्दी जल्दी रूपा की तीमारदारी मे लगी, घर की मुहँ लगी नौकरानी अपने राग मे थी __ ” अम्मा जी जूता सूंघा दौ,अब्भी उठ बैठेगी बहुरिया।”

” अरे मुह्नजली!! इन्ने मिर्गी ना आई है जो जूतो सूंघाने बोल रई,चकरा गई है तनिक, अभी पानी का छींटा से ठीक हो जायेगी।”

बेहोश पड़ी रूपा के कानों में जब जूता सून्घाने की बात पड़ी तो वो घबरा के थोड़ा कसमसाई पर दादी की बात कान में पड़ते ही उसे संतोष हुआ कि जूता नही सुन्घाया जायेगा,और वो फिर चित पड़ी रही।

इधर रूपा के पिता का बी पी रेखा के नये नवेले दूल्हे को देख बढ़ ही रहा था कि रूपा अचानक चक्कर खा गई,वो बेचारे जब तक कुछ समझ पाते ,समधन अपनी पायल चूड़ी बजाती दौड़ी चली आई और वो बेचारे रिश्ते के सम्मान के मारे एक किनारे खड़े रह गये,उतनी ही देर में घर के बड़े लड़के युवराज का पदार्पण हुआ।।
    अपने कमरे में आये दिन रूपा की ऐसी नौटंकी से परिचित युवराज ने आगे बढ़ कर रूपा की नब्ज थाम ली __
      ” अरे नब्ज तो बड़ी धीमी हो गई है,राजा वो क्या नाम है तुम्हारी डॉक्टर सहेली का?? हाँ रानी,ज़रा फ़ोन घुमाओ उसे,कहना बड़ा वाला विटामिन का इन्जेक्शन लेती आये,,इन्हें सुई ही लगवानी पड़ेगी।”

राजा को बड़े भैय्या की बात समझ नही आई,वो तुरंत अपनी जीन्स से मोबाइल निकालने लगा, उसका हाथ पकड़ बन्सी ने इशारे से उसे फोन करने से मना कर दिया,अपने पति की सुई वाली बात सुन रूपा को भी होश आने लगा,उसने धीरे से अपनी आंखें खोल दी__” कहाँ हैं हम?” हमेशा फिल्मों में होश मे आने के बाद नायिका द्वारा बोला जाने वाला पहला डायलॉग बोल कर आंखे फाड़ रूपा युवराज को देखने लगी,तभी उसे रेखा और लल्लन याद आ गये,और वो अपने पूरे फेफड़े फाड़ के दम लगा के चिल्ला के रो पड़ी ।।

  पूरे घर मे हाहाकार मच गया,ये ऐसा समय था जब लल्लन को अपने किये पे दिल से अफसोस होने लगा,उसे वहाँ से निकल भागने की राह नही सूझ रही  थी,जो महिला जैसे सुना सकती थी,वैसे सुना रही थी,चाहे राजा की दादी हो या रूपा,यहां तक की शन्नो मौसी को भी मौका मिल गया था,वो भी पानी  पी पीकर आज के नौ जवान छोकरे छोकरियों की विवाह प्रगती पे अपने विचार प्रकट कर रही थी,

” एक हमारा समय था,शकल सूरत तक ना देखी शादी होने तक,और एक आजकल के लड़के लड़कियाँ हैं,हद बद्तमीज़ी है।।”

” ठीके रहा तुम्हरे समय सकल ना देखे बनी ,नही तुम्हे कौन ब्याह  ले जाता सन्नो??” राजा की दादी के कथन पर शन्नो मौसी का पारा और चढ़ गया,सब नाराज थे,पर एक कोई ऐसी भी थी वहाँ जिसके मन में लड्डू फूट रहे थे!!!

   राजा की अम्मा थी जो बार बार रूपा को ना रोने और जो हुआ उससे समझौता करने की सीख दे रही थी,आखिर थक कर वो वहाँ से उठी और चुपके से अन्दर खिसक गई,दस मिनट बाद एक हाथ में पूजा की थाली और दूसरे हाथ में मिठाई का थाल उठाये राजा की अम्मा वापस आयी।।बांसुरी ने आगे बढ़कर उनके हाथ से एक थाल ले लिया।।
   रेखा रूपा के पैरों के पास उसे मनाने मे लगी थी,युवराज और राजा वकील बाबु को समझा रहे थे, दादी और शन्नो मौसी अपने राग दरबारी मे व्यस्त थे, वहीं प्रिंस और प्रेम में से एक दादी का तो एक मौसी का पक्ष ले आग मे घी डालने का काम कर रहे थे, इस पूरे सीन से विलग लल्लन एक किनारे खड़े खड़े अपने घर पे मिलने वाले सत्कार के बारे मे सोच सोच परेशान हुआ जा रहा था,,,उसे आज तक का अपना पूरा जीवन अपने सामने रील सा चलता दिख रहा था, बचपन में माँ को सताना,बाऊजी का मार मार के गिनती पहाड़ा रट्वाना,बड़े भईया की जेब से चुराये पैसों से पहली सिगरेट खरीद कर पीना,हर राखी पे दीदी के लिये कैसे भी कर के गिफ्ट खरीदना,इत्ती सारी खुशनुमा यादों को उसने खुद अपने हाथों कुएं में बहा दिया था,एकाएक उसे अपना निर्णय जल्दबाजी में किया गया फैसला लगने लगा था, पर अब समय उसके हाथ से रेत सा फिसल चुका था,वो अभी अपनी उधेड़बुन मे था कि राजा की अम्मा पूजा की थाली लिये आई ।।
     बाँसुरी ने आगे बढ़ दीवार से लग कर खड़े लल्लन को हाथ पकड़ कर आगे खींच लिया और रेखा के बाजू में बिठा दिया,अम्मा ने आगे बढ कर नवयुगल का तिलक किया और आरती उतारी,मुहँ मीठा करा दिया।।

    गुस्से मे बडबड करती रूपा रोती धोती अपने कमरे में चली गई,,युवराज ने लल्लन को बैठा कर उसके घर परिवार नौकरी चाकरी का हिसाब लेना शुरु किया,पढ़ाई लिखाई बताने के बाद जैसे ही लल्लन ने अपनी ताजा ताजा लगी सरकारी नौकरी का जिक्र किया,वहाँ उपस्थित सभी के चेहरों पर अलग अलग तरह की प्रतिक्रिया दिखने लगी,औरतों की खुसफुसाहत कुछ और मुखर हुई,वकील बाबु के चेहरे पर भी सन्तोष की झलक आ ही रही थी कि राजा के बाऊजी भी पिछले दालान से निकल बाहर आये,और आते ही उन्होनें अपना सबसे प्रिय सवाल छेड़ दिया__

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       ” किसके लड़के हो वैसे तुम,हमार मतलब कौन जात हो??”

   ” इरिगेशन में हमारे बाऊजी आफीसर है,बाबुलाल सूर्यवंशी।।”

लल्लन का ये वाक्य वकील बाबू के सीने मे घूंसे के समान लगा,उस समय उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी ने हाथ अन्दर डाल उनके फेफडों को जोर से मसल दिया हो,ऐसी प्राणान्तक पीड़ा मिली वो भी समधि के घर जहां ना वो खुल कर बोल पा रहे थे,और ना चिल्ला पा रहे थे।।आज तक वकील बाबू के लिये उनकी वकालत सबसे ऊपर थी,पर अदृश्य और अपरोक्ष रूप से उनकी वकालत के उपर था उनका ‘ ब्राम्हणत्व ‘।
     उन्हें सदा ही लगता आया था कि वो स्वयं ब्रम्हा की संतान हैं,इसीसे और कोई माने ना माने उन्होनें खुद को समाज में सबसे ऊपर स्थापित कर रखा था, उनके अनुसार उनके नीचे आने वाली हर जाति के लिये विभिन्न कार्य बनाये गये थे,और वो बने थे सबसे ऊपर बैठ कर सबके कार्यों का निर्धारण करने के लिये।।
      हालांकि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उनकी सोच और उनका स्थान बिल्कुल उलट हो चुका था,पर इसके बावजूद वो तन मन से इस नई व्यवस्था के खिलाफ थे,वो खिलाफ थे अन्तर्जातीय विवाह के।।उन्होनें अपने बच्चों के मन की मिट्टी को  भी सदा से जाति पाति के जटिल खाद और पानी से ही सींचा था,पर जाने कैसे ये कुलबोरनी अपने सारे संस्कार गंगा जी में बहाये आयी।अभी उनके हाथ में दुनाली होती तो ये नये नवेले जोड़े को सीधा परलोक पहुंचा देते पर एक तो समधि का घर दुजा वो मन ही मन युवराज का भी थोड़ा अधिक ही लिहाज करते थे,उनकी नज़र में उनकी जिंदगी भर की असली कमाई उनका दामाद युवराज ही था,लड़के तो शादी के बाद अपनी अपनी घर गिरस्ती में लीन थे,बस यही एक हीरा था जिसकी चमक से उन्होनें अपने तन मन को रोशन कर रखा था।।

   अपनी मर्मांतक पीड़ा को दबाते हुए उन्होनें बड़े कष्ट से युवराज को अपने पास बुलाया और तुरंत घर निकलने की इच्छा जाहिर की।।
      अपने श्वसुर के कट्टर स्वभाव से परिचित युवराज ने उनकी मंशा जानते ही राजा को गाड़ी निकालने का आदेश दिया और बैठ कर उन्हें सरकारी नौकरी के फायदे गिनाने लगा।।पर पल पल बदलते ससुर के चेहरे के रंगों का कुछ असाधारण होना युवराज को खटक रहा था कि वकील बाबू ने अपना सीना अपने हाथों सा पकड़ लिया__” क्या हुआ बाऊजी,कुछ तकलीफ है क्या??”

” हाँ,,कुंवर जी,लग रहा जैसे कोई कलेजा मरोडे दे रहा।।”
    बोलते बोलते ही वकील बाबू दर्द से कुम्हला कर एक ओर को झटक गये।

   युवराज और राजा ने आनन फानन उन्हें उठाया और बाहर गाड़ी में डाल तुरंत अस्पताल को दौड़ चले।। रूपा ने जैसे ही सुना की उसके बाऊजी को अस्पताल ले जाना पड़ा वो और हाथ नचा नचा के रेखा को सुनाने लगी_

  ” और कर लो लब मैरिज,अब पड़ गई कलेजे को ठंडक!! इत्ते में मत रुकना,बाऊजी को मार के ही दम लेना तुम,,कहे दे रहे रेखा ,आज के बाद हमे अपनी सकल ना दिखाना ,समझी।”

बहुत देर से चुप चाप खड़ी रेखा के लिये भी अब सब कुछ असहनीय हो गया,आखिर वो भी बिफर पड़ी

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” अरे शादी ही तो किये हैं,अपनी मर्ज़ी से कर लिये तो इतनी हाय तौबा काहे मचा रहे सब,और सुन लो दीदी बाऊजी भी अच्छे हो जायेंगे,तुम्हे ज्यादा चिंता करने की ज़रूरत नही है।” रेखा वहाँ से लल्लन का हाथ पकड़े बाहर निकली ही थी कि रूपा ने उसे रोक दिया__” कोई ज़रूरत नही तुम्हे अस्पताल जाने की।

” अरे अभी बखत नही है तुम दोनो का बिल्ली बन लड़ने का ,जल्दी अस्पताल चलो!! देखें वहाँ बकील बाबू को हुआ का है,भोले भंडारी रक्षा करे उनकी, समधन को भी खबर करना होगा।।”
  सबके सब बाहर निकले,प्रिंस और प्रेम अपनी बाईक में पहले ही राजा भईया की गाड़ी के पीछे निकल चुके थे,राजा के बाऊजी राजा लोगों के साथ निकल चुके थे,,अब बची थी घर की औरतें,बाँसुरी और लल्लन …..और बाहर खड़ी थी राजा की एस यू वी।।रेखा ने लल्लन को देखा __” हमें चलानी नही आती रेखा,हम बस आज तक वैगनार चलायें हैं,हम रोड पे एस यू वी नही उतार पायेंगे।”

  अभी लल्लन अपनी गाड़ी चलाने की योग्यता बता ही रहा था कि बांसुरी गाड़ी स्टार्ट कर गियर में डाल हॉर्न देने लगी,,

” चला तो लोगी ना,,बोज तो ना दोगी कहीं नाले वाले में ”  रूपा के सवाल पर बांसुरी ने मुस्कुरा कर नही में सर हिला दिया __” राजा सिखाये हैं हमें गाड़ी चलाना,बहुत सेफ ड्राइव करते हैं हम,,आप सब लोग  निश्चिंत होकर बैठिए।।

  सभी को लिये बांसुरी जब तक अस्पताल पहुंची तब तक वकील बाबू को इमरजेन्सी में भर्ती कर लिया गया था,कॉरिडोर में ही युवराज और राजा मिल गये,अभी सब मिल कर विचार विमर्श कर ही रहे थे कि डॉक्टर ने बाहर आकर एक परचा राजा को थमाया,और सारी दवाइयां जल्दी से जल्दी लाने की ताकीद की।।
   राजा के फोन पर रानी भी वहाँ पहुंच चुकी थी, वो भी अन्दर डॉक्टरों की टीम के साथ लगी हुई थी।।
  डॉक्टर और नर्सों की टीम भाग भाग कर अपने काम को अंजाम देने में लगी थी,लगभग दो ढाई घन्टे की मशक्कत के बाद एक सीनियर डॉक्टर बाहर आये __
         ” मरीज के साथ कौन है”  युवराज के आगे बढ़ते ही उन्होनें वकील बाबू के कमजोर हृदय का लेखा जोखा युवराज को थमा दिया

   ” देखिए इन्हें अटैक आया है,अभी तो हमने इमरजेन्सी दवाईयां दे दी हैं,पर आप लोग इनका एन्जियोग्राफ करवा लिजिये,जिससे ब्लॉकेज का परसेंटेज पता चल सके, अभी 4 दिन अस्पताल में ही रहना होगा,उसके बाद आप इन्हे लखनऊ मेडीकल कॉलेज ले जा सकते हैं ।”

इतना सुनते ही रूपा का पूर्वाभ्यासित रोने का कार्यक्रम शुरु हो गया,युवराज के बार बार समझाने पर भी उसने अपने राग तार सप्तक में ही छेड़े हुए थे, तभी वहाँ रानी आई__” अरे भाभी आप इतना परेशान मत होईये।।अभी अंकल ठीक है,आराम है उन्हें ।।लेकिन आगे चलकर कहीं वापस दुबारा अटैक आ गया तो बड़ी मुसीबत होगी इसिलिए डॉक्टर कह रहे कि एन्जियोग्राफी करवा लिजिये,उसमें अगर ज्यादा ब्लॉकेज आता है,तो आप एंजियोप्लास्टी करवा लीजियेगा,उसके बाद अंकल बिल्कुल स्वस्थ और सुरक्षित रहेंगे।।”

” ये सब का कारन ई कलमुही है,ना ये ऐसा भाग भगा के सादी करती ,और ना बाऊजी को हार्ट अटैक आता।”

” ऐसा नही होता भाभी,अंकल को शुरु से ब्लॉकेज रहा होगा,जो आज वेन्स को चोक कर गया और अटैक आ गया,आप बेवजह किसी को ब्लेम ना करें।”

” काहे ना करें,हमार बहिनी है,तुम्हारे पेट में काहे दरद हो रहा,ए लल्ला जी समझाओ अपनी डाक्टर्नी को,जादा चपर चपर ना करे,हम भी सब समझते हैं।।
बड़ी आई हमे समझाने वाली।”

कुछ ही देर में रूपा की माँ और भाई भी दौड़ा चला आया,अपनी माँ को देखते ही रूपा ने फिर एक बार रूदाली रूप धर लिया और आंखे और हाथ नचा नचा के रेखा के सर मत्थे सारा ठीकरा फोड़ दिया।।
  पर रूपा की माँ रूपा सी गंवार ना थी,समय की नज़ाकत को भांपते हुए उसने रूपा को समझा बुझा के शांत  कराया और रेखा के पास जाकर उसे अपने सीने से लगा लिया।।
    दुख की इस घड़ी मे,ऐसी अपार विपदा में जहां पति जीवन मृत्यु के बीच पीन्गे भर रहा था,बेटी का जात से बाहर जाकर शादी करना माताजी को कमतर दुखी कर पाया।।और शायद इसिलिए अपने दुख को दूर करने उन्होनें आगे बढ कर बच्चों को माफ कर दिया।।

  औरत ही औरत की पीड़ा समझती है,राजा की अम्मा ने आगे बढ़ कर समधन को गले से लगा लिया,दोनो औरतें साथ बैठी घंटों टन्सुये बहाती रहीं, अंत में रो धो कर फुर्सत पाई तो पति से मिलने की इच्छा जाहिर की,जिसे उस वक्त डॉक्टरों ने ठुकरा दिया।।

    शाम चार पांच बजे तक में मरीज की हालत स्थिर हुई,और सभी को उनके कक्ष में उनसे मिलने की इजाज़त मिल गई।।

   इतनी देर में राजा ने फ़ोन पे लल्लन के बड़े भाई को सारी जानकारी दे दी थी,राजा के फोन के बाद घर पे सोच विचार कर लल्लन का भाई,उसके बाबूजी और अम्मा भी अस्पताल चले आये।।
    आते ही लल्लन की अम्मा ने राजा की अम्मा से दुआ सलाम की और रेखा की अम्मा से मरीज का हाल पानी जानने लगी,वहीं लल्लन के पिता और भाई भी युवराज और बाकी पुरूषों से बाकी का हाल समाचार लेने लगे।।लल्लन को अपने पिता और भाई का तो उतना डर नही था जितना उसे अपनी अम्मा का डर सता रहा था,उसने आगे बढ़ कर पहले बाऊजी,भैय्या और फिर अम्मा के पैर छू लिये।।
   बाऊजी ने उसके सर पर हाथ फेरा तो लल्लन की आंखों की कोर भीग गई पर अम्मा ने आशीर्वाद की जगह दुसरी ओर मुहँ फेर लिया,और तो किसी को कुछ समझा नही पर कोखजाये ने अपनी जननी का दर्द उसकी पीड़ा समझ ली,पर अब क्या हो सकता था?? चुपचाप उठ कर लल्लन ने इशारे से रेखा को भी पैर छूने को कहा और एक तरफ खड़ा हो गया, रेखा ऐसी बातों को समझ कर भी कई बार नासमझ बन जाती थी,बांसुरी ने रेखा से मुहँ खोल कर कहा

” अपने सास ससुर की चरण धूलि तो ले लो रेखा, बड़ों का आशीर्वाद तुम्हारे भविष्य  को सफल बनाएगा,,चिंता ना करो सब ठीक हो जायेगा।।”

शाम ढलते ढलते सभी के चेहरों से चिंता की लकीरें भी छंट गई,रो के हँस के जैसे भी हो पर लल्लन और रेखा के विवाह को आखिर दोनो परिवारों की सहमती मिल ही गई।।
    वकील बाबू को भी हृदय मे उठी मर्मांतक पीड़ा  में जीवनरक्षक औषधियों ने ऐसा चमत्कार किया कि  अपने कष्ट से मुक्ति पाने के बाद वो यथासम्भव विनम्र होते चले गये,उन्होनें अपने मन की भावनाओं को समेट कर अपने नये जमाता को गले से लगा लिया।।

     वैसे भी मृत्यु के मुख से लौटे इन्सान को अपना जीवन और अधिक मूल्यवान लगने लगता है,वैसा ही कुछ वकील बाबू के साथ हुआ,और उन्होने हृदय से सबकी गलतियों को क्षमा कर दिया ।।

    रात मे अस्पताल में रूपा का भाई रुका,माँ को समझा बुझा कर रूपा अपने साथ ले गई,,शादी ऐसी जल्दी मे हुई परन्तु विदाई बिना परछन कैसे कर दे,ऐसा बोल रेखा को भी उसकी माँ अपने साथ ले गई,इधर लल्लन को उसके दोस्त बिना गाजे बाजे ही बाराती बने,, राजा भैय्या की गाड़ी में हँसी ठिठोली करते बिना दुल्हन ही उसके घर पहुँचा आये।।
    प्रेम प्रिंस और राजा भैय्या के साथ जैसे ही लल्लन अपने घर की चौखट लान्घने जा रहा था कि उसकी अम्मा की आवाज़ ने उसे वहीं रोक दिया, वो जल भरा कलश और आरती की थाल लिये चौखट पे आई,और पानी भरे कलसे को सात बार लल्लन के चारों ओर घुमा कर,बाहर निकल उस पानी को बहा आई__
       ” सादी बिना पूछे कर आये तो अब का हर जगह मनमानी चलेगी तुम्हारी,,अरे हल्दी नई चढ़ी तो का भवा,दूल्हा तो बनी गये,अब नैके दूल्हा का नज़र उतारे बिना,उसकी आरती उतारे बिना अन्दर कैसे ले लें,बोलो।।”

    नज़र उतार ,आरती कर,अम्मा ने लल्लन के मुहँ मे शगुन का गुड़ डाला और उसे अपने आंचल तले ढांप के घर के मन्दिर में ले चली।।
    कुल देवी के आगे प्रणाम कर लल्लन ने अपनी अम्मा के पांव छुए और अम्मा के आंसू लल्लन के चेहरे को भिगोते चले गये__” एक बार पूछने की ज़रूरत भी ना समझी लल्ला,आज तक किस बात के लिये रोका तुझे जो आज रोक लेती।।”

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” गलती हो गई अम्मा!! माफ कर दे।।” लल्लन अपनी अम्मा के गले से लगा रो पड़ा,,माँ बेटे के इस पावन मिलन के बीच घर के किसी सदस्य ने आने की जुर्रत नही की,राजा इसी बीच जाकर अपनी गाड़ी में बैठा प्रिंस और प्रेम का रास्ता देख रहा था,कि  बांसुरी का मेसेज आ गया ” वहाँ लल्लन के घर पे सब ठीक है ना??” जवाब में राजा ने भी लिख दिया _” हाँ सब ठीक!!”

  ” क्या भाई,चाय पीकर ही टरोगे तुम दोनो??” लल्लन की दीदी के सवाल पर प्रिंस हड़बड़ा गया

” नहीं दीदी!! बस जाते हैं हम दोनो।।” दोनो बाहर को भागे,देखा राजा भैय्या ड्राइविंग सीट पर अपना मोबाइल पकड़े मुस्कुरा रहें हैं ।।

” का बात है भैय्या जी,बड़ा मुस्कुरा रहे हैं,किसका मेसेज आ गया ??”

” अबे किसी का नही बे!! जल्दी चलो ,,घर जाये कुछु खाये पिये,,आज तो लल्लन की शादी के चक्कर में पानी तक नसीब नही हुआ,फिर भाभी के बाऊजी की तबीयत बिगड़ गई,,अब तो पेट मे चूहे रेस लगा रहे हैं,अम्म्मा जाते जाते इशारा कर गई थी कि आज हमारी पसंद की प्याज की कचौड़ी बना रही हैं,तो चलो जल्दी से चले और खाये पियें।”

” चलिये भैय्या जी फिर भगा लिजिये गाड़ी,किसका इन्तजार है।।”

तीनों साथ बैठे राजा के घर को निकल चले।।

क्रमशः

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aparna..

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जीवनसाथी- 118

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  जीवनसाथी – 118




     अस्पताल में बांसुरी के कानों में चुपके से कुछ कह कर पिया वहां से बाहर निकल गई बांसुरी में समर की तरफ देखा वह पिया को ही देख रहा था पिया के जाने के बाद उसने सर झुका लिया।

” क्या हुआ समर सा कुछ उदास लग रहे हैं आप?

“ऐसी तो कोई बात नहीं रानी साहेब! मैं तो बहुत खुश हूं। आपने इतनी बड़ी खुशखबरी दी है मेरे हाथों में।

“तो आप हम सब को कब मौका दे रहे हैं खुश होने का।”

बाँसुरी के सवाल पर समर मुस्कुरा कर चुप रह गया।

“नहीं! अब ऐसे चुप रहने से काम नहीं चलेगा! आपको याद है एक दिन आपने मुझसे कहा था, कुछ गिफ्ट के लिए, और मैंने कहा था वक्त आने पर मांग लूंगी! तो क्या आज मैं अपना तोहफा मांग सकती हूं!”

” आप रानी है हुक्म कीजिये।”

” पहली बात कि आप मुझे बार-बार रानी साहेब कहना बंद कीजिए। मैं आपको अपना देवर मानती हूँ इस लिहाज से आप मुझे भाभी सा कहिये तभी मैं अपना तोहफा माँगूँगी। “

  समर मुस्कुरा उठा..-” ठीक है भाभी साहब! आप बताइए । “

” अब आप भी शादी कर लीजिए। कब तक ऐसे मारे मारे फिरते रहेंगे। आपके राजा साहब अपने अलावा और किसी की तरफ ध्यान देते ही नही। “

” ये बड़ी ज्यादती है। अगर वो खुद किसी बंधन में बंधना नही चाहता तो मैं कैसे उसे पकड़ कर उसकी शादी कर दूं। “
   राजा के जवाब पर समर बाहर की तरफ देखने लगा। उसे देखकर बांसुरी वापस मुस्कुरा कर उसे छेड़ने लगी…-” क्या हुआ कमरे से बाहर की तरफ आप देख रहे हैं? किसी का इंतजार कर रहे हैं या किसी के पीछे जाना चाहते हैं।”

“जी ऐसा तो कुछ भी नहीं है।”

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“क्यों अपने आप से झूठ बोल रहे हैं? अब इस कमरे में आपके राजा साहब और मेरे अलावा कोई नहीं है! आप हम दोनों को तो सच बता ही सकते हैं।”

“कैसा सच भाभी साहब?”

“यही कि आप पिया से प्यार करते हैं!”

“ऐसा किसने कहा आपसे! क्या पिया ने कुछ कहा?”

“जी नहीं आप एक नमूना हैं तो वह डबल नमूना है। उसने भी कुछ नहीं कहा । यही तो मैं कह रही हूं कि ना आप कुछ कहेंगे ना वह कुछ कहेगी और बस इसी अनकही में कहीं यह ना हो जाए कि वह शादी करके उस डॉक्टर का नर्सिंग होम संभालने चली जाए ! तब बैठे रहिएगा अपनी मंत्रीगिरी संभालते हुए यहां।
  और एक बात कहूं! आज नहीं तो कल काकासाहेब आपकी शादी कर ही देंगे ! किसी ना किसी के साथ तो जिंदगी आपको भी बितानी ही है, तो अगर मौका मिल रहा है कि आप अपनी पसंद की लड़की के साथ अपनी पूरी जिंदगी बिता सकते हैं, तो उस मौके को क्यों यूं ही गवा रहे हैं?
  आखिर अब आपको किस बात का इंतजार है? देखिए आपकी सगाई हुई थी केसर से। पर यह हम सब जानते हैं कि वह सगाई कितनी सच थी और कितनी झूठ।
यह आप भी जानते हैं और केसर भी। अगर आप यह सोच कर बैठे हैं कि उस झूठी सगाई के बाद भी केसर की सारी जिम्मेदारी आपके ऊपर है तो यह गलत है। केसर खुद पश्चाताप में  डूबी है कि मुझसे और राजा साहब से बदला लेने के लिए उसने आपको मोहरा बनाया। यह बात आप भी जानते हैं। इसलिए केसर की तरफ से अपने मन में किसी भी तरह का कोई गिल्ट मत रखिएगा ।
  अपनी जिंदगी संवारने का, उसे सजाने का मौका हाथ से मत जाने दीजिए समर सा, क्योंकि अगर आप जिससे प्यार करते हैं वह आपके साथ नहीं है तो जिंदगी बहुत कठिन हो जाती। हमने यह बात बहुत करीब से महसूस की है रेखा को देखते हुए।
और अगर आपने जिससे प्यार किया वह आपका हमसफर बन कर आपका जीवन साथी बन कर आपके ज़िन्दगी के सफर में साथ चलता रहे तो इस जिंदगी के सफ़र से खूबसूरत कोई सफर नहीं रह जाता, यह हमसे ज्यादा और कौन जानता है।



“एक और भी कोई है जो यह बात जानता है।”

राजा की बात पर बांसुरी मुस्कुरा कर वापस समर को देखने लगी…-” देख लीजिए अपने राजा साहब को और हमें!
क्या हम दोनों की जोड़ी देखकर आपको यह नहीं लगता कि आपकी भी ऐसी ही एक जोड़ी होनी चाहिए! अभी भी वक्त है जाइए और रोक लीजिए अपनी पिया को, वरना वह इतनी ज़िद्दी है, कि अगर आपने उसे नहीं रोका तो वह वाकई उस लड़के से सगाई करके शादी करके आप की दुनिया से दूर चली जाएगी।”

” जाने दीजिए! अगर वह जिद्दी है, तो मैं उससे बड़ा जिद्दी हूं।”

“अगर आपकी ज़िद से किसी का फायदा होता तो मैं आपको इस ज़िद से पीछे हटने नहीं देती। लेकिन आप दोनों की यह फिजूल तानाशाही और यह फिजूल की सनक एक दूसरे की जिंदगी बर्बाद कर देगी। इतना कहने पर भी आप मेरी बात नहीं सुन रहे हैं इसका मतलब है, कि आपकी जिंदगी में मेरी कोई अहमियत नहीं है। चलिए कोई बात नहीं अगर आप नहीं चाहते तो मैं आपको बिल्कुल भी फोर्स नहीं करूंगी।”

“यह क्या कह दिया आपने भाभी साहेब। हुकुम का और आपका स्थान मेरे जीवन में मेरे माता-पिता के समान है! आपकी आज्ञा मेरे सर माथे। मैं अभी जा रहा हूं ,उसके पीछे।  उसे पकड़ कर वापस आपके सामने पेश करता हूं।”

“जी नहीं! उसे इस तरह से पकड़ जकड़ कर मेरे सामने लाने की जरूरत नहीं है। आज उसकी सगाई है आप जाइए उसकी सगाई होने से पहले -पहले उसके घरवालों से उसका हाथ मांग लीजिए।
लेकिन उसके पहले मेरी एक बात सुनिए।”

“जी आज्ञा दीजिए आप।”

“आप वाकई पिया से प्यार तो करते हैं ना?”

समर बांसुरी से नजर चुरा कर इधर-उधर देखने लगा और उसे इधर उधर देखते हुए बांसुरी खिलखिला कर हंस पड़ी…-” देखिए यह हमारा छोटा शैतान भी खुश हो रहा है अपने चाचा को शर्माते हुए देखकर। वैसे एक बात कहूं आप की बोलती कोई बंद नहीं करा पाता है। एकमात्र पिया है जिसके सामने आप चुप खड़े रह जाते हैं और वह सरपट बोलती चली जाती है। मैंने तो पहली बार ही आप दोनों को देख कर समझ लिया था कि यह राम मिलाई जोड़ी है।”

“देखा समर कितनी समझदार है हमारी हुकुम। दूसरों के सब मामले में इनकी समझदारी ऐसे ही फूट-फूटकर बहती है, और हमारे मामले में इन्हें मुझसे मिलने के बाद यह समझ आने में कि मैं ही इनका जीवन साथी हूं महीनों लग गए।”

“होता है ऐसा भी हो जाता है कभी-कभी!
वैसे समझ में तो तब भी मुझे आ गया था, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। और खासकर आपका यह बड़ा सा महल देखने के बाद तो रही सही थोड़ी सी हिम्मत भी चूक गई थी।”

“चलो अब हम दोनों बातों में नहीं लगते समर कि यहां से छुट्टी करते हैं जिससे वह जाकर अपनी जीवनसंगिनी को रोक सके ! “
राजा की बात पर बांसुरी ने हां की मुहर लगाई और समर को उन दोनों ने वहां से बाहर भेज दिया।

समर कमरे से बाहर निकल कर गाड़ी की तरफ बढ़ा और जैसे ही ड्राइविंग सीट पर दरवाजा खोलकर अंदर बैठा बाजू वाली सीट पर प्रेम आकर बैठ गया। उसी वक्त पीछे के दोनों दरवाजे खुले और आदित्य और विराट भी अंदर आकर बैठ गए। समर उन सब को चौक कर देखने लगा…-” आप सब अचानक एक साथ यहां कैसे?”

“भाई दुल्हन लेने जा रहे हो तो बाराती तो साथ चलेंगे ना।

प्रेम की बात पर समर एक बार फिर चौन्क कर प्रेम को देखने लगा। प्रेम भी उसे देखते हुए हंस दिया….-” अरे पहली बार जा रहे हो बात करने उनके घर, अकेले जाना शोभा देता है क्या? हम सब तुम्हारे भाई बनकर मिलेंगे उनसे, और जब बातचीत पक्की हो जाएगी तब काका और काकी से मिलवा देना।”

प्रेम की बात पर हामी भरते हुए आदित्य और विराट भी हंसने लगे।
“समर गाड़ी तुम चलाओगे या मैं चला लूं? वैसे दूल्हा खुद ड्राइव करता हुआ जाए ये अच्छा नहीं लगता। तुम पीछे आ जाओ मैं ड्राइविंग सीट पर आता हूं ।”
समर में एक नजर आदित्य को देखा और वापस गाड़ी गियर में डाल दी।
“मैं देख रहा हूं जैसे ही किसी की कोई नाजुक रग दूसरों को पता चलती है सब बड़े मजे लेने लगते हैं।’

“हम सब तो मजे लेंगे ही, तुम हो ही ऐसे कमाल के। पूरी दुनिया को सुधारने चले हो और अपनी जिंदगी का कबाड़ कर रखा है। अरे जब अच्छी-खासी लड़की मिली हुई है ,तो उससे शादी करने की जगह उसे प्रपोज करने की जगह तुम दून जाकर में कोर्ट केस में जिरह कर रहे हो।”

“वह भी तो जरूरी था दोस्त।”

समर की बात पर आदित्य ने हंसकर ठप्पा लगा दिया ….-“और यह भी बहुत जरूरी है।”

हंसते मुस्कुराते चारों लड़के पिया के घर पहुंच गए।
पिया के घर के सामने समर ने जैसे ही गाड़ी रोकी प्रेम तिरछी नजरों से समर को देखने लगा …-“अच्छा तो तुम्हें घर भी पता है।”

“अरे यार अब इसमें कौन सी बड़ी बात हो गई, घर तो पता होगा ही।”

समर की बात सुन पीछे बैठा आदित्य भी दिल खोल कर हंसते हुए बोलने लगा…-” और क्या प्रेम भैया आप तो ऐसे पूछ रहे हैं? अब इतनी बार आना जाना हुआ होगा तो समर सा को घर तो याद होगा ही।”

समर ने एक नजर मुड़ कर आदित्य को देखा और गाड़ी से उतरकर मेन गेट की तरफ बढ़ गया। मेन गेट पर बैठे गार्ड से समर ने ऊपर पिया के फ्लैट में जाने के लिए बताया तो गार्ड ने उल्टा उन्हें अचंभित कर दिया…..-” नहीं साहब ! प्रिया मेम साहब के घर पर तो इस वक्त कोई नहीं है सब लोग शादी भवन गए है।”

“शादी भवन ! लेकिन वहां क्यों गए हैं?”

“आज पिया मैडम की सगाई है ना।”

गार्ड से पता ठिकाना पूछ कर वह चारों वापस गाड़ी में जा बैठे! आदित्य एक बार फिर समर को छेड़ने लगा……-” शादी भवन गए हैं, सुनकर तो मुझे लगा पिया सगाई छोड़ कर सीधे शादी करने को ही तैयार हो गई है। वैसे भी समर बाबू ने जितने झटके दिए हैं, उस हिसाब से अगर मैं पिया की जगह होता तो आज सुबह ही शादी कर चुका होता । वह तो बेचारी अब तक बैठी राह देख रही होगी।”

विराट भी आदित्य के साथ जुगलबंदी में लग गया….-” ठीक कह रहे हो आदित्य! मुझे भी यही लगा कि कहीं पिया की शादी तो नहीं हो रही । फिर जब गार्ड ने कहा सगाई है, तब मेरी सांस में सांस आई। और मैंने देखा समर ने भी बहुत चैन की सांस ली।”

“मैं देख रहा हूं आजकल तुम दोनों की कुछ ज्यादा ही नजर है मुझ पर।”

एक तो पिया की हरकतों से समर वैसे ही नाराज था। दूसरा आदित्य और विराट उसका इतनी देर से मजाक उड़ा रहे थे। उसका गुस्सा और बढ़ता जा रहा था कि तभी समर की बात पर प्रेम चहक उठा।

“उन दोनों की ही नहीं मेरी भी नजर है तुम पर।”

प्रेम के ऐसा बोलते हैं आदित्य और विराट जोर से हंस पड़े….

“ज्यादा हंसिए मत आदित्य बाबू अब इसके बाद आपकी ही पारी है।”

विराट की बात पर समर ने भी हामी भर दी और आदित्य खिड़की से बाहर देखने लगा! उसी वक्त प्रेम के फोन पर घंटी बजने लगी प्रेम ने फोन उठाया फोन निरमा का था।

“सुनिए कहां है इस वक्त आप ?”

“मैं जरा काम से बाहर था बोलो क्या हो गया ?”

“आते वक्त याद से मीठी के स्कूल के क्राफ्ट के लिए क्राफ्ट का सामान लेते आइएगा। भूलिएगा मत। कल भी आप निकले थे, तब भी आपको मैसेज किया था और आप भूल भाल कर घर वापस आ गए थे।”

“सॉरी बाबा नहीं भूलूंगा।”

“बस कहते तो ऐसा है जैसे एक मेरे और मीठी के अलावा दुनिया में आपको कुछ याद नहीं, और हम ही दोनों की सारी चीजें आप भूल जाते हैं। अभी के अभी लिखकर रख लीजिए कि नहीं भूलना है, वरना अगर आज बिना भूले वापस आए ना तो।”

“तो क्या खाना नहीं दोगी?”

“खाना तो दूंगी, लेकिन अकेले सोना पड़ेगा।”

प्रेम के गले में कुछ अटक गया और उसे हल्की सी खांसी आ गई….” चलो रखता हूं अभी आसपास लोग हैं।”

प्रेम के फोन रखते ही एक जोर का ठहाका गाड़ी में गूंज उठा और चारों लड़के मंगल भवन की तरफ आगे बढ़े चलें।

   मंगल भवन बाहर से बहुत खूबसूरती से सजा था। गेंदे और गुलाब की मालाओं से सजा हुआ था , जिनमें बीच बीच में रोशनी की झालर लगी थीं।
इतनी खूबसूरती से पूरा परिसर बाहर से सजा सँवरा दिख रहा था की एक पल को समर को लगा कि यहां आकर कोई गलती तो नहीं हो गई ।उसने प्रेम की तरफ देखा प्रेम ने उसे कंधे थपथपा कर इशारा किया और खुद आगे बढ़ गया समर ने बड़ी हिम्मत करके कदम आगे बढ़ाया।
    मुख्य दरवाजे के दोनों तरफ बड़े-बड़े कलसो में पानी भर कर रखा था जिनमें गुलाब की पंखुड़ियां तैर रही थी। सामने फूलों से सुस्वागतम लिखा हुआ था। और एक बड़ी सी फूलों की रंगोली बनी थी। एक तरफ बड़े से पानी के कलसे मैं खूब सारी खुशबूदार मोमबत्तियां जल रही थी। सब कुछ बहुत सुहावना लग रहा था। लेकिन मन ही मन समर को अजीब सा डर लग रहा था कहीं इतनी सारी तैयारियां के कारण इतने सारे लोगों के बीच पिया ने उसका साथ देने से मना कर दिया तो?
इतने सारे लोगों के बीच पहले से तय सगाई को तोड़ने की हिम्मत पिया कैसे कर पाएगी? यह कोई फिल्म तो है नहीं कि हीरो मौके पर पहुंचा और हीरोइन ने अपनी सगाई तोड़ दी, और हीरो के साथ चली गई!
ऐसा सिर्फ फिल्मों में कल्पनाओं में और कहानियों में होता है वास्तविक जिंदगी ऐसी तो नहीं होती ना।

यही सब सोचकर वह दरवाजे से ही वापस जाने लगा कि प्रेम ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया…-” क्या हुआ समर अब भी किसी सोच विचार में हो?”

“मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं सही कर रहा हूं या गलत।”

“क्यों इसमें क्या सोचने वाली बात है?”

“सोचने वाली बात यह है कि आज तक ना मैंने, ना पिया ने एक दूसरे से प्यार का इजहार किया। और मैं आज अचानक यहां उसकी सगाई में चला आया। अब अगर मैं उससे यह कहूं भी कि पिया मैं तुमसे प्यार करता हूं तुमसे शादी करना चाहता हूं। तो वह उस लड़के को इनकार करके आखिर क्यों मेरी बात मानेगी? और चलो एक बार को पिया मुझे स्वीकार भी कर ले, तब भी इस सब में उस लड़के का क्या कसूर? अगर मैं सही समय पर पिया से अपने मन की बातें नहीं कर पाया , और पिया ने जल्दबाजी में उस लड़के से शादी के लिए हां कह दी तो इस सब में वह बेचारा तो बुरी तरह से फंस गया? अब वह और उसका परिवार यहां इतने तामझाम के साथ सगाई करने आए हैं .. ऐसे में अगर पिया उस लड़के को ठुकरा देती है तो वह बेचारा क्या करेगा कहां जाएगा?

“और तुम! तुम्हारा क्या होगा ? तुम अपने बारे में भी तो सोचो ना।” आदित्य ने समर से ही उल्टा सवाल कर दिया

“मेरा क्या है दोस्त !मैंने तो आज तक कभी शादी के लिए सोचा ही नहीं था। ऐसा तो है नहीं कि मेरे जीवन में कभी लड़कियां थी नहीं। पर मैं शादी ब्याह कर जिम्मेदारी से भरी जिंदगी जीने वाला लड़का हूँ ही नहीं।  मेरे लिए यह सगाई शादी यह सारे चोंचले नहीं बने।

“ऐसा तुम्हें लगता है, समर पर ऐसा है नहीं। शादी सिर्फ जिम्मेदारियों को उठाना नहीं होता। अगर तुम सामने वाली की जिम्मेदारी उठा रहे हो, तो वह लड़की भी तो तुम्हारी जिम्मेदारी बराबरी से उठाती है। यह क्यों भूल जाते हो। शादीशुदा जिंदगी हर हाल में एक कुंवारे की जिंदगी से कहीं बेहतर है। एक बार जी कर तो देखो अपनी जिम्मेदारियों से मत डरो। अगर आज तुम पिया से बिना मिले यहां से निकल गए तो याद रखना जिंदगी भर पछताओगे।
   अगर तुम ने सच में कभी भी उससे प्यार किया है तो एक बार जाकर उसे बता दो। फिर जो होगा उसे अपना नसीब मान लेना। “

   प्रेम की बात मान कर समर एक बार फिर अंदर की ओर बढ़ चला, उसके पीछे ही वो तीनों भी बढ़ गए। लेकिन दरवाजे पर पहुंचकर उसकी हिम्मत फिर चूकने लगी वह वापस मुड़ा ही था कि प्रेम ने उसे पकड़ लिया …-” इतना घबराओ मत समर। अपने जीवन के समर में तुमने अब तक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। फिर अपने प्रेम के समर में पीछे क्यों हट रहे हो?

  समर कोई जवाब देता है इसके पहले ही दरवाजे से उसे किसी ने आवाज लगा दी….
“आइए आइए ! आप सभी तक चले आइए आप लोगों का स्वागत है।”

पिया के माता-पिता अभ्यागतों के स्वागत के लिए दरवाजे पर ही खड़े थे। उन लोगों ने उन चारों को आते देख कर रोक लिया और अंदर बुला लिया। अब समर के पास अंदर जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। वह चारों जैसे ही अंदर की तरफ प्रवेश करने लगे, पिया की मासी और उनकी बेटी ने उन लोगों के ऊपर गुलाब जल छिड़क कर चारों के माथे पर कुमकुम का तिलक लगा दिया।
    “यहां कुछ ज्यादा ही स्वागत नहीं हो रहा है?” विराट ने धीरे से आदित्य के कान में कहा जिसे समर और प्रेम ने भी सुन लिया कि तभी पिया की मां हाथ में थाली लिए चली आई और समर की आरती उतारने लगी। समर ऐसा होते देख हड़बड़ा कर एक कदम पीछे हट गया।

“अरे घबराइये मत बेटा हमारे यहां ऐसे ही आगंतुकों का स्वागत किया जाता है। आइये अब आप चारों अंदर पधारे।”

अंदर की रौनक देखते ही बन रही थी। समर ने आज तक पिया के रहन सहन की तरफ ध्यान नही दिया था, उसे हमेशा उसकी सादी कुर्तियों और जीन्स के पहनावे को देख यही लगता था कि वो एक मध्यमवर्गीय परिवार की सीधी सी लड़की है। इतना तामझाम और चकाचौंध देख उसे अपने महल के कार्यक्रमों की याद आ गयी। तभी उसकी नज़र सामने से आते युवराज पर पड़ गयी….-” युवराज सा आप यहाँ ?”

“हाँ क्यों ? हम नही आ सकते यहाँ। “

युवराज के सवाल पर समर खिसिया गया तभी रूपा भी चली आयी…-” हम तो पूछने वाले थे आप यहाँ कैसे? “

समर रूपा की बात का क्या जवाब देता? क्योंकि उसके मन में खुद यही उथल पुथल थी कि युवराज और रूपा को पिया भला कैसे जानती है?

वो अभी क्या कहूँ सोच रहा था कि रूपा ने जैसे उसके मन की बात ताड़ ली…-“आप शायद यह सोच रहे की हम लोग यहाँ कैसे? “

” हाँ बिल्कुल मैं यही…” अपने उतावलेपन पर समर एकाएक बोलते बोलते रुक गया… उसकी ये हालत देख रुपा को हंसी आ गयी…- पिया आपकी माँ यानी काकी सा की जांच और इलाज के लिए महल आती थी न तभी उससे हमारी जान पहचान हुई थी। इसलिए उसने अपनी सगाई में हमें बुलाया। और हम ही क्या काकी सा भी आयीं हैं।”

समर पर एक के बाद एक बम फूट रहे थे। उसके लिए ये बहुत आश्चर्य की बात थी कि उसकी माँ जो महल के अलावा बाहरी किसी कार्यक्रम में कभी शामिल नही होती वो भी पिया के बुलावे पर यहाँ चली आयीं हैं।
वो इधर उधर अपनी माँ को ढूंढ रहा था कि प्रेम ने उसे एक तरफ इशारा कर दिखा दिया। उसकी माँ आराम से सोफे पर बैठी किसी औरत के साथ बातचीत में लगी थीं।
समर को पिया के ऊपर एक बार फिर गुस्सा आने लगा…-” हद करती है ये लड़की। एक तो किसी और से सगाई कर रही उस पर मेरे सारे खानदान को बुला रखा है। और अब जाने कहाँ छिपी बैठी है। ये भी नही हो रहा कि बाहर आ जाये। “

वो इधर उधर पिया को ढूंढ रहा था कि उसकी नज़र अपनी माँ से मिली उन्होंने भी उसे उसी वक्त देखा और हाथ के इशारे से अपने पास बुला लिया।

वो भारी कदमों से उन तक पहुंच गया… – ” ये मेरा बेटा है समर! समर इनके पैर छुओ बेटा ये पिया की दादी हैं। “
समर आश्चर्य से उन्हें देख उनके पैरों में झुक गया। उन्होंने भी उसे आशीर्वाद देने के बाद हाथों से ही उसकी बलैय्या ले लीं..-” बहुत सुंदर है आपका बेटा !”
समर को ऐसे अपनी तारीफ सुनना बड़ा अजीब लग रहा था, वो वहाँ से खिसकने के बहाने सोचने लगा…-” पापा साहेब भी आये हैं क्या?”
“हाँ फिर !हम अकेले किसके साथ आते?”

समर का जी कर रहा था चीख चीख कर पूछे जब कहीं और नही जाती तो यहाँ अपने बेटे का तमाशा देखने का ही क्या शौक चढ़ा था? लेकिन वो बिना कुछ बोले एक तरफ को जाने लगा कि उसकी माँ ने उसे हाथ पकड़ कर रोक लिया और एक तरफ इशारा कर कुछ दिखाने लगी….- ” वो देख! ऑर्केस्ट्रा आया है, जा न तू भी कुछ गा ले।।”

समर को अब अपनी माँ के बचपने पर गुस्सा आने लगा था। जिसे देखो वही खुश नजर आ रहा था लेकिन जिसके लिए ये सारा तामझाम था वही कहीं नजर नही आ रही थी।
उसे ढूंढता समर आगे बढ़ रहा था कि सामने से आती एक दुबली सी लड़की उससे टकराते बची…-” ओह्ह सॉरी जीजू!” लेकिन दूसरे ही पल समर को देख वो जीभ काट कर रह गयी..
” जीजू?” समर के ऐसा बोलते ही उस लड़की ने एक किनारे बने स्टेज की तरफ इशारा कर दिया। वहाँ दो चार लड़के खड़े थे।
समर को उस लड़की का इशारा समझ में नही आया। उसकी आँखों में सवाल देख वो लडकी जल्दी जल्दी बोलने लगी…-“मैं पिया दी कि मासी की बेटी हूँ। अभी हड़बड़ी में मुझे लगा मैं मेरे जीजू से टकरा गई , यानी उनसे । फिर चेहरा देखने पर समझ आया कि आप तो कोई और है।”

समर को समझ आ गया कि यह पिया की छोटी बहन है और यह ही इस वक्त पिया का पता बता सकती है। वह जाने लगी तो उसे आवाज देकर समर ने रोक लिया…-” सुनो एक मिनट! क्या तुम मुझे बता सकती हो कि पिया इस वक्त कहां मिलेगी?”

उस लड़की ने भौंहे चढ़ाकर समर को देखा..-” आप उनसे मिलना चाहते हैं?”

“हां! कुछ बहुत जरूरी काम है!”

“ओके! यह पीछे वाली सीढ़ियां चढ़कर ऊपर चले जाइए। पहला ही कमरा पिया दीदी का है। वह अपने रूम में सगाई के लिए तैयार हो रही है।”

आगे बिना कुछ सुने समर सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया। अपने बालों पर हाथ फिराते हुए यही सोच रहा था कि पिछले 1 घंटे से तो वो इस हॉल में इधर से उधर भटक रहा है। जाने और कितना पिया तैयार होने वाली है? ऊपर पहुंच कर उसने पहले वाले कमरे के दरवाजे पर लगी बेल बजा दी…

” एक मिनट रुको अभी आई।”


अंदर से पिया की आवाज आई और कुछ देर में ही दरवाजा खुल गया। पिया ने समर को देखा, समर ने पिया को और दोनों कुछ देर के लिए एक दूसरे को देखते रह गए। पिया की आंखों में आंसू झिलमिलाने लगे…-” अब क्या यही खड़े रखोगी। अंदर भी नहीं आ सकता मैं?”

पिया एक एक तरफ हो कर खड़ी हो गई। समर अंदर चला आया, पिया ने दरवाजा बंद किया, और समर से आगे बढ़ गयी।
” पिया बिना मुझसे कुछ बोले तुमने ऐसे कैसे सगाई के लिए हां कर दी?”

बिना किसी भूमिका के समर सीधे मुद्दे पर चला आया….

“तुमसे क्या पूछना और क्या बोलना था समर?'”

“तुम्हें सच में इस बात की जरूरत नहीं लगी, कि एक बार मुझे बता दो कि तुम सगाई करने जा रही हो!”

“मुझसे यह सवाल पूछने से पहले अपना फोन चेक करके देखो।”

“उस वक्त व्यस्त था मैं। फोन नहीं उठा पाया। फोन चार्ज भी नहीं कर पाया ,और मेरा फोन बंद हो गया था। लेकिन तुम एक मैसेज तो डाल ही सकती थी मुझे।”

“क्या फर्क पड़ जाता समर, क्या तुम अपना काम छोड़कर मेरे लिए आ जाते?”

“नहीं आता! लेकिन तुमसे मेरा इंतजार करने तो कह देता।”

“देखा !! अभी भी तुम्हारी अकड़ कम नहीं हुई ना। अभी भी मुझसे ज्यादा तुम्हें तुम्हारे काम से प्यार है।”

समर मुस्कुराने लगा। उसने आगे बढ़कर पिया को पकड़ लिया…-” मतलब मानती हो ना कि मुझे तुमसे प्यार है!”

समर की बात सुन पिया गुस्से में दूसरी तरफ मुंह फेर कर खड़ी हो गई।

“अब यह नाराजगी कैसी ? मैं जानता हूं ,तुम मुझसे प्यार करती हो।”

“पर मैं नहीं जानती कि तुम मुझसे प्यार करते हो या नहीं?”

“करता हूं यार बहुत प्यार करता हूं । लेकिन हर बात बताने की तो नहीं होती ना। लेकिन तुमने हड़बड़ी में आकर यह जो निर्णय ले लिया क्या यह तुम्हें सही लग रहा है।”

“अब मैं सही हूं या गलत लेकिन यही मेरी किस्मत है।”

“मैं जानता हूं तुम जिद्दी हो! अपनी बात से पीछे नहीं हटोगी । लेकिन बस यह कहना चाहता हूं कि एक बार सोच लो जिंदगी बहुत खूबसूरत हो जाती है, अगर वह उसके साथ गुजरे जिसे आपने सबसे ज्यादा प्यार किया हो।”

“किस ने सिखा कर भेजा यह सब मंत्री जी! क्योंकि आप तो बही-खाते हिसाब वकालत इनसे ज्यादा कुछ बोल ही नहीं पाते।”

“जब अपने प्यार को अपने अलावा किसी और का जीवन साथी बनते देख रहा हूं तो सब कुछ बोलना आ ही गया। बस एक मौका दे दो पिया मुझे। मैं तुम्हें कभी निराश नहीं करूंगा । तुम्हारी जिंदगी के सुख-दुख, हर मोड़ पर, हर ऊंचाई और हर गहराई पर तुम्हारे साथ रहूंगा। बोलो पिया मेरी जीवन साथी बनोगी?’

समर ने पिया की तरफ हाथ बढ़ा दिया, पिया ने धीरे से उसके हाथ में हाथ रख कर कहा…-” लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है मंत्री जी। अब कुछ नही हो सकता।”

“तुम हां तो कहो मैं सब सही कर लूंगा।”

पिया कुछ कह पाती उसके पहले ही दरवाजे पर किसी ने दस्तक देनी शुरू कर दी। पिया घबराकर दरवाजा खोलने जा ही रही थी कि, समर ने पीछे से पकड़ कर उसे अपनी बाहों में ले लिया। उसके कानों के पास जाकर एक बार फिर गुनगुनाना गया…-” सोच लो पिया किसी और की बाहों में मुझे याद करती रहोगी उससे बेहतर है कि मेरी बाहों में जिंदगी भुला दो।”



“अब तुम पागल हो रहे हो छोड़ो मुझे।” समर की बाहों से खुद को छुड़ा कर पिया ने दरवाजा खोल दिया। सामने उसकी मौसेरी बहन और बाकी सहेलियां खड़ी थी सब उसे लेने आई थी। चहचाहती हुई सारी की सारी पिया का हाथ थामे उसे बाहर ले गईं।
समर उस कमरे में अकेला रह गया। कुछ देर वहीं बैठने के बाद वह फिर तेज कदमों से कमरे से निकलकर सीढ़ियां उतरता नीचे हॉल में पहुंच गया….
आखिरी सीढ़ी पर उसका कदम जैसे ही पड़ा सारे हॉल की बत्तियां बुझ गयीं। और वो एकदम से चौक कर इधर-उधर देखने लगा कि, यह हुआ क्या ? तभी एक गोल रोशनी का घेरा सिर्फ उसके ऊपर पड़ने लगा। उसे कुछ समझ में आता तभी एक दूसरा गोल रोशनी का घेरा हॉल के दूसरी तरफ खड़ी पिया के ऊपर उसी तरह पड़ने लगा।
उसने पिया को देखा वो मुस्कुरा कर उसी की तरफ देख रही थी।
पिया धीरे धीरे आगे बढ़ने लगी, उसे अपनी तरफ आते देख समर भी उसकी तरफ बढ़ने लगा।
दोनों के एक दूसरे के सामने आते ही एक गुलाब की पंखड़ियों से सजी प्लेट उनके सामने किसी ने कर दी। उसमें दो अंगूठियां रखी थीं ।
पिया ने मुस्कुरा कर एक अंगूठी उठा ली और बड़ी हसरत से समर की ओर देखने लगी। समर उसे देख रहा था कि समर के कानों में उसकी माँ की आवाज़ पड़ी..-“अब तुम भी उठा लो अंगूठी। और पहना दो हमारी होने वाली बहु को।”
समर ने चौन्क कर देखा, उसके ठीक बाजू में उसकी माँ खड़ी थीं।
समर ने अंगूठी पिया की उंगली में पहनाई और पिया ने समर की उंगली में।
तालियों के शोर के साथ ही कमरे में रौशनी की चकाचौंध फैल गयी…
दोनों के ऊपर ढेर सारे गुलाबों की पंखुड़ियां बरसने लगी। पिया ने आगे बढ़ कर समर के माता पिता के पैर छुए तब कहीं जाकर समर को होश आया कि यहाँ क्या हो रहा है।
उसने भी अपने माता पिता के साथ ही बाकियों का आशीर्वाद लिया और युवराज सा के पैर छूने के बाद प्रेम की ओर बढ़ गया। प्रेम के पैर छूने वो जैसे ही पिया के साथ झुकने को हुआ कि प्रेम ने उसे उठा कर सीने से लगा लिया…- ” पैरों में नही तुम्हारी जगह यहाँ हैं।”

” तो तुम सब कुछ जानते थे न प्रेम ?”

समर के सवाल पर प्रेम ही नही बाकी लोग भी मुस्कुरा उठे, की प्रेम के पीछे से राजा अजातशत्रु भी आगे निकल आये…-“हुकुम आप यहाँ? “

” क्या करें? तुम्हारी भाभी सा का हुक्म था कि समर की सगाई का सारा ड्रामा उन्हें लाइव देखना है। तो बस यहाँ खड़े खड़े उन्हें सब कुछ लाइव दिखा रहे थे। “

समर मुस्कुराने लगा …-” अब तो कोई बता दो की ये सारा माजरा क्या है? और अब उस लड़के का क्या होगा जिससे पिया की सगाई…”

समर की बात आधे में ही काट कर पिया ने उसकी बाहें थामते हुए उसका चेहरा स्टेज की तरफ घुमा दिया…- ” जिनसे मेरी सगाई होने वाली थी, उन्हें कल रात मैंने सारी बातें कह सुनाई। वो हमारे रास्ते से हटने को तैयार थे कि मौसी जी ने अपनी बेटी की शादी का प्रस्ताव उनके जीजा और जीजी के सामने रख दिया। वहीं तुरन्त दोनों का मिलना और बातचीत हुई और दोनो ने ही एक दूसरे को पसन्द कर लिया।
अब स्टेज पर उन्हीं दोनो की सगाई है। “

समर ने देखा स्टेज पर वही लड़कीं थी जो कुछ देर पहले उससे टकरा कर उसे सॉरी जीजू बोल गयी थी।
सारी बातें समझ में आते ही समर ने पास खड़ी पिया को देखा और धीरे से उसे अपनी बाहों के घेरे में समेट लिया…

क्रमशः

दिल से …

क्या करूँ भाग इतना लंबा हो रहा था कि इसे अंतिम भाग नही लिख पायी। एक और भाग लिखवाना चाहतें हैं अजातशत्रु जी।
तो इंतज़ार रहेगा आपको भी और मुझे भी अगले भाग का।
जल्दी ही मिलतें हैं…!!

aparna …







  



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शादी.कॉम-13

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   रूपा की बहन रेखा को आये पूरे दो दिन बीत गये, अपनी बड़ी बहन की चाक चौबंद चौकीदारी में रेखा दुबारा राजा की जिम का रुख नही कर पाई।।
    मिलने की आस जगा कर भी जब रेखा मिलने नही आई तो लल्लन की बेचैनी घड़ी की हर टिक टिक के साथ बढ़ती चली गई,अब तो राजा प्रिंस और प्रेम सभी को उसके बारे में पता था,सभी उसके लटके हुए चेहरे का कारण जानते थे,इसलिये उसे उस समय किसी ने नही छेड़ा ।।
    राजा ने घर जाते समय उसे साथ चलने की पेशकश भी की जिसे ठुकरा कर सबसे अंत मे जिम का ताला लगा कर बेचारा अपने घर को चल दिया।।
    लल्लन को नही पता था कि घर पे एक सरप्राइज़ उसका इन्तजार कर रहा था।।
लल्लन के पिता और भाई की अफसरी ने उसके घर को एक अलग अदब और शिष्टाचार में रंग दिया था, घर पे सभी के लिये पढ़ना लिखना सांस लेने जितना महत्वपूर्ण था,इसिलिए लल्लन भले ही राजा की चंडाल चौकड़ी का हिस्सा था पर उन के साथ घूमते फिरते भी उसने अपनी पढ़ाई का हरजा नही होने दिया था,,वो दिल्ली भी किसी सरकारी नौकरी के सिलसिले में ही गया था।।
      थके हुए तन और बुझे हुए मन से जब लल्लन ने घर में प्रवेश किया,तो लगा  जैसे सभी उसी का इन्तजार कर रहे थे।।उसके घर मे घुसते ही आगे बढ़कर उसकी दीदी ने उसके मुहँ में कलाकन्द ठूंस दिया,,बेचारा इस हमले के लिये तैयार नही था,इतने बड़े टुकड़े को जब तक गालों के दोनों तरफ सेट करता तब तक माँ हाथ में गुलाब जामुन की कटोरी लिये खड़ी हो गई ।।
     मुहँ में गुलाब जामुन की जगह बनाते हुए सर ऊपर नीचे ‘रुको माँ जरा सबर करो’की मुद्रा में हिलाते हुए लल्लन ने पुछा __” आखिर हुआ क्या है?? काहे की मिठाई खवा रहे।”
  ” रेल्वे का जो एग्ज़ाम तुम दिये रहे,उसका रिजल्ट आ गया है,,तुम पास हो गये हो।”

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  लल्लन के बड़े भाई ने आगे बढ़ उसकी पीठ थपथपा के कहा।।

  ” बस हमारी आखिरी चिंता भी दूर हुई,क्यों लता देखी खुश हो अब,,तुम्हारे तीनो बच्चे सरकारी अफसर बन गये,,भई जब सरकार हमें मौका दे रही तो हम काहे लाभ ना उठायें,,बहुत बढ़िया लल्लन,आज हमारा सब चिंता दूर हो गया,,बस अब तुम्हारे दीदी और भैय्या का शादी हो जाये तो एक बार तुम्हारी अम्मा को बद्रीनाथ ले जायेंगे।।”

लल्लन का लटका चेहरा खिल उठा,आखिर उसे भी अपने बड़े भाई और दीदी जैसे नौकरी मिल ही गई,, उसके आत्मविश्वास में वृद्धि हुई जिसका परिणाम ये हुआ कि बिना किसी डर के लल्लन ने रेखा को ये खुशखबरी देने फोन लगा दिया__

” हेलो शो…,रेखा!!”

” तुम कौन बोल रहे??”

” भाभी जी चरण स्पर्श!! हम लल्लन बोल रहे।”

” बोलो”
रूपा की आवाज़ सुन लल्लन के प्यार का भूत भाग कर वापस बरगद पर लटक गया,वो जब तक हिन्दी वर्णमाला का जाप करना शुरु करता’ अ  ओ…’ तब तक में रेखा ने आकर अपना फ़ोन जिज्जी के हाथ से झपट लिया_ तुमको किचन में तुम्हारी मदर इन लॉ बुला रही हैं “
  और कमरे में भागी” हाँ!! बोलो हम हैं।”

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” थैंक गॉड!! तुम्हारी आवाज़ तो सुनने को मिली।। दो दिन से तुम्हारे बताये टाईम पर रस्ता देख रहे,जिम काहे नही आई।।”

” अरे क्या बताऊँ,मेरी दीदी के अन्दर हिटलर की आत्मा आ गई है,दिन भर तानाशाही,,मेरा फोन भी उन्हीं की निगरानी में रहता है,,कैसे करती फोन??

रेखा अभी भी धर्मसंकट में थी,,लुक्स और घर बार के हिसाब से राजा का पलड़ा ही भारी पड़ रहा था, पर वो जैसी अन्ग्रेज तबीयत की थी उसपे उसे रोहित का साथ भी भा जाता था।।।उसे इस बात पर भगवान से थोड़ी रुष्टता थी,कि क्यों भोले भंडारी उसे सही राह नही दिखा देते।।इसिलिए उसने अपने स्वयं के विवाह के लिये सोलह सोमवार व्रत करने का आज सुबह ही निश्चय किया था।।

” अच्छा शोना!! तुम्हे पता है हमारे लिये कितनी लकी हो तुम! देखो तुम हमारे शहर आई,और हमारा रेल्वे का जोइनींग लेटर भी आ गया,,हमारी नौकरी लग गई बाबु।””

सोलह सोमवार करने का संकल्प फलीभूत हुआ, रेखा को अपनी डगर दिख गयी,अपनी मंजिल मिल गई,अपना शुद्ध सात्विक प्रेम उसने चुन लिया।।

” हाय सच्ची!! मजाक तो नही कर रहे?? लव यू बाबु,,तुम्हें पता है तुम्हारी नौकरी के लिये भी व्रत करने का सोच रही थी मैं,अच्छा सुनो,अभी फोन रखती हूँ,कल कैसे भी कर के जिम आ जाऊंगी ,फिर बात करते हैं ।”

  रेखा ने हमेशा जागती आंखों से एक सुन्दर सपना देखा था,कि एक सजीले नौकरी पेशा लड़के से उसका ब्याह हो जाये,और वो अपने पति के साथ उसकी नौकरी वाले शहर में अपना छोटा सा घोंसला सजाये,जहां ना सास की चिकचिक हो,ना ससुर का दबदबा,,ना ननंद के तेवर हों ना जेठानी के नखरे।।।
अब लल्लन की नौकरी लग जाने से रेखा को उसका सलोना सपना पूरा होता दिख रहा था,,भले ही राजा हैंड्सम था,खानदानी रईस था,पर था तो सयुंक्त परिवार की कड़ी,,जो कभी किसी जनम में अपनी अम्मा का आंचल छोड़ कर बीवी को ले अलग घर नही बसा सकता था,,बस रेखा ने चुन लिया…..रोहित ही है जो उसका जीवनसाथी बनने के सर्वथा उपयुक्त है!!

अगले दिन सुबह रसोई का चाय नाश्ता निपटा के रूपा जब अपने कमरे में बैठी फेस बुक पे सुबह के नाश्ते आलू पूरी की फोटो अपलोड कर रही थी, तब चुपके से रेखा अपना फोन लिये निकल पड़ीं ।।
   जिम में लल्लन सभी का मुहँ मीठा करा रहा था।।

    रेखा को बाहर दरवाजे के पास ही प्रिंस और प्रेम मिल गये__” हाय डॉग्स!! वेयर इस रोहित??”

” अन्दर है।” गुस्से मे तमक के प्रेम ने जवाब दिया।
  अपनी सैंडल चटकाती रेखा भीतर चली गई

” इतना गुस्सा मे काहे जवाब दिये,कित्ता प्यार से पुछि रही बेचारी।।”

” इत्ता प्यार से शराफत से हम दोनों को कुत्ता बोली रही समझे!!”प्रेम के जवाब को सुन कर भी प्रिंस को भरोसा ना हुआ__” जो भी बोलो पर अन्ग्रेजी मे गाली भी बड़ी सुहानी लगती है,,नई??”

  रेखा के अन्दर बचपन से फिल्मी कीड़ा था,,वो भीतर जाते ही लल्लन के गले से लग गई,जिम में उपस्थित सभी की आंखें चौडी हो गई ।।

” आई रे आई रे,ले मै आई हूँ  तेरे लिये,तोड़ा रे छोड़ा रे हर बंधन वो प्यार के लिये”

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  जिम में बजने वाला गाना अचानक नायक और नायिका के लिये बैकग्राउंड म्युसिक बन गया….
 
  बाँसुरी ने धीमे से जाकर दोनो को आवाज़ दी और उन्हे अन्दर ऑफिस में चलने को कहा

ऑफिस के अन्दर राजा बांसुरी,प्रेम प्रिंस लल्लन और रेखा आगे क्या करना है पर सोच विचार में डूबे थे।।

  ” रोहित लिसन!! मेरे घर वाले कभी तुमसे शादी के लिये राज़ी नही होंगे,हमें कुछ और सोचना पड़ेगा।।”

” हाँ वैसे रेखा ठीके कह रही,हम भी तो जानते हैं,भाभी के बाऊजी बड़े जब्बर हैं,कभी ई सादी ना होने देंगे।।”

  ” तो अब क्या करना है शोना,,तुम जो बोलोगी हम सब मानने को तैयार हैं,वैसे हमारे घर में कोई दिक्कत नही होगी,बस एक ही छोटी सी परेशानी है,अभी तक हमारे बड़े भाई और दीदी की भी शादी नही हुई,तो बस ये हो सकता की अम्मा बाबूजी कम से कम दीदी की शादी तक हमको रुकने बोले।”

” पर हमारे पापा उतना नही रुकेंगे,,वो तो अभी पिंकी की इन्गेजमेंट  रतन से हो गई,तो थोड़ा चुप बैठे हैं,पर ज्यादा से ज्यादा एक महीना ,उसके बाद हमारी शादी कर ही देंगे।।”

  “तो बताओ क्या करें फिर।।”

   ” हमें मन्दिर में शादी करनी पड़ेगी रोहित,बाद में घर जाकर घर वालों का आशीर्वाद ले लेंगे, लेकिन अगर अभी जब तक हम दीदी के घर पे हैं हमारी शादी नही हुई तो समझ लेना कि हम तुम्हारा ब्यूटीफुल पास्ट बन जायेंगे,,फिर आ जाना हमारी शादी की दावत खाने।।”

   लल्लन से ज्यादा हडबडी इस शादी की राजा को थी,क्योंकि उसे भी पता था अगर रेखा की लल्लन से शादी नही हुई तो ये ढोल उसके गले ही बन्धेगा ।।

  ” हाँ रेखा एकदम ठीक कह रही,हम तो कहतें हैं कल ही शादी कर लो,हम सब तैयारी कर लेंगे,तुम दोनो बस समय से आ जाना।” राजा की बात सुन प्रिंस ने अपनी बात रखी__

  ” भैय्या जी ठीके कह रहे,कल हम कोर्ट पहुंच जायेंगे,वहीं बकील साहब के सामने साईन उन करके माला बदल लेना।”

   ” काहे प्रिंस!! क्राईम पैट्रोल बिल्कुल नही देखते हो क्या?? ऐसे कोर्ट में शादी के लिये ,एक महीना पहले अर्जी देना पड़ता है,वो अर्जी का आवेदन का फोटो अखबार में छपता है,अगर कोई दावा आपत्ति करना चाहे तो कोर्ट जा कर कर सकता है,फिर एक महीना बाद शादी की डेट मिलती है जिसमे शादी होती है।।”

  ” बन्सी हम भी देखते थे पहले,,हमको  तो एकदम झन्नाट लत लग गया था क्राईम पैट्रोल का, हम भी वैसे ‘ सहाय’ जैसे खुदरे पुलिस बनने का सपना भी देखे लगे थे,,पर हमारे साथ का होता था जानती हो,घर पे कूकर का सिटी भी बजता था तो हम चौंक जाते थे,घर पे किसी काम के लिये कोई मिस्त्री मास्टर आया तो हम उसको अपनी पैनी नज़र से घूरते रहते थे,,हमारे बाऊजी की सुनारी है,बेचारे जब चावड़ी निकलते हम रोज पीछे से टोकते ‘ बाऊजी सतर्क रहना,सुरक्षित रहना।’
    हमको तो सपने भी क्राईम पैट्रोले के आने लगे, छत पे खड़े हों और कहीं आजू बाजू की छत पर एक तरफ शुक्लाईन भाभी खड़ी हो,और दुसरी छत पे तिवारी भैय्या तो हमको लगता ज़रूर ई दोनों का कोई चक्कर चल रहा है,हमारे दिमाग में जासूसी घुस गया,अम्मा अलग चिल्लाती की उनका ये रिस्ता का कहलाता है छूटा जा रहा है,पूरा एक महीना निकल गया,उसके बाद एक दिन अम्मा हमारे हाथ से रिमोटवा को छीन डारी,और अपना सीरियल लगा ली,पर अम्मा के साथ गज़ब हो गया,उनको बेचारी को एक ही एपिसोड पूरा एक महीना झेलने का आदत था,पर उसी एक महीना में जाने का उलट फेर हुआ कि ‘ई रिस्ता का कहलाता है’ के सारे किरदार ही बदल गये,असली हीरोइन छोड़ दी रही सीरियल, और उसके लड़िका बच्चा बड़े हुई गये,,अम्मा अपन सिर धुन ली,बोली ‘ अब हमको नई देखना ई सीरियल,ये कोई तरीका होता है ?? इत्ता फास्ट भगायेंगे तो सिरियल नही ये लोग फिलिम बनायेंगे। और उसके बाद अम्मा ओ सीरियले देखना बन्द कर दी।।”

” फिर अब?? अब तुम्हारी अम्मा टी वी नही देखती?” बांसुरी के सवाल पर प्रिंस ने जवाब दिया

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” देखती है ना!! पर अब अम्मा रिस्ता उस्ता नही देखती अब अम्मा ‘ सावधान इंडिया ‘ देखती है।”

” ये तुम दोनो का अति महत्वपूर्ण टी वी परिचर्चा समाप्त हो गया हो,तो लल्लन और बहन जी का शादी डॉट कॉम पे विचार किया जाये।” प्रेम की इस बात पे राजा ने भी जल्दबाजी दिखानी शुरु की, उसे भी रेखा के साथ सम्भावित विवाह से बचने का यही एकमात्र उपाय दिखा ।।

” आई एम नॉट ए बहन जी,,कॉल मी रेखा ओनली, बोलो रोहित क्या करना है आगे।”

” करना क्या है,शादी करना है और क्या?? ऐसा करते हैं,लल्लन कल सुबह 9 बजे तुम गौरी शंकर मन्दिर पहुंच जाना, प्रिंस तुम बड़े तिवारी पण्डित को लेकर पहुंचना,और प्रेम फूल माला और बाकी पूजन सामग्री ले आयेगा,हम रेखा को लेकर आ जायेंगे, जितनी जल्दी सब निपट जाये उतना अच्छा।।

‘ बांसुरी कल तुम कॉलेज मत जाना,हम रेखा को लेकर तुम्हारे घर ही आयेंगे,तुम्हारे यहाँ ये शादी के लिये तैयार हो जायेगी और फिर वहाँ से तुम दोनो को लेकर हम मन्दिर चले जायेंगे।क्यों ठीक है ना??”

” ठीक है राजा,तो ऐसा करते हैं,हम अभी रेखा को साथ लिये बाज़ार निकल जाते हैं,कल पहनने के लिये रेखा को कुछ शॉपिंग भी तो करना होगा।”

हाय रि किस्मत!!! कहाँ 3 महीने की ब्राइडल सिटिंग,कहाँ हर एक फंक्शन में पहने जाने वाली अलग ड्रेस से मैचींग सैंडल और ज्वेलरी और कहाँ ये धूम फटाक शादी!!!
    पर इसका भी मज़ा है,,थोड़ा एडवेंचर तो इसमें भी है,रेखा ने अपने मन को समझा लिया,अरे हम आपके हैं कौन की माधुरी नही बन पाये तो क्या,दिल की माधुरी तो बन ही सकते हैं,उसमें भी तो आमिर खान के साथ भागना ही पड़ता है आखिर।।

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  राजा के साथ बांसुरी और रेखा ज़रूरी सामान खरीदने चली गई,प्रिंस और प्रेम तिवारी पण्डित को खोजने निकले और लल्लन अपनी तैयारी में लग गया।।

   अगले दिन सुबह राजा और रेखा निकलने ही वाले थे कि रेखा के बाबूजी का आगमन हो गया,वो जिस किसी काम से आये थे,उससे कहीं अधिक आवश्यक कार्य अपनी पुत्री को वापस लेकर जाना था,,इसीसे सुबह सुबह जल्दी जल्दी सारे काम निपटा के सीधे बिटिया की ससुराल पहुंच गये।।
    रूपा जहां पिता को देख कर प्रसन्न हुई वहीं रेखा का चेहरा लटक गया।।

‘ ए रेखा ठहरो!! सुबेरे सुबेरे लल्ला जी के साथ कहाँ चल दी तुम??’ और सुनो भले बाऊजी लेने आ गये तो क्या,हम इत्ता जल्दी तुमको जाने नई देंगे समझीं, एक तो पिंकी की सगाई में आई नई,और अब भागे की तैयारी।।”

” अरे जिज्जी हम कहाँ भाग रहे,यू डोंट वरी!! हम अभी रहेंगे तुम्हारे पास।।” दीदी से अपने मन का कहने के बाद रेखा अपने बाऊजी से मुखातिब हुई

” पापा हम बस यूँ गये और यूँ आये,राजा की बेस्ट फ्रेंड है बांसुरी,उस दिन मिली थी ना जिज्जी तुम ,आज उसके कॉलेज में कुछ फंक्शन है,तो हमें बुलाई है ,मेक’प में  हैल्प करने,बस हम उसे रेडी कर के अभी आये,,चले राजा?'”

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बड़ी मुश्किल से सबसे जान बचा के दोनों वहाँ से निकले और बांसुरी के घर पहुंच गये,बांसुरी पहले ही सारी तैयारी पूरी किये बैठी उन्हीं दोनों का रास्ता देख रही थी।।

” नमस्ते चाची जी!! हम राजा हैं,अवस्थी जी के लड़के,अगले मोहल्ले रहते हैं,बांसुरी कहाँ हैं??”

“ऊपर आ जाओ राजा ,,हम यहाँ अपने कमरे में ही हैं

” अच्छा अच्छा!! ऊ गैस वाले अवस्थी के लड़के हो?” बुआ जी के इस सवाल पे राजा ने सर ऊपर नीचे कर हाँ में जवाब दे दिया,बुआ जी ने बहुत इसरार कर राजा को वहीं बैठा लिया,बांसुरी नीचे आकर रेखा को अपने साथ ले गई ।।

” करते का हो बिटवा?? सादी ब्याह भया की नाही, हम बन्सी की बड़ी बुआ है,कोई अच्छा लड़का नजर में हो तो बताना,वैसे बच्चे कितने तुम्हारे?”

“बुआजी अभी हमारी शादी नही हुई।”
राजा के माथे पर लिखी उसकी जन्म कुंडली का ऐक्सरे निकालती बुआ जी ने अपनी आंखे छोटी छोटी कर बड़े आश्चर्य से कहा__” हैं अब तक ब्याह नही हुआ,,क्यों बेटा दिखने में तो अच्छे खासे हो।।”

” अब ये क्या बतायेंगे जिज्जी!! आप भी ना,लो बेटा चाय पियो,हम ऊपर बांसुरी को भी चाय दे आते हैं,अरे ये तो दोनो लड़कियाँ नीचे ही उतर आईं।”

  मैरून और गहरे हरे रंग के कॉम्बिनेशन लहन्गे में रेखा जितनी खिल रही थी,उतनी ही पीले सलेटी लहरिया लहन्गे में बालों को खुला छोड़ी सांवली सलोनी बांसुरी भी दमक रही थी।।राजा ने बांसुरी को देखा,बाँसुरी ने इशारे में उससे पुछा की ” मैं कैसी लग रही” आंखों से ही ” बहुत सुन्दर” बोल कर राजा ने शरमा कर चेहरा नीचे झुका लिया।।
   तीनों साथ साथ घर से निकल गये।।पर राजा और बांसुरी की इस आँख मिचौली को वहाँ और भी किसी ने देख लिया था।।

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” अरे बसुरीया कहाँ चली तू?? इत्ता सज धज कर तो कभी ना निकली घर से,ई छोरी जा कहाँ रई ।”

” इनकी शादी कराने जा रही बुआ” रेखा का हाथ अपने हाथ मे ले बांसुरी ने हँस के कहा और तीनो वहाँ से निकल गये।।

मन्दिर में पण्डित प्रिंस प्रेम और पूजन सामग्री सब पहुंच चुकी थी,बस कमी थी दूल्हा और दुल्हन की,।।
  राजा रेखा और बांसुरी के पहुंचते ही पण्डित जी अपनी तैयारियों मे लग गये,सब आस पास बैठ कर लल्लन का रास्ता देख रहे थे कि पण्डित जी ने राजा भईया के गले में पड़े स्टायलिश स्टोल को बांसुरी की चुन्नी से बांधा और आचमन कर मन्त्र पढ़ते हुए उन दोनो पर जल सिंचन किया ही था कि रेखा चीख पड़ी __ ओह माय गॉड!! पण्डित जी ये दोनो दूल्हा दुल्हन नही है!! दुल्हन मैं हूँ ।।

  ये सब इतनी हडबडी मे हुआ की बांसुरी या राजा कुछ बोल या समझ पाते कि जो घटना था घट गया, दोनों एक दूसरे को देख ही रहे थे कि रेखा ने झट बांसुरी की चुन्नी खोल दोनो को अलग किया,उतनी देर में लल्लन भी पहुंच गया।।

” कहाँ रह गये थे लल्लन!! अभी तुम्हारी जगह पण्डित जी भैय्या जी और बन्सी के फेरे फिराये दे रहे थे,,बच गये गुरू!! “प्रिंस की बात पे लल्लन ने माथे का पसीना पोछा और बोला_

  ” घर से निकल रहे थे कि अम्मा पीछे लपक ली, सत्ती माई में रोट चढाये गई,उनको वापस घर उतार के निकले कि गाड़ी का तेल खतम हो गया।।”

” वॉट तेल रोहित!! इट्स फ्युल!! चलो आ तो गये,अब आओ जल्दी यहाँ बैठो,फेरों का भी तो मुहूर्त होगा।।”

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” यस ऑफ़कोर्स ! फेरों का भी मुहूर्त है,पण्डित जी अब असली दूल्हा दुल्हन आ गये,शुरु कीजिए।।”

बांसुरी ने रेखा और लल्लन का गठजोड़ किया और मुस्कुराते हुए राजा की बाजू मे खड़ी हो गई ।।शुभ मुहूर्त और मंगल स्वस्तिवचनों के साथ सप्तपदी संपन्न हुई।।।

क्रमशः

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aparna..

Once in a blue moon!!!

Once in a blue moon – रिश्ता.कॉम

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    डिनर की प्लेट इन्हें थमा कर मैं वापस रसोई की ओर मुड़ गयी, रसोई साफ़ करने और बरतन धोने।।…..
 
     हम औरतें काम भी सारा ऐसे करती हैं जैसे कोई जंग लड़ रही हों, हाथ काम निपटाते हैं और दिमाग में युद्ध चलता रहता है, कभी सामने वाली पड़ोसन की लाल लपटें मारती नयी साड़ी, कभी सास बहू का ना देख पाया सिरियल, कभी सखी सहेलियों का फॉरेन ट्रिप तो कभी किसी खास मौके पर मायके ना जाने पाने की पीड़ा….

    लेकिन अभी तो वक्त ऐसा चल रहा कि हर औरत के दिमाग में एक ही शमशीर लहरा रही है__ हे प्रभु और कितना काम करवाओगे?? कब खुलेगा लॉकडाऊन? कब दर्शन देगी वो जिसे देखने की राह तकते तकते आंखें पथराने लगी हैं।। इतना ढ़ेर सारा काम तो अपनी आज तक की जिंदगी में कुल जमा नही किया होगा जितना इन एक महिने में कर लिया, भगवान जाने ये कोरोना हम औरतों से किस जनम का बदला ले रहा है??

    यही सब सोचते हुए मैं भी काम में लगी रहती हूँ, लेकिन इसके साथ ही पतिदेव को आराम से सोफे पर पैर पसारे हाथ में थामे रिमोट के साथ मटरगश्ती करते देख अन्दर से सुलग जाती हूँ __ इन्हीं का जीवन सही है, कोई फेर बदल नही हुआ, उल्टा वर्क फ्रॉम होम के नाम पर जल्दी उठने और भागादौड़ी से राहत मिल गयी, कोई मदद नही करेंगे बस सोफे पर लेटे लेटे ऑर्डर पास करतें जायेंगे__” मैडम समोसे खाये बहुत दिन हो गये ना? तुम बनाती भी अच्छा हो, आज शाम ट्राई कर लो फिर!!

  कभी कहेंगे __” सुनो इतना बड़ा सा तरबूज़ ले आया हूँ, सड़ा कर फेंक मत देना, ना खा पाओ तो सुबह शाम मुझे जूस बना कर दे देना”

   अब झाड़ू पोन्छा बरतन कपड़े से कुछ राहत मिले तब तो कोई एक्स्ट्रा काम करे, उस पर इनकी फ़रमाइशें…..

बेचारे फ़रमाइश एक दिन करतें हैं और उसे पूरी कर मैं सात दिन तक उसको पूरा करने की पीड़ा में सुलगती हूँ …..

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  ऐसी ही किसी बिल्कुल ही फ़िज़ूल सी इनकी इच्छा पर मेरे दिल दिमाग में द्वंद चल रहा था और मैं समेट कर सारे धोने लायक बरतन सिंक में जमा कर चुकी थी कि  साहब अपनी प्लेट थामे रसोई में चले आये__ “पनीर पसन्दा बनाने में तुम्हारा कोई जवाब नही, बहुत यमी था, अरे इतने बरतन , लाओ आज मैं साफ़ कर देता हूँ “

   पहला तो खाने की तारीफ कर दी और दूजा मेरे हाथ से धोने के लिये थामी कटोरी छीन ली…..

   ” जाओ जाओ तुम भी खाना खा लो, मैं ये सब निपटाता हूँ ।”

   हाय कहाँ संभालू इतना प्यार……. मैंने प्यार भरे गुस्से से इन्हें देखा और कटोरी वापस ले ली__

  ” आप भी ना!!! जाओ आप न्यूज़ देखो मैं ये ज़रा से तो बरतन हैं , निपटा कर आती हूँ “
   एक तरह से धकिया कर मैने इन्हें रसोई से बाहर कर दिया….. ये काउच पे मैं रसोई में , कुछ देर पहले दिमाग में जो ज्वालामुखी फटने को तैयार था वहाँ मनभावन सावन की बूंदे बरस कर उसे शांत कर चुकी थी, अपने मोबाईल पर अपने पसंदीदा गानों को सेट कर मैंने चलाया और मुस्कुराते हुए काम पर लगा गयी__

   ” मेरे यारा तेरे सदके इश्क सीखा,
         मैं तो आई जग तज के इश्क सीखा,
               जब यार करे परवाह मेरी…..”

  मधुर रोमांटिक गानों के साथ बरतन धोने का मज़ा ही अलग है, बरतन धो कर पोंछ कर करीने से जमा कर , सारा सब कुछ यथावत कर अपनी चमकीली रसोई की नज़र उतार ली।

       चेहरे पर एक मुस्कान चली आयी, काम कुछ किया नही बस मुझे रिझा कर सब करवा लिया…… साहब भी ना पक्के मैनेजर हैं , इन्हें अच्छे से पता है किस लेबर से कब और कैसे काम  निकलवाना है , अब प्राईवेट सेक्टर के बंदे लेबर से कम तो होते नही और उनके सर पर बैठे मैनेजर ठेकेदार!! खैर …..

मैंने  अपनी प्लेट लगाने के लिये केसरोल खोला कि देखा रोटी तो है ही नही__उस समय ये सोच कर नही सेंकी थी कि काम निपटा कर गरमा गरम फुल्के सेंक लूंगी, पर अब मन खट्टा सा हो रहा था, एक ही तो रोटी खानी है , सेंकू या रहने दूँ, दूध ही पीकर सो जाऊंगी…..दिमाग का ज्वालामुखी वापस प्रस्फ़ुटित होने जा ही रहा था कि साहब वापस रसोई में चले आये__
      ”  लाओ ये बेलन दो मेरे हाथ में ” मैं इनकी बात समझ पाती कि तब तक ये मेरे हाथों से बेलन ले चुके थे….

” अब तुम जाओ मैडम!! जाकर सोफे पर आराम फर्माओ, मैं तुम्हारी थाली परोस कर लाता हूँ ।”
    मेरे कुछ कहने से पहले एक तरह से जबर्दस्ती धकिया के इन्होंने मुझे अपने आसन पर बैठा दिया और खुद गुनगुनाते हुए रसोई की ओर चल पड़े

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  ” रोज़ तो तुम्हारा खाना ठंडा हो जाता है, आज मेरे हाथ से गरमा गरम फुल्के खा ही लो।”

  ” पर सुनो एक ही बनाना!!”

  ” क्यों?? आज के लिये ये कैलरी काउंटींग छोड़ो, एक की जगह तीन रोटियाँ ना खा ली तो मेरा नाम बदल देना।”

   कुछ इनकी रसीली बातें और कुछ गरम स्वाद भरा खाना , मैं सच थोड़ा ज्यादा ही खा गयी, चेहरे पर बिल्कुल वही संतुष्टी थी जो दिन भर थक हार के काम से लौटे मजदूर के हाथ में रोटी होने से होती है…..

    पर दिल के आगे एक दिमाग भी है, जिसने तुरंत सोचना शुरु कर दिया था, पर उसी समय मैंने मन ही मन एक छोटी सी कसम ले ली कि ऐसी शानदार थाली परोसने के बदले में पतिदेव ने किचन स्लैब और गैस चूल्हे का जो सत्यानाश किया होगा चुपचाप बिना किसी हील हुज्जत के झेल लूंगी, एक बार फिर सफाई कर लूंगी लेकिन इनके इतने ढ़ेर सारे प्यार के बदले कोई ज़हर नही उगलूंगी…..
     अपनी कसम मन ही मन दुहराती प्लेट रखने रसोई में आयी की मेरी आंखे फटी की फटी रह गईं…….

…..ये क्या मेरे स्वामी तो लिक्विड सोप स्प्रे कर कर के स्लैब को रगड़ रगड़ कर साफ़ कर चुके थे, सारा काम समेट कर गुनगुनाते हुए वो हाथ धो रहे थे, पूरे 20 सैकेण्ड से और मैं उन्हें देखती सोच रहीं थी__

   हाय मैं वारी जांवा , शायद इसे ही कहतें हैं once in a blue moon……….

aparna…..

मैं मैं हूँ!! जब तक तुम तुम हो!

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मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

तुमसे सारे रंग रंगीले
तुमसे सारे साज सजीले,
नैनों की सब धूप छाँव तुम,
होठों की मुस्कान तुम ही हो।
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

तुमसे प्रीत के सारे मौसम
तुमसे सूत,तुम ही से रेशम
तुमसे लाली,तुमसे कंगन,
मन उपवन के राग तुम ही हो
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

जीवन का यह सार तुम्हारा,
मेरा सब संसार तुम्हारा,
गुण अवगुण मेरे सब जानो,
मुझमे बसे मेरे प्राण तुम ही हो।
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !।।

जीवनसाथी-117

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            जीवनसाथी -117

     
    
  उनके सवाल पर समर एक किनारे खड़ा मुस्कुराता रहा… उसने पीछे देखा, कोर्ट रूम के दरवाजे पर एक आदमी अपना चेहरा आधा ढके खड़ा था उसने आंखों ही आंखों में समर को अभिवादन किया समर ने भी धीरे से बाकियों की नजर बचाकर उसके अभिवादन को स्वीकार किया और मुस्कुराकर ठाकुर साहब की तरफ देखने लगा।
   यह वही आदमी था जिसे समर ने 1 दिन पहले फोन करके ठाकुर साहब को कोर्ट तक पहुंचाने की बात कही थी……
….

     ठाकुर साहब का वकील एक तरफ चुप बैठ गया था। वो अब एक बार फिर नए सिरे से अपने कागज़ देख रहा था कि किस तरह अब कोर्ट में पहुंच चुके ठाकुर साहब को बचाया जाए। इसी बीच ठाकुर साहब को पुलिस ने कस्टडी में लिया और एक तरफ को लेकर आगे बढ़ गए, इसके साथ ही समर की जिरह भी शुरू थी।
     ठाकुर साहब के गुस्से का वारापार नही था। समर ने कहना जारी रखा….-“मैं अदालत में इनके काले कारनामों के सबूत पेश कर ही चुका हूँ। इसके साथ ही इन्होंने अपने कार्यालय से निकलते समय रानी बाँसुरी पर जो हमला करवाया उसकी भी तस्वीरें मेरे पास मौजूद हैं, जिन्हें मैं आपके समक्ष प्रस्तुत करने वाला हूँ।
    मारने काटने में ही तो इन्होंने पी एच डी कर रखी है न्यायधीश महोदय। जब जहाँ जी किया किसी पर उठा कर गोली चला दी। ये राजा अजातशत्रु के कार्यक्रम में भी इसलिए ही आये थे कि वहाँ इन्हें मार दिया जाए लेकिन इन्हें पहले ही राजमाता ने देख लिया। अब चूंकि इन्हें उस समय जेल में होना चाहिए था लेकिन ये जेल से फरार थे इसलिए राजमाता समझ गयीं की ये आदमी कुछ तो गड़बड़ करने के उद्देश्य से ही वहाँ आया है। उन्होंने ध्यान से देखा तो इनके हाथ की गन भी नज़र आ गयी , और उसी समय इन्होंने गन निकाल कर राजा अजातशत्रु पर निशाना साधा और राजमाता बीच में आ गईं और उन्हें गोली लग गयी जिसके बाद उनका देहांत हो गया। तो महोदय इन पर दो बार राजा अजातशत्रु पर हत्या के प्रयास और राजमाता की हत्या का आरोप लगता है…”

  समर की बात बीच में ही काट कर बचाव पक्ष का वकील कूद पड़ा…-” हत्या नही गैर इरादतन हत्या का प्रयास कहिये।”
” जी वो सारे चार्जेस तो अभी लगेंगे ही। वैसे भी जितने सबूत हमारे पास मौजूद हैं अब ठाकुर साहब को फांसी से बचा पाना आपके लिए बहुत मुश्किल होगा वकील साहब। आप ज़रूर कह रहे थे कि आप आज तक कोई केस नही हारे हैं, लेकिन अब ये केस आपके हाथ से निकलता दिख रहा है। मुझे तो समझ में नही आ रहा कि आपने इतने पारदर्शी और साधारण से केस को क्यों इतना घुमाया। ठाकुर जैसा लीचड़ और गिरा हुआ आदमी इस लायक ही नही की आप जैसा बुद्धिमान व्यक्ति इनकी पैरवी करे, और…
   समर की बात पूरी होने से पहले ही ठाकुर साहब ने पास खड़े पुलिस वाले कि गन निकाल कर राजा अजातशत्रु की तरफ मोड़ दी। उन्हें ऐसा करते देख उनका वकील ज़ोर से ” ऐसा मत कर दीजिएगा ठाकुर साहब ! आप अदालत में खड़े हैं, आपको कोई नही बचा पायेगा।” कहते उनकी तरफ भागे की हड़बड़ाहट में ठाकुर साहब का हाथ सामने से आते वकील साहब की ओर घूम गया।
   ठाकुर साहब का हाथ ट्रिगर पर ही था, उनके हाथ से गन चल गई लेकिन उतनी ही देर में किनारे खड़े समर ने वकील साहब को एक ओर खींच कर दूसरे हाथ से गन उन तक उछाल दी।
   ये सब इतनी जल्दी जल्दी हुआ कि किसी के कुछ सोच समझ पाने से पहले ही वकील साहब के हाथ में आई गन उन्होंने चला दी और गोली ठाकुर साहब को जा लगी।
   गोली ठाकुर साहब के माथे के ठीक बीचों बीच जाकर लगी और वो वहीं ढेर हो गए। उनका वकील कुछ समझ पाता कि तब तक पुलिस उन तक चली आयी।


    ठाकुर साहब के वकील ने समर की तरफ लाचारगी से देखा समर में दोनों कंधे ऊपर उठाकर ना में सर हिला दिया और राजा अजातशत्रु की ओर देख कर मुस्कुरा दिया।
कोर्ट ने अपनी कार्यवाही आगे बढ़ाने के पहले तुरंत ही डॉक्टर को तलब किया डॉक्टर ने आते ही ठाकुर साहब की जांच करके उन्हें मृत घोषित कर दिया! उनके वकील को पुलिस कस्टडी में ले लिया गया और यह सब देखते हुए कोर्ट ने तारीख आगे बढ़ा दी। राजा अजातशत्रु समर और आदित्य के साथ बाहर निकले ही थे कि फोन की घंटी बजने लगी…… फोन राजा के बड़े भाई युवराज का था…-” कहां हो कुमार?
” जी बस अभी अभी कोर्ट से बाहर निकला हूं आप बताइए क्या बात है भाई साहब?”
” तुम्हें मुबारकबाद देने के लिए फोन किया था। तुम पापा और हम बड़े पापा बन गए हैं। बांसुरी ने एक छोटे राजा अजातशत्रु को जन्म दिया है। मां और बच्चा दोनों ही स्वस्थ हैं अब जितनी जल्दी हो सके उड़कर यहां पहुंच जाओ।”

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   खुशी के अतिरेक में राजा से कुछ कहा ही नहीं गया। खुश होकर उसने अपने बाजू में खड़े समर की तरफ पलट कर देखा, समर और आदित्य उसे प्रश्नवाचक निगाहों से देख रहे थे? और राजा के चेहरे की मुस्कान ही गायब नहीं हो पा रही थी, कि समर ने फोन लेकर युवराज भैया से ही बात कर ली।
   खुशखबरी सुनते ही समर भी खुशी से उछल पड़ा लेकिन उसने राजा से कितना भी प्रेम किया हो उसके मन में राजा के लिए सम्मान बहुत अधिक था। इसलिए अपने संकोच में वह आगे बढ़कर राजा के गले से नहीं लग पाया लेकिन अपनी खुशी व्यक्त करने के लिए उसने साथ खड़े आदित्य को गले से लगा लिया…-” बधाई हो दोस्त हम चाचा बन गए हैं!”,
आदित्य को अब जाकर माजरा समझ में आया उसने झट आगे बढ़कर राजा के पैर छूकर उसे बधाई दे डाली। राजा ने आगे बढ़कर आदित्य और समर दोनों को गले से लगा लिया…-” अब यहां मेरा मन नहीं लगेगा, अब तुरंत वापस चलो समर।”

“लेकिन राजा साहब! केस अभी खत्म नहीं हुआ भले ही ठाकुर साहब नहीं रहे तो क्या हुआ पर उन पर लगे आरोपों को सिद्ध करके….”

   समर अपनी बात पूरी करता इसके पहले ही राजा ने उसकी बात आधे में ही काट दी …-“वह सब अब मैं कुछ नहीं जानता! तुम वकील हो अब तुम जानो तुम्हें क्या करना है? तुम्हारे पास सबूत भी हैं और गवाह भी लेकिन अब मुझे मेरे घर पहुंचना है।”
समर ने मुस्कुराकर हां में सर हिलाया और आगे बढ़कर गाड़ी का दरवाजा खोल दिया।
गाड़ी में पीछे बैठते ही राजा ने तुरंत बांसुरी के फोन पर रिंग कर दी।
थोड़ी देर फोन बजने के बाद फोन उठा लिया गया.. राजा ने धीरे से अपने मन की बात कह दी..-” थैंक यू सो मच हुकुम! आई लव यू अ लॉट!”
“आई लव यू टू कुंवर सा। आपकी हुकुम नहीं बल्कि आपकी भाभी रूपा बोल रहे हैं हम। कभी हमें भी याद कर लिया कीजिए हमसे भी बातें कर लिया कीजिए।’

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“भाभी साहब आप तो ह्रदय में बसती है आप छोटी मां है हमारी।”
“बस बातें बना लीजिए! आप आप दोनों भाइयों को और आता क्या है? वैसे हम आपका ज्यादा समय खराब नहीं करेंगे, लीजिये हम फोन बांसुरी को दे देते हैं।”
रूपा ने बांसुरी के सामने फोन रख कर फोन स्पीकर में डाल दिया राजा ने शरमाते हुए बांसुरी को थैंक यू कहा और आगे की बात उसे बताने लगा…-” मुझे लगा फोन तुम ने उठाया है और मैं भाभी साहब को जाने क्या-क्या कह गया? पता नहीं वह भी क्या सोच रही होंगी?”
“क्या सोच रही होंगी, यही सोच रही होंगी कि राजा साहब बावले हो गए हैं खुशी के मारे।”
“बात तो सौ टका सच है! राजा साहब खुशी के मारे बावले ही हो गए हैं। लेकिन बावजूद मैं कुछ का कुछ बोल गया और भाभी साहब ने सब सुन लिया।”
“साहब !  भाभी साहब तो अभी भी सब कुछ सुन रही हैं। आपका फोन स्पीकर में है, और इस कमरे में मेरे अलावा भाभी साहब, निरमा और पिया तीन और लोग भी हैं। और इन तीनों के अलावा आपका छोटा सा राजकुमार भी टुकुर टुकर पलके झपकाते हुए आपकी सारी बातें सुन रहा है।”
“तुम भी हद करती हो बांसुरी! मैंने फोन किया और तुमने स्पीकर में डाला हुआ है। मैं रख रहा हूं फोन।”

“अरे मैंने स्पीकर में नहीं डाला बाबा! भाभी साहब ने स्पीकर में डाल कर दिया, लेकिन सुनो तो सही बेबी मेरी गोद में है! मैं फीड कराने की कोशिश कर रही हूं उसको। अब ऐसे में आप फोन करोगे तो मैं कैसे बात करूं भला?”
“ओ ओ एम सॉरी! यह बात है तो पहले बताना चाहिए था ना। तुम्हें तो बड़ी मुश्किल हो रही होगी, चलो फोन रखो मैं बस जल्दी से तुम्हारे पास पहुंचता हूं।”
“कैसे बताती? बताने के लिए भी तो फोन उठाना ही पड़ता और फोन उठाते ही आपने आई लव यू की जो झड़ी लगाई कि भाभी साहब शरमा कर पानी पानी हो गई और उन्होंने फोन मेरी तरफ कर दिया।”
राजा ने शरमा  कर हंसते हुए फोन रख दिया। समर ने गाड़ी सीधे एयरपोर्ट की तरफ घुमा ली और फोन पर ही प्रेम को केसर को साथ लेकर एयरपोर्ट आने कह दिया।

कई बार जीवन में हर गुत्थी सुलझ जाए ऐसा नहीं होता। ठाकुर साहब के केस की गुत्थी उनकी अचानक मृत्यु से अनसुलझी रह गई थी। लेकिन हर गांठ अपने वक्त पर सुलझ जाए ऐसा हर बार संभव नहीं होता। ठाकुर साहब का केस पेचीदा था कठिनाइयों से भरा था। बावजूद समर ने जी-जान लगाकर उस केस को इमानदारी से लड़ने की कोशिश की। यह जानते हुए भी कि ठाकुर साहब का ईमानदारी से कोई दूर-दूर तक नाता नहीं है। उन्होंने शुरू से लेकर अपने जिंदा रहते तब हमेशा हर एक इंसान का फायदा उठाने की कोशिश की, चाहे वह उनकी पत्नी हो उनकी पुत्री हो या उनका भांजा।
   इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए समर यह जानता था कि ईमानदारी से ठाकुर साहब के खिलाफ अगर वह केस लड़ने गया तो सदियां लग जाएंगी। लेकिन केस निपटेगा नहीं। हालांकि इससे ना राजा का कुछ बिगड़ना था, ना बांसुरी का। लेकिन मन में अशांति और वैमनस्य तो उपजता ही है।
    इसीलिए समर ने शुरू से कोर्ट केस को इस ढंग से तैयार किया कि ठाकुर साहब और उनके वकील को लगे कि केस उनके पक्ष में जा रहा है। और बाद में हुई गड़बडियाँ इसी बात की लिए थी कि ठाकुर साहब हड़बड़ा कर कोई ऐसा कदम उठाएं कि अपने आप को बचाते हुए कोई उन्हें गोली मार दे।

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     समर केस के बीच के ब्रेक में मौका लगते ही  ठाकुर साहब के वकील के कान इसी बात से भरे की ठाकुर साहब बेहद सनकी, जिद्दी और घमंडी इंसान हैं। उनका कोई भरोसा नहीं है अगर वह बौरा गए तो भरी सभा में किसी पर भी गोली चला सकते हैं। इन बातों को बार-बार सुनकर ठाकुर साहब के वकील के दिमाग में यह बैठा हुआ था कि अगर ठाकुर साहब के हाथ में गन आ गई, तो हो सकता है वह अपने गुस्से के कारण अपने ही वकील पर भी गोली चला दे।  इसी बात से भयभीत वकील साहब ने जैसे ही ठाकुर साहब के हाथ में गन देखी घबरा कर उन्हें रोकने के लिए भागे और इस भागमभाग का फायदा उठाते हुए समर ने पहले से अपने पास छुपा कर रखी गन उनके हाथों में उछाल दी। उनके हाथ में गन देखते ही ठाकुर साहब के हाथ से ट्रिगर चल गया और खुद को बचाते हुए उनके वकील ने ठाकुर साहब पर गोली दाग दी। किया कराया सब कुछ समर का था। गोली तो असली में समर ने चलाई थी बस गन किसी और हाथ में थी।

   “मान गए समर सा आपकी बुद्धि और आपकी विद्वत्ता को।” आदित्य की इस बात पर केसर उसे सवालिया नजरों से देखने लगी तब आदित्य ने केस की उस दिन की सारी कार्यवाही प्रेम और केसर को कह सुनाई।
  प्रेम सब कुछ सुनने के बाद समर की तरफ देख कर मुस्कुराने लगा…-” यह इनकी की हुई पहली कारस्तानी नहीं है! यह इसी तरह के वकील है जो केस शुरू होने से पहले ही केस की हर चाल तय कर लेते हैं। अपनी तरफ की भी और विपक्षी की भी। उसके बाद सारी चाले समझने के बाद इस ढंग से अपनी गोटियां चलते हैं कि सामने वाला उन चालों को काटने के लिए अपने प्यादों को इस ढंग से चले कि समर की चाही हुई चाल सामने वाला खुद ब खुद चल जाए और सामने वाले को बिना यह समझ में आए कि वह हार रहा है वह हारता चला जाए।”

  “वह सब तो ठीक है पर आप लोगों ने सुबह से कुछ खाया पिया नहीं है अब कुछ खा पी लीजिए।” केसर की बात पर राजा मुस्कुरा के खिड़की से बाहर देखने लगा…-” अब तो हम अपने छोटे से राजकुमार का मुंह देखने के बाद ही कुछ खाएंगे पिएंगे।”

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एयरपोर्ट से राजा की गाड़ी महल की जगह अस्पताल की ओर ही मुड़ गयी। अस्पताल ने भी राजा जी के स्वागत की पूरी तैयारी कर रखी थी……
    फूलों गाजों बाजों के साथ राजा का स्वागत हुआ और राजा समर प्रेम आदित्य केसर सारे लोग एक साथ अस्पताल में अंदर पहुंच गए।
   केसर कुछ थकी हुई थी और साथ ही मन ही मन बांसुरी का सामना करने के लिए शायद डर भी रही थी! उसने धीरे से आदित्य की तरफ देखा आदित्य उसकी मन की बात समझ गया…-” राजा भैया अगर आप बुरा ना माने तो हम केसर को महल छोड़कर फिर वापस आ जाते हैं। “
  राजा के दिमाग में इस समय सिर्फ और सिर्फ बांसुरी से और अपने बेटे से मिलने की ललक थी। उसे ना तो कुछ सुनाई दे रहा था ना दिखाई दे रहा था उसने आदित्य से तुरंत “हां” कहा और तेजी से अंदर की ओर बढ़ गया! आदित्य केसर को लेकर बाहर से ही महल की ओर निकल गया। समर और प्रेम राजा के पीछे पीछे ही कमरे तक चले आए।


    राजा ने कमरे के दरवाजे पर थाप दी। अंदर से “चले आइए” की आवाज सुनकर राजा ने दरवाजा खोला और भीतर दाखिल हो गया।
    बांसुरी की ठीक बगल में उसका नन्हा राजकुमार लेटा हुआ था।  बाँसुरी की आँख लग गयी थी। रूपा कुछ देर पहले ही महल लौटी थी। निरमा भी रात से ही बाँसुरी के साथ होने के कारण मीठी को देखने घर गयी हुई थी। बाँसुरी की दो सहायिकाओं के साथ ही पिया उस वक्त बाँसुरी की दवाओं का जायज़ा लेने वहीं मौजूद थी।
   राजा को देख उसने मुस्कुरा कर उसका अभिवादन किया कि उसकी नज़र राजा के ठीक पीछे खड़े समर पर पड़ गयी, और अब तक कि सारी बातें भूल उसे बस समर का सीधे मुहँ बात न करना ही याद आ गया और उसने समर को पूरी नज़र देखे बिना ही प्रेम की तरफ मुहँ फेर लिया…-” नमस्ते भैया। “
    बाँसुरी को सोते देख एक झलक नन्हे राजकुमार को देख कर प्रेम तुरंत ही बाहर मुड़ गया। उसके पीछे ही समर भी बाहर जाने को हुआ कि बाँसुरी की आंख खुल गयी…
   राजा अब तक धीमे से अपनी उंगलियों से अपने बेटे के चेहरे को टटोल रहा था… वही नाक, वही माथा और वही गोल गोल पलकों के साथ काली मोटी मोटी आंखे।
   उसी का तो रूप था हूबहू। राजा की आंखों में खुशी के आँसू छलक आये ….
  राजा ने झुक कर उसका माथा चूम लिया..-” गोद में ले सकते हैं आप इसे साहब!”
  बाँसुरी की आवाज़ सुन राजा ने आंखें उठा कर उसे देखा…-“अरे तुम जाग गयीं।”
” मैं तो रास्ता ही देख रही थी,पता नही कब आंखें लग गईं। “
पिया ने धीरे से बच्चे को उठा कर कोमलता से राजा के हाथों पर रख दिया। राजा अपनी बाहों में अपने कलेजे के टुकड़े को समेटे विस्मित सा खड़ा था…-” आज तक बहुत से बच्चों को गोद में लिया है और सच कहूं तो दुनिया का हर बच्चा बहुत प्यारा होता है। लेकिन अपने खुद के बच्चे को अपने अंश को अपनी बाहों में लेना अद्भुत है। इससे सुंदर एहसास आज तक नही महसूस किया। किन शब्दों में तुम्हें थैंक्स कहुँ बाँसुरी। यूँ लग रहा मेरा बचपन तुमने मुझे वापस कर दिया।”

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” सही कह रहे हो कुमार! अब इसमें हम सब को तुम्हारा बचपन वापस जीने मिल गया।” युवराज ने कमरे में प्रवेश किया और राजा को आगे बढ़ कर गले से लगा लिया। अब तक राजा के हाथ से बच्चे को गोद में लेकर समर उसे देख मुस्कुरा रहा था कि रुपा पिया को वहाँ खड़ी देख चौन्क गयी…-“अरे डॉक्टर साहिबा आप अब तक यहीं हैं? आज शाम तो आपकी सगाई थी ना। आप गयीं नहीं अब तक। हम तो हमारी सगाई वाली शाम में सुबह से ही पार्लर में थे। “
  रुपा ने हंसी हंसी में अपनी बात कही और सहायिकाओं की सहायता से सबके लिए नाश्ता और चाय निकलवाने चली गयी, लेकिन सगाई वाली बात सुनते ही समर ने तुरंत पिया की ओर देखा और पिया संकोच में उसकी तरफ देख ही नही पायी। किसी ने समर की गोद से बच्चे को लेकर बाँसुरी को दे दिया। समर पिया से सब कुछ जानना पूछना चाह रहा था लेकिन पिया उससे नज़रें चुराती धीरे से बाँसुरी के कान में कुछ कह कर बाहर निकल गयी….

क्रमशः

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दिल से….

  त्योहारों की व्यस्तता के कारण इस भाग में देर हो गयी,लेकिन अब मेरी सारी कहानियां अपनी गति से आगे बढ़ती जाएंगी। समिधा और मायानगरी भी।
   जीवनसाथी का अगला भाग इस पूरी कहानी का सार सम्पूर्ण भाग होगा।
  मुझे पढ़ते रहने के लिए आप सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ

aparna….