दिल से….

कायाकल्प चैलेंज:-

सुप्रभात दोस्तों। कैसे हैं आप सब? हेल्दी एंड एनर्जेटिक?.. बिल्कुल!!!

आप लोगों ने अगर ईमानदारी से पूरे सात दिन 20 बार सूर्य नमस्कार करने के बाद 15 मिनट का डांस किया है और गर्म पानी के साथ जिंजर पाउडर हनी लेमन लिया है तो आप अपने आप में खुद फर्क महसूस कर पाएंगे।

देखिए हमें किसी को कुछ साबित करने के लिए नही बल्कि खुद को साबित करने के लिए ये करना है। सिर्फ अपने आप के लिए करना है। यकीन मानिए जब आप अपनी सुबह योग और व्यायाम से करते हैं तो पूरा दिन बेहतरीन बीतता है।

आपमें से कुछ लोग थायरॉइड के लिए योग पूछ रहे थे। आज उसके बारे में छोटी सी जानकारी दूंगी।

थायराइड के लिए सर्वश्रेष्ठ व्यायाम या योग है सूर्यं नमस्कार !! इसे करने की विधि आप सब जानते ही हैं।

थायरॉइड के लिए मुख्य रूप से निम्न योगासन लाभ देते हैं।

1) मत्स्यासन :- सुखासन में बैठ कर धीमे से पीछे की तरफ झुकते हुए सिर को ज़मीन से टिका कर रखना है। इस पोज़ में गर्दन और कंधों पर स्ट्रेच आता है जो थायरॉइड के लिए लाभप्रद है।

मत्स्यासन

2) सर्वांगासन :- इस आसन में आराम से लेटने के बाद पैरों को धीरे धीरे उठाते हुए सीधा 90 डिग्री एंगल पर लाएं। जसके बाद हाथों की सहायता से कमर को सपोर्ट करते हुए कमर को ऊपर उठाते जाएं।

इस आसन में भी कंधों और सिर पर पूरा संतुलन टिका होता है तथा गर्दन पर अच्छे से स्ट्रेच आता है।

सर्वांगासन

3) हलासन :-

हलासन करने का तरीका

पीठ के बल सीधा लेटने के बाद हाथों को शरीर से सटाकर सीधा रखें. पैरों को घुटने से मोड़े बिना धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाएं और फिर सांस छोड़ते हुए पीठ को उठाते हुए पैरों को पीछे की ओर ले जाएं. पैरों की अंगुलियों को जमीन से स्पर्श करने का प्रयास करें. 
– करीब एक मिनट तक इस अवस्था में रहते हुए धीरे-धीरे मूल अवस्था में आ जाएं.

हलासन

4) सिंहासन :-इस आसन को थायराइड के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। इस आसन को करने के लिए दोनों पैरों को सामने की ओर फैलाकर बैठ जाएं। अब अपने दाएं पैर को मोड़ें और उसे बाएं पैर की जांघ पर रख लें और बाएं पैर को मोड़ें और उसे दाएं पैर की जांघ पर रख लें। इसके बाद आगे की ओर झुक जाएं। उसके अलावा वज्रासन में बैठ कर दोनों घुटनों के बल होते हुए अपने हाथों को सीधा कर फर्श पर रख लें। इसके बाद अपने शरीर के उपर के हिस्से को आगे की ओर खीचें। अपने मुंह को खोलें और जीभ को मुंह से बाहर की ओर निकालें। नाक से सांस लेते हुए मुंह से आवाज करें। इसे रोजाना 7-11 बार करें। सिंह के समान गर्जन की आवाज़ इसमें निकालनी होती है।

सिंहासन

दिल से ….

Advertisements

Hello friends , कैसे हैं आप सब? और कैसा चल रहा है आपका कायाकल्प? प्लीज़ ये मत कहिएगा की मैंने 3 दिन से कोई अपडेट नही डाली इसलिए वेट करते बैठे हैं…

व्यायाम और योग तो हमें रोज़ करना ही है, चाहे मैं अपडेट डालूं या नही। ज्यादा नही करना है सिर्फ 15 मिनट !!!

शुरुवात में बस इतना ही करना भी पर्याप्त है। सबसे पहले हमें अपने शरीर को व्यायाम की आदत करवाना है। उसके बाद आपको सोचने की ज़रूरत ही नही पड़ेगी, आपकी बॉडी खुद ब खुद आपको खींच कर व्यायाम करवा लेगी।

महिलाओं की एक आम समस्या होती है ब्लोटिंग की । यानी पेट फूल रहा है ऐसा महसूस होता है। दोपहर के खाने के बाद शाम के समय में अगर आपको पेट में भारीपन लगता है तो ये ब्लॉटिंग ही हैं, बहुत बार ये भारीपन हल्के से दर्द में भी बदल जाता है।

आज इस ब्लॉटिंग से बचने के कुछ उपाय बताऊंगी… जिनमें से अधिकतर हम जानतें हैं पर अक्सर फॉलो करना भूल जाते हैं।

Advertisements

1) खाना खाते समय बिल्कुल भी पानी न पिएं। बहुत जरूरत हो तो हल्का गुनगुना पानी एक आध सिप ले सकतें हैं।

2) खाने के 40 मिनट बाद भी आपको भर गिलास पानी नही लेना है। थोड़ा थोड़ा ही पिये वो भी गुनगुना पानी। देखिए जैसे आप हवन करते समय अग्नि में आहुति डालते हैं कुछ ऐसा ही हमारे पेट में होता है। भूख के समय हमारे पेट में कई एंजाइम्स सीक्रिट होते हैं जो मान लीजिये पेट की अग्नि है अब उसमें हम खाना दिलातें हैं जैसे आहुति। अब अगर इसके साथ ही आप ठंडा पानी भी डाल देंगे तो पेट की अग्नि तो बुझ जाएगी ना, फिर वो उस भोजन को ठीक से पचायेगी कैसे? और यही अधपचा भोजन तरह तरह की परेशानियों को पैदा करने का कारण बनता है। तो जिस तरह हवन में अग्नि को भड़काने के लिए बीच में घी प्रयोग किया जाता है वैसे ही भोजन के बीच में ज़रूरत पड़ने पर गर्म पानी प्रयोग करें।

3) एक नियम बना लें,जब तक आपका पेट चिल्ला कर आपसे खाना न मांगे तब तक बिल्कुल न खाए। सिर्फ़ इसलिए कि खाने का वक्त हो गया है इसलिए खा लेना चाहिए वाली आदत छोड़ दीजिए। वैसे व्यायाम करने पर बहुत जोर की भूख लगती है और तब कुछ न कुछ हेल्दी फ़ूड ज़रूर खाये।।

4) हमारे खाने में प्रोटीन का बहुत महत्व है क्योंकि प्रोटीन हमारे शरीर की मरम्मत ही नही करता बल्कि शरीर को बनाने में भी सहायक है। इसलिए अपने भोजन में प्रोटीन ज़रूर शामिल करें। प्रोटीन डाइट और कौन सा प्रोटीन हमारे लिए बेटर है पर एक पूरा ब्लॉग लिखूंगी।जिससे और भी ज्यादा क्लियर हो जाएगा।

5) अब आते है आज के ड्रिंक पर। ये ड्रिंक आपको ब्लोटिंग की समस्या से निजात दिलाएगा और इसका उपयोग बहुत चमत्कारी ढंग से पेट के आधे से एक इंच को कम कर देता है। रात में सोने के पहले एक बड़े कॉफी कप में भर कर पानी लें। उसमें कुछ दो चार टुकड़े खीरे +चौथाई टुकड़ा निम्बू+ थोड़े पत्ते धनिया के+मिंट (पुदीना) के पत्ते भिगो दें।

रात भर भीगे इस पानी को सुबह खाली पेट में ले और सुबह भिगाये गए पानी को शाम के वक्त पर लें। आप देखिएगा, सिर्फ पहली बार के प्रयोग से ही आपको ब्लोटिंग की समस्या में बहुत आराम मिलेगा।

वैसे ब्लॉटिंग से बचने का एक और उपाय ये है कि हर बार कुछ भी खाने के बाद बैठ कर आराम करने की जगह कम से कम दस मिनट घर पर ही चल लें। उस से भी गैस और एसिडिटी की समस्या नही होती।

Advertisements

तो करते रहिए व्यायाम । उसी से मिलेगा आराम।।

फिर मिलते हैं अगले ब्लॉग में जिसमें आपके सवालों के जवाब शामिल होंगे कि किस व्याधि में कौन सा आसन किया जा सकता है।

तब तक खूब खाइए और खूब पसीना बहाइये ….

Advertisements

aparna

Advertisements

टायफाइड – लक्षण और उपचार

Advertisements


टायफाइड:—

    टाइफाइड एक बैक्टीरिया से फैलने वाली  ऐसी बीमारी है जो ज्यादातर दूषित पानी और दूषित भोजन के कारण मनुष्य की आंतों में असर कर पूरे शरीर में लक्षणों को उत्पन्न करती है। टाइफाइड मुख्य रूप से एक तरह का ऐसा बुखार है जो कि बैक्टीरिया के संक्रमण से उत्पन्न होता है।
    टाइफाइड की उत्पत्ति में कारक है सालमोनेला टायफिमयूरीयम।
सालमोनेला पैराटायफी भी टाइफाइड की उत्पत्ति में सहयोगी बैक्टीरिया है।

    मुख्य रूप से बाहर के खाने पीने दूषित जल संक्रमित भोज्य पदार्थ आधे पके भोज्य पदार्थ, सड़े और पर्युषित खाने से टाइफाइड की उत्पत्ति होती है। टाइफाइड का बैक्टीरिया मनुष्य की आंत में संक्रमण उत्पन्न कर मुख्य रूप से पेट से संबंधित लक्षणों को उत्पन्न करता है। इंफेक्शन बढ़ने पर मनुष्य में सर्व शरीर गत लक्षणों की उत्पत्ति होती है, जिनमें मुख्य रुप से बुखार आना सिर में दर्द बना रहना सारे शरीर में दर्द बना रहना आदि प्रमुख लक्षण  हैं।

    टाइफाइड का इनक्यूबेशन पीरियड लगभग 1 से 2 सप्ताह है जब की बीमारी की अवस्था तीन से 4 सप्ताह तक बनी रहती है।

    टाइफाइड के लक्षण सामान्यता दवा शुरू करने के बाद 3 से 5 दिन में समाप्त हो जाते हैं कभी-कभी किसी केस में यह लक्षण 2 से 3 सप्ताह तक भी पाए जाते हैं ।
    सही चिकित्सा और पथ्य अपथ्य के अभाव में बहुत बार लक्षणों में जटिलताओं की उत्पत्ति होने के कारण टाइफाइड पलट कर दोबारा हो जाता है। बहुत बार एंटीबायोटिक का कोर्स करना टाइफाइड में जरूरी होता है कोर्स कंप्लीट नहीं करने पर भी टाइफाइड दुबारा पलटकर हो सकता है। टाइफाइड को गंभीर बीमारी माने जाने का मुख्य कारण यही है कि अगर पूरी तरह से बैक्टीरिया का सफाया ना किया जाए तो यह बार-बार होने वाली बीमारी में से एक है जो कि आगे चलकर आंतों को कमजोर कर देता है। इसीलिए टाइफाइड के लिए कहा जाता है कि बीमारी से बचाव अधिक कारगर है। टाइफाइड से बचाव आसान है पानी उबालकर पीना, साफ सफाई रखना और शुद्ध और गर्म भोज्य पदार्थों का सेवन करना हमेशा टाइफाइड से सुरक्षा का कारण बनता है।

  टाइफाइड के लक्षण:–

Advertisements

बुखार या ज्वर टाइफाईड का सर्वप्रमुख लक्षण है।

-जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता जाता है वैसे-वैसे ही भूख भी धीरे-धीरे कम होती जाती है।

-टाइफाइड से ग्रस्त रोगी को सिर दर्द होता है।

-शरीर में दर्द का बने रहना, वेदना होना।

-ठण्ड तथा कंपकपी  की अनुभूति होना।

– शरीर में सुस्ती एवं आलस्य का अनुभव होना।

-शरीर में कमजोरी का बने रहना।

•- दस्त होना।

•-उल्टी होना।

कब जाने कि रोगी को डॉक्टर के पास जाना चाहिए?

टाइफाइड के रोगी को अगर बुखार लगातार बना हुआ है, सर में दर्द है खाने का मन नहीं करता तो ऐसे में रोगी को बिना देर किए डॉक्टर के पास चले जाना चाहिए । क्योंकि टाइफाइड का इन्फेक्शन बहुत देर तक आंतों में रहने पर आंत्रशोथ की स्थिति उत्पन्न करता है ऐसे में आंतों में घाव बनकर छेद हो जाते हैं यह टाइफाइड की वह गंभीर स्थिति है जिसमें मल त्याग के समय रोगी को कई बार रक्तस्त्राव भी हो सकता है। यह स्थिति आगे चलकर कई विषमताओं को उत्पन्न करती है, इसलिए समय रहते टाइफाइड के रोगी को लक्षणों के नजर आते ही डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

टाइफाइड एक ऐसी बीमारी है जिसमें चिकित्सा से बेहतर बचाव है आइए जानते हैं टाइफाइड के बचाव के उपायों के बारे में:–

खान पान में बदलाव कर:–

हमेशा हल्के और सुपाच्य आहार का सेवन करें।

ताजा और गर्म भोज्य पदार्थ ही सेवन करें

पानी उबालकर पिए अथवा फिल्टर कर अथवा बोतलबंद पानी का या केमिकल युक्त पानी का सेवन करें।

डिब्बाबंद भोज्य पदार्थ, बाहर की खाने-पीने की वस्तुएं, तथा बासी भोजन पदार्थों का सेवन ना करें।

अत्यधिक प्याज लहसुन आदि तेज गंध युक्त भोज्य पदार्थ अधिक मसालेदार अधिक तैलीय चटपटा मिर्च मसालेदार सिरका युक्त भोज्य पदार्थों का त्याग करे।

मांसाहार के सेवन से दूर रहें।

Advertisements

पचने में भारी और गरिष्ठ सब्जियां और फल जैसे अनानास कटहल आदि का प्रयोग कम करें।

देर से पचने वाले आहार ओं का सेवन कम करें और अत्यधिक पेट भर कर कोई भी चीज ना खाएं

शराब सिगरेट चरस गुटका तंबाकू पान इत्यादि का सेवन न करें।

अन्य सावधानियां:–

भोजन से पहले हमेशा हाथों को गर्म पानी से धोएं।

खाने से पहले फलों और कच्ची सब्जियों को धोकर ही खाएं।

हमेशा साफ पानी का प्रयोग ब्रश करने चेहरे और हाथों को साफ करने तथा सब्जियों फल आदि को धोने के लिए करें।

कैसा भोजन करें:–

टाइफाइड में क्योंकि रोगी के शरीर में डिहाइड्रेशन के कारण बहुत बार कमजोरी पैदा हो जाती है इसलिए उस कमजोरी को दूर करने के लिए उच्च कैलोरी युक्त उच्च कार्बोहाइड्रेट से भरपूर भोजन को सम्मिलित करना चाहिए। इसके साथ ही शरीर में हुई जल धातु की कमी को पूरा करने के लिए तरल वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए। जैसे पतली खिचड़ी, फलों के रस ,सब्जियों के सूप इत्यादि के प्रयोग से रोगी के शरीर से हुई तरल की कमी को पूरा किया जा सकता है। टाइफाइड के रोगी को रोग से उठने के बाद उच्च मात्रा में डेरी प्रोडक्ट दूध दही पनीर अंडे अर्थात उच्च प्रोटीन का भी सेवन करना चाहिए।

  ओमेगा 3 फैटी एसिड से युक्त आहार शरीर में उत्पन्न सूजन को कम करने में सहायक होते हैं। टाइफाइड बुखार से होने वाली हानि को सही करने के लिए सही मात्रा में खनिज इलेक्ट्रोलाइट और ओमेगा 3 फैटी एसिड की भी आवश्यकता होती है।

टायफाइड की चिकित्सा:

   टाइफाइड बुखार की चिकित्सा मुख्य रूप से संक्रमण को रोककर या एंटीबायोटिक दवाओं द्वारा संक्रमण के उपचार को करके की जाती है।
   टाइफाइड संक्रमण को रोकने के लिए दी जाने वाली एंटीबायोटिक दवाइयों के नाम हैं 1)अमाक्सीसिलिन
2)एंपीसिलीन
3)क्लोरेंफेनीकोल
4)ट्राइमेथोप्रिम
5) सल्फेमेथाक्साजोल इत्यादि….

अगर रोगी दवाओं के साथ भोजन करने में समर्थ है तो तरल पदार्थों खिचड़ी फलों का जूस इत्यादि का सेवन दवाओं के साथ करवाना उचित रहता है। किंतु कई अन्य रोगी इस तरह के होते हैं जिनमें उल्टी की समस्या बहुत अधिक होती है ऐसे में वह मुख द्वारा कोई भी दवा लेने में अक्षम होते हैं ऐसे रोगियों को एन एस फ्लूइड पर रखकर इंजेक्टबल दवाओं का प्रयोग किया जाता है बहुत सारे उपद्रव से ग्रस्त टाइफाइड के रोगी में बहुत बार पित्ताशय की थैली सर्जरी करके निकालनी भी पड़ सकती है।

टायफाइड की रोकथाम :–

टाइफाइड से सुरक्षा का सर्वश्रेष्ठ उपाय है स्वच्छता के नियमों का पूर्ण पालन करना।

1) भोजन पकाने हेतु और फलों और सब्जियों को धोने के लिए सदा साफ और बहते जल का प्रयोग करें।

Advertisements

2) घर पर पानी के जिस बर्तन में पानी को स्टोर किया जाता है हमेशा ढक कर रखें।

3) पीने के पानी को हो सके तो हर मौसम में उबालकर पीएं अथवा कम से कम बारिश के मौसम में उबालकर ही प्रयोग में लाएं ।

4)वाटर फिल्टर का प्रयोग भी किया जा सकता है।

5) भोज्य पदार्थ हमेशा गर्म और तुरंत पकाए हुए ही प्रयोग करें पर्युषित सड़ा गला अधपका खाना ना खाएं।

6) बाहर के भोज्य पदार्थों को चाट के ठेले गली नुक्कड़ के भुज पदार्थों को खाना अवॉइड करें।

7) घर पर पानी के निर्गमन और संधारण का प्रबंध स्वछता पूर्वक करें ।

8)भोजन बनाने वाले बर्तनों की सफाई पर भी उचित

ध्यान रखें।

Advertisements

9) खाना हमेशा हाथ धोकर खाएं.. शौच के पश्चात घर में बाहर कहीं से आने के पश्चात और भोजन से पूर्व तथा भोजन के पश्चात हमेशा हाथ किसी मेडिकेटेड सॉप से धोना सुनिश्चित करें।

10) समय-समय पर हैंड सैनिटाइजर का प्रयोग भी करें।

11) टाइफाइड के लिए टीका भी उपलब्ध है जो लगभग 2 वर्षों तक प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखता है टीके का प्रयोग करके भी टाइफाइड से बचा जा सकता है।

टायफाइड में घरेलू उपाय:–

कई अन्य ऐसे घरेलू उपाय हैं जिनके प्रयोग से टाइफाइड से बचा जा सकता है यह उपाय निम्न है:–

1) फलों का रस:– मौसमी फलों का जूस निकालकर टाइफाइड के रोगी को दिया जा सकता है संतरा मोसंबी अनार आदि के जूस टाइफाइड में शरीर में होने वाली तरल की हानि को दूर करते हैं।

2) सेब का रस:– सेब के रस में समान मात्रा में अदरक का स्वरस मिलाकर रोगियों को देने से पद्य का कार्य करता है।

Advertisements

3) तुलसी :– आयुर्वेद के अनुसार तुलसी पत्र स्वरस का प्रयोग भी किया जाता है।

4)लौंग:– आयुर्वेद के अनुसार लौंग का ताजा निर्मित क्वाथ भी टाइफाइड में दिया जाता है। इसमें लगभग 2 गिलास पानी में 4 लौंग डालकर इसे इतना उबालना है कि वह एक चौथाई शेष रह जाए तब  इसका पान करना है।
    सुबह और शाम समान मात्रा में एक कप लौंग का पानी अत्यधिक फायदेमंद है।

5) शहद :– गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद मिलाकर रोगी को दिया जा सकता है।

6 ) लहसन ;– आयुर्वेद मतानुसार 6 से 7 कच्ची लहसुन को कुचलकर लहसुन कल्क बनाकर सेंधा नमक के साथ मिलाकर टाइफाइड के रोगी को बुखार में दें।

7) कुछ आयुर्वेद औषधियां जैसे विषम ज्वरहरलोह ज्वरअंकुश रस ज्वर मुरारी इत्यादि ऐसी औषधियां है जो टाइफाइड के रोगी में बुखार को उतार कर उसके इम्यून सिस्टम को  मजबूत करती हैं।

8) आयुष 64 के कैप्सूल भी दिए जा सकते हैं।

  इस प्रकार सही समय पर टाइफाइड के लक्षणों को पहचान कर अगर रोगी डॉक्टर के पास पहुंच जाता है और उचित दवाओं के साथ पथ्य अपथ्य का भी सेवन करता है तो इस रोग को आसानी से पराजित कर सकता है और स्वास्थ्य लाभ पा सकता है।

Advertisements

डॉ अपर्णा मिश्रा







साबूदाना : स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है या नही?

Advertisements

  साबूदाना:-



    साबूदाना नाम लेते ही हमारे सामने उपवास से भरे दिन के बाद की सजी हुई थाली नजर आने लगती हैं साबूदाना हमारे हिंदुस्तान का एक बहुत प्रचलित खाद्य पदार्थ है।
     उत्तर भारत हो मध्य भारत हो या महाराष्ट्र उपवास में मुख्य रूप से खाए जाने वाले आहार का हिस्सा है साबूदाना। साबूदाना से तरह-तरह की चीजें बनाई जा सकती हैं चाहे वह साबूदाना की खिचड़ी हो साबूदाना के बड़े हो या खीर ।
यह सारे ही भोज्य पदार्थ पोषकता के मानकों पर खरे उतरते हैं।

   व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में इधर कुछ दिनों से साबूदाने के ऊपर लंबे चौड़े वीडियोज़ रहे हैं कि इन्हें पशुओं की चर्बी से पॉलिश किया जाता है या साबूदाना बनाने में एनिमल फैट प्रयोग किया जाता है तो इन्हें उपवास में प्रयोग में कैसे लाया जाए?

सबसे पहली बात तो यह है कि बिना किसी विश्वसनीय साइट के आप सिर्फ व्हाट्सएप के वीडियोस के आधार पर कोई भी भ्रांति मन में ना पाले यह एक तरह से अफवाहों का अड्डा ही है कोई अफवाह चल गई तो ट्रेंड में आ जाती है और लगातार लगातार उस वीडियो को देखते हुए आप अपने मन में एक धारणा तैयार कर लेते हैं।

  साबूदाना का इतिहास खंगाला जाए तो यह मालूम पड़ता है कि यह हमारे परंपरागत आहार का हिस्सा नहीं था। यह मुख्य रूप से अफ्रीका में होने वाली टैपिओका की प्रजाति है।
    भारतवर्ष में इसे लाने का श्रेय त्रिवेंद्रम के राजा जी को जाता है। कई जगह इतिहास में यह भी वर्णित है कि साबूदाना की खेती सबसे पहले तमिलनाडु में शुरू की गई लेकिन बहुत सी जगह पर इसकी खेती सबसे पहले केरल में किए जाने के सबूत भी मिलते हैं।

साबूदाना पूरी तरह से वानस्पतिक आहार है। वनस्पतियों के रस से बनाया आहार उपवास के लिए पूरी तरह शुद्ध और सात्विक होता है।

  आइए देखते हैं साबूदाना बनता कैसे हैं…

भारतवर्ष में साबूदाना मुख्य रूप से टेपियोका की जड़ से बनाया जाता है सबसे पहले खेती वाली जगह से सारी टेपियोका की जड़ों को एक साथ निकाल लिया जाता है। यह जड़ें निकालते समय कुछ-कुछ मूली की तरह नजर आती हैं। बड़ी-बड़ी मशीनों में इन्हें डाल कर अच्छे से इनकी मिट्टी साफ कर ली जाती है तेज पानी की धार में धुली हुई यह जड़ें मशीन में आगे पहुंचती हैं। जहां पर इन्हें पील कर दिया जाता है, यानी कि इनके ऊपर का छिलका उतार दिया जाता है। छिलका उतारने के बाद एक बार फिर इन जड़ों को तेज पानी की धार से निकाला जाता है जिससे इन में लगी थोड़ी बहुत भी मिट्टी हो तो वह साफ हो जाती है। इसके आगे मशीनों में लगे चौपर से गुजरते हुए टेपियोका कि यह जड़ें छोटे-छोटे टुकड़ों में कट जाती हैं आगे एक बार फिर इन टुकड़ों को क्रश किया जाता है जिससे इन जड़ों का दूध पूरी तरह से निकाला जा सके। टेपियोका की जड़ों से निकाला गया यह दूध फिर सेट होने के लिए रख दिया जाता है।
क्योंकि यह दूध टैपिओका की जड़ से निकाला हुआ स्टॉर्च है कुछ देर तक स्थिर रखने से यह जम जाता है। अच्छी तरह जम जाने के बाद इसे वापस बड़े बड़े टुकड़ों में तोड़ लिया जाता है अब इन बड़े टुकड़ों को बहुत बारीक पीस लिया जाता है। इस पाउडर को वापस मशीनों की सहायता से आगे बढ़ाया जाता है कि यह छोटे-छोटे पारदर्शी गोलों में बदल जाते हैं।

  इस सारी तकनीक के बाद साबूदाना के दाने तैयार हो जाते हैं साबूदाना की यह मोती जैसे दाने मुख्य रूप से 2 तरह की साइज में उपलब्ध होते हैं।
    अब बाजार में तो वही बिकता है जो दिखता है इसीलिए साबूदाना के इन दानों को पॉलिश कर लिया जाता है। इस तरह यह साबूदाना के दाने आप की प्लेट में आने के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं। आइए अब देखते हैं कि साबूदाने की न्यूट्रीशनल वैल्यू क्या होती है?

  साबूदाना मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट का सोर्स माना जाता है। कार्बोहाइड्रेट के अलावा कैलशियम पोटैशियम और अन्य मिनरल्स और खनिज भी इसमें पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं।

  उपवास में क्यों है ये मुख्य आहार:-

साबूदाना उपवास का सर्वप्रमुख आहार है इसका मुख्य कारण साबूदाने का कार्बोहाइड्रेट रिच होना ही माना जाता है। जब पूरा दिन उपवास करने के बाद शरीर की शक्ति कम होने लगती है तब हमारे शरीर को कार्बोहाइड्रेट से मिलने वाली ऊर्जा की आवश्यकता होती है। पूरा दिन उपवास करने के बाद  अनाज नहीं लेना चाहिए और सिर्फ फलाहार करना चाहे तब ऐसे में साबूदाना सबसे अच्छा ऑप्शन माना जाता है। साबूदाना को अनाज में नहीं गिना जाता लेकिन बावजूद उसमें काफी मात्रा में कार्बोहाइड्रेट पाए जाते हैं जो उपवास से होने वाली थकान और ऊर्जा की क्षति को पूरा कर देते हैं।

वजन बढ़ाने में सहायक :– साबूदाना में पाए जाने वाला फैट और कार्बोहाइड्रेट दुबलेपन से ग्रस्त लोगों में वजन बढ़ाने के लिए उपयोग में लाया जाता है।  इसीलिए काफी समय पहले टीबी सेनेटोरियम में साबूदाने की खीर सभी मरीजों को आवश्यक रूप से बांटी जाती थी इसका मुख्य उद्देश्य टीबी के मरीजों में वजन को बढ़ाना ही होता था।

हड्डियों के लिए लाभदायक:-  साबूदाना में पाए जाने वाले पोषक तत्व हमारे शरीर की हड्डियों के वर्धन में सहायक हैं । साबूदाना में कैल्शियम आयरन और मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। साबूदाना में पाए जाने वाला कैल्शियम जहां हड्डियों के वर्धन और विकास के लिए सहायता करता है । वही इस में उपस्थित आयरन ऑस्टियोपोरोसिस को रोकने में भी सहायक होता है ।  इसके साथ ही साबूदाना में पाए जाने वाला मैग्नीशियम आज समय में होने वाले हड्डियों के रोगों से भी लड़ने में सहायक होता है । यह हड्डियों को मजबूत बनाता है और फिट रखता है।

ऊर्जा देने में सहायक:– साबूदाने में उपस्थित कार्बोहाइड्रेट आपके शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है अगर आप किसी काम से थके हुए हैं और आपके शरीर का एनर्जी लेवल नीचे गिरा हुआ है, तब ऐसे में साबूदाने का सेवन आपके एनर्जी लेवल को सुधार कर आपको तुरंत ताकत और बल प्रदान करता है।

मेटाबोलिज्म के संतुलन में सहायक :-   गर्मी के दिनों में जब हमारे शरीर को ग्लाइकोजन की अतिरिक्त आवश्यकता होती है उस समय साबूदाने में उपस्थित कार्बोहाइड्रेट और फैट ग्लूकोस में बदलकर हमारे शरीर को तुरंत शक्ति प्रदान करता है और शरीर में उपस्थित गर्मी को दूर करता है इसीलिए ताप से जुड़ी बीमारियों में भी साबूदाने को खीर के रूप में या पानी के साथ उबालकर रोगियों को दिया जाता है।

उच्च रक्तचाप में साबूदाना:–   साबूदाना में पोटैशियम और फास्फोरस प्रचुर मात्रा में पाया जाता है इसके कारण यह शरीर में बढ़ने वाले उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायता करता है साबूदाना में सोडियम की मात्रा काफी कम पाई जाती है जिसके कारण इसके सेवन से रक्तचाप बढ़ने की समस्या नहीं होती इसके अलावा इसमें पाए जाने वाले फास्फोरस और पोटेशियम के कारण बढ़ा हुआ रक्तचाप कम होता है तथा उच्च रक्तचाप के मरीजों के लिए यह एक उचित नाश्ते का विकल्प माना जाता है।

रक्ताल्पता में इसका प्रयोग:– शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी को एनीमिया माना जाता है। एनीमिया से ग्रस्त रोगी को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। साबूदाना में उपस्थित आयरन लाल रक्त कणिकाओं की वृद्धि कर खून की कमी को दूर करता है। शोध द्वारा यह मालूम चला है कि साबूदाने में बहुत अधिक मात्रा में आयरन नहीं पाया जाता इसलिए एनीमिया के लिए सिर्फ साबूदाने का सेवन पर्याप्त नहीं है , साबूदाने के साथ ही अन्य आयरन युक्त आहार अधिक लाभप्रद माना जाता है।


मस्तिष्क के लिए उपयोगी:- साबूदाना में प्राकृतिक रूप से फॉलिक एसिड भी पाया जाता है। इसमें पाए जाने वाला फॉलिक एसिड शारीरिक रोगों के साथ-साथ मानसिक रोगों में भी लाभप्रद है मस्तिष्क में उत्पन्न विकारों में साबूदाना एक उचित आहार होता है।


रक्त परिसंचरण में लाभप्रद:– साबूदाना में पाए जाने वाला आयरन और फोलिक एसिड रक्त धमनियों में जाकर रक्त के परिसंचरण को सुगम बनाता है।
   

अतिसार में लाभदायक :– किसी कारण से दस्त हो जाने या अतिसार में भी बिना दूध के पकाया हुआ साबूदाना बहुत लाभप्रद होता है।

गर्भावस्था में :- गर्भावस्था में गर्भ में पल रहे शिशु के पर्याप्त पोषण हेतु भी साबूदाना उपयुक्त आहार माना जाता है। साबूदाना में लौह और खनिज तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जातें हैं जो शरीर की बढ़त के लिए अति आवश्यक हैं।

   इसके अलावा साबूदाना का फेस पैक त्वचा में कसाव लाकर त्वचा को चमकदार बनाने में भी सहायक होता है।

   साबूदाना के इतने सारे लाभ जान कर अब आप भी इसे अपने रोजाना के आहार का हिस्सा बना सकतें हैं।  ये एक उच्च ऊर्जायुक्त सुपाच्य आहार है जिसके फायदे अनेक हैं।

  डॉ अपर्णा मिश्रा

Advertisements