यूँ ही…

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एक तारा भी नज़र आता नही मुम्बई के आसमान पर

यूँ कहने को मुम्बई सितारों की नगरी है…..

aparna ..

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ओ स्त्री!!!

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पुरुष के मन मस्तिष्क
शब्द हृदय
हर जगह छाई हो।
ओ स्त्री!!!
तुम कहाँ से आई हो?

वो कहता है
मैंने तुझे पंख दिए।
परवाज़ दिए
उड़ लो, जितना मैं चाहूं
ओ स्त्री !!!
क्या तुम उसकी मोहताज हो?

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उसका घरौंदा बनाया
तिनका तिनका सजाया
पर जब वक्त आया तुम्हारा
उसने तुम्हें
अपने पैरों पे गिराया
ओ स्त्री!!!
तुम कैसे उसकी सरताज हो?

वो बेबाक है बिंदास है
जो जी में आये
करने को आज़ाद है
कूबत तो तुम्हारी भी है
फिर
ओ स्त्री!!!
तुम क्यों हर मर्तबा
झुकने को तैयार हो?

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कभी ये ना पहनो
का अधिकार
कभी ऐसे न बोलो
का अहंकार
पर हर दफा उसकी
सुन कर चुप
रह जाने वाली
ओ स्त्री!!!
तुम खुद में एक अंगार हो

क्यों जानती नही,
तुम खुद को मानती नही
वो ‘मैं’ में अड़ा रहता है,
क्यों  पहचानती नही?
तुम खुद को घोल घोल
ज़िन्दगी को पी गयी
ओ स्त्री !!!
तुम स्वयं एक संसार हो…

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  To be continued …..

आप सब चाहें तो मेरी इस रचना को अपने शब्दों से सजा कर आगे बढ़ा सकतें हैं…. ” ओ स्त्री!!”
  बिंदास लिखिए
   बेबाक लिखिए..

  क्योंकि..
कलम को जितना चला लो ये शिकायत नही करती…

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aparna…


लड़कियाँ

आंसूओं को छिपाने के लिए

जबरन मुस्कुराती लड़कियाँ….

दिल के दर्द को, बस यूं ही

हंसी में उड़ाती लड़कियाँ…

दिन भर खट कर पिस कर

तुम करती क्या हो सुन कर भी

चुप रह जाने वाली लड़कियां

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बाप की खुशी के लिए

अपना प्यार ठुकराती लड़कियां….

भाई की सम्पन्नता के लिए

जायदाद से मुहँ मोड़ जाती लड़कियां….

पति के सम्मान के लिए

अपना घर द्वार खुशी छोड़ जाती लड़कियां….

बच्चों को बढ़ाने के लिए

ऊंची नौकरी को लात मार जाती लड़कियां…

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डूबते से संसार की

अजूबी सी ये लड़कियां

जाने कब किस जगह इनकी मुस्काने

छिन जाएंगी…

उन बेपरवाह हंसी के गुब्बारों से

खुद को सजाती ये लड़कियां….

इन लड़कियों का जहान कुछ अलग सा होता है

इतनी आसानी से कैसे समझ पाओगे इन्हें

की क्या होती हैं ये लड़कियां!!!

aparna …

मैं मैं हूँ!! जब तक तुम तुम हो!

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मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

तुमसे सारे रंग रंगीले
तुमसे सारे साज सजीले,
नैनों की सब धूप छाँव तुम,
होठों की मुस्कान तुम ही हो।
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

तुमसे प्रीत के सारे मौसम
तुमसे सूत,तुम ही से रेशम
तुमसे लाली,तुमसे कंगन,
मन उपवन के राग तुम ही हो
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

जीवन का यह सार तुम्हारा,
मेरा सब संसार तुम्हारा,
गुण अवगुण मेरे सब जानो,
मुझमे बसे मेरे प्राण तुम ही हो।
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !।।

शुभकामनाएं … हिंदी दिवस की

महादेवी वर्मा

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जो तुम आ जाते एक बार

जो तुम आ जाते एक बार

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग

आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार

हँस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग

आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार

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जब तुम बूढ़े हो जाओगे…..

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मैं बन जाऊंगी फिर मरहम
वक्त के ज़ख्मों पर तेरे और
मुझे देख हौले हौले से
फिर तुम थोडा शरमाओगे।
जब तुम बूढे हो जाओगे।।

सुबह सवेरे ऐनक ढूंड
कानों पे मै खुद ही दूंगी ,
अखबारों से झांक लगा के
तुम धीरे से मुस्काओगे।
जब तुम बूढे हो जाओगे ।।

दवा का डिब्बा तुमसे पहले
मै तुम तक पहुँचा जाऊंगी,
मुझे देख फिर तुम खुद पे
पहले से ही इतरा जाओगे।
जब तुम बूढे हो जाओगे।।

सुनो नही बदलेगा कुछ भी
हम भी नही और प्रीत नही
हम तुम संग चलेंगे  ऐसे
की तुम फिर लहरा जाओगे
जब तुम बुढे हो जाओगे।।

मैं तो ऐसी थी,ऐसी हूँ ,
ऐसी ही मैं रह जाऊँगी,
मेरे मन के बचपने से
तुम भी संग इठला जाओगे
जब तुम बूढ़े हो जाओगे।।

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मुझसी मिली है तुमको जग मे,
सोच के खुश हो रहना तुम,
फिर अपनी किस्मत पे खुद ही
धीरे धीरे इतराओगे
जब तुम बूढ़े हो जाओगे।।

aparna …….

मैं हूँ…..

मैं खुशबू से भरी हवा हूँ
मै बहता जिद्दी झरना हूँ
कठिन आंच मे तप के बना जो
मै ऐसा सुन्दर गहना हूँ ।।

छोटा दिखता आसमान भी,
मेरे हौसलों की उड़ान पे,
रातें भी जो बुनना चाहे,
मैं ऐसा न्यारा सपना हूँ ।।

हरा गुलाबी नीला पीला
मुझसे हर एक रंग सजा है,
इन्द्रधनुष भी फीका लगता
प्रकृति की ऐसी रचना हूं ।।

मैं हूँ पत्नी ,मै हूँ प्रेयसी
मै हूँ  बेटी, मै ही बहू भी,
तुझको जीवन देने वाली
मै ही माँ,मै ही बहना हूं ।।

मैं हूँ मीठी धूप सुहानी,
मैं ही भीगी सी बयार भी,
मुझमें डूब के सब कुछ पा ले,
मै ऐसा अमृत झरना हूं ।।।

अपर्णा ।

ओ स्त्री: कभी खुद को भी जिया करो……..

जल्द आ रही है, मेरे ब्लॉग पर !!

रोज़ी …by अमृता प्रीतम जी

नीले आसमान के कोने में
रात-मिल का साइरन बोलता है
चाँद की चिमनी में से
सफ़ेद गाढ़ा धुआँ उठता है

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सपने – जैसे कई भट्टियाँ हैं
हर भट्टी में आग झोंकता हुआ
मेरा इश्क़ मज़दूरी करता है

तेरा मिलना ऐसे होता है
जैसे कोई हथेली पर
एक वक़्त की रोजी रख दे।

जो ख़ाली हँडिया भरता है
राँध-पकाकर अन्न परसकर
वही हाँडी उलटा रखता है

बची आँच पर हाथ सेकता है
घड़ी पहर को सुस्ता लेता है
और खुदा का शुक्र मनाता है।

रात-मिल का साइरन बोलता है
चाँद की चिमनी में से
धुआँ इस उम्मीद पर निकलता है

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जन्मदिन मुबारक अमृता प्रीतम जी!!