समिधा – 58


समिधा – 58

     आते आते आखिर वो दिन भी आ गया। आज से पारो और उसकी सखियों की परीक्षाएं शुरू थी। सविता सुबह से कृष्ण मंडप में बैठी बस भगवान से खुद को पास करवा देने की प्रार्थना में लगी थी।
   अपना ज़रूरी सामान अपने झोले में डाल पारो भी झटपट सीढियां उतरती नीचे चली आयी।
   नयना और मधुलिका के साथ वो भी मंडप की ओर बढ़ गयी।
   सभी ने एक साथ सामने मुरलीवाले के आगे हाथ जोड़ दिए। मन ही मन प्रार्थना करती नयना और मधुलिका की भी आंखें बंद थीं लेकिन पारो ने झट अपनी आंखें खोल इधर उधर किसी को ढूंढना शुरू कर दिया।


  
  ” चलें , अब तो प्रभु का आशीर्वाद भी ले लिया?”   नयना के सवाल पर बाकी तो दोनों ने हाँ कह दिया पर पारो अब भी चकित दृष्टि से इधर उधर देखती रही।

“क्या हुआ ? तू किसे ढूंढ रही है पारो?”

“मेरे द्वारिकाधीश को!”

“ये सामने तो हैं…!” सरिता के मूर्ति की ओर इशारा करते में पारो को दूसरी तरफ से आता वरुण नज़र आ गया….

“आ गए….”वरुण को देखते ही उसने धीमे से कहा और सीढियां उतर उसके सामने पहुंच गई।

“आशीर्वाद दीजिये, कि आपके विश्वास को विजय दिला पाऊं?”

   पारो की आत्मविश्वास से चमकती आंखें देख वरुण की आंखों में भी प्रसन्नता की शहनाई गूंज उठी….. उसकी आँखों की कोर आंखें मुस्कुराने लगी…

“तुम पारस हो पारो, जिसे छुओगी सोना बन जायेगा। निश्चित तुम्हारी विजय होगी।”

  होंठों ही होंठों में बुदबुदाते वरुण की बात आसपास कोई और नही सुन पाया और पारो वरुण के पैरों पर झुक गयी।
   अपने दोनों हाथों को वरुण के दोनों पैरों पर कुछ देर रख कर उसने आंखें मूंद लीं।
   उसे लगा ये देव की छुअन है, उसी का स्पर्श है…. और उस स्पर्श से जागी तरंगे उसके पूरे शरीर में एक ऊर्जा बन दौड़ गयी।
    उस स्पर्श को अपने माथे से लगाने के बाद वो उठने ही वाली थी कि वरुण ज़रा सा पीछे हटा और उसके पैर के नीचे की धूल उठा कर पारो ने माथे से लगा ली।
   वो उठी और प्रसन्नता से अपनी सखियों को साथ लिए अपने विद्यालय की ओर बढ़ गयी।     

*****

एक एक करती सारी परीक्षाएं निबटती गयीं। और अंतिम परीक्षा का भी दिन आ गया। उस दिन स्कूल से आते ही चारों लड़कियों की प्रसन्नता का ठिकाना नही था। एक तो अंतिम पेपर और उस पर आसान आया था, सभी अपने में मगन गाती गुनगुनाती ऊपर अपने कमरे की ओर बढ़ गईं थीं।
   अपने परीक्षा के अनुभव और अब आगे भविष्य में क्या करना है आदि की चर्चाओं में सभी व्यस्त थीं कि नीचे से एक दीदी उन चारों को खाने के लिए बुलाने आ गयीं।

“चलो तुम्हीं चारों का भोजन बाकी है, चल कर खा लो फिर रसोई समेट लेंगे हम।”

सरिता ने हाँ में सिर हिलाते बड़ी आस से पूछ लिया…

“दीदी आज खाने में क्या बना है?”

“वही मूंग की दाल और लौकी की सब्जी। चावल और रोटियां दोनो ही है तुम लोगों को जो खाना हो देख लेना।”

  सरिता का मुहँ ज़रा सा हो गया। दुनिया वाले भले उन्हें सुस्वादु भोजन खाने के योग्य न मानें पर उनकी भी तो जिव्हा थी जहाँ किसी ज़माने में छप्पन भोग भी सजते थे। पुरानी आदतों को त्याग देना इतना आसान होता है क्या?”

  मन मार कर चारों रसोई की तरफ बढ़ गईं।रसोई का काम निपटा कर लगभग भगिनी आश्रम की महिलाएं दोपहर के आराम के लिये अपने कक्ष की ओर जा चुकी थीं। वहाँ इस वक्त इन चारों के अलावा उन्हें। बुलाने गयी दीदी ही थी।

“मैं परोस दूँ। तुम लोग कहो तो भोजन गर्म कर देती हूं , थोड़ा स्वाद लगेगा वरना मूंग ठंडी अच्छी नही लगती।”

“मुझे तो गर्म भी अच्छी नही लगती है दीदी। अब जैसी है खाना तो है ही,हम खुद परोस लेंगे और खाने के बाद रसोई साफ कर देंगे। आप भी जाकर आराम कर लीजिए।”
     पारो की बात पर मुस्कुरा कर वो दीदी एक ओर खड़ी रह गईं और ये चारों लड़कियां अपना खाना परोसने लगीं….
   लेकिन भगोने खोलते ही चारों के चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी…
   पहले ही भगौने से धनिये गरम मसाले की खुशबू में तरबतर हरे चने का निमोना रखा था। दूसरे में सूखे  बैंगन तले हुए दिख रहे थे और टमाटर से छौंकी गरम दाल पर तैरता घी और  गरम चावलों से निकलती भाप  उन चारों को जैसे मुस्कुराने को बाध्य कर गयीं।
  सविता तुरंत भाग कर दीदी के गले से लग गयी…

“आज इतना सुस्वाद भोजन कैसे बनाया दीदी।”

“तुम चारों के अंतिम पेपर की खुशी में ।”

  पद्मजा दीदी रसोई में घुसती हुई बोल पड़ीं।

” भई हमारी बहने इतनी मेहनत कर रहीं तो कुछ तो हमारा फ़र्ज़ भी बनता है ना। खाना खा लो उसके बाद तुम्हारे ही शब्दों में एक और सरप्राइज है तुम लोगों के लिए।”

  और मुस्कुरा कर पद्मजा दीदी वही रखे पीढ़े पर बैठ गईं। चारों सखियां हंसती मुस्कुराती खाना परोस कर खाने बैठ गयी।
  उन लोगों का खाना समाप्त होने से पहले ही दीदी ने चार कटोरियों में निकाल रखी खीर भी लाकर उन सबके समक्ष परोस दी। उन सबकी खुशी का ठिकाना नही रहा।

   पारो ने अपने हाथ में खीर की कटोरी उठायी और खाने को थी कि उसे याद आ गया उसका परीक्षाफल आने तक वरुण ने मीठा न खाने की कसम उठा रखी है। इसका मतलब वरुण ने भी ये खीर नही खाई होगी…..
   जब उसके सेलेक्शन के लिए वरुण ने मीठा छोड़ रखा है फिर वो कैसे खा सकती है?  यही सोच उसने कटोरी नीचे रख दी।

” क्या हुआ पारो?तू खीर नही खाएगी?”

सरिता के पूछने पर उसने न में सिर हिला दिया।

“अरे बहुत स्वाद बनी है,ज़रा चख के तो देख। आज पद्मजा दीदी ने वो भुने बादाम और भुनी पोस्त का पाउडर डाल कर मस्त केसरिया खीर बनाई है। देख केसर का क्या खूब रंग आया है। एक चम्मच तो चख के देख बहन। आज की खीर अमृत है अमृत,बिल्कुल लग रहा जैसे…”

“नही सरिता!! मेरा पेट भर गया है अब एक चम्मच भी और खाया तो फट जाएगा।”

“कोई बात नही पारोमिता!! ढक कर अपने पास ही रख लेना, और बाद में खा लेना।”

पद्मजा दीदी की बात पर हामी भर पारो उठ खड़ी हुई। चारों ने रसोई समेट कर साफ सुथरी कर दी और वहाँ से अपने दोपहर के ठिकाने पर चल निकली।
  सरोवर के किनारे किनारे आगे बढ़ने पर घने पेड़ और झाड़ियों से घिरा पथरीला सा स्थान था। वहाँ सरोवर के ठीक किनारे होने से पानी से उठने वाले ठंडी हवा के झोंके भी आते थे।
    वो एक पुरानी बड़ी सी शिला थी जिसके बिछे होने से वहाँ समतल चौरस जगह बन गयी थीं,वहीं रोज़ दरी चटाई बिछा कर चारों पढ़ाई किया करती थी। आज भी चारों वहीं पहुंच गईं। 
       आपसी बातचीत में लगी चारों आज खुश थीं। कुछ समय बीतने के बाद पारो उठ कर जाने को हुई…

“क्या हुआ तू कहाँ चल दीं?”

“मौजमस्ती का समय खत्म। अब पढ़ाई शुरू करने जा रही हूं।”

“अब कौन सी पढ़ाई?”

“मैंने पीएमटी का फॉर्म भी डाल रखा है ना। उसके लिए भी तो पढना है।”

“अरे उसमें कौन सा इस साल सेलेक्शन हो ही जाना है। छोड़ न, इस साल तो बस आइडिया लेने के लिये दे देना। अगले साल अच्छे से तैयारी कर के देना। समझी।”

  पारो मुस्कुरा उठी, वो कैसे किसी को समझाती की उसके लिए ये इम्तहान नही उसके जीवन मरण का प्रश्न था।
   आती हूँ कहकर वो वहाँ से निकल गयी….

********

” कृष्ण हमेशा से न्याय के पक्षधर रहे। उन्होंने कभी किसी के साथ अन्याय नही होने दिया। स्वयं के साथ भी नही।
    शिशुपाल वध इसी का उदाहरण है। आप में से कइयों के मन में ये संशय कभी न कभी पैदा हुआ होगा कि वो तो स्वयं भगवान थे तो आखिर अपने भाई को उसकी सौ गलतियों के बाद भी माफ करने का माद्दा रखने की जगह उसे मौत क्यों दी। उन्होंने अपना भगवानपन क्यों नही दिखाया और बड़ा दिल रख कर उसे माफ क्यों नही किया।
  तो इसका जवाब यही है कि अत्याचार सहने की भी एक सीमा निर्धारित होनी चाहिए क्योंकि ये आपका शरीर भले ही हो पर बनाया तो उस सर्वशक्तिमान ने है जिसे हम अपना  सृजनकर्ता मानते हुए खुद को उसकी संतान मानते हैं। तो जब उसके बनाये संसार का हम अपमान नही करते और न सहते हैं तो उसी के बनाये हमारे शरीर का अपमान हम क्यों सहें। सिर्फ इसलिए कि अपमान करने वाला हमारा ही कोई नातेदार है हम बार बार अपनी फजीहत नही करवा सकते और बस यही समझाने के लिए उन्होंने भगवान होते हुए भी,बड़े दिल के स्वामी होते हुए भी अपने ही भाई को उसकी सौ गलती के बाद मृत्युदंड दिया।
   कि भाई भले ही तुम मेरे भ्राता हो तुम्हारा मेरे शरीर को गालियां देने का हक बनता है , लेकिन तुमसे अधिक हक तो मेरा स्वयम का मेरे शरीर पर है जिसकी मैं आराधना करता हूँ तो एक सीमा से बाहर मैं संसार में किसी को ये हक नही देता की वो मुझे अपमानित करे।
   श्री कृष्ण अगर यह समझा रहें हैं तो हम उनकी बात क्यों नही समझ पाते हैं । हम क्यों लोगों को मौके देते हैं कि वो हमें क्षण क्षण पर अपमानित करते चले जाएं।
    मैं आज इस प्रवचन के माध्यम से हमारे आश्रम की महिलाओं से कहना चाहता हूं कि आप भी उसी कृष्ण का सृजन हैं जिसका मैं और इसलिए आप भी हकदार हैं पूरे सम्मान की।
    अपने शरीर को मंदिर समझ कर उसका सम्मान कीजिये और उसे बिना ज़रूरत के कष्ट मत दीजिये, ना ही शारीरिक न मानसिक।
   अगर आप लोगो को सहीं लगे तो अबसे पूरे आश्रम के लिए समान भोजन बनेगा और आश्रम के पुरुष और महिलाएं साथ बैठ कर भोजन करेंगे। 
   जिस दिन महिलाओं का व्रत होगा उस दिन व्रत में खाया जाने वाला भोजन बनेगा और आश्रम का हर एक सदस्य उसी भोजन को खायेगा। यानी अगर महिलाएं व्रत के दिन सिर्फ शाम को आहार लेती हैं तो सिर्फ शाम में ही भोजन बनेगा और हम सब भी शाम को ही प्रसादी पाएंगे। “

   श्रद्धालुओं के पीछे बैठी भगिनी आश्रम की महिलाओं के चेहरे पर अचरज के भाव थे। उन लोगों के लिए ये बहुत बड़ी बात थी कि आश्रम के एक दयालु संत उन सभी के बारे में इतना सोच रहे थे। क्योंकि उनमें से कई एक तो ऐसी थी  जो असल में व्रत रखना ही नही चाहती थीं पर आश्रम की परिपाटी के कारण व्रत करने को मजबूर थी। उनके चेहरों पर मुस्कान खिल उठी और सबसे पीछे एक मीनार की टेक लगाए खड़ी पारो ने वरुण को देखा , वरुण ने पारो को।
  पारो की आंखें मुस्कुरा रही थी और आंखों ही में उसे अभिवादन करते हुए आभार व्यक्त कर रही थी, और वरुण की आंखें उस अभिवादन आभार का भार उठाती झुक कर मुस्कुराने लगी….

क्रमशः

  दिल से …..

    हां अब सोच लिया है कि छोटा ही सही पर दिल से लिखूंगी ज़रूर।

  मैं बहुत छोटी थी तब मुझे बहुत से व्रत त्योहारों का पता ही नही होता था। सच कहूं तो कॉलेज में आने के बाद भी मुझे छठ जैसे अनोखे व्रत के बारे में कुछ भी मालूम नही था।
   अब सोचती हूँ क्या मेरी क्लास  में कोई बिहारी बंदा/ बंदी नही था। शायद नही ही रहा होगा। पर अभी कुछ सालों में छठ का जैसे एकदम से फैशन सा आ गया है।
   हमारी टाउनशिप में भी औरतें बहुत सुंदरता से व्रत की कठिनाइयों को किनारे कर सूरज की दोनों वक्त की पूजा और अर्ध्य ज़रूर करती हैं।
  हमारे टाउनशिप में कुल जमा सात स्विमिंग पूल हैं जिनमें कमर तक डूबी सुहागन स्त्रियों का सूरज को अर्ध्य देना चमत्कृत करने वाला दृश्य होता है। मैंने जब पहली बार देखा तो वाकई गुज़बम्पस हुए थे।


  व्रत की कथा महत्ता आज भी बहुत ज्यादा नही मालूम लेकिन ये समझ में आया कि ये अत्यंत कठिन व्रत है जो महिलाएं अपने मन की हिम्मत के बलबूते करती हैं और मज़े की बात ये है कि घर परिवार के पुरुष सदस्य किसी भी स्वभाव के हों इस व्रत में बड़े बड़े डालना उठाये अपनी पत्नी/माँ/ भाभी आदी की मदद को आतुर दिखतें है और पूरे गर्व से करतें हैं।
   इस व्रत की एक और सुंदर बात ये है की पूरा मुहल्ला, गांव खेड़ा एक साथ इस पूजन में सम्मिलित होता है।
 
   आज जब फेसबुक पर रिश्तेदारों को गालियां देना लेटेस्ट ट्रेंड  है ऐसे में हमारे ही समाज का एक हिस्सा हमारे व्रत त्योहार को जिलाये रखने के लिए आज भी पूरी तन्मयता से लगा है देख कर अच्छा लगता है।

   पिछले महीने एक दोस्त मुम्बई से आई थी। एक रात मेरे घर ही उनका रुकना हुआ।
    बातों ही बातों में उसने बताया कि छठ के समय वो लोग अपने ससुराल घर में थे जो पटना से पंद्रह बीस किलोमीटर पर कहीं है। और तब उसने ससुराल का हल्का सा उलाहना भी दिया कि पहले तो सबने मना कर दिया था कि नही आएंगे इस बार , पर ऐन खरना से दो दिन पहले मंडली की मंडली चली आयी। अब सासु माँ ने खाना बनाने वाली रखी नही थी और तब इन्ही मुम्बई वाली सखी को अपनी देवरानी के साथ मिल कर पूरा खाना बजाना सब देखना बनाना पड़ा।
  रोते झींकते ही सही पर उसे अपनी बड़ी बहू होने का फर्ज याद आया और जैसा जितना बन सका उसने अपनी देवरानी की मदद  से कर लिया।
  उसके शब्दों में …-” मैंने कहा प्रीति हमसे पचास पचास रोटियां न बेली जाएंगी और न सेकी जाएंगी। कड़ाही चढ़ाओ पूरियां ही निकालेंगे अब तीनों दिन।

मैंने पूछ लिया कि खीर के साथ रोटी खाई जाती है ना। तब उसका जवाब था मेन परसादी तो खीर ही है। पहले के लोग पूड़ियाँ तलने से बचने रोटियां बनाते होंगे हम तो अपनी सास से भी कह दिए… अम्मा अब रस्मों रिवाज में थोड़े से बदलाव की ज़रूरत है । अब से हमारे यहाँ रोटी की जगह पूड़ियाँ ही चलेंगी।
 
  उसी के शब्दों में उसकी सास ने भी अपनी बहू की बात मान ली और हंसी खुशी व्रत त्योहार निपट गया।

   घुटनों से ऊपर की शॉर्ट्स पहने हाथ में कॉफी का कप थामे जब वो अपना किस्सा सुना रही थी तो सुनते हुए लगातार मेरे चेहरे पर एक मुस्कान बनी हुई थी।

सही भी तो है…

  किसी रूढ़ि को सिरे से नकार देने से कहीं बेहतर है, उसे अपनी सुविधानुसार बना कर पालन कर लेना। पुरानी पीढ़ी भी खुश और हम भी !!!!

कम से कम खाली बैठे फेसबुक के पेज पर निर्रथक गाली गलौच से कहीं बेहतर है अपनी पुरानी रूढ़ियों पर फोकस करना और उन्हें उनके सम्पूर्ण अस्तित्व में थोड़े बहुत सुधार के साथ स्वीकार करना।
   मेरे किस्सों की गुल्लक से निकला ये छोटा सा किस्सा एक व्रत पर था….
…. एक आस्था पर था, विश्वास पर था!!!

    जय छठी मैय्या की!!!

  मुझे पढ़ने सराहने के लिए दिल से आभार शुक्रिया नवाज़िश !!

aparna…
   
  

         

समिधा -56

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समिधा – 56

   प्रशांत वरुण का हाथ थामे अंदर ऑफिस में दाखिल हो गया। उन दोनों के अंदर पहुंचते ही डॉक्टर के साथ ही श्रेया और पारो की भी आंखें उन दोनों की तरफ उठ गई।
    वरुण यह सोच सोच कर हैरान हो रहा था कि उसके इस तरह से ऑफिस में चले आने से पारो पता नहीं उसके बारे में क्या सोचेगी, कहीं पारो के मन में यह ख्याल ना आ जाए कि वह एक अनजान लड़के के साथ बैठकर बातें कर रही है और इसीलिए वरुण वहां चला आया है।
    जबकि वरुण के विचारों से अलग पारो के मन में अलग ही फुलझड़ियां छूट रही थी। वरुण का इस तरह से खुद को देखते हुए पाना उसके मन में कई नई उमंगों को जगा गया था। लेकिन वह अपने इस उत्साह को सभी के सामने दिखाना नहीं चाहती थी, इसलिए वह मुस्कुराते हुए शरमा कर नीचे किताबों में अपनी नजर गड़ाए बैठी थी।
    और उसका इस तरह से मुस्कुराना देख वरुण यही सोच रहा था कि पारो उसकी हार पर मुस्कुरा रही है।
   
” अब कैसी तबियत है आपकी?”

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वरुण का डॉक्टर साहब के सवाल पर पहली बार में ध्यान ही नहीं गया। जब प्रशांत ने उसे कोहनी मारी तब वरुण को ध्यान आया कि डॉक्टर साहब उसी की तबीयत के बारे में पूछ रहे हैं..

” जी !! आपकी दवाइयों से अब मैं काफी स्वस्थ हूं।”

” मेरी दवाइयों के अलावा इनकी दुआएं और सेवा भी आपके स्वस्थ होने का एक बहुत मुख्य कारण है।”

  डॉक्टर के ऐसा कहते ही वरुण मुस्कुरा उठा। वरुण के मुस्कुरातें ही पारो उठ खड़ी हुई…

” मैं आप सबके लिए चाय लेकर आऊँ?”

पारो ने वरुण की तरफ देखकर ही सवाल किया!
और , अपनी आंखों में झांकती पारो की आंखों को सम्मोहित दृष्टि से देखता वरुण बस हां में सर हिला कर रह गया।
    पारो मुस्कुराकर ऑफिस से बाहर निकल गई..

” शी इज़ जीनीयस, बस थोड़ी ओवरकॉन्फिडेंट है।”

डॉक्टर की इस बात पर श्रेया ने भी हामी भर दी…

” थोड़ी नहीं भैया वह बहुत ज्यादा ओवर कॉन्फिडेंट है। अच्छी बात है, कम से कम एग्जाम फोबिया नहीं है उसे.. लेकिन कहीं ये ओवरकॉन्फिडेंस उसे ले ना डूबे।”

श्रेया ने अपनी चिंतित दृष्टि वरुण और प्रशांत की तरफ घुमा दी। लेकिन वरुण को उन दोनों की यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई और वह इस बात का प्रतिरोध करने से खुद को रोक नहीं पाया….

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” आत्मविश्वास!! यह एक ऐसी चीज है जो हर किसी को नहीं मिलती। यह अक्सर जन्मजात होती है। या फिर जो मनुष्य इसे स्वयं के बूते हासिल करता हैं, उसके पीछे उसकी ढेरों मेहनत छिपी होती है।
हर व्यक्ति में कोई ना कोई प्रतिभा छिपी होती है किसी को अपनी प्रतिभा का भान हो पाता है, और किसी को आजीवन अपनी प्रतिभा के बारे में पता ही नहीं चल पाता। लेकिन आत्मविश्वास एक ऐसी चीज है जिससे हम में से अधिकतर इंसान वंचित ही रह जाते हैं। हमने कितने भी गुण हो, प्रतिभा हो लेकिन अपने ऊपर विश्वास कभी नहीं रह जाता और इसीलिए हम बहुत मर्तबा ठोकर खा कर रह जाते हैं।
   पारो प्रतिभाशाली है। और उसे अपनी प्रतिभा का ज्ञान भी है, वह बुद्धिमती है और इस बात पर गर्व नहीं करती, घमंड नहीं करती, बस जानती है कि वह बुद्धि मती है और उसे अपनी बुद्धि का प्रयोग करना भी आता है। वो एक साधारण सी युवती नहीं है, उसका दिमाग वाकई हम सब से अलग चलता है। ये सारी पढ़ाई हम जैसे साधारण विद्यर्थियों के लिए जटिल होगी लेकिन उसके दिमाग के हिसाब से ये बहुत सरल और सामान्य है।
वो एक श्रुतिधर है यानी, उसके दिमाग को बनाने वाले ने ऐसे बनाया है की वो सिर्फ एक बार सुन कर, देख कर या पढ़ कर ही विषयों को याद रख लेती हैं। उसे इस सब के लिए किसी तरह से अलग से मेहनत करने की आवश्यकता नही है। उसके लिए इन सारी किताबों को बस एक बार अपनी आंखों के सामने से निकालने बस की देर है, और फिर इन किताबों में छपा सब कुछ उसके दिमाग में वैसे का वैसा छप जाएगा।
उसने सिर्फ चार महीने की पढ़ाई में हाईस्कूल में पूरे सम्भाग में पहला स्थान बनाया था। और वो चार महीने की पढ़ाई भी ऐसी जिसमें न उसने घर का कोई काम करना छोड़ा और न ठाकुर माँ की सेवा में कोई कोताही की!
मैंने उसे और उसकी मेहनत को देखा…..”

बोलते बोलते अचानक वरुण रुक गया। उसके मन में आया कि ये सब वो कैसे इतनी बारीकी से बता पा रहा है। जैसे वाकई वो रात दिन पारो के साथ ही था। फिर अचानक कुछ सोचते हुए उसने अपनी बात पूरी करी।" वह तो बाद में ओवर कॉन्फिडेंट होगी खुद पर उससे कहीं अधिक मुझे कॉन्फिडेंस है कि पारो ने जो सोच रखा है वह पूरा करके रहेगी। "

” तो फिर ये बताओ वरुणदेव!! जब इतना कॉन्फिडेंस है पारो पर कि वह जो चाहेगी वह करके रहेगी तो फिर उसके एग्जाम के रिजल्ट आने तक तुमने मीठा खाना क्योंकि त्याग रखा है भला।”

  सत्यानाश!! प्रशांत से अपने मन की कोई भी बात बताना सबसे बड़ी मूर्खता है। मन ही मन यह सोचता वरुण डॉक्टर और उसकी बहन के सामने कट कर रह गया। क्या जरूरत थी प्रशांत को इतना बड़बोलापन दिखाने की। और उससे भी अधिक उसे खुद को क्या जरूरत थी, प्रशांत को यह बताने की , कि जब तक पारो का परीक्षा फल नहीं आ जाता वह किसी भी तरह की मिठाई को हाथ भी नहीं लगाएगा।
   वरुण मन ही मन खुद को और प्रशांत को कोस रहा था कि डॉक्टर एक बार फिर चहक उठा।

” अच्छा तो मतलब आप संत स्वामी लोग भी मन्नतें करते हैं?”

” जी नहीं ऐसी तो कोई बात….”

  वरुण अभी डॉक्टर की बात का कोई जवाब दे पाता कि उसके पहले प्रशांत वापस उसकी बात काटकर शुरू हो गया….

” हां डॉक्टर साहब क्यों नहीं करते? आखिर हम भी तो इंसान ही हैं! संत साधु हम बाद में बनते हैं, लेकिन पहले हम भी आपकी तरह हाड माँस के बने इंसान ही हैं। हमारे अंदर भी एक छोटा सा दिल रहता है महसूस करने के लिए।
एक दिमाग है सोचने समझने के लिए और निर्णय लेने के लिए लेकिन हमारा भी दिल उतना ही कोमल है जितना आप सब लोगों का।
   बहुत से ऐसे कार्य होते हैं जो हमारी परिधि से बाहर के होते हैं। और उन कार्यों को पूरा करने के लिए हम भी अपने प्यारे से बाल गोपाल को रिश्वत देते रहते हैं। और इस बार हमारे वरुण देव ने कान्हा जी को यही रिश्वत दी है।
    इन्होंने पूरे सवा किलो लड्डू कान्हा जी को चढ़ाने के बाद उनके सामने हाथ जोड़कर यह प्रार्थना की, कि पारो इस साल जिन भी परीक्षाओं में बैठे उन सभी परीक्षाओं में उसकी विजय हो और अब जब तक पारो मेडिकल एंट्रेंस सेलेक्ट नहीं हो जाती यह किसी भी तरह का मीठा नहीं खाएंगे।
    कुछ ऐसी ही मन्नत जब यह बीमार पड़े थे और अस्पताल में भर्ती थे तब हमारी बहन पारोमिता ने करी थी।”

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   अब चौंकने की बारी वरुण की थी। क्योंकि उसे इस बारे में कुछ भी नहीं मालूम था, कि जब वह अस्पताल में भर्ती था , तब पारो में भी किसी तरह की कोई मन्नत की थी। वह तुरंत चौंक कर प्रशांत की तरफ देखने लगा…

” कैसी मन्नत? कौन सी मन्नत ?तुमने मुझे कुछ बताया नहीं?”

” ना बताने के लिए उस वक्त उसने मुझे कसम दे रखी थी। पारो ने उन पूरे 4 दिन जब तुम अस्पताल में भर्ती थे अन्न का एक दाना भी नहीं खाया। वो भूखी प्यासी कान्हा जी के सामने इसी जिद पर अड़ी थी, कि अगर तुम स्वस्थ होकर आश्रम नहीं लौटे तो वह कभी कुछ नहीं खाएगी।”

” यह क्या बचपना था प्रशांत!! तुम्हें तो उसे समझाना चाहिए था इस तरह अस्पताल में मेरी सेवा करते हुए खाली पेट दिन गुजार देने का क्या मतलब था?”

” तुम ही तो कहते हो ना कि वो बहुत ज़िद्दी  है। और किसी की नहीं सुनती । जब तुम्हारी नहीं सुनती तो मेरी कहां से सुनेगी?”

” पर यह तो सरासर बेवकूफी है।”

वरुण को पारो के इस त्याग के बारे में पहले कुछ नहीं मालूम था। और अब यह सुनने के बाद उसका मन पारो को देखने के लिए छटपटा रहा था।

” अच्छा तुम करो तो त्याग!  कोई और करें तो बेवकूफी! यह कैसा इंसाफ है वरुण? “

” वह बच्ची है प्रशांत !! इस उम्र में ऐसे व्रत करेगी तो उसके शरीर पर क्या असर पड़ेगा?”

” इतनी भी बच्चे नहीं है।  18 साल की हो चुकी है।  हमारा देश भी उसे वोट देने का अधिकार देता है। इसका मतलब समझते हो वह अपने बारे में निर्णय लेने में सक्षम हो चुकी है । और मुझे लगता है तुम से कहीं ज्यादा परिपक्वता से वह निर्णय लेती है। तुम्हें उसके निर्णय का आदर सम्मान करना चाहिए। “

प्रशांत की गहरी नजरें देखकर वरुण प्रशांत की बात समझ गया और झेंप कर दूसरी तरफ देखने लगा।

   लेकिन इस सब के साथ ही बाहर चाय की ट्रे लेकर खड़ी पारो ने भी वरुण की सारी सच्चाई सुन ली थी। एक तरफ तो उसका मन आह्लादित हुआ जा रहा था कि वरुण ने उसके लिए और उसकी परीक्षाओं के लिए मन्नत कर रखी है। और दूसरी तरफ आंखें भीगी जा रही थी क्योंकि जीवन में पहली बार किसी ने उसके लिए भगवान को चुनौती दी थी।
    अपने आराध्य को चुनौती देकर वरुण उसके लिए, सिर्फ उसके लिए मीठा त्यागे बैठा था। वह खुद भी जानती थी कि वरुण को मीठा कितना पसंद था। प्रतिदिन के भोजन के बाद उसे कुछ ना कुछ थोड़ी मात्रा में मीठा चाहिए ही होता था।
    कुछ नहीं मिलने पर वह भोजन के बाद लस्सी ही पी लिया करता था। जिसकी जगह आश्रम के बाकी लोग छांछ पिया करते थे। आश्रम के नियमों के अनुसार छांछ भोजन के बाद सभी को ही दी जाती थी, लेकिन मीठा ना होने की स्थिति में वरुण के लिए लस्सी ही बनाई जाती थी।
   और अब पारो को याद आ रहा था कि पिछले कई दिनों से वरुण ने लस्सी पीनी भी छोड़ दी थी। मीठा भी नही खा रहा था। और इस सब का कारण पारो उसकी बीमारी और परहेज से जोड़ कर देख रही थी।
   उसने धीमे से अपने ऑंसू पोंछे और चाय की ट्रे लेकर अंदर चली गयी।

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    डॉक्टर और श्रेया वरुण और प्रशांत की बात सुनते अचरज में डूबे बैठे थे… उन दोनों के लिये ये बहुत नई और अलग सी बात थी कि दो एक एक दूसरे से अनजान लोग यूँ एक दूजे के लिए कष्ट उठा रहे हैं।

सबको चाय देने के बाद पारो वरुण के सामने ट्रे लिए खड़ी हो गयी, उसने धीमे से अपनी कप उठा कर पारो को देखा , पारो की आंखें छलक उठी। पर उसने अपने आंसूओं को गिरने नही दिया।
वरुण को एकाएक पारो की गीली आंखों का कारण समझ नही आया, उसने वापस उसे देख इशारों में ही कारण पूछा लेकिन पारो ने धीमे से न में सिर हिला दिया….
उसके मन में करुणा का जो स्त्रोत बह रहा था उसे वो किसी को बता पाने में असमर्थ थी।
उसके हृदय की करुणा का अंत न था। कम उम्र में ब्याह के बाद देव की साज सम्भाल में वो जब अपने पति में छिपे प्रेमी को देख पाने वाली थी कि भगवान ने ऐसा वज्रपात किया कि उसका सुखस्वप्न अचानक भंग हो गया।
प्रेम का बीज जो उसके हृदय में बस बोया था देव ने उसे खाद पानी मिल भी नही पाया और वो चला गया, लेकिन फिर अचानक वरुण के सानिध्य में ऐसा कौन सा अपनापन था कि वो बीज वापस अंकुरण को तैयार होने लगा था।
वरुण के साथ रहने पर उसे यही आभास मिलता की वो देव के साथ है। आंखें बंद करने पर तो लगता ही नही की सामने कोई और है।
यहां तक कि वरुण के पास से आने वाली भीनी सी महक भी उसे देव की ही लगती, वरुण का स्पर्श , उसकी आँखों की चावनी, उसका बोलते हुए बीच में अचानक रुक जाना, उसका दूर से खड़े होकर उसे अपलक निहारना… हर बात में तो देव शामिल होता था।
अब तो उसे कई बार यूँ लगने लगा था कि वरुण की हर हरकत उसके हर क्रियाकलाप के पीछे उसका देव ही हाथ बांधे खड़ा मुस्कुरा रहा है।
और तभी तो वो वरुण के और करीब जाने को इतनी उतावली हो उठी थी।
पर अब उसे अपने मन को बांधना होगा, अब उसे अपने जीवन का लक्ष्य मिल चुका है। और उस लक्ष्य की प्राप्ति तक अब उसकी राह में कोई रुकावट न आये यही उसकी चाह थी।
ईश्वर के घर रहते हुए भी अब उसका किसी बात के लिए हाथ फैलाने का मन नही करता था। वो सामने से होकर कृष्ण को रिश्वत ही देती आयीं थी।
आज भी उसने वही किया …….

” मेरे तीन दिन भोजन न करने से तुमने उन्हें (वरुण) स्वस्थ कर दिया था, अब उन्होंने मेरी परीक्षाओं के लिए मीठा खाना छोड़ रखा है, अगर इस बार उनकी मन्नत पूरी नही की तो तुम्हारा ये मन्दिर ये आश्रम छोड़ कर हमेशा के लिए चली जाऊंगी।
अगर मैं अपनी परीक्षाओं में सफल नही हो पाई तो न मैं अब तुम्हें मुहँ दिखाउंगी और न उन्हें।”

अपनी प्रतिज्ञा मन ही मन दुहराती वो वापस श्रेया के पास जा बैठी, और अपने मन में चल रही शंकाओं और सवालों को उससे पूछने लगी। श्रेया ने अपने साथ रखी पुस्तकें और बाकी का स्टडी मटेरियल उसके हवाले किया और उसे पढ़ने और याद रखने के नुस्खे बताने लगी।
उसके साथ बातों में डूबी पारो का फिर वाकई ध्यान न वरुण पर रहा और न वहाँ बैठे बाकियों पर।

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डॉक्टर नन्दकिशोर वरुण और प्रशांत से बातों में लगा रहा पर रह रह कर वरुण का ध्यान पारो पर चला जा रहा था जो अपने और अपनी किताबों में मगन नज़र आ रही थी…..

क्रमशः

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aparna…..

समिधा – 55

समिधा -55

   आश्रम एक बार फिर अपनी लय में चलने लगा। पूजा पाठ आरती प्रवचन सभी अपने तयशुदा समय पर पूरे होते चले जाते।  भगिनी आश्रम की कन्याओं का पाठशाला का मार्ग भी प्रशस्त हो चुका था।
    पारोमिता अपने तीन अन्य साथियों के साथ पूरे उत्साह से स्कूल जाने और आने लगी थी। लेकिन उसके स्कूल जाने के बावजूद उसके द्वारा की जाने वाली वरुण की भक्ति और सेवा में कोई कमी नहीं आई थी।
रोज सुबह स्कूल जाने से पहले वह वरुण की प्रवचन की सारी तैयारी निपटा कर जाती उसके बैठने के स्थान पर आसन बिछाना उसकी किताबें और कलम वहां रखना साथ ही गर्म पानी का कलश रखना इनमें से कोई ऐसा कार्य नहीं था जो पारो कभी भी भूलती।
   यह सारा कुछ निपटाने के बाद उसे भगिनी आश्रम की रसोई में भी अपनी सखियों के साथ थोड़ी मदद देनी ही पड़ती, भले ही आश्रम की बाकी महिलाएं उन चारों बालिकाओं को देखकर प्रसन्न थीं। पर उनमें कुछ ऐसी महिलाएं भी थी जिनकी आंखों में जलन की भावना चमकने लगती थी। उन्हें लगता था हम ही अकेले इतनी लंबी चौड़ी रसोई में क्यों जूझ रहे है। अगर यह लड़कियाँ बाहर पढ़ने जा रही हैं तो इन्हें एक तरह से बाहर घूमने का मौका मिल रहा है।


      आश्रम के कट्टर अनुशासन से भरे माहौल से बाहर कम से कम 6 घंटे का समय इन लड़कियों को मिल जाता है जिसमें यह अपने तरीके से जी लेती हैं। ऐसे विचार रखने वाली महिलाएं इन चारों पर कुछ अधिक ही कठोर दृष्टि रखने लगी थी और उन्हीं के बनाए नियमों के अनुसार पाठशाला के लिए निकलने से पहले इन सभी लड़कियों को रसोई घर में थोड़ी मदद देनी ही पड़ती थी। पाठशाला से वापस आने के बाद भी इन चारों को अपने हिस्से के काम करने ही पड़ते थे।
     इसका फल यह हुआ कि पारो के अलावा बाकी की लड़कियाँ टूटने लगी थी। उन्हें लगता स्कूल जाने और पढ़ाई करने की थकान ही क्या कम थी जो वहां से लौटने के बाद आश्रम में इतना सारा काम भी करना पड़ता है? उनमें से एक आध के कदम डगमगाने से भी लगे थे।
      और एक शाम जब वह चारों स्कूल से आने के बाद आश्रम के अपने काम निपटा कर सरोवर किनारे बैठे पाठशाला का बाकी बचा काम लिख रही थी तब सरिता अचानक फूट पड़ी….

” मुझे नहीं करनी है ये सारी पढ़ाई ।मुझसे नहीं हो पाएगा।”

” अरे ऐसा क्यों बोल रही है सरिता, हुआ क्या?”

” हुआ क्या तो तू ऐसे पूछ रही है पारो जैसे तुझे नहीं मालूम? देखकर लगता नहीं है कि आश्रम की कुछ दीदीयों का स्वभाव कितना बदल गया है हमारे लिए।
   स्कूल जाना शुरू करने से पहले हम जितना काम किया करते थे अब मुझे लगता है उससे कहीं ज्यादा काम हम पर लाद दिया जा रहा है। जैसे की ये सारी खूसंठ बुड्ढियां हम से बदला ले रहीं हैं , कि हम आश्रम से बाहर रोज घूमने जाते हैं। उन्हें क्या पता कि स्कूल में कितनी सारी पढ़ाई करनी पड़ती है वैसे ही दिमाग का दही हुआ जाता है। उस पर आश्रम आने के बाद इनके ढेर सारे काम निपटाओ।
   मैं नहीं पढ़ पाऊंगी पारो। यही हाल रहा तो बिल्कुल नहीं पढ़ पाऊंगी।”

  ” तू सही कह रही है सरिता। तुझे पढ़ना भी नहीं चाहिए कल ही तू अपना नाम स्कूल से कटवा ले। और फिर पूरी तरह से आश्रम की सेवा में जुट जा, क्योंकि इससे अच्छी जगह तो और कहीं हो नहीं सकती… ऐसे ही तू भी आश्रम की सेवा करते करते 1 दिन इन्हीं दीदियों की तरह खूसंठ हो जाना और फिर कभी कोई हमारी जैसी बालिका यहां चली आई तो उसे भी तू इसी तरह पढ़ने मत जाने देना। उस पर भी काम का बोझ लाद लाद कर उसे इतना झुका देना, कि वह भी टूट कर बिखर जाए और पढ़ाई के अपने सपने को अपनी आंखों से निकालकर इसी सरोवर में बहा दे।”

“तू क्या कह रही है पारो?”

  मधुलिका पारो की बात सुन कर चौंक गईं….. और आगे सरिता को देख कहने लगी…

” पढ़ाई छोड़ने के और भी तो फायदे हैं। पूरा दिन आराम से दीदियों की सेवा करने का सुअवसर भी तो इसे मिलेगा। फिर हो सकता है कि पद्मजा दीदी सबसे ज्यादा सरिता को ही पसंद करने लगे और आगे जाकर जब हम सब बुड्ढे हो जाए तब सरिता को ही भगिनी आश्रम की रसोई का पूरा कार्यभार पद्मजा दीदी के द्वारा मिल जाए इससे ज्यादा खुशी की बात क्या हो सकती है पारो?”

” तू सही कह रही है मधु । ऐसा ही होगा। “

  सरिता ने बारी-बारी से पारो मधुलिका नैना को देखा और मुंह उतार कर बैठ गई….

” तुम दोनों मेरा मजाक बना रही हो है ना?”

” जी हां जैसी बातें तू कर रही है उसके बाद कोई भी तेरा मजाक ही बनाएगा। हमारी शिक्षा का द्वार खुल जाए इसके लिए इस आश्रम ने कितना बड़ा कदम उठाया है , यह तू सोच भी नहीं सकती। अब अगर 1-1 कर हम हिम्मत हार कर पढ़ना ही छोड़ दें तो हमारे बाद कभी कोई यहां से पाठशाला नहीं जा पाएगा। हम हिम्मत ना हारे अगर अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ाते रहें तो यह हमारे इस आश्रम की एक परिपाटी बन जाएगी कि अगर कोई छोटी उम्र की बालिकाएं दुर्भाग्य से इस आश्रम का हिस्सा बनते हैं तो कम से कम उच्च शिक्षा से वंचित तो ना रहे।
   अगर हम चारों ही हिम्मत हार गए तो यह याद रखना कि भगिनी आश्रम से फिर कभी कोई लड़की पढ़ने के लिए नहीं निकल पाएगी।
    बस कुछ दिनों की तकलीफ है सरिता एक बार हम कुछ कर पाए , पढ़ पाए तो इन्हीं सब दीदियों के चेहरे पर हमारे लिए मुस्कान और आंखों में हमारे लिए आशीर्वाद होगा।
    अभी असल में वह अपने समय से हमारे
समय की तुलना करते हैं और इसीलिए दुखी हो जाती है । क्योंकि कहीं ना कहीं उन सब को भी इस मौके की चाह रही होगी जो उन्हें नहीं मिला लेकिन हमें मिल रहा है। और इसीलिए एक स्वाभाविक जलन और ईर्ष्या के कारण वह हमारा मार्ग रोकना चाहती हैं, बाधित करना चाहती हैं। लेकिन दिल ही दिल में कहीं ना कहीं वह शायद यह भी चाहती होंगी की हमारी तरह बाकियों को भी यह मौका मिले।
     हमें उनके स्वभाव का दूसरा हिस्सा देखना चाहिए और उस पर ध्यान देना चाहिए। अभी तो शुरुआत है इसलिए यह सब हमें देखना पड़ रहा है कुछ समय बीतने दो यही दीदियाँ हमारे पक्ष में बाकियों के खिलाफ खड़ी हो जाएंगी, तुम देखती रहना।”

   सरिता मुस्कुराकर पारो के गले से झूल गई।

” चल चल अब लाड बाद में लड़ाना, अभी ढेर सारा काम है स्कूल का। इसे फटाफट लिखना है तभी तो कल की इकाई परीक्षा में हमारे नंबर ठीक आएंगे। “

” ठीक आएंगे ? तेरे तो हमेशा ही अच्छे आते हैं… कभी एक नंबर भी नहीं कटता तेरा। पारो एक बात बता, तेरे साथ ऐसे कैसे होता है कि कक्षा में पढ़ाई की बातें तू एक बार में याद रख लेती है।”

” क्योंकि मैं अच्छे से जानती हूं कि मेरे पास समय कम है। और ढेर सारी पढ़ाई करनी है , तो जितना हिस्सा हमारे गुरुजी पाठशाला में पढ़ाते हैं उसे मैं उसी वक्त ध्यान से सुन कर दिमाग में रख लेती हूं। जिससे बाद में उसे सिर्फ एक बार पढ़ने पर ही वह हमेशा के लिए याद रह जाए।”

” ध्यान से तो मैं भी सुनती हूं पर मेरा दिमाग तेरे जैसा तेज नहीं है।”

” ऐसा कुछ नहीं है सरु। दिमाग तो हम सब के बराबर हैं। बस पढ़ाई करते समय तेरा ध्यान रसोई में लगा रहता होगा, कि आज रसोई में गोभी बन रही है या बैंगन?”

   पारो की बात सुनकर उसकी तीनों सखियां खिलखिला कर हंस पड़ी। वह चारों वापस अपना काम कॉपी में लिखने लगी , कि उसी वक्त आश्रम के ऑफिस से पारो के लिए बुलावा आ गया।

” पारो तुमसे मिलने कोई 2 लोग आए हैं ऑफिस में?”

पारो सोच में पड़ गई कि सप्ताह के बीच में उससे मिलने कौन से दो लोग आ सकते हैं? क्योंकि दर्शन तो महीने के आखिरी रविवार को ही उससे मिलने आ पाता था….

वो उठ कर ऑफिस की तरफ चल पड़ी। वो ऑफिस की तरफ बढ़ रही थी कि कृष्ण मंडप की सीढ़ियों में बैठे वरुण ने उसे जाते देखा और वह भी सोच में पड़ गया कि इस वक्त पारो ऑफिस क्यों जा रही है।
   वह भी यही बात सोचने लगा कि आखिर सप्ताह के बीच में पारो से मिलने कौन आ सकता है ? और अपने मन की शंका का समाधान करने वह भी धीमे कदमों से उठकर पारो के पीछे चल पड़ा।

   ऑफिस में दाखिल होते ही पारो कुछ पल को सामने बैठे दोनों लोगों को देखकर अचानक पहचान नहीं पाई और फिर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान खिल गई…..

” नमस्ते डॉक्टर साहब कैसे हैं आप?”

” मैं तो ठीक हूं तुम कैसी हो?”

तारों ने मुस्कुराकर गर्दन हाँ में हिलाई और उन दोनों के सामने कुर्सी खींचकर बैठ गयी। सामने बैठे डॉक्टर ने बाजू में बैठी लड़की से पारो का परिचय करवा दिया…..

” यह श्रेया है! तुम्हें बताया था ना, मेरी बहन है! और अभी मेडिकल एंट्रेंस के लिए तैयारी कर रही है। और श्रेया यह पारोमिता है! यह इस साल ट्वेल्थ में है! और यह भी डॉक्टर बनना चाहती है, तो तुम से जितनी हो सके इनकी मदद की अपेक्षा रखता हूं। “

श्रेया ने मुस्कुराकर पारो की तरफ देखा और अपने साथ लाया हुआ एक बैग उसके सामने खोल दिया।

” पारोमिता मेडिकल एंट्रेंस इतना आसान नहीं होता। दिन-रात पढ़ना पड़ता है, मैं भी पढ़ रही हूं। लेकिन मैं यह भी जानती हूं कि इस साल मेरा सिलेक्शन होना मुश्किल है और इसलिए मैंने सोच रखा है कि मुझे एक और साल इस एग्जाम के लिए तैयारी करने को लग जाएगा। इसलिए मैं अगले साल बिना किसी कॉलेज को ज्वाइन किये ड्राप लूंगी। और उस ड्रॉप ईयर में मैं एक बार फिर से मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी करके एग्जाम दूंगी और मैं जानती हूं कि मैं अगले साल सेलेक्ट हो ही जाऊंगी। तुम भी इस साल ट्वेल्थ में हो। और अब एग्जाम को दो या 3 महीने ही बचे हैं तो ऐसे में तुम्हारा भी इस साल सेलेक्ट होना जरा मुश्किल है।”

” पर मेरे पास ज्यादा समय नहीं है। “

पारो की यह बात सुनते ही दोनों भाई बहन एक दूसरे को देखने लगे…

” मतलब?” श्रेया के इस सवाल पर पारो ने उसी से पलटकर दूसरा सवाल कर दिया..

” आप हो सके तो मुझे यह बताइए कि एग्जाम के लिए क्या क्या पढ़ना पड़ता है ?और कितने विषय हमें पूरे पढ़ने होते हैं। मेरा चयन हो या न हो लेकिन मुझे तैयारी तो इसी साल पूरी करनी है। हर एक गुजरता दिन मुझे लंबा लगने लगा है , और यूँ लग रहा कब ये परीक्षा हो जाएं। “

  पारो की अजूबा बातें उन दोनों भाई बहन के लिए समझनी दुष्कर थीं।
   श्रेया ने वहीं बैठ कर फिर पारो को हर एक किताब और पढ़ाई की बारीकियां समझानी शुरू कर दी।
   खिड़की के बाहर से अंदर झांकते वरुण ने भी डॉक्टर को देख कर पहचान लिया था और उसकी समझ में आ गया था कि डॉक्टर अपनी बहन के साथ पारो को तैयारियों में मदद देने ही आया है।


    वरुण मुस्कुरा कर वहाँ से जाने को हुआ लेकिन फिर उसका मन वहाँ से एक इंच भी हटने का नही किया। उसे इस तरह सामने बैठी पारो को देखना बड़ा भला लग रहा था।
   श्रेया के साथ पुस्तकों को पलट पलट कर देखती और बेशुमार सवाल करती पारो उसे बहुत प्यारी लग रही थी। उसकी नज़रें पारो पर से हट नही पा रहीं थी और उन कुछ पलों में वो खुद को और अपनी प्रतिज्ञा को ही नही बल्कि इस बात को भी भूल चुका था कि ये ऑफिस भी आश्रम परिसर का ही हिस्सा है और वो जहाँ खड़े होकर अंदर झांक रहा है,वहाँ से वो बाकी आश्रमवासियों को आराम से नज़र आ रहा है।

     कुछ बातों में उलझी पारो की नज़र अचानक खिड़की पर चली गयी और उसे खिड़की पर खडा वरुण नज़र आ गया जो अपलक उसे ही देख रहा था।
   वरुण की नज़र अपने ऊपर महसूस होते ही उसके मन में कुछ अजीब सी खुशी की लहर दौड़ गयी। उसे लगा जैसे उसकी नसों में रक्त का प्रवाह बढ़ गया है। वो मुस्कुराने को थी कि वरुण अचानक पलट कर वापस जाने को हुआ कि उसके ठीक पीछे खड़े प्रशांत ने उसे थाम लिया..

“इतनी रफ्तार में कहाँ भागे जा रहे हैं वरुणदेव जी। ऑफिस में कुछ मेहमान आएं हैं ,ज़रा मिल तो लीजिये।”

  वरुण को लगा जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो। वो प्रशांत की पकड़ से छूट कर आश्रम की तरफ भाग जाने को छटपटा उठा पर प्रशांत ने कस कर उसकी बांह थाम रखी थी, और वो उसे साथ ले अंदर दाखिल हो गया….

क्रमशः

aparna …

समिधा -54

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समिधा -54

डॉक्टर के केबिन में बैठी पारो को डॉक्टर ने सारी ज़रूरी बातें समझा दीं।

“अच्छा इसका मतलब अगर किसी का ऑपरेशन करना सीखना है तो उसके लिए तीन साल और पढना पड़ता है?”

“जी हाँ !  पहले पांच साल एम बी बी एस करना पड़ता है फिर 1 साल इंटर्नशिप करनी पड़ती है तब डिग्री कंप्लीट मानी जाती है।”

“मतलब डॉक्टर उसके बाद बन जातें हैं ?”

“हाँ डॉक्टर बन जातें हैं लेकिन किसी भी बीमारी या किसी विशेष विषय में विशेषज्ञ बनने के लिए तीन साल और पढना पड़ता है।”

“मतलब उसके बाद ही….

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“हाँ उसके बाद ही ऑपरेशन करना सीख सकतें हैं।”

“तो फिर इन पांच सालों में क्या पढाते हैं?”

पारो की बात सुन डॉक्टर के चेहरे पर हंसी खेल गयी…

“आपको जैसा लगता है उतना आसान नही है हमारा शरीर। ये एक जटिल मशीन है जिसके कलपुर्जे आपस में ऐसे जुड़ें हैं कि एक सेकंड भी कोई चलने में आगे पीछे हुआ तो बहुत बड़ा अनर्थ हो बैठता है। पहले साल में तो बस हमारा शरीर क्या है और इसके अलग अलग सिस्टम की कार्यप्रणाली को ही पढ़ाया जाता है। ऑपरेशन वो भी शरीर के किसी हिस्से का कर डालना इतना आसान थोड़े ही होता है। आधे इंच का चीरा लगाने के लिए भी तुम्हें मालूम होना चाहिए कि वहाँ की त्वचा के नीचे कितनी वेन्स और नर्वस हैं। ऐसे ही सब सर्जन बन जाते होते तो क्या बात थी?
    ये सारी तो हुई मेडिकल पढ़ाई की बात लेकिन उस कॉलेज में घुसने के लिए भी तुम्हे अलग से इम्तिहान देना होगा, जो आसान नही होता।
   तुमने तो अभी तक बारहवीं के लिए स्कूल भी नही शुरू किया। और उस इम्तिहान में 60% हिस्सा बारहवीं के सिलेबस का ही आता है।”

“और बाकी 40% हिस्सा?”

“वो ग्यारहवीं का रहता है।”

“चलिए तब तो मेरी 40 % तैयारी हो चुकी है।”

  डॉक्टर पारो की बात सुन ज़ोर से हंसने लगा…

“आत्मविश्वास अच्छी बात है लेकिन ये तो अति आत्मविश्वास है। मैं यहाँ जूनियर रेजिडेंट हूँ, अभी एम डी के लिए तैयारी कर रहा हूँ पर मैं भी नही कह सकता कि मेरी पांच साल की पढ़ाई मुझे याद है।”

पारो मुस्कुरा कर रह गयी….

“क्या आप अपनी बहन से मेरी बात करवा सकेंगे।”

“हाँ बिल्कुल! आप अपना नम्बर दे दीजिए। मैं उसे दे दूंगा।”

“मैं आश्रम में रहतीं हूँ,मेरे पास कोई फ़ोन नही है। लेकिन आश्रम के ऑफिस का एक नम्बर है,वो दे सकती हूं। पर बहुत ज़रूरी होने पर ही वहाँ बात हो पाएगी। “

  डॉक्टर ने एक पर्ची पर एक नम्बर लिख कर पारो की ओर बढ़ा दिया…

“श्रेया!! ये मेरी बहन का नाम है। हम दोनों यहीं अस्पताल के बाहर ही अगले मोड़ पर कमरा लेकर रहतें हैं। वो अभी मेडिकल एंट्रेंस के लिए पढ़ रही है। वो तुम्हारी मदद कर सकती है। लेकिन मैं बता दूं कि एंट्रेंस निकालना कोई हंसी खेल नही है। बहुत मेहनत लगती है। चलो अब मैं निकलता हुँ। मेरा टी ब्रेक खत्म हो गया, मुझे और भी काम है।”

“आपका बहुत बहुत धन्यवाद डॉक्टर साहब!”

  मुस्कुरा कर डॉक्टर बाहर निकल गया उसके पीछे पारो भी बाहर चली आयी।

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  वरुण प्रशांत आपस में बातचीत कर रहे थे। वरुण के दिमाग में यही घूम रहा था कि पता नही पारो डॉक्टर के कमरे में इतनी देर से उसे क्या बता या पूछ रही है।
उसी समय उनके दरवाज़े पर दस्तक हुई और दरवाज़ा खोल कर पद्मजा दीदी के साथ स्वस्तिकाचार्य और उनके पीछे उदयाचार्य भी अंदर दाखिल हो गए।

“अब कैसा लग रहा है वरुण?”

“जी आचार्य जी मैं अब पहले से काफी ठीक हूँ। पता नही डॉक्टर छुट्टी क्यों नही दे रहे?”

“उन्हें अपने अस्पताल का बिल जो बढ़ाना होता है। “
पद्मजा दीदी की ये बात वहाँ खड़े किसी भी व्यक्ति को सही नही लगी पर किसी ने उनकी बात का कोई विरोध नही किया।  पद्मजा की आंखें इधर उधर किसी को ढूंढ रही थीं, और ये बात वरुण और प्रशांत से छिपी नही थी।
    उन्होंने अपने साथ लाये फल वहीं एक किनारे टेबल पर रखने के बाद वरुण के लिए जूस ग्लास में ढालना शुरू किया ही था कि वरुण ने उन्हें टोक दिया…

“पद्मजा दीदी! इस वक्त कुछ मत निकालिए। मैं नाश्ता कर चुका हूं।”

“पर इतनी सुबह सुबह कैसे? अभी तो नौ ही बजें हैं।”

“जी दीदी ! पारोमिता ने सुबह ही वरुण के लिए यहीं दलिया बना लिया था। और उसके पहले इसे फल भी खिला दिए थे। अब ग्यारह बजे तक वरुण को कुछ नही खाना है। नाश्ते के ठीक दो घण्टे बाद उसकी एक खून की जांच होनी है।
मज़े की बात ये है कि अस्पताल से आने वाला नाश्ता भी देर से आया, उसके पहले ही वरुण नाश्ता कर चुका था। पारोमिता ने कल ही वरुण के पर्चे पर लिखे खाने पीने के समय को पढ़ लिया था, और उसी के हिसाब से सब कुछ दे दिया है।”

पद्मजा दीदी के चेहरे पर तनाव की रेखाएं उभर आयीं।

“वैसे हैं कहाँ पारोमिता? नज़र नही आ रही?”

उसी समय कमरे का दरवाज़ा खोले पारो भीतर चली आयी…
सब पर नजर पड़ते ही उसने सभी को प्रणाम किया और पद्मजा दीदी के पास आकर मुस्कुरा कर उनके पैर छूकर खड़ी हो गई।
इतने पर भी पद्मजा के मुंह से पारो के लिए कोई आशीर्वाद नहीं निकला, लेकिन उदयाचार्य स्वामी और स्वस्तिकाचार्य जी के चेहरे पर पारो को देखते ही एक मुस्कान खेलने लगी।

” बहन पारोमिता मैं तुम्हारा बहुत सारा आभार व्यक्त करता हूं कि हमारे आश्रम के कर्मठ और युवा योगगुरु कि तुम भली प्रकार सेवा कर रही हो। मैं जानता हूं हम सब आश्रम में एक साथ रहते हैं , और इसलिए एक दूसरे के प्रति एक लगाव मन में आ ही जाता है। बावजूद आवश्यकता पड़ने पर बहुत कम लोग ही इतनी तन्मयता और तत्परता से सेवा कर पाते हैं।
हमारे आश्रम में सिखाए जाने वाले सेवाभाव को तुमने इतने कम समय में जितनी आत्मीयता से ग्रहण कर लिया है उसके लिए तुम्हें जितना भी धन्यवाद कहें वो कम ही होगा।
उम्र में तो तुम हम सब से बहुत छोटी हो, लेकिन अपने सेवा भाव में तुमने बड़ों बड़ों को पीछे छोड़ दिया है। तुमने जिस लगन से वरुण की सेवा की है मैं यह चाहता हूं कि आश्रम में वरुणदेव के लौटने के बाद भी उसकी दवा और खाने-पीने का प्रबंध तुम अपनी निगरानी में ही करवाओ या स्वयं ही करो जैसा भी तुम्हें सुविधा हो। “

” जी स्वामी जी आपकी आज्ञा मेरे सर माथे पर। स्वामी जी मैं एक और बात के लिए आपसे आज्ञा लेना चाहती थी?”स्वस्तिकआचार्य ने पारो की तरफ देखा और इशारे से ही उसे पूछने को कह दिया...

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” स्वामी जी आप सब के प्रयासों से भगिनी आश्रम की कन्याओं के लिए पाठशाला का मार्ग खुल तो गया है लेकिन अब तक प्रारम्भ नहीं हो पाया है। मैं जल्दी से जल्दी अपनी पढ़ाई वापस शुरू करना चाहती हूं। क्योंकि अब परीक्षाओं में ज्यादा समय नहीं बचा है। अगर अभी मैं स्कूल नहीं जा पाई तो कहीं मैं पिछड़ ना जाऊं, लेकिन मैं आप सभी को इस बात से भी निश्चिंत करना चाहती हूं कि मेरे स्कूल जाने से स्वामी जी की सेवा में मेरी तरफ से कोई भी कमी नहीं रह जाएगी। “

” हां यह बात भी हम लोगों को तुम सबसे बतानी थी कि ट्रस्ट की तरफ से पत्र आने के बाद पास ही स्थित शासकीय कन्या शाला में बातचीत हो गई है। और तुम्हारा और बाकी बहनों का दाखिला भी हो चुका है। हमारे आश्रम से बारहवीं के इस सत्र के लिए तुम्हारे अलावा तीन और बहनों ने दाखिले के लिए इच्छा जताई थी। तो तुम चारों का दाखिला करवा दिया गया है। तुम अगर चाहो तो कल से ही कन्या शाला जाना शुरु कर सकती हो।”

” जी आचार्यवर यह तो बहुत ही खुशी की बात है । मैं यहां से इनकी छुट्टी होते ही, अगले दिन से ही स्कूल जाना शुरू कर दूंगी। “

उदयाचार्य और पारो की बातें सुनते हुए वरुण के चेहरे पर मुस्कान खेल गई। वह भी अंदर ही अंदर जानता था कि पारो का पढ़ाई के प्रति विशेष अनुराग है।

” नहीं आचार्यवर!! भले ही डॉक्टर मुझे 2 दिन और अस्पताल में रखना चाहते हैं लेकिन अब उन्होंने मेरे इंजेक्शन बंद कर दवाएं शुरु कर दी हैं और वो मैं कहीं भी ले सकता हूँ। इसलिए मैं आज ही छुट्टी के लिए बात कर लूंगा।”

पारो तो चाहती थी कि वरुण अस्पताल और डॉक्टर की निगरानी में ही रहे लेकिन फिर वरुण की जिद के आगे उनमें से किसी की भी एक ना चली और वरुण ने डॉक्टर से बात करके उसी शाम डिस्चार्ज ले लिया।


वरुण को रह रह कर यही डर सताता कि पारो जैसे उसकी सेवा में लगी फिर रही है आश्रम इस बात को अन्यथा न ले। जाने लोग क्या बातें बनाएं?

लेकिन पारो को जैसे दीन दुनिया से कुछ लेना देना ही नही था , और होता भी क्यों? देव को खोने के बाद जब उसे इन्हीं दुनिया वालों की इन्हीं चार लोगों की सबसे ज्यादा ज़रूरत थी, उस वक्त इन्हीं लोगों ने उसे अपनी ज़िंदगी से बेदखल कर कृष्ण के नाम का बहाना लगा कर आश्रम में पटक दिया था।
तो अब वो इन सब से निश्चिंत हो चुकी थी।

पहले पहल तो वो फिर भी अपने मन में वरुण के लिए पनपते आकर्षण को गलत समझ कर खुद को रोकने का प्रयास भी करती थी। पर अब जबसे उसे वरुण से हुई मुलाकातों का ध्यान आया था तबसे उसे उसी में कृष्ण रूप के दर्शन होने लगे थे, और अब वो उसकी मीरा कह लो या राधा खुद को उसकी भक्ति से रोक पाने में असमर्थ थी।

वरुण जितना ही उसे देख संकुचित हो उठता, उतने ही जतन से वो उसकी सेवा में जुट जाती।

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आश्रम आकर दो दिन बीत चुके थे, और एक दवा के अलावा अब वरुण की सारी दवाएं बंद हो चुकी थी। वरुण ने अब वापस अपनी आश्रम की दिनचर्या में आना शुरू कर दिया था, हालांकि प्रवचन अब भी नही दे रहा था, क्योंकि डॉक्टर के अनुसार उसे अब भी लगातार बोलने में होने वाली शक्ति की हानि का नुकसान उठाना पड़ सकता था।पर अब वरुण के स्वास्थ्य में पहले से कहीं अधिक सुधार दिखने लगा था। अब सुबह उठ कर वो सरोवर किनारे टहलने के बाद सूर्य को अर्ध्य देने के अपने सबसे पसंदीदा कार्य को करने को भी पूरी तरह तैयार था।

सुबह चार बजे उठ कर साढ़े पांच किलोमीटर में फैले आश्रम परिसर का चक्कर लगाने के बाद स्नान आदि से निपट कर वरुण सरोवर में कमर तक उतरा सूर्य को अर्ध्य दे रहा था।
उगते हुए सूर्य की किरणें उसके गौर धवल कंधों पर पड़ कर बिखर रहीं थी। पानी की बूंदे भी कमल पत्र पर जैसे संकलित हों चमकती हैं वैसे ही चमक रहीं थीं।
अर्ध्य देने के बाद जैसे ही उसने वापस जल हाथ में लेने के लिए पानी में हाथ डाला उसे लगा जैसे उसके ठीक पीछे कोई खड़ा उसे निहार रहा है।
उसने सिर घुमा कर पीछे देखा और उसकी आंखें प्रसन्नता से चमक उठीं।

सामने पारो खड़ी थी। स्लेटी रंग के कुर्ते और सफेद सलवार और दुपट्टे के साथ दो चोटियां सामने लटका कर खड़ी पारो ने कंधे पर एक बस्ता भी टांग रखा था। उससे कुछ दूरी पर सरोवर की सीढ़ियों के ऊपर सविता नयना और मधुलिका भी अपना बस्ता टांगे खड़ी आपस में बातें करती पारो का रास्ता देख रहीं थीं।
पारो आज अपने स्कूल के प्रथम दिवस पर स्कूल जाने से पहले वरुण से आशीर्वाद लेने सरोवर की सीढ़ियां उतर आई थी।
उसे देख वरुण ऊपर चला आया।

पारो ने झुक कर वरुण के पैर छुए और वरुण का हाथ पारो के सिर पर अनजाने ही रखा गया….

“सदा खुश रहो!”

पारो ने खड़े होकर उसके सामने हाथ जोड़ दिए…

“आशीर्वाद दीजिये की जिस इच्छा को पूरा करने दुबारा पढ़ाई शुरू करने की ललक जागी है वो पूरा कर सकूं।”

वरुण मुस्कुरा कर रह गया…

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“वैसे भी तुम बहुत ज़िद्दी हो, जो चाहती हो पूरा कर के ही मानती हो।”

“इसलिए आपके कृष्ण मेरी वांछित वस्तुओं को मुझसे छीन लेते हैं क्या?”

“ऐसा नही कहते पारो। बहुत बार हम उसकी इच्छा अनिच्छा समझ भी तो नही पाते, और इसलिए हमें बस ये दिखता है कि हमने ये खो दिया लेकिन उसके बदले में वो हमें जो देता है उसे हम नज़रंदाज़ करते चले जातें हैं।”

“मुझे आपकी ये गहरी बातें समझ में नही आतीं। बस ये समझ आता है कि कृष्ण भी उन्हीं का जीवन कठिनताओं से भर देते हैं जिन्हें जीने की सर्वाधिक चाह होती है।”

“जाओ!!! आज तुम्हारा स्कूल का पहला दिन है, अच्छे मन से जाओ। प्रसन्नता से जाओ। तुम्हारे जीवन के एक नए अध्याय की शुरुवात है । कृष्ण तुम्हारी हर मनोकामना पूर्ण करें।”

” शायद आपकी ही प्रार्थना आपके कृष्ण सुन लें और मेरे मन की बात पूरी हो जाये। “

मुस्कुरा कर वरुण को प्रणाम कर आत्मविश्वास से भरे ऊंचे ऊंचे डग भरती पारोमिता अपनी सखियों के संग अपने जीवन के एक नए अध्याय को रचने के लिए अपने सामने फैले विस्तृत आसमान में पंख पसारे आगे बढ़ गयी…..

…….. उस वक्त शायद उसे भी नही मालूम था कि अब उसका जीवन किस करवट बैठने वाला है…

क्रमशः

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aparna…

समिधा -49

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समिधा -49

   आसमान से उतरती धूप चेहरे पर पड़ती बहुत भली लग रही थी, और उससे भी भला लग रहा था, उन दोनों का साथ।
    वरुण और दर्शन को साथ बातों में उलझे देख पारो उन दोनों को अपलक निहार रही थी। वरुण कितने प्यार से दर्शन से घर भर की खबर ले रहा था। जैसे हर किसी को जानता हो।
   ठाकुर माँ के घुटनों से लेकर माँ के ठाकुर जी ( कान्हा जी) तक,बाबा की दुकान से लेकर काकी की बेटी के ससुराल तक हर बात की तसल्ली से तस्दीक कर रहा था कि सब कुशल हैं या नही।
   यहाँ तक कि दुकान की बढ़त के लिए उसने दर्शन को जाने कितने तरीके और नए तरीके के सामान भी बता दिए थे।
   इस बार दुर्गा पूजा में चंडी मंडप कहाँ बनेगा, क्या कैसा होगा? उन लोगों की ये सारी बातें सुनती बैठी पारो धीरे धीरे आश्चर्य में डूबने लगी।
   ये तो उससे भी ज्यादा उसके घर को जानता था।

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लेकिन वो कैसे ये सब जानता था? जितने आराम और तसल्ली से वो दर्शन के कंधे पर हाथ रखे बैठा था, दूर से क्या नज़दीक से देखने पर भी लोगों को यही लगेगा कि दो भाई साथ बैठे एक दूजे का हाल चाल ले रहे हैं।
    जाने उस शाम में ऐसा कुछ था या पता नही क्या बात थी पर पारो वरुण पर से नज़रे फेर ही नही पा रही थी।
   
    वही चौड़ा माथा, हल्के बिखरे उलझे से बाल, और तीखी लंबी नाक और उसके नीचे उसके भींचे हुए होंठ।
    बिल्कुल जैसे किताबों में देखी किसी बहुत सुंदर ग्रीक देवता की तस्वीर हो…
  … जिसमें उसने अपना एक हाथ बड़ी अदा से अपने घुटनों पर टिका रखा हो, सतर चौड़े कंधे खुले हुए और उन पर झूलती अलकें, और ऊपर आसमान की ओर ताकती बड़ी बड़ी पलकों वाली आंखें …
….. हाँ ये चेहरा उसने देखा तो था….
…. उस शाम जब वो भागती दौड़ती जोइता के घर पहुंची थी और वो किसी अंग्रेज़ी पत्रिका के पन्ने पलट रही थी।
  वहाँ उस ग्रीक देवता जो अपने सुंदर नयन नक्श और सुंदर देहयष्टि के लिए प्रसिद्ध है को देख कर उसे इसी चेहरे की तो याद आयी थी।
   और फिर उसके बाद उसने इस चेहरे को देखा था, काली मंदिर में…
   हे भगवान!!! ये तो वही लड़का है जो मंदिर के बाहर बच्चों को गुब्बारे दिला रहा था..
…. ये तो स्वयं द्वारिकाधीश हैं फिर इनकी सत्यभामा कहाँ गयी।

  कड़ी से कड़ी जुड़ती चली गयी और पारो को एकाएक वरुण से हुई हर मुलाकात याद आती गयी। आज तक वो किस भुलावे में बैठी थी,उसे याद क्यों नही था कि वो वरुण से पहले मिल चुकी है।
   पर खैर याद आ जाने से भी क्या बदल जाना था।मंदिर की मुलाकात के बाद साड़ियों के बाज़ार में भी तो मिलना हुआ था,जहाँ उसकी पसन्द की साड़ी को उसी सनकी सत्यभामा ने छीन लिया था।
  और उसके बाद उसने वरुण को आखिरी बार देखा था अपनी शुभ दृष्टि में…
….अपनी सप्तपदी की शुभ दृष्टि में जिसमें उसे देव को देखना था!!!

    पारो की आंखें जाने क्यों छलकने को बेकरार हुई जा रहीं थीं।

     ये कैसी सज़ा मिल रही थी उसे। पहले भगवान ने उसके बाबा को छीन लिया जब बाबा जैसे ही उसका ध्यान रखने के लिए देव को उसकी जिंदगी में भेजा तो फिर उसे वापस क्यों छीन लिया।

  और अब जब उसे छीन ही लिया तो मन को इतना कड़ा तो बना सकते थे कि वो इस तरह वरुण की ओर न फिसले? क्या वरुण को लेकर उसका ऐसा सोचना उसे शोभा देता है।अब जब उसके जीवन से सारे रंग जा चुके हैं तब फिर वो क्यो वरुण को देखने भर से गुलाबी हुई जाती है।

   वो उन दोनों को देखती बैठी थी कि वरुण ने पारो की तरफ देख अपना प्रस्ताव रख दिया…

“आज दर्शन हमारे साथ यहीं आश्रम में रुकेगा। क्यों ठीक है ना पारोमिता?”

   वो तो इतनी देर से उसे ही देखती बैठी थी, लेकिन साथ ही ये भी सोच रही थी कि उसे मालूम नही चलेगा? पर ऐसा कहां सम्भव था?
वरुण भले ही दर्शन से बात कर रहा था, लेकिन तब भी उसे पारो की आंखें खुद पर महसूस हो रहीं थीं।

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  पारो ने हाँ में सिर हिलाया और उठ कर अंदर जाने लगी…
   उसे लगा शायद वरुण उसे रोकेगा या पूछेगा कि कहाँ जा रही हो पारो? पर ऐसा कुछ नही हुआ।
  पारो ने जाकर पद्मजा दीदी को बता दिया कि आचार्य वरुण के कहने पर आज उसका देवर दर्शन वहाँ रुकने वाला है इसलिए उसके लिए भी भोजन की तैयारी करनी होगी।

    वो वापस लौट रही थी कि उसे पद्मजा दीदी ने कोई काम बता कर वहीं रोक लिया। हालांकि उसका मन तो वहीं बाहर लगा हुआ था फिर भी मन को मार कर वो वहीं काम पर लग गयी।
   कुछ देर बाद पद्मजा दीदी ने सरिता को बुला कर चाय की ट्रे पकड़ा दी कि बाहर बैठे लोगों को दे आये। पारो का मन वहीं अटका पड़ा था, पर इतनी औरतों के बीच सरिता से ट्रे लेने की उसकी हिम्मत नही हुई।
   उधर सरिता चाय लेकर बाहर पहुंची… वरुण और दर्शन के साथ ही अब प्रशांत भी वहाँ मौजूद था। वरुण ने चाय लेते हुए सामने वाली पर नज़रें उठायी तो सामने पारो की जगह सरिता थी, तुरंत उसके चेहरे का रंग बदल गया।
    वक्त रहतें ही वरुण ने खुद को संभाल लिया लेकिन प्रशांत की नज़रों ने उसकी ये चोरी पकड़ ही ली।
    शाम की आरती का समय हो चुका था। आरती के बाद आज वरुण का ही प्रवचन था।

   दर्शन श्रद्धालुओं के साथ सामने ही बैठ गया…  वरुण अपने आसन पर आया तो आज उसकी पुस्तिका के ठीक बगल में एक छोटा सा सफेद रुमाल रखा था, जिस पर नीले हरे रेशमी धागों से मुरली और मयूरपंख काढ़ा गया था। रुमाल इस ढंग से मुड़ा रखा था कि उसमें कढ़ी मुरली और पंख सामने ही नज़र आ रहे थे।
   वरुण को पाठ प्रवचन के बीच पानी के दो घूंट लेने की आदत थी, और जिसके बाद अक्सर उसके पास मुहँ पोंछने को कुछ नही होता था। और वो अक्सर अपने कुर्ते की बाँह से ही ये काम कर लिया करता था। आज वहाँ रखा रुमाल देख उसे रखने वाली याद आ गयी और उसके चेहरे पर एक मुस्कान चली आयी। वरुण को लगा जैसे कोई उसे देख रहा है उसने जैसे ही सामने नज़र उठायी प्रशांत उसे ही देखता खड़ा था। प्रशांत ने उसे देखते ही अपने दोनो कंधे उठा कर ” कहाँ तक भागोगे ” वाली मुस्कान दी और बाहर निकल गया।
   प्रवचन के बाद श्रद्धालुओं का समय तय था। वे अपनी समस्याएं स्वामी जी को बताया करते थे। वैसे तो आज के पहले वरुण ने इस समस्या परश्नोत्तरी पर काम नही किया था। और आज पहली बार वो यहाँ श्रद्धालुओं की जिज्ञासा दूर करने बैठा था।।
   उस भीड़ भाड़ के बीच से एक महिला उठ कर हाथ जोड़ कर खड़ी हो गयी…

“स्वामी जी!! मेरी शादी को साढ़े चार साल पूरे हो चुके हैं लेकिन अब तक मुझे संतान सुख नही मिला। स्वामी जी आप कुछ उपाय बताएं जिससे हमें संतान प्राप्ति हो सके।”

वरुण उस महिला की बात सुन हल्के से मुस्कुराने लगा।

” आपकी उम्र क्या है बहन ?”

“जी स्वामी जी इसी महीने तीस पूरा हो जाएगा।”

“ठीक है , मैं अब जो उपाय बताने जा रहा हूँ, वो आपको और आपके पति को एकसाथ मिलकर करना होगा,क्योंकि संतान तो दोनो के ही प्रयासों से ही मिलेगी ना!”

  उस औरत और उसके पति ने हाथ जोड़े हुए ही हाँ में सिर हिला दिया।

” आप दोनों की उम्र और शादी को बीता समय देख कर मैं समझ सकता हूँ कि आप बच्चे को लेकर कितना परेशान होंगे।”

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“स्वामी जी हम दोनों तो एक दूसरे के साथ भी बहुत खुश हैं लेकिन घर परिवार नाते रिश्तेदार हमें चैन से जीने नही देते। जहाँ जाओ हर कोई हमें बच्चे के लिए टोकना शुरू कर देता है। इसलिए लगता है कि अब बच्चा हो ही जाना चाहिए।”

“तो क्या आप बच्चा दुनिया वालों के लिए पैदा करना चाहते हैं?”

“नही वो मतलब नही था मेरा?”  और औरत के पति ने अपनी सफाई दी..

“पर मेरा यही मतलब है। आप दोनो ध्यान से मेरी बात सुनियेगा। अगर आपको चार सालों में संतान नही हुई तो इसमें आपके प्रारब्ध का ही दोष हो ऐसा ज़रूरी तो नही। सबसे पहले अपने शरीर में क्या ऐसी समस्या है वो जानने की कोशिश कीजिये क्योंकि संतान नही हो पाने की चिकित्सा एक डॉक्टर मुझसे कहीं ज्यादा अच्छी तरह कर सकता है। मैं कोई चिकित्सक तो हूँ नही जो आपकी समस्या का निदान कर पाऊं।
   अब मुझे ये बताइये की क्या आपने पहले कभी किसी डॉक्टर से परामर्श लिया है?

“नही गुरुवर!!”

“क्यों? आपको मेरे पास आने से पहले वहीं उनके पास ही जाना चाहिए था न।
  आप अगर तन मन से बच्चे के इच्छुक हैं तो कल ही डॉक्टर के पास जाए।
अब दूसरी बात आपके मन में जब तक स्वयं के लिए ये निर्णय  लेने की बात न आये तब तक सिर्फ दुनिया के लिए आपको कुछ भी करने की क्या आवश्यकता है।
   क्योंकि दुनिया के लिए आप जितना करतें जाएंगे वो आपसे और भी ज्यादा की उम्मीद रखती जाएगी। जब तक लड़का या लड़कीं की शादी न हो जाये तब तक उन्हें शादी करने की सलाह दी जाती है उसके बाद  बच्चे के लिए सलाह दी जाती है, और सिर्फ सलाहें ही दी जाती हैं कोई मदद नही की जाती। इसलिए मेरा यही मानना है कि सिर्फ ये सोच कर की घर पर सभी रिश्तेदारों , सभी दोस्तों ने यही निर्णय लिया है तो हमें भी लेना चाहिए, आप कोई भी निर्णय न लें।
और जब आप दोनो पूर्ण प्रसन्नता और हृदय से अपने परिवार को बढ़ाने के लिए तैयार होंगे तब कृष्ण स्वयं आपका परिवार बढ़ा देंगे।
   कृष्ण पर आपके विश्वास को कभी खोना नही है। क्योंकि आपके लिए जो उचित होगा वो आपको बिना किसी बाधा के ज़रूर मिलेगा और जो आपके हिस्से का नही होगा वो आपको किसी भी मूल्य पर नही मिलेगा।
   इसलिये निर्भय रहें निशंक रहे… आपकी झोली में खुशियां ज़रूर खेलेंगी।”

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  वो दोनो औरत और आदमी प्रसन्नता से अपनी जगह जा बैठे और श्रीकृष्ण के जयकारे से परिसर गुंजायमान हो गया।
   सबसे पीछे बैठी पारो का मन एक बार फिर अपने मन मंदिर में जा बैठे द्वारिकाधीश की ओर झुकने लगा।

    रात के भोजन के लिए सारे आचार्य बैठ चुके थे। दर्शन भी बैठ गया था। अपने हाथ में परोसने का पात्र लिए पारो वहाँ एक तरफ खड़ी हो गयी , उसकी आँखे उन लोगों में किसी को ढूंढ रही थी। दर्शन के ठीक एक तरफ प्रशांत बैठा था, और दूसरी तरफ की जगह खाली थी। जैसे ही उसे समझ आया कि वरुण वहाँ नही है,वो दूसरी तरफ उसे ढूंढने जाने को मुड़ी ही थी कि उसके ठीक पीछे खड़ा वरुण सामने आ गया।
   और उसे अपने इतने पास देख वो एक बार फिर अपनी सुध बुध खो कर उसे देखने लगी।
    दोनो एक दूसरे से आंखें हटा नही पा रहे …. कि वरुण ने ही धीमे से कहा…

“सामान्य रहो पारो। तुम कांप रही हो। “

   वरुण के इतने पास खड़ी पारो सच ही कांपने लगी थी…

“मुझ पर से अपना ध्यान हटा लो, हमारा कोई भविष्य नही है। “

   वरुण ने धीरे से अपनी बात रखी और लंबे लंबे डग भरते हुए अंदर चला गया, और पारो सूनी आंखों और सूने मन से वहीं खड़ी रह गयी। बस यही तो बचा था। पहले संसार उसका मज़ाक उड़ा रहा था, आज वरुण उड़ा गया!
   इसमें वरुण का भी क्या दोष है?  भगवान ने स्वयं जब उसके जीवन का मज़ाक बना छोड़ा है तो हर कोई अगर वही कर रहा तो किसी का क्या दोष।

ठीक ही तो कह गया वो , उस जैसी रंगहीन विधवा के साथ किसी का भी क्या भविष्य हो सकता है?

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   ऑंसू से धुंधली पड़ी जाती आंखों के साथ उसने हाथ में पकड़ रखा सामान वहीं नीचे रखा और तेज़ कदमों से सरोवर की तरफ बढ़ गयी।

  वरुण ने कहने को कह तो दिया था, लेकिन ये कहने के लिए उसे खुद को कितनी हिम्मत लगी थी, ये वही जानता था। उसके मन में जाने क्यों ये डर बैठने लगा था कि जैसे प्रशांत समझने लगा है कहीं आश्रम के बाकी लोगों को समझ मे आने लगा तो पारो के चरित्र पर एक काला दाग लग जायेगा। और फिर वो दाग छुड़ाना बहुत मुश्किल हो जाएगा।
    वो पारो को दुनिया से बचाये रखने के लिए तो अपने प्राण भी दे सकता था फिर इतना सा कह देने मात्र से अगर वो उस पर से अपना ध्यान हटा लेगी तो इसमें बुराई क्या थी?

   वो खुद ही दोनो पक्ष सोचता चला जा रहा था। बुराई क्या थी?
   क्या उसे खुद को पारो का इस तरह इच्छा भरी आंखों से उसे देखना गुदगुदा नही जाता था?
   क्या जब जब वो पारो को देखता था, उसके मन में कामनाओं का ज्वार भाटा नही जागता था?
     क्या उसे लेकर इस दुनिया से इस आश्रम से दूर भाग जाने के ख्याल उसके मन में नही कुलबुलाते थे?

   पारो से अधिक तो वो उसे पाने को लालायित हो उठा था, और अपने मन को काबू करने को उसने पारो को दूर रहने की सलाह दे डाली थी।

  खुद ही खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी दे मारी थी। 

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अपने मन को असीमित कठोर कर ही उसने पारो के सामने ये बात रखी थी। और ऐसा कहने के बाद भी उसकी आंखे और मन पारो से नही हट पा रहा था। वो जाकर दर्शन के पास बैठ तो गया लेकिन आंखें पारो का पीछा करती रहीं।
   पारो को अपने हाथ का सामान वहीं पटक कर ऑंसू पोंछते और सरोवर की तरफ जाते देख उसका मन ठनका कि पारो आंखों से ओझल हो गयी।
    और लगभग दस मिनट बाद सरोवर की तरफ से छपाक की आवाज़ आई।
   उसके आसपास बैठे सभी लोग सामान्य ढंग से बैठे खाते रहे,जैसे किसी ने उस आवाज़ को सुना ही न हो लेकिन वरुण का मन तो सरोवर की ओर ही लगा था,  वो एकदम से अपनी जगह पर खड़ा हुआ और सरोवर की ओर तेज़ कदमो से बढ़ गया……

क्रमशः

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aparna……




तेरे रंग

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मैं धूप सी निखरी तुझमे फिर
और शाम सी ही ढल जाऊंगी
तू मुझे बना ले बाँसूरी
कान्हा तेरे रंग, रंग जाऊंगी।।।

तेरी अंखियों से जग देख लिया
अब नही कहीं कुछ भाता है
तू एक कदम भी बढ़ा ले तो
तेरे पीछे पीछे आऊंगी।।

मैं जानू ये जग तेरा है
हर छल कपट पर मेरा है
तेरी तान मधुरतम मुझे लगे
तेरे स्वरों मे मैं लहराऊँगी।।

तेरे आंसू से मन भीग गया
तेरे सपनों में दिन बीत गया
बस मेरा नही तू सब का है
कैसे तुझे सबसे छिपाऊँगी।।

तू मुझे बना ले बाँसूरी,कान्हा तेरे रंग रंग जाऊंगी।।

aparna ….

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