समिधा- 34

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    समिधा – 34

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    अगले दिन से हवन पूजन शुरू हो गया। ढेर सारे आचार्य अलग अलग वेदियों पर बैठे एक साथ हवन कर रहे थे।
   हवन में डालने वाली समिधा और सामग्री की तैयारियों में आश्रम की महिलाएं और लड़के लगे हुए थे।
   एक तरफ मंदिर के प्रमुख आचार्य माइक पर मंत्र बोलते जा रहे थे। इस कार्यक्रम के लिए मंदिर भक्तों के लिए बंद रखा गया था।
   पूरा आश्रम परिसर विशुद्ध घृत और गुग्गुल की मिली जुली खुशबू से गमक रहा था।
  
       प्रबोधानन्द आंखें बंद किये आव्हान कर रहे थे। आचमन के बाद उन्होंने शिखाबन्धन कर भूमि और कलश पूजा सम्पन्न की और हवन शुरू हुआ। वरुण दूसरे कुंड में बैठा था पर उसकी आंखें प्रबोधानन्द पर ही थी।
   महिलाओं को इधर उधर कार्यो में व्यस्त देख प्रबोधानन्द की आंखें कल की दिखी अप्सराओं सी सुंदर कमनीय सी उस लड़की को ढूंढ रहीं थीं कि आखिर उनकी आंखों ने पारो को देख ही लिया।
    बनाने वाले ने कितनी फुरसत से बनाया था। बिना किसी साजश्रृंगार के भी वो अपरूप सुंदरी थी। खुला हुआ सा रंग जो परिश्रम की अधिकता से थोड़ा दबा सा लगने लगा था। लंबे काले बालों को उसने बेतरतीबी से जुड़े का रूप दे रखा था। जिनमें से कुछ ज़िद्दी लटें हवा से इठलाती उसके चेहरे पर उड़ कर आती जा रहीं थी। काली भंवर सी पलकें जो ज़रा ऊपर को घूमी हुई थीं उन्हें वो जब सहम कर झपकाती तो उसे देखने वाला उन्हीं आंखों के भंवर में डूब जाता।
प्रबोधानन्द को भान ही नही रहा की दीन दुनिया से बेखबर वो उसे आंखों ही आंखों में पीते जा रहे थे। परिश्रम की अधिकता से माथे पर चमकती बूंदे उसके चेहरे को एक अलग लुनाई से रंगे थी। वो पद्मजा दीदी की बातें सुनती यहाँ से वहाँ सामान सजाती जा रही थी।
    प्रबोधानन्द ने अपने साथ बैठें आचार्य के कानों में कुछ कहा और उसके बाद उन गुरुवर ने वहाँ कार्यरत महिलाओं को भी हवन में बैठने बुला लिया।
  सभी औरतें इधर उधर बैठने लगी कि प्रबोधानन्द का धैर्य चूक गया और उन्होंने हाथ उठा कर पारो को आवाज़ लगा दी..-“आप यहाँ आ जाइये। ” पारो ने चौन्क कर उनकी तरफ देखा और आगे बढ़ने लगी। प्रबोधानन्द हवन पर सामने की तरफ बैठे थे। उन्होंने अपने ठीक बाजू में बैठे युवक को कुछ लेने उसी समय भेज दिया जब पारो उनके पास पहुंची और पारो को हाथ के इशारे से अपने ठीक पास में स्थित खाली जगह की ओर इशारा कर दिया।
   पारो सकुचाती सी आगे बढ़ी, और झुक कर बैठने को थी कि लपक कर वरुण वहाँ बैठ गया। वरुण के पास ही एक और गुरुवर थे उन्होंने वरुण के बैठते ही ज़रा सरक कर पारो के लिए जगह बना दी…;” आओ बहन ! यहाँ बैठ जाओ।”
   उन गुरुवर की बात सुन पारो वरुण और उनके बीच की जगह पर सिमट कर बैठ गयी।
  गुरुवर और वरुण ने पारो से उचित दूरी बनाए रखी थी,लेकिन वरुण के कारण पारो प्रबोधानन्द के पास नही बैठ पायी थी और इस बात से नाराज़ प्रबोधानन्द ने एक नज़र वरुण पर डाली और फिर अग्नि से उठती लपटें देखने लगे।
  पारो के वहाँ बैठते ही तीन चार महिलाएँ भी उसके पास आ बैठी ।
     लपटों के बीच रह रह कर प्रबोधानन्द की आंखें उन लपटों के ठीक पीछे बैठी पारो पर फिसलती चली जा रही थी।
    अग्नि की चंचलता

प्रबोधानन्द के अंदर एक तृष्णा को जगाती चली गयी….

हवन सम्पन्न होने के साथ बाकी कार्यक्रम शुरू हो गए। मंदिर दर्शनार्थियो के लिए खुल गया।लोगों की आवाजाही बढ़ने से मंदिर में एकाएक भीड़ बढ़ गयी।
   दोपहर बाद प्रसाद वितरण होने के साथ ही आचार्यों और गुरुजनों का भोजन प्रारम्भ हो गया।
    कुछ महिलाएं जहाँ रसोई में लगातार भोजन पकाने में लगीं थीं वहीं नई उम्र की लड़कियों को दौडाभागी वाला काम सौंपा गया था। वो लोग भोजन परोसने में लगी थीं।
   पारो भी यहाँ से वहाँ भोजन परोस रही थी। प्रबोधानन्द ने अपने कमरे में ही खाने की इच्छा जताई और अपने कक्ष की ओर बढ़ गए। उन्होंने अपने कमरे में जाने से पहले जिन आचार्य से बात की थी वो पारो के पास चले आये…-” बहन जी आप ये फल और दूध प्रबोधानन्द जी के कमरे में पहुंचा दें, उनका आदेश है कि आप ही लेकर जाएं।”
” लेकिन मैं ही क्यों?”
” बस जाते हुए उनकी दृष्टि आप पर ही पड़ी होगी इसलिए आपका नाम ले लिया। बड़े लोग हर कार्य प्रयोजन से करतें हैं बहन। आपको गुरुवर की सेवा का मौका मिला है मत छोड़िए। उनकी सेवा साक्षात गोपाल जी की सेवा है।”
   नही कभी नही, किसी इंसान की सेवा गोपाल जी की सेवा कैसे हो सकती है जब तक वो व्यक्ति रोग ज़रा या आयु से पीड़ित न हो।
  मन में उफनते विचारों को विराम दे पारो फल और दूध हाथ में लिए आगे बढ़ गयी।
वो कमरे में दाखिल होने वाली थी कि वरुण बाहर दरवाज़े पर ही उससे टकरा गया…-” ज़रा रुकिए।”
  पारो ने आँख उठा कर उसे देखा और जैसे चौन्क उठी।
  इन भावपूर्ण आंखों को, इस लजीली सी चितवन को कहीं देखा है। पर कहाँ? वो सोच में पड़ गयी कि आखिर कहां देखा है उसने। यह तो याद आ रहा था कि उसने वरुण को कहीं देखा है लेकिन बहुत जोर देने पर भी वह वरुण के चेहरे को याद नहीं कर पा रही थी।  या शायद मन से इतना दुखी थी कि उसका दिमाग उस तरफ काम ही नहीं कर पा रहा था।
  वरुण ने उसके हाथ से फलों की तश्तरी ले ली… “आप मेरे पीछे अंदर आइएगा, और सुनिए आप आगे अपने स्कूल की पढ़ाई पढ़ना चाहती है ना?”
पारो आश्चर्य से वरुण का चेहरा देखने लगी उसे अचानक से समझ में नहीं आया कि आश्रम के यह गुरुवर उससे उसकी पढ़ाई लिखाई के बारे में क्यों पूछ रहे हैं?  तभी उसे याद आया कि उस दिन दर्शन जब उसे किताबें देने आया था तब यह वहां से निकल रहे थे और दर्शन को देख कर रुक गए थे।
   पारो एक बार फिर सोच में पड़ गई कि शायद उसी समय उसने इन्हें देखा था और इसीलिए यह चेहरा उसे इतना पहचाना हुआ सा लग रहा था। लेकिन उस दिन तो इन्हें उसने शरमाते हुए नहीं देखा था , तो फिर क्यों उसे बार-बार इस चेहरे में एक शर्मिला सा प्रेमी नजर आ रहा था। वह अपनी सोच पर ही लजा गयी और वापस नीचे देखने लगी।
” आप मेरी बात सुन रही है ना मैं यह पूछ रहा हूं कि क्या आप अपनी आगे की पढ़ाई करना चाहती हैं? हां या ना में मुझे तुरंत जवाब दीजिए।”
” हां करना तो चाहती हूं लेकिन…
बहुत संकोच से पारो अपनी बात कहना शुरू कर ही रही थी कि वरुण ने उसकी बात आधे में ही काट दी…-” लेकिन किंतु परंतु कि अब कोई चर्चा नहीं होगी। आप पढ़ना चाहती हैं, यही बहुत है। आपकी तरह इस आश्रम में और भी औरतें होंगी जो पढ़ना लिखना या और भी कुछ सीखना चाहती होंगी। मैं आप सभी के लिए प्रबोधानंद जी से बात करना चाहता हूं। और इसके लिए आपको मेरा साथ देना होगा मेरे साथ साथ ही आप अंदर आइएगा।”
  “हां” में सिर हिला कर पारो वरुण के पीछे हो गई! वरुण ने कमरे के बाहर से पारो को आवाज लगाने को कहा और चुप खड़ा हो गया पारो ने अपनी मीठी सी आवाज में अंदर आने की अनुमति मांगी।
    अंदर बैठे प्रबोधानन्द की बांछे खिल उठी…
” आओ निसंकोच भीतर चली आओ।”
  प्रबोधानंद जी का आग्रह सुनते ही वरुण मुस्कुराते हुए भीतर दाखिल हो गया।
   अपने आसन पर अधलेटे से प्रबोधानंद वरुण को अचानक कमरे में आया देख चौंक कर सीधे बैठ गए। और आंखें फाड़े उसे देखने लगे। वह अभी उससे कुछ कहते कि तभी वरुण के पीछे उसकी अनुगामिनी सी पारो भी चली आई।
    पारो को देख उनकी आंखों में कुछ ठंडक जागी की तभी वरुण की गहरी सी आवाज़ उनके कानों को चीरती उनके सुकून को छीन गयी…-“गुरुवर आपकी आज्ञा हो तो ये आपसे कुछ कहना चाहती हैं।”
” हॉं हाँ ! क्यों नही, कहिये आप क्या कहना चाहती हैं?”
पारो के मन में वैसे तो कभी कोई डर या संशय नही रहा था लेकिन देव का अचानक उसकी जिंदगी में आना और फिर अचानक ही चले जाना उसे इस कदर भीतर से तोड़ गया था, कि उसका पूरा व्यक्तित्व ही बदल गया था। पहले की स्पष्टवादी पारो अब शांत और गंभीर हो गई थी। वरुण के इस तरह अचानक कह देने से उसे कुछ समझ नहीं आया और वह हड़बड़ा गई।
  उसके भोलेपन को देख प्रबोधानंद का हृदय एक बार फिर उछल कर उनके मुंह तक आ गया….-” आप यहां आ जाइए। यहां बैठिये और आराम से बताइए कि आप क्या चाहती हैं?”
   एक बार फिर उन्होंने पारो के लिए अपने बहुत पास का आसन दिखाया। पारो संकोच से गड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी कि वरुण फिर जाकर वहां बैठ गया। और पारो के लिए एक दूसरा आसन दिखा दिया। प्रबोधानंद कुछ समझ कर वरुण से बोल पाते कि उसके पहले ही वरुण ने बोलना शुरू कर दिया…-” गुरुवर इनके साथ नियति ने बहुत गलत किया है। यह हमेशा से शिक्षा प्राप्त करना चाहती थी, लेकिन भाग्य ने कुछ ऐसा पलटा खाया कि यह अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाई।

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  यहां आश्रम के नियमों से आप भी भलीभांति परिचित हैं यहां सदियों से जो नियम बन चुके हैं उन्हें बदलना आसान नहीं है। यहां पर जितनी भी महिलाएं उपस्थित हैं उनकी आजीविका के लिए या उनके समय काटने के लिए किसी भी तरह का कोई प्रबंध नहीं है। मेरा बस यह मानना है गुरुदेव की यह सब भी तो हमारी तरह ही कृष्ण भक्त हैं। तो जब हम पुरुषों को वेद अध्ययन करने का अवसर दिया जाता है, तो इन महिलाओं को उसी अवसर से वंचित क्यों रखा जाता है? आप ज्ञानी हैं! आप स्वामी हैं! आचार्य हैं ! आचार्य शिरोमणि है।
   अगर आप चाहें तो हर असंभव कार्य को संभव कर सकते हैं। मुझे आपको देखते ही यह अनुभूति होने लगी थी कि आप सब कुछ संभव करने योग्य हैं।
   यह बालिका अंतर्मन से शिक्षा के लिए इच्छित है।
  गुरुवर ऐसी एकाध बालिका या महिला नहीं है इनकी संख्या बहुत है जो आश्रम से बाहर निकल कर भी कार्य करना चाहती हैं। कुछ जो कम उम्र की बालिकाएं हैं उन्हें स्कूल की शिक्षा फिर आगे कॉलेज की शिक्षा अगर हमारा आश्रम दिलवा सके, तो यह बहुत बड़ी कृपा होगी आपकी इन सभी पर।
  इसके अलावा जो ऐसी महिलाएं हैं जिन्हें सिलाई कढ़ाई बुनाई आदि कार्यों में रुचि है उनके लिए अगर हम आश्रम में ही किन्ही विशेषज्ञों की नियुक्ति करके उन्हें इन कार्यों में पारंगत कर सकें तो वे आपका आभार जीवन भर नहीं भूल सकेंगी।
   मैं यह नहीं कह रहा कि हमारे आश्रम के गुरुवर या आचार्य वर महिलाओं के लिए सचेत नहीं है या उनके लिए नहीं सोचते लेकिन शायद हमारे यहां का नियम है ऐसा है कि भगिनी आश्रम की महिलाएं स्वयं अपने लिए नहीं सोचती ना यह महिलाएं अपने खाने-पीने का विचार करती हैं और ना ही अपने रहने का। मैं बस यह जानना चाहता हूं गुरुवर कि जब उसी मुरलीधर ने आपकी और मेरी सृष्टि की तो क्या उस मुरलीधर ने इन लोगों को नहीं रचा? आखिर उन्हीं की ही तो रचना यह सब भी हैं! तो फिर हम इन्हें इनकी मौलिक आवश्यकताओं और मौलिक अधिकारों से वंचित करने वाले कौन होते हैं ? यही सारी बातें बाकी आचार्य और गुरुवरो से भी कर सकता था, लेकिन जाने क्यों आपके चेहरे का तेज देख कर मुझे ऐसा लगा कि आप ही हैं जो मेरी इस समस्या को सुलझा सकते हैं। आप खुद देख रहे हैं कि यह मेरी व्यक्तिगत समस्या नहीं है। यह मेरी समस्या भगिनी आश्रम से जुड़ी है। अगर आपकी कृपा दृष्टि हो गई तो भगिनी आश्रम की महिलाएं भी अपने जीवन को सार्थक कर पाएंगी, उनके जीवन में आगे जितना भी समय शेष है वह आपका नाम लेकर खुशी से व्यतीत कर पाएंगी।

” तुम्हारा नाम क्या है? ” वरुण की बातें सुन प्रबोधानंद उसके बारे में जानने से अपने आप को रोक नहीं पाए। वरुण ने ऐसी लच्छेदार बातें बनाई थी, कि प्रबोधनंद अगर पीछे हटते तो पारो के सामने उनकी छवि धूमिल होने का खतरा था ….और अगर हां बोल देते हैं तो उन्हें भगिनी आश्रम की महिलाओं के लिए एक अलग से व्यवस्था करनी पड़ती। लेकिन अब वह वरुण की बातों में इस तरह फंस चुके थे कि उनके पास और कोई चारा नहीं बचा था।
” जी वरुण नाम है मेरा वरुण देव।”
जाने किस मानसिक अवस्था में वरुण के मुंह से अपना पूरा नाम वरुण देव निकला जबकि आज तक उसके मन में कभी यह भाव नहीं आया था कि उसका पूरा नाम क्या है? वह सदा से अपना नाम वरुण ही लेता आया था। लेकिन आज जाने कैसा चमत्कार हुआ था कि वह प्रबोधानंद जी के सामने बोलता ही चला गया। ऐसी प्रगल्भता और वाचालता तो उसके अंदर कभी थी ही नहीं।  वह तो बहुत शांत और सौम्य था। और इसीलिए तो वह देव का इतना अनुरागी हो गया था। क्योंकि देव ऐसा ही था । अगर उसने कुछ करने की ठान ली तो अपने उस कार्य को पूरा करने के लिए वह किसी ना किसी तरीके से मार्ग बना ही लिया करता था।
    वरुण सोच में पड़ गया कि आज उसके साथ क्या हो गया था ? अचानक उसे कुछ देर के लिए लगा जैसे उसके अंदर से देव निकल कर बाहर आ गया!  और पारो की शिक्षा के लिए प्रबोधनंद के सामने सीना ताने खड़ा हो गया था।
  खैर जो भी हुआ हो लेकिन वरुण अपने अंदर के इस परिवर्तन से खुश था संतुष्ट था क्योंकि आज तक वह हमेशा यही सोचता आया था कि वह बहुत दबा छुपा सा  है।  और अपने मन की वह चाह कर भी ना बोल पाता है ना कर पाता है। लेकिन आज पहली बार शायद पारो का चेहरा देखकर उसके मन के अंदर से आवाज आई कि ‘जो भी हो वरुण लेकिन तुझे इस लड़की को इस के सपनों को पूरा करना ही है।’

” ठीक है वरुण देव हम अभी दो दिन और आपके आश्रम में हैं। हमारे यहां रहते तक में आप इन के आश्रम की महिलाओं की संख्या और कितनी महिलाएं शिक्षित होना चाहती हैं? कितनी महिलाएं क्या सीखना चाहती हैं? क्या पढ़ना चाहती हैं? इसकी संख्या से हमें अवगत कराइए। हम यहां से जाने से पहले इनका कोई ना कोई समाधान करके जाएंगे। “
 
   प्रबोधानंद की आंखें एक बार फिर पारो पर जाकर अटक गई। इस बार पारो ने भी महसूस किया कि सामने बैठे उस आदमी की आंखें उस पर बुरी तरह से फिसल रही हैं।  ऐसा महसूस होते ही पारो वहां से उठ खड़ी हुई।
   उसे उठते देख वरुण भी खड़ा हो गया उसने झुककर प्रबोधानंद को प्रणाम किया और पारो की ओट बनाकर उसे आगे बढ़ने को कहा। पारो कमरे से बाहर निकल गई वरुण जैसे ही कमरे के बाहर आया उसने देखा परेशान सी पारो एक तरफ आगे बढ़कर सीढ़ियों पर बैठी हुई थी। वरुण भी उसके पास पहुंच गया….” क्या हुआ किसी बात से आप परेशान है क्या? क्या मुझे वहां पर आपकी शिक्षा के बारे में बात नहीं करनी चाहिए थी?”
“नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं!  मैं आपके कारण परेशान नहीं हूं।”
“फिर क्या बात हो गई ? आप चाहें तो मुझ पर विश्वास कर सकती हैं मुझे बता सकती हैं।”
  “आप पर अविश्वास का कोई सवाल ही नहीं उठता?  लेकिन जाने क्यों आजकल संसार से ही विश्वास उठ गया है। मुझे समझ में नहीं आता कि मेरा चित्त ही इतना व्याकुल है कि मुझे हर किसी पर शक होने लगता है। “
वरुण समझ गया के पारो ने भी प्रबोधनंद की दृष्टि पहचान ली थी।
   आखिर वो भी तो औरत ही थी, और औरत तो अपने पीठ पीछे भी पड़ने वाली नज़र को पकड़ने की क्षमता रखती थी।
   पारो को वो क्या दिलासा देता , वो तो खुद रात को लेकर चिंतित था। अभी तो सुबह से वो पारो के पीछे साये सा घूम रहा था लेकिन रात में तो वो भगिनी आश्रम के सामने गार्ड बन कर नही बैठ सकता था। और जाने क्यों उसे प्रबोधानन्द की आंखें देख खुद भी डर सा लग रहा था।
   उसे वाकई पारो की चिंता सताने लगी थी, और बार बार मन में ये आ रहा था की किसी तरह वो उसे यहाँ सब से छिपा कर रख पाता। अपने मन के कष्ट को छिपा कर उसने उसे ढाँढस बंधाया….
” आप घबराइए नही। मेरे रहते यहाँ आपको कोई परेशान नही कर सकता।”
   पारो उसकी तरफ देखने लगी, ,उसी समय प्रशांत भी वहाँ चला आया…-” वरुण बाहर कोई तुमसे मिलने आये हैं।”
” मुझसे मिलने ? लेकिन कौन आया है?”
” मालूम नही। मंदिर दर्शन के बाद ऑफिस में जाकर तुम्हारे लिए पूछताछ कर रहे थे तो उदयाचार्य जी ने मुझे बुला कर तुम्हें बताने कहा है।”
” ठीक है मैं देखता हूँ।”
   मन में ये संशय लिए की पता नही बाहर कार्यालय में कौन होगा , वो बाहर की तरफ बढ़ा की पारो भी लपक कर उसके पीछे हो गयी।
   वरुण ने उसे आते देखा और मुस्कुरा कर सामने बढ़ गया….

क्रमशः

aparna….

दिल से ……

          ट्रूकॉलर है आपके फ़ोन पर? होगा ही। मेरे में भी है।  आपके साथ भी होता होगा, अक्सर ये होता होगा कि ट्रूकॉलर नोटिफिकेशन आती है कि 56 लोगों ने आपका प्रोफ़ाइल चेक किया।
   आप चौन्क जातें हैं कि कौन हैं भाई ये लोग? किस संसार के हैं? क्योंकि आपके पास तो इतना वक्त ही नही होता कि नंबरों को जांचते फिरें।
  और कहीं ये देखने चले जाओ की कौन नम्बर की छानबीन कर रहा था तो अगला मेसेज आता है कि मंथली सब्स्क्रिप्शन abc  रुपयों में लीजिये और पूरे महीने अपने स्टॉकर्स पर नज़र रखिये।
   मतलब हद है यार !मार्केटिंग की भी। ये सब्सक्रिप्शन नाम के ट्रेंड ने जान ले रखी है कसम से।
यूट्यूब पर कोई खूबसूरत रंगोली की डिज़ाइन खोलते ही पहले एड आ जाता है और उसके नीचे एड फ्री देखने का सब्स्क्रिप्शन फी!!!

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    लगता है बसपन का प्यार के बाद सब्स्क्रिप्शन की बहारट्रेंडिंग हैं।

  चलिए मिलतें हैं अगले भाग के साथ जल्दी ही। तब तक पढ़ते रहिये कहानी समिधा!!!

  दिल से आभार व्यक्त करती हूँ आप सभी का की आप मुझे इतने मन से पढ़ते हैं सराहतें हैं!!!

aparna…..

समिधा -33

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  समिधा – 33

       वरुण अपनी तैयारियों के लिए खाना निपटने के साथ ही भगिनी आश्रम की तरफ निकल गया।
  आश्रम की महिलाएं खाने बैठीं थी । वहाँ की वरिष्ठ महिलाओं की खाने की पारी थी। पारो और बाकी कम उम्र की लड़कियां और महिलाएं खाना परोस रहीं थीं।
  भोजन कक्ष के बाहर ही एक छोटा कमरा और था, जहाँ वरुण पहुंच कर बैठ गया था। वो उस आश्रम की देखभाल करने वाली पद्मजा दीदी का इंतज़ार करने लगा।
  वो जहाँ बैठा था वहाँ से लगी खिड़की से वो बड़े आराम से अंदर देख सकता था पर मारे संकोच के वो अंदर नही देख रहा था।
   भोजन कक्ष में उसी समय अंदर से पारोमिता एक साथ चार पांच गिलास में पानी ले आयी। पद्मजा दीदी के इशारे पर एक गिलास पानी बाहर बैठे वरुण के लिए भी वो लेती गयी।
   उसने वरुण की तरफ ध्यान से देखे बिना ही उसके सामने गिलास बढ़ा दिया। वरुण ने एक नज़र पारो को देख नज़रें नीचे की और गिलास की तरफ हाथ बढ़ा दिया।

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  पारो की कंपकपाती उंगलियों के ठीक ऊपर वरुण की तपती उंगलियां छू गयीं।
    दोनों के ही शरीर में उन उंगलियों से गुज़रती तरंगे बहती चली गईं।
  घबराहट में पारो के हाथ से गिलास छूट गया। और वो हड़बड़ाती  सी अंदर चली गयी। गिलास की आवाज़ पर खिड़की से कई जोड़ी आंखें उन दोनों की तरफ उठ गई होंगी यही सोच वरुण ने शर्मिंदा होकर गिलास उठाया और खिड़की पर रखने को हुआ कि उसकी नज़र अंदर कक्ष में बैठी औरतों पर चली गयी। कुछ दो एक  उसे अब भी देख रहीं थी बाकियों का ध्यान अपनी थालियों पर ही था।
   वरुण की न चाहते हुए भी नज़र उनकी थालियों पर चली गई। और उससे कुछ देर पहले का अपना खाया भोजन याद आ गया।
  मंदिर में वैसे भी तामसिक भोजन तो नहीं बनता था लेकिन मंदिर के आचार्य गुरुवर उनके लिए बनाए जाने वाले भोजन में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि उनकी थाली हर तरह के पोषक आहार से बनी हो।
   वरुण की थाली में  मिलने वाली भोज्य सामग्री यहां अंदर आश्रम की महिलाओं की थाली में से गायब थी।  वह कुछ क्षणों के लिए चौक गया क्योंकि उसे यह मालूम था कि आश्रम की यही महिलाएं एक साथ मिलजुल कर पूरे आश्रम का खाना तैयार करती हैं। तो फिर खाने में यह भेदभाव कैसे? वहां बैठी महिलाओं में  किसी की भी थाली संपूर्ण नहीं थी बल्कि सभी के थाली में जरा जरा सी खिचड़ी ही परोसी हुई नजर आ रही थी।
    वह अभी इस भेदभाव के बारे में सोच ही रहा था कि अंदर से पद्मजा दीदी बाहर निकल आई….-” जय श्री कृष्णा वरुण जी आइए बैठिए। “

” जय श्री कृष्णा दीदी कैसी हैं आप।”
” हम ठीक हैं आप बताइए हम लोगों के लायक क्या सेवा है? हमें भी जानकारी मिल चुकी है के आश्रम के कार्यक्रम के लिए श्री प्रबोध आचार्य जी का आना तय हो चुका है।”
” जी दीदी आपने सही कहा! मुझे भगिनी आश्रम के साज संभाल का काम दिया गया है। आप सभी के साथ मिलकर मुझे पूरे आश्रम परिसर में फूलों की सज्जा देखनी है। इसके साथ ही गोपाल जी के लिए भी पुष्प वस्त्रों का निर्माण करना है। यह काम भी आप सभी के सुपुर्द किया गया है।
   हवन की तैयारी के लिए भी आप में से कुछ दो चार महिलाओं की आवश्यकता होगी। क्योंकि लगभग 21 हवन वेदियाँ तैयार होंगी, जिनके चारों तरफ अल्पना बनानी होगी। इसके लिए आप अपने आश्रम में से चुनकर कुछ महिलाओं का एक समूह तैयार कर दीजिएगा। मेरा इस सब में यही कार्य है कि आप लोगों को अपने कामों के लिए जितनी वस्तुओं की आवश्यकता होगी, आप मुझे एक लिस्ट तैयार करके दे दीजिएगा। मैं सारी सामग्री आप लोगों तक पहुंचा दूंगा। इसके साथ ही बीच बीच में आकर मैं कार्य की रूपरेखा देखता रहूंगा वैसे अब हमारे पास सिर्फ दो दिन ही बचे हैं कल और परसो दो दिन में यह सारी तैयारियां हो जाए तो बहुत अच्छा है। “

” जी आप सही कह रहे हैं वरुण जी वैसे हमारे आश्रम में जितनी महिलाएं हैं सभी अल्पना बनाने में फूलों के वस्त्र बनाने में पारंगत हैं तो हम चुन कर दो अलग-अलग समूह तैयार कर देते हैं। जिससे सारे काम सही समय पर निपट जाए हम अभी सबका भोजन निपटते ही सब से बात करके किन वस्तुओं की आवश्यकता होगी इसकी सूची तैयार करके आपके कक्ष में भिजवा देंगे। “

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” नहीं ! नहीं ! आप यहां से किसे हमारे कक्ष में भेजेंगी। यहां तो सभी महिलाएं हैं। आप शाम तक तैयार करके रखें। आरती के बाद मैं खुद आकर आप से ले लूंगा। “

  पद्मजा दीदी ने मुस्कुराकर वरुण के सामने हाथ जोड़ दिये। उनकी मुस्कान के बावजूद वरुण नहीं मुस्कुरा पाया उसने एक नजर खिड़की से अंदर की ओर देखा। अब आश्रम की बाकी बची महिलाएं भोजन के लिए बैठ चुकी थी।
   यह इत्तेफाक था या ईश्वर की इच्छा कि वह जहां बैठा था वहां से ठीक सामने उसे पारो बैठी नजर आ रही थी। उसकी थाली में तो और भी कम खिचड़ी थी। मुश्किल से दो से तीन  निवालों का भोजन सामने रखे वह धीरे-धीरे एक-एक दाना चुग रही थी। जैसे अपने भोजन को निगलने से पहले वह उससे माफी मांग रही हो।
    वरुण का ह्रदय कसमसा कर रह गया उसने पद्मजा दीदी की तरफ देखा…-” अगर आप बुरा ना माने तो क्या मैं आपसे कुछ सवाल पूछ सकता हूं। “
” जी बिल्कुल पूछिए। “
” सारे मंदिर परिसर में यहां रहने वाले सभी लोगों का भोजन आप लोग ही तो बनाते हैं ना। “
” हां हम ही लोग यह भोजन बनाते हैं।
” तो क्या आश्रम में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग भोजन तैयार होता है। “
   पद्मजा दीदी एकाएक यह सवाल सुनकर चौन्क गयी क्योंकि आज तक यहां के किसी अन्य पुरुष ने उन लोगों के खाने के बारे में कभी कोई सवाल नही किया था।
” आप ऐसा सवाल क्यों पूछ रहे हैं वरुण जी?”
” मैं भी नहीं पूछता अगर मैं अपनी आंखों के सामने ऐसा होते नहीं देखता। मैं अभी कुछ देर पहले ही भोजन करके आया हूं और मेरी थाली मैं जो सब था वह यहां नहीं है। “
” आप इस सब में क्यों पड़ रहे हैं। जाने दीजिए यह सब बातें आपके विचार करने योग्य नहीं है!  बल्कि हम तो यह कहेंगे कि भगिनी आश्रम ही आप लोगों के विचार करने योग्य नहीं है! अब जैसा जीवन मिला है वैसा यहां की औरतें काट ही लेंगी।”
” आप उसी जीवन को काटने की बातें कह रही हैं जिस जीवन को उस मुरलीधर ने आपको दिया है।  आपका जीवन उनकी भेंट है जिसे आप इस तरह गंवा रही हैं। और कह रही हैं कि हम किसी भी तरीके से जीवन काट लेंगे। “
” यह बड़ी-बड़ी बातें यहां की इन मूर्ख औरतों की समझ से परे है वरुण जी। “
” यहां कोई मूर्ख नहीं है दीदी और ना ही यह बातें किसी के समझ से परे हैं । यहां सभी का जीवन अनमोल है। क्योंकि हम सब उस मुरलीधर के चरणों में पड़े हैं। हमारे जीवन का रचयिता वही है और जब तक उसने हमारी सांसे लिखी हैं हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम उन सांसो का सदुपयोग करें। अब बताइये की ये भेदभाव क्यों ?”
” किसी ने ये भेदभाव नही किया है वरुण जी। हम महिलाओं को खुद के लिए यही खिचड़ी रुचिकर लगती है, इसलिए हम यही बना लेतें हैं। समय भी कम लगता है।”
” तो हम सबके लिए भी खिचड़ी बनाया कीजिए। हमारे लिए तो रोटियां भी बन रही हैं सब्जी बन रही है दाल है चावल भी बनाए जा रहे हैं इतना सारा क्यों? और इन सब के बावजूद हमें सलाद मिठाई और दही भी दी जाती है। जबकि आप लोग सिर्फ खिचड़ी खा रही हैं उसके साथ  आपको न घी परोसा गया  और ना ही दही। यह तो गलत है ना दीदी। “
” वरुण जी ऐसा कुछ भी नहीं है कि कोई भी हमें रोक रहा है इन सब चीजों को खाने से।
  हम लोगों का ही जी नहीं करता इतना सब खाने का। “
” चलिए अच्छी बात है ।लेकिन हो सकता है यह आपका व्यक्तिगत विचार हो, क्या आपने यहां उपस्थित बाकी लोगों से इस बारे में पूछताछ की है कि क्या वह सारी महिलाएं भी सिर्फ खिचड़ी खा कर गुजारा करने को तैयार है। “
” जब घर परिवार पूरा समाज हम से मुंह मोड़ कर खड़ा हो जाता है ना तो एक पेड़ की छांव भी हमें बहुत ममतामई लगने लगती है । फिर यहाँ इस आश्रम में तो हमें रहने को एक छत दी हुई है। खाने को दो वक्त का भोजन मिल ही रहा है। तो क्या हम लोग अपनी तरफ से आश्रम का खर्चा बचाने के लिए इतना भी नहीं कर सकते कि जितना हो सके कम खाएं। हम किसी को भी अनशन करने नहीं कहते। लेकिन हमारा यह कहना है कि शरीर को चलाने के लिए जितना भोजन आवश्यक है उससे अधिक खाकर हमारे शरीर में सिर्फ अनावश्यक चर्बी ही जमेगी आलस्य ही पनपेगा।  तो इसलिए हम सब के लिए यही अच्छा है उचित मात्रा में उचित आहार का ही सेवन करें। “
  वरुण समझ गया था कि बात कुछ और थी और पद्मजा दीदी उसे नहीं बता रही थी। अंदर से किसी के बुलाने पर पद्मजा उठकर अंदर चली गई उसके जाते ही एक बुजुर्ग सी महिला रसोई की तरफ की दीवार की ओर से निकलकर वरुण के सामने चली गई…
” वह कभी सच नहीं बताएगी । वो ही क्या इस आश्रम की कोई भी महिला तुम्हें पूरा सच नहीं बताएगी। “
” लेकिन क्यों ऐसी क्या बात है जो मुझसे छुपाई जा रही है। “
” देख बेटा मैं बहुत बुजुर्ग हो चुकी हूं। अब जाने कितने दिन का मेरा जीवन शेष है। लेकिन इस आश्रम में बहुत समय से हूं। और यहां का सारा कारोबार देखती और समझती हूँ।
   यह लोग कहते हैं औरत का मन बहुत चंचल होता है।  पति के बिना रहती औरत जैसे तैसे करके खुद के मन को संभालने की कोशिश करती है अब ऐसे में अगर वह गरिष्ठ और तामसिक भोजन करेगी तो उसका मन चंचल होकर इधर-उधर भागने को करेगा और ऐसे में कुछ ऊंच-नीच हो गई तो आश्रम का नाम खराब होगा इसीलिए…
    जबकि सच्चाई इन बातों से बहुत अलग है। क्या नहीं होता यहाँ? जितने गहरे में जाओगे उतनी सच्चाइयां जानते जाओगे। अभी तो तुम्हें कुछ भी नही पता…”
” काकी आप वहाँ क्या कर रही हैं?” भीतर से पद्मजा की तीखी पुकार सुन वो वृद्धा कुछ बड़बड़ाती हुई वापस रसोई में घुस गई।
    वरुण उस वृद्धा से इतनी कड़वी सच्चाई सुनकर कांप उठा। यह कैसा न्याय था समाज का भी और आश्रम का भी।  यह लोग इन महिलाओं को क्यों इतना अलग समझते हैं। क्या इन महिलाओं के शरीर में वही रुधिर नहीं बहता जो बाकियों के शरीर में बहता है।
   और बाकी जो भी हो लेकिन अभी आने वाले श्री प्रबोधानन्द से वह इस बारे में बात करके रहेगा। लेकिन ऐसे सीधी प्रबोधानन्द से बात करने पर कहीं उदयचार्य जी नाराज ना हो जाए। तो इसलिए एक बार उसे उनके कान में भी यह बात डालनी पड़ेगी कि आश्रम में सभी के लिए एक समान व्यवस्था होनी चाहिए।
   जब यहां इस आश्रम में किसी भी तरह का जातिगत भेदभाव, रंग से जुड़ा भेदभाव, अमीरी गरीबी का भेदभाव नहीं देखा जा रहा तो महिला और पुरुष के बीच का भेदभाव क्यों इतना व्यापक रूप से पांव फैलाए बैठा है।
    वहीं महिलाएं जो आश्रम के पुरुषों के लिए इतनी तरह का भोजन बनाती हैं। अपने लिए क्यों फिर खिचड़ी बना लेती हैं। वो यही सोचते हुए आश्रम की तरफ की रसोई के सामने से होकर निकल रहा था तब उसकी नजर भीतर की तरफ पड़ी …. वहाँ आचार्यों के भोजन हो जाने के बाद रसोई में स्थित बड़े-बड़े बर्तनों में जो भोजन बना बचा रह गया  था। उसी भोजन को आपस में मिलाकर खिचड़ी का रूप दे दिया गया था। यानी असल बात तो यह थी कि आश्रम में मौजूद पुरुषों के भोजन कर लेने के बाद जो भी भोजन बच जाता उसमें कमीबेसी को सही करने के लिए वहां की वरिष्ठ महिलाएं उस सारे भोजन को एक साथ मिलाकर गर्म करके महिला आश्रम की औरतों को परोस दिया करती थी।
   वरुण की आंखें छलकने को थी, लेकिन उसने अपने आप को मजबूत कर लिया। पता नहीं केदारनाथ से लौटने के बाद उसके साथ क्या हुआ था, कि जब पाए तब उसकी आंखें छलक उठने को तैयार हो जाती थी। वह अपनी अति भावुकता पर शर्मिंदगी सी महसूस करने लगा था।
 
        वो तेज़ कदमों से आगे बढ़ गया। सामने से आते प्रशांत ने उसे असमंजस से देखा..-“क्या हुआ कुछ परेशान लग रहे हो?”
वरुण कुछ भी कहने की हालत में नही था , वो चुपचाप आगे बढ़ गया।
   प्रशांत किसी काम से दूसरी तरफ जा रहा था,वो वरुण के चेहरे का क्रोध देख उसके पीछे ही हो लिया। वरुण सीधे उदयाचार्य जी के कमरे में पहुंच गया लेकिन वो इस समय किसी बहुत ज़रूरी काम से कहीं बाहर गए हुए थे।
   कुछ देर वहीं बैठा वरुण कुछ सोचता रहा फिर वाटिका की तरफ निकल गया।

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***
  
   अगला दिन बीत गया, और तैयारियों में डूबा आश्रम बाकी सारी बातें बिसरा गया। यही हाल वरुण का हुआ। उस दिन भगिनी आश्रम का भोजन देख
जितनी तेजी से उसका खून जला था, उस खून का उबाल उतनी ही तेज़ी से अगले दिन बैठ भी गया। उसके ऊपर आश्रम की जिम्मेदारियां भी तो थी। उन्हीं सब व्यस्तताओं में वो इस बात को भूल कर रह गया।

   कार्यक्रम के ठीक एक दिन पहले सभी अतिथियों का आना शुरू हो चुका था। स्वामी प्रबोधानन्द जी भी अपने निर्धारित समय पर पहुंच गए।
   स्वामी जी को स्टेशन से आश्रम लेकर आने के लिए आश्रम की सबसे महंगी गाड़ी भेज दी गयी थी।
   प्रबोधानन्द जी के आसन के सामने ही कलश स्थापना होनी थी।
    वाटिका में पीछे बने सरोवर से शुद्ध जल के कलश मंगवाए गए थे।
सीधी सतर पंक्तियों में महिलाएं सिर पर जल से भरा कलश लिए हवन स्थल पर रखने जा रही थीं।
नियमों के अनुसार उन सभी को आकंठ सरोवर में डूब कर ही अपना कलश भरना था। और उन्हीं भीगे वस्त्रों में कलश स्थापित कर वो लोग अपने कमरों में जा सकती थीं।
      महिलाएं कलश रख कर स्वामी प्रबोधानन्द को प्रणाम कर एक तरफ खड़ी होती जा रहीं थीं। पारोमिता भी अपना कलश सिर पर उठाए धीमे कदमों से आगे बढ़ती गयी।
       जल से भीगे श्वेत वस्त्रों में सिर पर पानी का कलश रखे वो स्वर्ग से उतरी मेनका सी लग रही थी। प्रबोधानन्द वैसे तो हवन कुंड की बाकी तैयारियों को देख रहे थे लेकिन जैसे ही उनकी नज़रे पारो पर पड़ी वो चाह कर भी उस पर से अपनी आंखें नही हटा सके।
   पारो के कदमों के साथ साथ उनके हृदय का कंपन भी बढ़ता जा रहा था। माथे पर छलक आई बूंदों को उन्होंने पोंछ लिया।
   उसने ठीक उनके सामने आकर उन्हें प्रणाम किया तब जाकर उन्हें चेत आया और हाथ उठाकर उसे आशीर्वाद दे वो खुद पर लज्जित से दूसरी तरफ देखने लगे।
    पारो धीमे कदमों से अपनी साथियों की तरफ बढ़ गयी। और वहाँ से वो सारी साध्वियां आश्रम की तरफ बढ़ चलीं।
     वहीं खड़े वरुण की कनपटी पर जैसे कोई हथौड़े चलाने लगा था। उसके मन में आ रहा था कि वो उसी वक्त प्रबोधानन्द का गला दबा दे।
   उसकी कामातुर दृष्टि वरुण की आंखों से बच नही पायी थी।
   और उसे ये भी समझ आ गया था कि अब उसे यहाँ आश्रम में हर समय पारो की परछाई बन उसके आसपास रहना होगा।
     आश्रम में धूप गुग्गुल की खुशबू के बीच मंत्रोच्चार प्रारम्भ हो चुका था लेकिन इस सब के बीच अपने अशांत मन को साधने वरुण गोपाल जी की मूर्ति के सामने हाथ जोड़े खड़ा पारो के लिए खुशियों का वरदान मांग रहा था……

क्रमशः

   दिल से ….

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    समिधा सिर्फ एक कहानी है। मैंने समिधा शुरू करने से पहले ही कहा था कि एक अजीबोग़रीब प्रेम कहानी दिल में कुलबुला रही है। और मुझे यकीन नही था कि ये कहानी आप लोगों को पसन्द आएगी।
      
    आजकल लोगों का जीवन व्यस्त से व्यस्ततम होता जा रहा है और साथ ही लोगों की पसन्द भी बदलती जा रही है। थ्रिल इस शब्द ने हमारे समाज में तेज़ी से पांव पसारें हैं।
   और मैं जानती हूँ मेरी कहानियों में थ्रिल नही होता।

  समिधा  वैसे तो बिल्कुल ही सादी सी कहानी है लेकिन आगे कई ऐसे मोड़ आएंगे जिन्हें लिखने पर शायद आप लोग मेरे खिलाफ भी हो सकतें हैं।
   मेरी ये कहानी किसी भी धर्म विशेष, किसी आश्रम विशेष या किसी संत महात्मा का विरोध नही करती। कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। अगर आश्रम का कोई काला हिस्सा मैं लिखतीं हूँ तो ये पूरी तरह मेरी कल्पना की उपज है उसे किसी भी मंदिर ट्रस्ट आदि से जोड़ कर न देखें।
    जहाँ ढेर सारी अच्छाई हैं वहाँ कुछ बुराई भी पनप सकती है।
     इतना सारा मैं इस लिए समझा रही हूँ क्योंकि कई बार आप पाठक पढ़ते हुए नाराज़ भी हो जातें हैं। और आपकी नाराज़गी झेलने की हिम्मत नही है रे बाबा मुझमें।
     
    वैसे मैं हमेशा हल्की फुल्की कहानियां ही लिखती हूँ पता नही इस बार इतना भारी विषय कैसे रास आ गया लिखने को।

   चलिए मेरी पाती बड़ी होती जा रही है। अब लिखना बंद करती हूँ। जल्दी मिलेंगे कहानी के अगले भाग के साथ।
  तब तक पढ़ते रहिये….

(कृष्ण मंदिर या कृष्ण आश्रम का मैं उल्लेख कर रहीं हूँ लेकिन प्लीज़ इसे इस्कॉन ट्रस्ट से जोड़ कर ना देखें ।)

  aparna ….

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समिधा- 32

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  समिधा -32

    ‘”कृष्ण क्या है? एक विचार! एक चिंतन! या एक संपूर्ण युगपुरुष! जिसने युगों के विचारों को बदल दिया। श्री कृष्ण के जीवन में जन्म से लेकर उनके जीवन काल तक हर पल कुछ न कुछ घटता रहा और वह जो भी घटता रहा वह श्री कृष्ण का स्वयं रचित कार्य था । यानी अपने प्रारब्ध को समझकर उन्होंने उसके लिए प्रयास किया।
     उनकी यह जीवनशैली हमें भी यह समझाती है कि अगर अपने भविष्य को सुनियोजित-सुनिश्चित करना है तो अपने वर्तमान पर कार्य करना होगा।
    मैं कभी-कभी सोचता हूं कि इतनी सारी किताबें पढ़ने के बाद मैं श्रीकृष्ण को समझ गया हूं। जान गया हूं। उनका जीवन दर्शन पा चुका हूं । और जिस घड़ी मुझे यह महसूस होता है, कि मैं श्रीकृष्ण के करीब हूं उसी क्षण वह मुझसे दूर चले जाते हैं। मेरे और उनके बीच एक लंबा फासला बन जाता है। और उस फासले को पाटने के लिए मुझे एक बार फिर उनके जीवन चक्र को पढ़ना और समझना पड़ता है।
     मैं जानता हूं जब तक मैं उनकी लीलाओं को पूरी तरह समझ कर अपने आप में व्याप्त नहीं करूंगा। तब तक वह इसी तरह मुझ से दूर भागते रहेंगे । और उन्हें पाने की लालसा में मैं उनके पीछे भागता रहूंगा इसी भागा दौड़ी का नाम ही तो भक्ति है।

   हां, मैं कृष्ण भक्त हूं! पूरी तरह से कृष्ण की भक्ति में लीन उनका एक साधक उनका पुजारी जिन्हें उनका नाम लेना पसंद है! उनका श्रृंगार करना, उन्हें भोग लगाना और उनकी भोग की थाली उनके सामने रखकर करबद्ध निवेदन करना कि आओ मेरे कृष्ण और यह भोग ग्रहण करो! पसन्द है। मैं भी बहुत बार चाहता हूं उस बच्चे की तरह जिद पर अड़ जाऊं कि जब तक तुम नहीं खाओगे मैं यहां से नही हिलूंगा । और एक सुटियाँ लेकर मैं भी बैठ जाऊं उस मूर्ति के सामने। इस ज़िद को पकड़कर कि, तुम आओ और यह भोग खा कर ही जाओ।
      आप सब मेरा विश्वास नहीं करेंगे लेकिन ऐसा करने का मैंने कई बार प्रयास किया। और हर बार वह छलिया मुझे छल ही जाता है। कभी मुझे गुरुवर का बुलावा आ जाता है तो कभी किसी और कारणवश मुझे उस भोग की थाली के सामने से हटना ही पड़ता है। और मैं जब तक वापस आता हूं उसमें से एक कोई ना कोई हिस्सा खत्म हो चुका होता है। और मैं मुस्कुरा कर उस छलिया के सामने हाथ जोड़ देता हूं कि आखिर तुमने मुझे ठग ही लिया।
    मैंने आज तक द्वारिकाधीश को प्रकट होकर मेरे सामने बैठकर भोग की थाली में भोग लगाते नहीं देखा। लेकिन यह भी सच है कि हर बार उस भोग की थाली का कोई एक हिस्सा अपने आप गायब हो चुका होता है। मैं यह नहीं कहता कि मूर्ति उस भोग को ग्रहण कर लेती है लेकिन वह किसी ना किसी रूप में उस भोजन को प्राप्त जरूर कर लेती है।

    यहां आने से पहले मेरा मन बहुत अशांत था। शारीरिक रूप से भी और मानसिक भी।
     अपनी उसी अशांतता को अस्थिरता को दूर करने के लिए मैं आश्रम आया था। यहां आते  साथ मुझे अच्छा लगने लगा ऐसा भी नहीं था।
     मुझे समय लगा यहां ढलने में। यहां की जीवन चर्या को अपनाने में। लेकिन हर एक आगे बढ़ते समय के साथ मैं भी आगे बढ़ता गया और कृष्ण लीला में डूब कर रह गया।
   और आज मैं गर्व से कहता हूं कि मैं कृष्ण भक्त हूं। भक्त होने और अंधभक्त होने में बहुत महीन सा अंतर होता है ।
   भक्ति आपके अंदर पौरुष को जगाती है । आपकी ताकत को कई गुना बढ़ा देती है। जब आप किसी की भक्ति करते हैं तो वह भक्ति आपके अंदर  एक विश्वास पैदा करती है, कि आपके साथ जो भी होगा उचित होगा। वही अंधभक्ति आप को कमजोर कर जाती है। जब आप किसी के अंधभक्त हो जाते हैं तब आप बिना कुछ सोचे आंख मूंद कर उस पर भरोसा कर लेते हैं।
     वैसे कृष्ण की लीला ऐसी है कि अगर आप उनके अंधभक्त होते हैं तब भी वह आपको अंधे होकर आगे गिरने नहीं देंगे । वह हर कठिन समय पर आपको थामे रहेंगे।
कृष्ण लीला के वर्णन में जो अनिर्वचनीय सुख है, वह और कहीं नहीं। यह रस बोलने वाले को भी उतना ही सिक्त करता है जितना सुनने वाले को।
    अगली बार मैं कुछ कृष्ण लीलाओं का वर्णन करूंगा लेकिन वैसे नहीं जैसे आप आज तक सुनते आये हैं।
     कृष्ण चरित्र पर आज तक हमारे कवियों ने साहित्यकारों ने रचनाकारों में बहुत कुछ लिखा है। और कृष्ण को महिमामंडित कर के चमत्कार करने वाले पुरुष के रूप में वर्णित किया है। जिससे हम साधारण जनमानस उनसे एक दूरी महसूस करते हैं। हमें लगता है हमारी सारी समस्याओं को किसी चमत्कार के माध्यम से कृष्ण सुलझा देंगे लेकिन अब इतनी सारी किताबें पढ़ने के बाद मुझे यह जाकर समझ में आया कि राम और कृष्ण ने अपना जीवन बहुत साधारण तरीके से जिया । राजा होते हुए भी वह दोनों सदा एक आम व्यक्ति की तरह अपना जीवन यापन करते रहे । अपने जीवन में आने वाली हर कठिनाई  का उन्होंने खुलकर सामना किया। सिर्फ चमत्कार दिखाकर किसी कठिनाई को पार नहीं लगाया।
    मेरे विचार से उन दोनों ने ऐसा इसलिए किया जिससे हम साधारण जनमानस उन के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को भी सार्थक कर सकें।
श्री कृष्ण ने जीवन में चमत्कार किए लेकिन उन चमत्कारों के पीछे भी हमेशा कोई ना कोई लक्ष्य या कारण मौजूद था। अगली चर्चा में हम आपस में ऐसे ही कुछ विषयों का उल्लेख करेंगे। और आपस में परिचर्चा करेंगे, उम्मीद करता हूँ कि हमारी अगली परिचर्चा सफल सिद्ध होगी।”

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     अपनी बात समाप्त कर वरुण ने सामने बैठे श्रोताओं की तरफ देख कर अपने हाथ जोड़ दिए। सामने बैठे लोगों में अधिकतर लोग मंदिर से बाहर से आए दर्शनार्थी थे, जो वरुण के प्रवचन को सुनने के लिए दर्शनों के बाद बैठ जाया करते थे। उसके अलावा मंदिर परिसर में कार्य करने वाले कुछ एक लड़के थे और भगिनी आश्रम की कुछ महिलाएं भी एक तरफ बैठी हुई थी पारोमिता भी उन्हीं में से एक थी।
     भगिनी आश्रम की महिलाओं की पंक्ति में सबसे सामने बैठी पारोमिता की आंखें पूरी तरह वरुण पर केंद्रित थी।  उसे जाने क्यों वरुण को देख देख कर उसके चेहरे में बीच-बीच में देव की झलक मिल जाया करती थी और उस समय वह अपने मन को मार कर इधर-उधर देखने लगती थी।
     उसे इस तरह खुद का किसी पराए पुरुष की तरफ देखना अच्छा नहीं लग रहा था लेकिन वह अपने मन को उसके चेहरे से अपनी आंखें हटाने के लिए मना भी नहीं पा रही थी। प्रवचन के बीच से उठकर जाना मंदिर के नियमों के विरुद्ध था इसलिए प्रवचन समाप्त होने तक उसे वहां बैठना ही था और उसकी मर्जी से अलग जाकर उसकी आंखें घूम फिर कर वरुण के चेहरे पर केंद्रित हो ही जा रही थी।

  ” गुरुवर आपकी बातें हमें भी कृष्ण सागर में डूबा ले जाती हैं”  एक महिला के ऐसा कहते हैं वरुण ने अपनी बाईं तरफ बैठी महिलाओं की तरफ दृष्टिपात किया और मुस्कुराकर हाथ जोड़ दिए। कि तभी उसकी नजर सामने बैठे पारोमिता पर चली गई।
    और वह खुद कुछ देर के लिए उसे देखता रह गया। अंदर से उसके मन में अचानक ही तरंगे बहने लगी। उसे खुशी का आभास होने लगा, उसे अच्छा लगा कि पारोमिता भी उसे सुनने बैठी है।
    उसका मन किया कि वो कहता रहे और सामने बैठी पारो सुनती रहे। वो उसकी तरफ देख रहा था कि पारो की भी नज़र वरुण पर पड़ गयी..
   वरुण को एकाएक कुछ सूझा ही नही और उसने यूँ ही बिना कुछ सोचे कह दिया…-” आप लोगों के मन में अगर कोई शंका है तो आप पूछ सकती हैं। “
    पारो ने न में सिर हिला कर सिर नीचे कर लिया।

  लोग उठ कर जाने लगे थे। आश्रम की महिलाएं उसी जगह पर गोल घेरा बनाये बैठ गईं और ढोलक मंजीरा बजा बजा कर भजन गाने लगीं।
   उन्हें भजन करते देख पारो ने साथ बैठी सरिता से पूछा और अपनी जगह पर खड़ी हो गयी…-” ए ऐसे भजन बीच में छोड़ कर नही जाते।” उन्हीं महिलाओं में से एक कि कड़वी सी आवाज़ पारो के कान में पड़ी और पारो ने हाथ जोड़ कर बाहर निकलने की अनुमति मांग ली।
     वरुण का मन भी अब तक वहाँ से उठने का नही हो रहा था। वरना बाकी दिनों में प्रवचन के बाद वो उठ कर चला जाया करता था। पर आज दो चार लोगों के बुलाने पर भी वो किसी किताब को खोले वहीं बैठा रहा।
   की उसी वक्त पारो उठ कर बाहर निकल गयी। उसके वहाँ से निकलते ही वरुण का मन भी वहाँ से जाने का करने लगा। कुछ देर अपने मन को मना कर वो कुछ एक दो पन्ने पलटने के बाद आखिर वो भी उठ ही गया।

   परिसर से बाहर निकल इधर उधर देखता वो आगे बढ़ रहा था कि उसके साथ हमेशा बने रहने वाले स्वामी प्रशांत ने उसे टोक दिया…-“क्या हुआ वरुण ?”
   प्रशांत और वरुण ने कृष्ण आश्रम में अपनी यात्रा साथ ही शुरू की थी। कलकत्ता से जिन चार लड़कों की टोली केदारनाथ भेजी गई थी उनमें भी प्रशांत शामिल था। यहाँ तक कि केदारनाथ से वापसी के बाद जब वरुण देव के घर गया था तब भी प्रशांत उसके साथ देव के घर के बाहर तक गया था।
   वो बाहर ही गाड़ी में बैठा वरुण का इंतेज़ार कर रहा था। शुरू से ही साथ होने के कारण दोनो के बीच फ़िज़ूल औपचारिकता की कोई दीवार नही थी, इसी से  दोनों एक दूसरे का नाम ही लिया करते थे।

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   प्रशांत के द्वारा उसे पुकारे जाने पर जैसे वो यथार्थ में लौट आया…-“नही कुछ भी तो नही।”
” किसी को ढूंढ रहे हो क्या?” वरुण के चेहरे पर अपनी आंखें गड़ाए प्रशांत ने सवाल किया और उसकी आंखें देख वरुण खुद में ही झेंप कर रह गया।
   वाकई आश्रम में आकर रहते हुए वो आज कर क्या रहा था। जब से उस लड़की को देखा था जैसे उसका खुद पर से अधिकार ही खत्म हो गया था। जब तक वो वहाँ बैठी थी अच्छा लग रहा था, जैसे ही उठ कर गयी उसका मन भी उसके पीछे जाने को बावला होने लगा।
  पर ये तो गलत था!!! अब प्रशांत को क्या जवाब दे यही सोच रहा था कि प्रशांत ने ही उसकी बेचैनी का जवाब दे दिया…-“वो मंदिर के पीछे तरफ निकली है, शायद वाटिका के पीछे बनी झील पर चली गयी है।”
   वरुण प्रशांत की बात सुन एक बार फिर झेंप गया। अपनी झेंप मिटाने उसने एकदम ही निरर्थक सा सवाल कर दिया…-“कौन ?”
  और प्रशांत ने उसे ऐसी नज़रों से देखा कि वरुण फिर बिना प्रशांत की ओर देखे ही अपने अध्ययन कक्ष की तरफ बढ़ गया…
    प्रशांत भी उसके पीछे चल ही रह था की आश्रम के कुछ लड़के उन दोनों की तरफ चले आये…-” गुरुवर ! आप दोनों को भी गुरु उदयाचार्य अपने कमरे में अभी बुला रहें हैं।”
     सुबह के इस समय पर उदयाचार्य जी अधिकतर आश्रम की ज़रूरतों पर काम किया करते थे। आश्रम से सम्बंधित मीटिंग्स के लिए वो अक्सर दोपहर के खाने के बाद ही सबको बुलाया करते थे। आज अचानक क्या हो गया ये सोचते वरुण और प्रशांत भी तेज कदमों से उनके कमरे की ओर बढ़ चले।
    आश्रम के मुख्य संचालक, अन्य आचार्य और गुरुओं को मिलाकर लगभग ग्यारह बारह लोग  उस आश्रम के प्रमुख लोगों में थे जिनमें वरुण और प्रशांत भी शामिल थे।
   सभी के वहाँ पहुंचते ही उदयाचार्य जी ने अपनी बात कहनी शुरू की…. -” आप सभी को ये बताते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि हर वर्ष की तरह इस बार भी आश्रम का स्थापना दिवस मनाया जाना है। आज से ठीक तीसरे दिन ये शुभ तिथि पड़ेगी और उस दिन पूरे हर्षोल्लास के साथ हम अपने मंदिर आश्रम का स्थापना दिवस मनाएंगे। वैसे तो हर साल श्री श्री गुरुवर अमृताचार्य जी ही यहाँ आते थे लेकिन इस बार वो अमेरिका में स्थित मंदिर के विशेष कार्यक्रम में सम्मिलित होने जा रहे हैं।
  लेकिन इस बात से दुखी होने की आवश्यकता नही है क्योंकि उनकी जगह  इस बार श्री गुरुवर प्रबोध आचार्य हमारे बीच उपस्थित रहेंगे।
    वो अपने ऑस्ट्रेलिया प्रवास से कल ही वापस लौटे हैं और कल शाम तक वो हमारे आश्रम पहुंच जाएंगे। तब तक आश्रम की साफ सफाई और बाकी तैयारियां आप सभी को मिलजुल कर देखना है।
    ये हमने सूची तैयार कर रखी है। आप लोगों के नाम के सामने आपके काम लिखें हैं। अभी हमें थोड़ा बाज़ार का भी काम है तो हम अब निकलेंगे। आप लोग अपने काम के अनुसार अगर आश्रम में किसी प्रकार की कमी देखते हैं या कोई आवश्यकता लगती है तो उसे सूचीबद्ध कर के आज शाम तक हमें दे दीजिएगा। जिससे गुरुवर के आने पर उन्हें आश्रम में कोई कमी न लगे।”

   सूची उन्होंने सामने बैठे एक गुरुजी के हाथ में थमा दी और बाकी काम समेटने लगे।
   अपने नाम के आगे लिखा काम देखते वो लोग सूची आगे बढ़ाते जा रहे थे। 
प्रशांत ने अपना काम देख वरुण की ओर सूची बढ़ा दी। उसके नाम के सामने भगिनी आश्रम की महिलाओं की सहायता से पूरे मंदिर परिसर और आश्रम की पुष्प सज्जा के साथ ही गोपाल जी के वस्त्रो आदि की तैयारी लिखी थी।
  अपना अपना काम देख सभी लोग वहां से निकल गए।
  ” चलो फटाफट खाना खा कर अपना अपना काम देखना होगा। अब समय ही कहाँ बचा है। कल तक तो गुरुवर आ जाएंगे।”
  ” हाँ ! लेकिन प्रशांत ये बताओ कि ये गुरुवर हैं कौन?”
   ” ये श्री श्री स्वामी जी के परम शिष्य हैं। कहा जाता है बचपन में एक बार ये अपनी कक्षा में फेल हो गए, तब ये  नौ दस साल के रहे होंगे। इनके पिता ने क्रोधित हो इन्हें घर के बाहर निकाल कर दरवाज़ा बंद कर दिया। कुछ समय बाद जब पिता जी का गुस्सा शांत हुआ तब उन्होंने दरवाज़ा खोला तो ये वहां से गायब थे। अब इनकी ढूंढ मची तो पता चला ये गांव के बाहर की चौपाल पर अपना आसन जमाये बैठे थे। माता पिता सबने विनती चिरौरी कर ली लेकिन फिर ये लौट कर घर वापस नही गए। इनकीं माँ इनका खाना पीना सब वहीं ले आती। ये कभी खाते, कभी चार पांच दिन बिना खाये पड़े रहते। माँ रो रोकर आधी हो गईं पर ये घर वापस नही लौटे। एक सुबह जब इनके माता पिता रोज़ की तरह इनका भोजन लेकर वहाँ पहुंचे तो ये अपनी जगह नही थे। बाद में पता चला कि श्री स्वामी अमृताचार्य जी की गाड़ी उधर से निकली थी और स्वामी जी ने इनसे रुक कर कुछ बातचीत की और इनकी विद्वत्ता से इतने प्रभावित हुए कि इन्हें अपने साथ ले लिया। एक पत्र इनके माता पिता के नाम छोड़ गए जिसमें अपना पता ठिकाना सब लिख गए थे।
   इनके माता पिता कई बार इनसे मिलने आये लेकिन ये फिर कभी वापस नही लौटे। हालांकि इनकीं नाराज़गी तो बहुत पहले ही दूर हो गयी थी। कहा जाता है श्री श्री स्वामी जी ने इन्हें खूब शिक्षा दिलवाई और अब ये देश विदेश में घूम घूम कर प्रवचन देते हैं। उम्र तो यही कोई अट्ठाईस उनतीस के लगभग होगी पर अपने ज्ञान से ये हर तरफ छा गए हैं।
   मेरा इनसे मिलने का बहुत मन था, अब कल उनके दर्शन कर धन्य हो जाऊंगा। “

” अब तुमसे इतनी तारीफ सुन कर मेरा भी मन इनके दर्शन करने का होने लगा है।

” तुम्हें तो भई चुन कर भगिनी आश्रम मिला है। काम करते हुए उसे भी ढूंढ लेना, कुछ देर पहले जिसके पीछे जाते हुए कमरे का रास्ता भूल गए थे। “

” क्या कह रहे हो प्रशांत। मंदिर है ये और हम इसे अपवित्र नही कर सकते। “

” माफ करो दोस्त। मैं सिर्फ मज़ाक कर रहा था। चलों अपना काम धाम देखें। “

  प्रशांत ने उस वक्त बात बदल ज़रूर दी लेकिन वरुण के मन में ये बात रह गयी। क्या उसका बर्ताव वाकई पारोमिता के लिए अलग से दिखाई दे गया था। ऐसा हुआ तब तो आज प्रशांत ने उसे पकड़ा कल कोई और पकड़ लेगा।
   ऐसा होना तो ठीक नही है। अब उसे अपने मन को।कड़ा कर रखना होगा। चाहे कुछ भी हो जाये वो अब उस लड़की की तरफ आंख उठा कर भी नही देखेगा।

अपने संकल्प को मन ही मन दुहराते  वो अपने कमरे की ओर बढ़ रहा था कि सामने से तेज़ी से आती पारो ठीक उसके सामने तक आकर रुक गयी। अगर नही रुकती तो ज़रूर वरुण से टकरा चुकी होती। वरुण अपने दोनो हाथों को खड़ा कर ज़रा पीछे हो सतर खड़ा हो गया..-” माफ कीजियेगा ।” कह कर वो एक ओर से होकर आगे निकल गयी, और एक बार फिर उसका पीछा करती वरुण की आंखें दूर तक पारो के पीछे चलती चली गईं।

क्रमशः

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aparna ….


      


  

समिधा -31

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     समिधा – 31

      भगिनी आश्रम एक तीन मंजिला आश्रम था, जिसमें बहुत बड़े बड़े हॉल एक ऊपर एक बने हुए थे। इनमें सबसे ऊपरी मंजिल पर कुछ कमरे और खुली छत थी। ये कमरे भगिनी आश्रम के सामान रखने के लिए उपयोग में लाइ जाती थीं। इन्हीं में एक कमरा चारु दीदी को मिला था,जिसमें वो जब कभी आकर आश्रम की लिखा पढ़ी भी जांच लिया करती थीं।
    एक कमरे में आश्रम की महिलाओं के उपयोग के लिए दानदाताओं द्वारा मिली सामग्री रखी थी तो दूसरे कमरे में पहले कभी सन्यासिनों द्वारा बुने कपडे चटाइयां आदि पड़े थे।
    एक दो कमरे खाली पड़े थे लेकिन बाहर से उन पर ताला पड़ा था। उसकी निचली मंज़िल पर बड़े से हॉल में पारो को साथ लिए सरिता खड़ी थी और उसे सबसे पीछे की तरफ खाली पड़े एक पलंग को दिखा कर इशारा कर दिया, कि वही पलंग उसका है।
    लंबे चौड़े से हॉल में आमने सामने दोनो तरफ दीवार से लग कर पलंग बिछे थे, और हर एक पलंग के पीछे खिड़की खुलती थी। पलंग के बाजू से एक छोटी अलमीरा बनी थी जिसमें साध्वियां अपना सामना, पानी का बर्तन चंदन माला आदि रखा करती थीं।
     उस पूरे हॉल में लगभग बाइस पलंग बिछे थे। हर पलंग के पीछे खिड़की होने से कमरा बहुत ही ज्यादा खुला और हवादार लग रहा था। हॉल के एक तरफ सामने बड़ा सा दरवाजा था जिस के ठीक सामने ही नीचे जाने और ऊपर जाने की सीढ़ियां बनी हुई थी। हॉल के दूसरी तरफ जो दरवाजा खुलता था उसके पीछे  गुसल खाने बने हुए थे।
     ” सुबह उठने के बाद हमें अपनी अपनी जगह की सफाई करने के साथ ही नीचे के हॉल की सफाई करनी होगी। सबसे नीचे खाने का कमरा बना हुआ है। वहां झाड़ू पोछा करने के बाद हमें बाथरूम आदि धोना होता है। और उसके बाद नहा कर हम भजन के लिए मंदिर पहुंच जाते हैं।
      वहां का पूजा पाठ भजन आरती होने के बाद हमें पीछे बनी रसोई की तरफ जाना होता है ।वहां पर दोपहर के खाने की तैयारी करनी होती है। दोपहर का खाना बनने के बाद जब गुरु आचार्य और सभी संतो के लिए भोजन चला जाता है, तब हम सभी बहने अपने हिस्से का भोजन लेकर अपने आश्रम में आ जाती हैं।  वहां सबसे नीचे जो हॉल बना हुआ है वही बैठकर हम सब एक साथ भोजन करते हैं।
    उसके बाद चाहो तो दोपहर में अपने कक्ष में आकर आराम कर सकती हो । शाम को होने वाली संध्या आरती के पहले एक बार फिर हमें फूल तोड़कर उन्हें धोकर मंदिर में पहुंचाना होता है।”

” फूलों की माला नहीं बनानी होती?”

” नहीं फूलों की माला हम नहीं बनाते! फूलों की माला वहीं रहने वाले आचार्य या गुरुवर ही बनाते हैं। क्योंकि फूलों की माला तो सीधे गोपाल जी को चढ़ाई जाती है ना हमारी बनाई माला कैसे चढ़ेगी वहां?”

जाने क्यों पारो का चेहरा कसैला सा हो गया वह चुपचाप सरिता के दिखाए पलंग की तरफ आगे बढ़ गई उसके हाथ में एक ही बैग था। उसने उस बैग को नीचे रखा और उसमें से सामान निकाल कर उस छोटी सी अलमारी में जमाने लग गई।

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      पारो को आश्रम में आए 2 दिन ही हुए थे कि एक दोपहर जब रसोई में मदद कर रही थी कि तभी ऑफिस से एक लड़का उसे ढूंढता हुआ वहां चला आया….-” पारोमिता दीदी कौन है? “

  वहां काम करती सभी औरतों की आंखें उसकी तरफ उठ गई। आश्रम में मौजूद औरतों के लिए यह बहुत बड़ी बात होती थी, कि बाहर से उनसे कोई मिलने आया है। क्योंकि उनमें से अधिकतर के परिजनों ने तो उन्हें यहां छोड़ने के बाद शायद यह मान लिया था कि वह सब अब उनके लिए हमेशा हमेशा के लिए मर चुकीं हैं। एक बार यहां छोड़कर जाने के बाद ना कोई परिजन मिलने आते थे और ना ही इनमें से कभी किसी को घर बुलाया जाता था।
     उसकी बात सुन पारोमिता धीरे से खड़ी हो गई…-” जी मैं हूँ पारोमिता!”
” दीदी आपको उधर ऑफिस में बुलाया जा रहा है।”
    पारो ने एक नज़र सरिता पर डाली और उन सभी की प्रवर सुलोचना दीदी से आंखों ही आंखों में बाहर जाने की आज्ञा ले बाहर निकल गयी। सरिता ने भी दीदी की तरफ एक बारगी देखा, उन्होंने आंखों से ही उसे भी साथ जाने की इजाज़त दे दी।
   वो खुशी से पारो के साथ हो ली।

   उदयाचार्य जी के साथ ऑफिस में सिर झुकाए दर्शन बैठा था। पारो के वहाँ पहुंचते ही वो झट से खड़ा हो गया…
“कैसी हो बऊ दी!”
   दर्शन को देख पारो की आंखें भर आई उससे एकाएक कुछ कहते नहीं बना उसने अपना सिर झुका लिया। और “हां” में सर हिला दिया।  उसे देखकर दर्शन की भी आंखे भर रही थी लेकिन उसने खुद को संभाल लिया। उसने मुड़कर एक बार सामने बैठे उदयाचार्य जी की तरफ देखा उन्होंने शायद दर्शन का इशारा समझ लिया…-” हां हां आप बिल्कुल आश्रम घूम सकते हैं। सरिता इन्हें और पारो बहन को ले जाओ बाहर हमारी वाटिका और आश्रम घुमा दो।”

    दर्शन ने अपने हाथ में थाम रखी बैग को कस कर पकड़ा और धीमे से बाहर निकल गया । उसके पीछे पारो भी बाहर चली गई । सरिता ने मुड़कर एक बार उदयाचार्य जी को प्रणाम किया और वहां से बाहर निकल गई। उदयाचार्य अजीब सा मुहँ बनाकर वापस अपने रजिस्टर में गड़ गए। उन्हें हमेशा यही लगता कि आश्रम की सबसे मोटी जिम्मेदारियां उन्हीं के कंधों पर हैं और इसीलिए जब भी बाहर से कोई मिलने आता तो उनका सिर दर्द और बढ़ जाता ,क्योंकि आने वाले की पूरी जीवन कुंडली उन्हें एक अलग रजिस्टर में लिखनी पड़ती। कि वह किस से मिलने आया है? जिससे मिलने आया है उनसे वह कैसे परिचित है ?किस समय आया? किस शहर से आया ?कितनी देर यहां रहा? उसने आश्रम में क्या-क्या देखा? आश्रम के किन-किन कमरों में वह गया? और कब वापस लौटा? उसके साथ कोई सामान तो नहीं था? आदि इत्यादि।
    इतनी सारी लिखा पढ़ी का काम करने में अक्सर आचार्य झल्लाते रहते थे।

    उस ऑफिस से निकल कर वह लोग एक तरफ बने रास्ते से चलते हुए आश्रम की वाटिका में पहुंच गए। वहाँ ढेर सारे पेड़ों के बीच कुछ बड़े-बड़े पेड़ भी लगे हुए थे उन बड़े पेड़ों के चारों तरफ गोलाकार चबूतरे बने हुए थे जो साफ-सुथरे उजले थे । वही चबूतरे पर जाकर दर्शन बैठ गया, पारो उसके पास ही खड़ी रही।  सरिता ने दर्शन की तरफ देखा…-” आप आश्रम नहीं देखना चाहते? “
    सरिता भी पारो से कुछ दो-तीन साल ही बड़ी थी और उसकी भी किस्मत काफी कुछ पारो से मिलती जुलती थी। दर्शन ने उसे देखकर “ना” में सर हिला दिया और पारो की तरफ देखने लगा पारो उसके पास ही सर झुकाए खड़ी थी।

“बैठो ना बाउदी। “

  पारो वही चबूतरे पर दर्शन से जरा हट कर बैठ गई।

“क्या हुआ अचानक तुम यहां क्यों चली आई? मैं बस 1 दिन के लिए ही तो दूसरे गांव गया था,बाबा के साथ! और वापसी पर पता चला कि तुम्हारी मां आई थी और उसके बाद तुमने यहां आश्रम आने की जिद पकड़ ली। आखिर ऐसा क्या हुआ बाउदी जो तुम घर छोड़ कर हम सब को छोड़ कर यहां चली आई?

पारो समझ गई थी कि उसके आने का असली कारण किसी ने भी दर्शन को और उसके बाबा को नहीं बताया होगा। सब ने इस बार भी उसके आश्रम आने की जिम्मेदार उसी को ठहरा दिया होगा। वह अपनी किस्मत पर मुस्कुरा कर रह गई।

“बस ऐसे ही दर्शन अब वहां मन नहीं लग रहा था!”

“तो क्या यहां लग रहा है? यहां कैसे रह पाओगी बऊ दी? यहां इतने परायों के बीच जहाँ ना अपनी जमीन है ना अपनी मिट्टी ना ही अपनी बोली ना अपना खान-पान । इन सबके बीच रहना मुश्किल नहीं लग रहा तुम्हें। “

अपनों की आंखों में अपने लिए पारो इतना सारा पराया पन देख चुकी थी कि अब उसके मन ने अपना और पराया सोचना ही छोड़ दिया था।

“ऐसा क्यों सोचते हो दर्शन कि यहां मिट्टी अपनी नहीं है! लोग अपने नहीं हैं ! यह सब हमारी सोच पर ही तो निर्भर करता है, बल्कि यहां तो भगिनी आश्रम में सब मेरे जैसी ही किस्मत की मारी हैं। और हम एक दूसरे के साथ सब अपना दुख भुला लेते हैं, बांट लेते हैं। कुछ अपने आंसू बहा लेते हैं तो कुछ सामने वाले के आंसू पोंछ लेते हैं। मुझे तो यहां अच्छा लग रहा है दर्शन।”

“तुम्हारे चेहरे से तो नहीं दिख रहा कि तुम्हें अच्छा लग रहा है। बउ दी एक बात बोलूं मेरे साथ वापस चलो कम से कम तुम्हें देखकर लगता है, कि  मेरे देव दादा…”

इसके आगे दर्शन कुछ नहीं बोल पाया लेकिन पारो समझ गई कि वह क्या कहना चाहता है।

“नहीं दर्शन अब वापस नहीं जाऊंगी। अब मेरे हिस्से जितनी भी सांसे बची हैं ,वह मुझे यही इसी आश्रम में लेनी है । अब यहां से कहीं नहीं जाऊंगी। एक बात बताओ क्या तुम अकेले आए हो?”

“हां बउ दी , और मेरे साथ कौन आता अकेला ही आया हूं।

पारो के चेहरे पर एक मुस्कान खेल गई।  वह समझ गई कि दर्शन घर पर बिना किसी से कुछ बोले आया है।

“घर पर बिना बताए मुझसे मिलने चले आए हो फिर किसके सहारे मुझे वापस लेकर जाना चाहते हो दर्शन?”

दर्शन पारो की बात पर इधर-उधर देखने लगा। सच ही तो कह रही थी पारो अब इतने दिन में वह भी घर वालों को अच्छे से जानने लग गई थी। जब यहां आने से पहले उसके घर पर बात करने की हिम्मत नहीं हुई तो आखिर किस आधार पर वो पारो को वापस लेकर जाना चाहता है।
   हालांकि वह यही सोच कर आया था कि किसी भी तरीके से पारो को घर वापसी के लिए मना लेगा लेकिन उसके मन में एक शंका यह भी था कि पता नहीं पारो उसके साथ वापस जाना चाहेगी या नहीं और इस लिए….

“मेरे बारे में सोच सोच कर दुखी मत हो दर्शन। मैं यहां बड़े सुख से हूं।”

“हां वह तो देख पा रहा हूं। पहले ही इतनी दुबली थी अब तो ऐसा लगता है जैसे हड्डियां उभर आई हैं।”

उसकी बात सुन पारो खिलखिला कर हंस पड़ी।

“ठीक है अब से खा पीकर थोड़ी मोटी हो जाऊंगी! अगली बार मिलने आओगे तो इससे बेहतर पाओगे मुझे।”

दर्शन ने अपने धोखेबाज आंसुओं को जो उसकी बिना मर्जी के भी उसके गालों पर लुढ़क आये, उन्हें पोंछ लिया और खड़े होकर पारो का हाथ पकड़ लिया।
” बउ दी आपके लिए कुछ सामान लेकर आया हूं मना मत करना।”

“क्या है दिखाओ तो सही।”

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दर्शन ने इतनी देर से अपने कंधे पर टांग रखे बैग को अपनी गोद में रखकर उसकी चेन खोल दी उसमें पारो के लिए किताबें रखी थी।
     घर पर किसी तरह से जुगत लगा कर आखिर दर्शन और आनंदी के जोर देने पर पारो को 11वीं की परीक्षा देने का मौका मिल चुका था।
    पारो के आश्रम आने के बाद ही उसका परीक्षा फल भी आ गया था। और वो अच्छे नंबरों से पास हो चुकी थी।
     दर्शन को जब पारो के परीक्षाफल का पता चला तब वो बाहर ही था, वो खुशी से बांवरा मिठाई लिए जब घर पहुंचा तब उसकी प्यारी बऊ दी उसे घर भर में कहीं नही नज़र आई ।
   जब माँ से उसने पूछा तो माँ ने उसकी पूछताछ से परेशान हो कह दिया…-“मर गयी तेरी बऊ दी” और वो नाराज़ हो घर से बाहर चला गया था।
    गुस्सा उतरने के बाद जब आधी रात वो घर लौटा तब आनन्दी बऊ दी ने खाना परोसते हुए उसे पारो के जाने की सारी बात सिलसिले वार बता दी।
    और अगले ही दिन घर पर बिना किसी से कुछ कहे वो उससे मिलने निकल गया।
    पर जाने क्यों अपनी माँ की बात सुन उसका मन कड़वाहट से भर गया था। बऊ दी से ऐसी भी क्या नाराज़गी। उनकी तकलीफ समझने की जगह हर कोई उनकी तकलीफ बढ़ाने में लगा था।
   रास्ते भर सोच सोच कर उसका सिर फटने लगा था। उसे पारो की घर वापसी का कोई मार्ग दिखाई नही दे रहा था, फिर भी मन ही मन वो उसे वापस ले जाने को मना लेने का एक प्रयास तो करना ही चाहता था।
       पारो के लिए क्या लेकर जाना चाहिए  उसे नही सूझ रहा था कि एकदम से उसे लगा अगर पारो उसके साथ नही भी आई तो कम से कम जहाँ हैं वहीं से अपनी आगे की पढ़ाई ही कर ले। और इसलिए उसने उसके लिए किताबें रख ली थीं, वो भी अगली कक्षा की।
   बैग खोलते ही पारो की नज़र किताबों पर गयी और उसकी आंखें भर आयीं।

“अब इन किताबों का क्या करूँगी ? “

“पढना ! किताबों का भला और क्या किया जाता है? “

   वो दोनों बातें कर रहे थे कि उनके पास से होकर वरुण किसी अन्य आचार्य से बात करता निकल गया। और उसे पीछे से देख दर्शन के मुहँ से बेसाख्ता “देव दादा”निकल गया।
     दर्शन की आवाज़ पर वरुण चौन्क कर पलट गया।

   वरुण ने दर्शन को देखा और दर्शन ने वरुण में छिपे देव को।
   वरुण को देखते ही जाने क्यों दर्शन के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कुराहट चली आई वरुण ने भी दर्शन को पहचान लिया वरुण कदम बढ़ाता दर्शन तक चला आया।

  ” आप तो हमारे घर आये थे ना…?

  ” कैसे पहचान लिया मुझे ?”
वरुण के सवाल पर दर्शन के मुहँ से उसके बिना चाहे भी वो बात निकल गयी जो सुन वहीं खड़ी पारो भी चौन्क गयी
   ” आपको देख बिल्कुल ऐसा लगा जैसे मेरे देव भैया वापस आ गए। बऊ दी ये वहीं तो हैं जो उस वक्त हमारे घर आये थे, जब…। “

  पारो ने बिना वरुण का चेहरा देखे ही उसकी ओर हाथ जोड़ दिए, और इतनी देर में वरुण पारो की सारी आपबीती समझ गया।
   उस दिन पहली बार आश्रम में उसे देखने के बाद एकाएक वो उसे नही पहचान पाया था लेकिन जाने क्यों जब तक वो नज़र आती रही थी उस पर से नज़रे नही हटा पा रहा था।
   बादबाकी उस रात वो अपने इस कृत्य पर बेहद शर्मिंदा भी हुआ था।
   आश्रम में होते हुए वो ऐसे कैसे किसी औरत को अपलक देख सकता था?
आश्रम आने के बाद से ही उसने डॉक्टर की बताई दवाएं भी लेनी छोड़ दी थीं……
   यही सब सोचते सोचते जाने रात की किस पहर उसकी नींद लग गयी थी, सुबह भोर की पहली किरण से जब उसकी नींद खुली तब उसे एहसास हुआ कि कल रात वो जाने कितनी जागती रातों के बाद चैन की नींद सो पाया था….

क्रमशः

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aparna….

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