समिधा -33

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  समिधा – 33

       वरुण अपनी तैयारियों के लिए खाना निपटने के साथ ही भगिनी आश्रम की तरफ निकल गया।
  आश्रम की महिलाएं खाने बैठीं थी । वहाँ की वरिष्ठ महिलाओं की खाने की पारी थी। पारो और बाकी कम उम्र की लड़कियां और महिलाएं खाना परोस रहीं थीं।
  भोजन कक्ष के बाहर ही एक छोटा कमरा और था, जहाँ वरुण पहुंच कर बैठ गया था। वो उस आश्रम की देखभाल करने वाली पद्मजा दीदी का इंतज़ार करने लगा।
  वो जहाँ बैठा था वहाँ से लगी खिड़की से वो बड़े आराम से अंदर देख सकता था पर मारे संकोच के वो अंदर नही देख रहा था।
   भोजन कक्ष में उसी समय अंदर से पारोमिता एक साथ चार पांच गिलास में पानी ले आयी। पद्मजा दीदी के इशारे पर एक गिलास पानी बाहर बैठे वरुण के लिए भी वो लेती गयी।
   उसने वरुण की तरफ ध्यान से देखे बिना ही उसके सामने गिलास बढ़ा दिया। वरुण ने एक नज़र पारो को देख नज़रें नीचे की और गिलास की तरफ हाथ बढ़ा दिया।

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  पारो की कंपकपाती उंगलियों के ठीक ऊपर वरुण की तपती उंगलियां छू गयीं।
    दोनों के ही शरीर में उन उंगलियों से गुज़रती तरंगे बहती चली गईं।
  घबराहट में पारो के हाथ से गिलास छूट गया। और वो हड़बड़ाती  सी अंदर चली गयी। गिलास की आवाज़ पर खिड़की से कई जोड़ी आंखें उन दोनों की तरफ उठ गई होंगी यही सोच वरुण ने शर्मिंदा होकर गिलास उठाया और खिड़की पर रखने को हुआ कि उसकी नज़र अंदर कक्ष में बैठी औरतों पर चली गयी। कुछ दो एक  उसे अब भी देख रहीं थी बाकियों का ध्यान अपनी थालियों पर ही था।
   वरुण की न चाहते हुए भी नज़र उनकी थालियों पर चली गई। और उससे कुछ देर पहले का अपना खाया भोजन याद आ गया।
  मंदिर में वैसे भी तामसिक भोजन तो नहीं बनता था लेकिन मंदिर के आचार्य गुरुवर उनके लिए बनाए जाने वाले भोजन में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि उनकी थाली हर तरह के पोषक आहार से बनी हो।
   वरुण की थाली में  मिलने वाली भोज्य सामग्री यहां अंदर आश्रम की महिलाओं की थाली में से गायब थी।  वह कुछ क्षणों के लिए चौक गया क्योंकि उसे यह मालूम था कि आश्रम की यही महिलाएं एक साथ मिलजुल कर पूरे आश्रम का खाना तैयार करती हैं। तो फिर खाने में यह भेदभाव कैसे? वहां बैठी महिलाओं में  किसी की भी थाली संपूर्ण नहीं थी बल्कि सभी के थाली में जरा जरा सी खिचड़ी ही परोसी हुई नजर आ रही थी।
    वह अभी इस भेदभाव के बारे में सोच ही रहा था कि अंदर से पद्मजा दीदी बाहर निकल आई….-” जय श्री कृष्णा वरुण जी आइए बैठिए। “

” जय श्री कृष्णा दीदी कैसी हैं आप।”
” हम ठीक हैं आप बताइए हम लोगों के लायक क्या सेवा है? हमें भी जानकारी मिल चुकी है के आश्रम के कार्यक्रम के लिए श्री प्रबोध आचार्य जी का आना तय हो चुका है।”
” जी दीदी आपने सही कहा! मुझे भगिनी आश्रम के साज संभाल का काम दिया गया है। आप सभी के साथ मिलकर मुझे पूरे आश्रम परिसर में फूलों की सज्जा देखनी है। इसके साथ ही गोपाल जी के लिए भी पुष्प वस्त्रों का निर्माण करना है। यह काम भी आप सभी के सुपुर्द किया गया है।
   हवन की तैयारी के लिए भी आप में से कुछ दो चार महिलाओं की आवश्यकता होगी। क्योंकि लगभग 21 हवन वेदियाँ तैयार होंगी, जिनके चारों तरफ अल्पना बनानी होगी। इसके लिए आप अपने आश्रम में से चुनकर कुछ महिलाओं का एक समूह तैयार कर दीजिएगा। मेरा इस सब में यही कार्य है कि आप लोगों को अपने कामों के लिए जितनी वस्तुओं की आवश्यकता होगी, आप मुझे एक लिस्ट तैयार करके दे दीजिएगा। मैं सारी सामग्री आप लोगों तक पहुंचा दूंगा। इसके साथ ही बीच बीच में आकर मैं कार्य की रूपरेखा देखता रहूंगा वैसे अब हमारे पास सिर्फ दो दिन ही बचे हैं कल और परसो दो दिन में यह सारी तैयारियां हो जाए तो बहुत अच्छा है। “

” जी आप सही कह रहे हैं वरुण जी वैसे हमारे आश्रम में जितनी महिलाएं हैं सभी अल्पना बनाने में फूलों के वस्त्र बनाने में पारंगत हैं तो हम चुन कर दो अलग-अलग समूह तैयार कर देते हैं। जिससे सारे काम सही समय पर निपट जाए हम अभी सबका भोजन निपटते ही सब से बात करके किन वस्तुओं की आवश्यकता होगी इसकी सूची तैयार करके आपके कक्ष में भिजवा देंगे। “

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” नहीं ! नहीं ! आप यहां से किसे हमारे कक्ष में भेजेंगी। यहां तो सभी महिलाएं हैं। आप शाम तक तैयार करके रखें। आरती के बाद मैं खुद आकर आप से ले लूंगा। “

  पद्मजा दीदी ने मुस्कुराकर वरुण के सामने हाथ जोड़ दिये। उनकी मुस्कान के बावजूद वरुण नहीं मुस्कुरा पाया उसने एक नजर खिड़की से अंदर की ओर देखा। अब आश्रम की बाकी बची महिलाएं भोजन के लिए बैठ चुकी थी।
   यह इत्तेफाक था या ईश्वर की इच्छा कि वह जहां बैठा था वहां से ठीक सामने उसे पारो बैठी नजर आ रही थी। उसकी थाली में तो और भी कम खिचड़ी थी। मुश्किल से दो से तीन  निवालों का भोजन सामने रखे वह धीरे-धीरे एक-एक दाना चुग रही थी। जैसे अपने भोजन को निगलने से पहले वह उससे माफी मांग रही हो।
    वरुण का ह्रदय कसमसा कर रह गया उसने पद्मजा दीदी की तरफ देखा…-” अगर आप बुरा ना माने तो क्या मैं आपसे कुछ सवाल पूछ सकता हूं। “
” जी बिल्कुल पूछिए। “
” सारे मंदिर परिसर में यहां रहने वाले सभी लोगों का भोजन आप लोग ही तो बनाते हैं ना। “
” हां हम ही लोग यह भोजन बनाते हैं।
” तो क्या आश्रम में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग भोजन तैयार होता है। “
   पद्मजा दीदी एकाएक यह सवाल सुनकर चौन्क गयी क्योंकि आज तक यहां के किसी अन्य पुरुष ने उन लोगों के खाने के बारे में कभी कोई सवाल नही किया था।
” आप ऐसा सवाल क्यों पूछ रहे हैं वरुण जी?”
” मैं भी नहीं पूछता अगर मैं अपनी आंखों के सामने ऐसा होते नहीं देखता। मैं अभी कुछ देर पहले ही भोजन करके आया हूं और मेरी थाली मैं जो सब था वह यहां नहीं है। “
” आप इस सब में क्यों पड़ रहे हैं। जाने दीजिए यह सब बातें आपके विचार करने योग्य नहीं है!  बल्कि हम तो यह कहेंगे कि भगिनी आश्रम ही आप लोगों के विचार करने योग्य नहीं है! अब जैसा जीवन मिला है वैसा यहां की औरतें काट ही लेंगी।”
” आप उसी जीवन को काटने की बातें कह रही हैं जिस जीवन को उस मुरलीधर ने आपको दिया है।  आपका जीवन उनकी भेंट है जिसे आप इस तरह गंवा रही हैं। और कह रही हैं कि हम किसी भी तरीके से जीवन काट लेंगे। “
” यह बड़ी-बड़ी बातें यहां की इन मूर्ख औरतों की समझ से परे है वरुण जी। “
” यहां कोई मूर्ख नहीं है दीदी और ना ही यह बातें किसी के समझ से परे हैं । यहां सभी का जीवन अनमोल है। क्योंकि हम सब उस मुरलीधर के चरणों में पड़े हैं। हमारे जीवन का रचयिता वही है और जब तक उसने हमारी सांसे लिखी हैं हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम उन सांसो का सदुपयोग करें। अब बताइये की ये भेदभाव क्यों ?”
” किसी ने ये भेदभाव नही किया है वरुण जी। हम महिलाओं को खुद के लिए यही खिचड़ी रुचिकर लगती है, इसलिए हम यही बना लेतें हैं। समय भी कम लगता है।”
” तो हम सबके लिए भी खिचड़ी बनाया कीजिए। हमारे लिए तो रोटियां भी बन रही हैं सब्जी बन रही है दाल है चावल भी बनाए जा रहे हैं इतना सारा क्यों? और इन सब के बावजूद हमें सलाद मिठाई और दही भी दी जाती है। जबकि आप लोग सिर्फ खिचड़ी खा रही हैं उसके साथ  आपको न घी परोसा गया  और ना ही दही। यह तो गलत है ना दीदी। “
” वरुण जी ऐसा कुछ भी नहीं है कि कोई भी हमें रोक रहा है इन सब चीजों को खाने से।
  हम लोगों का ही जी नहीं करता इतना सब खाने का। “
” चलिए अच्छी बात है ।लेकिन हो सकता है यह आपका व्यक्तिगत विचार हो, क्या आपने यहां उपस्थित बाकी लोगों से इस बारे में पूछताछ की है कि क्या वह सारी महिलाएं भी सिर्फ खिचड़ी खा कर गुजारा करने को तैयार है। “
” जब घर परिवार पूरा समाज हम से मुंह मोड़ कर खड़ा हो जाता है ना तो एक पेड़ की छांव भी हमें बहुत ममतामई लगने लगती है । फिर यहाँ इस आश्रम में तो हमें रहने को एक छत दी हुई है। खाने को दो वक्त का भोजन मिल ही रहा है। तो क्या हम लोग अपनी तरफ से आश्रम का खर्चा बचाने के लिए इतना भी नहीं कर सकते कि जितना हो सके कम खाएं। हम किसी को भी अनशन करने नहीं कहते। लेकिन हमारा यह कहना है कि शरीर को चलाने के लिए जितना भोजन आवश्यक है उससे अधिक खाकर हमारे शरीर में सिर्फ अनावश्यक चर्बी ही जमेगी आलस्य ही पनपेगा।  तो इसलिए हम सब के लिए यही अच्छा है उचित मात्रा में उचित आहार का ही सेवन करें। “
  वरुण समझ गया था कि बात कुछ और थी और पद्मजा दीदी उसे नहीं बता रही थी। अंदर से किसी के बुलाने पर पद्मजा उठकर अंदर चली गई उसके जाते ही एक बुजुर्ग सी महिला रसोई की तरफ की दीवार की ओर से निकलकर वरुण के सामने चली गई…
” वह कभी सच नहीं बताएगी । वो ही क्या इस आश्रम की कोई भी महिला तुम्हें पूरा सच नहीं बताएगी। “
” लेकिन क्यों ऐसी क्या बात है जो मुझसे छुपाई जा रही है। “
” देख बेटा मैं बहुत बुजुर्ग हो चुकी हूं। अब जाने कितने दिन का मेरा जीवन शेष है। लेकिन इस आश्रम में बहुत समय से हूं। और यहां का सारा कारोबार देखती और समझती हूँ।
   यह लोग कहते हैं औरत का मन बहुत चंचल होता है।  पति के बिना रहती औरत जैसे तैसे करके खुद के मन को संभालने की कोशिश करती है अब ऐसे में अगर वह गरिष्ठ और तामसिक भोजन करेगी तो उसका मन चंचल होकर इधर-उधर भागने को करेगा और ऐसे में कुछ ऊंच-नीच हो गई तो आश्रम का नाम खराब होगा इसीलिए…
    जबकि सच्चाई इन बातों से बहुत अलग है। क्या नहीं होता यहाँ? जितने गहरे में जाओगे उतनी सच्चाइयां जानते जाओगे। अभी तो तुम्हें कुछ भी नही पता…”
” काकी आप वहाँ क्या कर रही हैं?” भीतर से पद्मजा की तीखी पुकार सुन वो वृद्धा कुछ बड़बड़ाती हुई वापस रसोई में घुस गई।
    वरुण उस वृद्धा से इतनी कड़वी सच्चाई सुनकर कांप उठा। यह कैसा न्याय था समाज का भी और आश्रम का भी।  यह लोग इन महिलाओं को क्यों इतना अलग समझते हैं। क्या इन महिलाओं के शरीर में वही रुधिर नहीं बहता जो बाकियों के शरीर में बहता है।
   और बाकी जो भी हो लेकिन अभी आने वाले श्री प्रबोधानन्द से वह इस बारे में बात करके रहेगा। लेकिन ऐसे सीधी प्रबोधानन्द से बात करने पर कहीं उदयचार्य जी नाराज ना हो जाए। तो इसलिए एक बार उसे उनके कान में भी यह बात डालनी पड़ेगी कि आश्रम में सभी के लिए एक समान व्यवस्था होनी चाहिए।
   जब यहां इस आश्रम में किसी भी तरह का जातिगत भेदभाव, रंग से जुड़ा भेदभाव, अमीरी गरीबी का भेदभाव नहीं देखा जा रहा तो महिला और पुरुष के बीच का भेदभाव क्यों इतना व्यापक रूप से पांव फैलाए बैठा है।
    वहीं महिलाएं जो आश्रम के पुरुषों के लिए इतनी तरह का भोजन बनाती हैं। अपने लिए क्यों फिर खिचड़ी बना लेती हैं। वो यही सोचते हुए आश्रम की तरफ की रसोई के सामने से होकर निकल रहा था तब उसकी नजर भीतर की तरफ पड़ी …. वहाँ आचार्यों के भोजन हो जाने के बाद रसोई में स्थित बड़े-बड़े बर्तनों में जो भोजन बना बचा रह गया  था। उसी भोजन को आपस में मिलाकर खिचड़ी का रूप दे दिया गया था। यानी असल बात तो यह थी कि आश्रम में मौजूद पुरुषों के भोजन कर लेने के बाद जो भी भोजन बच जाता उसमें कमीबेसी को सही करने के लिए वहां की वरिष्ठ महिलाएं उस सारे भोजन को एक साथ मिलाकर गर्म करके महिला आश्रम की औरतों को परोस दिया करती थी।
   वरुण की आंखें छलकने को थी, लेकिन उसने अपने आप को मजबूत कर लिया। पता नहीं केदारनाथ से लौटने के बाद उसके साथ क्या हुआ था, कि जब पाए तब उसकी आंखें छलक उठने को तैयार हो जाती थी। वह अपनी अति भावुकता पर शर्मिंदगी सी महसूस करने लगा था।
 
        वो तेज़ कदमों से आगे बढ़ गया। सामने से आते प्रशांत ने उसे असमंजस से देखा..-“क्या हुआ कुछ परेशान लग रहे हो?”
वरुण कुछ भी कहने की हालत में नही था , वो चुपचाप आगे बढ़ गया।
   प्रशांत किसी काम से दूसरी तरफ जा रहा था,वो वरुण के चेहरे का क्रोध देख उसके पीछे ही हो लिया। वरुण सीधे उदयाचार्य जी के कमरे में पहुंच गया लेकिन वो इस समय किसी बहुत ज़रूरी काम से कहीं बाहर गए हुए थे।
   कुछ देर वहीं बैठा वरुण कुछ सोचता रहा फिर वाटिका की तरफ निकल गया।

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***
  
   अगला दिन बीत गया, और तैयारियों में डूबा आश्रम बाकी सारी बातें बिसरा गया। यही हाल वरुण का हुआ। उस दिन भगिनी आश्रम का भोजन देख
जितनी तेजी से उसका खून जला था, उस खून का उबाल उतनी ही तेज़ी से अगले दिन बैठ भी गया। उसके ऊपर आश्रम की जिम्मेदारियां भी तो थी। उन्हीं सब व्यस्तताओं में वो इस बात को भूल कर रह गया।

   कार्यक्रम के ठीक एक दिन पहले सभी अतिथियों का आना शुरू हो चुका था। स्वामी प्रबोधानन्द जी भी अपने निर्धारित समय पर पहुंच गए।
   स्वामी जी को स्टेशन से आश्रम लेकर आने के लिए आश्रम की सबसे महंगी गाड़ी भेज दी गयी थी।
   प्रबोधानन्द जी के आसन के सामने ही कलश स्थापना होनी थी।
    वाटिका में पीछे बने सरोवर से शुद्ध जल के कलश मंगवाए गए थे।
सीधी सतर पंक्तियों में महिलाएं सिर पर जल से भरा कलश लिए हवन स्थल पर रखने जा रही थीं।
नियमों के अनुसार उन सभी को आकंठ सरोवर में डूब कर ही अपना कलश भरना था। और उन्हीं भीगे वस्त्रों में कलश स्थापित कर वो लोग अपने कमरों में जा सकती थीं।
      महिलाएं कलश रख कर स्वामी प्रबोधानन्द को प्रणाम कर एक तरफ खड़ी होती जा रहीं थीं। पारोमिता भी अपना कलश सिर पर उठाए धीमे कदमों से आगे बढ़ती गयी।
       जल से भीगे श्वेत वस्त्रों में सिर पर पानी का कलश रखे वो स्वर्ग से उतरी मेनका सी लग रही थी। प्रबोधानन्द वैसे तो हवन कुंड की बाकी तैयारियों को देख रहे थे लेकिन जैसे ही उनकी नज़रे पारो पर पड़ी वो चाह कर भी उस पर से अपनी आंखें नही हटा सके।
   पारो के कदमों के साथ साथ उनके हृदय का कंपन भी बढ़ता जा रहा था। माथे पर छलक आई बूंदों को उन्होंने पोंछ लिया।
   उसने ठीक उनके सामने आकर उन्हें प्रणाम किया तब जाकर उन्हें चेत आया और हाथ उठाकर उसे आशीर्वाद दे वो खुद पर लज्जित से दूसरी तरफ देखने लगे।
    पारो धीमे कदमों से अपनी साथियों की तरफ बढ़ गयी। और वहाँ से वो सारी साध्वियां आश्रम की तरफ बढ़ चलीं।
     वहीं खड़े वरुण की कनपटी पर जैसे कोई हथौड़े चलाने लगा था। उसके मन में आ रहा था कि वो उसी वक्त प्रबोधानन्द का गला दबा दे।
   उसकी कामातुर दृष्टि वरुण की आंखों से बच नही पायी थी।
   और उसे ये भी समझ आ गया था कि अब उसे यहाँ आश्रम में हर समय पारो की परछाई बन उसके आसपास रहना होगा।
     आश्रम में धूप गुग्गुल की खुशबू के बीच मंत्रोच्चार प्रारम्भ हो चुका था लेकिन इस सब के बीच अपने अशांत मन को साधने वरुण गोपाल जी की मूर्ति के सामने हाथ जोड़े खड़ा पारो के लिए खुशियों का वरदान मांग रहा था……

क्रमशः

   दिल से ….

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    समिधा सिर्फ एक कहानी है। मैंने समिधा शुरू करने से पहले ही कहा था कि एक अजीबोग़रीब प्रेम कहानी दिल में कुलबुला रही है। और मुझे यकीन नही था कि ये कहानी आप लोगों को पसन्द आएगी।
      
    आजकल लोगों का जीवन व्यस्त से व्यस्ततम होता जा रहा है और साथ ही लोगों की पसन्द भी बदलती जा रही है। थ्रिल इस शब्द ने हमारे समाज में तेज़ी से पांव पसारें हैं।
   और मैं जानती हूँ मेरी कहानियों में थ्रिल नही होता।

  समिधा  वैसे तो बिल्कुल ही सादी सी कहानी है लेकिन आगे कई ऐसे मोड़ आएंगे जिन्हें लिखने पर शायद आप लोग मेरे खिलाफ भी हो सकतें हैं।
   मेरी ये कहानी किसी भी धर्म विशेष, किसी आश्रम विशेष या किसी संत महात्मा का विरोध नही करती। कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। अगर आश्रम का कोई काला हिस्सा मैं लिखतीं हूँ तो ये पूरी तरह मेरी कल्पना की उपज है उसे किसी भी मंदिर ट्रस्ट आदि से जोड़ कर न देखें।
    जहाँ ढेर सारी अच्छाई हैं वहाँ कुछ बुराई भी पनप सकती है।
     इतना सारा मैं इस लिए समझा रही हूँ क्योंकि कई बार आप पाठक पढ़ते हुए नाराज़ भी हो जातें हैं। और आपकी नाराज़गी झेलने की हिम्मत नही है रे बाबा मुझमें।
     
    वैसे मैं हमेशा हल्की फुल्की कहानियां ही लिखती हूँ पता नही इस बार इतना भारी विषय कैसे रास आ गया लिखने को।

   चलिए मेरी पाती बड़ी होती जा रही है। अब लिखना बंद करती हूँ। जल्दी मिलेंगे कहानी के अगले भाग के साथ।
  तब तक पढ़ते रहिये….

(कृष्ण मंदिर या कृष्ण आश्रम का मैं उल्लेख कर रहीं हूँ लेकिन प्लीज़ इसे इस्कॉन ट्रस्ट से जोड़ कर ना देखें ।)

  aparna ….

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समिधा- 32

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  समिधा -32

    ‘”कृष्ण क्या है? एक विचार! एक चिंतन! या एक संपूर्ण युगपुरुष! जिसने युगों के विचारों को बदल दिया। श्री कृष्ण के जीवन में जन्म से लेकर उनके जीवन काल तक हर पल कुछ न कुछ घटता रहा और वह जो भी घटता रहा वह श्री कृष्ण का स्वयं रचित कार्य था । यानी अपने प्रारब्ध को समझकर उन्होंने उसके लिए प्रयास किया।
     उनकी यह जीवनशैली हमें भी यह समझाती है कि अगर अपने भविष्य को सुनियोजित-सुनिश्चित करना है तो अपने वर्तमान पर कार्य करना होगा।
    मैं कभी-कभी सोचता हूं कि इतनी सारी किताबें पढ़ने के बाद मैं श्रीकृष्ण को समझ गया हूं। जान गया हूं। उनका जीवन दर्शन पा चुका हूं । और जिस घड़ी मुझे यह महसूस होता है, कि मैं श्रीकृष्ण के करीब हूं उसी क्षण वह मुझसे दूर चले जाते हैं। मेरे और उनके बीच एक लंबा फासला बन जाता है। और उस फासले को पाटने के लिए मुझे एक बार फिर उनके जीवन चक्र को पढ़ना और समझना पड़ता है।
     मैं जानता हूं जब तक मैं उनकी लीलाओं को पूरी तरह समझ कर अपने आप में व्याप्त नहीं करूंगा। तब तक वह इसी तरह मुझ से दूर भागते रहेंगे । और उन्हें पाने की लालसा में मैं उनके पीछे भागता रहूंगा इसी भागा दौड़ी का नाम ही तो भक्ति है।

   हां, मैं कृष्ण भक्त हूं! पूरी तरह से कृष्ण की भक्ति में लीन उनका एक साधक उनका पुजारी जिन्हें उनका नाम लेना पसंद है! उनका श्रृंगार करना, उन्हें भोग लगाना और उनकी भोग की थाली उनके सामने रखकर करबद्ध निवेदन करना कि आओ मेरे कृष्ण और यह भोग ग्रहण करो! पसन्द है। मैं भी बहुत बार चाहता हूं उस बच्चे की तरह जिद पर अड़ जाऊं कि जब तक तुम नहीं खाओगे मैं यहां से नही हिलूंगा । और एक सुटियाँ लेकर मैं भी बैठ जाऊं उस मूर्ति के सामने। इस ज़िद को पकड़कर कि, तुम आओ और यह भोग खा कर ही जाओ।
      आप सब मेरा विश्वास नहीं करेंगे लेकिन ऐसा करने का मैंने कई बार प्रयास किया। और हर बार वह छलिया मुझे छल ही जाता है। कभी मुझे गुरुवर का बुलावा आ जाता है तो कभी किसी और कारणवश मुझे उस भोग की थाली के सामने से हटना ही पड़ता है। और मैं जब तक वापस आता हूं उसमें से एक कोई ना कोई हिस्सा खत्म हो चुका होता है। और मैं मुस्कुरा कर उस छलिया के सामने हाथ जोड़ देता हूं कि आखिर तुमने मुझे ठग ही लिया।
    मैंने आज तक द्वारिकाधीश को प्रकट होकर मेरे सामने बैठकर भोग की थाली में भोग लगाते नहीं देखा। लेकिन यह भी सच है कि हर बार उस भोग की थाली का कोई एक हिस्सा अपने आप गायब हो चुका होता है। मैं यह नहीं कहता कि मूर्ति उस भोग को ग्रहण कर लेती है लेकिन वह किसी ना किसी रूप में उस भोजन को प्राप्त जरूर कर लेती है।

    यहां आने से पहले मेरा मन बहुत अशांत था। शारीरिक रूप से भी और मानसिक भी।
     अपनी उसी अशांतता को अस्थिरता को दूर करने के लिए मैं आश्रम आया था। यहां आते  साथ मुझे अच्छा लगने लगा ऐसा भी नहीं था।
     मुझे समय लगा यहां ढलने में। यहां की जीवन चर्या को अपनाने में। लेकिन हर एक आगे बढ़ते समय के साथ मैं भी आगे बढ़ता गया और कृष्ण लीला में डूब कर रह गया।
   और आज मैं गर्व से कहता हूं कि मैं कृष्ण भक्त हूं। भक्त होने और अंधभक्त होने में बहुत महीन सा अंतर होता है ।
   भक्ति आपके अंदर पौरुष को जगाती है । आपकी ताकत को कई गुना बढ़ा देती है। जब आप किसी की भक्ति करते हैं तो वह भक्ति आपके अंदर  एक विश्वास पैदा करती है, कि आपके साथ जो भी होगा उचित होगा। वही अंधभक्ति आप को कमजोर कर जाती है। जब आप किसी के अंधभक्त हो जाते हैं तब आप बिना कुछ सोचे आंख मूंद कर उस पर भरोसा कर लेते हैं।
     वैसे कृष्ण की लीला ऐसी है कि अगर आप उनके अंधभक्त होते हैं तब भी वह आपको अंधे होकर आगे गिरने नहीं देंगे । वह हर कठिन समय पर आपको थामे रहेंगे।
कृष्ण लीला के वर्णन में जो अनिर्वचनीय सुख है, वह और कहीं नहीं। यह रस बोलने वाले को भी उतना ही सिक्त करता है जितना सुनने वाले को।
    अगली बार मैं कुछ कृष्ण लीलाओं का वर्णन करूंगा लेकिन वैसे नहीं जैसे आप आज तक सुनते आये हैं।
     कृष्ण चरित्र पर आज तक हमारे कवियों ने साहित्यकारों ने रचनाकारों में बहुत कुछ लिखा है। और कृष्ण को महिमामंडित कर के चमत्कार करने वाले पुरुष के रूप में वर्णित किया है। जिससे हम साधारण जनमानस उनसे एक दूरी महसूस करते हैं। हमें लगता है हमारी सारी समस्याओं को किसी चमत्कार के माध्यम से कृष्ण सुलझा देंगे लेकिन अब इतनी सारी किताबें पढ़ने के बाद मुझे यह जाकर समझ में आया कि राम और कृष्ण ने अपना जीवन बहुत साधारण तरीके से जिया । राजा होते हुए भी वह दोनों सदा एक आम व्यक्ति की तरह अपना जीवन यापन करते रहे । अपने जीवन में आने वाली हर कठिनाई  का उन्होंने खुलकर सामना किया। सिर्फ चमत्कार दिखाकर किसी कठिनाई को पार नहीं लगाया।
    मेरे विचार से उन दोनों ने ऐसा इसलिए किया जिससे हम साधारण जनमानस उन के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को भी सार्थक कर सकें।
श्री कृष्ण ने जीवन में चमत्कार किए लेकिन उन चमत्कारों के पीछे भी हमेशा कोई ना कोई लक्ष्य या कारण मौजूद था। अगली चर्चा में हम आपस में ऐसे ही कुछ विषयों का उल्लेख करेंगे। और आपस में परिचर्चा करेंगे, उम्मीद करता हूँ कि हमारी अगली परिचर्चा सफल सिद्ध होगी।”

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     अपनी बात समाप्त कर वरुण ने सामने बैठे श्रोताओं की तरफ देख कर अपने हाथ जोड़ दिए। सामने बैठे लोगों में अधिकतर लोग मंदिर से बाहर से आए दर्शनार्थी थे, जो वरुण के प्रवचन को सुनने के लिए दर्शनों के बाद बैठ जाया करते थे। उसके अलावा मंदिर परिसर में कार्य करने वाले कुछ एक लड़के थे और भगिनी आश्रम की कुछ महिलाएं भी एक तरफ बैठी हुई थी पारोमिता भी उन्हीं में से एक थी।
     भगिनी आश्रम की महिलाओं की पंक्ति में सबसे सामने बैठी पारोमिता की आंखें पूरी तरह वरुण पर केंद्रित थी।  उसे जाने क्यों वरुण को देख देख कर उसके चेहरे में बीच-बीच में देव की झलक मिल जाया करती थी और उस समय वह अपने मन को मार कर इधर-उधर देखने लगती थी।
     उसे इस तरह खुद का किसी पराए पुरुष की तरफ देखना अच्छा नहीं लग रहा था लेकिन वह अपने मन को उसके चेहरे से अपनी आंखें हटाने के लिए मना भी नहीं पा रही थी। प्रवचन के बीच से उठकर जाना मंदिर के नियमों के विरुद्ध था इसलिए प्रवचन समाप्त होने तक उसे वहां बैठना ही था और उसकी मर्जी से अलग जाकर उसकी आंखें घूम फिर कर वरुण के चेहरे पर केंद्रित हो ही जा रही थी।

  ” गुरुवर आपकी बातें हमें भी कृष्ण सागर में डूबा ले जाती हैं”  एक महिला के ऐसा कहते हैं वरुण ने अपनी बाईं तरफ बैठी महिलाओं की तरफ दृष्टिपात किया और मुस्कुराकर हाथ जोड़ दिए। कि तभी उसकी नजर सामने बैठे पारोमिता पर चली गई।
    और वह खुद कुछ देर के लिए उसे देखता रह गया। अंदर से उसके मन में अचानक ही तरंगे बहने लगी। उसे खुशी का आभास होने लगा, उसे अच्छा लगा कि पारोमिता भी उसे सुनने बैठी है।
    उसका मन किया कि वो कहता रहे और सामने बैठी पारो सुनती रहे। वो उसकी तरफ देख रहा था कि पारो की भी नज़र वरुण पर पड़ गयी..
   वरुण को एकाएक कुछ सूझा ही नही और उसने यूँ ही बिना कुछ सोचे कह दिया…-” आप लोगों के मन में अगर कोई शंका है तो आप पूछ सकती हैं। “
    पारो ने न में सिर हिला कर सिर नीचे कर लिया।

  लोग उठ कर जाने लगे थे। आश्रम की महिलाएं उसी जगह पर गोल घेरा बनाये बैठ गईं और ढोलक मंजीरा बजा बजा कर भजन गाने लगीं।
   उन्हें भजन करते देख पारो ने साथ बैठी सरिता से पूछा और अपनी जगह पर खड़ी हो गयी…-” ए ऐसे भजन बीच में छोड़ कर नही जाते।” उन्हीं महिलाओं में से एक कि कड़वी सी आवाज़ पारो के कान में पड़ी और पारो ने हाथ जोड़ कर बाहर निकलने की अनुमति मांग ली।
     वरुण का मन भी अब तक वहाँ से उठने का नही हो रहा था। वरना बाकी दिनों में प्रवचन के बाद वो उठ कर चला जाया करता था। पर आज दो चार लोगों के बुलाने पर भी वो किसी किताब को खोले वहीं बैठा रहा।
   की उसी वक्त पारो उठ कर बाहर निकल गयी। उसके वहाँ से निकलते ही वरुण का मन भी वहाँ से जाने का करने लगा। कुछ देर अपने मन को मना कर वो कुछ एक दो पन्ने पलटने के बाद आखिर वो भी उठ ही गया।

   परिसर से बाहर निकल इधर उधर देखता वो आगे बढ़ रहा था कि उसके साथ हमेशा बने रहने वाले स्वामी प्रशांत ने उसे टोक दिया…-“क्या हुआ वरुण ?”
   प्रशांत और वरुण ने कृष्ण आश्रम में अपनी यात्रा साथ ही शुरू की थी। कलकत्ता से जिन चार लड़कों की टोली केदारनाथ भेजी गई थी उनमें भी प्रशांत शामिल था। यहाँ तक कि केदारनाथ से वापसी के बाद जब वरुण देव के घर गया था तब भी प्रशांत उसके साथ देव के घर के बाहर तक गया था।
   वो बाहर ही गाड़ी में बैठा वरुण का इंतेज़ार कर रहा था। शुरू से ही साथ होने के कारण दोनो के बीच फ़िज़ूल औपचारिकता की कोई दीवार नही थी, इसी से  दोनों एक दूसरे का नाम ही लिया करते थे।

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   प्रशांत के द्वारा उसे पुकारे जाने पर जैसे वो यथार्थ में लौट आया…-“नही कुछ भी तो नही।”
” किसी को ढूंढ रहे हो क्या?” वरुण के चेहरे पर अपनी आंखें गड़ाए प्रशांत ने सवाल किया और उसकी आंखें देख वरुण खुद में ही झेंप कर रह गया।
   वाकई आश्रम में आकर रहते हुए वो आज कर क्या रहा था। जब से उस लड़की को देखा था जैसे उसका खुद पर से अधिकार ही खत्म हो गया था। जब तक वो वहाँ बैठी थी अच्छा लग रहा था, जैसे ही उठ कर गयी उसका मन भी उसके पीछे जाने को बावला होने लगा।
  पर ये तो गलत था!!! अब प्रशांत को क्या जवाब दे यही सोच रहा था कि प्रशांत ने ही उसकी बेचैनी का जवाब दे दिया…-“वो मंदिर के पीछे तरफ निकली है, शायद वाटिका के पीछे बनी झील पर चली गयी है।”
   वरुण प्रशांत की बात सुन एक बार फिर झेंप गया। अपनी झेंप मिटाने उसने एकदम ही निरर्थक सा सवाल कर दिया…-“कौन ?”
  और प्रशांत ने उसे ऐसी नज़रों से देखा कि वरुण फिर बिना प्रशांत की ओर देखे ही अपने अध्ययन कक्ष की तरफ बढ़ गया…
    प्रशांत भी उसके पीछे चल ही रह था की आश्रम के कुछ लड़के उन दोनों की तरफ चले आये…-” गुरुवर ! आप दोनों को भी गुरु उदयाचार्य अपने कमरे में अभी बुला रहें हैं।”
     सुबह के इस समय पर उदयाचार्य जी अधिकतर आश्रम की ज़रूरतों पर काम किया करते थे। आश्रम से सम्बंधित मीटिंग्स के लिए वो अक्सर दोपहर के खाने के बाद ही सबको बुलाया करते थे। आज अचानक क्या हो गया ये सोचते वरुण और प्रशांत भी तेज कदमों से उनके कमरे की ओर बढ़ चले।
    आश्रम के मुख्य संचालक, अन्य आचार्य और गुरुओं को मिलाकर लगभग ग्यारह बारह लोग  उस आश्रम के प्रमुख लोगों में थे जिनमें वरुण और प्रशांत भी शामिल थे।
   सभी के वहाँ पहुंचते ही उदयाचार्य जी ने अपनी बात कहनी शुरू की…. -” आप सभी को ये बताते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि हर वर्ष की तरह इस बार भी आश्रम का स्थापना दिवस मनाया जाना है। आज से ठीक तीसरे दिन ये शुभ तिथि पड़ेगी और उस दिन पूरे हर्षोल्लास के साथ हम अपने मंदिर आश्रम का स्थापना दिवस मनाएंगे। वैसे तो हर साल श्री श्री गुरुवर अमृताचार्य जी ही यहाँ आते थे लेकिन इस बार वो अमेरिका में स्थित मंदिर के विशेष कार्यक्रम में सम्मिलित होने जा रहे हैं।
  लेकिन इस बात से दुखी होने की आवश्यकता नही है क्योंकि उनकी जगह  इस बार श्री गुरुवर प्रबोध आचार्य हमारे बीच उपस्थित रहेंगे।
    वो अपने ऑस्ट्रेलिया प्रवास से कल ही वापस लौटे हैं और कल शाम तक वो हमारे आश्रम पहुंच जाएंगे। तब तक आश्रम की साफ सफाई और बाकी तैयारियां आप सभी को मिलजुल कर देखना है।
    ये हमने सूची तैयार कर रखी है। आप लोगों के नाम के सामने आपके काम लिखें हैं। अभी हमें थोड़ा बाज़ार का भी काम है तो हम अब निकलेंगे। आप लोग अपने काम के अनुसार अगर आश्रम में किसी प्रकार की कमी देखते हैं या कोई आवश्यकता लगती है तो उसे सूचीबद्ध कर के आज शाम तक हमें दे दीजिएगा। जिससे गुरुवर के आने पर उन्हें आश्रम में कोई कमी न लगे।”

   सूची उन्होंने सामने बैठे एक गुरुजी के हाथ में थमा दी और बाकी काम समेटने लगे।
   अपने नाम के आगे लिखा काम देखते वो लोग सूची आगे बढ़ाते जा रहे थे। 
प्रशांत ने अपना काम देख वरुण की ओर सूची बढ़ा दी। उसके नाम के सामने भगिनी आश्रम की महिलाओं की सहायता से पूरे मंदिर परिसर और आश्रम की पुष्प सज्जा के साथ ही गोपाल जी के वस्त्रो आदि की तैयारी लिखी थी।
  अपना अपना काम देख सभी लोग वहां से निकल गए।
  ” चलो फटाफट खाना खा कर अपना अपना काम देखना होगा। अब समय ही कहाँ बचा है। कल तक तो गुरुवर आ जाएंगे।”
  ” हाँ ! लेकिन प्रशांत ये बताओ कि ये गुरुवर हैं कौन?”
   ” ये श्री श्री स्वामी जी के परम शिष्य हैं। कहा जाता है बचपन में एक बार ये अपनी कक्षा में फेल हो गए, तब ये  नौ दस साल के रहे होंगे। इनके पिता ने क्रोधित हो इन्हें घर के बाहर निकाल कर दरवाज़ा बंद कर दिया। कुछ समय बाद जब पिता जी का गुस्सा शांत हुआ तब उन्होंने दरवाज़ा खोला तो ये वहां से गायब थे। अब इनकी ढूंढ मची तो पता चला ये गांव के बाहर की चौपाल पर अपना आसन जमाये बैठे थे। माता पिता सबने विनती चिरौरी कर ली लेकिन फिर ये लौट कर घर वापस नही गए। इनकीं माँ इनका खाना पीना सब वहीं ले आती। ये कभी खाते, कभी चार पांच दिन बिना खाये पड़े रहते। माँ रो रोकर आधी हो गईं पर ये घर वापस नही लौटे। एक सुबह जब इनके माता पिता रोज़ की तरह इनका भोजन लेकर वहाँ पहुंचे तो ये अपनी जगह नही थे। बाद में पता चला कि श्री स्वामी अमृताचार्य जी की गाड़ी उधर से निकली थी और स्वामी जी ने इनसे रुक कर कुछ बातचीत की और इनकी विद्वत्ता से इतने प्रभावित हुए कि इन्हें अपने साथ ले लिया। एक पत्र इनके माता पिता के नाम छोड़ गए जिसमें अपना पता ठिकाना सब लिख गए थे।
   इनके माता पिता कई बार इनसे मिलने आये लेकिन ये फिर कभी वापस नही लौटे। हालांकि इनकीं नाराज़गी तो बहुत पहले ही दूर हो गयी थी। कहा जाता है श्री श्री स्वामी जी ने इन्हें खूब शिक्षा दिलवाई और अब ये देश विदेश में घूम घूम कर प्रवचन देते हैं। उम्र तो यही कोई अट्ठाईस उनतीस के लगभग होगी पर अपने ज्ञान से ये हर तरफ छा गए हैं।
   मेरा इनसे मिलने का बहुत मन था, अब कल उनके दर्शन कर धन्य हो जाऊंगा। “

” अब तुमसे इतनी तारीफ सुन कर मेरा भी मन इनके दर्शन करने का होने लगा है।

” तुम्हें तो भई चुन कर भगिनी आश्रम मिला है। काम करते हुए उसे भी ढूंढ लेना, कुछ देर पहले जिसके पीछे जाते हुए कमरे का रास्ता भूल गए थे। “

” क्या कह रहे हो प्रशांत। मंदिर है ये और हम इसे अपवित्र नही कर सकते। “

” माफ करो दोस्त। मैं सिर्फ मज़ाक कर रहा था। चलों अपना काम धाम देखें। “

  प्रशांत ने उस वक्त बात बदल ज़रूर दी लेकिन वरुण के मन में ये बात रह गयी। क्या उसका बर्ताव वाकई पारोमिता के लिए अलग से दिखाई दे गया था। ऐसा हुआ तब तो आज प्रशांत ने उसे पकड़ा कल कोई और पकड़ लेगा।
   ऐसा होना तो ठीक नही है। अब उसे अपने मन को।कड़ा कर रखना होगा। चाहे कुछ भी हो जाये वो अब उस लड़की की तरफ आंख उठा कर भी नही देखेगा।

अपने संकल्प को मन ही मन दुहराते  वो अपने कमरे की ओर बढ़ रहा था कि सामने से तेज़ी से आती पारो ठीक उसके सामने तक आकर रुक गयी। अगर नही रुकती तो ज़रूर वरुण से टकरा चुकी होती। वरुण अपने दोनो हाथों को खड़ा कर ज़रा पीछे हो सतर खड़ा हो गया..-” माफ कीजियेगा ।” कह कर वो एक ओर से होकर आगे निकल गयी, और एक बार फिर उसका पीछा करती वरुण की आंखें दूर तक पारो के पीछे चलती चली गईं।

क्रमशः

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aparna ….


      


  

शादी.कॉम -23

मुलाकात : राजा और बांसुरी की

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   शादी डॉट कॉम:- 23

     समय!!! समय को किसी से लेना देना नही होता, उसे सिर्फ चलना है ,चाहे कोई लाख चाहे की वो रुक जाये ठहर जाये ,पर नही समय अपनी गति से ही भागेगा।।

      इन पांच साढ़े पांच सालों में राजा और बांसुरी के घरों में परिवारों में मुहल्ले में बहुत कुछ बदल गया।
   युवराज भैया ने दो नयी एजेंसी डाल दी,सिर्फ रुपयों पैसों मे ही उनका रुतबा नही बढ़ा बल्कि घर परिवार में भी बढ़ गया,जहां पहले वो घर के सबसे बड़े लड़के थे अब एक छोटे से बालक के पिता हो गये, रूपा पहले ही अभिमानिनी थी अब पुत्र की जननी होकर उस अभिमान के सोने पे सुहागा चढ़ गया।।
     खाता पीता परिवार सदा मधुमक्खियों के छत्ते सा होता है,छत्ते में एकत्र मधु के लालच में जैसे मक्खियां भिनकती हैं ऐसे ही नाते रिश्तेदार घेरे रहते हैं ।।
   
    राधेश्याम जी के घर पर भी बेला कुबेला कुछ ना कुछ होता ही रहता था,कोई तीज त्योहार,मुंडन छेदन,सीक सुहागिल हो,इसी बहाने घर परिवार की औरतों को बहाना मिल जाता,पहले तो सब दबी ढकी आवाज़ में ही राजा के ब्याह के प्रगति पत्र का जायजा लेती थी,पर अब वही ज़बान खुलने लगी थी।।
     जब घर की माल्किन ही मुहँ मे दही जमा के बैठी हो तो बोलने वालियों को मौका तो मिल ही जायेगा ना।।
    
” काये हो सुशीला बहन?? कब खिला रही हो रजुआ के ब्याह का लड्डू।”
     पड़ोस की बिन्नी काकी अपनी मित्र मंडली में अपने मुहँफट स्वभाव के लिये जानी जाती थी

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” अरे बिन्नी जिज्जी हम तो सुन रहे रजुआ कहीं का बड़ा आफीसर बन गया है,,क्यो सुसीला  तुम नही बताई कभी ,अरे कहाँ का लार्ड कमिस्नर हो गया है राजा।”

” अरे तुम लोग  भी ना!! अपने अपने कोच के पेड़े को निहारो ना,सुहागिल तो निबटने दो तब हम बताएंगे कहाँ का लार्ड गवर्नर बना है हमारा राजा।”

“चाची जी!! लल्ला जी के लाने ही तो अम्मा जी सुहागिल खिला रही हैं,जो मन्नत मानी थी वो पूरी जो हो गयी।।”

” हां भई रूपा !! अब तो जैसे तुम्हरे कन्हैय्या को गोद खिला रही ऐसे ही एक और बहुरिया आ जाये उसका भी एक आध लड़का लड़की कुछ हो जाये बस फिर तो सुसीला और भाई साहब के सब तीरथ हुई जायें।”

” तुम्हरे मुहँ मा घी सक्कर।।”

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         जी में आता है, तेरे दामन में सर झुका के हम
               रोते रहें, रोते रहें…….
        तेरी भी आँखों में, आंसूओं की, नमी तो नहीं
        तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई, शिकवा, तो नहीं..
       तेरे बिना ज़िन्दगी भी लेकिन, ज़िन्दगी, तो नहीं
       ज़िन्दगी नहीं, ज़िन्दगी नहीं, ज़िन्दगी नहीं……

माला– ओ मैडम !! और कोई गाना नही है आपके पास!!क्या यार,सुबह सुबह यही मनहूस गाना बजा देती हो।।

   माला की बात पर बांसुरी मुस्कुरा के वापस तैयार होने लगी….

माला– बस यही तो है!! आपसे हम कुछ भी कह लें आप बस अपनी कातिल मुस्कान फेंक दीजिये हम पे

बांसुरी- चलो चलो जल्दी से तुम भी तैयार हो जाओ, आज  बॉस ने तो सुबह सुबह ही मीटिंग बुलाई है।

माला- हाँ जी मुझे पता है, सुनने में आ रहा था की आर.बी.आई. की टीम आने वाली है।।

  बाँसुरी ने हाथ पे घड़ी बांधते हुए हामी में सर हिला दिया।।

     अम्बा जी गढी से एक साल पहले ही बांसुरी को अपनी दुसरी पोस्टिंग पुणे में मिल गयी थी, पहले पहल वर्किंग वीमेंस हॉस्टल मे  रहने के कुछ समय बाद सदाशिव पेठ में बांसुरी अपने ऑफिस की कुलीग माला के साथ शेयरिंग फ्लैट में  रहने चली आयी थी…..
        दोनों सखियाँ साथ ही ऑफिस आती जाती,
मस्तमौला और हंसमुख स्वभाव की माला बेहद बातूनी थी इसीसे उसके स्कूल कॉलेज घर परिवार ,पास के दूर के नाते रिश्तेदार हर किसी के बारे में बांसुरी को सब कुछ पता था,पर माला के बार बार पूछने पता करने पर भी जाने क्यों बांसुरी ने उससे उतनी ही बातें बताईं जितनी ना बताती तो भी कोई फर्क नही पड़ता।।

      बांसुरी का अपने घर जाना बहुत कम हो गया था,हर रविवार वो अपनी मम्मी को फोन कर घर परिवार का हाल समाचार लेती रहती थी, गाहे बगाहे बड़ी बहन वीणा भी उसे फोन कर शादी कर लेने का उलाहना सुनाती रहती थी।।

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     मम्मी पापा से बात कर घर की ,अपने मोहल्ले की अपने शहर की याद जब हद से ज्यादा सताने लगती तब वो अपनी छोटी सी टाउनशिप में बने बड़े से जिम पहुंच जाती,माला इस बात पे अक्सर उसे आड़े हाथों लिया करती __ ‘ अरे कभी समय भी तो देख लिया कर,,रोज़ तो सुबह सुबह जिम पहुंच ही जाती है,फिर अचानक क्या होता है तुझे जो कभी शाम मे कभी रात में 9 बजे जिम भाग जाती है, यार फिटनेस फ्रीक होना अच्छी बात है पर तू तो साइको होती जा रही है,अपने आप को देख ….बिल्कुल जीरो फिगर हो गयी है,कहीं कुछ समय बाद गायब ना हो जाना।।

      ” तेरी तो हर बात अजीब ही लगती है बन्सी!! अब इस मोबाइल के ज़माने में चिट्ठियां कौन लिखता है तुझे,,किसी दिन तेरे इस पेन फ्रेंड को पकड़ के रहूंगी।”
   पर माला बस ताने मार के अपनी बात खुद भूल जाती,इतने महिनों से आने वाली चिट्ठियों को ना कभी उसने पढ़ने की कोशिश की और ना चिट्ठी भेजने वाले को पकड़ने की।।
      हर पन्द्रह बीस दिन में आने वाली इन चिट्ठियों में जैसे बांसुरी की जान बसती थी,, बुआ की लिखी इन चिट्ठियों में सारे रिश्तेदारों का हाल समाचार रहता था,पर कहीं किसी कोने में बुआ हमेशा उसके बारे में भी एक लाइन लिख ही जाती थी और उसी एक नाम की अमृत बूंद पूरे महीने के लिये बांसुरी को जीने का बहाना दे जाती।।
      ” क्या बताऊँ छोरी!! तेरे पीछे से रजुआ ने तो घर से निकलना ही छोड़ दिया है।।”
  
    ” बिटिया सुनने मे आ रहा सुसीला का छोरा भी कोई परीक्षा दे रहा।।”
  
      ऐसे ही समय समय पर बिना बांसुरी के पुछे भी बुआ जी राजा के बारे में यत्न पूर्वक हर खबर उसे दे जाती।
    
      “कितना दुबला गया है का बताएँ लाड़ो,लम्बा तो पहले ही भतेरा था,अब तो पूरा ताड़ लगने लगा है।”
   
      ” सुना है सुसीला ने जहर खाने की भी धमकी दे डाली सादी कराने,,,पर मजाल लड़के के कान में जूं भी रेंग जाये।”
    
      “बिटिया कोई कोई तो जे भी कह रहा की रजुआ दीछा उक्छा (दीक्षा) लेने वाला है।”
     
       ” मुझे तो कभी कभी डर लागे है छोरी,जे छोरा किसी कनफड़े गुरू की शरण में हिमालय ना निकल जाये।”

    ऐसे ही बताने योग्य-अयोग्य हर बात बुआ जी बिना किसी आडम्बर के लिख जाती और मात्र उस एक पंक्ति में छिपे अपने जीवन की सार्थकता को बड़े यत्न से बांसुरी अपनी इत्र से सुवासित हाथी दांत की बनी डिबिया में सहेज लेती ।
      जैसे उसके जीवन में अब दो ही महत्वपूर्ण बातें बची थी,एक रोज़ का जिम और दूसरा बुआ जी की चिट्टीयां।।

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     दोनों भागती दौड़ती स्टॉप पे लगभग समय से पहुंच ही जाती थी,उनके बैंक की गाड़ी उन्हें लेने और छोड़ने आया करती जिसमें उनके अलावा आस पास के और भी एम्प्लायी हुआ करते।
     और दिनों की तरह उस दिन भी गाड़ी में सब होने वाली मीटिंग की चर्चा में लगे थे।।

” बांसुरी यार तू संभाल लियो ज़रा।। उस बड़बोले सिद्धार्थ की तेरे सामने ही बस बोलती बन्द रहती है,वर्ना हम सब को तो वो आंखो से ही गोली मार देता है हिटलर!।।

” शट अप राहुल!! फिजूल में बांसुरी को परेशान ना करो,और बॉस के बारे में ऐसा बोलते शरम नही आती।।”

” नो माला!! बिल्कुल शरम नही आती,उस खबीस बॉस को शरम आती है,इतनी सारी लड़कियों के सामने मुझ जैसे हैण्डसम बन्दे को यूँ लताड़ देता है, फिर!!! मुझे तो उसे कमीना बोलने मे भी शरम नही आती।।

” कम ऑन राहुल!! जब तुम बॉस बनोगे तब तुम भी ऐसे ही हो जाओगे,क्यों है ना बांसुरी ।।”

  बांसुरी मुस्कुरा के रह गयी

” बांसुरी यार कहाँ खोयी रहती है तू,बस हर बात का एक ही जवाब,तेरी स्माईल !! कोई लड़की इतना कम भी बोल सकती है मैनें कभी सोचा भी ना था,चलो यार भागे,,जल्दी से तैयारी कर लेते हैं,सिद्धार्थ आता ही होगा।।”

   कॉर्पोरेट जगत को कई मायनों में अन्ग्रेजी सभ्यता का अनुगामी माना जा सकता है,व्यवसायिक पाठ्यक्रमों में जहां सीनियर्स के लिये सर और मैडम बोलना प्रारंभ हुआ वही कॉरपोरेट में चाहे आपका सीनियर आपसे 30 साल भी बड़ा हो पूरे आदर के साथ उनका भी नाम ही लिया जाता है।

  बांसुरी के बैंक में भी कई सहकर्मी थे हर आकार प्रकार के,अलग अलग धर्म -जाति और उम्र के।।
    बांसुरी का ऑफिस का कार्य लोन इत्यादी से सम्बंधित था जहां उसे सिद्धार्थ को रिपोर्ट करना होता था,सिद्धार्थ 29-30 साल का नौजवान था जिसने बैंकिंग में कई श्रेणियाँ उत्तीर्ण कर अपने लिये यथोचित स्थान और सम्मान कमा लिया था।।

सिद्धार्थ- हेलो फ्रेंड्स ,जैसा की आप सभी जानतें हैं, आर बी आई का दौरा होने वाला है,और हमे इस बार उनकी हर बात उनकी हर चुनौती के लिये तैयार रहना है।।
     उनकी सबसे ज्यादा नज़र लोनधारकों से जुड़ी है,तो मैं चाहता हूँ बांसुरी,राहुल और नेहा आप तीन लोग टीम बनाकर इस काम में लग जायें।
    किसी भी खाता धारक के पेपर्स अधूरे नही होने चाहिये,कोई भी रैंडम पेपर्स वो लोग मांग सकते हैं।
         बड़ी सरकारी डील्स,एन जी ओ के साथ हुई डील्स और बड़ी ज़मीनों के लीज वगैरह के कोई पेपर कच्चे ना रहे,और हो सके तो आप लोग एक बार क्या क्या पूछा जा सकता है उनके जवाबों की रिहर्सल भी कर लेना,,ओके गाईज़।


 
   इसी तरह की कई अति महत्वपूर्ण चर्चाओ को निबटा कर सिद्धार्थ अपने केबिन में चला गया।।

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  ” भई हम तो सिर्फ टाईम पास कर रहे यहाँ,काम तो बस दो ही बन्दे करते हैं एक सिद्धार्थ दूसरा बांसुरी।”

  ” क्यों राहुल,ऐसा क्यों बोल रहे।”

   ‘” और क्या ,सही तो कह रहा हूँ,बन्दे को और कोई तो नज़र ही नही आता,सारी प्लानिंग्स बस एक ही को बताईं जाती हैं बांसुरी मैडम को,अमा यार हम भी खड़े हैं,जब हमारा नाम ले रहे हो तब तो हमें देख लो, यार बांसुरी इसने तुझे अब तक प्रपोज़ कैसे नही किया।।”

   बांसुरी- बकवास मत करो राहुल!! सिद्धार्थ को लगता है कि हमें जल्दी से कुछ समझ नही आता इसिलिए हमे ही सब कुछ एक्सप्लेन करते हैं।”

   राहुल- वॉव ग्रेट!! अच्छी जोड़ी है तुम दोनो की,सच कहता हूँ बांसुरी तुम सोच सकती हो बन्दे के बारे में,अरे दक्षिण भारतीय है तो क्या हुआ है तो वेदुला ब्राम्हण।।नार्थ वेद्स साऊथ,बेहतरीन जोड़ी जमेगी।”
      राहुल की बात अनसुनी कर बांसुरी अपने डेस्क पे चली गयी,राहुल की हमेशा की ही आदत थी जिसे बांसुरी ही क्या कोई भी गम्भीरता से नही लेता था, पर यही हँसी मजाक की बातें सिद्धार्थ के कानों में भी पहुंचने लगी थी।।

      29 साल का सिद्धार्थ तेलुगू ब्राम्हण परिवार का इकलौता लड़का था,इंजिनीयरिंग की पढ़ाई के दौरान ही विदेशों में आगे की पढ़ाई के लिये की जाने वाली टफेल में सफल नही हो पाने के बाद उसने प्रथम प्रयास में ही बैंक पी.ओ.का इम्तिहान पास कर लिया था,और उसके बाद सिलसिलेवार अपनी मेहनत और बुद्धि के बल पर अच्छे खासे सिनियर्स को पीछे छोड़ते हुए वो उच्च पद पर आसीन था।

       पढ़ा लिखा नये ज़माने का सिद्धार्थ जो पहले बात बात पे शादी का माखौल उडाया करता था,उसके लिये उसके कैरियर से अधिक कोई बात महत्वपूर्ण नही रही थी,पर अब इधर कुछ दिनो से शादी ब्याह को लेकर गम्भीर होने लगा था,एक दिन हँसी मजाक में उसने अपनी माँ से पूछ भी लिया__ कि अगर वो किसी उत्तर भारतीय कन्या से विवाह करना चाहे तो क्या उसकी माँ को आपत्ति हो सकती है के जवाब में उसकी माँ ने आगे बढ़कर अपने बेटे का माथा चूम लिया और उसकी खुशी में ही अपनी खुशी का ठप्पा लगा दिया था।।
         
       दुबली पतली सांवली सलोनी चुप चाप अपने काम में लगी रहने वाली बांसुरी पहली ही नज़र में उसे बहुत भा गयी थी,पर आज तक किसी बहाने भी सिद्धार्थ उससे अपने दिल की बात नही कह पाया था…..
     नये साल की पार्टी में जब उसे जबर्दस्ती माईक पकड़ा दिया गया था तब कितने मन से उसने बांसुरी की तरफ देखते हुए गाया था__

    एक अजनबी हसीना से यूँ मुलाकात हो गयी
  फिर क्या हुआ ये ना पूछो कुछ ऐसी बात हो गयी।

   उसी के बाद से राहुल और ऑफिस के कुछ एक उसके हमउम्र सहकर्मी बांसुरी को उसके नाम से छेड़ने लगे थे,उसे अपने केबिन से ये सब हल्की फुल्की गपशप सुनना बड़ा पसंद आता था पर आज तक उसके नाम पे बांसुरी को चहकते उसने कभी नही देखा था,बल्कि नये साल की पार्टी वाले दिन भी जब सबने उसे गाने का इसरार किया तब भी कैसा तो मनहूस सा गाना गाया था उसने__

     तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नही…

पर जो भी हो ,उसे धीर गम्भीर सी चुप चाप सी रहने वाली बांसुरी ने मोह लिया था। इसिलिए इतना ध्यान रखने पर भी कोई ना कोई चूक उससे हो ही जाती थी, जब कभी बांसुरी के साथ बाकी लोगो को वो काम के बारे में कुछ भी बताया करता उसकी नज़रे सिर्फ और सिर्फ बांसुरी पर ही टिकी होती।
 
    आज की इतनी महत्वपूर्ण मीटिंग में भी यही हुआ।

    इस मीटिंग के पूरी होते ही सारे लोग अपने अपने क्यूबिक पे जाकर काम पर जुट गये।।
     वैसे तो आर बी आई की टीम इसके पहले भी विज़िट पे आ चुकी थी,पर वो विजिट तकरीबन 8 साल पहले हुई थी,इसीसे इस बार तैयारियाँ कुछ अधिक ही उफान पर थी,इस बार 3 लोगों की टीम आ रही थी जो पूरे पांच दिन रह कर अलग अलग विषयों पर बैंकर्स को ट्रेनिंग देकर और उनका ऑडिट कर जाने वाली थी,जिनमें शुरु के दो दिन ऑडिट के थे और बाकी के दिन ट्रेनिंग के।।

    सभी को ऑडिट का ही डर सता रहा था,जितनी भी इमानदारी बरती जाये कही ना कहीं कोई ना कोई फाइल ऐसी कच्ची रह ही जाती है जिसपे ऑडिटर की पैनी नज़र पड़ ही जाती है।
     
   अपना काम जल्दी निपटा कर बांसुरी माला के क्यूबिक में पहुंची__

बांसुरी-” क्या हुआ माला मैडम?? अभी तक समेटा नही ,सब का सब फैला पड़ा है।।”

माला- अरे नही यार!! ये कहाँ कहाँ से आते है धारक!!बोल बोल के हम बैंकर्स मर जायेंगे पर मजाल है जो ये लोग सारे के सारे पेपर्स एक बार में जमा कर दें,खैर तूने कर लिया क्या सारा काम।

बांसुरी- हाँ डाटा हैंडलिंग तो कर ली सारी,बाकी भी फाइल्स कर ली है ,कुछ थोड़ा सा चेक करना है वो रूम पे हम कर लेंगे,तुम्हें और कितना समय लगेगा।

माला- क्यों तुझे निकलना है क्या??

बांसुरी- हां ….वो आज मंगल है ना हमे मन्दिर जाना है।

माला- अरे हाँ यार!! मैं भूल कैसे गयी?? तेरा तो हर मंगलवार एपॉइंटमेंट रहता है ना हनुमान जी के साथ, तो तू निकल ले,मैं सीधे रूम पे ही पहुंचती हूँ ।।और बन्सी यार आज कुछ अच्छा सा पका लेना खाने में,बॉस ने आज कुछ ज्यादा ही पका दिया ऑफिस में ।

बांसुरी- नाम भी बता दो डिश का ,क्या खाना है।।
  हँसते हुए बाँसुरी अपना बैग लटकाये माला से विदा लेकर मन्दिर के लिये निकल गयी।।

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   ऑफिस से मन्दिर दूर था,जल्दी जल्दी भागती दौड़ती बांसुरी ने बस पकड़ी और आरती शुरु होने के पहले पहुंच गयी।।
     मंदिर की भीड़-भाड़ में उसे आज काफ़ी पीछे खड़े होना पड़ा,अपनी जगह पर खड़ी दोनो हाथ जोड़े वो वापस अपने शहर पहुंच गयी थी।
    इसिलिए तो शायद हर मंगलवार वो यहाँ आया करती थी,यहाँ पहुंचते ही कितना सुकून मिलता था, सब कुछ सिलसिलेवार याद आने लगता था,हर मंगल के लिये एक ही स्मृति उसके मानस पटल पर अंकित थी,पर वही एक स्मृति हर बार उसे पुलकित कर जाती थी,जब वो राजा के पीछे उसकी बुलेट पे बैठी पहली बार बड़े हनुमान मन्दिर गयी थी, दोनो ने साथ ही हाथ जोड़े थे और उसके बाद लगभग दस मिनट तक आँख बन्द किये राजा के होंठ धीरे धीरे कुछ बुदबुदाते रहे थे और वो निर्निमेष उसे देखती खड़ी थी।।
      लोग कहतें हैं वस्तुएं बेजान होती हैं,पर वही किसी की स्मृति से जुड़ कर कैसी सजीव हो उठती हैं।
  इसी मन्दिर से पहली बार निकलते समय बाहर की छोटी सी फूलों की गुमटी में लटकी रुद्राक्ष की माला उसे कैसे मोह गयी थी,और उसने झट उसे खरीद लिया था,वैसा ही रुद्राक्ष तो वो सदा अपने दायें हाथ में पहना करता था।
       गोरे चौड़े से मणिबंध में कसा रुद्राक्ष कितनी ही बार उसकी धड़कनों में उथल पुथल मचा चुका था।।
 
    राडो की उसकी घड़ी,रे बैन के ग्लास ऐसा कौन सा उसका स्मृति चिह्न था जो बांसुरी ने सहेज के ना रखा हो,ये सारी वस्तुएं अपनी कमाई से खरीद खरीद कर उसने अपनी आलमारी के एक हिस्से में ऐसे सजा रखी थी जैसे खुद राजा ही उस हिस्से में आकर बस गया था।

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      अपने विचारों मे मगन बांसुरी ने आंखें खोली तो एक बारगी उसका दिल धक से रह गया…..
      उसके सामने खड़े लोगों में थोड़ा आगे राजा से डील डौल वाला कोई खड़ा था ।।

   हाँ वही तो लग रहा है,वही चौड़े कंधे,वही घने बाल!! फिर अपनी ही सोच पे बांसुरी को हँसी आ गयी__ ‘वो आकृति हृदय में ऐसी छप गयी है कि हर जगह वही नज़र आता है’  यहाँ कहाँ से राजा प्रकट हो जायेगा।।
        पांच साल से अधिक समय बीत चुका उसे देखे ,,उस शाम के बाद तो गुस्से में उसका नम्बर भी  फ़ोन से हटा दिया था,पर दिल से कहाँ  हटा पायी।।

     इसिलिए कभी कहीं कोई छै फुटिया गोरा चिट्टा नज़र आता तो मुस्कुरा के रह जाती,अपने आप को समझा के __ नही ये वो नही है।।
    उसके यहाँ दूध देने आने वाला गोपाल अलाहाबाद का ही तो है,उसकी आवाज़ और बोलने का तरीका कितना मिलता है राजा से,, इसिलिए आगे पीछे जब समय मिल जाये बांसुरी उससे दो बातें कर ही लेती है।।

     कई बार अपने मन को समझा चुकी,इतना सब उसके लिये कर के भी उसी से बात करने में इतना संकोच क्यों।।
     उस शाम के बाद कितना इन्तजार किया था बांसुरी ने कि एक बार वापस राजा फोन कर ले,तुरंत दौड़ कर उसके पास चली जाऊंगी ,उसकी माँ के भी
पांव पकड़ लूंगी…पर वो राह तकती रह गयी,कोई फ़ोन नही आया,और फिर इम्तिहान पास कर वो दूसरे शहर चली आयी ,,पर हर दफा उसकी आंखे और कान फोन की रिंग पर ही बने रहे।।
     एक फ़ोन तक करना राजा ने ज़रूरी नही समझा।।

    अपने मन को कितना मारा था उसने और आखिर अपनी सारी हिम्मत जुटा के अपनी पहली पोस्टिंग के बारे में बताने राजा को खुद ही फ़ोन लगा लिया।
      पर हाय री किस्मत!! फोन उठाया भी किसने, रूपा भाभी ने,,कैसी कड़वी थी वो बात चीत __ ” अच्छा तो नौकरी लग गयी तुम्हारी,चलो अच्छा हुआ, वर्ना जैसा रंग है ऐसे में लड़का मिलना बहुते मुस्किल होता,है ना बांसुरी!!! अब वहीं अपने बैंक में ही कोई ठीक ठाक छोकरा पकड़ ब्याह कर लेना,तुम्हारे लिये भी वही अच्छा रहेगा।”

” हमारे ब्याह की चिंता करने की आप को ज़रूरत नही है भाभी,हमारे मम्मी पापा हैं ये सब देखने के लिये।”

” मम्मी पापा को भी कहाँ मौका दे रही हो,तुम तो खुदे खोजे पड़ी हो,सोभा देता है का लडकियों का ऐसे उज्जडपना ,आप ही बता रहीं कि अम्मा हमारे फेरे फिरा दो अब…अब हमें मायके में नींद नही आती, वैसे तुम्हें बता दे कि हमारे लल्ला जी ने तो अम्मा के चरणों की सौगन्ध उठा ली है कि उनकी पसंद की लड़की से ही ब्याह करेंगे चाहे भले कानी लूली क्यों ना हो।।”

अपमान से बांसुरी के कान जलने लगे….

” आपकी रेखा से तो ठीक ही हैं,उसने तो बताने की भी ज़रूरत ना समझी ,खुद ही मन्दिर में माला बदल आयी,और सीधे आशीर्वाद लेने पहुंच गयी।”
   बोल कर तड़ाक से फोन काट दिया था उसने, बिस्तर पर पड़ी कितनी देर तक रोती रह गयी थी….
पता नही रूपा भाभी की बात में कितनी सच्चाई थी पर उस दिन के बाद से उसने कभी राजा को फ़ोन नही लगाया,,बहुत बार उठा कर फिर वापस रख दिया था।।
     आज मन्दिर में उस लड़के को पीछे से देख बिल्कुल ऐसा लगा जैसे मानो राजा ही दोनो हाथ जोड़े आंखे बन्द किये होंठो में कुछ बुदबुदाता खड़ा है,एक बार को मन किया कि उस तक पहुंच जाये,बाजू में जाकर कम से कम चेहरा तो देख ही सकती है,पर फिर अपनी ही बुद्धि पे हँसी आने लगी, कैसी बचकानी हरकत होगी ये,कहीं वो कोई और निकला तो?? क्या कहेगी ,कि क्यों उसे देख रही थी।।और चलो मान लिया कहीं राजा ही निकल गया तो???
     इस तो का कोई जवाब बांसुरी के पास नही था, ऐसा होना सर्वथा असम्भव था,मुस्कुरा के एक बार और प्रणाम कर वो मन्दिर से बाहर निकल गयी।।

***********

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     रोज़ सुबह 9 बजे खुलने वाला बैंक आज सुबह 6 बजे से ही खुल गया था,पूरे बैंक को झाड़ पोंछ कर चमका दिया गया था,बैंक ऐसा दिख रहा था जैसे ताजी बनी काजू कतली पे लगा चांदी का वर्क।
      और दिनों की तरह सरकारी बैंक वाला ठप्पा आज यहाँ कही नज़र नही आ रहा था,बिल्कुल किसी शानदार प्राईवेट मल्टीनेशनल बैंक की तरह चमकते अपने बैंक को देख बांसुरी और माला की आंखें भी खुशी से चमक उठी थी।।
     वैसे उन लोगो का कोई फॉर्मल ड्रेस कोड नही था,पर आज सारे ही लोगों को समरसता दिखाने की ताकीद की गयी थी,इसीसे सभी पुरूष सफेद शर्ट में और महिलाएं केरला ओणम वाली क्रीम कलर की साड़ी में थी।।
       आर बी आई की आने वाली टीम के दो सीनियर मेंबर चेन्नई से आ रहे थे और एक मेंबर कोच्ची से था।।
        अपने निर्धारित समय से दस मिनट पहले ही टीम वहाँ पहुंच गयी, सभी कर्मचारी अपने क़्युबिक में अपने अपने काम पर लगे हुए थे, लोगों की भी भीड़-भाड़ बढ़ चुकी थी,ऐसे में टीम धीरे-धीरे सब जायजा लेती एक से दूसरी जगह तफरीह कर रही थी,पहले बताया गया था 3 लोग आने वाले हैं,पर कुल 4 लोग आये थे,जिनमें से 2 अन्दर वाले हॉल में ऑडिट शुरु करने चले गये थे…बाकी दो लोग कर्मचारियों से मिलते जुलते उनकी डेस्क पर ही किसी भी फाइल को पूछ ले रहे थे।।

     कुछ थोड़ी ही देर में सिद्धार्थ हडबडाया सा बांसुरी के डेस्क पे आया__” बाँसुरी वो लीज़ वाली फाइल ले कर तुम आ जाओ ,एक्सप्लेन करना पड़ेगा,असल में वो काम मैनें देखा ही नही था,और उसीकी फाइल मांग रहे हैं,तुम आ जाओ जल्दी!!

    बांसुरी फाइल लिये सिद्धार्थ के केबिन में पहुंची ही थी कि टीम में से किसी ने कॉफ़ी की फरमाइश कर दी __” हमें तो सिद्धार्थ जी चाय ही पिलवाइये, कल जब से पुणे आये हैं,ढंग की एक भी चाय नही मिली।”
 
     बांसुरी का दिल उछल कर मुहँ को आ गया,ये आवाज़ तो राजा की थी,हाँ उसी की थी….अपनी  आखिरी सांस तक भी कभी इस गहरी आवाज़ को भूल पायेगी क्या, आवाज़ की तरफ उसने मुड़ कर देखा, रिवॉलविंग चेयर पे वही तो बैठा था,अपनी सफेद कमीज की बाहों को कुहनीयों तक मोड़ कर दाहिने हाथ मे ऑडिटर वाली पेन्सिल पकड़े टेबल पर पड़ी फाइल को देखता,,बिल्कुल वैसे का वैसा।। पर बुआ सही कह रही थी ,कुछ दुबला हो गया था,और ये चश्मा कब लग गया जनाब को।।
       अपने इस अवतार में तो और भी लुभावना हो गया था राजा!!
      राजा को देख ही रही थी कि राजा से उसके किसी साथी ने कुछ कहा,जिसे सुन वो खिलखिला के ज़ोर से हँसा और तभी उसकी नज़र दरवाजे पे खड़ी बांसुरी पर पड़ गयी।।

क्रमश:

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aparna..

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शादी.कॉम – 22

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      आँधी की तरह उड़कर इक राह गुज़रती है
       शरमाती हुई कोई क़दमों से उतरती है
           इन रेशमी राहों में इक राह तो वो होगी
         तुम तक जो पहुंचती है इस मोड़ से जाती है                                                              इस मोड़ से जाते हैं……  
      कुछ सुस्त कदम रस्ते,कुछ तेज़ कदम राहें…

  अपने कमरे में बैठी बांसुरी को समझ ही नही आ रहा था कि उसने सही किया या गलत….अपनी माँ का मुरझाया चेहरा वो कभी भी सहन नही कर पाती थी,उस समय भावावेश में आकर उसने राजा की अम्मा को खरी खोटी सुना तो दी पर अब रह रह के राजा का बुझा बुझा सा चेहरा ,जाते समय उसे रोकती हुई राजा की आंखें सब याद आ रहा था, बांसुरी जैसे खुद से ही बातें कर रही थी__ अच्छे से जानती हूँ,मेरे सामने तक तो मुहँ खोल नही पाता अपनी अम्मा के सामने क्या बोलेगा,बस नाम का राजा बाबू है,सारी होशियारी प्रिंस और प्रेम तक ही सीमित है,,बातें इनकी निकलेंगी जब वसूली करने जातें हैं,बाकी समय तो बस सर हिला के ही काम चला लेंगे….अरे पर एक बार तो अपनी अम्मा को टोक सकता था।”

  बांसुरी का मन राजा से बात करने के लिये व्याकुल हो उठा,

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          पर हाय रे मन!! मन की भी शायद अपनी आत्मा होती है, देह होता है ,तभी तो हर बड़ी छोटी बात को खुद से लगा लेता है,हाड़ मांस से बने शरीर को जितनी चोट नही पहुंचती उससे कहीं अधिक मन चोटिल हो जाता है….
         ऐसे समय जब कोई अपने प्रेम को  सर्वोपरी रख अपनी या सामने वाले की गलती पे झुक जाना चाहे ये मन देवदार बन जाता है,अकड़ के तन जाता है,और हर एक इच्छा को अपने नैनों से तोल कर निर्णय लेता है।।
    यही बांसुरी के साथ हुआ!!उसे मन्दिर में जो सही लगा उसने कर दिया पर अभी उसका मन राजा के लिये रो पड़ा,कैसे भी किसी भी हाल में उससे मिलने को वो तड़प उठी…..पर जैसे ही उसे मेसेज करने उसने फोन उठाया उसके अन्दर से एक आवाज़ आयी __ वो भी तो कर सकता है फ़ोन,,ठीक है शायद हमने बात बिगाड़ दी पर शुरु तो उसी की अम्मा ने किया था,और दोनो भाई मुहँ में कुल्फ़ी जमाये बैठे थे,हम भी आखिर क्या करते।। हम जाने लगे तब आगे बढ़ कर रोक भी तो सकता था,ठीक है अपनी अम्मा के सामने नही बोल सकता पर हमें तो बोलते समय रोक सकता था,हमे भी कोई शौक तो है नही की दूसरों का अनादर करें,बस हो गया जो होना था,अब एक बार फोन तो कर ले ,पूछ तो ले ,कैसी हो बांसुरी ।।पर नही जनाब तो अकड़ के बैठे होंगे,ये विचार आते ही बाँसुरी का दिल कसमसा के रह गया, उसे राजा का मासूम सा चेहरा याद आ गया,भला आज तक कब और किस बात पे वो अकड़ के खड़ा रहा था,वो तो बेचारा फलों से लदा ऐसा तमाल तरु था जिसकी छाँव से उसकी पूरी बिरादरी सुवासित थी।।

    बांसुरी ने फ़ोन करने को फ़ोन उठाया ही था की राजा के नम्बर से कॉल आ गया,थोड़ी देर पहले का क्षुब्ध स्वाभिमान एक बार फिर करवट ले खड़ा हो गया,बांसुरी ने तुरंत उचक कर फोन नही उठाया __ वो भी तो जाने हम बांसुरी  है।।
       हाय रे ये मिथ्या अभिमान!! जिसके लिये दिल टूक टूक रो रहा था,सामने से उसे ही उद्विग्न देख अपनी रोग और पीड़ा भूल गया,और उसके घावों पे मलहम देने की जगह नमक की बोरी उठा ली।।

    बांसुरी जब तक फोन उठाती फोन कट गया, उसके चेहरे पर एक मुस्कान खिल गयी__ अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे,अच्छा मज़ा चखाया!

    एक बार फिर फोन घनघना उठा__

बांसुरी- हेलो

राजा- बांसुरी!!
 
अपना नाम राजा के मुहँ से सुनना था की रहा सहा धैर्य गुस्सा सब भाटे की तरह उतर गया,वेगवती नदी सा बह गया।।

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बांसुरी-” इत्ती देर से याद आयी हमारी,सुबह से कहाँ मर रहे थे,एक बार को नही सोचा कि हम कैसे जी रहे होंगे।”

राजा- अरे सोचा नही होता तो अभी फ़ोन क्यों करते, सुबह से मौका ही नही मिला,सब हमी को घेरे खड़े थे,मन्दिर से आने के बाद अम्मा ने घर पर सब को सब बता दिया है,घर में कर्फ्यू वाली स्थिति हो गयी है।

बांसुरी- तो हमारे घर कौन सा हालात कन्ट्रोल में हैं, मन्दिर से आने के बाद बुआ ने ऐसा हंगामा मचाया है कि हमारे घर में भी इमरजेन्सी के से हालात हो गये हैं,,राजा एक बात बोलें

राजा- घर से भाग चलने बस मत बोलना।

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बांसुरी- हम वही बोलने वाले थे जादुगर सैंया।।

राजा- हम दोनो तरफ सब कुछ संभाल लेंगे बस तुम अपने आप को संभाले रखना,हमे ती समझ नही आता की हम किसे किसे देखे,बाकी सब को या तुम्हें ।कभी भी तमक जाती हो।।

बांसुरी– क्या करें?? हम अपनी अम्मा के लिये कुछ भी सुन नही पाते,,पर अब ध्यान रखेंगे,अच्छा सुनो!! कल कहीं मिल सकते हैं क्या?? अकेले?

राजा- क्या हो गया,अकेले काहे मिलना चाह रही??

बांसुरी- ऐसा कुछ नही,जैसा तुम सोच रहे,और सुनो!! सोचना भी मत!! हम तो प्लान बनाना चाह रहे कि आखिर ऐसा क्या हो सकता है कि तुम्हारी अम्मा की बात माननी भी ना पडे और पूरी भी हो जाये।

राजा- वही तो हम भी सोच रहे,क्या ऐसा किया जाये कि सब सही हो जाये और किसी को तकलीफ भी ना हो,चलो फिर यही ठीक रहा,कल रॉयल पेलेस चलते हैं,वहाँ बैठ के सोचेंगे ।।

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  बांसुरी- सुनो,एक बात बोलें ।

राजा- मना कर देंगे तो नही बोलोगी।

बांसुरी- तब तो और ज़ोर से चिल्ला के बोलेंगे,कान फाड़ के बोलेंगे,तुम्हें सता के बोलेंगे।।

राजा- तो बोलो ना,पूछती क्या रहती हो,सुनो सुनो सुनो!! जैसे बड़ा सम्मान दे देती हो।।

बांसुरी– कल तुम अपनी नीली शर्ट पहन के आना  और हम भी अपनी नीली कुर्ती ही पहनेंगे,ठीक है।

राजा बांसुरी की बात पर खिलखिला के हँस दिया, तभी अचानक किसी के आने की आहट से दोनो ही चौकन्ने हो गये_

राजा- बांसुरी बन्टी ऊपर आ रहा है,हम फोन रखते हैं ।।

बांसुरी- अरे रुको !! सुनो तो….

राजा– अरे रख रहे हैं यार,तुम तो पिटवा कर ही मानोगी लग रहा।।
   हँसते हुए दोनो ने अपना अपना फोन रख दिया।।

            पास बुला के गले से लगा के
             तुने तो बदल डाली दुनिया
             नए हैं नजारे नए हैं इशारे
           रही ना वो कल वाली दुनिया

           सपने दिखाके ये क्या किया
                 ओ रे पिया
           तुने ओ रंगीले कैसा जादू किया
          पिया पिया बोले मतवाला जिया।।

   रेडियो पे बजते गाने ने बांसुरी के चेहरे पे एक लाज भरी मुस्कान बिखेर दी।।

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              *********************

    अगले दिन दोनो परिवार अपनी अपनी दिनचर्या में लीन थे,सुशीला जहां खुश थी कि चलो उस लड़की से पीछा तो छूटा वही अपनी लाड़ली के दुख से प्रमिला दुखी थी,पर दोनो ही महिलाओं ने आम हिन्दुस्तानी औरतों की तरह ही अपने मन को पूर्ण रूपेण अपने नियन्त्रण में रखा हुआ था,एक दुखी थी एक सुखी थी पर दोनो में से किसी की दिनचर्या में कोई व्यवधान नही था।।
        घर के किसी सदस्य की किसी भी आवश्यकता को अधूरा नही रखा गया था,सब समुचित व्यवस्था थी।।
 
     बांसुरी कुछ गुनगुनाती सीढियों से नीचे उतरी, रसोई की खिड़की से झांक लगा के प्रमिला ने उसे आवाज़ लगायी

प्रमिला- लाड़ो!! नाश्ता ले आऊँ तेरा!!

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बांसुरी- नही मम्मी ,हम कुछ काम से बाहर जा रहे हैं, वापस आकर खा लेंगे

प्रमिला- अरे कम से कम दो पूड़ी तो खा ले।

बांसुरी ने मुस्कुराते हुए प्रमिला को देखा,__”पूड़ी तो हमने कब से खाना छोड़ रखा है मम्मी ,भूल जाती हो ,अभी 2 किलो और कम करना है,चलो हम जा रहे वर्ना देर हो जायेगी।।”

” अरे पर जा कहाँ रही छोरी?”

” कहीं नहीं बुआ,जल्दी आ जायेंगे।।

बांसुरी के निकलते ही बुआ जी ने प्रमिला को पृश्नवाचक निगाहों से भेद दिया__” परमिला कहीं उस रजुआ का बुखार फिर तो नही चढ़ गया छोरी को,कल तो बड़ा पांव पटकती निकली रही मन्दिर से।।

प्रमिला– नही पता जिज्जी,वैसे बांसुरी ऐसी है तो नही,ज़बान की बड़ी पक्की है मेरी बेटी।।

      यही तो लोग नही समझ पाते कि ना प्यार का भरोसा,ना प्यार करने वालों का।।जब एक बार इन्सान प्यार में पड़ जाये तब वो सिर्फ एक ही काम सलीके से और शिद्दत से कर सकता है वो है प्यार,
इसके अलावा हर एक काम बेमानी हो जाता है, ना तो फिर अपना वचन याद रहता है और ना मान सम्मान।।

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        रॉयल पैलेस जाते हुए बांसुरी ने निरमा को भी साथ ले लिया,वहाँ पहुंचने पे देखा राजा और बन्टी पहले से बैठे उनका रास्ता देख रहे थे।।

    बांसुरी को देखते ही राजा की आंखे मुस्कुरा पड़ी,
बन्टी ने आगे बढ़कर दोनो को अपने सामने की कुर्सियों पर बैठा दिया।।

बन्टी- देखो बांसुरी और राजा,तुम दोनो को ऐसा कोई हल निकालना पड़ेगा जिससे सांप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे।।

बांसुरी– भैय्या हम तो चाहतें हैं,ना सांप ही मरे ना लाठी ही टूटे,क्यों राजा!!

राजा– तो क्या सोचा ?? ऐसा क्या करें कि सब मान जायें,  बोलो बांसुरी!!

बांसुरी- राजा तुम हमारे तुम्हारे बारे में सब कुछ अपने पापा को बता दो,हमे यकीन है वो मान जायेंगे।

बन्टी- इत्ता आसान नही है बांसुरी पण्डित जी को भोग लगाना,वो भी परले दर्जे के जट्ठर हैं,बल्कि मौसी ही कुछ मुलायम हैं,जब वही इत्ती भरी बैठी हैं तो मौसा जी का सोचो भी मत,उसपे इनके घर के सब पुरखे अमृत पीकर आये हैं,90 की हो चुकी दादी अब तक अपने पसंद की मोहनथाल बनवाती है बहुओं से।।

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राजा- फिर करें तो क्या करें बन्टी,हमे तो समझ ही ना आ रहा??

बांसुरी– तुम्हें कभी कुछ आसानी से समझ आया भी है? भला हो ये समझ आ गया कि हमसे प्यार है।

बन्टी- देखो बिना दान दहेज ये शादी ना हो पायेगी, बांसुरी तुम भी अच्छे से जानती हो,कुछ काम समाज और दुनिया को दिखाने भी किया जाता है,है ना?

बांसुरी- हाँ तो?

बन्टी- तो ये कि मौसी जी ने जितना बोला उतना तो करना ही पड़ेगा,अब कुछ तो अंकल जी की भी तैयारी होगी ही,बाकी कमी बेसी को हम पूरा कर देंगे, मतलब हम नही हमारा भाई राजा!! क्यों राजा?

राजा ने बन्टी की बात पर बांसुरी को देखा,उसके चेहरे पर भी कोई भाव नही था,जैसे उसे समझने में दिक्कत आ रही थी कि ऐसा करना सही रहेगा या नही।।

बांसुरी– हमारे पापा को शायद अच्छा नही लगेगा राजा

बन्टी- लेकिन कुछ तो रास्ता निकालना ही पड़ेगा ना
तुम अपने पापा को समझा भी तो सकती हो।

बांसुरी- हां समझा सकते हैं,पर एक बात बताइये भैय्या ,हम पापा को ये समझायें की राजा से रुपये उधार ले कर हमारी शादी उसी से करा दे इससे कहीं ज्यादा आसान ये नही रहेगा कि  राजा अपनी अम्मा को ये समझा दे कि वो दहेज नही लेना चाहता।

राजा- बांसुरी तुम्हें क्या लगता है हमनें अम्मा से बात नही की,जितना कह सकते थे कह चुके हैं,,अब देखो यार अम्मा भी अपनी जगह कहाँ गलत है बताओ।

बांसुरी- तुम्हारी आँख मे ना तुम्हारी अम्मा भक्ति का चश्मा चढ़ा है,उस चश्मे को उतारो तब नज़र आयेगा की कौन गलत है और कौन सही,,हमे बन्टी भैय्या की बात अच्छी नही लगी।
      भले ही एक साधारण नौकरी में हैं हमारे पापा पर आज तक हमे किसी चीज़ की कमी नही महसूस होने दी,राजकुमारी बना के पाला पोसा,और आज हम अपने स्वार्थ के लिये अपने पापा के आत्मसम्मान को आग लगा दे,ये नही हो पायेगा राजा।।
     तुमसे प्यार करते हैं इसिलिए तुम्हारे आगे हमारा मान अपमान हम नही देखते पर अपने पापा को तुम्हारे पैरों में रुपयों के लिये झुकते नही देख पायेंगे।

राजा- यार तुम बात को कहाँ से कहाँ मोड़ दी,,काहे तुम्हारे पापा झुकेंगे?? हम चुपचाप जितने की उन्हें ज़रूरत होगी लाएंगे और तुम्हारे घर छोड़ जायेंगे। अब कल को हम उनके दामाद बन जायेंगे तो एक तरह से उनके बेटे जैसे हुआ ना,बेटे से कुछ लेने में कैसा संकोच?

बांसुरी- सही कह रहे हो ,बेटे से कैसा संकोच?? फिर चुपचाप आने का संकोच काहे कर रहे,डंके की चोट पे आना,अपने अम्मा बाऊजी को बोल कर आना की अपने होने वाले ससुर के लिये रुपये लिये जा रहे, उनके ज़रूरत है।।

राजा-बांसुरी तुम कोनो कसम खा कर आयी हो का कि लड़े बगैर नही जायेंगे

बांसुरी- हाँ बिल्कुल!! वैसे ही जैसे कल तुम्हारी अम्मा कसम खा के आयी रही ।।

राजा — बांसुरी!! हम कुछ कहते नही इसका मतलब ये नही कि तुम कुछ भी कहती जाओगी,,अम्मा है हमारी,उन्होनें जितना सहा है ना तुम उनकी पैर की धूल बराबर भी नही हो।। एक बात तो सुन के सही नही जाती तुमसे अम्मा से बराबरी करने चली हो।  अरे बचपन से अपने घर परिवार पड़ोस समाज सब जगह उन्होनें जो देखा है वही उनके दिमाग में बैठा है।। तुम्हारी तरह पढ़ी लिखी होती तब तो उनकी अपनी समझ होती ना,उनके खुद के ब्याह में दहेज मिला,सभी मौसियों का ब्याह ,चाचा का ब्याह फिर बुआ का ब्याह सभी जगह यही देखी है हमरी अम्मा इसे ही सही समझती है,तो इसमे उनकी क्या गलती।।
    जिस उम्र में तुम अपनी माँ के आंचल में दुबकी पड़ी थी उस उमर से घर गृहस्थी का बोझ उठा रही हमारी अम्म्मा।।बारह साल की उमर से ददिया सास चचिया सास और खुद की सास की सेवा में प्राण दिये जा रही हैं,और आज तक उनके सर का पल्लू कभी खिसका तक नही और तुम उनकी दो बातें सुन उन्हें पलट के चार बातें सुना गयी।।
       मजाल है जो आज तक हमारी अम्मा ने दादी को कभी पलट के जवाब दिया हो,ऐसा तो नही है कि हर बार बड़े बूढ़े सही बात ही बोलतें हों,पर जो भी बोला सुनाया हो दादी ने हमारी अम्मा ने उन्हें या बाऊजी को कभी जवाब नही दिया।।

बांसुरी– हम क्या बोल रहे और तुमने क्या समझ लिया।।

राजा- क्या समझ लिया,सही ही समझा।। हमारी ही आँख में चश्मा चढ़ा था,पर अम्मा का नही तुम्हरा,अब उतार फेंकने पर साफ साफ दिख रहा कि तुम्हारा ज्ञान कितना कोरा और उथला है बांसुरी ।।
   एक बात और कह दें,जो लड़की हमारी अम्मा का सम्मान नही करेगी ,इज्जत नही करेगी हम किसी जनम में उससे शादी नही करेंगे।।

बांसुरी– राजा तुम धमकी दे रहे हो हमे।।

राजा– हम सच बोल रहें हैं,,हमारी अम्मा से ज्यादा हम किसी से प्यार नही कर सकते,,तुम अपनी बताओ ,हमारी अम्मा के हिसाब से ढल सकती हो।तो ठीक है वर्ना जाओ,हमें भी तुम्हारी कोई ज़रूरत नही है।

बन्टी और निरमा चुपचाप बैठे दोनो की बातें सुन रहे थे,कुछ देर पहले की साधारण बातें अचानक ही ऐसे मोड़ ले लेंगी किसी ने सोचा भी ना था।।
     किसी ने सही कहा है__ बन्दूक से निकली गोली और ज़बान से निकली बात कभी वापस नही हो सकती।।

  काश दोनो में से एक ने भी अपनी जिह्वा पे समय रहते नियन्त्रण पा लिया होता तो स्थिति इतनी विकट ना होती।यहाँ गलती किसकी थी किसकी नही ये पक्ष विचारणीय रह ही नही गया,दोनों में से किसी ने उस समय झुकना अपनी शान के खिलाफ समझा।।

           ***************************

      इस पूरे वाकये को कई दिन बीत गये।। बांसुरी ने इम्तिहान पास कर लिया और एक महीने की ट्रेनिंग के लिये पुणे आ गयी,बन्टी भी वापस दिल्ली लौट गया, सभी अपने अपने कामों मे लग गये,जीवन का नाम ही चलना है,वो कभी किसी के लिये रुकता कहाँ है।।

     बांसुरी की ट्रेनिंग पूरी हो गयी और पहली नियुक्ति में उसे अम्बा जी गढी जाना पड़ा, उसने अपना कार्यभार संभाल लिया,कभी कुछ दिनों के लिये उसकी अम्मा या बुआ जी आ जाते हैं ।
     बन्टी की जिंदगी में एक बार फिर कोई लड़की आ गयी,वो अपने जीवन अपने बॉस और नयी नयी बनी गर्लफ्रैंड में व्यस्त रहने लगा।

    सभी का जीवन व्यस्त था,सभी अपने आप में लगे थे,बस एक राजा था जिसका जीवन उस शाम रुक गया,,उसने पहले की तरह जिम जाना छोड़ दिया, भैय्या के वसूली के काम में भी अब प्रिंस और प्रेम ही जाते ।।
    घर के लोग जैसे अम्मा,बाऊजी बड़े भैय्या चाचा जी सभी अपने लाड़ले के व्यवहार से क्षुब्द थे दुखी थे,पर वो खुश था अपने आप मे,अपने कमरे में अपनी किताबों के साथ।।
    अम्मा को लगा बांसुरी का भूत उतर गया,अम्मा को इस बात का कई एक बार प्रमाण भी मिल चुका था,, आखिर माँ थी कैसे अपने बेटे के जीवन से अनभिज्ञ रहती,उन्हें समझ आ चुका था की अब बांसुरी और राजा की हल्की फुल्की भी बातचीत नही होती।।
   खूब खोद कुरेद के उन्होनें बन्टी से भी सारी सच्चाई उगलवा ली थी,कि उस शाम के बाद दोनों में कभी कोई बात नही हुई ।।
      उस शाम को बीते पूरे पांच बरस गुज़र गये……बांसुरी चली गयी सिर्फ राजा के जीवन से ही नही उसके शहर से भी दूर ।।
  
   पर जब वो चली ही गयी थी राजा के जीवन से तो ऐसा क्या था जो राजा ने खुद को किताबों में इस कदर गुम कर लिया था…..

क्रमशः

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अपर्णा।।

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जीवनसाथी -120

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   जीवनसाथी – 120

     चुनाव के नतीजे आने लग गए थे रुझानों से साफ जाहिर था कि राजा और उसकी टीम ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया था। राजा की जीत तो पहले ही 100% तय थी।
समर अपने ऑफिस में बैठा हुआ इन्हीं सब जोड़ घटाव को देख रहा था कि मंत्री जी का फोन आ गया।

   समर उनसे बात कर ही रहा था कि आदित्य भी ऑफिस में चला आया। इस सारी प्रक्रिया में आदित्य ने भी समर का पूरा पूरा सहयोग किया था। वह हर जगह राजा के छोटे भाई की हैसियत से उस का साथ निभाता जा रहा था।
   राजा को उसने एक पल को भी अकेला नहीं छोड़ा था। आज तक जहां समर और प्रेम राजा के दाएं और बाएं हाथ थे अब आदित्य भी उनकी टीम में शामिल हो गया था।
    अब धीरे-धीरे महल आदित्य को भी अपनाने लग गया था। युवराज भैया, रूपा, जया, जय, विराट यह सभी लोग जहां आदित्य को पूरी तरह दिल खोलकर अपना चुके थे, वही पिंकी आज भी आदित्य से कुछ हद तक नाराज ही लगा करती  थी।
     राजा के बेटे यश के कार्यक्रम में शामिल होने आई पिंकी को उसकी मां ने कुछ समय के लिए महल में ही रोक लिया था।
    पिंकी और उसके बेटे के रुकने से पिंकी की मां को भी सहारा हो जाता था। अपनी जेठानी की मौत के बाद से वह कुछ ज्यादा ही डूबा हुआ सा महसूस करने लगी थी। आदित्य के बारे में पता चलने के बाद उनकी जो थोड़ी बहुत बातचीत अपने पति से हुआ करती थी, वह भी पूरी तरह से बंद हो चुकी थी। बल्कि अभी पिछले कुछ समय से उन्होंने हरिद्वार जाकर रहने का मन बना लिया था लेकिन पिंकी और राजा ने उन्हें किसी तरह रोक लिया।

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   आजकल उनकी तबीयत भी कुछ ऊपर नीचे ही रहा करती थी।
   उन्हीं के बारे में सोचते विचारते आदित्य समर के ऑफिस में प्रवेश कर गया। समर को चिंतित सा फोन में बात करता देख आदित्य भी उसके सामने बैठ गया।

“क्या हुआ समर कोई चिंता की बात है?”

“हां! ऐसा ही कुछ समझ लो।”

“हुआ क्या? चुनाव के नतीजे तो कल घोषित होने वाले हैं! और जहां तक मुझे लगता है राजा भैया और उनके सारे लोग जितने ही वाले हैं।”

“जितने ही वाले हैं कि बात नहीं आदित्य।। यह सभी लोग जीत चुके हैं।”

” ये तो बड़ी अच्छी बात है। फिर किस बात की चिंता में इतना विचार मगन बैठे हो।”

“इसी बात की चिंता है ! मैं नहीं चाहता था कि यह सारे लोग एक साथ जीते।”

“यह क्या कह रहे हो समर? होश में तो हो?”

“मेरा कहने का यह मतलब है, कि मैं नहीं चाहता था कि विराज भी जीते! लेकिन हुकुम का प्रभाव ही ऐसा है, कि उनके आस पास खड़ा हर व्यक्ति उनके प्रभाव के कारण हर जगह सफल हो ही जाता है।
   विराज अपने बलबूते तो कभी यह चुनाव नहीं जीत सकता था लेकिन लोगों ने  उसे हुकुम की टीम है यह मानकर विराज को भी जिता दिया और वह भी भारी बहुमत से।”

“मेरे ख्याल से तो यह खुश होने की बात है।”

“खुश होने की बात होती आदित्य अगर विराज हमारे सब के लिए लॉयल होता।”

“मतलब विराज आज हमारे लिए लॉयल नहीं है।”

“नहीं बिल्कुल भी नही। बात दरअसल यह है की हुकुम और उनके आदमी इतनी ज्यादा संख्या में नहीं थे कि सरकार बना सकें, लेकिन हुकुम और उनके सारे लोग अपने अपने जगह से चुनाव जीत चुके हैं। अब अगर हमें सरकार में शामिल होना है, तो हुकुम को अपने सारे जीते हुए विधायकों के साथ सरकार से हाथ मिलाना होगा यानी पक्ष या विपक्ष से हाथ मिलाना होगा।
   मैं खुद अब तक यही सोच रहा था की किसी एक पार्टी से तो हमें हाथ मिलाना ही पड़ेगा तो जिस पार्टी से हाथ मिला कर हमें अधिक लाभ हो उसी पार्टी से मैं चाहता था कि हुकुम हाथ मिला ले।
    मैं उस पार्टी के सामने यही शर्त रखने वाला था कि भले ही कम सदस्यों के कारण हुकुम अपनी सरकार नहीं बना सकते लेकिन जैसे चुनाव के नतीजे घोषित हुए हैं उससे यही साबित होता है कि जनता हुकुम को अपने मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है तो हम हुकुम को मुख्यमंत्री के पद पर देखने की शर्त पर ही अपने सारे विधायक किसी भी एक पार्टी को देते। हम उसी पार्टी की तरफ जाते जो हुकुम को मुख्यमंत्री का पद देगी।”

“पर यह तो बहुत बड़ी शर्त हो जाती ।  इस बात के  लिए तो वो लोग शायद ही तैयार हों।”

“देखो हमेशा यह होता है, कि जीती हुई पार्टी ही सरकार बनाती है !अभी हुकुम की पार्टी के अलावा बाकी दोनों बड़ी पार्टीयों में बहुत ज्यादा संख्याओं का अंतर नहीं है हुकुम जिस पार्टी की तरफ जाएंगे वही पार्टी सरकार बनाएगी तो ऐसे में हुकुम का पद बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।
   वैसे मुख्यमंत्री पद तो जीतने वाली पार्टी से ही चुना जाता है और हमारे विधायक सिर्फ उनकी पार्टी की संख्या बढ़ाने वाले विधायक ही कहलाएंगे । लेकिन हमारे राजा साहब कोई ऐसे साधारण व्यक्ति तो है नहीं। और न ही वह कोई साधारण विधायक हैं।  उनके साथ जनता का बेशुमार प्यार है।
    बात ऐसी थी कि उनकी पार्टी नई पार्टी थी इसलिए उन्होंने कम जगह से लोगों को खड़ा किया। अगर बड़ी पार्टी के समान इतनी बड़ी संख्या में वो अपने लोगों को चुनाव लड़वा पाते और अपने लोगों को खड़े कर पाते तो बेशक भारी बहुमत के साथ हमारे हुकुम की निर्विवाद रूप से सरकार बनती और हमारे हुकुम बिना किसी शक शुबहें के मुख्यमंत्री होते।
       पार्टी और प्रत्याशी तो बहुत से खड़े हुए लेकिन अभी हमारे सामने जो दो मुख्य पार्टी खड़ी हैं उनमें से एक है राजदल  पार्टी और दूसरी है जन जागरण दल।
दोनों ही तरफ के नेताओं का लगातार मेरे पास फोन आ रहा है, कि मैं हुकुम की तरफ से सारे विधायकों को उनके सपोर्ट में भेज दूं। जिससे कि वह सरकार बना सके और मैंने अभी-अभी राजदल पार्टी से कह दिया है कि अगर वह हम से हाथ मिलाना चाहते हैं तो यह मेरी शर्त है कि हमारे राजा साहब ही मुख्यमंत्री बनेंगे।
    देखो जाहिर सी बात है कि जैसे ही हम किसी पार्टी से हाथ मिलाते हैं हम सारे मिलकर एक पार्टी बन जाएंगे और उस समय मुख्यमंत्री उस पूरी पार्टी में से किसी को भी चुना जा सकता है। इसलिए राजा साहब एक बार फिर निर्विवाद रूप से मुख्यमंत्री पद के दावेदार बन जाएंगे।”

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“क्या यह सारी बातें राजा भैया जानते हैं।”

“अब तक तो नहीं जानते।”

“हां मुझे भी यही लगा था। क्योंकि मुझे नहीं लगता राजा भैया किसी दूसरी पार्टी से हाथ मिलाने के लिए तैयार होंगे। उन्हें मुख्यमंत्री बनने का कोई लालच नहीं है। वह तो विधायक बन कर भी अपने क्षेत्र की सेवा कर ही लेंगे। भगवान ने चाहा तो अगले चुनाव तक उनकी पार्टी इतनी सक्षम हो जाएगी कि वह अपने बलबूते पर बिना किसी से हाथ मिलाए मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी कर सकते हैं।”

“तुम्हारी कहीं एक एक बात बिल्कुल सही है आदित्य। राजा साहब को जब मेरा यह प्लान पता चलेगा तो वह मुझ पर बहुत नाराज होंगे , लेकिन इसीलिए मैंने यह सोच रखा है कि यह सारी बातें उनसे युवराज भैया कहेंगे मैं नहीं। दूसरी बात राजनीति ऐसी काजल की कोठरी है जिसमें आप अंदर घुसकर बिल्कुल बेदाग बाहर नहीं आ सकते।
  राजा साहब फिर भी बेदाग हैं। उनके सारे दाग मैं अपने ऊपर लेने को तैयार हूं। लेकिन उनके राजनैतिक कैरियर के लिए फिलहाल किसी एक पार्टी से हाथ मिलाना बेहद जरूरी है।
   हां यह किया जा सकता है कि एक बार मुख्यमंत्री बनने के बाद राजा साहब अपने कार्यों से वैसे भी जनता का दिल इतना जीत ही लेंगे कि अगले 5 सालों में उनकी अपनी नई पार्टी बना कर वो अलग हो जाएं।”

“तुम्हें लगता है कि अगर राजा भैया एक बार किसी पार्टी से जुड़ गए तो कभी भी उस पार्टी को छोड़ेंगे?”

“नही छोड़ेंगे!,मैं जानता हूँ इस बात को। इसलिए ऐसी पार्टी से हुकुम को जुड़वाने की कोशिश में हूँ जो बाकी राजनैतिक पार्टियों से ठीक हो। बाकी तो हुकुम वो पारस हैं कि जिस पत्थर को छू ले वह सोना बन जाए! जाहिर है वो जिस पार्टी से जुड़ेंगे उस पार्टी को भी अपने मुताबिक बना ही लेंगे।”

“सही कह रहे हो समर! लेकिन अब भी मुझे इस बात पर यकीन करना मुश्किल लग रहा है कि राजा भैया अपनी पार्टी को किसी और पार्टी से मिला लेंगे।”

“कोशिश करने में क्या बुराई है आदित्य?”

“बिल्कुल कोशिश तो हम सब करेंगे ही। अभी यह बताओ कि मंत्री जी से बात करने के बाद तुम इतने चिंतित क्यों हो गए थे। और यह विराज की धोखा देने वाली क्या बात है?”

“मैं चाह रहा था कि राजा साहब राज दल पार्टी के साथ हाथ मिला लें। यह बात विराज को मालूम चल गई हैं। और अब वह जन जागरण दल से बातचीत करने में लगा हुआ है। तुम जानते ही हो कि राजा साहब के अलावा कुल 11 सीटों पर हमारे लोग खड़े हुए थे, यानी राजा साहब को मिलाकर हमारे पास कुल 12 विधायक हैं। इनमें से तीन लोग विराज के खास हैं। अगर विराज अपने उन तीन लोगों को लेकर जन जागरण दल की तरफ चला जाता है, तो हमारे विधायक कम हो जाएंगे और ऐसे में राज दल पार्टी के ऊपर प्रेशर बनाने में हमें समस्या खड़ी हो जाएगी।”

“यह तो बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर दी विराज ने! अगर वह अपने तीन लोगों को साथ लेकर जाता है, इसका मतलब हमारी पार्टी से कुल चार लोग कम हो जाएंगे और सिर्फ आठ लोग ही बचेंगे राज दल पार्टी से जुड़ने के लिए।”

“बिल्कुल सही समझे आदित्य! अब अगर सिर्फ आठ लोगों के साथ हम हाथ मिलातें हैं तो मेरा गणित वापस गलत हो जाएगा और मैं दबाव बनाने में असमर्थ हो जाऊंगा।

“तो अब क्या सोचा है आगे?”

“सोचा तो यही है कि आज विराज के उन तीन लोगों से जाकर मीटिंग करता हूं। पहले तो रुपए पैसे देकर ही उन्हें अपनी तरफ मिलाने की कोशिश करूंगा और अगर नहीं तैयार होते हैं तो…”

” तो उस सूरत में क्या करोगे?”

समर ने अपनी जेब से गन निकल कर सामने टेबल पर रख दी।

“उस सूरत में बस एक ही उपाय बचेगा मेरे पास।”

“यह क्या समर तुम लोगों को जान से मारने की धमकी दोगे।”

“देना ही पड़ेगा आदित्य और कोई चारा भी नहीं है! राजनीति रुपया या खून मांगती ही है। मेरे पास और कोई उपाय नहीं है अगर विराज के वह तीन विधायक हमारी तरफ आ गए तो फिर विराज अकेला कुछ नहीं कर पाएगा। मन मार कर ही सही उसे हमारी तरफ आना ही पड़ेगा। “

“सही कह रहे हो। “

“कौन सही कह रहा है और क्या सही कह रहा है आदित्य?”

आदित्य और समर अपनी बातों में लगे थी कि राजा और युवराज भी उस कमरे में चले आए। राजा के इस सवाल पर आदित्य मुस्कुराकर समर की ओर देखने लगा।

“आपके अलावा और कौन हर वक्त सही हो सकता है हुकुम?”

“यह तो गलत बात है समर ! हमारे अलावा एक और इंसान है, जो हर वक्त सच्चाई और ईमानदारी पर अडिग खड़ा रहता है। और वह है हमारे बड़े भाई युवराज सा।”

“जी सही कहा हुकुम! इन की तो बात ही निराली !है आप लोगों के लिए चाय या कॉफी कुछ मंगवाया जाए।”

“हां मंगवा लो! उसके बाद जरा रियासत के दौरे पर जाना है। “
   राजा के ऐसा कहते ही समर ने बैल बजा कर बाहर खड़े सहायक को अंदर बुला कर कॉफी के लिए कह दिया।
    राजा इस वक्त रियासत के दौरे पर निकलने वाला है यह सुनकर समर के चेहरे पर मुस्कान खिल गई… क्योंकि उसे युवराज से बात करने के लिए वैसे भी एकांत चाहिए था।

   सबके साथ कॉफी पीने के बाद राजा प्रेम के साथ रियासत के दौरे पर निकल गया! उसने जाती बेला आदित्य से भी पूछा, आदित्य उनके साथ जाने को तैयार था, लेकिन निकलते वक्त अचानक उसका पैर हल्का सा मुड़ा और मोच खा गया। जिसके कारण वह वही बैठ गया। उसकी हालत देख राजा ने उसे आराम करने की सलाह दी और प्रेम के साथ बाहर निकल गया।
     समर युवराज से क्या बातें करना चाहता है यह आदित्य जान ही चुका था इसीलिए उन दोनों को कमरे में छोड़ वह भी बाहर निकल गया । समर ने उसके जाते ही अपने ऑफिस के बाहर खड़े सहायक से कह दिया कि किसी भी हाल में अगले दो घंटे तक वह उसे और युवराज को डिस्टर्ब ना करें।

    आदित्य अपने कमरे की तरफ जा रहा था कि उसे पिंकी की माँ के कमरे से कुछ अजीब सी आवाज़ें सुनाई पड़ीं।
  उसे एकाएक समझ नही आया कि हुआ क्या है?और ये आवाज़ कैसी आ रही है?
    उसे एकाएक अंदर जाने में भी संकोच सा लग रहा था। झिझकते हुए उसने दरवाज़े पर दस्तक दी लेकिन अंदर से कोई जवाब नही आया। उसने दो तीन बार दस्तक देने के बाद उसने आवाज़ लगा दी, लेकिन जब अंदर से कोई आवाज़ नही आई तब वो दरवाज़े को हल्का सा धक्का दिए भीतर चला गया।
    आश्चर्य की बात ये थी कि कमरे में अंदर कोई नही था,एक नौकर तक नही।
   आदित्य ने बाथरूम का दरवाजा खटकाना चाहा वो खुला हुआ ही था। उसने धीरे से झाँक कर देखा अंदर कोई नही था।
   उसे अब वो आवाज़ बड़ी करीब से सुनाई दे रही थी, जैसे कोई रोते हुए हिचकियाँ ले रहा हो। आवाज़ की दिशा में उसने आगे बढ़ना शुरू किया तो आवाज़ और साफ सुनाई पड़ने लगी।
    आवाज़ बालकनी की तरफ से आ रही थी।

   वो धीरे से बालकनी में पहुंच गया। उसने देखा बालकनी की एक तरफ बनी मेहराब पर जाने कैसे पिंकी का बेटा चढ़ गया था, और अब वहां की जालीदार लकड़ियों पर खुद को संभालने की कोशिश में सिसक रहा था।
   आदित्य ने उसे देखने के बाद एक बार नीचे झाँक कर देखा और उसका सिर घूम गया। कमरा तो पांचवी मंज़िल पर ही था लेकिन आदित्य को अलटोफोबिया था यानी उसे ऊंचाई से डर लगता था। डर भी कोई सामान्य डर नही बेहद घबराहट और रक्तचाप बढ़ा देने वाला डर।
     उसे इतनी ऊंचाई पर चक्कर से आने लगते थे। उसने अपनी आंखें एक पल को बंद की और एक गहरी सांस भरी।
   आंखें खोल कर वो बिना दुबारा नीचे देखे बच्चे की तरफ बढ़ने लगा बच्चा उसे देखकर घबराहट में कहीं अपना संतुलन ना बिगाड़ बैठे इसलिए आदित्य एकदम शांति से बिना कोई शोर किए उस कंगूरे तक पहुंच गया।  बहुत धीमे से उसने बिना आवाज किए पास रखे मोढ़े को कंगूरे तक रखा और उस  पर चढ़ गया।  धीरे से अपना एक पैर बालकनी के किनारे बनी रेलिंग पर रख वह उस रेलिंग पर कंगूरे को पकड़कर चड गया। अब उसका एक हाथ बच्चे तक आसानी से पहुंच पा रहा था। अपने दूसरे हाथ से कंगूरे को पकड़े हुए उसने एक हाथ से बच्चे को धीमे से अपनी गोद में उठाना चाहा। बच्चा आदित्य को देख कर और जोर से रोने लगा। आदित्य ने बहुत कोमलता से उसका जाली में फंसा पैर बाहर निकाला और एक हाथ से ही बच्चे को गोद में लेकर अपनी तरफ खींच लिया।  इस झटके में एक बार उसका खुद का संतुलन बहुत बुरी तरह से बिगड़ गया लेकिन उसने दूसरे हाथ से कंगूरे को इतनी जोर से थाम रखा था कि वह गिरने से बाल-बाल बच गया। अगर इस वक्त आदित्य वहां से गिरा होता तो वह पांचवीं मंजिल से सीधे महल की पथरीली जमीन पर गिरता।
भगवान का शुक्र मनाते आदित्य ने बच्चे को कस कर पकड़ा और वापस मोढ़े की सहायता से बालकनी में उतर गया।
   
     आदित्य जिस वक्त बालकनी में आया था उसी वक्त काकी साहब की सहायिका उस कक्ष में कुछ सामान रखने आई थी। उसने आदित्य को बालकनी की तरफ जाते देखा तो आदित्य को क्या चाहिए यह पूछने वह भी उसके पीछे-पीछे बालकनी तक चली आई और जैसे ही उसने बच्चे को कंगूरे पर लटके देखा वह तुरंत भाग कर बगल वाले कक्ष में बैठी पिंकी और काकी साहब को बताने चली गई थी।
   
आदित्य जैसे ही बच्चे को लेकर बालकनी के फर्श पर बैठा उतने में ही एक किनारे सांस रोके खड़ी पिंकी आदित्य तक चली आई और रोते-रोते उसने अपने बच्चे को आदित्य की गोद से ले लिया।
    पिंकी के पीछे काकी साहब भी आदित्य तक चली आई।  उसके बालों में हाथ फेर कर उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया और उसके सामने अपने दोनों हाथ जोड़ दिये।
    वह उनके हाथ थाम कर सिर हिला कर उन्हें मना करने की कोशिश में था कि उसकी आंखें बंद हुई और वह बेहोश होकर वहीं गिर पड़ा।
     घबराई हुई पिंकी ने तुरंत पास खड़ी सहायिका से पानी का गिलास मंगवाया और उसे डॉक्टर को इत्तिला करने के लिए भेज दिया। काकी साहब ने आदित्य का सिर अपनी गोद पर रख लिया। आदित्य के माथे पर पसीने की बूंदें छलक आई थी । पिंकी ने ग्लास से पानी निकालकर आदित्य के चेहरे पर छींटना शुरू किया। कुछ देर में ही सहायिका ने दो और सहायकों को बुला लिया। जिन लोगों की सहायता से काकी साहेब ने आदित्य को अंदर कमरे में ले जाकर अपने पलंग पर लेटा दिया । कुछ देर में ही डॉक्टर साहब भी चले आए। आदित्य की जांच करने के बाद उन्होंने एक गोली उसकी जीभ के नीचे रख दी और काकी साहब और बाकी लोगों की तरफ मुड़ गए।
    पिंकी के पिता भी इतनी देर में आकर पीछे हाथ बांधे खड़े हो गए थे

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“अरे ये तो दिल्ली वाले आदित्य सिंह है ना। मैं जानता हूँ इन्हें। मुझे लगता है शायद स्ट्रेस के कारण इनका बीपी बहुत ज्यादा बढ़ गया है। बीपी कम करने के लिए फिलहाल मैंने एक गोली इन्हें  खिला दी है। जैसे ही स्ट्रेस थोड़ा कम होता है इन्हें होश आ जाएगा। बेहोश हो जाने का फिलहाल यही एक कारण मुझे समझ में आ रहा है। मैं यह कुछ दवाइयां लिख कर दिए जा रहा हूं, इनके होश में आने के बाद आप इन्हें   खिला दीजिएगा और कल एक बार इन्हें मेरी क्लीनिक पर भेज दीजिएगा मैं एक बार फिर से सारी जांच कर लूंगा।”

पिंकी डॉक्टर साहब के सामने हाथ जोड़ें अनुनय करने लगी …-“डॉक्टर साहब कोई घबराने की बात तो नहीं है।”

“अरे नहीं बिल्कुल घबराने की बात नही है। असल में आदित्य जी अलटोफोबिक हैं। इन्हें ऊंचाई से डर लगता है, लेकिन जब इन्होंने बच्चे को कंगूरे पर फंसा देखा तो अपने डर को एक तरफ कर यह बच्चे को बचाने के लिए जुट गए और बस उसी सब में इन्होंने इतना ज्यादा स्ट्रेस ले लिया कि इनका बीपी एकदम से शूट कर गया। बच्चे को बचाने के बाद यह अपने उसी बढ़े हुए बीपी के कारण बेहोश होकर गिर गए। “

   डॉक्टर की बातें सुन पिंकी आश्चर्य से सामने लेटे आदित्य को देखने लगी। उसे यकीन नहीं आ रहा था कि जिस आदमी से वह सिर्फ इस वजह से नफरत किया करती थी कि वह उसके पिता की ही अवैध संतान है, वही लड़का अपनी जान की परवाह किए बिना अपने डर को एक तरफ रख उसके बच्चे को बचाने के लिए जी जान से जुट गया । अगर कहीं डर के कारण वह अपना संतुलन खो कर जमीन पर गिर जाता तो उसकी जान भी जा सकती थी। लेकिन उसके बेटे को बचाने के लिए आदित्य ने अपनी जान की भी परवाह नहीं की।
      और वह आदित्य की कोई गलती ना होने पर भी बिना वजह उसे सजा दिए जा रही थी। क्या आदित्य वाकई उसके भाई होने का हक नहीं रखता?
   क्या आदित्य महल का उत्तराधिकारी होने का हक नहीं रखता?
    और यह सब सोचने और तय करने वाली वह खुद होती कौन है? एक तरह से देखा जाए तो आदित्य उसके पिता की पहली पत्नी की संतान है इस हिसाब से वह अवैध कैसे हुआ?
   सिर्फ सोचने का ही तो फर्क है। आखिर उसके बड़े पिता साहेब ने भी दो-दो शादियां की। क्या राजा भैया और युवराज भाई साहब ने विराज और विराट को नहीं अपनाया?
   युवराज भाई साहब ने तो आज तक विराज विराट और राजा भैया में कोई अंतर ही नहीं किया और यही हाल राजा भैया का भी है। तो उन दोनों भाइयों के संरक्षण में पली वह खुद कैसे इतनी कठोर ह्रदय हो गई?
   पिंकी को अपने आप पर बहुत ज्यादा शर्मिंदगी महसूस होने लगी। उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह चली! पिंकी की मां ने आकर उसे प्यार से अपनी बाहों में समेट लिया…-” मत रोइये बेबी! आपके भाई को कुछ नहीं होगा।”
अपनी मां के मुंह से आदित्य के लिए यह संबोधन सुन वह अपनी मां के गले से लग गई। मां और बेटी दोनों ही एक साथ जी भर कर रो लेना चाहती थी।  उन दोनों को रोते देख पिंकी के पिता भी उनके पास आकर बैठ गये। पिंकी की मां ने पिंकी को शांत करवाने के बाद उसके पिता के हाथों पर अपना हाथ रख दिया….-” आप चिंता मत करिए! आदित्य को कुछ नहीं होगा! हम हमारे बेटे को कुछ भी नहीं होने देंगे।”

    पिंकी के पिता की आंखों में खुशी की दो बूंदें छलक आई। कुछ देर में ही आदित्य को होश आ गया। उसने आंखें खोली, सामने पिंकी बैठी थी। पिंकी को देखते ही उसे उसके बच्चे का ध्यान आया और उसने तुरंत आसपास नजरें दौड़ानी शुरू की। तभी पिंकी की मां ने आगे बढ़कर आदित्य के सर पर हाथ रख दिया। उसके माथे पर हाथ फेरते हुए वह प्यार से कहने लगी…-“घबराइए मत आदित्य। आपका भांजा बिल्कुल सही सलामत है ।”
  पिंकी ने सहायिका की तरफ इशारा किया। सहायिका उसके बेटे को गोद में लिए उस तक चली आई । पिंकी ने अपने बेटे को अपनी गोद में बैठाया और आदित्य की तरह उसका चेहरा कर दिया…-” बेटा मामा जी को नमस्ते करो!”
    पिंकी के मुंह से अपने लिए ऐसा प्यार भरा संबोधन सुनकर आदित्य का भी दिल भर आया। धीरे से उठकर आदित्य तकिए का सहारा लिए पलंग पर टिक कर बैठ गया। उसके आसपास उसकी बहन पिंकी , उसकी माँ और उसके पिता खड़े थे। और इन सब के पीछे अदृश्य रूप से खड़े मुस्कुरा रहे  थे राजा अजातशत्रु सिंह!! जो आदित्य को उसका हक दिलवाने के लिए इस महल में लेकर आए थे। आज उनका वह सपना सही अर्थों में पूरा हो रहा था।
आदित्य के पिता ने सामने बढ़कर आदित्य को गले से लगा लिया…-” हमें  हमारी हर गलती के लिए माफ कर दो बेटा और पूरी तरह से वापस लौट आओ।”
  काकी साहब ने भी अपने पति की हां में हां मिलाई…-” आदित्य बेटा! आज तक हमें कभी बेटे की कमी महसूस नहीं हुई, क्योंकि पिंकी के साथ ही युवराज, कुमार,  विराज विराट सभी हमें भी छोटी मां का दर्जा ही देते आए हैं। लेकिन आज तुम्हें पाकर हमारा वह स्थान और थोड़ा ऊंचा हो गया है। तुम पिंकी के बड़े भाई थे, और सदा रहोगे। अब इस महल से वापस लौटने की कभी सोचना भी मत।”

  पिंकी का बेटा आदित्य की गोद में जाने के लिए  मचलने लगा। आदित्य ने प्यार से हाथ बढ़ाकर उसे गोद में ले लिया।

“आदित्य भैया संभल कर यह बहुत शैतान है! आपको परेशान कर देगा।”

पिंकी के मुंह से खुद के लिए भैया शब्द सुन आदित्य मुस्कुराने लगा बच्चे को गोद में लिए ही वो बाहर निकल गया।
   उसका दिल इस वक्त मिली खुशियों से ऐसा भर आया था कि कहीं उसकी आंखें छलक ना आए, इसी डर से वहां बैठे सब लोगों को छोड़ यह खुशखबरी फोन पर राजा अजातशत्रु को सुनाने ही वहां से बाहर निकल गया…..

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क्रमशः

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aparna …….


शादी.कॉम – 21

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शादी डॉट कॉम: 21

       तेरे बिना चांद का सोना खोटा रे
          पीली पीली धूल उड़ावे रे
            तेरे संग सोना पीतल
             तेरे संग कीकर पीपल
              आजा कटे ना रतिया………
         ओ हम दम बिन तेरे क्या जीना
      तेरे बिना बेस्वादी बेस्वादी रतिया ओ सजना…

   ” लगे रहो बेटा!!! सही जा रहे हो,,एक एक लक्षण प्रेम मे पागल प्रेमी का दिख रहा तुममे।”

” क्या यार बन्टी,,अब ऐसा क्या देख लिये तुम?”

” जैसे गाने सुन रहे हो ना आजकल बेटा मैं ही क्या कोई अन्धा भी तुम्हारी आंखों में देख पढ लेगा कि बच्चा प्यार में है,,,मैं तो फिर भी पढा लिखा हूँ,और वो भी अच्छी खासी दिल्ली युनिवर्सिटी से…..तुमने ये तो ना सोच लिया कि झुमरितलैया से पढ कर भाई इतना ज्ञान बघार रहा है…” अपनी ही बात पे बन्टी ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा

” पता है एक बार हमारा बॉस अड़ गया कहता है __ लड़कों कुछ अच्छा करना है मुझे,जिससे मेरे बाद मेरा नाम हो,मैनें धीरे से कहा _ ट्रेन के टॉयलेट  में अपना नाम नम्बर लिख आईये,,सदियों तक लोग गंदे टॉयलेट की फ्रस्ट्रेशन में गालियाँ आपके नाम की निकालेंगे।।”

” तुमने ऐसा कह दिया बॉस से।”

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” अबे नही यार!! ऐसी पते की बातें तो मेरे मन में ही दफन रह जाती हैं,ऊपर से मैनें कहा __ क्या सोच रहे हैं आप बताइये सर जिससे आपकी कुछ मदद की जा सके,,कम्बख्त कहता है बाइजूज़ जैसा कोई काम का एप बनाना चाहता हूँ कि लोग उसमें बच्चों को पढ़ा कर मेरा नाम लें लाइक ‘ साहूज़’ ।।
    मैनें कहा सर एप सही नही है, मैनें एक बार बाईजूज में इतिहास पढ़ना चाहा,कम्बख्त इतना अनाप शनाप हड़प्पा की खुदाई में निकलवा दिया इन लोगों ने कि ‘साहनी साहब’ की आत्मा भी कलप गयी कि यार ये सब इन लोग कहाँ से निकाल निकाल ला रहे मुझे तो ना मिला आज तक….

” फिर मान गया बॉस??”

” जो अपने मातहत की बात मान जाये वो बॉस ही कैसा?? उसके बाद एप का भूत उतरा तो अब अपने क्लाइंट और खुद की प्रोजेक्ट डिस्कशन की विडियो यू ट्यूब पे लॉन्च करने की प्लान कर रहा है कमीना।।कुल मिला के ना खुद चैन से जियेगा,ना हमे जीने देगा….खैर मेरी बातें छोड़ और जल्दी से तैयार हो जा फिर मौसी को लेकर मन्दिर भी तो जाना है।”

दोनों भाई बातों में लगे थे कि सुशीला एक बड़ी सी ट्रे में दो प्लेट में नाश्ता और चाय लिये ऊपर चली आयी।।

” अरे मौसी जी हम नीचे ही आ रहे थे,आप यहाँ नाश्ता क्यों ले आईं ।”

” 9 बज गया अभी तक तुम लोग नीचे आये नही तो हम यहीं ले आये,चलो जल्दी से नाश्ता कर लो,तुम्हारी पसंद का आलू का पराठा और मूँग की दाल का हलुआ बनाये हैं बन्टी।।”

” अरे वाह!! मौसी जी इसी बात पे चलिये मन्दिर घूम आते हैं ।”

” मन्दिर?? अभी !! मतलब सुबह सुबह।।”

” मन्दिर तो सुबह सुबह ही जाया जाता है ना मौसी।”

     इतनी देर से चुप बैठे राजा ने अपनी माँ का हाथ पकड़ कर उन्हें कुर्सी पर बैठाया और माँ की आंखों में देखते हुए अपनी बात उनके सामने रख दी__

” माँ आज बांसुरी और उसकी माँ तुमसे मिलने आने वाली हैं शिव मन्दिर मे!! एक बार मिल लो उन लोगों से।”

सुशीला कभी राजा कभी बन्टी को भौचक नजरों से देखने लगी

” कर ली आखिर अपने मन की,जब हमसे पूछे बिना ही मिलनी तय कर आये तो टीका बरिक्षा भी तय कर आओ।।”

” अम्मा नाराज काहे हो जाती हो….बिना तुम्हरी मर्ज़ी कुछ नही करेंगे भई ,,कम से कम एक बार मिल तो लो,।।”

” का फायदा मिलने जुलने का ,जब हमरी राय कोनो मायने ही नही रखती तो का फायदा बोलो।”

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” कैसी बात कर रही हो मौसी,राजा को बचपन से देखे हैं,आज तक आपसे पूछे बिना तो पानी भी नही पीता लड़का,शादी तो बहुत दूर की बात है।”

” पानिये भर नही पीता है,बाकी सलगे काम अपन मर्ज़ी का ही कर रहा आजकल।”

” एक बार मिलने में कोई बुराई नही मौसी,मिल तो लो पहले,बाद की बाद में देखी जायेगी।”

   आखिर दोनो लड़कों की बहुतेरी जद्दोजहद ने सुशीला को मिलने जाने की हामी भरने मजबूर कर ही दिया…..
      सभी समय से तैयार हो कर मन्दिर पहुंच गये।।

” कहाँ हैं भई तुम्हरे मेहमान ?? अभी तक मन्दिरे नई पहुँचे, बड़ा लड़की ब्याहने चले हैं ।।”
    सुशीला की बड़बड़ जारी थी कि बुआ जी मन्दिर के अन्दर से निकल वहाँ उन लोगों के बीच धम्म से कूद पडीं …..

   ” कैसन हो सुसीला, पहले पहल तो मोहल्ले के सब कार्यक्रम में दिख भी जाती थी,आजकल तो दरसनों दुर्लभ है,अब तो बहु वाली हो फिर भी बाहर फिरे को टैम नही निकाल पाती ।”

” अरे हम बाहर घूमै फिरै लागें तो हुई जाये सब काम धाम।।बहु तो आन गयी पर आजकल की छोरियां ना काम की ना काज की….अपने मरे बिना सरग कहाँ दिखता है जिज्जी,लगे रहत हैं दिन भर काम मा, हम ना सकेलें तो पूरा घर पड़ा रहे,बचपना से एही करते आ रहे बस,अपनी मर्ज़ी से तो आज तक एक साड़ी भी नही ली,अब आजकल के बच्चे हैं सादी ब्याह भी अपनी मर्ज़ी से करना चाहतें हैं ।”

” का कहें सुसीला,आज कल के बच्चो में लाज शरम तो रह नही गया,एक हमारा जमाना था,हम सास के भी सामने अपने इनसे बात नही कर पाते थे,और आजकल के लड़िका लोग पहले ही कहे देते हैं ए अम्मा इन  संग हमर फेरे फिरा,लुगाई बना दो।”

” खाली लड़कों को काहे दोस दे रहीं,लड़कियाँ कम है का आजकल की,ऐसा तो चटक मटक बनी घूमेन्गी ,और फिर कहीं कोनो लड़का कुछ बोल भर दे तो उसके सर जूतियाँ बरसायेंगी….आजकल की लड़कियाँ बड़ी जब्बर हैं,इनसे पार पाना मुस्किल है बल्कि लड़के सीधे हो गये है इनके सामने।”

   बांसुरी ने राजा को देखा,वो सर नीचे किये जमीन पर पड़े छोटे से पत्थर के टुकड़े को अपने पैरों से इधर उधर करता बैठा था,बन्टी ने बांसुरी को देखा फिर उसकी माँ को और आखिर बीच बचाव करने कूद पड़ा …..

” इस चर्चा का तो कोई उपाय और कोई फल नही मौसी जी,,आप दोनो विदुषीयां जब बात कर रहीं तो मुझे बीच मे बोलना तो नही चाहिये,पर मैं कहना चाह रहा था कि राजा और बांसुरी के बारे में अगर बात कर लेते तो…..”

” तो और किसके बारे में बात कर रहे।” मौसी के कठोर जवाब पे बन्टी एक बार फिर मुखर हो उठा

” नहीं मेरा मतलब कि,इनकी शादी के बारे में बात कर लेते तो ….”

” अब यही तो तुम बच्चों के दिमाग मे नही आता, कैसे ये ब्याह सम्भव है?? कोई मेल मिलाप ही नही है दोनों घरों का,, आप ही बताइये जिज्जी!! आप बड़ी हैं घर की,,आप ठहरे सरजूपारी हम के के,,कैसे हो पायेगा,नही नही राजा के बाबूजी बिल्कुल नही मानेंगे।”

” देखो दुल्हीन हम का कह रहे कि एक बार दुनो के बाबूजी लोगो को बात करने देते हैं,हम भी जानते हैं, की रीत रीवाज, दान दहेज,मिलनी पूछनी सब अलग है ,पर हैं तो दुनो परिवार ब्राम्हण ।।तो एक बार बात बढाने मे हर्ज का है।”

” बुज़ुर्गवार हो कर कैसी बात कर रही जिज्जी,,पूरा समाज थू थू करेगा,कहेगा हमारे पास नही रही का लड़की जो बाहर से धरे लायी,और सही बोले अब कोई दुराव छिपाव भी नही रह गया,हमारे राजा के लिये 50-50 लाख का भी रिस्ता आ रहा है।।”

बहुत देर से चुप बैठी प्रमिला ने अपनी बात रखी__

” मैं कह रही थी,हमाई भी तो अकेली ही लड़की है अब शादी के लिये,इसके पापा ने जो जोड़ जाड़ के रखा है,सब इसी का तो है,हमलोग भी अपनी तरफ से बहुत अच्छी शादी ही करेंगे दीदी।”

” देखो मैं किसी को कम जादा नही आंक रही भाई,,बुरा मत मान जाना पर हमरे बड़के के में भी बिना मांगे पूछे ही सब कुछ आ गया था,अब ये हमारा आखिरी लड़का है,रुखा सूखा ब्याह देंगे तो समाज ताना मारेगा_ कहेगा लड़के में कोनो खोट रहा होगा जभी बिना लेन देन के हो गयी सादी।”

प्रमिला- हम पूछ तो रहे जिज्जी,आप अपनी बात रखिये ना ,हम कोसिस पूरी करेंगे कि आपको कोई असुविधा ना हो।

सुशीला- अरे का का करेंगी?? बरीक्षा ही सात आठ लाख की पड़ जायेगी,फिर तिलक कम से कम इक्कीस का तो चढायेंगी,जेवर जट्टा आप अपन बिटिया को जो दे वो आपकी मर्ज़ी पर पांव पखारते समय दामाद को चेन तो पहनाएंगी की नही….
    फिर तिलक बारात हर मौके पे मेहमानों को लिफाफ़ा पकडायेंगी,अब आजकल 20-50 रुपया का लिफाफ़ा भी तो नही चलता ,कम से कम 100 रुपैय्या तो डालना ही पड़ेगा और लड़के के ताऊ ,चाचा फूफा मौसा लोगो को 500 का ।।सास की पिटरिया रीति तो ना भेज देंगी,रूपा 3 तोले का हार लायी रही ,आप उतना ना सही पर कुछ तो डालेंगी,फिर सास के साथ जेठानि को एक आध कर्णफूल अँगूठी कुछ तो पकड़ाना पड़ेगा ही।।
   सामान के लिये चलो हम मना भी कर देंगे पर पार्टी तो देंगे ना आप लोग,कम से कम ग्यारह सौ बराति का खाना खरचा हो जायेगा ।।

प्रमिला- हाँ अब इतना तो करना ही पड़ेगा,,लड़की हमारी है आखिर।।
   प्रमिला के धीमे से शब्द जैसे गले में ही रुंध गये

बांसुरी- इतना कुछ नही करना पड़ेगा मम्मी ।।माफ कीजियेगा आँटी जी,पर बेटी पैदा करने का जो पाप हमारी मम्मी ने किया उसकी अच्छी खासी सज़ा आपने सुना दी,पर हमे ये सज़ा मंजूर नही है।
  राजा तुम अच्छे तो बहुत हो,हमे बहुत प्यारे भी हो पर अब हम तुमसे शादी नही कर पायेंगे ,चलिये मम्मी।।
    और आँटी आपको एक बात और बता दें,हम आगे पढ़ाई और नौकरी दोनो करना चाहतें हैं,पर शायद आपको ये भी पसंद नही आयेगा,वैसे आपकी पसंद का हममे कुछ भी नही है,आपको यहाँ आकर हमारे कारण जो भी परेशानी उठानी पड़ी उसके लिये माफी चाहतें हैं ।नमस्ते।।

बन्टी- अरे ऐसे कैसे!! बांसुरी बड़ों की बात चीत अभी चल रही है,ऐसे बीच मे तुम्हारा बोलना ठीक नही है,,ये सब तो शुरुवाती बाते हैं,धीरे धीरे सब सुलटाएंगे,तुम काहे इतना टेंशन ले रही हो।

बांसुरी- नही बन्टी भैय्या,जहां बातों की शुरुवात ही गलत नींव पर हो वहाँ हमारा सपनों का महल खड़ा नही हो पायेगा,चलिये मम्मी।

   बांसुरी को जाने कौन सी बात इतनी परेशान कर गयी,राजा की अम्मा का हद से ज्यादा बोलना या राजा की गम्भीर चुप्पी !! पर इसके बाद बिना रुके वो अपनी माँ का हाथ पकड़े मन्दिर से बाहर निकल गयी,उनके पीछे बुआ जी अपने पुरखों को कोसती दहेज लोभियों पे भाषण देती धीरे धीरे चल पडी,जाते जाते उन्होनें आखिरी व्यंग सुशीला पे भी दे मारा_

” अच्छा नही किया दुल्हिन!! जितना तुमने कहा उतनी सब की तैयारी रही हमारे भाई की,पर ऐसे इस ढंग से बच्चो के सामने…..का सोच रही अब खुस रह पाओगी तुम?? कर सकती हो तो हमरी बांसुरी के पहले राजा का ब्याह कर के दिखा दो, बड़ी खुसी से तुम्हरे द्वारे आयेंगे तुम्हरे राजकुमार के ब्याह का लड्डू खाने,और हम भी तुम्हें न्योत रहे एक महीना के अन्दर अन्दर तुम्हे बंसी के ब्याह का लड्डू खिला के रहेंगे।।”

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  आंखों से आग बरसाती बुआ जी अपने घुटने संभालती चली गयी।।

          ************************

              एक सौ सोलह चाँद की रातें,
               एक तुम्हारे काँधे का तिल
               गीली मेहंदी की खुशबू,
                झूठमूठ के शिकवे कुछ
          झूठमूठ के वादे भी, सब याद करा दो
         सब भिजवा दो, मेरा वो सामान लौटा दो……

  रेडियो पर बजते गाने के बोल सुन अनजाने ही दो आंसू बांसुरी के गालों पे लुढ़क आये,,खिड़की पर खड़ी वो अपनी सोच में गुम कहीं खो गयी।।

क्रमशः

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aparna..

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मायानगरी -5

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मायानगरी – 5

      मेरे पास आओ मेरे
     दोस्तों एक किस्सा सुनो
       मेरे पास आओ मेरे
     दोस्तों एक किस्सा सुनो

    कई साल पहले की ये बात है
      बोलो ना चुप क्यों हो गए
         भयानक अंधेरी
        सी यह रात में
       लिए अपनी बन्दूक
             मैं हाथ में……

   ” अबे सालों बस सुनने आये हो क्या? साला आज कल के लड़कों को कोई तमीज ही नही है। हम सीनियर होकर हम ही गाना भी सुनाए। शर्म करो कुत्तों। ये मैं गुनगुना रहा था कमीने कान गड़ाए खड़े हैं।”

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     इंजीनियरिंग कैम्पस में कंप्यूटर साइंस के जूनियर्स को मैकेनिकल के सीनियर्स धरे बैठे थे कि कंप्यूटर वाले सीनियर्स वहीं चले आये…

” अरे सीपी यार इन लोगो को काहे दबोच रखे हो, हमारे वाले हैं ये। “

” निशांत यार हम भी जानते हैं । लेकिन देखो, शुरू से ही हमारे कॉलेज में फैकल्टी वाइज कभी फसाद नही हुआ। हम अगर तुम्हारे बंदों को रैंग करते है तो तुम्हे भी तो खुल्ली छूट है यार हमारे बंदों को नोचने की।

“भाई वो बात नही है यार। इस बार की बैच में ज़रा हाई फाई लड़के भी हैं। मैनेजमेंट कोटा खूब भरा है।”

” अरे तो क्या हुआ? मैनेजमेंट कोटा से आने वालों को क्या हम तमीज नही सिखाएंगे। भाई ये हमारी ही नैतिक जिम्मेदारी है कि लड़कों को लड़का बनाया जाए। अब स्कूल से ये क्या सिख पढ़ कर आते हैं। कुछ नही। सिर्फ होर्लिक्स पी लेने से टॉलर स्ट्रॉन्गर और स्मार्टर नही बना जाता। हम ही हैं जो इन टोडलर्स को चलना सिखाते हैं।
  कायदे से यही वो जगह है जहाँ इन जाहिलों को इंसान बनाया जाता है।”
  तभी सीपी की नज़र एक जूनियर पर पड़ी जो थर्ड बटन से सर ऊपर कर के देखने की कोशिश कर रहा था कि सीपी का जोरदार तमाचा उसके चेहरे को लाल कर गया।
   जोश ही जोश में तमाचा इतना ज़ोर का पड़ा की लड़का घूम कर ज़मीन पर गिरा और बेहोश हो गया…

  वहीं चबूतरे पर बैठे अभिमन्यु और बाकी लड़के भी भाग कर देखने चले आये।
  लड़कों में हड़कंप मच गया। कम्प्यूटर वाले लड़के डर के मारे अपनी बिल्डिंग को खिसक लिए। सीपी को लगा नही था कि उसका पंजा ऐसा फौलाद का है। आश्चर्य से वो कभी उस बेहोश जूनी को तो कभी अपने हाथ को देख रहा था कि अभिमन्यु ने लड़के को उठाया और अपने कंधे पर डाल मेडिकल की तरफ भाग चला।
   अधीर भी उसके पीछे हो लिया।

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   लंबा चौड़ा अभिमन्यु उस नाजुक दुबले पतले से जूनियर लड़के को कंधे पर लिए बिल्कुल साक्षात सती को कंधो पर लिये महादेव सा चला जा रहा था।

  मेडिकल में गेट पर  से घुसते ही बायीं ओर कॉलेज का हॉस्पिटल था। अभि उसी तरफ निकल गया…

“ला यार थोड़ी देर मैं भी पकड़ लूँ। “

  अधीर के इस प्रोपोजल के आते में ही मेडिकल कैम्पस में खड़ी स्ट्रेचर लिए वार्डबॉय भागा चला आया…

” क्या हुआ है लड़के को? “

  डॉक्टर के सवाल पर अभिमन्यु ने ही जवाब दिया..

” बेहोश हो गया है। “

” वो तो दिख रहा है। बेहोश कैसे हुआ? “

  अभि और अधीर एक दूसरे को देखने लगे। डॉक्टर के सामने ये बताना कि रैगिंग में पड़े थप्पड़ ने ये हाल किया है महंगा पड़ सकता था।

” इसने ब्रेकफास्ट नही किया था डॉक्टर!”

ड़ॉक्टर ने अजीब सी नज़रों से अभि को घूर कर देखा और लड़के को साथ लिए अंदर चला गया।

  अभी और अधीर के पीछे सीपी और उसके 1-2 चेले भी भागते हुए मेडिकल चले आए। सीपी और चेले वहीं बाहर बैठ गए।

   अभि और अधीर इधर उधर भटकते उस लड़के के होश में आने का इंतज़ार कर रहे थे कि कहीं से मधुर सी गाने की आवाज़ चली आयी। दोनों उसी दिशा में बढ़ चले…

  मेडिकल प्रथम वर्ष के छात्रों का आज अस्पताल विज़िट करने का पहला दिन था और आज ये नन्हे-मुन्ने बच्चे रेजिडेंट डॉक्टर्स के हत्थे चढ़ गए थे।
   असल में इन्हें इनके कुछ सीनियर्स ने अस्पताल की ओपीडी से कुछ आवश्यक सामान लाने का बेइंतिहा गैरजरूरी काम दिया था।
   इसी चक्कर में ये चार पांच लड़के लड़कियां यहाँ फंस गए थे।
वैसे रेजिडेंट डॉक्टर्स इतना व्यस्त होते थे कि वो जूनियर्स की रैगिंग लेते नहीं थे। लेकिन पिछले दिन की हेक्टिक शेड्यूल की थकान उतारने के लिए आज उनके पास जूनियर्स नाम का एंटरटेनमेंट मौजूद था। और बस इस एंटरटेनमेंट की बहार देखते हुए रेजिडेंट डॉक्टरों का भी उ ला ला करने का मन करने लगा।
  डॉक्टर्स ड्यूटी रूम में इन जूनियर्स की रैगिंग चल रही थी।
  इत्तेफाक से रंगोली ही उस रैगिंग की सबसे पहली शिकार बनी थी। सीनियर से उसे गाना सुनाने को कहा था और वह अपने गले को साफ कर गाना शुरू कर चुकी थी।

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देख लो हमको करीब से
आज हम मिले हैं नसीब से
     यह पल फिर कहां
    और यह मंजर फिर कहां
  गजब का है दिन सोचो जरा
   यह दीवानापन देखो जरा
तुम भी अकेले हम भी अकेले मजा आ रहा है कसम से…..

   कमरे के ठीक बाहर खड़े अभिमन्यु और अधीर के कानों तक भी यह स्वर लहरी पहुंच चुकी थी। आवाज का नशा अभिमन्यु पर ऐसा छाया कि बेहोशी के आलम में उसने दरवाजा धीरे से खोल दिया…
उसके दरवाजा खोलते ही सारे सीनियर्स अपनी जगह से उठकर खड़े हो गए। जूनियर्स पहले ही खड़े थे जो थर्ड बटन में थे   वह लोग भी दरवाजे की तरफ देखने लगे । अभिमन्यु और अधीर को ऐसे सामने खड़े देख एक सीनियर रेजिडेंट ने उन लोगों से पूछ लिया…-” आप लोग कौन हैं यहां क्या कर रहे हैं?”

“हम इंजीनियरिंग के हैं ,एक मरीज लेकर आए थे।”

“मरीज लेकर आए थे? क्या हुआ तुम्हारे मरीज को?”

“जरा चक्कर आ गया था।”

“हां तो ठीक है! लेकिन यहां क्या कर रहे हो? मरीज को भर्ती करवा दिया है ना ड्रिप चढ़ेगी शाम तक बंदा अपने पैरों पर चलकर इंजीनियरिंग कैम्पस वापस आ जाएगा इसलिए अब  फुटो यहां से।”

अभिमन्यु ने रंगोली को देखा रंगोली ने अभिमन्यु को और अभिमन्यु के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कुराहट आ गई!  पास खड़ी झनक ने रंगोली को तुरंत कोहनी मारी….-” देख आखिर तेरा पति  तुझे ढूंढता यहाँ तक चला आया।
“चुप कर बकवास मत कर।”
रंगोली  जितना धीमा बोल सकती थी उतना धीमा बोली लेकिन उसने इतना धीमा बोल दिया कि पास खड़ी झनक तक को सुनाई नहीं दिया और झनक ने इतनी जोर से “क्या” कहा कि सारे रेजीडेंट डॉक्टर उन दोनों को देखने लगे।

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  उसी वक्त बाहर से गुजरते मृत्युंजय की नजर डॉक्टर्स ड्यूटी रूम पर पड़ गई। वह अभिमन्यु और अधीर को हाथ से हटा कर दरवाजे से भीतर चला आया…-” क्या हो रहा है यहां पर?”
सारे जूनियर रेजीडेंट डॉक्टर घबराकर एक तरफ खड़े हो गए …-“कुछ नहीं सर! वह बस जरा यह फर्स्ट ईयर जूनियर्स हैं इन्हें एनाटॉमी पढ़ा रहे थे।”
“एनाटॉमी पढ़ाना है, तो लैब में पढ़ाया करो। यहां बिना बोन और बिना किसी ऑर्गन के तुम लोग एनाटॉमी कैसे पढ़ा रहे हो?”
मृत्युंजय ने जूनियर की तरफ देखा और उन्हें वहां से जाने की इजाजत दे दी।

  उस कमरे से बाहर निकलते ही जूनियर्स ने चैन की सांस ली… -“यहां तो यार हर मोड़ पर आतंक छाया हुआ है! वह गाना आज मेरी समझ में आ रहा है, यहाँ रोज-रोज हर मोड़ मोड़ पर होता है कोई ना कोई हादसा।  बस उन्हीं हादसों का अड्डा है हमारा कॉलेज। क्लास में बैठते हैं तो फँस जाते हैं। लैब में जाते हैं तो फँस जाते हैं। हॉस्पिटल आते हैं तो भी फँस जाते हैं। जहां देखो वहां सीनियर का आतंक है। आखिर कब बच पाएंगे हम लोग।”
   झनक की बात पर साथ चल रहा लड़का राहुल हंसने लगा…-” तुम लोग तो फिर भी लड़कियां हो यार! तुम बच जाती हो, हम लोगों के साथ हॉस्टल में भी इतनी ज्यादा अति होती है कि हम बता नहीं सकते।”
  “प्लीज बता ना क्या रैगिंग होती है तुम लोगों के साथ।”
  ” चुप कर! नहीं बताना।”
“अरे ऐसा क्या करते हैं भई सीनियर बता ना प्लीज।”
“होती है बॉयज वाली रैगिंग! जैसे तुम्हारी गर्ल्स प्रॉब्लम तुम हमसे शेयर नही कर सकती, हम भी नही कर सकते ।”
” बड़ा आया। मत बता।”
   वो लोग बातें करते अगर बढ़ ही रहे थे कि पीछे से उन्हें आवाज़ लगाते अभिमन्यु और अधीर चले आये…
” एक्सक्यूज मी गाइज़! आप लोग मेडिकोज हैं?
   अभिमन्यु के सवाल पर रंगोली के अलावा बाकी लोगों ने उसे घूर कर देखा..-” हां जी आपको क्या प्रॉब्लम है?”
“नो नो! कोई तकलीफ नहीं है । एक्चुली मैं कुछ जानना चाहता था मेडिकल टर्म्स में।”
राहुल ने उसे बिल्कुल ही हिकारत भरी नज़रों से घूर कर देखा।
” भाई मेरे! ऐसे घूर कर मत देख! मैं भी कोई ऐवें नहीं हूं। इंजीनियरिंग कर रहा हूं, मेकेनिकल से। और उम्र के लिहाज से देखा जाए तो तुम सबसे दो-तीन साल बड़ा ही हूंगा। और प्रोफेशनल कॉलेज के हिसाब से देखा जाए तो यूनिवर्सिटी सीनियर हूं तुम्हारा।”
अबकी बार जवाब राहुल की जगह अतुल ने दिया…-” जी कहिए क्या पूछना है आपको।”

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“दोस्त कहीं आराम से बैठ कर बात कर सकते हैं । ज़रा सीरियस मुद्दा है।”
“ओके बाय गाइज़। तुम लोग बैठ कर बातें करो मैं और रंगोली चलते हैं।” झनक रंगोली का हाथ थामे आगे बढ़ने लगी कि अभिमन्यु उन दोनों के सामने अचानक से जाकर खड़ा हो गया….-” अरे मैडम! प्लीज रूके ना आप चार डॉक्टर रहेंगे, तो मेरी समस्या को आप लोग आसानी से समझ कर सुलझा सकते हैं । आप मेडिकल की पढ़ाई करने आई हैं। आप लोगों का तो पेशा ही है लोगों के दुख दर्द सुनना।”
   झनक ने एक नजर अभिमन्यु को देखा और हां में सर हिला दिया।
   रंगोली का वहां रुकने का बिल्कुल मन नहीं था वह झनक का हाथ पकड़े बार-बार उसके हाथ पर दबाव बनाती वहां से निकल चलने की गुजारिश कर रही थी।
    उन चारों डॉक्टरों के साथ अभिमन्यु और अधीर मेडिकल कैंटीन में पहुंच गए।
  वह चारों अभी फर्स्ट ईयर में थे इसलिए कायदे से उन्हें कैंटीन जाना अलाउड नहीं था। और यह बात उन चारों को मालूम नही थी, अनभिज्ञता में वह चारों अभिमन्यु के साथ कैंटीन में प्रवेश कर गये।
   कैंटीन में काम करने वाला लड़का झाड़न अपने कंधे पर लटकाए उन तक चला आया…-‘ फर्स्ट ईयर के लगते हो आप लोग।”
  झनक ने उसे घूर कर देखा…-” हां तो!”
“तो यह कि अगर सीनियर्स ने देख लिया कि फर्स्ट ईयर में वेलकम पार्टी मिले बिना आप लोग कैंटीन चले आए हो तो…?”
“तो क्या बे? हम लोगों को सिखा रहा है!” अबकी बार राहुल उलझ पड़ा।
“मैं क्या सिखाऊंगा? आप लोगों को रात में वह सामने पीपल पर लटकी उल्टी चुड़ैल सब कुछ सिखा देगी।”
“अरे गुरु घंटाल! यह लोग खुद से नहीं आए मैं इन लोगों को लेकर आया हूं! और मैं फिस्थ सेमेस्टर में हूं यानी कि सीनियर बन चुका हूं यूनिवर्सिटी का । और यूनिवर्सिटी के हर कैंटीन में हमें जाना अलाउड है, आई बात समझ में।”

अजीब सा मुहँ बनाकर उनके टेबल पर झाड़न मार कर वह लड़का जाने लग गया….-” अबे जाते-जाते ऑर्डर तो ले जा।”
“क्या लोगे आप लोग?” उसने एक नजर सब को घूर कर फिर पूछा….
” तेरे यहां का सबसे स्वादिष्ट व्यंजन क्या है ?”
“इस वक्त सिर्फ मैगी और सैंडविच मिलेगा।”
“और पीने के लिए ?”
   अभिमन्यु ने मुस्कुराते हुए पूछा…
” आप जो पीते हो वो कतई नही मिलेगा।
उस लड़के ने एक नज़रअभिमन्यु को देखा और अपनी ही कही बात संभाल ली…-” स्ट्रौबरी शेक।”
अभिमन्यु का मुंह बन गया उसने कहा …-“इन चारों के लिए वही ले आ।”
“अब बोलो? कौन सी  मेडिकल इमरजेंसी के बारे में पूछना था तुम्हें? झनक के सवाल पर अभिमन्यु मुस्कुराने लगा।
“अबे ओए टॉम क्रूज दांत बाद में दिखाना पहले फटाफट बता तेरी प्रॉब्लम क्या है ?” अबकी बार राहुल लपका
“वह प्रॉब्लम यह है कि मेरा एक दोस्त है उसकी याददाश्त जरा गुम होने लगी है! सुबह ब्रश किया है कि नहीं उसे कुछ याद नहीं रहता।  कई बार रात में सोता है लेकिन सुबह उठने पर फिर कहता है मैं तो रात भर सोया ही नहीं। नहा कर आता है, और फिर नहाने चला जाता है। खाने का तो पूछो ही मत जितनी बार दे दो हर बार खा जाता है। क्योंकि वह यही भूल चुका होता है कि वह खा चुका है। और तो और कई बार यह भी भूल जाता है कि वह सुसु पॉटी करके आ चुका है। इस प्रॉब्लम का इस समस्या का कोई समाधान है आप लोगों के पास डॉक्टर?”
“अबे यार कौन है यह नमूना? “
अभिमन्यु ने अधीर की तरफ इशारा कर दिया अधीर ने उसे घूर कर देखा और अपनी जगह से खड़ा हो गया…
” शरमा गया बेचारा। क्या है ना ऐसी समस्या है कि बाहर किसी से डिस्कस नहीं कर सकते, आप लोगों को देखकर लगा जैसे दिल से आपसे रिश्ता है। इसीलिए आपसे यह तकलीफ कह गया।”

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    अभिमन्यु अपनी बात कहते हुए रंगोली को देखता रहा। रंगोली ने घबराकर पलके नीचे कर ली। वह झनक का हाथ इतनी जोर से पकड़ी हुई थी, कि अब झनक को हाथ में दर्द होने लगा था। झनक अपनी जगह से खड़ी हो गई…-” चल रंगोली अब हम वापस जाते हैं हॉस्टल के लिए लेट हो रहे हैं।’
   वह दोनों वहां से निकलने को ही थी कि चार पांच सीनियर लड़कों की टोली उनका रास्ता रोक खड़ी हो गयी…
” फर्स्ट ईयर? “उनमें से एक ने कड़क कर पूछा।
“यस सर!” मिमियाती सी आवाज़ में राहुल ने जवाब दिया
” वेलकम पार्टी के पहले कैंटीन जूनीज़ के लिए अलाउड नही है। तुम लोगो को मालूम नही था।”
” वी आर सो सॉरी सर। हमें वाकई मालूम नही था। “
” अच्छा बेटा! और फर्स्ट मन्थ में ही तितलियों को लेकर कैंटीन घूम रहें हो। “
  रंगोली के लिए तितली सम्बोधन सुन अभिमन्यु का खून खौल उठा…-“माइंड योर लैंग्वेज, व्हाटएवर इस योर नेम? “
” तू कौन है बे? बीच में बोलने वाला? मेडिको तो नही है!”
” मेकेनिकल इंजीनियरिंग थर्ड ईयर का स्टूडेंट हूँ,नाम अभिमन्यु है। “
” तो बेटा अभिमन्यु तेरे गुर्दो में दर्द क्यों हो रहा जब हम अपने बच्चों को डांट रहे। “
” डाँटो लेकिन तमीज से। अगर गर्ल्स के लिए कोई बदतमीजी करोगे तो मैं सहन नही करूँगा। “
” क्यों बे तेरी सेटिंग है क्या ये। ” उसने रंगोली की तरफ इशारा किया..
” हां है। और आज के बाद इसे परेशान किया तो नाम याद रख लेना अभिमन्यु से बुरा कोई नही होगा।”
  अभिमन्यु उसे धमका कर निकल गया,अधीर भी उसके पीछे गिरता पड़ता भाग गया।
   इतनी सारी बहस के बीच पीछे खड़े सीनियर्स के इशारे पर वो सारे जूनियर्स भी वहाँ से खिसक लिए।
” वेलकम बेटा अभिमन्यु! मेडिकल के चक्रव्यूह में तुम्हारा स्वागत है। जानते नही हो तुम, तुम्हारा पाला ऋषि खुराना से पड़ा है।”
   खून का घूंट पीकर ऋषि खुराना भी अपनी गैंग के साथ निकल गया।

   वहीं पीछे एक सबसे किनारे की टेबल पर गौरी बैठी अपनी नोटबुक में कुछ लिख रही थी।
  उसकी एकमात्र खास सहेली प्रिया किसी काम से स्टाफ रूम गयी थी। उसी का इंतज़ार करती गौरी अपनी नोटबुक खोली बैठी थी कि तभी विधायक नारायण दत्त का लड़का वेदांत वहाँ अपनी टोली के साथ चला आया।
   यही वो लड़का था जिसके इधर उधर तफरीह करने से परेशान सीपी सर अभिमन्यु और बाकियों को लिए निरमा से मिलने गए थे।
   कैंटीन में सारे टेबल भरे थे। गौरी के सामने तीन कुर्सियां खाली पड़ी देख वेदांत ने एक कुर्सी पकड़ कर पीछे खींची और बैठने को था कि मृत्युंजय आकर उस कुर्सी पर बैठ गया।
    मृत्युंजय ने वेदांत को देख उसे थैंक्स बोला और गौरी की तरफ देखने लगा।
  गौरी वेदांत के व्यवहार को देखते हुए अचरज में थी कि मृत्युंजय आ गया और उसे देख गौरी के चेहरे पर सुकून लौट आया।
   उन दोनों को एक दूसरे को देखते देख वेदांत वहाँ से हट गया कि तभी उसके एक चेले ने उसे आवाज़ लगा दी…-” गुरु यहाँ टेबल खाली है। आ जाओ।”
   एक नज़र गौरी को घूर कर वेदांत आगे बढ़ गया…

“, थैंक यू सर। आप हमेशा मेरी परेशानी में मेरा साथ देने खड़े रहते हैं।”
” इट्स माय प्लेजर गौरी। और बताओ कैसी हो तुम?”
“ठीक हूँ । अभी एक हफ्ते से मेडिसिन बंद की है। और मुझे नींद भी सही या रही है।”
” इट्स गुड! लेकिन एकदम से विड्रॉ नही करेंगे। धीरे धीरे ही मेडिसिन छोड़ना।”

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” जी सर। “
” कॉफी लोगी? “
गौरी ने हाँ में सिर हिला दिया…
दोनो साथ बैठे कॉफी पीते इधर उधर की बातें करते रहे।
     जय के साथ होने पर गौरी के चेहरे पर काफी समय बाद मुस्काने लौटने लगीं थीं…..

क्रमशः

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aparna…

शादी.कॉम-18

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      ” नैना नु पता है, नैना दी खता है
       सानु किस गल दी फिर मिल दी सज़ा है
       नींद उड़ जावे, चैन छड  जावे
       इश्क़ दी फ़क़ीरी जद लग जावे
                 ऐ मन करदा है ठगी ठोरिया
                 ऐ मन करदा हैं  सीना ज़ोरियां
                 ऐने सिख लियाँ दिल दियां चोरियां
                 ऐ मन दियां ने कमज़ोरियाँ “

   एक के बाद एक गाने बजते रहे,गानों की ताल पे ताल मिलाता राजा गाड़ी चलाता रहा,बांसुरी पीछे से राजा को देख देख मुस्कुराती रही,पर राजा के ठीक बाजू में बैठी सुशीला का फिर किसी काम में मन नही लगा।।

     ऐसा नही था कि सुशीला को “लव मैरिज” से शिकायत थी ,अपनी बेटी जैसी पिंकी के लिये भी कुछ हल्की फुल्की ना नुकुर के बाद उसने खुद ने हामी भर दी थी……पर बेटों के नाम पर जाने क्यों उसका हृदय एक अजीब सी ममता से छलक उठता था,इस भाव में प्रेम था तो आधिपत्य भी था,स्नेह था तो एकाधिकार भी था।।
        वैसे भी शादी के बाद लड़का उतना माँ का कहाँ रह जाता है,और अगर शादी  खुद की मर्ज़ी से की हो तब तो पूछो मत !! माँ तो ऐसी शादियों में अमूमन ललिता पवार का किरदार निभाने लगतीं हैं।    

 

    वैसे सुशीला को पारंपरिक बहुओं को सताने वाली सास बनने का शौक भी नही था,इसीसे वो रूपा के लिये बिल्कुल माँ जैसी सास ना होकर भी एक  अच्छी सास तो थी ही, पर राजा के केस में बात अलग थी,यहाँ राजा किसी लड़की को पसंद करने लगा था,हालांकि अभी तक बांसुरी के लिये ऐसी कोई इच्छा उसने अपनी माँ के सामने जाहिर नही की थी पर पूरे नौ महीने अपने पेट में रख के अपने ही रक्त मांस से सींच कर उसे पैदा करने वाली जननी क्या अपने बालक के हृदय की अधीरता से इस हद तक अंजान रह सकती थी।।
       छठी इंद्रि के एंटीना द्वारा बार बार भेजी जा रही सूचनाओं को व्यर्थ भी नही माना जा सकता था ।।

       बिदाई के नियत मुहूर्त से कुछ पहले ही अवस्थी परिवार मय बांसुरी शास्त्री जी के घर पहुंच गया, आवश्यक आवभगत के बाद दोनो समधिने यहाँ वहाँ की तैयारियों में जुट गयी,रूपा बांसुरी को साथ लिये रेखा को सजाने में लग गयी,,सभी किसी ना किसी कार्य में व्यस्त थे।।

     घर के बीचो बीच बने बड़े से दालान में लोगों की आवाजाही लगी हुई थी,रूपा का कमरा ऊपर था जहाँ बांसुरी थी…..काफी देर से बांसुरी को राजा का कोई हाल समाचार नही मिला था,बांसुरी के भेजे सन्देश भी राजा ने व्यस्तता के कारण नही देखे थे, ऐसे में अपनी अधीरता से स्वयं परेशान बांसुरी ने रूपा से पानी पीने के बहाने नीचे जाने की आज्ञा ली और कमरे से निकल चली,लोगो से बचते बचाते नीचे को जाती गोलाकार सीढ़ियाँ उतर ही रही थी कि किसी काम से ऊपर को जाते राजा से टकरा गयी__

  ” कहाँ गायब हो सुबह से?? नज़र ही नही आ रहे,, और इतना काहे में बिज़ी हो गये की मेसेज तक देखने का समय नही मिला।”

  ” क्या मेसेज करी रही।”

  ” खुद ही देख लो,बताना होता तो लिखने में आँख काहे फोड़ते।”

  ” ये भी बात सही है,,यार इत्ता भन्नायी काहे हो,देख तो रही हो शादी ब्याह का घर है,अब भैय्या तो ठहरे जमाई ,उनको कोई काम नही बता रहा,हम ही सबसे छोटे हैं,हमी पेराते हैं हर जगह।।”

  ” हम काम करने मना कर रहे क्या?? पर एक तो हम किसी को जानते नही,तुम एकदम ही छोड़ कर चल दिये तो गुस्सा तो आयेगा ना,का करें बोलो।”

  ” हम तो सोचे थे आराम से तुम और हम कहीं बैठ के बातें करेंगे पर यहाँ तो इत्ता काम फैला रखा है इन लोगों ने,ऐसा लग रहा सारा काम हमारे लिये ही बचा रखा था कि राजा आयेगा और करेगा सब।।”

” अच्छा वो सब छोड़ो,ये बताओ अम्मा जी से बात हुई क्या??”

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” अजीब बात करती हो यार तुम!! देख रही हो मरने का भी फुर्सत नही है राजा के पास ,और पूछ रही अम्मा से बात हुई का!! अरे कहाँ से करे,अम्मा यहाँ वहाँ उड़ती जो फिर रही हैं ।”

” ना करो!! हम कौन सा मरे जा रहे कि तुम अम्मा जी से बात करो और उसके बाद हमको आई लव यू बोल दो।”

” रुको रुको! क्या बोली तुम!! क्या बोल दें।”

” हम कहाँ कुछ बोले?? हम तो कुछ नही बोले।।”

” अच्छा बाबू!! हम से चालाकी,अभी अभी तो बोली ना कि अम्मा से बात करके…..

दोनों एक दूसरे की आंखों में खोये एक दूसरे को ताने उलहने दे रहे थे कि राजा की अम्मा की गगनभेदी आवाज़ हवाओं में घुल गयी

” राजा ए राजा!! तुम हियाँ खड़े हो,वहाँ तुम्हारे बाबूजी कब से तुम्हें आवाज़ लगा रहे,,लड़के वाले निकले की नही पता करो जरा,उसके बाद जनमासा भी देखे आओ एक बार,सब ब्यब्स्था ठीक ठाक है की नही??”

” अम्मा बिदाई ही तो है,उसमें जनमासा की का ज़रूरत।”

“काहे अब तुम हमें बताओगे कि का नियम करना है और का नही।।कुंवर कलेवा करने के पहले दूल्हा का हाथ मुहँ नौआ कहाँ धुलायेगा,ईहे घर मे?? बिदाई के पहले दोनो का कोहबर पुजाई कहाँ  होगा?? बोलो? औ सबसे बड़ा बात कि यहाँ से रेखा को जनमासा  तक बिदा करके बापस ले आयेंगे औ एक बार फिर बिदाई कर देंगे तो गमना भी संगे संग निपट जायेगा। नही तो इतना महंगाई के जमाना में बिदाईये मा दुई तीन लाख रुपिया बकील बाबू का निपटा जायेगा, समझे।।हमसे बाते बनाएँगे ,जाओ हो लाला जल्दी करो,और ए सुनो तुम ,का नाम है तुम्हारा??”

  सुशीला ने बिल्कुल ऐसा अभिनय किया जैसे उसे सच में बांसुरी का नाम याद नही आ रहा हो,बांसुरी ने सिर झुका कर धीरे से अपना नाम बता दिया__” बाँसुरी “

  ” हाँ  हाँ बांसुरी!! जाओ देखो दुलहीन तैयार भई की नही।उसे नीचे लाना ,तब तक वहीं बैठो।।”

  बहुत प्यार से हां मे सिर हिला के बांसुरी ऊपर को वापस मुड गयी पर जाते जाते उसने आंखों के इशारों से राजा को अम्मा जी से बात करने को बोल ही दिया,जिसे राजा ने सर झुकाकर मान लिया,इस सारे प्रसंग को देख कर सुशीला के तन बदन में आग लग गयी।।
     उसे अपने लाड़कुंवर और इस छोकरी के बीच चल रही “आंखो की गुस्ताखियाँ ” माफ करने का बिल्कुल भी जी नही किया।।

   बिदाई के पहले होने वाली छोटी मोटी  रस्में चलती रहीं,सब रस्मों रिवाजों का आनंद ले रहे थे पर प्रेमी युगल अपने में ही मगन था,भले ही राजा पुरूषों की तरफ और बांसुरी औरतों के तरफ बैठी थी पर रह रह कर दोनो की आंखें आपस में टकरा ही जाती थी, और इस टकराहट में निपट जाते थे दुनिया भर के उलाहने,ताने,मान मनौव्वल,रूठना मनाना।।और इन सब बातों की साक्षी बनती जा रही थी सुशीला।।

    बरातियों के स्वागत सत्कार भोजन पानी के बाद बिदाई कार्यक्रम प्रारंभ हुआ__
    
“कैसे भूल पाऊँगी मैं बाबा ,सुनी जो तुमसे कहानियाँ छोड़ चली आँगन मैं मैय्या ,बचपन की निशानियाँ
सुन मेरी प्यारी बहना, सजाये रहना ये बाबुल की गली, सजन घर मैं चली ……”

     बरातियों के साथ आयी धुमाल पार्टी ने ऐसा मर्मस्पर्शी गीत पृष्ठभूमि में बजा दिया कि वहाँ खड़े कई उम्रदराज पुरूष भी अपनी अपनी दुहिताओं की बिदाई याद कर सिसक पड़े …..
        रेखा को शादी ब्याह की हर रस्म से बहुत प्यार था, पर उसकी शादी जिन हिसाबो में हुई उसे अपनी कल्पनाओं को साकार करने का कोई अवसर नही मिल पाया था,इसीसे आज उसने अपने एक मात्र सुख स्वप्न को पूर्ण करने शहर की सबसे बड़ी और महंगी चर्चित ब्युटिशियन “नीता जी “को अच्छी मोटी धनराशि दे कर बुक कर लिया था।।

    रेखा के पीछे पीछे रूपा भी ब्यूटी सलून की गंगा नहा आयी__” बस हमारा ज़रा सा जूड़ा सेट कर देना, ये कौन सी लिपस्टिक है थोड़ा सा हमें भी लगा देंगी नीता दीदी,ज़रा सा आपका वाला फेस पाउडर भी मार दो ना चेहरे पे।”
     इस तरह की टुच्ची हरकतों से परेशान होकर डिग्निफाईड,वेल मैनर्ड सुपर स्मार्ट ब्युटिशियन नीता जी ने अपनी असिस्टेंट को रूपा का टच’प करने का इशारा किया और खुद रेखा को सजाने में लग गयी।

      अपने कुशल चितेरे हाथों का कौशल दिखाती
ब्युटिशियन ने रेखा के साधारण रूप को ऐसे असाधारण रंगो से सजा दिया कि रूपा भी चकित हो देखती रह गयी….अब ग्यारह हज़ार खरच कर कराये इत्ते सुन्दर मेक’प को क्या बिदाई के आँसूओं में बहाया जा सकता था।।
       भले ही सारी मोहल्ले की औरतें ज़ार ज़ार रो रही थीँ पर दोनो बहनों के आंसू नदारद थे,,,जग दिखायी को दो एक आंसू रूपा ने बहा भी लिये,बहन को गले से लगाये बचपन की यादों को दुहराती रूपा ने धीमे से रेखा के कान में मन्त्र फूंक दिया__” दो आंसू बहा दो,बिदाई मे नही रोने से अपसकुन होता है।”

  ” मेक’प सारा बह जायेगा जिज्जी।”  रेखा की बात पर बन्सी ने चुपके से उसके कान के पास मुहँ ले जाकर कहा__
           ” वाटर प्रूफ मेक’प है ‘मैक’ का,आपकी ब्युटिशियन बोल रही थी,विदेशी कंपनी है,जा के नहा भी लेंगी ना तब भी चेहरा ऐसे का ऐसा ही दिखेगा।। बेझिझक रो लिजिये।”

  रेखा ने इशारे से बन्सी से पूछा ” पक्का??”
  
   बंसी ने आंखों से ही रेखा को आश्वस्त किया,और रेखा अपनी जिज्जी के गले से लगी रो पड़ी ।।

  लल्लन के पट से बंधी अपनी चुनरी की गांठ सहेजती रेखा अपने दोनों हाथों से लावे उलीचती आगे बढ़ कर कार में जा बैठी,उसके पीछे सभी को सादर नमन करता लल्लन भी अपनी नवेली पत्नि के बाजू में जा बैठा,,उनकी कार अपने पहिये से नारियल को दबाती धीरे धीरे आगे बढ़ धूल उड़ाती चली गयी।।।

     बिदाई के बाद सभी मेहमान खाना पीना निपटाने में लग गये, रूपा के साथ बैठी बांसुरी भी बिना मन आड़े टेढे कौर जैसे तैसे निगल रही थी।।

   जिसने भी ये कहा है कि प्यार होने के बाद भूख प्यास मर जाती है ,नींदे उड़ जाती है  …शत प्रतिशत सत्य कहा है,,उस बन्दे को वाकई ये सुखद अनुभूति ( पहले और सच्चे प्रेम की) कई कई बार हुई होगी।।

   अब इस आनंद उदधि में राजा और बांसुरी डुबकी लगा रहे थे ,जहां उनकी भूख प्यास सुख चैन सब खो चुका था,और कुछ बचा था तो बस एक सुकून __ एक दूसरे की आंखों में खोने का।।

   राजा अपनी प्लेट सजाये बांसुरी की तरफ बढ़ ही रहा था कि सुशीला ने आकर बीच में ही उसे रोक लिया__” लाला जा बेटा अपने बाऊजी को थाली दे आ!! वो कहाँ यहाँ बुफे उफे में घुसेंगे,और सुन पानी का गिलास भी रख आना,खाने के बीच उन्हें पानी लगता है,और सुनो मिर्ची का भजिया ना ले जाना , खाने को खा तो लेंगे फिर रात भर पेट मा जलन बोल के परेसान करेंगे,मीठा उठा अच्छे से ले जाना,वही तो चाव से खाते हैं मिठखौवा बामण ।।”

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   अम्मा की बात सुन राजा वापस मुड़ के अपने बाऊजी की तरफ चला गया,उन्हें थाली पकड़ा के निकल ही रहा था कि शास्त्री जी ने उसका हाथ थाम वही बैठा लिया__
 
    ” आज एक और जिम्मेदारी से मुक्त हो गये हम! अब हमारे सलगे लड़िका बच्चा अपने अपने ठौर को लग गये,,अवस्थी जी आप जैसा समधि पाकर सच हमने गंगा नहा ली ,, युवराज बाबू जैसा दामाद, आपका जैसा परिवार किस्मत से मिलता है भई !! अब देखो !! राजा ने कितना भाग दौड़ किया है,हमको तो लगता है जैसे राजा हमारे ही कोनो जनम का लड़का है।।
      अब एक पते की बात बताते हैं,हमारे एक साढू हैं, बलिया के रहवासी है,खूब खेती खार है,पुराने गोंटिया है जमीन जायदाद की कोनो कमी नही ,,इत्ता रुपया जोड़े रक्खे हैं कि सात पुश्ते आराम से बैठ के खा सकतीं हैं ……एक इकलौती लड़की है बस !! मालती!! अपने राजकुमार के लिये एकदम फिट रहेगी।।खूब माल दबा के रक्खा है मिसिर( मिश्रा) जी ने,मोटे आसामी है….इक्कीस लाख तो तिलके चढ़ा देंगे,पांच – सात में बरीक्षा निपटाएंगे।।
      गिरस्ती का पूरा समान,कार और पांच एकड़ का खेती भी देने बोल रहे।।हमरी बड़की के ब्याह में उन्होनें राजा को देखा रहा,अब जब वो देखे कि हमरी रेखा भी निपट गयी तब अपने मन की बात रक्खी हमारे सामने।।
      समधि जी इससे बढ़िया रिस्ता नही मिलेगा।”

” पापाजी लड़की पढ़ी कहाँ तक है।”

” दामाद बाबू अब ईहे मत पूछो,लड़की गोरी नारी सुन्दर है,अब बचपन से राजकुमारी बना के पाले, स्कूल में एक दिन कुछ जबाब गलत दे दी रही तो गणित की बहन जी ने वहीं दो लप्पड़ धर दिये अब लड़की डर गयी और घर आके ऐसा कोहराम मचाई कि फिर कोनो उसको स्कूल नही भेज पाया।”

“दसवीं तो पास होगी??”

” चौथी के बाद पाठसाला का दरसनो नही पायी लड़की पर काम काज में एकदम चतुर!! हमरी रूपा  का दूजा रूप समझो ।।।

” तब तो गये काम से ” युवराज की चिकोटि पे बिना ध्यान दिये उसके ससुर भावी पुत्रवधु के गुणों का व्याख्यान करते रहे।।

   महिलायें बिना वजह ही बतकही के नाम पे अधिक बदनाम है वर्ना पुरूष भी इधर उधर की गप्पे हाँकने में कहीं से पीछे नही रहते,,दस मिनट में समाप्त होने वाली पूरी कचौरी पूरे डेढ़ घन्टे तक थाली में अपने उदरस्थ होने की प्रतीक्षा करती रही।।
   
    तभी छन छन पायल छनकाती सुशीला वहाँ आयी और थोड़ी दूर से ही आवाज़ लगा दी__

   ” अजी सुनिये!! अब निकलना भी पड़ेगा,घर पहुँचते पहुँचते रात हो जायेगी,,बो तो अच्छा है फूलमणि को घर छोड़ आये थे तो सांझ का दिया बाती हो जायेगा।।”

” हाँ हाँ!! ठीके कह रही हो,चलो युव की अम्मा,निकलते हैं अब।।”

  अबकी बार सुशीला पूरी तैयारी में थी,कौन किस गाड़ी में सवार होगा,कहाँ बैठेगा उसने मन ही मन पूरा खाँचा खींच रखा था,उसने महिलाओं के बीच खड़ी बांसुरी और रूपा को ठेल ठाल के युवराज की गाड़ी में बैठा दिया,और खुद प्रिंस प्रेम और एक दो नौकरों को लिये राजा की गाड़ी में जा बैठी।।

    राजा जब शास्त्री जी की चरण वन्दना कर अपनी गाड़ी पे आया तो बाँसुरी को वहाँ ना पा कर असमंजस में प्रिंस को देखा,प्रिंस ने त्वरित गति से बड़े भैय्या की गाड़ी की ओर इशारा कर दिया, बड़े भैय्या की गाड़ी में बांसुरी को बैठे देख राजा को आश्चर्य हुआ __ :कि ये वहाँ कैसे चली गयी: पर प्रत्यक्ष में बिना कुछ कहे चुपचाप आकर ड्राईविंग सीट पर बैठ गया।।

   उधर अम्मा जी के कड़े तेवर देख बिना ना नुकुर किये बांसुरी चुपचाप युवराज भैय्या की गाड़ी में जा बैठी थी,रूपा भाभी से भी कम ही मिलना हुआ था उसका और उसे उनकी स्वप्रशंसा की बातें पसंद भी कम ही आती थी इसीसे मन ही मन उदास बांसुरी अपने ही मन के आगे लाचार हुई जा रही थी।।

    कैसा द्वंद उसके मन में चल रहा था,दो दिन पहले तक जिस राजा से सिर्फ जिम मे एक डेढ़ घन्टे की मुलाकात ही काफी होती थी आज उसके बिना पांच मिनट भी काटना कितना मुश्किल लग रहा था।। उसे पता था कि राजा की गाड़ी भी उसके आगे या पीछे ही चलेगी फिर भी कैसा खालीपन सा मन में भर गया था,जैसे बहुत सारे बादल छा तो गये हैं,पर बरस नही रहे…..तभी गाड़ी का सामने का दरवाजा खोल राजा अन्दर आकर बैठ गया__

  ” अरे राजा तुम यहाँ कैसे?? तुम्हारी गाड़ी कौन चला रहा बाबू??”

  ” भैय्या वो प्रिंस चला रहा,हमारा हाथ में ज़रा दर्द था तो प्रिंस को चलाने बैठा दिये,बाऊजी को उसी गाड़ी में बैठाए,काहे अम्मा नही तो अकेली हो जाती ,अम्मा बोली भी कि बाऊजी आपकी गाड़ी में बैठेंगे,तो हम बोल दिये हम चले जाते हैं भैय्या के पास,और यहाँ चले आये…अम्मा आवाज़ भी दी ,हम बोले चिंता ना करो अम्मा ,हम दोनो भाई समय से पहुंच जायेंगे घर।।ठीक है ना भैय्या।।”

   ” ठीके है छुटके ।चलो फिर गाड़ी भगायी जाये।।तुम्हरी भौजाई को अपना मायका गावँ का चाट भी खिलाना है,और उनको यहाँ तालाब पार शिव मन्दिर का दर्शन भी करना है,तो ये सब करते चलते हैं….काहे बांसुरी तुमको कोनो जल्दी तो नही है ना?”

  ” नही भैय्या जी कोई जल्दी नही,,हम मम्मी को फोन करके बता देते हैं ।”

    गाड़ी चारों को लिये सरपट कानपुर की ओर दौड़ चली।।

     तैनु ले के मैं जावांगा,दिल दे के मै जावांगा
      तेरे नाल मैं आवान्गी,ससुराल मैं जावान्गी।।।

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क्रमशः

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aparna …

समिधा-29

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समिधा- 29

    कितनी अजीब बात है! वही संसार है, वही हवा वही पानी सब कुछ भगवान में एक सा दिया है! सबको वही समय दिया है, लेकिन किसी का समय तो पंख लगाकर उड़ जाता है और किसी का काटे नहीं कटता।
पारो के साथ भी यही हो रहा था। चाहे वह दिन दिन भर अपने आपको काम में व्यस्त रखें लेकिन रात उसकी आंखों ही आंखों में कट जाती थी। वो दिन भर इतना सारा काम इसीलिए करती थी कि थक कर ऐसी चूर हो जाए कि पलंग पर लेटते ही उसे नींद आ जाये। वो सो जाए। लेकिन आंखें बंद करते ही देव का मुस्कुराता चेहरा उसके सामने झिलमिलाने लगता, और वह अपनी खाट पर पड़े-पड़े खिड़की से बाहर चांद को देखती आंखों ही आंखों में रात काट जाती थी।
    ******

   वहीं ऐसी ही कुछ बेचैनी वरुण के मन में भी उथल- पुथल मचाये थी! वह भी अपने काम में व्यस्त था। उसका सारा दिन मंदिर के कामकाज करने में निकल जाता था। वेद अध्ययन करने के समय के बाद भी वो रात में अपनी किताब  लिए पढ़ता रहता । लेकिन मंदिर के नियम थे कि रात्रि नौ के बाद विद्या अध्ययन नहीं किया जा सकता। मजबूरी में अपने तखत पर लेटा वह भी खिड़की से बाहर चमकते चांद को देखता रहता था।
   उसके मन में कुछ अलग ही तूफान चलता रहता था। वह अक्सर यह सोचता कि जब उसका एक मन वैराग्य की ओर अग्रसर है, तो क्यों उसका दिल चांद पर ऐसे लट्टू हुआ जा रहा है। आखिर चांद को देखते हुए वह किसे देखना चाह रहा है? अपने मन के सवालों का जवाब उसके पास नहीं था! पर फिर भी रात में लेटे-लेटे खिड़की पर से चांद को ताकते रहना उसे एक अलग सा सुकून देता था।

      ऐसा लगता था उस चांद के दूसरी तरफ कोई है जो उसे देख रहा है।

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*****

   इधर पारो की मुसीबतें खत्म होने की जगह बढ़ती जा रही थी। जैसे-जैसे समय बीत रहा था, पारो के लिए उसके घर के सदस्यों की सहानुभूति कम होती जा रही थी। और उसकी जगह गुस्सा बढ़ता जा रहा था। इन बातों में आग में घी का काम बुआ जी कर रही थी।
बुआ जी का मुख्य उद्देश्य था कि किसी भी तरीके से देव की दुकान उनके बेटे को मिल जाए । उनका बेटा भी देव की ही उम्र का था लेकिन वह अब तक उसकी शादी नहीं कर पाई थी। कारण उम्र हो जाने पर भी वो अब तक कोई काम धाम नहीं कर पाया था।
      वो अक्सर अपनी दोनो भाभियों के पास बैठी कुछ न कुछ इधर उधर की बातों में लगी रहतीं। उनकी सबसे छोटी भाभी यानी देव की काकी अक्सर कोई न कोई काम का बहाना बना कर इस गोष्ठी से उठ कर निकल जातीं। उन्हें बुआ जी की बातों में कोई मज़ा नही मिलता था।
    ऐसी ही एक दोपहर सभी औरतें चौका चूल्हा निपटा कर खा पीकर एक-एक झपकी लेकर फिर आंगन में बैठी थी। छोटी काकी चाय चढ़ाने के बहाने रसोई में ही थी। बाकी सारी बहुएं अपने कमरों में आराम कर रहीं थीं।
  आंगन में बुआ जी देव की माँ और बड़ी माँ के साथ बैठी अपनी ससुराल का कोई किस्सा सुना रहीं थीं कि ठाकुर माँ के कमरे से दर्शन भागता हुआ निकला और सीढ़ी चढ़ता ऊपर की ओर भागा!
  ” अरे ठहर तो जा! कहाँ भाग रहा है? ” ठाकुर माँ की आवाज़ के साथ-साथ ताल मिलाती उसके पीछे हाथ में पेंसिल लिए पारो भी बाहर भागती चली आयी। आखिर उसे सीढ़ियों पर चढ़ा देख पारो ने वहीं से पेंसिल उस पर फेंक कर मार दी…-“, ये क्या कर रही है? अगर उसे पेंसिल चुभ गयी तो? “देव की माँ चिल्ला उठी। सहम कर पारो वापस कमरे में जाने लगी कि रसोई से चाय लिए काकी बाहर चली आयीं। वहाँ बैठी औरतों को चाय देते उन्होंने एक कप पारो को थमा दिया…-” पारो जा ये कप ऊपर दर्शन को दे आ!” “
   देव की माँ नाराज़गी से खड़ी हो गयी और पारो के हाथ से कप ले लिया, और तेज़ी से ऊपर सीढियां चढ़ गयीं। काकी को इसका कारण समझ नही आया। उन्होंने दो कप उठा कर वापस पारो के हाथ में रख दिये…-” जा ठाकुर माँ और अपनी चाय ले जा, वहीं पी लेना। “
   हाँ में सिर हिलाती वो चाय लिए अंदर चली गयी। उसके अंदर जाते ही पैर पटकती देव की माँ वापस चली आयीं…-“मति मारी गयी है क्या तेरी छोटी बहू। उसके हाथ से दर्शन को चाय क्यों भिजवा रही थी? “
” क्यों क्या हुआ दीदी?”
उन्होंने अपने माथे पर हाथ मार लिया…-” अरे कैसे समझाऊं , मैं नही चाहती कि ये दोनों ज्यादा घुले मिलें। उसका हाथ अच्छा नही है। मैं नही चाहती दर्शन के किसी भी खाने पीने को ये हाथ लगाए, ज़हर हो जाएगा सब ज़हर।”
  सब कुछ सुनती बैठी बुआ जी को इस सारी बातचीत में बहुत रस मिल रहा था…-” ये सब क्या सोचने लगी बऊ दी? ऐसा भी होता है कभी। उसके हाथ में कौन सा ज़हर होगा? तुम भी कुछ भी सोचती हो। मैं तो बस इसलिए दोनो को दूर रखने कहती हूँ कि दोनो की उम्र ही ऐसी है कि बहक सकतें हैं।
   फिर रिश्ता भी वैसा ही है। आग और घी को साथ रखोगी तो आग तो भड़केगी ना। तुम खुद अनुभवी हो, सब जानती समझती हो। और कितना खुल कर कहूँ, हमारे मुहल्ले में ऐसा ही कुछ हुआ भी।”
   बुआ जी की बातों से देव की माँ का खून खौल रहा था, लेकिन कुछ कह नही पा रही थी कि साथ बैठी काकी ने धीरे से कुछ कहना शुरू किया…-“आप सभी मुझसे बड़े हैं ,अधिक ज्ञान है आपको। लेकिन मैं मेरे मन की बात आप सबके सामने रखना चाहती हूँ। क्या हम पारो और दर्शन की शादी नही करवा सकते?”
    बुआ जी ने ये बात सुनते ही देव की माँ की ओर देखा, उनकी आंखें आग उगल रही थी…-“वाह वाह छोटी बहू। तुम ऐसा भी सोच सकती हो मैंने कभी नही सोचा था। एक लड़के को तो वो खा गई अब दूसरे को भी जानबूझ कर उसी कुंए में धकेल दूँ, इतनी अंधी नही हूँ मैं? क्या तुम्हारा लड़का अभी ब्याह लायक होता तो उसका ब्याह कर देती तुम उससे। “
   देव की काकी को नही लगा था कि उसकी बात देव की माँ को इतनी खल जाएगी..
..” शांत हो जाओ , तुम दोनो आपस में ये सब क्या लेकर बैठ गईं। छोटी बहु , इसके मन की हालत समझो तुम लोग। अभी अभी इसने अपने बेटे को खोया है। इससे बड़ा दुख संसार में दूसरा नही है कि अपनी संतान को ऐसे ….
   देव की बड़ी माँ अपनी बात पूरी भी नही कर पायीं और सुबकने लगी।
  उनकी पीठ पर हाथ फेरती बुआ जी उन्हें और देव की माँ को सांत्वना देती बैठी थी कि उसी वक्त कहीं से धूल फांक कर उनका बेटा सतीश वापस लौट आया…-” माँ एक कप चाय बना देना।”अपनी माँ को आदेश देता वो सीधा सीढ़ी चढ़ ऊपर देव के कमरे में चला गया…-” एक ये हैं हमारे राजकुमार। दिखने सुनने में इतने सुंदर की लगता है कहीं के राजकुमार हैं और लक्षण देखो। न काम काज में मन लगता न पढ़ने लिखने में। पता नही क्या करेगा ये लड़का। ” अपने बेटे का गुणगान कर उन्होंने झूठ मूठ के दो ऑंसू बहा दिए।
   लोगों का दुख दूर करने का सबसे सुंदर उपाय है कि उनके सामने अपना दुखड़ा रो लो। बुआ जी को ऐसा कोई कष्ट नही था अपने बेटे से, लेकिन यहाँ बस अपनी भाभियों के सामने उन्होंने यूँ ही कह दिया।      उसी समय चाय के कप रसोई में रखने पारो चली आयी। उसे देखते ही उन्होंने उसे आवाज़ लगा दी…-” पारो ज़रा एक कप चाय बना कर ऊपर सतीश भैया को दे आ।”
   उसके पीछे कौन क्या कह रहा इन सब बातों से पारो भी पूरी तरह अनजान थी ऐसा नही था। लेकिन वो जानबूझ कर इन बातों में ध्यान नही दिया करती थी। वो जानबूझ कर खुद को किसी न किसी काम में उलझाए रखती।
   रसोई में चाय बना कर वो बाहर बुआ जी के पास कप ले आयी…-” जा ना ! ऊपर कमरे में हैं सतीश भैया उसे दे आ। देव से चार महीने बड़ा है तो तेरा भैया हुआ ना! “
   वो कप लिए ऊपर चली गयी। पलंग पर आराम से लेटा सतीश अपने फ़ोन पर कुछ देख रहा था कि दरवाज़े पर दस्तक दे पारो अंदर चली आयी। टेबल पर कप रख वो लौट रही थी कि सतीश ने उसे आवाज़ लगा दी…-” ज़रा यहीं ले आइये। अगर आपको तकलीफ न हो तो।”
पारो ने कप पलंग के पास वाले टेबल पर रखना चाहा कि सतीश ने हाथ बढ़ा दिया। पारो ने उसकी तरफ कप बढ़ाया और सतीश ने एक हाथ से कप थामते हुए दूसरे हाथ से उसके हाथ पर हाथ रख दिया।

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पारो ने चिहुंक कर अपना हाथ पीछे खींच लिया…-” अरे मुझसे डरने की ज़रूरत नही है आपको। और न ही इस कमरे में आने के लिए सोचने की ज़रूरत है। आप ही कमरा है। आप ही का पलंग है। जब जी चाहें आ जाया करें।”
   पारो को जाने क्यों ये आदमी कभी नही सुहाता था। वो पलट कर बाहर जाने को हुई कि उसने पीछे से उसके कंधे पर हाथ रख दिया…-“आपको किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो आप बेझिझक मुझसे कह सकती हैं। मैं समझता हूँ आपकी भी तो अपनी ज़रूरतें होंगी। “
  कंधो पर से फिसलती उसकी उंगलियां गर्दन से होती हुई पीठ तक आने लगी कि पारो को लगा वो पलट कर उसे एक झापड़ धर दे। लेकिन बिना कुछ कहे वो बाहर भाग गई। सीढ़ी से नीचे उतरते ही आंगन में सारी औरतें बैठी थीं। उनके सामने से अपनी रुलाई रोकते हुए निकल पाना मुश्किल जान वो छत के दूसरी तरफ बढ़ गयी। इतनी देर से रोकी हुई रुलाई आखिर फूट पड़ी और वो सिसक सिसक कर देव को याद करती रोने लगी।
    उसे मालूम नही था कि छत के उसी दूसरे किनारे में दर्शन बैठा कोई किताब पढ़ रहा था । पारो को ऐसे धार रोते देख वो उठ कर उसके पास चला आया…-” क्या हुआ बऊ दी ? आप अचानक इतना क्यों रोने लगी? सब ठीक तो है ना?
” अब क्या ठीक हो सकता है दर्शन? मेरा जीवन ही खत्म हो गया है समझो।”
” ऐसा क्यों कह रही हैं बऊ दी। अब देखिए परीक्षाएं भी पास आ रहीं हैं। अब बाकी बातों से मन हटा कर पढ़ने में लगा दीजिये। बाकी बातें कुछ समय के लिए भूल जाइए ना।”
  उसे बेचारे को सांत्वना के शब्द नही मिल पा रहे थे। वो जितना जैसा बन पड़ रहा था समझाने की कोशिश में था कि पारो सुबक उठी…-“मैं कुछ दिनों के लिए माँ के घर जाना चाहती हूँ।”
“हाँ बिल्कुल चली जाना आप। किसने रोका है, पर अभी शांत हो जाइए, देखिए आप को रोते देख फिर माँ भी रोने लगती है।”
  दर्शन और वो बात कर ही रहे थे कि देव की काकी पारो की माँ के साथ वहीं चली आई।
मां को देखते हैं पारो भाव विह्वल हो उनके गले से लग गई….-” मां! अच्छा हुआ तुम आ गईं। मैं अभी तुम्हें ही याद कर रही थी। मैं यही कह रही थी दर्शन से कि मुझे तुम्हारे पास जाना है।”
मां उसे सीने से लगाए चुप कराते हुए अपने साथ ले चली।
     वही सीढ़ियों पर दोनों मां बेटी बैठ गई काकी उन दोनों को वहीं छोड़कर नीचे रसोई में चली गई। दर्शन दूर छत की दीवार से टीका हाथ बांधे उन दोनों को एक दूसरे के दुख से दुखी होता देखता रहा । छुपकर उसने भी अपने आंखों से बहने वाले आंसुओं को पोंछ लिया।
“मुझे अपने साथ ले जाने आई हो ना माँ?”
“नहीं ! मेरी बेटी तुझे कैसे ले जा सकती हूं ? तू तो घर का हाल जानती ही है। तेरी मां का ही वहाँ कोई ठिकाना नहीं है । ऐसे में तुझे और साथ ले जाऊं।
     और वहां  जाकर तू अपने ही भाई भाभी और उनके बच्चों की गुलामी करें यह मैं कैसे देख पाऊंगी?  बोल तो।
अच्छा एक बात बता, क्या यहां तुझे कोई कष्ट है ? तेरी सास तो देवी स्वरूप है क्या तुझे प्यार से नहीं रखती?”

पारो अपनी मां से क्या कहती? उसने नीचे सिर झुका लिया और अपने आंसू पोंछ लिये।
“यहां घर पर सभी बहुत अच्छे हैं मां। मुझे किसी से कोई परेशानी नहीं है। और ऐसा भी नहीं है कि मुझे बहुत ज्यादा काम करना पड़ता है, लेकिन फिर भी तुम्हारी बहुत याद आती है। मन करता है कुछ दिन तुम्हारे साथ रह सकूं।”

“इतनी ही अच्छी किस्मत होती, तो अपने पति को थोड़े ही गंवा देती  बेटी? अगर तेरा पति होता तो तू भी शान से अपने मायके में आकर रह सकती थी। उतनी ही शान से मैं तेरे ससुराल में आकर रह सकती थी।
मेरी ही तरह तेरी किस्मत भी फूटी हुई है तो क्या किया जाये? पति से ही सारे सुख हैं। पति के बिना सिर्फ श्रृंगार नही छूटता, बल्कि छूट जाता है एक औरत का आत्मसम्मान, उसके होंठो की हंसी, उसके जीने की ललक….”
“अगर आप इसे अपने साथ नहीं रखना चाहती हैं, तो इसमें आपका कोई दोष नहीं है। ब्याह के बाद लड़की का घर उसका ससुराल ही होता है। “काकी ये कहती पारो की माँ के लिए कुछ खाने का सामना लिए ऊपर चली आयीं। उनके पीछे ही बुआ जी और देव की बड़ी माँ और माँ भी आ गईं।

  ” देखिए बहन जी बुरा मत मानियेगा। मेरी एक जान पहचान वाली हैं उन्होंने बताया था कि मथुरा में एक आश्रम है जो खास ऐसी औरतों के लिए ही बना है। “

  पारो की माँ की आंखें भीगने लगी..
और पारो के दुख की अब कोई सीमा नही रह गयी थी। वो सोचने लगी, यही वो औरतें थी जो देव के सामने उसे हाथों हाथ लिए रहती थीं और आज उसके जाते ही क्या सास और क्या माँ दोनो ही समाज का सोच सोच कर इतनी बदल गईं।
     क्या इन लोगों के लिए अपनी बेटी अपनी बहु का दुख समाज से ऊपर नही है?
   एक अपनी बेटी को नौकर बने नही देखना चाहती तो दूसरी को  ये डर सता रहा कि उनके दूसरे बेटे पर वो डोरे न डालने लगे।

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” आप दुख क्यों करती हैं। अगर भगवान दुख देते हैं तो निवारण भी वही करते हैं। वहाँ मथुरा आश्रम की बहुत तारीफ सुन रखी है मैंने। अच्छा खाना, पहनना और सारा दिन कृष्ण भक्ति। अब इससे ज्यादा सुख और क्या होगा? ” बुआ जी अपनी तीखी ज़बान से ज़हर बरसाए जा रहीं थीं और बाकी औरतें गुमसुम बैठी सुन रही थीं!

  ” अरे कोई मुझे भी बताओ ऊपर क्या चर्चा चल रही है। अब मरी बुड्ढी हड्डियों में ताकत नहीं कि मैं सीढ़ियां चढ़कर उपर आ सकूं, तो कम से कम तुम ही लोग नीचे आ कर बात कर लो।”
  ठाकुर मां की आवाज सुन बुआ जी मुंह बनाकर एक और देखने लगी…-” इनके सामने तो कुछ भी कहना व्यर्थ है! अब इस बुढ़ौती में इन्हें कुछ समझ में तो आता नहीं है। अपनी अलग ही रट लगाए बैठी रहती हैं। अगर इनके सामने बातचीत हुई तो यह पारो को कभी आश्रम नहीं जाने देंगी। पर आप सब से मैं एक बार फिर कहती हूं, कि उस आश्रम से बढ़कर सुंदर जगह पारो के लिए और कोई नहीं है। वही उसका भविष्य है आप लोग मेरी बात मानें और इसे जल्द से जल्द मथुरा के आश्रम भेजने की तैयारी कीजिये। “

  ऑंसू भारी आंखों से पारो की माँ ने अपनी लाडली को देखा। इन कुछ ही महीनों में चेहरा कैसा बुझ गया था। चेहरे पर बहुत पीलापन आ गया था। जैसे किसी ने शरीर का सारा रक्त निचोड़ लिया हो। सफेद साड़ी में में लिपटा चेहरा और सफेद लग रहा था। कितनी कमज़ोर हो गयी थी पारो।
    सोलह सत्रह की उम्र में उनकी बेटी का ये क्या हाल हो गया था।
” मैं पारो को अपने साथ ले जाना चाहती हूँ। “
   आखिर पारो की माँ ने हिम्मत कर ही ली, वहाँ बैठी बाकी औरतों के दिल से जैसे कोई बोझ उतर गया…
” नही माँ ! मैं तुम्हारे साथ नही जाऊंगी। ” पारो ने दृढ़ता से अपनी बात रखी और एक बार फिर वहाँ बैठी सभी औरतों का जी कसमसा गया!
“माँ ! मुझे मथुरा आश्रम पहुंचाने की व्यवस्था करवा दीजिये। “अपनी सास की ओर मुड़ कर पारो ने कहा और नीचे  उतर गई।
   उसके पीछे बैठी सभी औरतों के चेहरों पर रंग आते जाते रह गए…..

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क्रमशः

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aparna ….


  

शादी.कॉम- 16

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       ” ना मोहब्बत ना दोस्ती के लिये,वक्त रुकता नही किसी के लिये।।”

   जिसने भी कहा है या लिखा है,अटल सत्य है!! सब कुछ अपनी गति से चलता रहता है ,समय किसी के लिये नही रुकता,।।
     समय अपनी गति से चलता गया,बांसुरी को जिम जाते पूरे छै महीने बीत गये,अब वो पहली वाली गोल मटोल तबला सरीखी बांसुरी नही रही बल्कि वाकई दुबली सजीली बांसुरी बन गई,बिल्कुल अपने नाम को चरितार्थ करते हुए।।
       राजा भी अपनी परीक्षाओं से फारिग हो गया,इस बार उसने पेपर भी ठीक से लिखे।।पहले तो राजा के साथ ऐसा होता था कि जब वो पढ़ने बैठता था तो हर विषय एक दूसरे से होड़ लेता हुआ बकवास और बोरिंग लगता था,राजा हमेशा सोचा करता था,जब दिल को बहलाने वाले इतने साधन जीवन मे मौजूद हैं ( डम्बल,साईकल, ट्रेडमिल इत्यादी) तो कौन इन्सान होगा जो अपना जीवन किताबों में व्यर्थ करेगा,।
      वो जब कभी इतिहास पढ़ने बैठता तो आधा तो वो समय चक्र में उलझ के रह जाता ।।उसे  BC (before christ)और AD (anna domini) का झमेला बड़ा कठिन लगता,उसके ऊपर से अलग अलग आक्रमणकारी और अलग अलग सभ्यताएं ।
     वो हमेशा सोचा करता कि जब हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यता की खुदाई मे सिक्के मिले तो तुगलक ने कौन से सिक्के बदले।।
     ये तो सिर्फ एक विषय था,इसी तरह के कई विषय थे जो पूरी तरह वक्त की बर्बादी थे,नागरिक शास्त्र,भूगोल इत्यादी,,पर धीरे धीरे इन जटिल विषयों की गुत्थि को बांसुरी ने बड़ी सरलता से सुलझा कर रख दिया,बिल्कुल जैसे किसी उलझे हुए ऊन के गोले को कुशल हाथों से एक गृहिणी सुलझा कर अलग अलग बंडल तैयार कर लेती है,वैसे ही।।

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     पहले राजा पेपर बनाने बैठता था तो उसके साथ ये होता था कि एक सवाल नही आ रहा,आगे बढो, अरे दूजा भी नही आ रहा,फिर आगे बढ़ो, तीसरा भी तो नही आ रहा,क्या करना है आगे ही बढ़ना है,,पर चौथा भी नही आ रहा,अब क्लास से ही निकल लो।।।
   पर अबकी बार बांसुरी ने पक्की तैयारी की थी,उसे पता था उसका छात्र अड़ियल है,और इसे अभ्यास के चाबुक से ही सही किया जा सकता है,इसीसे उसने हर विषय के कई कई पेपर तैयार कर राजा से समय अवधि के भीतर पूर्ण करवाये थे,इसीसे इस बार जब राजा परीक्षा मे बैठा तो उसे खुद भी मालूम नही था कि उसके साथ इतना चमत्कार होगा।।
   
                प्रथम प्रश्नपत्र का प्रथम सवाल उसने गणपति को शीश नवा के जब देखा तो उसके आश्चर्य की सीमा ना रही__ अरे ये सवाल तो बनता है,,अगला देखा,अरे ये भी आता है,तीसरा?? हाँ ये भी तो याद है,चौथा सवाल देखा,अरे इसका जवाब तो बहुत अच्छे से आता है,!! ज्ञान और आत्मविश्वास का संगम जहां हो जाता है वहाँ फिर कोई विपत्ति आड़े नही आती।
    
        तीन घन्टे के प्रश्नपत्र में जहां राजा पहले दो ही घन्टे में बाहर निकल जाता था,आज पूरे तीन घन्टे उसे ऊपर नज़र उठाने की भी फुर्सत नही मिली।।
  सिर अपनी उत्तर पुस्तिका मे गडाये हुए वो बस सारे उत्तर एक के बाद एक लिखता गया,पैंतालीस मिनट बीते होंगे कि उसे अतिरिक्त उत्तर पुस्तिका की आवश्यकता पड़ गई ।।
      अब इतने सालों में शिक्षकों से भी भला परिचय हो चुका था इसीसे जब राजा ने अतिरिक्त उत्तर पुस्तिका की मांग की तो शिक्षक महोदय को हार्ट अटैक आते आते बचा,वो एक हाथ से अपना हृदय थामे दूसरे हाथ से कॉपी लिये राजा की बैंच तक चले आये
     “का हुई गवा राजा?? ऐसा का लिख डारे बाबू की सप्लीमेंट्री  की जरूरत पड़ गयी।देखो सभी कहते जरूर हैं कि कापी कोई पढ़ता नही किसी फिलिम की कहानी लिख डारो,पर होता नही ऐसा बबुआ,,कोनो पिच्चर विच्चर का कहानी थोड़े ही लिख मारे हो।।”
    
         शिक्षक महोदय ने अपनी बात पूरी करते करते राजा की कॉपी पर सरसरी नज़र भी मार ली,और अबकी बार उन्हें दूसरा हार्ट अटैक आते आते बचा।

  ” ई कैसा चमत्कार भवा,,राजा ही हो ना,,उंगली ना दुखी इत्ता सारा लिख मारे हो,अरे अभी तक पास होने के लाले थे तुम्हारे,अबकी लाने तो तुम गुरू टॉप कर जाओगे ,लग रहा।।

” गुरुजी इस बार पूरी तैयारी कर के आये हैं ,अब चाहे जो हो जाये हमको पास होना ही है।”

और इस प्रकार हर एक विषय के पेपर में अपने गुरूजनों को हल्का फुल्का अटैक देते हुए भैय्या जी ने सारे प्रश्नपत्र बड़ी सुगमता से हल कर लिये।।

   अन्तिम पेपर दे कर राहत और सुकून की सांस लेते हुए जिम की राह पकड़ लिये।।
     जिम पहुंच कर जैसे ही बड़े कांच के लगे स्लाइडिंग डोर को खोल कर भैय्या जी ने भीतर प्रवेश किया,उनके ऊपर पुष्पवर्षा होने लगी।।।पूरा जिम बड़े बड़े गुब्बारों से सजा पड़ा था,दरवाजे के एक किनारे बहुत सुन्दर रंगोली सजी थी,उस गोल रंगोली में एक तरफ डम्बल बने थे और एक तरफ क्रॉसट्रेनर ।।
   
      प्रिंस और प्रेम दौडे चले आये,भैय्या जी ने दोनों को ऐसे गले लगा लिया जैसे अलाउद्दीन खिलजी से चित्तौडगढ़ का किला जीत लाये हो।।बिल्कुल किसी शहंशाह का सा स्वागत हुआ,जिम में आने वाली हर नाज़नीन उस दिन कुछ अलग ही सजी धजी सी मौजूद थी,सभी ने परीक्षाफल आने के पहले ही भैय्या जी की भावी सफलता को आंक लिया था और उसी का जश्न मनाने की तैयारी थी।


   
           ऑफिस के अन्दर से एक बड़ा सा गोल रसमलाई फ्लेवर का केक लिये बांसुरी आई,,राजा ने मुस्कुरा कर केक काटा और सबसे पहला टुकड़ा बांसुरी की ओर बढ़ा दिया ,केक थामते हुए बांसुरी का हाथ ज़रा लड़खड़ा गया और उसने दूसरे हाथ से राजा की कलाई थाम ली__
    ” अरे!! बांसुरी तुम्हारा हाथ तो तप रहा है,तुम्हें तो तेज़ बुखार है,ऐसे मे यहाँ क्यों आई,घर में आराम करना चाहिये था ना।।”

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  ” कुछ नही बस हरारत है,अभी घर जाकर दवा ले लेंगे तो ठीक हो जायेंगे,तुम हमारी चिंता ना करो,तुम्हारे पेपर अच्छे बन गये उसी खुशी में पार्टी है,समझे……”

   बांसुरी अपनी बात पूरी किये बिना ही चकरा के नीचे गिर गई,अचानक उसके शरीर में अकड़न सी होने लगी,शरीर पीछे की ओर झटके के साथ मुड़ने लगा,ऐसे जैसे कोई धनुष!!!

   राजा को समझते देर ना लगी,एक दिन पहले ही एलो वेरा जूस का टिन खोलते समय बांसुरी के हाथ में लगी चोट ही मांसपेशियों की जकड़न और दर्द का कारण बनी थी, बचपन से उसने धनुषटँकार नामक बीमारी का उल्लेख सुन रखा था,कि कैसे जंग लगी धातु से खरोंच लगने पर टीटनस हो जाता है अगर समय रहते टीका ना लगवाया जाये तो।।
    
    बांसुरी के चेहरे और गरदन की पेशियों पे कसावट बढ़ने लगी,सभी किसी ना किसी दिशा में दौड़ पड़े, ऐसा अक्सर होता है,जब भी कभी कही कोई आपातकालीन स्थिति बनती है तो अमूमन भगदड़ मच जाती है,और इन भागते चीखते लोगों में से पचास प्रतिशत लोगों को तो पता भी नही होता कि वो क्यों भाग रहे हैं,और उन्हें कहाँ जाना है,वैसा ही कुछ जिम में हुआ,जिन्होनें बांसुरी को गिरते देखा वो तो उसकी सहायता को भागे लेकिन जिन्होने नही देखा वे भी उतनी ही तत्परता से भागते हुए ,काम करने वालों के रास्ते में व्यवधान उत्पन्न करने लगे।।  तभी सहसा राजा भैय्या ने सबको बांसुरी से दूर किया,और उसे अपने दोनों हाथों से उठा कर जिम से बाहर की ओर चल दिये, किसी ने पीछे से आवाज़ भी दी_
       ” अरे कमजोरी से सर घूम गया होगा,इत्ती सी बात के लिये कहाँ लिये भाग रहे हो राजा??”

  ” कमजोरी तो नही लगती,हमे तो लगता है कोई भूत परेत का चक्कर तो नही ना है।”

  किसी की बात पे कान दिये बिना राजा बांसुरी को लिये बाहर निकल गया।।

  राजा बांसुरी को लिये जब तक अस्पताल पहुंचा तब तक में बाँसुरी का दर्द और एँठन और बढ़ चुका था,ज्वर की बेहोशी टूटी नही थी,,बिल्कुल अवधूत रुद्र जिस प्रकार सती की अचल देह लिये क्रोध में कांपते पृथ्वी को नापते चले,कुछ वैसे ही अवतार में राजा बांसुरी की देह समेटे अस्पताल पहुँचा।।
    बाँसुरी को तुरंत इमरजेन्सी में भर्ती कर लिया गया,सीनियर जूनियर डॉक्टरों की टीम अपने काम में जुट गई।।

    लगातार दो दिन तक डॉक्टरों के किये अथक प्रयास से आखिर तीसरे दिन बांसुरी ने आंखें खोल दी।।इन दो दिनों में बांसुरी के हैरान परेशान परिवार का संबल बना राजा जैसे खाना पीना भी भूल गया था,हर दवा हर इन्जेक्शन के लिये दौड़ लगाता राजा अपने नाम की पद गरिमा को जैसे भूला बैठा था।

       इसी बीच बेटा घर क्यों नही आ रहा ये जानने माता जी ने प्रिंस से चर्चा की तो उन्हें बांसुरी की बीमारी और राजा की अवस्था का पता चला,बेटे से मिलने अस्पताल पहुंची अवस्थिन को वहाँ बेटे का एक अनोखा ही रूप देखने मिला,,घर पे पानी का एक गिलास स्वयं ना लेने वाला उनका लाड़ला यहाँ तो हर काम खुद करने की जिद पे अड़ा था,डॉक्टरों से चर्चा करने से लेकर हर छोटे बड़े काम की जिम्मेदारी राजा की ही थी।।
       
          जिसे किसी वस्तु की ज़रूरत होती फट राजा की पुकार मचती,बांसुरी की अम्मा तो ऐसे घुली मिली सी राजा से सिर भिड़ाये चर्चा करती की एक बारगी लगा राजा इनकी नही उनकी ही संतान है।।
      अपने कोखजाये को उन परायों के लिये इतना घिसते देख माँ के सीने में सांप लोट गये,कैसे भी हो इस लड़की और इसके परिवार से अपने राजकुमार को उन्हें बचाना ही होगा,जाने क्या घुट्टी पिला दी है इन लोगों ने_

    ” काहे राजा घर दुवार भुला गये हो का,दू दिन से उधर फिरे ही नही,तुम्हरे बाऊजी परेसान हो रहे थे,तब आज प्रिंस से पूछताछ कर तुम्हें ढूंढते आये हैं हम।”

” काहे अम्मा बड़के भैया नही बताये का?? हम तो जिस दिन बांसुरी को यहाँ ले के आये,तुरंते भैय्या को फोन लगा के बता दिये रहे कि बांसुरी को टिटेनस हुआ है, हमको अस्पताल में  ही रुकना पड़ेगा।।”

   बात सत्य थी,युवराज ने अम्मा को कुछ नही बताया था,बल्कि उल्टा अपने किसी कर्मचारी के हाथ राजा के पास कुछ पैसे भिजवा दिये थे।।

  अब तो माताजी का पारा और उबल पड़ा,दोनो लड़के मनमर्जी कर रहे,अपनी अम्मा से बताने की जरुरत ही नही समझी।।पर समझदारी उनमें कूट कूट कर भरी थी,उन्हें भली प्रकार ज्ञात था कहाँ क्या बोलना,किस शब्द से कब घात की जा सकती है और कब चाशनी में लपेट के परोसना है__

       ” अच्छा है बाबू,अम्मा की कोनो चिंता ही नही, कम से कम एक बार हमें भी बोल देते, किसी बात के लिये मना तो करते नही हैं,उल्टा हम घर से खाना पीना भिजा देते,जाने यहाँ का मिला होगा खाने को।”

  राजा के प्राण अपनी माँ में बसते थे,इन दो दिनों में बासुँरी की तीमारदारी में राजा जैसे खुद को ही भूल गया था,माँ को कुछ बताना कहाँ याद रहता,पर माँ की कही भावुक पंक्तियों ने मन में क्लेश और अफसोस जगा दिया,उससे वाकई बड़ी चूक हो गई थी,वो वहीं माँ के पैरों के पास ज़मीन पर बैठ गया, अपना सिर माँ की गोद में टिका कर आंखें बन्द कर ली__
      ” बस माँ का बतायें??,सब कुछ इत्ता अचानक हुआ कि कुछ समझ ही ना आया,बस बचपन की तुम्हारी बताई बात ही याद रही,उसी के लाने बन्सी को उठाये दौडे चले आये,लगा कि नही लाये तो जान ना बचेगी बेचारी की।”

  माँ अपने बेटे के बालों में हाथ फिराती सुनती रही, मन में बवंडर उठ रहा था,बांसुरी बंसी कब बन गई? बित्ते भर की छोकरी ने उसके लल्ला का दिमाग फिरा दिया,पर ऊपर से कुछ ना बोली__

” राजा ! हियाँ बैठे हो,चलो ना उधर डाकटर साहब बुला रहे,बोल रहे कल बंसी की छुट्टी कर देंगे।। नमस्ते बहन जी!! हम बाँसुरी की अम्मा !! अगर आपका राजा ना होता तो हमारी बांसुरी भी ना होती,बेचारी के प्राणों पे संकट पड़ गया था,भला हो राजा बाबू का समय रहते अस्पताल ले आये,सारी भाग दौड़ कर के भर्ती करा दिया तब हमें खबर की।”

  राजा तो बांसुरी की अम्मा की आवाज़ सुनते ही झट उठ कर बांसुरी के कमरे की ओर लपक लिया,और राजा की अम्मा के कलेजे पे सांप लोट गये।।पहले से जली भुनी बैठी थी कि ताबूत पे आखिरी कील ठोंकने बांसुरी की अम्मा स्वयं उपस्थित हो गई।।।अरे साफ साफ तो दिख रहा कि लड़का हाथ से निकला जा रहा अब ई तिवारीन काहे जले पे नमक छिड़क रही।।
 
    बांसुरी की अम्मा प्रमिला के मन में शुरु से अवस्थी परिवार के लिये एक विशेष सम्मान की भावना थी,मौके बेमौके राजा की भलमनसाहत वो देख भी चुकी थी,अवस्थी परिवार का नाम भी बहुत था,इसीसे वो खुद से आगे बढ़ कर राजा की अम्मा से खुले दिल से राजा की स्तुति कर गई, पर ऐसा करने से पहले ये नही सोच पाई की उनकी इस प्रशंसा के अर्ध्य को सामने वाली कैसे लेगी।। साफ मन और स्वछ हृदय से की गई प्रशंसा को राजा की माँ ने किसी और ही ऐनक से देखा और चोट खा बैठी।।

          ***********************

  बांसुरी को स्वस्थ हुए दिन बीत गये,वापस जीवन अपने ढर्रे पर चलने लगा।।कॉलेज के इम्तिहान भी निपट गये,अब बांसुरी का अधिकतर समय घर पर ही गुजरने लगा।।
       ऐसे में बुआ जी वापस अपने पुश्तैनी काम में जी जान से जुट गई,,घर बैठी जवान लड़की उनकी नज़र में सबसे बड़ी बोझ थी,जैसे भी इस छोकरी को भी पार लगाना था और अपने भाई भावज के लिये गंगा स्नान का मार्ग प्रशस्त करना था।।
   
    पहले बांसुरी मोटी थी अब पतली हो चुकी थी,लेकिन उसकी इस अवनति  से बुआ जी पर कोई विशेष प्रभाव नही पड़ा,वो अभी भी चुन चुन के ऐसे ही रिश्ते सहेज के भाभी के सामने परोसती की प्रमिला को उबकाई आ जाती पर रिश्ते के सम्मान को निभाने वो ननंंद के सामने चुप रह जाती।


     
             बांसुरी अब पहले की तरह अपनी तीखी ज़बान के प्रहार से बुआ को लहू-लुहान नही करती, बल्कि जैसे ही उसका विवाह प्रसंग छिड़ता वो उठ कर अपने कमरे में किसी किताब को खोल उसमें दुबक जाती।।एक शाम ऐसे ही बांसुरी जब बुआ जी के वार्तालाप से ऊब कर ऊपर चली गई तो उसके कुछ देर बाद प्रमिला भी ननंद को चाय का कप पकड़ा कर बाँसुरी की चाय लिये उसके कमरे में चली आई

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” का हुआ बंसी ,देख रहे हैं आजकल ब्याह का बात सुन के बड़ी अनमनी हो जाती हो,,कुछ मन मे चल रहा का??”

” अरे नही अम्मा,हमारे मन में का चलेगा।।पहले सोचा करते थे बैंक की परीक्षा देंगे नौकरी करेंगे पर अब सोच रहे जैसा बुआ और तुम सब ठीक समझो वही कर लेंगे।”

” अरे काहे वही कर लोगी!!! तुम्हरी बुआ तो सादी कराने पीछे पड़ी हैं,तो कर लोगी किसी से भी सादी।।”
   
बांसुरी ने चुपके से हाँ में सिर हिला दिया,अपनी बड़बोली बांसुरी को ऐसे चुपचाप देख प्रमिला का कलेजा मुहँ को आने लगा__

   ” अगर मन में कोई और है तो बता दो बंसी ,हम तो माँ हैं तुम्हारी,,कभी तुम्हरे साथ कुछ गलत ना होने देंगे।।
     तुम कहो तो राजा के घर सन्देसा भिजाये का।”

” काहे का सन्देश माँ?? जैसा सोच रही हो वैसा कुछ नही है।।राजा और हम सिर्फ दोस्त हैं ।”

अभी माँ बेटी अपनी बातों में लगी थी कि निरमा ने कमरे में प्रवेश किया__” प्रनाम चाची।”

” खुस रहो बिटिया!! आओ बैठो,तुम लोग बातें करो हम चाय भेजते हैं तुम्हारे लिये।”

  निरमा हंसते हुए आकर बांसुरी के पास बैठ गई ।

  ” क्या बात है छुपी रुस्तम!! क्या बोल रही थी चाची?? राजा भैय्या के घर रिश्ता भेजा जा रहा है हमारी राजकुमारी का,वाह वाह क्या बात है।”

  ” पगला गयी हो क्या निरमा,कुछ भी बोलती हो?”

  ” अरे तो बुराई क्या है राजा भैय्या में?? तुम जबर्दस्ती का ये सीरियसनेस का चोला जो ओढे बैठी हो ना,उतार फेन्को।।बहुत हुआ समझी ,वो भास्कर सर का शोक मनाना बन्द करो अब।।”

   ” तुमसे किसने कहा हम शोक मना रहे।”

   ” तुम्हारी शकल बता रही,अभी नीचे तुम्हारी बुआ जी मिली थी,मुझे एक से बढ़कर एक वाहियात लड़कों के फोटो दिखाने लगी__ बोलती हैं ये देखो कैसे हीरा मोती छाँट के लायी हूँ अपनी बंसी के लिये।मेरा मन किया बोल दूँ कद्दू !! इत्ते पसंद आ रहे तो किसी एक को चुन के आप ही फेरे फिरा लो,,पर संस्कार रोक देते हैं हमें,कुछ जादा बोलने से।”

  निरमा की बात सुन बांसुरी हँस दी__” देखो निरमा शादी तो करनी ही है,पापा चाह रहे उनके रिटायर होने के पहले पहले हमारा ब्याह भी हो जाये,हमारे लिये चिंता करते रहते हैं बेचारे! इसिलिये हमने भी अम्मा को शादी के लिये हाँ कह दिया है।।अगर हमारी किस्मत में पढ़ना और नौकरी करना बदा होगा तो शादी के बाद भी पढ़ लेंगे और कर लेंगे नौकरी।”

” बंसी तुम तो एकदम ही बदल गयी हो!!,अच्छा सुनो बड़े दिनों के बाद हमें घर से निकलने का मौका मिला है,चलो ना जिम चलते हैं प्रेम हमारा रस्ता देख रहा वहाँ ।।”

    बांसुरी ने मुहँ धोया कपड़े बदले और फेयर ऐण्ड लवली लगा कर तैयार हो गयी

” क्या बात है बंसी ,,पहले तो ये सब क्रीम वीम तुम्हे ढ़कोसला लगता था,अब क्या राजा भैय्या के चक्कर मे,हैं??”

” जी नही हमारी अम्मा के चक्कर में ये पोत रहें हैं आजकल!! हमारी गोरी नारी अम्मा को अपनी कलूटी बिटिया पे बड़ा तरस आता है,इसिलिये ये खरीद लायी,अब वो लायी है प्यार से इसीलिये लगा लेते हैं,अब चलो,वर्ना तुम्हारी अम्मा तुम्हें ढूँढते यहाँ चली आयेंगी।”

     जिम में शाम के पांच बजे की रौनक पसरी हुई थी,राजा अपने ऑफिस में बैठा था कि निरमा के साथ बांसुरी ने प्रवेश किया।।बांसुरी और राजा में पहले से ही तगड़ी दोस्ती थी पर अब कुछ हल्का फुल्का दुराव छिपाव भी ना रहा था।।
  
      अपनी तबीयत फिर परीक्षाओं के कारण कुछ समय के लिये जिम से अवकाश लेने वाली बांसुरी अब तक जिम मे वापसी नही कर पायी थी।।

  ” हाँ तो जिम कबसे शुरु करने का विचार है बंसी। दुबली हो गयी तो छोड़ दिया जिम ??”

  ” अरे नही राजा,तुम्हें बताया तो था परीक्षाओं में लगे थे,अभी एक हफ्ता तो हुआ है सब निपटे,बस अब कल से शुरु कर देंगे,हम ज़रा एक राउंड घूम कर आते हैं,जिम का चक्कर लगा लें,तुम बैठो निरमा।”

  निरमा प्रेम और राजा को वहीं छोड़ बंसी बाहर निकल गयी।।

” राजा भैय्या आपसे एक बात कहें ,हमें लगता है अब बांसुरी ज्यादा दिन तक जिम नही आयेगी,उसके घर में तो उसके लिये खूब जोर शोर से रिश्ता देख रहें हैं ।”

  ” अच्छा,,तो?? बांसुरी भी तैयार है क्या शादी के लिये,वो तो पढ़ना लिखना नौकरी करना चाहती थी।”

” चाहती थी! पर अब शादी के लिये तैयार है,ये देखिये ये फोटो, बंसी की बुआ जी की नज़र बचा के हम ले उड़े ,कैसा उजड़ा चमन लड़का है!! तानपूरा भी नही लग रहा और हमारी बांसुरी से शादी करेगा।।”

  फोटो देख कर राजा का चेहरा लटक गया__” इससे तो अच्छे हम हैं ।”

  ” कुछ कहा राजा भैय्या आपने।” निरमा के सवाल पर हड़बड़ा कर राजा ने फोटो निरमा को वापस कर दिया

  ” नही! कुछ नही।”

” वैसे बंसी की अम्मा तो उससे आपके बारे में भी पूछ रही थी,कि आप बंसी को कैसे लगते हैं ।।”

  ” क्या बात कर रही हो निरमा?? “

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  ” हाँ हम सच कह रहें हैं,पर हमारी बंसी है एक नम्बर की गंवार , कुछ नही बोली मुहँ में कुल्फ़ी जमाई बैठी रही।।हम भी सोचे भुगतो फिर,,जब इत्ते अच्छे रिश्ते को सुन के भी चुप बैठी रहेगी तो मिलेगा ऐसा ही कोई साम्बा और कालिया,हम क्या करें।”

  राजा नीचे सिर किये कुछ सोचते हुए मुस्कुराता रहा

  ” भैय्या जी! अब बस मुस्कुराने से कुछ नही होना जाना है।।आपको ही पहल करना पड़ेगा वर्ना बाद में पछताने के कुछ हाथ ना लगेगा।”

  ” निरमा तुम तो पीछे ही पड़ गयी हो,अरे अगर भैय्या जी के मन मे कुछ होगा ही नही तो वो बेचारे का करें।।तुम तो जबरिया उतर आयी हो यार।।चुप भी करो अपना बांसुरी पुराण,भैय्या जी बस दोस्त समझते हैं,और कुछ नही समझीं।क्यों भैय्या जी ठीक कहे ना??”

   ” अच्छा ऐसा है तो काहे उस दिन जैसे ही बन्सी चक्कर खा के गिरी तो सीधा उसे लिये अस्पताल भागे,काहे इत्ता उसकी बात सुनते हैं,काहे उसकी हर बात मानते हैं ।”

   ” क्योंकि भैया जी किसी का एहसान भूलते नही इसलिये,वो पढ़ाई है ना भैय्या जी को इसलिये उसकी मदद करते हैं,और कोई बात नही है,प्यार व्यार बहुत दूर की बात है,भैय्या जी तो उस मुटल्लो से बात कर लेते हैं ढंग से,वही बड़ी बात है।।

  ” अरे झगड़ा बन्द करो तुम दोनो यार!! हम देख लेंगे क्या करना हमें ।।वैसे प्रेम हमें लगता है निरमा सही कह रही…..यार एक बात बोलें हमे लगता है हमे बांसुरी की आदत सी पड़ गयी है,वो जिम नही आती तो जिम मे मन नही लगता,हमारे हर काम में उसकी राय लेना हमें अच्छा लगता है,और ये भी लगता है कि वो कभी गलत राय नही देगी,,हम भी सोच रहे कि एक बार बंसी से बात कर ही लेते हैं ।”

राजा अपनी बात पूरी कर भी नही पाया था कि बन्सी अन्दर आ गयी।।

  ” किस बारे में हमसे बात करने की सोच रहे राजा?”

  ” कुछ नही बंसी बाद में बताएंगे,, आओ लो कॉफ़ी पी लो,,आज तुम सब के लिये इंडियन कॉफ़ी हाऊस से कॉफ़ी मँगवाई है।।”

  ” क्या बात है राजा !! आज बड़े खुश लग रहे जो कॉफ़ी पिला रहे हम सब को।”

  चारों मुस्कुराते हुए कॉफ़ी का मज़ा लेने लगे बाहर जिम में गाने की पंक्तियाँ सुनाई दे रही थी।।

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तुम सिखा रहे हो,तुम सिखा रहे हो,जिस्म को हमारे रूहदारियां …….काफिराना सा है ,इश्क़ है या क्या है।।”

क्रमशः

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aparna..

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शादी.कॉम -15

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  “ शाही जोड़ा पहन के आई जो बन ठन के वही तो     
मेरी स्वीटहार्ट है,  शरमाई सी बगल में जो बैठी है दुल्हन के….”

   जिम में  मस्ती के मूड़ में गाना बज रहा था,सभी अपने अपने क्रिया-कलापों में व्यस्त थे,राजा कभी किसी को कुछ बताता,कभी किसी को।।कभी किसी की स्पीड सही करता,कभी किसी के वेट सही करता इधर से उधर चक्कर लगा रहा था,साथ ही घड़ी पर भी नज़र डाल लेता,,आज 9.30 हो चुके थे पर समय की पाबंद बांसुरी अब तक जिम नही पहुंची थी।।
     ऐसा तो वो कभी नही करती थी,इन चार पांच महिनों में राजा इतना तो बन्सी को जान ही गया था, अगर कभी उसे ना आना हो,या कोई काम हो तो वो बाकायदे राजा को मेसेज कर के बता देती थी, पर आज बिना कुछ बोले बताये ही गायब थी।।

   एक एक कर पूरे दो घन्टे बीत गये,पर बांसुरी नही आई।।अब राजा सोच मे पड़ गया,कुछ तो बात है।।

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    वो पूरा दिन सिर्फ सोचने सोचने में ही बीत गया।
जब कभी दोस्ती प्यार में बदल जाती है तब दिल तो मजबूर होता है पर दिमाग कुछ अधिक कार्य करने लगता है,दिमाग का ध्यान सारा समय इसी बात पे रहता है कि दिल की कमजोरी किसी के पकड़ मे ना आ जाये,और इसी अतिरिक्त सतर्कता के कारण जो बात किसी ने सोची भी ना हो सब के सामने आ जाती है।।
    ऐसे किसी भी बात पे चट से बाँसुरी को फ़ोन करके पूछने वाले राजा भैय्या ने उस दिन बार बार चाहते हुए भी बांसुरी को फ़ोन नही लगाया।।

” का हुआ भैय्या जी आज बांसुरीया नही आई।” प्रेम के पूछते ही राजा भड़क गया

” अबे हमे का पता बे,तुम तो ऐसे पूछ रहे जैसे वो हमे सब बता के ही करती है,,कॉलेज वॉलेज में काम होगा,नई आ पाई,इतना काहे बखेड़ा बना रहे।”

” हमने कहाँ  बखेड़ा बनाया,हम तो पूछ रहे बस।आज तो कॉलेज भी नही गई रही।”

” तो हम का करे,नही गयी तो नही गयी।।तुम हमारा सर काहे खा रहे।।”

” नै भैय्या जी हम बता रहे बस,,आपने कहा ना कॉलेज वॉलेज में काम होगा,इसिलिए बता रहे कॉलेज तो गई ही नही।”

” प्रेम तुम्हें कैसे पता।” प्रिंस को राजा की हालत का कुछ कुछ आभास हो चला था

” अरे हम अपनी वाली के चक्कर में जाते तो हैं ही ना,तो आज वहीं कॉलेज में निरमा अकेली ही दिखी हमे,,बांसुरी कॉलेज गयी होती तो दोनो जनी साथ ही होतीं ।”

भैय्या जी ने सामने तो बिल्कुल यही दिखाया की उन्हें कोई विशेष फर्क नही पड़ा इस जानकारी से,पर मन ही मन में उथल पुथल मच गई कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो बांसुरी ना ही जिम आयी और ना कॉलेज गई ।।

  इसी उधेड़बुन में वो दिन बीत गया,उसके बाद के दो और दिन बीत गये,पर इन कुल जमा तीन ही दिनों में राजा को ये समझ आ गया कि बांसुरी अब सिर्फ एक दोस्त,एक गाइड या एक जिम स्टूडेंट भर नही है, बल्कि वो उससे कहीं अधिक विशिष्ट स्थान रखती है।।जाने अनजाने राजा को पता ही नही चला कि कब सांवली सलोनी बांसुरी उसके हृदय आसन पर अपने समस्त आयुधों के साथ विराजमान हो गयी।

बहुत कठिनाई से खुद को समझा बुझा कर राजा ने रात मे निश्चित किया कि कल सुबह किसी बहाने से बांसुरी के घर जाना ही पड़ेगा,ऐसा सोचते ही एक सुखद अनुभूति के साथ राजा के चेहरे पे मुस्कान बिखर गयी और वो उसे याद करते करते सो गया।।

  जो काम दोस्ती के समय बहुत आसान होते हैं वही प्रेम का आभास होते ही अति दुष्कर होने लगते हैं ।
 
       जो राजा कभी किसी भी समय बांसुरी को फ़ोन कर लेता था,कभी भी मुहँ उठाये उसके घर पहुंच जाता था,वो आज ना तो उतनी आसानी से फ़ोन कर पा रहा था,और ना ही उसके घर जा पा रहा था।।
प्रिंस जो सदा राजा के साथ छाया सा लगा डोलता था,उसे राजा की अवस्था समझने में बिल्कुल भी देर नही लगी,वो अपनी बुद्धि अनुसार सब सही करने की कोशिश करने लगा।।

” भैय्या जी हमको लगता है बन्सी की तबीयत सही नही है,आपको क्या लगता है??”

” अरे हमे क्या मालूम,हम कोई ज्योतिष हैं जो बिना बताये सब जान ले।”

” नही भैय्या जी हमारे कहने का मतलब था कि एक बार क्यों ना बांसुरी के कॉलेज चल के उससे मिल लिया जाये,क्या है ना हम घर भी जा सकते हैं,पर बंसी की बुआ आपपे कुछ जादा ही फिदा है,इसिलिए हम कह रहे कॉलेज चलने की,हो सकता है थोड़ी बहुत बीमार हो ,जैसे सर्दी वर्दी तो उसमे कॉलेज जा रही हो,पर जिम नही आ रही।।”

” तुम्हें बड़ी चिंता हो रही मुटल्लो की,हैं काहे भई ?”

प्रेम के कटाक्ष पे प्रिंस भड़क उठा _ ” काहे नही होगी बे !! बहन मानते हैं उसको।।इत्ती अच्छी लड़की से बिना मतलब जले भुने बैठे हो, चले भैय्या जी।”

” अब तुम इत्ता जिद कर रहे हो प्रिंस तो चलो !! पर हमें काम बहुत सारा है,चलो कोई बात नही,अब तुम्हे चिंता हो रही तो देख ही आते हैं ।।”

रॉयल एनफील्ड में पीछे बमुश्किल प्रिंस और प्रेम को ऐडजस्ट कर राजा ने राजकीय कॉलेज की तरफ बुलेट भगा दी।।

फेडेड ब्लू डेनिम और सफेद शर्ट पे दोसा कबाना के गॉगल्स चढ़ाये राजा भैय्या ने जब कॉलेज के अन्दर बाईक पे एन्ट्री मारी तो बिल्कुल धूम वाला समा बान्ध दिया,ऐसा लगा जैसे बैकग्राउंड पे गाना बज रहा हो_

       “Dhoom again and run away with me on a roller coaster ride
        dhoom again and see your wildest dreams slowly come alive……dhoom machaale….”

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   लड़कों की आंखों मे जलन थी,तो लड़कियों की आंखों में तारीफ और उत्सुकता कि आखिर इतना हैंडसम बंदा मिलने किससे आया है।।

  प्रेम उस कॉलेज का ना होकर भी कॉलेज के चप्पे चप्पे से वाकिफ था,वो पार्किंग में गाड़ी खड़ी करवा कर भैय्या जी को लिये कैन्टीन में आ गया।।
   निरमा के मामा जी को नाना जी की बीमारी के कारण वापस जाना पड़ा,और निरमा एक बार फिर बांसुरी के साथ कॉलेज आने जाने लगी थी,पर कॉलेज के अलावा कहीं भी निकलने की मनाही के कारण निरमा जिम नही जा पा रही थी।।

  एक तयशुदा समय पर निरमा और बांसुरी कैन्टीन आते थे,पहले कैन्टीन में भकाभक समोसे आलू गुंडे पेलने वाली बांसुरी आजकल सिर्फ वर्जिन मोइतो ( नीम्बू पानी) से काम चला रही थी,आज भी दोनो अपने तय समय पर कैन्टीन को चल दी।।

इन्तजार का फल मीठा होता है,ये राजा को अपने जीवन मे उस दिन पहली बार समझ आया।।पूरे तीन दिन के बाद उसे बांसुरी दिखाई दी थी,दूर से पीले कुर्ते पे गुलाबी दुपट्टा ओढ़े नीचे सर किये चुपचाप आती बांसुरी को देख पहले पहल तो राजा को ज़ोर का गुस्सा आ गया__” कॉलेज आने का समय है,इधर उधर जा सकती हैं मैडम पर जिम आने का समय नही!!! अरे कुछ काम है ना आओ! पर एक फ़ोन करने में भी महारानी जी का हाथ दुख गया।”
पर प्रकट में राजा ने ऐसा कुछ नही कहा,हाँ ध्यान से देखने पर उसे बांसुरी बहुत थकी सी दुखी सी लगी।।

  बांसुरी और निरमा के वहाँ पहुंचते में प्रेम कूद कर निरमा तक पहुंच गया,दोनो आंखों ही आंखों मे मुस्कुरा उठे,उन्हें सादर अपनी सीट तक लाकर निरमा के लिये एक कुर्सी खींच प्रेम उसके बाजू वाली कुर्सी पर बैठ गया,तब जाकर कहीं बांसुरी ने राजा को देखा__” अरे राजा तुम यहाँ कैसे??कॉलेज में कुछ काम था क्या?”

” अरे कहाँ?? भैय्या जी तो तुम्हे ही…..” प्रिंस की बात को आधे मे ही काट कर राजा ने अपनी बात बांसुरी के सामने रख दी।।

” हाँ वो एक लड़के के एडमिशन की बात करने आये थे,तो सोचा तुम्हारा भी हाल चाल ले लें ।कैसी हो बाँसुरी ??”

राजा के “कैसी हो बांसुरी “पे जाने क्यों बांसुरी की आंखें छलक आईं जो राजा के सिवा कोई ना देख सका।।
     जब कोई रोता होता है तब उस समय अगर कोई सांत्वना से भरा हाथ कंधे पर रखे और चुप कराने की कोशिश करे तो आंसू और भी ज्यादा ज़ोर शोर से बहने लगते हैं,वैसे ही जब कोई सबसे बड़ा शुभचिंतक हितैषी ऐसे समय पर हाल पूछे जब वाकई हाल अच्छा ना हो तो दिल का दर्द आंखों के रास्ते बहना लाजिमी है।।बस वही बन्सी के साथ हुआ।।
   पर बांसुरी दिल की कच्ची लड़की नही थी,उसे अपना दुख दुनिया को दिखाना सख्त नापसंद था,इसिलिए उसने निरमा से भी अपने दिल का हाल नही बताया था,पर आज राजा को एकबारगी सब कुछ बताने को वो व्याकुल हो उठी,पर यहाँ कैन्टीन में सबके सामने उसके लिये कुछ भी बोलना बताना बहुत कठिन था,उसने एक पूरी नज़र राजा पे डाली,  राजा ने आंखों से ही बन्सी के मन की बात पढ़ ली,वो समझ गया कि बांसुरी उसे कुछ बताना चाह रही है।।
    
        इतनी देर में एक दूसरे में खोये प्रेम और निरमा अपनी बातों में लगे थे,निरमा अपने घर पर उसके ऊपर हो रहे अत्याचारों को बढ़ा चढ़ा कर प्रेम से बता रही थी,कि कैसे वो जब भी शाम को छत पर प्रेम की एक झलक पाने के लिये चढ़ती है तो पीछे से उसकी अम्मा ठीक उसी वक्त सूखे कपड़े निकालने छत पर पहुंच जाती है,कैसे जब निरमा रेडीयो पर__

    “ आते जाते हँसते गाते सोचा था मैंने मन में कई बार,वो पहली नज़र हल्का सा असर करता है क्यों इस दिल को बेकरार…..” सुनते हुए प्रेम को याद कर कर के मुस्कुराती है तो उसकी अम्मा आ कर रेडियो पे भजन वाला चैनल सेट कर जाती है__

  “ राधे राधे रटो चले आयेंगे बिहारी।।”
 
कैसे जब निरमा खिलती चांदनी में खिड़की पर खड़ी होकर चांद मे अपने प्रेम का चेहरा देख देख शर्माती है तब उसकी अम्मा आ कर खट से खिड़की बन्द कर जाती है, कैसे जब लौकी और तोरी की सब्जियों को देख कर निरमा मुहँ बनाती है तो अम्मा ताना मार जाती है कि ‘ हाँ अब हमरे हाथ का कुछु काहे भाये,जो बना रहे चुपचाप खा लो,जब अपना घर अपनी गिरस्ती होगी तो पका लेना अपने मन का।।”इसी तरह के तानों उलाहनो के बीच जीवन कैसा कठिन हुआ पड़ा है और अब प्रेम ही है जो निरमा के जीवन के बिखरे रंग समेट कर उसके जीवन के कैनवास को एक खूबसुरत तस्वीर मे बदल सकता है।।
  
   ये प्रेमी जोड़ा अपने में लीन, दीन दुनिया से बेखबर था,राजा भैय्या ने ये नोटिस कर लिया ,उन्होनें प्रिंस को पानी की बोतल लाने भेजा और अपनी कुर्सी बांसुरी की तरफ खींच ली।।

” अब बताओ क्या हुआ?? जिम क्यों नही आ रही आजकल??”

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राजा की गहरी आवाज़ और उससे भी गहरी ये बात सुन कर बांसुरी विहल हो गई

” यहाँ नही बता पायेंगे।।”

” फिर कहाँ?? बोलो,, कहीं बाहर मिलना चाहती हो।”

बांसुरी ने आंखें उठा कर राजा को देखा और हाँ मे सर हिला दिया

” कहाँ?? रॉयल पैलेस आ जाओगी अकेले??

बांसुरी ने फिर हाँ में सर हिला दिया।।बांसुरी की चुप्प्पी ने राजा के मन मे हाहाकार मचा दिया,आखिर ऐसी कौन सी गुम चोट खा ली जो इतनी चुपचाप सी हो गई,कहाँ तो बांसुरी को अधिक बोलने पर टोकना पड़ता था और कहाँ आज हाँ भी बोलने के लिये मुहँ नही खोल रही।।
       राजा का मन ऐसे कचोटने लगा कि कुछ भी कर के बांसुरी के दुख को दूर करना ही है,उसे ऐसी गुमसुम नही देख सकता।।प्रिंस के पानी की बोतल लेकर आते ही राजा उठ गया।

” ठीक है फिर हम चलते हैं अभी!! अपना ध्यान रखना बांसुरी ।।”

” अरे जिस काम से आये थे,वो तो कर लो।।एडमिशन ऑफिस उधर है।” बांसुरी ने एक तरफ को इशारा कर दिया,उसकी उंगली की दिशा में देखने के बाद मुस्कुराते हुए राजा ने बांसुरी को देखा_

” हम जिस काम से आये थे,वो हो गया बांसुरी,कल शाम 4 बजे मिलतें हैं फिर,,आ तो जाओगी ना।।”

हाँ मे सर हिला के बांसुरी चुपचाप खड़ी राजा को जाते देखती रही।।

रात में राजा अपने कमरे की खिड़की पे खड़ा बाहर खुले आसमान में चमकते चांद को देख सोच रहा था,हो सकता है बाँसुरी भी इस वक्त अपनी खिड़की पे खड़ी चांद देख रही हो,चलो अच्छा है इसी चांद के बहाने ही सही निगाहें तो मिल रही हैं ।।
   कहीं दूर एक गाना बज रहा था_

    “ सुनो किसी शायर ने ये कहा बहुत खूब ,
      मना करे दुनिया लेकिन मेरे मेहबूब
      ही जाता है जिस पे दिल आना होता है
       हर खुशी से हर गम से बेगाना होता है।
       प्यार दीवाना होता है मस्ताना होता है….”

 
       ******************************

  ” राजा!! उठो, आज बड़ी अबेर कर दी उठने में,ऐसे तो रोज़ भोरे उठ के दौड़ लगाने चले जाते हो आज सात बज गया ,अभी तक सो रहे,तबीयत तो ठीक है ।।” ऐसा कहते हुए राजा के माथे पर उसकी अम्मा ने हाथ रख कर ठेठ हिन्दुसतानी स्टाइल में बेटे का बुखार चेक किया।।

  शरीर का ताप हो तो पकड़ भी आये,मन के ताप का कहाँ निपटारा!!!

   रात बड़ी देर तक जागती आंखों के सपनों में विचरते हुए राजा को सोने में देर हो गई,सुबह सुबह रोज़ का अलार्म बन्द कर वो वापस सो गया,और सोता ही रह गया,वो तो अम्मा की आवाज़ से नींद टूटी,सुबह सुबह अम्मा को अपने कमरे में देख उसके चेहरे पे एक बड़ी सी मुस्कान आ गयी,अम्मा के हाथ से चाय लेकर वो चुपचाप पीने लगा।।

” का हुआ लल्ला? आज बहुते खुस लग रहे,कोई हड़बड़ी भी नही है तुम्हें जिम जाने की।।”

” जायेंगे अम्मा जायेंगे!!! सुबह सुबह तुम्हरे दरसन हुए, तुम चाय लिये सीधा कमरे में चली आयी ,ये सब खुशी का कारण नही हो सकता का??” हँसते हुए राजा पलंग से उतर बाहर निकल गया।।

  जिम में ऑफिस में अपना काम निपटाता राजा मन ही मन खुश था ,आखिर बांसुरी की उदासी का कारण पता चलेगा तो उसे दूर करने का कुछ उपाय भी कर पायेगा।।सुबह से जाने कितनी बार अपने हाथ में बंधी राडो पे समय देख चुका था,पर भई घड़ी चाहे रिको हो टाइटन हो या राडो दिखायेगी तो एक ही समय!!
      दिल ही दिल में एक हल्का सा डर भी था कि जाने क्या बात होगी जो बांसुरी जैसी दुरुस्त दिल लड़की ऐसी गुमसुम हुई पड़ी थी।।
    अपने विचारों में खोया राजा अपना काम निपटा रहा था कि दरवाज़े पे हल्की सी दस्तक हुई__

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” हम अन्दर आ जायें राजा!!”

राजा ने सर उठा के देखा सामने बांसुरी खड़ी थी

” अरे पूछने की क्या ज़रूरत ,,आओ आओ अन्दर आओ,,बैठो ।।”
  बाँसुरी आ कर राजा के सामने बैठ गयी,दोनो ही लोग बात शुरु करने का बहाना ढूँढ रहे थे,आखिर बांसुरी ने ही चुप्पी तोडी__

” राजा तुमसे कुछ कहना चाह रहे थे,कल तुमने पूछा था ना,उसी बारे में …..बस सोच रहे कि कैसे बोलें ।”

” कैसे मतलब? अरे जैसे बोलते हैं बतियाते हैं वैसे ही बताओ,,बात क्या है आखिर?? तुम इतनी उदास चुपचाप सी क्यों हो?”

” राजा तुम्हें भास्कर सर के बारे में बताया था ना? हमारे गणित के लेक्चरर!!जिन्हें हम पसंद करते थे।”

” हाँ हाँ!! क्या हुआ उन्हें ” राजा का दिल ज़ोर से धड़कने लगा

” उन्हें कुछ नही हुआ,,बिल्कुल ठीक हैं वो”

” फिर?”

” कैसे बतायेँ राजा!! वो भास्कर सर हैं  ना,वो असल में शादीशुदा निकले!!” ये बोलते ही बांसुरी का चेहरा मुरझा गया उसकी आँख से दो बूंद आंसू लुढ़क कर उसके गालों तक चले आये।।और राजा के दिल में सरगम बजने लगी।।

    “अपने आप को सम्भालो बांसुरी!! हमे तो नाम सुन कर ही ये लड़का तुम्हारे लिये ठीक नही लगा था,अब ऐसा भी क्या बन सँवर के कॉलेज आना कि मासूम नादान लडकियों को यही ना समझ आये कि सामने वाला शादीशुदा है,,ये तो सख्त बदतमीजी है नामुराद की।”

‘” अरे तो लड़कों का समझ भी कैसे आयेगा,वो ना तो सिन्दूर लगाते ना मंगलसूत्र पहनते।”

” तो क्या हुआ,पर चेहरा लटका हुआ तो रहता है ,घर से बीवी की डांट खा के जो निकलते हैं,,खैर वो सब छोड़ो,तुम खुद पे ध्यान दो ,इतनी अच्छी हो तुम्हे सच बहुत अच्छा लड़का मिलेगा।।” बांसुरी को समझाने के साथ ही राजा ने सामने लगे आदमकद आईने में खुद को देखा और मुस्कुरा दिया,,उसके मन में जलतरंग बज उठी।।
     
   
            “आ मैं तेरी याद में सबको भुला दूँ
    दुनिया को तेरी तसवीर बना दूँ
            मेरा बस चले तो दिल चीर के दिखा दूँ
    दौड़ रहा है साथ लहू के प्यार तेरा नस-नस में
ना कुछ तेरे बस में जूली ना कुछ मेरे बस में
      दिल क्या करे जब किसी को किसी से प्यार हो जाये।।”
 
  उसी समय दरवाजा खोल कर दो कप चाय लिये प्रिंस भीतर आया ,,अन्दर आते ही उसे आभास हुआ की जिम में  ‘ दिल क्या करे बज रहा है’ वो चाय रख वापस मुड़ गया_
         ” भैय्या जी अभी गाना बदल देतें हैं ।”

  ” काहे बे,,काहे बदलोगे गाना,इत्ता सुरीला गाना बदल दोगे,ससुरे तुम भी एक नम्बर के बकलोल हो।

  प्रिंस को कुछ समझ नही आया,वो अपना सर झटकता बाहर चला गया,राजा बाँसुरी की तरफ घूम गया,वो अभी भी गुमसुम सी थी,पर राजा की खुशी संभाले नही संभल रही थी,उसने अपने मन के भावों को मन तक ही सीमित रख अपनी ज़बान को भरसक उदास करते हुए बांसुरी को सांत्वना देना शुरु किया।।

” अरे तो का हुआ बांसुरी,शादीशुदा हैं तो इसमें कौन बड़ी बात हो गयी ।”

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” अच्छा तो ये तुमको बड़ी बात नही लग रही???” अरे बुद्धू राम ! अब जब उनकी अपनी घरवाली है तो वो हमे काहे देखेंगे,चाहे हम कितनी भी सज धज मचा लें, उन्हीं के लिये दुबली होना चाहते थे,इसिलिए जिस दिन पता चला उसी दिन से जिम आना बन्द कर दिये,पर ….”

” पर क्या बांसुरी??”

” पर ये कि अब हमको भी तुम्हारे जिम की थोड़ी थोड़ी आदत सी लग गयी है,,अब दो तीन दिन वर्क आउट नही करते हैं तो अच्छा नही लगता,,कल कॉलेज में तुमसे मिल कर घर लौटने के बाद हम सोचते रहे और फिर ये फैसला किया कि हम तुम्हारा जिम नही छोडेंगे।।”

” वाह बहुत ही अच्छा सोची,पर ये बताओ कि जिम नही छोड़ोगी या भैय्या जी का जिम नही छोड़ोगी?

प्रिंस के सवाल पर बांसुरी ने घूर के प्रिंस को देखा और __” ना तुम्हारे भैय्या जी को छोडूंगी ना उनका जिम ।।अब तो जब तक राजा लॉ पास कर के लॉयर ना बन जाये मैं ये जिम नही छोडून्गी।।

” ये हुई ना बात” प्रिंस की तालियों से ऑफिस गूँज गया।।।

राजा भैय्या के मन की खुशी पूरे उत्साह से उनके चेहरे को अबीरी कर गई ।।

” तो बाँसुरी फिर शाम का क्या प्लान है??”

” शाम का प्लान?? वही है 4 से 5 तुम्हें पढायेंगे,और क्या??”

” अरे नही!! हम तो होटल में मिलने के बारे में पूछ रहे थे।”

” अब यहीं तो सब कुछ बता दिये,अब क्या ज़रूरत होटल में मिल के पैसे उड़ाने की,अब तुम्हारे एग्ज़ाम को भी समय कम बचा है,,पढ़ाई पे पूरा पूरा ध्यान देना है,समझे!! ये घुमाई फिराई थोड़ा बन्द करो अब।।जब देखो तब फटफटी में उड़ते फिरते हो।।”

राजा  नीचे सर किये हाँ में सर हिलाता मुस्कुराता रहा,दोनो ने अपनी अपनी चाय उठाई और मुस्कुराते हुए पीने लगे।।

बाहर जिम में नया ट्रैक बज रहा था__

   “ शुद्ध देसी देसी देसी रोमांस …..हाय रे!!
      हाय रे क्रेज़ी क्रेज़ी क्रेज़ी रोमांस …..

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क्रमशः

aparna..

शादी.कॉम-14

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       फेरे पड़ गये,,भान्वर हो गई….वर वधु ने पण्डित जी का आशीर्वाद लिया और अपने गृहस्थ जीवन के शुरुवाती सोपान पर कदम रख दिया।।

     ब्याह निपटने के बाद मन्दिर से नीचे उतर के सभी विमर्श में जुटे कि अब आगे क्या किया जाये।।
  लड़कों का कहना था कि लल्लन के घर जाया जाये,परन्तु अब तक अँग्रेजो के खिलाफ लड़ने वाले क्रान्तिकारियों सी धमक दिखाने वाला लल्लन अब एकदम ही सहमी भीगी बिल्ली बना बैठा था,अब रह रह के उसको गुस्से में चीखते हाँफते अपने बाऊजी और रोती मिमियाती अपनी माँ का करुण चेहरा दिख रहा था,उसकी घर जाने की बिल्कुल हिम्मत नही हो रही थी,उसने प्रस्ताव रखा __

” हम सोच रहे लखनऊ निकल जाते हैं,दो दिन बाद वैसे भी हमारी जॉईनिन्ग है,अम्मा को कह देंगे प्रिंस के साथ कमरा खोजने और बाकी काम निपटाने आये हैं,और अब जॉईनिंग के बाद ही वापस आयेंगे।”

” और बाद में का कहोगे लल्लन?”

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” बाद में कह देंगे काम बहुते जादा है अम्मा,कुछ समय बाद ही घर आ पाएँगे।।”

” कानपुर लखनऊ में दूरी ही कित्ता है,जैसे मथुरा की लड़की वृंदावन ब्याही,बस वैसा ही।।।तुम नही गये तो तुम्हारी अम्मा आ जायेगी तो,तब का करोगे??”

प्रिंस के इस विचारणीय प्रश्न पर सभी सोच में पड़ गये।।

” हमें तो लगता है,लल्लन और रेखा तुम लोग पहले जाओ राजा के घर ,वहाँ सब का आशीर्वाद लो और वहाँ से युवराज भैय्या को साथ लेकर लल्लन के घर जाना,,बड़े भैय्या को सभी मानते हैं,वो जायेंगे तो लल्लन के घर भी कोई परेशानी नही होगी,क्यों ठीक बोले ना राजा।।”

बांसुरी के इस आइडिया पर राजा ने भी हामी भर दी

” ई पनौती फिर बोली,,ई जब जब अपना आइडिया देती है तब तब कोनो का बंटाधार होता है,लिखवा लो हमसे प्रिंस।” प्रेम फुसफुसाया

” अबकी ना होगा,,सही बोल रई बांसुरी!! लल्लन राजा भईया के साथ निकल लो गुरू,अब जादा सोच बिचार में ना पड़ो ।।”

बहुत सारी हिम्मत जुटा के लल्लन रेखा के साथ राजा के घर को निकला,राजा ने बांसुरी को भी साथ ले लिया,प्रिंस और प्रेम पीछे अपनी फटफटी फटफटाते चले आये।।

घर पे पहले ही रूपा के बाऊजी पधारे हुए थे,उनकी अगुआनी में रूपा ऊपर नीचे हो रही थी,तभी दरवाजा खोल के राजा अन्दर आया,आते ही दुबारा उसने भाभी के पिता को चरण स्पर्श किया,और एक कोने में खड़ा हो गया।।

” काहे लल्ला जी,रेखा कहाँ रह गई,आई नई आपके साथ।” रूपा की बात खत्म होते होते बन्सी भी अन्दर आ कर खड़ी हो गई

” अरे इसे ही तो सजाने गई रही,ये यहाँ खड़ी है तो रेखा कहाँ है भई ।।”

रूपा की पृश्नवाचक निगाहों को बांसुरी ने दरवाजे की तरफ घुमवा दिया,दरवाजे से बहुत धीमे से रेखा और उसके पीछे लल्लन आकर अन्दर खड़े हो गये।।

   कई सारे टी वी सीरियल और फिल्मों में नायक नायिका के भाग के शादी करने वाले सीन देख चुकी रुपा ने जब रेखा को फूलों की लम्बी वरमाला पहने और माथे पे पीला सिन्दूर लगाये देखा तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गई।।।आज तक अपनी सास के सामने अपने खानदानी होने और संस्कारी होने की बड़ी बड़ी डीँगे हाँकने वाली रूपा का मुहँ रुआंसा हो गया।।

” रेखा!!!” बस इतना बोल कर अपने सर को पकड़े रूपा धम्म से नीचे गिर पड़ी,हालांकि इस गिरने में बराबर चोट ना लगे इस बात का ध्यान रखा गया, सोफे पर पसरने के बाद रूपा ने आंखे पलट दी,, आसपास के सभी लोग दौड़ पड़े,राजा की दादी जिनका दीवान खाने में एक ओर पर्मानेंट अड्डा था, घबरा कर चीखी__ ” अरे दांत ना जुड़ जई,देखो रे “

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  राजा की अम्मा और शन्नो मौसी पानी की कटोरी लिये दौडे ,जल्दी जल्दी रूपा की तीमारदारी मे लगी, घर की मुहँ लगी नौकरानी अपने राग मे थी __ ” अम्मा जी जूता सूंघा दौ,अब्भी उठ बैठेगी बहुरिया।”

” अरे मुह्नजली!! इन्ने मिर्गी ना आई है जो जूतो सूंघाने बोल रई,चकरा गई है तनिक, अभी पानी का छींटा से ठीक हो जायेगी।”

बेहोश पड़ी रूपा के कानों में जब जूता सून्घाने की बात पड़ी तो वो घबरा के थोड़ा कसमसाई पर दादी की बात कान में पड़ते ही उसे संतोष हुआ कि जूता नही सुन्घाया जायेगा,और वो फिर चित पड़ी रही।

इधर रूपा के पिता का बी पी रेखा के नये नवेले दूल्हे को देख बढ़ ही रहा था कि रूपा अचानक चक्कर खा गई,वो बेचारे जब तक कुछ समझ पाते ,समधन अपनी पायल चूड़ी बजाती दौड़ी चली आई और वो बेचारे रिश्ते के सम्मान के मारे एक किनारे खड़े रह गये,उतनी ही देर में घर के बड़े लड़के युवराज का पदार्पण हुआ।।
    अपने कमरे में आये दिन रूपा की ऐसी नौटंकी से परिचित युवराज ने आगे बढ़ कर रूपा की नब्ज थाम ली __
      ” अरे नब्ज तो बड़ी धीमी हो गई है,राजा वो क्या नाम है तुम्हारी डॉक्टर सहेली का?? हाँ रानी,ज़रा फ़ोन घुमाओ उसे,कहना बड़ा वाला विटामिन का इन्जेक्शन लेती आये,,इन्हें सुई ही लगवानी पड़ेगी।”

राजा को बड़े भैय्या की बात समझ नही आई,वो तुरंत अपनी जीन्स से मोबाइल निकालने लगा, उसका हाथ पकड़ बन्सी ने इशारे से उसे फोन करने से मना कर दिया,अपने पति की सुई वाली बात सुन रूपा को भी होश आने लगा,उसने धीरे से अपनी आंखें खोल दी__” कहाँ हैं हम?” हमेशा फिल्मों में होश मे आने के बाद नायिका द्वारा बोला जाने वाला पहला डायलॉग बोल कर आंखे फाड़ रूपा युवराज को देखने लगी,तभी उसे रेखा और लल्लन याद आ गये,और वो अपने पूरे फेफड़े फाड़ के दम लगा के चिल्ला के रो पड़ी ।।

  पूरे घर मे हाहाकार मच गया,ये ऐसा समय था जब लल्लन को अपने किये पे दिल से अफसोस होने लगा,उसे वहाँ से निकल भागने की राह नही सूझ रही  थी,जो महिला जैसे सुना सकती थी,वैसे सुना रही थी,चाहे राजा की दादी हो या रूपा,यहां तक की शन्नो मौसी को भी मौका मिल गया था,वो भी पानी  पी पीकर आज के नौ जवान छोकरे छोकरियों की विवाह प्रगती पे अपने विचार प्रकट कर रही थी,

” एक हमारा समय था,शकल सूरत तक ना देखी शादी होने तक,और एक आजकल के लड़के लड़कियाँ हैं,हद बद्तमीज़ी है।।”

” ठीके रहा तुम्हरे समय सकल ना देखे बनी ,नही तुम्हे कौन ब्याह  ले जाता सन्नो??” राजा की दादी के कथन पर शन्नो मौसी का पारा और चढ़ गया,सब नाराज थे,पर एक कोई ऐसी भी थी वहाँ जिसके मन में लड्डू फूट रहे थे!!!

   राजा की अम्मा थी जो बार बार रूपा को ना रोने और जो हुआ उससे समझौता करने की सीख दे रही थी,आखिर थक कर वो वहाँ से उठी और चुपके से अन्दर खिसक गई,दस मिनट बाद एक हाथ में पूजा की थाली और दूसरे हाथ में मिठाई का थाल उठाये राजा की अम्मा वापस आयी।।बांसुरी ने आगे बढ़कर उनके हाथ से एक थाल ले लिया।।
   रेखा रूपा के पैरों के पास उसे मनाने मे लगी थी,युवराज और राजा वकील बाबु को समझा रहे थे, दादी और शन्नो मौसी अपने राग दरबारी मे व्यस्त थे, वहीं प्रिंस और प्रेम में से एक दादी का तो एक मौसी का पक्ष ले आग मे घी डालने का काम कर रहे थे, इस पूरे सीन से विलग लल्लन एक किनारे खड़े खड़े अपने घर पे मिलने वाले सत्कार के बारे मे सोच सोच परेशान हुआ जा रहा था,,,उसे आज तक का अपना पूरा जीवन अपने सामने रील सा चलता दिख रहा था, बचपन में माँ को सताना,बाऊजी का मार मार के गिनती पहाड़ा रट्वाना,बड़े भईया की जेब से चुराये पैसों से पहली सिगरेट खरीद कर पीना,हर राखी पे दीदी के लिये कैसे भी कर के गिफ्ट खरीदना,इत्ती सारी खुशनुमा यादों को उसने खुद अपने हाथों कुएं में बहा दिया था,एकाएक उसे अपना निर्णय जल्दबाजी में किया गया फैसला लगने लगा था, पर अब समय उसके हाथ से रेत सा फिसल चुका था,वो अभी अपनी उधेड़बुन मे था कि राजा की अम्मा पूजा की थाली लिये आई ।।
     बाँसुरी ने आगे बढ़ दीवार से लग कर खड़े लल्लन को हाथ पकड़ कर आगे खींच लिया और रेखा के बाजू में बिठा दिया,अम्मा ने आगे बढ कर नवयुगल का तिलक किया और आरती उतारी,मुहँ मीठा करा दिया।।

    गुस्से मे बडबड करती रूपा रोती धोती अपने कमरे में चली गई,,युवराज ने लल्लन को बैठा कर उसके घर परिवार नौकरी चाकरी का हिसाब लेना शुरु किया,पढ़ाई लिखाई बताने के बाद जैसे ही लल्लन ने अपनी ताजा ताजा लगी सरकारी नौकरी का जिक्र किया,वहाँ उपस्थित सभी के चेहरों पर अलग अलग तरह की प्रतिक्रिया दिखने लगी,औरतों की खुसफुसाहत कुछ और मुखर हुई,वकील बाबु के चेहरे पर भी सन्तोष की झलक आ ही रही थी कि राजा के बाऊजी भी पिछले दालान से निकल बाहर आये,और आते ही उन्होनें अपना सबसे प्रिय सवाल छेड़ दिया__

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       ” किसके लड़के हो वैसे तुम,हमार मतलब कौन जात हो??”

   ” इरिगेशन में हमारे बाऊजी आफीसर है,बाबुलाल सूर्यवंशी।।”

लल्लन का ये वाक्य वकील बाबू के सीने मे घूंसे के समान लगा,उस समय उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी ने हाथ अन्दर डाल उनके फेफडों को जोर से मसल दिया हो,ऐसी प्राणान्तक पीड़ा मिली वो भी समधि के घर जहां ना वो खुल कर बोल पा रहे थे,और ना चिल्ला पा रहे थे।।आज तक वकील बाबू के लिये उनकी वकालत सबसे ऊपर थी,पर अदृश्य और अपरोक्ष रूप से उनकी वकालत के उपर था उनका ‘ ब्राम्हणत्व ‘।
     उन्हें सदा ही लगता आया था कि वो स्वयं ब्रम्हा की संतान हैं,इसीसे और कोई माने ना माने उन्होनें खुद को समाज में सबसे ऊपर स्थापित कर रखा था, उनके अनुसार उनके नीचे आने वाली हर जाति के लिये विभिन्न कार्य बनाये गये थे,और वो बने थे सबसे ऊपर बैठ कर सबके कार्यों का निर्धारण करने के लिये।।
      हालांकि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उनकी सोच और उनका स्थान बिल्कुल उलट हो चुका था,पर इसके बावजूद वो तन मन से इस नई व्यवस्था के खिलाफ थे,वो खिलाफ थे अन्तर्जातीय विवाह के।।उन्होनें अपने बच्चों के मन की मिट्टी को  भी सदा से जाति पाति के जटिल खाद और पानी से ही सींचा था,पर जाने कैसे ये कुलबोरनी अपने सारे संस्कार गंगा जी में बहाये आयी।अभी उनके हाथ में दुनाली होती तो ये नये नवेले जोड़े को सीधा परलोक पहुंचा देते पर एक तो समधि का घर दुजा वो मन ही मन युवराज का भी थोड़ा अधिक ही लिहाज करते थे,उनकी नज़र में उनकी जिंदगी भर की असली कमाई उनका दामाद युवराज ही था,लड़के तो शादी के बाद अपनी अपनी घर गिरस्ती में लीन थे,बस यही एक हीरा था जिसकी चमक से उन्होनें अपने तन मन को रोशन कर रखा था।।

   अपनी मर्मांतक पीड़ा को दबाते हुए उन्होनें बड़े कष्ट से युवराज को अपने पास बुलाया और तुरंत घर निकलने की इच्छा जाहिर की।।
      अपने श्वसुर के कट्टर स्वभाव से परिचित युवराज ने उनकी मंशा जानते ही राजा को गाड़ी निकालने का आदेश दिया और बैठ कर उन्हें सरकारी नौकरी के फायदे गिनाने लगा।।पर पल पल बदलते ससुर के चेहरे के रंगों का कुछ असाधारण होना युवराज को खटक रहा था कि वकील बाबू ने अपना सीना अपने हाथों सा पकड़ लिया__” क्या हुआ बाऊजी,कुछ तकलीफ है क्या??”

” हाँ,,कुंवर जी,लग रहा जैसे कोई कलेजा मरोडे दे रहा।।”
    बोलते बोलते ही वकील बाबू दर्द से कुम्हला कर एक ओर को झटक गये।

   युवराज और राजा ने आनन फानन उन्हें उठाया और बाहर गाड़ी में डाल तुरंत अस्पताल को दौड़ चले।। रूपा ने जैसे ही सुना की उसके बाऊजी को अस्पताल ले जाना पड़ा वो और हाथ नचा नचा के रेखा को सुनाने लगी_

  ” और कर लो लब मैरिज,अब पड़ गई कलेजे को ठंडक!! इत्ते में मत रुकना,बाऊजी को मार के ही दम लेना तुम,,कहे दे रहे रेखा ,आज के बाद हमे अपनी सकल ना दिखाना ,समझी।”

बहुत देर से चुप चाप खड़ी रेखा के लिये भी अब सब कुछ असहनीय हो गया,आखिर वो भी बिफर पड़ी

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” अरे शादी ही तो किये हैं,अपनी मर्ज़ी से कर लिये तो इतनी हाय तौबा काहे मचा रहे सब,और सुन लो दीदी बाऊजी भी अच्छे हो जायेंगे,तुम्हे ज्यादा चिंता करने की ज़रूरत नही है।” रेखा वहाँ से लल्लन का हाथ पकड़े बाहर निकली ही थी कि रूपा ने उसे रोक दिया__” कोई ज़रूरत नही तुम्हे अस्पताल जाने की।

” अरे अभी बखत नही है तुम दोनो का बिल्ली बन लड़ने का ,जल्दी अस्पताल चलो!! देखें वहाँ बकील बाबू को हुआ का है,भोले भंडारी रक्षा करे उनकी, समधन को भी खबर करना होगा।।”
  सबके सब बाहर निकले,प्रिंस और प्रेम अपनी बाईक में पहले ही राजा भईया की गाड़ी के पीछे निकल चुके थे,राजा के बाऊजी राजा लोगों के साथ निकल चुके थे,,अब बची थी घर की औरतें,बाँसुरी और लल्लन …..और बाहर खड़ी थी राजा की एस यू वी।।रेखा ने लल्लन को देखा __” हमें चलानी नही आती रेखा,हम बस आज तक वैगनार चलायें हैं,हम रोड पे एस यू वी नही उतार पायेंगे।”

  अभी लल्लन अपनी गाड़ी चलाने की योग्यता बता ही रहा था कि बांसुरी गाड़ी स्टार्ट कर गियर में डाल हॉर्न देने लगी,,

” चला तो लोगी ना,,बोज तो ना दोगी कहीं नाले वाले में ”  रूपा के सवाल पर बांसुरी ने मुस्कुरा कर नही में सर हिला दिया __” राजा सिखाये हैं हमें गाड़ी चलाना,बहुत सेफ ड्राइव करते हैं हम,,आप सब लोग  निश्चिंत होकर बैठिए।।

  सभी को लिये बांसुरी जब तक अस्पताल पहुंची तब तक वकील बाबू को इमरजेन्सी में भर्ती कर लिया गया था,कॉरिडोर में ही युवराज और राजा मिल गये,अभी सब मिल कर विचार विमर्श कर ही रहे थे कि डॉक्टर ने बाहर आकर एक परचा राजा को थमाया,और सारी दवाइयां जल्दी से जल्दी लाने की ताकीद की।।
   राजा के फोन पर रानी भी वहाँ पहुंच चुकी थी, वो भी अन्दर डॉक्टरों की टीम के साथ लगी हुई थी।।
  डॉक्टर और नर्सों की टीम भाग भाग कर अपने काम को अंजाम देने में लगी थी,लगभग दो ढाई घन्टे की मशक्कत के बाद एक सीनियर डॉक्टर बाहर आये __
         ” मरीज के साथ कौन है”  युवराज के आगे बढ़ते ही उन्होनें वकील बाबू के कमजोर हृदय का लेखा जोखा युवराज को थमा दिया

   ” देखिए इन्हें अटैक आया है,अभी तो हमने इमरजेन्सी दवाईयां दे दी हैं,पर आप लोग इनका एन्जियोग्राफ करवा लिजिये,जिससे ब्लॉकेज का परसेंटेज पता चल सके, अभी 4 दिन अस्पताल में ही रहना होगा,उसके बाद आप इन्हे लखनऊ मेडीकल कॉलेज ले जा सकते हैं ।”

इतना सुनते ही रूपा का पूर्वाभ्यासित रोने का कार्यक्रम शुरु हो गया,युवराज के बार बार समझाने पर भी उसने अपने राग तार सप्तक में ही छेड़े हुए थे, तभी वहाँ रानी आई__” अरे भाभी आप इतना परेशान मत होईये।।अभी अंकल ठीक है,आराम है उन्हें ।।लेकिन आगे चलकर कहीं वापस दुबारा अटैक आ गया तो बड़ी मुसीबत होगी इसिलिए डॉक्टर कह रहे कि एन्जियोग्राफी करवा लिजिये,उसमें अगर ज्यादा ब्लॉकेज आता है,तो आप एंजियोप्लास्टी करवा लीजियेगा,उसके बाद अंकल बिल्कुल स्वस्थ और सुरक्षित रहेंगे।।”

” ये सब का कारन ई कलमुही है,ना ये ऐसा भाग भगा के सादी करती ,और ना बाऊजी को हार्ट अटैक आता।”

” ऐसा नही होता भाभी,अंकल को शुरु से ब्लॉकेज रहा होगा,जो आज वेन्स को चोक कर गया और अटैक आ गया,आप बेवजह किसी को ब्लेम ना करें।”

” काहे ना करें,हमार बहिनी है,तुम्हारे पेट में काहे दरद हो रहा,ए लल्ला जी समझाओ अपनी डाक्टर्नी को,जादा चपर चपर ना करे,हम भी सब समझते हैं।।
बड़ी आई हमे समझाने वाली।”

कुछ ही देर में रूपा की माँ और भाई भी दौड़ा चला आया,अपनी माँ को देखते ही रूपा ने फिर एक बार रूदाली रूप धर लिया और आंखे और हाथ नचा नचा के रेखा के सर मत्थे सारा ठीकरा फोड़ दिया।।
  पर रूपा की माँ रूपा सी गंवार ना थी,समय की नज़ाकत को भांपते हुए उसने रूपा को समझा बुझा के शांत  कराया और रेखा के पास जाकर उसे अपने सीने से लगा लिया।।
    दुख की इस घड़ी मे,ऐसी अपार विपदा में जहां पति जीवन मृत्यु के बीच पीन्गे भर रहा था,बेटी का जात से बाहर जाकर शादी करना माताजी को कमतर दुखी कर पाया।।और शायद इसिलिए अपने दुख को दूर करने उन्होनें आगे बढ कर बच्चों को माफ कर दिया।।

  औरत ही औरत की पीड़ा समझती है,राजा की अम्मा ने आगे बढ़ कर समधन को गले से लगा लिया,दोनो औरतें साथ बैठी घंटों टन्सुये बहाती रहीं, अंत में रो धो कर फुर्सत पाई तो पति से मिलने की इच्छा जाहिर की,जिसे उस वक्त डॉक्टरों ने ठुकरा दिया।।

    शाम चार पांच बजे तक में मरीज की हालत स्थिर हुई,और सभी को उनके कक्ष में उनसे मिलने की इजाज़त मिल गई।।

   इतनी देर में राजा ने फ़ोन पे लल्लन के बड़े भाई को सारी जानकारी दे दी थी,राजा के फोन के बाद घर पे सोच विचार कर लल्लन का भाई,उसके बाबूजी और अम्मा भी अस्पताल चले आये।।
    आते ही लल्लन की अम्मा ने राजा की अम्मा से दुआ सलाम की और रेखा की अम्मा से मरीज का हाल पानी जानने लगी,वहीं लल्लन के पिता और भाई भी युवराज और बाकी पुरूषों से बाकी का हाल समाचार लेने लगे।।लल्लन को अपने पिता और भाई का तो उतना डर नही था जितना उसे अपनी अम्मा का डर सता रहा था,उसने आगे बढ़ कर पहले बाऊजी,भैय्या और फिर अम्मा के पैर छू लिये।।
   बाऊजी ने उसके सर पर हाथ फेरा तो लल्लन की आंखों की कोर भीग गई पर अम्मा ने आशीर्वाद की जगह दुसरी ओर मुहँ फेर लिया,और तो किसी को कुछ समझा नही पर कोखजाये ने अपनी जननी का दर्द उसकी पीड़ा समझ ली,पर अब क्या हो सकता था?? चुपचाप उठ कर लल्लन ने इशारे से रेखा को भी पैर छूने को कहा और एक तरफ खड़ा हो गया, रेखा ऐसी बातों को समझ कर भी कई बार नासमझ बन जाती थी,बांसुरी ने रेखा से मुहँ खोल कर कहा

” अपने सास ससुर की चरण धूलि तो ले लो रेखा, बड़ों का आशीर्वाद तुम्हारे भविष्य  को सफल बनाएगा,,चिंता ना करो सब ठीक हो जायेगा।।”

शाम ढलते ढलते सभी के चेहरों से चिंता की लकीरें भी छंट गई,रो के हँस के जैसे भी हो पर लल्लन और रेखा के विवाह को आखिर दोनो परिवारों की सहमती मिल ही गई।।
    वकील बाबू को भी हृदय मे उठी मर्मांतक पीड़ा  में जीवनरक्षक औषधियों ने ऐसा चमत्कार किया कि  अपने कष्ट से मुक्ति पाने के बाद वो यथासम्भव विनम्र होते चले गये,उन्होनें अपने मन की भावनाओं को समेट कर अपने नये जमाता को गले से लगा लिया।।

     वैसे भी मृत्यु के मुख से लौटे इन्सान को अपना जीवन और अधिक मूल्यवान लगने लगता है,वैसा ही कुछ वकील बाबू के साथ हुआ,और उन्होने हृदय से सबकी गलतियों को क्षमा कर दिया ।।

    रात मे अस्पताल में रूपा का भाई रुका,माँ को समझा बुझा कर रूपा अपने साथ ले गई,,शादी ऐसी जल्दी मे हुई परन्तु विदाई बिना परछन कैसे कर दे,ऐसा बोल रेखा को भी उसकी माँ अपने साथ ले गई,इधर लल्लन को उसके दोस्त बिना गाजे बाजे ही बाराती बने,, राजा भैय्या की गाड़ी में हँसी ठिठोली करते बिना दुल्हन ही उसके घर पहुँचा आये।।
    प्रेम प्रिंस और राजा भैय्या के साथ जैसे ही लल्लन अपने घर की चौखट लान्घने जा रहा था कि उसकी अम्मा की आवाज़ ने उसे वहीं रोक दिया, वो जल भरा कलश और आरती की थाल लिये चौखट पे आई,और पानी भरे कलसे को सात बार लल्लन के चारों ओर घुमा कर,बाहर निकल उस पानी को बहा आई__
       ” सादी बिना पूछे कर आये तो अब का हर जगह मनमानी चलेगी तुम्हारी,,अरे हल्दी नई चढ़ी तो का भवा,दूल्हा तो बनी गये,अब नैके दूल्हा का नज़र उतारे बिना,उसकी आरती उतारे बिना अन्दर कैसे ले लें,बोलो।।”

    नज़र उतार ,आरती कर,अम्मा ने लल्लन के मुहँ मे शगुन का गुड़ डाला और उसे अपने आंचल तले ढांप के घर के मन्दिर में ले चली।।
    कुल देवी के आगे प्रणाम कर लल्लन ने अपनी अम्मा के पांव छुए और अम्मा के आंसू लल्लन के चेहरे को भिगोते चले गये__” एक बार पूछने की ज़रूरत भी ना समझी लल्ला,आज तक किस बात के लिये रोका तुझे जो आज रोक लेती।।”

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” गलती हो गई अम्मा!! माफ कर दे।।” लल्लन अपनी अम्मा के गले से लगा रो पड़ा,,माँ बेटे के इस पावन मिलन के बीच घर के किसी सदस्य ने आने की जुर्रत नही की,राजा इसी बीच जाकर अपनी गाड़ी में बैठा प्रिंस और प्रेम का रास्ता देख रहा था,कि  बांसुरी का मेसेज आ गया ” वहाँ लल्लन के घर पे सब ठीक है ना??” जवाब में राजा ने भी लिख दिया _” हाँ सब ठीक!!”

  ” क्या भाई,चाय पीकर ही टरोगे तुम दोनो??” लल्लन की दीदी के सवाल पर प्रिंस हड़बड़ा गया

” नहीं दीदी!! बस जाते हैं हम दोनो।।” दोनो बाहर को भागे,देखा राजा भैय्या ड्राइविंग सीट पर अपना मोबाइल पकड़े मुस्कुरा रहें हैं ।।

” का बात है भैय्या जी,बड़ा मुस्कुरा रहे हैं,किसका मेसेज आ गया ??”

” अबे किसी का नही बे!! जल्दी चलो ,,घर जाये कुछु खाये पिये,,आज तो लल्लन की शादी के चक्कर में पानी तक नसीब नही हुआ,फिर भाभी के बाऊजी की तबीयत बिगड़ गई,,अब तो पेट मे चूहे रेस लगा रहे हैं,अम्म्मा जाते जाते इशारा कर गई थी कि आज हमारी पसंद की प्याज की कचौड़ी बना रही हैं,तो चलो जल्दी से चले और खाये पियें।”

” चलिये भैय्या जी फिर भगा लिजिये गाड़ी,किसका इन्तजार है।।”

तीनों साथ बैठे राजा के घर को निकल चले।।

क्रमशः

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aparna..

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शादी.कॉम-13

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   रूपा की बहन रेखा को आये पूरे दो दिन बीत गये, अपनी बड़ी बहन की चाक चौबंद चौकीदारी में रेखा दुबारा राजा की जिम का रुख नही कर पाई।।
    मिलने की आस जगा कर भी जब रेखा मिलने नही आई तो लल्लन की बेचैनी घड़ी की हर टिक टिक के साथ बढ़ती चली गई,अब तो राजा प्रिंस और प्रेम सभी को उसके बारे में पता था,सभी उसके लटके हुए चेहरे का कारण जानते थे,इसलिये उसे उस समय किसी ने नही छेड़ा ।।
    राजा ने घर जाते समय उसे साथ चलने की पेशकश भी की जिसे ठुकरा कर सबसे अंत मे जिम का ताला लगा कर बेचारा अपने घर को चल दिया।।
    लल्लन को नही पता था कि घर पे एक सरप्राइज़ उसका इन्तजार कर रहा था।।
लल्लन के पिता और भाई की अफसरी ने उसके घर को एक अलग अदब और शिष्टाचार में रंग दिया था, घर पे सभी के लिये पढ़ना लिखना सांस लेने जितना महत्वपूर्ण था,इसिलिए लल्लन भले ही राजा की चंडाल चौकड़ी का हिस्सा था पर उन के साथ घूमते फिरते भी उसने अपनी पढ़ाई का हरजा नही होने दिया था,,वो दिल्ली भी किसी सरकारी नौकरी के सिलसिले में ही गया था।।
      थके हुए तन और बुझे हुए मन से जब लल्लन ने घर में प्रवेश किया,तो लगा  जैसे सभी उसी का इन्तजार कर रहे थे।।उसके घर मे घुसते ही आगे बढ़कर उसकी दीदी ने उसके मुहँ में कलाकन्द ठूंस दिया,,बेचारा इस हमले के लिये तैयार नही था,इतने बड़े टुकड़े को जब तक गालों के दोनों तरफ सेट करता तब तक माँ हाथ में गुलाब जामुन की कटोरी लिये खड़ी हो गई ।।
     मुहँ में गुलाब जामुन की जगह बनाते हुए सर ऊपर नीचे ‘रुको माँ जरा सबर करो’की मुद्रा में हिलाते हुए लल्लन ने पुछा __” आखिर हुआ क्या है?? काहे की मिठाई खवा रहे।”
  ” रेल्वे का जो एग्ज़ाम तुम दिये रहे,उसका रिजल्ट आ गया है,,तुम पास हो गये हो।”

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  लल्लन के बड़े भाई ने आगे बढ़ उसकी पीठ थपथपा के कहा।।

  ” बस हमारी आखिरी चिंता भी दूर हुई,क्यों लता देखी खुश हो अब,,तुम्हारे तीनो बच्चे सरकारी अफसर बन गये,,भई जब सरकार हमें मौका दे रही तो हम काहे लाभ ना उठायें,,बहुत बढ़िया लल्लन,आज हमारा सब चिंता दूर हो गया,,बस अब तुम्हारे दीदी और भैय्या का शादी हो जाये तो एक बार तुम्हारी अम्मा को बद्रीनाथ ले जायेंगे।।”

लल्लन का लटका चेहरा खिल उठा,आखिर उसे भी अपने बड़े भाई और दीदी जैसे नौकरी मिल ही गई,, उसके आत्मविश्वास में वृद्धि हुई जिसका परिणाम ये हुआ कि बिना किसी डर के लल्लन ने रेखा को ये खुशखबरी देने फोन लगा दिया__

” हेलो शो…,रेखा!!”

” तुम कौन बोल रहे??”

” भाभी जी चरण स्पर्श!! हम लल्लन बोल रहे।”

” बोलो”
रूपा की आवाज़ सुन लल्लन के प्यार का भूत भाग कर वापस बरगद पर लटक गया,वो जब तक हिन्दी वर्णमाला का जाप करना शुरु करता’ अ  ओ…’ तब तक में रेखा ने आकर अपना फ़ोन जिज्जी के हाथ से झपट लिया_ तुमको किचन में तुम्हारी मदर इन लॉ बुला रही हैं “
  और कमरे में भागी” हाँ!! बोलो हम हैं।”

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” थैंक गॉड!! तुम्हारी आवाज़ तो सुनने को मिली।। दो दिन से तुम्हारे बताये टाईम पर रस्ता देख रहे,जिम काहे नही आई।।”

” अरे क्या बताऊँ,मेरी दीदी के अन्दर हिटलर की आत्मा आ गई है,दिन भर तानाशाही,,मेरा फोन भी उन्हीं की निगरानी में रहता है,,कैसे करती फोन??

रेखा अभी भी धर्मसंकट में थी,,लुक्स और घर बार के हिसाब से राजा का पलड़ा ही भारी पड़ रहा था, पर वो जैसी अन्ग्रेज तबीयत की थी उसपे उसे रोहित का साथ भी भा जाता था।।।उसे इस बात पर भगवान से थोड़ी रुष्टता थी,कि क्यों भोले भंडारी उसे सही राह नही दिखा देते।।इसिलिए उसने अपने स्वयं के विवाह के लिये सोलह सोमवार व्रत करने का आज सुबह ही निश्चय किया था।।

” अच्छा शोना!! तुम्हे पता है हमारे लिये कितनी लकी हो तुम! देखो तुम हमारे शहर आई,और हमारा रेल्वे का जोइनींग लेटर भी आ गया,,हमारी नौकरी लग गई बाबु।””

सोलह सोमवार करने का संकल्प फलीभूत हुआ, रेखा को अपनी डगर दिख गयी,अपनी मंजिल मिल गई,अपना शुद्ध सात्विक प्रेम उसने चुन लिया।।

” हाय सच्ची!! मजाक तो नही कर रहे?? लव यू बाबु,,तुम्हें पता है तुम्हारी नौकरी के लिये भी व्रत करने का सोच रही थी मैं,अच्छा सुनो,अभी फोन रखती हूँ,कल कैसे भी कर के जिम आ जाऊंगी ,फिर बात करते हैं ।”

  रेखा ने हमेशा जागती आंखों से एक सुन्दर सपना देखा था,कि एक सजीले नौकरी पेशा लड़के से उसका ब्याह हो जाये,और वो अपने पति के साथ उसकी नौकरी वाले शहर में अपना छोटा सा घोंसला सजाये,जहां ना सास की चिकचिक हो,ना ससुर का दबदबा,,ना ननंद के तेवर हों ना जेठानी के नखरे।।।
अब लल्लन की नौकरी लग जाने से रेखा को उसका सलोना सपना पूरा होता दिख रहा था,,भले ही राजा हैंड्सम था,खानदानी रईस था,पर था तो सयुंक्त परिवार की कड़ी,,जो कभी किसी जनम में अपनी अम्मा का आंचल छोड़ कर बीवी को ले अलग घर नही बसा सकता था,,बस रेखा ने चुन लिया…..रोहित ही है जो उसका जीवनसाथी बनने के सर्वथा उपयुक्त है!!

अगले दिन सुबह रसोई का चाय नाश्ता निपटा के रूपा जब अपने कमरे में बैठी फेस बुक पे सुबह के नाश्ते आलू पूरी की फोटो अपलोड कर रही थी, तब चुपके से रेखा अपना फोन लिये निकल पड़ीं ।।
   जिम में लल्लन सभी का मुहँ मीठा करा रहा था।।

    रेखा को बाहर दरवाजे के पास ही प्रिंस और प्रेम मिल गये__” हाय डॉग्स!! वेयर इस रोहित??”

” अन्दर है।” गुस्से मे तमक के प्रेम ने जवाब दिया।
  अपनी सैंडल चटकाती रेखा भीतर चली गई

” इतना गुस्सा मे काहे जवाब दिये,कित्ता प्यार से पुछि रही बेचारी।।”

” इत्ता प्यार से शराफत से हम दोनों को कुत्ता बोली रही समझे!!”प्रेम के जवाब को सुन कर भी प्रिंस को भरोसा ना हुआ__” जो भी बोलो पर अन्ग्रेजी मे गाली भी बड़ी सुहानी लगती है,,नई??”

  रेखा के अन्दर बचपन से फिल्मी कीड़ा था,,वो भीतर जाते ही लल्लन के गले से लग गई,जिम में उपस्थित सभी की आंखें चौडी हो गई ।।

” आई रे आई रे,ले मै आई हूँ  तेरे लिये,तोड़ा रे छोड़ा रे हर बंधन वो प्यार के लिये”

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  जिम में बजने वाला गाना अचानक नायक और नायिका के लिये बैकग्राउंड म्युसिक बन गया….
 
  बाँसुरी ने धीमे से जाकर दोनो को आवाज़ दी और उन्हे अन्दर ऑफिस में चलने को कहा

ऑफिस के अन्दर राजा बांसुरी,प्रेम प्रिंस लल्लन और रेखा आगे क्या करना है पर सोच विचार में डूबे थे।।

  ” रोहित लिसन!! मेरे घर वाले कभी तुमसे शादी के लिये राज़ी नही होंगे,हमें कुछ और सोचना पड़ेगा।।”

” हाँ वैसे रेखा ठीके कह रही,हम भी तो जानते हैं,भाभी के बाऊजी बड़े जब्बर हैं,कभी ई सादी ना होने देंगे।।”

  ” तो अब क्या करना है शोना,,तुम जो बोलोगी हम सब मानने को तैयार हैं,वैसे हमारे घर में कोई दिक्कत नही होगी,बस एक ही छोटी सी परेशानी है,अभी तक हमारे बड़े भाई और दीदी की भी शादी नही हुई,तो बस ये हो सकता की अम्मा बाबूजी कम से कम दीदी की शादी तक हमको रुकने बोले।”

” पर हमारे पापा उतना नही रुकेंगे,,वो तो अभी पिंकी की इन्गेजमेंट  रतन से हो गई,तो थोड़ा चुप बैठे हैं,पर ज्यादा से ज्यादा एक महीना ,उसके बाद हमारी शादी कर ही देंगे।।”

  “तो बताओ क्या करें फिर।।”

   ” हमें मन्दिर में शादी करनी पड़ेगी रोहित,बाद में घर जाकर घर वालों का आशीर्वाद ले लेंगे, लेकिन अगर अभी जब तक हम दीदी के घर पे हैं हमारी शादी नही हुई तो समझ लेना कि हम तुम्हारा ब्यूटीफुल पास्ट बन जायेंगे,,फिर आ जाना हमारी शादी की दावत खाने।।”

   लल्लन से ज्यादा हडबडी इस शादी की राजा को थी,क्योंकि उसे भी पता था अगर रेखा की लल्लन से शादी नही हुई तो ये ढोल उसके गले ही बन्धेगा ।।

  ” हाँ रेखा एकदम ठीक कह रही,हम तो कहतें हैं कल ही शादी कर लो,हम सब तैयारी कर लेंगे,तुम दोनो बस समय से आ जाना।” राजा की बात सुन प्रिंस ने अपनी बात रखी__

  ” भैय्या जी ठीके कह रहे,कल हम कोर्ट पहुंच जायेंगे,वहीं बकील साहब के सामने साईन उन करके माला बदल लेना।”

   ” काहे प्रिंस!! क्राईम पैट्रोल बिल्कुल नही देखते हो क्या?? ऐसे कोर्ट में शादी के लिये ,एक महीना पहले अर्जी देना पड़ता है,वो अर्जी का आवेदन का फोटो अखबार में छपता है,अगर कोई दावा आपत्ति करना चाहे तो कोर्ट जा कर कर सकता है,फिर एक महीना बाद शादी की डेट मिलती है जिसमे शादी होती है।।”

  ” बन्सी हम भी देखते थे पहले,,हमको  तो एकदम झन्नाट लत लग गया था क्राईम पैट्रोल का, हम भी वैसे ‘ सहाय’ जैसे खुदरे पुलिस बनने का सपना भी देखे लगे थे,,पर हमारे साथ का होता था जानती हो,घर पे कूकर का सिटी भी बजता था तो हम चौंक जाते थे,घर पे किसी काम के लिये कोई मिस्त्री मास्टर आया तो हम उसको अपनी पैनी नज़र से घूरते रहते थे,,हमारे बाऊजी की सुनारी है,बेचारे जब चावड़ी निकलते हम रोज पीछे से टोकते ‘ बाऊजी सतर्क रहना,सुरक्षित रहना।’
    हमको तो सपने भी क्राईम पैट्रोले के आने लगे, छत पे खड़े हों और कहीं आजू बाजू की छत पर एक तरफ शुक्लाईन भाभी खड़ी हो,और दुसरी छत पे तिवारी भैय्या तो हमको लगता ज़रूर ई दोनों का कोई चक्कर चल रहा है,हमारे दिमाग में जासूसी घुस गया,अम्मा अलग चिल्लाती की उनका ये रिस्ता का कहलाता है छूटा जा रहा है,पूरा एक महीना निकल गया,उसके बाद एक दिन अम्मा हमारे हाथ से रिमोटवा को छीन डारी,और अपना सीरियल लगा ली,पर अम्मा के साथ गज़ब हो गया,उनको बेचारी को एक ही एपिसोड पूरा एक महीना झेलने का आदत था,पर उसी एक महीना में जाने का उलट फेर हुआ कि ‘ई रिस्ता का कहलाता है’ के सारे किरदार ही बदल गये,असली हीरोइन छोड़ दी रही सीरियल, और उसके लड़िका बच्चा बड़े हुई गये,,अम्मा अपन सिर धुन ली,बोली ‘ अब हमको नई देखना ई सीरियल,ये कोई तरीका होता है ?? इत्ता फास्ट भगायेंगे तो सिरियल नही ये लोग फिलिम बनायेंगे। और उसके बाद अम्मा ओ सीरियले देखना बन्द कर दी।।”

” फिर अब?? अब तुम्हारी अम्मा टी वी नही देखती?” बांसुरी के सवाल पर प्रिंस ने जवाब दिया

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” देखती है ना!! पर अब अम्मा रिस्ता उस्ता नही देखती अब अम्मा ‘ सावधान इंडिया ‘ देखती है।”

” ये तुम दोनो का अति महत्वपूर्ण टी वी परिचर्चा समाप्त हो गया हो,तो लल्लन और बहन जी का शादी डॉट कॉम पे विचार किया जाये।” प्रेम की इस बात पे राजा ने भी जल्दबाजी दिखानी शुरु की, उसे भी रेखा के साथ सम्भावित विवाह से बचने का यही एकमात्र उपाय दिखा ।।

” आई एम नॉट ए बहन जी,,कॉल मी रेखा ओनली, बोलो रोहित क्या करना है आगे।”

” करना क्या है,शादी करना है और क्या?? ऐसा करते हैं,लल्लन कल सुबह 9 बजे तुम गौरी शंकर मन्दिर पहुंच जाना, प्रिंस तुम बड़े तिवारी पण्डित को लेकर पहुंचना,और प्रेम फूल माला और बाकी पूजन सामग्री ले आयेगा,हम रेखा को लेकर आ जायेंगे, जितनी जल्दी सब निपट जाये उतना अच्छा।।

‘ बांसुरी कल तुम कॉलेज मत जाना,हम रेखा को लेकर तुम्हारे घर ही आयेंगे,तुम्हारे यहाँ ये शादी के लिये तैयार हो जायेगी और फिर वहाँ से तुम दोनो को लेकर हम मन्दिर चले जायेंगे।क्यों ठीक है ना??”

” ठीक है राजा,तो ऐसा करते हैं,हम अभी रेखा को साथ लिये बाज़ार निकल जाते हैं,कल पहनने के लिये रेखा को कुछ शॉपिंग भी तो करना होगा।”

हाय रि किस्मत!!! कहाँ 3 महीने की ब्राइडल सिटिंग,कहाँ हर एक फंक्शन में पहने जाने वाली अलग ड्रेस से मैचींग सैंडल और ज्वेलरी और कहाँ ये धूम फटाक शादी!!!
    पर इसका भी मज़ा है,,थोड़ा एडवेंचर तो इसमें भी है,रेखा ने अपने मन को समझा लिया,अरे हम आपके हैं कौन की माधुरी नही बन पाये तो क्या,दिल की माधुरी तो बन ही सकते हैं,उसमें भी तो आमिर खान के साथ भागना ही पड़ता है आखिर।।

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  राजा के साथ बांसुरी और रेखा ज़रूरी सामान खरीदने चली गई,प्रिंस और प्रेम तिवारी पण्डित को खोजने निकले और लल्लन अपनी तैयारी में लग गया।।

   अगले दिन सुबह राजा और रेखा निकलने ही वाले थे कि रेखा के बाबूजी का आगमन हो गया,वो जिस किसी काम से आये थे,उससे कहीं अधिक आवश्यक कार्य अपनी पुत्री को वापस लेकर जाना था,,इसीसे सुबह सुबह जल्दी जल्दी सारे काम निपटा के सीधे बिटिया की ससुराल पहुंच गये।।
    रूपा जहां पिता को देख कर प्रसन्न हुई वहीं रेखा का चेहरा लटक गया।।

‘ ए रेखा ठहरो!! सुबेरे सुबेरे लल्ला जी के साथ कहाँ चल दी तुम??’ और सुनो भले बाऊजी लेने आ गये तो क्या,हम इत्ता जल्दी तुमको जाने नई देंगे समझीं, एक तो पिंकी की सगाई में आई नई,और अब भागे की तैयारी।।”

” अरे जिज्जी हम कहाँ भाग रहे,यू डोंट वरी!! हम अभी रहेंगे तुम्हारे पास।।” दीदी से अपने मन का कहने के बाद रेखा अपने बाऊजी से मुखातिब हुई

” पापा हम बस यूँ गये और यूँ आये,राजा की बेस्ट फ्रेंड है बांसुरी,उस दिन मिली थी ना जिज्जी तुम ,आज उसके कॉलेज में कुछ फंक्शन है,तो हमें बुलाई है ,मेक’प में  हैल्प करने,बस हम उसे रेडी कर के अभी आये,,चले राजा?'”

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बड़ी मुश्किल से सबसे जान बचा के दोनों वहाँ से निकले और बांसुरी के घर पहुंच गये,बांसुरी पहले ही सारी तैयारी पूरी किये बैठी उन्हीं दोनों का रास्ता देख रही थी।।

” नमस्ते चाची जी!! हम राजा हैं,अवस्थी जी के लड़के,अगले मोहल्ले रहते हैं,बांसुरी कहाँ हैं??”

“ऊपर आ जाओ राजा ,,हम यहाँ अपने कमरे में ही हैं

” अच्छा अच्छा!! ऊ गैस वाले अवस्थी के लड़के हो?” बुआ जी के इस सवाल पे राजा ने सर ऊपर नीचे कर हाँ में जवाब दे दिया,बुआ जी ने बहुत इसरार कर राजा को वहीं बैठा लिया,बांसुरी नीचे आकर रेखा को अपने साथ ले गई ।।

” करते का हो बिटवा?? सादी ब्याह भया की नाही, हम बन्सी की बड़ी बुआ है,कोई अच्छा लड़का नजर में हो तो बताना,वैसे बच्चे कितने तुम्हारे?”

“बुआजी अभी हमारी शादी नही हुई।”
राजा के माथे पर लिखी उसकी जन्म कुंडली का ऐक्सरे निकालती बुआ जी ने अपनी आंखे छोटी छोटी कर बड़े आश्चर्य से कहा__” हैं अब तक ब्याह नही हुआ,,क्यों बेटा दिखने में तो अच्छे खासे हो।।”

” अब ये क्या बतायेंगे जिज्जी!! आप भी ना,लो बेटा चाय पियो,हम ऊपर बांसुरी को भी चाय दे आते हैं,अरे ये तो दोनो लड़कियाँ नीचे ही उतर आईं।”

  मैरून और गहरे हरे रंग के कॉम्बिनेशन लहन्गे में रेखा जितनी खिल रही थी,उतनी ही पीले सलेटी लहरिया लहन्गे में बालों को खुला छोड़ी सांवली सलोनी बांसुरी भी दमक रही थी।।राजा ने बांसुरी को देखा,बाँसुरी ने इशारे में उससे पुछा की ” मैं कैसी लग रही” आंखों से ही ” बहुत सुन्दर” बोल कर राजा ने शरमा कर चेहरा नीचे झुका लिया।।
   तीनों साथ साथ घर से निकल गये।।पर राजा और बांसुरी की इस आँख मिचौली को वहाँ और भी किसी ने देख लिया था।।

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” अरे बसुरीया कहाँ चली तू?? इत्ता सज धज कर तो कभी ना निकली घर से,ई छोरी जा कहाँ रई ।”

” इनकी शादी कराने जा रही बुआ” रेखा का हाथ अपने हाथ मे ले बांसुरी ने हँस के कहा और तीनो वहाँ से निकल गये।।

मन्दिर में पण्डित प्रिंस प्रेम और पूजन सामग्री सब पहुंच चुकी थी,बस कमी थी दूल्हा और दुल्हन की,।।
  राजा रेखा और बांसुरी के पहुंचते ही पण्डित जी अपनी तैयारियों मे लग गये,सब आस पास बैठ कर लल्लन का रास्ता देख रहे थे कि पण्डित जी ने राजा भईया के गले में पड़े स्टायलिश स्टोल को बांसुरी की चुन्नी से बांधा और आचमन कर मन्त्र पढ़ते हुए उन दोनो पर जल सिंचन किया ही था कि रेखा चीख पड़ी __ ओह माय गॉड!! पण्डित जी ये दोनो दूल्हा दुल्हन नही है!! दुल्हन मैं हूँ ।।

  ये सब इतनी हडबडी मे हुआ की बांसुरी या राजा कुछ बोल या समझ पाते कि जो घटना था घट गया, दोनों एक दूसरे को देख ही रहे थे कि रेखा ने झट बांसुरी की चुन्नी खोल दोनो को अलग किया,उतनी देर में लल्लन भी पहुंच गया।।

” कहाँ रह गये थे लल्लन!! अभी तुम्हारी जगह पण्डित जी भैय्या जी और बन्सी के फेरे फिराये दे रहे थे,,बच गये गुरू!! “प्रिंस की बात पे लल्लन ने माथे का पसीना पोछा और बोला_

  ” घर से निकल रहे थे कि अम्मा पीछे लपक ली, सत्ती माई में रोट चढाये गई,उनको वापस घर उतार के निकले कि गाड़ी का तेल खतम हो गया।।”

” वॉट तेल रोहित!! इट्स फ्युल!! चलो आ तो गये,अब आओ जल्दी यहाँ बैठो,फेरों का भी तो मुहूर्त होगा।।”

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” यस ऑफ़कोर्स ! फेरों का भी मुहूर्त है,पण्डित जी अब असली दूल्हा दुल्हन आ गये,शुरु कीजिए।।”

बांसुरी ने रेखा और लल्लन का गठजोड़ किया और मुस्कुराते हुए राजा की बाजू मे खड़ी हो गई ।।शुभ मुहूर्त और मंगल स्वस्तिवचनों के साथ सप्तपदी संपन्न हुई।।।

क्रमशः

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aparna..

समिधा-28

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      ससुराल में पारो का समय कैसे बीत रहा था उसे खुद ख्याल नही था। इसी बीच एक बार लाली भी उससे मिलने आई। लाली पेट से थी और इसी कारण उसे पहले आने नही दिया गया था।
   मांग भर लाल सिंदूर हाथ में शाखा पोला पहनी लाली पारो को अति सौभाग्यशाली दिख रही थी। उसके सामने पारो अपनी किस्मत का रोना लेकर नही बैठना चाहती थी। इसलिए उसे अपने कमरे में बैठा कर उसके लिए वो मुस्कुराती उसके सामने बैठ गयी। कुछ देर इधर उधर की बातों के बाद आनन्दी उन दोनों के लिये कुछ खाने पीने का सामना लिए ऊपर ही चली आयीं।
   बहुत दिनों बाद पारो के चेहरे पर मुस्कान आई थी , लाली को देख कर।
  जाने क्यों उसे लाली में देव नज़र आ रहा था। देव अपनी भतीजी पर जान भी तो छिड़कता था।।
  लाली भी पारो से मिल कर प्रसन्न थी, उसे पारो में उसके देव काका दिखाई दे रहे थे…-” पारो एक बात पूछूं”

” हाँ पूछ ना? “

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” तुम वापस पढ़ाई क्यों नही शुरू कर देती? “

पारो अनमनी सी लाली को देखने लगी..-” अपने घर के रीति रिवाजों से तो परीचित हो भली तरह। जब तक देव बाबू थे फिर भी किसी तरह सम्भव था लेकिन अब पारो का पढना एक तरह से असंभव है!”
   जवाब आनन्दी ने दिया । जवाब कड़वा ज़रूर था पर सत्य था। घर में पहले भी देव ने चोरी छिपे ही पारो को पढ़ने में मदद की थी और अब उसके जाने के बाद पारो में भी वो उत्साह कम दिख रहा था।

” आप कह तो सहीं रहीं हैं बऊ दी , लेकिन पढेंगी लिखेगी तो मन लगा रहेगा। वरना करेगी क्या दिन भर?”..

  लाली की बात सुन पारो की आंखों में पानी भर आया। आनन्दी भी पारो को देख दुख में डूब गई। तीनों औरतें कुछ पलों को चुप रह गईं की क्या किया जाए क्या नही… उसी वक्त कहीं से घूम घाम कर लौटा दर्शन भी ऊपर ही चला आया…-” ये लो दर्शन चला आया। सुन तू ही पारो की मदद क्यों नही कर देता पढ़ने लिखने में। थोड़ा उसका भी मन लगा रहेगा।”

” तो मैंने कब मना किया ? बऊ दी जब चाहें पढ़ लें। मैं इन्हें पढ़ाने में पूरी मदद कर दूंगा।”

“पर मदद सबसे छिप कर करनी होगी दर्शन बाबू। अगर घर भर को पता चल गया तो एक और नई मुसीबत हो जाएगी।”
  आनन्दी की बात पर दर्शन ने भी हामी भर दी….
पारो का अब किसी काम में मन नही लगता था। न रसोई में न पढ़ाई में। उसे अब सारा सारा दिन देव के बारे में सोचना ही बस भाता था। खिड़की की बल्लियां पकड़े खड़े वो देव में खोई रहती।
  पर घर की बाकी औरतों को ये कैसे सहन होता। आखिर उनके भी अपने दुख थे। तो अकेली पारो को ही गमगीन रहने का अवसर क्यों मिले भला? जब बेटा खो कर भी माँ कामधाम में लगी है?
  आखिर देव की माँ ने पारो को भी गृहस्थी के जंजाल में वापस बुला लिया। अब सुबह उठ कर आंगन को पानी से धो कर पारो घर भर के लिए चाय चढ़ा कर फिर नहाने चली जाती। नहा कर आने के बाद ठाकुर माँ  के पूजा पाठ का सरंजाम जुटाने के बाद एक बार फिर रसोई बनाने में डूब जाती। दोपहर सबके खाने पीने के बाद ही उसे छुट्टी मिलती। तब कुछ देर को अपने कमरे में आराम करने का मौका उसे मिल पाता। हालांकि दोपहर सोने की आदत न होने से वो दर्शन की दी हुई किताबें पढ़ने लगती।
  अक्सर किताब के सबसे रस भरे अध्याय में डूबी होती कि नीचे से शाम की चाय बना लेने की पुकार चली आती और वो अपनी किताब बंद कर नीचे भाग जाती।
  वो इतना काम करते हुए भी नही थकती क्योंकि अब उसे देव की माँ में अपनी सास कम और देव की माँ का अंश अधिक नज़र आने लगा था। अब उसे उस सारे घर से प्यार हो गया था। वो प्यार जिसका अधिकारी जा चुका था उसके उस अधिकार को उसके प्यार को अब पारो उसके घर और सम्बन्धों पर लुटा देना चाहती थी। वैसे भी अब इसके अलावा उसके जीवन में और बचा क्या था?
   देव के बाबा का अब वो और ज्यादा खयाल रखती। बिल्कुल जैसे वो सुबह नाश्ते के बाद और रात खाने के बाद कि गोलियां उन्हें निकाल कर दिया करता वैसे ही वो गोलियां निकाल उनकी टेबल पर पानी के गिलास के साथ रख आती।
   और वो धीमे से अपने चश्मे पर चढ़ आई भाप को चुपके से साफ कर लेते।
  ठाकुर माँ को शाम में बैठ कर सुखसागर पढ़ कर सुनाती बिल्कुल जैसे वो सुनाया करता था। माँ की कही हर बात वैसे ही जी जान से लग कर पूरा करती जैसे वो किया करता था लेकिन बस एक ही जगह वो चूक जाती…
   जहाँ खुद से प्यार करने की बारी आती वो लाचारगी से खिड़की पर खड़ी खुद पर तरस खा कर रह जाती। उसे तो वो टूट कर चाहता था, उसका प्यार जब तब वो महसूस कर पाती थी लेकिन न कभी उसने खुल कर कहा और न पारो ने ही उससे खुल कर कहने कहा लेकिन समझते तो दोनो ही थे।
  कितनी कोमलता थी देव के प्यार में। उसे छूता भी ऐसे था कि कहीं वो मैली न हो जाये और आज उसे इस अनजान सी दुनिया में अनछुआ अकेला तड़पता छोड़ गया था।
अब जब उसे शादी प्यार पति पत्नी के सम्बन्धो के बारे में थोड़ा बहुत मालूम चलने लगा तब वो ही चला गया।
  यही सोचती कभी कभी वो एकदम गुमसुम रह जाती तो कभी रोते रोते उसकी हिचकियाँ बंध जाती।
    लेकिन अब उसे सासु माँ अधिकतर समय काम में भिड़ाये रखती जिससे वो सुकून से कमरे में बैठ रो भी नही पाती थी।
  ऐसे ही एक शाम वो अपनी खिड़की पर खड़ी बाहर डूबते सूरज को देख रही थी कि उसकी सास और बड़ी बुआ अंदर चली आयी…-” क्या देख रही है पारो? “वो चौन्क कर मुड़ी और माँ के साथ बड़ी माँ और बुआ को भी आया देख चुप खड़ी रह गयी।
“दिन भर ऊपर अकेली पड़ी पड़ी उकता नही जाती हो? नीचे चली आया करो। हम सब के साथ बैठोगी तो अच्छा लगेगा न। “
  हाँ में सिर हिला कर वो ज़मीन पर अपने पैर के अंगूठे से गुणा भाग के चिह्न बनाती रही।
  वो तीनों एक साथ उसके कमरे में क्या सचमुच उसकी चिंता में ही चली आयीं थीं ? पारो सोच नही पा रही थी। पर जाने क्यों आज इतने दिनों में पहली बार उसे उसकी सास के चेहरे पर खुद के लिए एक अलग सी ममता दिखी थी। फिर भी वो उस वक्त उनके भावों का अर्थ नही जान पायी…
   बड़ी बुआ ने बोलना जारी रखा…-”  बेटा पारो ! तुझे ऐसे अकेले ऊपर अब छोड़ा नही जाता। वैसे भी इतने बड़े कमरे में अकेले घबराहट सी होती होगी न। ऐसा करना अपना सामान कल नीचे ठाकुर माँ के कमरे में रख लेना।
   उनका कमरा बड़ा भी बहुत है। उसी में एक ओर तेरे लिए खाट भी पड़ जाएगी, और तेरी ठाकुर माँ के साथ रहने पर तुझे अकेले डर भी न लगेगा।”
  पारो का जी किया कि चिल्ला के कह दे कि मुझे अभी भी किसी से डर नही लगता। और मैं ये कमरा छोड़ कही नही जाऊंगी। लेकिन देव जाते जाते उसकी ज़बान उसकी बोली भी अपने साथ ले गया था।
  वो चुप खड़ी रही।

” क्यों बऊ दी मैं गलत कह रही हूँ क्या? इतने बड़े पलंग का और इतने बड़े कमरे का अब इसे क्या काम?वैसे भी अब इसे पलंग पर नही खाट पर सोना चाहिए। पुराने लोग तो ज़मीन पर सोने कहते थे, पर चलो हम लोग वैसे पुराने खयालों वाले नही हैं। दूसरी बात यह नीचे माँ के साथ रहेगी तो उन्हें भी आसरा हो जाएगा। रात बरात कभी पानी पीना है कभी बाथरूम जाना है आखिर कोई तो साथ रहेगा। और फिर बऊ दी तुम्हें माँ के लिए नर्स रखने की भी ज़रूरत न होगी। अरे जब घर की बहु नहला धुला सकती है तो इसी काम के लिए पैसे बहाने की क्या ज़रूरत?”

पारो ने बड़ी मुश्किल से आँख उठा कर अपनी सास को देखा उन्होंने उससे नज़रे चुरा लीं। पारो समझ गयी देव के न रहने पर शोक जताने आयी बड़ी बुआ इसी घर में अपना पक्का आवास बनाना चाह रहीं थीं। एक ही लड़का था उनका, जो पढ़ लिख नही पाया था। वो पहले भी एक बार देव से उसे अपने साथ काम सिखाने कह चुकी थी लेकिन अब तो लग रहा था वो उसे देव की दुकान पर ही बैठाने के मंसूबे लिए आयीं थीं। क्योंकि सारे काज निपटने के बाद जब उनके पतिदेव ने उनसे भी वापस चलने की बात कही तो उन्होंने कुछ दिन बाद आने की बात कह कर उन्हें अकेले ही भेज दिया था। उनके पति पोस्टमास्टर रह कर रिटायर हुए थे इसी से कुछ खास आमद थी नही पर मायके की सम्पन्नता उनकी आंखें चौन्धिया जाती थी।

  जबसे वो यहाँ आई थी कोई न कोई तिकतिक लगाये ही रहतीं। कभी उन्हें माछ में सरसों की झाल कम लगती तो कभी मिष्टी दोई में मीठा। कुल मिलाकर वो किसी से संतुष्ट नही थीं। पारो से तो कतई नही।
  अब आज वो एक तरह से पारो का कमरा हथियाने चली आयी थीं। पारो ने एक नज़र सासु माँ पर डाली उनके चेहरे पर कष्ट की हल्की सी छाया आकर गुज़र गयी, अपनी भावनाओं पर अपने गुस्से को जबरदस्ती लादती वो भी अपनी ननंद के सुरों में सुर मिलाने लगी…-“ठीक ही तो कह रहीं है दीदी। तुम इतने बड़े कमरे में घबराओगी ही,इससे अच्छा है वहीं नीचे रहोगी तो माँ को वक्त पर कुछ ज़रूरत हो तो तुम कर सकोगी। वैसे भी अब तुम्हारे जीवन में और बचा ही क्या है? “

  ” ऐसा क्यों बोल रहीं है काकी माँ! उसका पूरा जीवन बचा है और जीवन से अनमोल क्या है भला? वो भी अपने जीवन को किसी सुंदर और सार्थक कार्य में लगा सकती है। अपने जीवन को एक सुंदर आकार दे सकती हैं। आखिर भगवान ने तो हमें अकेला ही पैदा किया है,रिश्ते नाते तो हम जोड़ते चले जातें हैं। और फिर उन्हीं नातों में अपना जीवन ढूंढने लगते हैं ये सोचे बिना की उस ऊपर वाले ने हमें क्यों पैदा किया…”


  
    आनन्दी अपनी लय में बोलती चली जा रही थी, की उसकी सास ने उसे टोक दिया…-“तुम्हारे जितना दिमाग हम लोगों के पास तो है नही बऊ माँ! कनकलता दीदी घर पर सबसे बड़ी हैं, ये अपना घर छोड़ हमारे यहाँ दुख के समय में खड़ी हैं, हम सब के साथ। इनका सम्मान करना भी हमारा ही धर्म है। नीचे उनके लिए अलग से कोई कमरा नही है। माँ और बेटा दो लोग हैं। इस इतने बड़े कमरे में आराम से रह सकतें हैं। पारो का क्या है कुछ दिन ठाकुर माँ के कमरे में रह जायेगी तो क्या बिगड़ जायेगा। नीचे हम सब भी तो साथ होंगे।
   और फिर दीदी के जाने के बाद तो कमरा देव का ही है, पारो को मिल ही जायेगा।”

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  अपनी सास के सामने आनन्दी कम ही बोलती थी, लेकिन आज उसका धैर्य चूक गया था। उसे बुआ जी के वहाँ रहने से कोई परेशानी नही थी, लेकिन उनका बात-बात पर घर परिवार के मामले में दखल देना उसे अखर जाता था।
   पर अब सासु माँ की तीखी आँखों के चाबुक ने उसे एक किनारे चुप खड़ा रहने की ताकीद कर दी थी। वो चुप खड़ी पारो को देख रही थी…-” जी ठीक है, मैं रात तक अपनी जरूरत का सामना लेकर नीचे चली जाऊंगी। ” पारो ने कह तो दिया लेकिन वो उन सब से और क्या कहती कि जब वो अपनी सास तक में अपने पति को देख पा रही थी तो इस कमरे में तो कितनी अनगिनत यादें गुंथी पड़ी थी। इसी खिड़की की बल्लियों पर उसके हाथों के निशान थे, जिन्हें पकड़ कर खड़ी वो यही महसूस करती की उसका हाथ देव के हाथों पर हैं। जिस तकिए पर वो सिर रखता था, जिस चादर को वो ओढता था, जिस तौलिए को काम में लाता था, वो सारी अनमोल धरोहरों को साथ ले पारो नीचे चली गयी। ठाकुर माँ के कमरे में एक ओर उसके लिए एक पुरानी चारपाई डाल दी गयी।
   उसमें एक पतले से रुई के गद्दे पर तकिया डाले जब वो रात में लेटी तो उसकी आंखें झर झर बहने लगीं… कहाँ देव के सामने वो अकेले उस हिंडोले से पलंग पर अकेली सोती थी। उन रेशमी चादरों मखमली तकियों के बाद आज ये पतला गद्दा उतना नही चुभ रहा था जितना देव का ऐसे चला जाना।
   किसी एक व्यक्ति के चले जाने से संसार कैसा वीरान और सूना हो जाता है, पारो महसूस कर रही थी। और सोचते सोचते अचानक एक बात उसके दिमाग में आई की क्या अगर वो देव की जगह मर जाती तो देव का जीवन भी ऐसा ही कठिन हो जाता? या उसके जीवन में कुछ और तरह की बातें होतीं।
  सभी तरह की बातें सोचती वो सो गई।
       रात उसे ऐसा लगा जैसे देव की उंगलियां उस पर चल रहीं हैं। चेहरे पर से फिसलती उंगलियां गले से नीचे उतरने को थीं कि नींद में भी उसे याद आ गया कि देव तो अब है नही फिर ये कौन था। वो चौन्क कर उठ बैठी। खिड़की पर कुछ सरसराहट सी हुई और सब कुछ एकदम शांत हो गया।
  उसकी खाट खिड़की से लगी हुई थी, उसने बैठे बैठे ही बाहर झांक कर देखा, बाहर कोई नज़र नही आया। तब क्या वो सच में सपने में देव को ही महसूस कर रही थी, या फिर खिड़की से किसी ने अपना हाथ अंदर डाल रखा था?
  पर कौन हो सकता था वहाँ इस वक्त? उसके बदन में एक झुरझुरी सी दौड़ गयी… उसके बाद वो रात उसकी आँखों ही आंखों में कट गई…रात बीत गयी, सुबह हो गयी लेकिन वो रात की बात किसी से कह न सकी।

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   दिन बीत रहे थे। लाली भी कुछ दिन मायके रह कर वापस चली गयी थी। अब घर भर में दो ही लोग थे जिन्हें पारो की चिंता थी, एक आनन्दी और दूसरी ठाकुर माँ। उन्हें हमेशा पारो को देख कर यही लगता कि उसकी इस हालत की ज़िम्मेदार वो खुद हैं। ना वो देव को अपने साथ लेकर जाती और न देव के साथ ये हादसा होता।
   पर घर भर की सबसे बुज़ुर्ग होने पर भी कई बातों में उनकी भी नही चलती थी। जो नियम थे वो तो थे ही।
   आनन्दी ने दर्शन से कह कर पारो को पढ़ने के लिए किताबें दिलवानी शुरू कर दी थीं। अब दोपहर में पारो ठाकुर माँ के कमरे में एक किनारे बैठी किताबें पढ़ती रहती।
   और कभी जब दर्शन उससे किसी पढ़े गए पद की व्याख्या पूछता या उसे गलत बताता तो वो उसे सहीं कर देती।
  एक शाम वो बाहर से आते हुए ढेर सारे अमरूद ले आया। नीचे आंगन में बैठी पारो कोई काम कर रही थी कि पीछे से आकर उसने उसकी झोली में अमरूद डाल दिए। चौन्क कर दर्शन को देख पारो मुस्कुरा उठी। उसके मन के अंदर कहीं छिपी बैठी लड़की मुस्कुरा उठी। वो सारे अमरूद समेट कर रसोई की तरफ जाने लगी…-” अरे कहाँ चल दीं सारे अमरूद समेट कर? क्या हम लोगों को एक भी न दोगी? “
  दर्शन के सवाल पर वो पलट कर थम गई…-“सारे ही तुम्हारे हैं। मैं तो अंदर धोने लेकर जा रही थी। “
   ” मैं क्या जानूं? मुझे तो लगा तुम अकेली ही खा लोगी!”
   ” इतनी भुक्खड़ लगती हूँ तुम्हें”  हँस कर उसे घूरती पारो आगे बढ़ने लगी कि उसके सिर पर पीछे से एक टपली मार दर्शन सीढ़ियों पर भागता हुआ चढ़ गया, और उसकी टपली का जवाब देने आँचल से सारे अमरूद फेंक कर पारो उसके पीछे दौड़ पड़ी। बड़े दिनों बाद पारो ने जतन से जिस बावली सी लड़की को अपने भीतर छिपा रखा था बाहर आ गयी।
  ” अरे सम्भल के ! फिसल न जाना तुम दोनों। ” आनन्दी दोनो की चुलहबाज़ी देखती मुस्कुराती हुई अपने आँचल से अपना हाथ पोंछती रसोई में चली गयी, और उसकी बात पर वहीं आंगन में बैठी बुआ जी ज़हर बुझा तीर छोड़ गई…-” समय रहते इन्हें न रोका तो फिसल ही तो जाएंगे। “
   वही बैठ कर चांवल चुनती पारो की सास का जी धक से रह गया, उन्होंने साथ बैठी अपनी जेठानी की ओर देखा, उनकी अनुभवी आंखों में भी चिंता की रेखाएं नज़र आने लगीं थीं…..

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क्रमशः

aparna…..

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दिल से …..

     समाज के कायदे कौन बनाता है? कौन हैं वो समाज के ठेकेदार जिन्होंने औरतों के लिए अलग और मर्दों के लिए अलग नियम बना रखें हैं।
  हम कितना भी लिख पढ़ जाएं , कितने भी आगे निकल जाएं लेकिन अब भी बिना पति के एक औरत का जीवन उतना सुगम और सहज नही हो पाया है। दुर्भाग्यवश अगर जीवनसाथी बिछड़ जाएं या अलग हो जाएं तो इसमें किसी का कोई दोष तो नही फिर क्यों उसके साथ ऐसा सुलूक किया जाता है कि उसका दुख कम होने की जगह और बढ़ता चला जाता है।


   काश लोग फ़िज़ूल नियमों की जगह एक ही नियम प्रेम का नियम मान लें तो किसी का दुख समाप्त भले न कर सकें कुछ हद तक कम तो ज़रूर कर पाएंगे।
  
     आगे के भाग हो सकता है पढ़ने में थोड़े और तकलीफदेह हों लेकिन अगर कृष्ण दुख देते हैं तो उससे उबारने वाले भी वहीं हैं।

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  आपका सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ। आप मुझे पढ़ते हैं सराहतें हैं, दिल से शुक्रिया नवाज़िश!!!

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aparna…


 

शादी.कॉम -12

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   “पहला पहला प्यार है,,पहली पहली बार है,
     जान के भी अनजाना कैसा मेरा यार है।।”

” अबे कौन बजाया बे! बदलो ई पहला पहला प्यार को!!”

” तो का लगायें भैय्या जी।” राजा की दहाड़ सुनते ही प्रिंस लपक पड़ा ।।जिम में लोगों का आवागमन शुरु हो चुका था,ऐसे में प्रिंस वर्कआउट के लिये गाने सेलेक्ट कर रहा था।।

” अब ये भी हमी बताएँ!! तुम्हारी अकल में ना बिल्कुले पत्थर पड़े हैं प्रिंस।।यार कैसे बनिये हो तुम ,, हमरी अम्मा तो कहती हैं बनियों से जादा दिमाग किसी के पास नई होता,,पर तुम तो बिल्कुल बमपिलाट हो।।”

  प्रिंस सदा से बाँसुरी का तरफदार था,इसिलिए आजकल प्रिंस और प्रेम में  ज़रा तनातनी रहने लगी थी।।राजा भैय्या की बात सुन प्रेम चहक उठा __

” भैय्या जी आप हम ठहरे बामण के छोकरे,हमारा तो जन्म ही होता है अपने बाप की चप्पल से पिटने के लिये।।
     ऑफ़िस में बाऊजी को उनका बॉस चमकाया आके हमको धुन देंगे,,गांव में पड़ोसी से जमीन का चिल्ला चिल्ली हुआ आके हमको सून्त देंगे,घर में बहन की शादी नही लग रही पिटाई हमारी होगी,और तो और अम्मा ने लौकी बना दी तब भी हमी धरे जातें  हैं ।।।
    ई तो पुन्यात्मा हैं बनिया घर में पैदा हुआ है, जैसें इनके बाप दादा सोना सहलाते हैं,ऐसे ही फूल की छड़ी से अपना लड़का बच्चा को भी सुधारते हैं, तो भैय्या जी इनको किसी का डर है ये नई,काहे दिमाग दौड़ाएंगे।।”

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” अच्छा बे तुमको बहुत बड़ी बड़ी बात सूझ रही हैं,, देख रहें हैं आजकल कुछ ज्यादा ही टर्रा रये हो।”

प्रिंस राजा की घुड़की सुन चुपचाप वहाँ से सटक लिया,।। उसे असल में भैय्या जी के दिल का हाल मालूम नही था,उसने जाकर दूसरा रोमैंटिक ट्रैक बजा दिया__
             ‘ सदियाँ समा गईं इस एक पल में,दिखने लगा सुकून दुनिया की हलचल में ….’

  तभी हल्के से दरवाजा खुला,हमेशा सलवार और कुर्ती पे चोटी बना के आने वाली बांसुरी के सुर आज कुछ बदले से थे।।
     ट्रैक पैंट पे टी शर्ट पहनी बांसुरी ने खुले बालों की उँची सी पोनीटेल बना रखी थी।।

   बांसुरी के प्रवेश करते ही सब उसकी तरफ देखने लगे…राजा भैय्या ने सिर्फ एक उड़ती नज़र डाली और वापस अपने रजिस्टर में मिलाए हुए नामों को वापस मिलाने लगे।।प्रिंस बांसुरी के इस परिवर्तन पे अति प्रसन्न हुआ और उसे बधाई देने कूद कर उस तक पहुंच गया,थोड़ी देर के लिये प्रेम भी चकरा गया।।

” वाह बंसी तुम तो बहुत-बहुत बहुत इस्मार्ट लग रही हो,।”
  बाँसुरी मुस्कुरा कर राजा की तरफ देखने लगी,इस उम्मीद से कि राजा भी शायद उसके नवेले रूप पे कोई टिप्पणी देगा,पर राजा ने सर उठा कर भी नही देखा।।बांसुरी चुपचाप अपने ट्रेड मिल पे चली गई ।
    लगभग 10 मिनट बीत जाने पर भी जब राजा एक बार भी बांसुरी का हाल चाल पूछने नही आया तो बांसुरी ने वहीं से हांक लगाई__
     ” आज क्या स्पीड रखना है हमें,,कुछ बताओगे भी या ऐसे ही बस भागते रहें ।”

  6km/hrs पे आकर राजा ने ट्रेड मिल सेट किया और वापस जाने लगा।।उसे ऐसे वापस जाते देख बांसुरी ने प्रिंस से इशारे से पूछा कि ‘ आज क्या हो गया राजा को?”जैसे इशारे मे उसने पूछा वैसे कंधे ऊपर कर प्रिंस ने जवाब दे दिया कि हमे नही पता।

  ” कब तक चुप बैठें अब तो कुछ है बोलना,
     कुछ तुम बोलो कुछ हम बोलें ओ ढोलना।।”

जैसे ही गाने के बोल जिम में गूंजे राजा ने सर उठा के प्रिंस को देखा,और बस उतने ही मे__” बदल रहें हैं भैय्या जी,बस अभी बदले।।”
  राजा की घूरती आंखों को देख प्रिंस हडबडी में म्युसिक सिस्टम तक भागा,पर तभी बांसुरी के बोल गूंजे__
         ” ए प्रिंस रुको!! काहे बदल रहे,हमें अच्छा लगता है ये गाना।।”

  ” ऊ भैय्या जी को नही ना पसंद इसिलिए बदले दे रहे।”

” अबे हम कब बोले तुमको बदलने।” राजा की घुड़की से घबराया प्रिंस मुहँ लटकाये बाहर निकल गया,बांसुरी राजा के पास आ कर बैठ गई ।।

” क्या हुआ राजा?? कुछ मूड ऑफ़ लग रहा तुम्हारा, घर पे कुछ हुआ क्या।।”

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” इस बार भैय्या जी के बाऊ जी ने कसम ले ली है कि अबकी बार अगर राजा भैय्या पास नही हुए तो इनकी हत्या कर देंगे या खुद चूहा मार दवा पी के आत्महत्या कर लेंगे।।”लल्लन बोला

बांसुरी ने आंखे तरेर के लल्लन को देखा फिर पूरी सहानुभूति से राजा को निहारने लगी।।

” अरे इसमें इत्ता परेशान होने की क्या बात,इस बार  राजा सिर्फ पास नही होंगे बल्कि बोर्ड एग्ज़ाम टॉप भी करेंगे,,हम पर भरोसा रखो।।”
  बांसुरी के ऐसा बोलते ही प्रेम भी उछल पड़ा

” हम भी यही कह रहे,भैय्या जी क्यों परेशान हो रहे, अरे पास हो गये तो ठीक वर्ना हम पूरे शहर से चूहा मार दवा खरीद कर यहाँ से बहुत दूर ले जाकर फेंक आयेंगे।।जब बाऊजी को दवा मिलेगा ही नही तो का खा कर मरेंगे।।

राजा ने खा जाने वाली नजरों से प्रेम को देखा और उठ कर अपने में ऑफिस में चल दिया,उसके पीछे पीछे बाँसुरी भी भागी,जाते जाते प्रिंस को दो कप चाय लाने कहती गई ।।

” हमें तो बताओ हुआ क्या है राजा?? कल तो बड़े खुश लग रहे थे, हनुमान जी ने ऐसा क्या मन्त्र फूंक दिया कान मे जो उदासे बैठे हो।”

” काहे परेशान कर रही हो,हमने कहा ना कोई बात नही।।”

” जब कोई बात नही ,तो हमें देखा क्यों नही,??  , हमारी नई ड्रेस पे कोई टीका टिप्पणी नही,,देखो तुम्हारे जैसे हमने भी रीबॉक के जूते पहने हैं, सुबह से तुम्हारे आगे पीछे घूम रहे,पर तुम तो जैसे इस दुनिया में हो ही नही,जाने कहाँ विचर रहे हो।।”

” थोड़ा सर मे दर्द था,और कुछ नही!! बस इसिलिए थोड़े चुप चाप बैठे थे।वैसे अच्छी लग रही हो तुम।।

” थैंक यू!! अब बताओ कि हमारी ट्रेनिंग कबसे शुरु कर रहे,,भास्कर सर के बारे में बताया था ना तुम्हें ।।”

” देखो ट्रेनिंग का जहां तक बात है,हमने लड़की पटाने में कोई पी एच डी तो की नही है,जो हम तुम्हें कुछ सीखा सके बता सकें।।तुम तो हमसे जादा समझदार हो।”

” अरे बाबा कम से कम यही बता दो कि तुम किसी लड़की में क्या देख कर इंप्रेस होते हो।।”

” अब देखो ,जहां तक हमारा सवाल है,हमें ना सभ्य संस्कारी लड़कियाँ अच्छी लगती हैं,सीधी साधी,  भोली सी,,अपने बड़ों का बात मानने वाली,कम बोलने वाली,झगड़ा फसाद ना करने वाली।।”

” बस बस हम समझ गये,,मतलब बिल्कुल हमारे अपोजिट लड़की तुम्हें पसंद है,है ना??”

” अरे नही बाबा!! वो मतलब नही है हमारा,,पर देखो एक बात सच्ची बताएँ,लड़कों को ना बहुत ही जादा ज्ञानी लड़की नही पसंद आती,उन्हें वही भाती है जिसके सामने वो जादा ज्ञानी दिखे,,वो लड़को की इस आदत को का कहते हैं …… अरे वो बोलते हैं ना का ….

” ईगो!!! मेल ईगो!! यही कहते हैं,यही बताना चाह रहे ना।।”

” अब देखो सच्ची बात बताये तो तुम बुरा मान गई,अब यही थोड़ा घुमा फिरा के बोलते तो खुश हो जातीं।।अच्छा सुनो तुम कुछ बातों का ध्यान रखना अपने सर के सामने फिर देखना कैसे तुम्हारा जादू चलता है,,, पहला तो उनकी क्लास मे कभी उचक उचक के जवाब मत बताना , नही उन्हें लगेगा इसे पढ़ाने का कोनो ज़रूरत ही नही,,दूसरा जो सवाल बन रहा उसे भी उनसे पूछना क्योंकि इससे उन्हे अन्दर से खुशी मिलेगी कि तुम उनसे कम हो,और वो तुमसे कहीं जादा बुद्धिमान हैं।।
     धीरे से दोस्ती हो जाये,तब उनका हर बात का ध्यान रखना,जैसे हमारा रखती थी,कि कौन सी आंटी फीस भरी है कौन सी नही।”
  ये बोल कर राजा हंसने लगा,बांसुरी भी।।

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” हर छोटी छोटी बात उनसे पूछ कर करना ,भले तुम करो अपने मन की पर सामने वाले को ये लगे कि तुम उनके हिसाब से सब कर रही हो,,बस यही दो चार बातें आजमा लो,तुम्हारा काम हो जायेगा।”

” काम हो जायेगा तो ऐसे बोल रहे जैसे तुम कोई गुरू घंटाल हो,,एक घन्टे में मोहिनी,सौतन से छुटकारा,प्रेमी को वश मे करें,वाले विज्ञापन के बाबा जी की तरह।।”
  बाँसुरी की खिलखिलाने की आवाज़ सुन कर निश्चिंत हो प्रिंस चाय लिये अन्दर आया।।

” बताओ अब आये हो चाय लेकर,अब तो हमारा जाने का समय हो गया।।” बान्सूरी के ऐसा बोलते ही राजा ने  भी खबर ली

“ये पहले गौ माता के पास जाकर दूध निकलवातें हैं,उसके बाद ऊ दूध लिये चमन के पास लाते हैं तब जाके कहीं चाय बनती है,,क्यों हो प्रभु,सही बोले ना हम।।”

” अरे का भईया जी,कतना तारीफ करेंगे हमारा,  लिजिये चाय लिजिये आप दुनो,हम अपनी भी यहीं ले आये।।

अभी तीनों ने अपनी अपनी चाय पीनी शुरु की थी कि जिम में बाहर से किसी ने राजा भैय्या के नाम की पुकार लगा दी,प्रिंस हम देखते हैं बोलकर बाहर दौड़ा, जितनी द्रुत गति से बाहर गया था वैसी ही त्वरित गति से अन्दर भागा__
    ” भैय्या जी ऊ भौजाई आई हैं ।।”
 
  ” हमरी तो शादी ही नही हुई,कहाँ से तुम्हारी भौजाई पैदा हो गई  बे!! कुछ भी बकते हो।

  ” अरे भैय्या जी बड़की भौजाई आई हैं,उनके साथ एक और कोनो लड़की है।।”

राजा भैय्या ने अपना एक हाथ हल्के से अपने माथे पर मारा_ ” अरे यार !! हम भूल गये रहे,,आज भाभी की बहन को स्टेशन लेने जाना था……राजा भैय्या की बात पूरी भी नही हो पाई थी कि दरवाज़ा खोल रुपा भाभी कमर पर हाथ टिकाये खड़ी हो गई।

” काहे लल्ला जी,जब जाना ही नही रहा तो हमे पहले काहे नई बता दिये,,बेचारी रेखा स्टेसन में खड़े खड़े आधा घंटा बेट करी,तब बिचारी हमें फ़ोन करी और हम इसे लेने गये।।”

” काहे इत्ती अनपढ़ है कि अकेले रिक्सा में घर नही आ सकती।।” प्रेम ने धीरे से फुलजड़ी छोड़ी और प्रेम  प्रिंस बांसुरी खिलखिला पड़े

” का बोले तुम प्रेम” ।

” कुछ नही भौजी!! हम बोले तनिक बैठ जाओ,हम समोसा मँगा देते हैं,ए प्रिंस लगाओ यार लल्लन को फ़ोन लगाओ , कहाँ है आजकल??”

प्रेम की इस बात का सभी ने एक स्वर में समर्थन किया।।
रेखा राजा में अपने होने वाले पति को देख रही थी, इसलिये उसके चेहरे पर लज्जा का अभिनय था, शर्म की लुनायी थी।।

राजा अपने मन में त्रस्त था,उसके मन में कुछ समय पहले खिला प्रेम का फूल हवा पानी के अभाव में अकेला इधर उधर डोल रहा था,उसे जिस माली के स्नेह सिंचन की आवश्यकता थी,वो माली अवकाश ग्रहण कर दूसरे की बगिया संवारने में खुद को व्यस्त किये था।।

  बांसुरी रेखा को देख रही थी जो  लगातार राजा को ताड़ रही थी,,बांसुरी राजा भैय्या के चार्म से अपरिचित थी,ऐसा नही था।।वो आये दिन ही जिम में आने वाली अनोखी अलबेली वारान्गनाओं के लटकों झटकों का कारण भली प्रकार समझती थी,पर रेखा की दृष्टी उसे चुभ गई ।।

“कहाँ है भई तुम्हारा समोसा?? इत्ती देर लगा दी,ए प्रेम ऊ लल्लन को फोन घुमाओ की तली मिर्ची भी हमारे लिये अलग से लेता आयेगा।।”

रूपा की इस बात पे राजा ने फ़ोन लगाया__” भाभी औ कुछ मँगा दें,,जलेबी खाओगी??”

” जो मँगाना है जल्दी मँगा दो,,हम तो रेखा को लेके घर जा रहे थे,यही बोली कि राजा हमे लेने कैसे नही आया,चलो दीदी देखे क्या कर रहा ,इसिलिए आ गये,बस चाय पी के निकल जायेंगे हम,,पूरा काम बिखरा पड़ा है,,हम ना करें तो इस घर का एक पत्ता ना हिले,,बहू नही नौकरानी हैं हम….

” अरे का भौजी,नौकरानी नही आप रानी हैं रानी!! कभी रूप देखी हैं अपना,,एकदम किसी रियासत की महारानी सी लगती हैं ।”प्रिंस की बात पर रूपा का बिगड़ा मूड संभल गया

” ऊ तो हम खानदानी रईस जो ठहरे।”भाभी की इस बात को सुन राजा को हँसी आ गई,,वो कई बार अपनी माँ की बड़बड़ इस बाबत सुन चुका था,जब कभी घर पे सास बहु की महाभारत छिड़ती और रूपा अपने कोप भवन में प्रस्थान कर जाती तब पीछे से सासु माँ का रूपा के खानदान का जो बखान शुरु होता ” हूंह बड़ी आई रईस !! जैसे हम नई जानती कि इनके बाप मिट्टी का तेल ( क्रूड ऑयल) प्लाण्ट से चुरा चुरा के बेच बाच के तो रुपया जोड़े,किसके किसके हाथ पांव जोड़ के बकालत का डिग्री खरीदे,अब चार पैसा घर में आ गया तो बडे जमींदार बन रहे।” अम्मा की ये बात याद करके राजा मुस्कुरा रहा था कि रेखा ने उससे सवाल कर दिया_

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” ये लड़की कौन है राजा?? जो आपके साथ खड़ी है?” किसी को ऐसे रूखे सवाल की अपेक्षा नही थी

” मैं बाँसुरी हूँ,यहाँ राजा का जिम जॉइन किया हुआ है।।” बांसुरी को पता था कि राजा अपने पढ़ने वाली बात किसी को नही बताना चाहता था।।

” और हमारी टीचर जी भी,क्यों ठीक है ना बांसुरी ।”

राजा मुस्कुरा कर बांसुरी को देखने लगा,,पर उसका इस तरह किसी और लड़की को देख कर मुस्कुराना दोनो बहनों को अन्दर तक भस्म कर गया।।अभी रूपा कुछ कहने ही जा रही थी कि दरवाजा खोल कर लल्लन समोसों की खुशबू से हवा को महकाते अन्दर आया।।

  अन्दर आते ही सारा सामान सामने रखे टेबल पर रख उसने जैसे ही सर ऊपर किया उसकी नज़र रेखा पर पड़ी __” अरे शोना तुम?”

” रोहित तुम?? तुम यहाँ कैसे?? रेखा ने लल्लन से सवाल किया,दोनो के सवाल सुन रूपा ने रेखा को घूर के देखा__” तुम दोनो एक दूजे को कैसे जानते हो,और ये तुम्हारा शोना नाम कब से पड़ गया रेखा।”

रूपा भाभी के अलावा वहाँ बैठे सभी लोगों को सब समझ आ चुका था,,प्रिंस ने धीरे से चुटकी ली__

” तो ई हैं हमरे लल्लन की शोना बाबु।””प्रिंस चुटकी ले और प्रेम चुप बैठा रहे,ये असम्भव था,अगला वार उसका हुआ_
           ” जी हाँ और दढ़ियल लल्लन हैं इनके बेबी।।।”

” तुम दोनो का खुसर फुसर कर रहे हो हैं??” हम देख रहे ,लल्ला जी के जिम में आजकल यारी दोस्ती की महफिल जादा सज रही,,ए रेखा जल्दी जल्दी ई समोसा ठूसो और घर चलो,घर पहुंच के जानेंगे तुमसे सब ।।”

बाँसुरी सर झुकाये अपनी हँसी रोकने के प्रयास में थी,कि राजा ने सबसे पहले उसी के सामने समोसे बढ़ा दिये।

” पक्का बताओ हम खा लें,जब से तुमने मना किया , तबसे कचौड़ी और समोसा छुआ तक नही,, तीन महीने हो गये।।” हँसते हुए बांसुरी ने कहा।।

” बहुत कहा मानती हो लल्ला जी का,,ऐसा भी क्या हो गया।” रूपा के इस सवाल का जवाब दिया प्रिंस ने

” अरे भौजी ,,बांसुरी तो कम ही बात मानती है भैय्या जी की। पर भैय्या जी तो हर काम बांसुरी के मन का ही करते हैं, हम पे भरोसा ना हो तो पूछ लो भैय्या जी से।।” प्रिंस के बौड़मपने पे प्रेम ज़ोर से हंसने लगा और उसने आगे बढ़ कर बात संभाल ली__

” अरे आप लोग पहिले समोसा तो खाईये,ऊ भी चीख चीख कर कह रहा,हमरे ठन्डे होने से पहले हमे खा लो।”

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          रूपा रेखा को लेकर जब जिम की सीढिय़ां उतरने लगी,तब उसे कार में बैठा कर रेखा दो मिनट में आई कह कर वापस जिम में घुस गई __

” रोहित सुनो!! तुम से कुछ बहुत ज़रूरी बात करनी है,घर से फ़ोन नही कर पायेंगे,दीदी हमारे सर पे सवार रहेगी,,, तुम शाम को यहीं जिम मे हमसे मिलना,,हम किसी बहाने यहाँ आ जायेंगे,समझे।।”

” हाँ हम आ जायेंगे,शाम को 5 बजे जिम खुलेगा,  आज प्रिंस से चाबी हम ले जायेंगे,तुम समय से आ जाना बस।।”

रेखा लल्लन को बाय बोल कर बाहर निकल गई, हल्की सी मुस्कान के साथ जैसे ही लल्लन पलटा सांमने राजा और बाकी लोगों को खड़ा देख हडबडा गया।।

” तो ई है तुम्हरी नैकी जिसके लिये ‘ चदरिया झिनी रे झिनी ‘ सुना सुना के हमारे कान फाड़ दिये तुम?”

लल्लन नीचे सिर किये अपने बालों पे हाथ फिराता शर्माता खड़ा रहा।।

सभी मुस्कुराने हंसने खिलखिलाने लगे तभी राजा को जैसे कुछ याद आया_ ” अबे लल्लन तुम तो सूर्यवंसी लिखते हो ना।।अबे गज़ब कर दिये गुरू,,अब फिर पिंकी औ रतन वाला किस्सा दोहराना पड़ेगा।।”

” तो क्या हुआ,तुम हो ना सबके तारणहार!! तुम्हारे रहते किसी का बुरा हो सकता है,,,कभी कभी तो हमे लगता है,अगर तुम नही होते तो इन सब का क्या होता।।” बांसुरी की बात सुन राजा के मुहँ से निकल गया__” और तुम्हारा??”

” हाँ सही कह रहे,हमारा भी!! हम भी तो तुम्हारे कारण ही ऐसे दिखने लगे।।बाँसुरी खिल्खिलाती हुई वहाँ से बाहर चली गई,और बाकी सारे के सारे लल्लन को घसीटते हुए उसपे लात घूंसे चलाते हुए उसकी राम कथा सुनने लगे।।

क्रमशः

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aparna..

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शादी.कॉम-11

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   पिंकी और रतन की सगाई संपन्न हुई।।।सारे लोगों को व्यस्तता का जो बहाना मिला था चूक गया,, सारे रस भरे दिन चूक गये,रसोइये ने अपने साजो सामान को समेटा ,तगडा नेग लिया और चलता बना,एक एक कर मेहमानो ने भी जाना शुरु कर दिया।।
  पर ऐसे मौकों पे कुछ ऐसे मेहमान भी आते हैं,जो आते ही लम्बा टिकने के लिये हैं,,ऐसी ही एक मेहमान थी राजा की अम्मा की चचेरी बहन शन्नो मौसी।।।
     शन्नो मौसी का वहाँ टिकने का मुख्य उददेश्य था,राजा भैय्या की शादी।। एक तो कान्यकुब्ज ब्राम्हण परिवारों में मिलने वाला ऊँचा दहेज उसपे उनकी सहेली की ननंद की भतीजी जिसके फूफा स्वयं जज महोदय!!! अब ऐसा जानदार रिश्ता कोई हाथ से निकलने दे सकता है क्या,,कम से कम शन्नो मौसी जैसी व्यवहार कुशला और सामाजिक महिला तो बिल्कुल नही।।
   राजा की अम्मा पहले ही रूपा की बहन रेखा को लेकर परेशान थी,अब शन्नो जिज्जी एक नया फसाद लिये खड़ी थी,,पर इन सबसे बेखबर राजा भैय्या अपने में मगन थे।।।

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  राजा भईया का सारा दिन जिम मे पसीना बहाने बहवाने में निकल जाता और रात थोड़ा बहुत किताबें खोलने में ।।
    राजा भैय्या ऐसे जीव थे जिन्हें ज्यादा सोचने की आदत नही थी,जो बात उन्हें एक बार में समझ नही आती,उसे वो दुबारा पलट के भी नही देखते।। ऐसा नही था कि वो दिमाग से पैदल थे,पर बात ये थी कि उन्होनें आज तक ये नही जाना था कि दिमाग संभाल कर तिजोरी में रखने की वस्तु नही बल्कि दिल खोल कर खर्च करने की चीज़ है,और जितना ही उसे खर्चोगे उतनी ही बढेगी।।पर उनकी इस खूबी को बांसुरी ने पकड़ लिया।।।
   बांसुरी इतने दिनों की राजा की संगत में ये बात समझ गई कि राजा को पढ़ाई बोल कर पढ़ाने पर उसका डब्बा गोल ही होना है,इसिलिए उसने राजा को अलग ढंग से पढ़ाना शुरु कर दिया,,इतिहास में उसने सिलसिलेवार सन लिख कर उन उन काल में हुई घटनाओं दुर्घटनाओं की कहानी सी तैयार की और जिम में वर्क आउट करते हुए वो राजा को सतत उन कहानियों का स्मरण और पाठ कराती,जल्दी ही राजा  को सारा सब कुछ कंठस्थ होने लगा,कब प्रथम महायुद्ध हुआ,किसके बीच हुआ,,पहली सभ्यता का नाम,गान्धी जी का कब स्वदेश आगमन हुआ से लेकर कब गोलमेज सम्मेलन हुआ,और कब हमे आज़ादी मिली,कब हमारा संविधान तैयार हुआ।।
    जब एक बार किसी इन्सान को दिमागी मेहनत करने की आदत हो जाती है तो इससे इतर अन्य कोई कार्य रुचिकर नही लगता।।ये सब पढ़ते हुए राजा को ऐसी रूचि उत्पन्न हुई कि अब उसकी दिमागी खुराक के लिये बारहवीं के सिलेबस की रसद कम पड़ने लगी,अब राजा खोज खोज कर पढ़ने योग्य अयोग्य सभी कुछ पढ़ने लगा।।।

” हमको तो लगने लगा है,हम इत्ता पढ़ डाले हैं कि अगर हम कौन बनेगा करोड़पति खेलने गये तो हम पूरा एक करोड़ एके बार में जीत डालेंगे ऊ भी बिना लाईफ लाइन के,,क्यों गुरू जी।।”

राजा ने बांसुरी से हँसके पूछा,पर जवाब मिला प्रेम से…..

” बिल्कुल सही बोले भईया जी,औ ई बसुरीया इत्ता बजन कम कर डाली है की अगर मिस इंडिया बनने गई तो अकेली ही सब जीत डालेगी,ऊ का का होता है ना मिस वर्ड,मिस ब्रम्हाण्ड औ जाने का का।।”

” हमारे लिये काहे इतना कड़वे हो प्रेम,,हमने सुना था लड़के लड़कों से जलतें हैं,लड़कियाँ लड़कियों से,पर तुम तो हमी से जले कटे बैठे रहते हो,,दिमाग को थोड़ा ठंडा रखा करो।।”

बाँसुरी ऐसा बोल कर वहाँ से उठ गई,और दिनों की तरह उसके चेहरे पे वो उल्लास नही दिखा राजा को, जिसके कारण राजा भी उठ कर उसके पीछे पीछे चला आया।।

” क्या हुआ बांसुरी? कोई परेसानी है?? आज तुम थोड़ा चिंतित दुखी परेसान लग रही हो।।”

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” समझ गये कि हम परेशान लग रहे पर तुमको तीन पर्यायवाची बोलने की क्या ज़रूरत??आजकल हर जगह अपनी परीक्षा की तैयारी में ही भिडे रहते हो।।” ऐसा बोल कर बांसुरी मुस्कुरा पड़ी और राजा शरमा के नीचे देखने लगा।।

” बांसुरी हम बहुत दिनों से एक बात सोच रहे थे,तुम हमारी सबसे करीबी दोस्त बन गई हो,तुमने हमें इतना अच्छे से पढ़ाया है कि हमको अब पढ़ाई लिखाई अच्छी लगने लगी है।” बांसुरी खड़ी मुस्कुराती रही
” हम और कुछ तो दे नही सकते,,आज तुमको एक छोटा सा पार्टी देना चाहतें हैं ।””

” अरे अभी पास तो हो जाओ,,फिर हम तुमसे पार्टी भी ले लेंगे।।”

” हमारे पास होने की पार्टी तो तुम दोगी हमे,देखो ई दू  तीन महीना में तुम भी दुबला गई और हम भी पढ़ लिख लिये तो अब हमको लगता है पार्टी तो देना ही पड़ेगा।।”

बांसुरी के मन की उदासी राजा के पकड़ में नही आई, अभी वो दोनो खड़े बात कर ही रहे थे कि डॉ रानी वहाँ चली आई ।।

” कैसे हो राजा,क्या चल रहा आजकल!! बहुत दिन से तुम दिखे नही तो हमनें सोचा हम ही मिल आते हैं तुमसे ।।”
उन दोनों को बातों में उलझा छोड़ बाँसुरी वहां से निकल गई ,,रानी और राजा भईया वहीं जिम की सीढियों पर बैठ गये,,रानी दुनिया भर की तमाम बातें राजा को बताती रही,बीच बीच में ” सुन रहे हो ना”  ” अच्छा बताओ मैने अभी अभी क्या कहा था” जैसे क़्विज़ कॉंटेस्ट भी खेलती रही पर बाँसुरी का इस तरह चुपचाप चले जाना राजा को बुरी तरह खलने लगा,वो दूर तक बाँसुरी को जाते हुए देखता रहा,, बार बार राजा का मन हुआ कि जाकर बाँसुरी को रोक ले और पूछ ले कि ऐसे बिना कुछ बोले कैसे चली गई ,पर वक्त की नजाकत देखते हुए वो चुप चाप बैठा रानी की बातों को सुनता रहा।।

   लोग कहतें हैं पहला प्यार कभी नही भूलता,अब लोग कहतें हैं तो ऐसा होता ही होगा पर लोगों के साथ ही,, क्योंकि राजा के साथ ऐसा कुछ नही हुआ।।
     राजा ने जितनी शिद्दत से रानी से अपनी अल्हड़ सी उम्र में प्यार किया था,उतनी ही शिद्दत से आज वो उस प्यार को भूल बैठा।।रानी में आज भी कोई कमी नही थी,खूबसूरत तो पहले ही थी अब डॉक्टरी की पढाई के आत्मविश्वास ने चेहरे को एक अलग लुनायी से रंग दिया था,बावजूद इसके अब राजा को रानी में सिर्फ एक अच्छी सच्ची दोस्त ही नज़र आ रही थी।।
     प्यार मोहब्बत ऐसा एहसास होता है कि जो करता है और जिससे करता है,उसे बताने और जताने की ज़रूरत नही रह जाती,,और जब वही प्यार करने वाला प्यार नही करता है,तब तो लगता है जैसे सारा संसार चीख चीख कर आपको ये बताने पे अमादा है कि ‘ अब ये तुझसे प्यार नही करता’।।
रानी भी राजा की भावनाओं को समझ चुकी थी,पर उसे कोई शिकायत ना थी,या शिकायत करने कि अवधि वो पार कर चुकी थी।।अपने मन की दुविधा को खुद में ही समेटे उसने बहुत सारी बातें राजा से करी,ये जानते हुए भी कि राजा उसके पास बैठा हो कर भी बांसुरी के साथ उसके घर तक चला गया है।

” राजा एक बात पूछें तुमसे?अरे हमे सुन भी रहे हो या नही?? माना की बहुत पतली हो गई है तुम्हारी मुटकि पर अभी भी हमसे तो मोटी ही है।”  रानी अपनी ही बात पर हंसने लगी,राजा चौंक कर उसे देखने लगा__ ” क्या कहा तुमने रानी,अच्छा सुनो हमे कुछ काम से घर जाना है,चलो तुम्हें तुम्हारे घर उतार देंगे।।”

” जी मेहरबानी आप मुझे मेरे घर तक लिफ्ट देंगे,,एक बात पूछना चाहतें हैं आपसे राजा बाबु।”

” हाँ पूछो।” अपनी गाड़ी स्टार्ट करते हुए राजा ने कहा

” बुरा मत मान जाना,,हम कुछ दिन से जो नोटिस किये वही पूछ रहे हैं,,तुम्हें बाँसुरी कैसी लगती है।।”

” कैसी लगती है मतलब?? ठीके है,मेहनती है,होशियार है,जो ठान लेती है कर के रहती है,,अब देखो ,,जब जिम मे आई रही 68 किलो की रही ,और अभी 60 की हुई गई,,बहुत मेहनती है,एकदम जी जान से जुट जाती है,,पढ़ाई में तो पुछो मत,हमें सोचो हमार जैसे लठ को आदमी बना डाली( राजा भैय्या की नजरों में जिसे शिक्षा का मह्त्व पता हो और जो शिक्षित हो वही असली पुरूष संज्ञा है)
राजा भैय्या की बात को बीच में ही काट कर रानी ने कहना शुरु किया__

” हाँ समझ गये!! बस करो अब तारीफ ,,तो मतलब हम जो सोच रहे वो सच है।”

” अब हमे क्या पता तुम क्या सोच रही??”

” ये कि तुम्हें बांसुरी अच्छी लगने लगी है।।है ना?”

” अच्छी है तो अच्छी लगेगी ही??”

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रानी मुस्कुराने लगी ” हम्म अच्छी तो है,पर तुम्हें कुछ ज्यादा ही अच्छी लगने लगी है।।”

जब किसी की चोरी पकड़ी जाती है तो उस वक्त उस इन्सान का सारा प्रयास इसी ओर रहता है कि किसी तरह उसकी बेगुनाही साबित हो जाये,ऐसा ही कुछ राजा के साथ हुआ!!! अभी वो बेचारे स्वयं अपने मन की थाह नही पा पाये थे उन्हें स्वयं अपने हृदय के अन्दर बहने वाले इस प्रेमझरने का स्त्रोत पता नही था कि उस झरने को पहचान कर लोग बाग उसका रसास्वादन करने लगे।।।राजा भैय्या सोच में पड़ गये कि शाम को बांसुरी से मिलने जाना चाहिये या नही, उन्हें उस समय यही उचित लगा कि मिलने नही जाना ही ठीक रहेगा।।वो बार बार अपने मन को तरह तरह से यही समझाने में लगे रहे कि रानी को कुछ गलतफहमी हुई है,और उनके मन में बाँसुरी को लेकर कोई विकार नही है।।

  वो पूरा दिन बस यही सोचते निकल गया कि अगर मिलने चला गया तो सब क्या सोचेंगे,और अगर मिलने नही गया तो बांसुरी क्या सोचेगी!! आखिर बांसुरी सब पर भारी पड़ी ।।
    तरह तरह के विचारों को सोचते सोचते अंतत: राजा ने यही सोचा कि जब उनका मन साफ है स्वच्छ है बांसुरी से मिलने जाने मे कोई परहेज नही।।ऐसा सोचने के बाद मन फूल सा हल्का हो गया,सुबह से सोच सोच के जो पीड़ा के बादल राजा ने अपने दिमाग मे जमा कर लिये थे,सब एकाएक बरस गये,और उजली चांदनी छिटक गई ।।

  अपने आप को भली तरह से सजा संवार कर राजा बाबु बाँसुरी से मिलने जाने निकले,ये प्रथम अनुभव था जब राजा अपनी किसी महिला मित्र से मिलने जा रहा था,इसके पहले तो हमेशा अपने चेलों के साथ घूमने के लिये कभी कोई तैयारी नही लगी पर आज कुछ विशेष यत्न से सारी साज संवार की गई थी,,मन ही मन अपने आप पे खुश होते राजा भईया निकल ही रहे थे कि भाभी जी का स्वर सुनाई पड़ा

” किधर को चली सवारी लल्ला जी?? बड़े बन ठन के निकल रहे हैं ।”
   ‘काली बिल्ली रास्ता काट गई ‘ वैसे भैय्या जी ये सब बातों को नही मानते थे,उन्हें अपनी भाभी पर स्नेह भी था पर उनकी इस कदर की टॉन्ट वाली बातों पे अरुचि भी थी।।

” कुछ नही भाभी बस मन्दिर तक जा रहे थे।।”

” आज कौन से मन्दिर जा रहे लल्ला जी??”
भाभी तो एकदम ही पीछे पड गई,अब बेचारे राजा भैय्या क्या बोलते

” बड़े हनुमान जा रहे,,आप चलेंगी??” आप चलेंगी कुछ इस ढंग से पूछा गया कि इस सवाल का जवाब आपको ना में ही देना है कहीं गलती से हाँ कह दिया तो भईया जी कहीं गाड़ी सहित आपको गंगा जी में ना डूबा आयें।।

” ना ना आप ही जाओ,,बस आते बखत उधर जो सेंतराम हलवाई है ना उसकी चाट हमारे लिये लेते आना,और उसे बोलना छोले कम डालेगा,ज्यादा गीला ना करे,टिकिया को अलग से बाँधेगा नही क्या होता है ना टिकिया गल जाती है सारी की सारी।”

” और कुछ भाभी।।”

” नही बस इत्ता ही याद से ले आना,बहुत है।”

अब राजा बाबु को जाना था रॉयल पैलेस होटल और बड़े हनुमान पड़ते थे घड़ी चौक से दाहिना जाकर,बेचारे झूठ बोल कर बुरा फंसे।।चाट तो वो अपने अनुचरों से भी मँगा लेते पर हनुमान जी का नाम ले दिया,अब मन्दिर नही गये तो भगवान नाराज और होटल टाईम से नही पहुँचे तो बांसुरी ।।

उन्होनें बांसुरी को फ़ोन लगाया,,रिंग बजने पे फ़ोन उठाया उधर से बांसुरी की अम्मा ने__ ” हेलो कौन बोल रा।”

बेचारे राजा भईया पहली बार किसी लड़की के नम्बर पे फ़ोन किये वो भी उसकी माँ उठा ली,अब का करे का ना करें की स्थिति थी।।

” नमस्ते !! बांसुरी है क्या?”
” ऊ तो अभिचे कहीं निकल गई!! बोल के गई है आने में थोड़ा देरी हो जायेगा।।तुम कौन बोल रये बेटा…..इतने में फ़ोन कट गया,राजा भईया को बड़ा गुस्सा आया,अरे इतनी भी क्या हड़बड़ी,,थोड़ा देर में नही निकल सकती थी।।
  हर बात पे बांसुरी की राय लेने की ऐसी आदत हो गई की अब इस आड़े वक्त में क्या करें,राजा भैय्या को सूझ ही नही रहा था।।उन्होनें अपनी गाड़ी उठाई और चल दिये।।

कुछ 20 मिनट बाद राजा भैय्या रॉयल पैलेस होटल की पार्किंग में थे।।गाड़ी खड़े करते हुए जाने क्यों एक अजीब सी बेचैनी उन्हें घेरने लगी।।आज तक किसी काम को करने के पहले दुबारा ना सोचने वाले राजा की हालत खराब थी,इतना तो उसने अपने सारे जीवन मे नही सोचा जितना आज अकेले एक दिन मे सोच लिया।खैर अपने आप को मजबूत कर अन्दर बढ़ ही रहे थे कि__” सर क्या आप अपनी पहली डेट पर आये हैं,अगर हाँ तो हमारे पास आपके लिये कुछ है”

अचानक से दरबान के साथ खड़े होटल मैनेजर के इस सवाल पर राजा भईया घबड़ा गये,एकाएक उनसे बोल ना फूटा__”सर अगर ये आपकी फ़र्स्ट डेट है तो ये रहा आपके लिये एक गुलाब !! हमारी ओर से!! आप अपनी गर्लफ्रैंड को ये दीजिये।।

” पर भैय्या तुम काहे दे रहे फ़्री में गुलाब??”

” सर पॉलिसी है हमारी,आज की तारीख पे हमारे साहब की शादी हुई थी तो आज के दिन जो कपल डेट पे आते हैं उन्हें हम गुलाब और कोम्प्लिमेन्ट्री ड्रिंक और स्टार्टर खिलाते हैं ।”

राजा का ये प्रथम अनुभव था,आज तक अपने चेलों के साथ सेंतराम की कचौड़ियाँ पेली थी या टिक्की।। पीने पिलाने का ऐसा था कि कभी एक बार प्रेम कहीं  से पी पिला के लौटा तो उसकी लटपटाती जिव्हा और उठने वाली कड़वी गन्ध से भी राजा नही समझ पाया तब प्रिंस ने ही सहायता की” अरे ई प्रेम कहीं से पी के आ रहा है भैय्या जी” बस इतना सुनना था कि राजा ने उसे 2 थप्पड़ लगा दिये__
               ” अरे बस बियरे तो पिये हैं,ऊ हार्ड ड्रिंक थोड़ी होता है भैय्या जी,,पुराने सब दोस्त मिल गये रहे जबरिया पिला दिये,औ जो थोड़ी बहुत चढ़ी रही ऊ आपका थप्पड़ उतार दिया।।”
  हालाँकि बाद में राजा ने प्रेम को ताकीद करी की जिम में जहां महिलायें भी आती हैं,वहाँ इस तरह पी कर आना वर्जित है,माफ कर दिया।।
   
  अब आज इस तरह मैनेजर से डाइरेक्ट फ़्री ड्रिंक की बात सुन भैय्या जी ज़रा झेंप गये और सिर्फ गुलाब लिये अन्दर चल दिये।।

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   अन्दर बड़े से हॉल में हल्की-सी रोशनी में हल्का धीमा सा कर्णप्रिय संगीत गूँज रहा था।।रूम फ्रेशनर की खुशबू सारे माहौल को खुशनुमा कर रही थी, ऐसे में भईया जी चारों तरफ नज़र दौड़ाते बांसुरी को ढूँढ रहे थे।।
     राजा को बांसुरी दिख गई,,,वो एक बार फिर अजीब सी परेशानी में घिरने लगा,आज सुबह तक जिसे सिर्फ एक छोटी सी पार्टी समझ कर देना चाहता था, वो रानी से बात होने के बाद से एक छोटी सी डेट में बदल गई ।।कितना भी नादान हो पर राजा डेट का मतलब तो समझता ही था।।
   
” कब आईं बांसुरी?? हमको थोड़ा ट्रैफिक के कारण देर हो गया।”

आज सब कुछ बदला सा लग रहा था राजा को।।
रानी की बातों का असर था या मैनेजर की बातों का, या उस रोमैंटिक माहौल का असर आज बांसुरी वाकई बाकी दिनों से अलग लग रही थी।।
बहुत सुन्दर तो बांसुरी को नही कहा जा सकता था पर वो स्मार्ट थी,अपने आप को सलीके से रखना उसे आता था,अब आठ किलो वजन कम करने के बाद उसका आत्मविश्वास और चमक गया था।।
कुल मिलाकर आज के ज़माने में कही जाने वाली स्मार्ट प्रेजेंटेबल लड़की थी।।

” अरे तुम खड़े क्यों हो राजा बैठो ना।”

” क्या कर रही थी अब तक ” अपनी कुर्सी पर बैठते हुए राजा ने सवाल किया

” कुछ नही ,बस मेन्यू देख रहे थे कि तुम्हारे लायक क्या हेल्दी खाने को मिल सकता है।”

” अरे हमारे चक्कर में ना पड़ो,जो तुम्हें पसंद हो वो मँगा लो।।” राजा के ऐसा बोलते ही बांसुरी मुस्कुरा पड़ी

” अरे राजा अब हमें भी तुम्हारी तरह मूँग और चना ही भाने लगा है,पता है एक दिन तो अम्मा बेचारी रो पड़ी,बुआ से बोलती हैं” लगता है हमार बांसुरी को जिन ऊन पकड़ लिया है,आज कल खाने को देखती भी नही,सिर्फ फलाहार करे है छोरी जिज्जी।” मुझे तो ऐसी हँसी आई,मैनें कहा अम्मा उस जिन्न का एक नाम भी है ” राजा”

बांसुरी तो ऐसा बोल कर फिर हंसने लगी पर राजा बेचारा शरमा गया।।

” अच्छा राजा सुनो तुमसे एक बात पूछना चाहते हैं “

” हाँ पूछो”
” सच तो बोलोगे ना??”
धड़कते दिल से राजा ने कहा” बिल्कुल सच बोलेंगे।”
उसे लगा जाने क्या पूछने वाली है।असल में तो राजा को खुद ही समझ नही आया था,कि इन कुछ महिनों के साथ में कब बांसुरी उसके मन में रात दिन बजने लगी,हर काम उस से पूछ पूछ कर करने की ऐसी आदत हुई कि कई बार जिम के काम से भी कहीं जाना हो तो पहले बांसुरी का अप्रूवल लगने लगा।।राजा तो नही समझा कि ये क्या है लेकिन उसके आस पास के लोगों जैसे प्रेम रानी यहाँ तक की पिंकी को भी समझ आने लगा कि राजा को बांसुरी भा गई है।।

” हम कैसे दिखते हैं,देखो एकदम सच बोलना ,तुम्हें तुम्हारे भगवान की कसम।”

भगवान की कसम सुनते ही भैय्या जी को बड़े हनुमान याद आ गये,दोनों हाथ कान से लगा कर मन ही मन भगवान से माफी मांग कर राजा ने कहा__

” हम सच बोलें तो तुम बहुत ही प्यारी दिखती हो,मासूम सी ।। और होशियार तो बहुतै दिखती हो।।”
  अभी राजा अपनी बात पूरा भी नही किया था कि वेटर उनका ऑर्डर ले कर आ गया।।

” अरे कॉफ़ी मंगाए हो राजा??”

” हाँ बांसुरी ऐसे होटल में चाय नही पी जाती, इसिलिए हम कॉफ़ी मँगा लिये,जल्दी से कॉफ़ी पी लो,फिर तुम्हे किसी से मिलवाने ले कर जाना है।।”

दोनो कॉफ़ी पीकर निकलने लगे तब बांसुरी ने राजा को टेबल पर गलती से भूले हुए गुलाब की याद दिलाई,,” किसके लिये लाये हो गुलाब”

” बताते हैं!! पहले हमारे साथ चलो।।”

बांसुरी को सिर्फ एक गुलाब देने की भी हिम्मत राजा नही जुटा पाया,दोनो उसकी रॉयल एनफील्ड में बैठ कर बड़े हनुमान मन्दिर को निकल चले।।रास्ते भर इधर उधर की बातें बताती बांसुरी ने अपने गणित के प्रोफेसर भास्कर सर की ढ़ेर सारी बातें राजा को बताईं,और बताते बताते अंत में धीरे से अपने मन में उपजी प्यार की भावना को भी राजा को बता दिया__
         ” देखो राजा जाने अनजाने तुम हमारे बहुत ही ज्यादा अच्छे दोस्त बन गये हो!! निरमा से तो अब मिलना भी कम हो पाता है,उसे बताएंगे भी तो हमारी बात समझेगी नही,और ना ही कोई मदद करेगी,क्योंकि वो हमसे इतना प्यार करती है कि उसे हममे कोई कमी नज़र ही नही आती।। तुम भी हमारे बहुत सच्चे दोस्त बन गये हो,हो ना।।”

बहुत धीरे से राजा ने कहा” हाँ हैं,बोलो क्या मदद चाहिये।”

” पहली बार जब भास्कर सर से मिले तभी हमें सर बहुत भा गये थे,,फिर उनका गणित पढ़ाने का स्टायल!!ऐसा पढाते हैं राजा की पूछो मत!! नये नये समीकरण खुद तैय्यार कर देते हैं ।।तुम हमारी इतनी मदद बस कर दो कि वो भी हमारी तरफ ध्यान देने लगे,,मतलब समझ रहे हो,हम क्या कर रहे।।

बिल्कुल रुआंसा होकर राजा ने कहा” नही समझे”

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” अरे बुद्धू!! तुम खुद लड़के हो,तुम हमें बता सकते हो ना कि लड़कों को क्या पसंद होता है,मतलब कैसी लडकियों से बात करना पसंद है ….अब और कितना खुल के बताएँ ।।”

” हम्म समझ गये!! कर देंगे तुम्हारी मदद।।”

” थैंक यू राजा ,हमे पता था,तुम बहुत अच्छे हो हमारी मदद ज़रूर करोगे,,अच्छा ये तो बताया ही नही तुमने कि ये गुलाब किसके लिये रखे हो।।”

” हनुमान जी के लिये,,वही चढाना है हमें,सुनो बांसुरी तुम्हें घर जाने की देरी हो रही तो तुम्हे घड़ी चौक पे उतार देते हैं!! हमको हनुमान मन्दिर जाना है।।”

” नही ऐसी कोई देर नही हो रही ,तुम्हारे साथ ही तो हैं,आज हमारे पतले होने की पार्टी जो है,पर तुम तो बस कॉफ़ी में निपटा दिये।।”

” अरे तुम वो भास्कर भास्कर किये जा रही थी तो हमे कुछ सूझा ही नही,बस कॉफ़ी मँगा लिये।।

” चलो कोई बात नही!! अभी हमे चार पांच किलो और कम करना है,उसके बाद जी भर के खायेंगे, अच्छा सुनो !! तुम मिलवाने किससे वाले हो।।’

” अरे किसी से नही!! ऐसे ही कह दिये रहे!! हमको मन्दिर जाना था।।हम बचपन से जब भी परेशान होते थे या बहुत खुश होते थे तब बड़े हनुमान मन्दिर ही जाया करते थे,उन्हीं से अपना सारा सुख दुख साझा करते रहे हैं,आज भी तुम्हें वहीं ले जाने की सोचे थे।”

” अरे वाह!! चलो हम भी मिल लेंगे अपने दोस्त के बाल सखा से।। पर सुनो भूल मत जाना राजा, पटला होने में इतनी मदद किये हो अब इस मामले में भी थोड़ी मदद कर दो,और किसी से कहना नही,समझे।।”

” हाँ मेरी माँ किसी से नही कहेंगे। और कल से तुम्हारी एक हफ्ते की एक और ट्रेनिंग शुरु कर देंगे,,उसके बाद वो भास्कर की क्या औकात तुम्हारे सामने।।भास्कर को मारो गोली सलमान खान भी पट जायेगा।।”

” अरे अरे अरे गोली क्यों मार रहे हो भई !! भास्कर सर ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ,रही बात सलमान की तो हमें सलमान खान पसंद ही नही….

बातों ही बातों में बड़े हनुमान मन्दिर पहुंच कर दोनों ने दर्शन किये,और सेंतराम के यहाँ से आलू टिक्की खा कर और पैक करा कर दोनो अपने अपने घर वापस आ गये।।

क्रमशः

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aparna..

Once in a blue moon!!!

Once in a blue moon – रिश्ता.कॉम

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    डिनर की प्लेट इन्हें थमा कर मैं वापस रसोई की ओर मुड़ गयी, रसोई साफ़ करने और बरतन धोने।।…..
 
     हम औरतें काम भी सारा ऐसे करती हैं जैसे कोई जंग लड़ रही हों, हाथ काम निपटाते हैं और दिमाग में युद्ध चलता रहता है, कभी सामने वाली पड़ोसन की लाल लपटें मारती नयी साड़ी, कभी सास बहू का ना देख पाया सिरियल, कभी सखी सहेलियों का फॉरेन ट्रिप तो कभी किसी खास मौके पर मायके ना जाने पाने की पीड़ा….

    लेकिन अभी तो वक्त ऐसा चल रहा कि हर औरत के दिमाग में एक ही शमशीर लहरा रही है__ हे प्रभु और कितना काम करवाओगे?? कब खुलेगा लॉकडाऊन? कब दर्शन देगी वो जिसे देखने की राह तकते तकते आंखें पथराने लगी हैं।। इतना ढ़ेर सारा काम तो अपनी आज तक की जिंदगी में कुल जमा नही किया होगा जितना इन एक महिने में कर लिया, भगवान जाने ये कोरोना हम औरतों से किस जनम का बदला ले रहा है??

    यही सब सोचते हुए मैं भी काम में लगी रहती हूँ, लेकिन इसके साथ ही पतिदेव को आराम से सोफे पर पैर पसारे हाथ में थामे रिमोट के साथ मटरगश्ती करते देख अन्दर से सुलग जाती हूँ __ इन्हीं का जीवन सही है, कोई फेर बदल नही हुआ, उल्टा वर्क फ्रॉम होम के नाम पर जल्दी उठने और भागादौड़ी से राहत मिल गयी, कोई मदद नही करेंगे बस सोफे पर लेटे लेटे ऑर्डर पास करतें जायेंगे__” मैडम समोसे खाये बहुत दिन हो गये ना? तुम बनाती भी अच्छा हो, आज शाम ट्राई कर लो फिर!!

  कभी कहेंगे __” सुनो इतना बड़ा सा तरबूज़ ले आया हूँ, सड़ा कर फेंक मत देना, ना खा पाओ तो सुबह शाम मुझे जूस बना कर दे देना”

   अब झाड़ू पोन्छा बरतन कपड़े से कुछ राहत मिले तब तो कोई एक्स्ट्रा काम करे, उस पर इनकी फ़रमाइशें…..

बेचारे फ़रमाइश एक दिन करतें हैं और उसे पूरी कर मैं सात दिन तक उसको पूरा करने की पीड़ा में सुलगती हूँ …..

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  ऐसी ही किसी बिल्कुल ही फ़िज़ूल सी इनकी इच्छा पर मेरे दिल दिमाग में द्वंद चल रहा था और मैं समेट कर सारे धोने लायक बरतन सिंक में जमा कर चुकी थी कि  साहब अपनी प्लेट थामे रसोई में चले आये__ “पनीर पसन्दा बनाने में तुम्हारा कोई जवाब नही, बहुत यमी था, अरे इतने बरतन , लाओ आज मैं साफ़ कर देता हूँ “

   पहला तो खाने की तारीफ कर दी और दूजा मेरे हाथ से धोने के लिये थामी कटोरी छीन ली…..

   ” जाओ जाओ तुम भी खाना खा लो, मैं ये सब निपटाता हूँ ।”

   हाय कहाँ संभालू इतना प्यार……. मैंने प्यार भरे गुस्से से इन्हें देखा और कटोरी वापस ले ली__

  ” आप भी ना!!! जाओ आप न्यूज़ देखो मैं ये ज़रा से तो बरतन हैं , निपटा कर आती हूँ “
   एक तरह से धकिया कर मैने इन्हें रसोई से बाहर कर दिया….. ये काउच पे मैं रसोई में , कुछ देर पहले दिमाग में जो ज्वालामुखी फटने को तैयार था वहाँ मनभावन सावन की बूंदे बरस कर उसे शांत कर चुकी थी, अपने मोबाईल पर अपने पसंदीदा गानों को सेट कर मैंने चलाया और मुस्कुराते हुए काम पर लगा गयी__

   ” मेरे यारा तेरे सदके इश्क सीखा,
         मैं तो आई जग तज के इश्क सीखा,
               जब यार करे परवाह मेरी…..”

  मधुर रोमांटिक गानों के साथ बरतन धोने का मज़ा ही अलग है, बरतन धो कर पोंछ कर करीने से जमा कर , सारा सब कुछ यथावत कर अपनी चमकीली रसोई की नज़र उतार ली।

       चेहरे पर एक मुस्कान चली आयी, काम कुछ किया नही बस मुझे रिझा कर सब करवा लिया…… साहब भी ना पक्के मैनेजर हैं , इन्हें अच्छे से पता है किस लेबर से कब और कैसे काम  निकलवाना है , अब प्राईवेट सेक्टर के बंदे लेबर से कम तो होते नही और उनके सर पर बैठे मैनेजर ठेकेदार!! खैर …..

मैंने  अपनी प्लेट लगाने के लिये केसरोल खोला कि देखा रोटी तो है ही नही__उस समय ये सोच कर नही सेंकी थी कि काम निपटा कर गरमा गरम फुल्के सेंक लूंगी, पर अब मन खट्टा सा हो रहा था, एक ही तो रोटी खानी है , सेंकू या रहने दूँ, दूध ही पीकर सो जाऊंगी…..दिमाग का ज्वालामुखी वापस प्रस्फ़ुटित होने जा ही रहा था कि साहब वापस रसोई में चले आये__
      ”  लाओ ये बेलन दो मेरे हाथ में ” मैं इनकी बात समझ पाती कि तब तक ये मेरे हाथों से बेलन ले चुके थे….

” अब तुम जाओ मैडम!! जाकर सोफे पर आराम फर्माओ, मैं तुम्हारी थाली परोस कर लाता हूँ ।”
    मेरे कुछ कहने से पहले एक तरह से जबर्दस्ती धकिया के इन्होंने मुझे अपने आसन पर बैठा दिया और खुद गुनगुनाते हुए रसोई की ओर चल पड़े

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  ” रोज़ तो तुम्हारा खाना ठंडा हो जाता है, आज मेरे हाथ से गरमा गरम फुल्के खा ही लो।”

  ” पर सुनो एक ही बनाना!!”

  ” क्यों?? आज के लिये ये कैलरी काउंटींग छोड़ो, एक की जगह तीन रोटियाँ ना खा ली तो मेरा नाम बदल देना।”

   कुछ इनकी रसीली बातें और कुछ गरम स्वाद भरा खाना , मैं सच थोड़ा ज्यादा ही खा गयी, चेहरे पर बिल्कुल वही संतुष्टी थी जो दिन भर थक हार के काम से लौटे मजदूर के हाथ में रोटी होने से होती है…..

    पर दिल के आगे एक दिमाग भी है, जिसने तुरंत सोचना शुरु कर दिया था, पर उसी समय मैंने मन ही मन एक छोटी सी कसम ले ली कि ऐसी शानदार थाली परोसने के बदले में पतिदेव ने किचन स्लैब और गैस चूल्हे का जो सत्यानाश किया होगा चुपचाप बिना किसी हील हुज्जत के झेल लूंगी, एक बार फिर सफाई कर लूंगी लेकिन इनके इतने ढ़ेर सारे प्यार के बदले कोई ज़हर नही उगलूंगी…..
     अपनी कसम मन ही मन दुहराती प्लेट रखने रसोई में आयी की मेरी आंखे फटी की फटी रह गईं…….

…..ये क्या मेरे स्वामी तो लिक्विड सोप स्प्रे कर कर के स्लैब को रगड़ रगड़ कर साफ़ कर चुके थे, सारा काम समेट कर गुनगुनाते हुए वो हाथ धो रहे थे, पूरे 20 सैकेण्ड से और मैं उन्हें देखती सोच रहीं थी__

   हाय मैं वारी जांवा , शायद इसे ही कहतें हैं once in a blue moon……….

aparna…..

शादी.कॉम-10

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……..

   युवराज के सकुशल घर वापसी से घर पे फिर एक बार उत्सव सा माहौल बन गया।।वैसे भी शादी ब्याह का घर त्योहारों का घर लगता है,,पन्द्रह दिन बाद होने वाली सगाई की तैय्यारियों में पूरा अवस्थी परिवार डूब गया,माहौल बिल्कुल दशहरा दिवाली जैसा हो गया।।
        हर कोई किसी ना किसी काम मे व्यस्त था,प्रेम प्रिंस जैसे लोग  सिर्फ व्यस्तता का दिखावा भी कर रहे थे।।घर की औरतें रोज किसी ना किसी वस्तु को खरीदने बाज़ार जा रही थी,फिर भी ज़रूरी सामान की सूची में कोई ना कोई कमी रह ही जाती थी।।।सगाई के तुरंत बाद ही वर को तिलक चढाना था ,उसकी भी तैय्यारियाँ साथ ही चल रही थी, कहीं नारियल पे सोने का पत्तर चढ़ाया जा रहा था कही,छोटी छोटी सोने और चांदी की सुपारियां बनवाई जा रही थी,,चांदी के पान के पत्तों पर अवस्थी सरनेम उकेरा जा रहा था।।
       राधेश्याम अपने छोटे भाई के साथ बैठे 500,100और 50के अलग अलग लिफाफे तैयार करा रहे थे,अरे भैय्या सभी को समधि के बराबर का लिफाफा थोड़े ही पकड़ा देंगे।।
    
           उनकी श्रीमती जी के तो काम की फेहरिस्त कम ही नही पड़ रही थी,,बेचारी रसोइये को देने के लिये रसद निकालने भण्डार में जाती ,और वहाँ फैले आलू प्याज को देख उन्हे याद आ जाता कि आलू तो अभी और दस बारह किलो मंगाने पड़ेंगे,मिज़ाज़ ये हो गया था कि बेचारी एक काम हाथ मे लेती उसे पूरा किये बिना ही दूसरे में भिड़ जाती,,आखिर घर भर की इकलौती बिटिया की सगाई थी,, अच्छा हुआ समय रहते ही उन्होनें बडियां तोड़ ली थी ,और पापड़ अचार बना कर रख छोड़े थे,क्योंकि जैसे समधि हडबडी मचा रहे थे,उससे उन्हें लग रहा था कहीं तिलक के दिन ही शादी की तारीख भी ना निकाल दें।।
     
      रूपा को जितना काम करना आता था,उससे अधिक दिखाना आता था,,वो किसी भी बड़े बुज़ुर्ग के आते ही अपने पल्लू को कमर पे कस कर इधर से उधर दौड़ चुटकियों में ऐसा माहौल बना जाती जैसे अब तक वही काम में जुटी थी।।रसोइये की तरफ वैसे तो उसका ध्यान ना रहता पर जब देखती सास आस पास से गुज़र रही तो हाथ हिला हिला कर उसे उपदेश देना शुरु कर देती “क्यों जी महाराज किलो भर घी का तो आपने मोमन ही डाल दिया,,अब आपकी कचौड़ियां खस्ता होंगी कद्दू,,ज़रा और मैदा गून्थिये,हमारी मम्मी हमको सिखाई थी कि मोमन इतना पड़े जे हाथ से लड्डू बंध जाये,,पर आपका तो यहाँ मैदा कम घी घी बस हुआ पड़ा है,,और बालूशाही के लिये मैदा अलग गुन्थीयो उसके लिये हम दही भिजा देंगे,,और एक बात सुन लो बूंदी मोटी ना छान देना,,कोई नही खाता यहाँ सब को मोतीचूर ही भावे है।।”
     कनखियों से जब देख लेती की सासु जी निकल गई हैं तो वापस अपने साज शृँगार में लग जाती, सगाई से ठीक 2दिन पहले उसकी फुलझडी सी बहन भी आने वाली थी,इसिलिए रूपा का उत्साह अपने चरम पे था।।

    पुरूष बाहर के कामों में व्यस्त थे,,इस सब के बीच बांसुरी की तरकीब के अनुसार रतन को युवराज भैय्या के साथ कर दिया गया था।।
   युवराज जिस किसी काम से बाहर जाता ,रतन को भी साथ ले जाता।।स्वभाव से अन्तर्मुखी रतन अधिकतर चुप ही रहता,जहां आवश्यकता हो वहाँ कम बोलता और जहां आवश्यकता ना हो बिल्कुल ही नही बोलता,,पर हाँ जब बोलता तो अपनी बुद्धिदीप्त बातों से युवराज को प्रभावित कर जाता।।
     रतन असल मे बुद्धिमान था उसके स्वभाव में छल कपट जैसी बातों का सर्वथा अभाव था,सब कुछ जानते हुए भी उसने एक बार भी युवराज को जान बूझ कर प्रभावित करने का कोई प्रयास नही किया,,,लेकिन सरस्वती के भक्त बुद्धि के अनन्य उपासक युवराज ने असली हीरा पहचान ही लिया।।

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   एक एक कर दिन बीतते गये, सगाई के ठीक 2दिन पहले युवराज राजा और रतन अँगूठी खरीदने गये,,दुकान पर बैठे तीनो अलग अलग तरह की अँगूठीयाँ देख रहे थे तभी युवराज ने कहा__
“मैं सोचता हूँ हीरे की अँगूठी लेना सही रहेगा,, आजकल तो हीरे का ही चलन है,लोग पसंद भी करते हैं,क्यों राजा ठीक है।।

  “बिल्कुल सही बात भैय्या ,,आपको जो सही लगे,हमरा तो ई सबमें दिमाग कम चलता है।।”

   “दिमाग तो चलता है भाई,तुम चलाना नही चाहते हो,,बस अपनी पहलवानी मे खुश रहते हो,,बात ये है।।।पर हम ये भी सोच रहे कि कहीं लड़का और उसके घर वालों को पसंद नही आयी तो।।”

  राजा ने पूछा”काहे पसंद नही आयेगी भैय्या,आखिर आप पसंद किये हैं,,पसंद तो आबे पड़ी ।”

  “अरे मेरे छोटे !!! तुम हमे इतना मानते हो कि हम जो कह दे तुम्हारे लिये पत्थर की लकीर है,पर वो लोग हमारे होने वाले समधि हैं,बेटा हो सकता है उनको हीरा ना पसंद आये,हो सकता है वो लोग ये सोचे कि सोने के जितनी हीरे की रीसेल वैल्यू नही है।।मतलब दुबारा बेचने पर कम कीमत मिलेगी, क्यों रतन सही कहा ना हमने।।”

  “भैय्या अगर लड़का और उसके घर वाले सगाई की अँगूठी का मोल देखने लगे और ये देखने लगे की उसकी रीसेल वैल्यू क्या है,तो फिर ऐसे लोगों को देने के पहले आपको कुछ भी सोचने की क्या ज़रूरत,????,मेरे खयाल से कुछ चीज़ों की कीमत नही आंकी जा सकती है,,वो कोई मूर्ख ही होगा जो अपनी सगाई की अँगूठी को बेचेगा ,तो रीसेल का सवाल ही नही उठता,वैसे मेरा भी इन सब बातों में दिमाग कम चलता है,,जैसा आपको सही लगे ,वही कीजिए।।”

  “लाख रुपये की बात कही मित्र,,बस यही सोच होनी चाहिये,,अच्छा ज़रा इसे पहन के देखो,,क्योंकि लड़का तुम्हारे डील डौल का ही है,,अगर तुम्हे सही आई अँगूठी तो उसे भी आ ही जायेगी।।”
    ऐसा कह कर युवराज ने अँगूठी रतन को पहना दी ,अँगूठी बिल्कुल सही नाप की आई,,रतन और राजा को वहीं छोड़ युवराज लेड़ीस काऊंटर की ओर चला गया।।

   सारा सामान लिये तीनो घर निकल गये,,घर की औरतों के लिये भी कुछ नये गहने युवराज ने ले लिये थे,पिंकी के लिये कुछ लेना हो तो रूपा के लिये उससे डबल नही भी लिया तो उतना तो लेना ज़रूरी ही था,वर्ना वो एक अलग बवाल मचा देती।।

    सगाई के एक दिन पहले शाम के समय अवस्थी जी सारी तैय्यारियों का जायजा ले रहे थे।।
    पूरे घर को गेंदें की फूल मालाओं से सजा दिया गया था,,छत पर  और बाहर बगीचे में चमकीला शामियाना  टांग दिया गया था,,बिजली के छोटे छोटे लट्टू और रंगीन रोशनियों से घर जगमगा गया था, सब तरफ लोंगो की आवाजाही थी,,मेहमानों से घर पटा पड़ा था,मऊ वाली बुआ जी सपरिवार पधार चुकी थी,,खंडवा वाले मामाजी रात तक पहुंचने वाले थे,,किसी की खातिर में कोई कमी ना रह जाये यही विचार करते राधेश्याम ऊपर नीचे सब जगह का जायजा ले रहे थे,,तभी प्रेम वहाँ से जल्दी जल्दी बाहर की ओर जाता दिखा ,जिसे रोक के उन्होनें एक नये काम का ऑर्डर थमा दिया ,,बेचारा अंकल जी की बात मान उनका काम करने निकल चला,,काम निपटा के वापसी में उसे दो घन्टे से अधिक हो गया,,तभी उसका फ़ोन बजा__

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“कहाँ??”भैय्या जी के इस सवाल पर प्रेम हडबडाते हुए बोला “बस भैय्या जी निकल रहे।”

“अबे ऊ जब पत्ता गोदाम से निकल घर पहुंच जायेगा तब जायोगे उठाने ,याद तो है ना का करना है।।”

“हाँ भैय्या जी !! हम बस प्रिंस को लिये निकल ही रहे,,आप निश्चिंत रहे,आज कोनो गड़बड़ नही होने देंगे।।”

प्रेम का आज एक बार फिर उस दिन जैसे ही जी घबड़ाने लगा,फिर प्रिंस के समझाईश से और थम्स अप पी कर उसको थोड़ा राहत हुआ और वो अपनी हीरो हौंडा में प्रिंस को बैठाए बीड़ी पत्ता गोदाम की ओर निकल लिया।।

  इधर रतन और युवराज कुछ विशेष तैय्यारियाँ करने के बाद युवराज के कमरे में बैठे चाय पी रहे थे।।
     रतन को जाने क्यों इस तरह छल कपट से पिंकी का हाथ पाना शुरु से ही रूच नही रहा था,पर सहज में ही किसी की अवज्ञा करने का स्वभाव ना होने के कारण वो इतने दिनो तटस्थ बना रहा,पर आज जब इस सारे नाटक का अन्तिम सीन फिल्माया जाना था,अपनी पूरी ताकत और हिम्मत सहेज के उसने युवराज के सामने अपना मन खोल कर रख दिया, शुरु से लेकर अंत तक का सारा किस्सा उसने युवराज को कह सुनाया,इसी सब में अपनी जाति और कुल को भी बताना वो नही भूला,सारी बातें बताते अंत मे उसकी आंखों में अपने होने वाले अपमान और पिंकी का हाथ ना मिल पाने की असमर्थता से आंसू छलक आये,जिन्हें उसने युवराज से छिपाकर पोंछ लिया लेकिन इतना छिपाने पर भी युवराज ने वो देख लिया जो उससे छिपाने की कोशिश की गई थी,,रतन सब बता चुका तब धीरे से उठ के वहाँ से जाने को हुआ,पर तभी युवराज की कड़कती आवाज़ उसके कानों में पड़ी ।।
 
“ये अच्छा न्याय है आपका कलेक्टर महोदय!!!खुद गलती की ,गलती मान भी ली और बिना सज़ा सुने ही चल दिये ।।”

“अरे नही भैय्या ऐसी कोई बात नही,,आप जो सज़ा देंगे मंजूर है।।”

राजा भैय्या इन सब बातों से अंजान कुछ गुनगुनाते हुए वहाँ पहुँचे और रतन को कंधो से पकड़ कर झिंझोड दिया”का हो कलेक्टर साहब आज बड़े चिंतित नज़र आ रहे,,का बात है।”

युवराज राजा को गहरी नजरों से घूर रहा था इस बात पे राजा का कोई ध्यान नही गया,उसका पूरा ध्यान अपने फ़ोन पे था,,क्योंकि जैसे ही प्रिंस और प्रेम का फ़ोन आयेगा कि लड़के को उठा लिया गया है,वैसे ही राजा को घर से निकलना था,पर तय समय से लगभग बीस मिनट ऊपर हो चुका था और प्रेम का कोई फ़ोन नही आया था,,आखिर थक हार के राजा ने खुद ही फ़ोन लगाने की सोची__

“का हुआ राजा?? किसी के फ़ोन का इन्तजार कर रहे हो ,लगता है।।”

“नही भैय्या,ऐसा तो कोई बात नही।।”

“तो फ़ोन को काहे घूर रहे बार बार,,,दीपिका पादुकोण का स्क्रीन सेवर रखे हो का।”युवराज के ऐसा कहते ही लजा के राजा ने फ़ोन नीचे रख दिया तभी राजा का फ़ोन बज उठा__

“हाँ बोलो” राजा के फ़ोन उठाने से पहले युवराज ने फ़ोन लपक लिया

“भैय्या जी ऊ लफंडर तो वहाँ मिला नही,अब का करे,कहाँ जाये उसे उठाने।।”

“कौन नही मिला बे ??”युवराज की ललकार सुन के प्रेम घबरा गया और फ़ोन प्रिंस को पकड़ा दिया ,,प्रिंस ने सोचा प्रेम राजा भैय्या से डर गया,उसने सोचा कौन सा इतने दूर से चपत लगा पायेंगे तो बिना डरे सविस्तार सारा प्रकरण कह सुनाया__”भैय्या जी हम लोग टाईम से पहुंच गये थे पर ऊ ससुर हमरे पहुँचने के पहले ही खिसक लिया ,,अब का करे भैय्या जी,,जैसन आपकी आज्ञा हो।।”

“दोनो के दोनो इसी वक्त घर आ जाओ,हम दंडा लेकर तैय्यार खड़े हैं तुम दोनो की पूजा करने।” फ़ोन काट कर युवराज राजा की तरफ मुखातिब हुआ।।

“ये का बचपना लगा रखे हो राजा?? तुमको का लगता है,ये सब कर के कोई फायदा होना है, और तुम्हारे वो जाहिल पण्टर किसी काम के हैं भी,अरे इतना सब नाटक करने की जगह एक बार हम से कहना तो था,,अब जब दोनों परिवार का सब ठीक ठाक हो गया तब तुम लोगों ने ये पर्पंच लगा दिया, अब जो होगा कल देखा जायेगा,अभी तुम जाओ रतन को उसके घर छोड़ आओ,,पर रतन कल बिना भूले सबेरे से चले आना,रातों रात कहीं भागने की जुर्रत की तो फेर हम दिखा देंगे की इस शहर का असल कलेक्टर कौन है।।”

राजा को अचानक से इतनी जटिल बात पल्ले नही पड़ी,उसे तब तक पता भी नही था कि रतन सब कुछ भईया को बता चुका है,,वो चुपचाप सर झुकाये रतन के साथ बाहर निकल गया।।

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  वो रात सभी की आंखों ही आंखों में कट गई,राधेश्याम जी और उनकी धर्मपत्नी को अति उत्साह के कारण नींद नही थी,तो वही राजा और बांसुरी को प्लान फेल होने के कारण,,दुसरी तरफ पिंकी और रतन ने अपने दुर्भाग्यपूर्ण भविश्य के खाके को सोच सोच कर अपनी नींद को अपना दुश्मन बना लिया था,,,घर भर में कोई था जो चैन से सो रहा था ,तो वो था युवराज हालांकी रूपा अपनी बहन के ना आ पाने के कारण जली कटी काफी देर तक जागती रही पर जागरण के कारण सुबह चेहरे पर दिखने वाले आलस्य को दूर भगाने वो सो गई ।।

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      सुबह से तो किसी को सांस लेने की भी फुरसत नही थी ,पन्द्रह दिन की तैयारियों के परीक्षाफल का समय था,लड़के वाले सगाई के लिये ठीक 11बजे घर आने वाले थे,,सगाई का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भोजन था और उसके बाद वर पक्ष की विदाई……उसके बाद शाम को वधु पक्ष को तिलक चढ़ाने जाना था शाम लगभग आठ बजे।।
   पूरे दिन का कार्यक्रम पूर्वनियोजित था,इसमे किसी प्रकार की कोई शंका शुबहा नही था।।

सब यंत्रवत अपने अपने कार्य में जुटे थे कि राधेश्याम जी का फ़ोन घनघना उठा__

“जी नमस्कार!! हाँ हाँ!! जी सब तैयार है,बस आप लोगों की प्रतीक्षा है,,क्या ??? ऐसा कैसे हो सकता है?? नही नही आप …..अभी राधेश्याम अपनी बात पूरी भी नही कर पाये कि दुसरी तरफ से फ़ोन कट गया।।
     राधेश्याम अपना सर पकड़ कर वहीं सोफे पर निढ़ाल हो गये,युवराज और राजा दौडे चले आये ,,तुरंत पानी मँगा कर उन्हें पिलाया गया,, श्रीमती जी ने पूछा __”किसका फ़ोन था ,क्या हो गया,,सब ठीक तो है ना??”

“लड़के वाले अभी नही आ पायेंगे,उन्हें कुछ आवश्यक काम आ पड़ा है,,इसीसे सगाई टालने की बात कह रहे हैं ।।”

जितने धीमे शब्दों में राधेश्याम जी ने कहा,उतने ही तेज़ आवाज़ में एक ज़ोर की हाय बोल कर श्रीमती जी भी दूसरे सोफे पर निढ़ाल हो गई ।।

  राजा गहन आश्चर्य से अपने पिता को देखने लगा

“क्या कहा बाऊजी,ऊ लोग सगाई तोड़ रहे।”

“पगला गये हो का राजा?? सगाई तोड़ नही रहे ,बाद में करने बोल रहे,,पर हम ई सोच रहे कि अब सब नातेदारों को का मुहँ दिखाएँगे ,सब तो सगाईये के नाम पे इकट्ठा हुए हैं,,हे भगवान का परीक्षा ले रहे हो हमारी।।”

“बाऊजी हम कुछ कहना चाहतें हैं आपसे।”युवराज ने इशारे से सब को बाहर जाने कहा और कमरे के किवाड़ बन्द कर दिये।।

कमरे के भीतर युवराज अपने पिता और चाचा से कुछ गहरी परिचर्चा में लग गया।।

इधर पूरे घर में सन्नाटा छाया था,,सुबह से शुभ अवसरों पर जो एक मीठी तान सी गूंजती है,बिना किसी शहनाई के भी ,वो अचानक एक नीरव स्तब्धता में बदल गई ।।घर में कुहासा छा गया,,अब तक घर का हर एक सदस्य एक विशिष्टता अनुभव करता अपने अलग अलग नखरों में डूबा था,चाहे वो घर की बहू हो चाहे रसोईया अब सभी एक गूढ़ मण्डप में छिपे छिपे से फिर रहे थे,सभी कछुए से अपने अपने खोल में दुबक गये थे ,,इतनी तैयारी इतनी रंगीनियाँ इतने मेहमान ,सब का क्या किया जाये,,कैसी शर्मनाक स्थिति से अवगत होना पड़ रहा था।।हर किसी के मन मे अलग अलग सवाल दौड़ रहे थे।।इस परिस्थिति से दो चार होने के बाद राजा को परिस्थिति की विकटता का एहसास हुआ था,,अब जाकर उसे असल में समझ में आया था कि किसी मंगल उत्सव का होते होते रुक जाना कैसा दुखद और कैसा मार्मिक होता है,,अब उसे उस परिवार और लड़के पे क्रोध आ रहा था।।
    उसने अपने दिमाग पर एक बार भी ज़ोर डाल कर ये सोचने का कष्ट नही उठाया कि अन्दर बडे भैय्या किस जोड़ घटाव में लगे हैं।।

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   अन्दर युवराज अपने पिता से जो भी आग्रह या परामर्श में लगा हो पर बाहर राजा प्रेम और प्रिंस की खबर ले रहा था कि __”जब तुम दोनो नहीं उठाये तो फिर लड़का वाले अचानक सगाई को टाले कैसे बे!!!! हमको लड़का वालोँ पर गुस्सा आ रहा है,ई का बात हुआ ,का हमरा कोनो इज्जत नही है,,ऐसन अपन मर्ज़ी से जब मन किया रिस्ता जोड़ दिया जब मन किया तोड़ दिया,,,चलो गुरू ज़रा खबर लेकर आये कि आखिर माजरा क्या है।।”

  राजा अपने चेलों को लेकर निकलने ही वाला था कि दरवाजा खोल कर युवराज बाहर निकल आया

“राजा रुको!!! किसी को कहीं जाने की ज़रूरत नही है,,पिंकी का सगाई आज ,अभी के मुहूर्त में ही होगा ,,वो भी रतन से।।रतन तुम से बिना पुछे हम ये तय कर दिये,,अगर तुम्हें कोई आपत्ति हो तो अभी बता दो।”

रतन की आंखों में आंसू छलक आये ,वो आगे बढ़ कर युवराज के पैर छूने झुका कि उसे युवराज ने अपने गले से लगा लिया,और राजा की तरफ घूम कर कहा__”राजा तुम फौरन गाड़ी निकालो और रतन के घर वालों को लेकर आ जाओ,रतन घर पर बोल दो किसी तरह की तैयारी की उन्हे ज़रूरत नही ,बस फौरन चले आयें,हमनें उसी दिन तुम्हरी तरफ से भी पिंकी के लिये अँगूठी खरीद ली थी।।।”

घर पे फिर एक बार अनदेखी शहनाई की मीठी करुण स्वर लहरी गूँज उठी,,घर की औरतों ने ज़रा ना नुकुर करना चाहा पर राधेश्याम जी के अटल आदेश पर सभी झट तैयार हो गये।।

  सगाई का कार्यक्रम शुरु हो गया,,पिंकी और रतन प्रसन्न मन प्रसन्न तन एक दूसरे को अपनाने की प्रक्रिया में आगे बढ़े,दोनो ने एक दूसरे को अँगूठी पहना दी।।

  सभी प्रसन्न थे बस एक तरफ राजा ज़रा गुस्से में खड़ा था तभी युवराज आकर उसके पास खड़ा हो गया।।

“का बात है आज तो भीम बड़ा गुस्से में नज़र आ रहा,अरे जो तुम सब चाहते थे वही तो हुआ,अब काहे मुहँ फुलाए खड़े हो।।”

“कुछ नही भैय्या,लड़के वाले अपना मर्ज़ी से सगाई से मुहँ फेर लिये इसिलिए थोड़ा दिमाग खराब है, बाकी तो सब ठीके हुआ।।”

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“अरे दिमाग है भी तुम्हारा?? अब सुनो हमारा बात।
हम जिस दिन पहली बार रतन से मिले उसी दिन हमे लड़का पसंद आ गया था,,हम उसी समय वो पप्पु के बारे में भी पता करा रहे थे,हमारे गुप्तचरों ने उसका अच्छा रीपोर्ट नही दिया था,हमें पता चल गया था कि लड़का खाता पीता सब है।।
   जिस दिन तुम्हारे ये दोनों घोन्चू हमारे ऊपर हमला किये थे उसी दिन हम ये दोनो को पहचान लिये थे,,बेटा !!! बड़े भाई हैं तुम्हारे,हम धीरे से गौर किये तो हमे समझ आने लगा कि गुरू तुम रतन के लिये फील्डिंग कर रहे हो।।
   बस हम भी मजे ले रहे थे,,पर एक बात थी रतन वाकई खरा सोना निकला ,हमसे झूठ नही बोल पाया और आखिर सब कुछ हमे सच सच बता दिया और बस हमारा दिल जीत लिया।।
   जिस दिन तुम्हारे ये पण्टर दूल्हे को अगवा करने गये उसके पहले ही उसको हमारे अनुचर लेकर निकल गये,,दूल्हा एक नम्बर का बेवडा था,बस उसे इतनी पिलाई की वो दूसरे दिन सुबह 11तक सोता ही रहा,उसकी हालत सगाई के लिये अवस्थियों के घर आने की थी ही नही,बस शर्मिंदगी से उसके बाप ने बाऊजी को तिथी टालने का फ़ोन घुमा दिया।।
    मौके का फायदा उठा कर हमने बाऊजी और चाचा को रतन के उजले पक्ष से परिचित करा दिया,हालांकी जात पात तो उनके अन्दर इतना घुसी है कि उसकी जड़ें खोदना मुश्किल था पर चाचा ने हमें उबार लिया,,सबसे पहले चाचा ही तैयार हुए अपनी पिंकी के आई ए एस दूल्हे के लिये।।
    फिर चाचा और हमने बाऊजी को हाथ पैर जोड़ कर मना ही लिया,बस एक छोटी सी शर्त बाऊ जी ने तब भी रख दी कि शादी के कार्ड मे रतन अपना सरनेम नही डालेगा,अभी तो हमनें हाँ कर दिया,,फिर देखते हैं क्योंकि अभी तो सगाई के बाद दोनो को ट्रेनिंग के लिये निकलना है,,बाद की बाद में देखेंगे।।

राजा की खुशी का ठिकाना नही रहा,पर वहीं उसे अपनी बेवकूफी पे झेंप भी लगी ,वो अपने बडे भाई के पैरों में झुक गया,युवराज ने उसे उठा कर अपने सीने से लगा लिया।।

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   मनभावन समय में उचित मुहूर्त में सगाई हसीं खुशी के माहौल में संपन्न हो गई ।।।

क्रमशः

aparna..

शादी.कॉम -9

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  …………..

     बांसुरी के प्लान के मुताबिक राजा ने प्रेम के घर पे और बांसुरी ने निरमा के घर पे जाकर बात की,पर उम्म्मीद के विपरीत दोनों ही घर की अम्मा लोंगो ने और बड़ी बड़ी कसमें किरिया उठा ली कि,”हमरे जीते जी ई ब्याह ना हो सकब,हमरी ठठरी उठ जाये के बाद अपन अपन मर्ज़ी से निबटा लो जो करना धरना है,एक बार सादी हुई जाये फिर आटे दाल का भाव पता चल जई ।।”

    निरमा के घर से बाहर निकलने पे पूरी तरह से रोक लगा दिया गया,अब बेचारी कॉलेज भी जाती तो उसका एक नकारा मामा उसे लेने और छोड़ने जाता और बेचारी जब तक कॉलेज में रहती वो गेट के बाहर की गुमटी में अपना अड्डा जमाये रहता, उसके इस मामा के पास कोई विशेष कार्य भी नही था,जुआ खेल खेल के अपने बाप को पैसों को स्वाहा कर रहा था,जब उसके बाप यानी निरमा के नाना को इस बात का पता चला तो लात घुन्सों से अच्छी तरह आरती उतार कर उसे घर से निकाल दिया ,और वो अपने में झूमता बीड़ी पीता अपनी जिज्जी के घर आ गया,जिज्जी ने रो धोकर जीजा को उसके यहाँ रहने के लिये मना लिया,तब से मामा जी का निवास यही था,अपने जीजा को भरोसे में लेने के लिये आये दिन कोई ना कोई जुगाड भिड़ाता फिरता और आखिर वो मौका मिल ही गया ,जब बांसुरी ने निरमा की प्रेम कहानी के बारे में उसकी अम्मा को बताया तब सबसे ज्यादा उछल उछल कर घर की बदनामी की फिकर करने वाले मामा ने अपनी बडी बहन को भड़का भड़का कर भांजी का कॉलेज बन्द करा दिया,,बाद में चुपके से भांजी से पैसे वसूल कर उसे कॉलेज जाने की अनुमती दिला दी और जिज्जी से भांजी को रोज कॉलेज छोड़ने लाने के बदले मेहनताना वसूला जाने लगा।।

  इस पूरे प्रकरण को लगभग 40-45दिन बीत गये,बंसी का जिम यथावत चलता रहा ।।
     कि तभी एक दिन सुबह जिम के समय पर अचानक पिंकी फिर जिम पहुंच गई ___

    “प्रिंस !!! भैय्या जी कहाँ है?? जल्दी बुलाओ!!”

   “भैय्या जी तो प्रोटीन पाउडर खरीदने गये हैं,दीदी आप ऑफिस में बैठिए भैय्या जी आते ही होंगे।।”

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  पिंकी ऑफिस पहुंची तो अन्दर बाँसुरी बैठी कुछ लिख रही थी,पूरी तन्मयता से__
     “क्या लिख रही हो बंसी?? इतना खो कर??”

  “अरे दीदी आप !! आप कब आई? ? मैं राजा के लिये कठिन सवालों को अलग छान्ट कर उनके जवाब तैय्यार कर रही हूं,बस ये याद कर लेने से पेपर पास करने में दिक्कत नही होगी।।”

“Very good बंसी!!! तुम पहले से थोड़ी दुबली भी लग रही हो,कुछ वजन तो कम हो ही गया है तुम्हारा।”

” हाँ लगभग साढे तीन से चार किलो कम कर लिया है इन्होनें ।।”राजा ने दरवाजा खोल ऑफिस में प्रवेश करते हुए जवाब दिया,

  बांसुरी ने पलट के राजा को सवालिया नजरों से देखा “पर हमने तो नापा ही नही,तुम्हें कैसे पता चला।।

“भैय्या जी की आंखो मे एक्स रे मशीन फिट है,किस लड़की का कितना वजन बढा कितना घटा सिर्फ देख कर ही बता लेते हैं भैय्या जी”प्रिंस अनजाने में कुछ भी मूर्खता पूर्ण अतिशयोक्ति कर जाता था

“अबे बौरा गये हो का बे!! कुछो भी बकते हो! पिंकी तुम अभी कैसे यहाँ आई,,घर में सब ठीक है ना??”

“कहाँ ठीक है भैय्या!!! वही तो बताने आये हैं,अभी सबेरे भाभी के पापा का फ़ोन आया था,वो लोग हमारी सगाई की तारीख पक्की कर दिये हैं,आज से ठीक पन्द्रह दिन बाद हमारी सगाई है,,,और आप अभी तक बड़े भैय्या से भी बात नही कर पाये।।”

“अरे ई तो नया काण्ड हुई गया!! तुम तो जानती हो पहले ऊ प्रेम के चक्कर में बिज़ी रहे उसके बाद ई जिम का सामान खरीदने दिल्ली चले गये इसी सब में बड़का भैय्या से बात करना रह गया ,अब रुको आजे कुछ जुगाड़ जमाते हैं भैय्या से बात करने का।”

“हम बताएँ राजा ,ऐसा करो ,कोरा बात करने से अच्छा ये है कि किसी तरह भैय्या से रतन की मुलाकात करवा दो,,मुलाकात ऐसी की भैय्या खुद प्रभावित हो जायें,और उसके बाद का प्लान हम बाद मे बताएँगे ।।”

बांसुरी के ऐसा बोलते ही राजा ने सवाल किया

“अब ऐसी कैसी मुलाकात करायें की भैय्या परभावित होई जाये,तुमही आइडिया देई दो।।”

“देखो सुनने में थोड़ा फिल्मी लगता है ,पर काम का  आइडिया है…… अभी बांसुरी बोल ही रही थी कि बीच में प्रेम कूद पड़ा

“भगवान बचाये भैय्या जी इ मुटकि के आइडिया से,हमरे लिये ऐसन खतरू आइडिया दी कि निरमा के दरसन भी दुरलभ हो गये,पहले कम से कम मिल जुल तो पाते थे,अब तो साला घर के अन्दर अम्मा ताने मार मार के जीना मुहाल की है और बाहर ऊ कनफड़े के गुंडे हमार रस्ता ताकते हैं कि कब हम उनके हाथ लगे औ ऊ हमार हड्डी मांस नोच नोच खा जायें  ।।

“प्रेम तुम चुप रहो!! इस बार हमारा आइडिया फेल नही होगा,,तुम्हारा और निरमा का भी ब्याह करायेंगे भाई चिंता ना करो।।”

“अरे काहे ना करे चिंता!! जिसके पास तुम जैसा दोस्त हो जो घरफुक्का राय दे बात बात पे, उसको चिंता छोड़ डायरेक्ट चिता मा चढ़ जाना चाही।।”

“कन्ट्रोल करो यार प्रेम !! तुम्हारा समय आयेगा ,तुम्हारा भी ब्याह हो जायेगा यार अभी बांसुरी का आइडिया सुनो!! हाँ बोलो बांसुरी तुम का बोल रही थी,कुछ फिल्मी उल्मी सा!!”

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” हाँ सुनो!! भैय्या जब अपनी गैस एजेन्सी में बैठे होंगे,,दोपहर को जब सब लंच के लिये जायेंगे और भैय्या अकेले होंगे उसी समय चेहरे पे नकाब बांध के दो नकाबपोश उन्हें लूटने जायेंगे,,सीधे जाकर उनकी कनपटी पे बन्दूक तान देंगे और तभी रतन आयेगा और उन दोनो से लड़ के भैय्या की जान बचा लेगा।।।और जब भैय्या उसको धन्यवाद देकर नाम पूछेंगे तब रतन अपना पूरा हिस्ट्री जॉग्रफ़ी उन्हें बता देगा बस अपना पूरा नाम नही बतायेगा,, बिल्कुल ऐसा माहौल जम जाना चाहिये की भैय्या को लगे काश ये लड़का पहले मिलता तो पिंकी की शादी इसीसे तय करते।।।

“बहुत फिल्मी है बंसी!! पता नही रतन मानेगा या नही।”पिंकी ने कहा

“धमल्लो जी ये भी बता दीजिये की ये गुंडे कहाँ से किराया मा लाने वाली है आप”प्रेम ने सवाल किया

“कही से लाने की का ज़रूरत,हमारे पास आलरेडी हैं गुंडे!! तुम और प्रिंस!!”

“पर बांसुरी तुमको लग रहा ये आइडिया काम करेगा??”भैय्या जी इतनी देर में पहली बार बोले

“भैय्या जी पगलाए गये हो का,ई मोटकी कुच्छो भी बकवास कर रही और आप इसका बात सुन रहे।”प्रेम बौखला गया

“हां तो तुम ही सूझा दो प्रेम बाबु कोई आइडिया है तुम्हरे दिमाग में,,देखो हमारा आइडिया फिल्मी है पर काम ज़रूर करेगा,,पिंकी दीदी रतन को आप मना लेना ,आज ठीक डेढ़ से 2बजे के बीच उसको एजेन्सी में भेज देना कैसे भी कर के,, आगे का सब राजा संभाल लेगा,।”

“हम कैसे बांसुरी??”

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राजा भैय्या के इस सवाल पर बाँसुरी ने उसे घूरा और __”यार हर बात तुम को समझानी पड़ती है,खाना लेकर तुम्ही जाते हो ना ,जब कभी ड्राईवर छुट्टी पर होता है,तो आज भी चले जाना और जब रतन और भैय्या जी की बात होने लगे तब तुम वहाँ पहुंच के ऐसी ऐक्टिंग करना जैसे रतन तुम्हे बड़ा पसंद आ गया ,,अब रतन वहाँ क्या करने जा रहा ,ये बताने की ज़रूरत तो नही है ना,फिर भी आप सबके लिये बता देते हैं,रतन वहाँ नया गैस कनेक्शन लेने जायेगा।।

“अब इसके आगे का प्लान भी सुन लो,राजा तुम अपनी तरफ से सिर्फ रतन की तारीफ करोगे पर पिंकी दीदी के लिये कुछ नही कहोगे उल्टा बढ़ चढ़ के सगाई की तैय्यारी मे लगे रहना, और रतन बड़के भैय्या से धीरे धीरे दोस्ती बढा लेगा।।
          जब सगाई को सिर्फ एक दिन बचेगा उस दिन तुम अपनी इस टोली के साथ चुपके से लड़के को किडनैप कर लेना,,जब सगाई के दिन भी लड़का अपने घर नही पहुंचेगा तो उसके घर वाले तुम्हारे घर फ़ोन करेंगे और माफी मांगेंगे ,तब तुम्हारे बाबूजी अपना सर पकड़ के बैठ जायेंगे क्योंकि सगाई के लिये हाल बुक हो गया है,सारे मेहमान आ गये हैं ,अब क्या किया जाये ,,तभी तुम बड़के भैय्या से कहना कि भैय्या आपका वो दोस्त जो अभी अभी आई ए एस का इंटरव्यू पास किया है उसिसे पिंकी की सगाई करा दो,,तब भैय्या बड़ी लाचारी से कहेंगे कि ऊ हमरे जात का नही है छोटे नही हम अभी इ सगाई कर देते ,लोग कहेंगे अपनी सगी बहन होती तो का ऐसे दुसरी जात में ब्याह देते तब पिंकी दीदी आयेगी और रोते हुए कहेगी भैय्या आपको जो सही लगे मैं करने को तैय्यार हूँ,आज जमाना इन्सान के काम से उसे पहचान रहा ना कि उसकी जात से,आपका दोस्त किसी भी जात का हो ,मैं तैय्यार हूँ,बस आपकी और बडे पापा की नाक नही कटनी चाहिये।।दीदी की ये बात सुनकर बड़के भैय्या खुश हो जायेंगे और जाकर आपके बाऊजी को मनाएंगे समझायेंगे और ये सगाई हो जायेगी।।”

“अरे वाह सुनने में तो अच्छा लग रहा है,पर क्या सच मे ये आइडिया काम करेगा??”

“अरे पिंकी तुमहू इसकी बतकही में आ गई,ये जैसन हमार कोल्हू पिराई है ना ,ऐसने तुम्हे भी पेर के मानेगी ,काहे इसकी बात सुनते हो यार तुम लोग।।”

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“प्रेम चुप रहो अम्मा कसम नही धर देंगे तुमको!! अबे सही लग रहा हमको ई आइडिया,क्यों पिंकी?? लगाओ जरा रतन गुरू को फ़ोन और समझाए बुझाये दो ,हम इन दोनो लामलेट को तैय्यार करते हैं ।
   इस पूरे प्लान में बिल्कुल अनिच्छा से प्रेम को भाग लेना ही पड़ा ,पर जाने क्यों अन्दर ही अन्दर उसे किसी अनिष्ट की आशंका कंपकंपा रही थी,,खैर राजा भैय्या की खातिर नकाब चेहरे पे बांध अपनी हीरो होंडा मे प्रिंस को पीछे बैठाए प्रेम निकला, निरमा की गली से निकलते हुए बड़ी हसरत भरी निगाहों से उसने छत की ओर देखा पर वहाँ खड़ी निरमा ने प्रेम को देख कर भी अनदेखा कर दिया__
               “देखा प्रिंस उस कजरौटी की ऐसी काली नज़र लगी है की हमरी निरमा भी हमारी तरफ देख नही रही।।”
           “अबे प्रेम तुम भी पूरे उल्लू हो यार!! पहला तो चेहरे पे गमछा बांधे हो,और दूसरा उसके ऊपर हेल्मेट चढाये हो ,गाड़ी का नम्बर प्लेट भी बदल दिये हो तो भाभी चिन्हेंगी भी कैसे बे??”
 
               प्लान के मुताबिक प्रिंस और प्रेम नकाब पहन कर युवराज के ऑफिस मे दाखिल हुए ,अभी उन्होनें गन निकाल के युवराज की तरफ मोड़ी ही थी की रतन वहाँ पहुंच गया__
               “आप बिल्कुल मत घबराइये ,मैं आपको बचा लूंगा ।”रतन की बात पूरी होने के पहले एक ज़ोर का चाँटा गन तानने वाले  प्रेम के चेहरे पे पड़ा _”अरे मर गया रे ,मार डाला रे मार डाला !!! “
  चिल्लाते हुए प्रेम अपना नकाब संभाले वहाँ से भागने को हुआ पर जाते जाते भी युवराज का ज़ोर का घूंसा उसकी और प्रिंस की पीठ पर पड़ ही गया, दोनों सर पे पैर रख कर वहाँ से भागे ।।।

  रतन घबराया सा कभी युवराज को कभी जान बचा कर भागते प्रेम और प्रिंस को देख रहा था,,जब दोनो आंखों से ओझल हो गये तब युवराज का दहाड़ना बन्द हुआ,तब तक वो उन दोनो को पानी पी पी कर गालियाँ देता रहा,अब उसने रतन की तरफ देखा !! तब तक रतन यही सोचता रहा कि उसे वहाँ खड़ा रहना चाहिये या भाग जाना चाहिये।।अभी रतन कुछ कहता उसके पहले ही युवराज ने उससे उसका परिचय जानना चाहा लेकिन तभी अचानक उसे तबीयत खराब सी लगने लगी,,सीने में उठने वाले दर्द और घबराहट से वो  दिवार का सहारा लेकर खड़ा हो गया,,युवराज का चेहरा पसीने से भीग गया और कलेक्टर साहब को “जी के “में पढ़े स्ट्रोक के सिम्पटम याद आ गये,,उसने फौरन युवराज को कुर्सी पर आराम से बैठाया और युवराज की बाई गरदन पर हलके हाथों से मसाज करते हुए उसे गहरी सांसे लेने के लिये कहने लगा और फिर धीरे से उसकी रीवोल्विंग चेयर को हल्के हाथों से खींचते हुए गाड़ी तक ले गया,,,युवराज को अपनी गाड़ी में बैठा वो तुरंत अस्पताल की ओर भागा।।


 
     जब रतन की स्विफ्ट एजेन्सी के गेट से निकल रही थी,उसी समय राजा भैय्या अपनी एक्स यू वी में अन्दर दाखिल हो रहे थे,रतन का भैय्या को गाड़ी मे ले कर कहीं जाना तो प्लान का हिस्सा था नही,उन्होनें अपने छोटे से दिमाग पर बहुत ज़ोर दिया पर उन्हें बांसुरी का बताया ऐसा कोई प्लान याद नही आया…..अभी राजा सोच में डूबा खड़ा था की कान्खते कराहते प्रिंस और प्रेम नकाब हटा कर वहाँ चले आये।।

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“हम कहे रहे ,,ई सनिचर हमरी जान की दुसमन है भैय्या जी!! हमको तो लगता है निरमा की अम्मा हमारी सुपारी दे रखी है ई बंसुरीया को,,जब देखो तब हमे मारे का प्लान बनाती रहती है।।आज तो बड़का भैय्या का हाथ से हमारा हत्या हो जाना था, ऊ तो सुबह सुबह चौकी के बजरंग बली का आसिर्वाद ले आये थे ,वर्ना अभी आप हमरी अर्थी सजाते होते।।

  प्रेम अपना दुखड़ा रो रहा था की भैय्या जी का फ़ोन बजा__’ जय हो जय हो शंकरा …..

“हेलो!! राजा बोल रहे हैं ।”

“राजा भैय्या हम रतन बोल रहे हैं,बडे भैय्या को हार्ट अटेक आया है,आप जल्दी से जल्दी सिटी हॉस्पिटल पहुंच जाइये,हम बस अभी पार्किंग मे गाड़ी डाल रहे हैं,,पहले चला रहे थे,इसलिए फ़ोन नही कर पाये,,,जल्दी आ जाईये आप !!”

“हे शिव शंकर ये क्या हो गया,चलो बैठो दोनो,अभी के अभी अस्पताल जाना है,भैय्या का तबीयत बिगड़ गया है,,,साला ई कलेक्टर उलेक्तर से रिस्ता जोडना भी रिस्की है,अब देखो ससुर गाड़ी चला रहा तो फ़ोन नई किया,हमको देरी से खबर मिली,,चलो यार प्रिंस कहाँ अटक गये तुम??”

“ऊ भैय्या जी घर मा फ़ोन करने लग गये थे।”

“किसके घर मे बे??”

“आपके औ किसके,आपकी अम्मा बाऊजी को बता रहे थे ,भैय्या को हार्ट फेल हुआ है।।”

“अबे तुम ना गधे हो एक नम्बर के,,का जरुरत रही अभी से अम्मा को बताने की ,अब ऊ वहाँ रो रो के जो रामायण गायेगी,,तुम्हरी ना ये हडबड़ी की आदत से बहुते परेसान हो गये हैं ।।”

हैरान परेशान राजा प्रिंस और प्रेम जब तक हॉस्पिटल पहुँचे तब तक में वहाँ रतन के फ़ोन से पिंकी और बांसुरी भी पहुंच चुके थे।।

   रतन ने उन्हें बताया की बड़े भैय्या को इमरजेन्सी में भर्ती करा दिया गया है,डॉक्टरों की टीम सारी जांच मे लगी हुई है,अभी किसी को भी अन्दर जाने की इजाज़त नही है।।राजा को बहुत ज्यादा परेशान देख बांसुरी उसके पास पानी की बोतल लिये आई__”पानी पी लो राजा!! और ज्यादा परेशान मत हो!! देखो भैय्या को समय पे अस्पताल तो ले आये ना ,तो अब कुछ भी बुरा तो होगा नही ।।और दुसरी बात तुम चिंता कर कर के अपनी तबीयत बिगाड़ लोगे,जबकि अभी यहाँ सारी भागदौड तुम्हें करनी है।।”अभी बांसुरी राजा से बात कर ही रही थी कि ओब्सर्वेशन रुम का दरवाजा खुला और एक जूनियर डॉक्टर बाहर निकल कर आई__

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  “आप में से युवराज अवस्थी के साथ कौन है”

   रतन पिंकी और राजा दौड़ पड़े “हम हैं ।”

“लिजिये ये कुछ दवाएं और इन्जेक्शन ले आईये , नीचे फार्मेसी है” उस लेडी डॉक्टर ने पर्ची रतन को पकड़ा दी और फिर राजा की तरफ बड़ी गहरी नजरों से देखने लगी__”सुनो तुम राजा हो ना !! राजकुमार अवस्थी!!”

  प्रेम और प्रिंस के साथ साथ पिंकी और बांसुरी की भी आंखे फट गई,ये इतनी सुन्दर डॉक्टरनी राजा को कैसे जानती है।।

“हां हम राजा ही है!! अरे !! तुम ,,तुम तो रानी हो ना ,,अरे यहाँ कैसे ,,और हमारे भैय्या कैसे हैं,पहले ऊ बताओ।।”

“तुम्हारे भैय्या बिल्कुल ठीक है,उन्हे हाइपर ऐसिडिटी हुई थी,,जलन कुछ ज्यादा बढ़ने के कारण और गर्मी से डिहाइड्रेशन से बेहोश हो गये थे,,अब वो ठीक हैं ।।

“का मतलब भैय्या को हार्ट उर्ट अटेक नई आया।”

राजा की बात पर डॉक्टर हँस पड़ी “नही कोई हार्ट अटैक नही आया,,उनका ई सी जी और बाकी सारे टेस्ट नॉर्मल आये हैं ,,घबराने की कोई बात नही है।।
   “तुम यहाँ कैसे रानी ?? तुम तो बाहर गांव चली गई रही पढ़ने”?? राजा के सवाल पर रानी मुस्कुरा दी।।
     “हां पढ़ाई पूरी हो गई,अभी हमे इंटर्नशिप करना था,तो हमने सोचा अपने शहर से ही किया जाये ,इसलिए हम यहीं आ गये।।और बताओ तुम क्या कर रहे अभी।।”
    रानी को देख पहले ही गुलाबी हो रहे राजा भैय्या उसके सवाल पे पूरे लाल हो गये,,अब उस डॉक्टरनी  के सामने क्या बोलते कि पांच साल में भी स्कूल का साथ नही छूटा ,बेचारे जवाब सोचने में व्यस्त हो गये।।

अभी वो दोनो बात कर ही रहे थे कि पूरा का पूरा अवस्थी खानदान वहाँ पहुंच गया,,रूपा और उसकी सास एक दूसरे से होड़ लगाती तार सप्तक में लयबद्धता के साथ रो रही थी,,पिंकी ने रूपा को और बांसुरी ने रूपा की सास को सम्भाला, सब कुछ बता देने पर भी दोनो में से कोई चुप होने को राज़ी ना था ,तब बाँसुरी ने धीरे से रूपा के कान मे कहा__

    “भाभी ,भैय्या एकदम ठीक है अब आप भी शान्त हो जाइये,वैसे भी रोने से आपका काजल फैल के पूरा चेहरा को काला काला कर दिया है,, आप तो हमसे भी अधिक कलूटी लग रही है।।”

   रूपा काली और भयानक दिखने के डर से एकदम से चुप हो गई,और उसकी हालत देख उसकी सास को हँसी आ गई,और वो भी अपना रोना भूल गई ।।
       कुछ देर पहले के चिंता के बादल छंट गये और शीतल मन्द समीर बहने लगी,,डॉक्टर ने बाहर आकर सबको मरीज से मिलने की इजाज़त दे दी।।

राधेश्याम जी युवराज के पैरों की तरफ बैठे और माताजी बेटे के सिरहाने बैठी,धीरे धीरे सर सहलाने लगी__”ये सब हुआ कैसे युव ?? पर अच्छा हुआ तुम समय पे अस्पताल पहुंच गये,अरे पर तुम यहां पहुँचे कैसे ,,मतलब राजा तो हमसे कुछ मिनट पहले ही यहाँ पहुंचा था ना,तो तुम्हे यहाँ लेकर कौन आया??”

“जी बाबूजी !! एक लड़का आया था एजेन्सी में शायद कनेक्शन के लिये आया होगा,वही हमारी तबीयत बिगड़ते देखा तो फौरन अपनी गाड़ी में हमे डाल यहाँ ले आया,,हो सकता है बाहर हो,देखो तो राजा कोई दुबला पतला सा लड़का खड़ा है क्या बाहर,बुला लाओ भीतर,आँख पे चश्मा लगा था,पढा लिखा टाईप का दिख रहा था।।”

अभी युवराज ने अपनी बात पूरी भी नही की थी कि डॉक्टर रानी ने कहा__पढा लिखा टाईप का दिख नही रहा था,वो बहुत पढा लिखा है,,जी आपको अस्पताल लेकर आने वाला कोई और नही अभी अभी आई ए एस का इंटरव्यू अच्छी रैंक से पास करने वाले भावी कलेक्टर रत्नप्रकाश हैं,आप लोग मिल कर जल्दी से धन्यवाद दे दीजिये वर्ना आपके धन्यवाद देने के पहले ही कही मसूरी ना उड़ जाएँ ।।””

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तब तक राजा रतन को अन्दर लेकर आ गया ,, राधेश्याम ने उठ कर रतन के दोनो हाथ पकड़ लिये __”बेटा कैसे धन्यवाद कहूँ आपको ,,आपने जो किया है उसके लिये धन्यवाद बहुत छोटा शब्द है,,वैसे बेटा कौन गांव के हो ,,किसके घर के हो,,हियाँ तो हम लगभग सभी को भले से जानते हैं ।।”

“अंकल जी धन्यवाद की ज़रूरत नही है,,ये तो मेरा फर्ज था,मै नही होता तो कोई और होता जो इन्हें सही समय पर अस्पताल ले आता।।””

“नही दोस्त !! तुमने वाकई बहुत उपकार किया,,कुछ समय के लिये मुझे भी लगा की मुझे हार्ट अटैक आ गया है,,अच्छा डॉक्टरनी साहिबा कह रही थी ,,तुमने आई ए एस निकाल लिया है, ये तो बहुत खुशी की बात है,ये हमारी छोटी बहन है पिंकी!!! इसका भी इंटरव्यू में हो गया है सेलेक्शन !!अच्छा है हम लोग भी सोच में थे इतनी दूर मसूरी अकेले कैसे भेजेंगे ,अब कम से कम कोई जान पहचान का तो रहेगा।।”

  युवराज के ऐसा बोल के चुप होते ही राजा जो अब तक सबसे पीछे चुपचाप खड़ा था ने अचानक अपना मुहँ खोला__” रतन गुरू !! तुम्हें तो ट्रेनिन्ग में जाने मे अभी टाईम है ना।””

“बस पन्द्रह दिन में जाना है मसूरी।।”

“हां तो हमारी बहन की सगाई तक रुक जाओ गुरू,,उसके बाद चले जाना।।”राजा की इस बात का वहाँ सभी ने समर्थन किया,कुछ देर युवराज के साथ बैठ कर घर के लोग वापस चले गये,,जब कमरे में अकेले युवराज और राजा थे,राजा बडे भैय्या के लिये जूस लेकर आया __”राजा पता है हम हमेशा से एक बात सोचते थे”

“क्या भैय्या??”

“हमे ना हमेशा से पिंकी के लिये ऐसे ही लड़के की तलाश थी।।”

“कैसे लड़के की भैय्या??”

“अरे रतन जैसे लड़के की यार!! कितना सोच सोच के बात करता है,,हर शब्द नाप तौल के बोलता है, बिल्कुल सुलझा हुआ समझदार सा लड़का है,,हमारी पिंकी के जैसा ,है ना राजा !!! और देखो पिंकी जैसे ही प्रशासनिक सेवा में भी जा रहा है!! कितना ही अच्छा होता अगर ये लड़का पहले मिल गया होता ,,है ना??”

“तो अभी भी का बिगाड़ होई भईया,,अगर आप चाहो तो सब कर सकते हो,””

“अरे कैसी बात कर रहे हो राजा !! अब तो शादी तय हो गई है पिंकी की ,अब कुछो नई हो सकता भाई।।
वर्ना हमारा ससुर हमारा गला पकड़ लेगा।।”

  दोनो भाई साथ साथ हंसने लगे।।।

  क्रमशः


 
aparna..

शादी.कॉम -8

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    हनुमान गली का गुड्डा असल में गुड्डा नही गुण्डा था,एक नम्बर का मवाली और नकारा गुड्डा अपने मोहल्ले ही नही सारे शहर का सर दर्द था।।
  मोहल्ले में घूम घूम के दुकानदारों को सताना और चिढ़ाना उसका प्रिय शगल था।।
     “काका कचौरी वाले” की दुकान हो या चौरसिया का पान ठेला सभी जगह उसकी उधारी की किताब के पन्ने भरते चले जा रहे थे,और वो ऐसे ताव से सब जगह से वसूली करता फिरता जैसे फ़्री में खाने का उसने लाइसेंस ले रखा हो।।
    उसके ताऊ हवलदार थे,जिनके नाम का डर दिखा कर वो हर किसी पर अपना रौब मारता था। एक बार ऐसे ही मंदिर के बाहर किसी बुज़ुर्ग से गलती से लगी ठोकर के बदले जब गुड्डा ने उस बुज़ुर्ग का गला पकड़ लिया और उन्हें एक पर एक बड़ी बड़ी गालियों से नवाजने लगा तभी जाने कहाँ से हवा में लहराता एक थप्पड़ आया और उसकी कनपटी को झनझनाते हुए निकल गया।।।
      दस सेकंड के लिये उसके कान में सिर्फ मख्खी भिनभिनाने की आवाज़ होती रही,अपनी आंखों को अच्छे से झटक के उसने नेत्र गोलकों को सही जगह टिका कर चेहरे को उस ओर घुमाया जहां से थप्पड़ पड़ा था,सामने ब्लू जीन्स और ब्लैक टी शर्ट में राजा भैय्या खड़े थे।।
            दायें हाथ के मणिबंध में रुद्राक्ष की माला लपेटे,माथे पर अगुरू चंदन का तिलक लगाये, आंखों पे गुची का चश्मा लगाये भैय्या जी बिल्कुल महादेव शिव शंकर का मॉर्डन अवतार लग रहे थे।।
   
    उन्हें देख कुछ 2 सेकंड के लिये गुड्डा  अपने थप्पड़ की तिलमिलाहट भूल कर उन्हें प्रनाम करने ही वाला था कि उसे याद आ गया कि इन्हीं चौड़े तगड़े हाथों ने कुछ समय पहले उसके चौखटे का भूगोल बिगाड़ने की कोशिश की थी।।
      तैश में आकर उसने उन्हें मारने को अपना हाथ उठाया जिसे बड़ी आसानी से अपने बाएं हाथ से ही पकड़ कर भैय्या जी ने मरोड़ कर रख दिया।।।
     दोनों तरफ की सेना मुहँ बाये ये सीन देख रही थी,जो बिल्कुल किसी पुरानी फिल्म की याद दिलाता सा लग रहा था,जिसमें सुनील दत्त ने आशा पारेख का हाथ मरोड़ दिया और वो बेचारी छटपटाते हुए गीत गा रही”मैं तुझसे मिलने आई मन्दिर जाने के बहाने”।।

   इस पहली मुलाकात के बाद गुड्डा ,भैय्या जी से खार खा बैठा।।।अब वो कोई ऐसा मौका  छोड़ना नही चाहता था जहां भैय्या जी की  नेकनामी को बदनामी में बदल सके पर ईश्वर इच्छा बलवती, आज तक उसे ऐसा कोई सुनहरा मौका नही मिला था।।
      परसों शाम जब बनवारी की टपरी पे बैठा अपनी पच्चीसवी मुफ्त की चाय गटक रहा था तभी उसका चेला भागा भागा आया,और उसे अपने मोहल्ले की निरमा और प्रेम को साथ  साथ देखे जाने की खबर दे दी।।
    गुड्डा का मन बल्लियों उछलने लगा ,पर उस वक्त शाम हो चुकी थी,इसलिए मन मार के अगली सुबह का इन्तजार किया,और अगले दिन सुबह उठते ही भैय्या जी के जिम पहुंच गया,,हालांकी वहाँ भी उसे निराशा ही हाथ लगी,क्योंकि प्रिंस ने बड़ी ढिठाई से उसे बोल दिया”भैय्या जी नई हैं,कल आना।।”

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“अबे साले हम भिकारी है का बे!! जो बोल रहे कल आना,,जाके अपना भैय्या जी को बोल देना ,अगर हमरे मोहल्ला की लड़की की तरफ आँख उठा कर देखा तो हम सीधा सरिया आँखी में घुसा देंगे।।समझे!”

इतनी मोटी धमकी जिसके मूर्तरूप में परिणत होने के कोई आसार नही थे,दे कर अपना सीना चौड़ा किये गुड्डा वहाँ से निकल गया,प्रेम की तलाश में!!

    प्रेम का मिलना असम्भव था!!!वो यहाँ जिम मे छिपा बैठा था,जो राजा भैय्या के हत्थे चढ़ चुका था।।

“अबे इधर आओ बे!! का गदर मचा रक्खे हो !! जिसे देखो साला हमे धमकाने चला आ रहा है तुम्हरे कारन !! का है गुरू?? इसक उसक में पड़ गये हो हम सुने!! कौन है भाई ,कुच्छो बताओगे।।”

  प्रेम जो अब तक चुपचाप जिम के बाथरूम में गुड्डा के डर से दुबका बैठा था,उसे राजा भैय्या की बड़ी बड़ी आंखे देख एक बार फिर से प्रेशर आ गया,वो वापस पेट पकड़ कर बाथरूम जा ही रहा था कि भैय्या जी ने पीछे से कन्धे पर हाथ रख उसे रोक दिया__”अब साले जो आ रहा है तुमको ,यहीं करो!! पर पहले बताओ का माजरा है ई ,वर्ना ऐसा धोबी पछाड़ लगायेंगे ना कि सीधा देवरिया जा कर गिरोगे अपन मामा घर!! समझे।।”

“भैय्या जी दुई मिनट दे दो ,बस हल्का होके आके सब बतातें हैं ।।”

  प्रेम जैसे ही वापस लौटा जिम में 4जोड़ी आँखो को खुद को घूरता पाया।।

*********************

  प्रेम ने जवानी में कदम रखते ही अपने नाम को बड़ा सीरियसली लेना शुरु कर दिया था,पुराना दिलजला था,और ऐसा दिलजला था की छांछ से भी मुहँ जलाता फिरता था।।

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   पण्डित रामसनेही दुबे डिग्री कॉलेज में पहुंचते ही जैसे प्रेम के अरमानों को पंख लग गये थे,जो लड़की सामने दिख जाती ,वही दिल को भा जाती,और पूरा दिन प्रेम उसके सपनों में काट देता।।
   फिर एक दिन जब प्रेम अपनी हीरो हौंडा को कॉलेज की पार्किंग में खड़ा कर “कमला पसंद” को निगलने ही जा रहा था,कि अचानक उसकी गाड़ी से किसी की टक्कर हुई और उसकी बाईक आगे वाली और आगे वाली उसके भी आगे वाली बाईक को लेकर गिरती चली गई,गुस्से में गाली देने ही वाला था कि मिसरी जैसी आवाज़ कान मे घुल गई_
     “सॉरी हम जान बूझ के नई गिराये।।”

  पलट के देखा तो देखता ही रह गया,वो और भी कुछ कुछ बोलती रही पर प्रेम के कानों में एक ही गाना सुनाई देता रहा_ एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा ……
     “जैसे खिलता गुलाब,जैसे शायर का ख्वाब
       जैसे उजली किरण,जैसे बन मे हिरण
        जैसे चांदनी रात जैसे नरमी की बात
         जैसे मन्दिर में हो एक जलता दिया !!!!

   जब तक गाने का प्रथम अन्तरा समाप्त हुआ, लड़की जा चुकी थी,परन्तु प्रेम को अपना पहला प्यार मिल गया था।।
     अगले दिन सारी खोज बीन कर ली,राजकीय कन्या इंटर कॉलेज से आई सकीना डिग्री कॉलेज में बी ए फाइनल इयर की छात्रा थी।।
 
“साला आधा साल खराब कर दिये इस कॉलेज में,आज तक हमारा नजरे नई पड़ा,और जब पड़ा तो सीधा प्यारे होई गया।।”प्रेम की इस बात पे नन्हे ने चुटकी ली

“तो परपोस करे दो फिर बेलेन्टाईन आने में तो अभी समय है।।”

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“अरे नई कर सकते भैय्या,हमार महतारी नई मानब!! सकीना की जगह सुसीला ,सीला,कबिता उबिता होती तो अलगे बात होता,,छोड़ो हटाओ।।”
  इस प्रकार प्रेम का पहला प्यार उसके सीने में दफन हो गया,अभी वो देसी दारु और चना चटपटी के साथ अपने गम को अच्छे से भुला भी नही पाया था कि ,उसके जीवन में फिर से एक बार प्यार ने दस्तक दी।।

  अबकी बार दस्तक उसके दरवाजे पे हुई,उसिने दरवाजा खोला__ “नमस्ते!! हम ई पड़ोस वाले घर में आये हैं,कल ही शिफ्ट हुए हैं,थोड़ी चीनी मिलेगी,हमें चाय बनानी है।।”

अभी बातचीत चल ही रहा था,कि अम्मा बाहर निकल आई __”अरे चीनी भी ले जाना,पहले बैठो और चाय पी लो”।

   प्रेम का दूसरा प्रेम अम्मा के संग चाय पीते बतियाता रहा पर प्रेम को कुछ और ही सुनाई दे रहा था__  “एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा………..
          जैसे सुबह का रूप,जैसे सर्दी की धूप।
          जैसे वीणा की तान जैसे रंगो की जान
           जैसे बल्खाये बेल जैसे लहरों का खेल
           जैसे खुशबू लिये आई ठंडी हवा।।।

जब तक दूसरा अन्तरा समाप्त हुआ ये लड़की भी जा चुकी थी,पर बेचारी चीनी लेने आई और भूल कर चली गई,उसके जाने के बाद अम्मा ने प्रेम को कटोरी पकड़ा दी कि नये पड़ोसी को चीनी दे आये।

   मुहँ धो के मर्दों की गोरेपन वाली क्रीम लगा कर बालों को भीगा कर अच्छे से ज़ुलफे संवार कर ,खूब पर्फ्यूम डियो डाल कर पूरी तैय्यारी से प्रेम शक्कर की कटोरी लिये चला।।
 
  “अरे का हमरी पतोहू लेने जाई रहे हो जो अतका सज धज मचा दिये,जल्दी जल्दी आओ,हिया सिलिंडर मरा खतम हुई गवा है,ई टाँकी को अपना फटफटी मा पीछे रख के बदला लाओ।।”

  प्रेम तो खुद मे खोया सा था,अम्मा की इतनी गैर-जरूरी बातें सुनने का उसके पास वक्त ही नही था।।पड़ोस के दरवाजे पे बिल्कुल जेंटलमैन स्टायल में खड़े होकर उसने बेल बजाया,दरवाजा खुला और
ये तो कोई उसकी ही उमर का लड़का खड़ा था_

“जी कहिये!! किससे मिलना है??”

“जी वो !! हमको लग रा हम गलत घर मा आ गये,वो थोड़ी देर पहले सक्कर मांगने…….प्रेम की बात पूरी भी नही हुई कि अन्दर से वही रूपसी जो सुबह चिनी माँगने गई थी ,बाहर आई__
     “बेबी !! ये हमारे पड़ोसी हैं,मै अभी इन्ही के घर से चाय पीकर आ रही हूँ,देखो आंटी जी इस सो स्वीट ,मै भूल गई तो उन्होनें खुद चीनी भेज दी।
  आप अन्दर आईये ना भैय्या!! इनसे मिलिये ये मेरे पति है अतुल शर्मा,और मै आभा।।”

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अच्छा हुआ दिल टूटने की आवाज़ नही होती वर्ना उस नाज़नीँ के मुहँ से भैय्या सुन के प्रेम का दिल जो चाक हुआ था कि बेचारा चीनी उन्हें बमुश्किल थमा भागा वहाँ से।।

  बेचारा प्रेम !!! माँ ने सलमान सोच कर नाम रखा पर किस्मत प्रेम चोपड़ा वाली हो गई ।।एक तो फष्ट इयरे मा लटक गये उसपे लडकियों का सनिचर !!
     इसिलिए जब अम्मा बोली चलो सनी देब  के मन्दिर मा मन्नत का तेल ऊल चढ़ा आये तो प्रेम तुरंते मान गया।।

    सनी देब में तेल चढ़ाया ,सत्ती गुड़ी में रोट चढ़ाया,बस वहीं माता का चमत्कार भवा!!!
   
    रोट चढ़ा के प्रेम मन्दिर की सीढिय़ां उतर अपनी चप्पल ढूँढ ही रहा था कि एक  नाज़ुक नवेली की साईकल की चेन उतर गई ,,अब किसी लड़की को  इतना बड़ा प्राब्लम हो और प्रेम अपनी चप्पल ढूँढता रहे शोभा देता है क्या?? बेचारा नंगे पैर गर्म तवे से जलते रोड पे खड़ा होकर चेन बनाता रहा,और लड़की अपनी गुलाबी चुन्नी से अपना आप को हवा झलती रही!! दो मिनट में चढ़ने वाली चेन भी उस दिन पूरा इक्कीस मिनट में चढ़ी,खैर चेन चढ़ा कर प्रेम ने नजरें ऊपर उठाई,लड़की ने प्रेम को देखा ,प्रेम ने लड़की को देखा ,और पहली बार दोनो दिलों में एक साथ घंटी बजी!!!

     पर ना ये घंटी जो दोनो को संग संग सुनाई दी ये सत्ती माता की आरती की घंटी थी,पर दोनो के हृदय ने एक दूसरे को चीन्ह लिया,,निरमा ने धीमे से कहा-” थैंक यू ….. अबकी बार प्रेम को अन्तिम अन्तरा सुनाई दिया जो सार्थक हो गया__
     “एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा ….
          जैसे नाचता मोर,जैसे रेशम की डोर
          जैसे परियों का राग,जैसे संदल की आग
          जैसे सोलह सिंगार जैसे रस की फुहार
          जैसे आहिस्ता आहिस्ता चढता नशा ।।

    अभी निरमा का नशा प्रेम पे चढ़ने ही वाला था कि बाँसुरी अपनी साईकल हाथ से खींचती चली आई__”तुम यहाँ कहाँ अटक गई,क्या हो गया निरमा??”

“हमारी साईकल का चेन उतर गया था,इन्होने ठीक किया।।”

“तो अब तो ठीक हो गया ना चेन,,अब चलो ,देर हो रही कॉलेज को।।”

  निरमा बाँसुरी के साथ चली गई और छोड़ गई प्रेम के दिल पे अपनी छाप!!!

   ये प्रेमप्रताप पाण्डेय की सम्पूर्ण जीवन गाथा थी जिसमें से सुविधानुसार प्रेम ने अन्तिम अंतरे वाली लड़की वाला अपना किस्सा वहाँ मौजूद सभी को कह सुनाया।।।
               सदियों से होता आ रहा कि किस्से कहानियाँ हम कानों से सुनते हैं लेकिन जाने क्यों हमारी आंखें फैल जाती हैं सुनते हुए,,वहाँ मौजूद सभी के साथ वही हुआ।

“अब करना क्या है गुरू?? सादी वादी का विचार है की नही।”प्रिंस के ऐसा पूछते ही प्रेम ने जवाब दिया

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“हैं काहे नही बे!! शादी तो निरमा से ही करना चाहतें हैं,पर हमारी अम्मा भी कसम खाये बैठीं हैं,कहती है ,वा वर्माइन हमार  बहुरिया ना बनी,, नही ता हम जहर खा ले और मर जाब, ,,अब बोलो का करें,भैय्या जी आप ही कुछ रस्ता सुझाओ।।अभी तक अम्मा से डरे बैठे थे,अब ई गुड्डा और आ गया चौधरी बन के,हम भी कोनो डरते नई हैं,हम तो साले के पनही न पनही लगाते पर आपका और जिम का लिहाज कर के चुप रह गये।।”

“तुम चुप नही रहे बल्कि छुप गये ,अब जादा बतियाओ ना ,नही  हम तुमको सही का पनही (चप्पल)धर देब।।लल्लन के ऐसा बोलते ही प्रिंस के बंमपिलाट दिमाग में एक खतरनाक आइडिया आया

  “हम तो कहते हैं,तुम निरमा को ले कर देवरिया निकल जाओ,हम फ़ोन पे तुम्हें यहाँ का सब खबर देते रहेंगे ,जब मामला ठंडा हो जायेगा तो सादी उदी कर के वापस आ जाना।।”प्रिंस की इस बात का जवाब दिया बांसुरी ने

“वाह ! प्रिंस जवाब नही क्या आइडिया दिये हो” अपनी तारीफ सुन प्रिंस चौड़ा हो गया,तब बांसुरी ने अपनी बात आगे बढ़ाई

“काहे तुम क्राईम पैट्रोल बिल्कुल ही नई देखते क्या?? अरे भागने वालों का फ़ोन नम्बर सबसे पहले ट्रैक करती है पुलीस,उसके बाद इन लोगो का गला पकड़ कर पुलीस लायेगी और दोनो के घर वालो के हवाले कर देगी,उसके बाद मुश्किल से एक महीना मे निरमा की शादी उसके समाज में हो जायेगी और प्रेम यहाँ जिम मे चदरिया झीनी रे झीनी सुनेगा,और हम सब को सुनाएगा।।”

राजा ने बांसुरी को देखा और पूछा__”फिर तुम ही बताओ का करना चाहिये।।”

  “हां हम बताते हैं एक नम्बर आइडिया देंगे जिसका फेल होने का चांस बस फिफ्ती परसेन्ट है।”और बांसुरी हंसने लगी__”सुनो राजा तुम जाओ प्रेम के घर और उसकी अम्मा से बात करो,और हम जायेंगी निरमा के घर उसकी अम्मा से बात करने।।एक बार दोनो घर के गृहमंत्री तैय्यार हो गये तो प्रधान मंत्री को मनाना आसान हो जायेगा।।”

  “लेकिन बंसी अगर हमारी अम्मा नई मानी तो,का करेंगे फिर।””निरमा ने पूछा

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“अगर ऐसा हुआ निरमा तो तुम फिर वही करना जो तुम्हरी अम्मा कहेंगी,क्योंकि एक बात याद रखो अपना अम्मा से ज्यादा तुमको कोई प्यार नही कर सकता ई प्रेम भी नही।।।अपनी जिद अपनी इच्छा अपने घर वालों को बताओ उन्हें मनाने की भी कोशिश करो पर जीने मरने की धमकी मत देना,,अगर प्रेम प्यार से मान गये तो अच्छा है नही तो तुम लोग उनकी बात मान जाना,उसी मे सब का भलाई है निरमा,,आज तुम भले हमारा बात ना समझो पर एक दिन हमारा बात तुम्हारा भेजा में घुस जायेगा।।”

  जिम में सन्नाटा छा गया ,तभी पिंकी ने आगे बढ़ कर बंसी को गले से लगा लिया___प्राउड ऑफ़ यू बंसी !! अब तुम और राजा भैय्या पहले इस प्रेम के प्रकरण को सुलझाओ फिर इसके बाद हमारे लिये काम करना है तुम दोनो को।।है ना।।”

“हां दीदी!!! बड़के भैय्या मान जायेंगे,और बस एक बार वो मान जाये फिर घर वाले भी ।।”दोनो सखियाँ एक साथ मुस्कुराने लगी

“राजा भैय्या अब हम घर जाते हैं,आप भी इस प्रेम का गणित बैठा के जल्दी से घर आ जाओ।।।”

जाते जाते पलट के पिंकी ने राजा को देखा और बोली__”अरे हाँ रेखा को भी फ़ोन कर लेना ,उसका फ़ोन आपने उठाया नही था।।और ज़ोर से खिल्खिलाती हुई पिंकी जिम से बाहर निकल गई ।।

प्रिंस और प्रेम शातिर मुस्कान के साथ भैय्या जी को देखने लगे वहीं लल्लन मन ही मन सोच मे पड़ गया कि बताओ क्या किस्मत है राजा भैय्या की होने वाली दुल्हीन और हमारी गर्ल फ्रेंड का एक ही नाम है।।सोचते सोचते वो भी मुस्कुराते हुए प्रिंस और प्रेम के साथ भैय्या जी को छेड़ने मे लग गया कि तभी उसके फ़ोन की रिंग बजने लगी__

  “हाँ बेबी!! बोलो …..बोलते हुए लल्लन बाहर की ओर निकल लिया।।।

उसके पीछे से एक ज़ोर का ठहाका उसका पीछा करता चला आया।।।
 
  क्रमशः

aparna..

समिधा-27

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   समिधा- 27

    केदारनाथ त्रासदी को घटे सात महीने बीत चुके थे। जिन्होंने अपने अपनों को खोया था वो उस त्रासदी को इन सात महीनों में भी नही भूल पा रहे थे, यही हाल उनका भी था जिनके अपने इस त्रासदी से वापस लौट चुके थे।

        वरुण मंदिर ट्रस्ट में स्थायी सदस्यता पा चुका था। उसके माता पिता ने भी इस बार न उसे रोका न टोका,और सहर्ष सहमति दे दी। कादम्बरी के परिवार ने ज़रूर कुछ टोकाटाकी करने की कोशिश की लेकिन वरुण का परिवार वरुण के सामने दीवार बन खड़ा रहा, फिर अपना सा मुहँ लेकर उन्हें भी लौटना ही पड़ा।
    कोलकाता के मंदिर में दो महीने बिताने के बाद वरुण और दो चार अन्य सेवादारों को मथुरा राधाकृष्ण मंदिर भेज दिया गया था।

    मंदिर में सुबह सवेरे उठ कर सारे मंदिर परिसर में झाड़ू लगाने के बाद पानी का छिड़काव कर वरुण अपने दो साथी सेवादारों के साथ पोंछा लगाया करता।
     मंदिर की ही पुष्पवाटिका से चुन चुन कर लाये फूलों की फिर सारे लोग मिल कर लंबी सी माला गूंथते और द्वारिकाधीश का श्रृंगार होता।
      दोपहर बाद सभी एक साथ बैठे भजन गाया करते।
   इस सब के साथ ही सुबह और शाम का समय वेदाध्ययन के लिए भी निश्चित था।
   वरुण को ये सारे कार्य प्रिय थे। वह इन सभी कार्यों को करते हुए अपने मन को शांत रखने का पूरा प्रयास करता और उसे इन कुछ महीनों में इन कार्यों में एक सुख मिलने लगा था एक शांति मिलने लगी थी ऐसा लगने लगा था कि वह अपने कृष्ण के आसपास है और कृष्ण सिर्फ उसके ही नहीं हर किसी के आसपास हैं। और इसीलिए धीरे-धीरे वरुण की श्रद्धा इस बात पर बढ़ने लग गई थी कि जो जिसके साथ होता है वह सब कृष्ण का रचा रचाया है और इसीलिए उससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता ।
  वरुण की यही सोच उसे धीरे-धीरे शांति की तरफ ले जा रही थी, लेकिन बीच-बीच में कभी अचानक एक चेहरा उसकी खुली आंखों में झांकने चला आता। जैसे पूछ रहा हो…-” मेरा क्या कसूर था जो तुम्हारे कृष्ण ने मुझे ऐसी सजा दी ?” ऐसे समय में वरुण अपने विचारों को झटक कर कोई ना कोई किताब खोल कर पढ़ने बैठ जाया करता। लेकिन इन सारी व्यस्तताओं के बाद भी बार बार एक जोड़ी पनीली आंखें उसका पीछा करती सी लगती जैसे कह रहीं हो “वापस आ जाओ!”  उसे अक्सर यूँ लगता कि वो मन से यही सब करना चाहता तो है पर उसकी आत्मा इस सब में शामिल ही नही होना चाहती। 
सुबह और शाम के समय के अतिरिक्त रात में भी जब उसे समय मिलता वह मंदिर परिसर के कोने में बैठ अपनी किताब को पढ़ने में डूब जाया करता। वेदों का अध्ययन करते करते धीरे-धीरे उसे हिंदू धर्म की जटिलताएं समझ में आने लगी थी।
   आज तक जिन रीति-रिवाजों को मानने के लिए वह अपनी मां का मजाक उड़ाया करता था और रीति-रिवाजों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को देख पढ़ कर समझ कर उसके ज्ञान चक्षु भी खुलने लगे थे।
    मंदिर का पूरा कार्य एक ट्रस्ट के अधीन था वह ट्रस्ट पूरे भारतवर्ष ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कृष्ण मंदिर की स्थापना कर चुका था। मंदिरों में होने वाले आय-व्यय के साथ ही दानदाताओं को अधिक से अधिक दान के लिए प्रेरित करने के लिए भी मंदिर ट्रस्ट को पढ़े लिखे शिक्षित वर्ग की आवश्यकता थी और अगर वरुण जैसे युवा इस कार्य में उनका सहयोग करें तो मंदिर ट्रस्ट को लाभ ही लाभ था इसलिए वरुण की तरफ मठाधीशों का कुछ अधिक ही झुकाव था।

   मंदिर में अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग पद सृजित बहुत से सेवादार ऐसे थे जो स्वेच्छा से जीवन पर्यंत सिर्फ सेवादार ही बने रह जाते थे।लेकिन कुछ उनमें से ऐसे भी थे जो सेवादार से ऊपर के कुछ 1 पदों तक जाकर रुक जाए करते थे। लेकिन वरुण जैसे उच्च शिक्षित युवाओं को मंदिर ट्रस्ट द्वारा सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ाते हुए मंदिर के मठाधीश तक के पद तक पहुंचाए जाने की व्यवस्था थी। वैसे मंदिर में जाति धर्म या गरीबी अमीरी के नाम पर किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं था। सभी के लिए समान कार्य बांटे गए थे , और सभी को अपने हिस्से के कार्य करने ही होते थे। अंतर बस इतना होता था कि शिक्षित लोग जो विद्या अध्ययन करने में सक्षम थे उन्हें वेदों का अध्ययन करवा कर उनसे प्रवचन आदि दिलवाए जाने की व्यवस्था की जाती थी।
     पिछले कुछ समय में ही वरुण ने बहुत सारी किताबों का अध्ययन कर लिया था और जैसे-जैसे अध्ययन करता जा रहा था उसका दिमाग भी विस्तृत होता जा रहा था।
       मंदिर परिसर हर किसी के लिए खुला था लोग दर्शनों के लिए आते मंदिर में चढ़ावा चढ़ाते, और चले जाते। सब के जाने के बाद हफ्ते में एक दिन चढ़े हुए सारे चढ़ाव की गणना की जाती और उसके बाद उस धनराशि को मंदिर ट्रस्ट के पास भेज दिया जाता।
    ट्रस्ट से हर महीने एक निश्चित धनराशि मंदिर में रहने वालों के खाने पीने आदि के लिए भेज दी जाती। इन सब का हिसाब योगेंद्र जी रखा करते थे।

   मंदिर परिसर बहुत विशाल था। चारों तरफ फैली वृहत वाटिका के बीचो बीच स्थापित मंदिर में पीछे तरफ कमरे बने हुए थे जहां सेवादार और बाकी के मंदिर कर्मचारी रहा करते थे।
      उसी परिसर में एक और हटकर विधवा आश्रम बना हुआ था जहां वृद्ध युवा और बाल विधवाये रहा करती थी। आश्रम के कर्मचारियों तथा अन्य लोगों के लिए भोजन पकाने बर्तन साफ करने आदि की जिम्मेदारी इन्हीं महिलाओं की थी । महिलाओं की संख्या कम अधिक होती रहती थी। वैसे तो एक बार जिस महिला को उसके घर वाले इस आश्रम में छोड़ जाते उसका वापस अपने घर लौट पाना असंभव ही था। इसलिए अधिकतर समय उस आश्रम में महिलाओं की संख्या में वृद्धि ही हुआ करती थी, संख्या में कमी तभी आती थी जब उनमें से कोई देवलोक को चली जाया करती थी।
     उनका जीवन कठिन नहीं कठिनतम था। क्योंकि उनके जीवन में वेद अध्ययन को स्थान नहीं दिया गया था। उनमें से अधिकतर वृद्ध महिलाएं अपने आपको कृष्ण समर्पित कर चुकी थी । इसलिए उनका मन सिर्फ कृष्ण को समर्पित लोगों की सेवा से ही प्रसन्न हो जाता था। लेकिन कुछ युवा और बाल विधाएं भी थी जिन्हें अच्छा खाने और अच्छा पहनने का शौक हुआ करता था। लेकिन उस स्थान में जहां उन्हें पर्याप्त आहार भी ना मिल पाता हो,उनके शौक कौन पूछता और कौन पूरे करता?

    वह औरतें एक रटी रटाई दिनचर्या का पालन करती हुई बस जीवन जीती चली जा रही थी! जिसका ना कोई आदि था ना अंत। बहुत बार ऐसा लगता जैसे वह वहां रहते हुए बस अपनी सांसें गिन रही हैं, कि किस तरह उनकी सांसो की अवधि पूरी हो और वह स्वयं कृष्ण के लोक पहुंच जाएं। कुछ महिलाओं ने एक आध बार वहां से निकलने की भी कोशिश की, लेकिन बाहर भी उनके पास कोई और आश्रय नहीं था दो-चार दिन बाद लौट कर वापस ही आ गई थी।
        जैसे ज़िन्दगी कट रही हो बस…. बिना जीने की आरज़ू के।
   लेकिन वरुण इन बातों से अनजान था….
….. पर अब अधिक समय नही बचा था कि वो इन सारी अव्यवस्थाओं से अपरिचित रह पाता…

******

   
     देव को गए वक्त बीत चुका था। जब उसके जाने का पता चला था उस समय उसके परिवार द्वारा किये कर्मकांड में पारो की माँ और बाकी सदस्य आये और जाते वक्त पारो की माँ देव की माँ के चरणों में लोट गयी….-” गरीब की बेटी का कोई आसरा नही होता बऊ दी! पहले ही बिना बाप की थी अब माथे से पति का साया भी सरक गया। पता नही इतनी बदकिस्मत लड़की क्यों मेरे घर ही पैदा हुई। इससे तो पैदा होते ही मर जाती तो सही होता,लेकिन फिर ये बदकिस्मती कैसे देखती?
  आपके पांव पड़ती हूँ, इसका आसरा मत छीनना। यहीं कहीं किसी कोने में पड़ी रहेगी। घर की नौकरानी को भी तो दो वक्त का खाना दिया ही जाता है। उससे अधिक की अब इसे दरकार भी कहाँ रही? “

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   बोलते-बोलते जाने कितनी बार वो भरभरा के रो पड़ीं। इतने कठोर शब्द मुहँ से भी तो नही निकल पा रहे थे। कैसी मर्मान्तक पीड़ा के साथ अपनी ही बेटी के लिए नौकरानी जैसा अलंकार जोड़ना पड़ा। किस्मत लड़की से ज्यादा तो उनकी खराब थी। पहले पति का दुख सहा फिर लक्ष्मी सी बेटी का …
  … इतनी छोटी सी उम्र में ये रंगविहीन साड़ी ! ये देखने से पहले दुर्गा माँ उसे उठा लेती तो कितना अच्छा होता। कम से कम अपनी ही बेटी का ये रूप तो न देखना पड़ता।
    दिल में तो आ रहा था कि बेटी को सीने से लगाये अपने साथ ले जाये। कैसे भी कर के अपने पास रख लेगी लेकिन अभी तो वो अकेली अपनी ससुराल की गुलामी में टूट रही है फिर अपने साथ अपनी फूल सी बेटी को वैसे ही टूटते कैसे देख पाएंगी?
   दूसरी बात जब घर भर मछली भात खा रहा होगा उसकी लाड़ली को सिर्फ शाक खा कर संतोष करना पड़ेगा। पान की कितनी शौकीन थी,अब तो वो भी कहाँ खा पाएगी।
   ये सारा सब अपनी आंखों से देखना उसके लिए मृत्युतुल्य कष्ट सहने के बराबर था।
   इससे तो अपनी ससुराल में रह कर क्या कर रही क्या नही इन सब बातों से तो उन्हें फुर्सत रहेगी।
  वैसे उनके मन में एक छोटा सा लालच और भी तो था…..
   देव का छोटा भाई दर्शन पारो से एक दो साल ही तो बड़ा था। अगर पारो यहीं अपनी ससुराल में रह गयी तो हो सकता है घर वालों के मन में पारो का ब्याह दर्शन से कर देने का विचार जाग जाए। और अगर ऐसा हो गया तो इससे अच्छा पारो के लिए क्या होगा भला।
   इतने गहन दुख के बीच एक बहुत छोटी सी खुशी उनके मन को उद्भासित कर गयी ..
…..-“ऐसा क्यों कह रही हो बऊ माँ। नौकरानी सी क्यों रहेगी भला। देव के पीछे अब यही तो हमारी देव है। पारोमिता जैसी अब तक रहती आयी है वैसे ही रहेगी।”

   देव की ठाकुर माँ का स्वर उस कमरे में गूंज गया और फिर घर के किसी सदस्य की पारो को वहाँ से हटाने या निकालने की हिम्मत नही हुई।

*****

  दिन कट रहे थे सिर्फ पारो के ही नही बल्कि घर के अन्य सदस्यों के भी।
  पहले पहल किसी ने पारो से कुछ नही कहा। वो अपने कमरे में सारा सारा दिन चुपचाप पड़ी देव को याद कर ऑंसू बहाती रहती।
   कभी खिड़की पर घंटो खड़ी रह जाती। यूँ लगता जैसे उसी का इंतज़ार कर रही हो।
  उसे पता नही क्यों अंदर से यही लगता कि समय को चीरता देव उसके पास वापस चला जायेगा।
कभी अचानक ही उसका मन ये मानने से इनकार कर देता की देव नही रहा।
वो उसकी कमीज़ें धोती अपनी साड़ी के साथ सुखाती और आयरन कर अलमीरा में सजा देती। जूते भी रोज़ रोज़ साफ करती और जब देखती की पहनने वाला तो दूर दूर तक नज़र नही आ रहा तो बिलख उठती।
    अब उसका खाना उसकी सास उसकी जेठानी के हाथों उसके कमरे में ही भिजवा दिया करतीं। शायद उन्हें मन ही मन लगने लगा था कि उन सब सुहागिनों के बीच बैठ पारो अपनी रूखी थाली का निवाला कैसे ले पाएगी। लेकिन पारो की जेठानी से ये पक्षपात जाने क्यों सहन नही हुआ जा रहा था।।
  रोज़ रोज़ उसकी रूखी सूखी थाली ऊपर लेकर जाना उसके मन को मसले दे रहा था, आखिर एक दिन घर भर की औरतों की नज़र बचा कर उसने मछली के झोल भरी कटोरी पारो की थाली में रखी और दाल की कटोरी में घी भर अपने आँचल से ढाँक ऊपर ले चली।
  पारो की तो नही लेकिन उसकी खुद की सास ने देख कर उसे आधी सीढ़ियों पर ही टोक दिया। पारो उस समय छज्जे पर कपड़े सूखा रही थी। उसने भी बड़ी माँ की रुबावदार आवाज़ सुन ली और ऊपर से झांकने लगी…-” ए आनंदी! की होलो? पारो के लिए क्या माछ लेकर जा रही हो? “

आनन्दी सकपका गई। उसे नही लगा था कि उसकी चोरी ऐसे पकड़ी जाएगी। उसने बहुत धीमी आवाज़ में अपनी बात रखी…-” उसकी अभी उम्र ही क्या है माँ। इतनी छोटी सी उम्र में इतना कुछ झेल गयी , अब कम से कम ठीक से खा पी तो सके। यही तो खाने पहनने की उम्र…”

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  उसकी बात बीच में ही काट कर उसकी सास लगभग उस पर चीख पड़ी…-“अब तुम आज की लड़कियां हमें नियम बताओगी, उसकी उम्र क्या है ये हमे बताने की ज़रूरत नही है।तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है हमने। चुपचाप माछेर झोल उठा कर थाली से बाहर कर दो। “

” धीमे बोलिए मां ,वो सुन लेगी। अच्छा नही लगेगा।”

” तुम्हें नियम भंग करते हुए अच्छा लगा न तो अब मुझे कोई लेना देना नही की किसे बुरा लगेगा और किसे नही। जो सच्चाई है सो है। अगर भगवान को उस पर इतना ही तरस था दयादृष्टि थी तो उसके पति को ऐसे अकालमृत्यु नही मिलती.।

   आगे की पंक्तियों के साथ ही भावुकता में बड़ी माँ रोने लगी,क्योंकि बेटा भले ही देवरानी का था लेकिन प्रेम तो उन्हें भी उससे बहुत था। और देव की असमय मृत्यु का दुख अब पारो पर गुस्से और नाराज़गी के रूप में उतारना शुरू हो रहा था।

आनन्दी समझ गयी कि इस वक्त सास से लड़ने में कोई लाभ नही है। वो चुपचाप मछली की कटोरी हटा कर फिर थाली ऊपर ले गयी….
… धीरे से उसने पारो के कमरे के दरवाज़े को धक्का दिया,पारो पलंग पर सिर टिकाए ज़मीन पर बैठी थी।
” आओ पारो !खाना खा लो!”
 
  पारो ने ऑंसू भरी आंखों से अपनी जेठानी को देखा और फिर बाहर देखने लगी…-“मेरी प्यारी छोटी बहन कुछ तो खा लो। देखो ऐसे भूखा रहने से क्या होगा। बल्कि तुम ऐसे भूखी रहोगी तो देव बाबू की भी आत्मा तड़प उठेगी। वो कैसे सुख से रह पाएंगे भला। चलो खा लो चुपचाप। बड़ी माँ की बातों को दिल से न लगा लेना। वो सब अभी बहुत दुखी हैं। उबर नही पाएं हैं ना । तुम तो समझ सकती हो।”

पारो ने हाँ में सिर हिला दिया और नीचे देखती चुप बैठी रही।
आनन्दी को उसी वक्त नीचे से किसी ने आवाज़ दी और वो एक बार फिर पारो से खा लेने का इसरार करती बाहर चली गयी।
पारो का थाली देखने का भी जी नही किया…  उसने धीरे से थाली सरका दी जैसे थाली से नाराजगी हो कि तुम उस समय क्योँ सामने नही इठलाई जब देव बाबू साथ थे और अपने हाथो से अपनी प्रेयसी अपनी पत्नी को खिलाना चाहते थे। उस वक्त इसी थाली ने क्यों चुपके से उसके कान में  नही कहा कि खा ले पारो! फिर इतना प्रेम करने वाला जीवन में कोई नही आएगा। “

  देव के बारे में सोचते हुए वो फफक के रो पड़ी। वहीं उस गांव से कई किलोमीटर दूर मथुरा में स्वामी वरुण के सामने सेवादार थाली परोस कर रख गया, पर जाने अंदर से वरुण को कैसी बेचैनी ने घेरा की उसने उस थाली को धीरे से आगे सरका दिया…-” स्वामी ऐसा क्यों? क्या आज भोजन नही लेंगे।”

” मालूम नही केवल लेकिन आज बिल्कुल भी खाने का जी नही कर रहा। अंदर से ऐसा लग रहा जैसे हृदय में किसी बात की पीड़ा सी उबर रही है। यूँ लग रहा कोई बहुत करीबी दुख में है, अपार दुख में और मैं उसकी कोई सहायता नही कर पा रहा हूँ। अब बस कृष्ण से यही प्रार्थना है कि वो जो कोई भी है उसे जल्दी से जल्दी मुझसे मिलवा दे, जिससे अपने मन की इस बेचैनी से छुटकारा पा सकूं।”

  वरुण क्या जानता था कि उसके कॄष्ण उसके प्रिय को उससे मिलवाने की भूमिका बांध ही चुके हैं…..

क्रमशः

aparna…..
  


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फ़िल्म समीक्षा- माचिस

movie review

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पानी पानी रे

   सुबह सुबह खिड़की पर खड़ी थी कि एक गीत फ़िल्म माचिस का सुनाई पड़ा, और पानी पानी रे याद दिला गया।
    गीत गुलज़ार साहब ने लिखा है और विशाल भारद्वाज के संगीत को लता जी ने इस कदर खूबसूरती से गाया है कि सुनते वक्त ये गीत आपको एक अलग ही रूहानी दुनिया में ले जाता है।

     स्कूल में थे बहुत छोटे तब ये मूवी आयी थी और मैंने देखी भी थी लेकिन सच कहूं तो समझ में नही आई थी, बिल्कुल भी नही।
    बहुत बाद में कभी आधी अधूरी सी देखी तो जो सार समझ आया वो ये की आज का हो या बीते समय का युवा हमेशा माचिस की तीली सा होता है जो एक चिंगारी से ही सुलग उठता है।

    एक आम आदमी कृपाल के आतंकवादी बनने की कहानी है माचिस।
     उसके गांव में किसी सासंद को मारने की असफल कोशिश कर भागे जिमी को ढूंढने आयी पुलिस को जसवंत सिंह( राज जुत्शी) का मज़ाक में अपने कुत्ते जिमी से मिलवाना इतना अखर जाता है कि वो उसे अपने साथ थाने ले जाते हैं और 15 दिन बाद मार पीट के वापस छोड़ देते हैं। उसकी हालत से दुखी और नाराज़ उसका दोस्त कृपाल जब किसी सरकारी महकमे से मदद नही पाता तब अपने चचेरे भाई जीत जो किसी आतंकवादी संगठन का हिस्सा है की तलाश में निकल जाता है और सनाथन ( ओम पुरी ) से टकरा जाता है, यहां से उसका सफर शुरू होता है। सनाथन उसे कमांडर से मिलवाता है जहाँ कृपाल की कहानी सुनने के बाद कमांडर उसे खुद अपना बदला लेने की सलाह देता है।

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    उस संगठन को परिवार मान कृपाल ट्रेनिंग लेने के बाद भरे बाज़ार में खुराना ( पुलिस वाले) पर गोली चला देता है।
   अगली कार्ययोजना के लिए जिस मिसाइल लॉन्चर का इंतज़ार किया जा रहा होता है वो होती है वीरा( तब्बू)
    वीरा कृपाल की मंगेतर और जसवंत की बहन होती है।
     कृपाल से मिलने पर बताती है कि पुलिस वाले खुराना को कृपाल के द्वारा मारने के बाद पुलिस एक बार फिर जसवंत को पकड़ कर ले गयी और वहाँ पुलिस के टॉर्चर से तंग आकर उसने आत्महत्या कर ली। उसकी मौत की खबर नही सहन कर पाने से वीरा की माँ भी चल बसी , बार बार पुलिस के घर आने से परेशान वीरा भी कृपाल के रास्ते चल पड़ती है।
   कृपाल और वीरा दो प्यार में डूबे दिलों के मिलन पर फिल्माया यह गीत बहुत खाली सा लगता है…
     गीत की पंक्तियां ..

    ये रुदाली जैसी रातें जगरातों में बिता देना
   मेरी आँखों में जो बोले मीठे पाखी को उड़ा देना
         बर्फों में लगे मौसम पिघले
             मौसम हरे कर जा
             नींदें खाली कर जा..

   पानी से गुहार लगाती नायिका की मौसम हरे कर जा और नींदे खाली कर जा … सहज ही अपनी उदासी अकेलापन और अपने साथ हुए अत्याचारों की तरफ ध्यान ले जाती है।
     कितना अकेलापन झेला होगा जब नायिका ने इन पंक्तियों को गाया होगा…..

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       एक गांव आएगा, मेरा घर आएगा…
       जा मेरे घर जा, नींदे खाली कर जा…

    इसके बाद नायक नायिका चुपके से शादी करने का फैसला कर लेते हैं।
    बहुत सारी घटनाएं घटती चली जातीं है…. नायक को कमांडर की तरफ से सासंद को मारने का काम दिया जाता है।
   उसके कुछ पहले ही वीरा कृपाल के पास से उसकी सायनाइड चुरा कर रख लेती है।
   ( यही वो सीन था जहाँ से मुझे सायनाइड का महत्व पता चला था कि उसे निगल कर मौत को गले लगाया जा सकता है)
    कृपाल का प्लान फेल हो जाता है और वो पुलिस के द्वारा पकड़ लिया जाता है।
   यहाँ फिर बहुत कुछ होता घटता जाता है। वीरा के हाथ से सनातन मारा जाता है।
   वो बड़ी मुश्किल से कृपाल से मिलने पहुंचती है और सबसे छिपा कर उसके हाथ में उसका सायनाइड रख कर वहाँ से बाहर निकल कर अपना सायनाइड भी खा लेती है।

    कहानी बहुत ही ज्यादा  ब्लैक थी। दुख अवसाद त्रासदी आंसूओं से भरी हुई लेकिन एक गहरी छाप छोड़ जाती है।
   जैसा कि मैं कोई समीक्षक तो हूँ नही इसलिए टेक्निकल कुछ नही कह सकती लेकिन गुलज़ार साहब की लिखी कहानी सीधे दिलों में उतर जाती है।
   सारे किरदार अपना पार्ट बखूबी निभाते हैं।।
जिम्मी शेरगिल की शायद पहली ही फ़िल्म थी , और वो अपनी छाप छोड़ने में सफल भी रहे।

   तब्बू तो बेस्ट हैं ही।

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पूरी फिल्म में मुझे सबसे ज्यादा पसंद आये फ़िल्म के गीत!
   
    चप्पा चप्पा चरखा चले हो या
    छोड़ आये हम वो गलियां या फिर
      पानी पानी रे।
  
  लेकिन सबसे खूबसूरत गीत था…

   तुम गए सब गया
   कोई अपनी ही मिट्टी तले
    दब गया…

   गुलज़ार साहब के शब्दों का जादू सभी उनके चाहने वालों के सर चढ़ कर बोलता है।

    अगली समीक्षा या चीर फाड़ अपने किसी पसंदीदा गीत की करने की कोशिश रहेगी।
   तब तक सुनते रहिए…

    पानी पानी इन पहाड़ो के ढलानों से उतर जाना
    धुंआ धुंआ कुछ वादियां भी आएंगी गुज़र जाना।
    एक गांव आएगा, मेरा घर आएगा..
    जा मेरे घर जा, नींदे खाली कर जा..
    पानी पानी रे, खारे पानी रे…

  aparna….

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शादी.कॉम-7

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     राधेश्याम जी के घर पे पूरा त्योहार का माहौल हो गया था,शाम को समधि जो आने वाले थे,राधे श्याम और उनके छोटे भाई सीता राम अपने अपने काम धन्धे से जल्दी वापस आ चुके थे लेकिन युवराज अपने पैट्रोल पम्प पर ही था,जाहिर है वो उनका दामाद ठहरा उसे तो अपने ससुराल में ये दिखाना ही है कि वो कितना व्यस्त रहता है,इसी से आज वो पूरी तन्मयता से पेट्रॉल पम्प,फिर एजेन्सी सब जगह घूम घूम कर मुआयना कर रहा था।।

   घर की महिलायें सुबह से रसोई मे जुटी थीं ऐसे जैसे मास्टर शेफ उन्हें ही चुनने आ रहें हैं,खैर उनकी परीक्षा परिणाम का समय आ गया,गिरिधर शास्त्री मय बेटा पधारे –

  “का हो समधि जी ,सब कुशल मंगल??ऐसा प्रस्ताव लाएं हैं कि आप खुशी से नाच उठोगे।”

“अरे आईये आईये !!! आपके आने से ही प्रसन्न हैं, बताईये कौन प्