गुल्लक-3 ……

मेरी नजर से….. समीक्षा

आजकल के कानफोड़ू गाली गलौज और वीभत्स रस के स्पष्ट उदाहरण कहीं जा सकने वाली भयंकर एक्शन से सजी महा पकाउ और बोरिंग एक जैसी ढेर सारी वेब सीरीज के बीच मिडल क्लास फैमिली की सौम्य शांत और सभ्य कहानी गुल्लक आपके मन को मोह लेगी…

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गुल्लक टीवी पर चलती ढेर सारी सीरीज के बीच में बिल्कुल वैसी ही लगेगी जैसी तेज गर्मी में गन्ने के रस की रसवती फुहार या फिर बादलों की ओट से झांकती रिमझिम बारिश…

निखिल विजय की कहानी पर अमृत राज गुप्ता के निर्देशन में सजी गुल्लक सीजन 3 को tvf ने प्रस्तुत किया है सोनी लाइव पर 7 अप्रैल से यह सीजन ऑन एयर हो चुका है…

कहानी एक महा मिडल क्लास फैमिली की है। कानपुर का रहने वाला मिश्रा परिवार।

जहां एक पिता है संतोष मिश्रा, जो विद्युत विभाग में कार्यरत हैं… इनके दो बेटे हैं बड़ा अन्नू मिश्रा..जो इस सीजन में नौकरी पा चुका है और नौकरी भी उसने टिपिकल मध्यमवर्गीय पाई है। एमआर की पोस्ट पर काम करने वाला अन्नू मिश्रा तरह-तरह की जुगत लगा कर अपने कंपनी की सेल्स बढ़ाना चाहता है, और इसमें उसका साथ देते हैं उसके तीन और दोस्त! कहानी के तीसरे मुख्य किरदार है अन्नु मिश्रा के छोटे भाई अमन मिश्रा। जिन्होंने दसवीं में तीसरी रैंक कमाई है, और इसी कमाई के कारण इनके गुरु जी और परिवार वाले इन्हें साइंस दिलवाना चाहते हैं …लेकिन अमन मिश्रा जी की दिली ख्वाहिश है कि वे आर्ट स्ट्रीम को चुने और उपन्यासकार बने। कहानी की सबसे मुख्य पात्र है घर भर को अपने तानों से अशांत बनाए रखने वाली हमारी गृहिणी शांति मिश्रा जी, जिन्हें जब अपनी परेशानियों से निकलने का कोई रास्ता नहीं नजर आता तभी बड़े मंदिर के पंडित जी को बुलवाकर शांति पाठ रखवा लिया करती हैं….

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गुल्लक एक साधारण से सामान्य से परिवार की कहानी है जो देखते हुए आप बिल्कुल ऐसा महसूस करते हैं कि यह तो हमारे अपने घर की कहानी है… किरदारों के बीच के डायलॉग बहुत सिंपल से हैं लेकिन भाव से भरे हुए हैं…

सीजन 3 के पहले एपिसोड में अमन के स्कूल की लंबी चौड़ी फीस देखकर परेशान मिश्रा दंपति जब अपने बड़े कमाऊ पूत से पैसों के बारे में बात करने में हिचकते हैं तो उन्हें टीवी पर देखते हुए कई जोड़ा मां-बाप की आँखें उनकी उस पीड़ा को देख बरस पड़ती है..जब बड़ी मुश्किल से वह दोनों अपनी पूरी हिम्मत जुटाकर अन्नू से अमन की फीस के बारे में बात करते हैं तो अन्नू अपने महंगे ब्रांडेड जूते खरीदने के सपने को 1 महीने के लिए पोस्टपोन करके अमन के लिए अपनी जेब खाली कर देता है, लेकिन इसका बदला वो जल्दी ही अमन के बालों को नाई के पास ले जाकर कटवा कर पूरा भी कर लेता है… लेकिन इस सारे सीन में दोनों भाइयों के बीच की केमिस्ट्री बहुत लाजवाब ढंग से निखर कर आती है.. इसी के बाद किसी एपिसोड में जब छोटा भाई अमन अपने केमिस्ट्री लैब के फेलियर को अपने बड़े भाई के सामने स्वीकार करता है और साथ ही उसके सामने अपने मन की यह बात रखता है कि वह विज्ञान नहीं पढ़ना चाहता बल्कि आर्ट्स लेना चाहता है तब उसके सामने बैठा बड़ा भाई अन्नू अपने चेहरे के भावों से यह स्पष्ट कर देता है कि “कोई बात नहीं छोटे तुझे जो करना है वह कर तेरे ऊपर मेरा हाथ हमेशा था, है…और रहेगा।

कहानी के छोटे छोटे हिस्से इतनी बारीकी से रचे गए हैं जो बाप बेटे भाई भाई और माता पिता के आपसी संबंधों की मजबूती को बहुत अच्छे से और सुंदर तरीके से चित्रित करते हैं। कहानी में एक और मुख्य किरदार है बिट्टू की मम्मी जिन्हें इस ढंग से रचा गया है कि उनकी एंट्री पर ही हम और आप हंसने को मजबूर हो जाते हैं…

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सुनीता राजधर एक लाजवाब एक्टर है… बहुत बार वह बिना डायलॉग बोले सिर्फ अपने चेहरे के एक्सप्रेशन और अपनी बॉडी लैंग्वेज से ही दर्शकों को गुदगुदा जाती हैं। बिट्टू की मम्मी का किरदार एक बहुत खास किरदार है जो अक्सर गली मोहल्लों में हमारे अड़ोस पड़ोस में देखने को मिल ही जाता है…

कहानी की एक खास बात और है कि इस कहानी में घर की गृहिणी कभी अड़ोस पड़ोस में ताका झांकी करके गॉसिप नहीं करती। इस काम का भार पूरी तरह से घर के बड़े लड़के अन्नू के कंधों पर है… जैसे ही कोई भी घर का सदस्य किसी बात को जानना चाहता है और गलती से भी पूछ लेता है ,तो हमारे अन्नु मिश्रा जी पूरी तरह से तैयार होकर रामायण बांचने का काम शुरू कर देते हैं… अपने गली मोहल्ले के बारे में उनका नॉलेज अगाध है और अपने इस अभूतपूर्व नॉलेज को वह समय समय पर अपने परिवार के सदस्यों से बांटते रहते हैं…

सीजन 3 का मुख्य प्लॉट था मध्यमवर्गीय परिवार की इमानदारी!!! उस ईमानदारी के वास्ते अपने रास्ते पर सीधे चलते संतोष मिश्रा जी को जब सस्पेंशन लेटर थमा दिया जाता है तब घर के सभी सदस्य यह सोचना छोड़कर कि संतोष मिश्रा जी मन में क्या सोच रहे होंगे? यह सोचने लगते हैं कि अब घर का खर्च कैसे चलेगा? इतनी ढेर सारी प्रैक्टिकैलिटि भरी है इस सीरिज में की आनंद आ जाता है..

बाकी मध्यमवर्गीय परिवारों में ऐसा ही तो होता है, लोग भावुक बहुत ज्यादा होते हैं लेकिन प्रैक्टिकल होना उनकी मजबूरी हो जाती है । कहानी के अंतिम एपिसोड में जब घर का मुखिया कमरे का दरवाजा बंद कर बेहोश हो जाता है तब उस वक्त उनके दोनों बेटे और पत्नी भावुकता में बहते कैसे उन्हें अस्पताल तक लेकर जाते हैं भर्ती करवाते हैं और किस ढंग से उनका उपचार करवाते हैं यह देखने वालों को हर बार रुला जाता है…. उसी एपिसोड में जब अन्नू अपने पिता को गोद में उठाकर बाहर की तरफ भागता है और उसके पीछे उसकी मां भी उस कमरे से बाहर निकल जाती है, तब चुपचाप खड़ा अमन धीरे से जाता है और अपने पिता की चप्पले उठाकर अपने सीने से लगाए घर से बाहर निकल जाता है इस छोटे से सीन में अमन ने इतना भावपूर्ण अभिनय किया है कि हर बेटा अपने पिता की चप्पलों की तरफ देख कर एक बार को नतमस्तक जरूर होता है…

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कहानी के तीसरे एपिसोड में अगुआ की कहानी भी बताई गई है .. अगुआ गांव का वह पुरुष होता है जो अपने नाते रिश्तेदारों दोस्तों यारों के बीच किसी भी निर्णय को लेने के लिए सर्वाधिक सक्षम होता है और बाकी सभी लोग उसके निर्णय को सर्वमान्य मानकर उसकी कहीं बात पर अपनी मुहर लगा देते हैं… संतोष मिश्रा का कोई भूला बिसरा मित्र अपनी बेटी की शादी की बातचीत मिश्रा जी के घर से करने के लिए उनके घर में बेटी पहुंच जाते हैं और इस पूरे आयोजन में संतोष मिश्रा जी की धर्मपत्नी और उनके मित्र की बेटी के बीच एक बहुत ही ममतामई रिश्ता बन जाता है जिसमें शांति मिश्रा जी फुर्तीली से स्पष्ट रूप से कहती हैं फुर्तीली भी इस रिश्ते में अपने मन की बात जरूर रखें….

अभीनय की बात करें तो सभी कैरेक्टर लाजवाब है… संतोष मिश्रा के रोल में जमीन खान हो या शांति मिश्रा जी के रोल में गीतांजलि कुलकर्णी हो, अनु के रोल में वैभव राज गुप्ता या अमन के रोल में हर्ष मायरो सभी ने अपने अभिनय से हंसाया भी है और रुलाया भी है… कुल मिलाकर यह एक फैंटास्टिक फोर सीरीज है जिसे अगर आपने अब तक नहीं देखा तो जरूर देखिए इसके पिछले 2 सीजन भी बेहद शानदार है और अगर आपने पिछले दोनों नहीं देखे तो गुल्लक फर्स्ट सीजन से शुरू कीजिए….

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दो आने ,चार आने ,आठ आने की पुलक

छोटे-छोटे किस्सों से भर गयी ये गुल्लक।।

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aparna…..

होली है….

हरिवंशराय बच्चन

तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।
देखी मैंने बहुत दिनों तक
दुनिया की रंगीनी,
किंतु रही कोरी की कोरी
मेरी चादर झीनी,
तन के तार छूए बहुतों ने
मन का तार न भीगा,
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

दिल से….

dear दोस्तों

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कैसे हैं आप सब ..? बहुत दिनों से ब्लॉग पर कोई हलचल नहीं थी , मैं जानती हूं आप लोग भी परेशान हो रहे होंगे कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि मेरी कहानियां मैंनें ब्लॉग से हटा ली..तो आज मैं इसका कारण आप सभी से शेयर करना चाहती हूं…

जैसा कि आपमे से ज्यादातर लोग जानते ही हैं कि मैं ने प्रतिलिपि से ही लिखना शुरू किया था ..फिर बाद में मुझे लगा कि मुझे मेरा ब्लॉग भी शुरू करना चाहिए और आप सब की मदद से मेरा ब्लॉग बस कुछ ही महीनों में चल प़डा …

लेकिन प्रतिलिपि ने मेरी कुछ कहानियों को अनुबंधित करना चाहा और उसके लिए मैंने भी स्वीकृति दे दी , उसी अनुबन्ध के कारण अब उन कहानियों को मैं प्रतिलिपि के अलावा कहीं और प्रकशित नहीं कर सकती ..और इसी कारण मुझे “जीवनसाथी “, “शादी.कॉम ” और “समिधा ” को यहां से हटाना पड़ा….

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मायानगरी हालांकि अब तक अनुबंध मे शामिल नहीं है लेकिन जल्दी ही हो भी सकती है ….

लेकिन आप सभी के लिए भी मेरे पिटारे में बहुत कुछ है…. मेरी नयी कहानियां जो प्रतिलिपि पर नहीं है उन्हें यहां शुरू करूंगी …और जल्दी ही एक नयी कहानी ” वापसी ” की शुरुआत मेरे ब्लॉग पर होगी..

आप सभी ने हमेश मेरा साथ दिया है इसलिए उम्मीद है हमारा साथ यूँ ही बना रहेगा ….और पढ़ते लिखते ये सफर कट जाएगा …..

मुझे पढ़ने और सराहने के लिए हृदय से आपका आभार धन्यवाद ….

aparna

दिल से….

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खुशियां आंखें गीली कर जातीं हैं जब कोई ऐसा मौका आये कि किसी ज़मीन से जुड़े शख्स को सिंहासन पर बैठे देखती हूँ……

मेरी नज़रों में ही असल नायक होता है। फल बेचकर 150 रुपये प्रतिदिन कमाने वाले हरिकेला को संतरे को orange कहा जाता है ये मालूम न था। अंग्रेज़ी की ये छोटी सी भाषयी अज्ञानता ने उनके ज्ञान चक्षु खोल दिए। स्वयं की अशिक्षा को मानक मान कर उन्होंने अपनी जीवन भर की कमाई से अपने गांव के बच्चों के लिए स्कूल खोल दिया।

मेंगलुरु के हरिकेला के एक छोटे से प्रयास ने सफलता रची और आज सरकारी अनुदान और कई प्राइवेट ऑर्गेनाइजेशन के सहयोग से उनका हजब्बा स्कूल सफलता के सोपान छू रहा है।

स्नेह सम्मान से लोग इन्हें अक्षर संत भी कहतें हैं। आपके हाथों में पद्मश्री अवार्ड भी मुस्कुरा रहा है।

दिल से…

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बॉक्सर आमिर खान  अक्षय कुमार से पूछते हैं ” हे ब्रो!! एंजॉइंग? और खिलाड़ी कुमार अपने मस्तमौला अंदाज में जवाब देते हैं येह एंजॉइंग ! बेटर लक नेक्स्ट टाइम!!!
   ये सारा स्पोर्ट्समैनशिप इमानदारी की हार बेईमानी की जीत, अलाना फलाना सब कुछ हम भूल जाते हैं जब इंडिया पाकिस्तान के खिलाफ मैच खेलती है।

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   इतना तो कल दिन भर व्रत रखने के बाद औरतों का खून कम नहीं हुआ होगा जितना इंडिया की हार से हो गया।
  

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अगली बार जीत के आना है बता देती हूं( फ्रॉम अनुष्का)

#दिल से देसी❤️
#छोटी सी भड़ास

शादी.कॉम – 26

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शादी डॉट कॉम-26


      
     “मल्टीनेशनल बैन्क्स की तर्ज पर खालिस देसी बैंक भी अपने कर्मचारियों को इस तरह की पार्टी और आयोजन का झुनझुना पकड़ा कर अत्यधिक परिश्रम  कार्य से होने वाली  मानसिक और शारीरिक थकान को दूर करने का सरल उपाय सिखाने की आड़ में उन पर क्षमता से अधिक कार्य थोप रहे हैं,” उस विषय पर प्रस्तावित अन्तिम दिन की कार्यशाला में सारे आयोजन उसी हिसाब से रखे गये थे।।

   पांचवे दिन के ट्रेनिंग सेशन के अंत में सभी की डिनर की व्यवस्था पास के ही एक फाईव स्टार होटल  में की गयी थी,हल्की फुल्की साज सज्जा के साथ ही बैंक कर्मियों में से कुछ एक द्वारा गीत संगीत पेश करने की भी तैयारी थी,इसके अलावा सवेरे के विषय को अनुपूरक करने कुछ एक छोटे मोटे सहभागिता गेम्स का भी आयोजन किया गया था।।
ये पार्टी पूरी तरह से पारिवारिक थी जिसमे कर्मचारी चाहें तो अपने परिवार को भी लेकर आ सकते थे।

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     तीसरे दिन के अपने सेशन के बाद लंच किये बिना ही राजा जो गया था वो चौथे दिन भी बांसुरी को नही दिखा था,ये कैसा बदला ले रहा था वो,जब तक लिस्ट मे बांसुरी का नाम नही था वो मौजूद था और उसका नाम जोड़ने के बाद खुद गायब हो गया था।।
     पर अन्तिम दिन सारी टीम की उपस्थिति अनिवार्य थी,इसीसे बांसुरी को उम्मीद थी,कि आज तो वो आयेगा और हुआ भी वही,राजा आ गया।।

     ऐश ग्रे साड़ी में धागे से बने गुलाबी बूटे बहुत सुंदर लग रहे थे,और उस साड़ी में संवरी बांसुरी भी।।
    माला और बांसुरी साथ ही बैठे थे कि माईक हाथ में लिये सिद्धार्थ ने गाना शुरु कर दिया

        कब कहाँ सब खो गयी
      जितनी भी थी परछाईयाँ
      उठ गयी यारों की महफ़िल
         हो गयी तन्हाईयाँ
       क्या किया शायद कोई
         पर्दा गिराया आपने

      दर्द-ए-दिल, दर्द-ए-जिगर
         दिल में जगाया आपने……….

  हर एक अंतरे पर बांसुरी को निहारता सिद्धार्थ बडे लय में अंदाज में  गा रहा था…..
    बांसुरी सोच ही रही थी कि अच्छा है राजा नही है,वरना सिद्धार्थ की इस बेशर्मी पर जाने उसके बारे में क्या कुछ सोच बैठता,अभी ऐसा सोच के उसने अपने बालों को पीछे किया ही था कि उसके पीछे थोड़ा हट के एक टेबल से टिक के खड़े राजा पर उसकी नज़र पड़ गयी।।
      गहरे ग्रे रंग की शर्ट और काली पैंट में खड़े राजा पर से उसकी आंखें एकाएक हट नही पायीं।।
     तब तक में राजा ने भी उसे देख लिया लेकिन तुरंत ही दुसरी तरफ मुहँ फेर किसी से बातों मे लग गया।।

      पहले दूसरे दिन तो ऐसी निर्लिप्तता नही दिखा रहा था,अचानक ऐसा क्या हो गया ….
     आज अन्तिम दिन था,आज के बाद राजा वापस चला जायेगा,आज ही का दिन है और यही कुछ पलछिन जिनमें वो अपनी बिगडी बना सकती है,पर क्या करे?? कैसे कहे?? कि राजा आज भी हमे फर्क नही पड़ता कि तुम बैंक अधिकारी हो गये!! तुम्हारी नौकरी लग गयी!!
    हमारे लिये तो आज भी तुम हमारे कानपुर के हमारी गलियों के वही राजा हो,कभी जिसकी ज़ुल्फों के साथ हमारी सांसे ऊपर नीचे होती थी।।

    अपनी सोच मे गुम बांसुरी को अचानक स्टेज की तरफ जाते राजा दिखा और तभी सिद्धार्थ ने राजा को गाने के लिये माईक थमा दिया,थोड़ी ना नुकुर के बाद राजा ने माईक संभाल लिया__


       बावरा मन राह ताके तरसे रे
      नैना भी मल्हार बन के बरसे रे
    आधे से अधूरे से, बिन तेरे हम हुए
    फीका लगे है मुझको सारा जहां
     बावरा मन राह ताके…

     ये कैसी ख़ुशी है, जो मोम सी है
    आँखों के रस्ते हँस के पिघलने लगी
      मन्नत के धागे, ऐसे हैं बाँधे
   टूटे ना रिश्ता जुड़ के तुझसे कभी
     सौ बलाएँ ले गया तू सर से रे
          नैना ये मल्हार…

गाने के प्रवाह में खोयी बांसुरी की नज़र राजा पर से हट ही नही पा रही थी,और वो था कि गाते समय उसने एक बार भी उसकी तरफ देखना ज़रूरी नही समझा।।

     डिनर के लिये कर्मियों के परिवारों का भी निमन्त्रण था,बहुत से कर्मचारी अपने बीवी बच्चों के साथ आये हुए थे।।
     
   राजा ने अपना गीत समाप्त किया और स्टेज पर से उतर ही रहा था कि उसकी नज़र सिद्धार्थ पर पड़ गयी और एक बार फिर उसके मुहँ मे एक कड़वाहट घुल गयी,सिद्धार्थ अपनी माँ को सबसे मिलवाते हुए बांसुरी की तरफ ही बढ रहा था।
     दक्षिण भारतीय पोचमपल्ली साड़ी में एक साधारण सा जूड़ा बनाई हुई सिद्धार्थ की माँ चेहरे से ही बेहद सुलझी हुई समझदार गृहिणी लग रही थी, अकेले ही ज़माने की ठोकरें खाती बेटे की अकेले परवरिश ने उनके चेहरे को एक दिव्य तेज़ से रंग दिया था।।

     बांसुरी स्टेज के दूसरी तरफ अकेली ही खड़ी थी कि सिद्धार्थ वहाँ पहुंच गया__

सिद्धार्थ- बांसुरी इनसे मिलो,ये मेरी मॉम है,and mom she is bansuri ,I’ve already told u about her..

  सिद्धार्थ की माँ ने मुस्कुरा कर बांसुरी का अभिवादन किया कि अपने उत्तर भारतीय संस्कारों में लिपटी बांसुरी ने झट आगे बढ कर उनके पैर छू लिये।।
     बांसुरी का लपक के इस तरह पैर छूना उन्हें मोहित कर गया,उन्होँने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया,अपनी टूटी फूटी अन्ग्रेजी मिश्रित हिन्दी में उन्होनें अगले दिन सुबह के सह्भोज पर उसे भी आमन्त्रित कर लिया।।

    अगले दिन महीने का दूसरा शनिवार होने से बैंक की छुट्टी थी,इसीसे टीम की वापसी के पहले जितने लोग आज रात की फ्लाईट से नही वापस हो रहे थे उन सब को बड़े इसरार के साथ सिद्धार्थ ने अपने घर सुबह के खाने पर बुला लिया था।।
      राजा ने सिद्धार्थ के आग्रह को सिरे से नकार कर अपने आने की असमर्थता प्रकट कर दी थी।।
     कभी किसी आयोजन का हिस्सा ना बनने वाली सिद्धार्थ की माँ एक तरह से टीम को स्वयं आमंत्रण देने ही आयी थी।।

    बांसुरी से जब तक उनकी बातें होती रही,राजा उन्हें  ही देखता रहा,पर जब उसने देखा की वो बांसुरी को साथ लिये उसी की तरफ आ रही हैं, तो वो एकाएक पलट कर दूसरी ओर देखने लगा।।

    ” हेलो ,कैसे हैं आप??”

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  राजा- जी नमस्कार!!! मैं ठीक हूँ,आप कैसी हैं।

” देखिए आप हमारे घर आये बिना नही जा सकते, मैं स्पेशली आप को इन्वाईट करने ही यहाँ  तक आयी हूँ ,कल का लंच आपको हमारे घर पर ही लेना है।”
    पता नही ये उनका स्नेह भरा आग्रह था या आश्चर्यजनक रूप से उनके व्यक्तित्व की अम्मा से समानता पर उस भद्र महिला के आग्रह को फिर राजा ठुकरा नही पाया, आखिर उसने भी झुक कर उनके पैर छू ही लिये।।

   तभी माला हाथ में स्टार्टर की प्लेट थामे वहाँ चली आयी,चार लोगों के बीच अकेली प्लेट पकड़ी खड़ी खुद को देख उसे अपनी भूल का आभास हुआ,और उसने अपनी प्लेट राजा की तरफ बढ़ा दी__

” सर लिजिये ना,आप कुछ ले ही नही रहे।”

” आप इतने प्यार से देंगी तो कोई लेने से कैसे मना कर सकता है।”
   बांसुरी एक बार फिर बुझ के रह गयी,आखिर हुआ क्या है राजा को।।

    पर बांसुरी को अब हर पल यही लग रहा था कि कैसे भी करके इस गलतफहमी को दूर करना ही पड़ेगा,चाहे इसके लिये उसे किसी भी हद तक जाना पड़े ।।

    माला ने उसी समय माईक बांसुरी के हाथ थमा दिया,बहुत सहम के आखिर उसने गाना शुरु किया

    मैं कागज़ की कश्ती, तू बारिश का पानी
           ऐसा है तुझसे अब ये रिश्ता मेरा
          तू है तो मैं हूँ, तू आए तो बह लूँ
            आधी है दुनिया मेरी तेरे बिना
           जी उठी सौ बार तुझपे मर के रे
                 नैना भी मल्हार…

बांसुरी ने बहुत मन से राजा के गाये हुए गाने को ही आगे बढ़ाया,पर उसके गीत को समाप्त करते में राजा वहाँ से जा चुका था।।

     राजा के जाने के बाद फिर बांसुरी का मन भी उस पार्टी से उचाट हो गया,जैसे तैसे समय काटती आखिर वो भी सर दर्द का बहाना बनाये वहाँ से निकल पड़ी ।।

  पार्टी हॉल में नेटवर्क ना होने से कैब बुक नही हो पा रही थी,इसीसे पैदल मेन रोड पर आगे बढ़ती बांसुरी अपने मोबाइल पर सर झुकाये कैब बुक करने में ही लगी हुई थी__

” अरे सम्भल के,ऐसे चलोगी तो गिर पड़ोगी!!

   राजा की आवाज़ सुन बांसुरी ने झटके से ऊपर देखा,सामने से उसीकी तरफ आते राजा को देख उसका चेहरा खिल उठा__

बांसुरी– ऐसे बीच में पार्टी छोड़ कर कहाँ निकल गये।।

राजा– बहुत बेचैनी सी लगने लगी थी अन्दर, इसिलिए बाहर खुली हवा में सांस लेने निकल गया।

राजा– तुम यहाँ कैसे?? पार्टी तो अभी चल ही रही होगी।।

बांसुरी– हाँ हमें भी थोड़ा अच्छा सा नही लग रहा था,इतनी भीड़ भाड़,हल्ला गुल्ला रास नही आ रहा था।तुमने खाना खाया राजा ??

राजा — खा लेंगे….तुम्हें अचानक हमारी फिक्र कैसे होने लगी।।

बांसुरी– अरे ऐसे क्यों बात कर रहे ,,हम फिक्र नही करेंगे तो और कौन करेगा तुम्हारी??

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राजा — जो हमारे लिये बनी होगी वो करेगी।।

बांसुरी– अच्छा !!! कौन है वो ज़रा हम भी सुनें,तुमने बताया ही नही कि शादी के लिये लड़की भी ढूँढ लिये।।

राजा– हाँ जैसे तुमने तो मिलते साथ ही सब बता दिया।।

बांसुरी– क्या बोल रहे हो तुम?? हमे समझ नही आ रहा,कभी भी साफ साफ बोलने की आदत भी तो नही है तुम्हारी।।

राजा– जैसे तुम सब साफ साफ बोलती हो,जब इतनी ही सफाई है बातो में तो अब तक बताई काहे नही कि उससे शादी करने जा रही हो।।

बांसुरी– पगला गये हो क्या?? किससे शादी करने जा रहे हम??

राजा — बनो मत बांसुरी!! सिद्धार्थ ने हमे सब कुछ बता दिया है।।

बांसुरी– अरे बाबा क्या बता दिया उसने,,हमें भी तो बताओ।।

राजा– यही कि तुम दोनों शादी करने वाले हो।।

बांसुरी– पगला गये हो क्या तुम?? एक बात बोले चाहे तुम कितने बड़े ऑफीसर बन जाओ ,
रहोगे गधे के गधे ,,  उसने कहा और तुमने मान लिया,अरे एक बार हमसे पूछना तो था।।

राजा — सवाल पूछने और जवाब देने का कोई रस्ता पीछे छोड़ गयी थी क्या ,जो हम कुछ पूछ पाते।।

बांसुरी– तुमने भी तो आवाज़ नही दी पीछे से….क्या इतनी सी बात पे कोई ऐसा जीवन भर का बैर मोल लेता है।।कहते कहते बाँसुरी की आंखें भीग गयी

   राजा ने आगे बढ़कर बांसुरी के दोनो हाथ अपने हाथों में ले लिये एक हाथ से उसके बहते आँसूं पोंछ उसकी आंखों में झांकते हुए उसने कहा__

राजा– आज भी तुमसे उतना ही प्यार करते हैं बांसुरी, कभी भूल ही नही पाये तुम्हें ।।
हमारे अनपढ़ होने से हमे छोड़ गयी यही सोच सोच कर पागल हो गये,और तुम्हारे जाने के बाद पढ़ने की ऐसी लत लगी की पागलों के समान किताबों में  ही घुसे रहने लगे,किताबें ही जीवन हो गयी थी हमारे लिये…..तुम्हारे बिन सब कुछ कितना फीका हो गया था ,कितना बेरंग !! चाय भी अच्छी नही लगती थी, फिर भी पीते थे,सिर्फ और सिर्फ तुम्हें याद करने के लिये…..जिम छूट गया!! दोस्त छूट गये!! यहाँ तक की हमारी खुद की तबीयत हमसे रूठ गयी पर तुम नही छूटी,कितना याद किया ये कैसे बताएँ क्योंकि तुम तो हमारे अन्दर ही समा गयी थी,इस कदर हमसे जुड़ गयी थी कि सोते जागते दिमाग में एक ही नाम चलता था ….बांसुरी!!

   बांसुरी के आँसू रूकने के बजाय बहते चले जा रहे थे,और अब राजा के आँसू भी उसका साथ दे रहे थे।।

बांसुरी– तुम्हें क्या लगता है,हम यहाँ बहुत खुश थे,किसी से तुम्हारे बारे में पूछ नही पाते थे,प्रिंस प्रेम सबने हमसे बात करना बन्द कर दिया,यहाँ तक की निरमा ने भी,,बस बुआ की चिट्ठी में कभी कोई हाल तुम्हारा मिला तो मिला,वर्ना कुछ नही।।

राजा– एक बार फोन भी तो कर सकती थी ना, राजा जिंदा है या मर गया,जानने की भी इच्छा नही हुई तुम्हारी ।।

बांसुरी–तुम तो फिर भी अपने अम्मा बाऊजी के साथ थे युवराज भैय्या के साथ थे,,हम तो यहाँ एकदम अकेले हो गये थे!! कभी तुम्हें नही लगा कि अकेले क्या कर रही कैसे जी रही एक बार फोन ही कर लूँ ।।
      कभी कहीं से गुजरते और तुम्हारे पर्फ्यूम की खुशबू आ जाती तो पागलों जैसे इधर से उधर भटकते फिरते,तुम्हें ढूंढते रहते थे,जबकि जानते थे की तुम यहाँ नही हो।।
     हमारे पागलपन की हद बताएँ राजा,तुम्हें हमेशा अपने पास महसूस करने के लिये लड़की होते हुए भी तुम्हारा जेंट्स पर्फ्यूम लगाते हैं,माला जाने कितनी बार इस बात पर हमारा मजाक भी बना चुकी है,पर हमे अपने कपडों से आने वाली तुम्हारी खुशबू ही भाती है ,क्या करें।।

     दोनो एक दूसरे का हाथ थामे एक दूसरे की आंखों में इतने सालों के अपने पलछिन देखते हुए सवाल जवाब में लगे थे कि अचानक राजा बांसुरी के चेहरे पे झुकने लगा__

बांसुरी– क्या कर रहे हो ये राजा ??

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राजा– उस शाम एक काम अधूरा रह गया था बंसी …… आज वही पूरा करने जा रहे …..

मुस्कुराते हुए बांसुरी ने राजा को पीछे धकेल दिया

बांसुरी– इतनी सारी शिकायतें जमा कर रखी है हमने,उन्हें सुनने की फुरसत नही है?? आये बड़े प्यार करने वाले….

राजा– कर लेना बाबा, शिकायतें भी कर लेना,,सब सुन लूंगा……
      राजा ने अपने दोनो हाथों में बड़े प्यार से बांसुरी का चेहरा पकड़ा और….
   ” पहले उस रात का हिसाब तो पूरा कर लेने दो।”

बांसुरी– नही ,पहले हमारी बात सुनो!! क्या कह रहे थे सिद्धार्थ सर ,मुझसे शादी करेंगे,हो चुकी तब तो।।तुमने कहा नही उनसे कि बांसुरी सिर्फ और सिर्फ राजा की है,और राजा से ही बांसुरी की शादी होगी।।

राजा– नही कहा!! लेकिन कल उनके घर जायेंगे ना तब कह देंगे,,अब खुश!!

बांसुरी– हाँ बहुत बहुत खुश ।।

राजा– तो फिर आओ इधर।

बांसुरी– कब से देख रहे हैं,घूम फिर के एक ही जगह तुम्हारा कांटा अटक जा रहा

राजा– इत्ते साल से इन्तजार भी तो किया है तुम्हारा बन्सी!!!
      मुस्कुराती हुई बांसुरी आगे बढ़ कर राजा के गले से लग गयी,और राजा उसके चेहरे पे झुकता चला गया।।

क्रमशः

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aparna..

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दिल से…. चिट्ठी आप सबों के नाम!

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प्यारे दोस्तों।

सबसे पहले तो आप सभी का शुक्रिया अदा करती हूं कि मेरे एक बार बोलने पर आप सभी मेरे ब्लॉग पर चले आए। पर यहां मेरे ब्लॉग पर भी आप सब मुझे सपोर्ट कर रहे हैं। मैं जानती हूं आप सब के दिल में यह भी चल रहा होगा कि आखिर मैंने अपना ब्लॉग लिखना क्यों शुरू किया। देखा जाए तो यह जरूरी था बेहद जरूरी। सिर्फ मेरे लिए ही नहीं मेरे जैसे उन ढेर सारे लेखकों के लिए भी जो ढेर सारी मेहनत करके लिखते तो हैं लेकिन उनके लिखेगा प्रतिसाद उन्हें नहीं मिल पाता।

मैं यहां किसी भी प्लेटफार्म की बुराई नहीं करूंगी। सभी प्लेटफार्म अपनी अपनी जगह सही है चाहे वह ऑनलाइन लेखन के प्लेटफार्म हों या ऑडियो स्टोरी सुनाने के प्लेटफार्म। हर एक प्लेटफार्म अपने आपके लिए काम करता है। अपनी ग्रोथ के लिए अपनी खुद की टीम के लिए । अगर हम लेखक उन प्लेटफार्म से जुड़ते हैं तो कहीं ना कहीं हमारा भी अपना एक लालच होता है कि हमें पाठक मिले। हमारी कहानियों को श्रोता मिले। आज बहुत से लेखक ऐसे हैं जो 1 से अधिक प्लेटफार्म पर काम कर रहे हैं। और यह लेखक लगातार काम कर रहे हैं। किसी प्लेटफार्म पर कहानियां लिखते हैं तो किसी दूसरे ऑडियो प्लेटफॉर्म के लिए भी अपनी कहानियां देते हैं। आप सोचिए उन लेखकों के दिन में भी 24 घंटे ही हैं। और वह उस टाइम को मैनेज करके लगातार मेहनत करते हैं। सिर्फ इसलिए कि उनकी कहानियों से उनकी कोई कमाई हो सके। लेकिन सच कहूं तो कोई भी प्लेटफार्म लेखकों को उनके परिश्रम के मुताबिक पारिश्रमिक नहीं देता। शायद इसीलिए लोगों को लेखन में कैरियर बनाने के लिए बहुत सोचना पड़ता है। ना ही इस क्षेत्र में जल्दी पैसा मिलता है और ना ही नाम। बावजूद लेखक के अंदर की भूख उसे लिखने के लिए बाध्य करती हैं। और यह भूख पैसों की भूख से कहीं ज्यादा तीव्र होती है । यह भूख होती है कि उसके लिखे को कोई पढ़े सराहे। अगर किसी लेखक को ढेर सारे पाठक मिलते हैं तो भले ही कमाई ना हो लेकिन वह उसी में संतुष्ट हो जाता है यह मेरा व्यक्तिगत विचार है जरूरी नहीं कि हर लेखक मेरे विचारों से सहमत हो।

अब मैं बात करती हूं अपने ब्लॉग और प्रतिलिपि की।

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मैं सच कहूं तो प्रतिलिपि की शुक्रगुजार हूं क्योंकि प्रतिलिपि ने ही मुझे वह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म दिया जहां आप सब से मेरी मुलाकात हो पाई। आज से ढाई साल पहले मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं लेखक भी बन सकती हूं । तब तक मैं सिर्फ और सिर्फ एक पाठक थी। प्रतिलिपि पर मैंने कभी कोई कहानी पढ़ कर लिखना नहीं सिखा। जैसा कि बाकी लेखक कहते हैं कि वह अपने शुरुआती दिनों में प्रतिलिपि पर पढ़ा करते थे और यही पढ़ते हुए उन के मन में लेखक बनने का विचार जागा। मैं बचपन से ही पाठक थी और वह भी जबरदस्त पाठक । पढ़ने का इस कदर शौक था कि मैं रोज घर पर आने वाले दोनों न्यूज़पेपर पूरे चट कर जाने के बाद सारे एडवर्टाइजमेंट और यहां तक कि निधन वाले कॉलम भी पढ़ लिया करती थी। जब कभी बचपन में मैं अपनी अलमारी जमाया करती तो कहीं भी अगर न्यूज़ पेपर बिछाने की पारी आती तो मैं उस पेपर को खोलकर घंटों तक पढ़ती रह जाती। मेरे इसी पढ़ने के शौक में जाने कितनी बार मेरी चाय के बर्तन को दूध की गंज को जला दिया। कॉलेज के दिनों में भी मेरा यही हाल था। संडे हमारा एक टाइम फीस्ट होने के कारण शाम के समय हमारा टिफिन नहीं आया करता था और तब पारी पारी से हम सहेलियां सबके लिए मेगी बनाया करती थी। जिस दिन मेरी पारी होती थी आप सोच ही सकते हैं कि मैं कितना बंटाधार करती रही होंगी। मैंगी चढ़ा कर वहीं खड़े-खड़े मैं कोई ना कोई किताब खोल कर पढ़ने लग जाया करती थी और मैगी की जलने की खुशबू सूंघकर मेरी सहेलियां दौड़कर रसोई में भागती थी कि आज फिर मैंने उनके डिनर को जला दिया।

पढ़ने के इतने जल्लादी शौक के बाद भी मुझे लेखन हमेशा से रॉकेट साइंस लगा करता था। मैं जब भी अपने पसंदीदा लेखकों को पढ़ती थी तो यही सोचती थी कि लिखना बहुत मेहनत का काम है। कैसे कोई लेखक इस कदर हमारी भावनाओं को अपने पन्नों पर उतार लेता है। और कैसे हम उसके लिखे को पढ़कर बिल्कुल वही महसूस करने लगते हैं। उसके लिखे शब्दों के साथ हंसते हैं और उसी के लिखे शब्दों को पढ़कर रोते हैं। ऐसा कैसे संभव हो सकता है? मेरे लिए लेखक हमेशा से परम श्रद्धेय थे अब भी हैं और हमेशा रहेंगे!

आप में से कई लोग बहुत बार यह सवाल भी कर चुके हैं कि मैं प्रतिलिपि पर इन लेखकों को पढ़ती हूं तो मैं आपको बताना चाहती हूं कि मैं जिम साहित्यकारों को पढ़कर बड़ी हुई हूं और जिनकी रचनाएं आज भी समय निकालकर पढ़ती हूं उनमें से प्रेमचंद शरतचंद्र ममता कालिया आदि के अलावा शायद ही किसी की रचना प्रतिलिपि पर मौजूद हो।

प्रतिलिपि पर आज के नए लेखकों की भरमार है और सभी बेहद खूबसूरत लिखते हैं। लेकिन इनमें से किसी को भी पढ़ने का अब तक सौभाग्य नहीं मिल पाया और इसका कारण उन लेखकों की कमी नहीं बल्कि मेरे पास वक्त की कमी है। जब थोड़ा सा समय मिलता है आप सभी के लिए कुछ ना कुछ लिखने की कोशिश करती हूं और इसी कोशिश में किन्ही भी नए लेखकों को नहीं पढ़ पाती हूँ।

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प्रतिलिपि पर जब से मोनेटाइजेशन शुरू हुआ लेखकों के बीच भी एक होड़ सी लग गई अपने सब्सक्राइबर्स बढ़ाने की होड । पर देखा जाए तो इस बात पर हम लेखकों का कोई कसूर भी नहीं आज तक निशुल्क लिखी रहे थे लेकिन जब कहानी पर कमाई का जरिया मिला है तो कोई भी क्यों छोड़ना चाहेगा।

इसके बाद बात शुरु हुई पाठकों की नाराजगी की । सब्सक्रिप्शन से हटाने के लिए लोगों ने इनबॉक्स में भूकंप ला दिया। पहले पहल मैंने भी सोचा कि मैं अपनी कहानियों को सब्सक्रिप्शन से हटा लूंगी लेकिन फिर यह महसूस हुआ कि अगर मैं ऐसा करती हूं तो मेरे साथ के बाकी लेखक ऐसा नहीं करते तो जाहिर सी बात है कि उनके ऊपर और भी ज्यादा दबाव डाला जाएगा कि देखिए उन्होंने तो अपनी कहानी से सब्सक्रिप्शन हटा लिया फिर आप क्यों इतना लालच कर रही हैं। जाहिर है यह कंपैरिजन नहीं होना चाहिए लेकिन होगा। अगर मैं सब्सक्रिप्शन हटाती हूं तो इसमें मेरे साथी लेखकों की तो कोई गलती नहीं है अगर वह अपनी कहानी उसे अपनी मेहनत से कोई कमाई करना चाहते हैं तो इसमें वह कोई गुनाह नहीं कर रहे बल्कि मैं पूरी तरह से उन सभी के सपोर्ट में हूं कि ऐसा करना ही चाहिए।

और इसीलिए मैंने अपनी कहानियों से सब्सक्रिप्शन नहीं हटाया। बल्कि बीच का यह रास्ता चुना कि मैं ब्लॉग पर भी अपनी कहानियां उसी समय पोस्ट कर सकूं। जिससे जो लोग सब्सक्रिप्शन लेकर नहीं पढ़ना चाहते वह मेरे ब्लॉग पर आकर उसी दिन निशुल्क उस कहानी को पढ़ सकते हैं।

इतना शानदार ऑफर देने के बावजूद अब तक बहुत से लोग प्रतिलिपि पर ही मुझे पढ़ना चाहते हैं । मैं उन पाठकों की इस बात को भी पूरी तरह समझती हूं मैं विज्ञान की विद्यार्थी हूं और अच्छे से जानती हूं कि मोमेंट ऑफ इनर्शिया यही होता है। जी हां इसे जड़त्व का नियम भी कहा जाता है इसका अर्थ है जब हम चलते रहते हैं तो हम चलना ही चाहते हैं रुकने के लिए हमारा शरीर हमारा विरोध करता है इसीलिए जब हम चलती हुई बस से उतरते हैं तो हम एकदम से स्थिर नहीं हो सकते हमें थोड़ी देर तक अपने शरीर को बस के साथ ही दौड़ आना पड़ता है या गति में रखना पड़ता है।

बस यही मोमेंट आफ इनर्शिया प्रतिलिपि पर पढ़ने वाले पाठकों के साथ भी हैं । उन्हें लगता है प्रतिलिपि पर पढ़ना आसान है। इसके अलावा कहीं भी और जाकर वह पढ़ना नहीं चाहते। मैं भी किसी पर दबाव नहीं बनाना चाहती लेकिन इसी कारण अब मुझ पर दबाव बढ़ने लग गया है । दो प्लेटफार्म पर एक साथ एक ही कहानियों को चलाना बेहद मुश्किल और तनाव भरा है। कब किस जगह पर कौन सी कहानी पोस्ट की थी। किस प्लेटफार्म पर अभी कहानी का अगला कौन सा भाग डालना है यह सब बहुत जटिल हो गया है।

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और इसीलिए अब यह सोचा है कि कुछ कहानियां सिर्फ अपने ब्लॉग पर ही लिखूंगी।

ब्लॉग पर लिखने से मुझे क्या फायदा है अब मैं उसके बारे में आप सभी को बताना चाहती हूं। पहली बात ब्लॉग पर आप सभी निशुल्क मुझे पढ़ सकते हैं दूसरी बात मेरे ब्लॉग पर अगर 1000 से ज्यादा फॉलोवर्स होते हैं तो वर्डप्रेस ब्लॉग मुझे मेरा ब्लॉग लिखने के लिए आप सब से कोई शुल्क लिए बिना मेरे अकाउंट को बिजनेस अकाउंट बना देता है और जिससे मुझे लाभ मिलता है। इसके अलावा मेरी कहानियों पर गूगल ऐड जो भी एडवर्टाइजमेंट डालता है उससे भी मुझे रेवेन्यू जेनरेट होता है यानी कि मेरी कमाई होती।

अब आप सोचिए कि ये आपके और मेरे दोनो के लाभ का सौदा है। आपको कुछ नहीं करना सिर्फ आकर मुझे पढ़ना है वह भी पूरी तरह से निशुल्क और उसके बदले मुझे गूगल से और वर्डप्रेस से पैसे दिए जाएंगे क्योंकि मेरा पेज बार-बार खोला जा रहा है और मेरे पेज पर एडवर्टाइजमेंट नजर आ रहे हैं।

क्योंकि यह मेरा पर्सनल ब्लॉग है और यह गूगल पर है तो इसलिए 1000 फॉलोअर्स से अधिक होने पर गूगल भी मुझे कुछ निश्चित राशि देना शुरू करेगा। मैं मानती हूं यह राशि बहुत कम है ।रेवेन्यू बहुत ज्यादा जनरेट नहीं होता लेकिन फिर भी मुझे मंजूर है। क्योंकि यहां मेरे पाठकों को मुझे पढ़ने के लिए कुछ भी खर्च करने की जरूरत नहीं है। लेकिन मुझे फायदा बढ़ाने के लिए आप यह जरूर कर सकते हैं कि मेरी कहानियों को आप अपनी सोशल अकाउंट पर शेयर कर सकते हैं। मेरे इस पेज यानी अनकहे किस्से को आप ज्यादा से ज्यादा अपने इंस्टाग्राम फेसबुक आदि अकाउंट पर शेयर कर सकते हैं। अगर आप सभी के फेसबुक पर 100 दोस्त भी हैं, और अगर उन्हें मेरी कहानी पढ़ना पसंद आता है ।तो वह मेरे ब्लॉग पर आकर मुझे फॉलो कर सकते हैं और इस तरह मेरे फॉलोवर्स की संख्या बढ़ सकती है। और साथ ही बढ़ सकते हैं मेरी रोजाना के व्यूज। आपको इस सम्बंध में कोई भी डाउट है तो आप समीक्षा में मुझसे खुल कर पूछ सकते हैं।

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वैसे यह आप सभी का प्यार ही था कि पहले महीने में ही मेरे ब्लॉग पर लगभग रोज के 1000 से ज्यादा व्यूज आने लग गए थे। लेकिन आप सभी को एक बार फिर अपना प्यार साबित करना पड़ेगा मेरे फॉलोवर्स बढ़ाने में और मेरे व्यूज बढ़ाने में सिर्फ आप सभी मेरी मदद कर सकते हैं।

प्रतिलिपि और मेरी मोहब्बत कितनी तगड़ी है यह तो आप सब जानते हैं । वहाँ पर ढेर सारे लेखक अपने कुकू एफएम पॉकेट एफएम के पोस्ट शेयर करते रहते हैं लेकिन उनसे प्रतिलिपि को कोई परेशानी नहीं है। और मैं ने जैसे ही अपने ब्लॉग के बारे में लिखा मुझे तुरंत नोटिस जारी कर दिया। इसलिए अब वहां मैं अपनी कोई पोस्ट शेयर नहीं कर सकती। हो सकता है कि कई पाठकों को शायद यह पता ही नहीं कि मैं अब मेरे ब्लॉग पर भी लिखती हूं तो दोस्तों हो सके तो आप सभी के सोशल अकाउंट पर मेरी कहानियों या मेरे पेज का प्रचार करने में मेरी मदद करें।

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बाकी तो आप सभी जानते हैं कि मैं संस्कारी बहुत हूं इसलिए पंगों से दूर ही रहती हूं। पर अब जाने क्यों आप सभी ब्लॉगर जो मेरे ब्लॉग पर मुझे फॉलो करते हैं से एक अलग से जुड़ाव हो गया है आप लोगों के सामने तो दिल खोल कर मैं अपनी भड़ास निकाल सकती हूं। तो बस मुझे दिवाली तक में 1000 फॉलोअर्स चाहिए और साथ ही चाहिए डेली के 2000 प्लस व्यूज भी।

वहां 22000 लोग फॉलो करते हैं पर पता नहीं क्यों फॉलो करते हैं। मेरी बात सुनते तो है नहीं पर चलो कोई नहीं। जो सुनते हैं वह लोग भी अगर मान गए तो भी बहुत बड़ी बात है।

एक और बात कहनी थी आप 297 फॉलोअर्स यहां मौजूद हैं। क्या आप सभी को मेरी हर पोस्ट की नोटिफिकेशन मिलती है। अगर आप लोगों को नोटिफिकेशन नहीं मिलती तो प्लीज प्लीज प्लीज मुझे इस पोस्ट पर मैसेज करके बताइए। मेरा टेलीग्राम चैनल और फेसबुक पेज की लिंक भी मैं आपसे शेयर करूंगी। आप हो सके तो मेरे फेसबुक पेज को भी फॉलो कर सकते हैं और टेलीग्राम चैनल को भी। जिससे मैं हर कहानी की पोस्ट का लिंक वहां शेयर कर सकूं।

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और अगर आप इतना सारा मेरे लिए करेंगे तो मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं नई नई अनोखी और अलग हटकर कहानियां आप लोगों के लिए सिर्फ आप लोगों के लिए अपने ब्लॉग पर लिखती रहूं।

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आप सभी की संस्कारी लेखिका

aparna…..

यूँ ही…

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एक तारा भी नज़र आता नही मुम्बई के आसमान पर

यूँ कहने को मुम्बई सितारों की नगरी है…..

aparna ..

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खुरापातें….

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Son :- मॉमा s e r लिखुँ या s r e ? सर की स्पेलिंग के लिए?

मॉम:- sir …..😡😡😡

#online classes rocks

#kids rockstars…

Originally mine u can share it…😂😂

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aparna …

कुछ खुरापातें…

She posted a ‘roti aloo ki sbji and dal ki thali ” photo on her wall and wrote …

Friday lunch….

खुरापाती ख्याल आया कि लिख दूँ

–चल finally तुझे खाना तो मिला।

पर मन की मन में रह गयी,नही लिख पायी, संस्कार बहुत है न मुझमें।

Next day she again posted her photo and wrote .. gain half kg after eating my favorite panipuri…

एक और खुरापात आई दिमाग में …

अच्छा हुआ बहन कुछ तो गेन किया वरना जिस ढंग से तू डाइट कर के पतली हो रही है, यूनेस्को वाले तुझे देख हमारे यहाँ अकाल न घोषित कर दें।

पर कह नही पायी क्योंकि संस्कार बहुत है ना मुझमें।

ओ स्त्री!!!

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पुरुष के मन मस्तिष्क
शब्द हृदय
हर जगह छाई हो।
ओ स्त्री!!!
तुम कहाँ से आई हो?

वो कहता है
मैंने तुझे पंख दिए।
परवाज़ दिए
उड़ लो, जितना मैं चाहूं
ओ स्त्री !!!
क्या तुम उसकी मोहताज हो?

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उसका घरौंदा बनाया
तिनका तिनका सजाया
पर जब वक्त आया तुम्हारा
उसने तुम्हें
अपने पैरों पे गिराया
ओ स्त्री!!!
तुम कैसे उसकी सरताज हो?

वो बेबाक है बिंदास है
जो जी में आये
करने को आज़ाद है
कूबत तो तुम्हारी भी है
फिर
ओ स्त्री!!!
तुम क्यों हर मर्तबा
झुकने को तैयार हो?

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कभी ये ना पहनो
का अधिकार
कभी ऐसे न बोलो
का अहंकार
पर हर दफा उसकी
सुन कर चुप
रह जाने वाली
ओ स्त्री!!!
तुम खुद में एक अंगार हो

क्यों जानती नही,
तुम खुद को मानती नही
वो ‘मैं’ में अड़ा रहता है,
क्यों  पहचानती नही?
तुम खुद को घोल घोल
ज़िन्दगी को पी गयी
ओ स्त्री !!!
तुम स्वयं एक संसार हो…

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  To be continued …..

आप सब चाहें तो मेरी इस रचना को अपने शब्दों से सजा कर आगे बढ़ा सकतें हैं…. ” ओ स्त्री!!”
  बिंदास लिखिए
   बेबाक लिखिए..

  क्योंकि..
कलम को जितना चला लो ये शिकायत नही करती…

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aparna…


लड़कियाँ

आंसूओं को छिपाने के लिए

जबरन मुस्कुराती लड़कियाँ….

दिल के दर्द को, बस यूं ही

हंसी में उड़ाती लड़कियाँ…

दिन भर खट कर पिस कर

तुम करती क्या हो सुन कर भी

चुप रह जाने वाली लड़कियां

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बाप की खुशी के लिए

अपना प्यार ठुकराती लड़कियां….

भाई की सम्पन्नता के लिए

जायदाद से मुहँ मोड़ जाती लड़कियां….

पति के सम्मान के लिए

अपना घर द्वार खुशी छोड़ जाती लड़कियां….

बच्चों को बढ़ाने के लिए

ऊंची नौकरी को लात मार जाती लड़कियां…

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डूबते से संसार की

अजूबी सी ये लड़कियां

जाने कब किस जगह इनकी मुस्काने

छिन जाएंगी…

उन बेपरवाह हंसी के गुब्बारों से

खुद को सजाती ये लड़कियां….

इन लड़कियों का जहान कुछ अलग सा होता है

इतनी आसानी से कैसे समझ पाओगे इन्हें

की क्या होती हैं ये लड़कियां!!!

aparna …

मैं मैं हूँ!! जब तक तुम तुम हो!

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मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

तुमसे सारे रंग रंगीले
तुमसे सारे साज सजीले,
नैनों की सब धूप छाँव तुम,
होठों की मुस्कान तुम ही हो।
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

तुमसे प्रीत के सारे मौसम
तुमसे सूत,तुम ही से रेशम
तुमसे लाली,तुमसे कंगन,
मन उपवन के राग तुम ही हो
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

जीवन का यह सार तुम्हारा,
मेरा सब संसार तुम्हारा,
गुण अवगुण मेरे सब जानो,
मुझमे बसे मेरे प्राण तुम ही हो।
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !।।

शुभकामनाएं … हिंदी दिवस की

महादेवी वर्मा

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जो तुम आ जाते एक बार

जो तुम आ जाते एक बार

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग

आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार

हँस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग

आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार

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जब तुम बूढ़े हो जाओगे…..

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मैं बन जाऊंगी फिर मरहम
वक्त के ज़ख्मों पर तेरे और
मुझे देख हौले हौले से
फिर तुम थोडा शरमाओगे।
जब तुम बूढे हो जाओगे।।

सुबह सवेरे ऐनक ढूंड
कानों पे मै खुद ही दूंगी ,
अखबारों से झांक लगा के
तुम धीरे से मुस्काओगे।
जब तुम बूढे हो जाओगे ।।

दवा का डिब्बा तुमसे पहले
मै तुम तक पहुँचा जाऊंगी,
मुझे देख फिर तुम खुद पे
पहले से ही इतरा जाओगे।
जब तुम बूढे हो जाओगे।।

सुनो नही बदलेगा कुछ भी
हम भी नही और प्रीत नही
हम तुम संग चलेंगे  ऐसे
की तुम फिर लहरा जाओगे
जब तुम बुढे हो जाओगे।।

मैं तो ऐसी थी,ऐसी हूँ ,
ऐसी ही मैं रह जाऊँगी,
मेरे मन के बचपने से
तुम भी संग इठला जाओगे
जब तुम बूढ़े हो जाओगे।।

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मुझसी मिली है तुमको जग मे,
सोच के खुश हो रहना तुम,
फिर अपनी किस्मत पे खुद ही
धीरे धीरे इतराओगे
जब तुम बूढ़े हो जाओगे।।

aparna …….

फ़िल्म समीक्षा- माचिस

movie review

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पानी पानी रे

   सुबह सुबह खिड़की पर खड़ी थी कि एक गीत फ़िल्म माचिस का सुनाई पड़ा, और पानी पानी रे याद दिला गया।
    गीत गुलज़ार साहब ने लिखा है और विशाल भारद्वाज के संगीत को लता जी ने इस कदर खूबसूरती से गाया है कि सुनते वक्त ये गीत आपको एक अलग ही रूहानी दुनिया में ले जाता है।

     स्कूल में थे बहुत छोटे तब ये मूवी आयी थी और मैंने देखी भी थी लेकिन सच कहूं तो समझ में नही आई थी, बिल्कुल भी नही।
    बहुत बाद में कभी आधी अधूरी सी देखी तो जो सार समझ आया वो ये की आज का हो या बीते समय का युवा हमेशा माचिस की तीली सा होता है जो एक चिंगारी से ही सुलग उठता है।

    एक आम आदमी कृपाल के आतंकवादी बनने की कहानी है माचिस।
     उसके गांव में किसी सासंद को मारने की असफल कोशिश कर भागे जिमी को ढूंढने आयी पुलिस को जसवंत सिंह( राज जुत्शी) का मज़ाक में अपने कुत्ते जिमी से मिलवाना इतना अखर जाता है कि वो उसे अपने साथ थाने ले जाते हैं और 15 दिन बाद मार पीट के वापस छोड़ देते हैं। उसकी हालत से दुखी और नाराज़ उसका दोस्त कृपाल जब किसी सरकारी महकमे से मदद नही पाता तब अपने चचेरे भाई जीत जो किसी आतंकवादी संगठन का हिस्सा है की तलाश में निकल जाता है और सनाथन ( ओम पुरी ) से टकरा जाता है, यहां से उसका सफर शुरू होता है। सनाथन उसे कमांडर से मिलवाता है जहाँ कृपाल की कहानी सुनने के बाद कमांडर उसे खुद अपना बदला लेने की सलाह देता है।

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    उस संगठन को परिवार मान कृपाल ट्रेनिंग लेने के बाद भरे बाज़ार में खुराना ( पुलिस वाले) पर गोली चला देता है।
   अगली कार्ययोजना के लिए जिस मिसाइल लॉन्चर का इंतज़ार किया जा रहा होता है वो होती है वीरा( तब्बू)
    वीरा कृपाल की मंगेतर और जसवंत की बहन होती है।
     कृपाल से मिलने पर बताती है कि पुलिस वाले खुराना को कृपाल के द्वारा मारने के बाद पुलिस एक बार फिर जसवंत को पकड़ कर ले गयी और वहाँ पुलिस के टॉर्चर से तंग आकर उसने आत्महत्या कर ली। उसकी मौत की खबर नही सहन कर पाने से वीरा की माँ भी चल बसी , बार बार पुलिस के घर आने से परेशान वीरा भी कृपाल के रास्ते चल पड़ती है।
   कृपाल और वीरा दो प्यार में डूबे दिलों के मिलन पर फिल्माया यह गीत बहुत खाली सा लगता है…
     गीत की पंक्तियां ..

    ये रुदाली जैसी रातें जगरातों में बिता देना
   मेरी आँखों में जो बोले मीठे पाखी को उड़ा देना
         बर्फों में लगे मौसम पिघले
             मौसम हरे कर जा
             नींदें खाली कर जा..

   पानी से गुहार लगाती नायिका की मौसम हरे कर जा और नींदे खाली कर जा … सहज ही अपनी उदासी अकेलापन और अपने साथ हुए अत्याचारों की तरफ ध्यान ले जाती है।
     कितना अकेलापन झेला होगा जब नायिका ने इन पंक्तियों को गाया होगा…..

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       एक गांव आएगा, मेरा घर आएगा…
       जा मेरे घर जा, नींदे खाली कर जा…

    इसके बाद नायक नायिका चुपके से शादी करने का फैसला कर लेते हैं।
    बहुत सारी घटनाएं घटती चली जातीं है…. नायक को कमांडर की तरफ से सासंद को मारने का काम दिया जाता है।
   उसके कुछ पहले ही वीरा कृपाल के पास से उसकी सायनाइड चुरा कर रख लेती है।
   ( यही वो सीन था जहाँ से मुझे सायनाइड का महत्व पता चला था कि उसे निगल कर मौत को गले लगाया जा सकता है)
    कृपाल का प्लान फेल हो जाता है और वो पुलिस के द्वारा पकड़ लिया जाता है।
   यहाँ फिर बहुत कुछ होता घटता जाता है। वीरा के हाथ से सनातन मारा जाता है।
   वो बड़ी मुश्किल से कृपाल से मिलने पहुंचती है और सबसे छिपा कर उसके हाथ में उसका सायनाइड रख कर वहाँ से बाहर निकल कर अपना सायनाइड भी खा लेती है।

    कहानी बहुत ही ज्यादा  ब्लैक थी। दुख अवसाद त्रासदी आंसूओं से भरी हुई लेकिन एक गहरी छाप छोड़ जाती है।
   जैसा कि मैं कोई समीक्षक तो हूँ नही इसलिए टेक्निकल कुछ नही कह सकती लेकिन गुलज़ार साहब की लिखी कहानी सीधे दिलों में उतर जाती है।
   सारे किरदार अपना पार्ट बखूबी निभाते हैं।।
जिम्मी शेरगिल की शायद पहली ही फ़िल्म थी , और वो अपनी छाप छोड़ने में सफल भी रहे।

   तब्बू तो बेस्ट हैं ही।

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पूरी फिल्म में मुझे सबसे ज्यादा पसंद आये फ़िल्म के गीत!
   
    चप्पा चप्पा चरखा चले हो या
    छोड़ आये हम वो गलियां या फिर
      पानी पानी रे।
  
  लेकिन सबसे खूबसूरत गीत था…

   तुम गए सब गया
   कोई अपनी ही मिट्टी तले
    दब गया…

   गुलज़ार साहब के शब्दों का जादू सभी उनके चाहने वालों के सर चढ़ कर बोलता है।

    अगली समीक्षा या चीर फाड़ अपने किसी पसंदीदा गीत की करने की कोशिश रहेगी।
   तब तक सुनते रहिए…

    पानी पानी इन पहाड़ो के ढलानों से उतर जाना
    धुंआ धुंआ कुछ वादियां भी आएंगी गुज़र जाना।
    एक गांव आएगा, मेरा घर आएगा..
    जा मेरे घर जा, नींदे खाली कर जा..
    पानी पानी रे, खारे पानी रे…

  aparna….

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मैं हूँ…..

मैं खुशबू से भरी हवा हूँ
मै बहता जिद्दी झरना हूँ
कठिन आंच मे तप के बना जो
मै ऐसा सुन्दर गहना हूँ ।।

छोटा दिखता आसमान भी,
मेरे हौसलों की उड़ान पे,
रातें भी जो बुनना चाहे,
मैं ऐसा न्यारा सपना हूँ ।।

हरा गुलाबी नीला पीला
मुझसे हर एक रंग सजा है,
इन्द्रधनुष भी फीका लगता
प्रकृति की ऐसी रचना हूं ।।

मैं हूँ पत्नी ,मै हूँ प्रेयसी
मै हूँ  बेटी, मै ही बहू भी,
तुझको जीवन देने वाली
मै ही माँ,मै ही बहना हूं ।।

मैं हूँ मीठी धूप सुहानी,
मैं ही भीगी सी बयार भी,
मुझमें डूब के सब कुछ पा ले,
मै ऐसा अमृत झरना हूं ।।।

अपर्णा ।

ओ स्त्री: कभी खुद को भी जिया करो……..

जल्द आ रही है, मेरे ब्लॉग पर !!

बेबात की बात:–

ये जो बात बात पर लोग स्टेटस अपडेट करतें हैं ना, बेबात की बात है….         सारी ज्ञान की बातें सोशल मीडिया पर बहातें हैं ना, बेबात की बात है…..      वक्त पड़ने पर वहीं बांटा ज्ञान भूल जातें हैं , बेबात की बात है…..   आजकल तो पोहा भी बनाये लड़कियाँ तो ऐसे स्टेटस अपडेट करेंगी जैसे उदयपुर की राजकुमारी हों और पहली बार अपने महल के खानसामा के हाथ से कलछी छीन कर कुछ बनाया हो, देखा जाए तो ये सबसे बड़ी बेबात की बात है…. अजूबी हेयरस्टाइल हो या नया हेयरकट, कोई डिश हो या नए जूते हर बात की अपडेट उफ्फ कतई बेबात की बात है….  तो दोस्तों आपस में स्टेटस का आदान प्रदान नही बल्कि बातें करों क्योंकि यही बातें आगे यादें बनने वालीं है बेबात की बात तो हर कोई भूल ही जायेगा….