शादी.कॉम -8

Advertisements

    हनुमान गली का गुड्डा असल में गुड्डा नही गुण्डा था,एक नम्बर का मवाली और नकारा गुड्डा अपने मोहल्ले ही नही सारे शहर का सर दर्द था।।
  मोहल्ले में घूम घूम के दुकानदारों को सताना और चिढ़ाना उसका प्रिय शगल था।।
     “काका कचौरी वाले” की दुकान हो या चौरसिया का पान ठेला सभी जगह उसकी उधारी की किताब के पन्ने भरते चले जा रहे थे,और वो ऐसे ताव से सब जगह से वसूली करता फिरता जैसे फ़्री में खाने का उसने लाइसेंस ले रखा हो।।
    उसके ताऊ हवलदार थे,जिनके नाम का डर दिखा कर वो हर किसी पर अपना रौब मारता था। एक बार ऐसे ही मंदिर के बाहर किसी बुज़ुर्ग से गलती से लगी ठोकर के बदले जब गुड्डा ने उस बुज़ुर्ग का गला पकड़ लिया और उन्हें एक पर एक बड़ी बड़ी गालियों से नवाजने लगा तभी जाने कहाँ से हवा में लहराता एक थप्पड़ आया और उसकी कनपटी को झनझनाते हुए निकल गया।।।
      दस सेकंड के लिये उसके कान में सिर्फ मख्खी भिनभिनाने की आवाज़ होती रही,अपनी आंखों को अच्छे से झटक के उसने नेत्र गोलकों को सही जगह टिका कर चेहरे को उस ओर घुमाया जहां से थप्पड़ पड़ा था,सामने ब्लू जीन्स और ब्लैक टी शर्ट में राजा भैय्या खड़े थे।।
            दायें हाथ के मणिबंध में रुद्राक्ष की माला लपेटे,माथे पर अगुरू चंदन का तिलक लगाये, आंखों पे गुची का चश्मा लगाये भैय्या जी बिल्कुल महादेव शिव शंकर का मॉर्डन अवतार लग रहे थे।।
   
    उन्हें देख कुछ 2 सेकंड के लिये गुड्डा  अपने थप्पड़ की तिलमिलाहट भूल कर उन्हें प्रनाम करने ही वाला था कि उसे याद आ गया कि इन्हीं चौड़े तगड़े हाथों ने कुछ समय पहले उसके चौखटे का भूगोल बिगाड़ने की कोशिश की थी।।
      तैश में आकर उसने उन्हें मारने को अपना हाथ उठाया जिसे बड़ी आसानी से अपने बाएं हाथ से ही पकड़ कर भैय्या जी ने मरोड़ कर रख दिया।।।
     दोनों तरफ की सेना मुहँ बाये ये सीन देख रही थी,जो बिल्कुल किसी पुरानी फिल्म की याद दिलाता सा लग रहा था,जिसमें सुनील दत्त ने आशा पारेख का हाथ मरोड़ दिया और वो बेचारी छटपटाते हुए गीत गा रही”मैं तुझसे मिलने आई मन्दिर जाने के बहाने”।।

   इस पहली मुलाकात के बाद गुड्डा ,भैय्या जी से खार खा बैठा।।।अब वो कोई ऐसा मौका  छोड़ना नही चाहता था जहां भैय्या जी की  नेकनामी को बदनामी में बदल सके पर ईश्वर इच्छा बलवती, आज तक उसे ऐसा कोई सुनहरा मौका नही मिला था।।
      परसों शाम जब बनवारी की टपरी पे बैठा अपनी पच्चीसवी मुफ्त की चाय गटक रहा था तभी उसका चेला भागा भागा आया,और उसे अपने मोहल्ले की निरमा और प्रेम को साथ  साथ देखे जाने की खबर दे दी।।
    गुड्डा का मन बल्लियों उछलने लगा ,पर उस वक्त शाम हो चुकी थी,इसलिए मन मार के अगली सुबह का इन्तजार किया,और अगले दिन सुबह उठते ही भैय्या जी के जिम पहुंच गया,,हालांकी वहाँ भी उसे निराशा ही हाथ लगी,क्योंकि प्रिंस ने बड़ी ढिठाई से उसे बोल दिया”भैय्या जी नई हैं,कल आना।।”

Advertisements

“अबे साले हम भिकारी है का बे!! जो बोल रहे कल आना,,जाके अपना भैय्या जी को बोल देना ,अगर हमरे मोहल्ला की लड़की की तरफ आँख उठा कर देखा तो हम सीधा सरिया आँखी में घुसा देंगे।।समझे!”

इतनी मोटी धमकी जिसके मूर्तरूप में परिणत होने के कोई आसार नही थे,दे कर अपना सीना चौड़ा किये गुड्डा वहाँ से निकल गया,प्रेम की तलाश में!!

    प्रेम का मिलना असम्भव था!!!वो यहाँ जिम मे छिपा बैठा था,जो राजा भैय्या के हत्थे चढ़ चुका था।।

“अबे इधर आओ बे!! का गदर मचा रक्खे हो !! जिसे देखो साला हमे धमकाने चला आ रहा है तुम्हरे कारन !! का है गुरू?? इसक उसक में पड़ गये हो हम सुने!! कौन है भाई ,कुच्छो बताओगे।।”

  प्रेम जो अब तक चुपचाप जिम के बाथरूम में गुड्डा के डर से दुबका बैठा था,उसे राजा भैय्या की बड़ी बड़ी आंखे देख एक बार फिर से प्रेशर आ गया,वो वापस पेट पकड़ कर बाथरूम जा ही रहा था कि भैय्या जी ने पीछे से कन्धे पर हाथ रख उसे रोक दिया__”अब साले जो आ रहा है तुमको ,यहीं करो!! पर पहले बताओ का माजरा है ई ,वर्ना ऐसा धोबी पछाड़ लगायेंगे ना कि सीधा देवरिया जा कर गिरोगे अपन मामा घर!! समझे।।”

“भैय्या जी दुई मिनट दे दो ,बस हल्का होके आके सब बतातें हैं ।।”

  प्रेम जैसे ही वापस लौटा जिम में 4जोड़ी आँखो को खुद को घूरता पाया।।

*********************

  प्रेम ने जवानी में कदम रखते ही अपने नाम को बड़ा सीरियसली लेना शुरु कर दिया था,पुराना दिलजला था,और ऐसा दिलजला था की छांछ से भी मुहँ जलाता फिरता था।।

Advertisements

   पण्डित रामसनेही दुबे डिग्री कॉलेज में पहुंचते ही जैसे प्रेम के अरमानों को पंख लग गये थे,जो लड़की सामने दिख जाती ,वही दिल को भा जाती,और पूरा दिन प्रेम उसके सपनों में काट देता।।
   फिर एक दिन जब प्रेम अपनी हीरो हौंडा को कॉलेज की पार्किंग में खड़ा कर “कमला पसंद” को निगलने ही जा रहा था,कि अचानक उसकी गाड़ी से किसी की टक्कर हुई और उसकी बाईक आगे वाली और आगे वाली उसके भी आगे वाली बाईक को लेकर गिरती चली गई,गुस्से में गाली देने ही वाला था कि मिसरी जैसी आवाज़ कान मे घुल गई_
     “सॉरी हम जान बूझ के नई गिराये।।”

  पलट के देखा तो देखता ही रह गया,वो और भी कुछ कुछ बोलती रही पर प्रेम के कानों में एक ही गाना सुनाई देता रहा_ एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा ……
     “जैसे खिलता गुलाब,जैसे शायर का ख्वाब
       जैसे उजली किरण,जैसे बन मे हिरण
        जैसे चांदनी रात जैसे नरमी की बात
         जैसे मन्दिर में हो एक जलता दिया !!!!

   जब तक गाने का प्रथम अन्तरा समाप्त हुआ, लड़की जा चुकी थी,परन्तु प्रेम को अपना पहला प्यार मिल गया था।।
     अगले दिन सारी खोज बीन कर ली,राजकीय कन्या इंटर कॉलेज से आई सकीना डिग्री कॉलेज में बी ए फाइनल इयर की छात्रा थी।।
 
“साला आधा साल खराब कर दिये इस कॉलेज में,आज तक हमारा नजरे नई पड़ा,और जब पड़ा तो सीधा प्यारे होई गया।।”प्रेम की इस बात पे नन्हे ने चुटकी ली

“तो परपोस करे दो फिर बेलेन्टाईन आने में तो अभी समय है।।”

Advertisements

“अरे नई कर सकते भैय्या,हमार महतारी नई मानब!! सकीना की जगह सुसीला ,सीला,कबिता उबिता होती तो अलगे बात होता,,छोड़ो हटाओ।।”
  इस प्रकार प्रेम का पहला प्यार उसके सीने में दफन हो गया,अभी वो देसी दारु और चना चटपटी के साथ अपने गम को अच्छे से भुला भी नही पाया था कि ,उसके जीवन में फिर से एक बार प्यार ने दस्तक दी।।

  अबकी बार दस्तक उसके दरवाजे पे हुई,उसिने दरवाजा खोला__ “नमस्ते!! हम ई पड़ोस वाले घर में आये हैं,कल ही शिफ्ट हुए हैं,थोड़ी चीनी मिलेगी,हमें चाय बनानी है।।”

अभी बातचीत चल ही रहा था,कि अम्मा बाहर निकल आई __”अरे चीनी भी ले जाना,पहले बैठो और चाय पी लो”।

   प्रेम का दूसरा प्रेम अम्मा के संग चाय पीते बतियाता रहा पर प्रेम को कुछ और ही सुनाई दे रहा था__  “एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा………..
          जैसे सुबह का रूप,जैसे सर्दी की धूप।
          जैसे वीणा की तान जैसे रंगो की जान
           जैसे बल्खाये बेल जैसे लहरों का खेल
           जैसे खुशबू लिये आई ठंडी हवा।।।

जब तक दूसरा अन्तरा समाप्त हुआ ये लड़की भी जा चुकी थी,पर बेचारी चीनी लेने आई और भूल कर चली गई,उसके जाने के बाद अम्मा ने प्रेम को कटोरी पकड़ा दी कि नये पड़ोसी को चीनी दे आये।

   मुहँ धो के मर्दों की गोरेपन वाली क्रीम लगा कर बालों को भीगा कर अच्छे से ज़ुलफे संवार कर ,खूब पर्फ्यूम डियो डाल कर पूरी तैय्यारी से प्रेम शक्कर की कटोरी लिये चला।।
 
  “अरे का हमरी पतोहू लेने जाई रहे हो जो अतका सज धज मचा दिये,जल्दी जल्दी आओ,हिया सिलिंडर मरा खतम हुई गवा है,ई टाँकी को अपना फटफटी मा पीछे रख के बदला लाओ।।”

  प्रेम तो खुद मे खोया सा था,अम्मा की इतनी गैर-जरूरी बातें सुनने का उसके पास वक्त ही नही था।।पड़ोस के दरवाजे पे बिल्कुल जेंटलमैन स्टायल में खड़े होकर उसने बेल बजाया,दरवाजा खुला और
ये तो कोई उसकी ही उमर का लड़का खड़ा था_

“जी कहिये!! किससे मिलना है??”

“जी वो !! हमको लग रा हम गलत घर मा आ गये,वो थोड़ी देर पहले सक्कर मांगने…….प्रेम की बात पूरी भी नही हुई कि अन्दर से वही रूपसी जो सुबह चिनी माँगने गई थी ,बाहर आई__
     “बेबी !! ये हमारे पड़ोसी हैं,मै अभी इन्ही के घर से चाय पीकर आ रही हूँ,देखो आंटी जी इस सो स्वीट ,मै भूल गई तो उन्होनें खुद चीनी भेज दी।
  आप अन्दर आईये ना भैय्या!! इनसे मिलिये ये मेरे पति है अतुल शर्मा,और मै आभा।।”

Advertisements

अच्छा हुआ दिल टूटने की आवाज़ नही होती वर्ना उस नाज़नीँ के मुहँ से भैय्या सुन के प्रेम का दिल जो चाक हुआ था कि बेचारा चीनी उन्हें बमुश्किल थमा भागा वहाँ से।।

  बेचारा प्रेम !!! माँ ने सलमान सोच कर नाम रखा पर किस्मत प्रेम चोपड़ा वाली हो गई ।।एक तो फष्ट इयरे मा लटक गये उसपे लडकियों का सनिचर !!
     इसिलिए जब अम्मा बोली चलो सनी देब  के मन्दिर मा मन्नत का तेल ऊल चढ़ा आये तो प्रेम तुरंते मान गया।।

    सनी देब में तेल चढ़ाया ,सत्ती गुड़ी में रोट चढ़ाया,बस वहीं माता का चमत्कार भवा!!!
   
    रोट चढ़ा के प्रेम मन्दिर की सीढिय़ां उतर अपनी चप्पल ढूँढ ही रहा था कि एक  नाज़ुक नवेली की साईकल की चेन उतर गई ,,अब किसी लड़की को  इतना बड़ा प्राब्लम हो और प्रेम अपनी चप्पल ढूँढता रहे शोभा देता है क्या?? बेचारा नंगे पैर गर्म तवे से जलते रोड पे खड़ा होकर चेन बनाता रहा,और लड़की अपनी गुलाबी चुन्नी से अपना आप को हवा झलती रही!! दो मिनट में चढ़ने वाली चेन भी उस दिन पूरा इक्कीस मिनट में चढ़ी,खैर चेन चढ़ा कर प्रेम ने नजरें ऊपर उठाई,लड़की ने प्रेम को देखा ,प्रेम ने लड़की को देखा ,और पहली बार दोनो दिलों में एक साथ घंटी बजी!!!

     पर ना ये घंटी जो दोनो को संग संग सुनाई दी ये सत्ती माता की आरती की घंटी थी,पर दोनो के हृदय ने एक दूसरे को चीन्ह लिया,,निरमा ने धीमे से कहा-” थैंक यू ….. अबकी बार प्रेम को अन्तिम अन्तरा सुनाई दिया जो सार्थक हो गया__
     “एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा ….
          जैसे नाचता मोर,जैसे रेशम की डोर
          जैसे परियों का राग,जैसे संदल की आग
          जैसे सोलह सिंगार जैसे रस की फुहार
          जैसे आहिस्ता आहिस्ता चढता नशा ।।

    अभी निरमा का नशा प्रेम पे चढ़ने ही वाला था कि बाँसुरी अपनी साईकल हाथ से खींचती चली आई__”तुम यहाँ कहाँ अटक गई,क्या हो गया निरमा??”

“हमारी साईकल का चेन उतर गया था,इन्होने ठीक किया।।”

“तो अब तो ठीक हो गया ना चेन,,अब चलो ,देर हो रही कॉलेज को।।”

  निरमा बाँसुरी के साथ चली गई और छोड़ गई प्रेम के दिल पे अपनी छाप!!!

   ये प्रेमप्रताप पाण्डेय की सम्पूर्ण जीवन गाथा थी जिसमें से सुविधानुसार प्रेम ने अन्तिम अंतरे वाली लड़की वाला अपना किस्सा वहाँ मौजूद सभी को कह सुनाया।।।
               सदियों से होता आ रहा कि किस्से कहानियाँ हम कानों से सुनते हैं लेकिन जाने क्यों हमारी आंखें फैल जाती हैं सुनते हुए,,वहाँ मौजूद सभी के साथ वही हुआ।

“अब करना क्या है गुरू?? सादी वादी का विचार है की नही।”प्रिंस के ऐसा पूछते ही प्रेम ने जवाब दिया

Advertisements

“हैं काहे नही बे!! शादी तो निरमा से ही करना चाहतें हैं,पर हमारी अम्मा भी कसम खाये बैठीं हैं,कहती है ,वा वर्माइन हमार  बहुरिया ना बनी,, नही ता हम जहर खा ले और मर जाब, ,,अब बोलो का करें,भैय्या जी आप ही कुछ रस्ता सुझाओ।।अभी तक अम्मा से डरे बैठे थे,अब ई गुड्डा और आ गया चौधरी बन के,हम भी कोनो डरते नई हैं,हम तो साले के पनही न पनही लगाते पर आपका और जिम का लिहाज कर के चुप रह गये।।”

“तुम चुप नही रहे बल्कि छुप गये ,अब जादा बतियाओ ना ,नही  हम तुमको सही का पनही (चप्पल)धर देब।।लल्लन के ऐसा बोलते ही प्रिंस के बंमपिलाट दिमाग में एक खतरनाक आइडिया आया

  “हम तो कहते हैं,तुम निरमा को ले कर देवरिया निकल जाओ,हम फ़ोन पे तुम्हें यहाँ का सब खबर देते रहेंगे ,जब मामला ठंडा हो जायेगा तो सादी उदी कर के वापस आ जाना।।”प्रिंस की इस बात का जवाब दिया बांसुरी ने

“वाह ! प्रिंस जवाब नही क्या आइडिया दिये हो” अपनी तारीफ सुन प्रिंस चौड़ा हो गया,तब बांसुरी ने अपनी बात आगे बढ़ाई

“काहे तुम क्राईम पैट्रोल बिल्कुल ही नई देखते क्या?? अरे भागने वालों का फ़ोन नम्बर सबसे पहले ट्रैक करती है पुलीस,उसके बाद इन लोगो का गला पकड़ कर पुलीस लायेगी और दोनो के घर वालो के हवाले कर देगी,उसके बाद मुश्किल से एक महीना मे निरमा की शादी उसके समाज में हो जायेगी और प्रेम यहाँ जिम मे चदरिया झीनी रे झीनी सुनेगा,और हम सब को सुनाएगा।।”

राजा ने बांसुरी को देखा और पूछा__”फिर तुम ही बताओ का करना चाहिये।।”

  “हां हम बताते हैं एक नम्बर आइडिया देंगे जिसका फेल होने का चांस बस फिफ्ती परसेन्ट है।”और बांसुरी हंसने लगी__”सुनो राजा तुम जाओ प्रेम के घर और उसकी अम्मा से बात करो,और हम जायेंगी निरमा के घर उसकी अम्मा से बात करने।।एक बार दोनो घर के गृहमंत्री तैय्यार हो गये तो प्रधान मंत्री को मनाना आसान हो जायेगा।।”

  “लेकिन बंसी अगर हमारी अम्मा नई मानी तो,का करेंगे फिर।””निरमा ने पूछा

Advertisements

“अगर ऐसा हुआ निरमा तो तुम फिर वही करना जो तुम्हरी अम्मा कहेंगी,क्योंकि एक बात याद रखो अपना अम्मा से ज्यादा तुमको कोई प्यार नही कर सकता ई प्रेम भी नही।।।अपनी जिद अपनी इच्छा अपने घर वालों को बताओ उन्हें मनाने की भी कोशिश करो पर जीने मरने की धमकी मत देना,,अगर प्रेम प्यार से मान गये तो अच्छा है नही तो तुम लोग उनकी बात मान जाना,उसी मे सब का भलाई है निरमा,,आज तुम भले हमारा बात ना समझो पर एक दिन हमारा बात तुम्हारा भेजा में घुस जायेगा।।”

  जिम में सन्नाटा छा गया ,तभी पिंकी ने आगे बढ़ कर बंसी को गले से लगा लिया___प्राउड ऑफ़ यू बंसी !! अब तुम और राजा भैय्या पहले इस प्रेम के प्रकरण को सुलझाओ फिर इसके बाद हमारे लिये काम करना है तुम दोनो को।।है ना।।”

“हां दीदी!!! बड़के भैय्या मान जायेंगे,और बस एक बार वो मान जाये फिर घर वाले भी ।।”दोनो सखियाँ एक साथ मुस्कुराने लगी

“राजा भैय्या अब हम घर जाते हैं,आप भी इस प्रेम का गणित बैठा के जल्दी से घर आ जाओ।।।”

जाते जाते पलट के पिंकी ने राजा को देखा और बोली__”अरे हाँ रेखा को भी फ़ोन कर लेना ,उसका फ़ोन आपने उठाया नही था।।और ज़ोर से खिल्खिलाती हुई पिंकी जिम से बाहर निकल गई ।।

प्रिंस और प्रेम शातिर मुस्कान के साथ भैय्या जी को देखने लगे वहीं लल्लन मन ही मन सोच मे पड़ गया कि बताओ क्या किस्मत है राजा भैय्या की होने वाली दुल्हीन और हमारी गर्ल फ्रेंड का एक ही नाम है।।सोचते सोचते वो भी मुस्कुराते हुए प्रिंस और प्रेम के साथ भैय्या जी को छेड़ने मे लग गया कि तभी उसके फ़ोन की रिंग बजने लगी__

  “हाँ बेबी!! बोलो …..बोलते हुए लल्लन बाहर की ओर निकल लिया।।।

उसके पीछे से एक ज़ोर का ठहाका उसका पीछा करता चला आया।।।
 
  क्रमशः

aparna..

हमारे दरमियां….

   ऑफिस से आकर सुप्रिया रोज़ की तरह अपने लिये एक कप कॉफ़ी बनाकर अपने फ्लैट की सबसे पसंदीदा जगह अपनी बालकनी में जा बैठी…
    उसकी रोज़ की यही दिनचर्या थी ,एक कप कॉफ़ी और रेडियो पर रफी साहब के गाने सुनते हुए मोबाईल पे आये दिन भर के मेसेज पढना और जवाब देना।रेडियो पर उसका मनपसंद गाना बजने लगा।

   सुहानी रात ढल चुकी ,ना जाने तुम कब आगे।

    वह कॉफ़ी पीते हुए मोबाइल पर मेसेज देखने लगी।
    वॉट्सएप्प पर एक नये नम्बर से आया हुआ पिंग देख सुप्रिया ने उसे खोला,जया का मेसेज था।।
  ” हाय सुप्रिया !! मैं जया,हम स्कूल मे साथ थे, पहचाना।”

सुप्रिया के चेहरे पे एक मुस्कान खिल गयी।।

” ओफ्कोर्स पहचाना,कैसे भूल सकती हूँ जया,भले ही हमारे सेक्शन अलग थे,पर स्कूल की यादें कभी भूली जा सकती हैं क्या?”

” ग्रेट!! सुप्रिया हम कुछ लोगों ने मिलकर स्कूल रियुनीयन प्लान किया है,सभी अपने बैचमेट को ग्रुप में जोड़ते जा रहें हैं,क्या तुझे भी उस ग्रुप में जोड़ लूँ, ग्रुप में हमारी क्लास के बॉयस भी हैं।कोई प्रॉब्लम तो नही है ना?

” बिल्कुल जया ,मुझे भी ग्रुप में जोड़ लो,कोई प्रॉब्लम नही।।

“30 दिसंबर को स्कूल में सुबह सारे शिक्षकों के साथ मनाएंगे और शाम को होटल में डिनर है अपनी अपनी फैमिली के साथ।”
  सभी कंट्री कर रहें हैं,मैं बाकी डिटेल्स बाद में बताऊँगी अभी तुझे जोड़ देती हूं ।

इसके कुछ 30 सेकेंड में ही एक नये ग्रुप में सुप्रिया को जोड़ लिया गया,ग्रुप का नाम था _ reunion 2005 DPS

   ग्रुप में जुड़ते ही सुप्रिया ने उसमें जुडे लोगों को देखना शुरु कर दिया,मन मे अजीब उथल पुथल मची थी,अजीब कश्मकश थी,किसी का चेहरा पहचाना सा लगता तो उसका नाम याद नही आ रहा था, किसी का नाम याद था तो चेहरा भूल गयी थी, उसे खुद पर ही हँसी आ रही थी__ और कर लो टॉप बेटा,पढ़ाई में यूँ खोये रहे कि साथ पढ़ने वालों का चेहरा भी भूल गये…तभी रेडियो पर अगला गाना बजा__

  भूल सकती नहीं आँखें वो सुहाना मंज़र
  जब तेरा हुस्न मेरे इश्क़ से टकराया था
  और फिर राह में बिखरे थे हज़ारोँ नग़में
   मैं वो नग़में तेरी आवाज़ को दे आया था      साज़-ए-दिल को उन्हीं गीतों का सहारा दे दे मेरा खोया हुआ रंगीन नज़ारा दे दे,मेरे महबूब तुझे...

हँसते हँसते उसकी आंखें एक चेहरे पर जाकर अटक गयी__ हाँ वही तो था कार्तिकेय चतुर्वेदी!!
    उसकी क्लास का सबसे शैतान नकारा निकम्मा बैक बेंचर।।
    बचपन से एक ही सेक्शन में थे दोनो,पर कभी दोनो की बात नही हुई,वो  अक्सर सबका मज़ाक बनाया करता ,कोई टीचर उसके लिये”डॉ वाशिंग पाउडर “था तो कोई ” हमारा बजाज “।

    सुप्रिया के चेहरे पर मुस्कान चली आयी ,,बारहवीं में थे तब अक्सर वो जीरो पीरियड़ में अपनी सहेलियों के साथ लाइब्रेरी चली जाया करती थी,
एक दिन लाइब्रेरी के ब्लैक बोर्ड पर उसे एक गाना बहुत ही सुंदर अक्षरों में लिखा दिखा

   चेहरे में घुल गया है हसीं चाँदनी का नूर
   आँखों में है चमन की जवाँ रात का सुरूर
    गरदन है एक झुकी हुई डाली गुलाब की
   अब क्या मिसाल दूँ  मैं तुम्हारे शबाब की।।

फिर तो ये रोज़ का सिलसिला ही बन गया,रोज़ जब सुप्रिया लाइब्रेरी जाती वहाँ ब्लैक बोर्ड पर एक गाना लिखा मिलता।

हुस्न वाले तेरा जवाब नही,
कोई तुझसा नही हजारों में

सुप्रिया से सभी सखियाँ कहतीं कि ये गाने उसीके लिये लिखे जातें हैं क्योंकि ऊपर सुप्रिया का s लिखा होता था ,और गाने के अंत में k

   आप के हसीन रूख पे आज नया नूर है,
   मेरा दिल मचल गया ,तो मेरा क्या कसूर है।।

सुप्रिया बनावटी गुस्सा दिखा कर रह जाती….
कार्तिक की स्कूल में जैसी छवि थी,लड़कियाँ तो क्या शरीफ पढ़ने लिखने वाले लड़के भी उससे दूर ही रहना पसंद करते थे,पर वो मनमौजी अपने मे मगन अपनी मस्तियों में खोया रहता।।
    ऐसे ही एक दिन बोर्ड पर लिखा मिला_

  हम आप की आंखों में इस दिल को बसा ले तो।

जाने सुप्रिया को क्या सुझी उसने उसके नीचे लिख दिया__
  हम मूंद के पलकों को इस दिल को सज़ा दे तो

अब तो लिखने वाले की हिम्मत और बढ गयी, और सुप्रिया की धड़कन भी ,ये सोच सोच कर कि आज जाने क्या लिखा मिलेगा, और अगले दिन_

   इतना है तुमसे प्यार मुझे मेरे राज़दार
   जितने के आसमान पर तारे है बेशुमार।।

बड़े ही अजीबोगरीब तरीके से ही सही कार्तिक ने अपने मन की बात लिख दी, इस गाने को पढ़ने के बाद सुप्रिया की लाइब्रेरी जाने की हिम्मत भी चूकने लगी,,वो कुछ दिनो तक स्कूल ही नही गयी,चार पांच  दिन बाद गयी तो पता चला किसी दूसरे सेक्शन के बच्चों से हुई मार पीट में कार्तिक के हाथों किसी को बहुत चोट लग गयी और इसिलिए कार्तिक को स्कूल से कुछ दिनों के लिये डिटेन कर दिया गया था।।
     उसके बाद बोर्ड की परीक्षा की तैयारियों में खो गयी,,इम्तहान होने के बाद कॉलेज की पढ़ाई के लिये वो अपने मामा जी के पास चली गयी और अपने शहर से नाता ही छूट गया।
   
    पिता की असामयिक मृत्यु और अनुकम्पा नियुक्ति में नौकरी के साथ मिली घर भर की जिम्मेदारियों ने फिर उसे खुद अपने बारे में कुछ सोचने का मौका ही नही दिया।।
    अपने से छोटी बहन को पढ़ा लिखा कर उसकी शादी निपटाने के बाद  वो अकेली ही अपनी माँ  का आसरा थी,इसलिये आजीवन शादी ना करने का निश्चय कर बैठी ,पर छै महीने पहले जब माँ भी उसे अकेले छोड़ गयी तब ये अकेलापन उसे काटने लगा था,पर अब उसके पास उपाय भी क्या बचा था,, 32 की उमर में अपनी शादी का खुद प्रयास करना कितना हास्यास्पद था…

   आज जया से बात होने के बाद वो एक बार फिर अपनी जिन्दगी की सबसे मीठी यादों में चली गयी थी।।
      अपनी सोच में डूबी ही थी कि उसी ग्रुप में किसी का उसे लेकर मेसेज आया__ स्वागत है सुप्रिया।

उसने भी स्माइली भेज दी,,तब दुसरी तरफ से फिर एक सन्देश आया__ अरे हमारा नम्बर तो सेव कर लो,वर्ना तुम्हारा डीपी कैसे देखेंगे।।

सुप्रिया ने मेसेज किया__ “किस नाम से तुम्हारा नम्बर सेव करुँ। ” अब वो बेचारी कैसे कहती की चेहरा तो दिख रहा लेकिन वो उसे पहचान ही नही पा रही

सामने वाले ने तुरंत जवाब दिया–” राघव सिंह ,,याद आया।।”अब तो भई तुम्हें बचपन की बातें याद नही दिल सकते वर्ना तुम्हारे मियाँ जी खफा हो जायेंगे ।।”

सुप्रिया ने वापस एक स्माईली भेज दी,,राघव !! कार्तिक का सबसे खास दोस्त!! अक्सर सुप्रिया के घर के चक्कर कार्तिक राघव के साथ ही लगाया करता था।।सबकी तो शादियां हो चुकी थी,राघव भी अपनी डीपी में अपनी खूबसूरत बीवी और प्यारे से बच्चे के साथ मुस्कुरा रहा था,,तो क्या कार्तिक की भी??
    और क्या?? कार्तिक ने भी शादी कर ही ली होगी, उन दोनों के बीच कोई बातचीत कोई करार तो हुआ नही कभी।।
    फोन बन्द कर वो अपने रात के खाने की तैयारी करने चली गयी।।
   
इसके बाद का एक हफ्ता ऑफिस में बहुत व्यस्त गुज़रा,उसे ठीक से सोने खाने का समय नही मिला, मोबाइल पर मेसेज देखना तो बहुत दूर की बात थी।

   फिर भी बीच में जब कभी समय मिलता वह अपना मोबाइल देख लेती उस ग्रुप में सभी आपस में एक दूसरे को संदेश भेजते पर उसमें कार्तिक का कभी कोई संदेश उसने नहीं देखा,  वह महीना गुजर गया और रीयूनियन वाला दिन आ गया।।

   रीयूनियन की तैयारी करने वाले ग्रुप ने बहुत सलीके से और बहुत जोरदार शानदार तैयारियां की थी लड़के तो यूनिफॉर्म की कलर के ही पेंट और शर्ट पहने हुए थे, लड़कियों ने यूनिफॉर्म की कलर की कुर्तियां डाली हुई थी ।।
वह भी नियत समय पर स्कूल पहुंच गई।।
    जया ने उसे देखते ही आगे बढ़ कर  गले से लगा लिया,, हाथ पकड़ के सभी के पास सुप्रिया को ले गई सारी लड़कियां एक एक कर आकर उसे गले मिलती रही ।
     अपने साथ की लड़कियों को अब एक्स एल और डबल एक्स एल साइज में देख देख कर सुप्रिया को उनके सुखी संतुष्ट वैवाहिक जीवन का परिचय मिलता गया,सबसे मिल कर वो भी प्रसन्न थी।।
” यार सुपी तू तो बिल्कुल नही बदली,अभी भी वैसी की वैसी है ,स्कूल ट्यूनीक पहन के आयेगी तो लगेगा स्कूल मे ही पढ़  रही।।

   अपने शिक्षकों सहेलियों सखियों सब से मिलकर भी सुप्रिया की आंखें किसी को इस भीड़ में तलाश रही थी।। उसकी क्लास के सभी लड़के बारी-बारी से उन लोगों की तरफ आए और मिलकर बातें करके चले गए।।
     स्कूल की प्लेज,प्रेयर सबने एक साथ गायी, सारे टीचर्स को कुछ गिफ्ट दिए गये ,स्कूल को 2005 बैच की तरफ से एक तोहफा दिया गया,,फिर कुछ टीचर्स ने अपने वक्तव्य वहां प्रस्तुत किए इसके साथ ही विद्यार्थियों में से भी कुछेक ने सामने आकर एक आध गीत और वक्तव्य प्रस्तुत किया।।।
     वह तालियाँ  बजा ही रही थी कि उसकी कुर्सी के ठीक पीछे कोई आकर बैठा उसने धीरे से सामने की तरफ झुक कर कहा __ सुप्रिया मुझे पहचाना मैं कार्तिक कार्तिकेय चतुर्वेदी!! कैसी हो?

  सुप्रिया ने झट से पलट कर देखा वह भी तो वैसा ही था जैसा स्कूल में दिखता था बस पहले से लंबा हो गया था और चौड़ा भी, वह उसे देख कर मुस्कुरा दी।।
“सुप्रिया तुमसे कुछ बात करनी है जरा बाहर आओ ।”

” कैसे हो कार्तिक ?? क्या कर रहे आजकल,बीवी बच्चे फैमिली सब कैसे हैं ।।”

” पहले तुम बताओ कैसी हो?? वैसे तुमने शादी नही की ये मुझे पता है,,मेरे बारे में तुम भले ही कुछ ना जानती हो पर तुम्हारे एक एक पल की खबर मुझे थी सुप्रिया,तुम्हें कॉलेज की पढ़ाई के बाद नौकरी करनी पड़ी,तुम आगे पढ़ना चाहती थी,सिविल सर्विस में जाना चाहती थी,पर घर की जिम्मेदारी ने तुम्हें तुम्हारे सपनों को पूरा करने नहीं दिया, यह सब मैं जानता हूं।।
   अभी वो दोनो बात् कर ही रहे थे कि राघव आ गया, उसी समय एक फोन आ जाने से कार्तिक अभी आया का इशारा कर के वहाँ से फोन पर बात करते हुए निकल गया।

” क्या सोच रही हो सुप्रिया,,कार्तिक को कैसे सब पता है यही ना,क्योंकि वह तुम्हारे हर संघर्ष में तुम्हारे पीछे खड़ा था पर तुमने कभी मुड़कर देखा ही नहीं तुमने कभी सोचा  जिस अनुकंपा नियुक्ति को पाने के लिए लोगों को एड़ियां रगड़नी  पड़ती है वह तुम्हें घर बैठे कैसे मिल गयी, इसके अलावा तुम्हारे पिता के नाम का ना तो कोई पैसा रुका और ना कोई और व्यवधान आया,, सब कुछ तुम्हें आसानी से मिलता गया,, क्योंकि वह  जानता था तुम्हारे जीवन में वैसे ही भगवान ने बहुत कष्ट दिए हैं कम से कम इन सबके लिए तुम्हें ज़माने से लड़ना ना पड़े।।
     वह तुम्हारे पीछे तो था पर तुम्हारे सामने कभी नहीं आ पाया उसके घर का तो तुम जानती हो उसके पिता का जमा जमाया कारोबार था  उसने उसी को आगे बढ़ाने की सोची,  उसके पिता को उसके दिमाग पर कुछ ज्यादा ही भरोसा था उन्होंने उसे विदेश एमबीए करने भेज दिया एमबीए करके आने के बाद उसने उनके बिजनेस को और चमका दिया और सिर्फ इसी शहर में नहीं इस देश के कई शहरों में उसका बिज़नेस फैला हुआ है,और वो  बिज़नेस ग्रुप का सी ई ओ है,क्लास का सबसे शैतान लड़का आज शहर का जाना माना बिज़नेस टाईकून है ।
” और शादी ?”

” हां शादी भी कर ली। उसकी मां ने ऐसा इमोशनल ब्लैकमेल किया कि उसे शादी के लिए हां कहना पड़ा ,,उसके पापा के बिजनेस पार्टनर की लड़की दिव्या से उसकी शादी हो गई लेकिन वो उसमें भी कहीं ना कहीं कुछ ऐसा ढूंढता रहा जो उस में था ही नहीं,, आखिर वो दोनो  साथ नहीं निभा सकें और शादी के 1 महीने में ही दिव्या उससे रूठ के अपने घर चली गई बस उसके बाद उन दोनो  तलाक हो गया,  तब से बस वो और उसका बिजनेस।। अब अंकल भी नहीं रहे सिर्फ आँटी  है घर पर,, अभी भी कहती हैं कि शादी कर ले कार्तिक!! मरने से पहले अपने नाती पोते का मुंह देखना चाहती हूं पर वो आँटी  को कैसे समझाये कि जिससे वो शादी करना चाहता है,वो तो कभी शादी ना करने की कसम खा कर बैठी है।।
    यकीन मानो आज भी वो तुम्हारा रास्ता देख रहा है।

   दोनों बात कर रहे थे कि कार्तिक जया और बाकी लोग भी वहां चले आए सबके आते राघव खामोश हो गया ,,सबने शाम को सही समय पर आने का वादा लिया और अपने अपने घर की ओर चले गए।।

   शाम को 7 बजे से होटल ऑर्किड में जो उन सब की महफिल सजी कि समा बन गया।।कार्तिक तो पहले से ही रफी साहब के गानों का जबर्दस्त प्रशंसक था,उसने इसिलिए रफी नाईट का आयोजन कर डाला,स्थानीय गायकों ने एक एक कर रफी साहब के गीत गाने शुरु किये

   इक हसीन शाम को दिल मेरा खो गया
पहले अपना हुआ करता था अब किसीका हो गया…..

राघव कहाँ चुप बैठने वाला था,उसने भी माईक पकड़ राग छेड़ दिया__

    गुनगुना रहे हैं भँवरे खिल रही है कलि कलि,।।

उसके बाद एक से एक गानों के साथ महफिल का रंग जमता चला गया , आखिर कार्तिक ने भी एक तराना सुप्रिया को देखते हुए छेड़ ही दिया__

    ऐसी ही रात, भीगी सी रात
हाथों में हाथ, होते वो साथ
कह लेते उनसे दिल की ये बात
अब तो ना सताओ, ओ हो …
खोया-खोया चांद खुला आस्माँ…

तभी एक वेटर ने सुप्रिया के हाथ मे एक पर्ची पकड़ा दी__” आज भी तुम्हारी राह देख रहा हूं,अगर तुम्हारी हाँ है तो कोई इशारा कर दो बस,,मैं आकर तुम्हारा हाथ थाम लूंगा….कार्तिक।।”

   सुप्रिया ने आगे बढ़ कर माईक अपने हाथ मे ले लिया और बहुत धीमे से शर्माते हुए गाना शुरु किया__

     बहार बन के आऊँ कभी तुम्हारी दुनिया मेगुज़र न जाएं ये दिन कहीं इसी तमन्ना में
तुम मेरे हो, हाँ तुम मेरे हो आज तुम इतना वादा करते जाना चुरा लिया … चुरा लिया है …

कार्तिक की खुशी का ठिकाना नही रहा ,वो तुरंत कूद कर सुप्रिया के पास पहुंच गया और उसके हाथ से हौले से माईक लेकर गाने को पूरा कर दिया__

   सजाऊँगा लुट कर भी तेरे बदन की डाली को
लहू जिगर का दूँगा हंसीं लबों की लाली को
  है वफ़ा क्या, इस जहाँ को एक दिन दिखला दूँगा मैं दीवाना चुरा लिया… चुरा लिया है …

और कार्तिक ने सुप्रिया का हाथ थाम लिया,सुप्रिया ने शरमा कर आंखे झुका ली ।।
   कार्तिक ने अपने जेब से एक रिंग निकाली और सुप्रिया से आंखों ही आंखों में पहनाने को पूछ लिया सुप्रिया के हाँ कहते ही उसने वो अंगूठी उसे पहना दी।।

   तभी किसी ने माईक लेकर एक नया तराना छेड़ दिया__

     इशारों इशारों में दिल लेने
वाले बता ये हुनर तूने सीखा कहाँ से
निगाहों निगाहों में जादू चलाना
मेरी जान सीखा है तुमने जहाँ से ….

aparna…


बाजीराव -2

     ……………
                  मूवी का नाम सुन मन अजीब सा खट्टा हो गया,बहुत भारी कदमों से मैं घर वापस आ गयी

      जिंदगी अपनी गति से चल रही थी,पर मेरे अन्दर ही कुछ टूट गया सा लग रहा था,जिसकी किरचें मेरी रगों मे दौड़ दौड़ के मुझे बार बार रनवीर की बेवफाई याद दिला रही थी,बार बार ये याद दिला रही थी कि एक औरत होते हुए भी मैं दो औरतों के साथ हो रहे अन्याय को बदल नही पा रही,कभी कभी लगता भी कि मैं क्यों इतना सोचती हूँ,संसार में ऐसे बहुत से लोग है जिन्हें जिन्दगी मे परेशानियों ने घेर रखा है,पर क्या मैं सबकी मदद कर सकतीं हूँ? नहीं ना ! तो जो जहां जैसा है,वैसे ही रहने देना चाहिये ।।।।क्या मैनें ही सब सही करने का ठेका ले रखा है??
   
             ये विचार कुछ क्षणों के लिये मन को राहत देता पर फिर प्रिया और अर्णव का चेहरा मेरी आंखों के आगे घूम जाता ,और मैं एक गहरी उदासी मे डूब जाती।।
     
               इस घटना को सिर्फ दो ही दिन बीते थे ,पर ये दो दिन दो वर्षों की तरह ही लम्बे प्रतीत हो रहे थे,इन दो दिनों मे मैने सिर्फ और सिर्फ सोचा ही था,सिक्के के दोनो पहलू,प्रिया का जीवन ,अर्णव,रनवीर और इन सब के बीच जाने कहाँ से आ के फंस गयी मैं।।
  
     अनु को किसी प्रेसेंटेशन के लिये बैंगलूर जाना पड़ गया था,सो वो भी नही थे,मुझे रोने से टोकने के लिये।।।।
      
                        वैसे भी अभी मैं एकान्त चाह रही थी,मुझे जी भर के रोना था और मन भर के सोचना था ,इसी रोने और सोचने के बीच ही दो दिन बीत गये,मैने ऑफ़िस से भी छुट्टी ले ली थी,दिमाग मे बस प्रिया अर्णव और रनवीर घूम रहे थे…….तभी मन मे अचानक एक और नाम कौंध गया ,,रागिनी!!!

                रागिनी तो मेरे फ्रेम से एकदम ही गायब हो गयी थी,शायद प्रिया के लिये मन मे इतनी अधिक सहानुभूति आ गयी थी कि रागिनी की तरफ ध्यान ही नही गया ,पर हुआ तो उस बेचारी के साथ भी वही था,जो प्रिया के साथ।।

       अचानक खयाल आया की क्यों ना रागिनी से ही एक बार बात की जाये।।।।
   
                  अनु ने जाने से पहले बहुत समझाया था की ज्यादा सोचना मत ,दूसरों के मामलों से दूर रहना,सब कुछ अच्छी बच्ची की तरह सुनती,मैं  उनके सामने चुप ही थी ,वैसे भी उन्हें एक बात को इतना लम्बा खींचना पसंद नही आता था।।।।।

        जाने क्या सोच मैं उठी और तैय्यार हो रागिनी के घर की तरफ चल पड़ी,उसका घर पिम्परी मे था ,और अभी शाम के 7बजे ट्रैफिक अपने पूरे शबाब पे होता था,ऐसे समय अपनी गाड़ी से जाना जरा मुश्किल था,दुसरी बात मैंने उसका घर देखा भी नही था,शादी के बाद से उसने कभी हमे घर बुलाया  नही था,वो अपने मे व्यस्त थी और हम लोग अपने मे।

     टैक्सी लेकर मैं उसकी सोसायटी पहुचीं ,धड़कते दिल से उसके घर पे दस्तक दी….मुझे पता था,रागिनी 5.30 तक घर आ जाती है,दरवाजा रागिनी ने ही खोला।

     ” what a pleasant surprise apps,,अन्दर आ जा,अनुपम भी हैं क्या?”

  “नही,मैं अकेले ही आयी हूँ ।”तुझसे कुछ बात करनी थी,कुछ पूछना था,इसीलिये अकेली ही चली आयी।”

“आ बैठ,मैं पानी लेकर आती हूँ ।”

      मैं रागिनी का घर ,उसका महल देखती ही रह गयी,इतनी कलात्मक अभिरुचि की है रागिनी ,ये तो मुझे पता ही नही था,मेरे साथ जब रहती थी तो मेरा आधा समय सिर्फ घर की साफ सफाई और उसका सामान समेटने मे ही खतम हो जाता था,मैं कितना भी समझा लूं वो अपने अल्हड़पने या कह लो आलस को छोड़ ही नही पाती थी,ये घर तो कहीं से भी रागिनी का लग ही नही रहा था।।।।

       दरवाजे पर ही लकड़ी का बना सिपाही तैनात था,जिसके पैरों के पास पीतल का कलात्मक पानी से भरा बरतन रखा था,जिसमें ताज़े खिले फूल महक रहे थे।।
      लिविंग रुम मे उसका टर्किश गुदगुदा कालीन बिछा था,जिसमे उसके महंगे और ब्रांडेड सोफे धन्से जा रहे थे,सोफे के ठीक पीछे की दीवार पे आदमकद नटराज की काली मूर्ती चमक रही थी,ऊपर क्रिस्टल का झाड़फानूस दमक रहा था, एक तरफ ब्रौस के बड़े बड़े फूलदान सजे थे ,तो दुसरी तरफ एक रंगबिरंगी छोटी सी साईकल रखी थी,जिसमें कुछ इनडोर प्लांट्स सजे थे।।।।

       घर इतना खूबसूरत और कलात्मक था की बड़े से बड़ा कला पारखी भी नतमस्तक हो जाये,इस सुन्दर घर का सबसे सुन्दर कोना था वो दीवार जिसपे रागिनी ने अपनी कई सारी तस्वीरें लगा रखी थी,नीचे लकड़ी की बनी छोटी से शैल्फ थी,जिसके ऊपर उसे मिले अलग अलग अवार्ड्स सजे थे,और पीछे दीवार पे तस्वीरें,सबसे बीच मे उसकी आदमकद  तस्वीर थी,अकेली!!  और आस पास बाकी तस्वीरें,किसी मे महिला दिवस पे अवार्ड लेती हुई रागिनी किसी मे बेस्ट एम्प्लायी का अवार्ड लेती हुई रागिनी,पर इतनी तस्वीरों मे किसी भी तस्वीर मे रनवीर नही था,बल्कि हमारे बॉस सुनील 3-4तस्वीरों मे रागिनी के साथ बड़ी आत्मीयता के साथ मुस्कुराते नज़र आ रहे थे।।।

     “अरे तू वहाँ खड़ी है,चल आजा मैं तेरे लिये तेरी पसंदीदा एस्प्रेस्सो बना लायी हूँ ।”
  
    “घर बहुत सुन्दर  है,रागिनी!” थैंक यू सो मच ,फ़ॉर सच आ नाइस कौफ़ी ।”तुझे अभी भी मेरी पसंद याद है।”
   “कैसे भूल सकती हूँ एप्स ,तेरी रगों मे खून से ज्यादा तो कौफ़ी ही घुली है।”
  ऐसा कह कर रागिनी ज़ोर से हंस पड़ी ।

“हाँ ! जैसे तेरी रगों मे रनवीर का प्यार घुला है।”

पर अबकी बार रागिनी मुस्कुरा नही पायी, मैं दुविधा मे थी कि अचानक रागिनी मेरे पास आ कर बैठ गयी,मेरा हाथ अपने हाथों मे ले उसने कहना शुरु किया।।

   “अपर्णा तुझसे बहुत पहले ही ये सब बताना चाहती थी,पर सब कुछ इतनी जल्दबाजी मे हुआ की मुझे तुझसे या किसी और से कुछ कहने का समय ही नही मिला।”
“तुझे तो पता ही है की मैं शुरु से ही सुनील सर के साथ प्रोजेक्ट मे थी,साथ काम करते हुए हमारी अच्छी दोस्ती भी हो गयी।”
  
   “हाँ,ये तो मैं  अच्छे से जानती हूँ,बल्कि सारा स्टाफ जानता है कि तू उनकी फेवरेट है।।”

    “बस ,दोस्ती जैसे जैसे गहरी होती गयी,हम एक दूसरे के परिवारों के बारे मे भी जानते गये,सुनील की पत्नि “वूमेन्स एरा” की एडिटर है, गज़ब की तेज-तर्रार औरत है,उसे सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में ही सोचना पसंद है,अपने कैरियर को लेके वो इतनी पसेसिव है की शादी के सात सालों मे भी उसने बच्चे के लिये नही सोचा ।।।।।
    पहले इन्ही छोटी-छोटी बातों पे होने वाले पति पत्नि के मतभेद धीरे-धीरे झगडों मे बदलने लगे,और फिर उनके बीच की खाई इतनी गहरी हो गयी कि उसे पाटने की कोई गुंजाईश दोनो के बीच नही रह गयी।।।और दोनो ने तलाक लेने का निर्णय ले लिया।।
     ऐसी उदासी और टूटन भरे वक्त पे मै सुनील के साथ उसका सहारा बनी खड़ी थी,उसके लिये मेरी सहानभूति कब प्यार मे बदल गयी ,पता ही नही चला,जब कोर्ट के लीगल नोटिस के कारण कुछ समय के लिये सुनील और वनीता  को अलग रहना था,तब सुनील मेरे साथ रहने चला आया,हम दोनों ही शादी के पहले किसी से कुछ बताना नही चाहते थे,मैं  सुनील के साथ रह रही ,ये बस तुझे पता था,पर तुझे भी आधा अधूरा ही बताया था मैनें ।।

    “जाने कहाँ से वनीता को इस बात की भनक लग गयी,और वो एकदम से भड़क गयी ,उसकी स्त्री सुलभ डाह अचानक ही सर उठा के खड़ी हो गयी और उसने सुनील से तलाक को मना कर दिया।।।”
    “बहुत समझाने बुझाने पर  वो तलाक के लिये तो तैय्यार हो गयी ,पर मुझसे उसे ऐसी जलन हुई की उसने एकदम ही बचकानी सी शर्त रखी कि जब तक मैं किसी और से शादी ना कर लूं वो कोर्ट मे हाज़िरी नही देगी……..हमें तो कुछ सूझ ही नही रहा था,पर तभी……”
     
      रागिनी ने पानी पी के अपना गला तर किया और फिर आगे बोलना शुरु किया।।

    “मेरे बचपन का दोस्त रनवीर मसीहा बन के हमारी मदद के लिये आगे आ गया।।।
      असल मे हमारा एक ओल्ड स्कूल ग्रूप है ,उस मे कुछ दिन पहले ही किसी ने  रनवीर का नम्बर भी जोड़ दिया,बातों बातों मे ही पता चला की वो भी यहीं पुणे रहता है,तब हमने मिलने का सोचा ।।।
    पुराने दोस्तों की बात ही अलग होती है………,जब वो मुझसे मिलने मेरे घर आया तब सुनील भी घर पे ही थे,बातें चली तो चलती चली गई और हमने उसे सारी बातें बता दी।।।
         उसने हमारी मुसीबत का एक अजीब सा हल निकाल लिया,वैसे भी जब तक सुनील का तलाक नही हो जाता मै और सुनील शादी नही कर सकते थे।।।
       वनीता ने सिर्फ  मेरी शादी की शर्त रखी थी उसकी शर्त ये तो थी नही की वो मेरी शादी मे आयेगी,तो बस उस दिन  औफ़िस पार्टी मे सिर्फ वनीता को दिखाने के लिये रनवीर मेरे पति बन के आये,उनका प्लान बस वनीता से मिल के निकलना था,वो तेरे साथ ही खड़ी थी,कुछ बनावटी ना लगे इसलिए मैनें पहले रनवीर को तुझसे मिलाया,खैर उस दिन तो तेरी तबियत बिगड़ गयी  और तू तुरंत ही चली गयी……रनवीर कुछ देर वनीता सुनील और मेरे साथ रहा,फिर वो भी चला गया।।।
    पर इस के बाद वनीता कुछ ठंडी पड़ गयी,उसका गुस्सा भी कम हो गया,और अब वो तलाक की सारी प्रोसेस मे सहयोग करने के लिये तैय्यार भी हो गयी है।।।

     “मैं बहुत पहले ही तुझे अपने और सुनील के बारे मे बताना चाहती थी,पर सुनील ने ही मना किया की औफ़िस मे अगर खबर फैल गयी तो वनीता हमारा जीना मुश्किल कर देगी।”

    “तो इसका मतलब रनवीर तेरा पति नही है।”

    “नही मैडम रनवीर मेरा पति नही है,पर हाँ अगले महीने आखिरी सुनवाई है,फिर सुनील का तलाक हो जाने के बाद मै और वो शादी कर लेंगे और सिंगापुर की ब्रांच मे ट्रांसफर भी ले लेंगे।”

  “अरे वाह ! बहुत खूब ,तूने तो सब कुछ प्लान कर लिया है।।”

   “हाँ!अब मैं भी एक सुकून भरी जिन्दगी चाहतीं हूँ,पर ये बता की तू मुझसे क्या पूछना चाहती थी??

  मैं मुस्कुराने लगी……
            “ये पूछना चाहती थी डम्बो कि तूने अपने घर का इंटीरियर किससे करवाया,तू तो इतनी कला मर्मज्ञ नही है।”

    “नही जी मैं कहाँ ? ये सब सुनील का किया धरा है,उन्हें भी तो तेरे जैसे सारे पागलों वाले शौक हैं ,जहां जातें हैं,कुछ ना कुछ उठा लातें हैं,एक और शौक भी तुझसे मिलता है,किताबों का,कभी फुर्सत मे उनकी लायब्रेरी देखना खुश हो जायेगी तू।”
  
      बाहर हल्की हल्की सी बारीश शुरु हो गयी थी,और अन्दर बैठे हम दोनों खुशी की बौछारों से सराबोर थे,तभी मेरा फ़ोन बज उठा,प्रिया का फ़ोन था।

   “कहाँ है एपी?तेरा घर भी बन्द है,तूने  चाबियां भी नही छोड़ी मेरे पास।।जल्दी से घर आ जा,तेरे लिये एक सरप्राईस है।”

    मैं कुछ पूछती उसके पहले ही फ़ोन कट गया, मेरा काम तो हो ही गया था,रागिनी से बिदा लेके मैं घर को चल दी।।।।रास्ते भर मुस्कुराते हुए,गुनगुनाते हुए घर पहुचीं ,मन फूल सा हल्का हो गया था,मेरा मन प्रिया से मिलने को बहुत बेचैन था,मैं प्रिया के घर पहुचीं तो वहाँ वाकई मेरे लिये सरप्राईस था,अनु वापस आ गये थे।
   
      बैठक मे अनु ,रनवीर के साथ बैठे चाय पी रहे थे,मैं भी शामिल हो गयी।।।।

        “तुम तो कल आने वाले थे ना?

    “क्या मैडम ? हमने सोचा एक दिन पहले पहुचं के आपको सरप्राईस किया जाये पर गायब होकर आपने ही सरप्राईस दे दिया।”

   प्रिया हँसते हुए मेरे लिये चाय बनाने अन्दर चली गयी तब मैं रनवीर से मुखातिब हुई…

    “रनवीर मैनें उस दिन आपके लिये बहुत गलत सोच लिया,मुझे माफ कर दीजिये।”

    “इसमें आपकी क्या गलती,आपकी जगह कोई भी होता तो यही समझता,गनीमत रही की आपने प्रिया से कुछ नही कहा,वैसे मैं उसके लिये भी तैय्यार था,मुझे मेरे प्यार पे भरोसा था,मै प्रिया को समझा लेता।”

     “क्या समझा लेते मुझे?”

    “भाभी जी रनवीर नही मैं आपको समझाना चाहता था,कि आप प्लीज़ अपर्णा के हाथ की ज़हरीली चाय की तारीफ ना किया करो,बल्कि इसे अच्छी चाय बनाना सिखा दो,जैसी आप बनाती हो।”
    “क्या भाई साहब ,कुछ भी बोलते हो आप ,इतनी प्यारी सी है मेरी सहेली,मीठी चाय नही बनाती तो क्या ,मीठा गाती तो है।”चल एपी कुछ सुना दे अच्छा सा।”

    “ना !आज तो अनु सुनायेंगे ,मेरा पसंदीदा गाना….
   
  “तू बन जा गली बनारस की,मैं शाम तलक भटकूं तुझमें…….”
    
    बाहर होती हल्की बारीश और भीतर चलते हास परिहास में  मेरे मन की सारी कालिख धुल गयी थी…….

aparna…..

जीवनसाथी- 112

जीवनसाथी – 112




मुस्कुराती हुई पिया अपनी गाड़ी उठाये महल की तरफ बढ़ गई उसे पता था कि समर इस वक्त अपने घर पर ही मिलेगा।
महल में पहुंचने के बाद वह सीधे समर के कमरे की तरफ बढ़ गई।
समर अपने कमरे में बैठा चार पांच लोगों से किसी बात पर सलाह मशवरा कर रहा था….
चुनाव को अब बहुत कम समय बाकी रह गया था, और इसलिए समर की व्यस्तता भी बहुत ज्यादा बढ़ गई थी।
मुस्कुराकर पिया भी उसकी कुर्सी के ठीक सामने कुर्सी खींच कर बैठ गयी।
समर में एक नजर उसे देखा और वापस अपनी फाइलों के पन्ने पलटने लगा।
वह अपने साथ के लोगों के साथ बातें करने और काम करने में इतना व्यस्त था कि पिया की तरफ ध्यान ही नही दे पाया।
कुछ देर तक पिया वहां बैठी उसे देखती रही, पर जब समर ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तब उसे भी गुस्सा आने लगा।

वह चुपचाप उठी और मुड़कर वापस जाने लगी । उसे जाते देख समर ने अपने साथ बैठे लोगों को इशारे से बाहर भेज दिया …- ” कहां चली जा रही हो?

समर के सवाल पर पिया चौक कर उसे देखने लगी-” अरे आप की मीटिंग खत्म हो गई मंत्री जी।

‘खत्म तो नहीं हुई लेकिन खत्म करनी पड़ी, अब बोलो कैसे आना हुआ यहां?’

“वाह आप पूछ तो ऐसे रहे जैसे जानते ही नहीं।”

” ओह्ह रियली! मैं नहीं जानता कि आप अपना कीमती वक्त निकालकर यहां किस लिए आई है?”

“ओह! तो यह बात है! मतलब मंत्री जी नाराज हो गए हैं! मैं कॉफी शॉप पर समय में नहीं पहुंच पाई इसलिए ना।

“किसने कहा मैं नाराज हो गया हूं? जिन लोगों को वक्त की कदर नहीं, मैं भी उनकी कदर नहीं करता।

“ओहो फिलॉस्फर जी सुनिए! वक्त की कदर और बेकद्री वाली कोई बात ही नहीं थी। मैं निकल ही रही थी कि एक इमरजेंसी केस चलाया, अब पेशेंट को एकदम इमरजेंसी में अकेला छोड़ कर तो मैं नहीं आ सकती ना!”

“तो आप क्यों आई हो? अभी भी पेशेंट के पास ही रहना था। मैंने तो नही बुलाया।”

“अब वह स्टेबल है, उसे मेरी जरूरत नहीं थी इसलिए मैं आ गई।”

“इसका मतलब आप के मरीज ही आपके लिए सबसे पहले हैं। जब उन्हें आपकी जरूरत नहीं होगी तभी आप बाकी लोगों पर ध्यान दे पाएंगी।”

“नहीं मेरा यह मतलब तो नहीं था!”

“तो और क्या मतलब है आपका?”

“मंत्री जी! हो क्या गया है आपको ? आप भी तो अपने कैरियर के लिए बहुत कॉन्शियस हैं। आपके लिए भी तो आपका काम ही सबसे पहले हैं। तो अगर मेरे लिए मेरा काम इंपॉर्टेंट हो गया तो आपको इतनी नाराजगी क्यों हो रही है ।यह तो गलत बात हुई ना आपके अपने खुद के लिए अलग रूल्स और मेरे लिए अलग रूल्स।”

“तुम्हारे लिए रूल्स बनाने वाला मैं होता कौन हूं? तुम्हारी लाइफ है तुम्हारे रूल्स तुम जो चाहे वह करो! जैसे चाहे वैसे रहो। बड़ी से बड़ी बातें मुझसे छुपा जाओ। मैं कौन होता हूँ तुम्हें कुछ बोलने वाला?”

“मैंने कौन सी बड़ी बात छुपा ली? “

पिया का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था उसकी चाची अभी कुछ दिन पहले ही उसकी मां के पास एक रिश्ता लेकर आई थी! लड़का रिश्तेदारी में ही था। डॉक्टर था और दिल्ली में अच्छी खासी प्रैक्टिस थी।
पिया का परिवार पिया के पीछे लगा हुआ था कि वह एक बार हां बोल दे तो चट मंगनी पट ब्याह कर उसके घर के लोग गंगा नहा लेंगे। वह तो पिया ही थी कि कोई ना कोई बहाना बनाकर अब तक उस रिश्ते के लिए टालती चली आ रही थी।
उसे अचानक से लगा कि कहीं समर को इस रिश्ते के बारे में कोई खबर तो नहीं हो गई।

“मैं तुम्हें बताने ही वाली थी लेकिन मौका ही नहीं मिला।”

“क्या बताने वाली थी?”

“यही कि घर पर रिश्ता देखा जा रहा है, और इस बार…..

समर ने पिया की बात आधे में ही काट दी, अब उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच चुका था। अब तक तो वह बांसुरी की बात छिपाए जाने से ही नाराज था, लेकिन अब पिया ने जो बात बोली थी उसे सुनकर समर का दिमाग उड़ चुका था।

“क्या इस बार तुम हां करने वाली हो, तो जाओ कह दो किसने रोका है तुम्हें। तुम वैसे भी अपनी मर्जी की मालिक हो। नए जमाने की लड़की हो। तुम्हें किसी का बंधन क्यों पसंद आएगा भला?”

“यह कैसी बातें कर रहे हो समर?”

“कैसी बातें कर रहा हूं? बिल्कुल सही बातें कर रहा हूं! कौन है वह जहाँ तुम्हारा रिश्ता तय हो रहा है?”

“डॉक्टर ही है दिल्ली में है प्रैक्टिस करता है।”

“बस और क्या चाहिए? लड़के का अच्छा जमा जमाया अस्पताल है। शादी के बाद तुम दोनों हस्बैंड वाइफ मिलकर उस अस्पताल को चलाना।”

बातों का रुख कड़वाहट की ओर मुड़ता देख पिया ने सोचा कि कुछ हल्का-फुल्का मजाक करके बातों को हल्का बना लिया जाए!
वो हंसने लगी- ” हां बिल्कुल मैं और मेरा हस्बैंड अस्पताल खोलेंगे! और तुम जब भी जरूरत हो इलाज करवाने चले आना। तुम्हारा पूरा इलाज फ्री में होगा। और सुनो तुम्हारे साथ साथ तुम्हारे मॉम डैड तुम्हारे सारे परिवार का भी इलाज मेरे अस्पताल में फ्री हो जाएगा।”

समर का दिमाग इस वक्त इतना खराब था कि उसे यह लगा ही नहीं कि पिया ने सिर्फ मजाक के तौर पर यह कहा है !
समर चुपचाप उठकर अपने कमरे से बाहर निकल गया। पिया ने उसे रोकने और मनाने की कोशिश भी की ,वह इसके पीछे भागी लेकिन समर ने पलट कर उसे जोर से डांट लगा दी-” खबरदार जो मेरे पीछे आने की कोशिश की, इसी वक्त निकलो और अपने अस्पताल घर जहाँ जाना है चली जाओ। बस मुझे नज़र मत आना।”

आश्चर्य से समर को देखती पिया तेज तेज कदमों से वहां से बाहर निकल गई।

वह अपने काम के कारण ही तो लेट हुई थी कोई जानबूझकर तो उसने देर की नहीं थी। फिर समर इतना नाराज क्यों था? उसे समर की नाराजगी का कोई कारण समझ नहीं आया ?आंखों में मोटे मोटे आंसू लिए वह अपनी बाइक चलाती अपने हॉस्टल की तरफ बढ़ गई आज उसका मन बहुत ही खट्टा हो गया था।

वह घर पहुंची ही थी कि उसकी मां का फोन चला आया। मां बड़े उत्साह से उसे उसके होने वाले ससुराल वालों के बारे में बता रही थी। मां से कुछ देर बातें करने के बाद उसका मन थोड़ा हल्का होने लग गया था। लेकिन अब भी उसे समर के ऊपर बहुत तेज गुस्सा आ रहा था।

यह कैसा बचपना था समर का? बाकी पूरी दुनिया के लिए तो वह बहुत समझदार बन जाता था, फिर उसी के लिए इतना नासमझ इतना बच्चों सा क्यों हो जाता था?
कि तभी पिया की मां ने एक और विस्फोट कर दिया

“बेटा अमोल तुझसे मिलना चाहता है। मैंने तेरे शहर का पता बता दिया है वह कल सुबह तुझसे मिलने आ रहा है।
देख अब की बार कोई भी उटपटांग हरकत मत करना। इस बार संभाल लेना। वह दो दिन रुकेगा। कल रात में उसकी वापसी की फ्लाइट है। बस दो दिन अच्छे से बन संवर के उसे थोड़ा वक्त दे देना। क्योंकि बेटा यह रिश्ता तेरे पापा जी को और मुझे बहुत पसंद है। सब कुछ एकदम सही है किस्मत से ऐसे अच्छे रिश्ते मिलते हैं अब तो कोई नाटक या नखरा मत करना समझी।”

“अरे मां !!यह क्या किया? यहां क्यों भेज रही हो? यहां कहां रुकेगा वह? “

“वहां उसकी दीदी और जीजाजी रहते हैं। उनके घर पर रुकेगा । तुझसे बस मिलने आएगा, तो तू कल उसके मिलने आने के हिसाब से अपनी ड्यूटी देख लेना समझी।

“हां डॉक्टर थोड़ी ना हूं! मैं तो कलेक्टर हूं यहां कि।
मेरे से मिलने जुलने वालों के आधार पर ही मेरी ड्यूटी का टाइम डिसाइड करती है सरकार है ना।”

“अब वह सब मैं नहीं जानती, लेकिन लड़कियों के लिए पढ़ाई लिखाई जितनी जरूरी है उतना ही सही समय पर शादी पर हो जाना भी बहुत जरूरी है।
निम्मी की बुआ याद है? पढ़ाई पर पढ़ाई पढ़ाई पर पढ़ाई , इतनी पढ़ाई कर ली, उन्होंने कि उनके डिग्री के हिसाब से लड़का ही नहीं मिला।
सरोज आंटी की बेटी याद है पहले एमबीबीएस किया फिर उसके बाद रूरल सर्विस की उसके बाद एमडी किया। इसके बाद भी उसका मन नहीं भरा लड़की पीएचडी भी करना चाह रही थी अब देखो कुंवारी बैठी क्लिनिक में बस मरीजों के साथ टाइम पास करती है।
इसीलिए बड़े बुजुर्ग कह गए हैं लड़की अगर डॉक्टर बने तो पढ़ाई के बीच में ही उसको ब्याह दो, तभी वह ज्यादा सफल होती है । और सच मान पिया यह टोटका भी है पढ़ाई के बीच में शादी हो जाए तो पढ़ाई में भी इजाफा होता है। नौकरी भी जल्दी लगती है। और हर तरफ से बरकत होती है। और वो याद है तुझे, रुक्मिणी बुआ की मंझली बहु के चाचा की लड़कीं। अब तो वो क्या कहतें हैं ….

“मम्मी कहां से लाती हो यार ऐसे फंडे ! पहले ही दिमाग खराब हुआ पड़ा है और तुम हो कि के बी सी खेल रही हो।रुक्मिणी फुई की बहु के चाचा की लड़की कौन थी पहचाने और जीतें पचास हज़ार रुपये। “


” वो सब छोड़ , कल तू उससे मिलने चली जाना ,समझी? “

एक छोटा सा “हम्म” बोल कर उसने फ़ोन रख दिया।

*****

चुनाव की तैयारियां अपने अंतिम पड़ाव पर थीं। अब सभी की व्यस्तता बढ़ चुकी थी।
इसके साथ ही मायानगरी में भी दाखिले शुरू हो गए थे। निरमा पिछले कुछ समय से खाली भले ही बैठी रही हो लेकिन उसमें अपने काम को सम्पूर्णता से करने का जज़्बा था। राजा भैया के इतने विश्वास से दिए पद की गरिमा उसे बनाये रखनी थी। वो पूरे जोश से अपने काम में डूब गई थी।

ऐसे ही एक शाम वो अपना लैपटॉप खोले काम कर रही थी…
उसी वक्त अम्मा ने मीठी के लिए दूध बनाने गैस पर चढ़ा रखा था। बाहर ज़रा मौसम खराब होता देख अम्मा ने घर निकलने की इच्छा जताई जिसे निरमा ने मान लिया…

“बहुरिया खाना बना कर रख दिये हैं और बिटिया के लिए दूध बना कर भी रख दिये हैं। थोड़ा ठंडा हो जाये तब पिला देना। “

“ठीक है अम्मा ! “लैपटॉप से नज़र हटाये बिना ही निरमा ने जवाब दिया और वापस काम में लग गयी।
अम्मा अपने घर के लिए निकल गईं। मीठी वहीं इधर उधर खेलती बैठी रही।
मीठी कुछ देर में खेलते कूदते उसी टेबल तक पहुंच गईं जहाँ अम्मा जाते वक्त दूध रख गयीं थीं। दूध ज़रा किनारे ही रखा था।
मीठी अब चलने फिरने लगी थी वह टेबल पर के सामान इधर-उधर करती खेल रहे थी। दूध का गिलास गर्म था उसमें से धुआं निकल रहा था, मीठी उस गिलास तक पहुंचने ही वाली थी कि, तभी बाहर से प्रेम भागता हुआ भीतर चला आया। उसने टेबल पर रखा दूध का गिलास उठाया और उसे जरा भीतर की तरफ रख दिया। और तुरंत मीठी को गोद में उठा लिया…
प्रेम के कुछ इस तरह आने और मीठी को उठाने तक में निरमा का ध्यान भी उन दोनों पर चला गया वह भी चौक कर उन दोनों के पास चली आई।
उसने तुरंत मीठी को गोद में ले लिया….

निरमा की इस सब में कोई गलती नहीं थी , लेकिन फिर भी उसे आत्मग्लानि ने घेर लिया ।। वो मीठी को गोद में लिए एक किनारे जाकर बैठ गई ।उसने डरते हुए प्रेम की तरफ देखा…-” आई एम सॉरी प्रेम जी ! मैं अपने काम में इतनी मग्न हो गई थी, कि मेरा ध्यान ही नहीं गया कि ग्लास टेबल पर एकदम किनारे रखा है। और मीठी का हाथ पड़ कर गिर सकता है। मीठी उस दूध से जल सकती है। आइंदा मैं इस बात का पूरा ध्यान रखूंगी।”

प्रेम भी निरमा के पास आकर बैठ गया…-” इसमें तुम्हें सॉरी बोलने की क्या बात है निरमा? अब तुम्हें बस इतना करना कि अगली बार से गिलास मीठी की पहुंच से थोड़ा दूर रखा हो।

निरमा आंखें फाड़े प्रेम को देखती रह गई। कोई और आदमी होता तो अभी अपनी पत्नी को उसके इस तरह काम में मगन रहकर बच्चे की तरफ ध्यान ना देने के लिए सौ बातें सुना चुका होता। पुरूष का सहज स्वभाव यही तो होता है। गलती किसी की भी हो लेकिन उसका ठीकरा वह अपनी पत्नी के माथे ही फोड़ते हैं। उसने खुद अपने आसपास आज तक यही देखा था।

अगर औरत नौकरी कर रही है। घर से बाहर जाकर काम कर रही है, तब भी ज्यादातर घरों में पुरुष उन्हें इसी शर्त पर बाहर जाकर काम करने देते हैं, कि वह अपने घर के कामों में किसी भी तरह की कोई कोताही नहीं करेंगी।
जैसे बाहर जाकर काम करना स्त्रियों का कोई शौक हो। बाहर उन्हें काम करना ही नही पड़ता हो।
वो तो महज मौज मस्ती करने निकलती हों। वही काम अगर पुरुष बाहर जाकर करता है तो शाम को लौट कर वह इतना थक जाता है की फ्रेश होने के लिए उसे तुरंत गर्म चाय पानी सब कुछ सोफे पर ही चाहिए। लेकिन उसी काम को कर के बाहर से लौटी स्त्री घर भर में किसी से एक ग्लास पानी की भी उम्मीद नहीं कर सकती। चाहे उसने ऑफिस में कितनी भी मेहनत की हो कितना सारा भी काम किया हो,लेकिन शाम को थक कर लौटने के बाद उसे चाय भी पीनी हो तो खुद ही बनाना पड़ता है ।
अगर पुरुष ऑफिस में कुछ अधिक वक्त तक रुक कर काम करें तो वह उसका ओवरटाइम कहलाता है। लेकिन अगर कभी किसी औरत को ओवरटाइम करने रुकना पड़ जाए तो बेचारी मन ही मन घबराने लगती है कि घर जाने के बाद पति को क्या कहकर सफाई देगी।
बिना किसी गलती के वो हर पल एक अग्निपरीक्षा में जलती रहती है कि जाने उसकी किस चूक पर घर में बवाल मच जाए।
यही तो आज तक उसने अपने आसपास देखा था। उसकी पड़ोसन रीमा भाभी का यही हाल था। बेचारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाया करती थी। सुबह 8:00 बजे के स्कूल के लिए निकलने से पहले घर भर का लंच और नाश्ता तैयार करके , पति, बच्चों को टिफिन देकर अपना टिफिन लेकर निकलती। दोपहर तीन बजे आने के बाद अपनी इतनी थकान के बावजूद एक कप चाय पीकर और आधे घंटे का आराम लेकर वो रात के खाने की तैयारी में जुट जाती। इसके बावजूद अक्सर भाई साहब को यही कहते सुना कि-” भई हमारे ऑफिस की थकान की बात ही अलग है। जबकि वह दस बजे ऑफिस जाते और शाम पांच बजे वापस आ जाते। इस जाने और आने के पहले और बाद में उन्हें कोई एक्स्ट्रा काम नहीं करना पड़ता था। रीमा भाभी जाने से पहले उनके ऑफिस के कपड़े रुमाल मोज़े सब कुछ सलीके से पलंग पर निकाल कर रख जाती। उनके लौट कर आने के बाद हाथ मुंह धोने तक में गरम नाश्ता और चाय टेबल पर सजा चुकी होती। लेकिन इस सबके बावजूद उनके घर में कभी किसी ने रीमा भाभी के काम को कोई महत्व नहीं दिया। रीमा भाभी ऐसी अकेली औरत नहीं थी, बल्कि निरमा ने तो अपने आसपास अपने ऑफिस में कई महिलाओं को ऐसे ही खटते देखा था।

उसे हमेशा यही लगता था, जब एक आदमी नौकरी करता है तो उसके साथ उसका पूरा परिवार उसकी नौकरी करता है। सुबह उसके ऑफिस जाने के पहले से लेकर उसके ऑफिस से लौटने के बाद तक हर कोई उस आदमी के पीछे हाथ बांधे दौड़ता रहता है। लेकिन जब एक औरत नौकरी करती है तो वह अकेले अपनी नौकरी करती है। उसका साथ देने के लिए ना तो उसका पति होता है और ना ही बच्चा।

निरमा को अपने ख्यालों में खोए देख प्रेम उसके पास सरक आया।

“तुम कुछ ज्यादा ही घबरा गई हो शायद! ऐसी कोई बहुत बड़ी बात नहीं हो गई है निरमा। छोटे बच्चों के घर में इस तरह के छोटे मोटे हादसे होते रहते हैं। और फिर यहां तो कोई हादसा हुआ ही नहीं। मैंने पहले ही गिलास हटा दिया था। फिर क्यों इतनी परेशान हो? “

निरमा प्रेम के गले से लग कर सिसक उठी। वाकई प्रेम औरों से अलग था। बेहद अलग।
और इसीलिए शायद निरमा की जिम्मेदारियां भी बढ़ गई थी। उसने मन ही मन यह कसम उठा ली कि अब चाहे कितनी भी व्यस्तता हो लेकिन वह आइंदा ऐसी लापरवाही कभी नहीं करेगी। अगर उसे घर से बाहर जाकर काम करना है, तो उस काम के प्रति लगन में वह कभी भी अपने घर पति और बच्चे की उपेक्षा नही करेगी।
ऐसा करने में मेहनत जरूर थोड़ी ज्यादा हो जाएगी, लेकिन प्रेम जैसा पति अगर हर कदम पर उसकी सहायता करने को तैयार बैठा है, तो वह भी हर कठिनाई को पार करते हुए खुद को साबित करके रहेगी।

प्रेम के सीने से लगी निरमा ने खुद को थोड़ा सा और प्रेम में समेट लिया।

*******

सुबह-सुबह बांसुरी बालकनी में बैठी सामने के कमरे को देख रही थी। उसे वह पल याद आ रहे थे जब वह पहली बार पिंकी और राजा के साथ महल में आई थी। राजा के कमरे के ठीक सामने की तरफ़ उसे कमरा मिला हुआ था। वह जब भी अपने कमरे की बालकनी में आती वहां से अक्सर वह छुप-छुपकर राजा को देखा करती थी। और आज वह उसी कमरे की मालकिन बनी बैठी थी। खुद में कोई मुस्कुराती हुई बांसुरी अपनी सोच में गुम थी, कि राजा ट्रैक सूट और स्पोर्ट्स शूज पहने वहाँ चला आया…- ” यहां बैठे-बैठे क्या मुस्कुरा रही है मैडम! चलिए उठिए । वॉक पर चलना है।”

बांसुरी ने अलसाई हुई नजरों से उसे देखा-” हूं मुझे नहीं जाना!”

” ऐसे कैसे नहीं जाना? जाना ही होगा।
यह पूरा समय तुमने अपनी मर्जी से बिताया है। अब ये आखिर का जो थोड़ा सा वक्त बचा है, इसे तो मेरे हिसाब से जी लो।”

“बिल्कुल नहीं! कहा जाता है प्रेगनेंसी में सब कुछ मां की मर्जी से होना चाहिए।”

“लेकिन ऐसे में तो हमारा बच्चा जिद्दी हो जाएगा। अगर मेरे जैसा नहीं हुआ तो मेरी तो कोई बात ही नहीं सुनेगा फिर!”

“क्यों? क्या मैं आपकी बातें नहीं सुनती?”

” वही बातें सुनती हो जो तुम्हारे काम की होती है !जो तुम्हारे काम की नहीं होती उन्हें यूं ही उड़ा देती हो।”

“ऐसा कब किया मैंने राजा साहब जरा बताइए तो!”

“आप अभी क्या कर रही हैं हुकुम आप बताइए तो।”

“आप बहुत जिद्दी हैं साहब ! जाइए ना अपने चुनाव का काम देखिए!”

“पूरा दिन पड़ा है उसी काम के लिए!
यह सुबह का ही तो वक्त है, जब हम साथ में इस प्यारे से बगीचे में घूमते हुए टहलते हुए अपने बच्चे के बारे में बातें कर सकते हैं । चलिए हुकुम बहुत सुंदर मौसम है आइए मेरे साथ।”

और एक तरह से जबरदस्ती बांसुरी का हाथ थामे राजा अपने साथ वॉक करने ले गया। शुरू में थोड़ी देर आलस से चलने वाली बांसुरी कुछ देर बाद ही अपने अंदर ढेर सारी ऊर्जा महसूस करने लगी। बगीचे का एक लंबा चक्कर लगाने के बाद एक जगह बांसुरी को लेकर राजा नीचे ही घास पर बैठ गया।
बांसुरी के सामने बैठे राजा ने उसे अलग अलग तरीके से ध्यान लगाने की विधियां सिखाई और उसके साथ ही खुद भी ध्यान लगाने लगा।
एक डेढ़ घंटे का समय यूं ही बीत गया कि तभी राजा के फोन पर किसी का मैसेज आने लगा।

राजा ने देखा समर का मैसेज था।

ठाकुर साहब के कोर्ट केस के लिए आदित्य और केसर को साथ लेकर समर को दून के लिए निकलना था वह निकलने से पहले एक बार राजा से मिलना चाहता था।

“मैं भी साथ चलूंगा!”

राजा के इस मैसेज पर समर में बांसुरी की हालत का जिक्र किया लेकिन ना राजा को मानना था और न वह माना।

शाम को ही उन लोगों को वहां से निकलना था बांसुरी से इस बारे में जब राजा ने बात की तो बांसुरी ने सहर्ष सहमति दे दी..-” आप मेरी चिंता मत कीजिए साहब! यहां रूपा भाभी जया भाभी फूफू साहेब दादीसा तभी तो हैं। और फिर मम्मी भी तो रुक गई हैं। आप जल्दी से अपना काम निपटा कर आ जाइए । तब तक मैं और आपका छुटकू हम दोनों ही आपका इंतजार करेंगे।

मुस्कुराकर राजा बांसुरी के पास ही बैठ गया।

समर अपने कमरे से निकलकर ऑफिस की तरफ बढ़ गया जाते-जाते उसने पिया को फोन लगा लिया।

सुबह का वक्त था पिया कहीं व्यस्त थी। वह फोन नहीं उठा सकी। समर ने उसे एक मैसेज ड्रॉप कर दिया।

“आज रात की फ्लाइट से दून निकल रहा हूं । उसके पहले एक बार मिलना चाहता हूं। हो सके तो दो घंटे बाद उसी कॉफी हाउस में मिलना।”

पिया ने बांसुरी की हालत के बारे में समर से भी कुछ नहीं बताया था। और बांसुरी की ऐसी हालत के कारण ही उसके राजा साहब परेशान हो उठे थे, इसीलिए समर पिया से नाराज़ बैठा था। लेकिन गुजरते वक्त के साथ यह नाराजगी भी कम हो गई थी। उस दिन के किए अपने अशिष्ट आचरण के कारण उसे खुद भी मन ही मन ग्लानि से हो रही थी। इसलिए वह पिया से एक बार मिलकर माफी मांगना चाह रहा था। मैसेज छोड़ने के बाद वह अपनी तैयारीयों में जुट गया।

अपना सारा काम निपटा कर और सारी तैयारियां समेटकर समर कॉफी हाउस के लिए निकल गया। समय का पाबंद तो वो था ही, अपने तय समय में उसने कॉफी हाउस का दरवाजा खोला और अंदर हॉल में सभी तरफ नजर दौड़ा ली। हॉल में एक तरफ उसे पिया बैठी दिख गयी। मुस्कुराकर वो उसकी तरफ बढ़ा ही था कि, उसने देखा पिया अकेली नहीं थी। उसके साथ एक लड़का भी बैठा था।

समर बहुत धीमे कदमों से उस टेबल तक बढ़ ही रहा था कि उसने देखा उस लड़के ने अपने पास से एक गुलाब उठाकर पिया की तरफ बढ़ा दिया। पिया ने गुलाब को देखा और धीरे से हाथों में ले लिया। पिया और उस लड़के की नजर समर पर नहीं पड़ी थी।

समर कुछ देर को वहीं खड़ा रह गया। फिर खुद को और अपने गुस्से को संभालते हुए पिया से कभी ना मिलने की कसम खाते हुए वहां से बाहर निकल गया।

क्रमशः

aparna….









बाजीराव – एक प्रेम कहानी


मैं दो साल से पुणे में थी,सदाशिव पेठ मे,अब शादी के बाद वाकड़ आ गयी ……मालपानी ब्लूस मे ।।
बहुत बड़ी सोसाइटी और उससे भी बड़े लोग,मै और मेरे पतिदेव सॉफ़्टवेयर वाले हैं,सो हमारी जमात को यहाँ के लोग एलियन समझते हैं ।

हम दोनो कुछ एलियन से थे भी,अपने मे मगन,किसी से कोई लेना देना नही,हफ्ते मे 5दिन तो हम सुबह कब ऑफ़िस निकलते और कब शाम मे वापस आते ,किसी पड़ोसी को झलक भी नही मिलती,पर एक दिन सुबह जब मैं ऑफ़िस निकलते
समय दरवाजा बन्द कर रही थी,उसने मुझे लपक ही लिया,मुझे कई दिनों से महसूस हो रहा था,कि कोई मुझ पर नज़र रख रहा है,,मुझे लगभग रोज़ ही ऐसा लगता की सामने वाले घर के की-होल से कोई मुझे आते जाते देखता है,मै भी जानना चाहती थी कि आखिर एक शादीशुदा लड़की मे किसी को क्या इंटरेस्ट ,कौन है वो दीवाना? आखिर वो दिन भी आ ही गया,,अनु जल्दी मे थे ,सो वो नीचे पार्किंग से गाड़ी निकालने चले गये,और मै दरवाज़ा बन्द करने लगी,तभी…….

…एक बहुत मीठी सी आवाज कानों में पड़ी,
“अच्छा तो आप आयी हैं ,701में।”
मैने मुड़ के देखा ,एक लगभग मेरी ही उमर की औरत कॉटन का कफ्तान पहने बालों को पीछे क्लच किये चाय का कप पकड़े खड़ी थी।।

ओहो तो ये था मेरा दीवाना!! ,

मैने उसे एक फॉर्मल सी मुस्कान दी और हां में सर हिला दिया।

“जॉब करती हैं आप??”

मैने फिर स्माइल के साथ अपना सर हिला दिया।

“बच्चे कितने हैं आपके?”

मुझे समझ आ गया था की ये मुझ से भी बड़ी ढीठ है,मै जितना ही उससे बचने के लिए कोशिश कर रही थी,वो उतनी ही एकाग्रता से मुझसे चिपक रही थी,

“जी अभी शादी को ज्यादा समय नही हुआ।”

“अच्छा! आजकल तो भाई सब 4-5साल बाद ही सोचते हैं,हमने तो तुरंत ही कर लिया,अब देखो मेरा अर्णव तो इस जुलाई मे 5का हो जायेगा।”

पहली ही मुलाकात मे अपना परिवार पिटारा खोल लेने वाली औरतों से मुझे बड़ी चिढ़ होती है, अरे क्या ज़रूरत इतना बेतकल्लुफ़ हो जाने की।

मैने फिर से एक ज़हरीली स्माइल दी कि ये अपना मुँह बन्द कर ले पर नहीं ,वो मेरी सोच से कहीं आगे थी।।

“मेरा नाम प्रियंका है,और मेरे पति का रनवीर ,अब देखीये ना फिल्मों वाले रनवीर को तो दीपिका मिल गयी।”

अपने सेंस ऑफ़ ह्युमर पे उसे बड़ी हंसी आयी,और मेरा खून जलने लगा,मुझे पता था नीचे पार्किंग से गाड़ी निकाल के मेरे पतिदेव मेरी लेट लतीफ़ी के कारण क्रोध मे अंगार हो रहे होंगे ।

“आपसे मिल के बहुत अच्छा लगा,अभी चलती हूं,लेट हो रही हूँ,आओ आप कभी घर।बाय।”

“अरे आप अपना नाम तो बताती जाईये।”

इससे बचना मुश्किल था,,
“अपर्णा “!!
मै जल्दी से नाम बता कर लिफ्ट मे घुस गयी।

कुछ दो दिन बाद सुबह 9:30पे दरवाजे पे घंटी
बजी,आज तबियत कुछ नासाज़ थी इसीसे ऑफ़िस से छुट्टी ले ली थी,बहुत दिन से कुछ अच्छा पढ़ने का मन था,जैसे ही अनु ऑफ़िस निकले मैनें एक अच्छी सी कॉफ़ी बनायी, और बस अपनी किताब खोल के पढ़ना शुरु ही किया की कम्बख्त बेल बज गयी।।

ये वक्त तो हमारा घर पे होने का होता ही नही किसी ने गलती से बजा दी होगी,मैने ऐसा सोचा ही था की बेल फिर बज गयी,बहुत मजबूर होकर ही मुझसे किताबें छूटती हैं,बड़े बेमन से मैं गयी दरवाजा खोला ही था कि अनाधिकार चेष्टा से वो मेरे घर मे घुसती चली आयी।।

“मैनें सुबह ही देख लिया था,की आज भाई साब अकेले ही ऑफ़िस जा रहे, तभी समझ गयी थी कि आप घर पे होंगी,इसीलिये चली आयी,तबियत तो ठीक है ना।”

“वैसे आप आज ऑफ़िस गयी क्यों नही?”

“उस दिन आपने भाई साब का नाम भी नही बताया?”

“आप बोलती बहुत कम हैं अपर्णा जी।”

अरे क्या खाक बोलूं?तू कुछ बोलने दे ,तब तो बोलूं

“जी थोड़ा सर मे दर्द था,इसीसे छुट्टी ले ली।”

“अच्छा अच्छा ,कुछ बाम वाम लगाया या नही?,है या मैं ला दूं घर से??,डिस्प्रिन खा लो आप,5 मिनट मे दर्द दूर हो जायेगा।”

अब क्या डिस्प्रिन खाऊँ? इससे अच्छा तो ऑफ़िस ही चली जाती,थिन्कींग ज़ोन मे कम से कम एक घंटा आराम तो कर लेती।

मुझे समझ आ गया था,मैं आज प्रियंका की अदालत मे खड़ी थी जहां वो जब जी चाहे मुझे फांसी पे लटका सकती थी,मेरे बचने की कोई उम्मीद नही थी,इसीलिये मै उसके लिए चाय बनाने रसोई मे चली गयी।

मेरे पीछे वो भी आ गयी।

“घर बड़ा सुन्दर सजाया है आपने,भाई साब का नाम क्या बताया।”

“अभी मैने बताया ही कहाँ ??।”

अब मै भी मज़े ले रही थी,जब ओखली मे सर दे ही दिया तो मूसल से क्या डरना।

“हां,हां,,बड़ा प्यारा नाम है आपका,पर ज़रा बोलने मे कठिन है ना।”

“अच्छा इसीलिये आपके भाई साब मुझे अपर्णा नही बुलाते।”

और मैं हंसने लगी,उस बेचारी को मेरा पी जे समझ नही आया।पर फिर हमारी जो बातें शुरु हुई तो सीधे 1बजे उसे होश आया की उसके बेटे का घर आने का समय हो गया है।

आखिर हूँ तो मै भी औरत ही,बातों मे रस तो मुझे भी मिलता ही है। साढे तीन घंटों में उसने पूरे मालपानी का कच्चा चिट्ठा सुना के रख दिया, मिसेस सूद दिल्ली की हैं,मिस्टर सूद यहाँ डी आर डी ओ मे थे,अब रिटायर होने के बाद से यहीं घर बना लिया,दोनो बच्चे शादी के बाद से ही यू एस मे हैं ।।

मिसेस गोल्वलकर,मिसेस शिर्के,मिसेस पानिग्राही ,सभी की जन्म पत्रिका उसने सारे गृह नक्षत्रों के साथ ही मुझे रट्वा दी।

“चलती हूं यार ऐपी,बातों मे देख ना पता ही नही चला कब 1बज गया।वैसे मुझे तो पहले पहले लगा की तू ज़बान की बिल्कुल ही कच्ची है,पर तू भी खूब बोलती है,है ना।”

“हां और क्या ? मै भी बातों की व्यापारी हूँ ।”

जहां हमारी बातें बड़ी नफ़ासत से आप आप से शुरु हुईं थीं वहीं आप से तुम और 3 घन्टे बीतते बीतते तू पर आ गईं ,वो मेरे लिये प्रिया बन गयी और मै उसके लिये ऐपी।।

प्रिया वाकई बड़ी खुशमिजाज़,खुशरंग लड़की थी,पहले पहले मै जहां उससे बचने की कोशिश करती थी,वही अब मुझे धीरे धीरे उसका साथ भाने लगा था।

मेरे शाम को घर लौटने के वक्त पे वो अक्सर मुझे नीचे पार्क में या ऊपर गैलरी मे ही मिल जाती और फ़िर उसका बातों का पिटारा खुल जाता,और अनु हम दोनों को बातें करता छोड़ आगे बढ़ जाते।

“अपर्णा ! देख मैं आज तेरे लिये क्या लेके आयी हूँ ।”

उसके हाथ मे केसरोल देख कर मैं अन्दर से खूब खुश हो जाती ,कि चलो खाना बनाने की झंझट से मुक्ति मिली।

“करेला! मेरे इनको मेरे हाथ का करेला बहुत पसंद है।तो मैनें सोचा तुझे भी खिला के देखूँ ।खा के बताना कैसा लगा,तुझे भी बनाना सिखा दूंगी।”

थोड़ी देर पहले का उत्साह उड़न-छू हो गया,करेला भी कोई चीज़ है खाने की। पर ऊपर से मुस्कुरा के उसके हाथ से डोंगा ले लिया।

रात के खाने पे अनु को ही परोसा ,
” तुम नही लोगी ।”
“मैं कहाँ करेला खाती हूँ ।”
” हाँ,सही है,पहले ही इतना कड़वा बोलती हो,करेला खा लोगी तो राम जाने क्या कहर ढ़ाओगी।”

मैनें घूर के अनु को देखा पर उन्हें मुझे देखने की फुरसत ही कहाँ थी,वो तो करेले मे ही मगन थे,मैनें भी उनकी प्लेट से ही थोड़ा चखा
“करेला ऐसा भी बनता है! वाह ! प्रिया के हाथ मे जादू है”।

ऐसे ही प्रिया अपने छोटे मोटे कारनामों से मुझे मंत्रमुग्ध करने लगी थी,उसे वो सारे काम बखूबी आते थे,जो मेरे लिये “रॉकेट साईंस” थे। सिलाई कढाई बुनाई की वो ऐसी मास्टर थी की जटिल से जटिल डिसाईन भी सिर्फ किताबों से देख ही सुलझा लेती और मुश्किल से 5 दिनों मे बुन बान के खतम कर देती।।

मेरी ऐसी रोजमर्रा की कई परेशानियों का वो उपाय बन गयी थी,आलू ,टमाटर, चीनी ,चाय पत्ती जैसी छोटी मोटी रसोई की जरूरतों के लिये तो वो मेरा बिग बाज़ार ही थी।।प्रिया मेरा जादुई चिराग थी
और मैं उसका अलादीन।

मुझे वैसे भी अपने ऑफिस की लिटररी सर्कल के एक जैसे रंगे पुते चेहरों की बनावटी मुस्कान और बनावटी अपनेपन से बड़ी चिढ़ होती थी,उन सब कागज़ के फूलों के सामने प्रिया थी चम्पा का ताज़ा खिला फूल।।।

एक बार मैनें उसे ऐसे ही शाम की चाय पीते हुए छेड़ भी दिया
“प्रिया तू ना मुझे चम्पा का फूल लगती है।पर तुझे पता है गुरुदेव ने चम्पा के लिये क्या कहा है?”

“चंपा तुझमे तीन गुण रूप-रंग-और बास, अवगुण तुझमे एक है,भ्रमर ना आवें पास।”

“अच्छा ! तुझे पढ़ने का बड़ा शौक है,पर एक बात बता,ये गुरुदेव हैं कौन?”

उसकी ये बचकानी बात सुन मुझे जो हंसी का दौरा पड़ा की वो खुद भी हंस पड़ी।

“अरे मेरी झल्ली ,बाद मे बताऊंगी गुरुदेव कौन हैं,पहले तू चाय तो पिला,मुझसे तो ढंग की चाय भी नही बनती।।”

दशहरे के समय सोसाइटी मे तरह तरह के नृत्य गीत स्पर्धाओं का आयोजन होता था,इस बार प्रिया भी इसमे भाग लेना चाहती थी,वो भी मेरे साथ।

‘”यार ये डांस वान्स नही होगा मुझसे।”
“क्यों नही होगा? प्लीज़ चल ना ,बड़ा मज़ा आयेगा,गुजराती फोक सॉन्ग है,बहुत प्यारा है,बस तू ,मैं और मेरी दो और सहेलियां हैं,हम चारों मिल कर करेंगे।”
“मुझे अनु से पूछना पड़ेगा,पता नही वो मानेंगे या नही।”
“अरे वाह ,झूटी,जैसे बड़ा पूछ पूछ के सब करती है,पूरी तो तेरी ही चलती है तेरे घर मे, भाई साहब तो बड़े सीधे हैं।”पीछे-पीछे घूमतें हैं तेरे।”
“हाँ जी क्यों नही,बड़े सीधे हैं तुम्हारे भाई साब ,फिर भी बिना उनसे पूछे नही बता सकती।”
“मेरे ये तो बोलते हैं,प्रिया तुझे जो करना है कर ,बहुत प्यार करते हैं मुझसे,और खूब बात मानते भी हैं,चल ठीक है ,पूछ के बता दे कल तक।”

नवमी की रात को पहले बच्चों का फिर महिलाओं का कार्यक्रम तय था,,हम सब तैय्यार होके वहाँ पहुँच चुके थे।

जितनी महिलाएँ आसपास थी ,सभी आंखों ही आंखों मे मेरा एक्स रे उतार रही थीं,सबको पहली बार मेरा दीदार मिला था।।।
मिसेस गोल्वलकर,पानिग्रही,सुगंधा जैन,भारती ओझा,मिसेस वेद,मिसेस मोहन्ती,मिसेस शिर्के और सबकी बॉस मिसेस सूद।

“तुम्हारे भी बच्चे का डांस है क्या?”
“जी नही!! वो ……..” मेरी बात आधे मे ही काट कर प्रिया बोल पड़ी,”हम खुद डांस करने वाले हैं ।”
” ओहह अच्छा।”और सब की सब मुस्कुरा पड़ी।

जितना सोचा था,उससे भी कहीं ज्यादा अच्छा हुआ हमारा डांस।।
कुछ देर पहले की जो महिलायें व्यंग से हमे देख मुस्कुरा रहीं थीं,वही हमें अब गले लगा लगा के बधाईयाँ दे रहीं थी।

बहुत खुशनुमा माहौल मे जब नीचे मेरे पतिदेव मेरे फोटो खींच रहे थे तभी प्रिया किसी का हाथ थामे हमारे पास चली आयी।

“अपर्णा इनसे मिलो ,ये रनवीर हैं,मेरे पति!”
मैं और अनु पहली बार ही रनवीर से मिल रहे थे, हमेशा प्रिया से सुना ही था की ,उनका बिजनेस है ,जिसके कारण आधा समय उन्हे कलकत्ता, अहमदाबाद ,दिल्ली घूमना पड़ता है,पुणे महिने मे बीस दिन ही रह पाते,पर जब भी यहाँ होतें हैं,प्रिया और अर्णव को खूब घूमाते फिरातें हैं,पर इसके बावजूद आज तक उनसे हमारा मिलना नही हुआ था।
रनवीर सच मे काफी जिंदादिल और स्मार्ट थे,वो जल्दी ही हम सबसे घुल मिल गये।

“आपकी बहुत बातें सुनाती है प्रिया,ये आपकी बहुत बड़ी फैन है अपर्णा जी।”

“जी बहुत शुक्रिया!!”वैसे असल मे मैं इसकी फैन हूँ,मुझमे तो ऐसी कोई खूबी ही नही,ये तो प्रिया की मोहब्बत है बस।”

इसके दो तीन दिन बाद ही रनवीर एक बार फिर अपने कारोबारी आकाश मे गुम हो गये।।

नये साल का आगाज़ हो रहा था ,ऑफ़िस मे भी पार्टी होनी थी,ऑफ़िस के नये नये लड़के खूब चहक महक के पार्टी की तैय्यारियों मे लगे थे।

ओरिक्रोन इस दफ़ा पहली बार इतने बड़े पैमाने पे फैमिली पार्टी कर रहा था,सभी बहुत बहुत उत्सुक थे,अनु को भी हाथ पैर जोड़ के मना चुकी थी साथ चलने के लिये,पर ऐन मौके पे उनके बॉस के बेटे की जन्मदिन की पार्टी के कारण वो मुझे कोर्टयार्ड के बाहर ही उतार के चलते बने।।

मैरियट में शानदार पार्टी चल रही थी। सारी राग रागिनियां जैसे वहीं बह चलीं थी,सब खुश थे मगन थे,खाते पीते इससे-उससे मिलते आगे बढते जाते थे।
तभी दूर से मुझे देख के हाथ हिलाती रागिनी चली आयी,रागिनी और मैने एक साथ ही ओरिक्रोन मे काम करना शुरु किया था,इसीसे हमारे बीच अच्छा पक्का सा रिश्ता था,हम एक दूसरे की हमेशा ही मदद करते,एक दूसरे से समय समय पे सलाह मशविरा लेते रहते थे।।

बस एक बात पे हमारी बात नही बन पायी थी,और विचारों मे थोड़ा टकराव आ गया था ,जब डेढ़ साल पहले रागिनी ने बताया की उसका बचपन का प्यार अचानक उसे कहीं मिल गया और वो उस लड़के के साथ रहने जा रही है,मैनें उसे बहुत समझाया पर मुझे दकियानूसी, परंपरावादी,बोदी,डरपोक, और तरह तरह के सुन्दर शब्दों से नवाज़ के वो उस लड़के के साथ शिफ्ट हो गयी,उसके बाद मेरी भी शादी हो गयी।।

जब आपकी दुनिया खूबसूरत हो जाती है तब आपको बाहर की दुनिया मे भी कोई कालिख कोई गन्दगी नज़र नही आती,ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ,अनु से शादी के बाद मैने रागिनी को भी माफ़ कर दिया,हम एक बार फिर दोस्त बन गये।

कुछ समय बाद उसने बताया की उसी लड़के से उसने शादी कर ली,अब तो मैं उसके लिये और भी खुश थी पर आज तक मिस्टर रागिनी से मुलाकात नही हो पायी थी।।

आज रागिनी की खुशी देखते ही बन रही थी,लिव इन मे रहने वाली लड़कियों के मन मे गाहे बगाहे एक अनचाहा अनजाना डर हमेशा समाया रहता है,पता नही साथ रहने वाला,सात जन्मों के, सात फेरों के बन्धन मे बंधना चाहेगा या नही,….उसी हां,नहीं के फेर से आखिर रागिनी को मुक्ति मिल गयी थी,उसका रुम मेट उसका सोल मेट बन चुका था………आज उसकी खुशी उसके हर हाव भाव से,उसके हर साज शृंगार से ,उसके हर ओर छोर से बह रही थी……..वो भागी भागी आयी और मुझे गले से लगा लिया,बहुत खुश थी वो क्योंकि आज वो पहली बार हम सब से अपने पति को मिलवाने जा रही थी।।।पर……..


“ऐप्स इनसे मिलो ,ये मेरे साहब हैं,रनवीर जी।”
“ऐण्ड डार्लिंग ये है मेरी सबसे खास सहेली अपर्णा।”

मैनें उसे देखा,उसने मुझे।।।।

कुछ दो सैकेण्ड के लिये मुझे लगा जैसे पृथ्वी मेरे ही चारों ओर चक्कर काटने लगी है,या मैं स्वयं कोई गृह ,उपग्रह बन कर सूर्य की परिक्रमा कर रही हूँ। ऐसा ज़ोर का चक्कर तो मुझे कभी नही आया था,
मेरी आंखो के सामने कई सहस्त्र जुगनू नृत्य कर रहे थे,कान जैसे कुछ सुनना तो चाहते थे,पर अशक्त थे,मेरी सभी ज्ञानेन्द्रीयों और कर्मेन्द्रीयों ने अपने कार्य से त्यागपत्र दे दिया था।।

मेरे चेहरे का उड़ा हुआ रंग देख कर रागिनी घबरा गयी।।
” what happened apps ,r u all right??”
” मैं ठीक हूँ,रागिनी।।सुबह से काम के चक्कर मे खाना भूल गयी ,शायद इसीलिये बी पी डाउन हो गया लगता है।”

मेरा उस निर्लज्ज को दुबारा देखने का बिल्कुल मन नही था ,पर वो तो जैसे मुझे अपनी कैफियत वही देने को आकुल हो रहा था।।
आंखों ही आंखों मे उसने मुझसे मेरी दोनों सहेलियों से की जाने वाली बेवफाई के लिये माफ़ी मांग ली।।
लेकिन मेरी आंखों से निकलते अंगारे इतने तेज थे कि,वो झुलस गया,उससे वो आंच सहन नही हुई और एक बुरा सा बहाना बना कर चलता बना।।।

रागिनी को इतना खुश ,इतना चहकते मैने कभी नही देखा था,वो पार्टी मे पूरी तरह डूबी थी बिल्कुल वैसे ही जैसे रनवीर के प्यार मे,पर अब मुझे वहाँ घुटन सी हो रही थी,जल्दी ही बॉस से मिल के मैं वहाँ से निकल आयी।।

मेरे फ़ोन करने से अनु भी जल्दी ही वापस आ गये,उन्हें देखते ही मेरे सब्र का बान्ध टूट गया।।
उनके गले से लगे मैं रोती रही…..
“अरे कुछ कहोगी भी ,बाबू हुआ क्या,,क्यों इतना रो रही हो?? देखो तुम बताओगी नही तो मेरे दिमाग मे तो ऊलजलूल खयाल आने लगेंगे ना,बॉस से बहस हो गयी क्या,अच्छा वो चिराग के बच्चे ने कुछ परेशान किया क्या?”
“मेरा अच्छा बच्चा ,जल्दी से बता दे अब क्या हुआ?”अच्छा रुको मैं प्रिया को बुला के लाता हूँ,शायद उससे मिल के तुम्हें ठीक लगे।”

“नही,रुको प्रिया को मत बुलाना।”

और उसके बाद एक सांस मे मैनें अनु को रनवीर की सारी करतूत कह सुनाई।।

“अभी तो नही पर सुबह सबसे पहले जाके प्रिया को रनवीर की सच्चाई ही बताऊँगी ।”
“बताना ही है ,तो अभी क्यों नही?”
“आज की रात तो चैन से सो ले बेचारी,फिर तो….”
” वाह ! क्या खूब सहेली हो तुम,उसे एक रात की चैन की नींद जो दे दी।”
“ऐसा क्यों बोल रहे अनु?”
“इसलिए मेरी जान ,कि जैसे तुम आज की रात उसे सुकून से सोने देना चाहती हो,मैं चाहता हूँ,वो हर रात इसी सुकून के साथ सोये,तुम्हारे उसे सब कुछ सच बता देने से क्या होगा? या तो वो अपने पति को हमेशा के लिये छोड़ जायेगी ,या अपना मन मार के अपने बच्चे के भविश्य के लिये रनवीर की हरकत को अपनी किस्मत मान सब कुछ स्वीकार लेगी,पर उसके बाद उसका जो खुशहाल गृहस्थी का चित्र है वो तुम्हारे सामने हमेशा के लिये धूमिल हो जायेगा,वो फिर कभी तुमसे उतनी आत्मीयता से नही जुड़ पायेगी।”

“दूसरा ये हो सकता है, कि वो तुम्हारी बात सुनते ही भड़क जाये और अपने पति का घर छोड़ दे,पर उसके बाद क्या??,मायके में अपनी भाभी से परेशान माँ की शिकायत वो अक्सर तुमसे लगाती ही है,मतलब वहाँ से उसे कोई विशेष सहारा नही है,
मान लो तुम्हारे रिबेल विचारों से प्रभावित हो उसने कोई नौकरी कर भी ली तो क्या इतनी कम उम्र की
अकेली औरत के लिये हमारा सभ्य समाज उतना ही सभ्य रह पाता है,कदम -कदम पर अग्नि परीक्षा देती इस सीता को कहाँ कहाँ जाके बचा पाओगी, आज कम से कम उसके पास एक सुरक्षित छत है ,पति नाम का कवच है जो उसे समाज की ऊँची नीची पगडंडी मे गिरने नही देता,तुम उसे सब सच बता कर उसका संबल ,उसका सहारा उससे छीन लोगी।”

“तो इसका मतलब रनवीर को इतनी बड़ी गलती के लिये भी माफ कर दूं ।”

“हम तुम उसे माफ़ करने या सज़ा देने वाले कौन होतें हैं अपर्णा! मैं तो बस ये कह रहा कि जो गलती प्रिया ने नही की उसकी सज़ा प्रिया को मत दो,मैं और तुम रनवीर से भी बात कर के देखेंगे की आखिर ऐसा क्यों किया उसने।”

“हाँ,क्यों नही ,हो तो तुम भी मर्द ही ,अपनी ज़मात की ही तरफदारी करोगे ना ,अगर इसी का उलट हुआ होता तब भी क्या रनवीर को बताने नही जाते।”

“नही जाता,कभी नही जाता,अगर प्रिया के साथ रनवीर खुश होता ,तो मैं कभी उनके संसार मे आग लगाने नही जाता।”

“हो सकता है अनु,पर मैं तुम्हारे जैसे बड़े दिल वाली नही हूं,मैं कल ही जाके प्रिया को सब सच बता दूंगी।”

सुबह से हर एक कॉफ़ी के कप के साथ सिर्फ क्या बोलना है,और कैसे बोलना है ,यही अभ्यास करती रही,मन ही मन प्रिया के भविष्य का ताना बाना भी बुन लिया,अपने मन को पूरी तरह समेट कर आखिर मैनें उसके दरवाजे पे दस्तक दे ही दी।

“अरे आजा अन्दर ,मैं बस चाय ही चढ़ाने जा रही थी,सुबह सारे काम निपटा के आराम से बैठ के चाय पीने का मज़ा ही अलग है,है ना?”

“तू ऐसी रोयी सी क्यों दिख रही एपी ? भाई साहब से झगड़ा हुआ क्या?”

एक गहरी सांस लेके मैं खुद को तैय्यार करने लगी ,वही बैठा अर्णव अपनी किसी पेंटींग मे खोया था,और मैं उस बच्चे मे खो गयी…..बेचारे इस बच्चे का क्या कसूर,कैसा निर्दयी आदमी है,ऐसा फूल सा बच्चा,ऐसी हीरे सी बीवी और देखो ,कहीं और भी अपना एक संसार सजाये बैठा है…..पर जो भी हो इन दोनो प्राणियों को देख के कहीं से नही लग रहा था कि ये रनवीर के सताये हैं,इस पूरे घर में रनवीर की कस्तूरी घुली हुई थी,उसका मुकम्मल संसार यहाँ भी सजा था,उसके प्यार मे उसकी बीवी बुरी तरह से डूबी हुई थी,अपने बेटे का हीरो था रनवीर,,इन दोनो के सुखों की धुरी था वो।।।

भले उसकी दुनिया मे कोई और भी थी पर इन दोनो की तो पूरी दुनिया ही रनवीर था।

मेरे गालों पे कब दो बूंद आंसू लुढ़क आये,पता ही नही चला।
अचानक प्रिया ने आकर मुझे गले से लगा लिया
“तू मन क्यों छोटा करती है एपी,तुझपे भी भगवान अपनी मेहर बरसायेंगे,देखना एक साल होते होते तेरी गोद में तेरा अर्णव आ जायेगा।”

मेरा अर्णव को देख के दुखी हो जाना प्रिया को किसी और ही सोच की तरफ मोड़ गया,अरे जब हम मेहर बरसाने देंगे तभी तो बरसायेंगे ना भगवान भी।उसकी बात सुन मै मुस्कुरा पड़ी।

“अच्छा अब बता,तू क्या बताने आयी थी। तूने सुबह मैसेज किया था ना ,कुछ बहुत ही ज़रूरी बात बतानी है,चल बता भाई,सस्पेंस खतम कर।”
“ऐसा खतरनाक मैसेज किया तूने ,मै तो तब से सोच मे पड़ीं हूँ,कि मैडम आखिर बताने क्या वाली हैं ।”

मैं फिर से मुस्कुराने लगी।
“अच्छा सुन,तुझे आज तक तेरे भाई साहब यानी मेरे मियाँ जी का नाम नही पता ना,वही बताने वाली हूं ।
“अनुपम “!!

और मैं हंसने लगी,मुझे हँसता देख वो दोनो भी खिलखिला पड़े,कुछ देर इधर उधर की बात कर मैं उससे बिदा लेके घर जाने उठी ही थी की उसका फ़ोन बज उठा।

जल्दी जल्दी बातें खतम कर फ़ोन रख के उसने मुझे बताया,कि रनवीर का फ़ोन था
“तुम दोनों भी चलो ना हमारे साथ,मैं इन्हे टिकट बुक करने कह देती हूं,अभी इन्होनें 2ही सीट बुक की हैं,दो और हो जायेंगी।”

“ना प्रिया,कल की पार्टी के कारण अभी तक सर दर्द कर रहा,तुम लोग जाओ आराम से।।।।कैसी लगी बताना ,हम बाद मे चले जायेंगे,वैसे कौन सी फिल्म जा रहे हो।”

“बाजीराव मस्तानी।”

मैं अपने बढ़ते सर दर्द और बी पी के साथ अपने घर वापस चली गयी।।।।

aparna….

दहकते पलाश …

कुछ मोहब्बतें वक्त की मोहताज नही होतीं…

दहकते पलाश

बालकनी के ग्लास डोर के पास रखे कैनवास पर जंगलों में बेतरतीब दहकते पलाश उकेरते हुए माया इतनी मगन हो गयी थी कि सरु की लायी हुई दुसरी कॉफ़ी भी रखे रखे ठंडी हो गयी।

उसके टोकने पर जब ध्यान गया तब उसे एक और कॉफ़ी लाने बोल बाहर बालकनी में आकर खड़ी हो गयी, वही महीना, वही फ़ाग, वही सिन्दूरी पलाश … उसका कितना कुछ जुड़ा था इन सब से, और वैसे सोचा जाये तो कुछ भी नही जुड़ा था, बस कशिश का आसमान था और शिद्दत सी ज़मीन, पर किस्मत थी कि ना आस्माँ मिला ना ज़मीं ।।

उसे सब कुछ ऐसे याद है जैसे सब कल की ही बात हो, लगता ही नही कि पन्द्रह साल बीत गये उस होली को।
आज भी उस दिन की एक एक बात याद थी, सारा कुछ जैसे अब भी आंखों के सामने एक फिल्म की तरह चल रहा हो…..

कितनी चहल पहल होती थी उन दिनों उस मोहल्ले में। उसकी उम्र के ढ़ेर सारे बच्चे इधर उधर तूफान मचाए घूमते थे, और वो था इन सब का सरगना।
जाने कहाँ से ढूँढ ढूँढ के शरारतें लाता था, सारा मोहल्ला उसका सताया हुआ था,कभी किसी की छत पर सूखने वाले पापड़ चकनाचूर कर जाता, कभी किसी की पानी की टंकी में रंग घोल जाता, इन्हीं सारे बेमतलब के कामों में दिल लगता उसका, पढ़ाई लिखाई से दूर, अपने और अपनी मस्तियों में मगन ।
उसकी पक्की सहेली का भाई ना होता तो कभी उसका चेहरा तक ना देखती, पर ऐसा सोचना आसान था करना कठिन, क्योंकि उस निर्मोही को एक नज़र देखने के बाद कोई बिरला ही होगा जो उसका लुभावना चेहरा भूल सके, गोरे रंग पे काली बड़ी बड़ी आँखें और उनसे टक्कर लेता चौड़ा माथा, उसके लिये अक्सर माया की दादी कहा करती _” जे मिसराईन के घर कोई यक्ष गन्धर्व पैदा हुआ है, तभी हम मानुसों से नही निभे है इस खर्राट की। कितना हडकंप मचाए रखता है पर जे के लाने कितना भी गुस्सा हो मन में, इसकी मुस्कान देख सब उड़ जाती है बहुरिया।।
अगर कुछ पढ लिख जाये, नौकरी पा जाये तो कल अपनी माया के लिये हाथ पसार कर मिसराईन से इस छोरे को मांग लूंगी।”

” आप भी अम्मा, सुबह सुबह कलेस मचाई रहती हो, लक्षण देखें है रावण है पूरा, और फिर माया भी तो…..

माया की माँ ने तो बात वही खत्म कर दी पर उसके मन में कोई बीज जम ही गया था, जो होली के दिन खाद पानी पाकर बेल सा लहलहाने लगा था।।

सभी रंग गुलाल में डूबे थे, बस वही साफ सुथरी अपनी छत पर खड़ी मोहल्ले की भीड़ भाड़ देख देख कर हँस रही थी, तभी नीचे उसकी सहेलियों का झुंड गुज़रा और सब उससे नीचे आने का आग्रह करने लगे, सब की बात और थी पर उन सभी में उसकी पक्की सहेली रोली भी थी, उसकी बात काटना माया के लिये कठिन था, अपनी सोच में डूबी माया को उसकी दादी ने समझा बुझा कर नीचे भेज ही दिया था।
सारी सखियाँ माथे पर टीका लगा के उससे गले मिल रही थी कि किसी के मज़बूत हाथों ने उसे पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया, और उसका पूरा चेहरा गुलाल से भर दिया।
वो अबीर था!! जिसके कुँवारे हाथों ने माया के गालों पर जाने कितने दहकते पलाश खिला दिये थे।
उसके कानों में चुपके से “हैप्पी होली” बोल वो एक बार फिर अपनी टोली में मगन हो गया था।।

वो होली बीत गयी पर उसके लिये छोड़ गयी थी ढ़ेर सारे एहसास, जिन्हें वो चाह कर भी किसी से साझा नही कर सकती थी।
उसे हमेशा से खुद पर और अपनी किस्मत पर तरस आता था, पर अब एक नाराज़गी थी क्यों भगवान ने उसकी किस्मत ऐसी काली स्याही से लिख दी थी जिसे वो चाह कर भी मिटा नही पा रही थी।
उसके दादा और उनके बचपन के दोस्त का अपनी बचपन की दोस्ती को पक्का करने का निर्णय उसकी जीवन नैय्या डूबा गया था, सिर्फ सात बरस की तो थी जब मृत्यशैय्या पर लेटे उसके दादा ने अपनी आखिरी इच्छा के तौर पर अपने दोस्त के पोते से उसके फेरे फिरवा दिये थे, उस समय बाल विवाह होना बन्द हो चुका था पर अक्षय तृतीया के ही दिन उसके घर वालों ने उसे भी गड्डे गुडियों सा ब्याह दिया था, उसके विवाह को एक माह भी नही बीता की उसके दादा जी सिधार गये पर घर वालों के मन में एक संतुष्टी छोड़ गये थे अपनी अन्तिम इच्छा पूरी कर पाने की।

उसके ब्याह को दो साल हुआ ही था कि, किसी बीमारी की चपेट में आकर उसका पति भी नही रहा और ना रहे उसके दादा ससुर।
नौ साल की उम्र में जब उसे शादी और ससुराल का मतलब तक पता नही था, सुहागन का मतलब पता नही था, वो विधवा हो चुकी थी।।
माँ और दादी उसे गले से लगाये बिलखती रहीं, और कुछ देर सहने के बाद कसमसा कर उसने खुद को उनसे छुड़ाया और खेलने बाहर भाग गयी।।

धीरे धीरे समय के साथ उसे अपनी काली किस्मत का लेखा जोखा समझ आने लगा था, और जैसे ही उसने अपनी किस्मत से समझौता करने की सोची अबीर किसी खुशबूदार हवा के झोंके सा उसके जीवन की नीरस बगिया में फूल खिलाने धंसता चला आया था।

उस होली के बाद अबीर के एग्ज़ाम्स हुए और आगे की पढ़ाई के लिये वो बाहर चला गया था, वो शाम भी वो कैसे भूल सकती थी, रोली से उसे पता चल ही चुका था कि उसके अबीर भैया कोटा जा रहें हैं पढ़ने, उसके निकलने के समय पर वो चुपके से अपनी छत पर जा खड़ी हुई थी, उसे एक बार पूरी नज़र देखने के लिये!!
अपना सारा सामान कार की डिक्की में भरने के बाद उसने पलट कर एक बार उसकी छत की तरफ देखा भी था और घबराहट में माया दीवार की ओट में हो गयी थी, उसे देखने की अधूरी आस लिये ही वो चला गया था।
वो तो उसके जाने के बाद उसके जाने का असली कारण माया को पता चला था, जब एक शाम वो स्कूल से लौटी और अपनी माँ और दादी को बातें करते सुना__” क्या ज़रूरत थी अम्मा उनके घर जाने की, ऐसा भी लड़के में कौन सा हीरे मोती जड़ें हैं, ना होगी माया की शादी तो ना होगी, मैं अपनी बेटी को जीते जी कोई दुख ना होने दूंगी।”

” और तुम्हारे बाद उसका क्या होगा बहुरिया?? यही सोच कर तो जी घबराता है कि हम सब के बाद उस बेचारी का क्या होगा?”

” पढ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो जायेगी अम्मा, वो खुद अपना सहारा बनेगी।। आइंदा आप किसी के घर माया का रिश्ता लेकर ना जाना, देखा नही मिश्राइन ने कैसे रातों रात लड़के को पढ़ाई के नाम पर बाहर भेज दिया जैसे हमारी माया की छूत लग जायेगी अगर यहाँ रहा तो।”

उसका कलेजा धक से रह गया था, तो इसलिये उसे बाहर भेज दिया!!
उस दिन के बाद से उसने रोली के घर आना जाना बिल्कुल बन्द कर दिया था, रोली ही क्या धीरे धीरे अपनी हर सखी सहेली से दूरी बना ली थी, और उसी समय उसकी मासी उसके लिये देवदूत बन कर आ गयी__
” दीदी माया का हाथ बहुत साफ है, बहुत अच्छी पेंटिंग करती है , इसे फाइन आर्ट्स में क्यों नही भेज देतीं ।”

और फिर सारे घर भर को मना मुनु के आखिर मासी उसे अपने साथ ले ही गयी थी। वल्लभ एकेडमी ऑफ़ आर्ट्स में प्रवेश लेते ही उसका जीवन बदलने लगा था, अपनी फाइन आर्ट्स की डीग्री पूरी कर स्कॉलरशिप लेकर वो वेनिस से भी कोई एक्स्ट्रा डिप्लोमा कर आयी थी।।

रंगों से खेलती उसकी तुलिका अब उसके कैनवास में ही जीवन ढूँढने लगी थी।
रंग बिरंगे रंगों से सजी उसकी पेंटिंग्स देख कर कोई उसके बिना रंगों के जीवन को सोच भी नही सकता था।।

” दीदी कॉफ़ी पी लो वर्ना फिर ठंडी हो जायेगी।”
सरु की आवाज सुन वो वापस वर्तमान में लौट आयी, अगले हफ्ते ठीक होली से एक दिन पहले उसकी पेंटिंग एक्सीबिशन होनी थी, उसी के लिये वो तन मन से जुटी थी।।

मासी के साथ उसके जाने के चार महीने बाद ही उसके पापा का ट्रांसफर भी दूसरे शहर हो गया था और उस शहर उस गली से सारे नाते छूट गये थे, बस नही छूटा था अबीर का लगाया वो रंग जो अब भी माया अपने गालों पर महसूस कर पाती थी।।

*******

शाम हो चुकी थी, लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी, लोग घूम घूम कर अपनी पसंद की पेंटिंग्स देख रहे थे, उनमें से कुछ खरीद भी रहे थे, एक्सीबिशन हॉल के एक ओर बने छोटे से ऑफिस में माया अपनी साथी पेंटर के साथ बैठी कुछ ज़रूरी बातों में लगी थी कि उनकी एक हेल्पर ने अन्दर आ कर उन्हें बताया कि कोई एक आदमी है जो माया की वो पेंटिंग खरीदने की ज़िद पर अड़ा है जो वहाँ बेचने के लिये रखी ही नही गयी।।

” उनसे कह दो, वो पेंटिंग बिकाऊ नही है, उसे बस “एज़ अ मास्टर पीस” रखा है।”

” पर मैडम वो समझ ही नही रहे, कह रहे जब बेचना नही था तो यहां रखने की क्या ज़रूरत थी?”

” कौन सी पेंटिंग माया ‘ दहकते पलाश’?

” हाँ नेहा! मैं उसे किसी कीमत पर बेचने को तैय्यार नही हूँ, पता नही कौन रईसजादा है, जो ऐसे ज़िद पर अड़ा है।”

” हम्म तुम्हारा चेहरा पसंद आ गया होगा, तुम्हारे जैसी ही तो लगती है वो पेंटिंग, भले ही तुमने खूब सारे रंगों से चेहरे को रंग दिया है बिल्कुल जैसे किसी ने होली पर चेहरे पर खूब सारा अबीर गुलाल छिड़क दिया हो, बस हँसते हुए दांत नज़र आते हैं पर पेंटिंग लाजवाब है।”

” मैडम जी आप ही बात कर लो एक बार, हमारी तो सुन नही रहे वो साहब”

माया और नेहा ऑफिस से बाहर निकल आये, माया ने आगे बढ़ कर उस आदमी से कुछ कहना चाहा ही था कि पेंटिंग को देखता वो पलट कर माया के सामने हो गया, दोनो कुछ देर एक दूसरे को देखते ही रह गये।।

” मैं कैसे समझ नही पाया कि ये तुम हो माया।”
अबीर की बात पर माया ने शरमा कर आंखे नीची कर लीं….

” बहुत खूबसूरत पेंटिंग है, बिल्कुल तुम्हारी तरह, अभी तक समझ नही पा रहा था की बनाने वाला इसे बेचना क्यों नही चाहता, पर अब तुम्हें देख कर समझ आ गया…..”

” कैसे हो अबीर?”

” बिल्कुल वैसा ही जैसे पहले था, तुम कैसी हो?”

उसके सवाल पर वो मुस्कुरा उठी__

” क्या समझ गये? मैं आखिर क्यों नही बेचना चाहती इस पेंटिंग को?”

“बस उसी कारण जिसके लिये मैं इस पेंटिंग को खरीदना चाहता था, पर खैर अब मैं नही खरीदूंगा, तुम्हारी यादें तुम्हें मुबारक!! हाँ अगर तुम्हारी जगह किसी और ने ये बनाया होता तो किसी भी कीमत पर खरीद ही लेता, मेरी वाईफ को पेंटिंग्स का बहुत शौक है माया, आज अपनी सालगिरह पर सोचा उसे उसकी पसंद का तोहफा दूंगा पर यहाँ इस पेंटिंग ने मुझे रोक लिया, इसके आगे और कुछ देख ही नही पाया, इस पेंटिंग में मुझे तुम नज़र आई थी, पर जब ये देखा कि बनाने वाली भी तुम ही हो तो सब समझ आ गया मुझे।।”

उन दोनों को बातें करता छोड़ नेहा और बाकी लोग वहाँ से जा चुके थे….

” तुमने शादी की माया?”

” नही!! पहली टिकी नही और जब दूसरी करनी चाही तो जिससे चाहा वो जाने कहां गुम हो गया।”

” एक बार मुझसे कहा तो होता?”

” कब कहती, कैसे कहती? अगर तुम्हारी ‘ना’ होती तो मैं जीते जी मर जाती, अब तक जी रहीं हूँ और तुम्हारे दिये उन रंगों से ही अपना कैनवास भर रही हूँ, इतना काफी है अबीर , तुम मेरी तरफ से ये पेंटिंग रख लो।”

” मिलना नही चाहोगी मेरी वाईफ से?”

” वो भी आईं हैं क्या यहाँ?”

” हम्म !!, वो तुम्हारा ऑफिस है शायद।”

” अरे हाँ!! आओ उन्हें भी बुला लो, मैं तब तक कॉफ़ी के लिये बोलती हूँ!” कह कर माया आगे बढ़ गयी, उसके पीछे अबीर भी उसके ऑफिस में प्रवेश कर गया…..

” कहाँ हैं?? तुम्हारी वाईफ अन्दर नही आई??”

” मिलवाता हूँ, पहले चैन से बैठ तो जाऊँ!! इतने सालों की कितनी सारी बातें हैं, मेरे कोटा जाने के कुछ समय बाद तुम्हारा परिवार वो शहर ही छोड़ गया….
पहले तो रोली से तुम्हारे बारे में कुछ सुनने को भी मिल जाता था पर तुम लोगों के शहर छोड़ने के बाद तो तुम लोगों से सम्पर्क के सभी साधन बन्द हो गये, रोली को भी तुम्हारी कोई खबर ना थी, खुद को कहाँ कैद कर रखा था माया?”

” पता नही अबीर!! पर तुम्हारे घर से ना सुनने के बाद मेरी भी हिम्मत चूक गयी थी, और शायद घर वालों की भी, दादी तो अब रहीं भी नही, मेरे घर भर में सबसे ज्यादा उन्हें ही तुम पसंद थे।”

” और तुम्हें??”

अबीर की बात अनसुनी कर माया ने कॉफ़ी उसके आगे बढ़ा दी__” अब मिलवा भी दो अपनी वाईफ से।”

अबीर ने हाँ में सिर हिला कर अपने जेब से अपना वॉलेट निकाला और खोल कर माया के सामने कर दिया, उसमें उसकी वही पन्द्रह साल पुरानी रंगों से भीगी मुस्कुराती तस्वीर लगी थी__” ये कब निकाल ली थी तुमने ?”

” रोली को कह कर तुम्हें नीचे बुलाने से लेकर मोहित से छिप कर तस्वीर खिंचवाने तक की प्लानिंग थी मेरी, वो तो उसके बाद मैं पढ़ने बाहर चला गया वर्ना ….”

अबीर अपनी बात पूरी भी नही कर पाया था कि नेहा हाथ में गुलाल से भरी प्लेट थामे दोनो के पास चली आयी …..
” आप दोनों को होली की शुभ कामनाएँ “

अबीर ने मुस्कुरा कर माया को देखा__” उस दिन एक काम अधूरा रह गया था माया”

प्लेट से ढ़ेर सारा गुलाल उठा कर अबीर माया की तरफ बढ़ा ही था कि माया ने अपने हाथों से गुलाल अबीर के गालों पर मल दिया ” उस दिन अधूरा रह गया था ये अरमान!! हैप्पी होली अबीर!!

aparna….

वो सात दिन …. एक प्रेम कहानी

प्यार में ज़रा सी दूरियां भी हैं ज़रूरी….

      रोहित और नीता की शादी तय हो चुकी है,सब कुछ बहुत- बहुत अच्छा चल रहा है,आज शाम को दोनों की शादी की डेट  भी निकल आयेगी।
    
           “हेलो ,रोहित! क्या कर रहा था मेरा शोना ?”
   “कुछ नही नीत ,बस अभी फ्रेश होके आया,अब डिनर करने जा रहा।”
“ओ के बेबी,अच्छा सुनो आज मम्मा-पापा ने पण्डित जी को बुलाया था ,आज से ठीक 45दिन बाद का मुहूर्त निकला है,28जनवरी का।
   “मम्मा ने तुम्हारी मॉम को भी फ़ोन कर दिया है ,अभी अभी,,बस तुम्हारी मॉम का भी तुम्हारे पास फ़ोन आने ही वाला होगा।”
” yeah off course! बल्कि आने ही लगा ,चलो मै मॉम से बात करके तुम्हे कॉल करता हूँ,बाय।”

      रोहित भोपाल का रहने वाला स्मार्ट खूबसूरत बन्दा था,एन आय टी से इंजीनियरिंग करने के साथ ही कैम्पस सेलेक्शन होके पुणे आ गया।’पटनी ‘ मे कुछ समय काम करने के बाद उसने अपने कैरिअर को देखते हुए कंपनी बदल दी,अपने तेज दिमाग और कार्य कुशलता के कारण 5साल मे ही टी एल बन गया ।
        
         नीता ने जब उसी कंपनी मे काम शुरु किया तब पूरे ऑफिस मे जैसे बहार सी आ गई।
हंसती खिलखिलाती नीता ने जैसे सारे ऑफ़िस मे जादू सा कर दिया,पर इस जादू का सबसे ज्यादा असर दिखा रोहित पे।

       रोहित और उसके दोस्तों मे होड़ सी लग गई नीत से दोस्ती करने की,रोहित जिस प्रोजेक्ट मे टीम लीड था,उसी प्रोजेक्ट मे नीता भी थी,बस रोहित ने बाजी मार ली।।आधी जंग तो उसने उसी दिन जीत ली,दोस्त बेचारे अपना सा मुहँ लेके रह गये।
 
      पर लड़के एक बात मे मानने लायक होते हैं,चाहे एक ही लड़की के पीछे सारे पड़े हों ,पर जब ये नज़र आता है की उस लड़की का उनमे से किसी एक की तरफ झुकाव है,तो सारे एक साथ मिल के अपने दोस्त की मदद मे जुट जातें हैं,बस वही हुआ।

     अब सारे मिल कर रोहित के लिये फील्डिंग करने लगे और उसे मैच जीता दिया,रोहित को ऐसा लगने लगा था की नीता नही मिली तो वो जी नही पायेगा,कुछ ना नुकुर के बाद नीता ने भी हाँ कर दी।

      अब रोहित को असल मे समझ आया की जीवन क्या है? बेचारा पांच साल से बैचलर जिंदगी जी रहा था,अपने मन का आप मालिक था ,मन किया तो खाया वर्ना सारा दिन सिर्फ चिप्स ठूंसते और टीवी पे मैच देखते निकाल दिया। घर पूरा अस्तव्यस्त पड़ा रहता और वैसा ही अस्तव्यस्त सा उसका जीवन भी पड़ा था।
    
     नीता के आने से उसके अन्धेरे जीवन मे रौशनी आ गई,पतझर मे जैसे बहार आ गई।
     उसने सीसीडी मे नीता से प्यार का इजहार किया और नीता ने हाँ कह दिया,उसके बाद वो उसे  घर तक छोडने गया,गाड़ी मे बजते ‘बादशाह’ को बदल कर नीता ने ‘तुम जो आये जिंदगी मे बात बन गई ‘  चला दिया,रोहित को बहुत पसंद आया ये गाना।
    “बहुत प्यारा सॉन्ग है,तुम्हारा फेवरेट है?”
“मुझे सारे रोमांटिक सॉंग्स बहुत पसंद हैं ।”और तुम्हे क्या पसंद है रोहित?”
“मुझे तुम पसंद हो ……नीत।”

    इसके बाद रोहित के संसार मे नीता घुलती चली गई।
    “हेल्लो ,रोहित क्या कर रहे हो? अभी तक उठे नही,बेबी आज रविवार है,मै तो सोच रही थी हम लंच साथ करेंगे।”
“हां करेंगे ना जान,तुम “सिगडी “पहुचों,मै बस तैय्यार होके आता हूँ ।”
” ओए ,मै तो सोच रही थी,तुम्हारे रुम पे आके कुछ बनाऊं और तुम्हे खिलाऊ ।”
      हे भगवान ! नीता रुम पे क्यों आना चाहती है,कल ही शनिवार था,और सारे यारों दोस्तों के साथ मिल कर जम के पार्टी की थी,सारी बोतलें कमरे मे ही पड़ीं हैं,हडबड़ा के उठा और घर की सफाई मे लग गया।

        घर ऐसे चमका दिया की रोहित को खुद पे ही नाज होने लगा,नहा धो के तैय्यार हुआ की नीता आ गई।
     “हेलो,ओह्ह ये रुम है तुम्हारा,रोहित कैसे रहते हो यहाँ पर,कितना मैसी है ,उफ,चलो मै ही कुछ करती हूँ ।”
    नीता ने खिड़की खोल दी ,और एक बार फिर घर समेटने मे लग गई,साफ सफाई कर के कॉफ़ी बनायी और लेके आई,रोहित दिल जान से नीता पे फिदा हो गया,घर अब वास्तव मे साफ हो गया था।

     रोहित को सब कुछ अच्छा लगता ,नीता का बहुत केयर करना,उसे बेबी बुलाना,मीटिंग मे कौन सी शर्ट पहनना है,ये बताना,और सबसे अच्छा लगता जब वो अपने दोस्तों के साथ रहता तब बार बार फ़ोन करके समय पे घर जाने,और कम पीने की सलाह देना।।

    रोहित और नीता बहुत खुश थे,दोनो के मॉम डैड भी पुणे आके मिल चुके थे,सब तरफ से सब अच्छा था,और अब दोनो की शादी की तारीख भी तय हो गई। पर अब अचानक ……

…..रोहित को कभी कभी डरावने सपने आने शुरु हो गये,वो नींद से चौंक के उठता,और घबरा जाता।
     पता नही कैसा अन्जाना सा डर उसके चारों ओर व्याप्त होने लगा,उसे खुद से डर लगने लगा था,उसे डर था की वो नीता को खुश रख पायेगा या नही,,असल मे उसे शादी से डर लगने लगा था।

      नीता हर बात मे पर्फेक्ट थी,समय की पाबंद, साफ सफाई पसंद,अच्छी कुक,इन्टीरियर डिजाइनर    ये,वो ……कोई ऐसा ज्ञान नही था जिसकी जानकारी नीता को नही थी,टी वी धारावाहिक मे क्या चल रहा है,से लेकर देश की राजनीति मे किसने कब कहाँ हलचल मचाई ,सब कुछ उसके जिव्हाग्र पे होता…….और जैसा की अक्सर इतने ज्ञानी लोगों के साथ होता है,ये लोग अनजाने ही अपने साथ वालों की हर बात मे दखल देने लगते हैं,उन्हे हर छोटी से छोटी बात भी सिखाने लगते हैं,बस वही हुआ…..

       ” रोहित !……ये क्या पहन के आ गये,आज तो गुरुवार है,मैने कहा था ना पीली शर्ट पहनना, तुम ब्लैक मे आ गये।”
      “रोहित! …… सुनो आज शनि देव पे तेल चढा देना,तुम्हारा शनि थोड़ा भारी है ना।”
      “रोहित!  वो तुम्हारा सुनील मुझे फूटी आँख नही भाता,उससे दूर रहा करो बाबू।खुद तो दिन भर पीने के बहाने ढूंडता है,और तुम्हे भी अपने साथ भिड़ाये रखता है।”
        ऐसे ही सुबह गुड मॉर्निंग से शुरु हुआ पीटारा रात मे एक झिड़की के साथ ही बन्द होता
    “तुम अभी तक ऑनलाइन हो,रात के साढे ग्यारह बज गये,चलो अच्छे बच्चों की तरह सो जाओ।”
      बेचारा रोहित डर के मारे ये भी नही बोल पाता की तू खुद ऑनलाइन नही होती तो मुझे ऑनलाइन पकड़ती कैसे मेरी माँ ।

     जहां प्यार होता है वहाँ भय नही होता,और अगर कही किसी के हृदय मे भय आ जाये तो उसका प्रेम महल हवा के झोंको से ही हिलने लगता है।

      नीता का मानना था की प्यार मे कोई दुराव छिपाव नही होना चाहिये,इसीसे वो कभी रोहित का फ़ोन भी खोल के उसके मैसेज पढ़ने लगती।
      एक बार ऐसे ही उसने सुनील का मैसेज पढ़ लिया।
   “अच्छा तो तुम्हारे ये सिरफिरे दोस्त मुझे हिटलर बोलते हैं।”
     “नो बेबी! किसने कहा तुमसे।”
   “मुझसे कौन कहेगा? हिम्मत है किसी की,वो तो तुम्हारा मैसेज पढा,तो पता चला की मैं हिटलर हूँ ।”

     “तुम्हे कोई हिटलर नही बोलता बेबी,वो तो सिर्फ सुनील कभी कभी मजाक मे……”
     नीता जितनी शिद्दत से रोहित से प्यार करती थी,उससे भी कहीं ज्यादा शिद्दत से सुनील से नफरत करती थी,और कुछ वैसी ही भावना सुनील की थी,नीता के लिये।वो भी रोहित को नीता के खिलाफ भडकाने का कोई मौका नही छोड़ता ।

    रोहित ये करो,वो मत करो,ऐसे खाओ,वैसे ना खाओ,योगा करो,जिम जाओ……ये,वो……रोहित रोहित रोहित।।।।।
     
     रोहित थकने लगा था,प्यार उसे अब भी था,पर जाने कैसी बेचैनी और उदासी उसके अन्दर भरने लगी थी।

      वो दोनो साथ ही शादी की शॉपिंग पे जाते पर एक तरफ जहां नीता चहक चहक के लेह्ंगो के ट्रायल लेती,वो चुपचाप बैठा,कुछ सोचता रहता, उसकी शेर्वानी भी नीता ने ही पसंद की अपने लहन्गे के कोन्ट्रास्ट मे।

      फिर एक दिन नीता ने रोहित को बताया कि उसे 7दिनों के लिये सिंगापुर जाना पड़ेगा,कुछ ऑफ़िस प्रोजेक्ट है,बताते समय लग रहा था,नीता रो ही पड़ेगी,पर इधर रोहित के मन मे तो बांसुरी बज रही थी।
        रोहित को खुद पे गुस्सा भी आ रहा था कि उसे दुखी होना चाहिये पर वो तो खुश है,,खुश भी नही बहुत खुश है।

      रोहित को तमाम बातें सिखा पढा के नीता बड़े बोझिल कदमों से फ्लाइट लेने चल दी,और अचानक रोहित ने महसूस किया ,की इतने दिनों से जो अजीब सा बोझिल पन था,वो खतम हो गया।
    सारे मनहूस काले बादल बरस गये,हर तरफ रोशनी फैल गयी,और उस रोशनी मे रोहित चमकने लगा।

       वो गाता गुनगुनाता वहाँ से सीधा सुनील को साथ लिये अपने कमरे मे पहुँचा,जी भर के दोनो ने बियर पी ,खूब उल्टा सुल्टा खाया,और मैच देखते पड़े रहे।
  दूसरे दिन इतवार था,रोहित की नींद फ़ोन की घंटी से ही खुली,नीता का फ़ोन था।
   “अभी तक सो रहे हो ना,अच्छा सुनो कल बहुत लेट पहुंची ,इसीसे तुम्हे फ़ोन नही किया,सोचा सुबह ही बता दूंगी ,गुस्सा तो नही हो ना।”
     उफ्फ रोहित को तो खयाल ही नही रहा था की उसे नीता से पूछना था की वो कब पहुंची।

     दो दिन बड़े आराम से सूकून भरे गुज़रे, मंगल को रोहित की क्लाइंट मीटिंग थी,तैय्यार होते होते उसने अपनी आलमारी खोली,उसे सुझा ही नही की क्या पहनूँ ।
     तुरंत नीता को फ़ोन लगाया,पर नीता ने फ़ोन काट दिया,दो बार रिंग करने पर उसका मैसेज आया।
  “I’m in meeting,call u later.”
    बेचारा कुछ तो भी पहन के चला गया।।।

मीटिंग्स में ऐसा उलझा की शाम के 7 बजे घर पहुँचा,सोचा एक कॉफ़ी बना लूं,पूरी रसोई छान मारी पर उसे चीनी का डब्बा नही मिला,फिर फ़ोन किया,नीता ने फ़ोन नही उठाया।

    दो दिन से जिस आज़ादी का जश्न मना रहा था आज उसी आज़ादी से कोफ्त हो गयी।

     समय काटने के लिये टी वी लगा लिया,,कुछ न्यूज़ सुनी,कुछ बहस सुनी,,पर मन कही नही लग रहा था,सुनील को फ़ोन किया,
    “कहाँ है भाई,घर आजा कोई मूवी देखेंगे।”
   “अरे नही रोहित ,तेरी भाभी को शॉपिंग पे ले के आया हूँ,यहीं से हम खाना खाते हुए ही घर जायेंगे,तू एन्जॉय कर भाई।”

   खाक एन्जॉय करुँ,खुद तो मुझे नीता के लिये भड़काता फिरता है और यहां अपनी बीवी से चिपका घूम रहा है।

    रात हो गयी ,नीता का कोई फ़ोन नही ,कोई मैसेज नही,रोहित ने फ़ोन उठाया वॉट्सएप्प खोला
  नीता ऑनलाइन थी
“हेल्लो जान ! सुबह से कहाँ बिज़ी हो यार।”
नीता का कोई रिप्लाई नही आया।
” ओ मैडम कहाँ हो भाई”
कोई रिप्लाई नही।
“नीता r u there? “
कोई रिप्लाई नही।अब तो हद ही हो गयी,यहाँ थी तो पीछे पीछे घूमती रहती थी,और अब देखो,दो दिन हुए की भूल गयी।

रोहित ऑफलाइन हो गया,और चादर ओढ कर सो गया,पर नींद खुद के चाहने से ही आ जाती तो प्यार करने वाले नींदों की शिकायत क्योंकर करते।

    आधे घन्टे बाद फिर फ़ोन खोला और देखा
नीता अब भी ऑनलाइन थी।।।।।

  अगले दिन सुबह नीता के गुड मॉर्निंग मैसेज से उसकी नींद खुली,एक प्यारी सी मुस्कान आ गयी चेहरे पे,तुरंत नीता को फ़ोन किया।
“हेल्लो कल कहाँ गायब थी?सारा दिन कोई मैसेज नही।”
“आज भी बिज़ी रहूंगी रोहित,हमारा टी एल है ना चैन्ग, बड़ा ही अनोखा बन्दा है,दिन भर काम करता भी है कराता भी है,पर ऐसे की कोई शिकायत ही ना कर पाये ।
  माहौल इतना स्पोर्टि कर देता है की लगता ही नही बॉस है।क्या नोलेज है बन्दे को ,क्या बताऊँ तुम्हे।”
“और तुम्हे पता है ,He just love Indian food”
उसे कुकिंग भी आती है,बिल्कुल मेरे जैसा पुलाव बनाता है……इसके बाद पूरे 5मिनट तक नीता चैन्ग के बारे मे ही बताती रही,पर अब रोहित को कुछ सुनाई नही दे रहा था।

    शाम को नीता को फ़ोन लगाया,उसने नही उठाया,अब तो रोहित को ऐसा लगा तुरंत उड़ के सिंगापुर पहुंच जाये और चैन्ग को गोली मार दे।
   पर हर बार मन का हो जाता तो मनमीत का दिल दुखे ही क्यों।

   क्या क्या सोचा था रोहित ने,उसे लगने लगा था की वो नीता के हाथ की कठपुतली बन गया है,शादी के नाम से इसीलिये तो डरने लगा था,उसे लगा नीता कुछ दिन के लिये चली जायेगी तो वो आज़ादी की खुशबू महसूस कर सकेगा ,पर जितना सराबोर होकर वो आज़ादी की महक सूंघना चाहता था,उससे कही ज्यादा वो नीता की खुशबू मिस कर रहा था।

     अभी तो नीता को गये सिर्फ 3 दिन हुए थे,और उसका ये हाल हो गया था।

     सुबह जल्दी नींद खुल गयी उसने,फेसबुक खोल लिया,नीता का प्रोफाइल फोटो बदला हुआ था,
     फोटो मे चार पांच लड़के लडकियां खड़े थे,सबसे बीच मे नीता ही थी,गुलाबी टॉप मे मुस्कुराती हुई कितनी प्यारी लग रही थी,और उसके बाजू मे उसके कन्धों पर हाथ रखा एक गोरा खड़ा था।
    ओह्ह्ह्ह तो यही है चैन्ग।,मुझे तो ये सारे चिंकी एक ही जैसे लगते हैं,पर ये नीता के कन्धे पर हाथ क्यों रखे खड़ा है।

   नीता को इस बारे मे कुछ भी टोकना प्रलय को दावत देना था,बेचारे का पूरा दिन खट्टा हो गया।चौथा दिन भी बीत गया।

  अगले दिन सुबह ऑफ़िस के लिये तैय्यार होने के बाद रोहित ने नीता को वीडियो कॉल किया, दोनो एक दूजे को देख के खिल गये मुस्कुरा उठे,तभी रोहित ने देखा नीता ने काफी छोटी ड्रेस पहनी थी,उसने पुछा,तो नीता ने कहा,”यहाँ तो यही फॉर्मल्स कहलाते हैं बाबू,मै तो सारी जीन्स ही लेके आई थी,आज पार्टी है तो कल ये चैन्ग के साथ जा के खरीद के लायी हूँ,उसी की पसंद है,मैने बहुत कहा पर देखो ना उसने मुझसे ड्रेस के पैसे भी नही लिये।”
     रोहित को पैर से सर तक आग लग गयी,यही काम है इन गोरों का ।।बस लड़की देखी की फिसले ,और खास कर शादीशुदा या एंगेज्ड लड़कियों पे तो ये कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो जातें हैं,अरे अपने जैसी ढूँढ ना भाई अपने लिये,मेरी वाली के पीछे क्यों पड़ा है,और चलो चैन्ग को मारो गोली ,ये नीता के उसूल कहाँ तफरीह करने चले गये,आज तो बात कर के रहूँगा।।

   पर पांचवा दिन भी बीत गया। रात बाकी थी………जो बिल्कुल नही बीत रही थी,बार बार नीता से पेहली मुलाकात,उसकी बातें,उसकी हंसी सब कुछ याद आ रहा था,वो दोनो जब भी लॉन्ग ड्राइव पे जाते हमेशा नीता एफ एम बन्द करके खुद ही कुछ गुनगुनाने लगती थी,कितना प्यारा गाती है,और कितना सारा गाती है,सोच के रोहित के चेहरे पे मुस्कान आ गयी…….
…………..क्यों बिना वजह इतना डर रहा था,नीता के बिना जीना तो ज्यादा मुश्किल है,उसके साथ डर डर के जीने से।।मॉम की कितनी फिक्र रहती है उसे
डैड को भी फ़ोन कर कर के अपना बी पी ,और शुगर समय समय पे चेक करवाने की हिदायत देती रहती है,,अब बेचारी ओवर परफ़ेक्ट है तो इसमें उसकी क्या गलती।
   रोहित का मन फूल सा हल्का होने लगा,उसने अपने तकिये को अपने सीने से लगाया और नीता को सोचते हुए सो गया।

  शुक्रवार को रोहित ने जल्दी जल्दी ही सारे काम निपटाए ,सुनील को लिये घर पहुँचा ,दोनो ने मिल के घर की सफाई की ,नीता के पसंदीदा ग्लौडियस फूलदान मे सजाये,और उसके बाद भीमजी भाई की दुकान पहुंच गये।

    शनिवार नीता की फ्लाइट आने के आधे घन्टे पहले ही दोनो दोस्त एयरपोर्ट पहुंच गये।
     रोहित का दिल ऐसे धड़क रहा था,जैसे आज पहली बार नीता को देखने वाला है,जैसे पहली बार नीता से बोलने वाला की वो उससे सच मे कितना प्यार करता है।
     नीता आई ,और दौड़ के रोहित के गले लग गयी,उफ्फ कितना सुकून,कितनी शान्ती,कितना प्यार है इस मिलन मे….
   “अब मुझे छोड़ के कही मत जाना नीत,मर जाऊंगा तुम्हारे बिना।” और फिर नीता की उंगली मे हीरे की अंगूठी पहना दी।
“अबे अगर नीता तुझे छोड़ के जाती नही तो तुझे पता कैसे चलता की वो क्या है तेरे लिये,चलो भाई अब मै चला अपने घर,शाम को मिलते हैं फिर,ओके नीता।”
  “जी भाई साहब ! शाम को भाभी जी को भी लेकर आना।”
   रोहित को समझा नही की अचानक नीता सुनील को भाई साहब क्यों कहने लगी।
  खैर वो दोनो बाहों मे बाहें डाले बाहर की तरफ बढ़ चले,जाते जाते नीता ने पलट के सुनील को देखा और आंखो ही आंखो मे आभार प्रकट किया,सुनील ने भी हल्के से मुस्कुरा के आभार ग्रहण कर लिया।।।

aparna…..

जीवनसाथी – 111

बाँसुरी की गोद भराई


जीवनसाथी -111



बाँसुरी ने जैसे ही अपने कमरे से बाहर कदम रखा उसकी आंखें आश्चर्य से चौड़ी हो गईं…..
    उसके सामने पूरे रास्ते गुलाबों की पंखडियाँ बिखरी पड़ी थी…
   एक तरफ फूलों से सजी पालकी तैयार रखी थी। पालकी के कहारों की जगह पर प्रेम, विराट और बाँसुरी के ताई जी के दोनों बेटों के साथ ही रेखा भी खड़ी थी।
  बाँसुरी आश्चर्य से भरी उन सभी को देखती खड़ी ही रह गयी….

    वो आगे कदम बढ़ाने ही वाली थी कि उसके ताई के बेटे उसके भैया आगे चले आये। अपनी बहन का हाथ पकड़े उन्होंने उसे आगे ले जाकर पालकी में बैठा दिया…

    रेशमी तोशक के ऊपर भी हर तरफ गुलाबी पंखुड़ियां बिखरी पड़ी थीं।
  मुस्कुरा कर बाँसुरी अंदर बैठ गयी। वो बैठी ही थी कि पालकी का रेशमी पर्दा ज़रा सा खुला और निरमा का चेहरा बाँसुरी को नज़र आ गया…
     निरमा ने झुक कर बांसुरी के माथे पर छोटा सा तिलक किया और उसकी आरती उतार कर साथ खड़ी सहायिका को थाल पकड़ा दी…

   नज़र का काला टीका बाँसुरी के कान के पीछे लगाने के बाद निरमा ने पालकी वापस ढाँक दी।
    प्रेम विराट और ताई के बेटों ने बहुत संभाल कर धीरे से उस चंदन डोली को उठा लिया….

  पालकी अपनी मंज़िल की ओर चल पड़ी। बाँसुरी को वापस अपनी शादी वाली रात याद आने लगी थी….
ऐसे ही पालकी में तो वो स्टेज तक लायी गयी थी।

   यहाँ भी वो उन रेशमी पर्दों से बाहर देख पा रही थी…

   आस पास लोगों को देख उसे समझ आ गया था , कि महल ने इस बार काफी बड़ा आयोजन कर रखा था….

   पालकी आखिर एक जगह जाकर रुक गयी…

  पालकी में से बाहर आने की वो सोच ही रही थी कि रुपा भाभी और जया ने उसके पर्दे खोल दिये और उसका हाथ पकड़ कर उसे बाहर उतार लिया…

   सुनहरी और हरे रंग की पोशाक में बाँसुरी बहुत खिल रही थी।
  उसने सामने देखा, लोगों का हुजूम उसे देखते ही खड़ा हो गया। वो धीरे से अपने सर का घूंघट संभाले आगे बढ़ने लगी… दोनो तरफ खड़े लोग उस पर फूल बरसाते रहे।
  रूपा भाभी और जया उसे साथ लिए मंच तक चले आये।
   वो पैर आगे बढ़ा कर सीढ़ियों पर रखने ही वाली थी कि उसका संतुलन बिगड़ा और गिरने से पहले ही उसे दो मज़बूत बाहों ने थाम लिया।

  उसका सन्तुलन बिगड़ता देख शेखर फौरन अपनी जगह से खड़ा होकर उस तक पहुंचता की राजा अजातशत्रु ने अपनी हुकुम को अपनी बाहों में थाम लिया।

  उसे साथ लिए राजा मंच पर ले चला।
मंच पर लगे सोफा के पास ही बाँसुरी की माँ पिता और ताई के साथ ही बाकी रिश्तेदार खड़े थे। सबको एक साथ खड़े देख बांसुरी आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी में डूब गई। वो जाकर अपनी मां के सीने से लग गई एक-एक कर सब से मिलते हुए उसके चेहरे की मुस्कान जा ही नहीं रही थी। उसने राजा की तरफ शर्माते हुए देखा और आंखों में आंखों में उसे धन्यवाद अर्पित कर दिया। राजा ने भी पलके झुका कर अपनी हुकुम का अभिवादन कर दिया…

” आपने बताया ही नहीं मां!-आप सब यहां आ रहे हैं?

” लाड़ो! कुंवर सा ने हम लोगों को भी तो मना कर दिया था। वह तुझे सरप्राइस देना चाहते थे। इतनी किस्मत वाली है मेरी गुड़िया रानी । अब जल्दी से एक नन्हा सा राजकुमार ले आ और सब कुछ अच्छे से हो जाए , फिर तुम दोनों को साथ ले कर माता वैष्णो देवी के दर्शन के लिए जाऊंगी।”

बाँसुरी ने शरमा कर धीरे से हाँ में सर हिलाया और चुपचाप नीचे बैठ गई। पंडित जी ने विधि विधान से पूजा पाठ प्रारंभ कर दी।

पूजा समाप्त होते ही पंडित जी ने एक-एक कर महल की सभी महिलाओं को आगे बुलाना शुरू कर दिया…

सबसे पहले काकी साहेब यानी पिंकी की मां आगे चली आई । सहायिका के हाथ से गहने का डिब्बा लेकर उन्होंने बांसुरी की गोद में रखा इसके साथ ही फल मिठाई नारियल सब कुछ बांसुरी की गोद में डालकर उन्होंने उसे मन भर कर आशीर्वाद दे दिया।

माथे पर छोटा सा सिंदूर का तिलक लगाकर उसके कान में चुपके से कुछ कहा और मुस्कुरा कर एक ओर खड़ी हो गई।
बांसुरी ने झुककर उन से आशीर्वाद लिया और मुस्कुराती बैठी रही…
  
मायके और ससुराल की महिलाएं एक-एक कर आती रही और बांसुरी की गोद में मिठाई फल मेवे मिष्ठान्न गहने जेवर डालकर उसे आशीर्वाद देती रहीं।

रूपा भाभी जया, रेखा, पिंकी इन सब के निपटते ही रूपा ने निरमा को भी खींच कर आगे खड़ा कर दिया। राज महल की गोद भराई में निरमा संकोच वश एक तरफ पीछे खड़ी थी। उसे लग रहा था रानी की गोद भराई करने की उसकी औकात है या नहीं लेकिन रूपा उसे दोनों कंधों से पकड़ कर सामने ले आई ।

निरमा भी अपनी प्यारी सहेली के लिए एक तोहफा लेकर आई थी। उसने बांसुरी की गोद में फल मिठाइयां डालने के बाद अपने पर्स से एक मखमली डिब्बी निकाली और उसमें से एक पतली सी चेन निकालकर बांसुरी के गले में डाल दी।
चेन में लगे छोटे से लॉकेट में राजा की तस्वीर बनी हुई थी। बांसुरी ने तोहफा देखा और भावुकता में उसकी आंखों से दो बूंदें छलक पड़ीं। उन आंसुओं में छिपे प्रेम को देख भावुकता और कृतज्ञता से निरमा की आंखों से भी दो बूंद आंसू छलक पड़े।

“अरे कोई मुझे भी तो बताओ कि आप सब बांसुरी के कान में कह क्या रही हो?”

राजा के सवाल पर रूपा जया निरमा सभी राजा को छेड़ने लगीं….

” यह बातें आपसे कहने की नहीं है। वैसे तो गोद भराई की रस्म में ज्यादातर औरतें ही सम्मिलित होती है, लेकिन आपकी जिद थी कि आप अपनी हुकुम की गोद भराई खुद देखना चाहते हैं, तो आइए अब आप भी गोद भर दीजिए।

राजा भी मुस्कुरा कर आगे बढ़ गया।

मुस्कुराते हुए बांसुरी को देखते हुए उसने भी वहां रखे सारे सामान को बांसुरी की गोद में डाला और वापस उसे देख छेड़ने लगा…

” मैं तो आपके लिए कोई तोहफा ही लाना भूल गया हुकुम । कल रात तक काम में इतना व्यस्त था कि दिमाग से उतर गया।”

बांसुरी ने भी हंसकर राजा को देखा

“कोई बात नहीं साहब! आपसे तो मैं कभी भी तोहफा ले लुंगी। “

बाँसुरी ने मुस्कुरा कर उसे देखा कि तभी समर भी वहाँ चला आया…

“तोहफा मैं लेता आया हूँ हुकुम आपकी तरफ से।”

और आगे बढ़ कर उसने कुछ पेपर्स राजा के हाथ में रख दिए….

  राजा ने पेपर्स पर नज़र डाली और मुस्कुरा उठा। बाँसुरी के ट्रांसफर के पेपर्स थे यानी  उसे अब वापस दून जाने की ज़रूरत नही थी।

मुस्कुराकर राजा ने वह पेपर बांसुरी की गोद में डाल दिया…

” अब हमारी हुकुम को हमसे दूर जाने की जरूरत नहीं है!”

समर भी मुस्कुराने लगा….
बांसुरी ने समर की तरफ देखा- ” आप कोई गिफ्ट नहीं लाए मेरे लिए?”

समय ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया-” मैंने तो अपने पूरे के पूरे राजा साहब आप को तोहफे में दे रखे हैं! रानी हुकुम इससे बढ़कर कीमती मैंने अपने जीवन में और कुछ नहीं देखा। और जो सबसे कीमती चीज देखी वह आप के हवाले कर दी अब इससे कम क्या तोहफा दे आपको?”

“बस आप लोगों से कोई बातें बनवा ले। हमारे साहेब की तरह ही आप भी बातें बनाने में बहुत एक्सपर्ट हो गए हैं। आप का तोहफा ड्यू रहा। समय आने पर मांग लूंगी, याद रखिएगा।”

“जी रानी साहेब बिल्कुल याद रखूंगा!”

राजा के कान में धीरे से कुछ कहकर समर वहां से निकल गया।
  कार्यक्रम जोर-शोर से शुरू था गोद भराई की रस्म के साथ ही गाना बजाना भी शुरू हो गया था।


    सोलह सिंगार करके गोदी भराई ले,
सोलह सिंगार करके गोदी भराई ले,
सइयां, सइयां, सइयां, सइयां,
सइयां से खेली बहुत अब छोटू को खिलाई ले,
सोलह सिंगार करके…


    एक के बाद एक गोद भराई गीतों में बेहतरीन प्रस्तुतियां चलती रही।
रूपा और जया ने सहायिकाओं से अपना और बांसुरी का खाना वही मंगवा लिया । इतनी भीड़ भाड़ के बीच बांसुरी से हालांकि कुछ भी खाया नहीं जा रहा था। दूसरी बात उसे यह भी लग रहा था कि राजा वहां से निकलना चाह रहा है।
   समर ने जाते वक्त जाने क्या कहा राजा के कान में कि उसके बाद से राजा का वहां मन ही नहीं लगा…
आखिर राजा ने बांसुरी की तरफ देखकर आंखों ही आंखों में उससे वहां से जाने की अनुमति मांगी और बिना खाए ही निकल गया।

   *****

तेज कदमों से चलते हुए राजा कार्यक्रम क्षेत्र से निकलकर अपने ऑफिस की तरफ बढ़ चला उसी वक्त विराज अपने कमरे से निकलकर कहीं जा रहा था राजा से टकराते टकराते बचा….

“आराम से चलो विराज !- अभी उठे हो सो कर?

“हां! जिसकी रातों की नींद गायब हो वह सुबह तो देर से ही सो कर उठेगा | सबकी किस्मत तुम्हारी जैसी नहीं होती है ना अजातशत्रु!”

विराज को कोई जवाब देने का राजा का मन नहीं था| वह चुपचाप ऑफिस की तरफ निकल गया और विराज अपने दोस्तों की मंडली से मिलने निकल गया|

ऑफिस के बाहर ही दरबान खड़ा था। राजा अजातशत्रु के वहां पहुंचते ही उसने बड़े अदब से झुक कर प्रणाम किया और दरवाजा धीरे से खोल दिया। अजातशत्रु के अंदर पहुंचते ही उसकी आंखें आश्चर्य से खुलकर चौड़ी हो गई, और उसने तुरंत जाकर आदित्य को अपने सीने से लगा लिया…

” कहां चले गए थे भाई? तुम्हारी बहुत फिक्र हो रही थी!”

आदित्य को पहली बार किसी ने इस तरह प्यार दिया था। उसकी आंखें छलक उठी। अजातशत्रु के सीने से लगे हुए उसने अपने बड़े भाई को और भी जोर से जकड़ लिया।

कुछ देर इसी तरह खड़े रहने के बाद वह अलग हुआ और उसने झुक कर राजा के पैर छू लिये। तफ़सील से बैठकर उसने दून से भागने से लेकर अब तक की सारी कहानी अजातशत्रु को कह सुनाइ।

केसर की हालत अब भी पूरी तरह से तो नहीं सुधरी थी, लेकिन वह पहले से अब काफी बेहतर थी। उसे आदित्य ने एक आरामदायक सोफे पर टेक लगा  कर बैठा दिया था।

“आप कैसी हैं केसर ?”

राजा ने केसर की तरफ देखा और शर्मिंदगी से केसर ने आंखें झुका ली आखिर वह किस तरह राजा से आंखें मिलाती?

राजा का नुकसान करने के लिए जाने उसने क्या-क्या नहीं किया था। ठाकुर साहब ने उसे एक मोहरा बनाकर राजा की जिंदगी में जहर घोलने को भेज दिया था। राजा और बांसुरी को अलग करने के षड्यंत्रों के अलावा भी उसने बहुत कुछ किया था। और इस सब के बाद भी यह राजसी जोड़ी उसकी जान बचाने के लिए लगी हुई थी। उसे अब अपनी तुच्छ बुद्धि पर तरस आने लगा था। क्यों उसने कभी भी सही और गलत को नहीं पहचाना ? क्यों उसने समय रहते ही ठाकुर साहब से कन्नी नहीं काटी? क्यों उसने इतने दिनों तक ठाकुर साहब की बातें मानी।

देर से ही सही उसे अकल तो आ ही गई थी। आखिर आदित्य का साथ उसे सही रास्ते पर ले ही आया ।उसने तो आदित्य को फंसाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
ठाकुर साहब तो यही चाहते थे कि भाई-भाई आपस में एक दूसरे के दुश्मन हो जाए! और पूरा परिवार एक दूसरे को मारकर तबाह हो जाए। उसने इस जलती आग में घी का काम किया था । लेकिन बावजूद आज राजा अजातशत्रु ही नहीं राजकुमार आदित्य भी उसकी जान बचाने में लगे हुए थे। तो क्या बदले में उसका कोई फर्ज नहीं बनता था उनके प्रति।

अपनी जगह से खड़े होकर वह भी राजा अजातशत्रु तक चली आई और उनके पैरों पर झुक गई….

” अरे अरे यह क्या कर रही है आप? हमारे यहां औरतें इस तरह पैरों में नहीं झुकती उठिए बाईसा!”

“आप हमें इतना सम्मान मत दीजिए राजा साहिब !हम इस के अधिकारी नहीं हैं। बहुत पाप किए हैं हमने अपने जीवन में बहुत गलतियां की हैं ।और अब उन गलतियों के पश्चाताप का समय आ गया है।”

राजा ने केसर को हाथ पकड़ कर सामने सोफे पर बैठा दिया और पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ा दिया।

“राजा साहेब हम बातों को घुमा कर और उलझायेंगे नहीं। हम साफ़ सपाट शब्दों में कहना चाहते हैं, कि आज तक हमने जो भी गलतियां की हैं उनके पीछे हम खुद हैं।
क्यों हमारा दिमाग सही और गलत के बीच भेद नहीं कर पाया? क्यों हम ठाकुर साहब के कहने में आ गए? आखिर क्यों हमने उनकी हर गलत बात को मंजूर किया? असली दोषी तो हम ही हुए ना ! और अब हम अपनी सारी गलतियों को सुधारना चाहते हैं।
अब तक तो आप जान ही गए होंगे कि रेखा हमारी छोटी बहन है और वह ठाकुर साहब की बेटी नहीं है! ठाकुर साहब ने हमारे माता-पिता से रेखा को गोद ले लिया था और उसके बाद रेखा की जिंदगी को बेहतर बनाए रखने की शर्त पर वह हमसे कितना कुछ करवाते रहें! उनकी शर्तें तो खैर बहुत सारी होती थी, लेकिन अब उन पुरानी बातों का क्या रोना? अब हम आपसे सिर्फ यह कहना चाहते हैं। ठाकुर साहब की पत्नी की मौत में बांसुरी का कोई हाथ नहीं है हम खुद इसके चश्मदीद गवाह हैं।
जैसे ही ठाकुर साहब की पत्नी का केस फाइल होता है हम गवाह के तौर पर वहां जरूर जाएंगे, और ठाकुर साहब और उनकी पत्नी का सारा कच्चा चिट्ठा सबके सामने खोल देंगे।
आप निश्चिंत रहें राजा साहेब अब आपकी बांसुरी को हम कुछ नहीं होने देंगे।

“बहुत-बहुत शुक्रिया तुम्हारा केसर ।उनका केस लग चुका है । और परसों ही सुनवाई है हमें आज रात ही दून के लिए निकलना होगा।”

समर की बात पर केसर ने समर की तरफ देखा और एक बार फिर उसकी पलकें झुक गई- ” समर तुम भी हमें माफ कर देना हमने जो सब किया…

समर ने केसर की बात आधे में ही काट दी..-” कोई बात नहीं केसर ! अब इन सब बातों का कोई मतलब नहीं । हम सब समझते हैं तुम्हारी भी कुछ मजबूरियां थी।
वह कहते हैं ना सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते। बस वही बात तुम्हारे साथ भी है। अब तुम हम सबकी नजरों में भूला नहीं हो।
तुमने अपनी गलतियां मान ली और तुम अपनी गलतियों का पश्चाताप भी करना चाहती हो यही सबसे बड़ी बात है।
वैसे तो अब सब सही ही होता दिख रहा है, लेकिन जाने क्यों मेरे दिमाग की घंटी बार-बार इस बात पर बज रही है कि ठाकुर साहब का कोई अता पता नहीं चला है। उन्हें अपनी पत्नी से भी ऐसा कोई प्रेम तो था नहीं । उन्होंने खुद ही अपनी पत्नी के ऊपर हमला करवाया था। यह भी मालूम चल चुका है और इसी सब को साबित करने के लिए केसर तुम्हारा कोर्ट में पेश होना बहुत जरूरी है।”

“तुम्हारी बात बिल्कुल सही है समर ! हम सब आज ही दून के लिए निकल जाएंगे! पर फिर भी मैं यह जानना चाहता था कि आखिर तुमने मुझे और केसर को ढूंढ कैसे निकाला?

उसी वक्त युवराज का सहायक राजा को बुलाने चला आया। कोई बहुत जरूरी बात होने से ही युवराज इस तरह से मीटिंग के बीच से राजा को बुला सकता है यह सोचकर राजा तुरंत वहां से निकल गया।

“आदित्य सा बस यही मत पूछिए बहुत मुश्किल था मेरा आपको और केसर को ढूंढना।
आप दोनों के ही फोन बंद थे हालांकि फोन आप लोगों के साथ होते तो फिर भी किसी तरह से मैं ट्रैक कर लेता लेकिन फोन भी आपके पास नहीं थे ! सबसे पहले मैंने यही गणित लगाना शुरू किया कि, अगर दून से आप उस वक्त पर भागेंगे तो किस दिशा में भाग सकते हैं। मुझे लगा आप बस रूट की जगह ट्रेन रूट को फॉलो करेंगे, क्योंकि अगर आप ट्रेन में चढ़ते हैं तो ठाकुर साहब के गुंडों का लंबी सी ट्रेन में आप को पकड़ना मुश्किल होगा। उसकी जगह एक छोटी सी बस से निकलना आप लोगों के लिए ज्यादा सुरक्षित नहीं रहता। मैंने आप लोगों के भागने के वक्त से डेढ़ से दो घंटों के भीतर की सभी ट्रेनों को खंगालना शुरू किया। उन सारी ट्रेन रूट्स को पता करने के बाद मुझे सबसे करीबी ट्रेन मध्य प्रदेश जाने वाली लगी। और मैंने अपने जासूसों को उस रूट की ट्रेन के सभी छोटे स्टेशंस पर दौड़ा दिया । मुझे बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। आप जब भिंड में थे वहां भी मैं पहुंच चुका था, लेकिन मेरे पहुंचने से पहले ही ठाकुर के गुंडे वहां पहुंच गए और आपको वहां से निकलना पड़ गया।
बस उसके बाद तो मुझे यह समझ आ ही गया था, कि आप यहां से बहुत ज्यादा दूर नहीं गए होंगे। क्योंकि आपके वहां से भागते ही उन गुंडों को मेरे आदमियों ने पकड़ लिया था, और पुलिस के हवाले कर दिया था। तो मुझे पता चल चुका था कि केसर बाईसा को गोली लगी है बस उस जगह के आसपास की जगह पर आदमी दौड़ाने से मुझे आपके बारे में खबर मिल गई।
    हालांकि इस सब दौड़ भाग में भी मुझे महीना भर लग ही गया और उस पूरे महीने आपको और केसर सा को उस छोटी सी जगह में बिना किसी सुविधा के गुजारना पड़ा जिसके लिए मुझे बहुत खेद है। क्योंकि मैं इससे ज्यादा कुछ कर नहीं पाया आपके लिए।
आप दोनों का यूँ एक साथ मिल जाना हमारे लिए बहुत खुशी की बात है। आप नहीं जानते- आपके गायब होने के बाद से ही राजा साहब बहुत परेशान थे। किसी भी बात में उनका मन नहीं लग रहा था। आप जानते ही हैं कि राजा साहब चुनाव की तैयारियों में भी व्यस्त हैं । इसके साथ ही रानी साहब भी अब अपने पूरे दिनों से हैं। ऐसे में इन्हें अपने छोटे भाई की बहुत जरूरत थी। विराज का हाल तो आप जानते ही हैं उनसे किसी भी तरह की कोई उम्मीद नहीं है।”

समर की बात सुनकर आदित्य भी मुस्कुराने लगा । केसर की तरफ उसने नज़र डाली।
उसे वाकई उम्मीद नहीं थी कि इतने कम समय में महल उसे इतने प्यार से अपना लेगा।

“चुनाव की तिथि क्या है समर?”

उसके सवाल पर समर ने कुछ कागजात उसके सामने बढ़ा दिये…-” बस बहुत ही जल्दी!
नामांकन भरा जा चुका है। और चुनाव की सारी तैयारियां अपने चरम पर है! ठीक पंद्रह दिन बाद चुनाव होने हैं। अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। सिर्फ इन दो हफ्तों में हमें ऐसा कुछ करना है कि जितनी सीट पर भी हुकुम और उनके कैंडिडेट खड़े हैं, वह सीटें हम भारी मतों से जीत सकें।

“बेशक हम ही जीतेंगे। एक बात और हम यह भी जानना चाहते थे समर! की इतनी कम सीट्स में जीतने के बावजूद भैया किसी भी ऊंचे पद को पा तो नहीं पाएंगे। क्योंकि सत्ता में तो वही पार्टी आएगी जिनके सबसे ज्यादा उम्मीदवार जीतेंगे और हमारे उम्मीदवार पक्ष और विपक्ष दोनों के ही उम्मीदवारों से आधे से भी कम है संख्या में।”

“आप सही कह रहे हैं आदित्य! इसीलिए चुनाव में मैं ऐसी तैयारी कर रहा हूं कि हमारे राजा साहब भारी मतों से जीतेंगे भी और बाकी के पक्ष और विपक्ष और बाकी पार्टियां बुरी तरह से हारेंगी भी।
दोनों पार्टी में अगर जीत हार का फैसला नहीं हो पाता है तब उसका पूरा फायदा हुकुम की पार्टी को मिलेगा और बस यही मेरी योजना है।
    मतदान ऐसे संपन्न होना चाहिए कि हुकुम की पार्टी के सभी लोग जीते और बाकी पार्टी के लोग ऐसे आंकड़ों से जीते कि जिस भी पार्टी को सत्ता में आना हो उसे हुकुम से हाथ मिलाना ही पड़े, और उस वक्त हुकुम को सर्वश्रेष्ठ पद देने की शर्त पर ही हम अपने जीते हुए कैंडिडेट के साथ उन से हाथ मिलाएंगे।”


“कहना तो तुम्हारा सही है समर लेकिन क्या भाई साहब इस बात के लिए तैयार होंगे?”

“राजा अजातशत्रु यानी हमारे हुकुम इस बात के लिए कभी तैयार नहीं होंगे। उन्होंने आज तक अपनी जिंदगी में हर जंग पूरी इमानदारी से जीती है, और आज भी वह मेरी इस बात के लिए तैयार नहीं होंगे। लेकिन इसीलिए मैं उन्हें यह सब बिना बताए करने वाला हूं आपसे भी उम्मीद करता हूं कि आप मेरी यह बात हम दोनों के बीच ही रखेंगे।
   फिलहाल राजा जी से कुछ भी कहने का कोई मतलब नहीं है अभी तो पंद्रह दिन बाकी है। उसके बाद देखते हैं आगे की रणनीति क्या होती है?
अभी तो नहीं लेकिन जीतने के बाद किसी भी तरीके से मुझे राजा साहेब को इस बात के लिए मनाना ही पड़ेगा।”


“आप बिल्कुल सही कर रहे हैं हम भी आपके पक्ष में हैं।

केसर की बात पर समर और आदित्य दोनों ने ही सहमति दे दी….-“अब आप दोनों भी कुछ खा पी लीजिए ! बहुत थके हुए हैं आप लोग अब अपने कमरे में जाकर आराम कर लीजिए। इस महल में अब आप पूरी तरह सुरक्षित हैं । विराज सा को अब तक आप दोनों के यहां पहुंचने की जानकारी नहीं दी गई है। हालांकि मैं यह जानता हूं कि विराज कितना भी बुरा हो लेकिन उसे अपनी और ठाकुर साहब के बीच के रिश्ते के बारे में मालूमात नहीं है । और इसीलिए ठाकुर साहब के गुंडों से भी उसका कोई लेना-देना नहीं है। पर फिर भी आप दोनों की सुरक्षा मेरे जिम्मे है। आप लोग ऑफिस के सामने वाले दरवाज़े से निकल कर अपने कमरों की ओर जाने की जगह इसी ऑफिस में पीछे की तरफ एक खुफिया दरवाजा है जो अंदर ही अंदर महल के सभी कमरों से जुड़ा हुआ है, वहाँ से अंदर जाएंगे।
उस दरवाजे से होकर आगे बढ़ते ही चौथे नंबर का कमरा आपका रहेगा आदित्य और सातवें नंबर पर आपका कमरा है केसर सा!
आप दोनों का खाना पीना और बाकी सारी आप की सुविधाओं की चीजें आपके कमरों में मेरे बहुत खास और विश्वासपात्र नौकरों के हाथ से मैं भिजवा दूंगा।
  अब मैं चलता हूं मुझे भी कुछ जरूरी काम है और इससे साथ ही आप लोग भी थोड़ा आराम कर लीजिए….


समर की बात मानकर आदित्य और केसर खुफिया दरवाजे की तरफ़ बढ़ गये समर भी साथ ही गया ।
ऑफिस में पीछे की तरफ एक बड़ी सी दीवार में बहुत ही बड़ी बुक्शेल्फ थी जिसमें किताबें भरी हुई थी । उस बुक्शेल्फ के एक तरफ एक छोटा सा ऐसा बटन था जो आसानी से नजर नहीं आ रहा था उस बटन को हल्के से दबाते ही वह बुक्शेल्फ एक तरफ को खिसक गई और सामने एक दरवाजा नजर आने लगा । उस दरवाजे को खोलते ही एक छोटा सा गलियारा बना हुआ था। समर वहां से आदित्य और केसर को लेकर अंदर चला गया। उन दोनों को उन के कमरों में छोड़कर वह बाहर निकल ही रहा था कि उसके फोन पर किसी का मैसेज चला आया- मैसेज पिया का था ….

” आजकल कहां भटक रहे हैं मंत्री जी नजर ही नहीं आते?”

“आप देखना चाहे तब तो नजर आएंगे?”

“मतलब इसमे भी मेरी गलती है?”

“मैंने ऐसा तो नहीं कहा।”

“तो जो कहा उसका क्या मतलब है?”

“इसका मतलब यह है कि आप इस वक्त कहां मिलेंगी मैं आ रहा हूं?

“क्या बात है मुझसे मिलने आ रहे हो?”

“नहीं मिलने नहीं तुम्हारी खबर लेने आ रहा हूं।”

“क्या मतलब?”

“आकर समझाता हूं पहले बताओ कहां मिलोगी?”

“अस्पताल के आगे वाले कॉफी शॉप पर आ जाओ!”

एक छोटा सा “हम्म” करके समर ने फोन जेब में डाला और बाहर निकल गया ।समर से बात करते हुए पिया को लगा भी कि समर और दिनों की तरह चुलबुला और मस्तीखोर लगने की जगह कुछ ज्यादा ही गंभीर लग रहा था। पिया को जाने क्यों ऐसा लगा जैसे समर उससे कुछ नाराज सा है। फिर भी अपने मन को समझा कर पिया कॉफी शॉप की ओर निकलने के लिए अपने केबिन से बाहर आ गई।

अस्पताल से वो निकल ही रही थी कि एक अर्जेंट डिलीवरी का केस चलाया। केस पास के ही गांव का था ।
गांव की किसी दाई ने बच्चा पैदा करवाने की कोशिश करी थी।
    गांव पर काम करने वाली दाईयां वैसे तो इन सब कामों में अनुभवी और कुशल होती हैं ,लेकिन उस दिन बच्चे का सिर बाहर नहीं आ पाने के कारण उस दाई ने जो भी दवाइयां प्रयोग की उसके कारण प्रसूता की हालत बिगड़ती चली जा रही थी।
बच्चा सही तरह से निकल नहीं पा रहा था और प्रसूता का दर्द के मारे बुरा हाल था। आनन-फानन में उसे लेकर गांव के लोग भागते हुए अस्पताल पहुंचे थे। उस प्रसूता की हालत देखकर पिया का उसे जूनियर डॉक्टर के सहारे छोड़ कर निकलने का मन नहीं हुआ और वह तुरंत अपना एप्रिन पहने ऑपरेशन थिएटर की ओर भाग चली।
   केस कॉम्प्लिकेटेड हो गया था। दर्द ले लेकर सात से आठ घंटों में प्रसूता पूरी तरह से थक चुकी थी। और अब उस पर बेहोशी छाने लगी थी। बच्चे का सिर इस तरह से फंसा हुआ था कि वो न तो सामान्य प्रसूति से निकल सकता था और ना ही ऑपरेट करके।

केस को देखकर पिया के भी हाथ-पांव फूल गए थे।

एक बार को उसे लगा कि अपने कच्चे अनुभव से क्या वह इतनी जटिल प्रसूति करवा पाएगी? लेकिन फिर भगवान का नाम लेकर उसने हाथ जोड़ें और अपने स्टाफ की सहायता से काम में जुट गई।
लगभग एक डेढ़ घंटे के अथक प्रयास के बाद एक नन्हा सा रोता हुआ बालक पैदा हो गया। पूरे अस्पताल में खुशी की लहर दौड़ गयी।
उस महिला के परिजनों की जान में जान आयी। वह दाई माँ जो घबरा कर एक किनारे जमीन पर चुपचाप बैठे भगवान का नाम जप रही थी, खुश होकर पिया के पैरों पर गिर पड़ी। अगर मां और बच्चे को कुछ भी हो जाता तो उस दाई का पूरा नाम खराब हो जाना था पिया ने उसे उठाकर उसके कंधे पर थपकी दी और उसे सामने कुर्सी पर बैठा दिया।

उस औरत के परिजनों से बात कर और उन्हें सारी बातें अच्छे से समझा कर पिया एक बार फिर कॉपी शॉप के लिए निकल गई।
निकलते हुए उसे ध्यान आया कि उसे इस सारे झंझट और फसाद में समर को फोन करके बताना तो याद ही नहीं रहा कि वह लेट हो जाएगी। उसने तुरंत अपने पर्स में से अपना फोन निकाला और समर को फोन लगाने के लिए फोन हाथ में लिया ही था कि देखा समर की पांच मिस कॉल मौजूद थीं। मुस्कुरा कर उसने समर का नंबर जैसे ही डायल किया नंबर व्यस्त बताने लगा।

दो तीन बार डायल करने के बाद भी समर ने फोन नहीं उठाया तो परेशान होकर पिया ने फोन अपने पर्स में डाला और कॉफी शॉप की तरफ निकल गई । जैसा कि उसे उम्मीद थी समर कॉफी शॉप पर मौजूद नहीं था। वहां पूछताछ करने पर पता चला कि कोई लड़का आधा पौना घंटा वहां किसी का इंतजार करता रहा और कॉफी पीकर कुछ समय पहले ही वहां से निकल गया।

पिया समझ गई कि वहां बैठ कर इंतजार करने के बाद जब उसने समर के द्वारा फोन लगाए जाने पर भी फोन रिसीव नहीं किया, तो झुंझला कर समर वहां से निकल ही गया होगा। जाहिर है वह इतना व्यस्त रहता है, ऐसे में उसका कितनी देर इंतजार करता? पिया ने अपना फोन वापस पर्स में डाला और समर के घर की तरफ निकल गई…….

क्रमशः

aparna ….










   

उधेड़बुन

एक छोटी सी प्रेम कहानी

‘उधेड़बुन ‘
          
           आज सुबह से ही धानी बड़ी व्यस्त है, कभी सलाईयों में फंदे डाल रही है,कभी निकाल रही है,कल ही से उसने नयी नयी बुनाई सीखना शुरू किया है॥  

अहा!  कितना मजे का समय है ये,,बुनाई कितनी कलात्मक होती है,,और भी कलायें होतीं हैं संसार में ,पेटिंग करना,कढ़ाई करना,पॅाट बनाना,वास बनाना पर ये सब एक हद तक सिर्फ अपने शौक पूरे करने जैसा है।बुनाई ही एक ऐसी कला दिखती है जिसमें कलाकार अपने सारे प्रेम को निचोड़ कर रख देता है।
              कुछ फंदे सीधे कुछ उल्टे बीनना ,कहीं फंदा गिराना कही फंदा उठाना,उफ पूरा गणित है बुनाई भी॥ और इतनी त्याग तपस्या के बाद बुना स्वेटर जब हमारा करीबी कोई पहनता है तो कितना गर्व होता है बनाने वाले को खुद पर। ऐसे ही बहुत सारे मिले जुले भावों के साथ धानी ने भी अपना पहला स्वेटर बुनना शुरू किया था,,पिंटू दा के लिये।
        
               स्वेटर बुनते हुये कितनी प्रसन्न कितनी विभोर थी धानी,अपने उपर अचानक मान भी होने लगता कि कोई भी नया काम हो वो कितनी जल्दी सीख लेती है।खाना बनाने में तो उसे महारथ हासिल है,कैसी भी पेचीदगी भरी जटिल रसोई हो,वो आधे घण्टे में सब सुलझा के रख देती है,चने की भाजी बनाना हो या मटर का निमोना उसके बायें हाथ का खेल है बस । कचौडि़याँ और मूंग का हलवा तो घर पे वही बस बनाती है,,मां को रसोई मे इतनी देर खड़ा होने मे थकान होने लगती है। घर को सजा  संवार केे रखना कपड़़ोंं को सहेजना,रसोई  बनााना इन सारे नारी सुलभ गुणोंं की खान है धानी।
              
           बस एक ही चीज है जो उसे बिल्कुल नही सुहाती ,वो है पढ़ाई। जाने कैसे लोग किताबों में प्राण दिये रहतें हैं,ना उसे पढ़ना पसंद है ना लिखना,,नापंसदगी की हद इतनी है कि लड़की गृहशोभा,गृहलक्ष्मी जैसी गृहिणियों की पहली पसंद रही किताबों पर भी आंख नही देती।

            आलम ये है कि दो बार में ही सही धानी ने बारहवीं पास कर ली ,उसके बाद होम साईंस लेकर अभी कालेज का सेकण्ड इयर पढ़ रही है,वो भी दुबारा। पढ़ाई से इतनी वितृष्णा का कारण भी बहुत वाजिब है,धानी की अम्मा ने अपने जमाने में बी.ए. किया था ,उसके बाद उनकी शादी हो गयी।मन में तरह तरह के सपने सजाये धानी की मां ससुराल आई तो उन्हे पता चला कि उस घर में उनकी डिग्री की कोई कीमत नही। वो अपने पैरों पर खड़ा होना चाहतीं थीं,एक अच्छी सरकारी नौकरी करना चाहतीं थीं पर उनकी पढ़ाई उनका ज्ञान उनके चौके तक ही सिमट कर रह गया। इसी कारण उन्होंने बचपन से ही धानी के मन में ये बात भली प्रकार बैठा दी जैसे तैसे वो थोड़ा बहुत पढ़ लिख ले फिर उसकी अच्छे घर में शादी करनी हैं।

                   बालिका धानी के मन में ये बात अच्छे से पैठ गयी की उसे सारा ज्ञान ऐसा ही अर्जित करना है,जिससे उसकी एक अच्छे घर में शादी हो सके।  उसी ज्ञान का नया सोपान था बुनाई।

           बहुत खुश और खुद मे मगन थी धानी बुनाई सीखते हुये।पड़ोस में रहने वाली लाली दीदी मायके आई थीं दो महीनों की लम्बी छुट्टी पर,बस उन्ही से ये गुरू ज्ञान मिला था,वो अपने पति के लिये बुन रही थी और धानी अपने पिंटू दा के लिये।
   
             पिंटू दा ! पिंटू दा से धानी की मुलाकात यही कोई 7-8 साल पहले हुई थी, तब वो स्कूल जाती थी,शायद नौंवी या दसवीं में थी,। पिंटू दा ने उसी साल ईंजिनियरिंग काॅलेज में प्रवेश किया था,दोनो सेमेस्टर पास करने के बाद की छुट्टियों में अपनी मामी के घर आ गये थे घूमने।
   
         पहली मुलाकात में ही उसे पिंटू दा बहुत भा गये थे,,कितने लंबे थे, चौड़ा माथा ,घने बाल,गोरा रंग,और गहरी आवाज ॥ कोई भी बात कितना समझा के बोलते थे,कि सामने वाला उनकी हर बात मान जाये।

               उस दिन मां ने धानी के हाथ से साबुदाने के बड़े भिजवाये थे रीमा चाची के घर,,बड़े लेकर जब धानी वहांं पहुंची तब चाची चाय चढा़ रहीं थीं,उसे देखते ही खिल गयीं ” आ तू भी चाय पी ले।”
     “नही चाची मैं तो बस ये देने आयी हूं,मां ने रज्जू दा के लिये भेजा है।”
       “अरे दिखा जरा क्या भेजा है जिज्जी ने,वाह साबुदाने के बङे।” 
      ” अच्छा रूक जरा मैं ये चाय भी साथ ही छान देतीं हूं,तू जरा ऊपर रज्जू के कमरे तक पहुचां दे ।”        “ये चाय के दो कप क्यों चाची,मैं तो नही पियूंगीं।” “हां बिटिया ये दूसरा कप पिंटू के लिये है,कलकत्ता वाली ननंद का बेटा।” “बहुत होशियार लड़का है,पहली बार में ही वो क्या कहते हैं आई.आई.टी. निकाल लिया उसने,,कानपुर में पढ़ रहा अभी।”
    “अच्छा मैं चाय दे के आती हूं।”
           
                  धानी का आज अपनी सहेली ममता के साथ पिक्चर जाने का प्लान था,ममता सज धज के उसके घर पहुंच चुकी थी,वो दोनो निकलने ही वाली थीं कि माता जी का फरमान सुनाई दिया ,
           ” बिट्टो जा जरा जाते जाते ये बड़े रीमा के यहां दे जा।”
           “क्या मां तुम भी ना,बनाने का इतना शौक है तो पहुंचाया भी खुद करो ,मुझे वैसे ही देर हो गयी है।”
        “अरे जा ना धनिया दे आ,पांच मिनट लगेगा मुश्किल से” भुनभुनाती पैर पटकती धानी वहां गयी तो रीमा चाची ने एक नया काम पकड़ा दिया। ऊपर पहुंच कर कमरे के दरवाजे को खटकाने जा ही रही थी कि दरवाजा खुल गया, पर सामने रज्जू दा तो नही थे,ये तो कोई और था। तब तक सामने खड़े आगंतुक ने हाथ बढ़ाकर धानी के हाथ से ट्रे ले ली ,और वापस अंदर मुड़ गया।अच्छा तो यही था पिंटू,,चाची का आई आई टियन भांजा।

                 धानी वापस मुड़ कर जाने लगी तो पीछे से एक थैंक्यू सुनाई दिया,मुड़ कर मुस्कुरा कर वो जल्दी जल्दी नीचे उतर गयी।
                             यही थी वो मुलाकात जिसके बाद धानी का मन  “मैनें प्यार किया “देखने मे भी नही लगा,कितने मन से आयी थी ,और यहां सारा वक्त उसी के बारे मे सोचते गुजर गया।

                   इसके दो तीन दिन बाद धानी दोपहर मैं स्कूल से वापस आयी तो रज्जू दा और पिंटू उसके घर पे बैठे खाना खा रहे थे,वो रसोई में गयी तो मां ने बताया कि रीमा चाची की तबीयत कुछ नासाज है इसी से मां ने दोनों को यही बुला लिया खाने पे।

      उसके बाद तो सिलसिला सा चल निकला ,जाने क्यो धानी को पिन्टू दा को छुप छुप के देखना बड़ा भाता था।अपनी छत पे बने लोहे के दरवाजे के ऊपर बनी जाली से वो बीच बीच मे झांक लगा लेती की बाजू वाली छत पे पिन्टू दा आ गये या नही।
   और जैसे ही देखती की आ गये वो झट किसी ना किसी बहाने छत पे आ जाती।
           कभी पहले से पानी मे तर पौधों मे पानी डालती ,कभी सुखे कपड़े पलटने लगती।
    और इन्ही सब के बीच कभी रज्जू दा उसे कैसे छेड़ देते ,कितना गुस्सा आता था उसे।
   “अरी धानी कभी पढ़ लिख भी लिया कर,बस इधर उधर डोलती फिरती है।”इस साल भी फेल होना है क्या।”
     पिन्टू के सामने कट के रह गयी धानी।रज्जू दा भी कभी कैसा बचपना कर जाते हैं ।
   पर पिन्टू उससे हमेशा बहुत प्यार से बात करता ,धानी जी बोलता ,,आप आप कर के उसे किसी राजकुमारी सा अह्सास कराता ।

   अक्सर शाम को उनकी ताश की बाजी जमती।रीमा चाची ,रज्जू दा,वो और पिन्टू।
उसकी और रज्जू दा की जोडी हमेशा ही जीत जाती और वो बड़ी अदा से पिन्टू को देख मुस्कुरा देती।
     एक बार चाची के साथ पकौड़ी तल रही थी,तभी कोई किताब पढते पढ़ते पिन्टू रसोई मे आया,उसे लगा मामी खड़ी है,उसने चट प्लेट से एक पकौड़ा उठाया और मुहँ मे भर लिया।
गरम पकौड़े की जलन से तिलमिला गया की तभी धानी पानी भरा ग्लास ले आयी।
    पिन्टू की जान मे जान आयी “थैंक यू धानी जी! मेरा ध्यान ही नही गया ,पढ़ने मे लगा था ना।”और हँसते हुए पिन्टू वहाँ से चल दिया।
  पर इस खाने पीने के चक्कर मे अपनी किताब भूल गया।
     धानी उसे उठा ले गयी।”मिल्स ऐण्ड बून” !
हे भगवान ! ये प्यार जो ना कराये,,धानी के लिये एक किताब पढ्ना उतना ही दुष्कर था जितना एक लंगडे के लिये रेस मे भागना और एक गून्गे के लिये गीत गाना।
    पर फिर भी बिचारी डिक्शनरी खोल के पढ़ने बैठी।उसकी बुद्धि जितना समझ सकती थी उतना उसने भरसक प्रयत्न किया फिर किताब को पकड़े ही सो गयी।

     कुछ दिन बाद होली थी।इस बार धानी ने अपनी जन्म दायिनी की भी उतनी सहायता नही की जितनी रीमा चाची के घर लोयियाँ बेली,उनके हर काम मे कदम ताल मिलाती धानी यही मनाती की चाची किसी तरह पिन्टू के लिये उसे उसकी माँ से मांग ले।
      होली का दिन आया ,हर होली पे पूरे मोहल्ले को रंगती फिरती धानी इस बार नव वधु सी लजिली बन गयी।उसे एक ही धुन थी।
   पिन्टू रज्जू के साथ उनके घर आया ,उसके माँ बाबा के पैर छुए आशीर्वाद लिया,उसके गालों पे भी गुलाबी रंग लगाया और चला गया।
    बस धानी ने सब जान लिया,उसने प्रेम की बोली अपने प्रियतम की आँखो मे पढ़ ली।

सारे रस भरे दिन चूक गये,और एक दिन पिन्टू कानपुर लौट गया।
      धानी चाची के घर आयी तब चाची ने बताया “अरे धानी ,बेटा एक कप चाय तो पिला दे।”आज सुबह से जो रसोई मे भीड़ि तो अभी फुर्सत पायी है,आज पिन्टू निकल गया ना,उसीके लिये रास्ते का खाना बनाने मे लगी रही।”
” कब निकले पिन्टू दा,कुछ बताया नही उन्होनें ।क्या अचानक ही जाना हुआ क्या उनका।”
    अपनी आवाज की नमी को छिपाते हुए उसने पुछा।
“रिसेर्वेशन तो पहले ही से था ना लाड़ो,इतनी दूर कही बिना रिसर्वेशन जाया जा सकता है क्या।”

हाँ जाया तो नही जा सकता पर बताया तो जा सकता है,इतनी भी ज़रूरत नही समझी,की मुझे बता  के जायें।
 
            ठीक है कभी हमने एक दूसरे से नही कहा लेकिन क्या हम दोनो ने एक दूसरे की आंखो मे प्यार देखा नही।
     
                 एक 14वर्ष की किशोरी दुख के अथाह सागर मे डूबने उतराने लगी।उसका पहला प्यार उससे बहुत दूर चला गया था,पर उसे अपने प्यार पे विश्वास था,एक दिन  उसका प्यार अपने पैरों पे खड़ा होके उसके घर बारात लिये आयेगा और उसे चंदन डोली बैठा के ले जायेगा।

     पिन्टू धानी के हृदय की कोमलता से सर्वथा अनभिज्ञ था,वो छुट्टियां मनाकर वापस लौट अपनी पढाई मे व्यस्त हो गया।

    समय बीतता गया,जीवन आगे बढता गया,पर धानी के मन से पिन्टू नही निकल पाया।

     धानी ने बहुत सुन्दर स्वेटर बुना है,जाने कब मिलना होगा पिन्टू से,पर जब भी होगा तभी वो अपनी प्रेम भेंट उसे देगी।ऐसा सोच कर ही धानी गुलाबी हो जाती।

    रज्जू के दादा 89बरस के होके चल बसे,पूरा घर परिवार शोकाकुल है,धानी भी,पर बस एक खयाल उसे थोड़ा उत्फुल्ल कर रहा की अब तो पिन्टू आयेगा।
        पिन्टू आया,पूरे 8बरस बाद!  धानी का पहला प्यार वापस आ गया।
     रीमा चाची के घर पूजा पाठ संपन्न हो रहा,तेरह बाम्हण जिमाने बैठे है,धानी दौड दौड कर सारे कार्य कर रही जैसे उसके खुद के ससुराल का काम है।अभी तक पिन्टू की झलक नही मिली पर उसी इन्तजार का तो मज़ा है।
      सारे काम निपटा के चाची बोली “जा धानी पिन्टू उपर रज्जू के कमरे मे है,जा ये थाली वहाँ दे आ।”
     थाली लिये राजकुमारी चली।मन ऐसे कांप रहा की अभी गिर पड़ेगी ।थाली ऐसी भारी लग रही की कही हाथ से छूट ना जाये,घबड़ाहट से हथेलियों मे पसीना छलक आया है,दिल की धड़कन तो धानी खुद सुन पा रही है।
   
             उफ्फ कैसा होगा वो समय ! जब वो पिन्टू को देखेगी ,उसे स्कूल मे पढी एक कविता की लाइन याद आ रही।
    ‘”चित्रा ने अर्जुन को पाया,शिव से मिली भवानी थी”।
   प्रेम का अपना अनूठा ही राग होता है वीर रस की कविता मे भी शृंगार रस की एक ही लाइन याद रही लड़की को।
  
  धडकते हृदय और कांपते हाथों से द्वार पे दस्तक दी उसने।
  “दरवाजा खुला है”वही भारी आवाज,सुनते ही धानी का हृदय धक से रह गया।धीरे से किवाड़ धकेल उसने खोला।
    
   अन्दर कुर्सी पे बैठा पिन्टू कुछ पढ़ रहा है,हाँ पिन्टू  ही तो हैं।पिन्टू ने आँख उठा कर धानी को देखा, धानी ने पिन्टू को, नजरे मिली,पिन्टू मुस्कुराया, पूछा
“कैसी है धानी ?” धानी के गले मे ही सारे शब्द फंस गये ,लगा कुछ अटक रहा है।
  “ठीक हूं पिन्टू दा।आप कैसे हो ?” इतना कह कर थाली नीचे रख धानी वापस सीढिय़ां उतर गयी।
  “मै तो एकदम मस्त ।”पिन्टू की आवाज सीढियों तक उसका पीछा करती आयी।

   हां मस्त तो दिख ही रहे,हे भगवान !कोई आदमी इतना कैसे बदल गया वो भी 8 ही वर्षों मे।
   नही! हे मेरे देवता! कोई मुझे आके बोल दो ,ये पिन्टू नही है।
    धानी को ज़ोर की रुलायी फूटने लगी,वो वहाँ से भागी ,अपने कमरे मे जाके ही सांस ली।
  अपनी आलमारी मे अपने कपडों के बीच छिपा के रखा स्वेटर निकाला और उसे अपने सीने से लगाये रोती रही।
     कितना मोटा आदमी सा हो गया था पिन्टू,पेट तो ऐसे निकल आया था जैसे कोई आसन्न पृसुता है जिसे अभी तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ेगा।उफ्फ सर के घने बाल भी गायब,ये तो बिल्कुल ही गंजा हो गया।
     पूरा चेहरा फूल के कुप्पा हो गया है,इतने लाल से गाल ,गालों का इतना उभरा मांस की बड़ी बड़ी आंखे भी चीनियों सी छोटी दिख रही। पूरी शकल ही बदल गयी जनाब की बस नही बदली आवाज।
     तो क्या आवाज के भरोसे ही शादी कर लुंगी।।
  ” हे भगवान !  बचा लिया मुझे,अच्छा हुआ अपनी बेवकूफी किसी से कही नही मैने।”
   “अपने प्रथम प्रेम को अपने ही मन तक सीमित रखा।”
  
बेचारी धानी जब रो धो के फुरसत पा गयी तब अपने बुने स्वेटर को लेके बैठी,अब उसे उधाड़ना जो था ,ये स्वेटर अब उसका प्रेमी कभी नही पहन पायेगा।।

उधेड़बुन  एक छोटी सी प्यारी सी प्रेम कथा है ,जो किशोर वय के प्रेम को दर्शाती है,जिसमे नायिका को हमेशा ही लगता है, उसका प्रेम बहुत उंचे आदर्शों पे टिका है,जबकी वास्तव मे उसके प्रेम का  आधार सिर्फ रूप ही है,और जीवन की वास्तविकता से दो चार होते ही धानी का गुलाबी प्रेम विलोपित हो जाता है।।।

कहानी को पढ़ने के लिये धन्यवाद!

अपर्णा।
           

समिधा -22

समिधा-22



           हरिद्वार से बस आगे निकल चुकी थी। पिछली
रात से होती बारिश अब भी नही रुकी थी ।
   ऋषिकेश से जैसे जैसे बस आगे बढ़ती जा रही थी पहाड़ी रास्ता शुरू होता जा रहा था, एक तरफ बारिश से धुलते पहाड़ थे तो दूसरी तरफ गरजती गंगा बह रही थी। धूल भरा रास्ता बारिश के पानी से कीचड़ भरा हो गया था। छोटे छोटे गांव पीछे छूटते जा रहे थे और आगे बढ़ते हुए शर्मा जी का उत्साह भी बढ़ता जा रहा था…

” ये देख रहें हैं आप लोग, ये शिवपुरी कहलाता है। यहाँ ये गंगा जी के किनारे पर की रेत पर लोग टेंट लगा कर रुकतें हैं। अभी लगातार होती बारिश के कारण ही कम नज़र आ रहें हैं। फिर भी इक्का दुक्का आप लोग देख ही सकतें हैं।
  गर्मियों में व्यास और कौड़ियावलिया में जबरजस्त रिवर राफ्टिंग होती है जी।”

  शर्मा जी की बातों में वरुण को कोई रस नही मिल रहा था वो तो पूरी तरह से प्रकृति की सुंदरता में खोया खिड़की से बाहर देख रहा था वहीं देव शर्मा जी से खोद खोद कर वहाँ के बारे में पूछ रहा था।

” ये तो हम शायद देवप्रयाग पहुंच गए हैं ना शर्मा जी!”

” बिल्कुल सही पहचान गए हो बेटे। ये देवप्रयाग ही है,  यहीं भागीरथी और अलकनंदा का संगम होता है। यहीं के बाद गंगा गंगा कहलाती है यहाँ तक वो भागीरथी होती है।मुख्य रूप से अलकनंदा के पाँच प्रमुख प्रयाग है. पाँच प्रयागो मे यह पाँचवा प्रयाग है. पहला प्रयाग विष्णु प्रयाग है जहाँ अलकनंदा से धौली गंगा मिलती है. दूसरा प्रयाग  नन्दप्रयाग है यहाँ नन्दकिनी नदी अलकनंदा मे मिलती है. तीसरा प्रयाग कर्ण प्रयाग है यहाँ पिंडर नदी अलकनंदा मे मिलती है.  चौथा प्रयाग रुद्रप्रयाग है. रुद्रप्रयाग मे मंदाकिनी अलकनंदा से मिलती हैं और पाँचवा देव प्रयाग.”

“बहुत जानकारी है आपको शर्मा जी।”

” अरे बेटा काम ही यही है हमारा। अभी देवप्रयाग के बाद श्रीनगर पड़ेगा उत्तराखंड वाला, उसके बाद जगह पड़ती है कालिया सौर जहाँ धरा देवी का सुप्रसिद्ध मंदिर पड़ता है। आप लोग चाहें तो दर्शन कर सकतें हैं वहाँ।”

  शर्मा जी और देव की बातों को सुनते गाते बजाते लोग आगे बढ़ते चले गए। एक नया नवेला जोड़ा तोता मैना बना एक दूसरे के सर में सर घुसाये बस के बाकी लोगों से बेखबर  खिड़की से बाहर देखने में लगा था।
     तिलवारा से आगे अगस्त्यमुनि में बस कुछ देर को रुक गयी…  ऊंची नीची चट्टानों पर अस्तांचलगामी सूर्य की किरणें पड़ रहीं थी, लेकिन सुबह से होती बारिश अब भी नही रुकी थी।
   वहाँ गुफाओं में बने आश्रम में घूमते वरुण को वहाँ कुछ और देर रुकने का मन कर रहा था लेकिन बाकियों को आगे बढ़ने की जल्दी थी। ड्राइवर का कहना था कि रात में पहाड़ी में जितना कम गाड़ी चलाया जाए उतना सुरक्षित रहेगा। उसे आज की रात सोनप्रयाग तक पहुंचना ही था। सोनप्रयाग में डेरा डाल दिया गया।

   अगली सुबह सब वहाँ से गौरीकुंड के लिए निकल गए।

   गौरीकुंड से थोड़ा आगे बढ़ा कर बस वाले ने बस रोक दी। वहाँ ढेर सारे खच्चर वाले और डोले वाले खड़े थे।
  ठाकुर माँ को डोले में बैठा कर देव वरुण के साथ घोड़े वाले के पास चला आया। अधिकतर लोग अपनी सुविधा से घोड़ा या डोला चुनतें जा रहे थे।
  शर्मा जी घोड़े वालों से बातचीत कर उनसे पैसे कम करने की चिकचिक कर रहे थे,घोड़े वाले अपनी ही परेशानी में थे… ” ये बारिश बंद नही हुई तो बड़ी मुसीबत हो जाएगी। “

  ” हाँ मैंने भी सुना है मंदाकिनी जो पच्छिम को बहती है उफान पर आ रही है। दद्दा कह रहे थे ऐसे ही पानी बरसात रहा तो पूरब को मुड़ जाएगी , और पूरब को अगर मुड़ी तो ये जो सब गेस्ट हाउस ,होटल बासा सब खोल दिया है ना सब बह जाएगा कसम से! “

” महादेव रक्षा करें!
     हाँ भाई बोलो कित्ते आदमी हो आप लोग । रुपया तो कम नही हो पायेगा। रास्ता देखो न आप उस पर ये बारिश,हम तो सब भीगते भीगते ही चलेंगे न दादा।”

” इतने लोगों को एक साथ लेकर जाने का भी कुछ कम नही करोगे।?”

” चलो ठीक है सौ पचास कम दे देना, बैठते जाओ एक एक पर। हमारे और आदमी भी है यहाँ ।

  सबके बैठते ही घोड़े वाले घोड़े लिए आगे बढ़ने लगे। पहाड़ पर के संकरे रास्ते पर भी घोड़ा खाई की तरफ बढ़ कर ठुमकता हुआ आगे बढ़ रहा था, कुछ को इस यात्रा में आनन्द आ रहा था तो कुछ को डर भी लग रहा था…

” अरे भैया जरा किनारे चलाओ न अपने घोड़े को। ये तो खाई से नीचे गिर पड़ेगा लग रहा है।”

” आराम से बैठिये बहन जी। ये घोड़े यहीं पहाड़ियों पर पैदा हुए हैं , दिन भर में तीन चार चक्कर लगा ही लेते हैं। इन्हें इन रास्तों की आदत है। अच्छा आप सभी लोग अपना अपना घोड़ा पहचान लीजियेगा। मंदिर दर्शन कर निकलेंगे तो पहचान कर बैठ जाइयेगा उतरने के लिए। “

   गौरीकुंड से आगे बढ़ते चलते खच्चर वाले अपनी अपनी सवारियों को केदारनाथ के किस्से भी सुनाए जा रहे थे।
   रास्ते में पड़ने वाले मंदिर दिखाते उसका प्राचीन किस्सा सुनते वो आगे बढ़ रहे थे।
भीम मंदिर पार करने के बाद और आगे बढ़ने पर रामबाड़ा आ चुका था।
   वहाँ घोड़ो को एक किनारे बांध घोड़े वाले आराम करने लगे थे।
   एक छोटी सी दुकान पर वरुण और देव साथ ही बैठे थे। दादी को चाय का गिलास देकर देव वरुण के पास अपनी चाय लिए आ रहा था कि बारिश के कारण वो फिसलने को हुआ लेकिन पास पड़ी टेबल का सहारा लिए वो गिरने से बच गया। लेकिन उसे देखते बैठा वरुण ज़ोर से उसका नाम ले चिल्ला उठा  ” देव बचो!”

  देव आश्चर्य से उसे देखता उस तक चला आया” मैं ठीक हूँ वरुण ! अचानक क्या हुआ? “

” पता नही मुझे ऐसा लगा जैसे इन पथरीली संकरी गलियों में तेज़ी से पानी बहता चला आ रहा है और तुम उसी में गिरने जा रहे हो।।”

” लगातार होती बारिश से डर गए हो लगता है।”

” हाँ दोस्त शायद तुम सही कह रहे। आजकल समझ नही आता, मेरे साथ क्या हो रहा है। अचानक कुछ सेकंड्स को आंखों के सामने एक तस्वीर सी बन जाती है और पलक झपकते में ही गायब हो जाती है।”

” पूर्वाभास तो नही होने लगा है कहीं तुम्हें?”

” क्या पता! “दोनों बातें करते हुए चाय भी पी गए कि उनके घोड़े वाले उन्हें बुलाते चले आये। एक बार फिर वो मनोहारी सफर शुरू हो गया।
     रामबाड़ा  से थोड़ा आगे बढ़ते ही सामने विशाल केदार पर्वत हल्की सी निकली धूप में पल भर को चांदी सा चमक उठा। आसपास उड़ते बादलों के बीच ऊंची चमकती गौर धवल पर्वत श्रृंखला देखने वालों को अभिभूत कर रही थी।
   यूँ लग रहा था प्रकृति अपना सारा सौंदर्य यही उड़ेल चुकी है , एक तरफ बहती दूधिया मंदाकिनी और दूसरी तरफ ऊंचा खड़ा केदार ऐसा अपरूप सौंदर्य था कि किसी की आंखें नही झपक रही थी…

” बस गरुड़ चट्टी से थोड़ा आगे से आप लोगों को पैदल जाना होगा बाबू लोग।
  बारिश की वजह से यहाँ गरुड़ नही दिख रहे वरना तो ऐसा लगता है जैसे छोटे छोटे यान उड़ रहे हों। “

  घोड़े वाले कि बात पर हामी भर सब इधर उधर देखते आगे बढ़ते रहे। घोड़े वाले लड़के चलते हुए आपस में कुछ खुसर पुसुर भी करते चल रहे थे।
   शायद लगातार होती बारिश उन लोगों को अब डराने लगी थी…

  मंदिर से कुछ पहले ही उन्हें उतार वो लोग एक तरफ चले गए। मंदिर के सामने पथरीली सी गली के दोनों ओर छोटे छोटे दुकान वाले बैठे थे, कुछ छोटे होटल भी थे।

   ठाकुर माँ को साथ लिए देव ने उनके लिए पूजा की थाली खरीदी और अंदर बढ़ गया….

  मंदिर के प्रथम भाग में पांचों पांडवों की मूर्ति स्थापित थी। श्रद्धालुओं की पंक्ति दर्शनों के लिए खड़ी थी, उसी पंक्ति में देव और वरुण भी खड़े हो गए। साथ आया पंडा उन सब को मंदिर धाम की कहानी सुनाने लगा..

“कहा जाता है , पांडव यहीं अपना पश्चाताप करने शिव जी के दर्शनार्थ आये थे परंतु शिव जी उन्हें अपने दर्शन देना नही चाहते थे इसलिए वो वृषभ रूप में जानवरों के बीच चले गए…
      तब भीम दो पहाड़ों के बीच अपने पैर फैलाये खड़े हो गए और नकुल को सभी जानवरों को उनके पैरों के मध्य से निकलने को कहा, उन्हें मालूम था भगवान शिव कभी ऐसा नही करेंगे।
  जब शिव ने यह देखा तो वहीं भूमि पर अपना सिर गड़ा कर  धरती मे  समाहित होने लगे. भीम ने जब यह देखा तो दौड़ कर उन्हें पकड़ना चाहा पर तब तक व्रष रूपी शिव की केवल पीठ ही पृथ्वी के उपर बची थी. और वही व्रष के प्रष्ठ भाग को केदारनाथ के नाम से जाना जाता है और उसी रूप मे यहाँ भगवान शिव की पूजा की जाती है….”

   पीछे खड़े एक नवविवाहित जोड़े ने तुरंत अपना मोबाइल निकाला और गर्भ गृह के बाहर से ही विग्रह की तस्वीर लेनी शुरू कर दी..

” अरे आप मोबाइल अंदर लिए कैसे चले आये। बाहर जमा करना था। यहाँ गर्भगृह की फ़ोटो लेना मना है। “

” अरे भाई एक तस्वीर ले लेने से तेरा क्या बिगड़ जाएगा,ये सौ रुपये रख ले, दो चार तस्वीरें ले लेने दे। हमारी शादी को बस पंद्रह दिन हुए हैं , सोचा केदारनाथ दर्शनों के साथ ही अपना वैवाहिक जीवन शुरू करेंगे। “

देव ने पलट कर देखा वो सुंदर शर्मिला सा जोड़ा एक दूसरे का हाथ थामे खड़ा था,बीच बीच में लड़की अपने पंजो पर उचक कर गर्भगृह से अंदर झांकने की कोशिश कर रही थी।

“ओ भाई मेरे हम भी दर्शनों के लिए ही आये हैं। दस साल हो गए थे हमारी शादी को लेकिन संतान नही थी, अब जाकर हुई। इसके पैदा होने के पहले ही मन्नत की थी कि इसके जन्म के साल भर में दर्शनों को जाएंगे। “

  वरुण ने देखा बोलने वाले के पास ही उसकी पत्नी मुस्कुराती हाथ जोड़े खड़ी थी और उसकी गोद में दस ग्यारह महीने का बच्चा शांति से सो रहा था।

  उनके पीछे तीन चार महिलाएं खड़ी थीं …

” बहुत बहुत बधाई हो आपको ,बच्चे के लिए। हम चारों किस मन्नत से आयीं हैं यहाँ वो सुनेंगे तो और खुश हो जाएंगे आप लोग”

लंबी पंक्ति में अपनी पारी का इंतज़ार करते सब आपस में बातें कर रहे थे

” हाँ बताइये न दीदी। “उस आदमी की बात पर वो महिला मुस्कुरा उठी…

” दीदी नही तुम मुझे आंटी भी बुला सकते हो बेटा। तुम्हारी उम्र का बेटा है मेरा। हम चारों सखियां स्कूल के समय की दोस्त हैं। स्कूल के बाद किसी की शादी हो गयी तो कोई आगे पढ़ने चली गयी ऐसे हम चारों बिछड़ गयीं। फिर ये आजकल का डाकिया है ना इसने हमें मिला दिया । अरे वही तुम लोगों का फ्रेंडबुक!
मेरी पोती ने मेरा फ्रेंडबुक पर अकाउंट बनाने के बाद मेरी सहेलियों के नाम पूछ पूछ कर ढूंढना शुरू किया तो एक एक कर  सभी मिल गयीं।
  सभी अपने अपने जीवन में आगे बढ़ गईं थीं। अधिकतर के बच्चों की भी शादी हो चुकी है। किसी के नाती पोते हो चुके तो किसी के होने वाले हैं। ऐसे ही एक दिन बातों बातों में कहीं मिलने का सोचा। पर चारों अलग अलग शहर के थे तो कहाँ मिलते। तब मैंने ही कहा कि चलो एक साथ कहीं घूम कर आतें हैं। सब राजी हो गए। और सबसे सुखद आश्चर्य ये था कि हमारे पतियों ने भी पहली बार हमें घर से अकेले निकलने की सहमति दे दी।
   सब कलकत्ता के आसपास ही थे सो वहीं से एक साथ केदारनाथ निकल आये।”

” वही मैं नोटिस कर रहा था आंटी जी , आप चारों पल भर को चुप नही बैठती थी। लग रहा था जैसे जीवन भर की बातें किये जा रहीं हैं।

  देव की बात पर चारों हँसने लगी। उनके ठीक पीछे दो तीन जोड़े और भी खड़े थे…

” बस हमारा भी कुछ ऐसा ही किस्सा है । हम सब अपने रिटायरमेंट का इंतेज़ार कर रहे थे।हम तीनों दोस्त कम कुलीग साथ ही रिटायर हुए और पत्नीयों को साथ लिए चले आये दर्शनों को।
  घर की ज़िम्मेदारी बच्चों ने उठा ही ली है।”

  सभी को अपनी अपनी बात रखते देख ठाकुर माँ भी अपनी कथा कहने लगीं।

” मुझे तो ये मेरा पोता लेकर आया है दर्शनों के लिए। इस बुढ़ापे में वरना यहाँ तक आना बहुत मुश्किल था। लेकिन ये मेरा पोता हीरा है हीरा। इसके जैसा बेटा पुण्य से मिलता है। ये जिस घर में रहे वहाँ उजाला ही उजाला है…

  ” बस बस ठाकुर माँ। ” देव ने उनकी बात बीच में ही काट दी

”  एबे की होलो!”

” अरे बाकी लोग बोर हो जाएंगे आपके इस पोता पुराण से। “

  सभी हँसने लगे । पंक्ति धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी…

आखिर एक एक कर सभी को गर्भगृह से अंदर प्रवेश करने का मौका मिल ही गया…
      9 फीट लंबा और लगभग 3 फीट चौड़ा विग्रह दर्शन मात्र से ही चमत्कृत कर उठा।
    वरुण पहली बार ऐसे किसी मंदिर में मूर्ति पूजने बैठा था।
  
       शिवलिंग के बाईं ओर बैठा कर पूजा आरंभ की गयी, वहीं मंदिर की दीवार  पर दिव्य ज्योति जल रही थी. पूजा के मध्य उसके दर्शन के लिए कहा  तत्पश्चात  घी को शिवलिंग पर मल कर जल से स्नान करवाया गया और अंत मे पंडित जी ने सबसे कहा, अपना मस्तक शिवलिंग मे लगा लीजिये, आप सभी का कल्याण होगा….

   उसी वक्त बाहर इतने ज़ोर की बिजली कड़की की कुछ क्षणों को मंदिर का गर्भगृह भी बिजली की रोशनी से उजाले से भर गया।
  बाहर तेज़ बादलों की गड़गड़ाहट बढ़ती चली जा रही थी।

  रुक रुक कर तेज़ बिजली चमक रही थी।ऐसा लग रहा था बादलों और बिजलियों में होड़ सी मची थी कि कौन ज्यादा तेजी से लोगों को डरा सकता है।

वहाँ बैठे पंडितो में भी आपस में मौसम को लेकर चर्चा शुरू हो गयी थी।

  “ऐसा लग रहा है महादेव तांडव कर रहें हैं।”

   घी हाथों में लिए शिवलिंग पर चढ़ाते हुए वरुण को सिहरन सी हुई, ऐसा लगा जैसे साक्षात महादेव सामने खड़े हों।
   लेकिन जाने क्यों उसे महादेव कुपित से लगे। ऐसा लग भगवान किसी बात पर रूष्ट हैं। उसने डर कर आंखे खोल दीं।

” माथा टेक लीजिये शिवलिंग पर!”

  वरुण ने जल्दी से अपना माथा टेका और बाहर निकल गया।

  उसके साथ कृष्णमंदिर आश्रम के तीन लड़के और भी थे। बीच बीच में उन सब से भी बातें होती रहती थी।सभी मंदिर ट्रस्ट की किताबें हाथ में लिए अक्सर पढ़ते मिलते लेकिन इस पूरी यात्रा में वरुण ने अब तक एक भी किताब नही पढ़ी थी।

” भैया मंदिर के पीछे शंकराचार्य जी का समाधि स्थल भी है।देखने चलेंगे क्या? “

देव को ठाकुर माँ के साथ बातों में लगा देख वरुण उन लोगों के साथ आगे बढ़ गया…
  
   बारिश इतनी तेज हो चुकी थी कि अब सामने गली के दोनो पार की दुकाने भी नज़र नही आ रही थी। चटपट की तेज ध्वनि ऐसी थी कि साथ खड़ा आदमी क्या बोल रहा सुनाई नही पड़ रहा था।

    वरुण को कृष्णमंदिर ट्रस्ट द्वारा यहाँ तक भेजने का मुख्य
उद्देश्य ही यही था, शंकराचार्य समाधि के दर्शन
  
   शंकराचार्य जी की समाधि मंदिर के पीछे बाईं ओर स्थित थी, यह एक बड़ा सा हाल था, यहाँ शंकराचार्य जी की मूर्ति, उनकी माता की मूर्ति एवं अन्य मूर्तियाँ स्थापित थी।
    सनातन हिन्दू धर्म के संस्थापक श्री श्री आदिगुरु शंकराचार्य के दर्शन पाकर वरुण का मन कुछ पलों को शांत सा हो गया था।
  उसके मन में चलती उथलपुथल को जैसे एक राह मिल गयी थी।
    अब तक यही सोच सोच कर वो परेशान था कि उसे सन्यास लेना चाहिए या नही लेकिन अब यहाँ इस समाधि पर आकर उसे समझ आने लगा था कि उसके जीवन का ध्येय क्या होना चाहिए।
  उसके जीवन का अर्थ क्या है?

  उसने मान लिया था समझ लिया था कि उसका जीवन अब पूरी तरह उसे कृष्ण समर्पित करना था।
वहाँ प्रणाम कर बाहर निकल रहा था कि एक आदमी मंदिर के एक तरफ भीगता सा बैठा था। अपने आप में सिमटा गठरी सा बना वो मैले कुचैले कपड़ों में एक फटा सा झोला रखे बैठा था। उसे देख वरुण को दया आ गयी उसने झुक कर उससे पूछा…” यहाँ भीगते हुए क्यों बैठे हो भाई। ये लो कुछ रुपये रख लो कुछ खा लेना। “

  उसने डबडबायी आंखों से वरुण को देखा और रुपये उससे ले लिए।
   फिर जाने क्या सोच कर उसने वो रुपये वापस कर दिए…

” अब नही चाहिए भाई ये रुपया। मैं सारी उम्र इसी रुपये के पीछे भागता रहा। खूब कमाया और खूब उड़ाया भी। पैसा कमाने में इतना मगन था कि कब पत्नी एक गंभीर रोग से ग्रस्त हो गयी पता भी नही चला। उसे लेकर हर बड़े अस्पताल के चक्कर काटा लेकिन मेरा रुपया किसी काम नही आया।
   पानी की तरह पैसों को बहा कर भी उसे नही बचा पाया।
  उसके मरते ही बेटों ने जायदाद के लिए शोर मचाना शुरू कर दिया। और सगे भाइयों को रुपयों के पीछे लड़ते देख मन वितृष्णा से ऐसा भर गया कि सब कुछ उन चारों के नाम लिख कर घर छोड़ केदारनाथ के लिए निकल गया।
  मन में विश्वास था कि भले एक कौड़ी न हो मेरे पास लेकिन मैं धाम पहुंच कर रहूंगा। और देखो किसी न किसी सहायता से यहाँ तक पहुंच गया। अब यहाँ से मुझे बद्रीनाथ जाना था , उसी के लिए बैठा था कि तुमने रुपये दे दिए। जानता हूँ तुम जैसे और भी आएंगे और मुझे बद्रीनाथ के लिए रुपये दे जाएंगे लेकिन अब लग रहा इससे आगे नही जा पाऊंगा।
  यूँ लग रहा है वो आसमान से हाथ बढ़ा कर मुझे बुला रही है कि बस अब बहुत हुआ संसार का मोह अब आ जाओ।
  वो देखो उस ऊंची पहाड़ी पर शिव नृत्य कर रहे हैं। साक्षात नटराज खड़े हैं वहाँ।
    उनकी एक एक भाव भंगिमा उनकी पदचाप उनके ताल ही तो ये गर्जन पैदा कर रहें हैं।
   इसी गर्जन तर्जन में रम जाने का दिल करता है अब। इस प्रलय में बह जाने का दिल करता है अब।
  अब कहीं नही जाना है मुझे। अब सीधे शिव के धाम ही जाऊंगा ।
   हर हर महादेव!!

  वरुण उसे देखता आगे बढ़ गया..
  वरुण शंकराचार्य मंदिर के लिए धीमे से आगे बढ़ रहा था कि एक बालक भागता हुआ उसके पास चला आया। हाथ से एक ओर बैठे पंडित की ओर इशारा कर उसने वरुण को अपनी बात बता दी…

” भैया वहाँ वो जो पंडित जी बैठे हैं ना उनके पास अपना नाम पता नम्बर दर्ज करवा दीजिये।

” क्यों ?” वरुण के इस सवाल पर वो मुस्कुरा कर जवाब देता उस तेज़ बारिश में सिर्फ अपने दोनो हाथो से खुद को बचाता मंदिर के सामने की गली में उतर कर भाग गया…

” ये ज़रूरी होता है। इससे ये पता चलता है कि आज की तारीख में मंदिर दर्शन के लिए कितने दर्शनार्थी आये और कितने वापस लौट पाए ज़िंदा।”
  वहीं खड़े एक दूसरे पंडा ने जवाब दिया और वरुण उन बही खाता भरते पंडित की तरफ कदम बढ़ाता आगे बढ़ गया…
   अब तक देव भी उसके पास चला आया था..

” देव आज तारीख क्या है? पूरी बताना। “

” आज  16 जून 2013 की तारीख है मेरे भाई। लिखवा दो। अपने साथ ही मेरा नाम भी जुड़वा देना…


क्रमशः

  दिल से ….


    अब तक आपमें से बहुत से पाठक समझ ही चुके हैं कि कहानी किस मोड़ पर मुड़ने वाली है। कहानी के अगले कुछ भाग दिल को दहलाने वाले भी हो सकते हैं। केदारनाथ त्रासदी ने स्तब्ध कर दिया था सभी को। प्रकृति अपना रौद्र रूप ऐसे भी दिखा सकती है किसी ने सोचा नही था।

16 जून 2013 की रात केदारनाथ में भयंकर जल प्रलय आया था और  इस भयानक जल प्रलय ने केदार घाटी की शक्ल ही बदल कर रख दी थी। इस रौद्र प्रलय ने केदारनाथ को मौत की चादर से ढंक दिया और हजारों लाशें नदी में बह गई। इतना ही नहीं कई लोगों का पता भी नहीं चला। … पूरे उत्तराखंड की नदियां किनारे तोड़कर बहने लगी थीं।
   उस दौरान चौराबाड़ी का ग्लेशियर पिघल गया था, चमोली में बादल फटने के साथ ही होती धुंआधार बारिश ने 16 जून की रात भयानक तबाही मचाई थी। मंदाकिनी का जलस्तर इतना ऊंचा बहने लगा था कि पानी मंदिर में भी घुस आया था।
   पूर्वी प्रवाहिका में बहने वाली मंदाकिनी पश्चिमी में भी बहने लगी थी। अपने साथ गांव के गांव बहा ले जाने वाली मंदाकिनी भी केदारनाथ मंदिर का कुछ नही बिगाड़ पायी थी।

  हज़ारों लोग उस पानी में बह गए,लापता लोगों का आज भी कोई पता नही है। तबाही से त्रस्त उत्तराखंड का वो हिस्सा आज भी अपने में भयानक दर्द समेटे है। लेकिन वहाँ फैली तबाही से मंदिर पर लेश मात्र भी असर नही हुआ।

इस आपदा में फंसे लोगों को बचाने के लिए भारतीय सेना को केदारनाथ घाटी के लिए तुरंत भेजा गया था। हमारी सेना के जवानों ने लाखों लोगों को रेस्क्यू किया । लगभग 110000 लोगों को सेना ने जीवित बचा लिया।
    इस दौरान मार्ग में आने वाले काफी सारे घर, होटल और रेस्‍तरा पानी में बह गए।
      लेकिन आठवीं सदी में बने केदारनाथ मंदिर को ज्‍यादा नुकसान नहीं पहुंचा। कई शोध संस्थानों ने ये समझने की कोशिश की कि आखिर इतनी विकराल आपदा में मंदिर कैसे सुरक्षित रहा? इसके पीछे कई कारण दिए गए, जिसमें मंदिर की भौगोलिक स्थिति को सबसे महत्‍वपूर्ण बताया गया।

   लेकिन क्या ये चमत्कार नही था? या थी  उस भोले भंडारी की महिमा जिसके आगे सब नतमस्तक हैं।

*****

  मुझे पढ़ने सराहने के लिए आप सभी का हार्दिक आभार शुक्रिया नवाज़िश!!!

  aparna….

समिधा -21

 वहीं मेरी मुक्ति है!!!
      वही मेरा मोक्ष है!!!
       वही मेरा निर्वाण……

    उन पंडित की बातों को सुनते शर्मा जी ने उन्हें प्रणाम किया और गाड़ी को आगे बढ़ाने का इशारा कर दिया…..

    कहीं उबड़ खाबड़ रास्ते तो कहीं लंबी चिकनी सड़क, कहीं ताल तलैय्या तो कहीं ऊसर पार करती बस आगे बढ़ती चली गयी।
  पहले दिन कहीं और सीट न मिलने से इत्तेफाक से साथ बैठे देव और वरुण में अब गाढ़ी दोस्ती हो गयी थी।

   दिन रात के इस साथ ने दोनो को ही मैत्री की एक भीनी सी डोर में बांन्ध दिया था। देव के हर वक्त खुश रहने की छूत वरुण को भी लगने लगी थी।
   कभी जब देव खाना बनाने वाले महाराज को एक ओर कर सबके लिए नाश्ता बनाने लगता तब अपनी डायरी एक ओर रख वरुण भी उसका हाथ बंटाने चला आता।
   हंसते बोलते सफर कटता जा रहा था। देव जहान भर की बातें वरुण को बता चुका था। और देव से बातें करते अब वरुण को ऐसा लगने लगा था कि वो देव के घर में हर किसी को भली प्रकार जानने लगा है चाहे वो बाबा हो माँ हो काकी हों लाली हो या हो पारोमिता!

  पारो की शैतानियां उसके पढ़ने की ललक उसकी लजीली मुस्कान सब कुछ बताते हुए देव जैसे खुद पारो हो जाता था….

” इतना प्यार करते हो तो उसे घर पर छोड़ कर कैसे निकल आये ? “

” मेरा घर और घरवाले अभी भी ज़रा पुराने विचारों वाले हैं ना। इसलिए ठाकुर माँ को तीर्थ के लिए लाते समय पारो को भी साथ ले लूँ ये पूछने की हिम्मत ही नही हुई!”

” हम्म ! यहाँ तुम्हारे लिए जितना मुश्किल है उसके लिए भी उतना ही मुश्किल हो रहा होगा, तुम्हारे बिन रहना। “

” उसका तो नही पता लेकिन अब मेरी बेसब्री बहुत बढ़ती जा रही है। “

” अभी से बेसब्री, अभी तो धाम पहुंचें भी नही। वहाँ पहुंचना है फिर वहां से लौटना है तब जाकर तुम्हारा दस दिन का ब्रम्हचर्य व्रत टूटेगा बेटा। तब तक तो सब्र करना ही पड़ेगा। “

” सही कह रहे हो दोस्त। जब साल भर निकाल लिया तो दस दिन क्या हैं? निकल ही जायेंगे… पर आज तक उसके सामने जितना ही संयमी बना हुआ था उससे दूर जाते ही जाने क्यों इतनी याद आ रही उसकी। ऐसा लग रहा नही मिली तो पागल हो जाऊंगा। “

” कितनी अच्छी बात है देव। प्यार ऐसा ही तो होना चाहिए, शायद मेरे और कादम्बरी के बीच इसी आकर्षण की कमी थी। पता नही मुझे कभी उसे छूने का मन ही नही किया”

” करेगा वरुण जिस दिन किसी से टूट कर प्यार हुआ न तो छूना बस क्या सब कुछ करने का मन करने लगेगा। और ये कोई पाप नही है। भैया आत्मा की गहराई से किसी को प्यार करने के लिए उसके शरीर का रास्ता चुनना ही पड़ता है। आखिर इसी देह की आड़ी टेढ़ी गलियों से गुज़र कर ही तो इंसान उस चरम को पाता है जिससे उसकी आत्मा तृप्त होती है और यही तृप्ति आत्मा से आत्मा के लगाव को जोड़ती है तभी तो हमारे समाज में ” विवाह आश्रम की व्यवस्था की गई है आखिर। “

  ” पता नही अब किसी से प्यार होगा भी या नही। मेरा तो रास्ता ही बदल गया है देव। अब जिस रास्ते पर आगे बढ़ना है वहाँ प्यार मुहब्बत जैसी बातें बचकानी और बेवकूफानी लगने लगीं हैं।”

” यू नेवर नो की तुम्हारे भविष्य में क्या लिख रखा है मुरली वाले ने। हो सकता है यहाँ से वापसी में ऐसा कुछ चमत्कार हो जाये कि कादम्बरी से ही तुम्हें प्यार हो जाये। और इस बार वो नही तुम आगे बढ़ कर उसका हाथ थाम लो!” 

  देव की बात सुन वरुण सोच में पड़ गया..

” मेरा भविष्य कुछ है भी या नही मालूम नही। मुझे तो अपने अगले दिन का भी भरोसा नही। कभी लगता है रात में सोऊंगा तो सुबह पता नही आंखें खुलेंगी भी या नही।

” एक तरफ तो कृष्ण साधना में निकले हो दूसरी तरफ ये भरोसा भी नही की भगवान अपनी साधना तुमसे करवाएंगे भी या नही। अगर भक्ति मार्ग पर हो तो सब कुछ भूल कर उस लीलाधर पर विश्वास धरो और डूब जाओ उसमें।”

” तुम इतने सुलझे हुए कैसे हो देव! जबकि उम्र अनुभव सभी में मुझसे छोटे हो फिर भी लगता है जैसे मेरी हर समस्या का समाधान तुम्हारे पास ही है। अब तो लगता है तुम पहले क्यों नही मिले, शायद मेरा मार्ग भी इतना कठिन नही होता, जितना मैंने बना लिया…”

” ये जीवन एक लंबा सफर ही तो है, मुसाफिर मिलते हैं दो कदम साथ चल लेते है और फिर अलग हो जातें हैं। ना सफर का भरोसा है और न सहयात्रियों का। बस हमें इस ज़िन्दगी के सफर को भी ऐसे ही मनोरंजक बनाना है जैसे केदारनाथ की यात्रा को बनाते जा रहें हैं।”

” ये देखो मेरे हर सवाल का कोई न कोई दार्शनिक जवाब होता है तुम्हारे पास। ” मुस्कुराते हुए वरुण आगे कुछ बोलने ही जा रहा था कि उसका फोन बजने लगा…
   फ़ोन उसकी मासी का था..

” बंटी कहाँ निकल गया है तू? घर पर कबसे बात नही की है तूने ?

” मासी क्या हुआ? अभी दो दिन पहले ही माँ से बात हुई थी। हुआ क्या है बताओ न? घर पर सब ठीक हैं ना? “

” कुछ ठीक नही है। तू क्या कर के गया है यहाँ से? तूने सोचा भी है उसके बाद क्या होगा?

” मासी साफ साफ बता दो प्लीज़ की हुआ क्या है? ऐसी पहेलियां बुझाओगी तो मेरा दिल धड़कना बंद कर देगा। “

” तेरे ससुराल वाले आये थे। पार्टी कार्यालय के चमचों ने आकर जो तोड़ फोड़ मचाई है घर पर की तेरे पापा तो अपने सीने पे हाथ धरे एक ओर चुपचाप बैठे रह गए। तेरी माँ ही उन लोगों के हाथ से छीन छीन कर सामान पहले रखती रही बाद में थक कर एक ओर बैठ गयी। और करती भी क्या?

” कादम्बरी को पता है ये सब ? “

” जी हाँ राजकुमारी जी भी आयीं थीं अपने पिता जी के साथ। शुरू में उसके बाप ने ही तेरे पापा से लड़ना झगड़ना शुरू किया। जब तेरे पापा ने तेरा पक्ष लेना शुरू किया तो दोनो बाप बेटी गुस्से में पैर पटकते बाहर निकल गए और उनके पीछे से सिर्फ पांच मिनट में उसके गुर्गों ने जो तबाही मचाई है कि क्या कहें।
   उस पर कादम्बरी वापस आ कर तेरी माँ से ये भी कह गयी कि अगर अपने बेटे की करतूत पर आप दोनो माफी मांग लेते तो फिर भी मेरे पापा शायद आप लोगों को माफ भी कर देते पर आप लोगों के अकड़ू स्वभाव ने पापा को गुस्सा दिला दिया। अब तो अगर वरुण नाक भी रगड़े मैं कभी उससे शादी के लिए वापस तैयार नही होने वाली हूँ।

  और इतना कह कर पैर पटकती बाहर चली गयी। तुझे भी अभी केदारनाथ जाने की क्या सूझी बेटा।

” मैं वापस आ रहा हूँ मासी। मैं दिल्ली से फ्लाइट ले लेता हूँ।”

” नही नही। अब तू अभी वापस मत आना बेटा। तेरे पापा मम्मी ने तुझे कुछ भी बताने मना किया था पर मेरा मन नही माना इसलिए गुस्से में बता दिया मैंने। अब तू वापस आ गया तो जिज्जी मुझ पर नाराज़ हो जाएंगी।
  वैसे भी वो लोग कुछ दिनों के लिए गांव चले गए हैं। मैं बस तुझे जानकारी देना चाहती थी कि अब अगर तू ये सोच भी रहा होगा कि वापस आ कर शादी के लिए हाँ बोल दूंगा तो सुन ले उस चुड़ैल से अब मैं तेरी शादी नही होने दूँगी । समझा!”

  इतने मुश्किल पलों में भी वरुण के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गईं।

“चिंता मत करो मासी ! आप बस माँ पापा का ध्यान रखना, मैं जल्दी ही लौट आऊंगा। “

” अपना ध्यान रखना बंटी।मौसम खराब हो रहा है । “

“” हाँ मासी। आप घबराओ मत।

   वरुण बातें कर वापस आया तब तक में देव दूर एक पेड़ की छांव में बैठा किसी से बहुत मुस्कुरा कर बात कर रहा था, उसे देखते ही वरुण को समझ आ गया कि वो किससे बातें कर रहा है। वो फ़ोन निकाल कर माँ के नम्बर पर फोन मिलाने लगा…

  माँ पापा से बात कर अब उसकी चिंता काफी हद तक कम हो गयी थी। वो दोनो गांव में थे चाचा जी लोगों के साथ अपने लोगों के बीच अपने परिवेश में उनका दुख काफी कुछ कम हो गया था।

  फ़ोन रख वो खाना बनाने वाले महाराज की तरफ बढ़ गया, देव अब भी बातों में लगा था।

  खाना खा कर सभी बस में सवार हो गए। अगला पड़ाव उनका दिल्ली था, जहाँ से वो लोग आगे भी इसी बस में बढ़ने वाले थे।

  अगली सुबह उनका नाश्ता दिल्ली में हुआ । वहाँ से हरिद्वार के लिए बस आगे बढ़ गयी….

” कुछ लिखते हो डायरी में ? केदारनाथ यात्रा संस्मरण ? क्यों हैं ना? “

देव की बात पर वरुण मुस्कुरा कर राह गया…

” हाँ ! सिर्फ यात्रा संस्मरण नही और भी बहुत कुछ। हमेशा से डायरी लिखता आया हूँ। बचपन में थोड़ा कम बोला करता था न तब माँ ने डायरी लाकर दी और कहा जो बातें कहीं बोल नही पाते वो इस डायरी में लिख लिया करो।
  बस तभी से लिख रहा हूँ……

“अब तक कितनी डायरी भर चुके हो ? “

” शायद चार या पांच! हमेशा लिखने का वक्त नही मिलता लेकिन जब कुछ खास हो तब लिख लेता हूँ

  हरिद्वार पहुंचते में दोपहर हो चुकी थी , खाना पीना निपटा कर कुछ लोग हरिद्वार ही रुकना चाह रहे थे, इसलिए बस वाले ने वहीं बस रोक दी।
    शाम गहराने से पहले ही अधिकतर यात्री गंगा आरती के लिए हर की पौड़ी पहुंच गए थे। ठाकुर माँ को एक तरफ बाकी बुजुर्गों के साथ घाट पर बैठा कर देव ने गंगा मैया में डुबकी लगा दी।

   सामने घाट पर बैठे वरुण को भी वो बुलाता रहा लेकिन वरुण अपनी डायरी में ही खोया रहा…

    ” गंगा आरती – ये हमारे यहाँ ही हो सकता है। हम अपनी नदियों को भी ऐसे पूजतें हैं जैसे सामने जीवित खड़ी हो। शाम होते ही लोगों की भीड़ पूरा रेला ही गंगा आरती के लिए धँसा चला आ रहा है। गंगा आरती के लिए हजारों लोग हर की पौड़ी के दोनों तरफ इकट्ठे होने लगे हैं…. हर हर गंगे , जय माँ गंगे के स्वर गूँजने लगें हैं , अंधेरा होने लगा है।
   अद्भुत है यह दृश्य। जब एक लय में पंडितों के हाथ उठते गिरतें हैं।
  होने वाली आरती की तस्वीर जब गंगा की लहरों में उतरती है तो उन लहरों का कंपन शरीर में भी एक सिहरन पैदा कर देता है। हमारी भाषा में लिखूं तो गूज़ बम्प्स! “

   ” उठो यार, बस यहाँ किनारे बैठे लिखते रहे तो गंगा जी की आरती का पूरा आनन्द नही ले पाओगे। आओ चलो मेरे साथ। “

  देव वरुण को साथ लिए थोड़ा आगे बढ़ गया। श्रद्धा से लोगों के हाथ जुड़े थे , हर हर गंगे का जाप चल ही रह था और आंखों के सामने चल रही थी अद्भुत और अविस्मरणीय गंगा आरती !!

  आरती समाप्त होते ही प्रसाद बटने लगा था, देव और वरुण भी प्रसाद लिए आगे बाकी लोगों के पास पहुंच गए।

” यहाँ से हम आप सबको चोटी वाला के वहाँ ले चलेंगे। “

  शर्मा जी की बात पर एक सहयात्रीणि चहक उठी..

” ये कौन सा मंदिर है शर्मा जी। “

” आप चलिए न खुद ही जान जाएंगी। “

  पंडित जी दिन ढलने के बाद नही खाते थे , इसलिए वो नही गए। उन्हें छोड़ कर सभी आगे निकलने लगे तो उन्होंने इशारे से देव और वरुण को बुला लिया। वरुण जाने क्यों ऐसे पंडित पुजारियों से चिढ़ा रहता था।

  ” तुम तो बहुत अच्छे तैराक हो !” देव की ओर देख पंडित जी ने कहा..

  ” बंगाल के गांव मे रहते हुए तैरना कैसे नही आएगा पंडित जी। ” देव उन्हें प्रणाम करता अपनी बात बोल गया..

” अच्छा है। शुभमस्तु !”  उन्होंने वरुण की ओर देखा, अपनी आंखें बंद की और होंठों में ही कुछ बुदबुदाते हुए उन्होंने आंखें खोल दी…

” इतना अविश्वास क्यों है तेरे मन में! हर बात को लेकर , हर घटना को लेकर।
  एक बात समझ ले ये जो भी हो रहा है उसी की मर्ज़ी है। ये मौसमों का बदलना, ये आंधी तूफान ये सब उसी का खेल है। प्रकृति का नियम है पुराना नष्ट होगा तभी तो नूतन जीवन जन्म लेगा।
   लेकिन कभी कभी प्रकृति भी ऐसे खेल रच जाती है, जो तेरे मेरे जैसे साधारण इंसानों की समझ से बाहर होता है। लेकिन ऐसे खेल जो प्रकृति स्वयं के आनन्द के लिए रचती है उनका भी कोई न कोई औचित्य अवश्य है……

” पंडित जी मुझे आपकी कोई बात समझ में नही आ रही है।”

” मैं जानता हूं तुझे अभी मेरी कोई बात समझ नही आएगी लेकिन मैं बस यही कहूंगा कि मेरी बात समझने की जगह मेरी बात सुनो और मान जाओ। तुम दोनों इसके आगे की यात्रा स्थगित कर दो। “

” ये क्या कह रहे हैं आप पंडित जी!”

  अबकी बार देव चौन्क कर आगे कूद पड़ा…

” मैं क्या कह रहा हूँ क्यों कह रहा हूँ इस सब चिंतन में पड़ने की जगह मेरी बात मान लोगे तो अच्छा होगा। “

” आपकी बात काटने का तो बिल्कुल मन नही है पंडित जी लेकिन मैं मेरी दादी को दर्शन के लिए ही तो लेकर आया हूँ। अब इतनी दूर आकर उन्हें कैसे कह दूं कि हम आगे नही जाएंगे। “

” मैंने कब बोला कि उन्हें मत जाने दो। वो हमारे साथ भी आगे बढ़ सकतीं हैं। मैंने बस तुम दोनो को मना किया है।”

” नही पंडित जी अपनी दादी को ऐसे अकेले नही छोड़ सकता मैं। उन्हीं की देखभाल के लिए तो आया हूँ। उन्हें कैसे छोड़ दूं?  मुझे तो आगे जाना ही है।वरुण चाहे तो यहाँ रुक सकता है या वापस लौट सकता है।

” नही मैं कहीं वापस नही जा रहा। मैं अब मंदिर दर्शन करने के बाद ही वापस लौटूंगा। “

   गंगा जी की लहरों पर ही नज़र जमाये वरुण ने भी अपनी बात रख दी….

   बारिश की एक मोटी सी बूंद उसके गाल पर पड़ी और उसने ऊपर आसमान की ओर अपनी नज़रे उठा दी। बड़ी बड़ी चार पांच बूंदे उसके चेहरे को भिगोती जाने लगी..

” महादेव रक्षा करें सब की। हर हर महादेव! हर हर गंगे जय माँ गंगे। “
   पंडित जी अपना जाप करते आगे बढ़ गए।

   देव वरुण का हाथ पकड़े वहीं घाट पर बैठने लगा तो वरुण मुड़ कर जाने को हुआ…

” पागल है क्या? भीग जाएंगे यहाँ बैठे तो… बारिश शुरू होने वाली है।”

” अरे बैठो तो सहीं दोस्त! बारिश में भीग कर घुल नही जाएंगे । मानता हूँ मिट्टी से बने हैं हम इंसान पर बिल्कुल ही चाक पेंसिल थोड़े ही हैं कि थोड़े से पानी से घुल जाएं। “

देव ने अब तक पास की टपरी से दो चाय मंगवा ली थी। शर्मा जी बाकियो को लेकर चोटी वाला जा चुके थे।
   देव ने वरुण को भी अपने साथ घाट पर बैठाया और दोनों चाय पीते गंगा जी की उठती गिरती लहरों को देखते रहे….

   वरुण को एकाएक दिखा जैसे गंगा की उत्ताल लहरें उठ उठ कर गिरने की जगह ऊंची उठती ही जा रही हैं। और लगातार ऊंची उठती लहरें तेज़ी से ऊपर से नीचे गिरीं और वरुण चौन्क कर अपने हाथों से चेहरे को बचाते हुए ज़रा पीछे खिसक गया। घबराहट में आंखें बंद हो गयी। धीरे से उसने आंखें खोली  पर सामने गंगा अपने उसी पुराने रूप में कलकल करती बहती चली जा रही थी। लेकिन अभी कुछ सेकेंड पहले ही उसने इसी गंगा का विकराल रौद्र रूप देख लिया था जैसे, और उसी से खुद को बचाने अपने चेहरे को ढंकता वो पीछे सरक गया था लेकिन आश्चर्य की बात थी कि न उसके चेहरे और न उसके हाथों पर पानी की एक बूंद भी थी।
   तो वो गंगा की उद्दात्त लहरों का प्रकोप क्या था जो उसे अचानक एक पल को दिखा और चला गया।

” क्या सोचने लगे दोस्त? “

  वरुण ने देव की तरफ देखा और सवाल के बदले उसी से सवाल कर लिया…

” इन गंगा की लहरों में तुम्हें क्या दिख रहा है देव ? “

  इस सवाल पर देव की आंखें चमक उठीं

” मुझे गंगा की इन पावन उठती गिरती लहरों में मेरी पारो की हंसी दिखाई देती है, कलकल की ये आवाज़ जैसे उसके पायलों की छमछम हो और अनवरत बहती ये धार जैसे वो खुद है, भागती सी चली आ रही हो मुझसे मिलने। मुझमें समाने!

” बस बस मेरे देवदास ! इतिहास में पहली बार हुआ होगा जब कोई लड़का अपनी ही पत्नी का प्रेमी बन गया है। तुम्हारी दीवानगी हद पार करती जा रही है , ऐसा नही लग रहा तुम्हें।”

” हाँ शादी के बाद पहली बार उसे छोड़ कर अकेला निकला हूँ ना। शायद इसीलिए। अच्छा तुम बताओ तुम्हें गंगा में क्या नज़र आ रहा है। “

” मुझे तो जाने क्यों दोस्त लेकिन गंगा की इन लहरों में प्रलय नज़र आ रहा है।
   भयानक प्रलय……

क्रमशः

aparna……

   दिल से ……

     अभी पिछले कुछ समय से ऐसा लग रहा है जैसे कोई त्योहार मनाया जा रहा है। लोग खुश हैं,बेहद खुश हैं। और अपनी खुशी मनाने वो रोड पर उतर आए हैं।
   मॉल क्या खुले ,सभी को याद आ गया कि सामान मॉल से बाहर तो कहीं मिलता ही नही। रेस्टोरेंट्स में भी बहारें सजने लगीं हैं।
   गृह प्रवेश बर्थडे पार्टी, शादियां सभी कुछ मनने लगा है और तो और लोग मनाली कुल्लू मसूरी की यात्राओं पर भी निकलने लगे हैं जैसे जाने कब से कैद थे और अब जाकर आज़ादी मिली है।

   कैसे हम इतने बेपरवाह हो जातें हैं,अभी ज्यादा वक्त नही बीता उस बात को जब हर तरफ से कोविड से जुड़ी बुरी खबरें ही आ रहीं थीं। जाने कितने लोगों ने अपने अपनों को खोया है।
   वो भी एक दौर चल रहा था जब सुबह उठ कर व्हाट्सप्प खोलने का मन नही होता था कि जाने क्या खबर सुनने मिल जाये।
   ॐ शान्ति से डर लगने लगा था। अजीब अवसाद सी स्थिति पैदा हो गयी थी।
   बस ईश्वर से यही प्रार्थना है अब ऐसी कोई स्थिति न आये।
   हम सब एक साथ मिलकर ये  प्रयास कर सकतें हैं कि तीसरी लहर को आने का मौका ही न मिले।
   अगर 60 % लोग भी वैक्सिनेट हो जातें हैं तो कोरोना को हमारा देश छोड़ कर भागना ही पड़ेगा।

बाकी सारे सुरक्षा साधन आपको मालूम ही हैं। बार बार बताऊंगी तो आप भी बोर हो जाएंगे।

तो बस ध्यान रखना है थोड़ा सा अपना और थोड़ा सा अपने अपनों का!!!

    कोशिश में हूँ आज ही मायानगरी का अगला भाग पोस्ट कर पाऊं।
जीवनसाथी भी जल्दी यानी कल या परसों तक आ जायेगी।

  आप सभी का हार्दिक आभार कि आप अपना कीमती वक्त निकाल कर मुझे पढ़तें हैं ,सराहतें हैं और स्टिकर्स की बरसात करते हैं।
    दिल से thank u

समिधा – 20




  समिधा -20


             
         मैं देवज्योति टैगोर हूँ। अपनी दादी को दर्शन करवाने ले जा रहा हूँ। वो बुज़ुर्ग हैं ना इसलिए वहां सामने उनकी सुविधा वाली सीट पर उन्हें बैठाया है।”

वरुण ने मुस्कुरा कर अपना हाथ आगे बढ़ा दिया…

” मैं वरुण सत्य की तलाश में केदारनाथ जा रहा हूँ। “

  दोनो ने आपस में हाथ मिलाया और एक बिजली सी चमकी ….
     और बस आगे बढ़ गयी…..

     उस तेज़ बिजली की रोशनी में एक पल को वरुण को लगा वो देवज्योति के चेहरे पर खुद को देख पा रहा है।
    उसे समझ नही आया कि ये क्या हुआ था। देव के माथे को देखता वरुण कुछ देर को खो सा गया। उसका और देव का चेहरा तो अलग था लेकिन कोई एक चीज़ थी जो दोनो को एक कर रही थी….
   उन दोनों का चेहरे का ऊपरी भाग, यानी माथा।

” क्या हुआ वरुण जी ? आप कुछ घबराए से लग रहे। बारिश बिजली से डर लगता है क्या?”

  वरुण ने चौन्क कर ना में सर हिलाया और बस से बाहर देखने लगा। उमस भरी गर्मी बीत चुकी थी, जेठ का महीना समाप्ति पर था और आषाढ़ लग चुका था। हालांकि जून में ऐसी बारिश होती तो नही पर न जाने क्यों कल रात से ही बारिश लगातार हो रही थी ….
…..
    वरुण को जाने क्यों ऐसा लगने लगा कि ये बारिश उससे कुछ कह रही है।

           इधर सुबह सवेरे बम भोले का जयकारा लगा कर बस अपने गंतव्य की ओर चल पड़ी थी।
    बस में जगह जगह से आये लोग थे। सभी का आपस में परिचय हो रहा था। शर्मा जी ने सबसे पहले सामने खड़े होकर अपना परिचय दिया और फिर एक एक कर हर एक कि सीट पर आगे बढ़ते चले गए…

    शर्मा जी का हंसी मजाक शुरू था, लोग अभिभूत हो रहे थे….
   देव पूरी तन्मयता से शर्मा जी बात सुनता उनकी हर बात का समर्थन कर रहा था , और वरुण खिड़की से बाहर  अपने शहर को छूटते देख रहा था।
   कल तक जो बहुत मजबूती से अपने निर्णय पर अटल था , आज अपने घर को अपने शहर को छोड़ता हुआ पसीजता जा रहा था। उसे एकाएक लगा कि वो रो पड़ेगा पर उसने खुद को संभाल लिया….
सीट पर पीछे सर टिका कर उसने आंखे मूंद ली…

  ” शर्मा जी कोई भजन वजन सुनाइये ”

  देव की फरमाइश पर शर्मा जी बड़े नाज़ नखरे दिखाते भजन सुनाने को तैयार हो गए….

       ” ठीक है देव बेटा तुम्हारे कहने पर हम हरि ओम शरण जी का सुप्रसिद्ध भजन सुनाते हैं तुम्हें …

        
   ये गर्व भर मस्तक मेरा, प्रभु चरण धूल तक झुकने दे.
          मैं ज्ञान की बातों में खोया,
          और कर्म हीन पड़कर सोया,
          जब आँख खुली तो मन रोया,
            जग सोये मुझको जगने दे,
             ये गर्व भरा मस्तक मेरा,
           प्रभु चरण धूल तक झुकने दे।
             ये गर्व भरा मस्तक मेर……


   शर्मा जी की मीठी आवाज़ का असर था या भजन के शब्दों का बस में बैठे सभी यात्री झूमने लगे, लेकिन वरुण की आंखों से दो बूंद ऑंसू ढुलक पड़े..

  देव से छिप कर उसने आंखें पोंछ ली।

  गाते बजाते बस काफी दूर निकल आयी थी, सुबह के दस बज रहे थे, सभी को भूख भी लग आयी थी। आज पहला ही दिन होने से नाश्ता बना पाने में असुविधा थी इसलिए हाइवे पर एक अच्छा सा ढाबा देख बस रोक दी गयी….

   सभी बस से उतर कर अपने हाथ पांव सीधे करने लगे।
  देव ने दादी को एक आरामदायक जगह में बैठाया और उनके लिए नाश्ता और चाय ले आया…
  दादी के साथ ही बैठे उसने भी एक आलू का पराठा खाने के बाद अपनी चाय की गिलास उठायी, ढाबे से एक और चाय लेकर वो वरुण की टेबल पर जा बैठा…

” अपने कुछ खाया ही नही दोस्त? बुरा मत मानियेगा आपको दोस्त मान सकता हूँ।”

  हां में सर हिला कर वरुण ने देव की लायी हुई चाय थाम ली….

” मन नही कर रहा था। “

” बात तो सही हैं बिना मन के कोई काम नही करना चाहिए। बहुतों को जीवन में ये मौका भी मिलता है बिना मन के कोई काम नही करने का।
     लेकिन हमारे जैसे मध्यमवर्गीय लड़कों को तो हमारा मन किसमें है ये भी जानने का अवसर नही मिलता।
   बचपन में पढना नही चाहता था, तब बाबा पढ़ाई के पीछे पड़े रहे। बड़ा हुआ तब पढना चाहता था तब बाबा ने कहा “तू पढ़ेगा तो दुकान कौन देखेगा? ” तो बस पढ़ाई छोड़ दी।

वरुण ने मुस्कुरा कर देव की ओर देखा और वेटर को इशारे से बुला कर अपने लिए भी नाश्ता मंगवा लिया…

” वैसे किस चीज़ की दुकान है तुम्हारी। व्यापारी तो बातों के लगते हो?”

  वरुण की बात पर देव ने एक ज़ोर का कहकहा लगा दिया…..

” आप जो समझ लें । वैसे छोटी सी जगह में रहता हूँ। बाबा ने अपने ज़माने में राशन की दुकान डाली थी, अब वो तीन मंजिला सुपर मार्केट है। “

” वाह ! बहुत खूब!मतलब पढना चाहते थे पर मजबूरी में दुकान करना पड़ा और उसे परचून की दुकान से सीधा सुपर मार्केट बना डाला।

  हां में सर हिलाता देव मुस्कुराता रहा..

” मैं कभी किसी बात का रोना लेकर नही बैठ सकता।मेरा स्वभाव ही नही है वो। मुझे अगर कुछ चाहिए और वो नही मिला तो मैं मान लेता हूँ कि वो मेरे नसीब का था ही नही और जो मुझे मिलता है उसे फिर मैं अपने माफिक बना लेता हूँ।
   सच कहूँ तो मैनेजमेंट की डिग्री लेना चाहता था। ग्रेड्यूएशन के बाद यही करने का सोचा था पर बाबा ने मना कर दिया और दुकान थमा दी।
  मुझे लगा कि ये लो मुझे तो डायरेक्ट मौका ही मिल गया अपने मैनेजमेंट स्किल्स को प्रैक्टिकली प्रूव करने का।
   और मैं जी जान से अपनी उस छोटी सी दुकान को सजाने में लग गया। तीन साल खूब मेहनत की। रात दिन एक कर दिया… अपनी दुकान की सेल्स कैसे बढ़ा सकता हूँ ? क्या नया दुकान में रख सकता हूँ सारी रिसर्च की। कोलकाता की बड़ी बड़ी सुपर मार्केट्स के चक्कर लगाए और धीरे धीरे कर अपनी दुकान को फैलाता गया।
   अब हमारे कस्बे में कोई घर ऐसा नही जिनकी रोज़ की ज़रूरत का कोई सामान मेरी दुकान पर न मिलता हो।
  शुरू में मेरा ये जुनून बाबा को पागलपन लगता था लेकिन फिर जब उन्होंने एक शाम दुकान की बैलेंस शीट देखी तब उन्हें लगा कि उनका सनकी बेटा भी कुछ कर सकता है।
    बाबा की आंखों में खुशी के ऑंसू चमक उठे। मेरी ओर उनके हाथ आगे तो बढ़े लेकिन एक पिता का संकोच उन्हें अपने बेटे के गले लगने से रोक गया।
  आप तो समझ सकतें हैं हमारे बाबा और माँ जिस जनरेशन से हैं वहाँ वो बच्चों के दोस्त नही बन सकते। वो हमेशा खुद को हमारे सामने कठोर दिखातें हैं जिससे हम उन्हें पर्याप्त आदर सम्मान दे सकें।
   मैं समझ गया बाबा चाह कर भी मुझे गले से नही लगा पाएंगे। मैंने उनके पैर छुए और उन्हें  सुपर मार्केट के बाकी फ्लोर घुमाने ले गया। उस दिन पहली बार मैंने उनकी आंखों में चमक देखी थी।

” तुम तो यार कमाल के लड़के हो। पहली नज़र में देख कर मुझे लगा था एक सामान्य से कॉलेज गोइंग लड़के होंगे तुम पर तुम तो बिज़नेस टाइकून निकले।”

” नही ऐसी कोई बात नही। मैं बहुत सामान्य सा लड़का ही हूँ छोटी छोटी बात पर खुश होने वाला..!”

” जैसे ! अभी यहाँ किस बात पर खुश हो? “

” अरे यहाँ तो ढेर सी बातें हैं। कलकत्ता की सड़ी गर्मी के बाद कल रात बारिश की फुहारें कैसी ठंडक दें गयीं मैं उसी में खुश हो गया। अभी ठाकुर माँ मेरा मतलब मेरी दादी को प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठाने जा रहा था कि हॉटल के एक कर्मचारी ने दौड़ कर छोटी सी गद्दी ला दी। दादी को उसमें बैठा कर मैं खुश हो गया।
   मैं बाहर चाय नही पीता क्योंकि अच्छी चाय नही मिलती पर यहाँ देखिए कैसी लाजवाब चाय था,बस मैं…

” …. खुश हो गए।” देव की बात आधे में ही काट कर वरुण बोल गया…

” बहुत अच्छा लगा तुमसे मिल कर बड़े खुशमिज़ाज़ हो ..!”

” हम्म लेकिन आप क्यों ऐसे असहज से लग रहे हैं जैसे अंदर ही अंदर कोई बात चल रही हो। जैसे कोई दुख साल रहा हो आपको?  अगर बताना चाहें तभी बताइयेगा!”

  वरुण देव के सवाल पर कुछ देर सोचता बैठा रहा और फिर अपनी धुन में कहता चला गया…

” मैं तुमसे काफी अलग हूँ देव। मुझे मेरे जीवन में जो सब मिल सकता था मिला पर भी मैं शायद संतुष्ट नही हो पाया।
   अच्छा घर , प्यारे माता पिता, शानादार नौकरी, विदेश में पोस्टिंग सुंदर लड़की से सगाई सब कुछ वही मिला मुझे जिसकी मेरे जैसे लड़के को आस रहती है……..
    …. लेकिन फिर अभी कुछ समय पहले ही मुझे मालूम हुआ कि मुझे हार्ट की बीमारी है, ऐसी बीमारी जिसमें मैं कभी भी अचानक मर सकता हूँ।
   इस बीमारी के बारे में पता चलते ही मेरे अंदर का डरपोक वरुण मेरे सामने खड़ा हो गया। मैं भगवान में अपना मन लगाकर डर दूर करने की कोशिश करने लगा। और इसी कोशिश में जाने कब मैं उसकी भक्ति में डूबता चला गया।
     मुझे अचानक भगवान के चमत्कारों पर विश्वास होने लगा, और मुझे लगा मुझे भी कृष्ण मरने नही देंगे, बचा ही लेंगे।
    लेकिन मैं जानता हूँ कि अभी भी मेरा कृष्ण पर विश्वास सौ फीसदी नही जाग पाया है। क्योंकि अगर मेरा विश्वास सौ फीसदी होता तो मैं अपनी शादी तोड़ कर अपने माता पिता को अकेला छोड़ कर नही भागता।
   अभी भी दिल के एक कोने में यह डर बैठा है कि अगर मैं कादम्बरी से शादी के बाद मर गया तो उसका क्या होगा?
   अगर मेरी तबियत मेरे माता पिता के सामने बिगड़ने लगी तो वो अपने बेटे को पल पल अपनी आंखों के सामने मरते कैसे देख पाएंगे।
   सच कहूं दोस्त तो अपने आप को अपने मन को ही नही समझ पा रहा हूँ। और बस इसीलिए स्वयं के अंदर के सत्य की तलाश में निकला हूँ।
   अगर कृष्ण मुझे जीवित रखतें हैं तो फिर ये जीवन उन्हें समर्पित हो जाएगा….

” पर ये कैसी शर्त हुई भला? आपने तो इस डर से शादी तोड़ी की कहीं आपको कुछ हो गया तो आपके बाद आपकी पत्नी का क्या होगा?
   अब मान लीजिए श्रीकृष्ण ने आपको बचा लिया तब भी अगर आप विवाह नही करते तो फिर आपके इतने बड़े निर्णय का क्या मतलब? बल्कि तब तो आपको श्रीकृष्ण की भक्ति में अपने पूरे परिवार के साथ लग जाना चाहिये।”

” शायद तुम ठीक कह रहे हो। पर अभी तो फिलहाल मेरा पूरी तरह से खुद को समर्पित कर देने का मन करने लगा है। ऐसा लगता है जितना भी जीवन बाकी है सब कृष्ण के चरणों में चढ़ा दूं। “

” उनके श्री चरणों में अर्पित करने के बाद हर चीज़ उत्कृष्ट हो उठती है। खुद को सर्वश्रेष्ठ बनाने का तरीका अच्छा है। पर अगर आप श्रीचरणों में जा रहे तब तो सब कुछ भूल कर आपको खुश रहना चाहिए, फिर क्यों ऐसे मुरझाए से हैं? “

” क्योंकि अपने माता पिता से बगावत कर के आ रहा हूँ। वो नही चाहते थे मैं सन्यास लूँ। “

” किस संसार के माँ बाप चाहेंगे उनका बेटा सन्यास ले? “

” जानता हूँ देव ! इसी बात पर तो ढेर सारी बहस हुई और कल रात उनके लिए एक चिट्ठी छोड़ मैं निकल आया।”

” मतलब उनसे मिले भी नही ? “

” नही ! अब तक तो माँ ने चिट्ठी पढ़ भी ली होगी। जाने क्या हाल हो रहा होगा उनका? और जाने पापा कैसे होंगे? “

” जब इतने चिंतित हो तो बात कर लो!”

  वरुण ने देव की तरफ देखा, देव ने वरुण का मोबाइल टेबल से उठा कर उसकी ओर बढ़ा दिया…

” सत्य की खोज में निकले हो तो घर वालों को भी सत्य बोल कर ही जाओ न। बातें न करने से शायद ही कभी समस्या का समाधान हो पर बातें साफ साफ कर लेने से हमेशा एक समाधान निकल ही आता है।”

   वरुण ने देव की ओर देखा और अपना फ़ोन हाथ में ले लिया ….

   कांपते हाथों से उसने माँ का मोबाइल नम्बर डायल किया …. घर से कोई फ़ोन न आ जाये इस डर से अब तक उसने अपना फ़ोन बंद कर रखा था।

  पहली ही रिंग में फोन उठ गया….
       फिर वरुण की क्या बात हुई क्या हुआ ये जाने बिना ही देव ने पारो को फ़ोन लगाया और दूसरी दिशा में आगे बढ़ गया….

  पारो के पास अपना मोबाईल था नही। घर भर की सभी औरतों के लिए मोबाइल की सुविधा घर की बड़ी बहू आनन्दी के पास थी….
   आनंदी पारो की जेठानी थी और देव की ताई की बहू थीं।
   आंनदी के मोबाइल पर जैसे ही देव का नम्बर दिखा वो भाग कर पारो के कमरे में पहुंच गईं।
  पारो और लाली मिल कर छत पर कटे हुए आमों में हल्दी नमक लगा कर उन्हें  सूती कपड़े पर धूप में फैला रहीं थीं।

” अरी पारो वो छोड़, ये ले देवर बाबू का फोन है!”

  पारो ने जल्दी से हाथ बढ़ा कर फोन ले लिया….

” कहाँ तक पहुंचे ? और कितना वक्त लगेगा? वापस कब आओगे? “

” अरे बाबा धीरे धीरे एक एक कर पूछो सवाल। पहले का जवाब ये है कि अभी हाइवे के किसी ढाबे पर रुकें हैं।  यहाँ से अभी हम तीस घंटे का सफर करके पहले हरिद्वार पहुंचेंगे उसके बाद वहाँ से सोनप्रयाग होते हुए गौरीकुंड में उतरेंगे।
   वहाँ से आगे शायद पैदल ही जाना पड़ेगा।
अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना है पारो। जितना जल्दी पहुंचेंगे उतना ही समय वापसी में लगेगा। तुम ठीक हो ना? क्या कर रहीं थीं अभी? “

” आम का अचार बना रही थी। आपके लौटते तक में खाने लायक हो जाये शायद। अच्छा सुनो आपको बताया था  मेरी सहेली है ना ज़ोइता उसकी शादी है अगले महीने। “

” हाँ तो ? जाना चाहती हो? “

” हम्म ! “

“चली जाना, मैंने रोका है कभी? “

” मैं चाहती हूँ आप भी साथ चलें।  चलेंगे ना? “

” बिल्कुल चलेंगे। चलो अब फोन रखता हूँ। तुम अपना और बाकी सबका ध्यान रखना । अच्छे से खाना पीना। और रात में ज्यादा पढ़ाई मत करना, वक्त पर सो जाना। “

” आप भी अपना ख्याल रखना और रोज़ फ़ोन करते रहना। ”

” हम्म ! ठीक है। ”

  मुस्कुराता देव फ़ोन रख जैसे ही पीछे पलटा उसके सामने वरुण खड़ा था।
  मुस्कुरा कर वरुण ने देव को गले से लगा लिया..

” तुमने सही कहा था देव ,अपनों से भाग कर किस सत्य की तलाश कर पाता मैं। माँ पापा नाराज़ तो थे और दुखी भी लेकिन उनसे बात करने के बाद अब थोड़ा सम्भल गए हैं। उन्हें भी अपने भगवान पर विश्वास है , की वो उनके बच्चे के साथ कुछ गलत नही होने देंगे। “

   दोनों साथ साथ आगे बढ़ रहे थे कि बस के दरवाज़े पर एक बुजुर्ग से टकरा गए, वो भी बस में चढ़ने जा रहे थे।
  उन्होंने रुक कर वरुण और देव को अंदर जाने की जगह बना दी, उनके ऐसा करने पर वो दोनो भी हंसते हुए एक तरफ खड़े हो गए और उन्हें पहले आगे जाने का रास्ता दे दिया। वो धीरे से बस में चढ़ सबसे सामने की सीट पर बैठ गए।
   देव दादी को पहले ही बस में बैठा चुका था। उन बुज़ुर्ग के चढ़ने के बाद देव और उसके पीछे वरुण भी चढ़ गया।
    उन्होंने देव के पीछे आते वरुण को देखा और चौन्क कर वापस देव को देखने लगे…

  देव और वरुण दोनो उनके इस कृत्य से भौचक्के रह गए। उन्होंने एक दूसरे को देखा और उन्हीं के सामने की सीट पर बैठ गए…

” क्या हम यहाँ बैठ सकतें हैं?”

  पारी पारी से दोनो को देखते उनके चेहरे का रंग बदलता जा रहा था।। उन्होंने हाँ का इशारा किया और खिड़की से बाहर देखने लगे..

     उनके माथे पर सजा त्रिपुंड , गले में पड़ी चंदन और रुद्राक्ष की कंठी उनके पंडित पुजारी होने की ओर इशारा कर रही थी।

” क्या हुआ पंडित जी आप कुछ परेशान लग रहे?”

” नही नही ऐसी कोई बात नही। जाओ अपनी जगह में बैठ जाओ..!

” पंडित जी कुछ तो बताइए। अभी इतनी लंबी यात्रा साथ में करनी है और आप ऐसा करेंगे तो कैसे बनेगा। कोई बात तो है जो आप हम दोनों को देख परेशान हो उठे। ”

  देव की बात पर उन्होंने गौर से देव को देखा फिर वरुण को देखने लगे….

“मैं कुंडलियां बनाता हूँ। हाथ की रेखाएं,माथे की रेखाएं पढ़ता हूँ।
   तुम दोनों की माथे की रेखाएं कुछ कह रहीं हैं…”

” क्या कह रहीं हैं पंडित जी? ” देव के सवाल पर वरुण ने हाथ पकड़ कर उसे उठा लिया

” जाने दो मैं ये सब नही मानता? कोई कुछ भी कह जाता है और तुम मान भी लेते हो। क्या बकवास है ये? “

” तुम्हारे मानने न मानने से बातें या तथ्य बदल नही जाएंगे।
   तुम दोनों का भविष्य एक दूसरे में हैं। एक के माथे की रेखा जहाँ तक जाकर मुड़ती है वहीं से दूसरे की शुरू हो रही है।
  ये रेखाएं तुम दोनो के जीवन में कुछ ना कुछ कर के रहेंगी….
  तुम दोनों का ही माथा अलग अलग पढ़ने पर पढ़ने वाला कुछ नही समझ पायेगा लेकिन जब वो तुम दोनो के माथे को साथ में पढ़ेगा तभी तुम दोनो का भविष्य पढ़ पायेगा।
   इसका मतलब समझे तुम? “

  पंडित जी को वरुण की अवहेलना खल गयी थी। और गुस्से में वो वह सब कह गए जो उन्हें नही कहना चाहिए था…

” इसका मतलब ये है कि तुम दोनों का भाग्य तुम दोनो की किस्मत तुम दोनो का जीवन एक है।
   अलग अलग तुम आधे ही हो,इसलिए आज तक तुम्हारे दोनो के जीवन में कुछ न कुछ कमियां थी। तुम दोनो एक साथ रहने पर एक ही व्यक्ति हो।

  पंडित जी की बातें अब देव को भी बे सर पैर की लगने लगीं। वरुण तो पहले ही उनकी बात बिना सुने अपनी सीट पर जा चुका था, देव भी धीरे से वहाँ से उठ खड़ा हुआ।
   उसने उन पंडित जी के पैर छुए और धीमे से अपनी सीट की ओर बढ़ गया…

” मैं झूठ नही कह रहा हूँ। अरे और किसी से क्या कहूँ अब तो मैं खुद निर्वाण हेतु बाबा के चरणों में जो जा रहा हूँ।
   वहीं मेरी मुक्ति है!!!
    वही मेरा मोक्ष है!!!
     वही मेरा निर्वाण है!!!

क्रमशः

aparna ….


  दिल से….

    दिल से कहूँ तो कहानी लिखते समय मैं तथ्यों का विशेष ध्यान रखती हूं कि पढ़ते समय आप लोगों को सब कुछ एकदम हवा हवाई न लगे। लेकिन बहुत बार होता है कि कुछ कहानियों में कहानी को आगे बढ़ाने के लिए या कोई मोड़ देने के लिए कहानी की कुछ मांग हो जाती है और तब कहानी को उस ढंग से मोड़ना पड़ता है।

   जैसा की कोलकाता से केदारनाथ की बस यात्रा। बस मार्ग से ये दूरी बहुत ज्यादा है और बहुत कम लोग ऐसी यात्रा करना पसंद करतें हैं । लेकिन फिर भी कुछ लोग आज भी तीर्थयात्रा बस का उपयोग करना पसंद करतें हैं।

  *******

   एक आधा बार मुझसे किसी ने पूछा इनबॉक्स में कि आप के पाठक आपको इतने शौक से पढ़तें हैं, आप बताइए आप किसे पढ़ती हैं?
    सवाल बहुत सरल सा था, पर जवाब पेचीदा है। मैं बहुत से लेखकों को पढ़ती हूँ। बस लेखन ऐसा हो कि शुरू की दो पंक्तियों के बाद ही कहानी छोड़ने का मन न करे।
   अभी फिलहाल कभी कभी सुधा मूर्ति जी की कहानियां पढ़ लेती हूँ। ये मूलतः कन्नड़, मराठी और अंग्रेजी में लिखतीं हैं। मेरे पास इनकी इंग्लिश स्टोरी बुक ही है फिलहाल, बाकी खरीदनी हैं।
    
    जिन पाठिकाओं के छोटे बच्चे हैं जो कहानी सुनना चाहतें हैं उनके लिए सुधा जी की कहानियाँ बहुत शानदार ऑप्शन है। कहानियां मोटिवेशनल हैं सकारात्मक हैं और जीवन को एक नया आयाम देती हुई सी हैं।
   वैसे आप में से बहुत से लोग सुधा जी को जानते भी  होंगे, जी हाँ इन्हीं के पति श्री एन आर नारायणमूर्ति इंफोसिस के फाउंडर और चेयर पर्सन हैं…. सुधा जी के कुछ वीडियो व्हाट्सप्प फेसबुक पर भी हैं।
   प्रतिलिपी पर इनकी कहानियां नही मिलेंगी!!

  तो इस बार के दिल से में छाई रहीं सुधा मूर्ति जी। आप भी कभी पढ़ कर देखिएगा , बहुत अच्छा लगेगा…..

   और सबसे आख़िरी में मुझे पढ़ने और सराहने के लिए आप सभी का दिल से आभार धन्यवाद शुक्रिया नवाज़िश….

aparna ……
   


 

समिधा – 19




समिधा -19


   खत पढ़ कर वरुण के चेहरे पर आई मुस्कान कुछ चंद मिनटों में ही गायब हो गयी। जाने कौन है ये पारोमिता और जाने कहाँ की है ये ज़ोइता?
    सिर्फ खत ही तो उसके पास पहुंचा था, न भेजने वाले का पता था न खत पहुंचने का ठिकाना लिखा था। ज़रूर लिफाफे में पहुंचने से पहले चिट्ठी उस तक पहुंच गई थी।
    खैर !!अब वो कर भी क्या सकता है। उसने एक नज़र चिट्ठी पर डाली और उसे टुकड़े कर बालकनी से नीचे गिराने के विचार से दोनो हाथों में ले तो लिया लेकिन फिर कुछ सोच उसने चिट्ठी अपने बैग में डाल ली।

  वही बैग जिसमें कुछ देर पहले ही उसने अपने कपड़े रखे थे।
  कपड़ों के साथ ही सफाई से तह किये रुमाल, मोज़े , टॉवेल, चादरें रखने के बाद उसने एक बार पूरी ममता से अपने कमरे को देखा और बत्तियां बुझा कर सोने चला गया।
  अगले दिन सुबह उसे एक बहुत बड़े निर्णय के साथ ये घर छोड़ कर जो जाना था।

*****

   सुबह सुबह देव गहरी नींद सोया हुआ था कि कमरे के दरवाज़े को अंदर ठेलती उसकी माँ चली आयी।
पारो नहा कर नीचे दालान में ठाकुर माँ की पूजा की तैयारी कर रही थी।
    
  “बाबून ऐई बाबून…”

  बोलते बोलते ही जैसे उनकी सांस अटक कर रह गयी। ये क्या कर रहा है उसका लड़का ?
  ये सोफे पर क्यों सोया पड़ा है। अपने जिगर के टुकड़े को सोफे पर ऐसे हाथ पांव सिकोड़े पड़े देख माँ की आंखों में खून उतर आया…
    उन्होंने आंखे  तरेर कर पलंग की ओर रुख किया, पलंग पर एक ही तकिया और एक ही ओढ़ने की चादर सफाई से तह की रखी थी।
  इसका मतलब महारानी जी पूरे पलंग पर अकेली सोतीं हैं।
पर दोनो के बीच बाहर तो सब अच्छा दिखता है । ऐसा दिखता है कि देव पारो से खूब प्यार करता है फिर दोनो अलग क्यों सोते  हैं भला?

  इतने बड़े प्रश्न के साथ व्यथित मन से देव की माँ उसे उठाये बिना ही नीचे उतर गयीं…

” ओ काकी माँ ये क्या ? देव को उठाया नही क्या? अपनी जेठानी की बहू की बात पर जैसे वो सोते से जागीं।

“अ हम्म बस पारो को भेजती हूँ उठाने। मैं चाय चढ़ा देती हूँ देव के लिए। “

फिर कुछ सोच कर उन्होंने जेठानी की बहू को ही पास बुला लिया…

” बहु माँ इधर सुनना ज़रा!”

आनंदी हाथ पोंछती उनके पास जा खड़ी हुई…

” देव और पारो के बीच सब ठीक है ना? “

” हाँ काकी माँ ऐसा क्यों पूछ रही हो? “

” नही वो बस ऐसे ही। तुझसे पारो ने कभी कुछ कहा तो नही। “

” नही तो । अब बताओ भी क्या बात है।”

” वो मैंने आज देखा देव सोफे पर सो रहा था, एक बार पहले भी इस बात पर ध्यान गया था मेरा। शादी को साल बीत गया और दोनो पति पत्नी अलग सो रहे। आखिर माजरा क्या है। तू पूछेगी क्या पारो से? “

  आनन्दी शरमा कर नीचे देखने लगी…

” अरे आप इतना सोचो मत काकी मां। हो सकता है कल कोई बात हो गयी हो,कुछ छोटा मोटा झगड़ा हो गया हो या ये भी हो सकता है पारो की तबियत ठीक न हो! आप इतना सोचो मत,मैं पारो से ही पूछ लुंगी। ”

आनंदी के आश्वासन के बाद उनका मन कुछ हल्का हुआ कि रसोई में चहकती हुई पारो चली आयी।

   मेरा हीरे जैसा लड़का मिल गया, उस पर स्कूल जाकर पढ़ने मिल गया। और क्या चाहिए राजरानी सा रख रहें हैं उस पर तेवर यह कि पति को सोफे पर सोना पड़ रहा है। ऐसे भी क्या नग जड़े हैं लड़की में…
   अपने विचारों में गुम देव की माँ पतागोभी काटने लेकर बैठी ही थी कि पारो ने टोक दिया…

” माँ आज पत्तागोभी क्यों बनाने जा रही हो। आज तो लाली आने वाली है ना जमाई बाबू के साथ,आज तो बैंगन बना दो भरवाँ। उसे बहुत पसंद हैं ना। “

  अपने हाथ से अपने माथे पर एक चपत लगा कर देव की माँ मुस्कुरा उठी..

” ओ माँ मैं कैसे भूल गयी भला?  तभी तो दीदी सुबह सुबह अपनी लाड़ली के लिए माछ ही तो लेने गयीं हैं। ला बैंगन दे दे मुझे और तू फटाफट चाय बनाकर देव को उठा दे बोलना बड़ा बाजार से रसगुल्ला ले आएगा । और कहना आज दुकान खोल कर जल्दी वापस आ जायेगा।

“अच्छा माँ! ” पारो चाय लिए देव को जगाने चली गयी।

   देव के पिता दर्शन को साथ लिए लाली को लेने चल दिए और दोपहर तक लाली अपने मायके पहुंच भी गयी।
   लाल साड़ी में बीच से मांग निकाले उस पर लाल सिंदूर की गाढ़ी रेखा भरी लाली चमचमा रही थी। ससुराल का ज़िक्र आते ही जैसे उसके गाल अबीर गुलाल हुए जा रहे थे।
  पर रह रह कर वो पारो के साथ अकेले में बात करना चाह रही थी।
    दोपहर का खाना निपटाते ही उसे ज़रा वक्त मिल ही गया। लाली की माँ ने उसे कमरे में चल कर आराम करने भी कहा पर उसका मन तो पारो के साथ बैठ गप्पे मारने का हो रहा था।
    दोनो साथ ही ऊपर कमरे में चली आयी…

  लाली अपने ससुराल की तारीफ करते नही थक रही थी। कभी सास का बड़प्पन कभी ससुर की बड़ाई और सबसे ज्यादा अपने पति की । प्रखर की।
  पारो बड़े मन से उसकी सारी बातें सुनती जा रही थी।अपने में खोई लाली अपनी प्रथम प्रीत की सुकोमल भावनाओं के साथ पहले पहले मिलन कि रसीली बातें भी खोल कर पारो के सामने कह गयी।
   पारो के कान लाल हो उठे और वो शरमा कर खिड़की बंद करने भाग गई…

” धीमे बोल लाली कहीं किसी ने सुन लिया तो? “

” हाँ सुन भी लिया तो क्या? पति हैं आखिर मेरे।”

  छुईमुई सी लाली का ससुराल से ये प्रत्यावर्तन पारो को भा रहा था , कभी लाली की बातें सुन शरमा जाती तो कभी हँसने लगती और तभी लाली ने उससे ही सवाल कर दिया…

” तुमने तो मुझे कुछ सिखाया समझाया भी नही था पारो। सब कुछ उन्होंने ही बताया। मुझे उस वक्त कितनी शर्म आयी क्या कहूँ। उन्हें भी लगा होगा कैसी बेढब लड़कीं से ब्याह दिया घर वालों ने। ” रिश्ते में काकी होने पर भी हमउम्र होने से दोनो सखियां एक दूजे का नाम ही लेती आयीं थीं।

  पारो धीमे से मुस्कुरा कर रह गयी…

” तुझे क्या सिखाऊं समझाऊँ लाली ? मेरे खुद के जानने समझने के दिन जाने कब आएंगे। ” पारो ने अपने मन की बात कह तो दी लेकिन लाली को समझ में कुछ भी नही आया।

  उन दोनों की लंबी बातों के बीच ही आनन्दी उनके साथ साथ अपनी भी चाय लिए ऊपर चली आयी..

” खूब लुक छिप कर बातें चल रहीं है दोनों सखियों की। ज़रा हम भी तो सुनें।”

दोनो ने मुस्कुरा कर उसके बैठने के लिए भी जगह बना दी।।

  ” पारो अब तुम भी सोचो परिवार बढ़ाने के बारे में ..!”

” क्या दीदी ?”

” अरे एक साल हो गया शादी को। अब तो बच्चा कर ही लेना चाहिए तुम दोनो को। इस साल नही किया तो अगले साल कहोगी बारहवीं की पढ़ाई कठिन है नही कर पाएंगे। उसके बाद और कोई बात हो जाएगी तो आखिर बच्चे के बारे में कब सोचोगे भला? अब देखो लाली की शादी तुमसे पीछे हुई है पर कहीं इसके पैर भारी हो गए तो? अच्छा लगेगा क्या काकी से पहले भतीजी माँ बन जाये।”

” इसमें मैं क्या कर सकती हूँ बऊ दी। ये जब चाहेंगे तभी तो कुछ हो सकता है। “

” ओ माँ मैं कहाँ जाकर मरूं। अरे यही तो एक बात है जिसमें तुम्हारी चल सकती है। बाकी तो बाहर की हर बात पर मर्द अपनी ही चलाते हैं।”

  पारो सर झुकाये बैठी सुनती रही। आनन्दी अपने अनुभव उसे सुनाती जल्दी बच्चे के लिए प्रेरित कर रही थी कि देव भी कमरे में चला आया…

” अरे रे मैं तो लग रहा गलत चला आया। आप सब इतनी मशगूल हैं आप लोगों को डिस्टर्ब करना सही नही होगा। “
  वो वापस पलट कर निकल ही रह था कि आनन्दी ने उसे भी आवाज़ दे दी।

” आप ही का कमरा है देवर बाबू। आप कहाँ चल दिये? आइये आइये। आपसे शिकायत है मेरी।।

” अरे बोलिये न बऊ दी !”

” पारो का कहना है उसके देव बाबू उस पर ध्यान ही नही देते। ”

देव चौन्क कर पारो की ओर देखने लगा। पारो आनंदी की इस बात के लिए तैयार न थी, वो अपनी बड़ी बड़ी आंखों से मैंने तो ऐसा नही कहा वाले भाव के साथ देव को देखती ना में सर हिला गयी।
   पारो की घबराहट देख देव को हंसी आ गयी…

” कैसे ध्यान नही देता मैं। ज़रा बताइये। “

” कितना ध्यान देते हो हमें दिख रहा है। साल पूरा हो गया पर पारो की गोद में बच्चा नही आया। ऐसे ध्यान रख रहे हो उसका। “

” अरे पारो अभी खुद बच्ची है। अभी से बच्चा कहाँ संभाल पाएगी। “

“सत्रह की पूरी होने वाली है। और क्या बच्ची है?। सही उम्र में संतान हो जाना भी ज़रूरी है देवर जी वरना जब बच्चा दौड़ेगा भागेगा तो आपसे उसके पीछे भागा नही जाएगा। “

” हम्म बात तो सोचने वाली है। ” देव ने अपना सर खुजाते हुए जवाब दिया…

” बच्चे के पीछे भागने के लिए बच्चों वाली उम्र में ही माता पिता बन जाना चाहिए। बिल्कुल सही कहा बऊ दी।”

” लगे मेरा मज़ाक उड़ाने। पर सच कह रही हूँ मैं। अब काकी माँ को ही ले लो। पैंतालीस की भी नही हुई और कुछ समय में पोता खिलाने लगेंगी। यही तो जीवन का सार है।
  कहा जाता है की हमें जन्म देने का ऋण हम अपने माता पिता का कभी नही चुका पाते लेकिन जिस दिन हमारी संतान होती है वो ऋण चूक जाता है।
  समझे।
  अब जल्दी जल्दी सोच लो भई बच्चे का।

” बिल्कुल बऊ दी ! आपकी आज्ञा सर माथे।”

आनंदी मुस्कुरा कर अपने पल्ले को माथे पर सजाती नीचे चली गयी। उसके पीछे लाली भी हंसती खिलखिलाती चली गयी।
   देव ने पारो को देखा वो शरम से नीचे देखती बैठी थी कि देव उसके पास चला आया…

” सोच रहा हूँ आज रात आनन्दी बऊ दी की बात मान ही लेता हूँ। क्यों पारो? “

  देव ने पारो को कंधो से पकड़ कर अपनी ओर घुमाया। पारो शरमा कर उसकी बाहों से निकल नीचे भाग गई।
   नीचे से देव की माँ ने उसके नाम की पुकार मचा दी…

  “बाबून ओ बाबून ”

” आया माँ । ”   देव नीचे पहुंचा तो देखा दालान में शर्मा जी बैठे थे।
   देव के पिता के पुराने पहचान वाले थे लेकिन घर पर और कोई इनसे उतना परिचित नही था।
   देव ने माँ की आंखों का इशारा समझ उनके पैर छुए और एक ओर कुर्सी खींच कर बैठ गया।

” शर्मा जी चाय पानी क्या लेंगे आप? “

” भाभी जी चाय ही पिला दीजिये बढ़िया अदरक वाली। “देव की नज़रों में खुद के लिए सवाल देख वो उसकी ओर मुड़ गए…

   “शर्मा जी बनारस वाले ” हमारा पूरा नाम है। हम गंगा मैया की नगरी से हैं बेटा । महाकाल की नगरी से। ”

हां में सर हिलाता देव उन्हें सुनता रहा..

” ठाकुर दादा ने कहा माँ को केदारनाथ जाना है तो हम चला आया। ”

” नही नही शर्मा जी दादी को तो मैं लेकर जाऊंगा न केदारनाथ। “

” हाँ बिल्कुल ! और तुम्हें हम लेकर जाएंगे। वैसे पेशे से हम बाबू है क्लर्क। दूरसंचार विभाग में काम करतें हैं। गुज़र बसर हो जाती है। लेकिन फिर एक दिन बिस्वनाथ बाबा सपने में आये और बोले कुछ पुण्य का भी काम कर लो शर्मा । बस हम अपने सपने का मतलब समझ गए। तबसे अब साल में दो बार अलग अलग तीर्थ के लिए हम गाड़ी बुक करतें हैं और श्रद्धालुओं को साथ लेकर तीर्थ करवाने का पुण्य कमाते हैं।

” शर्मा जी आप क्यों परेशान हो रहे। मैं दादी को करवा लूंगा दर्शन।”

” कह तो सही रहे हो बेटा लेकिन तीरथ बरत का असली मज़ा लोगों के साथ जाने में हैं। हमारे साथ जाने में कोई कष्ट ना होगा। हम साथ में अपना रसोइया और रसद साथ लेकर चलतें हैं। लंबी चौड़ी बस रहती है उसमें स्लीपर कोच भी है और बुजुर्गों के लिए आराम कुर्सी भी। जगह जगह पर रुकने के लिए हमारी धर्मशालाओं में भी बात तय रहती है। बड़े मजे से सफर कटता है।
आना जाना वहाँ रहना खाना पीना , दर्शन पूजन सब की तैयारी रहती है। बस हाथ हिलाते बैठ चलो हमारे साथ।
   रास्ते में गाने बजाने की भी पूरी तैयारी रहती है। ढोलक मंजीरा सब साथ हैं हमारे।  हमारा रसोइया ऐसा ढोलक बजाता है कि क्या कहें हम ? “

” रसोइया ढोलक बजाता है तो गाता कौन है शर्मा जी? “

” गातें हम हैं। कोई भजन गवा लो हमसे। हमें लगभग सारे याद हैं जो नही बनते उन्हें देख कर गा लेते हैं। खाना भी जबरदस्त बनाता है वो पंजाबी गुजराती बंगाली सभी तरह के निरामिष भोजन बनाने में कुशल है। आलू पोस्ते की सब्जी हो या बैगुनी, छोले भटूरे हो या खांडवी ,खीर हो या गाजर हलुआ सब बना लेता है और बहुत स्वाद बनाता है। हमारे टूर में हफ्ते के सातों दिन अलग अलग खाने के आईटम् …


  मुस्कुरा कर देव ने उनकी बात काटते हुए हामी भर ही दी।

” ठीक है शर्मा जी तो फिर कब निकलना है , केदारनाथ दर्शनों के लिए? “

” आपके पिता यानी दद्दा से हमारी सारी बात तय थी बेटा । आप तैयारी कर लो। बस सुबह सुबह भोर में महादेव का नाम ले चल पड़ेंगे। “

” कब कल? “

” हाँ कल! दिन तय हो चुका है। बस दो ही सीट बची थी हमारे पास की दद्दा का सुबह सवेरे फ़ोन आ गया। अब इस टूर के बाद अगला केदारनाथ ट्रिप अगले साल जाएगा न इसी से उन्होंने इसी में आप दोनो की बुकिंग करवा ली । हम इधर से घर जा रहे थे सोचा मिल कर आपको टूर ब्रोशर देते चलें। बेटा गरम कपड़े खूब रख लेना। हम चलतें हैं, सुबह चार बजे हमारे ऑफ़िस पहुंचना है आपको। ठीक पांच बजे हमारी बस चल पड़ेगी।
    हर हर महादेव ! जय सियाराम !”

अपनी चाय खत्म कर उन्होंने एक ओर टेबल पर रखी
और हाथ जोड़ खड़े हो गए।
  देव ने भी खड़े होकर हाथ जोड़ लिए। उनके जाते ही वो इतनी जल्दी में कोई कैसे कहीं जा सकता है कि बात पर कुछ देर माँ से उलझा रहा फिर ऊपर अपने कमरे में पैकिंग करने चला गया।
   ठाकुर माँ तो पहले ही सारा सामान बांन्ध बूंद कर बैठी थीं जैसे कहीं रात ही बस न निकल जाए।

****

  वरुण ने सोने से पहले एक बार फिर अपना मोबाइल जांचा और तीन बजे का अलार्म लगा कर लेट गया। वो समझ चुका था अब घर पर किसी को भी समझाना व्यर्थ था।
  मंदिर में पंडित जी से उसकी बात हो ही चुकी थी। उन्होंने ही उसे अगले दिन केदारनाथ निकलने वाली टोली के बारे में बताया था।
  उस टोली में मंदिर से कोई दो तीन लोग ही थे बाकी उसी से थे जो असमय सन्यास का सोच रहे थे। ऐसे कुल जमा सात लोगों के साथ उसे किसी तीर्थयात्री बस के साथ अगले दिन केदारनाथ निकलना था।
   
    अपने मन में चल रहे उहापोह के बीच उसकी घर पर वो आखिरी रात आंखों ही आंखों में कट गई। सुबह तीन बजे अलार्म बजने से पहले ही वो जाग गया।
   चुपचाप दबे कदमों से नीचे उतर वो रसोई में चला आया। अपने लिए एक कप कॉफी बनाते हुए उसकी आंखें भर आईं।
पता नही वो सही कर रहा था या नही।
क्या सच में वो ज्ञान की खोज में ही जा रहा था या भाग रहा था अपने आप से।
कहीं ऐसा तो नही की उसकी बीमारी का सुन कर या उसे तिल तिल मरते देख कर उसके माता पिता पर क्या बीतेगी ? इसी डर से तो नही भागा जा रहा वो?

   इन्हीं सब प्रश्नों का हल ढूंढ़ने ही तो उसे पंडित जी ने एक बार केदारनाथ यात्रा कर के आने की सलाह दी थी। उनका कहना था वहाँ तुम्हारा मन शांत होकर सही गलत को समझ कर सही निर्णय ले पायेगा।
 
लेकिन पिता जी के गुस्से के कारण उसकी फिर घर पर ये बोलने बताने की हिम्मत ही नही हुई कि वो केदारनाथ सिर्फ दर्शनों के लिए जा रहा है।
  अपने मन की सारी बातों को पत्र में उतार उसने नीचे हॉल में रख दिया और अपना कॉफी का मग लिए ऊपर चला आया था।
    ” हे ईश्वर तुम्हारी तलाश में निकलूँ या नही ये भी पूछने तुम तक ही आ रहा हूँ। मेरी आँखें खोल देना प्रभु!”

नहा धोकर वरुण तैयार हुआ और नीचे अपनी माँ के सजाए मन्दिर में कान्हा जी के सामने हाथ जोड़े खड़ा हो गया…

” सिर्फ तुम्हारे ऊपर विश्वास कर अपने माता पिता को अकेला छोड़े जा रहा हूँ। मुझे पता है तुम उनके साथ हो।”

  वरुण ने अपना लिखा पत्र हॉल की टेबल से उठा कर मंदिर में कान्हा जी की मूर्ति के पास रखा और अपना बैग टांगे चुपके से दरवाज़ा खोले बाहर निकल गया।

  शर्मा जी का ऑफ़िस उसके घर से कुछ कदमों पर ही था। लंबे लंबे डग भरता वो वहाँ पहुंच गया।
   अब भी अंधेरा छाया हुआ था लेकिन शर्मा जी का ऑफिस उजियारे से उद्भासित था। अलग अलग तरह के लोग बातों में मगन अपनी अग्रिम यात्रा के लिए अति उत्साहित थे।
  एक एक कर सभी बस में चढ़ते चले गए।

वरुण ने भी एक खिड़की वाली सीट पर कब्ज़ा जमा लिया।
  वो बैठा खिड़की से बाहर देख रहा था कि उसका ध्यान एक आवाज़ से टूट गया…

“क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ या किसी और के आने की प्रतीक्षा है? “

  वरुण ने चौन्क कर देखा एक बाइस तेईस बरस का सुंदर सा लड़का उसके सामने मुस्कुराता खड़ा था। वरुण ने मुस्कुरा कर उसे हां कह दिया…

” मैं देवज्योति टैगोर हूँ। अपनी दादी को दर्शन करवाने ले जा रहा हूँ। वो बुज़ुर्ग हैं ना इसलिए वहां सामने उनकी सुविधा वाली सीट पर उन्हें बैठाया है।”

वरुण ने मुस्कुरा कर अपना हाथ आगे बढ़ा दिया…

” मैं वरुण सत्य की तलाश में केदारनाथ जा रहा हूँ। “

  दोनो ने आपस में हाथ मिलाया और एक बिजली सी चमकी ….
     और बस आगे बढ़ गयी…..

क्रमशः



aparna ….

समिधा -18

  समिधा – 18


      वाह रे भगवान तुम और तुम्हारा संसार !!
अब तुम्हें पूरी तरह समझने आना ही पड़ेगा मुझे तुम्हारे रचे संसार को तज कर तुम्हारी शरण में…..

    रोली की बिदाई के साथ ही घर भर को व्यस्त रहने का जो बहाना मिल गया था वो खत्म हो गया।

वरुण को भी अब वक्त मिल गया था अपने बारे में सोच समझ कर निर्णय लेने का।
  अगले दिन जब एक एक कर सारे रिश्तेदार चले गए तब अपने मन को कड़ा कर वो नीचे चला आया। मासी और उनका परिवार भी उसी शहर का रहवासी था इसी से मासी अब भी नही गयी थीं।
    रसोई में दोनो औरतें समोसे बना रही थीं, लिली वहीं खड़ी उनकी मदद कर रही थी और कमल बाहर कहीं अपने दोस्त से मिलने गया हुआ था।
   वरुण के पिता  चाय पीते अखबार पढ़  रहें थे, की वरुण आकर उनके सामने बैठ गया…

” पापा आपसे कुछ बात करनी है।”

  चश्मे के अंदर से झांकती आंखों से ही उन्होंने वरुण से क्या कहना है पूछ लिया..

” पापा मैं सोच रहा था …
   मैं ये सोच रहा था कि ….. पापा !

अबकी बार हाथ का अखबार एक तरफ रख वो पूरी तरह वरुण को देखने लगे…” बोलो बंटी !”

” पापा मैं सन्यास लेना चाहता हूँ!”

  छन से थाली गिरी और थाली पर रखे सारे समोसे बिखर गए।
   रसोई से बाहर आती वरुण की माँ ने जैसे ही उसकी कही बात सुनी उनके हाथ से प्लेट छूट गयी।

” ये क्या बोल रहा है बंटी ? तू पागल हो गया है क्या? जो मुहँ में आया बक गया। अरे ये कोई उम्र है सन्यास की। तुझे उस लड़की से शादी नहीं करनी तो तू मत कर लेकिन इस सब से बचने के लिए ये सन्यास कोई उपाय नही है बेटा।
  
  वरुण की माँ की बातें सुनती उनकी छोटी बहन ने भी
वरुण के सर पर हाथ फिराते हुए कहना शुरू यरः दिया..

” क्या बात हो गयी बंटी? बेटा इतनी बड़ी बात तुम कैसे बोल गए। सन्यास लेना आसान होता है क्या?


” जानता हूँ मासी आसान नही होता, इसलिए देखना चाहता हूँ और एक मिनट आप लोग  समझ रहें हैं मैं वैसा सन्यास नही ले रहा कि अब आप लोगो से मिल नही पाऊंगा । मैं काफी आसान सा सन्यास ले रहा हूँ।

” आसान कठिन क्या होता है बंटी ? तुम आजकल के बच्चे समझते क्या हो? हर चीज़ तुम लोगो के लिए फैशन हो गयी है। भगवान भी और उसकी भक्ति भी। इस उम्र में सन्यास कौन लेता है भला ? और तुम लोगे भी नही। बस बात खत्म ।

“पर पापा! मेरी पूरी बात तो सुनिए ये एक मंदिर है जो जगह जगह स्थित है । इस मंदिर ट्रस्ट में प्रवेश करने वाले को वहाँ के लोग वेद उपनिषद आदि पढ़ा कर पहले उसका ज्ञान समृद्ध करतें हैं और फिर जगह जगह घूम कर हमें उसी ज्ञान का प्रचार करना होता है। ये वैसा सन्यास नही है जैसा आप लोग सोच रहे। इसमें मैं आप लोगों से मिलने भी आ सकता हूँ, और आप मुझसे मिलने…

” बस कर बंटी ,चुप हो जा। और दिमाग मत खराब कर मेरा। इसी दिन के लिए पैदा किया था न तुझे।

” अरे माँ  कहाँ से कहाँ जा रही हो तुम”

” और क्या? अपना पूरा जीवन खपा कर माँ बाप बच्चे को पालते पोसते हैं , अपनी सारी खुशियाँ एक तरफ रख पहले बच्चे का ख्याल रखते हैं और जब बच्चों का समय आया अपने माता पिता के किये कुछ करने का तब आ गए तुम्हरे मंदिर वाले। तुम्हारा दिमाग खराब करने। अरे उन्हें अपने ज्ञान का प्रचार ही तो करवाना है ना तो उसके लिए सन्यास की क्या ज़रूरत। हम सब मिल कर उनकी किताबें जगह जगह बांटेंगे ना।

” अरे माँ किताबें नही बांटनी है,ज्ञान बांटना है। “

” मैं कुछ नही जानती तू नहीं नही जाएगा बस। और सुन ले तुझे उस लड़की से शादी नही करनी कोई बात नही। तू मत कर शादी लेकिन शादी से बचने के लिए ये सब ऊलजलूल तिकड़म मत लगा।।

” माँ मैं कोई तिकड़म नही लगा रहा हूँ। मैं बस बता रहा हूँ कि…

  उसकी बात आधे में ही काट कर उसके पिता गरज उठे…..

” कोई कहीं नहीं जायेगा। घर को मज़ाक बना कर छोड़ा है। ये सारी बकवास अभी के अभी बंद करो । और सुनिए बंटी की माँ आप विधायक जी के यहाँ कहलवा भेजिए की शादी की तारीख जल्दी से जल्दी निकलवा लें। हम अगले ही मुहूर्त में ब्याह करने तैयार हैं।

” पर पापा!”

” पर वर कुछ नही। मैं भी कुछ तो हूँ ना इस घर का। तो अगर मुझे कुछ भी समझते हो तो आइंदा ये सारी बकवास ना करना। वरना मुझसे बुरा कोई न होगा।।”

“पापा समझने की कोशिश तो कीजिये। “

” तुम समझने की कोशिश करो बंटी। अब तक हम ही सारी ज़िम्मेदारी उठाते आएं हैं। अब जब तुम्हारा वक्त आया तो तुम पलट गए। अपने सारे कर्तव्यों से मुहँ मोड़ कर भागना चाहते हो। सन्यास का हमारे धर्म मे वर्णन है। चार आश्रमों में से चौथा आश्रम। लेकिन उसके पहले गृहस्थ धर्म को निभाओ।
   अपने जीवन में चलते हुए आने वाली मुश्किलों को हल करते हुए जीवन यापन भी तो कला है। दुखों कष्टों परेशानियों के झंझावात में उलझे बिना एक एक धागा सुलझाते सुलझाते कब जीवन का अंत समय आ जाता है पता ही नही चलता और यही सफर तो ज़िन्दगी है।
   लेकिन जो इन परेशानियों से जूझे बिना किनारे खड़े हो जाते है मेरी नज़र में वो कायर है।
अरे ज़िन्दगी से बढ़ कर कोई सत्य नही। अपने कर्तव्यों का पालन ही पूजा है। अपने कर्तव्यों से मुहँ मोड़ कर सन्यास लिए व्यक्ति को कौन सा यथार्थ ज्ञान मिल जाता है।
   मेरी नज़र में ये अपने कर्तव्यों से भागने के सिवा और कुछ नही है।
   अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए जीवन जीना भी तो एक तरह का सन्यास ही है।”

” पापा मैं अपने कर्तव्यों से नही भाग रहा। आप लोगो  को जब भी ज़रूरत होगी मैं दौड़ा चला आऊंगा।।

” वरुण मैंने कह दिया कि तुम कोई सन्यास नही ले रहे हो,बस।।अब अगर तुमने सोच ही रखा है कि तुम्हें अपने बाप की बात भी नही माननी है तो जाओ कर लो अपने मन की। आइंदा मैं तुमसे या किसी और से कुछ नही कहूंगा। ”

   अपने दोनो हाथों से अपना सर थामे वो वापस सोफे में धंस गए। वहीं एक ओर बैठी वरुण की माँ के ऑंसू नही थम रहे थे । मासी कभी उसकी माँ को चुप करवाती तो कभी उसके पिता को समझाती इधर से उधर हो रही थी।
   लिली एक ओर बैठी अपने फ़ोन पर टाइम पास कर रही थी। माहौल ऐसा भारी हो गया था कि उसका कुछ भी कहना यहाँ सही नही था।
  सबको वैसे ही छोड़ वरुण दरवाज़ा खोल बाहर निकल गया।
उसे समझ आ गया था कि उसने बहुत बड़ा धमाका कर दिया है और अब घर पर होने वाले इतने सारे ड्रामे के बाद फिलहाल उसकी कादम्बरी से कुछ कहने की हिम्मत नही हो रही थी।
   रोली की शादी को तीन दिन बीत चुके थे और आज शाम वो पगफेरों के लिए घर आने वाली थी।
   घर मे चलने वाली सारी तैयारियों  को फ़िलहाल उसने ठप्प कर दिया था और जाने क्या सोचता बाहर निकल गया था।
  
  ऐसे ही इधर उधर देखते चला जा रहा था कि उसे कहीं दूर से वही मनमोहक ध्वनि सुनाई पड़ने लगी..

   अच्युतम् केशवं कृष्ण दामोदरं।
    राम नारायणं जानकी वल्लभं।।

मन मे उठता तूफान जैसे थमने लगा और वो उसी आवाज़ की दिशा में आगे बढ़ता चला गया।

*****

   ब्याह के दो दिन बाद लाली की विदाई की तैयारियों के बाद उसकी विदाई हो गयी । घर भर की औरतें थकान से दुहरी होतीं दोपहर का खाना पीना निपटा कर जिसे जहाँ जगह मिली वहीं पसरी पड़ी थीं।
    लेकिन पारो इन सब से अलग ऊपर अपने कमरे में बैठी अपनी प्रिय सखी को चिट्ठी लिखने में व्यस्त थी।
  बहुत दिनों से उसे ज़ोइता की कोई खोज खबर नही मिली थी।
   यहाँ उसकी शादी को साल पूरा हो चुका था, उसने दंसवी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया था लेकिन ये सब वो अब तक ज़ोइता को नही बता पायी थी। हालांकि वो जानती थी कि जोई उसकी माँ से मिल कर उसके बारे में पूछ ताछ करती रहती है। लेकिन अपनी तरफ से उसका भी तो कोई फ़र्ज़ था।
   उसने एक छोटी सी चिट्ठी लिखी और दर्शन को थमा दी ।
   दर्शन को अपने दोस्त से मिलने जाना था। दोस्त के घर के रास्ते पर ही पोस्ट ऑफिस था जहाँ बाहर लगे लाल डब्बे में उसे चिट्ठी डालनी थी।
    दर्शन देव के साथ ही घर से निकल गया। देव अपनी दुकान पर उतर गया और बाइक दर्शन के हवाले कर दी।
     दर्शन  अपने दोस्त के घर पहुंचने की जल्दबाजी में चिट्ठी भूल गया।  दोनों दोस्त साथ साथ बातें करते घूमते घर से बाहर चले आये। टहलते हुए दोनो ही काफी दूर तक निकल गए।
   श्री कृष्ण मंदिर में भजन चल रहे थे जहाँ दर्शन की माँ भी थी। उन्हें घर की चाबी देने दोनों दोस्त साथ ही अंदर चले गए।
    चाबी प्रीतम ने पहले ही दर्शन को थमा दी थी जिसे दर्शन ने जेब में डाल रखा था।
  जेब से चाबी निकालने में जाने कैसे अनजाने में पारो का पत्र भी बाहर निकल गया। दर्शन के अनजाने ही पत्र हवा में यहाँ से वहाँ उड़ता चला गया।

   चाभी प्रीतम की माँ के हाथ में सौंप वो दोनों बाहर निकल गए।।
   और पारो का लिखा खत हवा में उड़ते हुए इत्तेफाक से वहाँ पहुंच गया जहाँ पहुंचने का वर्तमान में भले ही कोई फल न हो लेकिन इस खत से पारो का भविष्य ज़रूर बदलने वाला था…

       गोविंद बोलो हरि , गोपाल बोलो
         राधा रमन हरि गोविंद बोलो….

  वरुण एक ओर खड़ा मंदिर के पंडित जी से बात करने का इंतेज़ार करते कब खुद भजन में मगन हो गया खुद भी नही जान पाया।
       गीत की धुन में सर हिलाते गाते वो वहीं बैठ गया। एक के बाद एक भजन चलते रहे और वो उनमें रमता रहा कि तभी हवा से उड़ता एक कागज उसकी गोद में आ गिरा।

   साफ सुथरा भले से तह किया हुआ गुलाबी कागज़ उसकी गोद में गिरा फड़फड़ाता रहा।
   वरुण ने धीरे से उसे उठा लिया,लेकिन कागज़ को हाथ में लेते ही उसकी आँखों मे एक पल को कोई सफेद सी आकृति उभर आई।
    एक पल को उसे लगा जैसे उसके सामने कोई सफेद सी आकृति बढ़ती चली आ रही है। लेकिन सामने कोई नही था। ये आकृति बस उसके मन में उभरी थी। सेकंड के आधे हिस्से में ही ये घट गया और वरुण ने चौन्क कर वो कागज़ छोड़ दिया। उसे एक पल को लगा जैसे दिमाग में कुछ चमक सी हुई और फिर सब धुंधला हो गया।
   क्या था ये ? वो सोचता बैठा था कि उसके पास बैठी महिला ने वो कागज़ वापस उसके हाथ में रख दिया…
   वरुण ने वो कागज़ लिया कुछ देर उसे देखने के बाद उसे अपनी जेब के हवाले किया और पंडित जी से मिलने चला गया…

  ” कैसे हो वरुण?  तुम तो हमारी उम्मीद से कुछ ज्यादा ही जल्दी आ गए।”

  अमेरिका से वापस आते ही वरुण मंदिर ट्रस्ट आकर पंडित जी से मिल चुका था। इसलिए वो उसके विचारों और निर्णय से परिचित थे।
    

” बस पंडित जी । अब तय कर लिया है , की मुझे जीवन में क्या चुनना है। “

” गलत सोच रहे हो कि तुमने चुना है। बल्कि उस मुरलीधर ने तुम्हें चुना है अपने मार्ग में ले जाने को।
कुछ तो है तुममें वरुण जो तुम्हें बाकियों से अलग करता है। “

” जी पंडित जी। लेकिन घर वालों का क्या करूँ? वो तो नही समझ रहे।”

” कौन से माता पिता होंगे जो अपनी संतान को जवानी में सन्यास लेने के लिए सहमति देंगे। फिर भी मंदिर ट्रस्ट यही चाहेगा कि तुम पारिवारिक सहमति से ही आओ।

” बहुत मुश्किल है समझाना। अब तो मेरी समझ से बाहर है की मैं  आखिर क्या बोल कर घर वालों को समझाऊँ।”

” कोई बात नही । अभी कुछ समय के लिए उन्हें शांत और संयत होकर सोचने का मौका दो। जब थोड़ा समय गुज़र जाएगा तब धीरे से समझ जाएंगे। और हाँ सुनो हमारे गुरुवर अपने कुछ शिष्यों के साथ केदारनाथ निकलने वाले हैं। चाहो तो उनके साथ चले जाओ। तुम्हे भी बाबा के दरबार में अभूतपूर्व शांति मिलेगी। वहाँ से आने के बाद ट्रस्ट आ जाना। कुछ दिन यहाँ का काम धाम देख लो। तुम्हें सही लगा तब दीक्षा ले लेना। लेकिन पहले अपनी जिम्मेदारियों से मुक्ति पा लो। मन पर कोई बोझ लेकर मत आना।”

“संतान की ज़िम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ माता पिता की तरफ होती है। जितने रुपये जोड़ रखे थे सब उनके नाम कर चुका हूँ। एक छोटी बहन है । उस पर और  और उसके पति पर पूरा विश्वास है कि वो दोनो मेरे माता पिता का पूरा ध्यान रख लेंगे।
  रही बात कादम्बरी की तो मुझे लगता है कि मैं उनके लायक कभी था ही नही। वो मेरी बात जरूर समझेंगी और अपने लिए मुझसे कहीं बेहतर रिश्ता देख लेंगी।”

  पंडित जी को प्रणाम कर वरुण वहाँ से बाहर निकल गया।  उसके सर पर हाथ रखे उन्होंने आशीर्वाद दिया..” चिरंजीवी भव!”

     अगर लंबा जीवन मेरे पास होता तो बात ही क्या थी। मन ही मन सोचता वो घर के लिए निकल गया। उसे पता था अभी जब केदारनाथ जाने की बात वो घर पर कहेगा तब भी बवाल ही होना है। घर पर कोई उसे आसानी से जाने नही देगा लेकिन उसने सोच लिया था की अब वो वहाँ जाकर रहेगा।

  बाहर निकल कर जाने क्या सोच उसने कादम्बरी को फ़ोन कर मिलने बुला लिया।
   
    अक्सर कादम्बरी शहर से बाहर बसे एक छोटे से कॉफी हाउस में उसे लेकर जाया करती थी। वहां के एकांत में आज से पहले कभी भी वरुण कादम्बरी के साथ सहज नही हो पाता था पर आज उसने खुद कादम्बरी को वहीं बुला लिया।
      छोटे से बांस के बने कैफेटेरिया के सामने खुला सा गार्डन था और उसके एक ओर पतली सी नदी बहा करती थी, जिसमें बांस का ही पुल बंधा था।
   हाथ में कॉफी लिए दोनो वहीं खड़े थे…

” तुमसे कुछ बहुत ज़रूरी बात कहनी है कादम्बरी!”

  कादम्बरी ने  वरुण के चेहरे की ओर देखा …

” शादी नही करना चाहते हो ? है ना?”

वरुण आश्चर्य से कादम्बरी की ओर देखने लगा, उसे हमेशा से कादम्बरी के तेज दिमाग पर विस्मय होता था।
  वो मन ही मन उसके तेज़ दिमाग और बुद्धिमता का कायल भी था, जाने कैसे वो बिना कहे भी बहुत कुछ समझ जाया करती थी।
    कादम्बरी की आंखों में देखने की उसकी हिम्मत नही थी… उसने आंखें नीचे कर ली..

” कौन है वो ?

चौन्क कर वो वापस उसे देखने लगा…” कौन?”

” जिसके कारण मुझे छोड़ रहे हो? “

   पुल की रेलिंग थामे वो दूर कहीं देखता खड़ा रहा…

” दूर क्षितिज नज़र आ रहा है तुम्हें, जहाँ ऐसा लग रहा आसमान धरती पर झुक गया है। कितना सुंदर लग रहा है लेकिन अगर मैं इसे पकड़ने जाऊँ तो क्या पकड़ पाऊंगा…

  वरुण की बात सुनती कादम्बरी भी आगे कहने लगी…

” अच्छा नही कर रहे हो वरुण। अगर तुम्हारी ज़िन्दगी में पहले ही कोई और थी तो बताना चाहिए था न मुझे। मेरे पापा से ताऊ जी ने कहा भी की ये परिवार सिर्फ तुम्हारा रुतबा और पैसा देख तुमसे रिश्ता जोड़ रहा है। उन्हें अपनी बेटी भी तो ब्याहनी है। और देखो आखिर वही किया तुम लोगों ने।

” जैसा तुम सोच रही हो वैसा कुछ नही है कादम्बरी।”

” तो कैसा है वरुण बता दो न ? ये सिर्फ तुम्हारी मेरी ज़िंदगी की बात नही है। हमारी जिंदगियों से और भी लोगो का जीवन जुड़ा है। मेरे पापा का राजनैतिक कैरियर है ,उनके नाम पर कैसा बट्टा लगेगा कि उन्ही की बेटी की शादी टूट गयी,वो भी बिना किसी कारण के।”

“ये और किसी की नही सिर्फ मेरी ज़िन्दगी की बात है। कैसे बताऊँ कादम्बरी की मेरे पास ज्यादा समय ही नही बचा है। तुमसे शादी कर के भी तुम्हारा साथ जीवन भर तो निभा नही पाऊँगा, इससे कहीं अच्छा है मैं अपनी ज्ञान की प्यास ही बुझा लूँ।
     जितनी सांसे बची हैं उन्हें कृष्ण समर्पित कर दूं। “

  इतना सब मन मे सोचते हुए भी वरुण कुछ बोल नही पाया। बस दूर कहीं देखता खड़ा रहा।
    कादम्बरी का कुछ न कुछ कहना चालू था। उसे सबसे ज्यादा फिक्र अपने करियर की थी। लोग क्या सोचेंगे, आज तक जाने कितनी तस्वीरें वो सोशल मीडिया पर डाल चुकी थी। उसे जानने और न जानने वाले भी उसके और वरुण के रिश्ते के बारे में अच्छे से जानते थे । अब इस तरह से एकदम से वरुण का कदम पीछे हटा लेना उसके लिए झटका ही था।।
    वो मन ही मन यही सोच रही थी कि सोशल मीडिया पर सगाई टूटने की एनाउंसमेंट डालते ही वो ट्रोलर्स से कैसे बचेगी?
   वैसे भी सोशल मीडिया आजकल ट्रोलर्स और रोस्टर्स का ही अड्डा बन चुका है। किसी के साथ कुछ गलत होने का रास्ता ही देखते बैठे रहतें हैं ये लोग। उसके भी तो जाने कितने दुश्मन थे ज्यादातर तो सामने से दोस्त बन पीछे छुरा घोम्पने वाले थे। वो जानती थी कि उसकी सगाई टूटने से ये लोग खुशी से बरसाती मेढ़क से उछलने लगेंगे।
    दूसरी तरफ वरुण की अलग परेशानी थी। वो अपनी तबियत की बात कादम्बरी को बता देना चाहता था लेकिन फिर कादम्बरी और उसके परिवार वाले न जाने क्या निर्णय लेते।
   ज़रूरी तो नही की एक बीमार लड़के से वो अपनी बेटी को ब्याहना पसंद करतें।
   एक बार प्रज्वल ने अमेरिका में उससे कहा भी तो था–” क्यों अपने ऑपरेशन को लेकर इतना चिंतित है? एक बार अपने ससुर से बोलेगा तो वो पैसे की झड़ी लगा देंगे। “

” नही यार ! पहला तो मुझे उनका एहसान नही लेना है। दूसरी बात चल मैंने कह भी दिया उनसे और कहीं ये पता चलते ही कि मैं बीमार हूँ उन्होंने खुद अपने कदम पीछे हटा लिए तब?
    उस वक्त तो मैं और टूट जाऊंगा। अभी कम से कम खुद रिश्ते से मना करने में वो हीनभावना तो नही है जो उनके कदम पीछे हटाने से आ जायेगी। ”

  वरुण ने जाने कितनी बार इस बात पर सोचा था और आखिर उसने यही निर्णय लिया था कि अब वो अपनी बची खुची ज़िन्दगी कृष्ण समर्पित कर देगा। उस ज्ञान को पाने पढ़ने और जानने में अपने जीवन का बाकी बचा समय लगा देगा जिसकी खोज में बड़े बड़े लोग भटक चुके हैं।
  
     वो चुप खड़ा खुद में खोया सा था कि कादम्बरी ने उसके हाथों से कॉफी का खाली कप ले लिया।

” अगर तुम्हारी बात पूरी हो गयी हो तो वापस चलें ? “
.
  बिना वरुण की ओर देखे ही कादम्बरी तेज़ कदमों से अपनी गाड़ी की ओर बढ़ गयी….
   वो भी धीरे धीरे कादम्बरी के पीछे चलता अपनी गाड़ी तक पहुंचा ही था कि कादम्बरी ने गाड़ी स्टार्ट की और एक पल में हवा से बातें करती उसकी गाड़ी आंखों से ओझल हो गयी।

   भारी मन से वरुण भी अपने घर निकल गया।
रात में खाना बाहर से खा कर आ चुका है का बहाना बना कर वरुण नीचे ही नही उतरा।।
  उसकी किसी की ओर देखने की हिम्मत ही नही थी।
अपने कमरे का दरवाजा बंद किये वो बालकनी की रेलिंग पकड़ कर खड़ा दूर फैली रोशनियों को देख रहा था।
    अचानक उसे मंदिर में मिला वो कागज़ याद आ गया। आखिर क्या था उस कागज़ में जो उसे हाथ में लेते ही उसकी आँखों में एक धुंधली सी तस्वीर उभर आई थी। और कौन थी वो लड़कीं जो उसकी तरफ बढ़ती चली आ रही थी।
    वरुण ने तुरंत अपनी जीन्स की पॉकेट से वो गुलाबी सा कागज़ निकाला और पढ़ने लगा…..

  ” प्यारी ज़ोइता !!

  कैसी है तू? अच्छी ही होगी। मुझे पता है खूब बेरियां खाती होगी और काकी से छिप कर अंग्रेज़ी किताबें चित्र देख देख कर पढ़ने की कोशिश करती होगी।
    अच्छा सुन ,सबसे पहले तो तुझे खुशखबरी देने के लिये ये चिट्ठी लिखी है।
  मैं दंसवी कक्षा में पूरे जिले में प्रथम स्थान पर आई हूँ और अब मेरे ससुराल वाले मुझे आगे पढ़ने के लिए मान भी गए हैं।
पहले तो सब नाराज़ थे पर मेरे दूल्हा बाबू ने सबको मना लिया।
  देव बाबू सच बहुत अच्छे हैं जोई। इतने अच्छे की मैं तुझे बता नही सकती। मेरी सारी बातों का ध्यान रखतें हैं। कभी झगड़ा नही करते। बहुत मीठा बोलतें हैं लगता है जैसे शहद उनकी जीभ पर रखा हो। मेरा देवर है ना दर्शन मुझे अब उसके साथ ही स्कूल जाना रहेगा। वो गणित लेने वाला है लेकिन मैं तो जीव विज्ञान ही लुंगी। मुझे तो बचपन से पेड़ पौधे जीव जंतुओं के बारे में जानना पढना खूब पसंद है। तू तो जानती ही है।
   यहाँ सभी बहुत अच्छे हैं।  ठाकुर माँ ने मुझे बुलाकर एक बहुत पुरानी सी कलम भेंट की। उन्होंने कहा ये उनके पिता की पेन है मैं इसे संभाल रखूं।
   जोई अब लगता है मेरे बाबा का सपना ज़रूर पूरा हो जाएगा।
    तुझे याद है माँ हमेशा कहतीं थीं कि बाबा का डॉक्टरों ने सही इलाज नही किया और इसलिए बाबा हमेशा अपनी बीमारी और तकलीफ में यही कहते थे कि अपनी बेटी को बहुत अच्छा डॉक्टर बनाएंगे। बस तभी से ये सपना मेरी भी आंखों में बस गया था और अब लगता है पूरा भी हो जाएगा।
    दर्शन तो कहता है डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए पहले एक इम्तिहान होता है अगर उसमें पास हुए तभी डॉक्टरी करने मिलता है वरना नही।और कहता है ग्यारहवीं से ही उस तैयारी में जुट जाना चाहिए। जब मैंने अपने मन की ये बात की मैं डॉक्टरी पढना चाहती हूँ देव बाबू को बताई तो वो भी खुश हो गए। वो तो जाने कहाँ कहाँ से मोटी मोटी किताबें भी ले आएं है जोई।
   तुझे तो मालूम ही है किताबें मेरा जीवन हैं।
पता है एक दिन मैंने सारी किताबे बिस्तर पर बिछा ली और ज़मीन पर बैठी घंटो उन किताबो में सर रखे बैठी रही। ऐसा लग रहा था बाबा की गोद मे सर रखे बैठी हूँ।

  अब लगने लगा है जोई कि कृष्ण मेरी बात सुन रहें है  समझ रहें हैं। और मेरे कृष्ण मुझे डॉक्टर बनने का अवसर ज़रूर देंगे। बस अब खूब मेहनत  में जुटना है।तू भी अपना ध्यान रखना!
    मैं जल्दी ही आऊंगी तुझसे मिलने। और हाँ मुझे माँ से पता चला कि तेरी शादी भी तय हो गयी है। तेरी शादी में तो पक्का आऊँगी। खूब धमाल करना है। खूब नाचूंगी मैं तो अपनी ज़ोइता की शादी में।
  अब लिखना बंद कर रही हूँ। नीचे से सासु माँ के पुकारने की आवाज़ आ रही है।
  ये पत्र मिलते ही तू इसका जवाब देना। और खुद लिख कर देना मैं तेरी लिखावट का मज़ाक नही उड़ाऊंगी।
   खूब सारा प्यार मेरी प्यारी जोई
        तेरी
           पारोमिता ….

क्रमशः




समिधा – 17





     समिधा –17



     पारो ने कादम्बरी को देखने के लिए अपने एक ओर निगाहें डाली तो उसकी नज़र पास बैठे वरुण पर पड़ गयी और उसे अचानक उस शाम मंदिर के बाहर मिली वो जोड़ी याद आ गयी। द्वारिकाधीश और सत्यभामा की जोड़ी!
    पारो के चेहरे पर मुस्कान चली आयी… “आखिर सत्यभामा तो सत्यभामा ही रहेगी”

   पारो की गुनगुनाहट बहुत धीमी थी लेकिन वरुण के कानों तक पहुंच ही गयी..

” सॉरी ! आपने कुछ कहा? “
 
  उसने पास बैठी पारो से पूछ ही लिया, और ना में सर हिला कर पारो दूसरी साड़ियों की ओर देखने लगी।

   पारो के हाथ से लूटी साड़ी को फिर कादम्बरी ने वापस नही किया। पारो ने उससे मिलती जुलती साड़ी ढूंढने की कोशिश भी की लेकिन फिर उस साड़ी का कोई दूसरा रंग नही मिला।
    देव ने बहुत सुंदर सी दो साड़ियां पारो के लिए पसन्द की, लाली और घर भर की औरतों के लिए उनकी पसंद की साड़ियां लेकर तीनों घर के लिए निकल गए।
   
    कादम्बरी भी रोली के साथ शॉपिंग में मगन थी लेकिन वरुण के मन में जाने क्यों अजब सी बेचैनी सी उठने लगी।
   उसने एक बार पलट कर जाते हुए देव और पारो को देखा भी , इसने सोचा इन्हें एक बार आवाज़ दे कर रोक लूँ लेकिन फिर वो लोग क्या सोचेंगे यही सोच कर वो चुप बैठ गया।
    उसे खुद समझ नही आ रहा था कि उन दोनों अनजान जोड़े को देख उसके मन में इतनी ममता क्यों उबल रही थी। क्यों अचानक उसे उन दोनों की फिक्र सी होने लगी थी।
   मन ही मन हाथ जोड़ उसने कान्हा जी को प्रणाम किया… ” मुरली वाले उन दोनों की रक्षा करना”

” क्या हुआ? ये आंखें बंद किये क्या बड़बड़ा रहे हो? “

  कादम्बरी की आवाज़ पर उसका ध्यान टूट गया…
वरुण चौन्क कर कादम्बरी को देखने लगा..

” कुछ नही ! चलों घर चलें..”

” घर क्यों? हमें कुछ ख़िलाने पिलाने का इरादा नही है क्या? “

वरुण हंसते हुए उंगली में गाड़ी की चाबी घुमाते आगे बढ़ गया…

” महीने के पच्चीस दिन तो तुम डाइट फ़ूड खाती हो, आखिर तुम्हें खिलाना भी चाहूं तो क्या खिलाऊँ? “

   वरुण के साथ ही रोली और कादम्बरी भी आगे बढ़ गईं।

*********


    शादी की तैयारियों के साथ ही तीन दिन पलक झपकते बीत गए।
    घर से सभी लोग एक दिन पहले ही विवाह स्थल पर पहुंच चुके थे। सारा सामान भी लगभग ले जाया जा चुका था फिर भी अलग अलग नेगचार पूजा पाठ के वक्त कोई नई चीज याद आ जाती और वरुण को विवाह स्थल से घर भागना दौड़ना पड़ ही जाता था।
       विवाह के दिन सुबह से सभी लोग व्यस्त थे। मातृका पूजी जा चुकी थीं। दुल्हन को चढ़ने वाली तेल हल्दी निपटा कर उसकी रिश्ते की भाभियां उसे स्नान के लिए लेकर जा चुकी थीं।
   दुल्हन के साथ ही उसके माता पिता का भी व्रत था। और वरुण जूस का गिलास हाथ में लिए कमरे में जा रहा था कि उसे कमरे के अंदर से अपने पिता की चिंता भारी आवाज़ सुनाई दी।

” अब तक तो तिलक की राशि पच्चीस ही बोले थे ,अब अचानक पांच बढ़ा दिए। ऐसे कहेंगे तो कैसे होगा बंटी की माँ ? “

“कुछ न कुछ हो जाएगा जी। आप चिंता न करें। “

” कैसी बात करती हो? चिंता नही करें तो क्या करें बताओ? दोपहर का दो बजे चुका है , छै सात बजे तक द्वार पर बारात लग जानी है , उन्होंने साफ कह दिया है , द्वारचार में पांच लाख दे दो तभी लड़का अंदर कदम रखेगा ब्याह के लिए वरना बारात वापस लौट जाएगी।”

  वरुण सारी बातें सुनता भीतर पहुंच गया …

” ये क्या कह रहे हैं आप पापा? ये सब कब तय हुआ?

अपना सर पकड़ के बैठे वरुण के पिता उसे आया देख चौन्क गए। उसने आगे बढ़ कर उनके हाथ मे जूस का ग्लास थमाया और वहीं उनके पास बैठ गया…

“आप निश्चिंत रहें, मुरली वाला सब देख रहा है और वही सब ठीक करेगा!”

  वरूण की माँ आश्चर्य से उसे देखने लगी, उन्हें खुद को देखता पाकर वो मुस्कुरा उठा..

“मैं सच कह रहा हूँ , आप पूरे भरोसे के साथ एक बार सब कुछ उन पर छोड़ कर तो देखिए, मैं सच कहता हूँ कोई न कोई उपाय तो निकल ही आएगा।
  लीजिये सबसे पहले जूस पी लीजिये, तन में कुछ ठंडक पहुंचेगी तब मन मे भी राहत महसूस होगी न।


” उसकी मर्ज़ी के बिना तो पत्ता भी नही हिल सकता, फिर आपकी और हमारी हैसियत ही क्या हुई भला? आप विश्वास रखिये पापा भगवान ज़रूर रक्षा करेंगे और कोई न कोई उपाय ज़रूर निकालेंगे। अब तक भी तो उन्होंने ही रास्ता दिखाया है आगे भी दिखाएंगे। आप को हो न हो मुझे उन पर उनकी शक्ति पर पूरा भरोसा है।

उसकी बातें सुनते दोनों खो से गये। अपने आंसू पोंछ वरुण के पिता उसकी ओर देखने लगे..

” कैसे होगा बंटी? मेरी तो समझ से परे है? तूने पंद्रह का ऑफ़िस से लोन उठा लिया, मैंने मेरी जमापूंजी लगा दी, अब आखिर दो तीन घण्टो बस में पांच लाख कहाँ से लाऊं? अभी इस वक्त किसी से मांगना भी तो अच्छा नही लगेगा।
  पहले मालूम होता तो इतना सब जो समान खरीदा है वो नही लेते। इन्हें कार भी चाहिए और कैश भी।बताओ हमारे लिए ये कैसे संभव है?

  उन लोगों की बातें चल ही रही थीं कि बाहर से किसी ने आवाज़ दी और भीतर चला आया….
    वरुण का दोस्त अबीर था …

” यार बंटी यहाँ क्या कर रहा है?  चल बारात की तैयारी भी देखनी है, जनवासे का काम पड़ा है। वहाँ अभी तक इस्त्री वाला नही पहुंचा है। कोल्डड्रिंक का क्रेट भिजवा दिया है मैंने,  नाश्ता भेजना बाकी है।”

   अबीर के आते ही वरुण और उसके माता-पिता का ध्यान अबीर पर चला गया अबीर के कहे शब्दों में ध्यान जाते ही वरुण को जैसे एकदम से होश आया कि अभी कुछ घंटों में ही उसकी बहन की बारात आने वाली है वह उठकर तुरंत अबीर के साथ बाहर निकल गया।

    अबीर और वरुण ने साथ ही पढ़ाई की थी, वो भी सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और एक बड़ी एम एन सी में अच्छे खासे पैकेज पर काम कर रहा था।
   वरुण के अमेरिका से लौटने के दिन से वो छाया की तरह वरुण के साथ जी जान से काम में जुटा था। वरुण को अबीर पर खुद से कहीं अधिक भरोसा था।

   दौड़ भाग में समय बीतता चला गया और बारात दरवाज़े आ लगी।
   नाचते झूमते बाराती द्वार से कुछ पहले ही खड़े नाचते रहे। घंटे भर के नागिन डांस की समाप्ति के बाद समधी भेंट को आगे चले आये।
    दूल्हा बाबू की पूछ मचने लगी। लेकिन वर के पिता ने कार के दरवाजे पर आकर खड़े वरुण को हाथ से ठेल कर दूर कर दिया…

” गाड़ी का दरवाजा तब तक नही खुलेगा, जब तक बाकी रकम आप दे नही देते। “

  वरुण के चेहरे का रंग उड़ गया। कैसा लोभी आदमी था। मात्र पांच लाख के लिए अड़ गया और अपने बेटे को कार से नही उतरने दिया। अरे जब पच्चीस दे दिए तो पांच क्या चीज़ है। उतना बचा के हम कौन रईस हो जाएंगे। यही सब सोचते वरुण कुछ कहने जा रहा था कि वरुण के पिता गिरते पड़ते समधी के सामने हाथ जोड़ खड़े हो गए….

” जब इतना किया है तो यहाँ काहे चूकेंगे समधी जी। आप थोड़ा वक्त तो दीजिये। हम अभी इंतज़ाम किये देते हैं।”

” अभी इंतजाम किए देते हैं इसका मतलब अब तक इंतजाम नहीं किया? मिश्रा जी हम कब से आपको बता चुके थे फिर आप काहे रस्ता देख रहे थे? का सोचे कोई चमत्कार हो जाएगा और हम भूल जाएंगे अरे इक्के एक लड़का है हमारा। छब्बीस साल पाले पोसे हैं उसको अब अगर उसका ब्याह में हम कोई नेग नावर न मांगे तो ये सोहाता है क्या हमको।
  अब आप भी लड़का का बाउजी है। कित्ता बड़ी जगह हाथ मारें हैं आप। आप के समधी को बोलेंगे तो अभी रुपया का नदी बहा देँगे और आप महज़ पांच लाख के लिए इतना सोच रहे । ”

” सॉरी अंकल लेकिन हमने दहेज कभी नही मांगा!”

वरुण की बात सुन वो थोड़ा और भड़क गए..

” दहेज तो हम भी नही मांग रहे। ये तो प्यार से एक बाप का बेटी को दिया तोहफा है। अब रोज़ रोज़ बेटी यहाँ अपने बाप के घर तो आएगी नही। तो एक बार मे उसको मन भर तोहफा देने में का हर्ज है बताइये।”

” तोहफा अपनी मर्ज़ी से दी जाने वाली चीज़ है, इसे मांग कर या छीन कर नही लिया जाता। और आप थोड़ा संयम रखें हम लोग कोशिश करते हैं फेरो  से पहले कुछ इंतज़ाम हो जाये।”

” पागल समझे हो क्या हमको ?एक बार लड़का गाड़ी से उतरकर फेरों तक पहुंच गया उसके बाद वहां से उसको उठाकर ले जाना बहुत मुश्किल है इसीलिए हम कहे दे रहे हैं पांच लाख दे दो और लड़का ले लो। वरना हम जो कल तुम तिलक चढ़ाए रहे वो भी साथ लेते आये हैं कि तुम्हारे मुहँ मार कर वापस लौट जाएंगे।”

” आपका लड़का कोई आलू टमाटर है जो पांच लाख दें और आपका लड़का ले लें।”

  बाहर चलती बातचीत किसी ने जाकर दुल्हन के कान में फूंक दी, दहेज की बातों से अनजान रोली हैरान सी भागती बाहर चली आयी। यहाँ पीछे छिप कर खड़ी अपने भावी ससुर और अपने पिता भाई की बातचीत सुनती रोली की आंखों में आंसू चले आये।
    अपने होने वाले ससुर के लालची स्वभाव पर अधिक क्रोध करे या अपने होने वाले पति के नीरव स्वभाव पर , यही सोचती वो बीच में कूद पड़ी। उसकी कही बात ने उसके होने वाले ससुर के क्रोध में घी का काम किया।

” ये दुल्हन यहाँ क्या कर रही है। मिश्रा जी कहिये अपनी बिटिया से मर्दों के बीच बोलने की ज़रूरत नही है इसे। चुपचाप अंदर जाकर बैठे और फेरों की प्रतीक्षा करें। “

” अच्छा अब समझी , तो ये मर्दों की बातचीत हो रही इसलिए शायद आपका बेटा मुहँ में टेप चिपकाए चुपचाप गाड़ी में बैठा है। क्यों ठीक कहा न! “

  समधी की मांग से पहले ही परेशान वरुण के पिता इस तरह से रोली के वहाँ आ जाने से हैरान परेशान अपना सर थामे वहीं जमीन पर बैठ गए। उन्हें लगने लगा कि जो बात वो धीमे से कह कर सुल्टा सकते थे अब रोली के आ जाने से और उलझ गई थी। उन्हें अपने सीने में कुछ भारीपन सा महसूस होने लगा था।
वरुण कभी अपने पिता को देखता कभी रोली को देखता मन ही मन अपने आराध्य को आवाज़ देने लगा। ” प्रभु अब तो आ जाओ। रक्षा करो हम सब की। किसी भी रूप में आओ पर एक बार आ जाओ मुरलीधर !”
   रोली की तीखी बात कान में पड़ते ही समधि जी बुरी तरह से बिफर उठे…

” यही संस्कार दिए हैं मिश्रा जी अपनी लड़कीं को। सरे आम मर्दों के बीच आकर अपने होने वाले पति को क्या कुछ कह गयी।”

“होने वाला पति है ,अब तक हुआ नही है। और एक बात कहुँ अगर मुझे पहले पता होता कि यहाँ मुझसे ब्याह करने के बदले रुपये या दहेज दिया जा रहा है तो मैं कभी इस शादी के लिए हाँ नही कहती।वरुण भैया अपने भी मुझे पराया कर दिया, कुछ नही बताया।”

” रोली घर वर अच्छा था तो तुझे ये सब बताने की ज़रूरत ही नही…”

  वरुण की बात आधे में काट रोली बोल पड़ी…

” कैसा अच्छा घर वर भैया? घर ऐसा है कि द्वारचार रोक कर समधि अपने समधि से दहेज़ मांग रहा है।और वर ऐसा है कि अपनी आंखों के सामने गलत होता देख कर भी आंख कान बंद किये बैठा है। इसी घर वर के लिए आपने इतने रुपये बहा दिए भैया?बोलिये न कितना दे चुके है अब तक?”

वरुण या किसी और से कुछ भी कहते नहीं बना सभी आश्चर्य से रोली के पराक्रम को देख रहे थे उसके होने वाले वर की भी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वह गाड़ी से निकलकर अपने पिता की बात को काट सके कुछ हद तक शायद वो रोली की बात से सहमत था बावजूद अब उसके पास बोलने को कुछ नही बचा था।

“माफ कीजियेगा मिश्रा जी लेकिन अब ये ब्याह नही हो सकता।”

  वरुण के पिता ने आंखों में आंसू लिए उनके पैर पकड़ लिए..

” ऐसा मत कहिये समधि जी ! बच्ची है ये नादान है। नही जानती क्या बोल रही है। पर हम तो बड़ें हैं हमारा काम तो बिगड़ी संवारना है। “

” हमने कोई ठेका नही ले रखा है आपकी बिगड़ी संवारने का । जो जितना संवर सकता था संवर गया। आपकी बेटी ने खूब नाम उछाल दिया है मिश्रा जी। अब इस लड़की को घर की बहू बना कर क्या जीवन भर इसके ताने सुनेंगे हम ? और हम क्या हमें तो लगता है अब समाज का कोई बिरला ही ऐसा घर और लड़का होगा जो आपकी शहजादी को ब्याहेगा। पढ़ाई लिखाई अपनी जगह है मिश्रा जी लेकिन लड़की
को इतनी आज़ादी भी मत दे डालिये की अपना अच्छा बुरा सोचे बिना कुछ का कुछ कर जाए। “

” सलाह के लिए धन्यवाद अंकल जी। आप क्या मुझसे शादी से मना करेंगे मैं ही आपके गूंगे बेटे से शादी करने से इनकार करती हूँ। रही बात समाज के ठेकेदारों की तो जिन्हें मैं गलत और आप सहीं लगतें हैं उन घरों में मुझे ब्याह कर के जाना भी नही है।
  और एक बात , आप चुपचाप ऐसे ही बारात वापस नही ले जा सकते। इसके पहले तिलक में जो भी राशि आपको दी गयी थी वो भी सब वापस दीजिये और फिर जाइये यहाँ से।”

” हद करती है ये लड़की। ए छोकरी खुद को समझ क्या रखा है? तू जानती नही कौन हैं हम…अब देखतें हैं समाज का कौन सा घर है जो तुझे ब्याह कर ले जाएगा? अब किस भले घर का लड़का तुझसे शादी करने को तैयार होता है देखता हूँ मैं? “

” माफ कीजियेगा , ये आप लोगों का पारिवारिक मसला है, लेकिन वरुण अगर तुम और तुम्हारे घर के लोग इजाजत दें और रोली की मर्ज़ी हो तो क्या मैं रोली से शादी कर सकता हूँ।”

  अब तक बातें जिस तरह से बिगड़ती चली जा रहीं थीं अबीर की बात ने जैसे मौसम बदल दिया था। अब तक वहाँ उपस्थित लोगों की निगाहें जहाँ रोली और उसके होने वाले ससुर पर टिकी थीं अब अबीर की ओर मुड़ गयीं…
   वरुण अपने पिता को सहारा दिए खड़ा था, उसकी आंखें आश्चर्य से चौड़ी हो गईं
   अबीर उसी के साथ पढ़ा था, उसके माता पिता थे नही। उसकी बुआ ने ही उसे पाला था , जो गांव रहा करती थीं। पढ़ाई के समय होस्टल में रहने वाले अबीर ने नौकरी लगने के कुछ समय बाद लोन लेकर अपना घर गाड़ी सब धीरे धीरे ख़रीद लिया था। ऐसा गुणी और विवेकी लड़का वरुण ने आज तक नही देखा था फिर भी जाने क्यों उसके दिमाग में कभी ये बात नही आई कि रोली की शादी अबीर से भी तो की जा सकती है।
    उसने अपने पिता की ओर देखा। आंखों ही आंखों में दोनो  ने परस्पर विमर्श कर लिया और वरुण ने आगे बढ़ कर अबीर के हाथ पकड़ लिए। वहीं से वरुण ने एक नज़र रोली को देखा, वो खुद अचरज में डूबी कभी अबीर तो कभी वरुण को देख रही थी, लेकिन रोली की उन आंखों में अबीर के लिए अवमानना या अवहेलना नही थी। उन आंखों में एक मौन था एक स्वीकृति थी । वरुण के मन में भावों की हिलोर उठने लगी, गला रुन्ध जाने से वरुण कुछ कह नही पाया और उसने अबीर को गले से लगा लिया।
 

   वहाँ होती जाती घटनाओं को अंदर से बैठे देखते दूल्हे ने जाने क्या सोचा और गाड़ी खोल दूल्हा नीचे उतर आया, साथ में पकड़ा पैसों का ब्रीफकेस वरुण के हाथ रख उसने वरुण के सामने हाथ जोड़े और अपने पिता का हाथ पकड़ वो गाड़ी की ओर ले गया” और कितनी इज्जत उतरवाएँगे आप पापा। अब चलिए यहाँ से।”

उन्हें गाड़ी में एक तरह से ठूंस कर वो अपने साथ ले गया….
 
  बारात जैसी धूमधाम से आई थी उतनी ही शांति से बिना दुल्हन और फेरों के विदा हो गयी। लेकिन विधि ने रोली के लिए अगर ब्याह का यही मुहूर्त तय कर रखा था तो इसी मुहूर्त पर उसका ब्याह होना ही था।

   बारात के विदा होते ही, अबीर को साथ लेकर वरुण अंदर चला गया। कमरे में रोली और अपने माता पिता से चर्चा कर सबकी सहमति से रोली और अबीर का ब्याह सम्पन्न हो गया।
    सब कुछ अच्छे से निपटते ही वरुण रोली की विदाई की तैयारियों में लग गया।
    उसने अबीर से एक किनारे ले जाकर रुपयों से भरा बैग उसके हाथ में रख दिया…

” अबीर बुरा मत मानना दोस्त! लेकिन ये रुपये रोली के नाम के हैं तो अब ये तुम्हारे हुए । हो सके तो ये छोटी सी भेंट स्वीकार लो।”

” सारा लफड़ा ही इन रुपयों के कारण था और दोस्त तुम अब भी इन्ही रुपयों  के चक्कर में फंसे हो। मैं इनमें से एक रुपया भी नही ले सकता। और वैसे भी तुमने ये रुपये अपने ऑफिस से लोन में लिए थे न, वापस कर देना। तुम्हारा बोझ भी उतर जाएगा और मेरा आत्मसम्मान भी नही डिगेगा।”

    अबीर की बात सुन वरुण ने उसके सामने हाथ जोड़ दिए । उसके हाथों को अपने हाथों में ले वरुण को अबीर ने गले से लगा लिया।
   सारे नेगचार निपटा कर अबीर के साथ रोली की बिदाई हो गए। उसके पीछे एक एक कार मेहमान भी बिदा होते चले गए।
   पीछे से बचे घर के कुछ करीबी सारा सब समेटने में लगे रहे।
   थोड़ी देर में वरुण का ध्यान रुपयों के उस बैग पर चला गया।
    ब्रीफ़केस पर ऊपर एक तरफ मुरली बनी हुई थी…
उस मुरली को देखते ही वरुण के चेहरे पर मुस्कान चली आयी…
  “मैं सोच रहा था कि अगर मंदिर ट्रस्ट में चला जाऊंगा तो नौकरी छोड़नी पड़ेगी और तब लोन कैसे चुकाऊंगा। और तुमने ऐसे मेरी समस्या का हल निकाला प्रभु।
   रोली का ब्याह भी हो गया और ये रुपये भी रह गए। ये कैसी माया रचते हो प्रभु। अपने मनोरंजन के लिए हमारी दुनिया में इतने गोल गोल चक्कर डाल देते हों कि साधारण इंसान उलझ कर रह जाता है और फिर खुद उस बवंडर में हमारा हाथ पकड़ हमें बाहर  निकाल लेते हो।
  वाह रे भगवान तुम और तुम्हारा संसार !!
अब तुम्हें पूरी तरह समझने आना ही पड़ेगा मुझे तुम्हारे रचे संसार को तज कर तुम्हारी शरण में…..

क्रमशः

aparna….
   

 
.



    
  
 



        

समिधा- 16

समिधा –16




       माँ से बात करने के बाद वरुण के मन का बहुत बड़ा बोझ हट चुका था।
    वो शांत मन से मंदिर की ओर निकल गया….

   हमारे देश की तरह वहाँ मंदिर सुबह शाम दोनो वक्त खुलता हो ऐसा नही था। उस मंदिर के पंडित मंदिर ट्रस्ट की तरफ से रखे गए थे, जो अक्सर सुबह ही लंबे समय के लिए मंदिर खोला करते थे। शाम को सिर्फ एक से डेढ़ घंटे में वो मन्दिर बंद कर दिया करते थे। इस बात की अनभिज्ञता के कारण वरुण मंदिर की ओर बढ़ चला, उसकी किस्मत से मन्दिर खुला था।

   वो मंदिर पहुंचा, आसपास के कुछ लोग मंदिर में थे। कान्हा जी आज कुछ विशेष साज सज्जा में थे। उनका पूरा श्रृंगार फूलों से किया गया था। सफेद पीले फूलों से सिर्फ उनकी मूर्ति ही नही उनके आसपास का पूरा परिवेश सजा था।
  मूर्ति इतनी सजीव लग रही थी कि वरुण उस मूर्ति को देखता खो गया।
   कान्हा जी के सामने हाथ जोड़े वो अपलक उनके नेत्रों को देखता रहा, उसे ऐसा भान हुआ कि उसे देखते हुए कान्हा जी मुस्कुरा रहें हैं।
   वो भी उन्हें  देख मुस्कुरा उठा और उसके होंठ स्वयं उनकी प्रार्थना में लग गए।।
  पंडित जी उसे देख मुस्कुराने लगे..

” पंडित जी आपसे एक सवाल करना चाहता हूँ, अगर आप चाहें तभी जवाब दीजिएगा?”

“बिल्कुल मैं नही चाहूंगा तब भी कोशिश करूंगा कि तुम्हारी शंका का समाधान हो सके।

” पंडित जी कभी कभी ऐसा लगता है जैसे कान्हा जी मेरे साथ ही हैं , कहीं आसपास। भले ही उन्हें देख नही पाता तब भी। लेकिन कभी लगता है क्या वाकई इनका कोई अस्तित्व है?”

” शंका का कोई समाधान नही है
   चरित्र का कोई प्रमाण नही है
   मौन से बेहतर संधान नही है
   और शब्दों से तीखा कोई बाण नही है।

  यानी जब तक भगवान के अस्तित्व का तुम्हें पूर्ण रूप से विश्वास न हो तब तक किसी भी तरीके से कोई तुम्हारा समाधान नही कर सकता…

पंडित जी अभी अपनी बात कह ही रहे थे कि वरुण ने बीच में ही उनकी बात काट दी और अपनी बात रख दी …

” पंडित जी मैं धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहता हूँ। जिस तरह बुद्ध ने सत्य की तलाश के लिए संसार से विरक्त होकर कठिन तप किया ,में भले ही वैसा न कर पाऊं लेकिन ईश्वर क्या है, ब्रम्ह क्या है सत्य क्या है ये सब जानने के लिए मुझे भी सांसारिक प्रपंचों को त्यागना होगा ,और मैं इसके लिए तैयार हूँ।”

” संसार को त्याग कर , उसके परपंच त्याग कर संसार बनाने वाले को खोजने चला है? अरे वो तुझे इसी संसार में मिल जाएगा, आंखे बस खुली रख। “

   वरुण की बात उसी समय मंदिर में प्रवेश करते स्वामी जी ने सुनी और उसकी बात का जवाब दे पड़े। उनकी बात सुन वरुण पीछे पलट कर उन्हें देख सोच में पड़ गया। उसके सर पर हाथ रख स्वामी जी आगे कहने लगे…

“तू चाहता है तो कुछ समय के लिए मंदिर ट्रस्ट में आ जा। तुझे पूजा अर्चना भाव भक्ति तप साधना सब कुछ पास से देखने  और जानने का मौका मिल जाएगा।
   उसके बाद अगर तुझे लगता है कि तू सांसारिक मोह माया के लिए नही बना है तभी पूर्ण स्वेच्छा से दीक्षा ग्रहण करना।
  क्योंकि हम किसी के गले पर कटार रख कर उसे अपने धर्म में शामिल नही करना चाहते। और वैसे भगवान धर्म कर्म जात पांत से कहीं ऊंचा है, ये उसकी भक्ति और स्मरण से तुझे खुद ज्ञात हो जाएगा।
   जो पूर्ण तल्लीनता से उसे याद भी कर लेता है, उसका फिर हाथ पकड़ कर वो भक्तिरस के काननकुंज की ऐसी सैर करवाता है कि उसमें फिर डूबे रहने का ही मन करता है, उससे उबरने का फिर जी ही नही चाहता..
    हरे कृष्ण हरे कृष्ण! कृष्ण कृष्ण हरे हरे!

  स्वामी जी अपनी बात पूरी कर कृष्ण धुन में लीन हो गए, उनके पीछे खड़े अनुयायी भी उनके साथ कृष्ण धुन में मगन खड़े खड़े ही अपने हाथ ऊपर किये गाने लगे।
  वरुण को भी पता नही चला कब वो खुद उसी धुन में मगन घंटो तक “हरे रामा हरे कृष्णा !कृष्णा कृष्णा हरे हरे” बोलों को गाता रहा।

    भजन पश्चात स्वामी जी अंदर जाने लगे तब वरुण ने आगे बढ़ कर उनके पैर पकड़ लिए…

” स्वामी जी मुझे अपनी शरण मे ले लीजिए प्लीज़!”

” तू तो अभी जवान है, शादी भी नही की लगता है? फिर क्यों सन्यासी बनना चाहता है?”

” शांति की तलाश है स्वामी जी , जो सिर्फ यही इसी मंदिर में पूरी होती है। “

” बहुत कठिन तो नही हैं, लेकिन कुछ नियम हैं जो पालन करने पड़ेंगे। कर पायेगा?”

” जी ! कर लूंगा। “

” अरे पहले सुन तो ले। मांस मछली नही खा पायेगा, शराब सिगरेट सब छोड़नी होगी। मंदिर में रहेगा तो यहीं का सादा भोजन खाना पड़ेगा बिना प्याज़ लहसन वाला।
   हर तरह के व्यसन त्यागने होंगे, जुआं, सट्टा शेयर मार्किट ये सब बंद।
  रोज़ स्वध्याय के लिए कम से कम एक घंटा निकालना ही होगा जिसमें वेद पुराण उपनिषदों का अध्ययन करना होगा । पर स्त्री/ पर पुरुष के लिए किसी भी प्रकार से मन में कोई कुविचार नही आना चाहिए।
   बोल यह सब त्याग पायेगा।
कहने को हमारे नियम आसान हैं लेकिन हर कोई इनका पालन कर पाए ये आवश्यक नही इसलिए हम लोग किसी से नही कहते कि हमारे साथ चलो, जो स्वेच्छा से जुड़ता गया वही आगे बढ़ता गया।”

  वरुण ने स्वामी जी के पैर पकड़ लिए…

” स्वामी जी मैं सब करने को तैयार हूँ, आप बस अपनी शरण मे ले लीजिए। “

स्वामी जी मुस्कुरा उठे, उन्होंने वरुण के सर पर हाथ रखा और आशीर्वाद देते बोल पड़े…

” जा पहले अपने सांसारिक दायित्वों को पूरा कर ले। अपने घर वालों से परामर्श कर ले फिर आ जाना, मंदिर तो सभी के लिए खुला है। चिरंजीवी भव!!”

  स्वामी जी का आशीर्वाद सुन वरुण सोच में पड़ गया, जिसकी अगली सांस का भरोसा नही उसे किस विश्वास से स्वामी जी ने चिरंजीवी होने का आशीर्वाद दे दिया।
   उन्हें प्रणाम कर वो मंदिर से बाहर निकल गया।
मन में एक अभूतपूर्व शांति महसूस करता वो अपने फ्लैट के लिए निकल गया।

******

          समय सबसे बड़ा सौदागर होता है,
    जो हर पल आपके जीवन के साथ खेलता है।।

   आप चलें न चलें समय अबाध गति से चलता ही चला जाता है। एक हफ्ते का समय पलक झपकते कब बीत गया वरुण को पता ही नही चला।
  अपने ऑफ़िस में बात कर वरुण ने छुट्टियाँ ली और हिंदुस्तान पहुंच गया।।
  
   घर पर रोली की शादी की तैयारियां जोरों से चल रहीं थीं। उसे माँ ने जितना कहा था वो उतने रुपयों का इंतज़ाम कर लाया था। उसके इतने सालो की नौकरी में उसने जो भी रुपया जोड़ा था उसके साथ ही रोली की शादी के लिए कुछ रकम अपने ऑफिस से भी लोन में उठा रखी थी। अब वो यही सोच रहा था की अगर वो सन्यास ले लेगा तब उसे नौकरी छोड़नी पड़ेगी और तब वो इतनी मोटी रकम अपने ऑफिस में कैसे चुका पायेगा।
   पहले वाला वरुण होता तो इसी बात को सोच सोच कर परेशान हो उठता लेकिन स्वामी जी से मिल कर आने के बाद से उसमें एक अजब से परिवर्तन हो गया था।
  अब वो पता नही किस कारण लेकिन निश्चिंत हो गया था।
उसे लगने लगा था कि अब सब कुछ कृष्ण संभाल लेंगे। चाहे उसकी तबियत हो, ऑफिस से लिया लोन हो या बहन की शादी।
   वो निष्फिकर रोली की शादी की तैयारियों में मगन हो गया।
   दोपहर माँ के बार बार बुलाने पर वो खाना खाने आ पाया…. नीचे पहुंचते ही उसकी नज़र माँ के पीछे रसोई से हाथ में डोंगा थामे आती कादम्बरी पर पड़ गयी और एक सेकंड को उसका चेहरा दप्प से बुझ गया…
   ये यहाँ क्या कर रही है? वो सोच रहा था कि कादम्बरी ने उसकी थाली में मटर पनीर परोस दिया…

” बंटी बेटा तू सुबह से व्यस्त था, इसलिए कादम्बरी ने मना कर दिया तुझे बताने के लिए। आज दोनो सब्जियाँ और कढ़ी उसी ने बनाई है। ” माँ ने पहले ही वरुण को कादम्बरी से रिश्ते से मना करने के लिए रोक रखा था इसलिए न चाहते हुए भी उसे कादम्बरी को देख मुस्कुराना पड़ा..

   वरुण से कुछ कहते नही बना, उसने धीमे से कादम्बरी की तरफ देखा , वो उसके सामने की कुर्सी पर बैठी उसे देख कर मुस्कुरा रही थी। रोली वरुण मौसी के बच्चे ये सभी डायनिंग पर बैठे थे इसलिए वरुण के पिता सोफे पर ही अपनी प्लेट लेकर चले गए थे।
   अगले दिन से शादी की रस्में शुरू होनी थी और अगले दिन से ही मेहमानों को आना था। अब तक सिर्फ वरुण की मौसी के बच्चे ही आये थे।
    खाने की टेबल पर उन लोगों की चुहलबाज़ी चलती रही। मौसी के बच्चे कमल और लिली वरुण रोली के हमउम्र ही थे। दोनों कादम्बरी और वरुण को छेड़े जा रहे थे।


” क्या बात है भाभी जी, खाना तो आपने बहुत स्वाद बनाया है। मतलब अब वरुण मोटा ज़रूर हो जाएगा, हमेशा मुझे पेटू पेटू कह कर चिढ़ाता रहता है। अब देखूंगा रोज़ रोज़ इतना टेस्टी खाना खा कर तू कैसे मोटा नही होगा? “

” मैं मोटा होने दूंगी तब मोटे होंगे न! और वैसे भी मेरे घर पर मैं खाना नही बनाती, हमारे यहाँ शेफ है बनाने के लिए तो जाहिर है इन्हें उसी के हाथ का रोज़ खाना पड़ेगा। ”

  अपनी बात पूरी कर कादम्बरी मुस्कुराने लगी लेकिन वहाँ बैठे बाकी लोगों के मुहँ का स्वाद खराब हो गया।
कादम्बरी के व्यक्तित्व के सामने किसी की ये बोलने तक की हिम्मत नही हुई कि वरुण उसके घर पर घर जंवाई नही बनेगा।
      वरुण और उसकी माँ के दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था, लेकिन माँ के मना करने के कारण वरुण ने अब तक कादम्बरी से कुछ नही कहा था।
   खाना निपटने के बाद कादम्बरी ने शॉपिंग प्लान बना रखा था,वो रोली के लिए रोली की ही पसन्द से कुछ लेना चाहती थी।
      रोली को साथ लिए वरुण और कादम्बरी मार्किट के लिए निकल गए, कमल और लिली भी साथ हो लिए।

    रोली का बहुत मन था कि वो बंगाली लड़कियों की तरह ट्रेडिशनल सफेद लाल साड़ी पहने। उसकी शादी के दिन एक रस्म के लिए थीम भी बंगाली चुनी गई थी।

  “रोली मेरी तरफ से वही ट्रेडिशनल बंगाली साड़ी ही ले लो। तुम्हारी पसन्द की रहेगी तो मैं भी निश्चिंत रहूंगी। और उसके साथ पहनने के लिए गोल्ड के झुमके भी ले लेना। “

” भाभी इतना सब देने की क्या ज़रूरत है। मैं बस साड़ी आपकी तरफ से ले लुंगी। ”

” ज़रूरत कैसे नही है ? आखिर तुम नन्द हो मेरी। मेरा भी तो फ़र्ज़ बनता है ना।”

  रोली का हाथ थामे सामने सजी लंबी चौड़ी सी ” वेदम ” में कादम्बरी घुस गई।

   ” कुछ अच्छा सा दिखाना ट्रेडिशनल ब्राइडल में।”
 
  दुकानदार ने साड़ियां फैलानी शुरू की…

” नही ये नही, कुछ रिच सा दिखाओ ….

  कमल लिली रोली कादम्बरी फिर वरुण बैठा था,सामने गद्दी पर दुकानदार साड़ियों का अंबार लगाता जा रहा था।
   वरुण से थोड़ा हट कर उसके बगल में पहले से बैठे पारो देव और लाली भी साड़ियां देख रहे थे।
   
      देव के घर पर लाली की शादी की सारी तैयारी हो चुकी थी लेकिन पारो का मन था अपनी प्यारी सखी लाली की  शादी में वो और लाली एक सी साड़ियां पहनें और इसलिए वो चाहती थी कि देव उन दोनों के लिए एक से कपड़े ले आये।
   देव जानता था कि पारो अपनी पसंद का तोहफा लाली को देना चाहती है, इसलिए लाली और पारो को मंदिर घुमा लाने की बात कह देव उन दोनो को साथ लिए शॉपिंग के लिए कोलकाता चला आया था।

  शॉपिंग से पहले तीनो ने मन भर कर फुचका ( गोलगप्पे) खाया , कुल्फी खायी और फिर हंसी मजाक करते दुकान में घुस गए।
    दुकान का मालिक तो काउंटर पर था, उसके लड़के कपड़े दिखा रहे थे।
  दुकान बड़ी थी, अलग अलग जगह अलग अलग लड़के कस्टमर को कपड़े दिखा रहे थे।
   इत्तेफाक से पारो की बगल वाली कुर्सी पर वरुण आ बैठा। पारो को साड़ियां दिखाता लड़का उत्साह से एक से एक नयी कलेवरों की साड़ियां दिखा रहा था उधर कादम्बरी को कपडे दिखाने वाला साधारण ही दिखा पा रहा था।
    एक बहुत खूबसूरत सी मयूरपंखी रंग की साड़ी को हाथ में लिए उसके रेशमी आँचल पर हाथ फिराती पारो के सामने बिछी उस साड़ी पर नज़र पड़ते ही कादम्बरी ने लड़के को उस साड़ी को खुद दिखाने को कहा और तुरंत वो साड़ी झपट ली।
    पारो को भी वह साड़ी पसन्द आ रही थी लेकिन मूल्य देख कर वो सोच में पड़ी थी कि उसके हाथ से छिनवा कर कादम्बरी ने उस साड़ी को पसन्द किया और पैक करवाने एक ओर रख दिया।
     
   पारो ने कादम्बरी को देखने के लिए अपने एक ओर निगाहें डाली तो उसकी नज़र पास बैठे वरुण पर पड़ गयी और उसे अचानक उस शाम मंदिर के बाहर मिली वो जोड़ी याद आ गयी। द्वारिकाधीश और सत्यभामा की जोड़ी!
    पारो के चेहरे पर मुस्कान चली आयी… “आखिर सत्यभामा तो सत्यभामा ही रहेगी”

   पारो की गुनगुनाहट बहुत धीमी थी लेकिन वरुण के कानों तक पहुंच ही गयी..

” सॉरी ! आपने कुछ कहा? “
 
  उसने पास बैठी पारो से पूछ ही लिया, और ना में सर हिला कर पारो दूसरी साड़ियों की ओर देखने लगी।

क्रमशः

aparna ….



  
  

समिधा -15

समिधा — 15




       प्रखर के लिए मन में एक अलग सी आदर की भावना लिए देव वापस लौट आया।
    उस चिट्ठी को टेबल पर रख देव अपनी शर्ट खोलने लगा कि पारो चली आयी।
  पीछे से देव की कमीज पकड़ उसने उतारने में मदद करते हुए वहाँ क्या हुआ का हालचाल भी पूछ लिया…
     पारो का स्पर्श पाते ही देव चौन्क कर पीछे मुड़ गया। बाहर से भीगती भागती आयी पारो की गीली लटें उसके चेहरे के आस पास चिपकीं सी थी। बालों पर अब भी पानी की बूंदे मोती के दानों सी निखरी पड़ी थीं।
    पारो के चेहरे को देखता देव जैसे खुद को भी भूलता चला जा रहा था। दोनों हाथों में उसका चेहरा थामें वो कुछ देर एकटक पारो को देखता रह गया…

    पारो के होंठो को देखता वो उन पर झुकने ही जा रहा था कि दरवाज़े को ज़ोर से धकेलता दर्शन अंदर चला आया।

  ” दादा( बड़े भैया) जल्दी चलो बाबा( पिता) बेहोश होकर गिर गए हैं।”

  ” क्या हो गया दर्शन?” कहता पारो के हाथ मे थामी टीशर्ट को तुरंत पहनता देव दर्शन के साथ दौड़ता हुआ बाहर निकल गया।

   देव के बाबा बेहोश होकर गिर पड़े थे, उन्हें काका ने पलंग पर लिटा रखा था, माथे पर ठंडे पानी की पट्टी रखने के कुछ देर में उन्होंने धीमे से आंखे खोल दी। उतनी देर में देव अपनी बाइक निकाले डॉक्टर को लेने चला गया।
    डॉक्टर ने आते ही उनकी जांच शुरू कर दी। बीपी अचानक कम हो जाने से ही उन्हें चक्कर आ गया था। बीपी अचानक कम कैसे हुआ ये जानने के लिए अगले दिन होने वाली विभिन्न जांचों के लिए उन्हें अस्पताल आने का कह कर डॉक्टर चला गया पर इतनी देर में रो धोकर देव की माँ ने घर सर पर उठा लिया था। उनकी जेठानी देवरानी देव के बाबा से ज्यादा उन्ही की तीमारदारी में लगी थीं।
     लेकिन इस सब के बीच एक किनारे आंगन में बैठी ठाकुर माँ अपनी सुमिरनी जपती मन ही मन कुछ निर्णय भी ले चुकी थीं।
    उन्होंने हाथ के इशारे से देव को अपने पास बुला लिया…

” बाबुन कल तेरे बाबा की सारी जांच परीक्षा हो जाए फिर सब सही आ जाए तो..

” हाँ तो क्या ठाकुर माँ ?”

” तो तू मेरी एक इच्छा पूरी करेगा बेटा। भगवान के दर्शन कर के आना चाहती हूँ और इस घर के लिए आशीष मांग कर भी आना है कि यहाँ सब हँसी खुशी बनी रहे।

  देव मुस्कुरा कर हाँ बोल अगले दिन होने वाली जांचों के लिए नम्बर लगाने की तैयारी करने चला गया।

   अगली सुबह अपने बाबा को साथ लिए वो निकल पड़ा।
   शाम तक में सारी रिपोर्ट्स भी आ गयी। सब कुछ सामान्य ही था, ये जान कर घर वालों के चेहरों पर राहत थी….

  ” ए बाबुन ! अब तू मुझे मेरी मन्नत पूरी करने ले चलेगा न।”

“कहाँ जाना चाहती  हैं आप ठाकुर माँ। “

” केदारनाथ! केदारनाथ जाना चाहती हूँ। अपने जीवन काल में एक बार बाबा के दर्शन कर आऊँ और उन्हें एक बार आभार व्यक्त कर आऊँ, बस अब यही अभिलाषा है।

  मुस्कुरा कर देव की माँ ने देव की तरफ देखा …

” बाबुन अपनी ठाकुर माँ को ले जाएगा न।”

“क्यों नही ले जाऊंगा माँ , लेकिन अभी तो सर पर लाली की शादी टिकी है। आप सब अगर लाली की शादी थोड़ा आगे बढा दो तो मैं ठाकुर माँ को दर्शन करवा कर ले आता हूँ। “

” नही नही बाबुन! अब लाली की सप्तपदी भी निपट जाने दे, उसके बाद चलेंगे , तू और मैं बस। हम पूरे घर भर के लिए आशीर्वाद ले जाएंगे। ठीक है!

  हां में सर हिलाता देव अपने कमरे में तैयार होने चला गया।

*******


    वरुण उस शाम सुपर मार्केट से निकला सीधा मंदिर की ओर बढ़ चला, पर मन मे उमड़ते घुमड़ते विचारों के साथ वो वापस अपने घर की तरफ मुड़ गया।
   मन में चलता द्वंद ऐसा था कि उसे कहीं चैन नही मिल रहा था।
   वो जब से इंडिया से यहाँ आया था, उसके जीवन में जैसे कुछ अलग सा ही बदलाव आ गया था। कादम्बरी भी उससे हमेशा शिकायत किया करती, कि दुनिया जहान के प्रेमी अपनी प्रियतमा के लिए कैसे पागल रहतें हैं और एक वो है कि कभी खुद से फ़ोन तक नही करता। बात भी सही थी गाहे बगाहे कादम्बरी ही उसे फ़ोन कर लिया करती थी।
   पहले रोज़ रातों को फ़ोन करने वाली कादम्बरी धीरे धीरे एक एक दिन के अंतराल में फ़ोन करने लगी थी और अब हफ्ते में एक बार ही उसके भी फोन कॉल्स सिमट गये थे।
    कितने उलाहने होते थे उसके पास वरुण के लिए। हर बात में एक ताना छिपा होता था। ” मिल गयी होगी वहाँ कोई गोरी मेम। लड़को का क्या है बस लड़की देखी की फिसले।”
  वरुण पहले पहल उसे समझाया और मनाया करता था धीरे धीरे वो उसकी बातें सुनता चुप बैठे रहने लगा था।

  कहीं न कहीं इस सब में उसे खुद की भी गलती नज़र आती थी, आखिर वो उसकी होने वाली पत्नी है अगर वो उससे उम्मीद नही रखेगी तो किससे रखेगी पर फिर भी चाह कर भी कभी उसका कादम्बरी को फ़ोन करने का मन ही नही करता।
  
     पुरुष को स्त्री देह की तरफ आकर्षित करने वाली कोई कमनीयता कोई लुनाई वो कादम्बरी में चाह कर भी ढूंढ नही पाता था।
 
     कादम्बरी गोरी थी, गोरी भी बिल्कुल दूध मलाई सी, लंबी छरहरी थी फिर भी उसमें शायद वो चीज़ नही थी जो वरुण को उसकी तरफ खींच पाए।
   और जो भी हो आज तक वो उससे अपने रिश्ते अपने भविष्य के कारण जुड़ा था लेकिन अब अपनी बीमारी के बारे में पता चलने के बाद से उसका मन डगमगाने लगा था, और आज के मंदिर में मिले जोड़े की बातें सुनने के बाद एक ओर जहाँ उसका मन कृष्ण में डूबने लगा था वहीं दूसरी ओर एक आदर्श जोड़े को प्यार से एक दूजे का साथ देते देख यह भी समझ आ गया था कि अगर जीवन को सुखमय रखना है तो सही समय पर सही निर्णय लेना आवश्यक है।
   मन ही मन कुछ सोच कर उसने गाड़ी पास ही के एक पुराने मोन्यूमेंट की तरफ मोड़ ली।

  उस ऊंची सी मीनार के सबसे ऊपरी छज्जे पर पहुंच एक तरफ की रेलिंग के सहारे वो पैर लटकाए वो वहाँ बैठ गया।
  ठंडी हवाएं उसके चेहरे से टकराती उसके मन में चलती उलझनों को राहत के छींटे सी दे रहीं थीं….
  अपने मन को भरसक समेट कर उसने अपनी माँ को फोन लगा दिया…

“कैसी हो माँ? “

” तू कैसा हैं बंटी! बेटा इस वक्त पर फ़ोन लगाया, इतनी सुबह ! सब ठीक है ना?

वरुण के शहर में शाम ढलने लगी थी… उसके मन में इतनी हलचल थी कि उसने समय पर ध्यान ही नही दिया था। माँ की बात सुन उसे ध्यान आया और उसने घड़ी देखी…

“तुम सो तो नही रही थी न माँ?”

” हाँ बेटा, उठ चुकी थी, चाय पी रही थी। तू बता क्या बात है।”

” माँ ! मैं कुछ कहना चाहता हूँ, माँ !!! मैं कादम्बरी से शादी नही कर पाऊंगा!”

  अपनी बात कह कर वरुण कुछ देर को शांत रह गया, उधर उसकी माँ भी चुप थी…..
  जैसे वो शुरू से जानती थीं कि एक दिन यही होना है। वो भी शांत थी , गहरी सांसे लेती हुई चुप बैठी वो अपने विचारों में खो गयीं थीं।
   ना उन्होंने और साधारण माँओं की तरह कुछ पूछताछ की और न कोई समझाइश दी, वो यही सोचने में व्यस्त थीं कि कादम्बरी के घर पर आखिर क्या बोल कर मना किया जा सकता है।

   माँ और बेटा दो अलग अलग देशों में बैठे चुपचाप एक दूसरे की खामोशी सुन रहे थे। आखिर कुछ देर बाद वरुण की माँ ने ही कहना शुरू किया…

“तू ठीक है ना बंटी? अचानक इतना बड़ा निर्णय ?”

” मैं ठीक हूँ माँ। बहुत समय से सोच रहा था लेकिन हिम्मत ही नही हुई, आज जाने कैसे हिम्मत कर ही गया। अब मैं इस रिश्ते के बोझ को और नही सह पाऊंगा। पहले लगता था किसी तरह निभा जाऊंगा, लेकिन अब ये रिश्ता गले की फांस सा अटकने लगा है, मैं जानता हूँ तुम ये सुन कर परेशान हो उठी होंगी। इतना आगे बढ़ने के बाद रिश्ते से मना करना वो भी इतने बड़े लोगों को तुम सब के लिए मुसीबत का कारण बन सकता है। यही सब सोचता अब तक चुप था लेकिन अब नही हो पा रहा माँ।
  मैं तो चाहता हूँ तुम पापा रोली सब यहाँ मेरे पास आ जाओ जिससे वो लोग तुम लोगों को परेशान न कर सकें।

” बंटी इतना सोच मत बेटा। अभी रोली की शादी तक रुक जातें हैं उसके बाद  उनसे बात करेंगे। “

” नही माँ ! जब मन ही नही जुड़ रहा तो अब इस बात को जितना जल्दी कादम्बरी से कह दूं उतना अच्छा है। और फिर ज़िन्दगी का क्या भरोसा?”

” तू ऐसी बातें क्यों बोल रहा है। अपनी माँ पर तो भरोसा है ना, निपट जाने दे बहन की शादी, उसके बाद मैं तेरी बुआ से बात कर लुंगी, रिश्ते की मनाही को लेकर , लेकिन बंटी तब तक तू कादम्बरी से कुछ नही कहेगा, तुझे कसम है।
    मैं जल्दी से जल्दी रोली की शादी की तारीख तय कर तुझे बताती हूँ, तू अपनी छुट्टियां डाल देना। जब शादी मे आएगा तभी आगे की बातें कर लेंगे उनके घर जाकर।
   फ़ोन पर कादम्बरी से ये सब कुछ मत कहना बेटा।”

” ठीक है माँ। जैसा तुम्हें ठीक लगे। “

   वरुण फ़ोन रख उस ऊंची मीनार पर बैठा सोचता रहा सोचता रहा फिर जाने क्या सोच वो उस मीनार की रेलिंग पर खड़ा हो गया।
     बत्तीसवीं मंज़िल पर खड़ा वरुण मुस्कुराने लगा….

“सब कहते हैं तुम हो! मैंने पहले कभी नही माना कि तुम हो लेकिन जाने क्यों आज मन कर रहा है कि तुम्हे चैलेंज करूँ।
   तो सारे संसार के रचयिता, मुरली की तान पर सबकी साँसों की सरगम चलाने वाले वंशीधर मैं वरुण आज इस बत्तीसवीं मंज़िल से कूदने जा रहा हूँ। तुम अगर सच में कहीं हो तो आ जाओ और बचा लो मुझे। उस दिन मंदिर में पंडित जी ने कहा था कि तुम मुझे नास्तिक से आस्तिक बनाना चाहते हो और इसलिए बार बार अपने पास बुला लेते हो तो जब तुम में इतनी ताकत है तो आओ और बचा लो मुझे। “

   आसमान की ओर चेहरा किये वरुण ने अपनी बात पूरी की और आंखें बंद कर अपने शरीर को हल्का छोड़ते हुए अपने आप को एकदम ढीला छोड़ दिया, वो नीचे गिरने ही वाला था कि दो जोड़ी बाहों ने उसे कस कर थामा और पीछे खींच लिया…..

” What are you doing here, have you gone mad?”

    उस मीनार का गार्ड था शायद जो शाम गहराने पर हर एक मंज़िल पर  से लोगों को पुकार कर नीचे जाने कह रहा था। रात गहराती देख कर उस सबसे ऊंची जगह से सभी नीचे जा चुके थे वरुण के अलावा।
   उसे टेरेस पर खड़ा देख गार्ड ने उसे अंदर की तरफ खींच लिया था।
    घबराया सा वरुण उसकी बड़बड़ सुनता उसे सॉरी कहता नीचे उतर गया था।
   पर उस गार्ड की तेज बड़बड़ाहट उसे सीढ़ियों पर बहुत दूर तक सुनाई देती रही। वाकई भीड़भाड़ बहुत कम हो गयी थी। इक्के दुक्के लोग पार्किंग सेअपनी गाड़ी निकालते अपने अपने घरों को निकलते जा रहे थे।
   वरुण भी गार्ड की झिड़कियों को मन ही मन सोचता अपनी गाड़ी की ओर बढ़ा जा रहा था कि गेट पर किसी आदमी की ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ सुन वो भी औरों की तरह ठिठक कर मुख्य द्वार की ओर देखने लगा।
   वहाँ वही कुछ देर पहले का गार्ड जो उसे नीचे उतरने को बोल कर उसी मंज़िल की दूसरी ओर कोई है तो नही देखने चला गया था यहाँ गेट पर खड़ा उस व्यक्ति को पूरी विनम्रता से कुछ समझाने की कोशिश कर रहा था।
   उस गार्ड को देख वरुण का सर चकरा गया। इतनी जल्दी वो गार्ड ऊपर से नीचे कैसे आ गया? आखिर उसकी झिड़की सुन कर तो वरुण पहले नीचे भागा था, फिर वरुण से पहले वो कैसे नीचे पहुंच गया? इतनी ऊंचाई से उससे पहले उसका नीचे पहुंचना असम्भव था।

   वरुण उस गार्ड को देखता हुआ ही पार्किंग की ओर बढ़ने लगा। उसके मन मे अभी भी उथल पुथल मची हुई थी , कि सोचते सोचते उसका ध्यान इस मीनार की ऊपरी छत पर चला गया। उसे लगा जैसे उतनी ऊंचाई पर अभी भी वो गार्ड खड़ा मुस्कुरा रहा है, वापस नीचे गेट पर देखने पर भी वहाँ गार्ड खड़ा था।

  वरुण ने अपनी गाड़ी खोली और अंदर बैठ गया, गाड़ी पार्किंग से निकालते हुए जब वो मुख्य द्वार पर पहुंचा तब तक गार्ड से बहस करता व्यक्ति जा चुका था। गार्ड को अपनी पार्किंग टिकट दिखा कर वरुण आगे बढ़ने ही वाला था कि गार्ड ने नीचे से उठा कर कुछ उसकी ओर बढ़ा दिया…

  ” शायद ये आपका है जो गिर गया था। ”   गार्ड के हाथ मे मोरपंख देख वरुण की आंखे खुली की खुली रह गईं।

  गार्ड के हाथ से मोरपंख लेकर उसने रख लिया और गाड़ी आगे बढ़ा दी।
   रियर व्यू मिरर में उसने देखा मीनार पर अब भी कोई इंसानी आकृति खड़ी थी , जबकि गार्ड अपनी जगह पर मौजूद था।

    तो क्या इसका मतलब खुद श्रीकृष्ण उसे बचाने गार्ड का रूप धर चले आये थे।  नही ये तो हो ही नही सकता। माँ कहती है ये कलियुग है इस युग में भगवान ऐसे आकर दर्शन नही देते, लेकिन फिर वो क्या था?
   उसने कृष्ण को चैलेंज किया और कूदने जा रहा था कि किसी ने उसे खींच लिया,वो गार्ड वहाँ कब और कैसे पहुंचा? जब वो अकेला उतनी ऊंचाई पर था तो आखिर वहाँ कोई कैसे अचानक पहुंच कर उसे बचा सकता है।
  तो क्या उसे गिरने से रोकने वाले स्वयं श्रीकृष्ण ही थे?

    वरुण ने आखिर अपनी गाड़ी मंदिर की ओर घूमा ली।
   अभी वो मंदिर पहुंचा ही था कि उसकी माँ का संदेश उसके मोबाइल पर चला आया….

  ” बेटा पंडित जी से बात हो गयी है, रोली की शादी की तारीख अगले हफ्ते की निकली है, अगले हफ्ते 24 तारीख का शुभ मुहूर्त है। अब तू अपने ऑफिस में बात कर के अपनी छुट्टी का आवेदन दे देना बेटा। ”
 
  वरुण ने मेसेज देखा और मुस्कुरा कर मंदिर के अंदर चला गया।


*********

    देव अपने कमरे से कपड़े बदल कर आंगन में आया कि उसकी माँ ने उसे चाय पकड़ा दी…

” बाबुन लाली के ससुराल से फोन आया था। वो लोग अगले हफ्ते ही शादी कर देना चाहते हैं बेटा। चौबीस तारीख का मुहूर्त निकला है, बस एक ही हफ्ता बचा है अब तो हमें फटाफट तैयारियां शुरू करनी है। मंगल भवन , कैटरिंग सभी की बात शुरू कर देना बेटा। “

हाँ में सर हिलाता बैठा देव सोच रहा था वाह रे भगवान तेरी माया! कहाँ तो मैं शादी दो तीन साल आगे बढ़ाना चाहता था और कहाँ तुमने शादी और जल्दी करवा दी। चलो कोई बात नही, प्रखर ने भी हां कह दिया है तो उन्होंने कुछ सोच रखा होगा।

   चाय पीते बैठा देव अपने जोड़ घटाव में लगा था उधर पारो अपने कमरे में खिड़की पर खड़ी अपने भावी जीवन के सुरीले सपने संजोती आस का दीपक जलाएं खड़ी थी।
     उसका ग्यारहवीं कक्षा में दाखिला हो चुका था। और अब कुछ समय बाद उसका स्कूल शुरू होने जा रहा था। मन में बस एक ही टीस थी उसके कि उसकी पक्की सहेली उसकी प्यारी लाली अब उसके साथ स्कूल नही जा पाएगी…….


क्रमशः


  दिल से …..


      हमारे सब के जीवन मे अलग अलग रंग भरे होतें हैं, सबकी अपनी इच्छाएं कुंठाये सपने होतें हैं इसलिए तो सबका जीवन इतना भिन्न होता है।
    कोई जीवन में जो सब भी मिला उससे खुश नही और कोई ऐसा भी होता है जिसे भले कुछ न मिले लेकिन अपने जीवन से उसे बहुत प्यार होता है जैसे देव!
    देव जैसे किरदार बहुत कम होतें हैं क्योंकि अधिकतर लोग जीवन मे जो नही मिला उसकी शिकायत लेकर बैठे होते हैं। और जो मिला है उसे अनदेखा कर जातें हैं।
 
    वरुण वाले हिस्से में लिखी बातें किसी भी तरह के अंधविश्वास को बढ़ावा नही देती। आज के भाग में लिखी बातों का खुलासा अगले भागों में होता चला जायेगा।
    लेकिन कृपया कहानी पढ़ कर वरुण जैसे एक्सपेरिमेंट करने का सोचें भी नही, ये मात्र एक कहानी है जो लेखिका की कोरी कल्पना है। कभी कभी चमत्कार लिखना अच्छा लगता है खुद के अंदर भी अलग सी सकारात्मकता आती है और पढ़ने वालों के अंदर भी…..

   ईश्वर पर विश्वास खुद पर ही विश्वास करने जैसा है। अध्यात्म जितना आपको भगवान से जोड़ता है उतना ही खुद से भी जोड़ता है।
   भगवतभक्ति कहीं न कहीं खुद से खुद को मिलाने की कोशिश ही तो है, और इसी कोशिश में लगा है कहानी का नायक वरुण! 


  कहानी पढ़ने और सराहने के लिए हृदय से आभार आप सभी का।
  


aparna …..


  

  

समिधा – 14

  समिधा –14



     अब तक आपने पढ़ा:-

    वरुण को अपनी बीमारी के बारे में पता चलता है और उसके बाद अपनी एक दोस्त सारा की बातों से प्रभावित वरुण को धीरे धीरे अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों की बातों में रुचि जागने लगती है।
   वो मंदिर,श्री कृष्ण, उनके भोग आदि की तरफ अपने झुकाव को महसूस करता है।

     दूसरी तरफ कलकत्ता के एक गांव में पारो के ससुराल में उसकी रिश्ते की भतीजी लाली की सगाई के बीच ही पारो के देवर दर्शन के दोस्त के आकर धमाका करने से सब सन्न रह जाते हैं कि पारो पूरे जिले में प्रथम आयी है।
    देव पहले तो सभी को अपने शब्दों से भली प्रकार समझाने की कोशिश करता है लेकिन जल्दी ही उसे समझ आ जाता है कि सबको समझना टेढ़ी खीर है तब वो अपना आखिरी पैंतरा अपनाता है , जिसमें वो कहता है कि अगर पारो यहाँ रह कर नही पढ़ सकती तो वो पारो को संग ले अलग हो जाएगा।
    और आखिर सदियों से मर्तबान के अंदर कहीं छिपा घी परंपरागत तरीके से उंगली टेढ़ी कर निकालने से निकल ही आता है।
    घर पर लाली की सगाई के बाद देव उसकी जल्दी हो रही शादी को लेकर चिंतित है , और उसे ये भी पता है कि घर पर इस बारे में बात करने का कोई फायदा नही। इसलिए वो सीधे प्रखर से ही बात करके शादी को दो साल आगे बढ़ाने के बारे में सोचता है।
    लाली और प्रखर की सगाई निपटने के बाद प्रखर के घर वाले तिथि मुहूर्त तय करने देव के घर वालों को अपने घर आमंत्रित करते हैं…

   अब आगे ….

********


      अगली सुबह ठाकुर परिवार के लिए बहुत सुखद सौम्य और सुनहरी थी।
   प्रखर के घर वालों की तरफ से विवाह का शुभ दिन मुहूर्त निकालने के लिए देव के घर वालों को निमंत्रण भेजा गया था। घर के सभी पुरुष सदस्यों का न्योता था।
    सुबह सुबह खुश खबरी से घर चहक रहा था। घर की कामवाली कोयल अपने नाम को सार्थक करती इधर से उधर काम जितना करती उससे कहीं अधिक कूकती रहती थी।
     ठाकुर माँ का वो दाँया हाथ थी,घर भर की बहुओं का रोना  ठाकुर माँ उसे ही सुनाया करती और वो भी पूरा रस ले लेकर सुनती और खुद भी किसी न किसी के नाम का चिट्ठा ठाकुर माँ के सामने फाड़ा करती।
         आज घर में सुबह प्रवेश करते ही उसे दो खबरे मिली थी एक लाली की शादी की तारीख तय होने जा रही थी और दूसरा घर की सबसे छोटी बहु ग्यारहवीं कक्षा में प्रवेश लेने जा रही थी।
   पहली खबर तो सामान्य ही थी, उसमें कुछ नया नही था, शादी ब्याह तो होना ही है कौन सा किसी थानेदार कलेक्टर से ब्याह हो रहा? लेकिन ये दूसरी खबर तो बड़ी चटक थी। जबसे सुना था उसके पेट में खलबली मची हुई थी, आखिर ठाकुर माँ के कमरे में उनके बालों में गरम तेल डालने गयी तब जाकर उसे मौका मिला, अपने मन में उफनती नदी को रास्ता देने का।

  ” ए की ठाकुर माँ? ये क्या सुन रही हूँ मैं?

  ” मुझे क्या पता , तू क्या सुन रही है? तेरे कान हैं आखिर, तू जो चाहे वो सुन सकती है।

  ” घर की छोटी बहु अब घर से बाहर पढ़ने जाएगी? ये क्या बात हुई भला? छी बाहर के मर्दों के सामने खुले सर घूमेगी,आपने मना नही किया ? ”

  ” तू भी तो घर से बाहर निकलती है , काम करती है । क्या जिस जिस घर मे तू काम करती है वहाँ मर्द नही रहते?

  ” पापी पेट की मजबूरी न होती तो कौन सी औरत घर से निकलना चाहती है भला ठाकुर माँ। ”

  ” बस ऐसी ही कुछ पढ़ने की भी भूख होती है। तू नही समझेगी, चल जा अपना काम कर। ”

   कोयल ठगी सी खड़ी रह गयी, आज तक अपनी हर बहु में खोट निकालने वाली, गली मोहल्ले की हर औरत के लिए चुन चुन कर गालियां निकालने वाली ठाकुर माँ की भी पढ़ाई में श्रद्धा है, ये उसके लिए बड़ी नई बात थी।
    वो अपनी चोटी के बचे बालों की गूंथती वहाँ से बाहर चली गयी।
   घर की बाकी औरते अपनी अपनी पारी से काम पर लगी थीं।
   कोई रसोई में दाल की बटलोई में कलछी घुमा रही थी , कोई पोटोलोर डालना के लिए परवल साफ कर रही थी।
   कोई पोस्त और हरी मिर्च को सिल पर पीसती बैठी थी तो कोई बड़ी बड़ी मिर्चों में मसाले भरती उन्हें सुखाने की तैयारी में थी।
    बाहर के काम की पारी वाली बहुएं कपड़े धोने सुखाने में लगी थी।

   कोयल ने देखा, रसोई में पारो की सास के साथ उनकी देवरानी जेठानी ही थी , कोयल को मनचाही मुराद मिल गयी…

  ” ए माँ ! ये क्या सुन कर आ रही हूँ मैं ठाकुर माँ के मुहँ से। क्या अब आपकी बहु बाहर पढ़ने जाएगी?

  पिछली रात से जली भुनी बैठी देव की माँ तड़प कर रह गयीं। जाने क्यों उन्हें पारो को पढ़ने जाने के लिए घर भर की सहमति मिल जाना रास नही आ रहा था, उस पर देव का कदम कदम पर ऐसे अपनी दुल्हन का साथ देना उनके ममतामयी कलेजे को मरोड़े दे रहा था।
   अपना ही कोखजाया कैसे एक लड़की की गांठ से बंधते ही पराया हो गया ?
     उन्होंने बड़ी लाचारी से अपनी जेठानी की ओर देखा, दोनो औरतों ने एक दूसरे के मन की पीर समझ ली। उनकी देवरानी भी उन्हीं दोनो को देख रही थी, वो भी देव की माँ का दुख समझ रही थी।
   एक बार घर से बाहर निकली बहु क्या फिर कभी सास के हाथ आयी है भला? वो सब तो आज तक ठाकुर माँ के इशारों पर कठपुतली सी नाचती आयीं हैं और ये आज की लड़की अपने पति को मना कर चोरी छिपे पढ़ने लिखने भी लग गयी और अब तो बाहर जाने वाली है आगे पढ़ने।
   
   मन ही मन अपनी सोच में डूबी वो कुछ कुछ बुदबुदाए भी जा रही थी…” मा दुग्गा रक्षा करो”

  उसकी आवज़ सुनते ही देव की माँ और जेठानी उसे देखने लगे… ” क्या हुआ कृष्णा ?”

  ” कुछ नही दीदी, आपके और आपकी बहु के बारे में ही सोच रही थी। मन को बुरा मत लगाना दीदी लेकिन लक्षण तो शुरू से पारो के सही नही थे, उस पर घर से बाहर जाएगी, अब क्या हाथ आएगी वो आपके? “

  एक ठंडी आह भर देव की माँ वही बैठ गयी…

” क्या करूँ रे, जब किस्मत ही ऐसी लिखी है भगवान ने तो किसकी शरण जाऊँ।
   पहले लगता था बेटा ही ज़रा पागल है कल तो बाप ने भी अपना पागलपन दिखा दिया। अब इन मर्दों को कौन समझाए कि इस कच्ची उमर में लड़की का बाहर जाना सही नही है। है माँ दुग्गा अब तो तुम्ही कोई रास्ता निकालो।”

  कोयल को इस सब बतकही में अपरूप रस मिल रहा था, यही सब तो ठाकुर माँ से सुनने की चाहत थी जो यहाँ आकर मिली। वो दुगुने उत्साह से अपने काम में जुट गई।
    देव के पिता ने बाहर से आवाज़ लगाई और बता दिया कि देव के काका के अतिरिक्त बाकी सभी जन प्रखर के घर जाने को निकल रहें हैं।

   सभी औरतें हाथ धोती अपने पल्लू से पोंछती बाहर निकल आयी। होने वाले समधी के घर भेजने के लिये फल मिठाईयां, पिस्ते बादाम की टोकरियाँ उन लोगों के हाथ में थमा कर तिलक लगा कर उन्हें भेजने के बाद सभी एक बार फिर बातों में लग गईं।


   *****

  शनिवार की सुबह थी,  आज बहुत दिनों बाद ताज़ी धूप खिली थी, वरुण को बाज़ार से कुछ सामान लेना था, उसने अपनी गाड़ी निकाली और सुपर मार्केट निकल गया।
         मार्किट से काफी पहले ही गाड़ी पार्किंग में डाल कर वो पैदल अंदर जाने लगा।
   उसके सामने ही एक भारतीय पति पत्नी का जोड़ा चलता चला जा रहा था, दोनों मध्यम आयुवर्ग के थे, लगभग बावन से पचपन बरस के बीच के।
  दोनो में किसी सामान को लेकर बातचीत चल रही थी। स्टोर बहुत बड़ा होने से समय बचाने के लिए नीचे वाले फ्लोर पर एक और ऊपर वाले फ्लोर पर एक खरीदारी कर लेगा तो उनका काफी समय बच जाएगा। यही बातें तय करते वो लोग स्टोर के भीतर घुस गए, ऊपर जाते जाते औरत ने अपने पति से प्रसाद के लिए मिश्री लेने की बात दो बार कही।

    वो अपनी बात कह कर लिफ्ट में चली गयी और उसकी बात में उलझा वरुण उस आदमी के बगल वाली शेल्फ से सामान निकालते उससे पूछ ही बैठा…

” आपसे एक बात पूछ सकता हूँ? “

  अमेरिका में अपनी बोली सुन हर हिंदुस्तानी का दिल खिल उठता है, और फिर यहाँ तो वरुण ने बिना किसी औपचारिक लाग लपेट के शुद्ध हिंदी में बात शुरू की थी,सामने वाले सज्जन मुस्कुरा उठे..

” जी हाँ पूछिये। “

  ” सवाल ज़रा पर्सनल है, आप बुरा तो नही मानेंगे। “

  सामने वाले ने एक हल्का सा ठहाका लगाया और ना में सर हिला दिया..

  ” नही बेटा बिल्कुल बुरा नही मानूंगा। आप पूछिये तो सही।”

  ” आपकी वाईफ आपको प्रसाद के लिए बार बार मिश्री ही लेने क्यों फोर्स कर रहीं थीं? कुछ खास रीजन है क्या इसका भी। “

   ” जी हाँ, इसका भी एक रीजन है। कहतें हैं भगवान को माखन मिश्री पसंद होता है और इसलिए वही भोग में लगाना चाहिए पर हमारी श्रीमती जी का लॉजिक सुनेंगे तो शायद आपको हंसी आ जायेगी।

  वरुण ने मुस्कुरा कर ना में सर हिला दिया…

  ” हमारी श्रीमती जी को शुरू से भगवान में बड़ी श्रद्धा रही है। शादी के बाद हमें कई सालों तक संतान नही हुई, मैं शुरू से ही यहीं अमेरिका में नौकरी कर रहा था, तो जब दो साल में भी कोई औलाद नही हुई तब डॉक्टरों के चक्कर लगाने शुरू किए। इंडिया में आज जो चिकित्सा विधियां आयी हैं वो तभी यहाँ आ चुकी थी, हमने सारी आज़मा भी ली लेकिन कोई फल नही मिला। इसी सब में आठ साल बीत गए। हम लोग उस साल छुट्टियों में इंडिया आये हुए थे। एक शाम हम दोनों मंदिर गए थे तब वहाँ मंदिर के बाहर बैठे किसी गरीब आदमी ने इनसे कहा कि कुछ खाने को है तो दे दो। उस वक्त इनके पास कुछ नही था, बस मंदिर में चढ़ाने के लिए नारियल और मिश्री और कुछ फल थे । अब ये परेशान हो उठीं की अगर ये नारियल इसे खाने की दे दिया तो अंदर भगवान को क्या चढ़ाऊंगी?
    पर उस गरीब को देख इनके अंदर की माँ जाग उठी और इन्होंने हाथ में थाम रखी सारी प्रसाद सामग्री उस आदमी को दे दी और हम अंदर दर्शन करने चले गए।
    दर्शन कर के वापस निकले तो देखा वो आदमी दिए गए फल आदि से कुछ खुद खा कर कुछ अपने पास खड़ी गाय को खिला रहा था।
   श्रीमती जी चौन्क गयी और ज़रा नाराज़ भी हो गयी…

“ये क्या है? मैंने मंदिर में बिना चढ़ाए सारा प्रसाद तुम्हे दे दिया जिससे तुम्हारी भूख मिट सके और तुमने सब ऐसे गंवा दिया, फल गाय को दे दिए और मिश्री ज़मीन पर फेंक दी। हद है!”

   सामने खड़ा गरीब आदमी संकुचित हो उठा, बुज़ुर्ग था फिर भी श्रीमती जी को पूरे आदर से पुकारता वो अपना ऐसा जवाब दे गया कि फिर हमारे सारे सवाल बेमानी हो गए…

  ” मुझे माफ़ करना माँ !  लेकिन एक बात बताओ अंदर ले जाने वाले सामान को अंदर कौन खाता है भला? “

  उसकी बात सुन श्रीमती जी का क्रोध और बढ़ गया, वो इसे गुस्से में घूरती रहीं।

  ” वो जिसकी पूजा अर्चना करने अंदर जाती हो न वो तो यहीं तुम्हे मिल जाएगा। वो देखो तुम्हारी मिश्री ले कर जाती चींटियां यही तो तुम्हारे कान्हा जी हैं, एक कतार में चलती ऐसी लग रही जैसी बाँसुरी की मोहक ध्वनि में बंधी लयबद्ध किसी प्राकृतिक नृत्य को करती हमे  रिझाती चली जा रही हैं।
   वो देखो तुम्हारे फल खाती गौरा गाय अपने बछड़े को दूध भी पिलाती जा रही है, क्या इससे मनमोहक दृश्य कभी देखा है भला। क्या इस गाय में तुम्हे तुम्हारा
मुरलीधर नही नज़र आ रहा? तुम्हारा भोग खाते हुए समस्त संसार का पालन करता हुआ मनोहारी कान्हा!

    उसकी बातों में जाने क्या चमत्कार था, श्रीमती जी की आंखों से ऑंसूओ की धार बह चली। वो हाथ बांधे उसके सम्मुख खड़ी रह गयी..

  “मुझे माफ़ करना भैया, आज के बाद भगवान को भोग लगाने के बाद सबसे पहले किसी भूखे को भोजन कराउंगी तभी खुद खाऊँगी। “

  ” नही माँ !ऐसा कोई प्रण ना करो जो बाद में पूरा न कर सको। आज तो ये प्रण निभा लोगी लेकिन कल को जब खुद माँ बनने वाली रहोगी तब रोज़ एक भूखा मनुष्य ढूंढ कर पहले उसे खिला कर तब खुद खाना, बहुत कठिन हो जाएगा। इसलिए ऐसी कोई प्रतिज्ञा न करो। ”

  हम दोनों के आश्चर्य का ठिकाना नही था। इसे कैसे पता चला कि हमारी अभी कोई संतान नही है।

  ” आपको कैसे पता कि … मैं अपनी बात पूरी भी नही कर पाया था कि उसने हमारी बात काट दी…

  ” उस परमशक्ति के आगे सब अवश हैं। अगर अपनी परेशानी से निपटने सारे उपाय अपना चुके हो और कोई फल नही मिला तो अब मेरा बताया उपाय भी कर के देख लो। छोटे से बाल गोपाल की जतन से सेवा शुरू कर दो, जो चाहती हो न माँ वो पूरा हो जाएगा। बस श्रद्धा से  उनका भोग ऐसे ही भूखों और ज़रूरतमंदों को खिलाना, हट्टे कट्टे भिखारियों को नही ।”

   कतारबद्ध चलती चींटियों की तरफ देख वो मुस्कुरा उठा, और हम दोनों निरुत्तर से खड़े रह गए।

  समझ नही आया सामने खड़ा वो गरीब जर्जर बूढ़ा असल में याचक था या हम ?

  हम दोनों शांति से वापस चले आये, लेकिन आते आते इन्होंने एक छोटी सी बाल गोपाल की मूर्ति खरीद ली।
    मूर्ति को गोद मे लिए लिए ही घर पहुंची और जतन से उसे हमारे मंदिर में बैठा दिया। शुरू शुरू में पूजा पाठ की औपचारिकता आगे चल कर कान्हा जी की वास्तविक सेवा में बदलती चली गयी। सुबह सवेरे उन्हें नहलाना कपड़े बदलना, खाने में जो भी बना हो वही भोग में चढ़ा कर पहले उन्हें खिलाना फिर खुद खाना, लेकिन इस सब में ये हुआ कि वो भोग जो भगवान को चढ़ाया जाता वो वैसा ही रखा रह जाता, और उसे हम ही प्रसाद मान कर खा लेते। पर जाने क्यों इनका मन नही मान रहा था, इनकी किसी और जीव को खिला कर खाने की इच्छा पूरी नही हो पा रही थी। एक दिन इनकी तबियत कुछ खराब थी , ये कुछ बना नही पायी और प्रसाद में मिश्री चढ़ा दी। उस दिन शाम तक में प्रसाद का पात्र पूरा खाली हो गया, उस दिन इनके मन में एक अलग सा विश्वास पैदा हो गया कि इनके भगवान चींटी के रूप में आकर मिश्री खा कर जाते हैं। और बस कुछ ही दिनों में चमत्कार हुआ, इनके माँ बनने की आहट हुई और हमारी खुशी का ठिकाना न रहा।
   तो ये रहस्य है हमारी श्रीमती जी के प्रसाद में मिश्री चढ़ाने का।

   वरुण उनकी बात सुनता मुस्कुराने लगा….

  ” दुबारा कभी वो सज्जन आपको मिले जिनके आशीर्वाद से आपको संतान प्राप्ति हुई?”

” नही, इसी बात का तो अफसोस है कि वो दुबारा कभी नही मिले हमें। बाद में हमारे गट्टू के जन्म के बाद जब हम उसे लेकर मंदिर गए दर्शन के लिए तब श्रीमती जी ने बाहर बैठे याचकों से उसके बारे में पूछताछ की तो पता चला, ठीक नौ महीने पहले उसका निधन हो गया। ”

   उनकी ये बात सुन वरुण के रोंगटे खड़े हो गए। क्या कोई भक्त इतना भी शक्तिशाली हो सकता है? कि सामने वाले को जीवन देने अपने प्राण त्याग दे? क्या वाकई कृष्ण महिमा और उनकी भक्ति में इतनी अधिक शक्ति होती है?
  ”  है भगवान ये किस मायाजाल में उलझाते जा रहे हो मुझे? ”  अपने ही मन की बात पर उसे आश्चर्य होने लगा, आज तक उसने कभी ऐसे भगवान से कोई सवाल नही किया था लेकिन आज?

   बातों में लगे दोनों ने साथ ही अपनी सारी शॉपिंग भी निपटा ली…
   काम तो सारा निपट गया लेकिन वरुण के दिमाग में कान्हा जी का चमत्कार घूमता चला गया।

    मन ही मन कोई कठोर सा निर्णय लिए वो वहाँ से सीधा मंदिर की ओर मुड़ गया।

*******


      प्रखर के घर पर शादी ब्याह की बातें चल रहीं थीं, सभी बड़े बुज़ुर्ग साथ बैठे पंडित जी से पोथी बंचवा रहे थे।
   शुभ मुहूर्त निकलने को था लेकिन अब तक देव को प्रखर से अकेले मिलने का मौका नही मिल पाया था।।
     वो चाह रहा था कि किसी तरह शादी एक आध साल आगे बढ़ जाये और ये बात कहने के लिए उसे एक ही इंसान उस पूरी भीड़ भाड़ में उचित जान पड़ रहा था ,वो था प्रखर।

   आखिर भोजन पानी निपटने के बाद जब प्रखर कुछ देर को अंदर गया तब देव भी अपना सारा संकोच त्याग उसके पीछे बेधड़क उनके घर के अंदर वाले भाग में चला आया।
   घर के अंदर फैले आंगन में एक और बैठी प्रखर की माँ  मिठाईयों का थाल सजा रही थी। देव को अंदर प्रवेश करते देख वो भी चौन्क गयी..

  ” क्या हुआ देव बाबू? कुछ चाहिए आपको? “

” जी प्रखर बाबू का कमरा कौन सा है?”

   आसमान में उमड़ते घुमड़ते काले बादल अचानक अपने गर्जन तर्जन के साथ बरसने को आये और पलक झपकते ही मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी, प्रखर की माँ ने प्रखर के कमरे की ओर इशारा कर दिया।
   देव जल्दी जल्दी उसके कमरे की ओर बढ़ गया, आंगन में सूखते , मसालों पापड़ों को समेटती औरतें भी बारिश के भय से अंदर की ओर भाग गई।

   प्रखर के कमरे में पहुंचे देव ने देखा प्रखर कुछ पैक कर रहा था।
 
  ” प्रखर बाबू आपसे कुछ कहना चाहता हूँ। “

  देव को अचानक अपने कमरे में देख प्रखर भी चौन्क गया….

  ” अच्छा हुआ आप यहीं आ गए, मैं खुद आपसे मिल कर कुछ कहना चाहता था, ये एक चिट्ठी भी लिखी है लालीमा के लिए, क्या आप ये उसे दे देंगे? “

  हाँ में सर हिला कर देव ने उसके हाथ से वो चिट्ठी लेकर अपने पास रख ली। उसे खुद समझ नही आ रहा था कि प्रखर उससे क्या कहना चाहता है।

  ” कहिये प्रखर बाबू! क्या कहना चाहते हैं आप? “

  ” जी मैंने कुछ समय पहले सेना में भर्ती की चिट्ठी डाली थी, वहाँ से उनका जवाब आया है। मुझे आगे की परीक्षा के लिए बुलाया गया है और सच कहूं तो मैं बहुत खुश हूँ,जाना भी चाहता हूँ लेकिन घर वाले शुरू से इस सब के खिलाफ थे इसलिए उन्हें बिना बताए ही ये फॉर्म डाला था।

   प्रखर शायद इतनी बड़ी बात देव की आंखों में देखते हुए कहने से डर रहा था इसलिए उसने अपना चेहरा दूसरी ओर फेर लिया था, और उसी समय आसमान पर बादलों की तेज गड़गड़ाहट शुरू हो गयी।
   देव को कुछ सुनाई दिया कुछ नही, लेकिन प्रखर एक बार जो शुरू हुआ तो अपनी रौ में बोलता चला गया….

  ” देव भैया मैं अभी कुछ समय के लिए शादी नही कर पाऊंगा , बल्कि हो सकता है शादी ही न करूँ, सेना में जाने के बाद मेरा जीवन पूरी तरह देश को समर्पित हो जाएगा।”

  प्रखर की कही इन सारी बातों में से कोई बात भी देव के कानों में नही पड़ी, वो बस क्या? क्या कहा ? यही पूछता रह गया कि बाहर से हाथ में मिठाई का थाल लिए प्रखर की माँ भीतर चली आयी… आते ही देव के मुहँ में मिठाई का टुकड़ा डालती वो प्रखर की ओर बढ़ गयी।

  ” खूब बधाई! तेरी सप्तपदी की शुभ तिथि स्थिर हो गयी है। ” प्रखर के मुहँ में भी सन्देस का टुकड़ा डाल हंसती खिलखिलाती वो बाकियों का मुहँ मीठा कराने निकल गईं।

   देव इसी बात के लिए हड़बड़ी में था कि एक बार बड़े बुजुर्ग तिथि स्थिर करें उसके पहले ही प्रखर से बात कर शादी दो साल के लिए आगे बढ़ानी है लेकिन वो काम नही हो पाया।
   अब एक बार तिथि मुहूर्त तय हो जाने के बाद तो कुछ भी आगे बढ़ाना असम्भव है, ये वो अच्छे से जानता था।
   प्रखर के चेहरे पर भी कोई चमकीली खुशी की लहर नज़र नही आ रही थी देव को। दूसरी बात की प्रखर ने इतनी देर आखिर उससे अपने मन की कौन सी बात कही थी अब देव के लिए ये भी सोचने वाली बात हो गयी थी?
    क्योंकि बादलों की तेज गड़गड़ाहट में जो टूटे फूटे शब्द उसके कानों में पड़े उसका सार उसे ये लगा कि प्रखर आगे चल कर सेना में भर्ती होना चाहता है और यही बात विवाह से पहले वो लाली और लाली के घर वालो को बताना चाहता है ।
   इस बात से देव के मन में प्रखर के लिए  आदर की भावना और भी ज्यादा बढ़ गयी। उसे प्रखर पर गर्व महसूस हो रहा था।
   उसने मुस्कुरा कर आगे बढ़ प्रखर को सीने से लगा लिया।
   जो बालक अपनी मातृभूमि के लिए सोच सकता है अपनी पत्नी के लिए भी कुछ तो सोचेगा ही, यही सोचता देव बिना अपनी बात कहे ही मुस्कुरा कर प्रखर को बधाई देता बाहर निकल गया।

   प्रखर आश्चर्य में डूबा देव को जाता देखता रहा, उसे समझ आ गया कि वो जो कहना चाहता था देव उसकी वो बात नही समझ पाया है। और अब विवाह तिथि तय होने के बाद उसकी बात का कोई औचित्य भी नही रह गया था।
    अब तो उसे घर वालो से छिप कर ही सेना भर्ती का इम्तिहान देने जाना होगा।
   बस अब भी उम्मीद की एक किरण बाकी थी वो थी लालिमा को लिखी चिट्ठी!
    प्रखर ने जो बातें देव से कही थी वही बातें चिट्ठी में लिख उसने देव के हाथों ही लालिमा के लिए भेज दी थी। आशा की किरण अब वहीं से थी कि पत्र पढ़ कर कहीं लालिमा ने ही मना कर दिया तो वो मन पर बिना किसी बोझ के सेना में चला जाएगा, पर अगर लालिमा ने चिट्ठी पढ़ कर भी शादी से इनकार नही किया तब? या मान लो चिट्ठी पढ़ी ही नही तब?

    अब तब से ऊपर उठ कर प्रखर ने सब कुछ भगवान और भाग्य भरोसे छोड़ा और अपने दोस्त से मिलने निकल गया।

   प्रखर के कमरे से निकल कर आंगन पार कर बाहर के कमरे में आने में ही देव बुरी तरह से भीग गया उसके ऊपर वहाँ से निकलते समय वहाँ से लाली के लिए भेजे जा रहे सामान को बार बार इधर से उधर लेकर जाने आने में रही सही कसर भी पूरी हो गयी।
   उसे उतना भीगा देख कर प्रखर की माँ ने प्रखर के कपड़े पहन कर चले जाने का प्रस्ताव भी रखा लेकिन बस “गाड़ी में बैठते ही घर पहुंच जाएंगे’ कहता देव गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर जा बैठा।
   एक एक कर सभी के बैठते ही उसने गाड़ी आगे बढ़ा दी।
   घर पहुंचने में लगभग एक डेढ़ घंटे का वक्त लग गया।
  घर पहुंच कर सारा सामान उतार वो अपने कमरे की ओर भाग गया, भीगे कपड़ों में अब सर्दी भी लगने लगी थी।
     शर्ट के बटन खोलते में उसका ध्यान जेब में रखी चिट्ठी पर गया , चिट्ठी पानी से पूरी तरह भीग कर कागज़ की लुगदी सी रह गयी थी। उसे खोल कर देखने के प्रयास में चिट्ठी आपस मे ही और उलझ गए। अंदर लिखे शब्द बस नीली फैली सी स्याही से पता चल रहे थे कि अंदर कुछ लिखा था पर क्या लिखा था ये अब सिर्फ लिखने वाला ही बता सकता था।
    उस चिट्ठी को टेबल पर रख देव अपनी शर्ट खोलने लगा कि पारो चली आयी।
  पीछे से देव की कमीज पकड़ उसने उतारने में मदद करते हुए वहाँ क्या हुआ का हालचाल भी पूछ लिया…
     पारो का स्पर्श पाते ही देव चौन्क कर पीछे मुड़ गया। बाहर से भीगती भागती आयी पारो की गीली लटें उसके चेहरे के आस पास चिपकीं सी थी। बालों पर अब भी पानी की बूंदे मोती के दानों सी निखरी पड़ी थीं।
    पारो के चेहरे को देखता देव जैसे खुद को भी भूलता चला जा रहा था। दोनों हाथों में उसका चेहरा थामें वो कुछ देर एकटक पारो को देखता रह गया…

क्रमशः

aparna..


 
 

समिधा-13




   समिधा — 13


      बातचीत चलती रही, सब अच्छा अच्छा सा ही लग रहा था, शाम होते होते लड़के वाले चले गए। घर की औरतों ने सुबह से बहुत सारा परिश्रम किया था। जिसको जो अच्छा बनाना आता था उसने वही बना कर परोस दिया था, एक तरह से होड़ सी मच गई थी सासू और बहुओं के बीच।
   सभी ने कलछी तोड़ कर रख दी थी।

   रात होते होते पारो ने बाकियों के साथ मिल कर सारा काम समेटा और देव के लिए एक कटोरी में खीर लिए कमरे में चली आयी। आते आते रास्ते में उसने लाली को भी कमरे में ही बुला लिया…

   ” तुम चलो काकी मैं आती हूँ। ” कह कर लाली अपनी माँ के साथ कुछ विचार विमर्श करती रही।

  कमरे में पहुंच कर पारो देव के पास खीर ले आयी…

” ये क्या ले आयीं? “

” पायेश !!” मुस्कुरा कर पारो ने उसकी ओर खीर बढ़ा दी..

” अरे मैं तो खा चुका था बाबा! मैं इतना मीठा कहाँ खाता हूं, और फिर तुम लेकर आई हो कहीं नमक तो नही मिला रखा ना!”

  हंसते हुए उसके हाथ से खीर की कटोरी ले वो खाने लगा

  ” लाली को बुला कर आई हूँ, आप उससे भी एक बार पूछ लो कि वो क्या सोचती है? वैसे आगे क्या करना है? कुछ सोच रखा है आपने?”

  ” हाँ ! अगर लाली ने मना किया तो फिर मैं सीधा उस लड़के से मिल कर मना कर दूंगा। कहूंगा कि शादी तय करने के बाद दो साल रुक जाए। दो साल में लाली अट्ठारह की हो जाएगी तब ब्याह कर देंगे। “

” और अगर नही माना तो ? “

” अब तुम्हारे अनुसार नमक वाली चाय पी गया मतलब उसे रिश्ता पसन्द है तो मान भी जाएगा ही । है ना? “

  मुस्कुरा कर पारो ने हाँ कहा कि उसी समय लाली भी उनके कमरे में चली आयी। उसे आया देख देव और पारो एक दूजे की ओर देखने लगे कि बात कैसे शुरू की जाए । दोनो सोच रहे थे कि लाली ने अपने गले का हार पारो को दिखाते हुए खुद ही बोलना शुरू कर दिया…

” काकी ये हार कैसा लग रहा? सुंदर है ना। पूरे पांच तोले का है इसके साथ के झुमके भी ढाई ढाई तोले के मतलब कुल जमा दस तोला।”

” हाँ वो मैं समझ गयी लेकिन ये तो कहो कि इतना गणित क्यों लगाया जा रहा। ”

  ” गणित और मैं? गणित मरा कद्दू। ये तो मैं तुम्हे दिखाने लायी हूँ । मुझे बिदाई में माँ यही पहनाने वाली हैं। और छोटू माँ यानी तुम्हारी सास कंगन पहनाएगी वो भी पूरे आठ तोले के। ”

  लाली का चेहरा फूलों सा दमक रहा था। उसके दमकते चेहरे को देख पारो देव की ओर देखने लगी…
  देव ने धीरे से लाली से पूछ ही लिया..

.” तू खुश है लाली ?”

  संस्कारी लज्जाशील घर के बेटी अपने ही काका के सामने अपनी होने वाली शादी के लिए अपनी खुशी कैसे बताती भला। वो तो अपनी काकी से अपने गहनों की खुशी जताने भागती चली आयी थी,लेकिन इस सब जोड़ घटाव में काका उससे उसकी खुशी भी पूछ बैठेंगे उसे कहाँ पता था?

  वो शरमा कर नीचे देखने लगी…

” बोल न लाली! अगर तुझे रिश्ता पसन्द नही होगा तो हम इस रिश्ते के लिए मना कर देंगे.. ठीक है तू कुछ न बोल ,तेरे काका कल ही लड़के से मिल कर मना कर आएंगे….

  पारो की बात पूरी होने से पहले ही लाली ने काट दी

  ” मैंने कब बोला कि मुझे रिश्ता नही पसन्द ! बल्कि मैं तो आप को गहने दिखाने आयी थी काकी।”

  मुस्कुरा कर पारो लाली के गले से झूल गयी …

” इसका मतलब लाड़ो रानी को प्रखर बाबू खूब भा गए । है ना? ”

  लाली शरमा कर नीचे देखने लगी और देव उन दोनों को बातें करता छोड़ वहाँ से उठ कर कमरे के एक तरफ बने दरवाज़े को खोल बाहर छोटी सी बालकनी में चला आया। उसके मन में जो द्वंद चल रहा था न वो पारो समझ पा रही थी और न लाली । यहाँ तक कि उसकी माँ बड़ी माँ किसी को भी तो कोई फर्क नही पड़ता था।
   खैर उसकी खुद की शादी के पहले वो भी कहाँ इतनी गहराई से सोच पाता था, जितना अब सोचने लगा था।
   पारो के आने के बाद ही तो उसे इस बात का एहसास हुआ था।
   वो काफी देर  वहाँ खड़ा बाहर खिलता चाँद देखता रहा, काफी देर बाद जब वो अंदर आया तब तक लाली वहाँ से जा चुकी थी।
    पारो अपनी किताबें जमा कर रख रही थी, देव ने अंदर आकर बालकनी का दरवाजा बंद कर लिया और अपना तकिया उठाये सोफे की ओर बढ़ गया..

  ” रोज़ रोज़ कमर नही दुखती, वहाँ सोफे पर सोते हुए!”

  ना में सर हिला कर मुस्कुराते हुए देव ने अपना तकिया वहाँ बिछा लिया..

  ” आप यहाँ भी सो सकते हैं,पलंग बहुत बड़ा है, और मैं लात भी नही मारती । ”

पारो की बात सुन देव हँसने लगा…

  ” अरे हँसने की क्या बात है इसमें ? सच कह रही हूँ मैं। मुझसे घबराने या डरने की ज़रूरत नही है। ”

  ” तुमसे नही घबराता ! मैं खुद से अपने आप से डरता हूँ इसलिए तुमसे दूर रहता हूँ। ”

” मतलब ? “

“मतलब तुम नही समझोगी। अभी चुप चाप सो जाओ। हो सकता है कल तुम्हारा रिज़ल्ट आ जाये।”

हाँ में सर हिलाती पारो ने दरवाज़े पर सांकल लगाई और बत्तियां बुझा कर सोने चली गयी।

  अगले दिन भी दंसवी कक्षा का चिरप्रतीक्षित परिणाम किसी कारण से नही आ पाया लेकिन प्रखर के घर से रिश्ते के लिए सहमति आ गयी।
   और उसके अगले दिन ही वर पक्ष के गुरुजन दुल्हन को आशीर्वाद देने पहुंच गए।
   घर पर एक बार फिर उत्सव का माहौल था। सभी अस्त व्यस्त इधर उधर वर पक्ष की सेवा में लगे थे।
  देव को ये बाल विवाह रुच नही रहा था लेकिन घर वालों की लंबी चौड़ी फ़ौज के सामने उसकी हस्ती नक्कारखाने में तूती की आवाज़ से ज्यादा न थी।

   सगाई का वैसे तो देव के घर पर प्रचलन न था लेकिन प्रखर के घर वाले इन लोगों से थोड़ा ज्यादा आधुनिक थे इसी से अंगूठी की रस्म अदायगी के लिए सभी घर के बीचों बीच बने आंगन में जमा थे।
     पंडित जी के कुछ मंत्रोच्चार के बाद दूल्हा बाबू को उनकी भाभी ने चांदी की थाली में। गुलाबों की पंखड़ी के बीच रखी सोने की अंगूठी लाली को पहनाने के लिए आगे बढ़ाई, और दूल्हा बाबू ने जैसे ही अंगूठी हाथ में उठायी की सदर दरवाज़े को ठेलता दर्शन का परम मित्र प्रीतम भागता हुआ भीतर चला आया।
   हाथ में थामे अखबार को ज़ोर ज़ोर से हिलाता वो खुशी से जो चिल्लाता हुआ आया, उसे सुन वहाँ उपस्थित सब के सब सन्न रह गए…

  ” दर्शन अरे दर्शन कहाँ है रे तू। देख तेरी भाभी पूरे डिस्ट्रिक्ट में पहला स्थान लेकर पास हो आयी हैं।”

  कुछ समय को सारा ठाकुर परिवार प्रीतम को देखता रह गया…
   घर के पुरुष धीरे से उसकी ओर बढ़ने को हुए वहीं महिलाओं में कानाफूसी शुरू हो गयी…

. “देखा मैं ना कहती थी लड़का ज़रा पागल है, दीदी तुम तो अपने दर्शन को इससे बचा कर ही रखो।”

  तभी देव के पिता ने आगे बढ़ उसकी खबर लेनी शुरू कर दी

  “क्या बक रहा है रे लड़के? दर्शन की कौन सी भाभी प्रथम आ गयी।” उन्होंने पलट कर एक नज़र अपनी पत्नी को देखा। उनके आंखों ही आंखों में पूछे सवाल को समझ श्रीमती जी ने न में सर हिला दिया।
   उतनी देर में देव कूद कर प्रीतम के पास पहुंचा और उसके कंधे पर हाथ रखे उसे अपने साथ बाहर ले गया।
   प्रीतम “अरे देव दा , रुकिए तो। सुनिए तो ।” कहता उसके साथ बाहर चला गया।
   देव ने बाहर जाते ही उसके हाथ से अखबार लिया और फटाफट खबरों पर अपनी नज़र दौड़ाने लगा…
    प्रीतम सही कह रहा था पारो ने पूरे डिस्ट्रिक्ट मे सबसे ज्यादा नम्बर लाकर पहला स्थान प्राप्त किया था।
  देव की खुशी का ठिकाना नही था उसने आगे बढ़ प्रीतम को ही गले से लगा लिया।

  ” बहुत बहुत बधाइयाँ दादा। आज तो पार्टी लूंगा आपसे।”

” हाँ हाँ ले लेना प्रीतम । खुशखबरी भी तो गज़ब की सुनाई है तूने। ”

  ” कैसी खुशखबर देव ? “

  देव को लगा नही था कि उसके पीछे उसके पिता भी बाहर चले आये थे। वो हड़बड़ा गया..

” कुछ नही बाबा !

” क्या छिपा रहे हो देव? खैर अभी ये सब सोचने और बोलने का समय नही है। अभी अंदर चलो ,एक बार सगाई निपट जाए फिर तुमसे और इस झल्ले से निपटूंगा। तू भी अंदर आ जा। खाना खा कर ही जाना।”

  प्रीतम ने सर झुका कर हाँ बोला और देव के साथ ही अंदर चला आया।
   सगाई निपट गयी, भावी वर वधु ने सभी बड़ों का आशीर्वाद लिया और इसके साथ ही खाना पीना शुरू हो गया।
  सभी मगन थे सभी खुश थे,लेकिन सबसे ज्यादा खुश था देव।
   अब तक पारो को उसने कुछ नही बताया था। पर खुशी के साथ ही मन में एक शंका भी थी कि घर पर सच्चाई जानने के बाद क्या होगा?

सब को व्यस्त देख वो भी इधर उधर व्यस्त दिखने का प्रयास करने लगा।।

   ********

   वरुण की तबियत में दवाओं से कुछ सुधार आने लगा था। समस्या उसे पहले भी कुछ खास नही थी। बस कभी कभी उसका सर घूम जाया करता था।
    और अधिक दूर चलने पर हल्की सांस फूलने लगती थी। लेकिन दवाएं शुरू होने के बाद अब उसे आराम था।
   अस्पताल से छुट्टी के एक हफ्ते बाद  उसने वापस ऑफ़िस जॉइन कर लिया था।
  प्रज्वल और सारा के बहुत कहने पर भी उसे काम की दरकार थी ही क्योंकि किसी भी हाल में उसे पैसे जोड़ने ही थे!

   शाम में ऑफिस से वापस आकर वरुण ने अपने लिए कॉफी बनाई और बालकनी में आ बैठा। बाहर लंबी चौड़ी इमारतें देखना उसे बहुत भाता था। अभी अंधेरा नही हुआ था इसी से रास्ते पर आते जाते लोगों की भीड़ भाड़, पार्क से आता बच्चों का शोरगुल सब कुछ उसे अच्छा लग रहा था।
    दरवाज़े की आवाज़ हुई और सारा के साथ प्रज्वल भी अंदर चला आया..

.”ये लो तू यहाँ बैठा है। यार आज शनिवार है ,अब तक तैयार नही हुआ? “

” कहाँ के लिए?

” लाइव कॉन्सर्ट है स्मूथ जैज़ का यार , ये देख टिकट्स भी जुगाड़ ली हैं मैंने। मिल नही रही थीं। ये साले अंग्रेज हमसे बड़े भ्रष्टाचारी हैं। ब्लैक हो रहीं थी …

  बोलने के साथ ही प्रज्वल का ध्यान साथ खड़ी सारा पर चला गया और वो अपनी जीभ काट कर रह गया। सारा ने नाराजगी से उसे देखा और वापस वरुण की ओर देखने लगी…

” मैं नही जा रही किसी लाइव कंसर्ट पर। मुझे कहीं और जाना है। वरुण क्या तुम मेरे साथ चलोगे, मैं कृष्णा टेम्पल जा रही हूँ आज वहाँ कॄष्ण लीला का एक छोटा पार्ट दिखाया जाएगा ।”

  वरुण को सारा के साथ जाने में बिल्कुल रुचि नही थी, रुचि तो उसे जैज़ सुनने में भी नही आ रही थी लेकिन ये भी पता था कि अगर सारा के साथ नही गया तो प्रज्वल ज़बरदस्ती उसे पकड़ कर ले जाएगा।

  ” ओके मैं तुम्हारे साथ चलूँगा सारा। ”

  सारा ने विजयी मुस्कान से प्रज्वल की ओर देखा और उसने ना में सर हिलाते हुए अपने दोनों हाथ खड़े कर दिए। जेब से टिकट्स निकाल कर उसने फाड़ कर ट्रेश में डाला और उन लोगों की तरफ आगे बढ़ गया।

   तीनों कुछ देर में एक साथ मंदिर के लिए निकल गए।

   उनके पहुंचते में लीला प्रारम्भ हो चुकी थी। बरसाने में होली का प्रसंग चित्रित था। उल्लास लास में राधिका रानी और गोपियाँ मगन थी कि उन सब को एक ओर से देखते मंदिर के पंडित श्री केशव व्यास माइक थामे आगे चले आये….

  ” आप सभी जानतें है जहाँ कृष्ण है वहाँ राधा और जहाँ राधा है वहाँ कृष्ण।
   राधा का अर्थ होता है मोक्षप्राप्ति को इच्छित जीव। तभी तो गोकुल की हर गोपबाला में राधा थी,और हर राधा के भीतर उसे मोक्ष प्रदान करता कान्हा।
  लेकिन जैसे ही कृष्ण कान्हा से द्वारिकाधीश हुए उनसे गोप गोपियां राधा और उनके जीवन का सारा रस विलग हो गया।
   क्योंकि अपने कर्मो के मायाजाल में फंसे उस नीलवर्णी सखा से मोक्ष तो पहले ही सबने प्राप्त कर लिया था।
  कान्हा के दो मातापिता थे, दो गुरु थे, अनंत सखा थे, अस्सी पुत्र और चार पुत्रियां भी थी लेकिन सखी केवल एक थी… राधा ।
   द्रौपदी को भी उनकी सखी माना जाता है पर वो उनकी मानस भगिनी भी मानी जाती है। जबकि राधा उनकी एकमात्र सखी थी।
   एक ऐसी सखी जिसके संसर्ग में कान्हा अपने सम्पूर्ण रूप में अपने पूरे व्यक्तित्व के साथ होते थे। बिना राधा के तो वो भी सांसारिक प्रपंचों में कर्मरथी हो जाते थे जहाँ हर किसी को उनके एक अलग व्यक्तित्व के दर्शन हुए।
   कृष्ण पार्थसारथी हुए। ये भी सांकेतिक रूप से दिखाता है कि जिस प्रकार उन्होंने युद्ध में पार्थ की सहायता की उसी तरह वो मानव मन के विचार सारथी हैं।
   विचारकों के विचारक!! ज्ञानियों में ज्ञानी!! अजेय योद्धा!! तत्वज्ञ योद्धा।
    योद्धा इसलिए नही क्योंकि उन्होंने अपने परिश्रम से युद्ध लड़े ,बल्कि उन्होंने अपनी और दूसरों की जीवन की समस्याओं में समाधान ढूंढा। उनके अनुसार जीवन का अर्थ है अपने अंदर की तेजशक्ति का शोधन। जो व्यक्ति इस शोधन को करने में समर्थ हुआ वो अपने अंदर के हर विकार को जीत सकता है। शारीरिक ही नही मानसिक भी….”

  पंडित जी की बात ध्यान से सुनते वरुण ने अचानक अपना हाथ ऊपर कर दिया…
   उसके हाथ उठाते ही पंडित जी ने हाथ से उसे कहने कहा….

” आपने कहा कृष्ण हमारे जीवन के भी सारथी हैं।”

“हाँ बिल्कुल!”

  ” और उनके अनुसार जीवन का तातपर्य अपने अंदर की शक्ति का शोधन है। तो क्या अपने अंदर ऐसी शक्ति जागृत की जा सकती है जो आपके अंदर के विकारों को सही कर दे।”

” अगर तुमने पूरे विश्वास से खुद को कृष्ण समर्पित कर दिया तो तुम्हारे सारे विकार वो हर लेता है और अपने अंदर का सारा आह्लाद तुम्हारे अंदर भर देता है।

उनकी बात सुन वरुण सोच में खो गया……
लीला समाप्त होते ही प्रसाद वितरित होने लगा… भोग में खिचड़ी थी, जो वरुण के गले से नही उतरती थी लेकिन प्रसाद देने आए महिला के कहने पर की “प्रसाद को मना नही करते ,ज़रा सा चख तो लो , खुद ब खुद पुरी खा जाओगे। ” उसने प्रसाद का दोना पकड़ लिया।
    गरमा गरम खिचड़ी चखते ही वरुण चौन्क गया। खिचड़ी ऐसी भी हो सकती है?
  उसने फटाफट एक दोना खत्म कर बड़े शरामते हुए उन्हीं आंटी जी से एक और दोना भी मांग लिया…

” देखा मैंने कहा था न?”मुस्कुरा कर उसके हाथ मे भोग की खिचड़ी देते हुए वो आगे बढ़ गईं…..

  “खिचड़ी ऐसी बने तो कभी कभी खाई भी जा सकती है।”
     वरुण की बात पर पंडित जी भी बोल पड़े..

  ” ये स्वाद खिचड़ी का नही बल्कि उसके भोग की होने का है। वो अनन्तदृष्टा जिस पर नज़र डाल दे उसका स्वाद बढ़ ही जाता है। ”

  पंडित जी की बात पर वरुण मुस्कुरा कर उन्हें देखने लगा…

” तो उससे कहिये ना मुझ पर भी नज़र डाल दे। ”

  “तुम पर तो डाल ही चुका है तभी तो नास्तिक नास्तिक का रट लगाने के बाद भी तुम बार बार यहाँ कैसे खिंचे चले आते हो? तुम खुद सोचो? तुम्हारा जन्म तुम्हारे कर्म और तुम्हारा भाग्य सब वो पहले ही रच चुका है। तुम और कुछ नही बस उसके द्वारा रचे संसार रूपी नाटक के एक अभिनेता मात्र हो…
    वो वहाँ बैठे सब को देख रहा है।


  ********

   प्रखर के घर वालों के जाते ही घर के लगभग सारे पुरुष और महिलाएं एक साथ आंगन में जमा हो गए।सभी की नज़रों में एक ही सवाल था।
  महिलाओं की नज़रे प्रीतम पर अटकी थी तो वहीं देव के पिता देव को घूर रहे थे..

“” तुम दोनों में से कोई बताएगा कि आखिर चल क्या रहा है? “

  प्रीतम ने डरते डरते अपने कान पकड़ लिये और देव की ओर इशारा कर दिया…
   देव ने एक बार अपने गले को अच्छे से साफ किया…..
     उसे समझ आ गया था कि वो सिकंदर की सेना के सामने खड़ा पोरस है और अब उसकी सच्चाई ही उसकी रक्षा कर सकती है।
  मन ही मन माँ काली को स्मरण कर उसने बोलना शुरू किया…

  ” मैं आप सभी से एक बात कहना चाहता हूं। एक बात थी जो मैंने आप सभी से छुपा रखी थी और इस पूरी बात में सारी गलती और सारा दोष मेरा है मतलब मेरे अकेले का है।
    आप सब नहीं जानते इस बात को की पारो भी दर्शन की क्लास में पढ़ाई कर रही थी।  बाबा जी से झाड़-फूंक करवाने के बहाने मैं पारो को ट्यूशन क्लासेस लेकर जाया करता था। जहां वह अपने कठिन विषयों के लिए मास्टर जी से ट्यूशन लिया करती थी।
    कभी सुबह के वक्त और कभी शाम के वक्त बाबाजी मंत्र फूंकने  जो बुलाया करते थे वह असल में मास्टर जी होते थे जो पारो को पढ़ाने बुलाते थे।
  बीच में जब हर दो दिन में हमें सुबह मंत्र फूँकवाने जाना पड़ रहा था उस समय पारो की परीक्षाएं चल रही थी।
     पारो ने बहुत मेहनत और लगन से पढ़ाई की और उसका परिणाम आप सबके सामने हैं।
मैं आप सभी से हाथ जोड़ कर यह कहना चाहता हूं कि पारो एक होशियार लड़की है जिसका पढ़ने लिखने में बहुत दिल लगता है आपसे यह भी कहना चाहता हूं।
     वैसे मैं जानता हूँ मेरे परिवार वाले शिक्षा के महत्व को अच्छे से समझतें हैं और बड़े हृदय से शिक्षित व्यक्तियों का सम्मान भी करतें हैं।
  तो आज अगर आपके घर की बहु पढना चाहती है तो हम क्योंकर उसे रोकें भला?
    शिक्षा हमारा हम सबका बुनियादी अधिकार है, हमारे संविधान के हमारे मौलिक अधिकारों में भी आता है।
   तो हम पारोमिता से उसका बुनियादी अधिकार छीनने वाले कौन होतें हैं भला?
    मैं जानता और समझता भी हूँ कि आप लोग अपनी बेड़ियों में संस्कारों में जकड़े हुए है लेकिन साथ ही ये विश्वास भी दिलाता हूँ कि घर से बाहर निकल कर, और पढ़ाई कर के भी पारो आपकी बहु ही रहेगी, और बिल्कुल जैसे आज है ऐसी ही हमेशा रहेगी।”

  सब सांस रोके वरुण की बात सुनते रहे… वरुण ने अपने बाबा की तरफ देखा और फिर ठाकुर माँ की तरफ..

  ” ठाकुर माँ आप रात दिन भगवान का जप करती हैं , बताइये क्या ही अच्छा होता अगर आप उनकी सुख सागर मुझसे या दर्शन से सुनने की जगह खुद पढ़ पाती।
    माँ आप मुझसे हमेशा कहतीं हैं ना कि बाबून मेरे परलोक गमन के पहले जब मेरे मुहँ में गंगा जल और तुलसी देगा तब मुझे गीता का सत्रहवाँ अध्याय सुना देना ,एक इस अध्याय को सुन लेने से ही मोक्ष मिल जाता है तो बोलो माँ अगर तुम्हारे बाबुन को पढ़ना ही नही आता तो वो पढ़ कर सुनाएगा कैसे?
     तो अगर बाबुन पढ़ सकता है तो पारो क्यों नही? जब मुझे अपनी मर्ज़ी से खाने पीने पहनने ओढ़ने घूमने फिरने का अधिकार है तो सिर्फ लड़की का जन्म लेने और किसी के घर की बहु बन जाने की पारो को इतनी बड़ी सजा क्यों मिले ?
     अगर उसकी चाह है कि वो आगे पढ़ाई करे तो मैं अपना पति धर्म निभाते हुए अपनी पत्नी की इच्छा का सम्मान करते हुए उसे आगे पढ़ाना चाहता हूँ। “

  ” तो कलक्टर बनाएगा अपनी बहु को?

इतनी देर में उसके बाबा के मुहँ से इतना ही निकल पाया।

  ” हाँ बाबा अगर वो बनना चाहेगी और उसमें इतनी काबिलियत होगी तो मैं ज़रूर उसकी मदद करूँगा। हम लाली को तो स्कूल भेजतें ही हैं ना कल को अगर उसके ससुराल वाले उसे और पढ़ाना चाहेंगे तो क्या आप लोग मना कर देंगे। बोलिये बाबा? काका जी आप बताइए? माँ बोलो? ”

  सब को चुप देख वरुण की हिम्मत और बढ़ गयी और उसने आखिरी ब्रम्हास्त्र भी चला ही दिया …

   ” ठीक है अगर आप सबको पारो की पढ़ाई से परेशानी है तो मैं उसे लेकर कहीं और चला जाऊंगा रहने। ”

   ” बस कर बाबुन ! कोई कुछ नही बोल रहा तो तू कुछ भी कहता चला जायेगा। अब हम औरतों का क्या है? अगर ये पढ़ती है या नही इससे हमारी रसोई में क्या फर्क पड़ जायेगा? घर के मर्द ही सोच समझ कर बता सकतें है कि घर की बहु नंगे सर बाजार हाट घूम सकती है कि नही? “

  “माँ बातों का रुख मत मोड़ो!”

“रे मैं बातों का रुख नही मोड़ रही मेरे कहने का मतलब यही है कि हम औरतें क्या बोलें? जो बोलना है यही लोग बोलेंगे।”
   देव की बातों के बीच ही घर की औरतों के नैन मटक्के में बिना एक शब्द बोले ही सारी बातें हो गईं थीं।
   पुरुष सभी एक तरफ हाथ बाँधे खडे थे आख़िर देव के छोटे काका सबसे पहले बोल पड़े..

  ” भई मुझे तो कोई समस्या नही है। आखिर मोइत्रा मालिनी हों या शुभस्मिता सरकार । ये भी तो हमारे बंगाल की महिलाएं है आज पढ़ लिख कर परचम लहरा रहीं हैं ना।

  देव के पिता ने एक नज़र अपने भाई पर डाली की वो सकपका कर चुप हो गए..

. ” नही दादा मेरा मतलब था…

” तुम्हारा जो भी मतलब रहा हो और बाकियों का भी जो मतलब रहा हो मुझे वही निर्णय लेना है जो इस घर के लिए सही साबित होगा।
   और पूरी तरह सोच कर मैंने ये निर्णय लिया है कि पारो आगे पढ़ाई जारी रखेगी, लेकिन इससे उसके पहनने ओढ़ने में कोई फर्क नही आना चाहिए और न ही उसके स्वभाव में…
  
   अपनी बात पूरी भी नही कर पाये थे देव के पिता की देव उनके चरणों में गिर पड़ा…

  ” थैंक यू !! थैंक यू बाबा!”

  मुस्कुरा कर देव ने पारो की ओर देखा, अब तक सबसे किनारे खड़ी आंसू बहाती पारो के आंसुओं से भीगे चेहरे पर गीली गुलाबी सी मुस्कान रेंग गयी….

  क्रमशः

aparna …

   दिल से ….

 
   मैं बहुत बार अपनी पसंदीदा किताब का ज़िक्र कर चुकी हूँ। उस वक्त मैं चौदह या पंद्रह साल की थी जब मृत्युंजय पढ़ी थी और उसके बाद पूरी तरह से मैं दानवीर कर्ण की प्रीत में पूरी तरह खुद को भी भूल गयी थी।
   गनीमत रही कि मैंने एग्जाम पास कर लिए, गणेश जी ने फेल होने से बचा लिया लेकिन उस किताब को पढ़ने के बाद और कोई किताब पढ़ने की इच्छा ही नही रही। जबकि मेरे जैसे पढ़ने की शौकीन जो खाते वक्त भी किताब खोले रहती थी ने मृत्युंजय के बाद एक लंबा ब्रेक ले लिया था।
    उसके बाद मेरी माँ ने मुझे एक और किताब लाकर दी… “युगन्धर ”   श्रीकृष्ण के जीवन पर रचित ये किताब भी शिवजी सावंत द्वारा मराठी में। लिखी गयी जिसका अनुवाद उनकी धर्मपत्नी श्रीमती मृणालिनी सावंत ने हिंदी में किया।
    पर उस समय मृत्युंजय का बुखार ऐसा था कि युगन्धर को दो पेज के बाद आगे नही बढ़ पायी और न पढ़ पायी।

   समिधा का विचार जैसे ही दिमाग मे आया सबसे पहले युगन्धर याद आयी।
   अपनी किताबों की आलमारी खोले मैं उसे ढूंढने लगी। आप सब विश्वास नही करेंगे मुझे दो घण्टे सिर्फ किताब निकलने में लग गए, ना इसलिए नही की वो कहीं पीछे खो गयी थी, बल्कि इसलिए कि आलमारी खोलते ही सब की सब ऐसा लगा मुझसे इतने दिन से न मिलने की शिकायत करने लगीं। फिर एक एक कार कभी मन्नू भंडारी जी कभी ममता कालिया जी कभी हिमांशु जी को खोल खोल कर एक एक कहानी पढ़ती चली गयी।

    समिधा में। आगे जो भी कृष्ण सम्बंधित लिखूंगी उसके पहले युगन्धर ज़रूर पढूंगी जिससे जो भी लिखूं तथ्यात्मक हो और ये क्यों ? या ये कैसे? के सवाल पैदा न हों।

   समिधा पूरी तरह से समर्पित है उस मुरलीधर को जिसकी कृपा से मेरी लेखनी चल पा रही है।

  🙏🙏🙏🙏🙏

  मुझे पढ़ने के लिए आप सभी अपना कीमती वक्त निकालतें है और उसके बाद प्रशंसा के शब्दों से मुझे अभिभूत कर जातें हैं।
   आप सभी के स्नेह के लिए हृदय से आभार धन्यवाद।

आपकी

aparna..

  
   




  
 
 
  

समिधा-12




   समिधा — १२



      ढेर सारी शॉपिंग निपटने के बाद पूरा सामान सारा को सौंप कर अपनी तरफ गाड़ी का दरवाजा खोलते हुए वरुण का सर इतनी जोर से घूम गया कि वो खुद को संभाल नही पाया और बेहोश होकर गिर पड़ा।
   उसे दूसरों की मदद से गाड़ी में डाल कर सारा ने गाड़ी तुरंत अस्पताल की ओर घूमा ली।
   उसकी एक दोस्त किसी अस्पताल में नर्स का काम किया करती थी, उसे ही फ़ोन पर बात कर के सारा उसके पास पहुंच गई।

  अस्पताल पहुंच कर आपातकालीन चिकित्सा में वरुण को भर्ती किये जाने तक में उसे होश आ गया। खुद को अस्पताल में पाकर वो आश्चर्य से सारा की ओर देखने लगा।
   उसकी हालत के बारे में उसे बता कर सारा ने उसे ढांढस बंधाया और प्रज्वल को भी बुला लिया।
  उस रात वरुण को अस्पताल में ही भर्ती रखा गया। उसकी साधारण चिकित्सा शुरू करने के साथ ही कई ज़रूरी जांचे भी उसकी हो चुकी थी जिनकी रिपोर्ट्स अगले दिन आनी थी।
  
   अगली सुबह प्रज्वल भी वहाँ पहुंच गया। सारा ने अपने जाने की टिकट्स कुछ समय के लिए पीछे करवा ली..
     प्रज्वल हैरान परेशान सा वरुण के कमरे में बैठा था…..

  “क्या यार ? क्या हाल बना रखा है ये ? कितनी बार कहा था तुझसे कि एक बार डॉक्टर से मिल ले लेकिन तू सुने किसी की तब ना।”

  ” अरे ऐसी कोई घबराने की बात नही है यार। ये डॉक्टर डराते ज्यादा हैं अब अगर भर्ती किये बिना छुट्टी कर देते तो इनकी कमाई कहाँ से होती?  तू चिंता मत कर,बस कमज़ोरी की वजह से बेहोशी आ गयी थी।”

  उन दोनों की बातों के बीच ही सारा हाथ में कुछ रिपोर्ट्स लिए चली आयी…

  ” चिंता की बात तो है वरुण। तुम्हारी प्रॉब्लम ज़रा सीरियस है।”

  वो दोनो चौन्क कर उसे देखने लगे …

  ” क्या कह रही हो सारा ? कैसी चिंता की बात?”

  प्रज्वल सारा से पूछ बैठा..  सारा ने रिपोर्ट्स उसकी ओर बढ़ा दीं…
   रिपोर्ट्स देखते हुए झुंझला कर प्रज्वल ने सारा से शिकायती लहज़े में कहना जारी रखा..

” यार ये डॉक्टरों की बोली समझ आती तो मैं खुद डॉक्टर न बन जाता। क्या लिखा है इसमें?”

” इसमें लिखा है वरुण के हार्ट का वॉल्व जो बचपन में ही बंद हो जाना चाहिए अभी तक बंद नही हुआ है। ये वॉल्व एक उम्र के बाद स्वत: बंद हो जाना चाहिए जो वरुण के में नही हो पाया है। और इसकी एकमात्र चिकित्सा ऑपरेशन ही है।
    सिर्फ इतना ही होता तो फिर भी ठीक था लेकिन उसी के साथ ऑस्टिअल स्टेनोसिस भी है।”

  ” अब ये क्या बला है? “

  ” हार्ट के सर्कुलेशन में अपरोक्ष रूप से काम आने वाली वेन्स में ब्लॉकेज है,ऐसा भी साधारणतया नही होता, डॉक्टर खुद भी इसी लिए दुबारा सारी जांचों में लगे हैं, लेकिन सब कुछ ऐसा है कि वरुण तुम्हे जल्दी से जल्दी ऑपरेशन करवाना ही पड़ेगा। “

   वरुण अपने बेड पर बैठे बैठे सोच में डूब गया। उसे अभी नौकरी में आये बहुत साल तो हुए नही थे। उसने नौकरी में आते ही अपने लिए बीमा पॉलिसी ली तो थी लेकिन वो भी इनकम टैक्स सेविंग्स के लिए। उसने कोई भी स्वास्थ्य बीमा नही ले रखा था। हालांकि ऑफिस के नियमों के अनुसार भारत में कुछ भी होने पर उसकी बीमारी का खर्च उसका ऑफिस ही उठाता लेकिन भारत से बाहर कुछ भी होने पर उस पर हुए खर्च का भुगतान उसका खुद का था।
     पच्चीस छब्बीस की उम्र में वैसे भी कौन सी बड़ी बीमारी उसे हो सकती थी, यही सोच उसने अब तक अमेरिका के लिए किसी स्वास्थ्य बीमा का फॉर्म नही डाला था।
       एक मध्यमवर्गीय परिवार के इकलौते लड़के को तो अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी किये बिना बीमार पड़ने का भी हक़ नही था।

  ” क्या सोचने लगा वरुण? “

  ” हेल्थ इंश्योरेंस के बारे में सोचने लगा था यार। यहाँ के लिए कोई पॉलिसी ली नही है ना। “

  ” तो इसमें इतना क्या सोचना, आज ही ऑफिस एच आर से बात करता हूँ मैं। अगर यहाँ के लिए बीमा की सुविधा नही देंगे तो हम अपने देश ही चलेंगे दोस्त। वहाँ के डॉक्टर भी बहुत अच्छे हैं, बल्कि मुझे तो इन गोरों से ज्यादा हमारे हिंदुस्तानी डॉक्टर्स पर विश्वास है।”

  ” हम्म वही मैं भी सोच रहा था। तू एक बार रूम से मेरे सारे पेपर्स लेकर ऑफिस में पता कर भाई। क्योंकि खुद के पैसे लगा कर ऑपरेशन करवाना तो बड़ा मंहंगा पड़ेगा।”

” लेकिन हेल्थ पहले है वरुण! तुम ठीक रहे स्वस्थ रहे तो पैसे तो कमा ही लोगे न।”

” सारा तुम्हारी बात सही है लेकिन मेरे जोड़े हुए पैसे मेरी छोटी बहन के लिए है। उसके लिए भी रिश्ता देख रहें हैं, माँ पापा की कोशिश यही है कि मेरी शादी से पहले उसकी शादी निपट जाए।”

” पर वो तो तुमसे छोटी है ना?”

  ” दो साल ही छोटी है सारा। और हमारे तरफ ऐसा ही होता है। बहन की शादी निपटा कर ही भाई अपने लिए सोचता है। हमारे यहाँ शादी में खर्च भी तो बहुत करना पड़ता है।”

  “तो ऐसी जगह करना जहाँ खर्च कम हो। ”

  वरुण सारा की बात पर ज़ोर से हँसने लगा…

  ” मान लो ऐसा लड़का मिल भी गया जिसने दहेज लेने से इनकार कर दिया तब भी उसके घर वालों की डिमांड की शादी अच्छे से कीजियेगा में ही लाखों फुंक जाते हैं। खैर तुम नही समझोगी यार, तुम्हारे यहाँ ऐसा कल्चर जो नही है।”

  सारा मुस्कुराने लगी…

  ” हम्म ! हमारे कल्चर का तुम इंडियन्स मज़ाक बनाते हो लेकिन शादी के खर्चों के मामले में हम तुम लोगों से काफी बेटर हैं। हम शादी करतें हैं दिखावा नही। वो सब छोड़ो,सबसे पहले तो तुम अपने घर वालों को बताओ कि तुम्हारी क्या हालत है फिर आगे का सोचना। हो सकता है तुम्हारे घर वाले खुद आगे बढ़ कर तुम्हें कहें कि पहले ऑपरेशन करवा लो। “

  प्रज्वल और सारा के ज़ोर देने पर वरुण घर पर अपने पिता को अपनी हालत बताने को राजी हो गया, उसने घर पर फ़ोन लगाया, इस वक्त भारत में शाम हो रही थी। फ़ोन उसकी मासी ने उठाया, और हड़बड़ाते हुए बातों में लग गयी…

” अच्छा हुआ बंटी तेरा फ़ोन आ गया।”

  ” क्या हुआ मासी? सब ठीक तो है ना?”

” हाँ बेटा , यहाँ सब बढ़िया है। अभी रोली को देखने लड़के वाले आये हुए हैं। तुझे तेरी माँ ने बताया तो होगा ही ।”

  वरुण को याद आया ,माँ ने कुछ चार पांच दिन पहले उसे बताया तो था कि रोली के रिश्ते की कहीं बात चल रही है। उसके चेहरे पर एक लंबी सी मुस्कान चली आयी और आंखों में उसकी प्यारी सी बहन की भोली सी तसवीर।

  ” हां मासी ! माँ ने बताया था ,मैं ही ज़रा भूल गया था। तो अभी सब बैठे हैं क्या? “

“हां सब बैठे हैं बातचीत चल रही है। मैं तो यहाँ रसोई में तेरी माँ की मदद कर रही थी, इसलिए फ़ोन उठा लिया।

  “कैसा है लड़का?”

  ” बहुत अच्छा है बंटी। बैंक में पी ओ है,सरकारी नौकरी है, कमाता ठीक ठाक है। एक ही इकलौता लड़का है इसलिए उसके माँ बाप की भी तो इच्छा होगी न कि शादी अच्छे से हो।”

  ” हाँ मौसी ! शादी तो अच्छे से ही होगी।”

  ” बस बंटी तेरा ही तो भरोसा है। ये ले माँ आ गयी तेरी। बात कर ले।”

  वरुण ने जो बताने के लिए फ़ोन किया था वो उस बात को ही भूल बैठा, मासी के आवाज़ की चहक ने उसे कुछ राहत दी थी लेकिन अभी माँ से बात होनी बाकी थी….

” बंटी ! बेटा लड़का बहुत अच्छा है। शादी के लिए वो लोग ज़रा जल्दबाजी में लग रहे हैं। बस …

” बोलो न माँ ! क्या हुआ?”

  ” बेटा अकेला ही लड़का है, उनके भी सारे सुख स्वप्न
इसी एक से तो जुड़े हैं। कह रहे शादी काफी मोटी चाहिए।”

  ” मतलब कितने की डिमांड है वो बताओ माँ?”

  ” बेटा पच्चीस कैश बोल रहे हैं,उनका कहना है सामान हमें कुछ नही चाहिए, बस शादी अच्छी हो। शादी अच्छी मतलब कि शादी में अलग से हमारा बीस तीस लग जायेगा।
   अब तेरे पापा कुछ अपने पी एफ और ग्रेच्यूटी से निकाल भी लेंगे तब भी बेटा तुझे लगभग तीस करना पड़ सकता है।
   तू हां बोले तो हम लोग आगे सोचेंगे वरना देखी जाएगी।
  बंटी अभी फ़ोन रखती हूं, वहाँ सब बाहर रास्ता देख रहें हैं। रात में बात करूँगी बेटा।”

  वरुण के हां कहते ही उसकी माँ फ़ोन रखे बाहर निकल गईं।
   प्रज्वल और सारा उसका चेहरा देखते रहे और वरुण ने ना में सर हिला दिया।

कुछ देर में ही राउंड लेने वाला डॉक्टर भी वरुण के कमरे में चला आया, उसने भी वही सारी बातें बताई जो सारा पहले ही बता चुकी थी।
    वरुण ने ऑपरेशन करवाने की बात मान ली ।
कुल जमा खर्च पूछने पर डॉक्टर ने लगभग 30 हज़ार डॉलर के खर्चे का मोटा मोटा हिसाब बता दिया।
    कुछ दवाओं के साथ ही उसी शाम वरुण की छुट्टी हो गयी।
   उसकी सारी जांचों में एक जांच उसकी एंजियोग्राफी भी हुई थी। उन्हीं सारी जांचों और एक दिन के बिल में भी उसके काफी पैसे वहाँ खर्च हो गए थे। उन्हीं सब का हिसाब करता वरुण प्रज्वल और सारा के साथ अपने कमरे में वापस लौट आया।
    उन दोनों का कहना था कि वरुण को बिना देर किए घर पर बता देना चाहिए और फिलहाल रोली की शादी को कुछ समय के लिए पीछे कर उसका इलाज पहले करवा लेना चाहिए।
   लेकिन वरुण अपनी ही ज़िद पर अड़ा था, उसके अनुसार अगर अच्छा रिश्ता मिला है तो उसके जीवन की सबसे पहली प्राथमिकता उसकी बहन है। उसका जीवन सुखमय रहेगा तो वो भी सुखी रहेगा और आगे पीछे कभी भी ऑपरेशन करवा ही लेगा।

  ” वरुण ज़िन्दगी से बढ़ कर कुछ नही होता। तुम समझते क्यों नही। अगर तुम्हें ही कुछ हो गया तो तुम्हारी बहन की शादी कैसे होगी ? ये सोचा है कभी?”

  सारा की बात पर वरुण मुस्कुराने लगा..

  ” मैं नही रहा तो मेरी बीमा पॉलिसी मेरे पैरेंट्स और बहन के काम आ जायेगी सारा।”

  सारा ने अपना हाथ अपने ही माथे पर दे मारा

  ” तुम समझते क्यों नही। तुम्हारी पॉलिसी के पैसों से कहीं ज्यादा तुम कीमती हो तुम्हारे घर वालों के लिए। तुम रहोगे तो पैसे हमेशा ही कमा कर दे सकते हों। तुम्हारे न रहने पर एक बार मिले पैसे कितने दिन चलेंगे भला।
   तुम्हारे भगवान भी यही कहतें हैं,कर्म कर ! इसका मतलब कर्म ही सब कुछ है। और कर्म करने के लिए हमारा ज़िंदा और स्वस्थ रहना बहुत ज़रूरी है।”

” तुम्हें बहुत विश्वास है ना हमारे भगवान पर। तो चलो यही चैलेंज रहा, अब जब तक मैं अपने सारे काम नही निपटा लेता तुम्हारा भगवान मुझे कुछ नही होने देगा। और अगर मुझे इस बीच कुछ भी हो गया तो तुम मान लेना कि भगवान नही होता।”

   सारा और प्रज्वल एक दूजे का चेहरा देखने लगे। सारा को इंडियन माइथोलोजी पर भरोसा तो था लेकिन वो भी अचानक से वरुण के इस बर्ताव पर क्या कहे क्या नही इसी सोच में चुप खड़ी रह गयी….
    आखिर कुछ देर में खुद को संयत कर उसने कहना शुरू किया…

” हां वरुण मुझे है विश्वास तुम्हारे भगवान पर। मैंने जितनी भी किताबें पढ़ीं हैं वो मुझे बस उस एक अद्भुत शक्ति पर आंखें मूंदे भरोसा करने ही कहती हैं लेकिन तुम्हारे भगवान खुद तुमसे कहतें हैं कि सफलता चाहिए तो कर्म करना ही होगा।”

  ” मैं वो सब नही जानता,मैं बस इतना मानता हूँ कि अगर छोटी की शादी तक मुझे कुछ नही हुआ तो मैं अपना सारा जीवन उसी भगवान को समर्पित कर दूंगा। पूरी दुनिया में उसके नाम का डंका बजाऊंगा और हर अविश्वास और अंधविश्वास को दुनिया से हटा कर रहूँगा। बोलो मानती हो मेरी शर्त?”

” मानती हूँ। क्योंकि मैं जानती हूँ तुम्हारा भगवान तुम्हें कुछ नही होने देगा।”

  एक व्यंग भरी हंसी वरुण के चेहरे पर आई और चली गयी। वो अपने बेड पर बैठा खिड़की से बाहर खिले फूलों को देखता रहा।
     प्रज्वल उतनी देर में तीनों के लिए कॉफी बना कर ले आया…

  “” चल भाई मान ली तेरी बात। लेकिन भगवान भरोसे बैठने का ये मतलब हरगिज़ नही की तुम बस चुपचाप बैठ जाओ। डॉक्टर ने जो दवाएं और परहेज़ बताया है वो सब तो फॉलो करना ही पड़ेगा। बोल ठीक है ना।”

  ” अरे हाँ यार। मैं भी कोई आत्महत्या थोड़े न करना चाहता हूँ। मैं भी तो यही चाहता हूँ कि तुम्हारा भगवान जीत जाएं और मैं उससे हार जाऊँ।”

  वरुण के चेहरे पर आई मुस्कान देख कर सारा भी मुस्कुरा उठी…

  ” असल बात तो ये है कि तुम अंदर ही अंदर भगवान पर मुझसे भी कहीं ज्यादा भरोसा करते हो वरुण। और उसी भरोसे को साबित करने इतनी बड़ी कसम ले ली। पर चलो अच्छा ही है, भगवान की शरण में सब अच्छा ही होगा। अब चिंता की कोई बात नही है।”

  दूर कहीं किसी मंदिर में बजते शंख की आवाज़ वहाँ उस कमरे में बैठे वरुण तक भी चली आयी….

********

   सुबह सुबह ठाकुर माँ के शंख की आवाज़ सुन कर पारो की हड़बड़ा कर नींद खुल गयी। आँखे खुलते ही उसकी नज़र ठीक सामने सोफे पर सोए देव पर पड़ी और वो मुस्कुरा कर अपने खुले बालों का जुड़ा बनाती  बाहर निकल गयी।
     आज उसे सुबह से ही खूब सारा काम था। घर पर लाली को देखने लड़के वाले आने वाले थे।
    और आज ही उसकी साल भर की मेहनत का परिणाम भी आने वाला था।

    वो नहा धो कर नीचे रसोई में अपनी सास की मदद करने पहुंच गई। कुछ देर में ही देव भी नीचे चला आया। नीचे घर के बीचोबीच खुले आंगन में एक ओर ठाकुर माँ अपनी सुमिरनी लिए बैठी थी, वहीं एक ओर देव के पिता और काका चाय पीते आपस में बातों में लगे थे दूसरी ओर देव हाथ में अखबार थामे खबरों को पढ़ने में लगा था।
   पारो ने धीमे कदमों से आकर देव के पास चाय का प्याला रख दिया। देव ने एक नज़र कप पर डाली और पारो को देख मुस्कुरा कर अपना कप उठा लिया।
   कप जिस प्लेट में रखी थी उसमें एक छोटी पर्ची थी, चाय पीते हुए सबकी नजर बचा कर देव ने पर्ची उठा ली….

  ” आज परीक्षा परिणाम का दिन है। ”

  पर्ची पढ़ते ही देव को याद आ गया कि कल रात ही पारो ने उसका ध्यान इस तरफ दिलाया था। उसे ये भी मालूम था कि उसके पढ़ने के बाद अखबार उसके पिता के पास पहुंचता है और घर की किसी भी महिला के हाथों में अखबार का दिखना बहुत बड़ी अनहोनी की बात हो जाती। देव ने फटाफट सारा अखबार अल्टी पलटी कर लिया लेकिन कहीं परिणाम के बारे में कुछ भी नही लिखा था। उसने रसोई की ओर झांक कर देखा पारो बैंगन काटते हुए उसे ही देख रही थी, उसने न में सर हिला दिया।

  ” ये क्या तैयारियां चल रहीं है माँ?”

  ” आज लाली को देखने लड़के वाले आने वाले हैं बाबून ! तू भी दुकान खोल कर वापस आ जाना, या फिर आज घोष बाबू को दुकान खोलने बोल दे ना। ”

” इतनी जल्दी क्या है माँ ? लाली तो बच्ची है अभी।”

  ” हम्म लाली की उम्र की तेरी भी दुल्हन है बाबून ! अब तू ज्यादा दिमाग मत चला, और हम लोगों को काम करने दे। ”

  “लेकिन माँ ! तुम खुद भी तो औरत हो ,समझती हो कि एक बच्ची की जल्दी शादी उसके ऊपर कितनी सारी ज़िम्मेदारियाँ लाद जातीं हैं, सिर्फ शारीरिक ही नही मानसिक रूप से भी…

” बस बाबुन ! मैंने कहा न ज्यादा दिमाग मत चला। मैं जब इस घर में शादी होकर आयी थी तब मेरी उम्र दस बरस की थी, तेरी मंझली और संझली काकी तेरी बड़ी माँ उनकी बहु सभी लगभग इसी उम्र में आयीं हैं। आज किसे कोई बीमारी है बता तो भला? सभी शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ हैं। तुम लोग चार किताबें पढ़ कर ज्यादा ज्ञानी बन जाते हो। जब स्कूल में पढ़ने वाली पंद्रह सोलह साल की लड़कियां घरों से भाग कर शादी कर लेती हैं तब? तब कोई नही कहता लेकिन हम उसी उम्र में ब्याह करें तो हम गलत हो जातें हैं।
   बाबुन बहस करने से अच्छा है हमारी मदद कर, जा बाजार से ये सारा सामान लेते आ बेटा।”

  देव समझ गया था घर पर लाली के लिए कुछ भी बोलना बेकार है। वो भी वो सारे काम करता चला गया जो जो काम उसकी माँ ने उसे करने को कहे थे।
      घोष बाबू को दुकान खोलने बोल  वो बाजार का बहाना कर पारो का परीक्षा परिणाम पता करने निकल गया।
   
  नियत समय पर लड़के वाले चले आये, देव का पूरा परिवार उनकी आवभगत में जी जान से जुट गया ।
सभी आपस में बातचीत में लगे थे, लड़का एक ओर बैठा चुप चाप सभी की बातें सुन रहा था।
    पारो और लाली की माँ लाली को साथ लिए चली आयीं। लाली सर झुकाये शरमाते हुए आकर एक ओर बैठ गयी।
   खाने पीने के साथ ही देव ने धीमे से लड़के के बड़े भाई के कान में कुछ कहा जिसके बाद उन्होंने वहाँ बैठे सभी के सामने एक प्रस्ताव रख दिया…

  ” अगर आप सभी को मंजूर हो तो क्या प्रखर लाली से अकेले में बात कर सकता है?

   घर के बड़े बेटे की बात नकारना लड़के वालों के लिए मुश्किल था और लड़के वालों की नकारना लड़कीं वालों के लिए।
   आखिर लाली और प्रखर को साथ लिए देव और पारो अपने कमरे में चले आये।
    पारो ने चाय का प्याला लाली की ओर बढ़ाया, लाली ने वही प्याला प्रखर को दे दिया…

   प्रखर मुस्कुराते हुए चाय पीने लगा।
पारो और देव बाहर निकल गए थे, पारो की हंसी बाहर आने पर भी नही रुक रही थी…

” क्या हुआ ? तुम्हे इतनी हंसी क्यों आ रही है? “

  ” एक बात बताऊँ? “

“हां बताओ? “

  ” अगर दूल्हा बाबू ने चाय पूरी पी ली इसका मतलब समझो रिश्ता पक्का। और अगर नही तो…

” ऐसा क्यों भला? ”

  कहते कहते ही देव ने खिड़की से कमरे में झांक भी लिया। प्रखर मुस्कुराते हुए लाली से कुछ बातें करते चाय भी पीता जा रहा था…

  ” उसने तो चाय पी ली, अब बताओ क्या बदमाशी की है तुमनें पारो?”

  पारो की आंखें खुल कर चौड़ी हो गईं उसने अपने दोनों हाथों से अपना सर थाम लिया और वहीं बैठ गयी…

  ” बोलो भी क्या किया था तुमने..”

” देव बाबू मैंने चाय में चीनी की जगह नमक मिला दिया था। मैंने आपको माँ से बात करते सुना था न! आप नही चाहते थे ना कि लाली की इतनी जल्दी शादी हो जाये इसलिए मुझे लगा चाय में नमक मिला देने से दूल्हा बाबू नाराज़ होकर रिश्ते को मना कर जाएंगे, लेकिन ये तो सारी चाय गुटक गए। अब क्या होगा?”

अपनी बड़ी बड़ी आँखें देव पर टिकाये पारो एकदम से चिंतित हो उठी और उसे देख देव को हंसी आ गयी।

  ” वाह एक से बढ़ कर एक बहाने रहते हैं तुम्हारे पास शादी तोड़ने के। पहले मेरे सामने पूरे चेहरे पर काजल पोत कर चलीं आयीं अब लाली को बचाने चाय में नमक घोल दी । एकदम पागल लड़की से शादी हुई है रे बाबा मेरी। है ना “

  देव ने पारो के सर पर हाथ रख उसे हिला दिया, और उसे हंसते देख वो भी हँसने लगी…

” अरे मैं तो आपकी ही मदद कर रही थी।”

” हाँ वही तो देख रहा हूँ कि मेरी धर्मपत्नी को मेरी कितनी चिंता है। चलो अब अंदर चलते  हैं। उन दोनों से भी तो पूछ लें कि उन्हें एक दूसरे से मिल कर कैसा लगा? “

” आप दोनों से पूछेंगे। मतलब लाली से भी?”

” हां क्यों नही पूछुंगा?”

  ” तो क्या अगर लाली ने शादी से मना कर दिया तो ? क्या आप शादी रोक देंगे?”

  पारो का सवाल वाजिब था। जिस घर में लड़की की कमसिन उम्र के बारे में सोचा नही गया वहाँ उसकी इच्छा अनिच्छा का सवाल ही कहाँ उठता था। पारो की बात सुन देव भी सोच में पड़ गया..

  ” अगर लाली की मर्ज़ी न हुई तो फिर शादी टालने के लिए भी कोई बहाना ढूंढ लेंगे। या भगवान से मनाएंगे की किसी तरह शादी टल जाए। ”

  पारो ने हाथ जोड़ कर आंखे  मूंद ली..

  ” मैं तो यही मनाऊंगी की लाली के प्रखर बाबू का स्वभाव भी बिल्कुल मेरे देव बाबू सा हो।

  मुस्कुराती पारो कमरे के अंदर चली गयी और देव वहीं खड़ा अपनी इस चुलबुली सी दुल्हन की बात में डूब कर रह गया….

  क्रमशः

aparna….

   ….
    

  

समिधा- 11




    समिधा 11



आप लोग चिंता न करें, गांव के बाहर एक  बाबा बैठते हैं , बूढ़े नीम के नीचे। सुना है देसी विदेसी सभी तरह की चुड़ैलों को पकड़ने में महारत है उन्हें। अगर माँ आप सब कहें तो मैं पारो को वहाँ से बंधवा लाऊं।”

  सभी औरतों के चेहरे पर एक सी मुस्कान रेंग गयी

  “तू अकेला क्यों जाएगा रे बाबून। मैं चलूंगी न तेरे साथ!”

  “नही माँ तुम घर देखो। इस बार मुझे अकेले ही पारो को ले जाने दो। ज़रूरत पड़ी तो अगली बार तुम्हें साथ ले चलूंगा।”

  गले से अपना आँचल डाल मन ही मन ईश्वर को प्रणाम कर देव की माँ ने उसे पारो को साथ ले अकेले ही बूढा नीम जाने की इजाजत दे दी।

  इजाज़त मिलते ही देव दो दो सीढ़ियां लांघता अपने कमरे में भाग चला। कमरे में अंदर जाकर उसने दरवाज़ा भिड़ा लिया, उसे ऐसे असमय कमरे में देख पारो भी चौन्क गयी…

  “आप इतनी जल्दी आ गए। ”

  पारो के चेहरे की खुशी देख देव मुस्कुरा उठा..

  ” जल्दी से तैयार हो जाओ। तुम्हें बाहर घुमाने लेकर जाना है।”

” हाय सच्ची! लाली को भी संग ले लूँ।”

” नही आज बस हम तुम जाएंगे। तुम फटाफट तैयार हो जाओ, और सुनो अभी बाहर किसी से कुछ कहना नही। ”

  हां में सर हिला कर मुस्कुराती पारो ने अलमारी से अपनी ढ़ाकाई लाल साड़ी निकाली और अखरोट की लकड़ी के पार्टीशन के पीछे बदलने चली गयी।

   उसके तैयार होकर आते में देव कहाँ कहाँ घूमना है यही सोच सोच मुस्कुराता रहा।
   दोनो साथ नीचे उतरे, तब सारी औरतें नीचे साथ बैठी चाय पी रहीं थीं।
   उन लोगों को जाते हुए आज किसी ने नही रोका टोका ये देख पारो भी आश्चर्य में डूब गई। पहले तो लाली और दर्शन के साथ भी कहीं जाना हो तो पचास बहाने लगाने पड़ते थे। देव के साथ तो खैर अकेले जाना ही नही हुआ था कभी।

  वो चुपचाप सर झुकाये देव के कदम से कदम मिलाती उसके पीछे चलती चली गई ….
   बाहर अपनी बाइक में पारो को पीछे बैठाए देव हवा से बातें करता आगे बढ़ गया। इतने महीनों की शादी में आज पहली बार उसकी नाज़ुकदिल दुल्हन उसके साथ बैठी थी।
    दोनों हाथों से सीट के अगले पिछले हिस्से को कस कर थामी पारो बाइक को लगने वाले हर झटके पर ज़रा और आगे लुढ़क पड़ती थी।
    बाइक की पिछली सीट ज़रा ऊंची होने से वो बार बार आगे सरकती जा रही थी, संतुलन बिगड़ने से कहीं गिर न पड़े ये सोच कर उसने धीरे से अपना एक हाथ देव के कंधे पर रख दिया, देव मुस्कुरा कर गाड़ी भगाता रहा…
       शहर के एक मूवी थियेटर के बाहर पारो को उतार वो गाड़ी पार्क कर उसके पास चला आया।
    थिएटर में मूवी लगी थी — दोस्ताना

   दो टिकट लिए वो पारो का हाथ थामे अंदर चला गया। पारो के लिए ये भी एक नया अनुभव था। उसे फिल्मों का बहुत शौक था लेकिन आज तक उसे कभी घर से बाहर फिल्में देखने नही मिला था।
   उसके घर पर भी नीचे ठाकुर माँ के कमरे में रखे टीवी पर बांग्ला दर्पण में बस संतवाणी ही चला करती थी।
  अक्सर शाम के समय वो बाली दा के काम से आने तक तारा बऊ दी के साथ कभी “साँझेर बाती” कभी “जिओन गाथा” कभी “कोने बऊ” ही देखा करती, हां कभी कभी जोइता के घर पर ही उसे फिल्में देखने का सौभाग्य मिला था। वो भी सारी ऐसी ही फिल्में उसने आज तक देखी थी जो उसकी माँ के भी पैदा होने के पहले की थीं।
   फिर भी किस्मत से उसने हमेशा वही देखा जिसके कारण उसका सिनेमा प्रेम बढ़ गया।
अपनी छोटी सी उम्र में उसे ” कागज़ के फूल” के नायक गुरुदत्त का ऑंसू भरी आंखों से
        “ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया
         ये इनसां के दुश्मन समाजों की दुनिया
         ये दौलत के भूखे रिवाज़ों की दुनिया
         ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ”
  गाना भले ही न समझ आया हो लेकिन उस नायक के बहते ऑंसू पारो ने अपनी आंखों में ज़रूर महसूस किए थे।
   उसे दूसरी जो फ़िल्म देखने को मिली वो उसे अच्छी तो लगी लेकिन अंत में नायक का सिक्का उछाल कर मर जाना उसे अंदर तक भिगो गया, और बस जय के मरने के कारण ही उसने शोले को एक बकवास फ़िल्म की उपाधि दे डाली।
  जोयता के साथ इसी बीच उसने छिप छिप कर कई फिल्में देख ली लेकिन अपनी शादी से ठीक पहले उसकी देखी फ़िल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे ने उस पर कुछ अलग ही रंग जमा दिया।
     नायक का हाथ बांन्ध कर नायिका के पलटने का इंतेज़ार उसने भी धड़कते दिल से महसूस किया, और काजोल के पलटने पर शाहरुख की मुस्कान उसका भी दिल ले गयी।
  इस सब के बावजूद उसे आज तक मूवी थियेटर के दर्शन नही मिले थे। और एक दिन उसने बातों बातों में ही देव से अपनी इस अधूरी सी ख्वाहिश का ज़िक्र भी किया था।
  अपनी उसी अधूरी इच्छा का सम्मान देख वो मुस्कुराती इधर उधर थियेटर को आंखे फाड़े देखती धीमे कदमों से बढ़ रही थी कि देव ने उस भीड़ में उसका हाथ थाम लिया…

  ” मेरा हाथ पकड़ी रहो, कहीं भीड़ भाड़ में गलती से किसी और को अपना पति मान उसके साथ न चल देना।”

  मुस्कुरा कर पारो ने ना में सर हिलाया और देव के  साथ आगे बढ़ गयी…

   फ़िल्म शुरू हो गयी , हंसी मजाक मस्ती में फ़िल्म आगे बढ़ती चली गयी और फ़िल्म की कई बातें पारो के दिमाग के ऊपर से निकल गईं…

  ” सुनिए मुझे एक बात समझ नही आई?”

” क्या ?”

” ये हीरोइन दोनो हीरों के साथ रहने क्यों तैयार हो गयी। मतलब उसने क्या कहा वो नही समझा।”

  पारो का सवाल समझ आते ही देव को हंसी आने लगी…. फ़िल्म में दोनो नायकों द्वारा परिस्थिति वश खुद को गे बताए जाने को वो पारो को क्या और कैसे समझाता?
   कुछ इधर उधर की बातें बना कर वो फिर फ़िल्म देखने लगा, लेकिन कुछ देर में ही स्क्रीन पर चलते गीत ” माँ दा लाड़ला बिगड़ गया” पर पारो ने एक बार फिर चीर फाड़ शुरू कर दी।
     फ़िल्म का ओर छोर पारो की समझ से परे था, और वो उस कहानी को अपने हिसाबों से समझ देव को समझाए जा रही थी।
   देव भी पूरी तन्मयता से पारो की बातें सुनने और समझने का नाटक कर रहा था। इसी सब में कभी उसे बीच में हंसी का दौरा भी पड़ जाता तब उसके साथ उसकी हंसी में उसका साथ देती पारो भी खिलखिला उठती।
    फ़िल्म समाप्त होते ही वहाँ से दोनों बाहर निकल गए….
   रास्ते में फुचका खाने के लिए देव ने गाड़ी रोकी तो पारो अचकचा गयी…

” बाहर से खा कर चले गए तो घर का खाना बच रहेगा। घर पर डांट भी पड़ेगी।”

“नही पड़ेगी। मैं हूँ न सब संभाल लूंगा। तुम खाओ जितना खाना हो।”

  मुस्कुराती पारो ने देव को देखा और दोनो गोलगप्पे वाले के पास पहुंच गए..

” मैं तो पचास खा सकती हूँ।”

” बस ! उस दिन तो बड़ी बड़ी बातें कर रहीं थी कि मैं गोलगप्पे खाने की शर्त में सबसे जीत जाती हूँ, बेहिसाब खा सकतीं हूँ। और अब बस पचास?”

  ” अरे तो क्या? जोइता की साथ लगी शर्त जीतना आसान होता था न। वैसे सही कहा मैं तारा बऊ दी से भी जीत ही जाती थी।

  ” तो आओ फिर,मुझसे भी कर लो मुकाबला। वैसे मैं एक बार में सौ खा सकता हूँ।”

” झूठे ! घर पर इतने से चावलों को भी पूरा खाया नही जाता आपसे। बड़े आये सौ गोलगप्पे खाने वाले।”

” तो आओ न मैदान में। देख लो फिर।

  दोनों की शर्त लगी और गोलगप्पे वाला खिलाने लगा
देव तो पारो को जल्दी जल्दी खाते देख ही खुश हुआ जा रहा था। कुछ दो चार खाने के बाद वो बस उसे देखता मुस्कुराता रहा और एक के बाद एक लगभग बीस पच्चीस गोलगप्पे खाने के बाद पारो ने भी हथियार डाल दिये।

   “तो इसका मतलब पारो को गिनती नही आती। इनके यहाँ बीस को पचास माना जाता है। क्यों? है ना?”

” हां बिल्कुल ! जैसे आपके यहाँ पांच को सौ गिना जाता है। बिल्कुल वैसे ही…

दोनो हंसते खिलखिलाते वहाँ से आगे निकल गए।

  पारो की पसंदीदा कुल्फी दिखने पर दोनों ने कुल्फी खाई और आगे बढ़ गए…

  ” कुछ ज़रूरी सामान तो नही लेना पारो?”

” नही। आप तो मेरी ज़रूरत से पहले ही सब ला देतें हैं।”
    पारो ने अपना चेहरा देव के कंधे पर रख दिया। अब दोनो को बातें करने में सुविधा भी थी। बातें करते करते दोनों गाड़ी में इधर से उधर चक्कर लगाते रहे।
   पारो के ही ध्यान दिलाने पर कि रात बहुत हो गयी है अब घर चलना चाहिए देव ने घर की ओर गाड़ी मोड़ ली…
   रास्ते पर पड़ने वाली पान की दुकान पर गाड़ी रोक उसने दो गिलौरी बंधवाई और एक पारो के हाथ में दे दूसरी अपने मुहँ में रख ली..

” उस दिन मुझे पान न खिला पाने की कसक आज ऐसे पूरी कर ली । है ना?”

” हां और अब हफ्ते में एक दिन हम कैसे भी कर के बाहर निकल ही जायेंगे बस एक शर्त है?

” क्या ?”

” किसी से कुछ भी मत बताना कि हम कहाँ घूमे, क्या खाया। कुछ भी नही। समझीं? “

  हां में सर हिला कर पारो ने देव के कंधे पर सर रखे आंखे मूंद ली , फ़िल्म का एक गाना जिसके बोल तो उसे याद नही थे लेकिन कुछ छोटे मोटे शब्द जो याद रह गए थे उन्हें गुनगुनाती पारो आंखें बंद किये मुस्कुराती रही….

        तू है, तो टेड़ी-मेड़ी राहें, उलटी-पुलटी बातें
                सीधी लगती हैं
     तू है, तो झूठे-मूठे वादे, दुश्मन के इरादे
                सच्चे लगते हैं

         जो दिल में तारे-वारे दे जगा
              वो तू ही है, तू ही है
       जो रोते-रोते दे हँसा, तू ही है वही


       जाने क्यूँ (जाने क्यूँ) दिल जानता है
           तू है, तो I’ll be alright …


  ***********


        वरुण का जीवन अपनी गति से चल रहा था।
    उसके रूम मेट प्रज्वल को तीन महीने के लिए यू के जाना पड़ा था, अकेले वरुण का एक बंधा बंधाया रूटीन हो गया था, रोज़ सुबह उठ कर कॉफी बस पीकर ऑफिस निकल जाना और सारा दिन काम में डूबे रहने के बाद शाम को घर आकर कुछ भी बना कर खा लेना और कुछ देर लैपटॉप पर कोई मूवी या शो देख कर सो जाना बस यही उसका रूटीन हो गया था।
      एक शाम इत्तेफाक से टकराई विदेशिनी सारा से भी दोनो की ठीक ठाक दोस्ती हो गयी थी।
सारा वहाँ न्यू जर्सी में रिसर्च स्कॉलर थी , इसी से यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में ही रहा करती थी। कभी महीने में एक आध बार वो उनमें से किसी एक को फ़ोन कर लिया करती थी। प्रज्वल ही अक्सर उसे फोन कर बुला लिया करता था। प्रज्वल के जाने के बाद सारा का भी वरुण के कमरे में आना एकदम से बंद ही हो गया था कि एक शाम वो अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के चली आयी…
     शनिवार होने से छुट्टी  होने से वरुण घर पर ही था और कॉफी पीते हुए अपने लैपटॉप पर कोई मूवी देख रहा था।
    दरवाज़े पर बेल होने से वो बिना लैपटॉप बंद किये ही दरवाज़ा खोलने चला गया।
   सारा को देख उसे भी खुशी हुई…

  ” बहुत दिनों से मिलना नही हुआ था इसलिए मैं ही चली आयी। तुमसे तो फ़ोन की भी उम्मीद नही की जा सकती।

मुस्कुरा कर सारा अंदर चली आयी। वरुण ने हँस कर उसका स्वागत किया और उसके बैठते ही उसके लिए भी कॉफी लेने अंदर चला गया….
   सारा ने जाने क्या सोच कर लैपटॉप की स्क्रीन अपनी तरफ घुमा ली…
  उसी समय वरुण कॉफी लिए बाहर चला आया…

” आई एम सॉरी ऐसे किसी का लैपटॉप बिना उससे पूछे देखना नही चाहिए , पर जो म्यूज़िक सुनाई दे रहा था उसे सुन मैं खुद को रोक नही पायी। इतना भावुक और डिवोशनल था कि…


” ओह्ह नही कोई बात नही, तुम देख सकती हो।”

  ” क्या नाम है मूवी का? “

  ” शायद “कृष्ण सत्य” । मुझे भी सही नही मालूम। बस ऐसे ही सर्च करते हुए नज़र पड़ी और देखने लगा। मूवी मुख्यत: भगवान के चमत्कारो पर है। सो तुम्हें शायद पसन्द न आये। ऐसी मूवीज़ मुझे भी कुछ खास पसन्द नही आती, आज तो बस ऐसे ही नज़र पड़ी सोचा ये सीन खत्म हो जाए फिर बंद कर दूंगा लेकिन एक बार देखना शुरू किया तो देखता ही चला गया।”

सारा मुस्कुराने लगी…

” मेरी थीसिस का विषय भी तो यही है। “भारतीय संस्कृति में भगवान और उनके चमत्कार” मिथ या सत्य।
  एक बात कहुँ अगर संसार में बुरी शक्तियां हैं तो अच्छी शक्तियां भी हैं। मुझे तुम्हारी माइथोलोजी पर विश्वास होता है, और वो भी थोड़ा नही बहुत ज़्यादा। तुम्हारे यहाँ लोग भगवान पर विश्वास करतें हैं और डरते भी हैं। और शायद उसी डर के कारण वो गलत काम करने से पीछे हट जाते हैं। ये एक बहुत स्ट्रांग फीलिंग है कि तुम लोग अपने भगवान को भी अपने जैसा मानते हो। ज़िंदा और तुम्हें देखता हुआ। तुम उसे खाना बना कर खिलाते हो ,तुम उसे सुलाते हो झूले में झुलाते हो,नहलाते भी हो, फूलों और खुशबुओं से सजाते हो … तुम लोग अपने भगवान का वैसे ही ध्यान रखते हो जैसे कोई अपने बच्चे का ध्यान रखता है।
    कभी तुम अपने भगवान को कान्हा मान उसमें बच्चे का रूप देखते हो, और कभी उसमें औरत का रूप मान उसे शक्ति कहते हो। कभी वही भगवान विष्णु के रूप में सारी सृष्टि के रचयिता हो जाते हैं तो कभी शिव के रूप में संहारक।
   इसका मतलब तुम अपने हर सुख दुख का कारण भगवान यानी उस अदृश्य शक्ति को मानते हो…
      और जब तुम्हें कोई तकलीफ होती है तो तुम पूरे हक से उसके सामने हाथ फैला के मांगते हो। बिल्कुल जैसे वो मूर्ति नही है तुम्हारे सामने ज़िंदा खड़ा है और तुम्हारी बातें सुन देख और समझ रहा हो।”

  वरुण सामने बैठे ध्यान से सारा की बात सुनता रहा।

“बात तो सही है तुम्हारी। मेरे घर पर ही मेरी माँ रोज़ सुबह का खाना पहले अपने कान्हा जी को भोग लगाती है उसके बाद हमें खिलाती है। बस मुझे हमारी माइथोलोजी की एक बात बिल्कुल पसंद नही आती और उसी के कारण मैं भगवान पर विश्वास नही कर पाता।”

” क्या है वो बात ?”

  “कुछ खास बड़ी बात नही है लेकिन मुझे हमारे बुजुर्गों का बात बात पर ऐसा करोगे तो भगवान नाराज़ होकर श्राप दे देंगे ऐसा कर दिया तो भगवान ये कहर बरपाएँगे वाली बातें समझ नही आती। बचपन से हमारे यहाँ पाप पुण्य के नाम पर , भगवान के नाम पर या तो हमें डराया जाता है या हमारे इमोशंस के साथ खिलवाड़ किया जाता है।
  बार बार कहा जाता है अगर भगवान मानते हो तो ये पढ़ो, वो करो। अरे बार बार हमें ये साबित करने की क्या ज़रूरत की हाँ हम मानतें हैं।
   ज़रूरी तो नही की अगर हम भगवान पर विश्वास करतें हैं तो हमें धार्मिक किताबें ही पढ़नी होंगी या भजन गाने होंगे…
   बस इन्हीं सब बातों के प्रपंच से बचने के लिए….

  वरुण की बात आधे में काटती सारा आगे बोल पड़ी.

” तुमने नास्तिकता का चोला ओढ़ रखा है। किसी के सोचने और समझने से फर्क भी क्या पड़ता है वरुण। तुम्हारी श्रद्धा और विश्वास तो पूरी तरह तुम्हारे और तुम्हारे भगवान के बीच की बात है। उसमें तुम किसी और का हस्तक्षेप देखते ही क्यों हो। आई मीन किसी और के कुछ कहने से तुम्हें और तुम्हारे विश्वास को कोई फर्क नही पड़ना चाहिए…

” हम्म बात तो सही हैं तुम्हारी..

कुछ देर और इधर उधर की बातें करने के बाद सारा वापस जाने के लिए उठ गई…

  ” आज तुम्हें बहुत बोर किया न वरुण?”

  ” नही बिल्कुल नही। बल्कि मैं तो यही सोच रहा था कि हमारे भगवानों के बारे में हमसे ज्यादा तो तुम जानती हो..”

  सारा मुस्कुरा उठी…

  ” अच्छा मैं परसों इंडिया जा रही हूँ। तुम्हें अगर अपनी सिस्टर या घर वालों के लिए कुछ भेजना हो तो दे देना। “

” अरे वाह ! ये तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन मैंने ऐसा कुछ खरीद नही रखा।

” कोई बात नही। मेरे साथ चलो और अभी कुछ ले लो।”

” हां ये सही रहेगा। चलो फिर साथ ही चलतें हैं , और बाहर ही कुछ खा भी लेंगे।”

  वरुण और सारा मार्किट के लिए निकल गए।
काफी देर की शॉपिंग के बाद वरुण ने अपनी माँ , रोली और पापा के लिए काफी सारा सामान सारा को थमा दिया, एक छोटा सा सॉलिटेयर भी उसने गिफ्ट पैक करवा कर कादम्बरी के लिए सारा को देने के बाद दोनों वहाँ से बाहर निकल गए।
    मॉल की दुकान से बाहर निकलते ही गाड़ी का दरवाजा खोलते में वरुण का सर घूम गया, और उस बार उसे इतनी जोर का चक्कर आया कि वो गाड़ी के बाहर ही बेहोश होकर गिर पड़ा।
   

  *********

    देव पारो को लिए घर पहुंचा तब तक घर पर सब का खाना पीना निपट चुका था। घर के मर्द पारो और उसे पकड़ी चुड़ैल वाली बात पर नाराज़ हो सकते थे इसी से घर की औरतों ने इस अति महत्वपूर्ण बात को उन लोगों से छिपा लिया, उन लोगों के पूछने पर देव के किसी दोस्त के बुलावे पर वो दोनो वहाँ खाने गए हैं का बहाना लगा कर सभी को खिला पिला दिया।
     नीचे ओसारे में बैठे सभी से नज़रे चुराते देव ऊपर जाने लगा कि उसकी माँ ने उसे हाथ पकड़ एक ओर खींच लिया। वो माँ के साथ उनके कमरे की ओर चला गया और पारो धीमे कदमों से ऊपर अपने कमरे में चली गयी…

” क्या हुआ ? सब ठीक तो है ना बाबून?”

  ” सब ठीक है माँ, लेकिन बाबा जी ने कहा है हफ्ते में एक बार पारो को उनके पास ले जाना होगा।”

” हां तो ले जाना। पर बेटा कब तक ले जाना होगा?”

” ये वो अगली बार बताएंगे माँ। अब मैं ऊपर जाऊँ? बहुत थकान सी हो गयी है।

” हां हाँ बेटा। पर सुन तुझे डर तो नही लगेगा ना?”

वरुण ने अपने हाथ में बंधा कलावा दिखा दिया…

” बाबाजी ने मुझे रक्षासूत्र बाँध दिया है माँ, मेरा कुछ नुकसान नही होगा।”

देव की कलाई देखते ही माँ प्रसन्नता से मुस्कुरा उठी…

” भगवान तेरी रक्षा करें बेटा। बाबा जी की जय हो।”

  मुस्कुरा कर हाथ ऊपर की ओर प्रणाम की मुद्रा में जोड़े देव कुछ गुनगुनाता हुआ ऊपर चला गया…

   जाने क्यों दिल जानता है ….
           तू है, तो I’ll be alright….

उसे जाते देख उसकी माँ बाहर बाकियों को भी ये खुश खबर देने चली गयी…


क्रमशः

  aparna …


 
 



 

मायानगरी -1





   

       ओम गणपतये नमः


             मायानगरी :–

         इंजीनियरिंग कैम्पस के खचाखच भरे कॉरिडोर में विद्यार्थी अपनी अपनी क्लास रूम का नम्बर देखने या फिर फीस अमाउंट का पता लगाने लाइन में लगे थे।
   कुछ बाहर गार्डन में इधर उधर घूमते अपने कॉलेज को आंखों ही आंखों में आंकने की कोशिश में थे…..
 
   कुछ लड़के एक ओर जमा इधर उधर की बातों में लगे थे कि एक लड़की भागती सी उनके पास चली आयी।
   आते ही उसने एक लड़के को पीछे से कंधो से पकड़ अपनी ओर घुमाया और फटाफट बोलना शुरू कर दिया…

” कहाँ थे अब तक। तुम्हें पता है कितनी देर से तुम्हें ढूंढ रही थी मैं ? “

   लड़का उस अनजानी लड़की को अपनी बड़ी बड़ी आंखें फैला कर  देख सोचने लगा। दूर दूर तक दिमाग के घोड़े दौड़े लेकिन खाली हाथ वापस चले आये…

” आप जानती हैं मुझे? “
 
इस सवाल को पूछते ही लड़के के चेहरे पर एक लंबी सी मुस्कान छा गयी..
    लड़की तो पहले ही मुस्कुरा रही थी…

” हाँ फिर? मेरे दिल ने तुम्हारी रूह को पहचाना है। हम जन्म जन्म से एक हैं। “

“अच्छा ! और कुछ बोलिए ना।  अच्छा लग रहा है एक सुंदर लड़की का मुझे लाइन मारना । ”

” ये रूहानी मुहब्बत है पागल? बोलो क्या तुम मुझसे शादी करोगे ? क्योंकि मैं तुमसे शादी करना चाहती हूँ। “

” हाँ करूँगा ! ज़रूर करूँगा !हर जन्म में करूँगा । बार बार करूँगा। अब तो तुम मना भी कर दो तब भी करूँगा। ”
    वो शायद और भी कुछ कहता रहता , लेकिन तब तक वो लड़की अपने दुपट्टे को संभालती वहाँ से वापस निकल गयी…..

    और लड़का अपने बालों पे हाथ फिराता उसके कदमों के निशान देखता रह गया….
  
******


       ये हैं कहानी के नायक अभिमन्यु मिश्र ! मध्यम वर्गीय परिवार के सबसे बड़े लड़के। जिनके कंधो पर जन्म के साथ ही ढेरों ज़िम्मेदारियों का बोझ आ जाता है,कुछ उसी तरह के।।
    लेकिन अपने बेलौस और बेपरवाह स्वभाव के कारण ये किसी बात को बहुत ज्यादा दिल से नही लगाते।
   इंजीनियरिंग भी इन्होंने तुक्के में ही जॉइन कर डाली। गणित कुछ ज्यादा ही अच्छी थी,आसपड़ोस के लोगों ने आर्यभट्ट बुलाना शुरू कर दिया। और बस आर्यभट्ट जी ने खुद को नवाजे इस नाम को इतना सीरियसली लिया कि ग्यारहवीं में गणित ले बैठे।
    पढ़ाई लिखाई में दीदे लगते न थे। स्कूल के शुरुवाती दो महीने स्कूल से चोरी छिपे भाग कर फिल्में देखने में या स्कूल के पीछे की तलैया में दोस्तों के साथ बैठ सिगरेट फूंकने में निकाल दिए।
   तीसरे महीने फर्स्ट टर्म्स के इम्तिहान होने पर नानी दादी सब एक साथ याद आ गयी।
    रिजल्ट्स बुरे नही बेहद बुरे आये। नतीजा ये हुआ कि मार्कशीट घर पर पिता जी को दिखाने से उतारी जाने वाली चप्पलों की आरती से बचने का एकमात्र उपाय यही दिखा की आर्यभट्ट जी ने अपने पिता के नकली साइन मारे और परीक्षाफल जमा कर दिया।

    अब ये छोटी मोटी सी गलती कोई पाप तो है नही की जिसके लिए नरक की अग्नि में जलाने की सज़ा दी जाए। लेकिन यही समझ जाती तो प्रिंसिपल इंसानियत के दायरे में न आ जाती।
  पर उसे तो खून पीने वाली चुड़ैल का ही टाइटल भाता है। आर्यभट्ट बाबू के पिता श्री अनिल मिश्र जी के साईन होने के बाद भी धड़धड़ा के मिश्र जी के ऑफिस के लैंडलाइन पर फ़ोन दे मारा और उन्हें उनके लख्ते जिगर का कांड कह सुनाया वो भी सारी लगाई बुझाई के साथ।
    अब जब छौंक ही मिर्ची हींग की लगी हो तो स्वाद मीठा कैसे आये?
   उस रात घर के बड़े राजकुमार की जबरदस्त पिटाई हुई। एक मिडल क्लास बाप अमूमन जो जुमले सुनाता है वो सब मिसिर जी ने कह सुनाए…
    और उस रात स्वाभिमानी बेटा बिना कुछ खाये ही सो गया।  अगले दिन उठते ही उसने एक कसम ले ली कि अब इस साल चाहे विषय कठिन से कठिनतम हो जाये पढ़ कर ही पास होना है।
    इस बार न तो फर्रे बनाये जाएंगे और न ही स्कूल बाथरूम की दीवारों को रंगा जायेगा।
   अभिमन्यु का अभिमान जागा था आखिर!

   ग्यारहवीं वो अच्छे नंबरों से पास हो गया। अब क्लास के होशियार लड़कों से ज़रा सी दोस्ती बढ़ी और दोस्ती के साथ बढ़ता गया छिटपुट ज्ञान।
   बारहवीं के लड़कों के जिस ग्रुप में अभिमन्यु शामिल हुए वहाँ आये दिन एन आई टी , आई आई टी , आर आई टी के चर्चे होने लगे। और फिर अभिमन्यु को दिखा अपनी आजादी का पहला रास्ता।
    पहले तो उसने कभी अपनी आगे की पढ़ाई को लेकर कुछ सोचा ही नही था।
    लेकिन अब उसे अंधियारे में एक हल्की सी रोशनी दिखने लगी थी।
   उसके सारे दोस्त इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे थे। उन लोगों के मुताबिक अच्छे सारे कॉलेज उनके शहर से दूर थे और बस यही तो उसे चाहिए था। अपने शहर से दूर , अपने घर से दूर कोई ठिकाना जहाँ वो पढ़े न पढ़े पर सुकुन से रह तो सकें।
     यहाँ घर में तो उसका जीवन कतई अस्थिर हो रखा था। पिता जी की प्रोमोशन पेंडिंग है अभी को मार लो, किसी से कहा सुनी हो गयी अभी को मार लो। मतलब अभी उनका बेटा न हुआ डस्टर हो गया जब तब हाथ साफ कर लो।
  माँ अक्सर उसके पक्ष में बोलती ” जवान लड़का है उस पर हाथ न छोड़ा करें । किसी दिन गुस्से में घर छोड़ गया तो? ”
   पर मिसिर जी हर बार कोई ऐसी कैफियत दे जाते की उन दोनों का झगड़ा बढ़ता चला जाता और अभिमन्यु चुपचाप घर से निकल सड़क पर चला आता।
  वो भी अपने परिवार की समस्या को समझता था। कमाने वाला एक और खाने वाले पांच। घर चलाना भी तो मुश्किल था। उसके पीछे उसके एक भाई और जो था। उसके बाद वाला उससे डेढ़ साल ही छोटा था।
  मतलब उसकी कॉलेज की पढ़ाई तक ये  भी तैयार हो जाना था।
   उसे इतना तो समझ आ ही गया था कि ज़िन्दगी की खींच तान में थोड़ा आगे बढ़ना है,  तो उसे इंजीनियरिंग में प्रवेश लेना ही पड़ेगा।

   और बस उसने तैयारी शुरू कर दी थी। उसकी तैयारी और उसके गणित का ज्ञान देख उसके एक करीबी दोस्त ने उसे आई आई टी और बाकी बड़े महाविद्यालयों के फार्म भी भरने की सलाह दी थी। लेकिन महंगे फॉर्म्स के साथ ही महंगे कॉलेज की फीस सुन उसकी घर पर बात करने की हिम्मत ही नही हुई ।

    बारहवीं के साथ ही उसने इंजीनियरिंग का इम्तिहान दे दिया  और जिसमें उसका चयन भी हो गया ।
  काउंसिलिंग के बारे में घर पर उसने डरते डरते ही बताया था…
     क्योंकि अब तक फार्म भरने से लेकर इम्तिहान देने तक का काम उसने अपने पिता हिटलर मिश्रा जी से छिप कर अपने छोटे मामा की सहायता से ही किया था।
  अभिमन्यु का डर सही साबित हुआ। आज तक पापा किसी बात से खुश या संतुष्ट हुए थे जो आज होते?  जहाँ उसके दोस्तों के पिता बेटों के सेलेक्शन पर मिठाई बाँट रहे थे अभि के पिता का अलग ही राग चल रहा था।

” क्या ज़रूरत थी इंजीनियरिंग की? चार साल बर्बाद करने के बाद जाने कब नौकरी मिले? आजकल इंजिनिंयर्स ढेरों हो गए हैं, सरकारी नौकरियों के लाले पड़े हैं। इससे अच्छा तो तीन साल की ग्रेड्यूएशन की डिग्री लेकर पी सी एस कर लेना था। “

  पिता जी की नाराजगी इस बार अभि के समझ से बाहर थी।
  काउंसिलिंग के दौरान वो कॉलेज चुन पाता इसके पहले ही कॉलेज ने उसे चुन लिया था।

*****

   मायानगरी विश्वविद्यालय ने खुलने के साथ ही अपने कैम्पस में हर एक डिग्री के कॉलेज की स्थापना कर रखी थी। इसके साथ ही सभी कॉलेज में विद्यार्थियों के लिए भी फ्री सेलेक्शन, स्कॉलरशिप  के साथ ही मैनेजमेंट कोटा भी रख छोड़ा था।
   कुछ बच्चे अपने दम पर सेलेक्ट होकर आते थे तो कुछ मैनेजमेंट सीट से। उनके अलावा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स की टीम अलग अलग जगह की काउंसिलिंग में घूम कर कुछ विशेष होशियार बच्चों को छात्रवृत्ति देकर भी अपने विश्वविद्यालय का हिस्सा इसीलिए बना रही थी कि विश्वविद्यालय का नाम  हो सके।

  विश्विद्यालय की मेहनत का नतीजा था कि ” मायानगरी ” अपने खुलने के पांच ही सालों में पढ़ने और पढ़ाने वालों के बीच अपना अच्छा नाम बना चुकी थी।

    अभिमन्यु को यहाँ चुन कर लाया गया था। और ये विश्विद्यालय खुलने के तीसरे साल से यहाँ मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ रहे हैं।
     अभी इनका पांचवा सेमेस्टर चल रहा है। और अब ये वापस अपने पुराने रंग में आ चुके हैं।
  
    वही बेफिक्री वहीं बेपरवाही का आलम है । न इन्हें किताबो से मुहब्बत है ना किताबों को इनसे। इनका इंजीनियरिंग में घुसने का मुख्य उद्देश्य था अपने घर से दूर भागना जो पूरा हो चुका था इसलिए अब इनका पढना लिखना भी दो साल से लगभग बंद ही है।
 
      वो तो दिमाग ऐसा पैना है बंदे का की कोई भी सेमेस्टर हो और कोई भी पेपर इनका रिकॉर्ड रहा है सिर्फ एक रात दिन की पढ़ाई में ही इन्होंने अपनी नैय्या तो पार लगाई ही है अपने आगे पीछे आजु बाजू वालों को भी वैतरणी पार कराई है।
   इसलिए भाई साहब का नाम चल गया है, लेकिन सिर्फ इनकीं ब्रांच में। यहाँ तक कि इनकी ब्रांच के बाहर भी लोग इन्हें ज्यादा नही जानते पहचानते।
   
   पर फिर भी ये अपने चेलों यानी दोस्तों को जमा कर जब तब ज्ञान देते ही रहतें हैं।
  कॉलेज का नया नया सत्र शुरू ही हुआ है और अभी उसी पर कुछ ज्ञान गंगा बह रही थी कि बिल्कुल किसी आंधी सी वो आयी और तूफान सी लौट गई…

और अभिमन्यु मिश्रा बस उसे देखते ही रह गए..

” अबे थी कौन ये?”

   आंधी सी आने वाली का नाम था रंगोली…..
रंगोली तिवारी !! ये मेडिकल प्रथम वर्ष की छात्रा हैं। दिखने में नाजुक सी खूबसूरत सी रंगोली का कॉलेज का पहला दिन बहुत बुरा बीता।

********

    बारहवीं के बाद मेडिकल सेलेक्शन लिस्ट में उसका नाम नदारद था । तो वैसे ही उसने रो रोकर घर सर पर उठा लिया था कि ठीक अगले दिन एक और नई लिस्ट आयी जिसमें वेटिंग लिस्ट वालों के नाम थे और यहाँ सातवें नम्बर पर रंगोली तिवारी का नाम और अनुक्रमांक मिल गया।
   बस घर वालों की खुशी का ठिकाना नही रहा लेकिन रंगोली को हर काम जब तक पूरा न हो जाये विश्वास नही होता था।
  उसने कितनी मेहनत की थी ये वही जानती थी। रात दिन एक कर उसने पढ़ाई की थी। किताबों को ऐसे रट घोंट लिया था कि उसे सपने भी एग्जाम हॉल और पेपर के ही आते थे।
  तैयारी बहुत अच्छी होने के बावजूद वो पेपर बनाते समय एंजाइटी की शिकार हो गयी और अच्छा खासा बनता पेपर थोड़ा सा बिगाड़ आयी।
     पेपर्स के बाद उसका पूरे एक हफ्ते का शोक चला जिसमें अपनी खिड़की पर खड़ी वो बाहर लगी रातरानी की बेल सूंघती अपने लैपटॉप पर आबिदा परवीन की गज़लें सुन सुन कर रोने की कोशिश में लगी रहती।

   लेकिन ज़िन्दगी कब तक उदास बैठेगी। रंगोली की मीठी सी कमज़ोरी आइसक्रीम को उसकी माँ ने औजार बना कर उपयोग किया और दुखियारी के सामने चार दिन बाद उसकी पसंदीदा आइसक्रीम पेश कर दी।
     रंगोली की पसंदीदा नॉवेल उसके हाथ में देकर मम्मी ने अपने हाथो से उसे आइसक्रीम खिलाई और बस रंगोली अपना गम भूल गयी।

मम्मी ने एक अच्छा सा ऑप्शन भी रख दिया..” बेटा अगर इस साल सेलेक्शन नही भी हुआ तो कोई नही। ड्राप लेकर अगले साल कर लेना तैयारी। मुझे पूरा विश्वास है मेरी बेटी अव्वल दर्जे की डॉक्टर बनेगी। चाहे कितना भी समय ले लेना बेटा पर हिम्मत नही हारना। “

   रंगोली माँ के सीने से लग गयी। उसके कमरे के बाहर खड़े उसके पापा उसके चेहरे की खोई मुस्कान वापस पा कर खिल उठे।
   दो महीने बाद रिज़ल्ट आया और वेटिंग लिस्ट में ही सही रंगोली का सेलेक्शन हो गया।

   परिणामों के दो हफ्ते बाद ही एक शाम जब पूरा परिवार साथ बैठे चाय की चुस्कियों के साथ गप्पे मारने में लगा था कि रंगोली के पिता जी के मोबाइल पर किसी अनजान नम्बर से फोन आया…

” तिवारी जी बोल रहे है .?

” जी हाँ ! कहिये कौन काम है हमसे ?”

” आपकी बिटिया का सलेक्सन नही हुआ महाराज ?”

” तो तुमको इससे क्या लेना देना भाई? “

” लेना देना है ना तिवारी जी। आपकी बिटिया आई है वेटिंग में सातवें स्थान पर। अब मान लीजिए छै तक आकर सेलेक्सन रुक गया तो क्या करेंगे। का बिटिया का एक साल फिर बर्बाद कर देंगे।

“तुम हो कौन और कहना क्या चाहते हो? “

” नाम में हमारे कोई खास बात नही जो हम बताएं। पर जो बताने जा रहे वो बहुत खास है। आप पांच लाख तैयार रखियेगा हम नार्मल सीट से सेलेक्शन करवा देंगे।

” पगला गए हो क्या ? इत्ता पैसा देना होगा तो मैनेजमेंट सीट नही खरीद लेंगे। “

” पगला तो आप गयें हैं गुरु। मेडिकल की सीट वो भी मैनेजमेंट सीट! कम से कम तीस पैंतीस लाख लगेगा। घर द्वार बेच के बिटिया को पढ़ाएंगे का? और फिर रंगोली के पीछे एक और गुड़िया भी तो है ना मेहंदी। उसके लिए क्या बचाएंगे। पांच लाख बहुत सस्ता ऑफर दिए हैं हम। वो तो बिटिया आपकी होशियार है वरना हम किसी को सामने से होकर फ़ोन नही करते। जिसको सीट चाहिए वो खुद ही हमें ढूँढ़ लेता है। समझे? “

  तिवारी जी ने खिसिया कर फोन पटक दिया। ठीक था वो घर से सम्पन्न थे , अच्छी नौकरी में थे। पर थे तो मध्यम वर्गीय ही। तीस लाख तो पूरी उम्र कमाई कर जोड़ लेंगे तब भी शायद ही जोड़ पाएं। और फिर रंगोली के पीछे ही मेहंदी भी थी। वो गणित लिए तैयार खड़ी थी।
   इस साल रंगोली का किसी अच्छे कॉलेज मे सेलेक्शन हो जाता तो दो साल बाद मेहंदी के लिए सोचना शुरू करना था उन्हें ।
    वो सोच ही रहे थे कि रंगोली ने उनकी मुश्किल आसान कर दी…

” ड्राप ले लुंगी पापा। आप चिंता न करो। ऐसे किसी को पैसे क्यों दे हम। जाने कहाँ का फ्रॉड हो ये। “

  बिटिया की समझदारी भरी बात पर पापा मुस्कुरा उठे लेकिन फ़ोन वाली बात उनके दिमाग से गयी नही।
  कुछ दो दिनों के बाद ही काउंसिलिंग लेटर आ गया और घर की रौनक वापस आ गयी।
  रंगोली अपने पिता के साथ काउंसिलिंग में आ गयी। एक से एक बड़े बड़े चिकित्सा महाविद्यालयो की भीड़ में उसे दो महाविद्यलयों में आखिरी की दो तीन बची सीट मिल रही थी।
  सीट तो भाई शुरू की मिले या आखिरी की मेडिकल सीट मेडिकल सीट होती है।
  रंगोली बुरहानपुर की सीट के लिए हां कहने वाली थी कि उसके सामने बैठे व्यक्ति के पीछे की स्क्रीन जिस पर सीट्स और कॉलेज दिखाए जा रहे थे में एक नए चिकित्सा महाविद्यालय का नाम सात खाली सीट्स के साथ नज़र आया ” रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह चिकित्सा महाविद्यालय ” …
   ये नाम देखते ही रंगोली ने सामने बैठे व्यक्ति के सामने टेबल पर अपने फॉर्म पर एकदम से हाथ रख दिया…

“वेट सर ! सर ये बाँसुरी मेडिकल कॉलेज कौन सा है? “

सामने बैठे व्यक्ति ने अपने एक किनारे रखे ब्रोशर को उठा कर उसके सामने कर दिया…

” मायानगरी विश्वविद्यालय का एक कॉलेज है। मायानगरी में भी बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की तर्ज़ पर एक ही कैम्पस में लगभग सारे कॉलेज खोल रखें हैं। अभी नया बना विश्विद्यालय है लेकिन रेप्युटेशन अच्छी हैं।।
  यहाँ मेडिकल में सात सीट उपलब्ध है। “

” सर मुझे यही एडमिशन लेना है। “

” आर यू श्योर ? “

” डेफिनेटली सर ” मुस्कुरा कर रंगोली पीछे स्क्रीन पर चमकते नाम को देख मुस्कुरा उठी।
   कौन सा मुझे एम्स या ए एफ एम सी मिल रहा था। बुरहानपुर की सीट से तो यही भला है। कम से कम कॉलेज का नाम तो सुंदर है।
   रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह मेडिकल कॉलेज। यानी मेडिकोज की भाषा में R B A S medical collage….

क्रमशः

aparna …….


  
  

Advertisements
Advertisements

मायानगरी -4




   मायानगरी -4



       वो एक अंधेरा सा कमरा था। कमरे में टीवी फुल वॉल्यूम में चल रहा था और बस टीवी से निकलने वाली रोशनी उस कमरे में फैली हुई थी….
   कमरा बहुत खूबसूरती से सजा था। हर चीज़ अपनी जगह पर मौजूद थी। कमरे में एक तरफ बड़ी सी लकड़ी की अलमीरा में खूब सारे सॉफ्ट टॉयज सजे थे….
    उनमें से एक टेडी बियर नीचे गिरा पड़ा था। बाहर तेज़ बारिश का शोर था और अंदर टीवी पर चलते किसी शो का ।
      इसलिए शायद रसोई से आती सिसकारी की आवाज़ साफ नही सुनाई पड़ रही थी…
  लेकिन बहुत ध्यान से सुनने पर लग रहा था जैसी कोई बच्ची रो रही हो…
   उसी वक्त सीढ़ियों पर किसी के तेजी से चढ़ने की आवाज़ आयी।
   कोई लगभग दौड़ते हुए सीढियां चढ़ कर बाहर के बड़े से दरवाज़े को ठेलते हुए बाहर के ही जूतों के साथ भाग कर रसोई में चला आया…

” ये क्या कर रही हो देविका ? बच्ची है वो उसे छोड़ दो। “

” मेरी भी तो बच्ची है। सिर्फ तुम्हारी तो नही। “

” हाँ तुम्हारी ही है, फिर क्यों उस पर इतना ज़ुल्म कर रही हो। उसे छोड़ दो प्लीज़। तुम जो कहोगी मैं मानने को तैयार हूँ। “

  ” प्रॉमिस करो। गौरी के सर पर हाथ रख कर कसम खाओ पहले ।

  वो आदमी जैसे ही एक कदम आगे बढ़ा उस औरत ने उसे वापस रोक दिया..

“नही तुम वहीं रहो , इधर मत आओ। “

  उस औरत जिसे वो आदमी देविका कह रहा था ने अपनी आठ साल की मासूम सी बच्ची को रसोई गैस के सिलेंडर से बांध रखा था। हाथ में दियासलाई पकड़े वो उस आदमी यानी अपने पति से किसी बात को मनवाने की ज़िद कर रही थी।

   आखिर सामने खड़े पूरी तरह से मज़लूम और बेसहारा से दिखते उस आदमी ने उस औरत के सामने अपने हाथ जोड़ दिए…..

” तुम जो कहोगी मुझे सब मंज़ूर है। लाओ दो मुझे कहाँ रखें हैं तलाक के पेपर्स। “

देविका ने आंखों से पीछे  रखे टेबल की ओर इशारा किया। जयेश टेबल की ओर लड़खड़ाते हुए मुड़ा ही था कि देविका का पैर सिलेंडर से उलझा और वो सामने की ओर गिर पड़ी….
   देविका के गिरते ही सन्तुलन बिगड़ने से सिलेंडर भी अपनी जगह से लड़खड़ा कर गिरने ही वाला था कि उससे बंधी बच्ची ज़ोर से चिल्ला उठी… ” पापा..”

   गर्ल्स हॉस्टल के कमरा नम्बर 10 में अपने बेड पर बैठी गौरी पसीना पसीना हो चुकी थी। वो नींद से जाग चुकी थी… तो अब तक जो चल रहा था वो ?
   हाँ वो सपना ही तो था…. वही सपना जो उस भयानक रात के बाद उससे जैसे चिपक सा गया था…
   ये सपना बचपन से उसका पीछा कर रहा था। अक्सर वो अपने कड़वे बचपन को इसी तरह सपने में देख चौन्क चौन्क कर आधी रात को जाग जाया करती थी, और फिर घंटो उसे नींद नही आती थी…

    आज भी वो समझ गयी कि अब उसे नींद नही आनी है…. उसने अपने बिस्तर के बाजू में रखी टेबल पर पड़ा लैम्प जला लिया और गाइनेकोलॉजी की किताब खोल कर पढ़ने बैठ गयी।
    यही रात दिन की पढ़ाई ही तो उसके टॉपर होने का कारण थी। लोग परीक्षाओं में आगे बढ़ने के लिए पढ़ते थे और वो खुद से जंग लड़ने के लिए पढ़ती थी।
पढ़ते पढ़ते ही भोर हो गयी थी….  खिड़की से आती रोशनी देख उसने खुद के लिए चाय चढ़ाई और मुहँ हाथ धोने वॉशरूम में चली गयी….
    चाय लिए  बालकनी में खड़ी गौरी की नज़र बाहर कैम्पस में जॉगिंग करते मृत्युंजय पर पड़ गयी… वो उसे देख ही रही थी कि उसने भी उसे देख लिया और हाथ के इशारे से बाहर बुलाने लगा।
   हाँ में सर हिला कर वो बाहर चली गयी….

” ये क्या जॉगिंग वाला ट्रैक सूट क्यों नही पहना। नाइट सूट में ही बाहर चली आयीं।”

  अब गौरी को होश आया कि वो जैसे खिड़की पर खड़ी थी, वैसे ही बाहर चली आयी थी…

” वो ध्यान ही नही रहा सर ! आज जॉगिंग करने का मूड भी नही है। “

  जय को समझ में आ गया था कि गौरी ने आज फिर वही सपना देखा है।
   जय यानी मृत्यंजय उपाध्याय अभी मेडिकल कॉलेज में हाउस सर्जन शिप समाप्त करने के बाद  मनोरोग में पीजी कर रहा था। फिर भी जूनियर्स में वो हाउस सर्जन के पद से ही जाना जाता था।
   गौरी और मृत्युंजय की मुलाकात भी इत्तेफाक से हुई थी…. दोनो के बीच अफेयर जैसी बात फिलहाल नही थी लेकिन मेडिकल कॉलेज ऐसी जगह होती हैं जहाँ बिना आग के ही धुंआ उड़ता है।
   लोग बस धुंआ देख बात उड़ा देते हैं ये जाने बिना की धुँआ सिर्फ आग का ही नही  सिगरेट का भी हो सकता है…..

    मृत्युंजय गौरी का सिर्फ ट्रीटमेंट कर रहा था जिसके कारण गौरी को अक्सर मृत्युंजय की ओ पी डी जाना होता था और बस वहीं से दोनो के बीच कुछ चक्कर चल रहा है कि लहर सारे कॉलेज में बह चली। गौरी से तो किसी ने नही पूछा लेकिन जय को अक्सर उसके दोस्त इस बात पर छेड़ जाते और वो चुपचाप मुस्कुरा कर रह जाता……
   
     ऐसे ही थोड़े न मेडिकल कॉलेज अपने कांडो को लेकर बदनाम था…


*****

    फर्स्ट ईयर की पहली क्लास सेमिनार हॉल में लगी थी। सारे जूनियर्स कतार में बैठे प्रोफेसर का इंतेज़ार कर रहे थे कि धड़धड़ाते हुए सीनियर लड़कियों की टोली अंदर चली आयी….
   आते ही दरवाज़ा बंद कर दिया गया….

   सामने मंच पर कुछ सीनियर्स सवार हुई तो कुछ जूनियर्स के आगे पीछे कहीं न कहीं व्यवस्थित हो गईं…

  सारे जूनियर्स सांस रोके थर्ड बटन हो चुके थे।

” क्यों भई कौन है वो श्रीदेवी जिसने कॉलेज में पहले ही दिन कांड कर दिया ? “

  एक सिनीयर की तेज कड़कती आवाज़ पर भी सब चुप खड़े थे। ऐसा सन्नाटा पसरा था कि सुई भी गिरे तो टन्न की आवाज़ हो…

” काहे भाया सांप सूंघ गया ? ये जब से आमिर ताऊ ने बताया है कि म्हारी छोरियां छोरों से कम है के? तब से इस बात को मेडिकल की छोरियों ने कुछ ज्यादा ही सिरियसली ले लिया है!”

   अब जूनियर्स की सांसो की आवाज़ भी आनी बंद हो गयी थी….

” क्या हुआ? मैं पागल लग रही हूँ तुम लोगों को जो किसी के मुहँ से जवाब नही फूट रहा। अरे बको न कौन थी भई सलीम की अनारकली जो पहले ही दिन जाकर इंजीनियरिंग के लड़के को प्रोपोज़ कर आई? “

   रंगोली के आजू बाजू खड़े लोगों ने धीरे से उसकी तरफ उंगली से इशारा कर दिया….

” ओहो तो आप हैं वो मधुबाला! आइये ज़रा सामने, हम भी तो दीदार करें।
   भई शक्ल से तो सीधी सूदी दिख रही है फिर कैसे इत्ता बड़ा कांड कर आई।
  एक तो प्रोपोज़ कर दिया वो भी इंजीनियरिंग वाले बंदे को। कमाल है यार! अब वो बंदा तुझे ढूंढता यहाँ हनीमून मनाने आ गया न तो हमारे पास आकर रोने मन बैठ जाना।”

एक ने अपनी बात पूरी भी नहीं कि की दूसरी पट से बोल पड़ी…..

” यार और कोई नहीं मिला तुझे।  प्रपोज ही करना था तो अपने कॉलेज के किसी बंदे को कर देती। मिला भी तो इंजिस!
    लानत है यार लानत!  तुझे पता भी है सबसे घटिया बंदे पढ़ते इंजीनियरिंग कॉलेज में….
   फर्स्ट ईयर से क्या-क्या कांड नहीं करते हैं। रोंगटे खड़े हो जाएंगे अगर हम उनकी रैगिंग के किस्से तुम सबको  सुना दे तो ।
   आई बात समझ में?  हम तो पहले दिन से ही लड़कियों को आगाह कर देते हैं कि भैया एक बार को चलती ट्रेन में भले चढ़ जाना लेकिन इंजीनियरिंग कॉलेज के लड़कों के सामने मत पड़ना। यह इतने गए बीते होते हैं ना कि तू सोच भी नहीं सकती।
   लड़कों की सबसे घटिया जमात इन्हीं कॉलेज में इकट्ठा होती है ।
    फर्स्ट ईयर से इन्हें रैगिंग में सुट्टा मारना और दारु पीना सिखाया जाता है। यह होती है इनकी आगे की ट्रेनिंग। समझ रही है सेकंड ईयर थर्ड ईयर तक पहुंचते-पहुंचते   तो बंदा बिल्कुल ही पुरखा हो जाता है । गांजा हशीश चरस डोप क्या नहीं ट्राई करते हैं ये लोग।
  यह साले इतने स्लेविश होते हैं इतने स्लेविश होते हैं कि इनकी कमिनाई पर पूरा ग्रंथ लिख डालो। आई बात समझ में ? तो बेटा तुझे इतनी बड़ी माया नगरी में इंजीनियरिंग के अलावा और कोई बंदा ही नहीं दिखा।
आंखें ठीक तो है ना तेरी चश्मा वश्मा तो नहीं चढ़ा रखा।”

” अबे ये भी तो हो सकता है कि ये उसी की बंदी हो। दोनों की पहले ही डिंग डाँग चल रही हो। सीनियर्स ने रैंग किया तो चली गयी अपने पिया जी को बताने। ”

  रंगोली की सांस अटकी पड़ी थी और ये सीनियर उसे और डराये जा रही थी….

” नो मैम ! ऐसी कोई बात नही है। मैं तो यहाँ किसी को नही जानती। “.

” तो इतनी होशियारी मारने की क्या ज़रूरत थी?
पहले दिन आकर हमने रूल्स बताए नही और तुम लोग कूद पड़ीं। अरे क्या ज़रूरत थी सीनियर लड़को को रैगिंग देने की। हमारा कॉलेज एन्टीरैगिंग है इतना भी नही पता? “

“जाने दे सुचित्रा , हमें क्या ? हम तो इन नौनिहालों को बचाना चाहतें हैं और ये लोग है कि वो ऋषि एंड टीम के सामने सरेंडर कर गयीं।
  क्यों ऋषि खुराना ने रैंग किया है ना? “

  तभी एक जूनियर ने धीमे से गुनगुना कर कोई दूसरा नाम पुकार लिया…

” नो मैंम। अधिराज सर ने!”

” ओह्ह तो अधिराज के हत्थे चढ़े हो बेटा। मतलब अब तक ऋषि के साथ इंट्रो नही हुआ । ऋषि खुराना से बच के रहना, हम लोग एन्टीरैगिंग वाली हैं ना इसलिए पहले से खबरदार कर रहीं हैं। बाद में मत कहियो की मैडम ने बचाया नही। “

” मैम प्लीज़ हेल्प कर दीजिए। कैसे बचना है ऋषि सर से। “

   ” देखो भई मैं बहुत बड़े दिल वाली हूँ। परमार्थ में बहुत विश्वास है मेरा। बिना किसी स्वार्थ के बता रही हूँ। आज के आज फटाफट शाम में सारी गर्ल्स हमारे कमरों में आकर असाइनमेंट ले जाना और हफ्ते भर में लिख कर हमें वापस दे देना । “

“पर मैंम उससे हम सर लोगों की रैगिंग से कैसे बचेंगे?”

” अबे बता रहीं हूँ ना ज़रा सांस ले लूँ।”

” जी मैंम!”

  “एंड यू बॉयज, तुम लोगों के हॉस्टल में फर्स्ट फ्लोर के कमरा नम्बर 5 में अध्यक्ष का कमरा है। अध्यक्ष मतलब स्टूडेंट्स यूनियन मेडिकोज का अध्यक्ष।
   उसके पास तुम सारे लड़के पहुंच जाना। घर से जो भी खाना खज़ाना लेकर आये हो ना जैसे लड्डू चकली , निमकी .. सारी चीज़ें अध्यक्ष को पहुंचा देना। ये उनसे मिलने की फीस है। बस उसके बाद अध्यक्ष सर सब संभाल लेंगे। ”

” चल शर्मिला आज के लिए बहुत ज्ञान हो गया…”

” अरे हां मुमताज ! तूने सही कहा , चल अब निकलें वरना कहीं चतुर्वेदी आ गया न तो लेने के देने पड़ जाएंगे। “

  सारी की सारी सीनियर्स जैसे आयीं थी वैसे ही बाहर निकल गईं….

   उनके जाते ही जूनियर लड़के शाम को अध्यक्ष से मिलने जाने के मनसूबे तैयार करने लगे।

******

  सीपी सर की अगुआई में अभिमन्यु , अधीर और बाकी लोग सीईओ यानी निरमा से मिलने निकल गए।
  अभिमन्यु ने 400 की जगह 499 हस्ताक्षर तैयार कर लिए थे जिनमें कुछ नकली तो कुछ असली भी थे।

” अबे 499 का क्या फंडा है बे? या तो 400 रखता या 500,। 450 भी चल जाता । पर ये कुछ आधा अधूरा सा नही लगता। “

“सर जी यही तो फंडा है। जैसे मॉल और बड़े ब्रांड्स अपनी ब्रांडिंग करते हैं ना 499 लिख कर। देखने वाले का फोकस 4 पर ही जाता है दिमाग में आता है 400 कि रेंज का सामान है जबकि असल रेट तो 500 है। बस वहीं बात यहाँ लागू होगी।
  निरमा मैडम जब 499 देखेंगी तो उनके दिमाग मे  400 की रेंज आएगी और वो आसानी से सारे हस्ताक्षर मान जाएंगी।
   हम 10 लोग 500 के साइन लेकर जाते तो वो बिना पढ़े ही फाड़ के फेंक देती। इसलिए ऐसा किया। और जब उनकी टीम काउंटिंग में जाएगी तब 500 हस्ताक्षर एक बड़ा पैमाना बन जायेगा हमारी बात को प्रूव करने का। “

” अरे वाह अभिमन्यु। तुम तो यार बहुत ही बेकार सा ज्ञान दे डाले। चलो अब वहीं देखा जाएगा , क्या होता है?

  सारे लड़के निरमा के चेम्बर के बाहर खड़े थे। अंदर निरमा किसी मीटिंग में थी।
   लगभग घंटे भर बाद कमरे के अंदर से फैकल्टी मेंबर बाहर निकल आये।
  उनके बाहर आते ही निरमा ने पियोन से कह कर उन लड़कों को बुलवा भेजा…

“बैठिये आप लोग। “

  सामने रखी कुर्सियों पर सबके बैठते ही निरमा ने अपने सामने रखी फाइल को धीरे से बंद कर एक किनारे कर दिया..

   सारे लड़के उसे ही देख रहे थे। निरमा ने बीच में बैठे सीपी से इशारे से ही सवाल कर लिया…

” कहिये क्या तकलीफ है आप लोगों की?”

  सीपी ने साथ रखा पर्चा उसके सामने कर दिया… आंखों पर चश्मा सही करते हुए निरमा उनके द्वारा प्रस्तुत किये आवेदन को पढ़ने लगी। पढ़ते हुए उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ कर चली गयी..
  

” ओके । तो आप लोग चाहतें है सारे कैम्पस में बेरियर लगवा दिए जाएं।”

  ” नही मैम । नॉट बैरियर । पर लोगों का यहाँ वहाँ टहलना बंद हो जाये। “

“देखो वो तो ऐसा है की अगर आप सब अपनी अपनी क्लास में मन लगा कर पढ़ेंगे तो बाहर निरर्थक टहलने का किसी को वक्त ही कहाँ मिलेगा? “

” जी मैंम हम तो शिद्दत से पढ़ते ही है लेकिन आर्ट्स एंड स्पोर्ट्स कॉलेज के लड़के हमारे कैम्पस में खूब चक्कर लगातें हैं मैम।
  उन लोगो का चक्कर मेडिकल में भी खूब लगता है।”

“और आप लोग अपने ही कैम्पस में रहतें हैं? “

निरमा के सवाल पर सभी ने राजा बेटा बन कर हां में सर हिला दिया..

” गुड। लेकिन जब आप लोग अपने कैम्पस से निकलते नही तो ये कैसे पता चला कि वो लोग मेडिकल के भी चक्कर लगातें हैं।”

“मैडम ये सब तो पता चल ही जाता है।”

” अच्छा ! कैसे लेकिन? मैं तो देखो सारे कैम्पस में घूम सकती हूँ पर जब तक आप लोग न बताएं मुझे ये सब पता ही नही चलता। खैर…
   आप लोग अपनी पढ़ाई के लिए इतने कटिबद्ध है कि बाहर से आने वाले बच्चों के कारण डिस्टरबेंस फील करते हैं इससे आपको असुविधा हो रही है। ये बात सही नही है। अब ऐसे में मुझे कोई निर्णय तो लेना ही पड़ेगा।
  मैं ऐसा करती हूँ कल ही इंजीनियरिंग कैम्पस की बाउंड्री वाल को ऊंचा करवा देती हूँ। और आपका गेट परमानेंट लॉक करवा देती हूँ।
  वैसे भी आपके कॉलेज कैम्पस में ही आपकी फैकल्टी का भी हाउसिंग है, और आप लोगो का होस्टल भी।
  तो मेन गेट लॉक करवा देते हैं। न आप लोग बाहर आ सकेंगे न बाहर से कोई अंदर जा सकेगा।  
  इज़ इट ओके?”

“नो मैंम ! बिना बाहर निकले तो काम नही बनेगा। और बाउंड्री ऊंची हो गयी तो हवा कैसे आएगी? “

अभिमन्यु की बात सुन निरमा को ज़ोर से हंसी आ गई..

” फिर ? बोलो क्या करना चाहिए। “

” आप मेडिकल और हमारा कैम्पस ओपन रखिये बस आर्ट्स वालो का यहाँ  आना बंद करवा दीजिये।”

” नो ये तो पॉसिबल नही है। अगर खुले रहेंगे तो सारे खुले रहेंगे और अगर बंद किया तो सभी को बंद करवा दूँगी।
   एक बात और! मैं रोज़ रोज़ नए नियम अप्लाई करने में यकीन नही रखती। अगर एक बार निर्णय ले लिया तब फिर आप लोग मुझे मेरे निर्णय बदलने के लिए नही कह पाएंगे।
  इसलिए अभी एक हफ्ते के लिए सभी कैम्पस में कर्फ्यू कर लेते हैं।
कोई अपने कैम्पस से बाहर कहीं नही जाएगा। अगर ये ट्रायल सफल हुआ तो यही कार्यप्रणाली आगे अपनायी जाएगी वरना देखा जाएगा।
  पर इस एक हफ्ते की समयावधि में आप लोग ये इंश्योर कर लेना कि आप में से कोई किसी और कैम्पस में न दिखे वरना मैं फिर उसे सीधा रेस्टीकेट ही करूँगी।”

  निरमा की बातों को मंज़ूर कर वो लोग खड़े हो गए। निरमा को नमस्ते कर सभी बाहर निकल गए..

” यार ये तो पूरी डॉन है। पहले कैसे स्माइल देकर मीठी मीठी बातें कर एकदम से छुरी मार दी।मतलब हद है , अब आप इंजीनियरिंग वालों को भी  रूल्स बताएंगे। “

” सीपी भाई उनके लिए तो हम सब बराबर ही हैं। वो कौन सा इंजिस से खौफ खाएंगी। खैर चलो एक हफ्ते का ही सही कर्फ्यू तो लगा । अब देखते है वो जूनियर विधायक कैसे हमारे कैम्पस में फटकता है…..
   साला एक हफ्ते नही आएगा तो खुद यहाँ का रास्ता भूल जाएगा….”

  निरमा के ऑफिस से बाहर निकले वो लोग अपने कैम्पस की ओर बढ़ रहे थे कि अभिमन्यु ने अधीर को धीरे से पीछे खींच लिया…

” क्या हुआ? “

” यार आज मंगल है? “

” हाँ तो । तुम्हारा तो सब मंगल ही है। “

” अबे आज मंगलवार है तो आज के दिन मैं थोड़ा पुण्य कमा लेता हूँ न। मैं फटाफट यूनिवर्सिटी के मन्दिर से दर्शन कर के आता हूँ। तू कहाँ मिलेगा? “

” अबे और कहाँ, वहीं मिलूंगा अड्डे पे।

” चल ठीक है मैं  आता हूँ। इन गँवारू लोगो से कुछ मत कहना मैं कहाँ गया। “

” हाँ मेरे शाहरुख तू जा। जी ले अपनी ज़िंदगी। बस कोई नई सिमरन मत पटा कर आना। “

  अपने बालों पर हाथ फिराते हंसते गुनगुनाते अभिमन्यु यूनिवर्सिटी के अंदर की तरफ बने मंदिर की ओर चल पड़ा।
   बाहर जूते खोल वो फटाफट मंदिर में दाखिल हो गया…
   भगवान की मूर्ति के सामने आंखे बंद कर हाथ जोड़े वो मन ही मन में उनसे बातें करता रहा। होंठ धीमे से कुछ बुदबुदा रहे थे और उसने धीमे से आंखें खोल लीं। उसके ठीक सामने खड़ी लड़की ने भी शायद उसी वक्त आंखें खोली और पंडित जी के कहने पर नीचे झुक कर उसने सिंदूर उठा कर अपने माथे पर छोटा सा तिलक करने के बाद अपने साथ खड़ी अपनी सहेली को तिलक करने मुहँ पीछे घुमाया और ठीक सामने पड़ गए अभिमन्यु  के माथे पर तिलक की लंबी रेखा खींच दी।
    इतनी जल्दी ये सब हुआ कि वो लड़की और अभिमन्यु दोनो ही कुछ नही समझ पाये…

” आई एम सॉरी , आई एम सॉरी । मैंने तो झनक समझ कर तिलक आपको लगा दिया। “

” नो इट्स ऑलराइट । एब्सोल्यूटली ऑलराइट ! “

  अभिमन्यु तिलक पोंछने ही जा रहा था कि पंडित जी ने टोक लगा दी…

” अरे बेटा इतनी जल्दी मंदिर का लगा तिलक नही पोंछते। घर जाकर मुहँ धोओगे तो चेहरा साफ हो ही जायेगा…”

  हाँ में सर हिला कर उसने पंचामृत के लिए हाथ बढ़ा दिया।।उसके बाजू से ही  उस लड़की ने भी हाथ आगे कर दिया…
  अब तक में अभिमन्यु उस लड़की को पहचान चुका था।
   ये वही उस दिन वाली लड़की ही थी।
उस दिन तो लंबे लंबे बाल लहराती सुंदर सी कॉलेज फर्स्ट ईयर की लगती ये लड़की आज किसी शिशु मंदिर की गयरहवीं की छात्रा लग रही थी।
  नीला कुरता,सफेद सलवार, सफेद थ्री पिन की हुई चुन्नी पर ऊपर की ओर लाल रिबन से बंधी दो चोटियां।
   पर जो भी हो प्यारी बहुत लग रही थी।

  अभिमन्यु उसे देखता उसके पीछे मंदिर की सीढ़ियां उतर गया। वो अंतिम सीढ़ियों पर खोले अपने जूते पहन रही थी..

” हेलो ! माइसेल्फ अभिमन्यु … अभिमन्यु मिश्रा इंजीनियरिंग मैक फिफ्थ सेम। ”

  उस लड़की ने अपनी बड़ी बड़ी आंखें ऊपर कर उसे देखा , और सर नीचे किये जाने के लिए मुड़ गयी…

” अरे इत्ती घनघोर बेइज्जती । अपना नाम तो बताती जाओ यार। इतनी भी कर्टसी नही है? “

” रंगोली नाम है उसका और मैं हूँ झनक। मेडिकल फर्स्ट ईयर।
   हो गया इंट्रो अब हम लोग जाएं?”

  पानी पीकर आयी झनक ने अभिमन्यु की बात सुन ली थी। उसने रंगोली का हाथ पकड़ा और उसे खिंचती अपने साथ लिए आगे बढ़ गयी…

” रंगोली पहचाना इस लड़के को? “

  रंगोली के ना में सर हिलाते ही झनक हँसने लगी…

” अरे तेरा पति है ये। वही बंदा है जिसे तूने उस दिन प्रोपोज़ किया था।”

  झनक की बात सुन रंगोली का दिल धक से रह गया। कहीं सीनियर्स की कही बातें सच न हो जाएं। उसके मज़ाक को कहीं इसने सीरियसली ले लिया तो?
  उसका तो जीना दूभर हो जाएगा। पहले ही लड़कों को देख कर उसकी सिटी पिट्टी गुम हो जाती थी, और यहाँ तो उसने खुद आगे बढ़ कर कुल्हाड़ी में अपना पांव दे मारा था।
   उसने धीमे से पीछे मुड़ कर देखा वो वहीं हाथ बांधे खड़ा अपनी गहरी आंखों से उसे ही देख रहा था….

क्रमशः



aparna….
   

मायानगरी -3







  मायानगरी -3


      इंजीनियरिंग कैम्पस में भी नई नई चिड़िया चहक रहीं थीं वहीं कुछ कौए भी फुदक रहे थे…
   एक तरफ एक छोटा सा गार्डन बना था, जहाँ एक बड़े से बरगद के पेड़ पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था..
   “यहाँ रैगिंग करना सख्त मना है”

   उसी पेड़ के नीचे बैठे कुछ लड़कों ने उधर से गुजरते कुछ कौवों यानी  कुछ नए लड़कों को आवाज़ देकर बुला लिया..

” फर्स्ट ईयर? “

” यस सर !”

” बेटा पहले दिन ही जीन्स? और ये क्या बाल बना रखें हैं? खुद को नागराज समझते हो? “

” नो सर!”

” तो ये जो बालों का फुग्गा दिख रहा है ना कल कटवा के आना समझे। कल गंगाधर विद्याधर मायाधर ओंकारनाथ शास्त्री बन के आ जाना समझे।”

” ये सारे लोगों जैसा बन कर आना है सर? “

” अबे शक्तिमान नही देखे क्या बे ? हो सकता है तुम्हारे पैदा होने के पहले का सीरियल हो? अबे गूगल कर लेना।  .. और सुनो आज रात आठ बजे होस्टल नम्बर 5 में आ जाना। चलो फूटो अब…

   वो लड़के जान बचा कर भाग खड़े हुए। उन्हें यूँ भागतें देख सभी सीनियर्स में हंसी की लहर दौड़ गयी।
   
        तभी उस लड़की के प्रोपोजल से हैरान परेशान अभिमन्यु वहाँ चला आया। अभिमन्यु के साथ उसका दोस्त अधीर शर्मा भी था…
   दोनो बातें करते गार्डन में पहुंच गए…

” काहे इत्ता सोच विचार रहे हो अभि कोई नई चिरैया होगी आर्ट या कॉमर्स वाली, बेचारी रैगिंग की शिकार !”

” हाँ होगी तो रैगिंग की शिकार ही लेकिन सोचने वाली बात ये है कि उसने इतने लड़कों में मुझे ही प्रोपोज़ किया? “

” अबे ओए तू कोई जॉन इब्राहिम नही है समझा। जो सामने पड़ गया उसे प्रोपोज़ कर चलती बनी, अब इतना मत सोच , भूल जा उसे। “

” हाँ यार !मैं कौन सा सिरियस हूँ। बस ये पता चल जाये कि बंदी है किस फैकल्टी की। वैसे शक्ल सूरत से इतनी खूबसूरत सी थी पक्का आर्ट्स वाली होगी। है ना?

” कॉमर्स या साइंस ग्रैजुएट भी हो सकती है। सभी सुंदर लड़कियां आर्ट्स ही लें ये ज़रूरी तो नही? “

” हाँ यार वैसे बी एस सी में भी अच्छी लड़कियां आती हैं। एक हमारे हिस्से ही दुनिया भर की शशिकला और टुनटुन पता नही क्यों आती हैं। पता नही ये मैथ्स वाली लड़कियां इतना पढ़ती क्यों हैं कि अपने थोबड़े का भूगोल ही गड़बड़ा देती हैं। “

” मैथ्स बिना पढ़े निकलता भी तो नही भाई, अब हर कोई तेरे जैसा अनाप शनाप दिमाग तो नही पाए बैठा है ना?

” हाँ बात में तो दम है तेरी। वैसे तुझे वो पिछले साल की बी एस सी वाली याद है?

” कौन रूही ? जिसके चक्कर में तू उसके बॉयफ्रेंड से पिटने वाला था।

” अबे मैं नही पिटने वाला था, उल्टा उस साले को मैं पीट देता लेकिन रूही का चेहरा देख कर छोड़ दिया। अब यार जब मैं उसके चक्कर लगा रहा था तब वो कमबख्त भी तो फुल लाइन देती थी,मुझे क्या पता था मज़े ले रही है । अपने बॉयफ्रेंड की ताकत नापने का ये कौन सा तरीका होता है भाई। पहले खुद लाइन दो और फिर बॉयफ्रेंड से पिटवा दो।

  अधीर का हँस हँस कर बुरा हाल था…

” और वो याद है तुझे क्या नाम था “भाषा ” क्या स्मार्ट लड़की थी यार वो। मैथ्स ऑनर्स कर रही थी ना।”

  भाषा नाम सुनते ही अभिमन्यु के चेहरे पर चौड़ी सी मुस्कान चली आयी …..

” कैसे भूल सकता हूँ यार। इतनी टैलेंटेड बंदी सच आज तक नही देखी। अब कैंटीन में जब मैं उसे देखता वो भी मुझे देख मुस्कुरा देती। मुझे लगा पट गयी है। फिर धीरे धीरे मुझसे ज्यादा तो वो ही मुझे ताड़ने लगी थी …

” हाँ और फिर आया वो मनहूस दिन!”   अधीर अभिमन्यु की बात आगे बढ़ाता हँसने लगा…

“हम्म ! अबे कैंटीन में राखी लेकर कौन आता है यार!”

” हाँ सारे बवाल तेरे ही हिस्से लिखें हैं। तुझे उसकी आँखों में ममता नज़र नही आई थी जो लाइन मार रहा था। साले वो तुझमें अपना गुमशुदा भाई देखा करती थी और तू…”

” अब मैं क्या करूँ यार। इतनी प्यारी सी लड़की अगर मुझमें अपना भाई देखेगी तो फिर ज़िंदगी ही खत्म अपनी। अच्छा हाँ इसी बात से याद आया, आज भाषा की सहेली धरा छुट्टियों के बाद वापस आ रही है, उसे लेने स्टेशन जाना है मुझे।”

“हां अब बहन बन गयी है तो पूरी शिद्दत से भाई धर्म निभा तू। कब जाना है तुझे स्टेशन? अकेली आ रही है क्या”

” रात में ट्रेन है उसकी। अकेली ही होगी तभी तो भाषा ने स्पेशली फोन कर के कहा कि स्टेशन लेने चले जाना। “

“और ये नही कहा कि अपनी आदत से मजबूर लाइन मत मारना शुरू कर देना। “

  अभिमन्यु नीचे सर किये हँसता अपने बालों पर हाथ फिराता रहा….

” खैर अब भूल जा सुबह वाली को ,चल लाइब्रेरी चलते हैं। अबे यार….. सुबह वाली लड़की मेडिको भी तो हो सकती है। “

” तौबा तौबा , ऐसी नाजुक लड़की डॉक्टर नही बन सकती यार। डॉक्टर लड़कियां न अजीब छिपकली होती हैं पढ़ पढ़ कर इनके चेहरे सड़ जातें हैं, आंखों के नीचे काले घेरे और उस पर मोटा सा चश्मा लगाने वाली लड़कियां, डेडबॉडीज़ को चीरती फाङती लड़कियां , उफ्फ। मुझे तो इनमें चुड़ैल नज़र आती है। दुनिया में आखरी लड़कीं भी बची होगी न तब भी डॉक्टरनी से कभी प्यार नही करूँगा।”

“वैसे लड़कियों के मामले में तूने जो अभूतपूर्व ज्ञान कमाया है उसे देख कर समझ सकता हूँ तू सही ही कह रहा होगा।
   दर्जन भर तो तेरी सिर्फ ए अल्फाबेट से दोस्त रही होंगी , अवनी अनामिका,अनिका, आँचल, आरुषि ,अनन्या अपूर्वीनी और क्या थी वो चैताली मिताली … हे भगवान!

” बस करो यार। जलो मत तुम बराबरी करो। समझे। “

  दोनो बातें करते आगे बढ़ रहे थे कि सामने से एक हैरान परेशान लड़का चला आया…

“”अरे ज्ञानी भैया क्या हुआ ? बड़े टेंशनियाए घूम रहे हो। “

” यार अभिमन्यु सेमेस्टर शुरू हुआ नही की ये प्रोफेसर्स की किचकिच शुरू हो जाती है।

” अब क्या जुल्म हो गया गुरु?

” अब क्या बताएं यार , पिछले सेमेस्टर का बकाया मांग रहे हैं सारे। “

” ओहहो जे बात। चलिए लाइब्रेरी में चलिए कोई उपाय निकालतें हैं ज्ञानी जी।

  ज्ञानी जी का असली नाम हर्षवर्धन गेरा है। दिल्ली के रहने वाले हर्षवर्धन के पापा का रेस्टोरेंट है लेकिन वो अपने लड़के को सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनाना चाहते हैं। बड़े घिस तिस कर हर्षवर्धन को इंजीनियरिंग कॉलेज पहुंचाया गया था। इनके बारे में किवदंती ये है कि मैनेजमेंट कोटा के लिए आवश्यक मिनिमम मार्क्स भी ये नही ला पाए थे। मैनेजमेंट कोटा की मोटी धनराशि पर अपने रेस्टोरेंट की काजू कतली की रुपहली पतरी चिपका कर ही इन्हें इनके पिता ने पार लगवाया था।
पहले जैसे इनके रहने से इनका स्कूल धन्य हुआ पड़ता था अब कॉलेज का वही माहौल था यह कहने को तो पांचवे सेमेस्टर में पहुंच चुके थे लेकिन हर एक सेमेस्टर में कोई ना कोई विषय इन्हें मुंह चढ़ाता वहीं खड़ा रह गया था ।
    कहां जाता है इन्होंने फर्स्ट ईयर की पढ़ाई दो बार पढ़ी सेकंड ईयर की पढ़ाई भी दो बार पढ़ चुके हैं और अभी पांचवें सेमेस्टर में होते हुए भी पिछले सेमेस्टर के कुछ विषय लटके पड़े ही हैं।

     इतनी गहन पढ़ाई के कारण ही इंजीनियरिंग के बच्चों में यह ज्ञानी नाम से सुप्रसिद्ध हैं, अभिमन्यु का साथ मिलने पर उसने इन्हें रात-दिन एक करके पढ़ाया और यह किसी तरह सेमेस्टर की वैतरणी पार कर आगे बढ़ गए इसीलिए यह अभिमन्यु को बहुत माना करते हैं।
      दिल का साफ अभिमन्यु इन्हें सीनियर्स की तरह आदर भी देता था और एक मित्र की तरह प्रेम भी किया करता है अभिमन्यु और अधीर के साथ ही ज्ञानी जी भी इनके रूम मेट है।

  कुछ प्रोफेसर ज्ञानी जी के पांचवे सेमेस्टर में जाने के खिलाफ थे उनका कहना था कि ज्ञानी जी पहले सारे पुराने सेमेस्टर क्लियर कर लें तभी आगे बढ़े इसी बात के फसाद पर ज्ञानी जी अभी अभी किसी से उलझ कर बाहर चले आ रहे थे जिन्हें वापस समझा-बुझाकर अभिमन्यु ने लाइब्रेरी के लिए मोड़ लिया था।

नया सत्र शुरू हुआ था इसीलिए अभिमन्यु को किताबें अलॉट करवाने की जल्दबाजी थी, उसके पास इतने पैसे तो होते नहीं थे कि वह हर एक महंगी किताब खरीद सके, इसीलिए सबसे पहले लाइब्रेरी पहुंच कर अपने काम की किताबें  अलॉट कर के रख लिया करता था।
   भले पढ़ाई से कोई नाता नहीं था लेकिन एग्जाम में फेल होना उसके जमीर को गवारा नहीं था इसीलिए एग्जाम्स में पास होने किताबें और नोट्स उसके पास होना बहुत जरूरी हुआ करता था।
    सीनियर्स भी इस मैजिक माइंड लड़के से प्रभावित थे इसलिए अपने सबसे ज़रूरी नोट्स संभाल कर रखते और सेमेस्टर क्लियर होते ही अपनी वसीयत अभिमन्यु के नाम कर दिया करते।

वहां पहुंचे वह लोग किताबें अलॉट करवा ही रहे थे कि उन लोगों के भी सुपर सीनियर 5-6 के ग्रुप में वहां चले आए उन सभी को हैरान परेशान देख अभिमन्यु और अधीर एक दूसरे को देखने लगे यह सभी ज्ञानी के साथ ही इस कॉलेज को ज्वाइन किए हुए थे इसलिए सभी ज्ञानी को अच्छे से जानते थे वह लोग ज्ञानी और अभिमन्यु के पास ही चले आए।
    उन्हीं में से एक थे सीपी भाई !

  सीपी भाई का पूरा नाम था चंद्रप्रताप सुबोधन। ज्ञानी जी के साथ ही इन्होंने भी कॉलेज में कदम रखा था। पर जहाँ सीपी भाई सारे जहान के जोड़ घटाव गुणा भाग कर कैसे भी कर के पास होते चले गए ज्ञानी जी वहीं उसी सेमेस्टर में रहकर अपना ज्ञान सिंचित करते रहे।

सीपी (c p) ने अपने साथ रखा एक पर्चा अभिमन्यु की तरफ बढ़ा दिया …..

” यह क्या है सीपी सर ?”

” ध्यान से देख ले, पढ़ ले!”

अभिमन्यु उस पर्चे को ध्यान से देखने लगा और उन लड़कों में से एक लड़का उस पर्चे के बारे में बताने लगा ….

” यार अब हद होने लगी है ! ठीक है, माया नगरी एक पूरी यूनिवर्सिटी है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि किसी भी फैकल्टी का कोई भी बंदा कहीं भी घुस जाएगा।”
  हमारे इंजीनियरिंग केंपस में कुल जमा 3 कैंटीन। है कि नहीं?  यह राजा युवराज सिंह आर्ट्स एंड स्पोर्ट्स अकैडमी वाले लड़के जब देखो तब हमारी कैंपस की कैंटीन में चले आते हैं। एक तो साला उनमें विधायक का लड़का है अपनी जीप में धूल उड़ाता फिरता है । सारा वक्त अपनी एसयूवी में सवार रहता है अपने चेलों से घिरा खुद को पता नहीं कहां का राजा समझता है?

    माया नगरी में पढ़ रहा है तो उसे लगता है कि वह खुद भी राजा अजातशत्रु बन गया है। अरे ऐसे कोई थोड़ी अजातशत्रु बन सकता है।
     पता नहीं लीचड़ आदमी खुद को क्या समझता है? जब देखो तब हमारी कैंटीन में चलाएगा और हमारे कैंपस की लड़कियों को छेड़ता रहेगा। इसी सबके लिए यह पेपर लिखा गया है।  इस पेपर को हम डायरेक्ट यूनिवर्सिटी के चेयर पर्सन के पास देने वाले हैं । इसमें यह लिखा है कि जो जिस फैकल्टी का स्टूडेंट है उसी कैंपस में रहे , और उसे किसी और कैंपस में घुसने की मनाही कर दी जाए । हमारी ब्रांच के लड़के इसमें साइन कर चुके हैं। अभी 4 ब्रांच और बची हैं , वहां के भी सारे बच्चों के साइन होने के बाद काफी सारे लोग हमारे फेवर में आ जाएंगे , इसके बाद हम अपने कॉलेज के लेक्चरर और प्रोफेसर के साइन लेने के बाद सीधा माया नगरी की सीईओ के पास जाएंगे।”

” सर पता भी है मायानगरी की सीईओ है कौन?”

“हां पता है ना! वैसे तो माया नगरी के कर्ता-धर्ता राजकुमार विराज सिंह है लेकिन हम डायरेक्टली उनके पास नहीं पहुंच सकते ऑफिस मैनेजमेंट देखने के लिए ऑफिस सीईओ के पास ही हमें जाना पड़ेगा। और सीईओ है श्रीमती निरमा प्रेम सिंह चंदेल ।
      सुनने में आया है थोड़ी स्ट्रिक्ट है मैडम लेकिन है बहुत अच्छी । यह भी सुना है कि स्टूडेंट्स के भविष्य से वह कभी खिलवाड़ नहीं होने देती। कोई भी परेशानी हो वह दोनों पक्षों को सुनकर समझ कर वही निर्णय लेती हैं जिसमें विद्यार्थियों का भला हो।  मुझे तो भरोसा है कि वह हमारी बात सुनेंगे और समझेंगे और उस विधायक के लड़के को भी सही मजा चखा देंगे,  तो बेटा अभिमन्यु साइन कर दो इसमें।

“जी सर!   सर साइन ही नहीं करेंगे बल्कि मैडम के पास चलेंगे भी…
     हम जितने ज्यादा लोग जाएंगे उतना ज्यादा असर पड़ेगा। जाहिर सी बात है कि हमारे कैंपस में सिर्फ इंजीनियरिंग वाले लड़के लड़कियां ही रहें। ना तो आर्ट्स वाले यहां आएँ और ना ही साइंस वाले ।और  मेडिकल वाले भूत तो बिल्कुल ही न आ सकें। सबको अपनी अपनी फैकल्टी अपने अपनी ब्रांच दी गई है सभी के कैंपस सफिशिएंट बड़े हैं। सभी को कैंटीन की सुविधा लाइब्रेरी की सुविधा दी गई है । फिर क्यों इधर-उधर मारे मारे फिरना । सर मैं बिल्कुल आपके साथ चलने को तैयार हूं।

“गुड तुमसे यही उम्मीद थी।  तुम्हारे दोस्त भी बहुत सारे हैं,  तो सब के सब का साइन ले लेना इसमें। ठीक है ?यह पेपर रखो शाम को हमें दे देना

“सर मैं आज शाम तक इसमें 400 लोगों के साइन ले कर आ जाऊंगा भरोसा रखिए…

“गुड तुमसे यही उम्मीद थी ..अब हम चलते हैं बाकी जगह भी जाना है!

उन लोगों के वहां से जाते ही ज्ञानी और अधीर अधीरता से अभिमन्यु का चेहरा देखने लगे।

” अभी 400 साइन कहां से लेकर आएगा तू ?  कुछ ज्यादा ही फेकू नही है ? कुछ भी कह देता है….”

” अबे सिर्फ साइन लेने के लिए 400 लोगों के पास जाने की क्या जरूरत है? भगवान ने मुझे दो दो हाथ  और 10 उंगलियां दी है।
      इन दोनो हाथों की  उंगलियों से ऐसे ऐसे कारनामे करूंगा ना कि 400 ही नही 800 साइन बना लूंगा और किसी को पता भी नहीं चलेगा। “

“अबे साले हद फर्जीवाड़ा है तू। अपना सारा दिमाग बस इसी सब में झोंक दे। सही से पढ़ लिख लेता ना तो कलेक्टर बन जाता कहीं का।”

“कितना कंफ्यूज है यार तू और मुझे भी करता है। इंजीनियरिंग कर के मैं कलेक्टर काहे बन जाता भला? “

” चल अब चलें कम से कम आठ दस साइन तो असली वाले ले ले फिर रात में हॉस्टल रूम में बैठ कर बनाते रहना फर्जी सिग्नेचर। कल मैडम से मिलने भी जाना है।”

अभिमन्यु अधीर और ज्ञानी कैंटीन की ओर चल पड़े…..

**********

रंगोली तैयार होकर अपने गांधी झोले में किताबें और नोटबुक डाल रही थी कि झनक भी नहा कर निकल आयी…

” रंगोली तू तैयार नही हुई अब तक? “

” हो तो गयी हूँ। और क्या तैयार होना बाकी है।?”

” ओए मैडम हम फुज़ी हैं, हमें ये ऊंची सी पोनी टेल , ये चटकीले रंगों के कपड़े और ये स्टाइलिश सी जूतियां अलाऊ नही हैं। समझी।

” ओह्ह ! फिर ।।”

” फिर ? तुझे एडमिशन के समय मेधा रानी ने कुछ बताया नही क्या ? अजब डंबो है यार तू। ये सब तो हमें एडमिशन के साथ ही उसने बता दिया था।

” अब ये मेधा रानी कौन है? “

झनक ने अपने माथे पर हाथ मारा और फटाफट अपनी अलमीरा से एक जोड़ा यूनिफॉर्म निकाल कर रंगोली को थमा दिया…

” मेधा रानी मैडम कॉलेज में फीस कलेक्शन के बाहर इधर उधर भटकती आत्मा के समान टहलती रहतीं हैं। सेकंड ईयर स्टूडेंट हैं, हॉस्टल रूम अलॉटमेंट के साथ ही सारे नियम भी फटाफट बता देती हैं। असल में हर साल सेकंड ईयर की एक लड़की को इस काम के लिए चुना जाता है। जो जूनीज़ को पकड़ कर नियम रटवा दें।
  अब तू पूछेगी नियम क्या हैं। तो बेबी पहला तो हमें दो चोटियां बनानी है , वो भी रेड रिबन लगा कर ऊपर बांधनी हैं। दूसरा यूनिफॉर्म में यही नीला कुर्ता और सफेद सलवार पहनना है ,चुन्नी थ्री पिन करनी है। और पैरों में बिना हील्स के हद दर्जे के बोरिंग पंप शूज़।
  ये सिमिज़ की जलन है बस। क्योंकि हर नई खेप के साथ सीनियर लड़के क्लास में अपने लायक जूनी ढूंढने ही तो आते हैं। इसलिए ये लोग हमें ऐसे नमूना बनवा कर रखतीं हैं।

  झनक की बातों के दौरान ही रंगोली भी तैयार हो गयी।
  दोनो फटाफट अपने गांधी झोले टांगे कॉलेज के लिए भाग चले….

” जल्दी जल्दी कदम बढ़ा, आज सबसे सामने बैठना है एनाटॉमी लैब में। “.

“हां यार मुझे भी अच्छे से पढ़ाई करनी है, सामने बैठेंगे तभी तो समझ आएगा। “

” पढ़ाई वढ़ाई का कोई चक्कर नही है मेरे साथ…. वो तो आज मृत्युंजय सर क्लास लेने वाले हैं, उन्हें ताड़ना है बस इसलिए सामने बैठना है…”

रंगोली फिर आंखों में सवाल लिए झनक को देखने लगी…
  
  झनक रंगोली को देख मुस्कुरा उठी….

” ऑब्विसली तू मृत्युंजय सर को भी नही जानती होगी। हाउस सर्जन हैं अपने यहाँ , क्या डैम हैंडसम बंदा है यार उफ्फ, और जब कभी ब्लैक शर्ट में आता है ना कसम से कितनी लड़कियां तो ऐसे ही कत्ल हो जाती होंगी। वो साउथ का हीरो है ना सुधीर बाबू, वो भी फेल है मृत्युंजय सर के सामने।  ये ब्लैक शर्ट का किस्सा सिमिज़ के मुहँ से ही सुना था, अब तक देखने का सौभाग्य नही मिला। “

  झनक की बातें सुनती हंसती रंगोली झनक को गहरी आंखों से देखने लगी…

” बाकियों का पता नही तू तो अभी से फ्लैट हो गयी ,लग रहा है…”

” अरे कहाँ यार। सर की तो सेटिंग है पहले से। हम तो बस आंखों को सुकून मिले ऐसी चीज़ें देखनी चाहिए, इसलिए देख लेते हैं।”

” ओह्ह तो सर की सेटिंग किससे है? “

” गौरी मैम ! उस दिन दिखी थी न होस्टल में, वही हैं……

  




क्रमशः

aparna …

मायानगरी -2

Advertisements




  मायानगरी -2



     काउंसिलिंग से वापस लौट कर रंगोली के पैर जमीन पर नही पड़ रहे थे। चार दिनों में वहाँ जाने रहने की सारी तैयारियां पूरी कर रंगोली बिल्कुल किसी राजकुमारी सी अपने घर से पहली बार विदा हुई।
   सत्रह की अल्हड़ उम्र में पहली बार अपनी माँ पापा बहन को छोड़ कर जाना उसके लिए बहुत मुश्किल था।
  यही हाल उसकी माँ का हो रहा था। उनकी कनक कलेवर लड़की जिसको मेड