गुल्लक-3 ……

मेरी नजर से….. समीक्षा

आजकल के कानफोड़ू गाली गलौज और वीभत्स रस के स्पष्ट उदाहरण कहीं जा सकने वाली भयंकर एक्शन से सजी महा पकाउ और बोरिंग एक जैसी ढेर सारी वेब सीरीज के बीच मिडल क्लास फैमिली की सौम्य शांत और सभ्य कहानी गुल्लक आपके मन को मोह लेगी…

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गुल्लक टीवी पर चलती ढेर सारी सीरीज के बीच में बिल्कुल वैसी ही लगेगी जैसी तेज गर्मी में गन्ने के रस की रसवती फुहार या फिर बादलों की ओट से झांकती रिमझिम बारिश…

निखिल विजय की कहानी पर अमृत राज गुप्ता के निर्देशन में सजी गुल्लक सीजन 3 को tvf ने प्रस्तुत किया है सोनी लाइव पर 7 अप्रैल से यह सीजन ऑन एयर हो चुका है…

कहानी एक महा मिडल क्लास फैमिली की है। कानपुर का रहने वाला मिश्रा परिवार।

जहां एक पिता है संतोष मिश्रा, जो विद्युत विभाग में कार्यरत हैं… इनके दो बेटे हैं बड़ा अन्नू मिश्रा..जो इस सीजन में नौकरी पा चुका है और नौकरी भी उसने टिपिकल मध्यमवर्गीय पाई है। एमआर की पोस्ट पर काम करने वाला अन्नू मिश्रा तरह-तरह की जुगत लगा कर अपने कंपनी की सेल्स बढ़ाना चाहता है, और इसमें उसका साथ देते हैं उसके तीन और दोस्त! कहानी के तीसरे मुख्य किरदार है अन्नु मिश्रा के छोटे भाई अमन मिश्रा। जिन्होंने दसवीं में तीसरी रैंक कमाई है, और इसी कमाई के कारण इनके गुरु जी और परिवार वाले इन्हें साइंस दिलवाना चाहते हैं …लेकिन अमन मिश्रा जी की दिली ख्वाहिश है कि वे आर्ट स्ट्रीम को चुने और उपन्यासकार बने। कहानी की सबसे मुख्य पात्र है घर भर को अपने तानों से अशांत बनाए रखने वाली हमारी गृहिणी शांति मिश्रा जी, जिन्हें जब अपनी परेशानियों से निकलने का कोई रास्ता नहीं नजर आता तभी बड़े मंदिर के पंडित जी को बुलवाकर शांति पाठ रखवा लिया करती हैं….

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गुल्लक एक साधारण से सामान्य से परिवार की कहानी है जो देखते हुए आप बिल्कुल ऐसा महसूस करते हैं कि यह तो हमारे अपने घर की कहानी है… किरदारों के बीच के डायलॉग बहुत सिंपल से हैं लेकिन भाव से भरे हुए हैं…

सीजन 3 के पहले एपिसोड में अमन के स्कूल की लंबी चौड़ी फीस देखकर परेशान मिश्रा दंपति जब अपने बड़े कमाऊ पूत से पैसों के बारे में बात करने में हिचकते हैं तो उन्हें टीवी पर देखते हुए कई जोड़ा मां-बाप की आँखें उनकी उस पीड़ा को देख बरस पड़ती है..जब बड़ी मुश्किल से वह दोनों अपनी पूरी हिम्मत जुटाकर अन्नू से अमन की फीस के बारे में बात करते हैं तो अन्नू अपने महंगे ब्रांडेड जूते खरीदने के सपने को 1 महीने के लिए पोस्टपोन करके अमन के लिए अपनी जेब खाली कर देता है, लेकिन इसका बदला वो जल्दी ही अमन के बालों को नाई के पास ले जाकर कटवा कर पूरा भी कर लेता है… लेकिन इस सारे सीन में दोनों भाइयों के बीच की केमिस्ट्री बहुत लाजवाब ढंग से निखर कर आती है.. इसी के बाद किसी एपिसोड में जब छोटा भाई अमन अपने केमिस्ट्री लैब के फेलियर को अपने बड़े भाई के सामने स्वीकार करता है और साथ ही उसके सामने अपने मन की यह बात रखता है कि वह विज्ञान नहीं पढ़ना चाहता बल्कि आर्ट्स लेना चाहता है तब उसके सामने बैठा बड़ा भाई अन्नू अपने चेहरे के भावों से यह स्पष्ट कर देता है कि “कोई बात नहीं छोटे तुझे जो करना है वह कर तेरे ऊपर मेरा हाथ हमेशा था, है…और रहेगा।

कहानी के छोटे छोटे हिस्से इतनी बारीकी से रचे गए हैं जो बाप बेटे भाई भाई और माता पिता के आपसी संबंधों की मजबूती को बहुत अच्छे से और सुंदर तरीके से चित्रित करते हैं। कहानी में एक और मुख्य किरदार है बिट्टू की मम्मी जिन्हें इस ढंग से रचा गया है कि उनकी एंट्री पर ही हम और आप हंसने को मजबूर हो जाते हैं…

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सुनीता राजधर एक लाजवाब एक्टर है… बहुत बार वह बिना डायलॉग बोले सिर्फ अपने चेहरे के एक्सप्रेशन और अपनी बॉडी लैंग्वेज से ही दर्शकों को गुदगुदा जाती हैं। बिट्टू की मम्मी का किरदार एक बहुत खास किरदार है जो अक्सर गली मोहल्लों में हमारे अड़ोस पड़ोस में देखने को मिल ही जाता है…

कहानी की एक खास बात और है कि इस कहानी में घर की गृहिणी कभी अड़ोस पड़ोस में ताका झांकी करके गॉसिप नहीं करती। इस काम का भार पूरी तरह से घर के बड़े लड़के अन्नू के कंधों पर है… जैसे ही कोई भी घर का सदस्य किसी बात को जानना चाहता है और गलती से भी पूछ लेता है ,तो हमारे अन्नु मिश्रा जी पूरी तरह से तैयार होकर रामायण बांचने का काम शुरू कर देते हैं… अपने गली मोहल्ले के बारे में उनका नॉलेज अगाध है और अपने इस अभूतपूर्व नॉलेज को वह समय समय पर अपने परिवार के सदस्यों से बांटते रहते हैं…

सीजन 3 का मुख्य प्लॉट था मध्यमवर्गीय परिवार की इमानदारी!!! उस ईमानदारी के वास्ते अपने रास्ते पर सीधे चलते संतोष मिश्रा जी को जब सस्पेंशन लेटर थमा दिया जाता है तब घर के सभी सदस्य यह सोचना छोड़कर कि संतोष मिश्रा जी मन में क्या सोच रहे होंगे? यह सोचने लगते हैं कि अब घर का खर्च कैसे चलेगा? इतनी ढेर सारी प्रैक्टिकैलिटि भरी है इस सीरिज में की आनंद आ जाता है..

बाकी मध्यमवर्गीय परिवारों में ऐसा ही तो होता है, लोग भावुक बहुत ज्यादा होते हैं लेकिन प्रैक्टिकल होना उनकी मजबूरी हो जाती है । कहानी के अंतिम एपिसोड में जब घर का मुखिया कमरे का दरवाजा बंद कर बेहोश हो जाता है तब उस वक्त उनके दोनों बेटे और पत्नी भावुकता में बहते कैसे उन्हें अस्पताल तक लेकर जाते हैं भर्ती करवाते हैं और किस ढंग से उनका उपचार करवाते हैं यह देखने वालों को हर बार रुला जाता है…. उसी एपिसोड में जब अन्नू अपने पिता को गोद में उठाकर बाहर की तरफ भागता है और उसके पीछे उसकी मां भी उस कमरे से बाहर निकल जाती है, तब चुपचाप खड़ा अमन धीरे से जाता है और अपने पिता की चप्पले उठाकर अपने सीने से लगाए घर से बाहर निकल जाता है इस छोटे से सीन में अमन ने इतना भावपूर्ण अभिनय किया है कि हर बेटा अपने पिता की चप्पलों की तरफ देख कर एक बार को नतमस्तक जरूर होता है…

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कहानी के तीसरे एपिसोड में अगुआ की कहानी भी बताई गई है .. अगुआ गांव का वह पुरुष होता है जो अपने नाते रिश्तेदारों दोस्तों यारों के बीच किसी भी निर्णय को लेने के लिए सर्वाधिक सक्षम होता है और बाकी सभी लोग उसके निर्णय को सर्वमान्य मानकर उसकी कहीं बात पर अपनी मुहर लगा देते हैं… संतोष मिश्रा का कोई भूला बिसरा मित्र अपनी बेटी की शादी की बातचीत मिश्रा जी के घर से करने के लिए उनके घर में बेटी पहुंच जाते हैं और इस पूरे आयोजन में संतोष मिश्रा जी की धर्मपत्नी और उनके मित्र की बेटी के बीच एक बहुत ही ममतामई रिश्ता बन जाता है जिसमें शांति मिश्रा जी फुर्तीली से स्पष्ट रूप से कहती हैं फुर्तीली भी इस रिश्ते में अपने मन की बात जरूर रखें….

अभीनय की बात करें तो सभी कैरेक्टर लाजवाब है… संतोष मिश्रा के रोल में जमीन खान हो या शांति मिश्रा जी के रोल में गीतांजलि कुलकर्णी हो, अनु के रोल में वैभव राज गुप्ता या अमन के रोल में हर्ष मायरो सभी ने अपने अभिनय से हंसाया भी है और रुलाया भी है… कुल मिलाकर यह एक फैंटास्टिक फोर सीरीज है जिसे अगर आपने अब तक नहीं देखा तो जरूर देखिए इसके पिछले 2 सीजन भी बेहद शानदार है और अगर आपने पिछले दोनों नहीं देखे तो गुल्लक फर्स्ट सीजन से शुरू कीजिए….

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दो आने ,चार आने ,आठ आने की पुलक

छोटे-छोटे किस्सों से भर गयी ये गुल्लक।।

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aparna…..

फ़िल्म समीक्षा- माचिस

movie review

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पानी पानी रे

   सुबह सुबह खिड़की पर खड़ी थी कि एक गीत फ़िल्म माचिस का सुनाई पड़ा, और पानी पानी रे याद दिला गया।
    गीत गुलज़ार साहब ने लिखा है और विशाल भारद्वाज के संगीत को लता जी ने इस कदर खूबसूरती से गाया है कि सुनते वक्त ये गीत आपको एक अलग ही रूहानी दुनिया में ले जाता है।

     स्कूल में थे बहुत छोटे तब ये मूवी आयी थी और मैंने देखी भी थी लेकिन सच कहूं तो समझ में नही आई थी, बिल्कुल भी नही।
    बहुत बाद में कभी आधी अधूरी सी देखी तो जो सार समझ आया वो ये की आज का हो या बीते समय का युवा हमेशा माचिस की तीली सा होता है जो एक चिंगारी से ही सुलग उठता है।

    एक आम आदमी कृपाल के आतंकवादी बनने की कहानी है माचिस।
     उसके गांव में किसी सासंद को मारने की असफल कोशिश कर भागे जिमी को ढूंढने आयी पुलिस को जसवंत सिंह( राज जुत्शी) का मज़ाक में अपने कुत्ते जिमी से मिलवाना इतना अखर जाता है कि वो उसे अपने साथ थाने ले जाते हैं और 15 दिन बाद मार पीट के वापस छोड़ देते हैं। उसकी हालत से दुखी और नाराज़ उसका दोस्त कृपाल जब किसी सरकारी महकमे से मदद नही पाता तब अपने चचेरे भाई जीत जो किसी आतंकवादी संगठन का हिस्सा है की तलाश में निकल जाता है और सनाथन ( ओम पुरी ) से टकरा जाता है, यहां से उसका सफर शुरू होता है। सनाथन उसे कमांडर से मिलवाता है जहाँ कृपाल की कहानी सुनने के बाद कमांडर उसे खुद अपना बदला लेने की सलाह देता है।

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    उस संगठन को परिवार मान कृपाल ट्रेनिंग लेने के बाद भरे बाज़ार में खुराना ( पुलिस वाले) पर गोली चला देता है।
   अगली कार्ययोजना के लिए जिस मिसाइल लॉन्चर का इंतज़ार किया जा रहा होता है वो होती है वीरा( तब्बू)
    वीरा कृपाल की मंगेतर और जसवंत की बहन होती है।
     कृपाल से मिलने पर बताती है कि पुलिस वाले खुराना को कृपाल के द्वारा मारने के बाद पुलिस एक बार फिर जसवंत को पकड़ कर ले गयी और वहाँ पुलिस के टॉर्चर से तंग आकर उसने आत्महत्या कर ली। उसकी मौत की खबर नही सहन कर पाने से वीरा की माँ भी चल बसी , बार बार पुलिस के घर आने से परेशान वीरा भी कृपाल के रास्ते चल पड़ती है।
   कृपाल और वीरा दो प्यार में डूबे दिलों के मिलन पर फिल्माया यह गीत बहुत खाली सा लगता है…
     गीत की पंक्तियां ..

    ये रुदाली जैसी रातें जगरातों में बिता देना
   मेरी आँखों में जो बोले मीठे पाखी को उड़ा देना
         बर्फों में लगे मौसम पिघले
             मौसम हरे कर जा
             नींदें खाली कर जा..

   पानी से गुहार लगाती नायिका की मौसम हरे कर जा और नींदे खाली कर जा … सहज ही अपनी उदासी अकेलापन और अपने साथ हुए अत्याचारों की तरफ ध्यान ले जाती है।
     कितना अकेलापन झेला होगा जब नायिका ने इन पंक्तियों को गाया होगा…..

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       एक गांव आएगा, मेरा घर आएगा…
       जा मेरे घर जा, नींदे खाली कर जा…

    इसके बाद नायक नायिका चुपके से शादी करने का फैसला कर लेते हैं।
    बहुत सारी घटनाएं घटती चली जातीं है…. नायक को कमांडर की तरफ से सासंद को मारने का काम दिया जाता है।
   उसके कुछ पहले ही वीरा कृपाल के पास से उसकी सायनाइड चुरा कर रख लेती है।
   ( यही वो सीन था जहाँ से मुझे सायनाइड का महत्व पता चला था कि उसे निगल कर मौत को गले लगाया जा सकता है)
    कृपाल का प्लान फेल हो जाता है और वो पुलिस के द्वारा पकड़ लिया जाता है।
   यहाँ फिर बहुत कुछ होता घटता जाता है। वीरा के हाथ से सनातन मारा जाता है।
   वो बड़ी मुश्किल से कृपाल से मिलने पहुंचती है और सबसे छिपा कर उसके हाथ में उसका सायनाइड रख कर वहाँ से बाहर निकल कर अपना सायनाइड भी खा लेती है।

    कहानी बहुत ही ज्यादा  ब्लैक थी। दुख अवसाद त्रासदी आंसूओं से भरी हुई लेकिन एक गहरी छाप छोड़ जाती है।
   जैसा कि मैं कोई समीक्षक तो हूँ नही इसलिए टेक्निकल कुछ नही कह सकती लेकिन गुलज़ार साहब की लिखी कहानी सीधे दिलों में उतर जाती है।
   सारे किरदार अपना पार्ट बखूबी निभाते हैं।।
जिम्मी शेरगिल की शायद पहली ही फ़िल्म थी , और वो अपनी छाप छोड़ने में सफल भी रहे।

   तब्बू तो बेस्ट हैं ही।

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पूरी फिल्म में मुझे सबसे ज्यादा पसंद आये फ़िल्म के गीत!
   
    चप्पा चप्पा चरखा चले हो या
    छोड़ आये हम वो गलियां या फिर
      पानी पानी रे।
  
  लेकिन सबसे खूबसूरत गीत था…

   तुम गए सब गया
   कोई अपनी ही मिट्टी तले
    दब गया…

   गुलज़ार साहब के शब्दों का जादू सभी उनके चाहने वालों के सर चढ़ कर बोलता है।

    अगली समीक्षा या चीर फाड़ अपने किसी पसंदीदा गीत की करने की कोशिश रहेगी।
   तब तक सुनते रहिए…

    पानी पानी इन पहाड़ो के ढलानों से उतर जाना
    धुंआ धुंआ कुछ वादियां भी आएंगी गुज़र जाना।
    एक गांव आएगा, मेरा घर आएगा..
    जा मेरे घर जा, नींदे खाली कर जा..
    पानी पानी रे, खारे पानी रे…

  aparna….

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