दहकते पलाश …

कुछ मोहब्बतें वक्त की मोहताज नही होतीं…

दहकते पलाश

बालकनी के ग्लास डोर के पास रखे कैनवास पर जंगलों में बेतरतीब दहकते पलाश उकेरते हुए माया इतनी मगन हो गयी थी कि सरु की लायी हुई दुसरी कॉफ़ी भी रखे रखे ठंडी हो गयी।

उसके टोकने पर जब ध्यान गया तब उसे एक और कॉफ़ी लाने बोल बाहर बालकनी में आकर खड़ी हो गयी, वही महीना, वही फ़ाग, वही सिन्दूरी पलाश … उसका कितना कुछ जुड़ा था इन सब से, और वैसे सोचा जाये तो कुछ भी नही जुड़ा था, बस कशिश का आसमान था और शिद्दत सी ज़मीन, पर किस्मत थी कि ना आस्माँ मिला ना ज़मीं ।।

उसे सब कुछ ऐसे याद है जैसे सब कल की ही बात हो, लगता ही नही कि पन्द्रह साल बीत गये उस होली को।
आज भी उस दिन की एक एक बात याद थी, सारा कुछ जैसे अब भी आंखों के सामने एक फिल्म की तरह चल रहा हो…..

कितनी चहल पहल होती थी उन दिनों उस मोहल्ले में। उसकी उम्र के ढ़ेर सारे बच्चे इधर उधर तूफान मचाए घूमते थे, और वो था इन सब का सरगना।
जाने कहाँ से ढूँढ ढूँढ के शरारतें लाता था, सारा मोहल्ला उसका सताया हुआ था,कभी किसी की छत पर सूखने वाले पापड़ चकनाचूर कर जाता, कभी किसी की पानी की टंकी में रंग घोल जाता, इन्हीं सारे बेमतलब के कामों में दिल लगता उसका, पढ़ाई लिखाई से दूर, अपने और अपनी मस्तियों में मगन ।
उसकी पक्की सहेली का भाई ना होता तो कभी उसका चेहरा तक ना देखती, पर ऐसा सोचना आसान था करना कठिन, क्योंकि उस निर्मोही को एक नज़र देखने के बाद कोई बिरला ही होगा जो उसका लुभावना चेहरा भूल सके, गोरे रंग पे काली बड़ी बड़ी आँखें और उनसे टक्कर लेता चौड़ा माथा, उसके लिये अक्सर माया की दादी कहा करती _” जे मिसराईन के घर कोई यक्ष गन्धर्व पैदा हुआ है, तभी हम मानुसों से नही निभे है इस खर्राट की। कितना हडकंप मचाए रखता है पर जे के लाने कितना भी गुस्सा हो मन में, इसकी मुस्कान देख सब उड़ जाती है बहुरिया।।
अगर कुछ पढ लिख जाये, नौकरी पा जाये तो कल अपनी माया के लिये हाथ पसार कर मिसराईन से इस छोरे को मांग लूंगी।”

” आप भी अम्मा, सुबह सुबह कलेस मचाई रहती हो, लक्षण देखें है रावण है पूरा, और फिर माया भी तो…..

माया की माँ ने तो बात वही खत्म कर दी पर उसके मन में कोई बीज जम ही गया था, जो होली के दिन खाद पानी पाकर बेल सा लहलहाने लगा था।।

सभी रंग गुलाल में डूबे थे, बस वही साफ सुथरी अपनी छत पर खड़ी मोहल्ले की भीड़ भाड़ देख देख कर हँस रही थी, तभी नीचे उसकी सहेलियों का झुंड गुज़रा और सब उससे नीचे आने का आग्रह करने लगे, सब की बात और थी पर उन सभी में उसकी पक्की सहेली रोली भी थी, उसकी बात काटना माया के लिये कठिन था, अपनी सोच में डूबी माया को उसकी दादी ने समझा बुझा कर नीचे भेज ही दिया था।
सारी सखियाँ माथे पर टीका लगा के उससे गले मिल रही थी कि किसी के मज़बूत हाथों ने उसे पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया, और उसका पूरा चेहरा गुलाल से भर दिया।
वो अबीर था!! जिसके कुँवारे हाथों ने माया के गालों पर जाने कितने दहकते पलाश खिला दिये थे।
उसके कानों में चुपके से “हैप्पी होली” बोल वो एक बार फिर अपनी टोली में मगन हो गया था।।

वो होली बीत गयी पर उसके लिये छोड़ गयी थी ढ़ेर सारे एहसास, जिन्हें वो चाह कर भी किसी से साझा नही कर सकती थी।
उसे हमेशा से खुद पर और अपनी किस्मत पर तरस आता था, पर अब एक नाराज़गी थी क्यों भगवान ने उसकी किस्मत ऐसी काली स्याही से लिख दी थी जिसे वो चाह कर भी मिटा नही पा रही थी।
उसके दादा और उनके बचपन के दोस्त का अपनी बचपन की दोस्ती को पक्का करने का निर्णय उसकी जीवन नैय्या डूबा गया था, सिर्फ सात बरस की तो थी जब मृत्यशैय्या पर लेटे उसके दादा ने अपनी आखिरी इच्छा के तौर पर अपने दोस्त के पोते से उसके फेरे फिरवा दिये थे, उस समय बाल विवाह होना बन्द हो चुका था पर अक्षय तृतीया के ही दिन उसके घर वालों ने उसे भी गड्डे गुडियों सा ब्याह दिया था, उसके विवाह को एक माह भी नही बीता की उसके दादा जी सिधार गये पर घर वालों के मन में एक संतुष्टी छोड़ गये थे अपनी अन्तिम इच्छा पूरी कर पाने की।

उसके ब्याह को दो साल हुआ ही था कि, किसी बीमारी की चपेट में आकर उसका पति भी नही रहा और ना रहे उसके दादा ससुर।
नौ साल की उम्र में जब उसे शादी और ससुराल का मतलब तक पता नही था, सुहागन का मतलब पता नही था, वो विधवा हो चुकी थी।।
माँ और दादी उसे गले से लगाये बिलखती रहीं, और कुछ देर सहने के बाद कसमसा कर उसने खुद को उनसे छुड़ाया और खेलने बाहर भाग गयी।।

धीरे धीरे समय के साथ उसे अपनी काली किस्मत का लेखा जोखा समझ आने लगा था, और जैसे ही उसने अपनी किस्मत से समझौता करने की सोची अबीर किसी खुशबूदार हवा के झोंके सा उसके जीवन की नीरस बगिया में फूल खिलाने धंसता चला आया था।

उस होली के बाद अबीर के एग्ज़ाम्स हुए और आगे की पढ़ाई के लिये वो बाहर चला गया था, वो शाम भी वो कैसे भूल सकती थी, रोली से उसे पता चल ही चुका था कि उसके अबीर भैया कोटा जा रहें हैं पढ़ने, उसके निकलने के समय पर वो चुपके से अपनी छत पर जा खड़ी हुई थी, उसे एक बार पूरी नज़र देखने के लिये!!
अपना सारा सामान कार की डिक्की में भरने के बाद उसने पलट कर एक बार उसकी छत की तरफ देखा भी था और घबराहट में माया दीवार की ओट में हो गयी थी, उसे देखने की अधूरी आस लिये ही वो चला गया था।
वो तो उसके जाने के बाद उसके जाने का असली कारण माया को पता चला था, जब एक शाम वो स्कूल से लौटी और अपनी माँ और दादी को बातें करते सुना__” क्या ज़रूरत थी अम्मा उनके घर जाने की, ऐसा भी लड़के में कौन सा हीरे मोती जड़ें हैं, ना होगी माया की शादी तो ना होगी, मैं अपनी बेटी को जीते जी कोई दुख ना होने दूंगी।”

” और तुम्हारे बाद उसका क्या होगा बहुरिया?? यही सोच कर तो जी घबराता है कि हम सब के बाद उस बेचारी का क्या होगा?”

” पढ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो जायेगी अम्मा, वो खुद अपना सहारा बनेगी।। आइंदा आप किसी के घर माया का रिश्ता लेकर ना जाना, देखा नही मिश्राइन ने कैसे रातों रात लड़के को पढ़ाई के नाम पर बाहर भेज दिया जैसे हमारी माया की छूत लग जायेगी अगर यहाँ रहा तो।”

उसका कलेजा धक से रह गया था, तो इसलिये उसे बाहर भेज दिया!!
उस दिन के बाद से उसने रोली के घर आना जाना बिल्कुल बन्द कर दिया था, रोली ही क्या धीरे धीरे अपनी हर सखी सहेली से दूरी बना ली थी, और उसी समय उसकी मासी उसके लिये देवदूत बन कर आ गयी__
” दीदी माया का हाथ बहुत साफ है, बहुत अच्छी पेंटिंग करती है , इसे फाइन आर्ट्स में क्यों नही भेज देतीं ।”

और फिर सारे घर भर को मना मुनु के आखिर मासी उसे अपने साथ ले ही गयी थी। वल्लभ एकेडमी ऑफ़ आर्ट्स में प्रवेश लेते ही उसका जीवन बदलने लगा था, अपनी फाइन आर्ट्स की डीग्री पूरी कर स्कॉलरशिप लेकर वो वेनिस से भी कोई एक्स्ट्रा डिप्लोमा कर आयी थी।।

रंगों से खेलती उसकी तुलिका अब उसके कैनवास में ही जीवन ढूँढने लगी थी।
रंग बिरंगे रंगों से सजी उसकी पेंटिंग्स देख कर कोई उसके बिना रंगों के जीवन को सोच भी नही सकता था।।

” दीदी कॉफ़ी पी लो वर्ना फिर ठंडी हो जायेगी।”
सरु की आवाज सुन वो वापस वर्तमान में लौट आयी, अगले हफ्ते ठीक होली से एक दिन पहले उसकी पेंटिंग एक्सीबिशन होनी थी, उसी के लिये वो तन मन से जुटी थी।।

मासी के साथ उसके जाने के चार महीने बाद ही उसके पापा का ट्रांसफर भी दूसरे शहर हो गया था और उस शहर उस गली से सारे नाते छूट गये थे, बस नही छूटा था अबीर का लगाया वो रंग जो अब भी माया अपने गालों पर महसूस कर पाती थी।।

*******

शाम हो चुकी थी, लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी, लोग घूम घूम कर अपनी पसंद की पेंटिंग्स देख रहे थे, उनमें से कुछ खरीद भी रहे थे, एक्सीबिशन हॉल के एक ओर बने छोटे से ऑफिस में माया अपनी साथी पेंटर के साथ बैठी कुछ ज़रूरी बातों में लगी थी कि उनकी एक हेल्पर ने अन्दर आ कर उन्हें बताया कि कोई एक आदमी है जो माया की वो पेंटिंग खरीदने की ज़िद पर अड़ा है जो वहाँ बेचने के लिये रखी ही नही गयी।।

” उनसे कह दो, वो पेंटिंग बिकाऊ नही है, उसे बस “एज़ अ मास्टर पीस” रखा है।”

” पर मैडम वो समझ ही नही रहे, कह रहे जब बेचना नही था तो यहां रखने की क्या ज़रूरत थी?”

” कौन सी पेंटिंग माया ‘ दहकते पलाश’?

” हाँ नेहा! मैं उसे किसी कीमत पर बेचने को तैय्यार नही हूँ, पता नही कौन रईसजादा है, जो ऐसे ज़िद पर अड़ा है।”

” हम्म तुम्हारा चेहरा पसंद आ गया होगा, तुम्हारे जैसी ही तो लगती है वो पेंटिंग, भले ही तुमने खूब सारे रंगों से चेहरे को रंग दिया है बिल्कुल जैसे किसी ने होली पर चेहरे पर खूब सारा अबीर गुलाल छिड़क दिया हो, बस हँसते हुए दांत नज़र आते हैं पर पेंटिंग लाजवाब है।”

” मैडम जी आप ही बात कर लो एक बार, हमारी तो सुन नही रहे वो साहब”

माया और नेहा ऑफिस से बाहर निकल आये, माया ने आगे बढ़ कर उस आदमी से कुछ कहना चाहा ही था कि पेंटिंग को देखता वो पलट कर माया के सामने हो गया, दोनो कुछ देर एक दूसरे को देखते ही रह गये।।

” मैं कैसे समझ नही पाया कि ये तुम हो माया।”
अबीर की बात पर माया ने शरमा कर आंखे नीची कर लीं….

” बहुत खूबसूरत पेंटिंग है, बिल्कुल तुम्हारी तरह, अभी तक समझ नही पा रहा था की बनाने वाला इसे बेचना क्यों नही चाहता, पर अब तुम्हें देख कर समझ आ गया…..”

” कैसे हो अबीर?”

” बिल्कुल वैसा ही जैसे पहले था, तुम कैसी हो?”

उसके सवाल पर वो मुस्कुरा उठी__

” क्या समझ गये? मैं आखिर क्यों नही बेचना चाहती इस पेंटिंग को?”

“बस उसी कारण जिसके लिये मैं इस पेंटिंग को खरीदना चाहता था, पर खैर अब मैं नही खरीदूंगा, तुम्हारी यादें तुम्हें मुबारक!! हाँ अगर तुम्हारी जगह किसी और ने ये बनाया होता तो किसी भी कीमत पर खरीद ही लेता, मेरी वाईफ को पेंटिंग्स का बहुत शौक है माया, आज अपनी सालगिरह पर सोचा उसे उसकी पसंद का तोहफा दूंगा पर यहाँ इस पेंटिंग ने मुझे रोक लिया, इसके आगे और कुछ देख ही नही पाया, इस पेंटिंग में मुझे तुम नज़र आई थी, पर जब ये देखा कि बनाने वाली भी तुम ही हो तो सब समझ आ गया मुझे।।”

उन दोनों को बातें करता छोड़ नेहा और बाकी लोग वहाँ से जा चुके थे….

” तुमने शादी की माया?”

” नही!! पहली टिकी नही और जब दूसरी करनी चाही तो जिससे चाहा वो जाने कहां गुम हो गया।”

” एक बार मुझसे कहा तो होता?”

” कब कहती, कैसे कहती? अगर तुम्हारी ‘ना’ होती तो मैं जीते जी मर जाती, अब तक जी रहीं हूँ और तुम्हारे दिये उन रंगों से ही अपना कैनवास भर रही हूँ, इतना काफी है अबीर , तुम मेरी तरफ से ये पेंटिंग रख लो।”

” मिलना नही चाहोगी मेरी वाईफ से?”

” वो भी आईं हैं क्या यहाँ?”

” हम्म !!, वो तुम्हारा ऑफिस है शायद।”

” अरे हाँ!! आओ उन्हें भी बुला लो, मैं तब तक कॉफ़ी के लिये बोलती हूँ!” कह कर माया आगे बढ़ गयी, उसके पीछे अबीर भी उसके ऑफिस में प्रवेश कर गया…..

” कहाँ हैं?? तुम्हारी वाईफ अन्दर नही आई??”

” मिलवाता हूँ, पहले चैन से बैठ तो जाऊँ!! इतने सालों की कितनी सारी बातें हैं, मेरे कोटा जाने के कुछ समय बाद तुम्हारा परिवार वो शहर ही छोड़ गया….
पहले तो रोली से तुम्हारे बारे में कुछ सुनने को भी मिल जाता था पर तुम लोगों के शहर छोड़ने के बाद तो तुम लोगों से सम्पर्क के सभी साधन बन्द हो गये, रोली को भी तुम्हारी कोई खबर ना थी, खुद को कहाँ कैद कर रखा था माया?”

” पता नही अबीर!! पर तुम्हारे घर से ना सुनने के बाद मेरी भी हिम्मत चूक गयी थी, और शायद घर वालों की भी, दादी तो अब रहीं भी नही, मेरे घर भर में सबसे ज्यादा उन्हें ही तुम पसंद थे।”

” और तुम्हें??”

अबीर की बात अनसुनी कर माया ने कॉफ़ी उसके आगे बढ़ा दी__” अब मिलवा भी दो अपनी वाईफ से।”

अबीर ने हाँ में सिर हिला कर अपने जेब से अपना वॉलेट निकाला और खोल कर माया के सामने कर दिया, उसमें उसकी वही पन्द्रह साल पुरानी रंगों से भीगी मुस्कुराती तस्वीर लगी थी__” ये कब निकाल ली थी तुमने ?”

” रोली को कह कर तुम्हें नीचे बुलाने से लेकर मोहित से छिप कर तस्वीर खिंचवाने तक की प्लानिंग थी मेरी, वो तो उसके बाद मैं पढ़ने बाहर चला गया वर्ना ….”

अबीर अपनी बात पूरी भी नही कर पाया था कि नेहा हाथ में गुलाल से भरी प्लेट थामे दोनो के पास चली आयी …..
” आप दोनों को होली की शुभ कामनाएँ “

अबीर ने मुस्कुरा कर माया को देखा__” उस दिन एक काम अधूरा रह गया था माया”

प्लेट से ढ़ेर सारा गुलाल उठा कर अबीर माया की तरफ बढ़ा ही था कि माया ने अपने हाथों से गुलाल अबीर के गालों पर मल दिया ” उस दिन अधूरा रह गया था ये अरमान!! हैप्पी होली अबीर!!

aparna….

वो सात दिन …. एक प्रेम कहानी

प्यार में ज़रा सी दूरियां भी हैं ज़रूरी….

      रोहित और नीता की शादी तय हो चुकी है,सब कुछ बहुत- बहुत अच्छा चल रहा है,आज शाम को दोनों की शादी की डेट  भी निकल आयेगी।
    
           “हेलो ,रोहित! क्या कर रहा था मेरा शोना ?”
   “कुछ नही नीत ,बस अभी फ्रेश होके आया,अब डिनर करने जा रहा।”
“ओ के बेबी,अच्छा सुनो आज मम्मा-पापा ने पण्डित जी को बुलाया था ,आज से ठीक 45दिन बाद का मुहूर्त निकला है,28जनवरी का।
   “मम्मा ने तुम्हारी मॉम को भी फ़ोन कर दिया है ,अभी अभी,,बस तुम्हारी मॉम का भी तुम्हारे पास फ़ोन आने ही वाला होगा।”
” yeah off course! बल्कि आने ही लगा ,चलो मै मॉम से बात करके तुम्हे कॉल करता हूँ,बाय।”

      रोहित भोपाल का रहने वाला स्मार्ट खूबसूरत बन्दा था,एन आय टी से इंजीनियरिंग करने के साथ ही कैम्पस सेलेक्शन होके पुणे आ गया।’पटनी ‘ मे कुछ समय काम करने के बाद उसने अपने कैरिअर को देखते हुए कंपनी बदल दी,अपने तेज दिमाग और कार्य कुशलता के कारण 5साल मे ही टी एल बन गया ।
        
         नीता ने जब उसी कंपनी मे काम शुरु किया तब पूरे ऑफिस मे जैसे बहार सी आ गई।
हंसती खिलखिलाती नीता ने जैसे सारे ऑफ़िस मे जादू सा कर दिया,पर इस जादू का सबसे ज्यादा असर दिखा रोहित पे।

       रोहित और उसके दोस्तों मे होड़ सी लग गई नीत से दोस्ती करने की,रोहित जिस प्रोजेक्ट मे टीम लीड था,उसी प्रोजेक्ट मे नीता भी थी,बस रोहित ने बाजी मार ली।।आधी जंग तो उसने उसी दिन जीत ली,दोस्त बेचारे अपना सा मुहँ लेके रह गये।
 
      पर लड़के एक बात मे मानने लायक होते हैं,चाहे एक ही लड़की के पीछे सारे पड़े हों ,पर जब ये नज़र आता है की उस लड़की का उनमे से किसी एक की तरफ झुकाव है,तो सारे एक साथ मिल के अपने दोस्त की मदद मे जुट जातें हैं,बस वही हुआ।

     अब सारे मिल कर रोहित के लिये फील्डिंग करने लगे और उसे मैच जीता दिया,रोहित को ऐसा लगने लगा था की नीता नही मिली तो वो जी नही पायेगा,कुछ ना नुकुर के बाद नीता ने भी हाँ कर दी।

      अब रोहित को असल मे समझ आया की जीवन क्या है? बेचारा पांच साल से बैचलर जिंदगी जी रहा था,अपने मन का आप मालिक था ,मन किया तो खाया वर्ना सारा दिन सिर्फ चिप्स ठूंसते और टीवी पे मैच देखते निकाल दिया। घर पूरा अस्तव्यस्त पड़ा रहता और वैसा ही अस्तव्यस्त सा उसका जीवन भी पड़ा था।
    
     नीता के आने से उसके अन्धेरे जीवन मे रौशनी आ गई,पतझर मे जैसे बहार आ गई।
     उसने सीसीडी मे नीता से प्यार का इजहार किया और नीता ने हाँ कह दिया,उसके बाद वो उसे  घर तक छोडने गया,गाड़ी मे बजते ‘बादशाह’ को बदल कर नीता ने ‘तुम जो आये जिंदगी मे बात बन गई ‘  चला दिया,रोहित को बहुत पसंद आया ये गाना।
    “बहुत प्यारा सॉन्ग है,तुम्हारा फेवरेट है?”
“मुझे सारे रोमांटिक सॉंग्स बहुत पसंद हैं ।”और तुम्हे क्या पसंद है रोहित?”
“मुझे तुम पसंद हो ……नीत।”

    इसके बाद रोहित के संसार मे नीता घुलती चली गई।
    “हेल्लो ,रोहित क्या कर रहे हो? अभी तक उठे नही,बेबी आज रविवार है,मै तो सोच रही थी हम लंच साथ करेंगे।”
“हां करेंगे ना जान,तुम “सिगडी “पहुचों,मै बस तैय्यार होके आता हूँ ।”
” ओए ,मै तो सोच रही थी,तुम्हारे रुम पे आके कुछ बनाऊं और तुम्हे खिलाऊ ।”
      हे भगवान ! नीता रुम पे क्यों आना चाहती है,कल ही शनिवार था,और सारे यारों दोस्तों के साथ मिल कर जम के पार्टी की थी,सारी बोतलें कमरे मे ही पड़ीं हैं,हडबड़ा के उठा और घर की सफाई मे लग गया।

        घर ऐसे चमका दिया की रोहित को खुद पे ही नाज होने लगा,नहा धो के तैय्यार हुआ की नीता आ गई।
     “हेलो,ओह्ह ये रुम है तुम्हारा,रोहित कैसे रहते हो यहाँ पर,कितना मैसी है ,उफ,चलो मै ही कुछ करती हूँ ।”
    नीता ने खिड़की खोल दी ,और एक बार फिर घर समेटने मे लग गई,साफ सफाई कर के कॉफ़ी बनायी और लेके आई,रोहित दिल जान से नीता पे फिदा हो गया,घर अब वास्तव मे साफ हो गया था।

     रोहित को सब कुछ अच्छा लगता ,नीता का बहुत केयर करना,उसे बेबी बुलाना,मीटिंग मे कौन सी शर्ट पहनना है,ये बताना,और सबसे अच्छा लगता जब वो अपने दोस्तों के साथ रहता तब बार बार फ़ोन करके समय पे घर जाने,और कम पीने की सलाह देना।।

    रोहित और नीता बहुत खुश थे,दोनो के मॉम डैड भी पुणे आके मिल चुके थे,सब तरफ से सब अच्छा था,और अब दोनो की शादी की तारीख भी तय हो गई। पर अब अचानक ……

…..रोहित को कभी कभी डरावने सपने आने शुरु हो गये,वो नींद से चौंक के उठता,और घबरा जाता।
     पता नही कैसा अन्जाना सा डर उसके चारों ओर व्याप्त होने लगा,उसे खुद से डर लगने लगा था,उसे डर था की वो नीता को खुश रख पायेगा या नही,,असल मे उसे शादी से डर लगने लगा था।

      नीता हर बात मे पर्फेक्ट थी,समय की पाबंद, साफ सफाई पसंद,अच्छी कुक,इन्टीरियर डिजाइनर    ये,वो ……कोई ऐसा ज्ञान नही था जिसकी जानकारी नीता को नही थी,टी वी धारावाहिक मे क्या चल रहा है,से लेकर देश की राजनीति मे किसने कब कहाँ हलचल मचाई ,सब कुछ उसके जिव्हाग्र पे होता…….और जैसा की अक्सर इतने ज्ञानी लोगों के साथ होता है,ये लोग अनजाने ही अपने साथ वालों की हर बात मे दखल देने लगते हैं,उन्हे हर छोटी से छोटी बात भी सिखाने लगते हैं,बस वही हुआ…..

       ” रोहित !……ये क्या पहन के आ गये,आज तो गुरुवार है,मैने कहा था ना पीली शर्ट पहनना, तुम ब्लैक मे आ गये।”
      “रोहित! …… सुनो आज शनि देव पे तेल चढा देना,तुम्हारा शनि थोड़ा भारी है ना।”
      “रोहित!  वो तुम्हारा सुनील मुझे फूटी आँख नही भाता,उससे दूर रहा करो बाबू।खुद तो दिन भर पीने के बहाने ढूंडता है,और तुम्हे भी अपने साथ भिड़ाये रखता है।”
        ऐसे ही सुबह गुड मॉर्निंग से शुरु हुआ पीटारा रात मे एक झिड़की के साथ ही बन्द होता
    “तुम अभी तक ऑनलाइन हो,रात के साढे ग्यारह बज गये,चलो अच्छे बच्चों की तरह सो जाओ।”
      बेचारा रोहित डर के मारे ये भी नही बोल पाता की तू खुद ऑनलाइन नही होती तो मुझे ऑनलाइन पकड़ती कैसे मेरी माँ ।

     जहां प्यार होता है वहाँ भय नही होता,और अगर कही किसी के हृदय मे भय आ जाये तो उसका प्रेम महल हवा के झोंको से ही हिलने लगता है।

      नीता का मानना था की प्यार मे कोई दुराव छिपाव नही होना चाहिये,इसीसे वो कभी रोहित का फ़ोन भी खोल के उसके मैसेज पढ़ने लगती।
      एक बार ऐसे ही उसने सुनील का मैसेज पढ़ लिया।
   “अच्छा तो तुम्हारे ये सिरफिरे दोस्त मुझे हिटलर बोलते हैं।”
     “नो बेबी! किसने कहा तुमसे।”
   “मुझसे कौन कहेगा? हिम्मत है किसी की,वो तो तुम्हारा मैसेज पढा,तो पता चला की मैं हिटलर हूँ ।”

     “तुम्हे कोई हिटलर नही बोलता बेबी,वो तो सिर्फ सुनील कभी कभी मजाक मे……”
     नीता जितनी शिद्दत से रोहित से प्यार करती थी,उससे भी कहीं ज्यादा शिद्दत से सुनील से नफरत करती थी,और कुछ वैसी ही भावना सुनील की थी,नीता के लिये।वो भी रोहित को नीता के खिलाफ भडकाने का कोई मौका नही छोड़ता ।

    रोहित ये करो,वो मत करो,ऐसे खाओ,वैसे ना खाओ,योगा करो,जिम जाओ……ये,वो……रोहित रोहित रोहित।।।।।
     
     रोहित थकने लगा था,प्यार उसे अब भी था,पर जाने कैसी बेचैनी और उदासी उसके अन्दर भरने लगी थी।

      वो दोनो साथ ही शादी की शॉपिंग पे जाते पर एक तरफ जहां नीता चहक चहक के लेह्ंगो के ट्रायल लेती,वो चुपचाप बैठा,कुछ सोचता रहता, उसकी शेर्वानी भी नीता ने ही पसंद की अपने लहन्गे के कोन्ट्रास्ट मे।

      फिर एक दिन नीता ने रोहित को बताया कि उसे 7दिनों के लिये सिंगापुर जाना पड़ेगा,कुछ ऑफ़िस प्रोजेक्ट है,बताते समय लग रहा था,नीता रो ही पड़ेगी,पर इधर रोहित के मन मे तो बांसुरी बज रही थी।
        रोहित को खुद पे गुस्सा भी आ रहा था कि उसे दुखी होना चाहिये पर वो तो खुश है,,खुश भी नही बहुत खुश है।

      रोहित को तमाम बातें सिखा पढा के नीता बड़े बोझिल कदमों से फ्लाइट लेने चल दी,और अचानक रोहित ने महसूस किया ,की इतने दिनों से जो अजीब सा बोझिल पन था,वो खतम हो गया।
    सारे मनहूस काले बादल बरस गये,हर तरफ रोशनी फैल गयी,और उस रोशनी मे रोहित चमकने लगा।

       वो गाता गुनगुनाता वहाँ से सीधा सुनील को साथ लिये अपने कमरे मे पहुँचा,जी भर के दोनो ने बियर पी ,खूब उल्टा सुल्टा खाया,और मैच देखते पड़े रहे।
  दूसरे दिन इतवार था,रोहित की नींद फ़ोन की घंटी से ही खुली,नीता का फ़ोन था।
   “अभी तक सो रहे हो ना,अच्छा सुनो कल बहुत लेट पहुंची ,इसीसे तुम्हे फ़ोन नही किया,सोचा सुबह ही बता दूंगी ,गुस्सा तो नही हो ना।”
     उफ्फ रोहित को तो खयाल ही नही रहा था की उसे नीता से पूछना था की वो कब पहुंची।

     दो दिन बड़े आराम से सूकून भरे गुज़रे, मंगल को रोहित की क्लाइंट मीटिंग थी,तैय्यार होते होते उसने अपनी आलमारी खोली,उसे सुझा ही नही की क्या पहनूँ ।
     तुरंत नीता को फ़ोन लगाया,पर नीता ने फ़ोन काट दिया,दो बार रिंग करने पर उसका मैसेज आया।
  “I’m in meeting,call u later.”
    बेचारा कुछ तो भी पहन के चला गया।।।

मीटिंग्स में ऐसा उलझा की शाम के 7 बजे घर पहुँचा,सोचा एक कॉफ़ी बना लूं,पूरी रसोई छान मारी पर उसे चीनी का डब्बा नही मिला,फिर फ़ोन किया,नीता ने फ़ोन नही उठाया।

    दो दिन से जिस आज़ादी का जश्न मना रहा था आज उसी आज़ादी से कोफ्त हो गयी।

     समय काटने के लिये टी वी लगा लिया,,कुछ न्यूज़ सुनी,कुछ बहस सुनी,,पर मन कही नही लग रहा था,सुनील को फ़ोन किया,
    “कहाँ है भाई,घर आजा कोई मूवी देखेंगे।”
   “अरे नही रोहित ,तेरी भाभी को शॉपिंग पे ले के आया हूँ,यहीं से हम खाना खाते हुए ही घर जायेंगे,तू एन्जॉय कर भाई।”

   खाक एन्जॉय करुँ,खुद तो मुझे नीता के लिये भड़काता फिरता है और यहां अपनी बीवी से चिपका घूम रहा है।

    रात हो गयी ,नीता का कोई फ़ोन नही ,कोई मैसेज नही,रोहित ने फ़ोन उठाया वॉट्सएप्प खोला
  नीता ऑनलाइन थी
“हेल्लो जान ! सुबह से कहाँ बिज़ी हो यार।”
नीता का कोई रिप्लाई नही आया।
” ओ मैडम कहाँ हो भाई”
कोई रिप्लाई नही।
“नीता r u there? “
कोई रिप्लाई नही।अब तो हद ही हो गयी,यहाँ थी तो पीछे पीछे घूमती रहती थी,और अब देखो,दो दिन हुए की भूल गयी।

रोहित ऑफलाइन हो गया,और चादर ओढ कर सो गया,पर नींद खुद के चाहने से ही आ जाती तो प्यार करने वाले नींदों की शिकायत क्योंकर करते।

    आधे घन्टे बाद फिर फ़ोन खोला और देखा
नीता अब भी ऑनलाइन थी।।।।।

  अगले दिन सुबह नीता के गुड मॉर्निंग मैसेज से उसकी नींद खुली,एक प्यारी सी मुस्कान आ गयी चेहरे पे,तुरंत नीता को फ़ोन किया।
“हेल्लो कल कहाँ गायब थी?सारा दिन कोई मैसेज नही।”
“आज भी बिज़ी रहूंगी रोहित,हमारा टी एल है ना चैन्ग, बड़ा ही अनोखा बन्दा है,दिन भर काम करता भी है कराता भी है,पर ऐसे की कोई शिकायत ही ना कर पाये ।
  माहौल इतना स्पोर्टि कर देता है की लगता ही नही बॉस है।क्या नोलेज है बन्दे को ,क्या बताऊँ तुम्हे।”
“और तुम्हे पता है ,He just love Indian food”
उसे कुकिंग भी आती है,बिल्कुल मेरे जैसा पुलाव बनाता है……इसके बाद पूरे 5मिनट तक नीता चैन्ग के बारे मे ही बताती रही,पर अब रोहित को कुछ सुनाई नही दे रहा था।

    शाम को नीता को फ़ोन लगाया,उसने नही उठाया,अब तो रोहित को ऐसा लगा तुरंत उड़ के सिंगापुर पहुंच जाये और चैन्ग को गोली मार दे।
   पर हर बार मन का हो जाता तो मनमीत का दिल दुखे ही क्यों।

   क्या क्या सोचा था रोहित ने,उसे लगने लगा था की वो नीता के हाथ की कठपुतली बन गया है,शादी के नाम से इसीलिये तो डरने लगा था,उसे लगा नीता कुछ दिन के लिये चली जायेगी तो वो आज़ादी की खुशबू महसूस कर सकेगा ,पर जितना सराबोर होकर वो आज़ादी की महक सूंघना चाहता था,उससे कही ज्यादा वो नीता की खुशबू मिस कर रहा था।

     अभी तो नीता को गये सिर्फ 3 दिन हुए थे,और उसका ये हाल हो गया था।

     सुबह जल्दी नींद खुल गयी उसने,फेसबुक खोल लिया,नीता का प्रोफाइल फोटो बदला हुआ था,
     फोटो मे चार पांच लड़के लडकियां खड़े थे,सबसे बीच मे नीता ही थी,गुलाबी टॉप मे मुस्कुराती हुई कितनी प्यारी लग रही थी,और उसके बाजू मे उसके कन्धों पर हाथ रखा एक गोरा खड़ा था।
    ओह्ह्ह्ह तो यही है चैन्ग।,मुझे तो ये सारे चिंकी एक ही जैसे लगते हैं,पर ये नीता के कन्धे पर हाथ क्यों रखे खड़ा है।

   नीता को इस बारे मे कुछ भी टोकना प्रलय को दावत देना था,बेचारे का पूरा दिन खट्टा हो गया।चौथा दिन भी बीत गया।

  अगले दिन सुबह ऑफ़िस के लिये तैय्यार होने के बाद रोहित ने नीता को वीडियो कॉल किया, दोनो एक दूजे को देख के खिल गये मुस्कुरा उठे,तभी रोहित ने देखा नीता ने काफी छोटी ड्रेस पहनी थी,उसने पुछा,तो नीता ने कहा,”यहाँ तो यही फॉर्मल्स कहलाते हैं बाबू,मै तो सारी जीन्स ही लेके आई थी,आज पार्टी है तो कल ये चैन्ग के साथ जा के खरीद के लायी हूँ,उसी की पसंद है,मैने बहुत कहा पर देखो ना उसने मुझसे ड्रेस के पैसे भी नही लिये।”
     रोहित को पैर से सर तक आग लग गयी,यही काम है इन गोरों का ।।बस लड़की देखी की फिसले ,और खास कर शादीशुदा या एंगेज्ड लड़कियों पे तो ये कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो जातें हैं,अरे अपने जैसी ढूँढ ना भाई अपने लिये,मेरी वाली के पीछे क्यों पड़ा है,और चलो चैन्ग को मारो गोली ,ये नीता के उसूल कहाँ तफरीह करने चले गये,आज तो बात कर के रहूँगा।।

   पर पांचवा दिन भी बीत गया। रात बाकी थी………जो बिल्कुल नही बीत रही थी,बार बार नीता से पेहली मुलाकात,उसकी बातें,उसकी हंसी सब कुछ याद आ रहा था,वो दोनो जब भी लॉन्ग ड्राइव पे जाते हमेशा नीता एफ एम बन्द करके खुद ही कुछ गुनगुनाने लगती थी,कितना प्यारा गाती है,और कितना सारा गाती है,सोच के रोहित के चेहरे पे मुस्कान आ गयी…….
…………..क्यों बिना वजह इतना डर रहा था,नीता के बिना जीना तो ज्यादा मुश्किल है,उसके साथ डर डर के जीने से।।मॉम की कितनी फिक्र रहती है उसे
डैड को भी फ़ोन कर कर के अपना बी पी ,और शुगर समय समय पे चेक करवाने की हिदायत देती रहती है,,अब बेचारी ओवर परफ़ेक्ट है तो इसमें उसकी क्या गलती।
   रोहित का मन फूल सा हल्का होने लगा,उसने अपने तकिये को अपने सीने से लगाया और नीता को सोचते हुए सो गया।

  शुक्रवार को रोहित ने जल्दी जल्दी ही सारे काम निपटाए ,सुनील को लिये घर पहुँचा ,दोनो ने मिल के घर की सफाई की ,नीता के पसंदीदा ग्लौडियस फूलदान मे सजाये,और उसके बाद भीमजी भाई की दुकान पहुंच गये।

    शनिवार नीता की फ्लाइट आने के आधे घन्टे पहले ही दोनो दोस्त एयरपोर्ट पहुंच गये।
     रोहित का दिल ऐसे धड़क रहा था,जैसे आज पहली बार नीता को देखने वाला है,जैसे पहली बार नीता से बोलने वाला की वो उससे सच मे कितना प्यार करता है।
     नीता आई ,और दौड़ के रोहित के गले लग गयी,उफ्फ कितना सुकून,कितनी शान्ती,कितना प्यार है इस मिलन मे….
   “अब मुझे छोड़ के कही मत जाना नीत,मर जाऊंगा तुम्हारे बिना।” और फिर नीता की उंगली मे हीरे की अंगूठी पहना दी।
“अबे अगर नीता तुझे छोड़ के जाती नही तो तुझे पता कैसे चलता की वो क्या है तेरे लिये,चलो भाई अब मै चला अपने घर,शाम को मिलते हैं फिर,ओके नीता।”
  “जी भाई साहब ! शाम को भाभी जी को भी लेकर आना।”
   रोहित को समझा नही की अचानक नीता सुनील को भाई साहब क्यों कहने लगी।
  खैर वो दोनो बाहों मे बाहें डाले बाहर की तरफ बढ़ चले,जाते जाते नीता ने पलट के सुनील को देखा और आंखो ही आंखो मे आभार प्रकट किया,सुनील ने भी हल्के से मुस्कुरा के आभार ग्रहण कर लिया।।।

aparna…..

उधेड़बुन

एक छोटी सी प्रेम कहानी

‘उधेड़बुन ‘
          
           आज सुबह से ही धानी बड़ी व्यस्त है, कभी सलाईयों में फंदे डाल रही है,कभी निकाल रही है,कल ही से उसने नयी नयी बुनाई सीखना शुरू किया है॥  

अहा!  कितना मजे का समय है ये,,बुनाई कितनी कलात्मक होती है,,और भी कलायें होतीं हैं संसार में ,पेटिंग करना,कढ़ाई करना,पॅाट बनाना,वास बनाना पर ये सब एक हद तक सिर्फ अपने शौक पूरे करने जैसा है।बुनाई ही एक ऐसी कला दिखती है जिसमें कलाकार अपने सारे प्रेम को निचोड़ कर रख देता है।
              कुछ फंदे सीधे कुछ उल्टे बीनना ,कहीं फंदा गिराना कही फंदा उठाना,उफ पूरा गणित है बुनाई भी॥ और इतनी त्याग तपस्या के बाद बुना स्वेटर जब हमारा करीबी कोई पहनता है तो कितना गर्व होता है बनाने वाले को खुद पर। ऐसे ही बहुत सारे मिले जुले भावों के साथ धानी ने भी अपना पहला स्वेटर बुनना शुरू किया था,,पिंटू दा के लिये।
        
               स्वेटर बुनते हुये कितनी प्रसन्न कितनी विभोर थी धानी,अपने उपर अचानक मान भी होने लगता कि कोई भी नया काम हो वो कितनी जल्दी सीख लेती है।खाना बनाने में तो उसे महारथ हासिल है,कैसी भी पेचीदगी भरी जटिल रसोई हो,वो आधे घण्टे में सब सुलझा के रख देती है,चने की भाजी बनाना हो या मटर का निमोना उसके बायें हाथ का खेल है बस । कचौडि़याँ और मूंग का हलवा तो घर पे वही बस बनाती है,,मां को रसोई मे इतनी देर खड़ा होने मे थकान होने लगती है। घर को सजा  संवार केे रखना कपड़़ोंं को सहेजना,रसोई  बनााना इन सारे नारी सुलभ गुणोंं की खान है धानी।
              
           बस एक ही चीज है जो उसे बिल्कुल नही सुहाती ,वो है पढ़ाई। जाने कैसे लोग किताबों में प्राण दिये रहतें हैं,ना उसे पढ़ना पसंद है ना लिखना,,नापंसदगी की हद इतनी है कि लड़की गृहशोभा,गृहलक्ष्मी जैसी गृहिणियों की पहली पसंद रही किताबों पर भी आंख नही देती।

            आलम ये है कि दो बार में ही सही धानी ने बारहवीं पास कर ली ,उसके बाद होम साईंस लेकर अभी कालेज का सेकण्ड इयर पढ़ रही है,वो भी दुबारा। पढ़ाई से इतनी वितृष्णा का कारण भी बहुत वाजिब है,धानी की अम्मा ने अपने जमाने में बी.ए. किया था ,उसके बाद उनकी शादी हो गयी।मन में तरह तरह के सपने सजाये धानी की मां ससुराल आई तो उन्हे पता चला कि उस घर में उनकी डिग्री की कोई कीमत नही। वो अपने पैरों पर खड़ा होना चाहतीं थीं,एक अच्छी सरकारी नौकरी करना चाहतीं थीं पर उनकी पढ़ाई उनका ज्ञान उनके चौके तक ही सिमट कर रह गया। इसी कारण उन्होंने बचपन से ही धानी के मन में ये बात भली प्रकार बैठा दी जैसे तैसे वो थोड़ा बहुत पढ़ लिख ले फिर उसकी अच्छे घर में शादी करनी हैं।

                   बालिका धानी के मन में ये बात अच्छे से पैठ गयी की उसे सारा ज्ञान ऐसा ही अर्जित करना है,जिससे उसकी एक अच्छे घर में शादी हो सके।  उसी ज्ञान का नया सोपान था बुनाई।

           बहुत खुश और खुद मे मगन थी धानी बुनाई सीखते हुये।पड़ोस में रहने वाली लाली दीदी मायके आई थीं दो महीनों की लम्बी छुट्टी पर,बस उन्ही से ये गुरू ज्ञान मिला था,वो अपने पति के लिये बुन रही थी और धानी अपने पिंटू दा के लिये।
   
             पिंटू दा ! पिंटू दा से धानी की मुलाकात यही कोई 7-8 साल पहले हुई थी, तब वो स्कूल जाती थी,शायद नौंवी या दसवीं में थी,। पिंटू दा ने उसी साल ईंजिनियरिंग काॅलेज में प्रवेश किया था,दोनो सेमेस्टर पास करने के बाद की छुट्टियों में अपनी मामी के घर आ गये थे घूमने।
   
         पहली मुलाकात में ही उसे पिंटू दा बहुत भा गये थे,,कितने लंबे थे, चौड़ा माथा ,घने बाल,गोरा रंग,और गहरी आवाज ॥ कोई भी बात कितना समझा के बोलते थे,कि सामने वाला उनकी हर बात मान जाये।

               उस दिन मां ने धानी के हाथ से साबुदाने के बड़े भिजवाये थे रीमा चाची के घर,,बड़े लेकर जब धानी वहांं पहुंची तब चाची चाय चढा़ रहीं थीं,उसे देखते ही खिल गयीं ” आ तू भी चाय पी ले।”
     “नही चाची मैं तो बस ये देने आयी हूं,मां ने रज्जू दा के लिये भेजा है।”
       “अरे दिखा जरा क्या भेजा है जिज्जी ने,वाह साबुदाने के बङे।” 
      ” अच्छा रूक जरा मैं ये चाय भी साथ ही छान देतीं हूं,तू जरा ऊपर रज्जू के कमरे तक पहुचां दे ।”        “ये चाय के दो कप क्यों चाची,मैं तो नही पियूंगीं।” “हां बिटिया ये दूसरा कप पिंटू के लिये है,कलकत्ता वाली ननंद का बेटा।” “बहुत होशियार लड़का है,पहली बार में ही वो क्या कहते हैं आई.आई.टी. निकाल लिया उसने,,कानपुर में पढ़ रहा अभी।”
    “अच्छा मैं चाय दे के आती हूं।”
           
                  धानी का आज अपनी सहेली ममता के साथ पिक्चर जाने का प्लान था,ममता सज धज के उसके घर पहुंच चुकी थी,वो दोनो निकलने ही वाली थीं कि माता जी का फरमान सुनाई दिया ,
           ” बिट्टो जा जरा जाते जाते ये बड़े रीमा के यहां दे जा।”
           “क्या मां तुम भी ना,बनाने का इतना शौक है तो पहुंचाया भी खुद करो ,मुझे वैसे ही देर हो गयी है।”
        “अरे जा ना धनिया दे आ,पांच मिनट लगेगा मुश्किल से” भुनभुनाती पैर पटकती धानी वहां गयी तो रीमा चाची ने एक नया काम पकड़ा दिया। ऊपर पहुंच कर कमरे के दरवाजे को खटकाने जा ही रही थी कि दरवाजा खुल गया, पर सामने रज्जू दा तो नही थे,ये तो कोई और था। तब तक सामने खड़े आगंतुक ने हाथ बढ़ाकर धानी के हाथ से ट्रे ले ली ,और वापस अंदर मुड़ गया।अच्छा तो यही था पिंटू,,चाची का आई आई टियन भांजा।

                 धानी वापस मुड़ कर जाने लगी तो पीछे से एक थैंक्यू सुनाई दिया,मुड़ कर मुस्कुरा कर वो जल्दी जल्दी नीचे उतर गयी।
                             यही थी वो मुलाकात जिसके बाद धानी का मन  “मैनें प्यार किया “देखने मे भी नही लगा,कितने मन से आयी थी ,और यहां सारा वक्त उसी के बारे मे सोचते गुजर गया।

                   इसके दो तीन दिन बाद धानी दोपहर मैं स्कूल से वापस आयी तो रज्जू दा और पिंटू उसके घर पे बैठे खाना खा रहे थे,वो रसोई में गयी तो मां ने बताया कि रीमा चाची की तबीयत कुछ नासाज है इसी से मां ने दोनों को यही बुला लिया खाने पे।

      उसके बाद तो सिलसिला सा चल निकला ,जाने क्यो धानी को पिन्टू दा को छुप छुप के देखना बड़ा भाता था।अपनी छत पे बने लोहे के दरवाजे के ऊपर बनी जाली से वो बीच बीच मे झांक लगा लेती की बाजू वाली छत पे पिन्टू दा आ गये या नही।
   और जैसे ही देखती की आ गये वो झट किसी ना किसी बहाने छत पे आ जाती।
           कभी पहले से पानी मे तर पौधों मे पानी डालती ,कभी सुखे कपड़े पलटने लगती।
    और इन्ही सब के बीच कभी रज्जू दा उसे कैसे छेड़ देते ,कितना गुस्सा आता था उसे।
   “अरी धानी कभी पढ़ लिख भी लिया कर,बस इधर उधर डोलती फिरती है।”इस साल भी फेल होना है क्या।”
     पिन्टू के सामने कट के रह गयी धानी।रज्जू दा भी कभी कैसा बचपना कर जाते हैं ।
   पर पिन्टू उससे हमेशा बहुत प्यार से बात करता ,धानी जी बोलता ,,आप आप कर के उसे किसी राजकुमारी सा अह्सास कराता ।

   अक्सर शाम को उनकी ताश की बाजी जमती।रीमा चाची ,रज्जू दा,वो और पिन्टू।
उसकी और रज्जू दा की जोडी हमेशा ही जीत जाती और वो बड़ी अदा से पिन्टू को देख मुस्कुरा देती।
     एक बार चाची के साथ पकौड़ी तल रही थी,तभी कोई किताब पढते पढ़ते पिन्टू रसोई मे आया,उसे लगा मामी खड़ी है,उसने चट प्लेट से एक पकौड़ा उठाया और मुहँ मे भर लिया।
गरम पकौड़े की जलन से तिलमिला गया की तभी धानी पानी भरा ग्लास ले आयी।
    पिन्टू की जान मे जान आयी “थैंक यू धानी जी! मेरा ध्यान ही नही गया ,पढ़ने मे लगा था ना।”और हँसते हुए पिन्टू वहाँ से चल दिया।
  पर इस खाने पीने के चक्कर मे अपनी किताब भूल गया।
     धानी उसे उठा ले गयी।”मिल्स ऐण्ड बून” !
हे भगवान ! ये प्यार जो ना कराये,,धानी के लिये एक किताब पढ्ना उतना ही दुष्कर था जितना एक लंगडे के लिये रेस मे भागना और एक गून्गे के लिये गीत गाना।
    पर फिर भी बिचारी डिक्शनरी खोल के पढ़ने बैठी।उसकी बुद्धि जितना समझ सकती थी उतना उसने भरसक प्रयत्न किया फिर किताब को पकड़े ही सो गयी।

     कुछ दिन बाद होली थी।इस बार धानी ने अपनी जन्म दायिनी की भी उतनी सहायता नही की जितनी रीमा चाची के घर लोयियाँ बेली,उनके हर काम मे कदम ताल मिलाती धानी यही मनाती की चाची किसी तरह पिन्टू के लिये उसे उसकी माँ से मांग ले।
      होली का दिन आया ,हर होली पे पूरे मोहल्ले को रंगती फिरती धानी इस बार नव वधु सी लजिली बन गयी।उसे एक ही धुन थी।
   पिन्टू रज्जू के साथ उनके घर आया ,उसके माँ बाबा के पैर छुए आशीर्वाद लिया,उसके गालों पे भी गुलाबी रंग लगाया और चला गया।
    बस धानी ने सब जान लिया,उसने प्रेम की बोली अपने प्रियतम की आँखो मे पढ़ ली।

सारे रस भरे दिन चूक गये,और एक दिन पिन्टू कानपुर लौट गया।
      धानी चाची के घर आयी तब चाची ने बताया “अरे धानी ,बेटा एक कप चाय तो पिला दे।”आज सुबह से जो रसोई मे भीड़ि तो अभी फुर्सत पायी है,आज पिन्टू निकल गया ना,उसीके लिये रास्ते का खाना बनाने मे लगी रही।”
” कब निकले पिन्टू दा,कुछ बताया नही उन्होनें ।क्या अचानक ही जाना हुआ क्या उनका।”
    अपनी आवाज की नमी को छिपाते हुए उसने पुछा।
“रिसेर्वेशन तो पहले ही से था ना लाड़ो,इतनी दूर कही बिना रिसर्वेशन जाया जा सकता है क्या।”

हाँ जाया तो नही जा सकता पर बताया तो जा सकता है,इतनी भी ज़रूरत नही समझी,की मुझे बता  के जायें।
 
            ठीक है कभी हमने एक दूसरे से नही कहा लेकिन क्या हम दोनो ने एक दूसरे की आंखो मे प्यार देखा नही।
     
                 एक 14वर्ष की किशोरी दुख के अथाह सागर मे डूबने उतराने लगी।उसका पहला प्यार उससे बहुत दूर चला गया था,पर उसे अपने प्यार पे विश्वास था,एक दिन  उसका प्यार अपने पैरों पे खड़ा होके उसके घर बारात लिये आयेगा और उसे चंदन डोली बैठा के ले जायेगा।

     पिन्टू धानी के हृदय की कोमलता से सर्वथा अनभिज्ञ था,वो छुट्टियां मनाकर वापस लौट अपनी पढाई मे व्यस्त हो गया।

    समय बीतता गया,जीवन आगे बढता गया,पर धानी के मन से पिन्टू नही निकल पाया।

     धानी ने बहुत सुन्दर स्वेटर बुना है,जाने कब मिलना होगा पिन्टू से,पर जब भी होगा तभी वो अपनी प्रेम भेंट उसे देगी।ऐसा सोच कर ही धानी गुलाबी हो जाती।

    रज्जू के दादा 89बरस के होके चल बसे,पूरा घर परिवार शोकाकुल है,धानी भी,पर बस एक खयाल उसे थोड़ा उत्फुल्ल कर रहा की अब तो पिन्टू आयेगा।
        पिन्टू आया,पूरे 8बरस बाद!  धानी का पहला प्यार वापस आ गया।
     रीमा चाची के घर पूजा पाठ संपन्न हो रहा,तेरह बाम्हण जिमाने बैठे है,धानी दौड दौड कर सारे कार्य कर रही जैसे उसके खुद के ससुराल का काम है।अभी तक पिन्टू की झलक नही मिली पर उसी इन्तजार का तो मज़ा है।
      सारे काम निपटा के चाची बोली “जा धानी पिन्टू उपर रज्जू के कमरे मे है,जा ये थाली वहाँ दे आ।”
     थाली लिये राजकुमारी चली।मन ऐसे कांप रहा की अभी गिर पड़ेगी ।थाली ऐसी भारी लग रही की कही हाथ से छूट ना जाये,घबड़ाहट से हथेलियों मे पसीना छलक आया है,दिल की धड़कन तो धानी खुद सुन पा रही है।
   
             उफ्फ कैसा होगा वो समय ! जब वो पिन्टू को देखेगी ,उसे स्कूल मे पढी एक कविता की लाइन याद आ रही।
    ‘”चित्रा ने अर्जुन को पाया,शिव से मिली भवानी थी”।
   प्रेम का अपना अनूठा ही राग होता है वीर रस की कविता मे भी शृंगार रस की एक ही लाइन याद रही लड़की को।
  
  धडकते हृदय और कांपते हाथों से द्वार पे दस्तक दी उसने।
  “दरवाजा खुला है”वही भारी आवाज,सुनते ही धानी का हृदय धक से रह गया।धीरे से किवाड़ धकेल उसने खोला।
    
   अन्दर कुर्सी पे बैठा पिन्टू कुछ पढ़ रहा है,हाँ पिन्टू  ही तो हैं।पिन्टू ने आँख उठा कर धानी को देखा, धानी ने पिन्टू को, नजरे मिली,पिन्टू मुस्कुराया, पूछा
“कैसी है धानी ?” धानी के गले मे ही सारे शब्द फंस गये ,लगा कुछ अटक रहा है।
  “ठीक हूं पिन्टू दा।आप कैसे हो ?” इतना कह कर थाली नीचे रख धानी वापस सीढिय़ां उतर गयी।
  “मै तो एकदम मस्त ।”पिन्टू की आवाज सीढियों तक उसका पीछा करती आयी।

   हां मस्त तो दिख ही रहे,हे भगवान !कोई आदमी इतना कैसे बदल गया वो भी 8 ही वर्षों मे।
   नही! हे मेरे देवता! कोई मुझे आके बोल दो ,ये पिन्टू नही है।
    धानी को ज़ोर की रुलायी फूटने लगी,वो वहाँ से भागी ,अपने कमरे मे जाके ही सांस ली।
  अपनी आलमारी मे अपने कपडों के बीच छिपा के रखा स्वेटर निकाला और उसे अपने सीने से लगाये रोती रही।
     कितना मोटा आदमी सा हो गया था पिन्टू,पेट तो ऐसे निकल आया था जैसे कोई आसन्न पृसुता है जिसे अभी तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ेगा।उफ्फ सर के घने बाल भी गायब,ये तो बिल्कुल ही गंजा हो गया।
     पूरा चेहरा फूल के कुप्पा हो गया है,इतने लाल से गाल ,गालों का इतना उभरा मांस की बड़ी बड़ी आंखे भी चीनियों सी छोटी दिख रही। पूरी शकल ही बदल गयी जनाब की बस नही बदली आवाज।
     तो क्या आवाज के भरोसे ही शादी कर लुंगी।।
  ” हे भगवान !  बचा लिया मुझे,अच्छा हुआ अपनी बेवकूफी किसी से कही नही मैने।”
   “अपने प्रथम प्रेम को अपने ही मन तक सीमित रखा।”
  
बेचारी धानी जब रो धो के फुरसत पा गयी तब अपने बुने स्वेटर को लेके बैठी,अब उसे उधाड़ना जो था ,ये स्वेटर अब उसका प्रेमी कभी नही पहन पायेगा।।

उधेड़बुन  एक छोटी सी प्यारी सी प्रेम कथा है ,जो किशोर वय के प्रेम को दर्शाती है,जिसमे नायिका को हमेशा ही लगता है, उसका प्रेम बहुत उंचे आदर्शों पे टिका है,जबकी वास्तव मे उसके प्रेम का  आधार सिर्फ रूप ही है,और जीवन की वास्तविकता से दो चार होते ही धानी का गुलाबी प्रेम विलोपित हो जाता है।।।

कहानी को पढ़ने के लिये धन्यवाद!

अपर्णा।
           

मायानगरी -1





   

       ओम गणपतये नमः


             मायानगरी :–

         इंजीनियरिंग कैम्पस के खचाखच भरे कॉरिडोर में विद्यार्थी अपनी अपनी क्लास रूम का नम्बर देखने या फिर फीस अमाउंट का पता लगाने लाइन में लगे थे।
   कुछ बाहर गार्डन में इधर उधर घूमते अपने कॉलेज को आंखों ही आंखों में आंकने की कोशिश में थे…..
 
   कुछ लड़के एक ओर जमा इधर उधर की बातों में लगे थे कि एक लड़की भागती सी उनके पास चली आयी।
   आते ही उसने एक लड़के को पीछे से कंधो से पकड़ अपनी ओर घुमाया और फटाफट बोलना शुरू कर दिया…

” कहाँ थे अब तक। तुम्हें पता है कितनी देर से तुम्हें ढूंढ रही थी मैं ? “

   लड़का उस अनजानी लड़की को अपनी बड़ी बड़ी आंखें फैला कर  देख सोचने लगा। दूर दूर तक दिमाग के घोड़े दौड़े लेकिन खाली हाथ वापस चले आये…

” आप जानती हैं मुझे? “
 
इस सवाल को पूछते ही लड़के के चेहरे पर एक लंबी सी मुस्कान छा गयी..
    लड़की तो पहले ही मुस्कुरा रही थी…

” हाँ फिर? मेरे दिल ने तुम्हारी रूह को पहचाना है। हम जन्म जन्म से एक हैं। “

“अच्छा ! और कुछ बोलिए ना।  अच्छा लग रहा है एक सुंदर लड़की का मुझे लाइन मारना । ”

” ये रूहानी मुहब्बत है पागल? बोलो क्या तुम मुझसे शादी करोगे ? क्योंकि मैं तुमसे शादी करना चाहती हूँ। “

” हाँ करूँगा ! ज़रूर करूँगा !हर जन्म में करूँगा । बार बार करूँगा। अब तो तुम मना भी कर दो तब भी करूँगा। ”
    वो शायद और भी कुछ कहता रहता , लेकिन तब तक वो लड़की अपने दुपट्टे को संभालती वहाँ से वापस निकल गयी…..

    और लड़का अपने बालों पे हाथ फिराता उसके कदमों के निशान देखता रह गया….
  
******


       ये हैं कहानी के नायक अभिमन्यु मिश्र ! मध्यम वर्गीय परिवार के सबसे बड़े लड़के। जिनके कंधो पर जन्म के साथ ही ढेरों ज़िम्मेदारियों का बोझ आ जाता है,कुछ उसी तरह के।।
    लेकिन अपने बेलौस और बेपरवाह स्वभाव के कारण ये किसी बात को बहुत ज्यादा दिल से नही लगाते।
   इंजीनियरिंग भी इन्होंने तुक्के में ही जॉइन कर डाली। गणित कुछ ज्यादा ही अच्छी थी,आसपड़ोस के लोगों ने आर्यभट्ट बुलाना शुरू कर दिया। और बस आर्यभट्ट जी ने खुद को नवाजे इस नाम को इतना सीरियसली लिया कि ग्यारहवीं में गणित ले बैठे।
    पढ़ाई लिखाई में दीदे लगते न थे। स्कूल के शुरुवाती दो महीने स्कूल से चोरी छिपे भाग कर फिल्में देखने में या स्कूल के पीछे की तलैया में दोस्तों के साथ बैठ सिगरेट फूंकने में निकाल दिए।
   तीसरे महीने फर्स्ट टर्म्स के इम्तिहान होने पर नानी दादी सब एक साथ याद आ गयी।
    रिजल्ट्स बुरे नही बेहद बुरे आये। नतीजा ये हुआ कि मार्कशीट घर पर पिता जी को दिखाने से उतारी जाने वाली चप्पलों की आरती से बचने का एकमात्र उपाय यही दिखा की आर्यभट्ट जी ने अपने पिता के नकली साइन मारे और परीक्षाफल जमा कर दिया।

    अब ये छोटी मोटी सी गलती कोई पाप तो है नही की जिसके लिए नरक की अग्नि में जलाने की सज़ा दी जाए। लेकिन यही समझ जाती तो प्रिंसिपल इंसानियत के दायरे में न आ जाती।
  पर उसे तो खून पीने वाली चुड़ैल का ही टाइटल भाता है। आर्यभट्ट बाबू के पिता श्री अनिल मिश्र जी के साईन होने के बाद भी धड़धड़ा के मिश्र जी के ऑफिस के लैंडलाइन पर फ़ोन दे मारा और उन्हें उनके लख्ते जिगर का कांड कह सुनाया वो भी सारी लगाई बुझाई के साथ।
    अब जब छौंक ही मिर्ची हींग की लगी हो तो स्वाद मीठा कैसे आये?
   उस रात घर के बड़े राजकुमार की जबरदस्त पिटाई हुई। एक मिडल क्लास बाप अमूमन जो जुमले सुनाता है वो सब मिसिर जी ने कह सुनाए…
    और उस रात स्वाभिमानी बेटा बिना कुछ खाये ही सो गया।  अगले दिन उठते ही उसने एक कसम ले ली कि अब इस साल चाहे विषय कठिन से कठिनतम हो जाये पढ़ कर ही पास होना है।
    इस बार न तो फर्रे बनाये जाएंगे और न ही स्कूल बाथरूम की दीवारों को रंगा जायेगा।
   अभिमन्यु का अभिमान जागा था आखिर!

   ग्यारहवीं वो अच्छे नंबरों से पास हो गया। अब क्लास के होशियार लड़कों से ज़रा सी दोस्ती बढ़ी और दोस्ती के साथ बढ़ता गया छिटपुट ज्ञान।
   बारहवीं के लड़कों के जिस ग्रुप में अभिमन्यु शामिल हुए वहाँ आये दिन एन आई टी , आई आई टी , आर आई टी के चर्चे होने लगे। और फिर अभिमन्यु को दिखा अपनी आजादी का पहला रास्ता।
    पहले तो उसने कभी अपनी आगे की पढ़ाई को लेकर कुछ सोचा ही नही था।
    लेकिन अब उसे अंधियारे में एक हल्की सी रोशनी दिखने लगी थी।
   उसके सारे दोस्त इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे थे। उन लोगों के मुताबिक अच्छे सारे कॉलेज उनके शहर से दूर थे और बस यही तो उसे चाहिए था। अपने शहर से दूर , अपने घर से दूर कोई ठिकाना जहाँ वो पढ़े न पढ़े पर सुकुन से रह तो सकें।
     यहाँ घर में तो उसका जीवन कतई अस्थिर हो रखा था। पिता जी की प्रोमोशन पेंडिंग है अभी को मार लो, किसी से कहा सुनी हो गयी अभी को मार लो। मतलब अभी उनका बेटा न हुआ डस्टर हो गया जब तब हाथ साफ कर लो।
  माँ अक्सर उसके पक्ष में बोलती ” जवान लड़का है उस पर हाथ न छोड़ा करें । किसी दिन गुस्से में घर छोड़ गया तो? ”
   पर मिसिर जी हर बार कोई ऐसी कैफियत दे जाते की उन दोनों का झगड़ा बढ़ता चला जाता और अभिमन्यु चुपचाप घर से निकल सड़क पर चला आता।
  वो भी अपने परिवार की समस्या को समझता था। कमाने वाला एक और खाने वाले पांच। घर चलाना भी तो मुश्किल था। उसके पीछे उसके एक भाई और जो था। उसके बाद वाला उससे डेढ़ साल ही छोटा था।
  मतलब उसकी कॉलेज की पढ़ाई तक ये  भी तैयार हो जाना था।
   उसे इतना तो समझ आ ही गया था कि ज़िन्दगी की खींच तान में थोड़ा आगे बढ़ना है,  तो उसे इंजीनियरिंग में प्रवेश लेना ही पड़ेगा।

   और बस उसने तैयारी शुरू कर दी थी। उसकी तैयारी और उसके गणित का ज्ञान देख उसके एक करीबी दोस्त ने उसे आई आई टी और बाकी बड़े महाविद्यालयों के फार्म भी भरने की सलाह दी थी। लेकिन महंगे फॉर्म्स के साथ ही महंगे कॉलेज की फीस सुन उसकी घर पर बात करने की हिम्मत ही नही हुई ।

    बारहवीं के साथ ही उसने इंजीनियरिंग का इम्तिहान दे दिया  और जिसमें उसका चयन भी हो गया ।
  काउंसिलिंग के बारे में घर पर उसने डरते डरते ही बताया था…
     क्योंकि अब तक फार्म भरने से लेकर इम्तिहान देने तक का काम उसने अपने पिता हिटलर मिश्रा जी से छिप कर अपने छोटे मामा की सहायता से ही किया था।
  अभिमन्यु का डर सही साबित हुआ। आज तक पापा किसी बात से खुश या संतुष्ट हुए थे जो आज होते?  जहाँ उसके दोस्तों के पिता बेटों के सेलेक्शन पर मिठाई बाँट रहे थे अभि के पिता का अलग ही राग चल रहा था।

” क्या ज़रूरत थी इंजीनियरिंग की? चार साल बर्बाद करने के बाद जाने कब नौकरी मिले? आजकल इंजिनिंयर्स ढेरों हो गए हैं, सरकारी नौकरियों के लाले पड़े हैं। इससे अच्छा तो तीन साल की ग्रेड्यूएशन की डिग्री लेकर पी सी एस कर लेना था। “

  पिता जी की नाराजगी इस बार अभि के समझ से बाहर थी।
  काउंसिलिंग के दौरान वो कॉलेज चुन पाता इसके पहले ही कॉलेज ने उसे चुन लिया था।

*****

   मायानगरी विश्वविद्यालय ने खुलने के साथ ही अपने कैम्पस में हर एक डिग्री के कॉलेज की स्थापना कर रखी थी। इसके साथ ही सभी कॉलेज में विद्यार्थियों के लिए भी फ्री सेलेक्शन, स्कॉलरशिप  के साथ ही मैनेजमेंट कोटा भी रख छोड़ा था।
   कुछ बच्चे अपने दम पर सेलेक्ट होकर आते थे तो कुछ मैनेजमेंट सीट से। उनके अलावा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स की टीम अलग अलग जगह की काउंसिलिंग में घूम कर कुछ विशेष होशियार बच्चों को छात्रवृत्ति देकर भी अपने विश्वविद्यालय का हिस्सा इसीलिए बना रही थी कि विश्वविद्यालय का नाम  हो सके।

  विश्विद्यालय की मेहनत का नतीजा था कि ” मायानगरी ” अपने खुलने के पांच ही सालों में पढ़ने और पढ़ाने वालों के बीच अपना अच्छा नाम बना चुकी थी।

    अभिमन्यु को यहाँ चुन कर लाया गया था। और ये विश्विद्यालय खुलने के तीसरे साल से यहाँ मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ रहे हैं।
     अभी इनका पांचवा सेमेस्टर चल रहा है। और अब ये वापस अपने पुराने रंग में आ चुके हैं।
  
    वही बेफिक्री वहीं बेपरवाही का आलम है । न इन्हें किताबो से मुहब्बत है ना किताबों को इनसे। इनका इंजीनियरिंग में घुसने का मुख्य उद्देश्य था अपने घर से दूर भागना जो पूरा हो चुका था इसलिए अब इनका पढना लिखना भी दो साल से लगभग बंद ही है।
 
      वो तो दिमाग ऐसा पैना है बंदे का की कोई भी सेमेस्टर हो और कोई भी पेपर इनका रिकॉर्ड रहा है सिर्फ एक रात दिन की पढ़ाई में ही इन्होंने अपनी नैय्या तो पार लगाई ही है अपने आगे पीछे आजु बाजू वालों को भी वैतरणी पार कराई है।
   इसलिए भाई साहब का नाम चल गया है, लेकिन सिर्फ इनकीं ब्रांच में। यहाँ तक कि इनकी ब्रांच के बाहर भी लोग इन्हें ज्यादा नही जानते पहचानते।
   
   पर फिर भी ये अपने चेलों यानी दोस्तों को जमा कर जब तब ज्ञान देते ही रहतें हैं।
  कॉलेज का नया नया सत्र शुरू ही हुआ है और अभी उसी पर कुछ ज्ञान गंगा बह रही थी कि बिल्कुल किसी आंधी सी वो आयी और तूफान सी लौट गई…

और अभिमन्यु मिश्रा बस उसे देखते ही रह गए..

” अबे थी कौन ये?”

   आंधी सी आने वाली का नाम था रंगोली…..
रंगोली तिवारी !! ये मेडिकल प्रथम वर्ष की छात्रा हैं। दिखने में नाजुक सी खूबसूरत सी रंगोली का कॉलेज का पहला दिन बहुत बुरा बीता।

********

    बारहवीं के बाद मेडिकल सेलेक्शन लिस्ट में उसका नाम नदारद था । तो वैसे ही उसने रो रोकर घर सर पर उठा लिया था कि ठीक अगले दिन एक और नई लिस्ट आयी जिसमें वेटिंग लिस्ट वालों के नाम थे और यहाँ सातवें नम्बर पर रंगोली तिवारी का नाम और अनुक्रमांक मिल गया।
   बस घर वालों की खुशी का ठिकाना नही रहा लेकिन रंगोली को हर काम जब तक पूरा न हो जाये विश्वास नही होता था।
  उसने कितनी मेहनत की थी ये वही जानती थी। रात दिन एक कर उसने पढ़ाई की थी। किताबों को ऐसे रट घोंट लिया था कि उसे सपने भी एग्जाम हॉल और पेपर के ही आते थे।
  तैयारी बहुत अच्छी होने के बावजूद वो पेपर बनाते समय एंजाइटी की शिकार हो गयी और अच्छा खासा बनता पेपर थोड़ा सा बिगाड़ आयी।
     पेपर्स के बाद उसका पूरे एक हफ्ते का शोक चला जिसमें अपनी खिड़की पर खड़ी वो बाहर लगी रातरानी की बेल सूंघती अपने लैपटॉप पर आबिदा परवीन की गज़लें सुन सुन कर रोने की कोशिश में लगी रहती।

   लेकिन ज़िन्दगी कब तक उदास बैठेगी। रंगोली की मीठी सी कमज़ोरी आइसक्रीम को उसकी माँ ने औजार बना कर उपयोग किया और दुखियारी के सामने चार दिन बाद उसकी पसंदीदा आइसक्रीम पेश कर दी।
     रंगोली की पसंदीदा नॉवेल उसके हाथ में देकर मम्मी ने अपने हाथो से उसे आइसक्रीम खिलाई और बस रंगोली अपना गम भूल गयी।

मम्मी ने एक अच्छा सा ऑप्शन भी रख दिया..” बेटा अगर इस साल सेलेक्शन नही भी हुआ तो कोई नही। ड्राप लेकर अगले साल कर लेना तैयारी। मुझे पूरा विश्वास है मेरी बेटी अव्वल दर्जे की डॉक्टर बनेगी। चाहे कितना भी समय ले लेना बेटा पर हिम्मत नही हारना। “

   रंगोली माँ के सीने से लग गयी। उसके कमरे के बाहर खड़े उसके पापा उसके चेहरे की खोई मुस्कान वापस पा कर खिल उठे।
   दो महीने बाद रिज़ल्ट आया और वेटिंग लिस्ट में ही सही रंगोली का सेलेक्शन हो गया।

   परिणामों के दो हफ्ते बाद ही एक शाम जब पूरा परिवार साथ बैठे चाय की चुस्कियों के साथ गप्पे मारने में लगा था कि रंगोली के पिता जी के मोबाइल पर किसी अनजान नम्बर से फोन आया…

” तिवारी जी बोल रहे है .?

” जी हाँ ! कहिये कौन काम है हमसे ?”

” आपकी बिटिया का सलेक्सन नही हुआ महाराज ?”

” तो तुमको इससे क्या लेना देना भाई? “

” लेना देना है ना तिवारी जी। आपकी बिटिया आई है वेटिंग में सातवें स्थान पर। अब मान लीजिए छै तक आकर सेलेक्सन रुक गया तो क्या करेंगे। का बिटिया का एक साल फिर बर्बाद कर देंगे।

“तुम हो कौन और कहना क्या चाहते हो? “

” नाम में हमारे कोई खास बात नही जो हम बताएं। पर जो बताने जा रहे वो बहुत खास है। आप पांच लाख तैयार रखियेगा हम नार्मल सीट से सेलेक्शन करवा देंगे।

” पगला गए हो क्या ? इत्ता पैसा देना होगा तो मैनेजमेंट सीट नही खरीद लेंगे। “

” पगला तो आप गयें हैं गुरु। मेडिकल की सीट वो भी मैनेजमेंट सीट! कम से कम तीस पैंतीस लाख लगेगा। घर द्वार बेच के बिटिया को पढ़ाएंगे का? और फिर रंगोली के पीछे एक और गुड़िया भी तो है ना मेहंदी। उसके लिए क्या बचाएंगे। पांच लाख बहुत सस्ता ऑफर दिए हैं हम। वो तो बिटिया आपकी होशियार है वरना हम किसी को सामने से होकर फ़ोन नही करते। जिसको सीट चाहिए वो खुद ही हमें ढूँढ़ लेता है। समझे? “

  तिवारी जी ने खिसिया कर फोन पटक दिया। ठीक था वो घर से सम्पन्न थे , अच्छी नौकरी में थे। पर थे तो मध्यम वर्गीय ही। तीस लाख तो पूरी उम्र कमाई कर जोड़ लेंगे तब भी शायद ही जोड़ पाएं। और फिर रंगोली के पीछे ही मेहंदी भी थी। वो गणित लिए तैयार खड़ी थी।
   इस साल रंगोली का किसी अच्छे कॉलेज मे सेलेक्शन हो जाता तो दो साल बाद मेहंदी के लिए सोचना शुरू करना था उन्हें ।
    वो सोच ही रहे थे कि रंगोली ने उनकी मुश्किल आसान कर दी…

” ड्राप ले लुंगी पापा। आप चिंता न करो। ऐसे किसी को पैसे क्यों दे हम। जाने कहाँ का फ्रॉड हो ये। “

  बिटिया की समझदारी भरी बात पर पापा मुस्कुरा उठे लेकिन फ़ोन वाली बात उनके दिमाग से गयी नही।
  कुछ दो दिनों के बाद ही काउंसिलिंग लेटर आ गया और घर की रौनक वापस आ गयी।
  रंगोली अपने पिता के साथ काउंसिलिंग में आ गयी। एक से एक बड़े बड़े चिकित्सा महाविद्यालयो की भीड़ में उसे दो महाविद्यलयों में आखिरी की दो तीन बची सीट मिल रही थी।
  सीट तो भाई शुरू की मिले या आखिरी की मेडिकल सीट मेडिकल सीट होती है।
  रंगोली बुरहानपुर की सीट के लिए हां कहने वाली थी कि उसके सामने बैठे व्यक्ति के पीछे की स्क्रीन जिस पर सीट्स और कॉलेज दिखाए जा रहे थे में एक नए चिकित्सा महाविद्यालय का नाम सात खाली सीट्स के साथ नज़र आया ” रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह चिकित्सा महाविद्यालय ” …
   ये नाम देखते ही रंगोली ने सामने बैठे व्यक्ति के सामने टेबल पर अपने फॉर्म पर एकदम से हाथ रख दिया…

“वेट सर ! सर ये बाँसुरी मेडिकल कॉलेज कौन सा है? “

सामने बैठे व्यक्ति ने अपने एक किनारे रखे ब्रोशर को उठा कर उसके सामने कर दिया…

” मायानगरी विश्वविद्यालय का एक कॉलेज है। मायानगरी में भी बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की तर्ज़ पर एक ही कैम्पस में लगभग सारे कॉलेज खोल रखें हैं। अभी नया बना विश्विद्यालय है लेकिन रेप्युटेशन अच्छी हैं।।
  यहाँ मेडिकल में सात सीट उपलब्ध है। “

” सर मुझे यही एडमिशन लेना है। “

” आर यू श्योर ? “

” डेफिनेटली सर ” मुस्कुरा कर रंगोली पीछे स्क्रीन पर चमकते नाम को देख मुस्कुरा उठी।
   कौन सा मुझे एम्स या ए एफ एम सी मिल रहा था। बुरहानपुर की सीट से तो यही भला है। कम से कम कॉलेज का नाम तो सुंदर है।
   रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह मेडिकल कॉलेज। यानी मेडिकोज की भाषा में R B A S medical collage….

क्रमशः

aparna …….


  
  

Advertisements
Advertisements

मायानगरी -4




   मायानगरी -4



       वो एक अंधेरा सा कमरा था। कमरे में टीवी फुल वॉल्यूम में चल रहा था और बस टीवी से निकलने वाली रोशनी उस कमरे में फैली हुई थी….
   कमरा बहुत खूबसूरती से सजा था। हर चीज़ अपनी जगह पर मौजूद थी। कमरे में एक तरफ बड़ी सी लकड़ी की अलमीरा में खूब सारे सॉफ्ट टॉयज सजे थे….
    उनमें से एक टेडी बियर नीचे गिरा पड़ा था। बाहर तेज़ बारिश का शोर था और अंदर टीवी पर चलते किसी शो का ।
      इसलिए शायद रसोई से आती सिसकारी की आवाज़ साफ नही सुनाई पड़ रही थी…
  लेकिन बहुत ध्यान से सुनने पर लग रहा था जैसी कोई बच्ची रो रही हो…
   उसी वक्त सीढ़ियों पर किसी के तेजी से चढ़ने की आवाज़ आयी।
   कोई लगभग दौड़ते हुए सीढियां चढ़ कर बाहर के बड़े से दरवाज़े को ठेलते हुए बाहर के ही जूतों के साथ भाग कर रसोई में चला आया…

” ये क्या कर रही हो देविका ? बच्ची है वो उसे छोड़ दो। “

” मेरी भी तो बच्ची है। सिर्फ तुम्हारी तो नही। “

” हाँ तुम्हारी ही है, फिर क्यों उस पर इतना ज़ुल्म कर रही हो। उसे छोड़ दो प्लीज़। तुम जो कहोगी मैं मानने को तैयार हूँ। “

  ” प्रॉमिस करो। गौरी के सर पर हाथ रख कर कसम खाओ पहले ।

  वो आदमी जैसे ही एक कदम आगे बढ़ा उस औरत ने उसे वापस रोक दिया..

“नही तुम वहीं रहो , इधर मत आओ। “

  उस औरत जिसे वो आदमी देविका कह रहा था ने अपनी आठ साल की मासूम सी बच्ची को रसोई गैस के सिलेंडर से बांध रखा था। हाथ में दियासलाई पकड़े वो उस आदमी यानी अपने पति से किसी बात को मनवाने की ज़िद कर रही थी।

   आखिर सामने खड़े पूरी तरह से मज़लूम और बेसहारा से दिखते उस आदमी ने उस औरत के सामने अपने हाथ जोड़ दिए…..

” तुम जो कहोगी मुझे सब मंज़ूर है। लाओ दो मुझे कहाँ रखें हैं तलाक के पेपर्स। “

देविका ने आंखों से पीछे  रखे टेबल की ओर इशारा किया। जयेश टेबल की ओर लड़खड़ाते हुए मुड़ा ही था कि देविका का पैर सिलेंडर से उलझा और वो सामने की ओर गिर पड़ी….
   देविका के गिरते ही सन्तुलन बिगड़ने से सिलेंडर भी अपनी जगह से लड़खड़ा कर गिरने ही वाला था कि उससे बंधी बच्ची ज़ोर से चिल्ला उठी… ” पापा..”

   गर्ल्स हॉस्टल के कमरा नम्बर 10 में अपने बेड पर बैठी गौरी पसीना पसीना हो चुकी थी। वो नींद से जाग चुकी थी… तो अब तक जो चल रहा था वो ?
   हाँ वो सपना ही तो था…. वही सपना जो उस भयानक रात के बाद उससे जैसे चिपक सा गया था…
   ये सपना बचपन से उसका पीछा कर रहा था। अक्सर वो अपने कड़वे बचपन को इसी तरह सपने में देख चौन्क चौन्क कर आधी रात को जाग जाया करती थी, और फिर घंटो उसे नींद नही आती थी…

    आज भी वो समझ गयी कि अब उसे नींद नही आनी है…. उसने अपने बिस्तर के बाजू में रखी टेबल पर पड़ा लैम्प जला लिया और गाइनेकोलॉजी की किताब खोल कर पढ़ने बैठ गयी।
    यही रात दिन की पढ़ाई ही तो उसके टॉपर होने का कारण थी। लोग परीक्षाओं में आगे बढ़ने के लिए पढ़ते थे और वो खुद से जंग लड़ने के लिए पढ़ती थी।
पढ़ते पढ़ते ही भोर हो गयी थी….  खिड़की से आती रोशनी देख उसने खुद के लिए चाय चढ़ाई और मुहँ हाथ धोने वॉशरूम में चली गयी….
    चाय लिए  बालकनी में खड़ी गौरी की नज़र बाहर कैम्पस में जॉगिंग करते मृत्युंजय पर पड़ गयी… वो उसे देख ही रही थी कि उसने भी उसे देख लिया और हाथ के इशारे से बाहर बुलाने लगा।
   हाँ में सर हिला कर वो बाहर चली गयी….

” ये क्या जॉगिंग वाला ट्रैक सूट क्यों नही पहना। नाइट सूट में ही बाहर चली आयीं।”

  अब गौरी को होश आया कि वो जैसे खिड़की पर खड़ी थी, वैसे ही बाहर चली आयी थी…

” वो ध्यान ही नही रहा सर ! आज जॉगिंग करने का मूड भी नही है। “

  जय को समझ में आ गया था कि गौरी ने आज फिर वही सपना देखा है।
   जय यानी मृत्यंजय उपाध्याय अभी मेडिकल कॉलेज में हाउस सर्जन शिप समाप्त करने के बाद  मनोरोग में पीजी कर रहा था। फिर भी जूनियर्स में वो हाउस सर्जन के पद से ही जाना जाता था।
   गौरी और मृत्युंजय की मुलाकात भी इत्तेफाक से हुई थी…. दोनो के बीच अफेयर जैसी बात फिलहाल नही थी लेकिन मेडिकल कॉलेज ऐसी जगह होती हैं जहाँ बिना आग के ही धुंआ उड़ता है।
   लोग बस धुंआ देख बात उड़ा देते हैं ये जाने बिना की धुँआ सिर्फ आग का ही नही  सिगरेट का भी हो सकता है…..

    मृत्युंजय गौरी का सिर्फ ट्रीटमेंट कर रहा था जिसके कारण गौरी को अक्सर मृत्युंजय की ओ पी डी जाना होता था और बस वहीं से दोनो के बीच कुछ चक्कर चल रहा है कि लहर सारे कॉलेज में बह चली। गौरी से तो किसी ने नही पूछा लेकिन जय को अक्सर उसके दोस्त इस बात पर छेड़ जाते और वो चुपचाप मुस्कुरा कर रह जाता……
   
     ऐसे ही थोड़े न मेडिकल कॉलेज अपने कांडो को लेकर बदनाम था…


*****

    फर्स्ट ईयर की पहली क्लास सेमिनार हॉल में लगी थी। सारे जूनियर्स कतार में बैठे प्रोफेसर का इंतेज़ार कर रहे थे कि धड़धड़ाते हुए सीनियर लड़कियों की टोली अंदर चली आयी….
   आते ही दरवाज़ा बंद कर दिया गया….

   सामने मंच पर कुछ सीनियर्स सवार हुई तो कुछ जूनियर्स के आगे पीछे कहीं न कहीं व्यवस्थित हो गईं…

  सारे जूनियर्स सांस रोके थर्ड बटन हो चुके थे।

” क्यों भई कौन है वो श्रीदेवी जिसने कॉलेज में पहले ही दिन कांड कर दिया ? “

  एक सिनीयर की तेज कड़कती आवाज़ पर भी सब चुप खड़े थे। ऐसा सन्नाटा पसरा था कि सुई भी गिरे तो टन्न की आवाज़ हो…

” काहे भाया सांप सूंघ गया ? ये जब से आमिर ताऊ ने बताया है कि म्हारी छोरियां छोरों से कम है के? तब से इस बात को मेडिकल की छोरियों ने कुछ ज्यादा ही सिरियसली ले लिया है!”

   अब जूनियर्स की सांसो की आवाज़ भी आनी बंद हो गयी थी….

” क्या हुआ? मैं पागल लग रही हूँ तुम लोगों को जो किसी के मुहँ से जवाब नही फूट रहा। अरे बको न कौन थी भई सलीम की अनारकली जो पहले ही दिन जाकर इंजीनियरिंग के लड़के को प्रोपोज़ कर आई? “

   रंगोली के आजू बाजू खड़े लोगों ने धीरे से उसकी तरफ उंगली से इशारा कर दिया….

” ओहो तो आप हैं वो मधुबाला! आइये ज़रा सामने, हम भी तो दीदार करें।
   भई शक्ल से तो सीधी सूदी दिख रही है फिर कैसे इत्ता बड़ा कांड कर आई।
  एक तो प्रोपोज़ कर दिया वो भी इंजीनियरिंग वाले बंदे को। कमाल है यार! अब वो बंदा तुझे ढूंढता यहाँ हनीमून मनाने आ गया न तो हमारे पास आकर रोने मन बैठ जाना।”

एक ने अपनी बात पूरी भी नहीं कि की दूसरी पट से बोल पड़ी…..

” यार और कोई नहीं मिला तुझे।  प्रपोज ही करना था तो अपने कॉलेज के किसी बंदे को कर देती। मिला भी तो इंजिस!
    लानत है यार लानत!  तुझे पता भी है सबसे घटिया बंदे पढ़ते इंजीनियरिंग कॉलेज में….
   फर्स्ट ईयर से क्या-क्या कांड नहीं करते हैं। रोंगटे खड़े हो जाएंगे अगर हम उनकी रैगिंग के किस्से तुम सबको  सुना दे तो ।
   आई बात समझ में?  हम तो पहले दिन से ही लड़कियों को आगाह कर देते हैं कि भैया एक बार को चलती ट्रेन में भले चढ़ जाना लेकिन इंजीनियरिंग कॉलेज के लड़कों के सामने मत पड़ना। यह इतने गए बीते होते हैं ना कि तू सोच भी नहीं सकती।
   लड़कों की सबसे घटिया जमात इन्हीं कॉलेज में इकट्ठा होती है ।
    फर्स्ट ईयर से इन्हें रैगिंग में सुट्टा मारना और दारु पीना सिखाया जाता है। यह होती है इनकी आगे की ट्रेनिंग। समझ रही है सेकंड ईयर थर्ड ईयर तक पहुंचते-पहुंचते   तो बंदा बिल्कुल ही पुरखा हो जाता है । गांजा हशीश चरस डोप क्या नहीं ट्राई करते हैं ये लोग।
  यह साले इतने स्लेविश होते हैं इतने स्लेविश होते हैं कि इनकी कमिनाई पर पूरा ग्रंथ लिख डालो। आई बात समझ में ? तो बेटा तुझे इतनी बड़ी माया नगरी में इंजीनियरिंग के अलावा और कोई बंदा ही नहीं दिखा।
आंखें ठीक तो है ना तेरी चश्मा वश्मा तो नहीं चढ़ा रखा।”

” अबे ये भी तो हो सकता है कि ये उसी की बंदी हो। दोनों की पहले ही डिंग डाँग चल रही हो। सीनियर्स ने रैंग किया तो चली गयी अपने पिया जी को बताने। ”

  रंगोली की सांस अटकी पड़ी थी और ये सीनियर उसे और डराये जा रही थी….

” नो मैम ! ऐसी कोई बात नही है। मैं तो यहाँ किसी को नही जानती। “.

” तो इतनी होशियारी मारने की क्या ज़रूरत थी?
पहले दिन आकर हमने रूल्स बताए नही और तुम लोग कूद पड़ीं। अरे क्या ज़रूरत थी सीनियर लड़को को रैगिंग देने की। हमारा कॉलेज एन्टीरैगिंग है इतना भी नही पता? “

“जाने दे सुचित्रा , हमें क्या ? हम तो इन नौनिहालों को बचाना चाहतें हैं और ये लोग है कि वो ऋषि एंड टीम के सामने सरेंडर कर गयीं।
  क्यों ऋषि खुराना ने रैंग किया है ना? “

  तभी एक जूनियर ने धीमे से गुनगुना कर कोई दूसरा नाम पुकार लिया…

” नो मैंम। अधिराज सर ने!”

” ओह्ह तो अधिराज के हत्थे चढ़े हो बेटा। मतलब अब तक ऋषि के साथ इंट्रो नही हुआ । ऋषि खुराना से बच के रहना, हम लोग एन्टीरैगिंग वाली हैं ना इसलिए पहले से खबरदार कर रहीं हैं। बाद में मत कहियो की मैडम ने बचाया नही। “

” मैम प्लीज़ हेल्प कर दीजिए। कैसे बचना है ऋषि सर से। “

   ” देखो भई मैं बहुत बड़े दिल वाली हूँ। परमार्थ में बहुत विश्वास है मेरा। बिना किसी स्वार्थ के बता रही हूँ। आज के आज फटाफट शाम में सारी गर्ल्स हमारे कमरों में आकर असाइनमेंट ले जाना और हफ्ते भर में लिख कर हमें वापस दे देना । “

“पर मैंम उससे हम सर लोगों की रैगिंग से कैसे बचेंगे?”

” अबे बता रहीं हूँ ना ज़रा सांस ले लूँ।”

” जी मैंम!”

  “एंड यू बॉयज, तुम लोगों के हॉस्टल में फर्स्ट फ्लोर के कमरा नम्बर 5 में अध्यक्ष का कमरा है। अध्यक्ष मतलब स्टूडेंट्स यूनियन मेडिकोज का अध्यक्ष।
   उसके पास तुम सारे लड़के पहुंच जाना। घर से जो भी खाना खज़ाना लेकर आये हो ना जैसे लड्डू चकली , निमकी .. सारी चीज़ें अध्यक्ष को पहुंचा देना। ये उनसे मिलने की फीस है। बस उसके बाद अध्यक्ष सर सब संभाल लेंगे। ”

” चल शर्मिला आज के लिए बहुत ज्ञान हो गया…”

” अरे हां मुमताज ! तूने सही कहा , चल अब निकलें वरना कहीं चतुर्वेदी आ गया न तो लेने के देने पड़ जाएंगे। “

  सारी की सारी सीनियर्स जैसे आयीं थी वैसे ही बाहर निकल गईं….

   उनके जाते ही जूनियर लड़के शाम को अध्यक्ष से मिलने जाने के मनसूबे तैयार करने लगे।

******

  सीपी सर की अगुआई में अभिमन्यु , अधीर और बाकी लोग सीईओ यानी निरमा से मिलने निकल गए।
  अभिमन्यु ने 400 की जगह 499 हस्ताक्षर तैयार कर लिए थे जिनमें कुछ नकली तो कुछ असली भी थे।

” अबे 499 का क्या फंडा है बे? या तो 400 रखता या 500,। 450 भी चल जाता । पर ये कुछ आधा अधूरा सा नही लगता। “

“सर जी यही तो फंडा है। जैसे मॉल और बड़े ब्रांड्स अपनी ब्रांडिंग करते हैं ना 499 लिख कर। देखने वाले का फोकस 4 पर ही जाता है दिमाग में आता है 400 कि रेंज का सामान है जबकि असल रेट तो 500 है। बस वहीं बात यहाँ लागू होगी।
  निरमा मैडम जब 499 देखेंगी तो उनके दिमाग मे  400 की रेंज आएगी और वो आसानी से सारे हस्ताक्षर मान जाएंगी।
   हम 10 लोग 500 के साइन लेकर जाते तो वो बिना पढ़े ही फाड़ के फेंक देती। इसलिए ऐसा किया। और जब उनकी टीम काउंटिंग में जाएगी तब 500 हस्ताक्षर एक बड़ा पैमाना बन जायेगा हमारी बात को प्रूव करने का। “

” अरे वाह अभिमन्यु। तुम तो यार बहुत ही बेकार सा ज्ञान दे डाले। चलो अब वहीं देखा जाएगा , क्या होता है?

  सारे लड़के निरमा के चेम्बर के बाहर खड़े थे। अंदर निरमा किसी मीटिंग में थी।
   लगभग घंटे भर बाद कमरे के अंदर से फैकल्टी मेंबर बाहर निकल आये।
  उनके बाहर आते ही निरमा ने पियोन से कह कर उन लड़कों को बुलवा भेजा…

“बैठिये आप लोग। “

  सामने रखी कुर्सियों पर सबके बैठते ही निरमा ने अपने सामने रखी फाइल को धीरे से बंद कर एक किनारे कर दिया..

   सारे लड़के उसे ही देख रहे थे। निरमा ने बीच में बैठे सीपी से इशारे से ही सवाल कर लिया…

” कहिये क्या तकलीफ है आप लोगों की?”

  सीपी ने साथ रखा पर्चा उसके सामने कर दिया… आंखों पर चश्मा सही करते हुए निरमा उनके द्वारा प्रस्तुत किये आवेदन को पढ़ने लगी। पढ़ते हुए उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ कर चली गयी..
  

” ओके । तो आप लोग चाहतें है सारे कैम्पस में बेरियर लगवा दिए जाएं।”

  ” नही मैम । नॉट बैरियर । पर लोगों का यहाँ वहाँ टहलना बंद हो जाये। “

“देखो वो तो ऐसा है की अगर आप सब अपनी अपनी क्लास में मन लगा कर पढ़ेंगे तो बाहर निरर्थक टहलने का किसी को वक्त ही कहाँ मिलेगा? “

” जी मैंम हम तो शिद्दत से पढ़ते ही है लेकिन आर्ट्स एंड स्पोर्ट्स कॉलेज के लड़के हमारे कैम्पस में खूब चक्कर लगातें हैं मैम।
  उन लोगो का चक्कर मेडिकल में भी खूब लगता है।”

“और आप लोग अपने ही कैम्पस में रहतें हैं? “

निरमा के सवाल पर सभी ने राजा बेटा बन कर हां में सर हिला दिया..

” गुड। लेकिन जब आप लोग अपने कैम्पस से निकलते नही तो ये कैसे पता चला कि वो लोग मेडिकल के भी चक्कर लगातें हैं।”

“मैडम ये सब तो पता चल ही जाता है।”

” अच्छा ! कैसे लेकिन? मैं तो देखो सारे कैम्पस में घूम सकती हूँ पर जब तक आप लोग न बताएं मुझे ये सब पता ही नही चलता। खैर…
   आप लोग अपनी पढ़ाई के लिए इतने कटिबद्ध है कि बाहर से आने वाले बच्चों के कारण डिस्टरबेंस फील करते हैं इससे आपको असुविधा हो रही है। ये बात सही नही है। अब ऐसे में मुझे कोई निर्णय तो लेना ही पड़ेगा।
  मैं ऐसा करती हूँ कल ही इंजीनियरिंग कैम्पस की बाउंड्री वाल को ऊंचा करवा देती हूँ। और आपका गेट परमानेंट लॉक करवा देती हूँ।
  वैसे भी आपके कॉलेज कैम्पस में ही आपकी फैकल्टी का भी हाउसिंग है, और आप लोगो का होस्टल भी।
  तो मेन गेट लॉक करवा देते हैं। न आप लोग बाहर आ सकेंगे न बाहर से कोई अंदर जा सकेगा।  
  इज़ इट ओके?”

“नो मैंम ! बिना बाहर निकले तो काम नही बनेगा। और बाउंड्री ऊंची हो गयी तो हवा कैसे आएगी? “

अभिमन्यु की बात सुन निरमा को ज़ोर से हंसी आ गई..

” फिर ? बोलो क्या करना चाहिए। “

” आप मेडिकल और हमारा कैम्पस ओपन रखिये बस आर्ट्स वालो का यहाँ  आना बंद करवा दीजिये।”

” नो ये तो पॉसिबल नही है। अगर खुले रहेंगे तो सारे खुले रहेंगे और अगर बंद किया तो सभी को बंद करवा दूँगी।
   एक बात और! मैं रोज़ रोज़ नए नियम अप्लाई करने में यकीन नही रखती। अगर एक बार निर्णय ले लिया तब फिर आप लोग मुझे मेरे निर्णय बदलने के लिए नही कह पाएंगे।
  इसलिए अभी एक हफ्ते के लिए सभी कैम्पस में कर्फ्यू कर लेते हैं।
कोई अपने कैम्पस से बाहर कहीं नही जाएगा। अगर ये ट्रायल सफल हुआ तो यही कार्यप्रणाली आगे अपनायी जाएगी वरना देखा जाएगा।
  पर इस एक हफ्ते की समयावधि में आप लोग ये इंश्योर कर लेना कि आप में से कोई किसी और कैम्पस में न दिखे वरना मैं फिर उसे सीधा रेस्टीकेट ही करूँगी।”

  निरमा की बातों को मंज़ूर कर वो लोग खड़े हो गए। निरमा को नमस्ते कर सभी बाहर निकल गए..

” यार ये तो पूरी डॉन है। पहले कैसे स्माइल देकर मीठी मीठी बातें कर एकदम से छुरी मार दी।मतलब हद है , अब आप इंजीनियरिंग वालों को भी  रूल्स बताएंगे। “

” सीपी भाई उनके लिए तो हम सब बराबर ही हैं। वो कौन सा इंजिस से खौफ खाएंगी। खैर चलो एक हफ्ते का ही सही कर्फ्यू तो लगा । अब देखते है वो जूनियर विधायक कैसे हमारे कैम्पस में फटकता है…..
   साला एक हफ्ते नही आएगा तो खुद यहाँ का रास्ता भूल जाएगा….”

  निरमा के ऑफिस से बाहर निकले वो लोग अपने कैम्पस की ओर बढ़ रहे थे कि अभिमन्यु ने अधीर को धीरे से पीछे खींच लिया…

” क्या हुआ? “

” यार आज मंगल है? “

” हाँ तो । तुम्हारा तो सब मंगल ही है। “

” अबे आज मंगलवार है तो आज के दिन मैं थोड़ा पुण्य कमा लेता हूँ न। मैं फटाफट यूनिवर्सिटी के मन्दिर से दर्शन कर के आता हूँ। तू कहाँ मिलेगा? “

” अबे और कहाँ, वहीं मिलूंगा अड्डे पे।

” चल ठीक है मैं  आता हूँ। इन गँवारू लोगो से कुछ मत कहना मैं कहाँ गया। “

” हाँ मेरे शाहरुख तू जा। जी ले अपनी ज़िंदगी। बस कोई नई सिमरन मत पटा कर आना। “

  अपने बालों पर हाथ फिराते हंसते गुनगुनाते अभिमन्यु यूनिवर्सिटी के अंदर की तरफ बने मंदिर की ओर चल पड़ा।
   बाहर जूते खोल वो फटाफट मंदिर में दाखिल हो गया…
   भगवान की मूर्ति के सामने आंखे बंद कर हाथ जोड़े वो मन ही मन में उनसे बातें करता रहा। होंठ धीमे से कुछ बुदबुदा रहे थे और उसने धीमे से आंखें खोल लीं। उसके ठीक सामने खड़ी लड़की ने भी शायद उसी वक्त आंखें खोली और पंडित जी के कहने पर नीचे झुक कर उसने सिंदूर उठा कर अपने माथे पर छोटा सा तिलक करने के बाद अपने साथ खड़ी अपनी सहेली को तिलक करने मुहँ पीछे घुमाया और ठीक सामने पड़ गए अभिमन्यु  के माथे पर तिलक की लंबी रेखा खींच दी।
    इतनी जल्दी ये सब हुआ कि वो लड़की और अभिमन्यु दोनो ही कुछ नही समझ पाये…

” आई एम सॉरी , आई एम सॉरी । मैंने तो झनक समझ कर तिलक आपको लगा दिया। “

” नो इट्स ऑलराइट । एब्सोल्यूटली ऑलराइट ! “

  अभिमन्यु तिलक पोंछने ही जा रहा था कि पंडित जी ने टोक लगा दी…

” अरे बेटा इतनी जल्दी मंदिर का लगा तिलक नही पोंछते। घर जाकर मुहँ धोओगे तो चेहरा साफ हो ही जायेगा…”

  हाँ में सर हिला कर उसने पंचामृत के लिए हाथ बढ़ा दिया।।उसके बाजू से ही  उस लड़की ने भी हाथ आगे कर दिया…
  अब तक में अभिमन्यु उस लड़की को पहचान चुका था।
   ये वही उस दिन वाली लड़की ही थी।
उस दिन तो लंबे लंबे बाल लहराती सुंदर सी कॉलेज फर्स्ट ईयर की लगती ये लड़की आज किसी शिशु मंदिर की गयरहवीं की छात्रा लग रही थी।
  नीला कुरता,सफेद सलवार, सफेद थ्री पिन की हुई चुन्नी पर ऊपर की ओर लाल रिबन से बंधी दो चोटियां।
   पर जो भी हो प्यारी बहुत लग रही थी।

  अभिमन्यु उसे देखता उसके पीछे मंदिर की सीढ़ियां उतर गया। वो अंतिम सीढ़ियों पर खोले अपने जूते पहन रही थी..

” हेलो ! माइसेल्फ अभिमन्यु … अभिमन्यु मिश्रा इंजीनियरिंग मैक फिफ्थ सेम। ”

  उस लड़की ने अपनी बड़ी बड़ी आंखें ऊपर कर उसे देखा , और सर नीचे किये जाने के लिए मुड़ गयी…

” अरे इत्ती घनघोर बेइज्जती । अपना नाम तो बताती जाओ यार। इतनी भी कर्टसी नही है? “

” रंगोली नाम है उसका और मैं हूँ झनक। मेडिकल फर्स्ट ईयर।
   हो गया इंट्रो अब हम लोग जाएं?”

  पानी पीकर आयी झनक ने अभिमन्यु की बात सुन ली थी। उसने रंगोली का हाथ पकड़ा और उसे खिंचती अपने साथ लिए आगे बढ़ गयी…

” रंगोली पहचाना इस लड़के को? “

  रंगोली के ना में सर हिलाते ही झनक हँसने लगी…

” अरे तेरा पति है ये। वही बंदा है जिसे तूने उस दिन प्रोपोज़ किया था।”

  झनक की बात सुन रंगोली का दिल धक से रह गया। कहीं सीनियर्स की कही बातें सच न हो जाएं। उसके मज़ाक को कहीं इसने सीरियसली ले लिया तो?
  उसका तो जीना दूभर हो जाएगा। पहले ही लड़कों को देख कर उसकी सिटी पिट्टी गुम हो जाती थी, और यहाँ तो उसने खुद आगे बढ़ कर कुल्हाड़ी में अपना पांव दे मारा था।
   उसने धीमे से पीछे मुड़ कर देखा वो वहीं हाथ बांधे खड़ा अपनी गहरी आंखों से उसे ही देख रहा था….

क्रमशः



aparna….
   

मायानगरी -3







  मायानगरी -3


      इंजीनियरिंग कैम्पस में भी नई नई चिड़िया चहक रहीं थीं वहीं कुछ कौए भी फुदक रहे थे…
   एक तरफ एक छोटा सा गार्डन बना था, जहाँ एक बड़े से बरगद के पेड़ पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था..
   “यहाँ रैगिंग करना सख्त मना है”

   उसी पेड़ के नीचे बैठे कुछ लड़कों ने उधर से गुजरते कुछ कौवों यानी  कुछ नए लड़कों को आवाज़ देकर बुला लिया..

” फर्स्ट ईयर? “

” यस सर !”

” बेटा पहले दिन ही जीन्स? और ये क्या बाल बना रखें हैं? खुद को नागराज समझते हो? “

” नो सर!”

” तो ये जो बालों का फुग्गा दिख रहा है ना कल कटवा के आना समझे। कल गंगाधर विद्याधर मायाधर ओंकारनाथ शास्त्री बन के आ जाना समझे।”

” ये सारे लोगों जैसा बन कर आना है सर? “

” अबे शक्तिमान नही देखे क्या बे ? हो सकता है तुम्हारे पैदा होने के पहले का सीरियल हो? अबे गूगल कर लेना।  .. और सुनो आज रात आठ बजे होस्टल नम्बर 5 में आ जाना। चलो फूटो अब…

   वो लड़के जान बचा कर भाग खड़े हुए। उन्हें यूँ भागतें देख सभी सीनियर्स में हंसी की लहर दौड़ गयी।
   
        तभी उस लड़की के प्रोपोजल से हैरान परेशान अभिमन्यु वहाँ चला आया। अभिमन्यु के साथ उसका दोस्त अधीर शर्मा भी था…
   दोनो बातें करते गार्डन में पहुंच गए…

” काहे इत्ता सोच विचार रहे हो अभि कोई नई चिरैया होगी आर्ट या कॉमर्स वाली, बेचारी रैगिंग की शिकार !”

” हाँ होगी तो रैगिंग की शिकार ही लेकिन सोचने वाली बात ये है कि उसने इतने लड़कों में मुझे ही प्रोपोज़ किया? “

” अबे ओए तू कोई जॉन इब्राहिम नही है समझा। जो सामने पड़ गया उसे प्रोपोज़ कर चलती बनी, अब इतना मत सोच , भूल जा उसे। “

” हाँ यार !मैं कौन सा सिरियस हूँ। बस ये पता चल जाये कि बंदी है किस फैकल्टी की। वैसे शक्ल सूरत से इतनी खूबसूरत सी थी पक्का आर्ट्स वाली होगी। है ना?

” कॉमर्स या साइंस ग्रैजुएट भी हो सकती है। सभी सुंदर लड़कियां आर्ट्स ही लें ये ज़रूरी तो नही? “

” हाँ यार वैसे बी एस सी में भी अच्छी लड़कियां आती हैं। एक हमारे हिस्से ही दुनिया भर की शशिकला और टुनटुन पता नही क्यों आती हैं। पता नही ये मैथ्स वाली लड़कियां इतना पढ़ती क्यों हैं कि अपने थोबड़े का भूगोल ही गड़बड़ा देती हैं। “

” मैथ्स बिना पढ़े निकलता भी तो नही भाई, अब हर कोई तेरे जैसा अनाप शनाप दिमाग तो नही पाए बैठा है ना?

” हाँ बात में तो दम है तेरी। वैसे तुझे वो पिछले साल की बी एस सी वाली याद है?

” कौन रूही ? जिसके चक्कर में तू उसके बॉयफ्रेंड से पिटने वाला था।

” अबे मैं नही पिटने वाला था, उल्टा उस साले को मैं पीट देता लेकिन रूही का चेहरा देख कर छोड़ दिया। अब यार जब मैं उसके चक्कर लगा रहा था तब वो कमबख्त भी तो फुल लाइन देती थी,मुझे क्या पता था मज़े ले रही है । अपने बॉयफ्रेंड की ताकत नापने का ये कौन सा तरीका होता है भाई। पहले खुद लाइन दो और फिर बॉयफ्रेंड से पिटवा दो।

  अधीर का हँस हँस कर बुरा हाल था…

” और वो याद है तुझे क्या नाम था “भाषा ” क्या स्मार्ट लड़की थी यार वो। मैथ्स ऑनर्स कर रही थी ना।”

  भाषा नाम सुनते ही अभिमन्यु के चेहरे पर चौड़ी सी मुस्कान चली आयी …..

” कैसे भूल सकता हूँ यार। इतनी टैलेंटेड बंदी सच आज तक नही देखी। अब कैंटीन में जब मैं उसे देखता वो भी मुझे देख मुस्कुरा देती। मुझे लगा पट गयी है। फिर धीरे धीरे मुझसे ज्यादा तो वो ही मुझे ताड़ने लगी थी …

” हाँ और फिर आया वो मनहूस दिन!”   अधीर अभिमन्यु की बात आगे बढ़ाता हँसने लगा…

“हम्म ! अबे कैंटीन में राखी लेकर कौन आता है यार!”

” हाँ सारे बवाल तेरे ही हिस्से लिखें हैं। तुझे उसकी आँखों में ममता नज़र नही आई थी जो लाइन मार रहा था। साले वो तुझमें अपना गुमशुदा भाई देखा करती थी और तू…”

” अब मैं क्या करूँ यार। इतनी प्यारी सी लड़की अगर मुझमें अपना भाई देखेगी तो फिर ज़िंदगी ही खत्म अपनी। अच्छा हाँ इसी बात से याद आया, आज भाषा की सहेली धरा छुट्टियों के बाद वापस आ रही है, उसे लेने स्टेशन जाना है मुझे।”

“हां अब बहन बन गयी है तो पूरी शिद्दत से भाई धर्म निभा तू। कब जाना है तुझे स्टेशन? अकेली आ रही है क्या”

” रात में ट्रेन है उसकी। अकेली ही होगी तभी तो भाषा ने स्पेशली फोन कर के कहा कि स्टेशन लेने चले जाना। “

“और ये नही कहा कि अपनी आदत से मजबूर लाइन मत मारना शुरू कर देना। “

  अभिमन्यु नीचे सर किये हँसता अपने बालों पर हाथ फिराता रहा….

” खैर अब भूल जा सुबह वाली को ,चल लाइब्रेरी चलते हैं। अबे यार….. सुबह वाली लड़की मेडिको भी तो हो सकती है। “

” तौबा तौबा , ऐसी नाजुक लड़की डॉक्टर नही बन सकती यार। डॉक्टर लड़कियां न अजीब छिपकली होती हैं पढ़ पढ़ कर इनके चेहरे सड़ जातें हैं, आंखों के नीचे काले घेरे और उस पर मोटा सा चश्मा लगाने वाली लड़कियां, डेडबॉडीज़ को चीरती फाङती लड़कियां , उफ्फ। मुझे तो इनमें चुड़ैल नज़र आती है। दुनिया में आखरी लड़कीं भी बची होगी न तब भी डॉक्टरनी से कभी प्यार नही करूँगा।”

“वैसे लड़कियों के मामले में तूने जो अभूतपूर्व ज्ञान कमाया है उसे देख कर समझ सकता हूँ तू सही ही कह रहा होगा।
   दर्जन भर तो तेरी सिर्फ ए अल्फाबेट से दोस्त रही होंगी , अवनी अनामिका,अनिका, आँचल, आरुषि ,अनन्या अपूर्वीनी और क्या थी वो चैताली मिताली … हे भगवान!

” बस करो यार। जलो मत तुम बराबरी करो। समझे। “

  दोनो बातें करते आगे बढ़ रहे थे कि सामने से एक हैरान परेशान लड़का चला आया…

“”अरे ज्ञानी भैया क्या हुआ ? बड़े टेंशनियाए घूम रहे हो। “

” यार अभिमन्यु सेमेस्टर शुरू हुआ नही की ये प्रोफेसर्स की किचकिच शुरू हो जाती है।

” अब क्या जुल्म हो गया गुरु?

” अब क्या बताएं यार , पिछले सेमेस्टर का बकाया मांग रहे हैं सारे। “

” ओहहो जे बात। चलिए लाइब्रेरी में चलिए कोई उपाय निकालतें हैं ज्ञानी जी।

  ज्ञानी जी का असली नाम हर्षवर्धन गेरा है। दिल्ली के रहने वाले हर्षवर्धन के पापा का रेस्टोरेंट है लेकिन वो अपने लड़के को सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनाना चाहते हैं। बड़े घिस तिस कर हर्षवर्धन को इंजीनियरिंग कॉलेज पहुंचाया गया था। इनके बारे में किवदंती ये है कि मैनेजमेंट कोटा के लिए आवश्यक मिनिमम मार्क्स भी ये नही ला पाए थे। मैनेजमेंट कोटा की मोटी धनराशि पर अपने रेस्टोरेंट की काजू कतली की रुपहली पतरी चिपका कर ही इन्हें इनके पिता ने पार लगवाया था।
पहले जैसे इनके रहने से इनका स्कूल धन्य हुआ पड़ता था अब कॉलेज का वही माहौल था यह कहने को तो पांचवे सेमेस्टर में पहुंच चुके थे लेकिन हर एक सेमेस्टर में कोई ना कोई विषय इन्हें मुंह चढ़ाता वहीं खड़ा रह गया था ।
    कहां जाता है इन्होंने फर्स्ट ईयर की पढ़ाई दो बार पढ़ी सेकंड ईयर की पढ़ाई भी दो बार पढ़ चुके हैं और अभी पांचवें सेमेस्टर में होते हुए भी पिछले सेमेस्टर के कुछ विषय लटके पड़े ही हैं।

     इतनी गहन पढ़ाई के कारण ही इंजीनियरिंग के बच्चों में यह ज्ञानी नाम से सुप्रसिद्ध हैं, अभिमन्यु का साथ मिलने पर उसने इन्हें रात-दिन एक करके पढ़ाया और यह किसी तरह सेमेस्टर की वैतरणी पार कर आगे बढ़ गए इसीलिए यह अभिमन्यु को बहुत माना करते हैं।
      दिल का साफ अभिमन्यु इन्हें सीनियर्स की तरह आदर भी देता था और एक मित्र की तरह प्रेम भी किया करता है अभिमन्यु और अधीर के साथ ही ज्ञानी जी भी इनके रूम मेट है।

  कुछ प्रोफेसर ज्ञानी जी के पांचवे सेमेस्टर में जाने के खिलाफ थे उनका कहना था कि ज्ञानी जी पहले सारे पुराने सेमेस्टर क्लियर कर लें तभी आगे बढ़े इसी बात के फसाद पर ज्ञानी जी अभी अभी किसी से उलझ कर बाहर चले आ रहे थे जिन्हें वापस समझा-बुझाकर अभिमन्यु ने लाइब्रेरी के लिए मोड़ लिया था।

नया सत्र शुरू हुआ था इसीलिए अभिमन्यु को किताबें अलॉट करवाने की जल्दबाजी थी, उसके पास इतने पैसे तो होते नहीं थे कि वह हर एक महंगी किताब खरीद सके, इसीलिए सबसे पहले लाइब्रेरी पहुंच कर अपने काम की किताबें  अलॉट कर के रख लिया करता था।
   भले पढ़ाई से कोई नाता नहीं था लेकिन एग्जाम में फेल होना उसके जमीर को गवारा नहीं था इसीलिए एग्जाम्स में पास होने किताबें और नोट्स उसके पास होना बहुत जरूरी हुआ करता था।
    सीनियर्स भी इस मैजिक माइंड लड़के से प्रभावित थे इसलिए अपने सबसे ज़रूरी नोट्स संभाल कर रखते और सेमेस्टर क्लियर होते ही अपनी वसीयत अभिमन्यु के नाम कर दिया करते।

वहां पहुंचे वह लोग किताबें अलॉट करवा ही रहे थे कि उन लोगों के भी सुपर सीनियर 5-6 के ग्रुप में वहां चले आए उन सभी को हैरान परेशान देख अभिमन्यु और अधीर एक दूसरे को देखने लगे यह सभी ज्ञानी के साथ ही इस कॉलेज को ज्वाइन किए हुए थे इसलिए सभी ज्ञानी को अच्छे से जानते थे वह लोग ज्ञानी और अभिमन्यु के पास ही चले आए।
    उन्हीं में से एक थे सीपी भाई !

  सीपी भाई का पूरा नाम था चंद्रप्रताप सुबोधन। ज्ञानी जी के साथ ही इन्होंने भी कॉलेज में कदम रखा था। पर जहाँ सीपी भाई सारे जहान के जोड़ घटाव गुणा भाग कर कैसे भी कर के पास होते चले गए ज्ञानी जी वहीं उसी सेमेस्टर में रहकर अपना ज्ञान सिंचित करते रहे।

सीपी (c p) ने अपने साथ रखा एक पर्चा अभिमन्यु की तरफ बढ़ा दिया …..

” यह क्या है सीपी सर ?”

” ध्यान से देख ले, पढ़ ले!”

अभिमन्यु उस पर्चे को ध्यान से देखने लगा और उन लड़कों में से एक लड़का उस पर्चे के बारे में बताने लगा ….

” यार अब हद होने लगी है ! ठीक है, माया नगरी एक पूरी यूनिवर्सिटी है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि किसी भी फैकल्टी का कोई भी बंदा कहीं भी घुस जाएगा।”
  हमारे इंजीनियरिंग केंपस में कुल जमा 3 कैंटीन। है कि नहीं?  यह राजा युवराज सिंह आर्ट्स एंड स्पोर्ट्स अकैडमी वाले लड़के जब देखो तब हमारी कैंपस की कैंटीन में चले आते हैं। एक तो साला उनमें विधायक का लड़का है अपनी जीप में धूल उड़ाता फिरता है । सारा वक्त अपनी एसयूवी में सवार रहता है अपने चेलों से घिरा खुद को पता नहीं कहां का राजा समझता है?

    माया नगरी में पढ़ रहा है तो उसे लगता है कि वह खुद भी राजा अजातशत्रु बन गया है। अरे ऐसे कोई थोड़ी अजातशत्रु बन सकता है।
     पता नहीं लीचड़ आदमी खुद को क्या समझता है? जब देखो तब हमारी कैंटीन में चलाएगा और हमारे कैंपस की लड़कियों को छेड़ता रहेगा। इसी सबके लिए यह पेपर लिखा गया है।  इस पेपर को हम डायरेक्ट यूनिवर्सिटी के चेयर पर्सन के पास देने वाले हैं । इसमें यह लिखा है कि जो जिस फैकल्टी का स्टूडेंट है उसी कैंपस में रहे , और उसे किसी और कैंपस में घुसने की मनाही कर दी जाए । हमारी ब्रांच के लड़के इसमें साइन कर चुके हैं। अभी 4 ब्रांच और बची हैं , वहां के भी सारे बच्चों के साइन होने के बाद काफी सारे लोग हमारे फेवर में आ जाएंगे , इसके बाद हम अपने कॉलेज के लेक्चरर और प्रोफेसर के साइन लेने के बाद सीधा माया नगरी की सीईओ के पास जाएंगे।”

” सर पता भी है मायानगरी की सीईओ है कौन?”

“हां पता है ना! वैसे तो माया नगरी के कर्ता-धर्ता राजकुमार विराज सिंह है लेकिन हम डायरेक्टली उनके पास नहीं पहुंच सकते ऑफिस मैनेजमेंट देखने के लिए ऑफिस सीईओ के पास ही हमें जाना पड़ेगा। और सीईओ है श्रीमती निरमा प्रेम सिंह चंदेल ।
      सुनने में आया है थोड़ी स्ट्रिक्ट है मैडम लेकिन है बहुत अच्छी । यह भी सुना है कि स्टूडेंट्स के भविष्य से वह कभी खिलवाड़ नहीं होने देती। कोई भी परेशानी हो वह दोनों पक्षों को सुनकर समझ कर वही निर्णय लेती हैं जिसमें विद्यार्थियों का भला हो।  मुझे तो भरोसा है कि वह हमारी बात सुनेंगे और समझेंगे और उस विधायक के लड़के को भी सही मजा चखा देंगे,  तो बेटा अभिमन्यु साइन कर दो इसमें।

“जी सर!   सर साइन ही नहीं करेंगे बल्कि मैडम के पास चलेंगे भी…
     हम जितने ज्यादा लोग जाएंगे उतना ज्यादा असर पड़ेगा। जाहिर सी बात है कि हमारे कैंपस में सिर्फ इंजीनियरिंग वाले लड़के लड़कियां ही रहें। ना तो आर्ट्स वाले यहां आएँ और ना ही साइंस वाले ।और  मेडिकल वाले भूत तो बिल्कुल ही न आ सकें। सबको अपनी अपनी फैकल्टी अपने अपनी ब्रांच दी गई है सभी के कैंपस सफिशिएंट बड़े हैं। सभी को कैंटीन की सुविधा लाइब्रेरी की सुविधा दी गई है । फिर क्यों इधर-उधर मारे मारे फिरना । सर मैं बिल्कुल आपके साथ चलने को तैयार हूं।

“गुड तुमसे यही उम्मीद थी।  तुम्हारे दोस्त भी बहुत सारे हैं,  तो सब के सब का साइन ले लेना इसमें। ठीक है ?यह पेपर रखो शाम को हमें दे देना

“सर मैं आज शाम तक इसमें 400 लोगों के साइन ले कर आ जाऊंगा भरोसा रखिए…

“गुड तुमसे यही उम्मीद थी ..अब हम चलते हैं बाकी जगह भी जाना है!

उन लोगों के वहां से जाते ही ज्ञानी और अधीर अधीरता से अभिमन्यु का चेहरा देखने लगे।

” अभी 400 साइन कहां से लेकर आएगा तू ?  कुछ ज्यादा ही फेकू नही है ? कुछ भी कह देता है….”

” अबे सिर्फ साइन लेने के लिए 400 लोगों के पास जाने की क्या जरूरत है? भगवान ने मुझे दो दो हाथ  और 10 उंगलियां दी है।
      इन दोनो हाथों की  उंगलियों से ऐसे ऐसे कारनामे करूंगा ना कि 400 ही नही 800 साइन बना लूंगा और किसी को पता भी नहीं चलेगा। “

“अबे साले हद फर्जीवाड़ा है तू। अपना सारा दिमाग बस इसी सब में झोंक दे। सही से पढ़ लिख लेता ना तो कलेक्टर बन जाता कहीं का।”

“कितना कंफ्यूज है यार तू और मुझे भी करता है। इंजीनियरिंग कर के मैं कलेक्टर काहे बन जाता भला? “

” चल अब चलें कम से कम आठ दस साइन तो असली वाले ले ले फिर रात में हॉस्टल रूम में बैठ कर बनाते रहना फर्जी सिग्नेचर। कल मैडम से मिलने भी जाना है।”

अभिमन्यु अधीर और ज्ञानी कैंटीन की ओर चल पड़े…..

**********

रंगोली तैयार होकर अपने गांधी झोले में किताबें और नोटबुक डाल रही थी कि झनक भी नहा कर निकल आयी…

” रंगोली तू तैयार नही हुई अब तक? “

” हो तो गयी हूँ। और क्या तैयार होना बाकी है।?”

” ओए मैडम हम फुज़ी हैं, हमें ये ऊंची सी पोनी टेल , ये चटकीले रंगों के कपड़े और ये स्टाइलिश सी जूतियां अलाऊ नही हैं। समझी।

” ओह्ह ! फिर ।।”

” फिर ? तुझे एडमिशन के समय मेधा रानी ने कुछ बताया नही क्या ? अजब डंबो है यार तू। ये सब तो हमें एडमिशन के साथ ही उसने बता दिया था।

” अब ये मेधा रानी कौन है? “

झनक ने अपने माथे पर हाथ मारा और फटाफट अपनी अलमीरा से एक जोड़ा यूनिफॉर्म निकाल कर रंगोली को थमा दिया…

” मेधा रानी मैडम कॉलेज में फीस कलेक्शन के बाहर इधर उधर भटकती आत्मा के समान टहलती रहतीं हैं। सेकंड ईयर स्टूडेंट हैं, हॉस्टल रूम अलॉटमेंट के साथ ही सारे नियम भी फटाफट बता देती हैं। असल में हर साल सेकंड ईयर की एक लड़की को इस काम के लिए चुना जाता है। जो जूनीज़ को पकड़ कर नियम रटवा दें।
  अब तू पूछेगी नियम क्या हैं। तो बेबी पहला तो हमें दो चोटियां बनानी है , वो भी रेड रिबन लगा कर ऊपर बांधनी हैं। दूसरा यूनिफॉर्म में यही नीला कुर्ता और सफेद सलवार पहनना है ,चुन्नी थ्री पिन करनी है। और पैरों में बिना हील्स के हद दर्जे के बोरिंग पंप शूज़।
  ये सिमिज़ की जलन है बस। क्योंकि हर नई खेप के साथ सीनियर लड़के क्लास में अपने लायक जूनी ढूंढने ही तो आते हैं। इसलिए ये लोग हमें ऐसे नमूना बनवा कर रखतीं हैं।

  झनक की बातों के दौरान ही रंगोली भी तैयार हो गयी।
  दोनो फटाफट अपने गांधी झोले टांगे कॉलेज के लिए भाग चले….

” जल्दी जल्दी कदम बढ़ा, आज सबसे सामने बैठना है एनाटॉमी लैब में। “.

“हां यार मुझे भी अच्छे से पढ़ाई करनी है, सामने बैठेंगे तभी तो समझ आएगा। “

” पढ़ाई वढ़ाई का कोई चक्कर नही है मेरे साथ…. वो तो आज मृत्युंजय सर क्लास लेने वाले हैं, उन्हें ताड़ना है बस इसलिए सामने बैठना है…”

रंगोली फिर आंखों में सवाल लिए झनक को देखने लगी…
  
  झनक रंगोली को देख मुस्कुरा उठी….

” ऑब्विसली तू मृत्युंजय सर को भी नही जानती होगी। हाउस सर्जन हैं अपने यहाँ , क्या डैम हैंडसम बंदा है यार उफ्फ, और जब कभी ब्लैक शर्ट में आता है ना कसम से कितनी लड़कियां तो ऐसे ही कत्ल हो जाती होंगी। वो साउथ का हीरो है ना सुधीर बाबू, वो भी फेल है मृत्युंजय सर के सामने।  ये ब्लैक शर्ट का किस्सा सिमिज़ के मुहँ से ही सुना था, अब तक देखने का सौभाग्य नही मिला। “

  झनक की बातें सुनती हंसती रंगोली झनक को गहरी आंखों से देखने लगी…

” बाकियों का पता नही तू तो अभी से फ्लैट हो गयी ,लग रहा है…”

” अरे कहाँ यार। सर की तो सेटिंग है पहले से। हम तो बस आंखों को सुकून मिले ऐसी चीज़ें देखनी चाहिए, इसलिए देख लेते हैं।”

” ओह्ह तो सर की सेटिंग किससे है? “

” गौरी मैम ! उस दिन दिखी थी न होस्टल में, वही हैं……

  




क्रमशः

aparna …

मायानगरी -2

Advertisements




  मायानगरी -2



     काउंसिलिंग से वापस लौट कर रंगोली के पैर जमीन पर नही पड़ रहे थे। चार दिनों में वहाँ जाने रहने की सारी तैयारियां पूरी कर रंगोली बिल्कुल किसी राजकुमारी सी अपने घर से पहली बार विदा हुई।
   सत्रह की अल्हड़ उम्र में पहली बार अपनी माँ पापा बहन को छोड़ कर जाना उसके लिए बहुत मुश्किल था।
  यही हाल उसकी माँ का हो रहा था। उनकी कनक कलेवर लड़की जिसको मेडिकल की तैयारी के कारण उन्होंने ज़मीन पर पैर नही रखने दिए थे आज खुद अपनी ज़िम्मेदारी बन कर उनसे दूर जा रही थी।
   पिछले चार दिनों से वाकई रंगोली के जाने की ऐसी तैयारियां की जा रहीं थी जैसे वो घर से अपने ससुराल विदा हो रही हो।
   भर भर के रिश्तेदार रंगोली से मिलने आ रहे थे, आखिर घर परिवार से पहली बार कोई डाक्टरी पढ़ने बाहर जा रही थी।
  मामी जी किलो भर पिन्नियों के साथ चने के पापड़  ले आयीं तो वहीं ताई जी दो जोड़ी नए सूट के कपड़े लेती आयीं।
   सबसे खुशी खुशी मिलती रंगोली चहक रही थी…

” अरे बड़ी अम्मा इसकी क्या ज़रूरत थी? ” बोलते हुए भी उसने फटाफट पन्नी में से निकाल कर बंधेज का गुलाबी कुर्ता गले से लगा लिया..

” पर है बहुत सुंदर। थैंक यू !!!”

” अच्छे से पढना बेटा। फिर वापस आकर मेरे घुटनों का तू ही इलाज करना। मुये इनके मारे कही आना जाना मुश्किल हो रखा है ।”

” अरे अभी तो कॉलेज तक भी नही पहुंची है ये। ड़ॉक्टरी पढ़ने में बहुत समय लगता है अम्मा ? सिर्फ एम बी बी एस से कुछ नही होना जाना, उसके बाद पीजी भी तो करना पड़ेगा। पता नही ये झकली वहाँ क्या करेगी। ठीक से बोल तक तो पाती नही है। कोई ज़ोर से कुछ बोल भर दे तुरंत आंखों में आंसू चले आते हैं। ”

  मेहंदी की बात सुन रंगोली ज़रा सी रुआँसी हो गयी। बात तो सही थी। वो भले ही मेहंदी से दो साल बड़ी थी पर मेहंदी जैसी तेज़ तर्राट नही बन पाई थी।
   अपने विषय से इतर कुछ भी बोलने में उसे झिझक सी महसूस होती थी। पढ़ाई में अच्छी होने पर भी वाइवा में हमेशा पिछड़ जाया करती। कितनी भी अच्छी तैयारी हो वो सिर्फ लिख सकती थी,जवाब बोल कर बताना उसके लिए बहुत कठिन हो जाता था।
   अब तक तो चयन हो जाने की संतुष्टि में झूम रही थी लेकिन मेहंदी की बात ने उसे यथार्थ के धरातल पर पटक दिया था।
   वहाँ ढेर सारे सीनियर्स और टीचर्स के बीच वो कैसे और क्या करेगी।
  
  ” डरा क्यों रही है यार मेहंदी ? चल पैकिंग करवा मेरी। “

” मैं क्या पैकिंग करूँ। मम्मी तो ऐसा लग रहा है पूरा बाजार पैक कर चुकी हैं तेरे लिए। “

  मेहंदी की बात सुन सामान के पैकेट्स कमरे में लेकर जाती रंगोली की माँ उसकी तरफ पलट गई..

” मेहंदी बेटा! वहाँ से ज़रा वो बड़ा पैकेट भी इधर ले आना।।”

  सुबह से चल रही पैकिंग से परेशान मेहंदी ने पैकेट उठा कर पलंग पर पटका और अपना रैकेट उठाये बाहर निकल गयी, जाते जाते रंगोली के कान में एक और ज़हरीला तीर छोड़ गई….

” मम्मी का बस चले तो इस घर में चक्के लगा कर भेज दे तेरे साथ!”

” तुझे क्यों जलन हो रही है? दो साल बाद ऐसे ही तेरी भी पैकिंग होगी। समझी । “

” नही समझना मेरी माँ। ये सारा घरेलू सामान तुझे मुबारक। मैं दो साल बाद कॉलेज पढ़ने जाऊंगी, तेरे जैसे गृहस्थी बसाने नही। “

   अपने रैकेट को हवा में लहराती हंसती खिलखिलाती मेहंदी बाहर निकल गयी और रंगोली मुस्कुरा कर अपनी माँ से लिपट गयी…

” मम्मी हर सैटरडे मुझसे मिलने आ जाओगी न? मैं रह नही पाऊँगी आपके बिना!”



“हर शनिवार तो मुश्किल होगा बेटा लेकिन महीने में एक बार जरूर कोशिश करेंगे कि मैं ना भी आ पाऊं तो तेरे पापा को ही भेज दूं।”

  मुस्कुरा कर माँ बेटी दोनो ने अपने आंसू पोंछ लिए!

बड़े धूम धड़ाके से रंगोली की विदाई हो गयी। रंगोली को बात बात पर छेड़ने वाली उसकी छोटी बहन ही उस की विदाई पर उसके गले लग सबसे ज्यादा रोई और रंगोली अपने पापा के साथ पूरे  चार घंटों का लंबा सफर तय कर मायानगरी पहुंच गई…

   वहाँ रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह मेडिकल कॉलेज में उसके प्रवेश की सारी औपचारिकताएं पूरी कर उसके पिता ने उसके होस्टल आदि की व्यवस्था देखने के बाद उसका सामान उसके कमरे में रखवाया और उसे साथ ले बाहर शहर घूमने निकल गए। उनकी वापसी  रात की थी। इसी से बेटी को बाहर खिला पिला कर वापस कॉलेज कैम्पस में छोड़ वो बाहर निकल गए।
   रंगोली पापा के सीने से लगी बिलख उठी। उसे लगा ये मेडिकल सीट ये कॉलेज सब उसके ममी पापा के सामने बकवास है। वो क्यों चली आयी इससे अच्छा अपने ही शहर में कुछ पढ़ लेती। बी एस सी में भी तो आजकल कितनी सारी ग्लैमरस ब्रांच हो गईं हैं। माइक्रोबायोलॉजी है और …और… और उसे कुछ याद ही नही आया। उसकी आदत ही थी खुद में कुछ भी सोचते हुए खो जाने की। और अक्सर ऐसे खो कर वो बात की मुख्य जड़ ही भुला बैठती।
   उसके पापा ने उसके सर पर प्यार से हाथ फेरा और बाहर निकल गए। पापा का ऑटो आंखों से ओझल होने तक उन्हें बाय करती वहीं खड़ी रही फिर थके कदमों से अपने कैम्पस की ओर बढ़ गयी…

   अपने होस्टल पर पहुंच कर अपना कार्ड गार्ड भैया को दिखा कर वो सीढ़ियों की ओर धीमे कदमों से बढ़ी चली जा रही थी…

” बिटिया कोई ज़रूरत हो तो पूछ लेना हमसे। डरना बिल्कुल मत!”

  पीछे मुड़ कर एहसान भरी आंखों से उन्हें देख हाँ में सर हिलाती वो सीढियां चढ़ने लगी।
   फ़र्स्ट ईयर की लड़कियों के कमरे ऊपर ही थे , नीचे सीनियर्स के थे। डरना बिल्कुल मत ऐसा क्यों बोला उन्होंने ? कुछ देर सोच कर वो गर्दन को झटक कर ऊपर चढ़ती गयी। दूसरी मंजिल पर उसे कमरा मिला था।
   वो ऊपर जा रही थी कि सामने से उतरती दो लड़कियां टकरा गई…” फुजी है ? “
रंगोली चौन्क कर सामने देखने लगी…”जी ?”

” जी जी क्या बे? फुजी है तू? “

” फूजी मतलब ? “

” मतलब फर्स्ट ईयर जूनियर। “

” जी हाँ !”

” कौन सा कमरा अलॉट हुआ है?

” सत्रह नम्बर सी विंग में!”

  दोनो लड़कियां चौन्क कर एक दूसरे को देखने लगी…

” हद करती है यार ये हिटलर!मतलब क्या इस बार ग़दर मच गया कि हॉन्टेड रूम को भी लड़कियों को दे मारा।

“हम्म सुनने में तो आया है इस बार मैनेजमेंट कोटा से भीड़ आयी है…

” अरे तो इसका मतलब भुतहा कमरा भी उठा कर रहने दे दोगे। “

  दोनो लड़कियों की बातें सुनती रंगोली घबरा कर खड़ी रह गयी….

” सुन बहन कोई परेशानी हुई तो तुरंत कमरे से बाहर भाग निकलना। बस कुछ भी हो जाये उस कमरे की खिड़की से नीचे मत झांकना और ऊपर लगे फैन को मत देखना और हाँ सुन कान में रुई डाल कर पड़ी रहना जैसे कोई आवाज़ सुनाई नही दे रही हो। एक बात और सुन,अरे एक मिनट नाम क्या है तेरा? “

” जी रंगोली , रंगोली तिवारी। “

” ओहो बढ़िया है जेम्स बांड स्टाइल में नाम बता रही है। वैसे मेरा नाम वृंदा है और ये है भूमि। हम दोनों तेरी करंट सीनियर हैं। और हम एंटी रैगिंग वाले ग्रुप के हैं। किसी सीनियर ने सताया तुझे तो तुरंत हमारे पास आना। समझी?

हां में सर हिला कर रंगोली मुड़ कर जाने लगी…

“जा बेटा महादेव का नाम लेकर चुपचाप कान में रुई डाले सो जाना।”

  रंगोली पहले ही हद दर्जे की डरपोक थी। उसे रात में उठ कर वॉशरूम जाना हो तब भी वो मेहन्दी को उठा लेती थी। अब ऐसे में कमरे में अकेले रहना उसके लिए बहुत मुश्किल था। हालांकि कमरा एलॉट करते समय उसे होस्टल इंचार्ज सर ने कहा था कि कल से एक लड़की और उसके साथ आ जायेगी रहने। लेकिन आज की रात उसे अकेले ही रहना था।

   ताले में चाभी घुमाती  वो धीमे से अंदर घुस गई। कमरा छोटा ही था। दो अलग अलग दीवारों पर छोटी छोटी कैंप कॉट पड़ी थी, बिन चादर के गद्दे और और बिना लिहाफ के तकिए के साथ। उसी के एक ओर एक टेबल कुर्सी और लैम्प था, जिससे लग कर एक आलमारी खड़ी थी।
पहली नज़र में ऐसा डरावना नही था कमरा। सामान तो वो सुबह ही ऊपर भेज चुकी थी। गार्ड भैया के हाथ से। कमरे की चाबियां भी गार्ड के पास ही छोड़ दी थीं जो अभी उन्हीं से लेकर वापस आ रही थी।

   चाबी अंदर टेबल पर रख वो अपने बैग से टॉवेल और नाइट सूट निकाल कर नहाने वॉशरूम में घुस गई।
     बाल्टी में पानी लगा कर कपड़े टांगते वो वापस अपने खयालों में खो गयी थी। घर से निकलते समय उसकी सहेलियों ने उसे समझाया था, हॉस्टल के कमरे बाथरूम सब जगह कैमेरा चेक कर लेना। आजकल ज़माने का भरोसा नही रहा, उसी बात को याद कर वो बाथरूम में कैमेरा चेक करती रही कि बाल्टी के भरने की आवाज़ पर जैसे ही नल बंद करने उसने हाथ बढ़ाया चौन्क कर एक कदम पीछे हट गई। बाल्टी में पूरा लाल पानी भरा था,और वैसा ही खूनी पानी नल से आ रहा था।
   खून!!! उसके मुहँ से चीख निकल गयी, बड़ी मुश्किल से हाथ बढ़ा कर जैसे तैसे नल बंद कर वो बाहर भागी तो देखा पूरे कमरे में हल्का  धुंआ सा है… दोनो बेड पर सलीके से चादरें बिछी हैं और कमरे में किसी के गुनगुनाने की धीमी सी आवाज़ आ रही है पर नज़र कोई नही आ रहा…
    ” झूम झूम ढलती रात, लेके चली मुझे अपने साथ झूम झूम ढलती रात …”

  डर के मारे रंगोली की आत्मा शरीर छोड़ने को थी कि उसके दिमाग ने गोता खाया और उसे लगा ये सब रैगिंग का हिस्सा भी हो सकता है।
  वो धीमे कदमों से आगे बढ़ती एक बेड के पास रुकी जहाँ से गाने की आवाज़ें आ रही थी। ध्यान से देखने पर उसे लगा वहाँ क्विल्ट ओढ़े कोई लेटा है। उसने धीरे से चादर हटा दी और एक तेज़ चीख उसके मुहँ से निकल गई….

   सामने एक पूरा का पूरा कंकाल पड़ा था।

  उसकी चीख के साथ ही उस कमरे की बुझी हुई बत्तियां जल गई और एक साथ कई जोड़ी हंसती हुई आंखें उसके सामने चली आयीं।

” वेलकम वेल्कम रंगोली , रंगोली तिवारी उर्फ जेम्स बांड !

  बेहोश होने जा रही रंगोली जैसे होश में आ गयी.. उसने देखा सामने सीढ़ियों पर मिली उसकी करंट सीनियर्स खडी थीं वृंदा और भूमि मैंम। इनके अलावा वो किसी का चेहरा नही पहचानती थी।

   उसके माथे पर पसीने की बूंदे छलक आयीं, डर से गला सूख रहा था कि एक  लड़की पानी की बोतल लिए उस तक चली आयी…

” ले पानी पी ले। “

  कृतज्ञता से उसे देख रंगोली ने बोतल हाथ में ले ली, जाने कहाँ से दिमाग का फ्यूज बल्ब जल गया और उसने सीनियर्स से पानी पीने की परमिशन मांग ली…

” मैम क्या हम पानी पी सकतें हैं? “

” ज़रूर पियो, लेकिन हम में कौन कौन शामिल है भईया ? पूरा रामगढ़ साथ लिए घूमती हो क्या? “

” जी नही तो!”

“तो हम हम क्या लगा रखा है। सिंगुलर के लिए “मैं” यूज़ किया जाता है,नही मालूम क्या? ग्रामर भी सीखानी पड़ेगी ? “

” नो मैम!”

” तो आइंदा ये हीरोइनों वाली होशियारी मत मारना। चलो अब निकल लो तुम दोनों , जाओ सारे तीरथ कर आओ। फूटो अब यहाँ से। हम अपने कमरे में जा रहे। काम निपटा कर हमारे कमरे में आ जाना। समझीं !

” जी मैम ! ” रंगोली ने अपने साथ खड़ी लड़की की तरफ देखा , उसके आंखों के इशारे पर दोनों बाहर निकल गईं…

  कमरे से बाहर निकलते ही रंगोली ने चैन की सांस ली…

” बहुत घबरा गयीं थीं क्या?”

” हाँ फिर? कोई गधा ही होगा जो  ऐसे प्रैंक से नही घबराएगा ?

“मैं नही घबराई थी। मुझे समझ आ गया था ये प्रैंक है जो ज्यादातर मेडिकल कॉलेज होस्टल में किया ही जाता है। पहले सिर्फ बॉयज हॉस्टल में होता था अब गर्ल्स हॉस्टल में भी होने लगा है।”

” ओह्ह ! रियली?”

” यस!बाय द वे मेरा नाम झनक है, मैं तुम्हारी रूम मेट हूँ। “

” पर नीचे गार्ड भैया ने तो कहा कल आएगी रूममेट। “

” शायद कल कोई और भी आएगी। फिर उसके लिए भी बेड डल जाएगा । यहाँ वेल्कम करने का यही तरीका है।

” खतरनाक तरीका है यार। ऐसे हड्डियों वाला कंकाल दिखा कर कौन डराता है भला?”

” यार तू सच इतनी इनोसेंट है?  पागल लड़की वो कंकाल हमें गिफ्ट किया है वृंदा मैम और भूमि मैम ने, वो भी फ्री में।

” मतलब ?”

“मतलब फर्स्ट ईयर में एनाटॉमी पढ़नी पड़ती है ना जिसके लिए बोन सेट चाहिए होता है। वो इन दोनों ने हमें दे दिया।
  हॉस्टल में ऐसे ही होता है, आपके सीनियर्स आपको चुन लेते हैं उसके बाद आपकी जम के रैगिंग भी लेते हैं, अपने असाइनमेंट लिखवातें हैं और वक्त पड़ने पर आपकी मदद भी करतें हैं। मुझे लगता है तुझे कुछ नही पता। चल कोई नही मैं बताती जाऊंगी। तीन फ्लोर में सबसे ऊपर हम जूनीज़ और हमारे नीचे वाले में थर्ड एंड सेकंड ईयर और सबसे नीचे फायनल प्रोफ की मैम लोग रहतीं हैं।
  तीर्थ करना मतलब हमें हर किसी के रूम को नॉक करना है डोर खुलते ही चाइनीज़ लोगों की तरह हमें झुक कर उन्हें विश करना है वो भी तीन बार। फिर अगर सिमी ( सीनियर मैम) हमारा नाम पूछतें हैं तब अपना नाम बताना है और फिर से विश करके निकल जाना है। “

” ओह्ह ! तो ये हैं तीरथ ? “

” हाँ जी! ” किसी को सामने से आते देख झनक फटाफट रंगोली का हाथ पकड़ सामने वाली को झुक कर विश करने लगी। रंगोली भी उसकी देखादेखी वैसे ही कर के खड़ी हो गयी।

  सामने से गुजरती सीनियर ने बड़ी प्यारी सी मुस्कान दी और सीढियां चढ़ कर ऊपर चली गयी…

” कौन थी यार ये। बड़ी मीठी सी थीं? “

रंगोली के सवाल पर झनक मुस्कुरा उठी….

“हमारे कॉलेज की शान हैं ये। इनके जूनीज़ इन्हें ऐश्वर्या रॉय का टाइटल दे चुके हैं। देखा न तूने कितनी ज्यादा खूबसूरत हैं।
   जहाँ से निकल जाएं लोग इन्हें देखते रह जातें हैं। सब कहतें हैं इनके मरीज़ तो इन्हें देख कर ही ठीक हो जाएंगे। थर्ड ईयर में हैं  , इनका नाम है गौरी मैम।

” वाकई बहुत सुंदर हैं। मैं तो खुद उन्हें देख कर खो गयी। ”

” हम्म पढ़ने में भी अच्छी हैं। अगर फायनल ईयर में भी इनका रिज़ल्ट ऐसे ही आया तो हाउस सर्जन शिप पक्की है इनकी। देख लेना फर्स्ट अटेम्प्ट में ही पीजी क्लियर कर लेंगी। चल फटाफट , आगे बढ़े….

  दोनों भागती दौड़ती हर एक के कमरे पर नॉक कर विश करती अपने कमरे में लौट आईं….

” बाकी के हमारे साथ वाले कहाँ हैं? “

” सब आजू बाजू के कमरों में ही हैं। सुबह मिल लेंगे। चल अब फटाफट सोतें हैं, सुबह 7 बजे से एनाटॉमी की क्लास रहेगी। ”

  अपने बेड पर बिछे कंकाल को उठा कर रंगोली ने धीरे से एक तरफ रखा और एक बार गौर से अपने बिस्तर को देख लेट गयी…

” क्या हुआ डर तो नही लग रहा, की जिस बिस्तर पर अब तक कंकाल सोया था वहाँ सोना पड़ रहा है?

रिरियाती सी आवाज़ में नहीं बोल रंगोली ने अपनी चादर सर तक तान ली। अगली सुबह उसका कॉलेज का पहला दिन जो था….

  सुबह सवेरे भागती दौड़ती दोनों एनाटॉमी लैब पहुंच गई। पहला ही दिन था , कोई पढ़ाई लिखाई नही हुई। सभी विद्यार्थी आपस में एक दूसरे का परिचय पाते रहे…
   तभी कहीं पीछे से एक आवाज़ आयी  “गांव वालों तैयार रहना गब्बर की सेना कभी भी हमला बोल सकती है”

  रंगोली ने पीछे मुड़ कर आवाज़ को पहचानने की कोशिश शुरू की ही थी कि धड़धड़ाते हुए दस बारह लड़कों का एक जत्था लैब में घुसता चला आया। आते ही उन्होंने मुख्य दरवाज़े को बंद किया और क्लास के सामने खड़े हो गए।
   झनक ने रंगोली का हाथ खींच उसे नीचे देखने कहा और खुद भी सर झुका कर खड़ी हो गयी…

” थर्ड बटन हो जा रंगोली , यमदूतों की टोली आ गयी है। ये करंट सीनियर्स सर लोग है । हम इन्हें नही देख सकते लेकिन ये लोग अपनी आंखों से ही हमारा एक्स रे स्कैन सब कर लेंगे। “

धीमे से फुसफुसा कर झनक ने रंगोली के कान में कहा और वो दोनों भी बाकियों की तरह थर्ड बटन हो गईं।

  ” ओह हेलो ! क्या नाम है तुम्हारा? सेकंड रो में लेफ्ट से थर्ड ? “

  सब धीरे से इधर उधर देखने लगे। पर झुके सरों में देखना मुश्किल था तभी रंगोली को पीठ पर किसी ने पेन चुभाई और धीमी सी आवाज़ आयी ” तुम्हें ही बुला रहें हैं, जाओ आगे!”

  रंगोली अपनी जगह से थोड़ा आगे बढ़ गयी…

” इन के पीछे वाले सर आप भी आइये। ” उसी पेन वाले लड़के को जिसने रंगोली को आगे भेजा था भी बुला लिया गया। एक एक कर पांच छै लोगों जिनमें झनक भी शामिल थी को चुन कर सीनियर्स अपने साथ बाहर ले गए…

  “चलो बेटा एक एक कर अपना इंट्रो दो। ” सबके अपना परिचय देने के बाद सीनियर्स अपनी मस्ती में चले आये।
  मेडिकल कॉलेज गेट के ठीक बाहर बड़ा सा गार्डन था,वहीं सब ने महफ़िल जमाई थी।  कुछ सीनियर्स किनारे बनी रेलिंग पर पैर लटकाये बैठे थे तो कुछ जूनियर्स के चारों ओर घूम घूम कर उन्हें  घूरते हुए गाने गवा रहे थे…

” अबे सुनो जिसको गाना सुनाना है  तनिक चार कदम यहाँ सामने आ जाओ। “

रंगोली को छोड़ कर बाकी सारे चार कदम पीछे सरक गए, पर रंगोली को चुपचाप अपनी जगह खड़ा देख वही लड़का वापस चार कदम आगे बढ़ गया…

” क्या बात है फुज़े ! पहले ही दिन सेटिंग। जय हो!!
     अब बेटा सामने आ ही गए हो तो हमारी शान में ज़रा कुछ सुना दो !”

” सर गाना सुनाऊं?”

” हाँ बेटा गाना ही अच्छा लगेगा अब मेरे ऊपर निबंध सुनाएगा तो ये लोग तुझे ज़िंदा नही छोड़ेंगे न। चल शुरू हो जा, पर होना मेरे लिए चाहिए…

  कुछ देर सोचने के बाद उसने गाना शुरू कर दिया…

  “नफ़रत से देखना पहले अंदाज प्यार का है ये
   कुछ है आँखों का रिश्ता गुस्सा इकरार का है ये 
   बड़ा प्यारा है तेरा जुल्म , सनम तेरी कसम…
   कितने भी तू कर ले सितम हँस हँस के सहेंगे हम
    ये प्यार ना होगा कम, सनम तेरी कसम…”

” बस बस बेटा , गज़ब खुश कर दिए तुम तो। माहौल बना दिये यार,अब तो एकदम रोमैंटिक मूड बन गया है। अब कुछ यहाँ शादी ब्याह हो जाये बस, पिंक सूट वाली मैडम ज़रा अब आप आगे आइये…

  घबराती हुई रंगोली दो कदम आगे बढ़ गईं….

” यहाँ जो लड़का पसंद आ रहा है उसे आपको शादी के लिए प्रोपोज़ करना है। अगर तुम्हारे कहने पर उसने पलट कर ये कह दिया कि वो तुमसे शादी के लिए तैयार है तो मैं अभिराज सिंह तुम्हारा करंट सीनियर शपथ लेता हूँ कि पूरा साल तुम्हारी रैगिंग नही करूँगा। “

खुशी से रंगोली के चेहरे पर मुस्कान चली आयी… पर उसे झनक ने बताया था कि सीनियर्स के सामने बत्तीसी किसी हाल में मत दिखाना वरना कमीने कहर तोड़ने से बाज नही आएंगे।
  अपनी खुशी अपने अंदर संभालती रंगोली ने हाँ में सर हिला दिया…

” तो वेट किसका है? जस्ट गो एंड प्रोपोज़ योर ड्रीमबॉय!”

काहे का ड्रीमबॉय रंगोली को तो बस ये रोज़ रोज़ के तमाशे से छुटकारे का रास्ता मिल गया था। उसने धीमे से नज़रे उठायी, उनसे ज़रा दूर लड़कों का एक झुंड खड़ा था,वो उसी तरफ तेज़ी से बढ़ गयी।
       ग्रे शर्ट पहने उस लड़के की न रंगोली ने कभी पहले शक्ल देखी थी न उस लड़के ने रंगोंली को देखा था।
   उसे एक झटके से अपनी तरफ घुमा कर जो दिमाग में आया उल्टा पुलटा बोल कर वो वापस भाग गई। उस लड़के ने भी वही जवाब दे दिया था जो रंगोली को चाहिए था, वो वापस भागती सी अपने ग्रुप के पास पहुंच गई…

” आई एम इम्प्रेस्ड डॉक … क्या नाम बताया था अपना?

” सर रंगोली , रंगोली तिवारी !”

“तिवारी जी… ओके गुड लक। आज के लिए बहुत हो गया, अब निकलो सब के सब। वरना फिजियो की पहली क्लास मिस हो जाएगी।
   लीला पांडेय के कहर से बचना मुश्किल ही नही नामुमकिन है।

   सीनियर्स की आज्ञा मिलते ही सारे जूनियर अंदर की तरफ भाग चले।
    वही क्लास जो सुबह रंगोली को बड़ी मनहूस लगी थी , अब सुकून और शांति का ठिकाना लग रही थी।
  क्लास में पहुंचतें ही अपनी बेंच पर बैठते ही उसने राहत की सान्स ली कि अचानक उसे वो पेन वाला लड़का याद आ गया।
   कौन था वो ,जो बेचारा पहले दिन ही मदद के चक्कर में खुद फंस गया।

  उसने अपने पीछे मुड़ कर देखा। कोई एक लड़का नही पीछे बंदरों सी पूरी फौज थी। सीनियर्स के सामने विनम्रता और शिष्टाचार की मूर्ति बने खड़े लड़के अब अपने असली रंग में उन्हीं सीनियर्स को गालियों से नवाज़ते उनके नए नए नाम रख रहें थे…..
    उन्हें  देखती मुस्कुराती रंगोली सामने मुड़ गयी। कल झनक से पूछ लुंगी, सोच रही थी कि झनक उसके पास आकर खड़ी हो गयी…
   चल फिजियोलॉजी लैब में चलना है अब!”

  हां में सर हिलाती रंगोली झनक के साथ बाकी क्लास के पीछे लैब की तरफ बढ़ गयी…..


क्रमशः …..




दिल से…


   मायानगरी का भाग आने में ज़रा देर हो गयी, कारण ये था कि मुझे लगा मालूम नही ये कहानी आप लोगों को पसन्द आएगी भी या नही। क्योंकि अधिकतर प्रेम कहानियों में कॉलेज वाला एंगल कॉमन ही होता है। अगर किसी भी आदरणीय लेखक की किसी कहानी से मेरी कहानी का कोई हिस्सा मिलता सा लगे तो ये एक इत्तेफाक ही है।

  तो कहीं ये भी कॉमन सी न लगे….

  एक और बात आप में से बहुतों को लग रहा ये मेरी कहानी है, तो उसके लिए मैं ये कहना चाहूंगी कि ये मेरी कहानी बिल्कुल भी नही है।
    हां कहानी में कुछ मेरे कॉलेज के वहाँ की पढ़ाई के, रैगिंग , पार्टिस , कलचरल्स के अनुभव शामिल हो सकतें हैं लेकिन कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है।

   कहानी में ढेर सारे किरदार होंगे जिनमें से मुख्य किरदारों के आसपास घूमती कहानी से बाकियों की कहानियां जुड़ती चली जाएंगी। बाकी बातें आप लोगों को आगे के भागों में पढ़ने मिल ही जाएगी।

  मुझे पढ़ते रहने के लिए आप सभी का दिल से आभार व्यक्त करती हूँ।
   हार्दिक धन्यवाद !!!!

aparna …..


   

Advertisements
Advertisements

जीवनसंगिनी

     आज आंसू हैं की रुकने का नाम ही नही ले रहे,पर उन्हें आंखों मे रोके रहना मजबूरी है,बहुत नज़ाकत से हल्के हाथों से ही टिशू से आँखो की कोर पोंछ रही हूँ ।
     “मानसी no dear ,plz don’t spoil,..पूरा मेकप खराब हो जायेगा।”
   मेरी ब्युटिशियन ,मेरी सखियाँ,सभी समझा रही मुझे,की अपनी शादी के दिन ऐसे कौन रोता है भला।

तभी नीचे से बुलावा आ गया,जयमाला के लिये,मुझे मेरी सखियाँ,बहनें नीचे ले चली।
जयमाला हुई,फेरे फिरे और मेरी मांग मे अनुराग ने सिन्दूर भर दिया।

दुल्हने सतरंगी अरमान लिये जातीं हैं,मैं राहुल की यादों की पोटली लिये ससुराल चली।

शादी के दूसरे दिन सत्यनारायण पूजन मे एक बार फिर गठजोड़ कर के हमे साथ बैठाया गया,तब भी अपने जीवन संगी को अच्छे से देख नही पायी।

फिर घूमने फिरने हमे ऊटी भेजा गया,पहली बार फ्लाइट में इन्हें भर आँख मैने देखा,इनमे ऐसा क्या दिखा मेरे पिता को ,वही ढूंडने की कोशिश करती रही। कहाँ उनकी चम्पा चमेली सी लड़की और कहाँ ये खडूस। समझ आ गया बाबा को सिर्फ लड़के की कलक्टरी ने ही रिझाया था।

   कितने मनोयोग से बी एस सी प्रथम वर्ष मे प्रवेश लिया था,वहाँ पहुचते ही सीनियर की रैगिन्ग का शिकार होना पड़ा,उफ्फ एक गाना ना गा पाने के कारण ही राधिका मैम ने बहुत ज़ोर की लताड़ लगायी,पर तभी किसी की गहरी आवाज कानों मे पड़ी।
“अरे राधा ,उन मोहतरमा को मत परेशान करो भाई,देख नही रही,कितना घबरा गयी है, जाईये जाईये आप अपनी क्लास मे जाईये।”
जान बचा कर जो भागी मैं,पर जाते जाते अपने उस मसीहा को देख लिया मैने ,राहुल!
 
             अन्तिम वर्ष का होनहार छात्र,जितना होशियार उतना ही मनोहारी,गोरा, लम्बा चौड़ा,ऐसे जैसे फिल्मी हीरो ।
   
                 उसके बाद हमारी दोस्ती हो गयी,जो जल्दी ही प्यार मे बदल गयी,सभी सहेलियां राहुल के नाम से छेड़ती ,ऐसा लगता जीवन सफल हो गया मेरा।
  साथ साथ समय बहता गया ,मैं अन्तिम वर्ष मे आ गयी, राहुल एम एस सी करने लगा।मैं  शादी चाहती थी पर राहुल कैरिअर ,सही भी तो था।मै रुकने को तैयार भी थी पर जाने कहाँ से दुर्भाग्य ने जीवन मे दस्तक दे दी।

    मेरी फुफी की बेटी की शादी मे अनुराग की माताजी ने मुझे देखा ,परिवार के बारे मे पता किया और झट रिश्ता भेज दिया।
   बाबा तो फुले नही समाए ,इतने बड़े घर का लड़का वो भी प्रथम प्रयास मे बना कलेक्टर,उनकी नज़र मे तो उनकी पुत्री का सौभाग्य द्वार खुल रहा था।

      ऊटी से लौटने के बाद हम अनुराग की नौकरी वाले शहर मे आ गये,प्रथम नियुक्ति थी इसीसे एक छोटा सा कस्बा ही था,वहाँ भी सारे प्रशासनिक अधिकारियों की एक अलग कॉलोनी थी।

   हमारा जीवन भी चल निकला,बाकी दम्पतियों की तरह,शान्त और सुगम।
   मैने अनुराग से कभी कोई शिकायत नही की ना उन्हें मौका दिया,पर ये आदमी कभी मेरे हृदय मे जगह नही बना पाया।
   
    एक दिन अचानक फोन बजा”हेलो ! मनु मै बोल रहा हूँ राहुल।”
“यार तुमने अपना मोबाईल नंबर भी बदल दिया,हद करती हो,ये भी नही सोचा मेरा क्या होगा?”
“हेलो राहुल,कैसे हो तुम?”
“मै ठीक हूँ,अभी ये बताओ ,तुम हो कहाँ ।मै मिलने आना चहता हूँ ।मिलोगी ना,या शादी हो गयी तो भूल गयी हमे।”
“हां,मिलूंगी। बाद मे बात करती हूँ,अभी दरवाज़े पे कोई है।”
  
  बहाने से फोन काट दिया ,दिल की धडकने इतनी तेज हो गयी की सच मे दरवाजे की आवाज कानो मे नही पड़ी।

    फिर जाने अनजाने राहुल से बाते शुरु हो गयी,छोटे मोटे संदेशों का आदान प्रदान ,फोटो की अदला बदली ,जीवन फिर सुखमय होने लगा।

    एक दिन ऐसे ही राहुल मे खोयी सब्जी काट रही थी,उंगली कट गयी।खुद ही अल्हड़ सी पट्टी  बांध ली।अनुराग ने नाश्ते के बीच पुछा भी “ये क्या लग गया मानसी।”
                   उफ्फ इस आदमी को बात भी तो करना नही आता,कौन आदमी होगा संसार मे जो अपनी रूपसी पत्नी से ऐसे बोलता होगा,मानसी ! अरे मानू बोल लो,मनु बोलो,मोना बोलो पर नही मानसी !
   मैने भी उतनी ही रुखाई से जवाब दिया-“कुछ नही प्याज काटते मे कट गया।”
    इन्होने नाश्ता खतम किया और औफिस चले गये।
    ऐसी आग लगी की क्या कहूँ,मै भी द्वार भिड़ा कर राहुल को संदेश भेजने मे व्यस्त हो गयी।राहुल को इनकी सारी करनी बताती हूँ ।
 
               मुझे अचंभित करते हुए अनुराग दोपहर अचानक घर चले आये,अपना टिफिन डब्बा भी साथ लाये थे। आते ही बोले”मानसी जल्दी तैयार हो जाओ ,मै रास्ता देख रहा हूँ ।”
               “कहाँ जाना है।”पर मेरा सवाल हवा मे ही खो गया,इनका अर्दली इनके सामने मुझसे कही ज्यादा ज़रूरी फाइल खोल चुका था,और ये उसमे डूब चुके थे।
                   मै अन्दर गयी ,मुझे 10मिनट भी नही बीते की इनकी आवाज आयी,”हो गयी तैयार।”।
                     हे ईश्वर क्या करुँ इस आदमी का,इस संसार मे कौन ऐसी स्त्री होगी जो सिर्फ 10मिनट मे तैयार हो जाये।अभी तो मै अपनी आलमारी खोले यही देख रही थी की क्या पहनूँ ।तभी जिलाधीश महोदय फिर गरजे ” मानसी तुम्हे वापस घर छोड़ मुझे टी एल मीटिंग के लिये जाना।जल्दी कर लो।”
    
               लगा आलमारी के दरवाजे पे अपना सर फोड लूँ ।  जैसे तैसे 15मिनट मे तैयार होके बाहर आयी,हमेशा की तरह इन्होने देखना भी ज़रूरी नही समझा ।हम कार मे बैठे चल दिये।
                               कॉलोनी मे ही एक छोटा सा अस्पताल था,गाड़ी वहाँ जाकर रुकी।
                     मै जब तक अपनी गुलाबी सितारों वाली साड़ी  का आंचल बचाती उतरी ये लपक के काऊंटर पर पहुच्ं के कुछ फॉर्म जैसा भरने लगे।
                     उफ्फ अगर किसी मरीज को ही देखने आना था तो एक बार बता ही देते ,मै इतनी गहरी लाल लिपस्टिक तो ना लगाती,मुझे तो लगा कही बाहर लंच पे लेके जा रहे।
                      ये पर्ची लिये एक कमरे मे दाखिल हुए,पीछे मै भी।वहाँ बैठी डॉक्टरनी ने पूछा -“अरे आईये कलेक्टर साहब ,क्या तकलीफ हो गयी आपको।”
   “जी मुझे नही ,इन्हे” “असल मे सुबह इनकी उंगली कट गयी।”
“ओहो वाह is she your wife..she is quite a mouth full “
उस सात्विकी साऊथ कॉटन साड़ी धारिणी के सामने मेरी रेशमी साडी मुझे डंक मारने लगी।
    क्या सोच रहे होंगे सब , टी टी इन्जेक्शन लगवाने   कौन इतना सज के आता है।

   हम घर पहुचें,अनुराग उस दिन बिना खाए ही चले गये,मीटिंग का समय हो गया था।आज की कोई भी बात राहुल को नही बता पायी।

       एक दोपहर माँ का फ़ोन आया”मनु जल्दी आ जा बेटा,तेरे पापा को अस्थमा का दौरा पड़ा है,भर्ती कराना पड़ा ।”
       घबरा कर तुरंत अनुराग को फ़ोन मिलाया पर इनका नंबर व्यस्त आ रहा था,मै जल्दी जल्दी सामान रखने लगी ।  10मिनट बीते की ये दरवाजे पे खड़े थे,”मानसी जल्दी करो”।
    मुझे अच्छा लगा की ये मुझे मायके भेजने तैय्यार हो गये,सामान लेके बाहर आई,तो इनके अर्दली सारा सामान इनकी गाड़ी मे रखने लगे। मै बैठी,और ये भी,मैने इनकी तरफ सवालिया नजरों से देखा “ट्रेन की टिकट नही मिली मानसी,हम दोनो कार से ही चलेंगे।तुम्हे फ़ोन करने के बाद छोटु ने मुझे भी फ़ोन कर दिया था।”
      पहली बार जीवन मे इनके गले से लगने का बहुत मन किया ,पर मैनें खुद को संभाल लिया।
      वहाँ जाकर तो ये मेरे मायके मे ऐसे घुल मिल गये जैसे ये ही उनके बेटे हैं,मै कुछ नही,सारी भाग दौड की और 2ही दिन मे बाबा की छुट्टी करा के हम घर ले आये।
      शाम को माँ मेरी बिदाई की तैय्यारी मे लगी थी “क्या माँ इतना सारा कुछ देने की क्या ज़रूरत,अभी  बाबा के मे भी कितना रुपया खर्च हुआ होगा,रहने दो ना।”
     “कहाँ कुछ खर्च हुआ लाली,सारा बिल तो जमाई जी ने भर दिया,हमे तो देखने तक नही दिया,छोटु ने जबर्दस्ती छीन के देखा 75000का बिल था।”
     “सच बहुत पुण्य किये है लाड़ो तूने,जो ऐसा पति मिला।” उस रात हम वापस आ गये।

      कुछ दिन बाद करवा चौथ का व्रत पड़ा, भारतीय औरतें भले अपने पति से प्यार ना करे पर पति के लिये रखे जाने वाले व्रत उपवासों से उन्हें बहुत प्रेम होता है,मै भी बहुत चहक के करवा चौथ की तैयारियाँ करने लगी।
                         पर करवा चौथ वाले दिन सुबह ही ज़ोर का सर दर्द चढ़ गया,जब तक नहा धो के आई ,ये नाश्ता करके निकलने की तैयारी मे थे,मेरा सूखा  मुह देख के पूछा “क्या हुआ तबियत ठीक नही क्या।”
जवाब मैने नही कामवालि रधिया ने दिया”आज बहुजी का व्रत है साहब ,करवा चौथ।”
               “अच्छा कुछ जूस वूस ही ले लो,तीरथ को भेज के फल वगैरा मंगा लेना।”
       मंगा लेना ,मेरा सर ,कितना रूखा आदमी है ये।
“अरे जूस कहाँ पियेंगी साब ,आज तो बहु जी निर्जला व्रत किये हैं,शाम को चांद की पूजा कर आपके हाथ से ही पियेंगी।”
     पता नही सुने या नही ,चले गये।    मै भी आराम से सोफे पे पसर गयी और राहुल से वाट्स अप पे बात करने लगी।

        राहुल मुझे देखने को कितना उत्सुक रहता था,उसके कारण हर 2दिन बाद डी पी बदलना पड़ता था,लेकिन उसकी एक बात मुझे पसंद नही आती थी,उसका अनुराग की बुराई करना।
    
                   आज भी राहुल इधर उधर की ढेरों बाते बता रहा था,अचानक उसने कुछ ऐसा कहा की मन खट्टा सा होने लगा।
     वो मेरे शहर आके कुछ दिन रुकना चहता था,किसी होटल मे,जहां हम आराम से मिल सके ।
  “मिलने की क्या ज़रूरत है राहुल,दिन भर तो बातें करतें हैं हम।”
   “ज़रूरत है मनु,सिर्फ बातें ही तो सब कुछ नही होती ना।””तुम समझ तो रही हो ना ,मै क्या कह रहा।”
   “मै अच्छे से जानता हूँ,तुम्हारे खडूस पति को,घमंडी है बहुत,सोचता क्या है,कलेक्टर बन गया तो सब उसके गुलाम है।इतनी सुन्दर बीवी को भी नौकर बना रखा है।”
                            “नही राहुल ऐसी तो कोई बात नही,अनुराग ने कभी मुझे कुछ भी करने को विवश नही किया।”
“अरे तो इसका क्या मतलब ,कभी उसने तुम्हारी तारीफ की क्या।”
“नही तारीफ तो नही की,पर बुराई भी तो नही निकाली।बल्कि जब उस दिन उस डॉक्टर ने मेरी तारीफ की तो अनुराग ऐसे लजा गये की मुझे भी हंसी आ गयी।”
                    “क्या बात है मैडम ,आज बड़ा प्यार उमड रहा ऐसे तो बड़ी बुराईयां निकालती हो।”
                               “अच्छा खैर वो सब छोड़ो,सच बताओ ,तुम मिलोगी या नही,,अगर तुम्हारा इससे आगे जाने का इरादा नही है तो कल से ये गप्पे मारना भी बन्द करो यार,बोर कर दिया है तुमने अपना अनुराग पुराण सुना सुना के”।

   कान मे जैसे सीसा पिघल गया,कैसा आदमी था ये राहुल ,कभी तो मै इसकी जान हुआ करती थी,घण्टों मेरी बातें सुनता था,और आज 3ही महिनों मे मै बोर हो गयी। ईश्वर तेरी माया,क्या पुरूषों को बस यही चाहिये।

   फ़ोन बन्द कर मैने आंखे बन्द कर ली,कुछ अच्छा सोचने का मन कर रहा था,पर ये क्या बन्द आंखों मे बार बार अनुराग क्यों चला आ रहा था।

   शाम को कॉलोनी मे एक साथ सभी की पूजन व्यवस्था की गयी थी,मै भी शादी का जोड़ा पहन तैयार हो गयी।
                    आईने मे खुद को देखती ही रह गयी।इतना सुन्दर भी कोई हो सकता है,अपने मे खोयी मुस्कुरा रही थी तभी कमरे के कोने मे मेरे पीछे खड़े अनुराग पे नज़र पड़ी,वो भी मुझे मुग्ध दृष्टी से देख रहे थे ,मुझसे नजरें मिलते ही तुरंत ही अपनी नज़र हटाये हाथ मुह धोने चल दिये।
               और  मैं अपने इस विजय पर्व पर इठलाती बाहर चली आई।रसोई मे रधिया रात के खाने की तैयारी कर रही थी,कढी मैने बना कर रख दी थी,वो पूरिया निकाल रही थी,बोली “बहु जी आज साहब का डिब्बा ऐसे ही आ गया,साहब तो खाना खाए ही नही।”
    अब इस आदमी के लिये उतना रूखापन नही था मन मे ,पर इस निष्ठुर पे पूरी तरह भरोसा भी नही था,की ये आदमी मेरे लिये भोजन त्याग सकता है।

     ये कुर्ता पहने तैयार हो आये,मैरून कुर्ती मे अच्छे लग रहे थे।हम नीचे गये और पूजा निपटा ली।जान बूझ कर तो ये इंसान कर ही नही सकता अनजाने ही हुआ होगा,इन्होनें भी वही रंग पहना जिस रंग की मेरी साडी थी । हम दोनों ने एक से रंग के कपड़े पहने थे,जिसके कारण नीचे सभी हमे छेड़ते रहे।

     मेरी उस दिन के बाद राहुल से  बात चीत काफी कम हो गयी और अब मै पहले से अधिक सावधान थी,सिर्फ हल्की फुल्की बातें ही करती,ज्यादा भावुकता से बचने लगी थी।
    एक दिन इनकी आलमारी जमा रही थी की ऊपर के आले से एक तस्वीर और एक चिट्ठी गिरी ।
तस्वीर निहायत ही खूबसूरत सी एक लड़की की थी,नाम लिखा था लालिमा,वो सच लालिमा ही थी,साथ मे जो चिट्ठी थी उसे मैने पढ्ना शुरु किया।
” माननीय
       आपके घर पर मैनें मेरी बहन के लिये रिश्ते का प्रस्ताव भेजा था,पर आपकी माताजी को कोई और लड़की भा गयी है,हमने उसका सारा कच्चा चिठ्ठा निकाला,उसका उसके ही कॉलेज के किसी लड़के के साथ संबंध है,सुनने मे आया की लड़की भागने को भी तैय्यार थी,वो तो लड़का संस्कारी निकला।
  आपके घर से हमे खोटे सिक्के सा फिरा दिया गया,मैं नही जानता की वो लोग ऐसा क्या दे रहे जिसका लालच आपके घर वालों पे हावी है,पर हम आपको 30 लाख रुपये और बाकी सारा सामान देना चाहतें हैं जब ये प्रस्ताव आपके पिता के सामने रखा तो उन्होने मुझे बाहर का रास्ता दिखा दिया। आजकल के लड़के खुद समझदार हैं स्वयं अपना निर्णय लेने मे सक्षम हैं इसीसे ये पत्र भेज रहाँ हूँ,साथ ही फोटो भी है,पसंद आये तो आप हमे  फ़ोन कर लीजियेगा।
         आपका धरनीधर।”

  मेरा सर घूम गया,कुछ नही सूझा क्या करुँ,मै जाने कब तक वैसे ही बैठी रही,अनुराग कब आये,पता ही नही चला,वो आये ,मेरे हाथ से चिट्ठी ली और फाड़ के फेक दी।
  
                  मैनें आँख उठा कर इन्हे देखा और ज़ोर से रो पड़ी।ये घबरा गये पर वही बैठ कर मुझे सांत्वना देते रहे।

                  “आपने एक बार भी मुझसे कुछ नही पुछा,आप खुद को समझते क्या हैं।क्यों की आपने मुझसे शादी,आज आपको मुझे सब सच बताना ही पड़ेगा।”
               “अरे मानसी क्या बताऊँ ।मैने किसी ज़ोर जबर्दस्ती मे शादी नही की।”देखो जब से नौकरी लगी ,घर पे विवाह प्रस्तावों की बाढ़ सी आ गयी।मै शुरु से ही पढाई मे लगा रहा,कभी जीवन मे कोई लड़की नही आई,माँ से कह रखा था,उनकी पसंद ही मेरी पसंद।”   
       “तो आपको उस चिट्ठी पे विश्वास नही हुआ,की मेरा मेरे कॉलेज मे कुछ…”
           “तुम पागल हो क्या,अरे इस तरह की चिट्ठी पे कौन पुरुष विश्वास करेगा और जो इस पे विश्वास करे उससे बढ़ के मूर्ख मेरी नज़र मे कोई नही।”
      “पर सोचो अनुराग ,अगर ये बात सच होती तो।”
          “तो क्या ,मुझे तो शादी के 5महिनों मे ऐसी कोई कमी मेरी बीवी मे नज़र नही आई, रही बात तुम्हारे पास्ट की ,तो वो हर किसी का एक खुबसूरत पास्ट होता है,पर सच्चा इंसान वही है ,जो सच्चाई से ईमानदारी से अपने जीवन की धारा मे बहता जाये।”
            “हाँ बात वहाँ गलत हो जाती,जब मै या तुम अनिच्छा से इस बन्धन मे बन्धे होते और दुनिया वालों के लिये इस रिश्ते को खीचते चलते,वो मेरी नज़र मे पाप होता,ऐसा कुछ अगर तुम मुझे बताती तो मै दूसरे ही दिन तुम्हे खुद उसके पास पहुँचा देता जिससे तुम असल मे प्यार करती होती।”

     “और हाँ,एक बात और हर इंसान अपने आप मे सम्पूर्ण नही होता,अगर तुम मे कुछ कमियाँ हैं तो मैं तो कमियों की खान हूँ,अगर तुमने मुझे 5 महिने झेल लिया तो पूरा जीवन झेल ही लोगी।”
                “देखो मानसी बहुत लच्छेदार बातें मै नही जानता,मुझे कविताए ना पढना आता ,ना लिखना ,मै एक साधारण सा आदमी हूँ जो अपने परिवार से अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता है,पर मुझसे ये उम्म्मीद ना करना की मै रोज तुम्हारी तारीफ करुँ ।”
               “पर मुझे तो पसंद हैं कवितायेँ “मैं मुस्कुरा उठी,  कितना सरल जीवन परिचय मुझे समझा गये अनुराग,सच तो है जीवन कोई फिल्म नही ,यथार्थ है और यहां मेरे अनुराग जैसे हीरो की ही ज़रूरत है।

   मैं मुस्कुराते हुए रसोई मे चाय चढ़ाने चली गयी,चाय बनाते बनाते ही राहुल को सारा किस्सा कह सुनाया और ये भी बता दिया की वो अब मेरा सिर्फ अच्छा दोस्त है,उससे ज्यादा की मुझसे कोई उम्मीद ना रखे।

    अब मैं अपने रूखे सूखे पति को कैसे अपनी पत्नी को खुश रखना है,कैसे बात करना है,ये सब सब समय समय पे सिखाती रहती हूँ,रोज डे पे मै ही  गुलाब देती हूँ,चॉकलेट डे पे चॉकलेट और वैलेन्टाइन डे पे उन्हे डिनर पे भी ले जाना मेरा ही काम है,,
      हाँ मेरा नीरस कलेक्टर इन सब मौको पे अपना अमुल्य समय मुझे दे देता है,और मेरी इन सब कारगुजरियों पे शरमा के गुलाबी भी हो जाता है,लेकिन आज भी खुल के I love u नही बोल पाता और मै जानती हूं कभी बोल भी नही पायेगा।

इति।

अनकही…

        अनकही….
पिया बसंती रे ….

        तेज़ कदमों से जल्दी जल्दी स्कूल की ओर भागती गौरी और अनिता के कदम स्कूल के बड़े घंटे को सुन और तेज़ हो जाया करते।
   दोनो अहल्याबाई शासकीय कन्या विद्यालय में बारहवीं कक्षा की विद्यार्थी थी,दोनो ने होम साइंस लिया था।
     उनके गांव में स्कूल ना होने से पास के गांव दोनों पैदल पैदल ही जाया करती थी।।अब कुछ समय से डिपो की बस चलने से कुछ राहत मिल गयी थी…
  उनके और आस पास के गांव के लड़कों लड़कियों के लिए राहत थी परिवहन की खटारी बस।

       इधर कुछ दिनों से एक लड़का अक्सर आकर उसके पीछे की ही सीट पर बैठने लगा था। इस बात पर भी उसका खुद का ध्यान कहाँ गया था, वो तो अनिता ही थी जिसके पास एक छठी इंद्री थी जो आसपास के किस लड़के के दिमाग में क्या चल रहा है का ज्ञान उसे दे जाया करती थी।

    ” वो रजुआ है ना चिल्पी के पान ठेले वाला?”

  ” हाँ क्या हुआ उसे ?”

  ” सिलाई इस्कूल वाली सरिता है ना उसको चिट्ठी फेंक के मारा रहा।”

  ” हाय सच्ची!”

  ” हाँ तो और क्या! सरिता के भैया ने क्या चप्पल से आरती उतारी थी जो रजुआ की ! क्या बताएं?”

     दोनो सखियां ऐसी ही रसभरी बातों में अपने गांव से स्कूल की दूरी तय कर जाया करतीं…..

        सत्रह अट्ठारह की उम्र वैसे भी वो उम्र है जिसमें सारा संसार सुंदर दिखने लगता है , हर मौसम बसंत हो जाता है और हर लड़की टेसू का फूल बन खिल उठती है,  हर लड़का भँवरा बन मंडराने लगता है…

  ” ये कौन है जो रोज़ तेरे पीछे आ बैठता है?

   ” हमें क्या पता?

  ” हम्म! हमें इसकी नीयत सहीं नही लगती, पहले हुँआ सामने बैठ जाता था वहाँ से तुम्हें घूरे रहता था, अब देखो हिम्मत कैसी बढ़ गयी है, सिद्धा पीछे ही आ बैठा। लफ़ंडर कहीं का!”

  गौरी अनिता की बात सुन सिहर उठी, उसका भी कुछ कुछ ध्यान तो गया था लेकिन उसने जानबूझ कर इस तरफ ध्यान देना उचित नही समझा था….
    उसे रह रह के अम्मा का गरियाना याद आ जाता…

  ” बिटियन के बिहाव करने की जगह उनका इस्कूल भेज रहें हैं ! कहाँ की कलक्टरनी बनवाएंगे इसे हैं? हमको तो आपका मूढ़ मति समझे में नही आता, पिछली बार दिद्दा कितना नीक रिस्ता लायी रही, बड़ी मनिहार की दुकान थी लड़के के बाप का लेकिन एक ये हैं कान मा जूँ नही रेंगी। अब उ कामता परसाद के यहाँ तो जाइये बात उत कर आइये नही ये रिसता भी हाथ से फिसल जाएगा। इक्के एक लड़का है उनका, सहर जाता है पढ़ने, देखने सुनने में बहुतै सुंदर है लछिमी कह रही थी।”

   आंखों में चश्मा चढ़ाये उसके बापू बहुत बार अम्मा की चीं चीं सुन के अनसुना कर जाते और बिना मतलब ही बही खाता का किया कराया हिसाब किताब जांचते बैठे रहते।
    बड़ी मुश्किल से जिद करके उसे पढ़ने जाने मिला था , वो भी बारहवीं के बाद उसका बिहाव हो ही जाना था…
    
       वो रोज़ ही स्कूल आना जाना करती लेकिन अब उसका ध्यान उस लफ़ंडर पर भी जाने लगा था। उसने खुद ने कई बार उसे अपनी तरफ ताकते पाया था लेकिन जब भी वो उसे देखती वो बस से बाहर देखने लगता ।
   उसकी नज़रों से बचने ही गौरी बस की खिड़की वाली सीट पर बैठने लगी, लेकिन अब तो तिर्यक कोण बना कर वो उसे और भी आसानी से देख पा रहा था।

   ” बहुतै गाली गलौच करता है उ।”

  ” उ कौन अन्नी?”

  ” अरे वही लंगूर जो तुम्हें ताकता रहता है, जबान बहुतै गंदी है , लबार है लबार । उस दिन संझा में हम अम्मा के साथ मंदिर गए थे वहीं बाहर जब हम मंदिर से निकले चप्पल पहन रहे थे तब वहीं बच्चों से काहे भीख मंगवा रहे कर के एक आदमी को लात ही लात मारता रहा खबीस ! “

   ” हाय राम ! ये हाथ पैर भी चलाता है?”

   ” हाँ तो और क्या! हाथ पैर के साथ जबान भी चला रहा था, अब बेचारे गरीब बच्चे भीख ना मांगे तो क्या खाएं भला।”

  ” छि कित्ता गंदा आदमी है?”

   ” और बताएं हमें तो लगता है कट्टा अट्टा लेके घूमता है साथ में । और हम तो इसे  धुआँ उड़ाते  भी देखे हैं।
    अब इस बात पर गौरी क्या कहती वो खुद लाल बाजार में अपनी माँ के साथ चूड़ी खरीदते समय उसे सिगरेट फूंकते देख चुकी थी। ये और बात थी कि उस पर नज़र पड़ते ही उसने अपने हाथ की सिगरेट फेंक कर हाथों से ही मुहँ के सामने छाया धुंआ हटाने की नाकाम सी कोशिश भी की थी।

   एक लड़के से ख़ौफ़ खाने लायक सारी ज़रूरी बातें अनिता ने गौरी के मन में भर दीं।
  
     एक दिन तो गौरी के खुद के सामने वो किसी से भिड़ा हुआ था , हिकारत से उसे देख गौरी अन्नी के साथ आगे बढ़ गयी….
    पता नही पीठ में इतना लंबा सा कैसा अजीब बस्ता टांगे रहता, बाद में कुछ उसके दोस्तो से चलती उसकी बात और कुछ कंडक्टर की बात सुन गौरी को समझ आया कि उनके स्कूल के आगे जो तहसील पड़ती है वहीं पॉलिटेक्निक कॉलेज से पढ़ाई कर रहा था वो…

   “और आसुतोस कब तक पूरा हो जाएगा तुम्हारा पॉलीटेक्निक?”   कंडक्टर के सवाल पर उसने जवाब दिया था और पहली बार उस लफंगे की इतनी मोटी गहरी सी आवाज़ उसने सुनी थी…

  ” बस चच्चा ! अगले साल जुलाई में दूसरा साल का रिज़ल्ट आ जायेगा और हम शहर निकल जाएंगे इंजीनियरिंग करने, और चच्चा गाना वाना भी तो बजाओ गाड़ी में।”

” अभी लगाए देतें हैं बिटवा।”

   और कंडक्टर ने सदियों से बसों में चलने वाले बम्पर गानों की जुगाली करनी शुरू कर दी…

    तुम तो ठहरे परदेसी साथ क्या निभाओगे
     सुबह पहली गाड़ी से घर को लौट जाओगे

   ” अरे छि ये का बजा दिए?”

  ” रुको दूसरा लगाए देते हैं…

    परदेसी परदेसी जाना नही मुझे छोड़ के…

  ” अरे यार चच्चा फ्यूज बल्ब हो तुम, हटो ज़रा हम ये नया कसैट लाये हैं शहर से”

   और उस लफ़ंडर ने आगे बढ़ कर अपना कसैट लगा दिया…..

   पिया बसंती रे काहे सताए आ जा …
   पिया बसंती रे काहे सताए आ जा….

    गौरी अपनी जगह पर ही और भी ज्यादा सिमट गई लेकिन उस दिन के बाद से उस लोफर की निडरता कुछ और बढ़ गयी…
    अब आये दिन स्कूल से लौटते वक्त की बस में वो यही गाना चलवाये रहता, उसके साथ के लड़के बिना बात हँसते और वो मुस्कुराए रहता।
    
    एक दिन तो हद ही हो गयी, उसी के कॉलेज का लड़का था …  बस में दरवाज़े के पास ही बैठा था। अपना स्टॉप आने पर गौरी अन्नी के साथ उतर रही थी कि उसने दरवाजे के ठीक सामने अपना पैर अड़ा दिया…

  ” पाय लागू भौजी! औ का हाल है?”

   घबरा कर गौरी जब तक में उसका चेहरा देख पाती आशुतोष के हाथ का एक ज़ोरदार तमाचा उस बदतमीज के चेहरे का भूगोल बिगाड़ गया। हड़बड़ा कर उसके पैर हटाते में ही एक छलांग लगा कर गौरी और अन्नी वहाँ से भाग खड़ी हुईं….
     इसके बाद चार दिन तक बुखार से तपती गौरी स्कूल नही जा पायी। पांचवे दिन ताप के साथ साथ डर भी कुछ हद तक उतर गया…

     उस दिन अन्नी अपनी मौसी के घर सत्ती माता के रोट बांधने चली गयी थी इसी से स्कूल नही जा पायी थी। एस यू पी डब्ल्यू का काम था जिसके कारण गौरी को अकेले ही स्कूल जाना पड़ा।
    और दिनों की तरह आज उसने बस्ता नही लिया था, बल्कि अपने कढ़ाई के नमूनों के रुमाल और सूई धागा सब एक कपड़े के थैले में डाले ही निकल गयी थी।
    स्कूल में टीचर दीदी को उसके नमूने बड़े पसन्द आये थे। किसी रुमाल में कमल काढ़े थे तो किसी में कुंदा की बेल। एक रुमाल जो उसने सबसे मेहनत से काढ़ा था उसमें लाल गहरे रंग से गुलाब की कलि और फूल चेन स्टिच और गांठ स्टिच लगा लगा कर काढ़ा था । और उसी रुमाल को कक्षा में सभी को दिखा कर उसकी खूब पीठ ठोंकी थी दीदी ने। बाकी सभी ने भी तालियों से उसका खूब उत्साह बढ़ाया था।

   शाम को इसी उत्साह में मगन वो स्टॉप पर बस का इंतेज़ार करती खड़ी थी कि बस आ गयी…
    आज बस और दिनों से कुछ खाली ही लग रही थी…
    कंडक्टर चाचा भी नही थे, लड़कियों के नाम पर अकेली वही बैठी थी।
    परकास ( प्रकाश) आज अपनी पूरी टोली के साथ मौजूद था। उस दिन आसुतोस के हाथ का रेपटा खाने के बाद से आज बस में नज़र आया था और आज ही उसके साथ अन्नी भी नही थी।

   उसने एक नज़र अपने आस पास दौड़ाई और फिर घबरा गई…
    ” हे भगवान आज तो वो भी नही है।”

    मन ही मन राम जी हनुमान जी से लेकर जिन जिन देवी देवताओं की उसके घर तस्वीरें लगी थीं सभी का उसने जाप कर लिया। आज तो उसका बचना मुश्किल लग रहा था। हालांकि डिराईभर भैया तो थे लेकिन एक अकेले वो इन छै सात लड़को से कैसे निपटेंगे भला।
    सोच सोच के उसका गला सूखा जा रहा था कि मैनी बाजार आ गया….दो चार इधर उधर की जो सवारियां थीं वो भी उतर गयीं।
   अब इस पूरी बस में बस वो परकास और परकास के छै लौंडे इत्ते ही जन बचे थे।
    उसकी जान निकल कर मुहँ तक आ गयी थी….

   उसके घर अखबार नही आता था तो क्या हुआ , अकेली लड़की के साथ इत्ते सारे लड़के क्या कर सकतें हैं वो अच्छे से जानती थी।
   कहीं बस डिराईभर भैया भी इन्हीं का साथ दे गए तो?

   उसका डर अपने चरम पर पहुंच चुका था।
 
   परकास और उसके दोस्त पहले तो सबसे पीछे बैठे थे फिर धीरे-धीरे उठकर इधर उधर कहीं भी बैठने लगे कोई कुछ गा रहा था कोई हंस रहा था कोई पान चबा रहा था तो कोई गुटका…

   डर के मारे मन ही मन दुर्गा चालीसा का पाठ करती गौरी खिड़की से बाहर देखती जा रही थी। बस के अंदर देखने की उसकी हिम्मत ही ना थी । बाहर देखते हुए भी उसे साफ पता चल रहा था कि वह सारे के सारे लड़के उसे ही घूर रहे थे….
   अपने झीने से दुपट्टे से उसने खुद को लपेट रखा था और उसका छोर ऐसे कस कर पकड़ा था जैसे उसकी सारी इज्जत इसी दुपट्टे में रह गयी थी।
   हे काली माता रक्षा करो! ये अन्नी की बच्ची को भी आज ही मरना था!
    वो क्यों अकेले स्कूल आ  गयी। कहीं अम्मा का डर की अकेली लड़कियां स्कूल जाकर खराब हो जातीं हैं सच ना हो जाये।
    अगर आज उसके साथ कुछ ऊंच नीच हो गयी तो क्या करेगी वो? गांव के पहले नाला पड़ता है ना बस वहीं कूद कर जान दे देगी!
    पर हाय री खराब किस्मत! एक तो उस नाले में ज्यादा पानी होता नही दूसरा गांव की तमसा नदी में बचपन से तैरती आयी है तो पानी में हाथ पैर खुद ब खुद चलने लगेंगे।
    देबी मैय्या किरपा करो, अब आगे से कभी अकेली घर से न निकलूंगी और अम्मा जहाँ कह रहीं वहीं ब्याह कर लुंगी।

   मन ही मन मन्नत मानी ही थी कि चर्र की आवाज़ के साथ बस रुकी और वो आंखें फाड़े बस के दरवाज़े की ओर देखने लगी…
    दरवाज़ा खुला और आशुतोष बस में चढ़ आया।

   जीवन में गौरी को लगा पहली बार उसने इतनी बड़ी सुकून की सांस ली , वो उसे देख मुस्कुरा उठी, उसने गौरी को देखा और फिर प्रकाश और गैंग को और एक पल में उसे सारा माजरा समझ आ गया।
   वो आगे बढ़ा ही था कि अपने बाजू में रखी थैली को गोद मे रख गौरी ने उसके अपने पास बैठने के लिए जगह बना दी।
   उस जगह को देख कर भी वो बाजू वाली खाली सीट पर बैठ प्रकाश और उसके दोस्तों को एक नज़र देखने के बाद सामने हो कर बैठ गया…
   

  ” का हो दद्दा आज कंडक्टर चच्चा नही आये?”

   ” हाँ बिटिया भई है उसकी तो आज और कल दू दिन नही आ पायेगा।”

  ” आज कोई गाना नही बजाओगे दद्दा?” अबकी बार प्रकाश की खी खीं सुनाई दी। हंसते हुए उसने ड्राइवर को गाने के लिए कहा ही था कि आशुतोष ने मुड़ कर उसे घूर कर देखा और उस दिन का करारा झापड़ याद आते ही प्रकाश अपना गाल सहलाते चुप बैठ गया…

  ” रहने दो रहने दो। हमको वैसे भी बस अताउल्ला खाँ सुनना ही पसन्द है , वो तुम बजाओगे नही।”

  आशुतोष के आकर बैठते ही गौरी की सामान्य श्वांस प्रश्वांस की प्रक्रिया शुरू हो गयी थी…
     अब तक जो यात्रा जीवन की कठिनतम यात्रा लग रही थी अब वही सुकून भरी प्यारी सी यात्रा लगने लगी थी।
   कुछ देर में ही चौपाल पर बस रुकी और प्रकाश और उसकी मंडली वहीं उतर गई।
   बस में अब गौरी और आशुतोष ही थे।

   आशुतोष ने ड्राइवर से कह कर एक बार फिर वही गाना बजवा दिया  ……

   पिया बसंती रे काहे सताए आ जा….

   गाने के बोल सुनते ही शरमा कर गौरी खिड़की से बाहर देखने लगी…

  ” ये सब तुमही बनाई हो”

  चौन्क कर गौरी ने देखा आशुतोष के हाथ मे उसका काढ़ा रुमाल था…

  ”  हाँ ” छोटा सा हाँ बोलने में ही उसका दिल उछल कर मुहँ तक आ गया था

  ” ये सब कहाँ सीखा ?”

  ” स्कूल में !”

  ” गौरी है ना तुम्हारा नाम ? हमारा नाम आशुतोष है..

   ” हम जानते हैं।”

   ” और का जानती हो हमारे बारे में?”

     “यही  कि तहसील के सरकारी कॉलेज से पॉलिटेक्निक कर रहें हैं आप। “

   ” और ?”

   ” और बस !

    “नौ महीने बाद हमारा पढ़ाई यहाँ से पूरा हो जाएगा फिर हम शहर के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज चले जायेंगे पढ़ने।”

  ” अच्छा !”

  ” और एक बात बताएं?”

  ” बताइये?

  ” हमारे बापू का नाम कामता प्रसाद है! “

   बस खचाक से डिपो में रुकी और उसके साथ ही गौरी का धड़कता दिल भी जैसे कुछ सेकण्ड्स को रुक गया।
    वो हड़बड़ा कर अपना सामान समेटे बस से जल्दी जल्दी उतर कर घर की तरफ भाग चली की तभी पीछे से आशुतोष की आवाज़ उसके कानों में पड़ी….

  “अरे ये एक रुमाल भूल गयीं हो?”   गहरे लाल रंग से काढ़ा गुलाब वाला रुमाल आशुतोष के हाथ में था…

   ” आपके लिए है, रख लीजिये। “

  कहती हँसती खिलखिलाती कामता प्रसाद की होने वाली बहु वहाँ से भाग गई….

   aparna …..
   
   

50% सेल

    ये सोमवार की सुबह आती क्यों  है?ये सिर्फ स्नेहा के लिये ही इतनी टॉर्चर होती है ,या सभी का यही हाल होता है,मालूम नही!
      तरुण को सिर्फ ये पता है की उसे ठीक 8बजे ऑफ़िस निकलना ही हैं,चाहे शहर मे कर्फ्यू लग जाये,देश मे  इमरजेन्सी आ जाये,पर 8 मतलब 8।
     स्नेहा नाश्ता बना पायी तो ठीक वर्ना ऑफ़िस कैन्टीन जिन्दाबाद।

      जैसा की दुनिया के हर मर्द को लगता है,की उसकी बीवी सबसे निकम्मी है,तरुण को भी पूरा विश्वास है,इस बात पर।
    और वो अपनी निकम्मी बीवी के टाईम मैनेजमेंट से तो कतई खुश नही रहता।

    “क्या करती रहती हो दिन भर ,एक फ़ोन नही संभाल पाती हो,,ऊपर से सारा सब कुछ अपने सर ले लोगी।”
    “क्या ज़रूरत थी नये प्रोजेक्ट पे हाथ मारने की,आराम से बैंच पे थी,,कोई काम नही ,प्रेशर नही,बस जाओ ,और आओ।”
      “अच्छा सुनो अगर आहान और ऑफ़िस एक साथ नही कर पा रही तो कुछ दिन के लिये माँ  को बुला लेते हैं,तुम्हे भी सुविधा हो जायेगी।”
        “नही नही माँ को बुलाने की ज़रूरत नही,मै कर लुंगी।”

      बस मर्दों के पास यही एक हथियार हैं,पता है सास को बुलाने के डर से बीवी हथियार डाल ही देगी। और बिना कोई और शिकायत किये चुप लगा जायेगी।

        पुरूषों के लिये उनका कैरीयर सब कुछ होता है,उनका बॉस ही उनका भगवान और ऑफ़िस ही उनका मदीना।पर औरत के लिये ! सिर्फ उसके समय काटने का ज़रीया।।
       ये बात पुरूषों के मन में भी गहरी बैठी होती है और ऑफ़िस ना जाने वाली महिलाओं के भी।

      “बैंच पे अच्छी थी……कैसे भला? किसको पसंद है काम पे भी जाओ और काम भी ना करो।”
“अरे जब अहान के लिये क्रच मिल ही गया,और ऑफ़िस शुरु कर ही दिया तो खाली क्यों बैठूँ ।”

      स्नेहा अपने विचारों मे उलझी खुद ही बडबड करती काम भी निपटाती जाती है।
     वैसे सभी औरतों मे एक ईश्वर प्रदत्त शक्ती होती है,तीन चार काम एक बार मे कर लेने की,,,लैंड लाईन से बहन से बात भी कर लेंगी,मोबाइल पे ज़रूरी मेल और मैसेज भी चेक होता रहेगा,,और साथ ही सब्जी भी कटती जायेगी,और सबसे ज़रूरी क्राईम पैट्रोल का एपिसोड साथ ही देख लेंगी।

      क्या करें,भगवान ने औरत को बनाया एक पर काम दिये अनेक।
     ऐसे ही स्नेहा खूब हडबडी मे रोज सारा काम निपटाती है,और फिर रात के खाने पे अपने पति से यही सुनती है,कि तुम दिन भर करती क्या हो?

    रोज सुबह 10बजे अहान को क्रच छोड़ कर उसे ऑफ़िस जाना होता है,इतनी हाय तौबा होती है सुबह की पूछो मत। इसी हाय तौबा मे उसने एक बार अपना मोबाइल गलती से कपडों के साथ वॉशिंग मशीन मे घुमा दिया।
       कपडों के साथ उनसे भी ज्यादा साफ सुथरा मोबाइल निकला,और स्नेहा सन्न रह गई,वो तो अच्छा था की उसके मेल पे सारे नम्बर सुरक्षित थे।

     अगली बार अहान का दूध गरम करते मे मोबाइल जाने कैसे अवन मे रखा गया,असल मे उस दिन शाम को तरुण के एक परिचित खाने पे आने वाले थे,क्या बनाऊं,क्या ना बनाऊं की उधेडबुन मे फसीं स्नेहा फ़ोन मे अपनी सहेली से इसी संबंध मे कुछ अति आवश्यक परिचर्चा मे व्यस्त थी ,तभी अहान के लिये दूध गिलास मे निकाला और अवन खोला और कान पर से मोबाईल निकाल के अवन मे रख दिया।

       अबकी बार खूब ठोंक बजा के अहान के पापा ने महंगा सा आई फोन खरीदा,उनका अटूट विश्वास  था की औरतों को सामान से ज्यादा उसकी कीमत से प्यार होता है।बस उनका आईडिया काम कर गया।

     छह महीनों मे दो स्मार्ट फोन गवां चुकी स्नेहा को   स्वयं भी आत्मग्लानी थी। अब वो अहान से भी ज्यादा फ़ोन को संभालती,पर हाय रे फूटी किस्मत!

       वही मनहूस सोमवार का दिन फिर आ गया,,दो दिन की लम्बी छुट्टी के बाद ये दिन बहुत जानलेवा होता है,खासकर नौकरीपेशा औरत के लिये।

      तरुण को नाश्ता करा के भेजा और अपने काम पे लग गई,कामवाली को जल्दी जल्दी काम समझा के अहान को तैय्यार किया और खुद नहाने घुस गई।
       स्नेहा नहा के आके जल्दी जल्दी तैय्यार होने लगी,उसने क्रीम हाथों पे निकाली ही थी की विलासिनी ज़ोर से चिल्लाई “दीदी बाबा ने पॉटी कर ली।” अब स्नेहा जब तक क्रीम को हाथों मे समेटे वहाँ पहुचीं तभी तरुण का फोन आने लगा,तरुण का फोन नही उठाने से जनाब एकदम से चिढ जाते हैं,इसलिए फोन उठाना भी आवश्यक था।
       फ़ोन को कन्धे और कानो के बीच फसाये स्नेहा ने जैसे तैसे बात करी और अहान को वैसे ही उठा बाथरूम मे ले गई।

        अहान को साफ सुथरा कर बड़े प्यार से गोद मे लिया और गर्दन सीधी कर ली,इसी बीच स्नेहा का जानी दुश्मन उसका फोन बड़ी चालाकी से उसे अंगूठा दिखा गया……और 40000 के आई फ़ोन ने ना आव देखा ना ताव कमोड मे कूद कर आत्महत्या कर ली।

   ‘छपाक ‘ इस आवाज के साथ ही स्नेहा का दिल डूब गया,आंखों मे मोटे मोटे आंसू आ गये।
    “हे भगवान! मेरे साथ ही क्यों?”
    “अब क्या मुहँ दिखाउन्गी तरुण को,उनको तो और मौका मिल गया,आज तो जान ही ले लेंगे मेरी।
सही कहते हैं,एक फ़ोन भी संभाल के नही रख सकती। क्या करुँ,कैसे बचू,कोई उपाय।”
       ” सही कहता है तरुण ,मै किसी लायक नही हूँ,ना घर सम्भालना आता ,ना ढंग से खाना बनाना ,कोई काम तो होता जो मै परफेक्टली कर पाती,ऊषा ,नीरू,चंचल ये सब कितने अच्छे से सब कर लेती हैं ।”
     जब कभी इंसान से ऐसी कोई गलती हो जाती है जो कुछ ज्यादा ही महंगी हो,तब उसे अपना असल चरित्र समझ आ जाता है,उसी समय उसे अपने सारे गुण दोष नज़र आने लगते है,अपनी भयानक भूल का पश्चाताप होने लगता है,और जाने अनजाने ही कितनी मन्नते हो जाती हैं…..पर यही कुछ समय बाद वो अति आवश्यक मन्नतें,बिल्कुल ही अनावश्यक होकर मन से निकल भी जाती हैं ।
     “गणेश जी इस बार तरुण के गुस्से से बचा लो ,आपको सवा किलो लड्डू भोग लगाउन्गी वो भी पैदल दगडू शेठ आके”
        (  दगड़ू शेठ पुणे का बहुत प्रसिद्ध गणपति मन्दिर है,जहां लेखक की स्वयं बहुत आस्था है।)
       
           ईश्वर हर असहाय की मदद करतें हैं…..उसी समय लैंड लाइन पे घंटी बजी ,,स्नेहा को पता था ,तरुण का फ़ोन है,,भारी कदमों से जा के बोला “हेल्लो ।”
    “स्नेहा क्या हुआ ,बात करते मे ही अचानक आवाज आनी बन्द हो गई। आहान तो ठीक है ना,अरे बोलती क्यों नही…..मेरा दिल घबरा रहा है जान ,तुम ठीक तो हो ना।”
     डांट पड़ने का डर था ,पर यहाँ तो गहरी सांत्वना वाले शब्द थे,भावुक होकर स्नेहा रो पड़ी।
      ऐसा रोयी ,ऐसा रोयी की हिचकी बँध गई,,बेचारी खुद चुप होना चाहती थी पर रुलायी थी की रुक ही नही रही थी।

    “रुको ,मै अभी आया।” “नही तुम मत आओ,सब ठीक है,,आहान एकदम ठीक है।”
    “वो असल मे मेरा फ़ोन ……कमोड …..”
“ओह्हो अहान ने तुम्हारा फोन कमोड मे गिरा दिया क्या?  अरे कोई बात नही ,तुम तो ऐसे रोयी की मै घबरा ही गया था।”
“फ़ोन के लिये इतना परेशान हो रहा था मेरा बेबी,कोई नही स्वीटहार्ट शाम को चलेंगे नया फ़ोन ले लेना।”
     
    इतनी देर से छाये ऊमस भरे बादल बरस गये,चारों ओर हरियाली छा गई,मयूर नाच उठे,कोयल गाने लगी,सारा संसार खूबसूरती की चादर मे मुस्कुराने लगा और……….स्नेहा की जान मे जान आई …
          …..सच कहतें हैं लोग,बच्चे भगवान का रूप होते हैं,,”आज मेरे बालगोपाल ने मुझे बचा ही लिया।
    वर्ना सच्चाई पता चल जाती तो तरुण ऑफ़िस से ही मुझे गोली मार देता।”

        थोडी देर पहले का गहन दुख दूर हो गया और गुनगुनाते हुए स्नेहा रसोई मे तरुण का मनपसंद खाना बनाने चली गई,,ऑफ़िस से छुट्टी ले ली।।

      खाना बनाते मे उसे अचानक याद आया की ऑनलाइन शॉपिंग की सेल का आज आखिरी दिन था,और उसने ढेर से कपड़े ऑर्डर करने के लिये जमा कर रखे थे, पर हाय री किस्मत !
              50परसेन्ट सेल उसके हाथ से फिसल के कमोड मे गिर चुकी थी……..और स्नेहा एक बार फिर गहन अवसाद मे घिर चुकी थी।

aparna….

संविधान

” मैं नही खाती नॉनवेज !! मुझे पसंद नही।”

” जब कभी खाया ही नही तो कैसे पता कि पसंद नही आयेगा।”
   कुछ देर सोच कर मैने कहा__

” हिंदू हूँ,पंडिताईंन!! मेरे धर्म में  नही खाते ,इसिलिए नही खाती, समझे!!”

  अपनी ज्ञान भरी बात पर मैं इठला गयी,पर तभी उसने कुछ ऐसा कहा कि एक ग्लेशियर पिघल गया, एक पतझर झर गया और एक सावन बह गया ….

” मैं भी नही खाता,इसलिये नही क्योंकि मेरा धर्म कहता है मत खा! मै इसलिये नही खाता क्योंकि मैं किसी जीव को अपने मुहँ के स्वाद के लिये मार नही सकता…सिर्फ कुछ एक मांस पेशियों की मज़बूती के नाम पर एक लाश पका कर नही खा सकता,,मैं नही खा सकता क्योंकि मैं मानवता को सर्वोपरी मानता हूँ, वही है मेरा धर्म, मानव धर्म!!

   ये मेरे जीवन का संविधान लिखा था उसने ,जिसके बाद मैं उसकी हो गयी,, और हमेशा हमेशा के लिये मेरी स्वतंत्रता छिन गयी….
       उसके बंधन जो बंध गयी थी।।

aparna…