समिधा – 47

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   समिधा – 47

  
    उदयाचार्य के अपनी बात समाप्त करने के बाद सारे आचार्य सोच में थे सभी की निगाहें वरुण की ओर थीं कि आखिर वरुण के दिमाग में ऐसी कौन सी योजना है जिसके लिए वो इतने आत्मविश्वास से कह रहा है।
  उदयाचार्य ने उससे पूछा पर अपना विचार बताने के पहले वरुण भी कुछ जानना चाहता था।
  
  ” स्वामी जी अब तक आपने जो बताया उससे तो यही मालूम चला कि प्रबोधानन्द जी ने आश्रम के लिए बहुत कुछ किया है। पर मुझे ये समझ नही आ रहा कि इतना ज्ञानी अचानक ऐसे पतित कार्य में कैसे संलग्न हुआ? “

  ” यहाँ उपस्थित सभी के मन में यही बात है शायद। और इस के बारे में मैं कुछ भी नही जानता लेकिन यहाँ उपस्थित स्वस्तिकाचार्य इस बात पर रोशनी डाल सकतें हैं। स्वस्तिक क्या आप इस बारे में कुछ कहना चाहेंगे?”

   अब सभी स्वस्तिकाचार्य की तरफ देखने लगे। अपने गले को ज़रा साफ कर उन्होंने बोलना शुरू किया….

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“मैं शुरू से प्रबोधानन्द के साथ नही था। मैं उसके काफी पहले ही यहाँ आचार्य पद पर आ चुका था। प्रबोधानन्द ने जब आचार्य का पद संभाला तब अमृतानंद स्वामी ने उसे मेरे साथ कर दिया और मुझसे कहा कि मैं उसे आचार्य पद की गरिमा और दीक्षा के बारे में अवगत करा दूं|  मैंने सोचा नया लड़का है इसे अभी बहुत ही चीजें सिखानी समझानी पड़ेगी। लेकिन वह मेरी सोच से बहुत आगे था। और वैसे देखा जाए तो सही अर्थों में वाकई वह बहुत तीव्र बुद्धि का स्वामी था। हम जब तक किसी समस्या के लिए सोचना शुरू कर पाते, उसके पहले ही वह समाधान प्रस्तुत कर दिया करता था। अब ऐसे व्यक्ति को मैं क्या और कैसे सिखा पाता ? इस चीज को मैं भी समझता था और इसलिए मैंने उसे कुछ भी समझाने की जगह उसकी तरफ दोस्ती का ही हाथ बढ़ाया और उसने भी बहुत प्रेम से वो हाथ थाम लिया। उसने बहुत कुशलता से आश्रम की जिम्मेदारी उठानी शुरू कर दी थी। आश्रम में एक नियम था कि हर एक काम के लिए एक व्यक्ति और एक व्यक्ति के लिए एक काम । लेकिन उसने आश्रम के लगभग हर एक काम को पूरी जिम्मेदारी से अपनी निगरानी में करवाना शुरू कर दिया। हर बात के लिए वह आदेश पारित करता और उसके व्यक्तित्व का प्रभाव ऐसा था कि हर कोई उसके सामने नतमस्तक हो उसका आदेश मानने को बाध्य हो जाया करता था। शायद किसी किसी को भगवान अंदर से ही सम्राट बनाकर पैदा करते हैं। प्रबोधानन्द उन्हीं में से एक था, लेकिन कहते हैं ना कि एक सम्राट में जहां लोगों का नेतृत्व करने की क्षमता होती है, निर्णय लेने की क्षमता होती है, सभी में अनुशासन बनाए रखने की क्षमता होती है, वहीं इतनी सारी अच्छाइयों के बावजूद एक सम्राट के अंदर हमेशा अपने आधिपत्य को लेकर एक गर्व की भावना, अभिमान की भावना जरूर रहती है। और उस अभिमान से प्रबोधानन्द भी अछूता नहीं रह सका।

    शुरुआत में जितने प्रेम और प्यार से वह सभी स्वामी गुरु आदि का आदर किया करता था। धीरे-धीरे उसकी आंखों से वह प्यार और सम्मान घटने लग गया। एक समय ऐसा आया कि उसे अपने प्रभुत्व अपने बल पर अपनी बुद्धि और विवेक पर इतना अभिमान हो गया कि, वह अपने साथ के आचार्यों पर भी कड़े शब्दों का प्रयोग करने लगा।
    पहले तो हम सभी ने यह प्रयास किया कि हम प्रबोधनंद की बातों पर ध्यान ही ना दें लेकिन धीरे-धीरे यह समस्या बढ़ने लगी। अब ऐसा हुआ कि जिस आश्रम में वह रहा करता वहां हर एक चीज उसकी पसंद की होने लगी। हर एक कार्य के लिए चाहे कोई भी स्वामी या आचार्य निर्धारित हो, पर उस कार्य को कैसे करना है और कैसे नहीं का निर्णय प्रबोधनंद स्वविवेक से लेने लगा। उसने अब किसी भी कार्य के लिए किसी अन्य से पूछने की आवश्यकता ही समझनी छोड़ दी। एक बार हम सब ने मिलकर सोचा भी की अमृतआनंद स्वामी से इस बारे में बात करनी चाहिए , लेकिन हम सब यह भी जानते थे कि  प्रबोधानन्द अमृतआनंद स्वामी का सर्वाधिक प्रिय शिष्य है, और उनकी आंखों पर उस समय प्रबोधनंद के स्नेह का चश्मा चढ़ा हुआ था। वह इस कदर उससे प्रभावित थे, कि उन्होंने मन ही मन शायद यह तय कर लिया था, कि वह अपनी गद्दी अपने बाद प्रबोधनंद को ही देंगे।
     अमृतआनंद स्वामी की वृद्धावस्था और उनका प्रबोधानन्द पर अटूट विश्वास देखकर हम में से किसी का भी मन नहीं हुआ, कि हम स्वामी जी से प्रबोधानन्द की शिकायत करें। हम मन मार कर रह गये, लेकिन यहीं पर हमने गलती कर दी। अगर कोई विषबेल आपके आंगन में फलने फूलने लगे तो उसे शुरुआत में ही काट कर फेंक देना चाहिए, वरना वह बढ़ते बढ़ते अमरबेल का रूप धर लेती है। और उसके बाद वह उस उद्यान में उपस्थित हर एक वनस्पति को लील जाती है यही हमारे साथ भी हुआ।
    इसके बाद एक बार मैंने गुपचुप तरीके से आश्रम ट्रस्ट में प्रबोधानन्द के खिलाफ शिकायत दर्ज की उसका परिणाम यह हुआ कि, ट्रस्ट ने मुझे ही उस आश्रम से हटाकर दूसरे आश्रम में पदस्थ कर दिया। मैं समझ गया कि प्रबोधनंद की पहुंच अब बहुत ऊंची हो चुकी थी और वह हमारी तरह एक सामान्य आचार्य बस नहीं रह गया था। उसने जितना कार्य हम सबके सामने आश्रम के लिए किया था अंदर ही अंदर उसने ट्रस्ट के लोगों के साथ भी अपने संबंध उतने ही प्रगाढ़ कर लिए थे।
      उम्र तो उसकी भी ऐसी कोई ज्यादा थी नहीं। और जैसे उसकी उम्र थी उस उम्र में सामान्य कामनाएं जागना स्वाभाविक ही था। और इसीलिए आश्रम किसी भी गुरु स्वामी आचार्य से उनकी इच्छा के विरुद्ध जाकर ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करवाता। आश्रम में आज भी सुविधा है कि अगर कोई आचार्य चाहें तो अपने पद से त्याग पत्र देकर विवाह करके गृहस्थाश्रम व्यतीत कर सकते हैं… और जब चाहे तब विवाह की जिम्मेदारियों को निपटाने के बाद अपनी आयु पूरी करने के बाद वानप्रस्थआश्रम में आने पर हमारे कृष्ण आश्रम वापस आ सकते हैं। लेकिन प्रबोधानन्द ने विवाह के मार्ग को नहीं चुना क्योंकि आश्रम में अब उसका अपना एक स्थान था पद था। और उस गरिमामय पद पर रहते हुए वो अपने मनमाने कार्य कर सकता था।
   यह तो हम सबको बहुत बाद में पता चला कि वह विदेशों में मंदिरों के शिलान्यास, निर्माण आदि में बहुत बड़ी राशि लिया करता था। उसमें से कुछ राशि अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए अलग से रख लिया करता था ।जबकि ऐसा करने की आज्ञा किसी को भी नहीं है। अगर आप मंदिर ट्रस्ट के लिए मिली राशि को स्वयं के उपयोग के लिए रखना चाहते हैं तो इसके लिए आपको ट्रस्ट से अनुमति लेनी होती है।
   वैसे भी आश्रम ट्रस्ट हर महीने सभी सदस्यों को फिर चाहे वह गुरु हो आचार्य हों, उनके कार्य और पद के अनुरूप  एक निश्चित राशि प्रदान किया ही करती है। इसके बावजूद प्रबोधानन्द ने राशि का गबन शुरू कर दिया। और यहीं से उसका पतन शुरू हुआ। पहले पहल विदेशों में पूजा-पाठ कर्मकांड करवाने के नाम पर जब भी वो जाया करता था, तो अपने आने-जाने का खर्च भी वह विदेशों में स्थित अपने यजमानों से ही वसूला करता था। वहीं धीरे से उसकी कुछ महिला मित्र बननी शुरू हुई, और फिर उसे एक बार इस तरह की मित्रता की आदत हुई वो सुधारने की जगह बिगड़ता ही गया।

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    मैंने अपने स्तर पर उससे बात करने की और समझाने की बेहद कोशिश की, लेकिन अब वह जिस स्थान पर पहुंच चुका था वहां उसे उसके अभिमान ने इस कदर जकड़ रखा था कि वह अपने सामने हर किसी को गलत समझने लगा। तरह-तरह के कुतर्कों से उसने मुझे भी परास्त कर दिया। मैंने एक बार उसे यह धमकी भी दे दी कि मैं ट्रस्ट से बात करूंगा, लेकिन मेरे द्वारा ट्रस्ट में बात किए जाने से पहले ही उसने पता नहीं ट्रस्ट के लोगों से क्या बात की कि मुझे मेरे पद से एक पद नीचे स्थान देकर ट्रस्ट ने एक बार फिर मेरा स्थान बदल दिया।
   उसने पता नही ट्रस्ट के लोगों को क्या घुट्टी पिलाई थी , कि कोई उसके बारे में कुछ सुनना ही नही चाहता था। और बस इसलिए मैं भी चुप लगा गया। लेकिन मुझे नही पता था कि बढ़ते बढ़ते उसकी मनमानी इतनी बढ़ जाएगी कि वो अपने ही आश्रम की महिलाओं पर कुदृष्टि डाल बैठेगा।
   और ये उसने जो भी किया है कहीं से भी क्षमा के योग्य नही है। इसलिए उदयाचार्य जी का ये कथन की उसे बाहर निकलवाना होगा मुझे रास नही आ रहा है। हालांकि उदयाचार्य जी ने ऐसा कहा है , तो कुछ सोच कर ही कहा होगा लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर तो नही चाहता कि वो बाहर आये। बल्कि ये चाहता हूं कि कुछ ऐसा हो जिससे आश्रम की बदनामी हुए बिना ही उसे उसके किये की सज़ा मिल जाये और साथ ही इस कार्य में उसके साथ संलग्न अन्य लोगों को भी जेल का सुख मिल सके।
   बोलो वरुण तुम क्या कहना चाहते थे।”

” गुरुवर आप सभी मुझसे बड़े हैं श्रेष्ठ भी हैं। मेरे मन में यह विचार आया था कि अगर आश्रम ही प्रबोधानन्द के खिलाफ रिपोर्ट करेगा तो आश्रम की बदनामी नही होगी। पर अगर कोई श्रद्धालु या भक्त आश्रम के किसी सदस्य पर उंगली उठाता है तो पूरे आश्रम की बदनामी होती है। मेरा कहना बस ये है कि हमें अमृतानन्द स्वामी जी को सारी बातें बता देनी चाहिए। उसके बाद वो प्रबोधानन्द के खिलाफ लिखित कार्यवाही कर उस कार्यवाही को ट्रस्ट में भेज कर पारित करवाएं और उसके बाद सार्वजनिक रूप से अगर अमृतानन्द आचार्य प्रबोधानन्द का पद समाप्त कर उसे मठ से निष्कासित करने का आदेश दे देते हैं, तो उसके बाद उस पर कोई भी इल्जाम लगे वो सारे उसके अपने होंगे और तब उसके किये कार्यों का और उस पर लगे आरोपों का कोई दुष्प्रभाव आश्रम पर नही पड़ेगा।”

  वहाँ उपस्थित सभी आचार्यों ने एक साथ वरुण की बात पर सहमति की मुहर लगा दी।  तुरंत ही सर्व सहमति से उदयाचार्य जी ने अमृतानन्द स्वामी को फ़ोन मिला दिया।
    सारी बातें सुनने के बाद अमृतानन्द स्वामी भी सकते में आ गए। उनके मन के लिए ये बहुत बड़ी चोट थी, उन्होंने प्रबोधानन्द को अपनी संतान मान कर प्रेम किया था, और अपनी संतान का ऐसा कलुषित दुर्व्यवहार उनके लिए असहनीय था। बड़ी कठिनता से उन्होंने खुद को संभाला और अगले ही दिन आश्रम पहुंचने की बात कह कर फ़ोन रख दिया।
   वहाँ उपस्थित सभी आचार्य वर अब भी परेशान थे पर अब कम से कम उन सभी को एक मार्ग मिल गया था।
   उदयाचार्य जी ने वरुण और प्रशांत को  स्वस्तिकाचार्य के साथ मिलकर प्रबोधानन्द के काले कारनामों को कलमबद्ध करने की ज़िम्मेदारी दी और इस मामले में जो भी जितना प्रकाश डाल सकता था, उनसे उतनी सहायता करने की बात रख दी।

  शाम की आरती का समय होता देख उनमें से कुछ आचार्य पूजा स्थल को चले आये।
   रात्रि के भोजन के बाद भी कुछ समय वेद चर्चा हुआ करती थी। उसके लिए आज दो दिन से कोई एकत्र नही हो पा रहा था। इस हेतु आज उदयाचार्य ने सभी से विशेष आग्रह कर सभी को कृष्ण मंडप में बुलाया था।
    खाने के बाद वरुण कुछ देर को सरोवर की सीढ़ियों पर आ बैठा था। वो धीमे धीमे छोटे छोटे तिनके ऊपर की सीढ़ियों पर बैठे सामने पानी में फेंकता जा रहा था। सीढ़ियों का ऐसा निर्माण हुआ था कि ऊपर की सीढ़ियां खड़ी सी थी और नीचे की ढलान पर थीं। जिसके कारण अगर कोई सबसे नीचे की सीढ़ियों पर बैठा हो तो ऊपर बैठे इंसान को दिखाई न दे।
   वही वरुण के साथ हुआ। वो तिनके पर तिनके फेंकता रहा और कुछ देर में ही नीचे की सीढ़ियों पर कुछ हलचल सुनाई पड़ी,वरुण ने ध्यान से देखा नीचे की सीढ़ियों से पारो ऊपर चली आयी।
   उसके बालों में जगह जगह तिनके फंसे हुए थे।
वो उन्हें धीमे से निकालते हुए चली आ रही थी। वो खुद खाने के बाद सरोवर के पास बैठी वरुण के बारे में ही सोच रही थी। वो सोच रही थी कि वरुण में ऐसा क्या था जो उसके आसपास रहने पर उसे ऐसा आभास होता था जैसे वो देव के पास हो… और कहीं उसकी आंख बंद हुई तब तो बिल्कुल यही लगता कि उसके पास वरुण नही देव है। वरुण उसे कोई अपरिचित अनजान पुरुष क्यो नही लगता था। उसकी मुस्कान, उसकी गहरी आंखें सब कुछ उसे क्यों डुबाने पर तुली थीं।
   बहुत बार दिमाग लगा कर सोचने पर उसे आभास होता था कि उस जैसी स्त्री को ऐसे लुभावने सपने देखने का कोई हक नही है ,जब वो अकेली होती हर बार यही प्रण करती की अब वो वरुण के मोहपाश में नही फंसेगी पर उसे एक झलक देखते ही वो जैसे सब भूल कर रह जाती।
   आज भी सरोवर में बैठी वो यही सोच रही थी कि शायद वरुण उससे दूर भागना चाहता है और एक वो है कि उससे चिपकी चली जा रही है,अब उसे भी अपना मन कड़ा करना ही होगा।
  की तभी उसके बालों में एक तिनका आकर उलझ गया, और फिर एक के बाद एक आते ही चले गए और कहीं बाल चिड़िया का घोंसला न बन जाये इस डर से उसे अपनी जगह से उठ कर ऊपर जाना पड़ा जहाँ वरुण उसे आश्चर्य से खड़ा देख रहा था।
  वरुण तक पहुंचते ही उसका नियंत्रण बिगड़ा और वो अपनी ही साड़ी में उलझ कर गिरने को थी कि वरुण ने उसे सम्भाल लिया। उसकी कमर के इर्द गिर्द वरुण की बाहों का घेरा था।
    पारो का कलेजा जैसे उछल कर मुहँ को अ गया। उसकी डर से आंखें बंद हो गयी। और वरुण की उंगलियों के स्पर्श से उसके सोए मन के सारे तार झनझना उठे…
  …. वो पता नही कब तक वैसी ही खड़ी रह जाती की उसे पकड़ कर वरुण ने  सीधा खड़ा कर दिया….

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” आंखें खोलो पारोमिता , तुम ठीक हो!”

  घबरा कर पारो ने आंखे खोल दी… अब भी उसकी धड़कन रेलगाड़ी से होड़ लेती भाग रही थी।

“सांस लो पारोमिता!”

  पारो ने एक नज़र वरुण को देखा और शरमा कर नीचे देखने लगी।

  उसकी हालत समझते हुए भी वरुण उसे वहीं छोड़ तेज़ कदमों से अपने कमरे की ओर चला गया।

“पहले तो पारो ही कहा करते थे, अब अचानक पारोमिता? लेकिन क्यो ?
   अपनी सोच में गुम पारो भी भारी कदमों से अपने भगिनी आश्रम की तरफ मुड़ गयी…

क्रमशः

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aparna …..

समिधा -46

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  समिधा -46

      अगले दिन मंदिर में उपस्थित सभी आचार्य गुरुओं की मीटिंग बैठी। वरुण और प्रशांत भी मौजूद थे।
  चर्चा का विषय एकमात्र यही था कि प्रबोधानन्द के मामले में क्या किया जाए? अभी तक तो बस मामला एक पुलिस थाने में ही था लेकिन जैसे ही मामला कोर्ट कचहरी या मीडिया तक जाएगा तो आश्रम की बदनामी होनी तय थी।

    आश्रम के लिए बहुत ही विकट परिस्थिति थी ये सभी चिंतित बैठे थे। वरुण और प्रशांत चुपचाप एक दूसरे को देख रहे थे। उन्होंने प्रबोधानन्द को तो मज़ा चखा दिया था लेकिन उसका इतना दूरगामी परिणाम सोचा ही नही था। हालांकि इस बात पर एक बार वरुण और प्रशांत की बात भी हुई थी।
   वरुण का दिमाग इसी बात पर अड़ा हुआ था कि उदयाचार्य जी ने बोलना शुरू किया…

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“प्रबोधानन्द की कहानी आप सभी नहीं जानते हैं… ऐसा नहीं है कि इसने सिर्फ गलत काम ही किए हैं, मुझे तो खुद आज अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा कि प्रबोधानन्द ऐसा भी कर सकते हैं।
   अपने घर से किसी बात पर रूठ कर निकले प्रबोधानन्द को जो अमृतानंद स्वामी ने अपने पास पनाह दी और अपने साथ लेकर गए…..
…… तो वह स्वयं भी इनके दिमाग से और इनकी वाकपटुता से प्रभावित रह गए थे।
  फिर  अमृतानंद स्वामी ने यह सोचा था कि यह मठ के कार्यों को करने वाले सदस्य के रूप में मठ में उनके साथ रह लेंगे। उस समय प्रबोधानन्द की उम्र भी कम थी। मात्र चौदह – पंद्रह साल की उम्र में वह अपना घर त्याग चुके थे। पर अमृतानंद स्वामी के साथ आने के बाद उन्होंने अमृतानंद स्वामी की भक्ति में अपना दिन रात एक कर दिया। वो वही करते जो स्वामी जी कहते। उनकी आज्ञा से उठना बैठना… सोना जागना, खाना पीना…उनकी इतनी भक्ति देख स्वामी जी भी प्रसन्न थे, उस पर प्रबोधानन्द दिमाग के एकदम तेज़ थे।
    उस समय प्रबोधानन्द स्वामी बनारस निवास किया करते थे। उस मठ में भी विभिन्न तरह के चढ़ावो के साथ ही धन भी चढ़ा करता था। उस सबको गिनने और अलग करना रोज़ का सिरदर्द हो गया था। तब एक रात जब कुछ महंत यही काम कर रहे थे, उन सब के लिए चाय लेकर गए प्रबोधानन्द ने तुरंत कहा…-“अगर शुरू से ही ये सभी वस्तुएं अलग अलग डालने की व्यवस्था हो अर्थात दानपात्र ही 2 हों जिनमें एक में रुपये और दूसरे में अन्य वस्तुएं डाली जायें तो किसी को भी असुविधा नही होगी।”
  वहाँ उपस्थित सभी लोग चौन्क कर उस बालक को देखने लगे कि इतनी छोटी उम्र में इतनी बुद्धि कैसे? कुछ एक महंतों ने बात काटनी चाही पर अमृतानन्द स्वामी को प्रबोधानन्द की बात जम गई और उन्होंने वही किया…
    ऐसे ही एक बार की बात है…
मठ में कुछ ऊँची जात के लोग दर्शन को आये हुए थे। वो लोग अपना पूजा पाठ महानुष्ठान करवा रहे थे… उसी समय वहाँ कुछ निम्नजातिवर्ग के लोग आ पहुंचे और दर्शन के लिए मंडप से होते हुए आगे बढ़ गए।
   वहाँ अनुष्ठान में बैठे किसी ने उन लोगों को देख कर पहचान लिया और वहाँ बवाल मचा दिया कि इन लोगों को अंदर प्रवेश कैसे और किसने दिया?
  इन्हें मंदिर दर्शन की पात्रता नही होनी चाहिए… और वैसे उस समय भी उन्हें मंदिर दर्शनों की पात्रता तो थी पर मंडप में प्रवेश नही दिया जाता था।
तो इसी बात को ध्यान में रख़ कर किसी ने उन्हें टोक दिया कहा कि अगर दर्शन करना भी है तो मंडप से परे खड़े होकर ही दर्शन करें। यहां सब छूकर अपवित्र न करें।
   यह सब सुनते ही मठ में अमृतानन्द स्वामी समेत सभी को गुस्सा तो बहुत आया लेकिन उनमें से कोई भी खड़े होकर उस आदमी की बात काट पाता कि महज इक्कीस वर्ष के प्रबोधानन्द ने चाकू उठा कर उस आदमी के हाथ में एक छोटा चीरा बना दिया। उसके तुरंत बाद उसने अपने और उन दलितों के में से एक पुरुष के हाथ में भी चीरा लगा दिया।
   तीनो का खून बलबला कर छलक उठा। वहीं रखें एक पात्र में उसने उन दोनों आदमियों के साथ साथ अपना भी खून एकत्र किया और फिर उस नाराज व्यक्ति के पास जा पहुंचा।
  उसके कटे हुए स्थान पर हल्दी का लेप रख उसने उस पात्र को उसके सामने बढ़ा दिया। अब तक में वह आदमी गुस्से से पागल हो उठा था… लेकिन वह नाराज होता उसके पहले अमृतानंद स्वामी भी उसके पास पहुंच चुके थे कि तभी प्रबोधानन्द ने बोलना शुरू किया…

-” महानुभाव आप मुझसे उम्र अनुभव आदि सभी में बड़े हैं… इसलिए मैं आपको क्या शिक्षा दूं ? फिर भी मैं अबोध बालक बस यह कहना चाहता हूं, इस पात्र में से आप अपना स्वयं का रक्त पहचान लीजिए , बस आपको इतना ही करना है , और तुरंत ही हमारा मठ और यह आश्रम उन दलितों को उनके खून के द्वारा पहचान कर यहां से बाहर कर देगा।”

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बात अचंभित कर देने वाली थी!!! अमृतानंद स्वामी ही नहीं वहॉं अनुष्ठान में बैठे हर एक व्यक्ति के मन में यही सवाल जागा कि इतनी छोटी उम्र में यह बालक इतनी बुद्धिमता वाली बात कैसे कर सकता है? अमृत आनंद स्वामी धीरे धीरे मुस्कुराने लगे…
उस आदमी ने उस पात्र को अपने हाथ में लिया और इधर उधर हिलाकर बहुत कोशिश की …कि उन तीनों रक्त को पृथक कर सकें लेकिन यह संभव नहीं था।

” यह तीनों तो बिल्कुल एक से है, इनमें वे अपना रक्त चुनना असंभव है । यह क्या मजाक कर रहे हो तुम? “

प्रबोधानन्द मुस्कुराने लगे और उन्होंने मंदिर की तरफ देख कर इशारा कर दिया…-” जब उस बनाने वाले ने आपके हमारे और उस आदमी के रक्त में कोई भेद नहीं किया। तब आप और हम कौन होते हैं? सिर्फ चमड़ी के रंग या पैदा होने के स्थान और कुल को लेकर भेदभाव करने वाले?
   क्या आप माता सीता का कुल बता सकते हैं ?उनका गोत्र बता सकते हैं? क्योंकि रामायण के अनुसार तो वह राजा जनक की गोद ली हुई पुत्री थीं।
महाराज जनक को खेत की ज़मीन जुताई के समय मिली सुंदर कन्या यानी धरती की बेटी थी वह।
धरती का तो कोई कुल नहीं, कोई जाति नहीं, कोई धर्म नहीं… फिर भी प्रभु श्री राम ने माता सीता से कभी उनके कुल और जाति के बारे में सवाल किये बिना उन्हें अपनाया, उनसे विवाह किया। उन्होंने तन मन से उन्हें अपनी प्राणप्रिया माना और अपना लिया। तो जब हमें बनाने वाले उस परमात्मा ने जाति और कुल के ऊपर विचार नहीं किया तो हम और आप क्या उनसे भी बड़े हो गए हैं जो यह भेदभाव करने लगे हैं?”

प्रबोधानन्द की बात सुनते ही उस आदमी ने आंखें झुका ली। उसे मन ही मन इतनी ग्लानि हुई की उसने उसी समय प्रबोधनंद के पैर पकड़ लिये। अमृतानंद स्वामी के चेहरे पर एक गर्व भरी मुस्कान छलक उठी और उस दिन से हमारा मठ और आश्रम पूरी तरह से हर जाति वर्ग के लिए खुल गया।

   इतना ही नहीं पहले हर कार्य के लिए अलग सेवादार नियुक्त किए जाते थे। कई सेवादार तो सिर्फ अपना पूरा जीवन आश्रम की साफ सफाई में ही निकाल दिया करते थे।
  लेकिन जब अमृतआनंद स्वामी ने प्रबोधानन्द जी को एक गरिमामय पद दिया तब अमृतानंद स्वामी से कहकर प्रबोधानन्द जी ने सेवादारों की प्रथा भी हमारे मठों से और आश्रमों से हमेशा हमेशा के लिए समाप्त करवा दी। उन्होंने कहा कि मंदिर में कार्य करने वाला हर एक व्यक्ति और हर एक सदस्य उस कृष्ण के लिए कार्य कर रहा है, तो वह चाहे प्रवचन देने का कार्य हो भजन कीर्तन पूजा-पाठ आरती का कार्य हो या साफ-सफाई का, है तो सभी एक बराबर श्रद्धालु !! हैं तो सभी उस मुरली वाले के भक्त!! तो इसलिए इन सभी पदों को स्वामी, आचार्य और गुरुवर इन नामों से पुकारा जाए भले ही काम के अनुसार इन पदों को निम्न मध्यम और उच्च तीन भागों में बांट दिया जाए जिससे पद क्रम के अनुसार आचार्य वर और गुरुवर के बारे में बाकी लोगों को मालूम चल सके लेकिन सेवादार कोई भी ना कहलाये।
   वैसे कृष्ण का सेवादार होना भी अपने आप में सम्मानित पद ही है, और अपने आप में ही बहुत प्रसन्नता की बात है । लेकिन अगर सेवादार कहलाएंगे तो मंदिर के हर एक सदस्य फिर सेवादार ही कहलाएंगे।

  अमृतानन्द स्वामी को प्रबोधानन्द की यह बात भी बहुत अच्छी लगी। और उन्होंने फिर हमारे हर एक आश्रम से सेवादार पद को समाप्त कर दिया।
पहले पहल हमारे ट्रस्ट के मुख्य मंदिर में जो नियम बनाए जाते थे , वही हर मंदिरों और मठों में पालन करना आवश्यक था। यहां तक कि किस दिन क्या भोजन बनेगा? किस मठ में कितना दूध दिया जाएगा? अगर गाय पाली जाएंगी तो कितनी संख्या में गाय पाली जाएंगी ? लगभग कुल कितने गुरुवर और आचार्यवर आश्रम में निवास करेंगे? हर एक चीज का नियम एक पुस्तिका में लिखा होता और उस पुस्तिका के प्रति हर एक मठ और आश्रम में पहुंचा दी जाती। और सभी लोग अक्षरश: उसमें लिखी बातों का पालन किया करते थे लेकिन ऐसा पालन करना भी बहुत कठिन था।
   बनारस के आश्रम की पुस्तिका में लिखा है कि सोमवार को सुबह पालक साग बनेगा तो वह पालक साग हर जगह बनना आवश्यक था।
    राजस्थान, गुजरात … यह सब ऐसी जगह है जहां हर समय हर एक साग भाजी का मिलना संभव नहीं हो पाता है। ऐसे में उनके यहां बहुत बार इस तरह के नियम पालन नहीं हो पाते थे, और वस्तुतः उन्हें हर्जाने के रूप में मुख्य आश्रम को एक राशि भेजनी पड़ती थी।
प्रबोधानन्द एक बार राजस्थान के आश्रम गए हुए थे अमृतानंद स्वामी के साथ । तब उन्होंने वहां के आश्रम में यह सारी परेशानियां देखीं।हालांकि इस बारे में वह खुद भी यही सोच रहे थे और तब उन्होंने अमृतानंद स्वामी से इस बारे में बात की कि हर एक मठ और आश्रम के उस जगह के अनुसार अपने नियम होने चाहिए क्योंकि बहुत सी ऐसी वस्तुएं हैं जो पूरे भारत में हर जगह नहीं मिल सकती। इसके साथ ही पूरे भारत में हर राज्य की अपनी अलग विशेषताएं हैं। अपना अलग पहनावा, अपना अलग खान-पान है तो ऐसी स्थिति में एक मुख्य आश्रम के द्वारा सभी आश्रमों को संचालित किया जाना तो गलत नहीं है, लेकिन दैनिक उपयोग मैं आने वाली वस्तुओं के लिए नियम बनाना और उसे पालन करने को बाध्य करना सही नहीं है। क्योंकि ऐसे नियमों का पालन तो हर जगह एक साथ संभव ही नहीं है।

अमृतआनंद स्वामी स्वयं प्रबोधनंद की बातों से सहमत थे। लेकिन वह अपने से ऊपर बैठे ट्रस्ट के लोगों से यह बातचीत करने में संकोच का अनुभव कर रहे थे। तब प्रबोधनंद ने स्वयं आगे बढ़कर अमृतानंद स्वामी के पैर पकड़ लिए…-” स्वामी जी अगर आप आज्ञा दें तो ट्रस्ट के आचार्य से मैं स्वयं बात कर लूंगा।”

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“लेकिन ट्रस्ट के सदस्यों से बात करने के लिए अभी तुम बहुत छोटे हो प्रबोधानन्द। उन लोगों तक हर कोई नहीं पहुंच सकता। सीढ़ी दर सीढ़ी तय कर कर ही उन तक पहुंचा जा सकता है।

” इसका भी उपाय है मेरे पास! आप ट्रस्ट से मुलाकात के लिए समय मांगिये और जब आप मिलने जाए तो आप कह दीजिएगा कि आपके गले में खराश है या खराबी है, जिसके कारण आप अपना प्रवक्ता साथ लेकर आए हैं। मैं सिर्फ आपके प्रवक्ता की हैसियत से यह बातें एक बार ट्रस्ट के सामने रखना चाहता हूं। आखिर मंदिर के ट्रस्ट में भी इंसान ही तो हैं और वह हम इंसानों की तकलीफों को नहीं समझेंगे तो कौन समझेगा?

अमृतआनंद स्वामी तो पहले ही प्रबोधानन्द से प्रभावित थे, अब उसने उन्हें निशब्द कर दिया था। उनका ये कहने का मतलब नही था कि वो ये सब नही कह सकते और किसी और के द्वारा अपने मन की बात कहलवा सकतें हैं ,वो यही बात प्रबोधानन्द को समझना चाहते थे पर अपनी जिद के पक्के प्रबोधानँद को कुछ भी समझाना अपने आप में टेढ़ी खीर था। उन्होंने उसे हामी भरी और उसे साथ लिए ट्रस्ट से मुलाकात करने चल पड़े। ट्रस्ट से हुई उनकी मुलाकात सफल रही। ट्रस्ट के आगे प्रबोधानन्द ने अपने तर्कों से ट्रस्ट में उपस्थित सभी लोगों को इस बात के लिए मना लिया कि राज्य के अनुसार अलग-अलग आश्रम अपनी सुविधा अनुसार अपने दैनिक उपयोग की वस्तुओं को तय कर सकते हैं और अपने नियम रोज के लिए स्वयं बना सकते हैं।

   मंदिर के पूजन अर्चन अनुष्ठान आरती भजन आदि के सारे कार्यक्रम सभी आश्रमों में एक समान होंगे… लेकिन हर आश्रम का खानपान और पहनावा उस आश्रम के वातावरण के अनुसार होगा।

यह भी एक बहुत बड़ा परिवर्तन था, जो सभी आश्रमों में हुआ था। और इस परिवर्तन के बाद हर एक आश्रम ने व्यक्तिगत रूप से प्रबोधानन्द से मिलकर उसे आभार व्यक्त किया था और इसके बाद एक भव्य कार्यक्रम में प्रबोधनंद को गुरु की पदवी मात्र 22 वर्ष की आयु में दे दी गई थी।

उस समय आश्रम सिर्फ हमारे भारतवर्ष में ही मौजूद था। उसी समय एक अमेरिकन भक्त बनारस के आश्रम में आया था । प्रबोधनंद से मिलने और उनका प्रवचन सुनने के बाद उसने इस आश्रम को वाशिंगटन में खोलने की प्रार्थना की। अमृतआनंद स्वामी और ट्रस्ट के बाकी लोग इस बात के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन एक बार फिर प्रबोधानन्द ने ट्रस्ट के लोगों के साथ मिलकर मंत्रणा की और अमृतआनंद स्वामी की उपस्थिति में सभी को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि मंदिर भारत से बाहर भी खुलना चाहिए।
   उन्होंने सभी से यही कहा कि जब बाकी के धर्म के लोग अपने धर्म का प्रचार प्रसार कर सकते हैं, तो हम इस बात में पीछे क्यों रहें? ठीक है, हम यह मानते हैं कि हमारे धर्म को प्रचार प्रसार की आवश्यकता नहीं है!! लेकिन फिर भी इस तरह के प्रचार में मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती।
दूसरी बात अगर अमेरिका में हमारा भव्य आश्रम् बनता है तो अमेरिका और वहां रहने वाले भारतीयों के द्वारा मोटी रकम चंदे के रूप में हमारे आश्रम को मिलेगी। आप सभी यह मत सोचें कि मुझे रुपयों का कोई लालच है , मैं बस यह चाहता हूं, कि जितनी मोटी धनराशि हमारे आश्रम को मिलेगी उस धनराशि का फायदा हम आश्रम के द्वारा संचालित अस्पतालों वृद्ध आश्रम अनाथ आश्रम आदी में लगाकर अपने आश्रम का लाभ बढ़ा सकते हैं।
   प्रबोधानन्द ने और भी ऐसी कई बातें कही कि ट्रस्ट के सभी आचार्यों के साथ अमृत आनंद स्वामी भी प्रबोधानन्द के भक्त हो गए । सबने एक साथ अमेरिका में मंदिर खोलने को मंजूरी दे दी।

  अमेरिका में मंदिर ट्रस्ट की स्थापना के समय अमृतानंद स्वामी के साथ ट्रस्ट के बाकी लोग भी गए थे। और उन सब के साथ प्रबोधानन्द भी उस कार्यक्रम में शामिल हुए थे।
   उस अंग्रेज ने तो प्रबोधानन्द के हाथों ही मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कराई जानी चाहिए थी। लेकिन प्रबोधानन्द ने यहां पर अपने स्वभाव की विनम्रता दिखाते हुए अमृतानंद स्वामी को आगे कर दिया और इस प्रकार एक बार फिर वह सब की आंखों में ऊंचा उठ गया था।
उस मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से वापस लौटते साथ सभी मठाधीशों ने एक साथ मिलकर प्रबोधानन्द को गुरु से एक और ऊपर की पदवी यानी आचार्य की पदवी दे दी। वह भी महज़ दो ही सालों के भीतर । यानी कि इस पूरे आश्रम में सबसे कम उम्र में आचार्य की पदवी पर पहुंचने वाला प्रबोधनंद ही बन गया था। महज 24 की आयु में आचार्य का पद पा चुके प्रबोधानन्द के लिये आगे रास्ते खुलते चले गए। अमेरिका में एक बार मंदिर खुलने के बाद यह सिलसिला नहीं थमा। और भारत से बाहर यूरोप लंदन ऑस्ट्रेलिया नीदरलैंड्स एमस्टरडम सभी जगह हमारे ट्रस्ट स्थापित हुए। और हर जगह प्रबोधानन्द अमृतानंद स्वामी के साथ बना रहा। आगे के उनके कई मंदिर के कार्यक्रमों में तो प्रबोधानन्द अकेले ही जाने लगा और फिर ऐसा हुआ कि साल में तीन से चार बार प्रबोधानन्द के विदेशों के चक्कर लगने लग गए…

देखा जाए तो आश्रम की कीर्तिगाथा में प्रबोधानन्द का बहुत बड़ा हाथ है। और दूसरी बात प्रबोधानन्द को तो हमने पुलिस के हवाले कर दिया लेकिन उसे रातों रात छुड़वा कर यहां से बाहर भेजना होगा क्योंकि बाकी सारे कई आश्रमों में उसके श्रद्धालुओ की संख्या इतनी अधिक है कि उसके नाम पर उसके भक्त बवाल मचा देंगे…

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“आप सही कह रहे हैं आचार्य! प्रबोधानन्द ने गलत तो किया है लेकिन साथ ही वो बाहर के लोग भी तो गलत है जिन्होंने आश्रम की महिलाओं के साथ गलत किया है। हमें उनके बारे में भी सोचना चाहिए कि कैसे उन्हें  कानून के हवाले किया जाये।”

  सभी की बातें सुनते बैठे वरुण के दिमाग में फिर कोई बात आने लगी थी…

” मेरे पास एक उपाय है … जिससे आश्रम का गलत लाभ उठाने वाले सभी कानून की गिरफ्त में भी आ जाएंगे और प्रबोधानन्द पर लगे इल्ज़ाम के कारण आश्रम पर कोई आंच न आने पाएगी… लेकिन..!

“क्या है वो उपाय?”

  स्वस्तिकाचार्य ने उससे पूछा ही था कि सभी के लिए चाय लिए पारो और सरिता वहाँ चली आयीं।
हर किसी के सामने चाय का प्याला रखती सरिता ने जब वरुण के सामने प्याला रखा तो उसमें हल्दी वाला दूध देख कर वरुण के माथे बल पड़ गए, उसने तुरंत चेहरा उठा कर सरिता की ओर देखा तो सरिता तुरंत एक तरफ हो गयी और उसने दूसरी तरफ खड़ी पारो की ओर इशारा कर दिया…

   पारो ने आंखों ही आंखों में वरुण से पी लेने की गुज़ारिश की और तभी प्रशांत ने भी धीमे से उसकी ओर झुक कर एक फुलझड़ी छोड़ ही दी…

” सर्दी भी तो है तुम्हें, हल्दी वाला दूध गले को आराम देगा.. पी भी लो, वरना ये भिजवाने वाली तब तक सामने खड़ी घूरती रहेगी जब तक पी नही लोगे।”

  वरुण ने सामने देखा, पारो एक तरफ खड़ी उसे ही घूर रही थी…-“कैसे समझाऊँ इसे ..?”

“क्या समझाना है भाई! पहले खुद समझो, अपनी तबियत देखो, फिर दूसरे को समझाना।”

   वरुण ने एक बार फिर पारो की तरफ देखा और चुपचाप अपना गिलास उठा कर मुहँ से लगा लिया…
   पारो मुस्कुरा कर बाहर निकल गयी….

क्रमशः

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aparna …

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समिधा-45

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समिधा – 45

    पुलिस प्रबोधानन्द को पकड़ कर ले जा चुकी थी लेकिन आश्रम का माहौल आज सामान्य नही हो पाया था।
  मंदिर तो बिना बताए बंद नही किया जा सकता था, इसलिए श्रद्धालुओं के लिए मंदिर खुला था पर आश्रम के बाकी दैनिक कार्यक्रम जैसे प्रवचन भजन आदि आज के लिए स्थगित कर दिए गए थे।
  चारुलता जल्दी से जल्द वहां से निकल जाना चाहती थी… लेकिन आश्रम के गुरु आचार्यों ने चारुलता को ऑफिस में पूछताछ के लिए बुला लिया।

    इधर रोज का पूजन अर्चन साधारण रूप से समाप्त करने के बाद आज वरुण को प्रवचन नहीं देना था वह सरोवर की तरफ निकल गया वहां उसके बाकी साथी उसका इंतजार कर रहे थे…

” आओ वरुण बस तुम्हारा ही इंतजार हो रहा था… अब बताओ जरा की उस पाखंडीनंद के होश ठिकाने लाने के लिए तुमने उसकी खीर में क्या मिलाकर खिलाया था?”

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” हां यह सवाल तो हम सब जानना चाहते थे, बल्कि मैं तो और भी बहुत सारे सवाल आप से पूछना चाहती थी स्वामी जी।”

अबकी बार सवाल सुनीता की तरफ से आया था यह सभी लोग सीढ़ियों पर बैठे थे। सबसे नीचे बैठी पारो की आंखें वरुण पर एकदम स्थिर थीं और एकटक उसे निहार रही थी। बहुत बार उसे खुद भी लगता कि वह कैसे बेशर्म सी वरुण को ताकने लगती थी लेकिन पता नहीं क्यों वरुण की आंखों से उसे देव की आंखें झांकती हुई नजर आती थी।
    वरुण को देखकर हमेशा ऐसा लगता था कि शरीर भले ही वरुण का हो लेकिन इसके अंदर दिमाग दिल सब कुछ देव का आ गया है।

  वरुण ने एक नजर उन सब को देखा और फिर उन्हीं के साथ सीढ़ियों पर बैठकर उसने सुनीता की तरफ देखा और बोलना शुरू किया…

” आप सभी के सवालों का जवाब जरूर दूंगा। लेकिन सबसे पहले मैं आपसे जानना चाहता हूं , कि आखिर आपने अपने ऊपर इतने अत्याचार होने दिए ही क्यों?
   अगर पहली बार में ही उस पाखंडी को आपने आंखें दिखा दी होती! और खींच के एक थप्पड़ उसके गाल पर रख दिया होता तो शायद वह इतना आगे नहीं बढ़ पाता।

   “आप सही कह रहे हैं स्वामी जी! शायद मैं ही कमजोर पड़ गई थी… कुछ अपने परिवार की तकलीफों के कारण और कुछ उस मजबूत आदमी के दिए प्रलोभन के कारण, शायद मेरे मन में भी यह लालच आ गया था कि इस एक आदमी को खुश और संतुष्ट करके मैं अपना जीवन संवार लूंगी… लेकिन जब ऐसा कुछ हुआ नहीं , तब मेरी आंखें खुली और मुझे समझ में आया कि मैं किस गहरे दलदल में फंस चुकी हूं। और जब एक बार उस गहरे दलदल में नीचे उतर गई तब मुझे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं मिला।”

“ऐसा तुम्हें लगता है सुनीता, कि तुम्हें रास्ता नहीं मिला। आखिर तुमने पारो से सब कुछ सच कहा ना!! यही सच अगर कुछ सालों पहले कह देती तो पहले ही इस दलदल से मुक्ति मिल जाती।”

“पर किसे कहते स्वामी जी? आश्रम में जितनी महिलाएं हैं, उनमें से मैं किस पर विश्वास करूं और किस पर नहीं? यह भी तो मुझे नहीं पता था। वह तो पारो इतनी निश्चल है बिल्कुल बच्चों सी कि इससे अनजाने ही मैं अपने ह्रदय की सारी पीड़ा कह गई।  और इत्तेफाक देखें कि इसने बिना देरी किए आपसे सब कुछ कह दिया और आप दोनों ने मिलकर हमें उस नर्क से बचा लिया।”

  “वह सब तो ठीक है, लेकिन इस सब के बारे में हम पांचों से बाहर कोई बात नहीं जानी चाहिए। क्योंकि चारुलाता अब तक आश्रम में है, और उसके खिलाफ हमें अब तक कुछ भी नहीं मिला। अगर प्रबोधानंद पुलिस के सामने चारुलाता के खिलाफ कुछ बोलते भी हैं, तो भी चारुलता को कुछ दिन रिमांड में रखने के बाद सबूत ना मिलने की कारण पुलिस छोड़ भी सकती है। इसलिए अब हमें उस पर नजर रखनी होगी। हालांकि अभी अभी प्रबोधनंद पकड़ा गया है, तो चारु जरूर कुछ समय के लिए शांत हो जाएगी…… लेकिन बहुत लंबे समय तक शांत बैठी रहे वह ऐसी औरत नहीं है।”

“तुम सही कह रहे हो प्रशांत और मेरा साथ देने के लिए तुम्हारा आभार भी व्यक्त करता हूं ..दोस्त!!”

“एक तरफ दोस्त भी कहते हो, और दूसरी तरफ आभार भी देते हो! खैर अब बताओ कि यह सारी दवाइयां और वह जादूई  धूप यह सब तुम्हें मिला कहां से?”

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“मेरी दोस्त सारा से!! मैं जब सिएटल (अमेरिका) में रह रहा था तब वहां सारा से मेरी दोस्ती हुई थी। सारा के पिता जाने-माने जादूगर थे और वह अक्सर बड़े-बड़े जादू के शो किया करते थे। उन सब के दौरान वह कई अलग-अलग तरह के करतब दिखाया करते थे
और वाकई अपनी आंखों के सामने उनके बड़े-बड़े जादुई करतब देखना ऐसा लगता था जैसे मैं वाकई जादू की दुनिया में पहुंच गया हूं । असल में वह इल्यूशंस क्रिएट किया करते थे। यानी कि ऐसे दृश्य हमारे सामने बनाया करते थे कि, हमें यूं लगता वह सारा सबकुछ जो हम स्टेज पर देख रहे हैं , सच है। जबकि वह असल में सिर्फ एक तस्वीर हुआ करती थी। तब उस समय मैंने सारा से उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की थी, और सारा ने मुझे अपने पिता से मिलवाया भी था ।
  उसके पिता अमेरिका में घूम घूम कर अलग अलग जगह शो किया करते थे इसलिए सारा सिएटल में रहा करती थी।
   उनके पास वैसे तो वक्त कम हुआ करता था, लेकिन हम लोग सारा के अच्छे दोस्त थे इसलिए उन्होंने हमें सिर्फ समय ही नहीं दिया अपनी काफी सारी ट्रिक्स भी बताइ और उसी में उन्होंने इस जादुई पाउडर के बारे में बताया था।
     वो जब जादू किया करते थे तब उनके सहयोगी हर एक पंक्ति के पीछे उस जादुई पाउडर को मोमबत्तियों में डालकर जला दिया करते थे। लोगों को ऐसा लगता था कि यह खुशबू के लिए जलाया जा रहा है। लेकिन इससे निकलने वाला धुआं आंखों के सामने एक अलग सा पर्दा तैयार कर देता था और जिसके कारण हम जब जादू देखते थे तो बहुत सी चीजें जो हमारे पीठ के पीछे पर्दे पर चला करती थी.. वह हमें अपने सामने नजर आती थी और ऐसा लगता था हम उन चीजों को साफ-साफ देख रहे हैं।  वह हमारे पीठ के पीछे दो लड़कियों को आधा-आधा काट कर जोड़ दिया करते थे। यानी एक लड़की का धड़ और दूसरी लड़की का सिर, यह सब हमारे पीछे की स्क्रीन पर वह कंप्यूटर के द्वारा ग्राफिक से किया करते थे.. लेकिन उस पाउडर के कारण हमें यूं लगता था जैसे स्टेज पर हमारे सामने दो लड़कियां आधी आधी कट कर आपस में जुड़ गई वह वाकई गजब का अनुभव था।
    यह इत्तेफाक ही था कि जब मैं अमेरिका से हमेशा के लिए भारत वापस आ रहा था तब उन्होंने मुझे गिफ्ट के तौर यह पांव पाउडर भेंट किया था। हालांकि उन्होंने उस समय यह कहा भी कि यह तुम्हारे किसी काम का नहीं है लेकिन फिर भी मेरी याद के तौर पर इसे रख लो……. और देखो उस पाउडर ने आज कितना काम किया।
    सुबह जब प्रबोधनंद हवन कर रहे थे और प्रशांत ने उनके पीछे यह धूप जलाई, तब प्रबोधनंद को अपने सामने बैठी वह लड़कियां नजर आने लगी जो उनके पीछे थी। और इसीलिए हाथ बढ़ाने पर वह किसी को भी छू नहीं पा रहे थे। इसके साथ ही उस धूप का यह प्रभाव हुआ कि उन्हें आंखों में कुछ धुंधलापन सा आया और इसी के कारण उन्हें भूख लगनी बंद हो गई। मैं यह इसलिए चाहता था कि शाम को उन्हें दवा वाली खीर खिलानी थी और उसका अधिक असर तभी होता जब खाने वाला खाली पेट हो। मेरी इच्छा पूरी हो गई क्योंकि प्रबोधानंद ने दिनभर कुछ भी नहीं खाया था।
    शाम को जब पारो ने प्रबोधआनंद को वह नशीली खीर खिलाई तो उस के कारण उसका दिमाग भी काम करना बंद कर गया। उस चीज के प्रभाव के कारण ही उसे हर चीज दुगुने प्रभाव से नजर आ रही थी… जब साधारण सी साज सज्जा के साथ सुनीता और कावेरी बार बार उसके सामने आने लगीं तब उसे उन दोनों में ही भयानक भूतनीया नजर आने लगीं। इसके साथ ही खिड़की से बाहर की तरफ टॉर्च की रोशनी और बड़े कटआउट की सहायता से दीवार पर हमने लाश की झूलती हुई परछाई भी बना दी। उस परछाई को देखकर वो और भी ज्यादा डर गया इसके साथ ही कमरे की रोशनी भी हम बार-बार जला बुझा रहे थे और इन्हीं सब चीजों का एक साथ ऐसा असर हुआ कि प्रबोधआनंद खुद ही हर एक बात कबूल कर गया। हालांकि यह सब करने से पहले मैंने नहीं सोचा था कि प्रबोधनंद इतनी जल्दी पकड़ में आ जाएगा। मैंने उसे एक बहुत मजबूत आदमी सोच रखा था लेकिन शायद उसके पाप कर्मों की हांडी इतनी बढ़ चुकी थी कि छलकने ही लगी थी…… और इसीलिए वह बार-बार बेशर्मी से चारुलता को पारो को अपने कमरे में भेजने के लिए कहने लगा था।
   अपनी ताकत और घमंड में वह इस कदर चूर हो गया था कि उसे दिन दुनिया के बारे में सोचने और फिक्र करने की  बात भूले से भी दिमाग में नहीं आ रही थी! और बस यही से उसके पतन का रास्ता शुरू हो गया। उसने कभी सोचा भी नहीं कि सारे संसार से थकी हारी औरतें इस आश्रम में पनाह लेती हैं और वह इन औरतों को खराब करके इनका सौदा कर देता है। सुनीता , कावेरी क्या आप लोगों ने सोचा भी है कि आपको बड़े-बड़े नेता मंत्रियों के सामने परोसने के बाद यह लोग आपके बदले एक मोटी रकम लिया करते थे।
   बहुत शर्म की बात है कि इतने बड़े मंदिर परिसर से और इतने सारे आचार्यों की पीठ पीछे से ऐसा काला काम यहां होता रहा। और आज तक किसी ने इस काम को रोकने की कोशिश नहीं की …मेरा तो सोच सोच कर ही खून खौल रहा था, मैंने कितनी मुश्किल से खुद को रोका है उस प्रबोधनंद को मारने से यह मैं ही जानता हूं। वरना मेरा बस चलता तो मैं उसका गला दबाकर उसे वहीं खत्म कर देता। लेकिन मैं भी चाहता हूं कि वह कानूनी तरीके से पूरी सजा काटे।
    अब एक बात और मैं आप दोनों से कहना चाहता हूं चारुलाता तो पूरी कोशिश में होगी कि वह आज के आज यहां से अपने घर निकल जाए । उसके यहां से जाते हैं आप दोनों को इतना डर नहीं रह जाएगा।। पुलिस प्रबोधनंद को पकड़कर जरूर ले गई है, लेकिन उसके खिलाफ उन्हें पुख्ता गवाह और सबूत चाहिए होंगे । प्रबोधनंद का इकरारनामा काफी है… लेकिन आप दोनों को आगे आकर अपने ऊपर बीती हर एक बात पुलिस से कहनी होगी। क्योंकि इकरारनामा उसने अनजाने में किया है जब उसे कोर्ट में पेश किया जाएगा तब जरूर अपनी बात से मुकर जाएगा और अगर वह अपनी बात से मुकर गया और हमारे पास कोई गवाह नहीं रहे तो कोर्ट उसे बड़ी आसानी से छोड़ देगा। तो क्या मैं आप दोनों से यह उम्मीद कर सकता हूं कि आप दोनों गवाही देने से पीछे नहीं हटेगी।”

” हम बिल्कुल पीछे नहीं हटेंगे। आपने और पारोमिता ने जिस तरह से हमारा साथ दिया है, हम कोशिश करेंगे कि इस नर्क में हमारे साथ आश्रम की और भी जो महिलाएं शामिल थी वह भी अगर प्रबोधानंद के खिलाफ बोलने के लिए खड़ी हो जाए तो और भी अच्छा होगा। “

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“लेकिन वरुण यह भी तो हो सकता है कि यहां मौजूद सभी आचार्यवर यह बात ना पसंद करें। क्योंकि इससे हमारे मंदिर और आश्रम की बदनामी होगी। देखो वैसे भी अगर एक स्वामी पाखंडी निकला ढोंगी निकला तो उसके साथ चलने वाले हर किसी को बाहर निशाना बनाया जाएगा। इस पूरे कृष्ण आश्रम पर उंगलियां उठने लगेंगी और लोगों का भरोसा टूट जाएगा तो अभी कुछ कहा नहीं जा सकता कि प्रबोधानंद के ऊपर कोई केस चलेगा या नहीं!”

“कह तो तुम सही रहे हो दोस्त इस बारे में भी कुछ सोचना होगा।  मैं सोच रहा हूं इस बारे में अमृतआनंद स्वामी जी को फोन करके सब कुछ सच बता देना चाहिए। इसके बाद वो जो निर्णय लें वह निर्णय हमें भी मानना ही पड़ेगा।”

     ऑफिस में उपस्थित उदयाचार्य  स्वस्तिकआचार्य तथा बाकी गुरुवरों ने चारुलता से जितना हो सकता था , पूछताछ की… लेकिन वह अपनी बात पर अड़ी रही । और उसने यही कहा कि प्रबोधानंद स्वामी अपनी रोज की दवाइयां लेना भूल गए थे और शायद इसीलिए तबीयत सही नहीं होने के कारण कुछ भी बोले चले जा रहे थे। उसने उनके इस आचरण के लिए सभी से माफी मांगी और रोते हुए ऑफिस से बाहर निकल गई। वह सरोवर के पास से गुजर कर अपने कक्ष की ओर तेज कदमों से जा रही थी, तभी उसने वरुण पारो और बाकी लोगों की  बातें सुनी और वह वही एक बड़े से कदंब के पेड़ के पीछे छुप कर खड़ी हो गई और इन लोगों की योजना के बारे में सुनने लगी।
    
    वह लगभग सारी बातें सुन लेती कि तभी पीछे से सरिता चली आई…-” प्रणाम चारु दीदी वहां रसोई में पद्मजा दीदी आपको बुला रही हैं।”

चारु का पहले ही दिमाग खराब था और उस पर जैसे ही वरुण कुछ काम की बात बताने लगा था कि यह लड़की धमक पड़ी थी। उसका मन तो किया यही गड्ढा खोदकर सरिता को दफन कर दे। लेकिन अपने जज्बात समेटे वो पैर पटकती रसोई की तरफ निकल गई। सरिता को अचानक से समझ में नहीं आया कि चारु दीदी उस पर नाराज क्यों हो रही थी, कि तभी उसकी नजर सरोवर की सीढ़ियों पर बैठी पारो और बाकी लोगों पर चली गई वह मुस्कुराती हुई उन लोगों की तरफ बढ़ गई।

   आश्रम में सुबह सुबह  जो कुछ भी हुआ था उसमें आश्रम के किसी भी सदस्य को यह भनक तक नहीं लग पाई थी कि इस सारे काम के पीछे वरुण पारो प्रशांत सुनीता और कावेरी का हाथ है।
   आश्रम के लोग यही सोच रहे थे कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि प्रबोधनंद अपने कमरे से बाहर भागता हुआ आया और चिल्ला चिल्ला कर उसने अपने पापों के बारे में खुद ही वहां उपस्थित समूह को बता दिया।
    जहां महिलाएं इसे कृष्ण का चमत्कार मान रही थी, तो वही आश्रम के पुरुष किसे प्रबोधआनंद के पापों का घड़ा भरकर छलकना मान रहे थे। खैर जो भी था किसी को भी इस सबके पीछे वरुण और पारो का हाथ है, यह भान नहीं हो पाया था।

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   अपने दोनों हाथों को तेजी से हिलाती मुस्कुराती सरिता भी उन लोगों के पास जाकर सीढ़ियों पर बैठ गई….-” आज आप लोगों का भोजन करने का विचार नहीं है क्या? कब से देख रही हूं तीन-चार दिन से आप लोग सरोवर के इसी स्थान पर मंडली जमा कर बैठ जाते हैं, और जाने क्या बातों में लगे रहते हैं। और यह पारो दुष्ट मुझसे कुछ बताती भी नहीं।”

“तुझे भी सब कुछ बता दूंगी, लेकिन अभी वक्त नहीं आया है… और अगर तुझे कुछ भी जानना है तो इन से पूछ ले।”
     पारो ने धीमे से वरुण की तरफ इशारा कर दिया वरुण ने बाकियों से नजरें छुपा कर पारो को आंखें तरेर कर देखा और पारो ने आंखों ही आंखों में उससे माफी भी मांग ली।

   “तुम लोग नहीं बताओगे तो मैं चारु दीदी से जाकर पूछ लूंगी , वह अभी उस कदम्ब के पेड़ के पीछे खड़ी खड़ी तुम लोगों की बातें सुन रही थी, कि तभी पद्मजा  दीदी ने मुझे उन्हें बुलाने के लिए भेजा और मैंने उन्हें रसोई की तरफ भेज दिया। अब समझ आया इसीलिए शायद वह मुझ पर नाराज हो रही थी कि, वह तुम लोगों की पूरी बात नहीं सुन पाई होंगी।”

  नादानी और भोलेपन में सरिता सारी बातें कह गई और वरुण प्रशांत के कान खड़े हो गए…;” क्या कहा चारु लता यहां खड़ी थी?”

“यहां नहीं वहां कदम्ब के पेड़ के पीछे। वैसे वहां से मुझे तो तुम लोगों की कुछ खास बातें समझ में नहीं आई, पर वह पूरे कान लगाए हुए तुम लोगों की बातें सुन रही थी। “

वरुणा प्रशांत ने एक दूसरे को गहरी नजरों से देखा और कुछ सोच में डूब गए।

“कोई बात नहीं आप में से किसी को भी डरने या घबराने की कोई जरूरत नहीं है। वैसे भी अगर चारु लता ने हमारी सारी बातें सुन ली होंगी, तब भी वह हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। और दूसरी बात अब वह बौखलाहट में कोई ना कोई ऐसा कदम जरूर उठाएगी जिससे वह खुद भी फंस जाए। “

सरिता ने बड़ी बड़ी आंखों से उन सब की तरफ पलकें झपकाते हुए देखा। उसके सिर के ऊपर से यह सारी बातें निकल गई। और इसलिए वह सीढ़ियों पर अपनी जगह खड़ी हो गई…-” पारो तू चलेगी मेरे साथ? सारे आचार्यवर बैठ रहे हैं। चल उन्हें खाना परोसने।”

पारो ने चुपचाप हां में सिर हिलाया और एक नजर भर उनकी तरफ देख कर उठ कर चली गई। वरुण भी उसकी आंखों में बंधा कुछ देर तक उसे देखता ही रह गया ।
      जैसे ही पारो और सरिता उन लोगों की आंखों से ओझल हुए प्रशांत ने अपनी बात रख दी…-” अब हम लोगों को भी यहां से अंदर चलना चाहिए वरना आचार्य लोग भी सोचेंगे कि आखिर हम यहां बैठ कर कर क्या रहे हैं? आप लोग भी भगिनी आश्रम की तरह प्रस्थान कीजिये।”

   प्रशांत ने कावेरी और सुनीता की तरफ हाथ छोड़ दिए वह दोनों भी उन दोनों को प्रणाम कर रसोई की तरफ बढ़ गई।

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  कृष्ण मंडप के सामने ही एक बड़ा सा भोजन कक्ष बना हुआ था। जहां आमने-सामने लंबाई में दरियां बिछाकर और इन दरियों के सामने छोटे-छोटे पाटे रखकर गुरु आचार्यों को भोजन करने बैठाया जाता था आज भी सारे आचार्य खाने एक साथ बैठ गए।
  सुबह के कार्यक्रम के बाद आज मन तो किसी का भी खाने को नहीं था लेकिन वहां का बना भोग पहले श्री कृष्ण को अर्पित किया जाता था और इसीलिए उन सभी का खाना असल में कृष्णार्पण हो जाने के कारण प्रसाद स्वरूप हो जाया करता था और प्रसाद को नकारने की हिम्मत उनमें से किसी में भी नहीं थी। और इसीलिए सभी बेमन से खाना खाने बैठ गए। आज सरिता और पारो भोजन परोस रही थी।
    सभी की थालियों में रोटियां परोसते हुए पारो आगे बढ़ी। वरुण के सामने जाकर वो ठिठक गई। वरुण ने सिर्फ एक ही रोटी का इशारा किया और पारो ने उसकी थाली में दो रोटियां डाल दी। वरुण ने आंख उठाकर उसे देखा और आंखों ही आंखों में पारो ने उसे खा लेने का अनुरोध किया और आगे बढ़ गई।
     सभी की दाल की कटोरीयों में घी डालने का जिम्मा भी पारो के ही हाथ आया और सभी की कटोरी में उस छोटी चमची से पिघला हुआ घी डालते हुए पारो एक बार फिर वरुण की कटोरी में दो चम्मच डालकर आगे बढ़ने लगी…. वरुण ने उसे घूर कर देखा।थोड़ा आगे बढ़कर पारो ने दोनों हाथ धीरे से जोड़ कर उससे माफी मांग ली और जग में से गिलासों में पानी ढालने लगी….
     

क्रमशः

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aparna….
   
    

समिधा-44

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  समिधा -44

उनके वहां से जाते हैं पारो ने चैन की सांस ली, और दरवाज़े की ओर बढ़ गयी।  क्योंकि उसे पता था दरवाजे के भीतर शयन कक्ष के पहले बने गलियारे में उसके साथी उसका इंतजार कर रहे थे……

   दरवाजे को धीरे से खोलकर पारो अंदर चली आई। अंदर आते ही उसकी नजर वरुण और सुनीता पर पड़ी वो लोग दीवार से लगे एक तरफ चुपचाप सांस रोके खड़े थे। उन दोनों पर नजर पड़ते ही पारो के चेहरे पर मुस्कान चली आयी।
    वरुण ने उसे जल्दी से भीतर आने का इशारा किया और अपने होठों पर उंगली रख कर चुप रहने का भी। पारो ने हाँ में सिर हिलाते हुए अंदर प्रवेश करने के बाद अपने हाथ की थाली एक हाथ में पकड़ी और मुड़कर दरवाजा बंद करने लगी।
      दरवाजा बंद करते समय ही उसकी नजर वहां से जाती हुई चारु पर पड़ी और राहत की सांस लेकर पारो ने दरवाजा बंद कर दिया।
    दरवाजा जरा जोर से ही पारो ने बंद किया था… इस खटके की आवाज को अंदर लेटे हुए स्वामी जी ने भी सुन लिया उन्होंने तुरंत अंदर से आवाज लगा दी

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“कौन है वहां?”

“स्वामी जी!! मैं हूं पारोमिता!”

“अच्छा आ जाओ, भीतर आ जाओ।”

“जी स्वामी जी अभी आई।”

एक बार वरुण की तरफ देखकर वह अंदर दाखिल हो गई।
    उसके अंदर प्रवेश करने से पहले ही वरुण ने अपने पास छुपा कर रखी एक पुड़िया खोल कर स्वामी जी की खीर की कटोरी में कुछ मिला दिया।
   धीमे कदमों से थाली लिए पारो स्वामी जी के सामने पहुंच गई …स्वामी जी की आंखों में अब भी सुबह का खुमार नजर आ रहा था। पारो ने उन्हें गहरी नजरों से देखते हुए उनसे पूछ लिया…-” अब कैसी तबीयत है आपकी?”

  पारो को ऐसे खुद की तरफ देखते देख कर प्रबोधानन्द के चेहरे पर भी मुस्कान चली आई।

” सुबह से अभी ठीक महसूस कर रहा हूं। अब थोड़ी-थोड़ी भूख लगनी भी शुरू हो गई है। पता नहीं सुबह अचानक ऐसा क्या हुआ था, कि आंखों में जरा धुंधला धुंधला दिखने लगा और सिर भारी हो रहा था। उसके बाद कुछ भी खाने पीने का मन ही नहीं कर रहा था।”

“अभी तो साफ साफ दिखाई दे रहा है ना?”

आंखों में धुंधलेपन की समस्या प्रबोधानंद को अब भी हो रही थी… लेकिन जाने क्यों उसने उसे झूठ ही कह दिया…-” हां!! अभी तो साफ साफ दिख रहा है।

   पारो ने मुस्कुराकर प्रबोधानंद के पलंग के एक तरफ बैठने के लिए रखी कुर्सियों के सामने टेबल पर उसकी थाली रख दी…-” आप इधर आ जाइए और खाना खा लीजिए।”

  प्रबोधानंद का तो अपने पलंग से उठने का बिल्कुल भी मन नहीं कर रहा था… जाने सुबह से शरीर क्यों ऐसे टूट रहा था? लेकिन फिर भी पलंग पर बैठ कर खा तो नहीं सकते थे, इसलिए उठ कर उन्हें कुर्सी तक जाना ही पड़ा …उनकी कुर्सी के ठीक पीछे खिड़की खुलती थी।
     खिड़की के पीछे प्रशांत छिपकर खड़ा था। उसने एक बार फिर अपने आसपास यह देखकर कि कोई भी नहीं है, सुबह वाली धूप जलाकर खिड़की से जरा अंदर की तरफ सरका दी… उसका धुँआ धीरे-धीरे प्रबोधआनंद के चारों तरफ फैलने लगा…
  ” मैं आपके लिए हल्का गुनगुना पानी लेकर आती हूं।”

   यह बोलकर पारो उनके सामने से हटकर एक तरफ जाने लग गई…. प्रबोधानंद ने उसे रोकना चाहा लेकिन एक बार फिर उन्हें थोड़ा अजीब सा महसूस होने लगा। आंखें वापस थोड़ी सी भारी होने लगी, और ऐसा लगा जैसे उन्हें देखने में कुछ कष्ट सा हो रहा है। उन्होंने अपनी आंखें मली और जैसे ही उन्होंने अपनी आंखें खोली सामने सुनीता बैठी थी…

” इतनी जल्दी आप हमें भूल गए स्वामी जी? कितने बड़े-बड़े वादे किए थे आपने हमसे, कि हमें अपने साथ विदेशों की सैर करवाएंगे….. बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घुमाएंगे,  खूब सारे नए कपड़े दिलवाएंगे । आश्रम में हमें अलग से कमरा दिलवा देँगे।  अपने तो इसमें से  कुछ नहीं दिलवाया बल्कि आपके जाने के बाद हमे जो मिला वह तो और भी बुरा था।”

” तुम हमारे कमरे में कैसे आ गयी? जाओ यहां से, हम तुमसे बाद में बात करेंगे।”

” ऐसे कैसे चले जाए?  पहले हमारा चेहरा तो देख लीजिए… हमने तो अपना चेहरा आधा ढक रखा है। आपने हमें पहचाना कहां होगा? आपके लिए तो हम और हमारी जैसी लड़कियां तितली की तरह है , बस एक बार अपनी उंगली से पकड़ा और जैसे ही हमारा रंग आपकी उंगलियों में छूटा आप हमें छोड़ कर उड़ जाते हैं। “

” यह सब क्या बक रही हो?  तुम हो कौन?”

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और सरिता ने अपने चेहरे से अपने आंचल को हटा दिया… अब तक उसकी सिर्फ आंखें ही नजर आ रही थी उसका चेहरा देखते ही प्रबोधानंद चौक कर जरा पीछे की ओर सरक गया।
  उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था क्योंकि आप तक उसने आश्रम की लड़कियों को इस कदर डरा कर रखा था कि किसी की हिम्मत उसकी अनुमति के बिना उसके कमरे में प्रवेश करने की नहीं हुई थी। यह लड़की आज अचानक बिना उससे अनुमति लिए ऐसे कैसे चली आई… यही उनके लिए बहुत बड़ी बात थी?  आंखों के धुंधलेपन से परेशान उन्होंने अपनी आंखों को एक बार मलकर वापस खोला तो सामने पारो खड़ी थी….

” स्वामी जी यह आपका पानी हल्का सा गर्म है….. संभल के पीजियेगा कहीं मुहँ ना जल जाए। “

स्वामी जी आश्चर्य से चारों तरफ देखने लगे। क्योंकि अब उन्हें सुनीता कहीं नजर नहीं आ रही थी । उन्होंने एक बार फिर अपनी आंखें साफ की और पारो को देखने लगे…-” पारोमिता क्या  इस कमरे में और कोई भी लड़की है? क्या तुमने किसी को भी देखा है?”

  “ना” में सिर हिला कर पारो गुमसुम सी खड़ी रही….-” मैंने तो किसी को नहीं देखा स्वामी जी!! इस कमरे में तो सिर्फ मैं ही हूं। आप भोजन तो शुरू कीजिए। आज आपने सुबह से कुछ भी नहीं खाया ऐसे में तो कमजोर हो जाएंगे आप?”

“आज अचानक तुम्हें हमारी चिंता क्यों होने लगी? कल तो बहुत जोर का थप्पड़ मार कर गई थी?”

“चिंता तो मुझे आज भी आपकी नहीं हो रही है, लेकिन क्योंकि आप इस आश्रम का एक हिस्सा है और मैं भी इस आश्रम की सदस्य हूं , तो मेरा फर्ज बनता है कि आप के खान-पान का ध्यान रखूं।”

“अकड़ बहुत ज्यादा है तुममें लड़की?”

“जानती हूं स्वामी जी!! शायद परिस्थितियों ने मुझे ऐसा बना दिया है।”

“हम कह तो रहे हैं कि हम तुम्हारी परिस्थितियां बदल देंगे। तुम्हें वह सारी सुख सुविधाएं मिलेंगी, जो तुम जैसी लड़की को मिलनी चाहिए। तुम जानती भी हो कि तुम कितनी सुंदर हो। और तुम अपने इस रूप को भुनाकर कितना कुछ पा सकती हो। इस संसार में हर एक वस्तु की एक कीमत होती है, तुम भी बहुत सुंदर हो अगर तुम हमारी बात मान जाओ तो हम तुम्हें कहां से कहां पहुंचा देंगे तुम सोच भी नहीं सकती…

  स्वामी जी अपनी लय में कहते चले जा रहे थे कि तभी पारो के ठीक पीछे से कावेरी सामने चली आई…

” जैसे आपने मुझे पहुंचाया….?  आज से  पांच साल पहले यही शब्द आपने मुझसे कहे थे । याद है, स्वामी जी? तब मैं भी आश्रम में नई-नई आई थी। कुछ समय तक तो मुझे आपकी बातें बहुत बुरी लगी लेकिन फिर लगने लगा कि शायद इस आश्रम से मुक्ति का यही उपाय होगा। लेकिन आपने क्या किया मुझे बुद्धू बना कर मुझसे झूठ बोल कर मुझे हर लिया।
   यही सारे सपने तो आपने मुझे भी दिखाये थे।  यही सारे हसीन वादे आपने मुझसे भी किए थे, कहा था अगर मैं आपके जीवन में चली आई तो मेरे जीवन से सारी कालिख और अंधेरा दूर हो जाएगा। लेकिन आपने क्या किया ? मेरा भोग लगाने के बाद आपने अपने परिचितों में मेरा प्रसाद बांट दिया ….
    मुझे तो आपने एक निर्जीव वस्तु से भी गई बीती बना दिया था…..याद है  स्वामी जी !!! भूल गए क्या?”

प्रबोधानंद के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। क्योंकि इस कावेरी से पिछले डेढ़ दो साल से उनकी कोई मुलाकात नहीं हुई थी। यह आज अचानक कहां से यहां टपक पड़ी थी? उन्होंने तो बहुत पहले ही चारु से कहा था कि इसे किसी और आश्रम में भेज दिया जाए। अब इसका यहां पर कोई काम नहीं , लेकिन पता नहीं क्यों चारु ने इसे नहीं भेज यही रख रखा था।

   वो आंखें फाड़  उसे देखने की कोशिश कर रहे थे पर आंखें और धुंधली होती जा रही थी। उन्होंने नीचे सर किया और अपनी आंखों पर थोड़ा पानी लगा कर आंखें खोली… लेकिन अब कोई भी वहां नहीं था।  पारो नीचे बैठी थाली में कुछ और चीजें सजाकर उनकी राह देख रही थी….

” यह सारी लड़कियां अंदर कैसे आती जा रही है?

” कौन सी लड़कियां स्वामी जी !!!यहां तो बस मैं ही हूं, और आप कुछ खा भी नहीं रहे।”

पारो ने खीर की कटोरी उठाई और स्वामी जी के सामने कर दिया “कम से कम ये खीर ही खा लीजिए।”

“हमें कुछ ठीक नहीं लग रहा है… सुबह से तबीयत ठीक नहीं हो रही, और अभी कुछ अजीब अजीब सी चीजें हो रही है।”

“आप सोचते बहुत है ना स्वामी जी!! मन ही मन मनसूबे  तैयार करने लगते हैं। इतने बड़े-बड़े सपने देखने लगते हैं, कि असल जिंदगी में आपको कुछ नजर ही नहीं आता।”

“यह क्या बकवास कर रही हो।”!

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    पारो ने धीमे से गुनगुना कर जो कहा था वह भी प्रबोधानंद को सुनाई दे गया और वह उस पर नाराज होने लगे… इस पर पारो ने मुस्कुराकर वह कटोरी वापस उनके सामने कर दी…

    “जी आप नाराज मत होइए.. मेरा कहने का तात्पर्य सिर्फ यह था कि, आप अपने खाने पीने पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते। आज आपने सुबह से कुछ भी नहीं खाया है ….और शायद इसीलिए आपकी तबीयत सही नहीं लग रही है।  चलिए अब आप सबसे पहले यह खीर खत्म कीजिए..”

  प्रबोधानंद को भी यही लगा कि शायद सुबह से एक अन्न का दाना भी उसके पेट में नहीं गया और इसीलिए उसे तबीयत ज्यादा खराब लग रही है। वह फटाफट खीर खाने लग गया, और लगभग दो-तीन मिनट में ही उसने पूरी कटोरी खा कर नीचे रख दी। पारो के चेहरे पर मुस्कान खेलने लगी।

  तभी पारो के पीछे से वापस सुनीता निकलकर सामने चली आई …प्रबोधनंद के ठीक सामने हाथ बांधे खड़ी हो वापस मुस्कुराने लगी।
   इतनी देर में प्रशांत ने धुँआ करने के लिए जो सामग्री रखी थी उसे हटा लिया था जिसके कारण अब पारो सुनीता या कावेरी को उस धुँए से कोई समस्या नहीं होनी थी।

“हर चीज़ अब भी सबसे पहले ही चाहिए आपको स्वामी जी। और फटाफट चट कर जाने की आदत भी गयी नही आपकी। मुझे भी ऐसे ही खा कर जैसे कटोरी एक तरफ फेंक दी मुझे भी फेंक दिया था। याद है स्वामी जी?
    और आपके वो कुत्ते जिनके सामने मुझे फेंका था आपने, कुछ दिनों पहले तक नोच रहे थे मुझे। फिर जानते हैं आप? मैंने उनसे बचने के लिए क्या उपाय किया?
   आप कैसे जानेंगे ? आपकी प्रिय चारु ने आप तक ये बात आने ही नही दी….., या हो सकता है आपको पता भी हो तो आप अनजान बने घूम रहे हों?”

” कौन सी बात ? क्या किया तुमने?”
   ये पूछते हुए प्रबोधानन्द ने एक नज़र वहीं एक तरफ खड़ी पारो पर डाली। लेकिन पारो के चेहरे पर ऐसे निर्लिप्त भाव थे जैसे उसे सुनीता नज़र ही नही आ रही…

“क्या आप सच में नही जानते कि मैंने क्या किया? चलिए मैं ही बता देती हूँ। जब आपके उन रईस दोस्तो से मैं तंग आ गयी और मुझे बचने का कोई उपाय नही दिखा तब मैंने अपनी ही साड़ी का फंदा बनाया और झूल गयी… ऐसे…”
    वो एक तरफ को किनारे सरक गयी…. और उसके ठीक पीछे की दीवार पर फांसी के फंदे से लटकी एक औरत की छाया सी दिखने लगी।
   प्रबोधानन्द के कमरे में वैसे भी अधिक प्रकाश नही था, नाइट बल्ब जैसी नीली झिली सी रोशनी में दीवार पर औरत की झूलती लाश की परछाई डरावना माहौल बना रही थी…
   वो हड़बड़ा कर अपनी जगह से गिरते गिरते बचा, उसे अपनी आंखों पर विश्वास नही हो रहा था। वो तुरंत पीछे की ओर घुमा, ये देखने के लिए की आखिर परछाई बन कहाँ से रही है। पर उसके पीछे मुड़ते ही उसके सामने बाल बिखेरे कावेरी खड़ी थी…

” मुझे क्यों इतनी जल्दी भूल गए स्वामी जी?  आपने तो कहा था आप मेरा भला कर देंगे, मेरी जिंदगी सवार देंगे ….मैं अगर आपका कहना मान जाऊं तो आप जिंदगी भर मेरा ख्याल रखेंगे। लेकिन आप तो दो ही साल में मुझे भूल कर अपने रास्ते निकल गए। आप तो बहुत बड़े पाखंडी निकले स्वामी जी। “

  ” जाओ यहां से…. तुम यहाँ कैसे आ गई? यह तुम सब की कोई मिलीभगत है, मैं समझ गया हूं। “

  प्रबोधानंद  ने उसे हटाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया लेकिन उनका हाथ कावेरी के सामने से निकल गया… पर वह कावेरी को छू नहीं पाए।
        इस बात से वह थोड़ी देर को चौक गए और कावेरी को पकड़ने के लिए आगे बढ़ने लगे.. कावेरी अब भी अपनी जगह पर ही खड़ी थी और प्रबोधनंद को ऐसा लग रहा था वह चलते जा रहे हैं, लेकिन वह कावेरी तक पहुंच नहीं पा रहे थे….

    उन्होंने वापस पलट कर देखा पारो अब भी उनकी थाली में कुछ थोड़ा बहुत परोस रही थी। वह बिल्कुल इस तरह से निर्लिप्त उनकी थाली सजा रही थी, जैसे उसे ना तो कमरे की दीवार पर लाश की परछाई नजर आ रही और ना ही सरिता और ना कावेरी। वो मुड़ कर एक बार फिर उस तक चले आए..

” ए लड़कीं सुनो क्या नाम है तुम्हारा?”
घबराहट में वह पारो का नाम तक नहीं ले पा रहे थे… पारो ने नीचे बैठे बैठे ही उनकी तरफ अपना चेहरा उठा दिया अपनी गहरी काली आंखों से उन्हें घूरते हुए उसने कहा ….”सरिता !!! सरिता नाम है मेरा!”

” क्या बकवास कर रही हो? तुम सब मिली हुई हो, मैं सब जानता हूं.. यह सब मुझे डराने के लिए कर रही हो ना बोलो?”

” जो खुद अपने पाप की गहराई में डूबता चला जा रहा हो, उसे मैं क्या डराऊंगी?”

” बंद करो यह नाटक और निकलो तुम सब मेरे कमरे से। “

  उसी पल कमरे में थोड़ी रोशनी बढ़ गई पारो वापस थाली को सजा कर  प्रबोधानंद की तरफ देखने लगी….-” स्वामी जी आप वहां कब चले गए आप तो यहां बैठे खा रहे थे… मैं तो आपकी कटोरी में खीर परोस रही थी….
    मैं इतनी देर से खीर की कटोरी पकड़े खड़ी हूं और आपने अभी तक चखी भी नहीं।  क्या कल के थप्पड़ से अब तक आप मुझसे नाराज हैं?”

  प्रबोधानंद के चेहरे पर गुस्से की लकीरें खिंच गई उसने घूर कर पारो की तरफ देखा…-” मुझे बुद्धू बना रही हो। तुम्हें क्या लगता है मुझे समझ में नहीं आ रहा है… अभी अभी तो मैंने खीर खाकर कटोरी रखी थी और तुम ये दूसरी कटोरी देते हुए कह रही हो कि मैंने खीर नहीं खाई?  उल्लू समझ रखा है क्या मुझे?”

प्रबोधानंद के ऐसे कहते हैं किसी ने उसे कंधों से पकड़कर अपनी तरफ मोड़ लिया । प्रबोधनंद जैसे ही पलटा सामने सुनीता खड़ी थी…-” उल्लू नहीं पाखंडी समझा है तुझे, और तू पाखंडी है। और अब तू अपनी सजा भुगतने तैयार रह ।
     तेरे कारण ही मैंने अपना जीवन समाप्त कर दिया। और अब मैं वापस आई हूं तुझ से बदला लेने के लिए… और सिर्फ मैं ही नहीं इस आश्रम की जिस जिस लड़की के साथ तूने ज्यादती की है, वह सारी लड़कियां अब तुझ से बदला लेकर रहेंगी ।”

  ” दूर रहो मुझसे।  तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। प्रबोधानंद ने सुनीता का हाथ पकड़ने के लिए उसकी तरफ हाथ बढ़ाया, लेकिन हवा में ही प्रबोधानंद का हाथ इधर-उधर घूमता रहा। लेकिन सामने खड़ी सुनीता को वह छू भी नहीं पाया । प्रबोधानंद का डर अब अपने चरम पर था।
    ना तो वह कावेरी को छू पा रहा था और ना सुनीता को।
    दीवार पर अब भी वह परछाई वैसे ही नजर आ रही थी। इधर पारो का अलग ही नाटक चल रहा था। अब उसका सिर जोर-जोर से घूमने लगा… उसे लगा वो इस कमरे में रहा तो पागल हो जाएगा ….
    वह जोर से चिल्लाते हुए गलियारे की तरफ भागा कि तभी सुनीता ने उसका हाथ पकड़ लिया..-” तुझे क्या लगता है प्रबोधानन्द तू अब भी जिंदा है?  अरे मूर्ख अगर तू जीवित होता तो तू मुझे कैसे देख पाता? तेरी तबीयत बिगड़ी थी ना उसमें तेरे प्राण पखेरू उड़ चुके हैं।”

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” चुप करो जैसे चमत्कारों की कहानियां हम अपने श्रद्धालुओं को सुनाते हैं, वैसी ही  उटपटांग कहानियां हमें मत सुनाओ हम जानते हैं कि…”

” तू कुछ नहीं जानता और अगर जानता भी है तो जानबूझकर अनजान बन रहा है। आ  मुझे छूने की कोशिश कर। क्या तू मुझे छू पा रहा है? नहीं ना फिर तुझे समझ में क्यों नहीं आ रहा प्रबोधानंद!!
     अगर इस संसार में देवता है तो दानव भी है। अगर इंसान हैं तो आत्माएं भी हैं। हर इंसान के अंदर एक आत्मा होती है और जब वह आत्मा उस इंसान से विलग हो जाती है तो इंसान मृत हो जाता है।
   मेरी आत्मा तो उसी दिन मृत हो गई थी, जिस दिन तू ने अपने इन गंदे हाथों से मुझे छुआ था। लेकिन फिर भी मैं घिसट सिसक कर ही सही  जिंदा थी। पता नहीं क्यों जिंदा थी? शायद अपने परिवार को पालने पोसने के लिए।
    लेकिन जब तेरे और तेरे आदमियों की ज्यादातियां बढ़ती गई तब मेरी हिम्मत चूक गई। और उस समय ना तो मेरा बीमार छोटा भाई मेरी आंखों के सामने था और ना मेरी बूढ़ी मां।  उस वक्त मुझे बस यही लगा कि मैं अपनी आत्मा को अपने शरीर से अलग कर दूं। अपनी आत्मा को मुक्ति दे दूँ। और मैंने अपने गले में फांसी लगाकर खुद को मुक्त कर दिया। ये मेरी सोच थी कि मैं मुक्त हो जाऊंगी , लेकिन मेरी आत्मा यहीं इसी आश्रम में भटकती रह गई… तेरे इस रंगीले कमरे के चारों तरफ।
   क्योंकि मेरी मौत का जिम्मेदार तू जो था। आखिर मेरी आत्मा क्यों नहीं भटकती? मेरी मौत को भी तो पूरा न्याय नहीं मिला। इस आश्रम के लोगों को भी मेरी मृत्यु के बारे में पता नहीं चल पाया। तेरी उस महिला मित्र ने मेरी लाश को अपने आदमियों से कहकर ठिकाने लगवा दिया। इस आश्रम के एक आचार्य तक को  भी पता नहीं चला कि भगिनी आश्रम में रहने वाली सुनीता अचानक कहां चली गई।”

प्रबोधानन्द  ध्यान से सुनीता की बातें सुनता रहा …
  सुनीता उसकी तरफ बढ़ती हुई अपनी बात कहती रही और प्रबोधनंद पीछे हटते हुए उसकी बातें सुनता रहा धीरे-धीरे उसकी बातें सुनते हुए प्रबोधानन्द आगे बढ़ता चला गया…और कमरे से बाहर आ गया।

” मैं सच कह रहा हूं जैसे इस आश्रम के किसी आचार्य को नहीं पता था वैसे ही मुझे भी नहीं पता था कि तुम मर चुकी हो। “

” अब तो पता है ना!! तो अब चल मेरे साथ।।”

  “नहीं मुझे छोड़ दो मुझे जाने दो”
  
     रात बीत चुकी थी, हल्की सी भोर का समय था।कमरे में हल्का उजाला हल्का अंधेरा सा था।  उस पर बाल बिखराई भूतनी के समान दो औरतें ….दीवार पर बनती लाश की परछाई… और उस पर खाई हुई खीर में मिली हुई दवा का असर प्रबोधानंद के सर चढ़कर बोलने लगा था… उसका डर अपने चरम पर था.. अब उसे लगा अगर वह उस भूतिया कमरे में रहा तो पागल हो जाएगा….
   अपने कमरे से वो गलियारे की तरफ निकल रहा था कि पारो उसके सामने चली आयी….

” खीर तो खा लीजिये स्वामी जी। “

   उसे एक तरफ को धक्का देकर वो चारु का नाम पुकारता बाहर निकल गया…

” ये क्या हो रहा है हमारे कमरे में?  वो लड़कियां सुनीता और कावेरी वहाँ कहाँ से चली आयीं? ठीक है हम मानते हैं कि हमारे उनके साथ गलत सम्बन्ध थे!! ये भी मान लेते हैं कि उन्हें इस काम के लिए हम ही ने डराया धमकाया भी… और हमारे बाद बड़े बड़े व्यापारियों नेता मंत्रियों के सामने भी उन्हें परोस दिया पर उसका मतलब ये थोड़े ही हुआ कि इस सब में हम अकेले दोषी हैं। इस सब से हमारा अकेले का तो फायदा नही होता? अगर हम उन लड़कियों के साथ वक्त बिताने के बाद उन्हें  रईसों के हवाले कर देते थे तो क्या बदले में उन लड़कियों की कोई कमाई नही होती थी। अभी अगर ये लड़कियां बाहर बैठ कर यही धंधा करती होती तो पुलिस के चक्करों से इन्हें कौन बचाता। हमारे सरंक्षण में कम से कम उनसे तो सुरक्षित ही हैं। ठीक है माना कि तुम लोग इसे दलदल मानते हो पर उन लोगो को इस दलदल में खींचने में हमारे साथ साथ तुम्हारा भी बहुत बड़ा हाथ …”

  प्रबोधानन्द कमरे से बाहर मंदिर परिसर के बीचोंबीच खड़े चारु पर तेज़ आवाज़ में अपनी भड़ास निकाले जा रहे थे कि आसपास की भीड़ देख चारु ने उनके मुंह पर हाथ रख दिया…..

” यह क्या कह रहे हैं आप स्वामी जी मैं इस बारे में कुछ भी नहीं जानती।”

   उसने चारों ओर देखा आसपास मंदिर के आचार्य भगिनी आश्रम की महिलाएं और बाकी सदस्य भी जमा हो गए थे। उस गोल घेरे के बीच प्रबोधनंद और चारु लोगों से घिरे खड़े थे। चारु ने एक बार फिर सब की तरफ देखा और हाथ जोड़ लिए….-” मैं सच कह रही हूं इस बारे में मैं कुछ भी नहीं जानती कि यह  स्वामी जी क्या बोल रहे हैं? “

    उसने उदयआचार्य और बाकी गुरुओं को देख वापस अपनी बात कहनी शुरू कर दी…-” मैं सच कह रही हूं आचार्यवर!! मैं इस बारे में कुछ भी नहीं जानती। मैं प्रबोधानंद जी की खास सेवा में उपस्थित रही हूं लेकिन यह महिलाओं से जुड़ी क्या बात कह रहे हैं वह मैं कुछ भी नहीं जानती।”

” कोई बात नहीं मैडम!! आप एक तरफ हट जाइये, यह जो भी कह रहे थे यह सब हमने रिकॉर्ड कर लिया है। और अब कौन क्या जानता है? और क्या नहीं? यह सब थाने में चल कर ही पता चलेगा। चलिए स्वामी जी आपका समय पूरा होता है।”

  चारु की आंखें फैल गई उसने पीछे पलटकर देखा पीछे पुलिस खड़ी थी। उन्ही पुलिस वालों में से एक पुलिस इंस्पेक्टर ने अपने फोन पर स्वामी जी की कही गई एक एक बात रिकॉर्ड कर ली थी।
 
   इस सारे झोल झमेले के बीच ही वरुण पारो और बाकी लोग कमरे से बाहर निकल आये थे , और चुपके से उसी भीड़ का हिस्सा बन गए थे। वरुण ने ही पुलिस को इत्तला कर यहाँ बुलवाया था।

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    आश्रम के सारे लोगों के सामने पुलिस वाले ने एक बार फिर रिकॉर्डिंग चलाई और आगे बढ़ कर प्रबोधानन्द के हाथ में हथकड़ियां डाल दी…

” उम्मीद है आप में से कोई भी इस पाखंडी को यहाँ से लेकर जाने का विरोध नही करेगा।”

  सभी आचार्य गणों ने घृणा से प्रबोधानन्द को देख पुलिस के जाने के लिए मार्ग बना दिया…

    प्रबोधानन्द जो अपना सिर पकड़े वहीं ज़मीन पर बैठ गया था कि हथकड़ी को पकड़ कर पुलिस वाले ने खींचा और गिरते पड़ते वो खड़ा हो गया..

  जाते जाते उसने एक बार पलट कर देखा, पारो भी उस भीड़ में खड़ी उसे दिख गयी। उसे आंखों से ही भस्म करता वो पुलिस की गाड़ी की तरफ बढ़ रहा था कि उस भीड़ से हवा में उड़ता एक चप्पल उसके माथे पर जाकर लगा, उसके बाद उस भीड़ से एक एक कर लहराते हुए चप्पलों से प्रबोधानन्द का सम्मान तब तक चलता रहा जब तक पुलिस उसे अपने घेरे में लेकर गाड़ी में बैठा कर ले नही गयी…

क्रमशः

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aparna….

समिधा – 43

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समिधा – 43

        हवन समाप्त होते तक में प्रबोधआनंद थोड़ी थकान महसूस करने लगे थे।
    हवन के पूरे होते ही, वह वहाँ से उठ गए और अपने कमरे की ओर जाने लगे… वहां बैठे आचार्यों ने उनसे आरती करने के लिए विनम्र अनुरोध भी किया, लेकिन उन्होंने तबीयत सही नहीं लगने का बहाना कर अपने कमरे की ओर रुख कर लिया….

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    सुबह तक वो भले चंगे थे , यहाँ तक कि पूजा पाठ निपटा कर जब हवन में बैठे तब भी ठीक थे फिर हवन के बीच अचानक न जाने क्या हुआ कि उन्हें हल्की घबराहट सी लगने लगी। वो तो हवन बीच में छोड़ा नही जा सकता था वरना वो हवन छोड़ ही कमरे में चले जाते।
     उनके वहां से जाते ही हवन पूजन होने के बाद रोज की तरह वरुण अपने प्रवचन के लिए अपनी जगह पर आ बैठा।
   अपने आसन पर बैठते हैं उसकी नजर सामने पाटे पर रखी पुस्तिका और कलम पर पड़ी और उसे एकदम से पारो का चेहरा याद आ गया।
    वरुण के ठीक बगल में बायीं ओर गुनगुने पानी का कलश रखा था। और कलश से लगा हुआ एक छोटा सा चांदी का गिलास रखा था। इन सभी छोटी छोटी चीजों में आज उसे पारो नजर आ रही थी… मुस्कुराकर उसने आज की कथा कहनी प्रारंभ की…..
    
        वरुण के कथा समाप्त करने के बाद भगिनी आश्रम की वह महिलाएं जो वहां रोज बैठकर भजन गाती थी ने हारमोनियम संभाला और ढोलक बजाते हुए भजन गाने लगी….

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     सांवरी सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया।

एक तो तेरे नैन तिरछे, दूसरा काजल लगा ।
तीसरा नज़रें मिलाना, दिल दीवाना हो गया ॥

एक तो तेरे होंठ पतले, दूसरा लाली लगी ।
तीसरा तेरा मुस्कुराना, दिल दीवाना हो गया ॥

     एक तो तेरे साथ राधा, दूसरा रुक्मणि खड़ी ।
     तीसरा मीरा का आना, दिल दीवाना हो गया ॥

    भजन समाप्त होते तक में आश्रम में भोजन का समय हो गया था।
   सबका भोजन आदि निपटा कर दोपहर में एक बार फिर सरोवर पर वरुण प्रशांत पारो सुनीता और कावेरी एक साथ थे।
   आज रात के लिए जो भी उनकी तैयारी थी वह सब लगभग पूरी हो चुकी थी। कोई एक सामान वरुण ने बाहर से मंगाया था जो शाम तक मिल जाने की संभावना थी।
   सारी बातें सब को अच्छे से समझा देने के बाद वरुण ने सभी को जाकर आराम करने कह दिया…..  और खुद वही सरोवर की सीढ़ियों पर बैठ गया। प्रशांत ने उसे साथ चलने के लिए पूछा भी…-” नहीं प्रशांत मैं थोड़ी देर शांति से यहां बैठना चाहता हूं! बस थोड़ी देर में आ जाऊंगा।

” ठीक है जैसा ठीक समझो, पर आ जरूर जाना। इतनी देर तक और इतना लंबा प्रवचन देने के बाद तुम्हें भी थोड़े आराम की जरूरत है वरुण।”

  वरुण के “हां” में सर हिलाते ही प्रशांत सुनीता कावेरी के साथ ही पारो भी वहां से निकल गई… लेकिन वरुण को वहां अकेले छोड़ पारो का मन कहां लगता?
    अपने कमरे में जाने के बाद वो एक बार फिर धीमे कदमों से वापस लौट आई…-” क्या मैं भी यहां बैठ सकती हूं? आपके एकांत में मेरे आ जाने से कोई विघ्न तो नहीं पड़ेगा?”

वरुण ने पारो की आवाज सुनी और चौक कर पीछे देखा…. वह सामने हाथ बांधे ख़ड़ी मुस्कुरा रही थी… वरुण ने भी इशारे से मुस्कुरा कर सिर हिला दिया और वह आकर उसके कुछ सीढियां नीचे की सीढ़ियों पर बैठ गई…

” आज भी तो प्रबोधानंद के लिए भोजन लेकर जाने का जिम्मा तुम्हारे हिस्से था ना?  गई थी क्या उनके कमरे में?”

पारो को जाने कैसे लेकिन यह समझ आ गया कि वरुण को शायद यही बात मन ही मन मथ रही थी कि सुबह से उसे पारो कहीं दिखाई नहीं दी थी और उसने यह सोच लिया था कि प्रबोधानंद की जिद को पूरा करने हो सकता है पारो को उसके कमरे में चारु ने भेज दिया हो।

“आपको क्या लगता है? मैं गई थी या नहीं? “

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   पारो के इस गोलमोल जवाब से वरुण चिढ़ गया।

“अब ये मुझे क्या पता? मैं कोई अंतर्यामी तो हूँ नही। और तुम इस तरह पहेलियां बुझाने से अच्छा है सीधे शब्दों में मेरे सवाल का जवाब दे दो।”

अब भी वरुण के समझ से बाहर था कि आखिर क्यों वह इतने हक से पारो को डांट लिया करता था।
  आज प्रवचन के पहले मिलने के बाद से उसने पारो को अब तक नहीं देखा था। लगभग यह दो-तीन घंटे का समय यूं ही बीत गया था…
   और उसके लिए पारो को यह बताना बहुत कठिन हो रहा था कि इन दो तीन घंटों में पारो को देखे बिना उसका जी कैसे कसमसा कर रह गया था.. ..
  
     उसका ध्यान बार-बार प्रबोधानंद के कक्ष की तरफ चला जा रहा था कि, कहीं उसने पारो को बुलाकर वापस कोई बदतमीजी तो नहीं कर दी । हालांकि पारो का पिछला व्यवहार देखकर वह थोड़ा बहुत तो आश्वस्त हो गया था कि अब प्रबोधानंद इतनी आसानी से पारो पर हाथ नहीं डाल सकता। लेकिन फिर भी आखिर मन ही तो था जो पारो के लिए बेचैन हुआ जा रहा था।
   और वह अपने मन में चलती इस उलझन का कोई ओरछोर नहीं पा रहा था।

   ऐसी बेचैनी तो उसे कभी कादंबरी के लिए भी नहीं हुई थी। उस समय भी नहीं जब नई-नई सगाई के बाद वह कादंबरी को पहली बार इंडिया अकेले छोड़कर अमेरिका जा रहा था …..
        फिर इस लड़की में ऐसी क्या बात थी कि जो इसकी तरफ देखते ही उसके ह्रदय में ममता का सागर उमड़ पड़ता था। हमेशा ऐसा लगता था कि इस लड़की को अपने सीने से लगाए इस सारे संसार से छुपा कर कहीं दूर ले जाए। और लेकिन उसी पल उसका खुद का दिमाग उसके मन पर कोड़े बरसाने लगता था, कि वह यहां सब कुछ छोड़ कर सांसारिक वृत्तियों को छोड़कर वैराग्य लेने आया हुआ है… और ऐसे में उसके मन में एक पराई औरत के लिए ऐसे भाव आना सही नही है।

   “नहीं!!! मैं आज अभी तक प्रबोधानंद के कमरे में नहीं गई हूं! उन्होंने खुद ही चारु दीदी से संदेश भेज दिया था कि, आज वह पूरे दिन आराम करना चाहते हैं और उनके कमरे में कोई भी नहीं आएगा।
  उन्होंने खुद ही कह रखा है कि वह शाम को ही अपने कक्ष से बाहर आएंगे और रात का भोजन मेरे हाथ से भेजने के लिए कहलवा दिया है।”

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” बहुत अच्छे!!! सुबह कुछ भी नहीं खाया इसका मतलब हमारी सुबह वाली तरकीब काम कर रही है… और अच्छा है उनका दिन भर खाली पेट रहकर रात में ही सीधे भोजन करना भी हमारे फायदे की ही बात है।
  तुमने सुनीता और कावेरी को सब कुछ ठीक से समझा दिया है ना। “

” हां मैंने तो समझा ही दिया है, लेकिन आपने भी इतनी बार उन लोगों को समझाया है कि अब हम में से कोई भी कुछ नहीं भूल सकता। “

   पारो के मुस्कुराकर कहने पर भी वरुण के चेहरे पर कठोरता वाले भाव बने रहे। वह बेचारा अपने आप में परेशान था। वह एक युद्ध अगर प्रबोधानंद के खिलाफ लड़ रहा था, तो दूसरा युद्ध अपने खुद के मन के खिलाफ लड़ रहा था।
     उसे अपने मन को, अपनी आत्मा को पारो से विमुख करना था।  लेकिन कितनी भी कोशिश कर ले वह बार-बार पारो की तरफ फिसलता चला जा रहा था।

   “रुकिए जरा एक मिनट, इधर झुकिए मेरी तरफ!”

वरुण को एकाएक पारो की बात समझ नहीं आई वह इधर-उधर देखने लगा कि पारो खुद दो सीढ़ियां ऊपर चढ़कर वरुण के कंधे तक पहुंची और हाथ बढ़ाकर उसके कान के ऊपर पेड़ से लटकती मकड़ी को उसके जाल के साथ हटाकर एक तरफ फेंक दिया।
    मकड़ी हटा देने के बाद भी पेड़ से कुछ घास फूस जो गिरकर वरुण के बालों में अटकी थी पारो उन्हें वहां से हटाने लगी। अनजाने ही पारो की कोमल उंगलियां वरुण के कानो और उसके आसपास की त्वचा से होते हुए बालों पर फिरती रही और वरुण की धड़कने बढ़ाती रही।
   वरुण को उस वक़्त यही लग रहा था कि यह पल यही ठहर जाए…
     वो  इसी तरह सीढ़ियों पर बैठा रहे और उसके बालों में पारो की उंगलियां यूं ही फिरती रहे… उसे एक पल को लगा कि काश वो पारो की गोद में सर रखकर अपनी सारी चिंताओं से मुक्ति पा लें….
     लेकिन तभी उसकी आंखें झटके से खुल गई और उसने पारो का हाथ जोड़ से झटक दिया…

” यह क्या कर रही हो?  अपनी सीमाओं को समझो?”

  ” क्यों?अपनी सीमाओं से परे जाकर मैंने ऐसा कौन सा अपराध कर दिया? जो आप इतने गुस्से में आ गए? “

वरुण की समझ से बाहर था कि वह पारो को कैसे बताएं, कैसे समझाए कि जब जब पारो की उंगलियां गलती से भी उसे छू जाती हैं तो उसके मन में कैसी अदम्य लालसा जागने लगती है, उसे पाने की।  जिन लालसाओं, कामनाओं को वह छोड़ कर अपने जीवन में आगे बढ़ना चाहता है…. वही कामनाएं अपना सर उठाने लगती हैं।
   
” कुछ नहीं …तुम नहीं समझोगी।  अब जाओ तुम भी थोड़ी देर आराम कर लो आज रात में हो सकता है रात भर जागना पड़ जाए। “

  वरुण को भर नजर घूर कर पारो ने हां में सर हिलाया और धीमे कदमों से सीढ़ियां चढ़कर अपने भगिनी आश्रम की तरफ मुड़ गई।

    शाम के समय भगिनी आश्रम की महिलाएं एक साथ चाय  पिया करती थी… पर आज पारो सुनीता और कावेरी अपनी चाय लिए ऊपर चले आए।
    खिड़की के पास बैठी  पारो की आंखें खिड़की से बाहर ही लगी हुई थी… बार-बार बाहर देखती जैसे वह किसी को ढूंढ रही थी ….सुनीता और कावेरी आपस में बातें कर रही थी लेकिन सुनीता का ध्यान पारो पर ही था…

” क्या हुआ पारो किसे ढूंढ रही हो?

” नहीं किसी को भी तो नहीं।” पारो के चेहरे पर बिल्कुल ऐसे भाव चले आए जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो कि तभी सीढ़ियों पर से ऊपर चढ़कर सरिता भी अपनी चाय लिए उन लोगों के पास चली गई…

” तुझे नई सखियां क्या मिली अपनी पुरानी सखी को इतनी जल्दी भूल गई।

सरिता के मीठे से उलाहने पर पारो ने आगे बढ़कर उसके गले में अपनी  गलबहिया डाल दी और उसके कंधे पर अपना सर रखें मुस्कुराने लगी…

” तुझे कैसे भूल सकती हूं?  तू ही तो है जो उस समय मेरे साथ थी जब मेरी मां ने भी मेरा साथ नहीं दिया!  आश्रम के शुरुआती दिन कितने कठिन थे मेरे लिए और तूने हर मोड़ पर, हर रास्ते पर मेरा साथ दिया है। तुझे तो मैं अपनी अंतिम सांस तक भी नहीं भूल सकती। “

“चल चल बातें मत बना!! बल्कि यह बताओ कि तुम तीनों मिलकर क्या खिचड़ी पका रहे हो? आज दोपहर के भोजन के बाद भी तुम तीनों अचानक ही गायब हो गए थे। ?
  दोपहर भोजन के बाद जब आश्रम की सभी बहने अपनी-अपनी जगह पर आराम कर रही थी तब चारु दीदी दो घड़ी के लिए ऊपर हमारे इस कमरे में भी आई थी। तुम तीनों के ही पलंग खाली देखकर उन्होंने मुझसे ही सवाल किया… और वह भी तेरा नाम लेकर पूछा था कि पारोमिता कहां गई?”

“फिर तूने क्या कहा?”

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“कुछ नहीं, बस मैंने कह दिया कि गौशाला में एक गौमाता जरा अस्वस्थ हैं । उनके पैर में थोड़ी चोट लग गई है उन्हें ही तेल हल्दी लगाने गई होगी। कभी उसे  डॉक्टर बनने का भूत सवार था न!”

“हमें बचा लिया तूने।”

“अब मुझे भी बचाओ! मेरा भी उद्धार करो! और मुझे भी बताओ कि यह क्या चल रहा है तुम तीनों के बीच।”

“कल सुबह तुझे सब कुछ पता चल जाएगा बहन…. बस तब तक थोड़ा सा धैर्य रख ले। “

“चल ठीक है तेरी बात मान कर मैं धैर्य ही रख लेती हूं पर और क्या-क्या रखने के लिए देगी मुझे? “

  उन चारों की बातों के बीच में कब शाम ढल गई उन्हें पता ही नहीं चला!  शाम की आरती भजन पूजन के बाद भोजन भी निपट गया।
  

      रात्रि भोजन के समय भी चारु ने जब प्रबोधनंद से खाने के लिए पूछा तो उन्होंने उस वक्त भूख नहीं होने की बात कह दी। और कहा कि वह बाद में भोजन करेंगे, पहले वह आश्रम के बाकी लोगों का भोजन निपटा लें।
   सब कुछ हो जाने के बाद चारु लता ने पारो को बुलाया और उसके हाथ में स्वामी जी की भोजन की थाली पकड़ा दी। उस थाली पर ऊपर से एक रेशमी कपड़ा भी ढक दिया… पारो उस थाली को लेकर स्वामी जी के कमरे की तरफ बढ़ चली..

   आश्रम के नियम भी अनोखे हैं! हम सभी के लिए लौकी तोरी टिंड़े कद्दू के अलावा कुछ नहीं बनता, क्योंकि अगर हम तामसिक भोजन खाएंगे तो हमारे मन में तामसिक विचार आएंगे… तो यह प्रबोधानन्द ढोंगी के लिए इतने छप्पन भोग बनाने की क्या जरूरत है ? सबसे ज्यादा तो इसे ही अपने मन को बांध कर रखने की जरूरत है।

  मन ही मन विचार करती पारो आश्रम वाटिका के बीचो बीच अकेले बने प्रबोधानंद के कक्ष के सामने खड़ी थी!  चारु लता वहां तक साथ आई थी उसके बाद उसने पारो से सवाल किया…-” मैं भी अंदर चलूं या तुम..

उनकी बात आधे में ही काट पारो ने हड़बड़ा कर तुरंत ही कह दिया…-” नहीं मैं संभाल लूंगी!! आप जाइए! आप भी दिनभर आश्रम में व्यस्त थी… आप भी थक गई होंगी , चारु दीदी!!”

  पारो के मुंह से इतनी समझदारी वाली बातें सुन चारु को थोड़ा अजीब सा लगा लेकिन उसे लगा कि हो सकता है प्रबोधानंद के व्यक्तित्व का जादू शायद इस लड़की पर भी चल गया हो… थकान के कारण बहुत ज्यादा सोचने का उनका कुछ मन भी नहीं था।  वह मुंह फेर कर भगिनी आश्रम में बने अपने कमरे की तरफ आगे बढ़ गई।
      उनके वहां से जाते हैं पारो ने चैन की सांस ली, और दरवाज़े की ओर बढ़ गयी।  क्योंकि उसे पता था दरवाजे के भीतर शयन कक्ष के पहले बने गलियारे में उसके साथी उसका इंतजार कर रहे थे……

क्रमशः

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aparna….

दिल से……

    
     वैसे तो आप सभी जानते हैं कि फिल्मी गानों का और मेरी कहानियों का रिश्ता पुराना है… गाने बस मधुर होने चाहिए , चाहे वह मेरी पैदाइश के पहले के भी क्यों ना हो। पर अगर गाना सुंदर है मधुर है तो मुझे पसंद जरूर आता है। ऐसे ही कुछ भजन भी बहुत अच्छे लगते हैं। मैंने हमेशा अपनी कहानियों में कहीं ना कहीं जगह बनाकर फिल्मी गाने घुसाए हैं, हालांकि साहित्य की दृष्टि से एक अच्छे साहित्य उपन्यास में फिल्मी गाने नहीं होने चाहिए।

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     मुझे एक बार हमारी प्रतिलिपि के ही सुविख्यात साहित्यकार स्वर्गीय श्री कुसुमाकर सर ने गाने लिखने पर टोका भी था…. उन्होंने कहा था कि गाने उपन्यास की सुंदरता को समाप्त कर देते हैं!
      और उसके बाद से मैंने फिल्मी गाने कहानियों में डालना बंद कर दिया। शायद आप लोगों ने भी नोटिस किया होगा कि जीवनसाथी में कुछ भागों में फिल्मी गाने थे लेकिन बाद के भागों में मैंने गाने डालने बंद कर दिए।
    खैर मैं गाने डालती भी थी तो सिर्फ 2 पंक्तियां लिखती थी जिससे शब्द सीमा भी कम रहें, और जरूरत के मुताबिक मैं जो भाव फिल्मी गानों से प्रस्तुत करना चाहती हूं वह भी पाठकों तक पहुंच जाए। वैसे ही आज इस भजन को कहानी के इस भाग में लिखा है।
   शुरू में इस भजन की सिर्फ दो पंक्तियां ही लिखी थी लेकिन सच कहूं तो यह भजन मुझे इतना पसंद है , कि मैं अपने आप को रोक नहीं पाई और तीन अंतरे लिख दिए।

     कभी फुर्सत में हों तो इस भजन को गूगल करके सुनिएगा जरूर…. बहुत मीठा भजन है।

  जय श्री राधे राधे….

  पढ़ते रहिए ….. आप लोगों का मुझे यूं पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता है…

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aparna….

समिधा -42

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  समिधा -42

      प्रबोधानन्द को अपने तयशुदा कार्यक्रम के हिसाब से हरिद्वार निकलना था, लेकिन अब उनका मन वहाँ से जाने का ही नही हो रहा था। अमृतानन्द स्वामी के पास से प्रबोधानन्द को बुलाने के लिए बार बार संदेश आ रहे थे लेकिन उसने आखिरकार अपनी बीमारी का बोल कर आने में असमर्थता जता ही दी।

   प्रबोधानन्द फिलहाल यहीं रुकने वाले हैं ये जानने के बाद वरुण तनाव में आ गया था। उसे लगा था एक आध दिन रुक कर प्रबोधानन्द निकल गया तो चिंता ही खत्म, लेकिन अब वो यहाँ रुकने वाला है ये सोचने वाली बात हो गयी थी….

प्रबोधानन्द के दिमाग से पारो के थप्पड़ वाली बात नहीं निकल पा रही थी। और इसीलिए अब उसके मन में पारो को पाने की इच्छा बदले की भावना के साथ मिलकर अधिक प्रबल हो गई थी….
     पारो का थप्पड़ रह रह कर उसे अपमान की आग में झुलसाता जा रहा था और इसी लिए अब उसके दिमाग में हर वक्त पारो से बदला लेने का जुनून , उसका अपमान करने की इच्छा बलवती होती जा रही थी और इसलिए उसने चारु से भी साफ शब्दों में कह दिया था कि वो भी अब कुछ दिन आश्रम में ही रुक जाए।
“चारु आज तो किसी भी कीमत पर वह लड़की हमारे कमरे में होनी चाहिए। समझ रही हो ना?”
   
” हमने तो हमेशा ही आपकी आज्ञा पर उसे आपके पास भेजा है, आप ही का स्वास्थ्य साथ नही देता तो क्या किया जाए। वैसे अभी आपका स्वास्थ्य कैसा है?”

   चारु को मन ही मन प्रबोधानन्द पर गुस्सा आने लगा था। उसे स्वामी जी का किसी के लिए ऐसा पागलपन नही सुहा रहा था। उसके अनुसार प्रबोधानन्द को अपने कार्य पर अधिक ध्यान देना चाहिए ये सब तो बाद कि बातें हैं लेकिन प्रबोधानन्द इन्ही सब व्यसनों में अधिक लिप्त होते जा रहे थे। लिप्त तो वो खुद भी थी, लेकिन हर काम समयानुसार किया करती थी।
    उसे हर काम के लिए एक वक्त और हर वक्त पर वो काम करना पसंद था, और अब प्रबोधानन्द का पागलपन उसका जी का जंजाल बनता जा रहा था।
प्रबोधानन्द की फरमाइशें भी सीमाएं लांघती जा रही थी।
   उन्हें अब हर वक्त पारो अपने सामने चाहिए थी। आश्रम में ऐसे खुल्लमखुल्ला उनकी इक्छाओ की पूर्ति करना मुश्किल था। फिर भी प्रबोधानन्द को नाराज़ करना चारु के बस के बाहर की बात थी और इसलिए वो मजबूरी में उनका हुकुम बजाए जा रही थी…

  ” यही हाल रहा तो किसी दिन ये स्वामी जी भगिनी आश्रम की औरतों से जूते खाते यहाँ से निकाला जाएगा। अरे थोड़ा तो संयम रखो, उस लड़की को देख कर एकदम ही पगला गया है।” मन ही मन सोचती चारु उनके कमरे की ओर बढ़ चली….. सुबह प्रबोधानन्द के बुलाने पर वो जब उनके कमरे में गयी तब फिर एक बार वो शुरू हो गए थे।
” सुनो चारु! आज के हमारे हवन में वो हमारे साथ ही बैठेगी! और बल्कि आज के बाद हमारे हर कार्य में उसे ही हमारे सहयोग के लिए ठीक कर दो। और किसी की अब हमें आवश्यकता नही है। समझ गयीं!” 
    चारु ने मन ही मन अपना माथा पीट लिया। वो कैसे इस ठरकी बाबा को समझाए की ऐसे करने से सारे आश्रम में बातें फैलने लगेंगी लेकिन प्रबोधानन्द भी अपने ही गर्व में चूर था। उसके अनुसार इस आश्रम में उसे रोक टोक सके ऐसा कोई न था।

” जी गुरुवर! हम जा रहे आपकी तैयारियां करने, तब तक आप भी स्नान ध्यान निपटा लीजिये।”
  
   वो उन्हें प्रणाम कर बाहर निकल गयी… पैर पटकती भुनभुनाती वो रसोई की तरफ बढ़ी जा रही थी कि सामने से आता वरुण दिख गया…-“ये एक और ज्ञानी मिल गया। एक वो है जो अपनी ऊटपटांग फरमाइशों से आश्रम में जीने नही दे रहा और एक ये है कृष्ण लीला सुना सुना कर मरने भी नही दे रहा। क्या करें हम ? “

” क्या हुआ चारुलता जी! आप कुछ परेशान लग रही हैं।”
   वरुण के सवाल पर वो धीमे से मुस्कुरा कर भर रह गयी। वरुण का जवाब देने के लिए उसके पास कुछ होता तब तो कहती….
   उसी समय भगिनी आश्रम से निकलती महिलाएं रसोई की ओर बढ़ रही थी, उसने उनमें से ढूंढ कर पारो को आवाज़ लगा दी..
“ओ लड़की इधर आना। ” पारो ने सुनने के बाद भी उधर का रुख नही किया, धीमे से सरिता ने उसके कान में फुसफुसा कर कहा भी ..-“पारो तुझे ही पुकार रहीं हैं। जा सुन ले।”
” मैं ओ लड़की नही हूँ सरु ! जब तक मेरा नाम नही लेंगी मैं नही सुनूँगी।”
   
“अरे ओ सुन क्यों नही रही… क्या नाम है तुम्हारा?”
  चारु को पारो का नाम अच्छे से याद था पर अपने स्वभाव के कड़वेपन के कारण उसे हर किसी को जलील करने में ही सुख मिलता था… और इसलिए वो उसे ऐसे बुला रही थी पर उसे भी नही पता था कि उसका पाला किससे पड़ा था। पारो बिना सुने रसोई की तरफ मुड़ गयी, सरिता बार बार डर के मारे उसे कोहनी मारती रही…. लेकिन पारो ने एक बार भी मुड़ कर चारु की तरफ नही देखा, आखिर थक कर चारु ने उसका नाम पुकार लिया…-” अरे ओ पारोमिता तुम्हे ही बुला रहें हैं । ज़रा यहाँ आना!”

  अब पारो के कदम ठिठक कर रुक गए और वो मुड़ कर चारु तक चली आयी..-“पहले हमारी आवाज़ सुनाई नही दी थी क्या?”

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“आवाज़ तो सुनाई दे रही थी पर समझ नही आया था कि आप मुझे बुला रहीं है।”

  पारो ने हाथो से ही चारु और वरुण को प्रणाम किया। वरुण तो उसे ही देख रहा था, पारो का जवाब सुन उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान खिल उठी।

” अभी प्रबोधानन्द स्वामी हवन करेंगे और उसके बाद उनका उद्गार होगा। इन दोनों मौकों पर तुम्हें उनके साथ ही बने रहना है। स्वामी जी का आदेश है!”

“क्षमा करें चारु दीदी। पर आज मैं हवन में नही बैठ पाऊँगी!”

“लेकिन क्यों?”

    पारो ने एक नज़र वरुण पर डाली और वापस चारु की ओर मुड़ गयी…” अभी तीन दिन मैं मंदिर नही जा सकती, अशुद्ध हूँ।  आप समझ रहीं हैं ना!”

” ओह्ह अच्छा! फिर ऐसा करना जब वो हवन निपटा कर अपने कक्ष में जाएं तब उनका जलपान लेकर उनके कमरे में पहुंचा देना।”

  बिना कोई जवाब दिए पारो नीचे देखती खड़ी रही और चारु अपनी चप्पल फटकाती वहाँ से निकल गयी।

   वरुण ने पारो की ओर देखा, पारो ने आंखें उठाई और उसकी आंखें मुस्कुराने लगी।
“आपके व्याख्यान के लिए सारी तैयारी कर दी है। आपकी पुस्तिका आपकी कलम और हल्का गुनगुना पानी, सब कुछ आपके आसन के पास रख आयीं हूँ। पानी अभी कुछ ज्यादा गर्म है पर जब तक आपके बोलने का समय होगा तब तक सही तापमान में रहेगा,आपके पीने लायक हो जाएगा।”
    वरुण की आंखों में प्रश्नचिन्ह था कि अभी अभी हवन में न बैठ पाने का कारण उसकी प्रवचन सामग्री की तैयारियों में बाधक क्यों नही बना?

  वरुण की आंखों का सवाल पारो समझ गयी….. पारो ने एक पल को पलकें झपकी और वापस वरुण को देख मुस्कुरा उठी…-“चारु दीदी से झूठ कहा मैंने। मुझे उस पाखण्डिनंद के साथ किसी हवन में नही बैठना, और इसके लिए चाहे मुझे झूठ बोलना पड़े या और कोई उपाय करना पड़े पर मुझे ये गलत नही लगता। हो सकता है आपकी नज़र में मैं गलत हों लेकिन मुझे उस आदमी के सामने भी जाने से घिन आ रही है।”

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  वरुण के चेहरे पर भी एक अलग सी मुस्कान रेंग गयी…-“ठीक है, ठीक है। अभी शांत हो जाओ। अधिक उत्तेजना में ज़ोर से न कह जाना अपनी बात। वैसे तुम्हारी बात सत्य है कृष्ण भी तो यही कहतें हैं… की परपीड़क को मारने के लिए जो झूठ छल प्रयोग किया जाता है वो पाप नही पुण्य है। तुम्हारे इस झूठ का कोई दोष तुम पर नही आएगा पारो।”

” मैं पाप पुण्य नही मानती। मरने के बाद कहाँ जाऊंगी क्या करूँगी किसे पता है। मरने के बाद मेरे अच्छे कर्मों का लेखा जोखा जिसे आप पाप पुण्य में बांधते है मुझे मिलेगा भी की नही मैं क्या जानूं?
   मेरे हृदय को जो सत्य और सही लगता है वही मेरे लिए पुण्य है और जो गलत लगता है वो पाप। उस पाखंडी से छुटकारा पाने अगर मुझे उसे मारना भी पड़ गया तो ये मेरे लिए पुण्य ही होगा।”

“हम्म सही कह रही हो। अभी उनका हवन चलेगा और उस समय से मेरा आख्यान होने में लगभग बीस मिनट का समय रहेगा। तुम ऐसा करो पीछे सरोवर के पास सुनीता और एक आध वो लड़कियां जो प्रबोधानन्द का शिकार बन चुकी हैं को लेकर आओ। तुरंत!!
   मैं प्रशांत को लेकर वहीं पहुंच रहा हूँ।”

“क्या करने वाले हैं आप?”

“अभी अभी तुमने ही तो उपाय बताया है। बस वही करना है।”

” मैंने क्या उपाय बताया?”पारो आश्चर्य से वरुण को देखने लगी..

“सरोवर तक सबको लेकर तो आओ। फिर सभी के सामने बताता हूँ कि हमें आगे क्या करना है।इस प्रबोधानन्द को तो इसी के जाल में फांसना होगा वरना
इसके अत्याचारों पर कोई विराम नही लगेगा। और उसे हमें रँगे हाथों पकड़ना है। इसलिए सुनीता जैसी और भी कोई उसकी सताई औरतें हो तो उन्हें भी ले आना लेकिन सुनो पारो ज्यादा औरतों को इस बारे में मालूम न हो तो अच्छा है। मुझे लगता है आश्रम में कुछ चारुलता की औरतें भी तुम सब के बीच घुली मिली हैं जिससे आश्रम की हर खबर उस तक पहुंचती रहे। इसलिए ज़रा होशियार रहना। “

   हॉं में सिर हिला कर पारो वहाँ से रसोई की ओर मुड़ गयी।
     हवन शुरू हो चुका था इसलिए उन लोगों के पास ज्यादा वक्त नही बचा था।
   पारो ने जाकर सुनीता से बात की और सुनीता तुरंत अपने साथ कि एक और लड़की कावेरी को ले आयी।कावेरी उन लोगों से उम्र में कुछ ज्यादा बड़ी थी लेकिन उम्र बढ़ जाने पर भी उसकी सुंदरता म्लान नही हुई थी।
     पारो ने पिछली रात ही सुनीता को ये बात बता दी थी कि उसने वरुण से उसकी समस्या का ज़िक्र किया है और वो उन सभी को इस दलदल से निकालने के लिए प्रयासरत है।

   ****

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  मंदिर में पूजा अर्चना के बाद हवन प्रारम्भ हो चुका था। प्रबोधानन्द ने हवन में पारो को न देख चारुलता से उसके बारे में पूछने के लिए चारुलता को ढूंढना शुरू किया। लेकिन उनकी सवालिया नज़रों से बचने के लिए चारुलता खुद हवन में उपस्थित ही नही हुई।
    गुस्से में खीझते प्रबोधानन्द हवन करते रहे। उन्हें उम्मीद थी कि हवन के बाद कमरे में शायद चारु पारो को भेज दे।
         

    वो अपनी हवन वेदी में अकेले ही बैठे थे। उनका स्थान भी सामान्य लोगों से ज़रा ऊंचाई पर बना था। बाकी सभी आचार्य अपनी अपनी वेदियों में आंखें बंद किये बैठे ध्यानमग्न मंत्रोच्चार कर रहे थे…
    उसी समय प्रशांत सरोवर के पास से तेज़ कदमो से मंडप की ओर चला आया।
   उसे पता था मंडप में बैठे दस के दस आचार्य इस वक्त आंखें बंद किये बैठे होंगे। वो चुपके से प्रबोधानन्द के पीछे चला आया। उसने अपने हाथ में कुछ छिपा रखा था , उसे जला कर उसने धीमे से प्रबोधानन्द के पीछे से सामने की ओर सरका दिया और खुद उनके सामने तरफ आकर उनके घृत पात्र को भरने लगा। प्रबोधानन्द ने हलचल की आवाज़ सुन ऑंखे खोल दी। प्रशांत ने उनके सामने ही उनके घृत पात्र को भरा और पास ही रखी हवन सामग्री में घी डालने लगा कि प्रबोधानन्द की नज़र हवन कुंड के दूसरी तरफ बैठी कावेरी पर चली गयी। बाल खोले, आंखों में प्रगाढ़ अंजन लगाए कावेरी उस समय ऐसी लग रही थी जैसे कितना रो कर आई है। उन्होंने उसे देखा और प्रशांत की तरफ देखने लगे,पर प्रशांत चुपचाप अपना काम करने में लगा था।
   उन्हें एकाएक अपनी आंखों पर विश्वास नही हुआ और उन्होंने वहीं हाथ पोंछने के लिए रखे मलमल से अपनी आंखें साफ की और फिर सामने देखा लेकिन अब वहां कोई नही था, न कावेरी और न प्रशांत!!

   वो एक बार फिर ध्यान लगाने की कोशिश करते हवन में समिधा को सही ढंग से संजोते उस पर घी की धार बहाने लगे….

क्रमशः

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aparna…..
   

समिधा-40

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  समिधा -40

        ऑफ़िस से वापस आश्रम लौटते तक प्रबोधानन्द बिल्कुल ठीक थे.. आह्लादित थे प्रसन्न और प्रफुल्लित थे।
   लेकिन आश्रम के मुख्य द्वार से भीतर प्रवेश करते ही उन्हें वापस तबियत खराब सी लगने लगी। ऐसा लगा जैसे एक बार फिर ज्वर की अवस्था होने वाली है।
” हमें तबियत कुछ ठीक नही लग रही चारुलता!”
“अगर आप कहें तो मैं यहीं रुक जाऊँ आपकी सेवा के लिए।”
” नही !!तुम्हें रुकने की ऐसी कोई आवश्यकता नही है। ये दोनों हैं ना। तुम आश्रम का अपना काम निपटा कर वापस लौट सकती हो।”
चारुलता ने एक नज़र पास में बैठी पारो पर डाली और धीमे से फुसफुसा उठी…-” सुन लिया, स्वामी जी चाहतें हैं तुम ही उनकी देखभाल करो। तो सम्भाल लेना, समझीं।”
   अभी कुछ देर पहले ही पारो को चारुलता में देवी के दर्शन हुए थे, और इसलिए अभी भी उसे ये बात बुरी तो लगी पर उसमें अपने मन को मना लिया।
   
   परिसर में प्रवेश के साथ ही प्रबोधानन्द कि तबियत ऐसी बिगड़ी की गाड़ी से उतर कर अपने कमरे तक जाना भी दुभर हो उठा….
     एकबारगी उसने सोचा भी था कि कुछ देर कृष्ण मंडप में बैठना है लेकिन अपनी हालत देखते हुए समझ आ गया कि ये असम्भव होगा। वो चुपचाप धीमे कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ गए…
    जाते जाते उसने चारु को इशारा कर दिया..

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चारु ने भगिनी आश्रम की रसोई में जाकर एलान कर दिया कि अबसे प्रबोधानन्द स्वामी की सेवा में पारो ही जाएगी। पारो के हाथों में फलों मेवों की तश्तरी के साथ उसे दूध भी पकड़ा दिया चारु ने, और उसे स्वामी जी के कमरे की ओर भेज दिया….
       
      वरुण के प्रवचन का समय हो चुका था और इसलिए वो मंडप की ओर बढ़ गया। पारो ने वरुण की तरफ देखा कि शायद वो एक बार मुड़ कर देख ले लेकिन बिना उसकी तरफ एक बार भी देखे वरुण अपनी लय में आगे बढ़ता चला गया।
    वो सीढियां चढतें हुए जानता था कि पीछे खड़ी पारो उसे ही देख रही है , वो खुद मुड़ कर एक बार उसे देख लेना चाहता था लेकिन अपने मन को समझा कर कड़ा कर उसने खुद को रोक ही लिया।
   सीढियां चढ़ कर उसके ओझल होते ही पारो वापस आगे बढ़ गयी।

    प्रबोधानन्द के कक्ष में प्रवेश के साथ ही उसे अजीब सी घुटन होने लगी। लेकिन चारु दीदी का आदेश था सो वो नही टाल सकी।

   वो कमरे में अंदर गयी तो देखा प्रबोधानन्द अपने तोषक पर अधलेटे से अपने फ़ोन में कुछ देख रहे थे। पारो ने उनके सामने जाकर फलों की टोकरी रख दी।  वो वहाँ सामान रख कर उठ ही रही थी कि प्रबोधानन्द ने उसकी कलाई थाम ली।
      पारो की दाईं कलाई प्रबोधानन्द की चौड़ी हथेली में कसमसा उठी…-” हमसे इतना डरने की क्या आवश्यकता है? हमारे आसपास भी नही टिकती तुम? अरे हम कोई बहुत उम्रदराज नहीं हैं… अभी सिर्फ उनतीस के….”
   प्रबोधानन्द की बात पूरी होने से पहले ही पारो के उलटे हाथ का एक जोरदार करारा थप्पड़ प्रबोधानन्द के चेहरे पर था।
   वो आश्चर्य से कलबला कर रह गए। पारो का हाथ छोड़ वो अपना गाल सहलाने लगे।
   ” अगर आप बाहर किसी से भी इस थप्पड़ की चर्चा नही करेंगे तो मैं भी किसी से कुछ नही कहूंगी। न आपकी गंदी नज़र के बारे में और न ही आपकी इस हरकत के बारे में।
   लेकिन अगर आपने शुरुवात की तो मैं भी सब कुछ सबके सामने बोल जाऊंगी। फिर भले ही मुझे ये आश्रम छोड़ कर जाना ही क्यों न पड़ जाए पर आपका कच्चा चिट्ठा अमृतानन्द स्वामी तक पहुंचा ही जाऊंगी। समझे आप?”
  ” व्यापार कर रही हो ,वो भी हमसे?”
   ” व्यापारियों के साथ ही तो व्यापार किया जाता है। मुझे उन कमज़ोर लड़कियों के जैसा मत समझ लीजियेगा जो आप जैसों की ज़्यादती सह कर भी चुप रह जातीं है सिर्फ इस डर से की अगर कुछ कह दिया तो ये आसरा भी छिन जाएगा।
   मुझे इस बात का कोई भय नही है। जैसे ये आसरा मिला कहीं और भी मिल जाएगा।”
” धमकी दे रही हो हमें। तुम जानती भी हो किस से बात कर रही हो।”
” मैं धमकियां नही दिया करती आप चाहें तो आज़मा कर देख लीजिए, अगर आप में हिम्मत है तो बुला लीजिये सारे आश्रम को।
    और मैं किस से बात कर रही ये मुझे अच्छे से मालूम है। एक नम्बर का झूठा लंपट दुर्व्यसनी है ये आदमी जो छद्म रूप धर आश्रम में घुस आया है और यहाँ की पवित्रता भंग करने के प्रयास में है। अभी तो सिर्फ एक थप्पड़ मारा है अगर दुबारा मुझे छूने या देखने का भी प्रयास किया तो डंडे से मार मार कर प्राण ले लुंगी। “
     प्रबोधानन्द के पास शब्द नही बचे थे। अपमान से उनके कानों की लोरियां जलने लगी थीं और चेहरा काला पड़ गया था…
   दूसरी तरफ मुहँ फेर कर उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं और पारो तेज़ कदमों से वहाँ से बाहर निकल गयी।
    आश्रम के पीछे बने सरोवर तक तेज़ तेज़ कदमों से पहुंच वो भरभरा कर ढह गई। सीढ़ियों पर बैठी वो फफक कर रो पड़ी….
    उसकी समझ से बाहर था आखिर उसकी किस्मत में लिखा क्या था? यहाँ जिस आस उम्मीद से आई थी अगर वो ही नही पूरी हो पा रही थी तो आखिर उसके यहाँ भी रहने का क्या औचित्य था।
    हालांकि प्रबोधानन्द से पहले आश्रम के किसी पुरुष ने कोई गलत बात उससे नही की थी लेकिन ये प्रबोधानन्द सुधर ही नही पा रहा था।

   पर उसकी उलझन का कारण दूसरा भी था। गुस्सा तो उसे प्रबोधानन्द पर ही था लेकिन वरुण की बेपरवाही भी कहीं न कहीं उसके गुस्से का कारण थी।
   उसे समझ नही आ रहा था कि कल तक हर बात पर उसका साथ देने वाला वरुण आज अचानक उस सरोवर के बाद से उसकी तरफ देख तक नही रहा आखिर क्यों?
     वो तो सुनीता की समस्या वरुण से बताने की सोच रही थी लेकिन अगर वरुण का यही रवैय्या रहा तो कैसे उसे बता पाएगी?

” क्या हुआ आप यहाँ अकेली बैठी हैं? कोई परेशानी?”

   पारो ने चौन्क कर पीछे देखा, वहाँ वरुण का दोस्त प्रशांत खड़ा था..-” नही कुछ नही। बस ऐसे ही।”
  प्रशांत भी कुछ सीढियां छोड़ कर वहीं बैठ गया…

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” मेरी कोई बात सुनता ही नही। बेहद ज़िद्दी है। जो ठान लिया वही करेगा फिर चाहे उसका कुछ भी परिणाम हो?”
   पारो आश्चर्य से प्रशांत की ओर देखने लगी…
” मैं समझी नही। आप किसकी बात कर रहे है?”
” उसी पागल से लड़के की जो सारी दुनिया भूल जाता है अपने कर्तव्यपालन के लिए और किसी से कुछ कहता तक नही।”
पारो को समझ में तो आने लगा था कि प्रशांत वरुण के लिए कह रहा है लेकिन ऐसे वो कैसे उसका नाम ले लेती इसलिए पूछ बैठी…

” वरुण के बारे में बात कर रहा हूँ। आप जानती हैं उसे कितनी बड़ी समस्या है?”

  पारो ने न में सिर हिलाते हुए मना कर दिया…-” क्या समस्या है उन्हें?”

“उसके हृदय में छेद है और साथ ही उसके हृदय के किनारों में ठीक से खून नही पहुंच पाता है , डॉक्टरों के शब्दों में कहुँ तो ब्लॉकेज है। “.

” डरने वाली बात है क्या?”

” बिल्कुल डरने वाली बात ही है। उसकी समस्या का समाधान सिर्फ सर्जरी है, और वो अब कुछ करवाना ही नही चाहता। कहता है जितना जीवन बचा है अब उसे कृष्ण समर्पित करना है।”
“हाँ तो कृष्ण समर्पित करने का ये मतलब तो नही है ना कि अपने जीवन को ही दांव पर लगा दिया जाए। अपनी ज़िंदगी के लिए प्रयास करना गलत थोड़े न है। भगवान दवा लेने से मना तो नही करते ये तो आपकी बुद्धिमत्ता कहीं से नही हुई।”

” मैं तो समझा समझा कर हार गया, लेकिन किसी को तो उसे समझाना होगा, दवाएं बिल्कुल ऐसे छोड़ देना भी सहीं नही है ना। अभी कल रात ही उसे हल्का सा चक्कर आ गया था। अपनी क्षमता से अधिक काम करता है और किसी से अपनी तकलीफ कहता नही ऐसे कैसे काम चलेगा। “

“हम्म ! लेकिन आप मुझसे ये सब क्यों बता रहे?”

  प्रशांत के पास इस बात का कोई जवाब नही था। वो क्या बताता की वो कई बार वरुण को पारो के ताकते देख चुका है , वो जानता है कि मन ही मन पारो के लिए वरुण के मन की कोमल भावनाएं क्या हैं ? और इसलिए वो खुद भी यही चाहता है कि वरुण की भावनाएं पारो भी जान ले। लेकिन ये सब कहने की उसकी हिम्मत नही थी तो उसे जो सही लगा उसने कह दिया।

   आरती के घंटो शंख की आवाज़ आते ही पारो और प्रशांत वहाँ से उठ कर कृष्णमंडप की ओर बढ़ गए।
  आरती के बाद वरुण सबको आरती देता उन दोनों तक भी चला आया।
   पारो के चेहरे के ठीक सामने आग की लपटें उसके चेहरे को उजाले से भरती जा रही थीं।
   वरुण एकटक उसे देखता खड़ा रह गया…-” यहाँ का काम निपटा लीजिये फिर आज हमें प्रबोधानन्द स्वामी की सेवा में ही रहना है।”
  पारो की बात पर किसी अच्छे बच्चे की तरह वरुण ने हॉं में सिर हिलाया और आरती रख कर बाहर चला आया।

*****

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      पारो के बाहर जाते ही प्रबोधानन्द अपमान की आग में तिलमिला कर रह गया था। लेकिन वो ये भी समझ गया था कि ये पारो की शिकायत करने का उचित समय नही था। अब तो बदले की भावना उसके अंदर दावानल की भान्ती जल रही थी। और उसके भीतर की ये अग्नि उसे सिर्फ शारीरिक ही नही मानसिक रूप से भी संतप्त करने लगी थी।
  बहुत अकड़ है तुझमें छोकरी। मैं भी तुझे दिख दूंगा की प्रबोधानन्द आखिर है क्या बला। तुझे अपने कदमो पर गिरा कर तेरी सारी अकड़ न निकाल दी तो प्रबोधानन्द मेरा नाम नही।
  अभी शारीरिक रूप से अस्वस्थ था तो मुझे थप्पड़ धर गयीं न। ये थप्पड़ तुझे बहुत भारी पड़ेगा। इस थप्पड़ का मूल्य जीवन भर चुकाने पर भी नही चुका पाएगी। समझती क्या है खुद को हैं….
   अभी बिंदल से बात करता हूँ और तेरी सारी हेकड़ी निकलवाता हूँ।
  प्रबोधानन्द किसी को फ़ोन लगाने जा ही रह था कि चारु कमरे में चली आयी…-“अरे आपने तो कुछ भी नही लिया? ऐसे तो कमज़ोरी आ जायेगी स्वामी।जी।”
“चारु वो लड़कीं कहाँ गयी? वो आज रात भर हमारे कक्ष में ही रहेगी? हमें जिस वस्तु की आवश्यकता होगी वही प्रस्तुत करेगी। समझ गयीं तुम, वरना तुम्हारे सारे फंड जो आश्रम की तरफ से मिलते है कैंसिल ही समझो।”
   प्रबोधानन्द का आखिरी वार निशाने पर लगा,चारु तिलमिला कर रह गयी। उसे गुस्सा तो प्रबोधानन्द की अजीबोग़रीब फरमाइश पर आ रहा था पर उतरने वाले था पारो पर।
   अभी भी तो उसने पारो को यहाँ भेजा था पर वो यहाँ फल और दूध पटक कर जाने कहाँ गायब हो गयी थी।
  इतनी नाराज़गी के बावजूद अपने चेहरे को संयत किये मुस्कुरा कर चारुलता ने प्रबोधानन्द को प्रणाम किया और हंस कर उसकी बात मान ली…-” आप कहें तो जीवनपर्यंत उसे आपकी सेवा में लगा दूं । आप इतने नाराज़ क्यों लग रहे हैं स्वामी जी। कुछ भूल हो गयीं क्या हम सब से?”
    प्रबोधानन्द खुद तिलमिलाए बैठा था लेकिन पारो के थप्पड़ की बात वो ऐसे किसी को भी क्या बताता इसी से चुप लगा गया।
  ” बिंदल से बात हुई क्या तुम्हारी?”
  ” हाँ उनसे तो हमारी बात होती ही रहती है। उन्ही से तो ये सारा कारोबार है।”
   ” हम्म सब ठीक चल रहा है ना?”
   ” सब कुछ मज़े में चल रहा है स्वामी जी, आप ये कुछ भोग ग्रहण करें मैं तब तक मैं आपके भोजन के साथ उस लड़की को भी भेजती हूँ। अबकी ज़रा समझा सीखा कर भेजूंगी।”
  “नही उसकी आवश्यकता नही है। समझाना सिखाना हम खुद कर लेंगे। तुम बस भेज दो।”

   चारुलता ने प्रबोधानन्द को प्रणाम किया और बाहर निकल गयी। उस कक्ष से बाहर निकलते ही उसके तेवर बदल गए। जलती हुई आंखों से पारो को ढूंढती चारु को पारो तो नही मिली पर वरुण ज़रूर मिल गया…-” वरुणदेव सुनो, उस लड़की को कहीं देखा क्या ?”
” किसे ?”
” वही लड़की पारोमिता? प्रबोधानन्द स्वामी की तबियत फिर बिगड़ गयी है। उन्हें कक्ष में अकेले नही छोड़ा जा सकता उनके साथ किसी का होना ज़रूरी है। सो इसलिए हम लोगों ने सोचा कि पारो ही उनके कमरे में रुक जाए, रात मध्यरात कही उनकी तबियत बिगड़ी तो कम से कम हमें बाहर खबर तो दे पाएगी।”
” मैं रुक जाता हूँ उनके साथ!”
” नही!स्वामी जी का आदेश यही है वही रुकेगी तो अब वही रुकेगी। जाओ भेजो उसे”

  वरुण के चेहरे पर तनाव की रेखाएं खिंच गयीं। एक गहरी सांस भर वो चारु के सामने से हट कर पारो को ढूंढता आगे बढ़ गया कि तभी उसे दूसरी तरफ से पारो आती हुई नजर आ गई।
   वह अभी पारो से कुछ कह पाता कि उसके पहले ही चारुलता की आवाज उन दोनों के कानों में गूंज गई
” पारोमिता प्रबोधानन्द स्वामी की तबीयत आज भी सही नहीं है। और इसलिए आज रात तुम उनके कक्ष में उनकी सेवा में प्रस्तुत रहोगी। कहीं आधी रात उनकी कुछ तबीयत बिगड़ी तो हमें बताने के लिए उनके साथ किसी का होना बहुत जरूरी है।”
     चेहरे पर मैं ही क्यों वाले भाव लाते हुए भी पारो ने चारुलता दीदी से कुछ नहीं कहा। और चुपचाप सिर झुका कर हां कह दिया। उसकी इस तरह हां कहने पर वरुण को पारो पर ही जोर से गुस्सा आ गया। चारुलता दीदी अपनी बात कह कर वहां से भगिनी आश्रम की तरफ बढ़ गई। प्रशांत भी किसी काम से निकल गया अब वहां बस वरुण और पारो ही खड़े रह गया।
” मुंह में दही जमा रखा था क्या?  मना भी तो कर सकती थी?”
  वरुण को खुद समझ नहीं आया कि आज तक पारो से इतने सम्मान से बात करने वाला वह आज उसे किस अधिकार से इस तरह डांट बैठा ।
” स्वामी जी की तबीयत सही नहीं है , उनकी सेवा के लिए वहां किसी का रहना जरूरी है। ऐसे में मना करना अच्छा नहीं लगता।”
    मन ही मन पारो को वरुण का इस कदर उसकी चिंता में उसे डांटना अच्छा लग रहा था लेकिन वह भी वरुण के शाम के बर्ताव के कारण थोड़ी सी दुखी थी। और इसीलिए उसने ऐसा उल्टा जवाब दिया उसका जवाब सुनकर वरुण की भौहें तन गई।
” अच्छा तो यह बात है । पूरे आश्रम में एक तुम्हारे अलावा और कोई नहीं बचा उनकी सेवा के लिए।”
” उनकी सेवा के लिए तो बहुत से लोग हैं । लेकिन अगर मुझे ही चुना गया है, और मुझे मौका मिल रहा है तो इसमें आपको क्यों कष्ट हो रहा है?”
   पारो की इस बात ने वरुण की आंखें खोल दी उसे एकदम से आभास हुआ कि जैसे वह वरुण नहीं कोई और है। उसके अंदर से ऐसा लगा जैसे कोई और पारो के ऊपर इतना हक जताते हुए उससे बात कर रहा है।
    पारो सही ही तो कह रही थी आश्रम में भले ही बहुत से लोग हैं लेकिन अगर पारो को स्वामी जी की सेवा करने का मौका मिला तो उसे क्यों बुरा लग रहा था?  क्यों उसे बार-बार प्रबोधआनंद की दृष्टि में पारो के लिए गलत ही नजर आ रहा था ? ऐसा और तो किसी को नहीं नजर आ रहा, फिर अकेले उसे ही क्यों? क्या वह कुछ ज्यादा सोच ले रहा है… कहीं यह उसके मन में पारो के लिए  कोमल भावनाओं से पैदा हुई जलन तो नहीं है।
     अगर वह प्रबोधानंद को गलत समझ रहा है तो वह खुद भी कितना सही है?
   प्रबोधानंद अगर पारो को घूरता रहता है तो वह खुद भी तो दुनिया से छिपकर उसे देखने का कोई भी बहाना नहीं  छोड़ता? तो फिर उसमें और प्रबोधानंद में अंतर भी क्या हुआ ? उम्र का भी ऐसा कोई खास बहुत ज्यादा अंतर नहीं है..
    प्रबोधानंद अधिक से अधिक उससे दो या तीन साल ही बड़े होंगे।

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     वो अपने मन के भावों में इस कदर फंसता जा रहा था कि उसे खुद ही समझ नहीं आ रहा था कि उसके मन में पारो के लिए जागती कोमल भावनाएं सही है या गलत?
   अपने मन को कड़ा कर वह वहां से मुड़कर कृष्ण मंडप की तरफ बढ़ गया और पारो अकेली खड़ी रह गई।

   पारो को लगा था कि अगर वह कुछ कड़े जवाब देगी तो वरुण शायद नरम पड़ जाएगा । और एक बार फिर तालाब किनारे उसके साथ पत्थर फेंकने वाला वरुण बन जाएगा। लेकिन यहां तो पांसा ही उल्टा पड़ गया। उसकी कठोर वचनों को सुनकर वरुण ऐसा टूटा कि उसे अकेला छोड़ कर वहां से चला गया।
     पारो ने तो वरुण के सामने बस उसे चिढ़ाने के लिए ही अंदर जाने की बात मान ली थी, लेकिन अब उसकी स्थिति विकट थी। वह अपने ही शब्दों में बुरी तरह फंस चुकी थी। काश जिस समय वरुण, प्रशांत उसके साथ खड़े थे तभी वह चारुलता दीदी की बात मानने की जगह काट देती, तो वह दोनों लड़के मिलकर कोई ना कोई और उपाय निकाल लेते। लेकिन उसने खुद ने चारु की बात पर हामी भर दी और उसके बाद वरुण से इतनी सारी बहस करके उसे भी नाराज कर दिया। अब तो उसके पास कोई नहीं बचा था जो उसे बचा सके और पता नहीं अंदर वह प्रबोधानंद क्या सोच कर बैठा था।

     आश्रम में भोजन का समय हो चला था सभी आचार्य गुरुवरों के बाद भगिनी आश्रम की महिलाओं ने भी भोजन कर लिया। सबको खिलाने पिलाने के बाद अंतिम पारी में बैठी सरिता सुनीता पारो और उनकी हमउम्र सखियां एक दूसरे से बातें करते हुए खाना खा रही थी। लेकिन पारो का आज किसी काम में मन नहीं लग रहा था। उससे एक निवाला भी खाया नहीं गया। उसे रह-रहकर बस यही चिंता सता रही थी कि उसने क्यों प्रबोधानंद के कक्ष में जाने के लिए हामी भर दी।
    उन लोगों का खाना निपटते ही चारुलता एक बार फिर पारो के पास चली आई… उसे दूर से ही देख कर चारु ने गर्दन हिलाकर स्वामी जी के कमरे में जाने का उसे इशारा कर दिया! पारो चुपचाप मन मसोसकर अपने जगह से उठकर चारु की तरफ बढ़ने लगी की सुनीता ने उसका हाथ पकड़ लिया…-” अपना ध्यान रखना बहन। “
हां में सिर हिला कर पारो धीमे कदमों से आगे बढ़ गई।
   दिल में तो उसके ऐसी हलचल मची थी कि एक-एक कदम मनो भारी हुआ जा रहा था। लेकिन अपने आप को समझती अपने मन को समझाती धीमे-धीमे कदमों से प्रबोधानंद के कक्ष की ओर बढ़ चली। मन ही मन वो जाने कितने तरीके सोच रही थी कि अगर अब प्रबोधानंद ने उस पर हाथ डालने की कोशिश की तो वह क्या करेगी।  उसे याद था कि कुछ समय पहले जब वह फल रखने उनके कमरे में गयी थी तो वहां फलों के पास एक छोटा सा चाकू भी रखा था। उस चाकू को याद कर के उसके मन में थोड़ी सी तसल्ली के भाव जागे…..
      ज्यादा कुछ हुआ तो चाकू उठाकर प्रबोधनंद के आर पार कर देगी…. बस यही सोचकर वह वाटिका में मैं बने उस अकेले कक्ष के दरवाजे तक पहुंच गई ।वहां पहुंचने के बाद वो एक बार मुड़कर पलटी.. चारु दीदी सीढ़ियों से नीचे खड़ी थी। उन्होंने उसे अंदर जाने का इशारा किया और आगे बढ़ गई… तीन चार सीढ़ियों के ऊपर ही कक्ष का दरवाजा था, जो लगा हुआ था। उसने धीरे से दरवाजा खोला और अंदर प्रवेश किया। दरवाजे के साथ एक छोटा सा गलियारा लगा था, जिससे अंदर बढ़ने पर सोने का कमरा था।
    दरवाजे के अंदर घुसते ही उसकी नजर दीवार से लग कर खड़े वरुण पर पड़ गई।  और उसे देखते ही पारो के चेहरे पर सूरज सी रोशनी चमकने लगी। उसकी आंखें खुशी से उद्भासित हो गई… उसने आश्चर्य से वरुण की तरफ देखा वरुण ने तुरंत अपने होठों पर उंगली रख कर उसे चुप रहने का इशारा किया और पारो ने गर्दन हाँ हिलाकर एक भीनी सी मुस्कान वरुण को दी और मुड़कर दरवाजा बंद कर लिया…

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क्रमशः

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aparna ……
   
     
      

समिधा – 39

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  समिधा – 39

    वरुण के गाड़ी में बैठते ही प्रबोधानन्द का चेहरा उतर गया। उनकी नज़र में वैसे तो अब तक वरुण ने ऐसा कुछ नही किया था बावजूद वो वरुण को पसन्द नही कर पाते थे| जबकि वो लड़का उनके आगे पीछे घूमता उनकी सहायता को ततपर नज़र आता था।
  ” कहाँ घूमना चाहेंगे गुरुवर?”
  ” यहाँ के रास्ते मालूम भी हैं तुम्हें?”
   ” जी! शुरुवाती दिनों में तो मैं और प्रशांत पैदल ही पूरा मथुरा घूम आया करते थे। श्री कृष्ण जन्मस्थली तो जाने कितनी बार हम हो आये। प्रभु की जन्मस्थली देख कर मन ही नही भरता।”
“हम्म ! हमें तो द्वारिकाधीश मंदिर बहुत पसंद है। वहाँ भी चलेंगे।”
” जी! सबसे पहले आपको कंस किला लेकर चलता हूँ।”
” वहाँ ऐसा क्या है? हमें तो ज़रा पसन्द नही।”
“जी यही तो दिखता है कि कंस जैसा इतना बड़ा राजा जिसके पास न धन की कमी थी ना राज्य की बस अपने लोभ और लालच ने उसे कहीं का नही छोड़ा। आज उसका किला कैसा जीर्ण शीर्ण पड़ा है जो कभी आमोद प्रमोद का गढ़ हुआ करता था। ये सब हमें ये दिखाता है कि राजा हो या रंक समय सभी का बदलता ज़रूर है। और घमंड कभी किसी का नही टिकता। अगर हम अपने मन को शुद्ध साफ नही रख पाते हैं तो भगवान स्वयं हमारे मन की कालिख दूर करने का प्रयत्न करते हैं।”

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“बस बस… स्वामी जी ने तुम्हें प्रवचन की ज़िम्मेदारी क्या सौंपी तुम तो हर जगह शुरू हो जाते हो। ये सब जो बता रहे हो तुम क्या सोचते हो, हमें नही पता होगा।?”
“ऐसा तो असम्भव है गुरुवर! जो मैं जानता हूं वो तो समंदर की एक बूंद बराबर भी नही। आप तो स्वयं समंदर हैं।”
“अच्छा सुनो  वरुण देव! हमें ज़रा कुसुम ताल की तरफ चलना होगा। वहीं थोड़ा आगे बढ़ कर हमारा भी ऑफिस है। हम प्रबोधानन्द जी को वहाँ भी ले जाना चाहतें हैं।”
” जी, ज़रूर।”
     चारुलता की बात पर वरुण ने हामी भरी और गाड़ी पहले कुसुम ताल की ओर ही घुमा ली।
     गोवर्धन और राधा कुंड के बीच कुसुम सरोवर स्थित था। उधर से गुजरते हुए प्रबोधानन्द को उस सरोवर की सुंदरता ने ऐसा आकृष्ट किया कि उन्होंने वहीं गाड़ी रुकवा ली।
   वो चारों लोग सरोवर पर उतर गए। प्रबोधानन्द के पीछे ही चारुलता चल रही थी।  उनके पीछे वरुण था और वरुण के ठीक पीछे थी पारो। वो जानबूझ कर ऐसे चल रही थी कि उस पर प्रबोधानन्द की नज़र न पड़े…
   कुछ आगे बढ़ कर वो लोग वहीं सीढ़ियों पर बैठ गए।
    प्रबोधानन्द अपने बचपन से लेकर अपने स्वामी बनने के किस्से उन लोगो को सुना रहे थे। चारुलता तो बहुत खुशी से सब सुन रही थी पर न वरुण को ही उनकी बातों में कोई रस मिल रहा था और न ही पारो को।
      वो सीढ़ियों पर सबसे ऊपर और पीछे की तरफ बैठी थी। वो धीमे से उठ कर वहाँ से दूसरी तरफ निकल गयी। कुछ छोटे बकरी के बच्चे इधर से उधर कुलांचे भर रहे थे, वो उनके पास खड़ी उनकी उछल कूद देखने लगी।
    तभी उसका ध्यान एक मेमने पर गया जो सबसे अलग थलग एक तरफ खड़ा था। पारो ने देखा उसके पैर पर शायद चोट सी थी, हल्की लालिमा सी दिख रही थी, और शायद उसी चोट के कारण वो हिल डुल नही पा राह था।
   कि तभी उसे देव के साथ कि वो शाम याद आ गई। जब घर भर से झूठ बोलकर देव पारो को तांत्रिक बाबा के पास बंधवाने के नाम पर घुमाने लेकर जाया करता था। और एक शाम ऐसे ही बहाने बना कर निकले वो दोनो एक तालाब के किनारे बैठे सूरज को डूबते देख रहे थे… और साथ ही देख रहे थे पास में खेलते कुछ बकरी के बच्चों को..
    उनमें से एक बच्चा यूं ही किनारे चुपचाप पड़ा था तभी देव ने कहा जरूर इसके पैर में मोच आई होगी। बस इसी लिए यह पैर अपना सीधा नहीं रख पा रहा है।  देव  तुरंत अपनी जगह से उठा और उसने जाकर उस बच्चे को सीधा खड़ा किया…. उसके बाद उसके उस भाग में जिसमें मोच सी महसूस हो रही थी और लालिमा थी! उस हिस्से को सीधा करके उसने अपनी जेब से रुमाल निकाला और वहां पर बांध दिया। थोड़ी देर पैर पर मालिश जैसी करने के बाद मेमने का बच्चा उछलता कूदता अपने साथियों के साथ खेल में लग गया और पारो देव को देख कर मुस्कुरा उठी…
” अरे वाह आपने तो उसे बिल्कुल ठीक कर दिया।”
” जानती हो पारो हमारा शरीर खुद अपने आप में एक वैद्य होता है। जब भी हमारे शरीर में कोई भी समस्या या व्याधि पैदा होती है, तो हमारा शरीर सबसे पहले उस व्याधि से लड़ने के लिए तैयारी करने लगता है। और यह बात हम इंसानों से ज्यादा यह जानवर समझते हैं। हम तो हल्के से बुखार में भी डॉक्टर के पास दौड़े चले जाते हैं कि, बुखार कम करने की दवा दे दो। लेकिन यह नहीं समझते कि हमारे शरीर में आखिर ऐसा क्या हुआ जिसके कारण हमें बुखार आया ।
   जानती हो जब भी हमारे शरीर में कीटाणुओं जीवाणु विषाणुओं का आक्रमण होता है, तो हमारा शरीर अपना तापमान बढ़ा कर उन जीवाणुओं को हमारे अंदर प्रवेश करने से रोकता है, उनसे लड़ता और उन्हें मारने की कोशिश करता है, और तभी हमें बुखार आता है। लेकिन हम इस बात को समझे बिना दौड़कर डॉक्टर के पास चले जाते हैं। यह सारे निरीह बेजुबान जानवर हम से कहीं ज्यादा समझदार होते हैं…”
   पारो मुस्कुराकर देव की बात सुनती रहती थी उसे देव को सुनना बहुत पसंद था….

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   वह अपनी मीठी सी यादों में खोई उस मेमने को सहला रही थी कि तभी उसके कानों में ऐसा लगा जैसे देव की ही आवाज गूंजने लगी…-” कुछ नहीं हुआ है इस मेमने को बस हल्की सी मोच आई है। अभी ठीक हो जाएगा।”
  झट से पारो ने पलटकर देखा पीछे वरुण खड़ा था। वरुण ने अपनी जेब से रुमाल निकाला और मेमने के पैर को थोड़ा सीधा किया और उसकी मोच वाली जगह पर बांध दिया। कुछ देर मालिश करने के बाद उसने मेमने को खड़ा कर दिया। थोड़ी देर लड़खड़ाने के बाद वह मेमना उछलता कूदता अपने साथियों के पास भाग गया….

” देखा यह जानवर हम से कहीं ज्यादा समझदार होते हैं। हम तो अपने शरीर में होने वाली अधि व्याधियों को पहचान नहीं पाते, जबकि हमारा शरीर खुद उन व्याधियों से लड़ने के लिए तैयार रहता है ।लेकिन यह जानवर इस मामले में हम से कहीं ज्यादा समझदार होते हैं । वह मेमना अपने उस मोच  वाले पैर को अपने शरीर से दबाए बैठा था। एक सीध में उसने अपने पैर को रखा हुआ था,और वह इसी तरह बैठा रहता तो 2 से 3 घंटे में उसकी मोच अपने आप ठीक हो जाती। उसके पैर के उस हिस्से की मांसपेशियां शिथिल हो जाती और उसे आराम मिल जाता। इसीलिए उसे देखते ही मुझे समझ में आ गया कि उसके किस पैर में कहां पर मोच आई है।”

    पारो आश्चर्य से वरुण के चेहरे को देखती रह गई… उसे लगा यही सब तो पहले भी उसके साथ हो चुका है। बस उस समय वरुण नहीं देव था सामने। लेकिन क्या ऐसा संभव है कि दो अलग-अलग लोग बिल्कुल एक ही तरह की बातें और एक ही तरह की सोच के हों।
    
        उसे जाने क्यों उस वक्त वरुण के अंदर देव की झलक मिल रही थी।
   ऐसा लग रहा था सामने वरुण नहीं देव खड़ा है… आंखों की वैसी ही चमक। चेहरे पर वैसा ही तेज। और उसके पास से आने वाली वही भीनी भीनी सी खुशबू कुछ भी तो देव से अलग नहीं था…..
      
    पता नहीं कैसे लेकिन उसके मन में अचानक से ऐसे भाव आने लगी कि जैसे वह देव के साथ तालाब के किनारे सीढ़ियों पर बैठी रहती थी, वैसे ही काश वरुण के साथ बैठ सके। उसकी सीढ़ियों से दो तीन सीढियां ऊपर देव बैठा करता था और उसके घुटनों पर सिर टिकाए वह बैठी सामने तालाब को देखती उस पर पत्थरों से निशाने लगाया करती थी, और वह हमेशा उसके निशानों का मजाक उड़ाया करता था।
     दोनों के बीच पत्थरों के निशानों का खेल हुआ करता था…. दोनों शर्त लगाते थे कि किसका पत्थर कितनी बार कूदकर तालाब में गायब होगा।
    और वह हर बार देव से जीत जाया करती थी।

अपने में गुम पारो सरोवर को देख रही थी कि तभी उसके बाजू से होते हुए एक चपटा का पत्थर तालाब में एक के बाद एक पांच कुदाली लगाता हुआ दूर तक चला गया…
     वह चौक पर पलटी… वरुण हाथ में ढेर सारे पत्थर लिए खड़ा था। उसने पारो की तरफ वो पत्थर बढ़ा दिए…-” निशाना लगाओगी?”
   हॉं में सिर हिला कर उसने वरुण के हाथ से पत्थर लिया और निशाना लगा दिया। उसका पत्थर सिर्फ तीन कुदाली के बाद ही डूब गया ।
    और इस बात पर उसकी भौहें चढ़ गयीं…-” नहीं ऐसा नहीं हो सकता! अगर आपके पत्थर ने पांच कुदाली लगाई है तो मेरा पत्थर दस बार कूदेगा देख लीजिएगा।’
“हाथ कंगन को आरसी क्या?  दिखा दो!
     कि आखिर तुम्हारा पत्थर दस बार कैसे कूदता है?”

       उसके बाद तो एक दूसरे से लड़ते झगड़ते पारो और वरुण वहां पर निशाना लगाते रहे । ऐसा लग रहा था जैसे कोई दो किशोर बालक बालिका है जो आपस में खेल कर एक दूसरे को हरा देना चाहते हैं।
  शुरू के दो तीन बार के बाद पारो के पत्थर ज्यादा दूर तक होने लगे और वह खुशी के मारे किलकारी मारती तालियां बजाकर हंसने लगी। उसे इस कदर खुश देख वरुण के चेहरे पर जो भाव थे वह समझाने मुश्किल थे। वरुण अपलक दृष्टि से पारो को देख रहा था, जैसे कितने दिनों बाद उसे यह चेहरा देखने को मिला था, कितने दिनों बाद ये मोहक मुस्कान उसके चेहरे को रंग रही थी।
     उसका  मन किया कि उस चेहरे को अपने दोनों हाथों में पकड़ कर चूम ले।  लेकिन तभी उसे भान हुआ कि वह वरुण है… आश्रम का एक कर्तव्यपरायण सदस्य!  और सामने खड़ी लड़की सिर्फ एक लड़की नहीं बल्कि उसी आश्रम की ही सम्मानित महिला सदस्य है ।
     और उसके लिए वरुण के मन में इस तरह की कोई भी भावना आना गलत है। सरासर गलत है।
   अपने मन के भावों को एक झटके से अपने दिमाग से निकाल कर वरुण ने हथेली में रखे बचे हुए पत्थर वहीं फेंक दिये और वापस मुड़ कर सीढ़ियां चढ़ गया। पारो को अचानक समझ में नहीं आया कि ऐसा क्या हुआ कि वरुण वहां से ऐसे चला गया।
   उसका तो अभी भी मन कर रहा था कि वरुण उसके पास ही खड़ा रहे और वह दोनों इसी तरह पत्थर फेंकते रहे।
    एक ठंडी से सांस भर कर वह भी वरुण के पीछे सीढ़ियां चढ़ गई….
” कहां चले गए थे आप दोनों? “
  उन दोनों के वहां पहुंचते ही चारु लता ने प्रश्न कर दिया।
” बस यही तो थे।  उस तरफ जरा बकरी के बच्चे और गाय के बछड़े खेल कूद रहे थे उधर ही चले गए थे।”
” बता कर जाना चाहिए था ना! प्रबोधानन्द स्वामी गाड़ी में जाकर बैठ चुके हैं। चलिए यहां से हमारे ऑफिस जाना है।”
चारुलता की बात पर सिर झुका कर वरुण गाड़ी की ओर बढ़ गया !

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         कुछ देर पहले की जो शाम मुस्कुराती हुई ढल रही थी , उसे याद करते हुए पारो के चेहरे पर अब भी मुस्कान थी… वह भी चारुलता के पीछे धीमे कदमों से कार की तरफ बढ़ गई।
     उसे यही नहीं समझ में आ रहा था कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि वरुण बिना कुछ बोले पलट कर चला गया। उसका मन उसी बात में लगा हुआ था कि अचानक उसे समझ में आ गया कि वरुण के मन में ऐसा क्या आया होगा।
   उसे अपनी सोच पर भी बुरा महसूस होने लगा। उसे यह लगने लगा कि वह खुद कैसे वरुण के लिए अपने मन में कुछ गलत सोचने लगी थी? आखिर क्यों वह वरुण को देव की जगह देखने लगी? और जैसे ही यह बात उसके मन में आई वह शर्मिंदा होकर गाड़ी से बाहर देखने लगी। अब तक वरुण पर टिकी उसकी नजरें खुद ब खुद वरुण से हट गई। उसने तय कर लिया कि अब वह खुद को वरुण से दूर रखने का प्रयास करेगी।

     वरुण के मन की भी सारी चपलता ठंडी पड़ गई थी। वह अपनी सोच में गुम गाड़ी चलाने लग गया था। प्रबोधआनंद को इस तरह से वरुण और पारो का अचानक गायब हो जाना पसंद नहीं आया था। लेकिन दूर खड़े वह उन दोनों को बछड़ों के पास खड़ा देख चुके थे। और वैसे देखा जाए तो उन दोनों का वहां इस तरह खड़े रहना कुछ गलत भी नहीं था। अपने मन को यही समझा कर प्रबोधआनंद एक बार फिर प्रसन्न होने की कोशिश करने लगे।
  आगे बढ़ते हुए गाड़ी चारुलता के ऑफिस के ठीक सामने जाकर रुकी। चारुलता ने सादर प्रबोधानन्द जी को अंदर आमंत्रित किया, उन्हीं के पीछे वरुण और पारो भी ऑफिस में प्रवेश कर गए..
      ऑफिस में प्रबोधानन्द को बैठाने के बाद चारुलता अपने तरह-तरह के कागज पत्तर निकालकर उनके सामने बिछाती चली गई। वह प्रबोधानन्द को हर तरह से अपने प्रभाव में ले लेना चाहती थी। वह दिखाना चाहती थी कि वह समाज सेवा के क्षेत्र में किस तरह से अग्रणी है। वृद्ध आश्रमों में जाकर फल और कंबल बांटने हों, या दिव्यांगों के अस्पताल में जाकर समय-समय पर जरूरी दवाइयां बांटनी हो, हर क्षेत्र में चारुलता के कागज बड़े पक्के थे।
   वह काम कितना और क्या करती थी यह तो वह खुद ही जानती थी । लेकिन उनके पास उनके सारे किए कामों का लेखा-जोखा भरपूर था।
   एक किया चार दिखाया की तर्ज पर हर जगह के फोटोग्राफ्स भी उसने फाइल करके रखे हुए थे।
    पारो के लिए यह सब बहुत नया था। यह सब देखकर उसकी आंखें फटी जा रही थी। उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई एक औरत अकेले भी समाज कल्याण का इतना सारा कार्य कर सकती है वह भी बिना किसी की सहायता के।
   कुछ देर पहले चारुलता के लिए उसके मन में जो थोड़ी सी कड़वाहट आ रही थी, वह अब अचानक चली गई। और उसे चारुलता दीदी में देवी नजर आने लगी।
वरुण एक तरफ चुपचाप बैठा अपने आप में खोया हुआ था कि, तभी चारुलता का चपरासी उन सभी के लिए चाय और कुछ नाश्ता ले आया।
    प्रबोधानन्द की आंखे रह रह कर पारो पर ठहर जाया करती। चारुलता ने चाय की कप प्रबोधानन्द की ओर बढ़ा दी।
  वो अपना कप थामे अपनी जगह से उठे और पारो के पास जाकर खड़े हो गए।
उन्होंने अपना कप उसकी ओर बढ़ा दिया…-“मैं चाय नही पीती स्वामी जी!”
” क्यों ? ” और ये कहते हुए उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रख दिया…
   पारो ने अब तक झुका रखी अपनी नज़र ऊपर उठायी और उसकी जलती आंखें प्रबोधानन्द के चेहरे पर गड़ गयीं।
   उस नाजुक कोमल सी लड़की की उन तीखी आंखों का तेज प्रबोधानन्द सह नही सका और उसने तुरंत उसके कंधे पर रखा हाथ हटा लिया। वो अपना कप अपने हाथ में लिए वहाँ से अपनी जगह वापस लौट गया।
” मुझे पसन्द नही है।” पारो का जवाब ऐसा था कि प्रबोधानन्द को एकबारगी समझ में नही आया कि वो चाय के लिए कह रही है या उसके स्वभाव के लिए।
  प्रबोधानन्द के हटते ही सामने बैठे वरुण पर पारो की नज़र पड़ गयी। वरुण भी उसे ही देख रहा था, लेकिन कुछ देर पहले के उखड़े उखड़े से वरुण के चेहरे पर अब थोड़ी शांति नज़र आने लगी थी।
  शायद उसने भी प्रबोधानन्द का हाथ रखना और हटा लेना देख लिया था और पारो के चेहरे पर आए गुस्से से ही उसके चेहरे पर संतोष की रेखाएं खींच गयीं थीं।
   उसने भी चाय लेने से मना कर दिया।
” अरे क्यों? तुम भी चाय नही पीते क्या?”
“कभी पिया करता था पर अब मन नही करता।”
    चारुलता एक बार फिर अपनी बतकही में लग गईं और पारो और वरुण अपने अपने मन से एक दूजे को हटाने में लग गए….

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क्रमशः

   दिल से….

   आप में से कई पाठकों ने कहा कि कहानियां तो अच्छी चल रही है, लेकिन आप लोग मेरा कॉलम दिल से बहुत मिस कर रहे हैं। मिस तो मैं भी कर रही थी, लेकिन जीवनसाथी समाप्त करने के बाद पता नहीं क्यों कुछ समय तक दिल से लिखने का मन नहीं किया मैं भी अजातशत्रु जी को बहुत मिस कर रही हूं।

   अजातशत्रु और बांसुरी ऐसे दिल दिमाग पर छाए हैं की उस कहानी को समाप्त करने के बाद सच कहूं तो चार-पांच दिन तक मोबाइल देखने का भी मन नहीं किया। मैंने खुद नहीं सोचा था कि मैं इतनी इमोशनल ब्रेकडाउन में चली जाऊंगी।
    पहले लगता था कि प्रेम कथाएं लिखना सरल होता है। लेकिन असल में ऐसा नहीं है। जब आप कोई कहानी लिखते हैं तब आप उस कहानी की दुनिया में पूरी तरह से चले जाते हैं। मैं खुद अपने आप को राजा साहब के महल में महसूस करती थी , उनके कमरे उनकी बालकनी उनका दीवानखाना पिया का अस्पताल समर और राजा साहब का ऑफिस, प्रेम और निरमा का आशियाना हर एक जगह ऐसा लगता था मैं उन किरदारों के साथ खुद भी खड़ी हूं।
     जब-जब रसोई से झांक कर निरमा प्रेम से चाय के लिए पूछा करती थी, तो ऐसा लगता था मैं भी निरमा से कह दूं कि मेरे लिए भी एक कप बना लेना।

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    यह सब लेखकों के लिखने के साइड इफेक्ट्स होते हैं। और इसीलिए शायद बहुत से लेखक जब कोई एक लंबी कहानी खत्म करते हैं तो उसके बाद एक ब्रेक या पॉज़ ले लेते हैं। क्योंकि वह शायद खुद अपने रचे उन किरदारों  से बाहर निकलने की जद्दोजहद में लगे होते हैं ।
    और उस समय उनका दिमाग किसी नए किरदार को रचने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होता।
    
       और शायद यही वह चीज होती है , जिसे राइटर्स ब्लॉक कहा जाता है। मेरे साथ तो यह अक्सर होता है। जब मैंने shaadi.com लिखी थी तब बांसुरी की विदाई के बाद भी मेरा यही हाल था। और अपने आप को संभालने के लिए मुझे एक लीक से हटकर कहानी लिखनी पड़ी। क्योंकि अगर shaadi.com के तुरंत बाद मैं कोई प्रेम कहानी शुरू करती तो उस पर shaadi.com वाले राजा और बांसुरी की ही छाप नजर आती और इसीलिए एक नई प्रेम कथा शुरू करने से पहले मुझे एक ब्रेक की जरूरत थी।

    थैंक यू लिखने के बाद मुझे लगा कि अब मैं तैयार हूं shaadi.com का सीक्वेल लिखने के लिए और तब मैंने जीवनसाथी लिखना शुरू किया।
 
     दोनों कहानियों में नाम भले ही एक से थे, लेकिन किरदार बहुत अलग थे शादी.कॉम का प्रेम जहां बिल्कुल ही अलमस्त और खिलंदड़ प्रेमी था । वही जीवन साथी का प्रेम गंभीर और भावुक प्रेमी था।
   और मैं ऐसे ही लिखना चाहती थी। मैं बिल्कुल नहीं चाहती कि मेरी दो कहानियों के किरदार एक-दूसरे को ओवरलैप कर जाएं। यूं लगता है कि हर नई कहानी के साथ एक नया किरदार सामने आना चाहिए, जो अपने पूरे व्यक्तित्व के साथ आप पाठकों से मिले और आपके दिलो-दिमाग पर छा जाए।

   जीवनसाथी के बाद जो नई प्रेम कहानी मैं लिखने वाली हूं उसका प्लॉट मैं पहले ही आप सब से बता चुकी हूं कि, वह मुख्य रूप से प्रेम और निरमा की कहानी होगी सिर्फ प्लॉट और नाम ही समान होंगे। बाकी बहुत कुछ इस बार अलग होगा। यह बहुत अलग सी प्रेम कहानी होगी जिसमें इस बार एक मध्यमवर्गीय परिवार से आप रूबरू होंगे।

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जीवनसाथी के तुरंत बाद इसे शुरू न करने का कारण यह भी था कि जीवनसाथी में अभी-अभी आपने प्रेम और निरमा के किरदारों को पढा है, और इस नई कहानी के किरदार उस पुरानी कहानी के किरदारों से कुछ अलग रहेंगे । तो इन दोनों किरदारों में आपस में कोई ओवरलैपिंग ना हो जाए बस इसीलिए उस कहानी को शुरू करने से पहले एक ब्रेक ले लिया और कहानी शुरू कर दी बेस्टसेलर!!

    मेरे दिमाग के कुछ पेंच जरा ढीले हैं… इसीलिए मैं अपनी पसंदीदा जॉनर में लिखने के बीच बीच में इधर-उधर भी हाथ आजमाती रहती हूं।
  मुझे अच्छा लगता है अपनी क्षमताओं से बाहर जाकर देखना और लिखना।
     बेस्टसेलर एक बहुत ही सामान्य सी हॉरर सस्पेंस थ्रिलर है ! यह असल में एक मर्डर मिस्ट्री है जो कहानी के अंत में सुलझ जाएगी। अब तक आप जो पढ़ रहे हैं इसमें तीन अलग-अलग कहानियां चल रही है… लेकिन आगे जाकर यह सारी कहानियां आपस में जुड़ती जाएंगी और धीरे-धीरे हर राज़ पर से पर्दा उठता जाएगा।
     कहानी के मुख्य चार पात्र हैं जिनमें एक इंस्पेक्टर है शेखर! एक पत्रकार है नंदिनी! एक लेखिका है कामिनी! और एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है सुहास! इन चारों की कहानियां आपस में गुथी हुई है, जो जल्द ही आपके सामने परत दर परत खुलती जाएंगी।

*****

   अब बात कहूं समिधा की तो , समिधा लिखते हुए मुझे खुद भी बहुत मजा आ रहा है। जैसा कि मैंने पिछली बार अपनी पोस्ट में कहा भी था कि समिधा में हवन अब जाकर शुरू हुआ है अब तक तो सिर्फ हवन की तैयारियां की जा रही थी।
    
    कहानी में मैंने जिस आश्रम का वर्णन किया है , और आश्रम के अंदर की जो काली सच्चाईयां लिखी है इनका वास्तविक जीवन से कोई लेना-देना नहीं है ! मैंने अपने आज तक के जीवन में ऐसा कोई आश्रम कभी नहीं देखा यह पूरी तरह से मेरी कल्पना है।
     आप यह कह सकते हैं कि कुछ हद तक अखबारों में आने वाली खबरें और समय-समय पर अलग-अलग आचार्य महंतों स्वामियों का जो भंडाफोड़ अखबारों में होता है उसे पढ़कर थोड़ा बहुत जो ज्ञान मिला उसमें अपनी कल्पनाओं का थोड़ा सा रंग घोला और समिधा लिखने बैठ गई….
     लेकिन मथुरा के किसी भी आश्रम से इस कहानी का कोई भी लेना देना नहीं है।

   मैंने आज तक सिर्फ एक ही आश्रम अंदर से देखा है और वह है हरिद्वार में स्थित शांतिकुंज।
   शांतिकुंज एक ऐसी जगह है जहां जाकर आपको वाकई आत्मिक शांति का अनुभव होता है ….अपनी जिंदगी में मैंने इतनी सुंदर जगह दूसरी नहीं देखी। गुरुदेव और माताजी ने इस आश्रम का निर्माण किया था युग निर्माण के लक्ष्य को लेकर और उनके बाद भी उनके अनुयाई उनके इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए दृढ़ संकल्प है।
      जाती पाती अमीर गरीब पुरुष महिला इनमें कहीं कोई भेदभाव इस आश्रम में आप नहीं देख पाएंगे। सभी बराबरी से पूरे सेवा भाव से ईस आश्रम से जुड़े हैं और लगातार कार्यरत हैं ।बड़े से बड़े डॉक्टर कलेक्टर इंजीनियर भी यहां पर खाना बनाते हुए और परोसते हुए दिख जाएंगे । लाइब्रेरी में किताबों को संभाल कर रखना हो या आश्रम की साफ सफाई का कार्य हो यह सभी लोग एकजुट होकर बराबरी से हर काम में हिस्सा लेते हैं।
      शांतिकुंज में वाकई स्वर्गीय सुख की प्राप्ति होती है ।

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अब इसके साथ ही मैं अपना यह कॉलम समाप्त करती हूं । कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया… शायद पिछले इतने सारे भागों में जो नहीं लिखा था उसकी कसर आज पूरी हो गई.. अब से कोशिश रहेगी कि हर भाग में छोटा ही सही दिल से जरूर लिखूं।

aparna….
   
    
   
 

समिधा -38

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  समिधा – 38

     चारुलता पद्मजा के साथ प्रबोधानन्द के कमरे की ओर बढ़ चली। कमरे के दरवाज़े लगे हुए थे, उसने बाहर से ही हल्की दस्तक दी और दरवाज़ा खुल गया।पद्मजा को बाहर ही छोड़ चारुलता अंदर चली गयी।
  उसने देखा प्रबोधानन्द पलंग पर लेटे हुए थे, वो उनके पास पहुंच गई। उसने धीमे धीमे उन्हें आवाज़ लगानी शुरू की लेकिन स्वामी जी ऐसे अचेत सोये पड़े थे कि उन्हें ढोल दमामो की आवाज़ भी न जगा सके।
    इतनी गहरी नींद में उन्हें देख वो थोड़ी देर को अचरज में डूबी खड़ी रही और फिर वापस जाने को हुई लेकिन फिर कुछ सोच कर वो वापस मुड़ गयी। उसने जाकर प्रबोधानन्द के माथे पर अपना हाथ रखा, उनका शरीर ज्वर से तप रहा था…
    ओह तो ये ज्वर से पैदा हुई अचेतावस्था थी। वो तुरंत बाहर गयी और आश्रम में मौजूद आचार्य जो वहाँ के वैद्यराज माने जाते थे को बुला लायी।
    वैद्यराज हिमाचल से थे इसी से उन्हें  जड़ी बूटियों का पर्याप्त ज्ञान था…
  उन्होंने आकर प्रबोधानन्द को देखा और ज्वरनाशन आवश्यक दवाएं दे कर चले गए। चारुलता वहीं बैठी उनके माथे पर गीली पट्टियां रखने लगी।

    बाहर सभी इस बात से चिंतित थे कि प्रबोधानंद स्वामी बीमार पड़ गए थे, लेकिन वरुण की चिंता का कोई और कारण था। वह चाह रहा था कि जल्द से जल्द प्रबोधानंद स्वामी वहां से निकल जाए लेकिन अब उनकी बीमारी ने उन्हें आश्रम में ही रोके रखा था।

    दो रात ज्वर में तपने के बाद आखिर तीसरी सुबह प्रबोधानंद स्वामी का ज्वर उतर गया। वैद्यराज की दवाओं का असर हुआ और अगले दिन स्वामी जी अपनी सेहत में काफी सुधार महसूस कर रहे थे।
उनकी बिगड़ी तबीयत देखकर ही चारु लता भी कुछ दिन आश्रम में ही रुक गई थी।
  सुबह नींद खुलने पर प्रबोधानंद स्वामी अपने कमरे से बाहर वाटिका में चले आए । खुले उद्यान में टहलते हुए उन्हें अच्छा महसूस हो रहा था। उनके पीछे ही चारुलाता भी एक तश्तरी में कुछ फ़ल मेवे और दूध लिए वाटिका में ही चली आई…
” यह कुछ फल खा लीजिए स्वामी जी, आपने परसों शाम से ही कुछ भी नहीं खाया।”
” हमें परसों की शाम का कुछ भी याद ही नहीं। पता नहीं कब हमारे सिर में हल्का सा दर्द शुरू हुआ और हम थकान से शायद सो गए।”
” आप ज्वर के कारण बेहोश हो गए थे स्वामी जी।”
” क्या कह रही हो चारु? क्या हम ज्वर से मूर्छित हो गए थे?”
” जी स्वामी जी।”
” तुम शायद उस वक्त हमारे कमरे में ही थी है ना, पिछली रात ?”
” नहीं स्वामी जी हम पिछली से पिछली रात जब तक आप के कक्ष में आए आप ज्वर से मूर्छित पलंग पर पड़े हुए थे। आपको देखने के बाद हमने तुरंत वैद्यराज को बुलाया। आपकी देह गर्म तवे सी तप रही थी।”
” अच्छा हमें तो ऐसा कुछ याद नहीं… तो क्या हम दो रातों से सो ही रहेहैं।
पर आज हमें काफी अच्छा अनुभव हो रहा है ऐसा लग रहा है हमारी सेहत ठीक है.. आज हम मथुरा के मंदिरों के दर्शन के लिए जाना चाहते हैं। गाड़ी तो हमारे लिए है ही। हम यही मंदिर परिसर से एक दो लोगों को अपने साथ ले लेंगे।”
” आप कहेंगे स्वामी जी तो हम ही आपके साथ चले चलेंगे।”
” अरे आप क्यों कष्ट करेंगी। आपकी समाज सेवा के कार्य वैसे भी इतने फैले हुए हैं कि आपके पास वैसे भी समय नहीं रहता।
” ऐसी बात नहीं है स्वामी जी। आपके लिए तो हमारे पास समय ही समय है। बल्कि हम चलेंगे तो आप हमारे समाज सेवा के कार्यों में भी कोई कमीबेसी हो तो हमें बता सकेंगे।”
” चलिए ठीक है फिर आप ही चलिए और ऐसा कीजिएगा वह एक नई लड़की आई है आश्रम में पारोमिता वह पढ़ना भी चाहती है , तो उसे भी साथ ले लीजिएगा।।बालिका है थोड़ा नगर भ्रमण कर लेगी तो उसे भी अच्छा लगेगा।”
   पारोमिता का नाम सुनकर चारुलता के माथे पर बल पड़ गए। अपनी एक तरफ की भौंह कटाक्ष में उठाए उसने स्वामी जी को प्रणाम किया और भगिनी आश्रम की तरफ मुड़ गयी।
    भगिनी आश्रम में भोजन की तैयारियां चल रही थी। पारोमिता भी सरिता के साथ बैठी एक तरफ सब्जी काट रही थी कि, चारु लता दीदी ठीक उसके सामने जाकर खड़ी हो गई । उनकी साड़ी की सरसराहट देखकर पारो ने ऊपर नजर की और उन्हें नमस्ते किया पर चारु के मुंह से पारोमिता के लिए आशीर्वाद का एक भी शब्द नहीं फूटा…-” तुम ही हो पारोमिता?”
” जी दीदी।”

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” जा कर तैयार हो जाओ… स्वामी जी तुम्हें साथ लेकर मथुरा के मंदिर घूमने जाना चाहते हैं।”
उनकी बात सुन पारो धीमे से सिर झुकाए हुए ही अपनी जगह पर खड़ी हो गई..
” लेकिन दीदी कुछ अस्वस्थता सी लग रही है, मैं नहीं जाना चाहती हूं।”
“तुम्हारे चाहने या ना चाहने से यहां किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता! यहां तुम्हें जो कह दिया वह तुम्हें करना ही होगा…..उस दिन तो बड़ी शान से अपनी इच्छाएं बता रही थी अमृतआनंद स्वामी जी के सामने! और अब प्रबोधनंद जी के साथ शहर भ्रमण के लिए जाने का मौका मिल रहा है तो उसे गंवा रही हो? इतनी गवार तो नहीं दिखती तुम।”
” मुझे उनसे भय सा लगता है दीदी। ” पारो को लगा चारु लता सच्चे अर्थों में समाजसेवी है । और वह उन सभी स्त्रियों के दुख दर्द को समझती है महसूस करती है, और इसीलिए अनजाने में ही सही पारो के मुंह से सच्चाई निकल गई कि वह क्यों प्रबोधानंद के साथ कहीं नहीं जाना चाहती है।
” इसमें विशेष क्या है पारोमिता!!! प्रकृति ने स्वयं स्त्री को ऐसे ही बनाया है, कि वह सदा से पुरुष से भय खाती रही है। बचपन में अपने पिता और भाई से डर कर रहना, फिर विवाह के बाद अपने पति की दृष्टि के नीचे रहना। आगे चल कर बेटे और दामाद से दबना और डरना।
और समाज में जब जिस मोड़ पर आगे बढ़े पुरुषों की दृष्टि से भयभीत रहना यही तो स्त्रियों की नियति है। इसमें ऐसा क्या अलग है?
अपने आप को ऐसे बनाओ कि किसी पुरुष की नजरें, उसकी सोच तुम्हारे भय का कारण न बने। बल्कि उसकी उस सोच का, उसकी उस नजर का तुम क्या फायदा उठा सकती हो इस तरफ ध्यान देना सीखो । तभी अपनी जिंदगी में आगे बढ़ सकोगी, हमारी बात समझ रही हो ना?
  पारो ने धीमे से ना में सिर हिला दिया।
” कोई बात नहीं यह जरूरी नहीं कि हमारी हर बात तुम्हें समझ में आए । अभी यह सारी दुनियादारी समझने के लिए तुम बहुत छोटी हो। जाओ अपने कमरे में जाकर यह साड़ी बदल कर आ जाओ और फिर चलो हमारे साथ।”
पारो समझ गई थी कि इस वक्त उन लोगों के साथ जाने के अलावा उसके पास और कोई उपाय नहीं था। वो ऊपर अपने कमरे में चली गई। जाते जाते बार-बार उसके मन में यही हलचल मच रही थी कि, किसी तरह वरुण भी उन लोगों के साथ शहर घूमने जा सकता । क्योंकि अब तक तो उसे सिर्फ प्रबोधानन्द से डर लग रहा था लेकिन अब चारुलता की बातें सुनकर उसके मन में वह डर और गहरे पैठ गया था।
वो ऊपर पहुंची और अपने पलंग के बाजू से लगी छोटी सी दराज से उसने अपनी दूसरी साड़ी निकाल ली और वही बरामदे की तरफ बने बाथरूम की तरफ कपड़े बदलने चली गयी। वह कपड़े बदल ही रही थी कि उसे वहां कुछ आवाजें सुनाई पड़ी… उसने ध्यान से सुनने की कोशिश की, यह आवाज उसे बहुत जानी पहचानी सी लगी।
कपड़े बदल कर उसने धीरे से दरवाजा खोला और बरामदे से आगे बढ़ने लगी कि उसे समझ में आया कि, बरामदे के पीछे की तरफ छत पर सुनीता खड़ी थी… और वह मोबाइल पर किसी से बात कर रही थी। पारो बहुत धीमे कदमों से जाकर उसके ठीक पीछे खड़ी हो गई… अब सुनीता की बातें वो साफ-साफ सुन पा रही थी और समझ पा रही थी…
सुनीता किसी को फ़ोन पर ढाँढस बंधा रही थी कि वो जल्दी ही पैसे भेज देगी।
पारो आश्चर्य में डूबी उसकी बातें सुन रही थी कि तभी सुनीता पीछे मुड़ गई और उसने पारो को देख लिया।

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“अरे पारो तुम यहां क्या कर रही है?”
“मैं तो बस कपड़े बदलने आई थी, चारु दीदी के साथ शहर घूमने जाना है ना इसलिए।”
“अच्छा!!! तो तुझे चारु दीदी इतनी जल्दी अपने साथ ले जा रही है। अभी तो तुझे यहां रहते हुए ज्यादा वक्त भी नहीं हुआ।”
“हां !!!जाने का तो मेरा भी मन नहीं है… लेकिन चारु दीदी जबरदस्ती कर रही है। इसलिए जाना पड़ रहा है। वैसे एक बात पूछूं सुनीता?
“हां पूछ ना!”
“तेरे पास यह मोबाइल कहां से आया? यहां आश्रम में तो हमें मोबाइल नहीं मिलता है ना।”
पारो की बात सुन सुनीता ने जल्दी से मोबाइल अपनी साड़ी में छुपा लिया।
“इस बारे में तो किसी से कुछ मत कहना! और सुन इसके बदले में तुझे जब भी अपनी मां से बात करनी होगी, या किसी से भी बात करनी होगी…. मैं अपना मोबाइल तुझे दे दूंगी। चुपचाप यही छत पर आ कर बात कर लेना समझी।”
“वह तो समझ गई.. लेकिन तुझे यह मोबाइल मिला कहां से? किसने दिया? तेरे पास इतने रुपए आए कहां से? और दूसरी बात अगर किसी ने यह देख लिया कि तेरे पास मोबाइल है तो फिर तू क्या जवाब देगी? तुझे तो गुरूवरों को, आचार्यों को सभी को जवाब देना पड़ेगा।और कहीं अमृतानंद स्वामी तक तेरी शिकायत पहुंच गई और कहीं तुझे आश्रम से निकाल दिया तो?”
“तो क्या होगा? उसी के पास चली जाऊंगी जिसने यह मोबाइल दिया है… उसी से कहूंगी अपने परिवार को छोड़कर मुझे रख ले।”
“यह तू क्या कह रही है सुनीता। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा साफ-साफ बता ना!”
“क्या बताऊं पारो किस्मत इतनी उलझी हुई लिखी है कि अब साफ-साफ शब्दों को बोलना ही नहीं आता। तेरे जैसे ही मैं भी आई थी यहाँ दो साल पहले ।
पति के जाने के बाद एक बीस साल की विधवा के लिए ना उसके मायके में जगह होती है ना ससुराल में। अगर यही मेरी उम्र पचास साल होती ना तो यह दोनों घर वाले लड़ लड़ के मुझे अपने पास रखते, क्योंकि तब इन्हें मुफ्त की नौकरानी मिल जाती। मायके में भाभी के बच्चों के पोथड़े धोने हों या ससुराल में देवरानी जेठानी के बच्चों के।
लेकिन सिर्फ बीस साल की उम्र इन सब की आंखों में चुभती है और खासकर अगर औरत सुंदर हो तब तो और भी ज्यादा ।

पता नहीं हमारा समाज एक स्त्री को सिर्फ उसकी देह की नजर से क्यों देखता है?
और पति ना रहे तब तो ना मायका मायका रह जाता है ना ससुराल ससुराल । सारे रिश्ते नाते झूठ हो जाते हैं। यह जितने आदमी होते हैं ना इन सब की आंखों में एक ही चीज उतर आती है हम जैसों के लिए….कोरी वासना !!
इन्हें लगने लगता है कि कब इन गिद्धों को मौका मिले और यह हमें नोच खाए।
शायद इसीलिए हमारे घर की बड़ी बुजुर्ग औरतों ने आपस में मिल बैठकर यह निर्णय निकाला कि हमारे लिए सबसे सुरक्षित जगह आश्रम है । वरना ससुराल में रहने पर क्या देवर क्या जेठ ? पता नहीं कब कौन लार टपकाता रात बिरात हमारे कमरे के दरवाज़े की सांकल खटका जाए। उसी डर से बचने के लिए यहां चली आयीं, लेकिन मुझे क्या पता था कि मैं एक कुएं से निकलकर दूसरी खाई में गिर रही हूं। औरत का रूप और उसकी जवानी उसके सबसे बड़े दुश्मन हो जाते हैं अगर उसके सर पर सरमाया ना हो तो।

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एक औरत के लिए इस समाज में खुद को बचा कर रखना बिल्कुल वैसे ही हो जाता है जैसे 32 दांतो के बीच जीभ को सम्भाल कर रखना। बावजूद कभी ना कभी तो कट ही जाती है।
यहीं हुआ मेरे साथ। चारु लता दीदी कि समाज सेवा बहुत बड़ी चढ़ी हुई है। उन्हें अक्सर अपनी समाज सेवा के लिए बड़े-बड़े नेताओं मंत्रियों को प्रसाद चढ़ाना पड़ता है जिससे वह लोग अच्छी खासी मोटी रकम इनके संस्थान को दान करें और बस उस प्रसाद को चढ़ाने के लिए हम जैसों की कभी कभार बलि चढ़ा दी जाती है।
और एक बार जिस बकरी का गला इन्होंने काट दिया वह बार-बार हलाल होती है।
मैं तुझसे यह सब नहीं बताना चाहती थी पारो!! क्योंकि तुझे अभी यहां आए ज्यादा वक्त नहीं बीता। भगिनी आश्रम की यह काली सच्चाई जब तक तुझसे दूर रहती, तू उतना समय यहाँ आराम से रह सकती थी। लेकिन आज तूने खुद मेरी बातें सुन ली और ये मोबाइल भी देख लिया । अब इसके बाद तुझसे झूठ बोलने का मन नहीं किया । जाने क्यों तुझ में मैं अपनी दो साल पहले की झलक देख पाती हूं।
बिल्कुल ऐसा ही निष्पाप निष्कलंक चेहरा था मेरा भी। लेकिन इस दुनिया के लोगों ने और इस दुनियादारी ने सब पोंछ पाँछ कर रख दिया। पहली बार चारु दीदी के साथ गई , वहाँ से लौटने के बाद लगा मुझे मर जाना चाहिए। मुझे इस आश्रम में रहने का कोई अधिकार नहीं। क्योंकि तुझे पता है यह सारी बातें यहां मंदिर के आचार्यों या गुरुजनों को नहीं मालूम है। अमृतआनंद स्वामी खुद भी इस बारे में कुछ नहीं जानते।
” तो तुमने उन्हें बताने की कोशिश नहीं की।
” की थी लेकिन मैं सफल नहीं हुई। और उसी बीच एक और समस्या मेरे सर पर टपक पड़ी। कहते हैं ना मजबूरी औरत को मरने भी नहीं देती। स्वामी जी से शिकायत करने तो मैं चली थी लेकिन जिस दिन स्वामी जी से शिकायत करने के लिए उनके ऑफिस में पहुंच कर उनका नंबर लगा रही थी कि तभी मेरी बूढ़ी मां मुझसे मिलने चली आई। पूरे सात महीने बाद मेरी मां को मेरी सुधि आई थी। और वह भी जानती हो किसलिए? क्योंकि उन्हें मुझसे कुछ काम था। मां बाप बेटों की धुन में बेटियों पर बेटियां पैदा करते चले जाते हैं …उन्हें आस होती है कि उनके बुढ़ापे में बेटे उनका सहारा बनेंगे। लेकिन जब वही बेटे एक औरत के पल्लू से बंधे अपने बूढ़े मां बाप को छोड़ जाते हैं, तब वहीं बूढ़े मां-बाप उन्हीं बेटियों के पास सहारा तलाशने जाते हैं, जिन्हें बचपन से हर बार वह बेटों के कारण तिरस्कृत करते चले आते रहे थे।
मेरी मां तो बहुत गौरवान्वित थी क्योंकि तीन तीन लड़कों की माँ थी वो। और उन तीन भाइयों के बाद मैं पैदा हुई थी। इसलिए मेरे पैदा होने पर इतनी नाराजगी उन्हें नहीं थी। लेकिन उसके बाद मेरी किस्मत ने धोखा खाया पहले पिताजी चले गए और उसके बाद पति।
मेरे आश्रम आ जाने के बाद दोनों बड़े भाइयों ने पुश्तैनी घर को बेचा, अपना अपना हिस्सा लिया अपनी बीवी बच्चों के साथ अपनी अलग गृहस्थी बसा ली। छोटा भाई और मां बस यही दो प्राणी रह गए। उनके हिस्से का जो भी पैसा रूपया था उनके हाथ में रख कर दोनों बड़े भाई तो पल्ला झाड़ कर चलते बने, लेकिन मां रह गई अकेली वो भी उस छोटे भाई के साथ जो बचपन से ही मानसिक रूप से विकलांग था। पच्चीस का हो चुका है वह। लेकिन अब भी अपने हाथ से खाना तक नहीं खा सकता। इस बुढ़ापे में जब मां को खुद सहारे की जरूरत है। वह बेटे का सहारा बनी बैठी है। और इसीलिए वह मेरे पास आई थी, कि मुझे अपने साथ वापस ले जा सकें जिससे मैं उनकी बिखरी हुई गृहस्थी संभाल लूं। लेकिन उस समय जब मां ने मुझसे साथ चलने को कहा मन, में ऐसी कसक उठी कि उस वक्त लगा, अपनी ही मां को ऑफ़िस से धक्के मार कर बाहर निकाल दूँ।
रो-रो कर चिल्लाकर कहने का मन किया कि माँ! जिस वक्त मुझे तुम्हारी सबसे ज्यादा जरूरत थी तुमने इन्हीं भाइयों का नाम लेकर मुझे यहां आश्रम में पटक दिया कि अगर मैं तुम्हारे साथ रहीं तो मुझे तुम्हारी दोनों बहुएंअपनी नौकरानी बनाकर छोड़ेंगी। कम से कम मैं यहां आराम से चैन सुकून से रह पाऊंगी। और आज जब तुम खुद अकेली हो गई हो उस भाई के साथ, तो मुझे बुलाने और अपने साथ ले जाने चली आयीं।
मैंने मां से इतना कुछ तो नहीं कहा लेकिन यह जरूर कहा कि अब मैं आश्रम छोड़कर नहीं जाना चाहती हूं।
मां रोती बिलखती वहां से निकलने लगी, तभी मुझे याद आया कि एक रात पहले जब मैं चारु दीदी के साथ गई थी, तब उन मंत्री जी ने मेरे हाथ में भी कुछ रुपए रखे थे। मैंने मां को रोका और दौड़ कर अपने कमरे में चली गई । मैंने वो लिफाफा निकाल कर देखा उसमें 5000 थे। मैं वह पूरा लिफाफा वैसे का वैसा वहां ले आई और मां के हाथ में रख दिया।

माँ ने आश्चर्य से मुझे देखा। मैंने धीरे से कह दिया कि मंदिर के कामकाज के बदले यह थोड़े से रुपए मिले हैं… तुम रख लो! और जब भी जरूरत हो मुझे बताना मैं देती रहूंगी। माँ जाने से पहले मुझे कसकर गले से लगा लिया और रोने लगी.. मैं भी रोने लगी। मन में अजीब से पीड़ा थी, मां के लिए ममता भी उमड़ रही थी और नाराजगी भी ।
समझ में नहीं आ रहा था कि मेरे मन में उनके लिए प्यार ज्यादा था या नफरत। पर जो भी था वो आखिर थी तो मेरी ही मां, और उनके साथ था मेरा पागल भाई।
माँ धीमे कदमों से वापस चली गई।
दस दिन बाद ही उनका फोन आ गया कि अगर हो सके तो मैं हर पंद्रह दिन में आश्रम से होने वाली कमाई का कुछ थोड़ा सा हिस्सा उनके और उनके बेटे के खर्चे के लिए भेज दूँ। मैं जानती थी कि बड़े भाइयों ने कुछ रकम उनके नाम से भी बैंक में डाली थी। लेकिन मैं यह भी समझती थी कि माँ उन रुपयों को बैंक में जोड़े रखना चाहती है। वह शायद उन रुपयों को अपने बाद अपने छोटे बेटे के लिए लिए जोड़ कर रखी हुई थी कि, शायद इन पैसों के लालच में उनके मर जाने के बाद उनके बाकी के दोनों बेटे इस भाई की भी देखभाल कर लें।
मैंने मां की मदद के लिए हामी भर दी। और बस उसके बाद जो इरादा किया था कि जैसे ही समय मिलेगा अमृतानंद स्वामी से चारु लता दीदी की शिकायत करुंगी या फिर जैसे ही मौका मिलेगा जहर खा लूंगी यह दोनों ही इच्छाएं मेरी, मन के कहीं किसी कोने में जाकर दुबक कर पड़ी रह गईं।
इच्छा कह लो या अनिच्छा अब मैं खुद आगे बढ़कर चारु दीदी के साथ जाने लगी। उनके रईस डेलीगेट्स के सामने खुद ही बिछ कर और उनके सामने हाथ फैला कर अपने किए का मेहनताना मांगने लगी। वह लोग शायद चारु लता दीदी को पैसे दिया करते थे। लेकिन मेरे मांगने पर कुछ थोड़े रुपए मेरे हाथ में भी रख दिया करते थे ऐसे ही मेरी मुलाकात वीरेन से हुई।
वीरेन के पिता एमएलए हैं। और वीरेन खुद अपने वार्ड का पार्षद! रईस घर का है, उसकी बीवी भी नहीं है…. 5 साल पहले मर चुकी है ! मुझसे उम्र में 10 साल बड़ा है लेकिन जब से मुझसे मिला अब उसे कोई और नहीं जचती ऐसा वह कहता है।
उसी ने मोबाइल दिया है और उसी ने मुझसे यह भी कहा कि मैं एक निश्चित मासिक वेतन देकर अपने भाई के लिए एक नर्स क्यों नहीं रख लेती। मुझे उसकी यह सलाह पसंद आई और मैंने मां से भी यही कहा। माँ ने भी मेरी बात मान ली। वीरेन से जान पहचान हुए लगभग डेढ़ साल बीत चुका है, और इन डेढ़ सालों से अब मैं मां को हर महीने 10000 भेज पाती हूं । मां भी खुश हैं, उन्हें लगता है उनकी बेटी आश्रम के काम करके पैसा कमा रही है।
पर कभी-कभी मैं सोचती हूं कि क्या मेरी मां इतनी भोली है? उसे समझ में नहीं आता कि आश्रम में इतनी सारी महिलाएं हैं …सभी काम करती हैं.. और सभी को अगर 10000 देंगे तो आश्रम का क्या होगा?
खैर जो भी हो मुझे यह भी लगता है कि कई बार मां अपने आपको झूठा दिलासा दे देती है… वह भी शायद जानती है कि उनकी बेटी कहां से पैसे लाकर भेज रही है ?यह सब कुछ तुमसे कहने का बिल्कुल भी मन नहीं था पारोमिता।
मैं जानती हूं जो भी मेरी इस सच्चाई को सुनेगा वह मुझे गलत ही समझेगा। लेकिन क्या करूं जीवन बहुत कठिन है! और उसे जीना उससे भी कठिन! हम सोचते जरूर है कि अपनी मुश्किलों से निजात पाने के लिए हम अपनी जान ले ले, हम मर जाए। लेकिन आत्महत्या करना भी उतना ही मुश्किल है जितना किसी और की हत्या करना। आपका मन आपका ह्रदय कभी गवाही नहीं देता कि आप अपनी स्वयं की जान ले लो। मैं भी यह कठिन काम नहीं कर पाई।
उससे आसन मुझे अपनी आत्मा को बेचना लगा और बस वही करती आ रही हूँ।”
” आश्रम के कोई भी गुरुवर आचार्य इस बारे में नहीं जानते?”
” जानते हैं एक है जो जानते हैं। वह चारु लता दीदी के साथ मिले हुए हैं। लेकिन उनका नाम तुम्हें नहीं बता सकती पारोमिता। वरना यह लोग मिलकर मेरे परिवार को मुझे और साथ ही विरेन को भी मार डालेंगे। यह लोग ऐसे ही हैं पहले पहल हमें लगता है कि हम गलत कर रहे हैं और जब धीरे-धीरे हम इनकी दुनिया में उतरते जाते हैं, तो यह लोग हमारे चारों तरफ एक मजबूत जाल बुनते चले जाते हैं। अब इस जाल से मैं निकलना भी चाहूं तो यह मेरे लिए असंभव है। चारु लता दीदी का नाम तो मैंने फिर भी तुम्हें बता दिया लेकिन बाकी लोगों का नाम मैं नहीं बता सकती। क्योंकि इन लोगों ने अपना फंदा इतना कस रखा है कि उसमें सिर्फ मेरी जान जाने का भय नहीं है। अगर सिर्फ मुझे मरना होता तो मैं कब का इस जाल को तोड़कर बाहर निकल चुकी होती। पुलिस के पास पहुंच चुकी होती, लेकिन ऐसा नहीं है। इन लोगों का फंदा मकड़ी के जाल की तरह मेरे चारों तरफ बन चुका है और अब इससे मैं अपनी आखिरी सांस छूटने तक नहीं निकल सकती।
या तो यह हो सकता है कि यह लोग जब मैं बूढ़ी हो जाऊं, बदसूरत हो जाऊं तो खुद मुझे दूध की मक्खी सा निकाल फेंके। लेकिन उस समय मेरा किसी से भी कुछ भी कहने का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा? तुमसे भी यही गुजारिश है पारोमिता कि हो सके तो मेरी यह सारी बातें किसी से मत कहना। तुम सरिता के साथ रहती हो। हो सके तो सरिता से भी मत कहना, क्योंकि शायद वह भी इस सब के बारे में कुछ नहीं जानती।”
“ठीक है! पर यह बताओ कि तुम्हारे साथ और कौन-कौन सी लड़कियां इस सब कार्यों में लिप्त हैं?”

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“मैंने तुम्हें मेरी कहानी सुना दी ना! मेरे साथ जितनी भी और महिलाएं लड़कियां इस सब में संलिप्त हैं, उनकी भी ऐसी ही कोई ना कोई कहानी है। हम सभी एक ही नाव पर सवार हैं। और अब अगर हम में से एक भी इस नाव से बाहर कूदती है तो वह पूरी नाव को ले डूबेगी और इसलिए मैं किसी का नाम नहीं बता सकती। जो जैसा चल रहा है वैसा चलने दो । आज पता नहीं मन बहुत भावुक था इसलिए मैंने तुमसे यह सारी बातें कह दी। पर बहन मैं तुम पर विश्वास कर सकती हूं ना? कि तुम बाहर कहीं किसी से कुछ नहीं कहोगी।”
“हां तुम मुझ पर विश्वास कर सकती हो सुनीता!! मैं किसी से कुछ भी नहीं कहूंगी। “
“उस चारुलता और प्रबोधनंद से दूर ही रहना, दोनों ही सही नहीं है।”
“मुझे भी तो प्रबोधआनंद से जाने क्यों बहुत भय लगता है! अभी भी मेरा बिल्कुल मन नहीं है, लेकिन पता नहीं चारु लता दीदी क्यों इतना जबरदस्ती कर रही है? “
“उन दोनों के साथ अकेले कहीं मत जाना तुम! हो सके तो सरिता को साथ में ले लो या फिर कोई बहाना बनाकर आश्रम में ही रुक जाओ।”
“मैंने बहुत कोशिश की कि मैं बहाना बना लूं… लेकिन वह मानने को तैयार नहीं है।”
“ठीक है कोशिश करो की आश्रम के ही कोई स्वामी या गुरुवर तुम्हारे साथ चले जाएं । भगवान भी उन्हीं की मदद करते हैं, जो स्वयं अपनी मदद करने के लिए प्रस्तुत रहे। मैंने तो अपनी मदद करने की सोची ही नहीं और शायद इसीलिए मेरा ऐसा पतन हुआ।”
“ऐसा मत सोचो सुनीता! उस लीलाधर ने तुम्हारे लिए भी कोई लीला सोच ही रखी होगी।”
पारो सुनीता से बात कर ही रही थी कि सरिता उसे ढूंढती हुई आवाज देती उपर चली आई….-” अरे तू यहां बैठे-बैठे सुनीता से बातें कर रही है। वहां नीचे चारु लता दीदी ने पूरा आश्रम सर पर उठा रखा है। प्रबोधानन्द स्वामी कब से गाड़ी में बैठे तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। तुरंत जाओ सखी वरना स्वामी जी गुस्सा हो जाएंगे।”
“हां” में सर हिला कर पारो वहां से उठ गई । बहुत ही भारी मन से धीमे कदमों से वो सीढियां उतरने लगी कि तभी पीछे से सुनीता ने आवाज लगा दी…-” अपना ध्यान रखना पारो।”
थके कदमों से पारो आश्रम से बाहर की तरफ निकल गई। रास्ते में ही चारु लता दीदी उसे मिल गई । उनकी झिड़कियां उसके ऊपर शुरू थी। वह शांती से उनके साथ आश्रम के मुख्य द्वार से बाहर निकल गई ।बाहर अपनी गाड़ी में ड्राइवर की सीट के बाजू में प्रबोधानन्द बैठे थे । जैसे ही चारुलाता ने दरवाजा खोला और पारो को बैठाया, प्रबोधानन्द ने पीछे की सीट पर एक नजर डाली, और पारो को देख कर मुस्कुरा कर सामने देखने लगे। पारो के ही बाजू में चारु लता दीदी भी बैठ गई। ड्राइवर की सीट अब तक खाली थी।
कि तभी ड्राइवर की सीट खोलकर वरुण भीतर चला आया उसने अंदर आकर स्वामी जी को प्रणाम किया और गाड़ी गियर में डालकर आगे बढ़ा ली।
” तुम यहाँ कैसे?”
” आपके ड्राइवर को भी तेज बुखार हो गया है स्वामी जी। और आश्रम में मेरे अलावा एस यू वी किसी को चलानी नही आती। इसीलिए अलोकानन्द स्वामी जी ने मुझे भेजा है। आप चिंता न करें मैं आपकी सुविधा का पूरा ध्यान रखूंगा।”
प्रबोधानन्द के पास कोई उपाय नही बचा था। अपनी झुंझलाहट छिपाते हुए वो खिड़की से बाहर देखने लगे और पीछे बैठी पारो ने मन ही मन मुरली वाले को मुस्कुरा कर धन्यवाद ज्ञापित किया कि एक बार फिर उसने उसकी लाज रखने वरुण को भेज ही दिया..

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क्रमशः

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aparna….

समिधा-28

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      ससुराल में पारो का समय कैसे बीत रहा था उसे खुद ख्याल नही था। इसी बीच एक बार लाली भी उससे मिलने आई। लाली पेट से थी और इसी कारण उसे पहले आने नही दिया गया था।
   मांग भर लाल सिंदूर हाथ में शाखा पोला पहनी लाली पारो को अति सौभाग्यशाली दिख रही थी। उसके सामने पारो अपनी किस्मत का रोना लेकर नही बैठना चाहती थी। इसलिए उसे अपने कमरे में बैठा कर उसके लिए वो मुस्कुराती उसके सामने बैठ गयी। कुछ देर इधर उधर की बातों के बाद आनन्दी उन दोनों के लिये कुछ खाने पीने का सामना लिए ऊपर ही चली आयीं।
   बहुत दिनों बाद पारो के चेहरे पर मुस्कान आई थी , लाली को देख कर।
  जाने क्यों उसे लाली में देव नज़र आ रहा था। देव अपनी भतीजी पर जान भी तो छिड़कता था।।
  लाली भी पारो से मिल कर प्रसन्न थी, उसे पारो में उसके देव काका दिखाई दे रहे थे…-” पारो एक बात पूछूं”

” हाँ पूछ ना? “

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” तुम वापस पढ़ाई क्यों नही शुरू कर देती? “

पारो अनमनी सी लाली को देखने लगी..-” अपने घर के रीति रिवाजों से तो परीचित हो भली तरह। जब तक देव बाबू थे फिर भी किसी तरह सम्भव था लेकिन अब पारो का पढना एक तरह से असंभव है!”
   जवाब आनन्दी ने दिया । जवाब कड़वा ज़रूर था पर सत्य था। घर में पहले भी देव ने चोरी छिपे ही पारो को पढ़ने में मदद की थी और अब उसके जाने के बाद पारो में भी वो उत्साह कम दिख रहा था।

” आप कह तो सहीं रहीं हैं बऊ दी , लेकिन पढेंगी लिखेगी तो मन लगा रहेगा। वरना करेगी क्या दिन भर?”..

  लाली की बात सुन पारो की आंखों में पानी भर आया। आनन्दी भी पारो को देख दुख में डूब गई। तीनों औरतें कुछ पलों को चुप रह गईं की क्या किया जाए क्या नही… उसी वक्त कहीं से घूम घाम कर लौटा दर्शन भी ऊपर ही चला आया…-” ये लो दर्शन चला आया। सुन तू ही पारो की मदद क्यों नही कर देता पढ़ने लिखने में। थोड़ा उसका भी मन लगा रहेगा।”

” तो मैंने कब मना किया ? बऊ दी जब चाहें पढ़ लें। मैं इन्हें पढ़ाने में पूरी मदद कर दूंगा।”

“पर मदद सबसे छिप कर करनी होगी दर्शन बाबू। अगर घर भर को पता चल गया तो एक और नई मुसीबत हो जाएगी।”
  आनन्दी की बात पर दर्शन ने भी हामी भर दी….
पारो का अब किसी काम में मन नही लगता था। न रसोई में न पढ़ाई में। उसे अब सारा सारा दिन देव के बारे में सोचना ही बस भाता था। खिड़की की बल्लियां पकड़े खड़े वो देव में खोई रहती।
  पर घर की बाकी औरतों को ये कैसे सहन होता। आखिर उनके भी अपने दुख थे। तो अकेली पारो को ही गमगीन रहने का अवसर क्यों मिले भला? जब बेटा खो कर भी माँ कामधाम में लगी है?
  आखिर देव की माँ ने पारो को भी गृहस्थी के जंजाल में वापस बुला लिया। अब सुबह उठ कर आंगन को पानी से धो कर पारो घर भर के लिए चाय चढ़ा कर फिर नहाने चली जाती। नहा कर आने के बाद ठाकुर माँ  के पूजा पाठ का सरंजाम जुटाने के बाद एक बार फिर रसोई बनाने में डूब जाती। दोपहर सबके खाने पीने के बाद ही उसे छुट्टी मिलती। तब कुछ देर को अपने कमरे में आराम करने का मौका उसे मिल पाता। हालांकि दोपहर सोने की आदत न होने से वो दर्शन की दी हुई किताबें पढ़ने लगती।
  अक्सर किताब के सबसे रस भरे अध्याय में डूबी होती कि नीचे से शाम की चाय बना लेने की पुकार चली आती और वो अपनी किताब बंद कर नीचे भाग जाती।
  वो इतना काम करते हुए भी नही थकती क्योंकि अब उसे देव की माँ में अपनी सास कम और देव की माँ का अंश अधिक नज़र आने लगा था। अब उसे उस सारे घर से प्यार हो गया था। वो प्यार जिसका अधिकारी जा चुका था उसके उस अधिकार को उसके प्यार को अब पारो उसके घर और सम्बन्धों पर लुटा देना चाहती थी। वैसे भी अब इसके अलावा उसके जीवन में और बचा क्या था?
   देव के बाबा का अब वो और ज्यादा खयाल रखती। बिल्कुल जैसे वो सुबह नाश्ते के बाद और रात खाने के बाद कि गोलियां उन्हें निकाल कर दिया करता वैसे ही वो गोलियां निकाल उनकी टेबल पर पानी के गिलास के साथ रख आती।
   और वो धीमे से अपने चश्मे पर चढ़ आई भाप को चुपके से साफ कर लेते।
  ठाकुर माँ को शाम में बैठ कर सुखसागर पढ़ कर सुनाती बिल्कुल जैसे वो सुनाया करता था। माँ की कही हर बात वैसे ही जी जान से लग कर पूरा करती जैसे वो किया करता था लेकिन बस एक ही जगह वो चूक जाती…
   जहाँ खुद से प्यार करने की बारी आती वो लाचारगी से खिड़की पर खड़ी खुद पर तरस खा कर रह जाती। उसे तो वो टूट कर चाहता था, उसका प्यार जब तब वो महसूस कर पाती थी लेकिन न कभी उसने खुल कर कहा और न पारो ने ही उससे खुल कर कहने कहा लेकिन समझते तो दोनो ही थे।
  कितनी कोमलता थी देव के प्यार में। उसे छूता भी ऐसे था कि कहीं वो मैली न हो जाये और आज उसे इस अनजान सी दुनिया में अनछुआ अकेला तड़पता छोड़ गया था।
अब जब उसे शादी प्यार पति पत्नी के सम्बन्धो के बारे में थोड़ा बहुत मालूम चलने लगा तब वो ही चला गया।
  यही सोचती कभी कभी वो एकदम गुमसुम रह जाती तो कभी रोते रोते उसकी हिचकियाँ बंध जाती।
    लेकिन अब उसे सासु माँ अधिकतर समय काम में भिड़ाये रखती जिससे वो सुकून से कमरे में बैठ रो भी नही पाती थी।
  ऐसे ही एक शाम वो अपनी खिड़की पर खड़ी बाहर डूबते सूरज को देख रही थी कि उसकी सास और बड़ी बुआ अंदर चली आयी…-” क्या देख रही है पारो? “वो चौन्क कर मुड़ी और माँ के साथ बड़ी माँ और बुआ को भी आया देख चुप खड़ी रह गयी।
“दिन भर ऊपर अकेली पड़ी पड़ी उकता नही जाती हो? नीचे चली आया करो। हम सब के साथ बैठोगी तो अच्छा लगेगा न। “
  हाँ में सिर हिला कर वो ज़मीन पर अपने पैर के अंगूठे से गुणा भाग के चिह्न बनाती रही।
  वो तीनों एक साथ उसके कमरे में क्या सचमुच उसकी चिंता में ही चली आयीं थीं ? पारो सोच नही पा रही थी। पर जाने क्यों आज इतने दिनों में पहली बार उसे उसकी सास के चेहरे पर खुद के लिए एक अलग सी ममता दिखी थी। फिर भी वो उस वक्त उनके भावों का अर्थ नही जान पायी…
   बड़ी बुआ ने बोलना जारी रखा…-”  बेटा पारो ! तुझे ऐसे अकेले ऊपर अब छोड़ा नही जाता। वैसे भी इतने बड़े कमरे में अकेले घबराहट सी होती होगी न। ऐसा करना अपना सामान कल नीचे ठाकुर माँ के कमरे में रख लेना।
   उनका कमरा बड़ा भी बहुत है। उसी में एक ओर तेरे लिए खाट भी पड़ जाएगी, और तेरी ठाकुर माँ के साथ रहने पर तुझे अकेले डर भी न लगेगा।”
  पारो का जी किया कि चिल्ला के कह दे कि मुझे अभी भी किसी से डर नही लगता। और मैं ये कमरा छोड़ कही नही जाऊंगी। लेकिन देव जाते जाते उसकी ज़बान उसकी बोली भी अपने साथ ले गया था।
  वो चुप खड़ी रही।

” क्यों बऊ दी मैं गलत कह रही हूँ क्या? इतने बड़े पलंग का और इतने बड़े कमरे का अब इसे क्या काम?वैसे भी अब इसे पलंग पर नही खाट पर सोना चाहिए। पुराने लोग तो ज़मीन पर सोने कहते थे, पर चलो हम लोग वैसे पुराने खयालों वाले नही हैं। दूसरी बात यह नीचे माँ के साथ रहेगी तो उन्हें भी आसरा हो जाएगा। रात बरात कभी पानी पीना है कभी बाथरूम जाना है आखिर कोई तो साथ रहेगा। और फिर बऊ दी तुम्हें माँ के लिए नर्स रखने की भी ज़रूरत न होगी। अरे जब घर की बहु नहला धुला सकती है तो इसी काम के लिए पैसे बहाने की क्या ज़रूरत?”

पारो ने बड़ी मुश्किल से आँख उठा कर अपनी सास को देखा उन्होंने उससे नज़रे चुरा लीं। पारो समझ गयी देव के न रहने पर शोक जताने आयी बड़ी बुआ इसी घर में अपना पक्का आवास बनाना चाह रहीं थीं। एक ही लड़का था उनका, जो पढ़ लिख नही पाया था। वो पहले भी एक बार देव से उसे अपने साथ काम सिखाने कह चुकी थी लेकिन अब तो लग रहा था वो उसे देव की दुकान पर ही बैठाने के मंसूबे लिए आयीं थीं। क्योंकि सारे काज निपटने के बाद जब उनके पतिदेव ने उनसे भी वापस चलने की बात कही तो उन्होंने कुछ दिन बाद आने की बात कह कर उन्हें अकेले ही भेज दिया था। उनके पति पोस्टमास्टर रह कर रिटायर हुए थे इसी से कुछ खास आमद थी नही पर मायके की सम्पन्नता उनकी आंखें चौन्धिया जाती थी।

  जबसे वो यहाँ आई थी कोई न कोई तिकतिक लगाये ही रहतीं। कभी उन्हें माछ में सरसों की झाल कम लगती तो कभी मिष्टी दोई में मीठा। कुल मिलाकर वो किसी से संतुष्ट नही थीं। पारो से तो कतई नही।
  अब आज वो एक तरह से पारो का कमरा हथियाने चली आयी थीं। पारो ने एक नज़र सासु माँ पर डाली उनके चेहरे पर कष्ट की हल्की सी छाया आकर गुज़र गयी, अपनी भावनाओं पर अपने गुस्से को जबरदस्ती लादती वो भी अपनी ननंद के सुरों में सुर मिलाने लगी…-“ठीक ही तो कह रहीं है दीदी। तुम इतने बड़े कमरे में घबराओगी ही,इससे अच्छा है वहीं नीचे रहोगी तो माँ को वक्त पर कुछ ज़रूरत हो तो तुम कर सकोगी। वैसे भी अब तुम्हारे जीवन में और बचा ही क्या है? “

  ” ऐसा क्यों बोल रहीं है काकी माँ! उसका पूरा जीवन बचा है और जीवन से अनमोल क्या है भला? वो भी अपने जीवन को किसी सुंदर और सार्थक कार्य में लगा सकती है। अपने जीवन को एक सुंदर आकार दे सकती हैं। आखिर भगवान ने तो हमें अकेला ही पैदा किया है,रिश्ते नाते तो हम जोड़ते चले जातें हैं। और फिर उन्हीं नातों में अपना जीवन ढूंढने लगते हैं ये सोचे बिना की उस ऊपर वाले ने हमें क्यों पैदा किया…”


  
    आनन्दी अपनी लय में बोलती चली जा रही थी, की उसकी सास ने उसे टोक दिया…-“तुम्हारे जितना दिमाग हम लोगों के पास तो है नही बऊ माँ! कनकलता दीदी घर पर सबसे बड़ी हैं, ये अपना घर छोड़ हमारे यहाँ दुख के समय में खड़ी हैं, हम सब के साथ। इनका सम्मान करना भी हमारा ही धर्म है। नीचे उनके लिए अलग से कोई कमरा नही है। माँ और बेटा दो लोग हैं। इस इतने बड़े कमरे में आराम से रह सकतें हैं। पारो का क्या है कुछ दिन ठाकुर माँ के कमरे में रह जायेगी तो क्या बिगड़ जायेगा। नीचे हम सब भी तो साथ होंगे।
   और फिर दीदी के जाने के बाद तो कमरा देव का ही है, पारो को मिल ही जायेगा।”

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  अपनी सास के सामने आनन्दी कम ही बोलती थी, लेकिन आज उसका धैर्य चूक गया था। उसे बुआ जी के वहाँ रहने से कोई परेशानी नही थी, लेकिन उनका बात-बात पर घर परिवार के मामले में दखल देना उसे अखर जाता था।
   पर अब सासु माँ की तीखी आँखों के चाबुक ने उसे एक किनारे चुप खड़ा रहने की ताकीद कर दी थी। वो चुप खड़ी पारो को देख रही थी…-” जी ठीक है, मैं रात तक अपनी जरूरत का सामना लेकर नीचे चली जाऊंगी। ” पारो ने कह तो दिया लेकिन वो उन सब से और क्या कहती कि जब वो अपनी सास तक में अपने पति को देख पा रही थी तो इस कमरे में तो कितनी अनगिनत यादें गुंथी पड़ी थी। इसी खिड़की की बल्लियों पर उसके हाथों के निशान थे, जिन्हें पकड़ कर खड़ी वो यही महसूस करती की उसका हाथ देव के हाथों पर हैं। जिस तकिए पर वो सिर रखता था, जिस चादर को वो ओढता था, जिस तौलिए को काम में लाता था, वो सारी अनमोल धरोहरों को साथ ले पारो नीचे चली गयी। ठाकुर माँ के कमरे में एक ओर उसके लिए एक पुरानी चारपाई डाल दी गयी।
   उसमें एक पतले से रुई के गद्दे पर तकिया डाले जब वो रात में लेटी तो उसकी आंखें झर झर बहने लगीं… कहाँ देव के सामने वो अकेले उस हिंडोले से पलंग पर अकेली सोती थी। उन रेशमी चादरों मखमली तकियों के बाद आज ये पतला गद्दा उतना नही चुभ रहा था जितना देव का ऐसे चला जाना।
   किसी एक व्यक्ति के चले जाने से संसार कैसा वीरान और सूना हो जाता है, पारो महसूस कर रही थी। और सोचते सोचते अचानक एक बात उसके दिमाग में आई की क्या अगर वो देव की जगह मर जाती तो देव का जीवन भी ऐसा ही कठिन हो जाता? या उसके जीवन में कुछ और तरह की बातें होतीं।
  सभी तरह की बातें सोचती वो सो गई।
       रात उसे ऐसा लगा जैसे देव की उंगलियां उस पर चल रहीं हैं। चेहरे पर से फिसलती उंगलियां गले से नीचे उतरने को थीं कि नींद में भी उसे याद आ गया कि देव तो अब है नही फिर ये कौन था। वो चौन्क कर उठ बैठी। खिड़की पर कुछ सरसराहट सी हुई और सब कुछ एकदम शांत हो गया।
  उसकी खाट खिड़की से लगी हुई थी, उसने बैठे बैठे ही बाहर झांक कर देखा, बाहर कोई नज़र नही आया। तब क्या वो सच में सपने में देव को ही महसूस कर रही थी, या फिर खिड़की से किसी ने अपना हाथ अंदर डाल रखा था?
  पर कौन हो सकता था वहाँ इस वक्त? उसके बदन में एक झुरझुरी सी दौड़ गयी… उसके बाद वो रात उसकी आँखों ही आंखों में कट गई…रात बीत गयी, सुबह हो गयी लेकिन वो रात की बात किसी से कह न सकी।

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   दिन बीत रहे थे। लाली भी कुछ दिन मायके रह कर वापस चली गयी थी। अब घर भर में दो ही लोग थे जिन्हें पारो की चिंता थी, एक आनन्दी और दूसरी ठाकुर माँ। उन्हें हमेशा पारो को देख कर यही लगता कि उसकी इस हालत की ज़िम्मेदार वो खुद हैं। ना वो देव को अपने साथ लेकर जाती और न देव के साथ ये हादसा होता।
   पर घर भर की सबसे बुज़ुर्ग होने पर भी कई बातों में उनकी भी नही चलती थी। जो नियम थे वो तो थे ही।
   आनन्दी ने दर्शन से कह कर पारो को पढ़ने के लिए किताबें दिलवानी शुरू कर दी थीं। अब दोपहर में पारो ठाकुर माँ के कमरे में एक किनारे बैठी किताबें पढ़ती रहती।
   और कभी जब दर्शन उससे किसी पढ़े गए पद की व्याख्या पूछता या उसे गलत बताता तो वो उसे सहीं कर देती।
  एक शाम वो बाहर से आते हुए ढेर सारे अमरूद ले आया। नीचे आंगन में बैठी पारो कोई काम कर रही थी कि पीछे से आकर उसने उसकी झोली में अमरूद डाल दिए। चौन्क कर दर्शन को देख पारो मुस्कुरा उठी। उसके मन के अंदर कहीं छिपी बैठी लड़की मुस्कुरा उठी। वो सारे अमरूद समेट कर रसोई की तरफ जाने लगी…-” अरे कहाँ चल दीं सारे अमरूद समेट कर? क्या हम लोगों को एक भी न दोगी? “
  दर्शन के सवाल पर वो पलट कर थम गई…-“सारे ही तुम्हारे हैं। मैं तो अंदर धोने लेकर जा रही थी। “
   ” मैं क्या जानूं? मुझे तो लगा तुम अकेली ही खा लोगी!”
   ” इतनी भुक्खड़ लगती हूँ तुम्हें”  हँस कर उसे घूरती पारो आगे बढ़ने लगी कि उसके सिर पर पीछे से एक टपली मार दर्शन सीढ़ियों पर भागता हुआ चढ़ गया, और उसकी टपली का जवाब देने आँचल से सारे अमरूद फेंक कर पारो उसके पीछे दौड़ पड़ी। बड़े दिनों बाद पारो ने जतन से जिस बावली सी लड़की को अपने भीतर छिपा रखा था बाहर आ गयी।
  ” अरे सम्भल के ! फिसल न जाना तुम दोनों। ” आनन्दी दोनो की चुलहबाज़ी देखती मुस्कुराती हुई अपने आँचल से अपना हाथ पोंछती रसोई में चली गयी, और उसकी बात पर वहीं आंगन में बैठी बुआ जी ज़हर बुझा तीर छोड़ गई…-” समय रहते इन्हें न रोका तो फिसल ही तो जाएंगे। “
   वही बैठ कर चांवल चुनती पारो की सास का जी धक से रह गया, उन्होंने साथ बैठी अपनी जेठानी की ओर देखा, उनकी अनुभवी आंखों में भी चिंता की रेखाएं नज़र आने लगीं थीं…..

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क्रमशः

aparna…..

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दिल से …..

     समाज के कायदे कौन बनाता है? कौन हैं वो समाज के ठेकेदार जिन्होंने औरतों के लिए अलग और मर्दों के लिए अलग नियम बना रखें हैं।
  हम कितना भी लिख पढ़ जाएं , कितने भी आगे निकल जाएं लेकिन अब भी बिना पति के एक औरत का जीवन उतना सुगम और सहज नही हो पाया है। दुर्भाग्यवश अगर जीवनसाथी बिछड़ जाएं या अलग हो जाएं तो इसमें किसी का कोई दोष तो नही फिर क्यों उसके साथ ऐसा सुलूक किया जाता है कि उसका दुख कम होने की जगह और बढ़ता चला जाता है।


   काश लोग फ़िज़ूल नियमों की जगह एक ही नियम प्रेम का नियम मान लें तो किसी का दुख समाप्त भले न कर सकें कुछ हद तक कम तो ज़रूर कर पाएंगे।
  
     आगे के भाग हो सकता है पढ़ने में थोड़े और तकलीफदेह हों लेकिन अगर कृष्ण दुख देते हैं तो उससे उबारने वाले भी वहीं हैं।

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  आपका सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ। आप मुझे पढ़ते हैं सराहतें हैं, दिल से शुक्रिया नवाज़िश!!!

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aparna…


 

समिधा-27

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   समिधा- 27

    केदारनाथ त्रासदी को घटे सात महीने बीत चुके थे। जिन्होंने अपने अपनों को खोया था वो उस त्रासदी को इन सात महीनों में भी नही भूल पा रहे थे, यही हाल उनका भी था जिनके अपने इस त्रासदी से वापस लौट चुके थे।

        वरुण मंदिर ट्रस्ट में स्थायी सदस्यता पा चुका था। उसके माता पिता ने भी इस बार न उसे रोका न टोका,और सहर्ष सहमति दे दी। कादम्बरी के परिवार ने ज़रूर कुछ टोकाटाकी करने की कोशिश की लेकिन वरुण का परिवार वरुण के सामने दीवार बन खड़ा रहा, फिर अपना सा मुहँ लेकर उन्हें भी लौटना ही पड़ा।
    कोलकाता के मंदिर में दो महीने बिताने के बाद वरुण और दो चार अन्य सेवादारों को मथुरा राधाकृष्ण मंदिर भेज दिया गया था।

    मंदिर में सुबह सवेरे उठ कर सारे मंदिर परिसर में झाड़ू लगाने के बाद पानी का छिड़काव कर वरुण अपने दो साथी सेवादारों के साथ पोंछा लगाया करता।
     मंदिर की ही पुष्पवाटिका से चुन चुन कर लाये फूलों की फिर सारे लोग मिल कर लंबी सी माला गूंथते और द्वारिकाधीश का श्रृंगार होता।
      दोपहर बाद सभी एक साथ बैठे भजन गाया करते।
   इस सब के साथ ही सुबह और शाम का समय वेदाध्ययन के लिए भी निश्चित था।
   वरुण को ये सारे कार्य प्रिय थे। वह इन सभी कार्यों को करते हुए अपने मन को शांत रखने का पूरा प्रयास करता और उसे इन कुछ महीनों में इन कार्यों में एक सुख मिलने लगा था एक शांति मिलने लगी थी ऐसा लगने लगा था कि वह अपने कृष्ण के आसपास है और कृष्ण सिर्फ उसके ही नहीं हर किसी के आसपास हैं। और इसीलिए धीरे-धीरे वरुण की श्रद्धा इस बात पर बढ़ने लग गई थी कि जो जिसके साथ होता है वह सब कृष्ण का रचा रचाया है और इसीलिए उससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता ।
  वरुण की यही सोच उसे धीरे-धीरे शांति की तरफ ले जा रही थी, लेकिन बीच-बीच में कभी अचानक एक चेहरा उसकी खुली आंखों में झांकने चला आता। जैसे पूछ रहा हो…-” मेरा क्या कसूर था जो तुम्हारे कृष्ण ने मुझे ऐसी सजा दी ?” ऐसे समय में वरुण अपने विचारों को झटक कर कोई ना कोई किताब खोल कर पढ़ने बैठ जाया करता। लेकिन इन सारी व्यस्तताओं के बाद भी बार बार एक जोड़ी पनीली आंखें उसका पीछा करती सी लगती जैसे कह रहीं हो “वापस आ जाओ!”  उसे अक्सर यूँ लगता कि वो मन से यही सब करना चाहता तो है पर उसकी आत्मा इस सब में शामिल ही नही होना चाहती। 
सुबह और शाम के समय के अतिरिक्त रात में भी जब उसे समय मिलता वह मंदिर परिसर के कोने में बैठ अपनी किताब को पढ़ने में डूब जाया करता। वेदों का अध्ययन करते करते धीरे-धीरे उसे हिंदू धर्म की जटिलताएं समझ में आने लगी थी।
   आज तक जिन रीति-रिवाजों को मानने के लिए वह अपनी मां का मजाक उड़ाया करता था और रीति-रिवाजों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को देख पढ़ कर समझ कर उसके ज्ञान चक्षु भी खुलने लगे थे।
    मंदिर का पूरा कार्य एक ट्रस्ट के अधीन था वह ट्रस्ट पूरे भारतवर्ष ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कृष्ण मंदिर की स्थापना कर चुका था। मंदिरों में होने वाले आय-व्यय के साथ ही दानदाताओं को अधिक से अधिक दान के लिए प्रेरित करने के लिए भी मंदिर ट्रस्ट को पढ़े लिखे शिक्षित वर्ग की आवश्यकता थी और अगर वरुण जैसे युवा इस कार्य में उनका सहयोग करें तो मंदिर ट्रस्ट को लाभ ही लाभ था इसलिए वरुण की तरफ मठाधीशों का कुछ अधिक ही झुकाव था।

   मंदिर में अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग पद सृजित बहुत से सेवादार ऐसे थे जो स्वेच्छा से जीवन पर्यंत सिर्फ सेवादार ही बने रह जाते थे।लेकिन कुछ उनमें से ऐसे भी थे जो सेवादार से ऊपर के कुछ 1 पदों तक जाकर रुक जाए करते थे। लेकिन वरुण जैसे उच्च शिक्षित युवाओं को मंदिर ट्रस्ट द्वारा सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ाते हुए मंदिर के मठाधीश तक के पद तक पहुंचाए जाने की व्यवस्था थी। वैसे मंदिर में जाति धर्म या गरीबी अमीरी के नाम पर किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं था। सभी के लिए समान कार्य बांटे गए थे , और सभी को अपने हिस्से के कार्य करने ही होते थे। अंतर बस इतना होता था कि शिक्षित लोग जो विद्या अध्ययन करने में सक्षम थे उन्हें वेदों का अध्ययन करवा कर उनसे प्रवचन आदि दिलवाए जाने की व्यवस्था की जाती थी।
     पिछले कुछ समय में ही वरुण ने बहुत सारी किताबों का अध्ययन कर लिया था और जैसे-जैसे अध्ययन करता जा रहा था उसका दिमाग भी विस्तृत होता जा रहा था।
       मंदिर परिसर हर किसी के लिए खुला था लोग दर्शनों के लिए आते मंदिर में चढ़ावा चढ़ाते, और चले जाते। सब के जाने के बाद हफ्ते में एक दिन चढ़े हुए सारे चढ़ाव की गणना की जाती और उसके बाद उस धनराशि को मंदिर ट्रस्ट के पास भेज दिया जाता।
    ट्रस्ट से हर महीने एक निश्चित धनराशि मंदिर में रहने वालों के खाने पीने आदि के लिए भेज दी जाती। इन सब का हिसाब योगेंद्र जी रखा करते थे।

   मंदिर परिसर बहुत विशाल था। चारों तरफ फैली वृहत वाटिका के बीचो बीच स्थापित मंदिर में पीछे तरफ कमरे बने हुए थे जहां सेवादार और बाकी के मंदिर कर्मचारी रहा करते थे।
      उसी परिसर में एक और हटकर विधवा आश्रम बना हुआ था जहां वृद्ध युवा और बाल विधवाये रहा करती थी। आश्रम के कर्मचारियों तथा अन्य लोगों के लिए भोजन पकाने बर्तन साफ करने आदि की जिम्मेदारी इन्हीं महिलाओं की थी । महिलाओं की संख्या कम अधिक होती रहती थी। वैसे तो एक बार जिस महिला को उसके घर वाले इस आश्रम में छोड़ जाते उसका वापस अपने घर लौट पाना असंभव ही था। इसलिए अधिकतर समय उस आश्रम में महिलाओं की संख्या में वृद्धि ही हुआ करती थी, संख्या में कमी तभी आती थी जब उनमें से कोई देवलोक को चली जाया करती थी।
     उनका जीवन कठिन नहीं कठिनतम था। क्योंकि उनके जीवन में वेद अध्ययन को स्थान नहीं दिया गया था। उनमें से अधिकतर वृद्ध महिलाएं अपने आपको कृष्ण समर्पित कर चुकी थी । इसलिए उनका मन सिर्फ कृष्ण को समर्पित लोगों की सेवा से ही प्रसन्न हो जाता था। लेकिन कुछ युवा और बाल विधाएं भी थी जिन्हें अच्छा खाने और अच्छा पहनने का शौक हुआ करता था। लेकिन उस स्थान में जहां उन्हें पर्याप्त आहार भी ना मिल पाता हो,उनके शौक कौन पूछता और कौन पूरे करता?

    वह औरतें एक रटी रटाई दिनचर्या का पालन करती हुई बस जीवन जीती चली जा रही थी! जिसका ना कोई आदि था ना अंत। बहुत बार ऐसा लगता जैसे वह वहां रहते हुए बस अपनी सांसें गिन रही हैं, कि किस तरह उनकी सांसो की अवधि पूरी हो और वह स्वयं कृष्ण के लोक पहुंच जाएं। कुछ महिलाओं ने एक आध बार वहां से निकलने की भी कोशिश की, लेकिन बाहर भी उनके पास कोई और आश्रय नहीं था दो-चार दिन बाद लौट कर वापस ही आ गई थी।
        जैसे ज़िन्दगी कट रही हो बस…. बिना जीने की आरज़ू के।
   लेकिन वरुण इन बातों से अनजान था….
….. पर अब अधिक समय नही बचा था कि वो इन सारी अव्यवस्थाओं से अपरिचित रह पाता…

******

   
     देव को गए वक्त बीत चुका था। जब उसके जाने का पता चला था उस समय उसके परिवार द्वारा किये कर्मकांड में पारो की माँ और बाकी सदस्य आये और जाते वक्त पारो की माँ देव की माँ के चरणों में लोट गयी….-” गरीब की बेटी का कोई आसरा नही होता बऊ दी! पहले ही बिना बाप की थी अब माथे से पति का साया भी सरक गया। पता नही इतनी बदकिस्मत लड़की क्यों मेरे घर ही पैदा हुई। इससे तो पैदा होते ही मर जाती तो सही होता,लेकिन फिर ये बदकिस्मती कैसे देखती?
  आपके पांव पड़ती हूँ, इसका आसरा मत छीनना। यहीं कहीं किसी कोने में पड़ी रहेगी। घर की नौकरानी को भी तो दो वक्त का खाना दिया ही जाता है। उससे अधिक की अब इसे दरकार भी कहाँ रही? “

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   बोलते-बोलते जाने कितनी बार वो भरभरा के रो पड़ीं। इतने कठोर शब्द मुहँ से भी तो नही निकल पा रहे थे। कैसी मर्मान्तक पीड़ा के साथ अपनी ही बेटी के लिए नौकरानी जैसा अलंकार जोड़ना पड़ा। किस्मत लड़की से ज्यादा तो उनकी खराब थी। पहले पति का दुख सहा फिर लक्ष्मी सी बेटी का …
  … इतनी छोटी सी उम्र में ये रंगविहीन साड़ी ! ये देखने से पहले दुर्गा माँ उसे उठा लेती तो कितना अच्छा होता। कम से कम अपनी ही बेटी का ये रूप तो न देखना पड़ता।
    दिल में तो आ रहा था कि बेटी को सीने से लगाये अपने साथ ले जाये। कैसे भी कर के अपने पास रख लेगी लेकिन अभी तो वो अकेली अपनी ससुराल की गुलामी में टूट रही है फिर अपने साथ अपनी फूल सी बेटी को वैसे ही टूटते कैसे देख पाएंगी?
   दूसरी बात जब घर भर मछली भात खा रहा होगा उसकी लाड़ली को सिर्फ शाक खा कर संतोष करना पड़ेगा। पान की कितनी शौकीन थी,अब तो वो भी कहाँ खा पाएगी।
   ये सारा सब अपनी आंखों से देखना उसके लिए मृत्युतुल्य कष्ट सहने के बराबर था।
   इससे तो अपनी ससुराल में रह कर क्या कर रही क्या नही इन सब बातों से तो उन्हें फुर्सत रहेगी।
  वैसे उनके मन में एक छोटा सा लालच और भी तो था…..
   देव का छोटा भाई दर्शन पारो से एक दो साल ही तो बड़ा था। अगर पारो यहीं अपनी ससुराल में रह गयी तो हो सकता है घर वालों के मन में पारो का ब्याह दर्शन से कर देने का विचार जाग जाए। और अगर ऐसा हो गया तो इससे अच्छा पारो के लिए क्या होगा भला।
   इतने गहन दुख के बीच एक बहुत छोटी सी खुशी उनके मन को उद्भासित कर गयी ..
…..-“ऐसा क्यों कह रही हो बऊ माँ। नौकरानी सी क्यों रहेगी भला। देव के पीछे अब यही तो हमारी देव है। पारोमिता जैसी अब तक रहती आयी है वैसे ही रहेगी।”

   देव की ठाकुर माँ का स्वर उस कमरे में गूंज गया और फिर घर के किसी सदस्य की पारो को वहाँ से हटाने या निकालने की हिम्मत नही हुई।

*****

  दिन कट रहे थे सिर्फ पारो के ही नही बल्कि घर के अन्य सदस्यों के भी।
  पहले पहल किसी ने पारो से कुछ नही कहा। वो अपने कमरे में सारा सारा दिन चुपचाप पड़ी देव को याद कर ऑंसू बहाती रहती।
   कभी खिड़की पर घंटो खड़ी रह जाती। यूँ लगता जैसे उसी का इंतज़ार कर रही हो।
  उसे पता नही क्यों अंदर से यही लगता कि समय को चीरता देव उसके पास वापस चला जायेगा।
कभी अचानक ही उसका मन ये मानने से इनकार कर देता की देव नही रहा।
वो उसकी कमीज़ें धोती अपनी साड़ी के साथ सुखाती और आयरन कर अलमीरा में सजा देती। जूते भी रोज़ रोज़ साफ करती और जब देखती की पहनने वाला तो दूर दूर तक नज़र नही आ रहा तो बिलख उठती।
    अब उसका खाना उसकी सास उसकी जेठानी के हाथों उसके कमरे में ही भिजवा दिया करतीं। शायद उन्हें मन ही मन लगने लगा था कि उन सब सुहागिनों के बीच बैठ पारो अपनी रूखी थाली का निवाला कैसे ले पाएगी। लेकिन पारो की जेठानी से ये पक्षपात जाने क्यों सहन नही हुआ जा रहा था।।
  रोज़ रोज़ उसकी रूखी सूखी थाली ऊपर लेकर जाना उसके मन को मसले दे रहा था, आखिर एक दिन घर भर की औरतों की नज़र बचा कर उसने मछली के झोल भरी कटोरी पारो की थाली में रखी और दाल की कटोरी में घी भर अपने आँचल से ढाँक ऊपर ले चली।
  पारो की तो नही लेकिन उसकी खुद की सास ने देख कर उसे आधी सीढ़ियों पर ही टोक दिया। पारो उस समय छज्जे पर कपड़े सूखा रही थी। उसने भी बड़ी माँ की रुबावदार आवाज़ सुन ली और ऊपर से झांकने लगी…-” ए आनंदी! की होलो? पारो के लिए क्या माछ लेकर जा रही हो? “

आनन्दी सकपका गई। उसे नही लगा था कि उसकी चोरी ऐसे पकड़ी जाएगी। उसने बहुत धीमी आवाज़ में अपनी बात रखी…-” उसकी अभी उम्र ही क्या है माँ। इतनी छोटी सी उम्र में इतना कुछ झेल गयी , अब कम से कम ठीक से खा पी तो सके। यही तो खाने पहनने की उम्र…”

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  उसकी बात बीच में ही काट कर उसकी सास लगभग उस पर चीख पड़ी…-“अब तुम आज की लड़कियां हमें नियम बताओगी, उसकी उम्र क्या है ये हमे बताने की ज़रूरत नही है।तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है हमने। चुपचाप माछेर झोल उठा कर थाली से बाहर कर दो। “

” धीमे बोलिए मां ,वो सुन लेगी। अच्छा नही लगेगा।”

” तुम्हें नियम भंग करते हुए अच्छा लगा न तो अब मुझे कोई लेना देना नही की किसे बुरा लगेगा और किसे नही। जो सच्चाई है सो है। अगर भगवान को उस पर इतना ही तरस था दयादृष्टि थी तो उसके पति को ऐसे अकालमृत्यु नही मिलती.।

   आगे की पंक्तियों के साथ ही भावुकता में बड़ी माँ रोने लगी,क्योंकि बेटा भले ही देवरानी का था लेकिन प्रेम तो उन्हें भी उससे बहुत था। और देव की असमय मृत्यु का दुख अब पारो पर गुस्से और नाराज़गी के रूप में उतारना शुरू हो रहा था।

आनन्दी समझ गयी कि इस वक्त सास से लड़ने में कोई लाभ नही है। वो चुपचाप मछली की कटोरी हटा कर फिर थाली ऊपर ले गयी….
… धीरे से उसने पारो के कमरे के दरवाज़े को धक्का दिया,पारो पलंग पर सिर टिकाए ज़मीन पर बैठी थी।
” आओ पारो !खाना खा लो!”
 
  पारो ने ऑंसू भरी आंखों से अपनी जेठानी को देखा और फिर बाहर देखने लगी…-“मेरी प्यारी छोटी बहन कुछ तो खा लो। देखो ऐसे भूखा रहने से क्या होगा। बल्कि तुम ऐसे भूखी रहोगी तो देव बाबू की भी आत्मा तड़प उठेगी। वो कैसे सुख से रह पाएंगे भला। चलो खा लो चुपचाप। बड़ी माँ की बातों को दिल से न लगा लेना। वो सब अभी बहुत दुखी हैं। उबर नही पाएं हैं ना । तुम तो समझ सकती हो।”

पारो ने हाँ में सिर हिला दिया और नीचे देखती चुप बैठी रही।
आनन्दी को उसी वक्त नीचे से किसी ने आवाज़ दी और वो एक बार फिर पारो से खा लेने का इसरार करती बाहर चली गयी।
पारो का थाली देखने का भी जी नही किया…  उसने धीरे से थाली सरका दी जैसे थाली से नाराजगी हो कि तुम उस समय क्योँ सामने नही इठलाई जब देव बाबू साथ थे और अपने हाथो से अपनी प्रेयसी अपनी पत्नी को खिलाना चाहते थे। उस वक्त इसी थाली ने क्यों चुपके से उसके कान में  नही कहा कि खा ले पारो! फिर इतना प्रेम करने वाला जीवन में कोई नही आएगा। “

  देव के बारे में सोचते हुए वो फफक के रो पड़ी। वहीं उस गांव से कई किलोमीटर दूर मथुरा में स्वामी वरुण के सामने सेवादार थाली परोस कर रख गया, पर जाने अंदर से वरुण को कैसी बेचैनी ने घेरा की उसने उस थाली को धीरे से आगे सरका दिया…-” स्वामी ऐसा क्यों? क्या आज भोजन नही लेंगे।”

” मालूम नही केवल लेकिन आज बिल्कुल भी खाने का जी नही कर रहा। अंदर से ऐसा लग रहा जैसे हृदय में किसी बात की पीड़ा सी उबर रही है। यूँ लग रहा कोई बहुत करीबी दुख में है, अपार दुख में और मैं उसकी कोई सहायता नही कर पा रहा हूँ। अब बस कृष्ण से यही प्रार्थना है कि वो जो कोई भी है उसे जल्दी से जल्दी मुझसे मिलवा दे, जिससे अपने मन की इस बेचैनी से छुटकारा पा सकूं।”

  वरुण क्या जानता था कि उसके कॄष्ण उसके प्रिय को उससे मिलवाने की भूमिका बांध ही चुके हैं…..

क्रमशः

aparna…..
  


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तेरे रंग

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मैं धूप सी निखरी तुझमे फिर
और शाम सी ही ढल जाऊंगी
तू मुझे बना ले बाँसूरी
कान्हा तेरे रंग, रंग जाऊंगी।।।

तेरी अंखियों से जग देख लिया
अब नही कहीं कुछ भाता है
तू एक कदम भी बढ़ा ले तो
तेरे पीछे पीछे आऊंगी।।

मैं जानू ये जग तेरा है
हर छल कपट पर मेरा है
तेरी तान मधुरतम मुझे लगे
तेरे स्वरों मे मैं लहराऊँगी।।

तेरे आंसू से मन भीग गया
तेरे सपनों में दिन बीत गया
बस मेरा नही तू सब का है
कैसे तुझे सबसे छिपाऊँगी।।

तू मुझे बना ले बाँसूरी,कान्हा तेरे रंग रंग जाऊंगी।।

aparna ….

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