वापसी ….

समय के चक्र को घुमा कर रख देने वाली एक प्रेम कहानी…

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वो कितना कुछ कर रहा था खुद को संभालने के लिए। ऐसा लगने लगा था उसने यामिनी को नही अपने जीवन को खो दिया है। यामिनी की कही हर बात, उसकी मुस्कान, उसकी आंखें कुछ भी तो भुला नही पा रहा था। जब सब कुछ सही था तो यामिनी ऐसे उसे छोड़ क्यों चली गयी। वो खुद को ही मनाता समझाता रहता कि वो एक दिन वापस आएगी। ज़रूर आएगी।

हर वो जगह जहां वो यामिनी के साथ एक बार भी गया था छान आया। यामिनी का कोई दोस्त और सहेली नही बचे थे जिनसे उसने उसके बारे में पूछताछ न कि हो। यामिनी से जुड़ी हर चीज़ को उसने गले से लगा कर सम्भाल रखा था। पहले पहल लोग उस पर तरस खाते थे, उसे समझाने की कोशिश करते थे, लेकिन अब लोगों ने उससे और उसके पागलपन से कन्नी काटना शुरू कर दिया था।

वजह !!! वजह यही थी कि लोग अब उसे समझा कर थक चुके थे कि रागिनी मर चुकी है। उसका प्लेन 35000 फीट की ऊंचाई पर क्रैश हो चुका है। उसके अस्थि पंजर भी किसी को नसीब नही हो सकते….

लेकिन वो लोगों की कही बातों में भी उसे ढूंढ ही लेता था। और ऐसे ही एक दिन किसी की इस बात को की मरे हुए लोग वापस नही आते, उनसे मिलने के लिए खुद मरना पड़ता है , पूरा करने वो भी शहर की सबसे ऊंची पहाड़ी पर नीचे छलांग लगा कर मरने ही तो खड़ा था, कि किसी के कोमल हाथों ने उसे अपनी तरफ खींच लिया था।

वो भोर थी!! मानवविज्ञान की विद्यार्थी। जो जाने कब से उसके मोहपाश में बंधी खुद को ही भूल बैठी थी। और फिर उसने उसे बाहों में समेट लिया। जिस प्यार की तलाश में वो अपनी ज़िंदगी भूल बैठा था उसी ज़िन्दगी से उसे प्यार करना सीखा दिया भोर ने।

उसकी जिंदगी ने जैसे दूसरी करवट ले ली थी। भोर के साथ ने उसके जीवन में मधुमास वापस ला दिया था। अब उसके भी दिन रात चाशनी में भीगे बीतने लगे थे। दोनों ने शादी कर ली थी, और फिर भोर ने उसे उसकी जिंदगी का सबसे सुंदर तोहफा दिया था… उसका अपना बेटा।

ज़िन्दगी ऐसी खुशगवार भी हो सकती है, उसने नही सोचा था। देखते ही देखते तीस साल बीत चुके थे। आज वो खुद पचपन बरस की उम्र में अपने आप को कितना खुश और संतुष्ट पाता था और इसका एकमात्र कारण थी भोर। भोर वाकई उसके जीवन में सवेरा लेकर आई थी। अपने नाम के जैसे ही सुंदर, हालांकि अब तो उसके चेहरे पर भी उम्र के निशान नज़र आने लगे थे। माथे पर कुछ समय की लकीरें खींच गयीं थी और कनपटी और मांग पर के बालो में चांदी झलकने लगी थी, ये और बात थी कि वो हर पंद्रह दिन में बड़े करीने से अपने बालों को डार्क ब्राउन शेड्स से रंग लेती थी। पर कमर पर की परिधि, पेट के आसपास का बढ़ता वृत्ताकार घेरा उसे भी बावन का न सहीं अड़तालीस का तो दिखाने ही लगा था।

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आईने के सामने खड़े वो खुद भी तो अपनी कनपटी पर की सफेदी देख मुस्कुरा उठता था, और बालों की स्टाइल बदल बदल कर उन्हें छिपाने की असफल कोशिश में लग खुद ही ठठा कर हँस पड़ता था। आज भी इसी कोशिश में था कि दरवाज़े पर घंटी बजी। घंटी सुनते ही उसके चेहरे पर लंबी सी मुस्कान खेल गयी थी। आज ही उसके बेटे का पच्चीसवाँ जन्मदिन था, और आज ही उसे एक नई कंपनी में जॉइन करना था। वो ही घर वापस आया होगा ये सोच कर दिनकर दरवाज़ा खोलने आगे बढ़ गया।

दरवाज़ा खुला लेकिन सामने उसका बेटा नही यामिनी खड़ी थी। यामिनी !!! वही यामिनी, जिसके लिए वो कभी पागल हो चुका था। वही यामिनी जिसके लिए वो खुद को मारने जा रहा था। लेकिन ये तो सचमुच वही यामिनी थी। वही आज से तीस साल पहले वाली यामिनी। सिर्फ बाइस साल की यामिनी। पर ऐसा कैसे संभव है? गुलाबी टॉप और ब्ल्यू डेनिम में सीधे सतर बालों को दोनो तरफ के कंधों पर सामने रखे खड़ी वो वैसे ही मुस्कुरा रही थी जैसे उस दिन जब वो उसे प्लेन में बैठाने गया था…..

क्या ये सम्भव था ? या यामिनी किसी तूतनखामेन की ममी में अब तक सोई पड़ी थी जो जस की तस वापस लौट आयी थी।

मेरे प्यारे पाठकों , ये रही मेरी नई कहानी की छोटी सी झलक। ये कहानी भी मेरी बाकी कहानियों की तरह प्रेम कहानी ही होगी लेकिन बहुत सारे रहस्य और रोमांच से भरी इस कहानी का अंत कुछ अलग हट के होगा।

ये कहानी नवंबर में दीवाली के बाद शुरू होगी। और इसके भाग रोज़ आएंगे। एक और बात ये कहानी एक्सक्लुसिवली सिर्फ और सिर्फ मेरे ब्लॉग पर ही आएगी।

मुझे पढ़ने और सराहने के लिए आप सभी का दिल से शुक्रिया….

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Once in a blue moon!!!

Once in a blue moon – रिश्ता.कॉम

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    डिनर की प्लेट इन्हें थमा कर मैं वापस रसोई की ओर मुड़ गयी, रसोई साफ़ करने और बरतन धोने।।…..
 
     हम औरतें काम भी सारा ऐसे करती हैं जैसे कोई जंग लड़ रही हों, हाथ काम निपटाते हैं और दिमाग में युद्ध चलता रहता है, कभी सामने वाली पड़ोसन की लाल लपटें मारती नयी साड़ी, कभी सास बहू का ना देख पाया सिरियल, कभी सखी सहेलियों का फॉरेन ट्रिप तो कभी किसी खास मौके पर मायके ना जाने पाने की पीड़ा….

    लेकिन अभी तो वक्त ऐसा चल रहा कि हर औरत के दिमाग में एक ही शमशीर लहरा रही है__ हे प्रभु और कितना काम करवाओगे?? कब खुलेगा लॉकडाऊन? कब दर्शन देगी वो जिसे देखने की राह तकते तकते आंखें पथराने लगी हैं।। इतना ढ़ेर सारा काम तो अपनी आज तक की जिंदगी में कुल जमा नही किया होगा जितना इन एक महिने में कर लिया, भगवान जाने ये कोरोना हम औरतों से किस जनम का बदला ले रहा है??

    यही सब सोचते हुए मैं भी काम में लगी रहती हूँ, लेकिन इसके साथ ही पतिदेव को आराम से सोफे पर पैर पसारे हाथ में थामे रिमोट के साथ मटरगश्ती करते देख अन्दर से सुलग जाती हूँ __ इन्हीं का जीवन सही है, कोई फेर बदल नही हुआ, उल्टा वर्क फ्रॉम होम के नाम पर जल्दी उठने और भागादौड़ी से राहत मिल गयी, कोई मदद नही करेंगे बस सोफे पर लेटे लेटे ऑर्डर पास करतें जायेंगे__” मैडम समोसे खाये बहुत दिन हो गये ना? तुम बनाती भी अच्छा हो, आज शाम ट्राई कर लो फिर!!

  कभी कहेंगे __” सुनो इतना बड़ा सा तरबूज़ ले आया हूँ, सड़ा कर फेंक मत देना, ना खा पाओ तो सुबह शाम मुझे जूस बना कर दे देना”

   अब झाड़ू पोन्छा बरतन कपड़े से कुछ राहत मिले तब तो कोई एक्स्ट्रा काम करे, उस पर इनकी फ़रमाइशें…..

बेचारे फ़रमाइश एक दिन करतें हैं और उसे पूरी कर मैं सात दिन तक उसको पूरा करने की पीड़ा में सुलगती हूँ …..

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  ऐसी ही किसी बिल्कुल ही फ़िज़ूल सी इनकी इच्छा पर मेरे दिल दिमाग में द्वंद चल रहा था और मैं समेट कर सारे धोने लायक बरतन सिंक में जमा कर चुकी थी कि  साहब अपनी प्लेट थामे रसोई में चले आये__ “पनीर पसन्दा बनाने में तुम्हारा कोई जवाब नही, बहुत यमी था, अरे इतने बरतन , लाओ आज मैं साफ़ कर देता हूँ “

   पहला तो खाने की तारीफ कर दी और दूजा मेरे हाथ से धोने के लिये थामी कटोरी छीन ली…..

   ” जाओ जाओ तुम भी खाना खा लो, मैं ये सब निपटाता हूँ ।”

   हाय कहाँ संभालू इतना प्यार……. मैंने प्यार भरे गुस्से से इन्हें देखा और कटोरी वापस ले ली__

  ” आप भी ना!!! जाओ आप न्यूज़ देखो मैं ये ज़रा से तो बरतन हैं , निपटा कर आती हूँ “
   एक तरह से धकिया कर मैने इन्हें रसोई से बाहर कर दिया….. ये काउच पे मैं रसोई में , कुछ देर पहले दिमाग में जो ज्वालामुखी फटने को तैयार था वहाँ मनभावन सावन की बूंदे बरस कर उसे शांत कर चुकी थी, अपने मोबाईल पर अपने पसंदीदा गानों को सेट कर मैंने चलाया और मुस्कुराते हुए काम पर लगा गयी__

   ” मेरे यारा तेरे सदके इश्क सीखा,
         मैं तो आई जग तज के इश्क सीखा,
               जब यार करे परवाह मेरी…..”

  मधुर रोमांटिक गानों के साथ बरतन धोने का मज़ा ही अलग है, बरतन धो कर पोंछ कर करीने से जमा कर , सारा सब कुछ यथावत कर अपनी चमकीली रसोई की नज़र उतार ली।

       चेहरे पर एक मुस्कान चली आयी, काम कुछ किया नही बस मुझे रिझा कर सब करवा लिया…… साहब भी ना पक्के मैनेजर हैं , इन्हें अच्छे से पता है किस लेबर से कब और कैसे काम  निकलवाना है , अब प्राईवेट सेक्टर के बंदे लेबर से कम तो होते नही और उनके सर पर बैठे मैनेजर ठेकेदार!! खैर …..

मैंने  अपनी प्लेट लगाने के लिये केसरोल खोला कि देखा रोटी तो है ही नही__उस समय ये सोच कर नही सेंकी थी कि काम निपटा कर गरमा गरम फुल्के सेंक लूंगी, पर अब मन खट्टा सा हो रहा था, एक ही तो रोटी खानी है , सेंकू या रहने दूँ, दूध ही पीकर सो जाऊंगी…..दिमाग का ज्वालामुखी वापस प्रस्फ़ुटित होने जा ही रहा था कि साहब वापस रसोई में चले आये__
      ”  लाओ ये बेलन दो मेरे हाथ में ” मैं इनकी बात समझ पाती कि तब तक ये मेरे हाथों से बेलन ले चुके थे….

” अब तुम जाओ मैडम!! जाकर सोफे पर आराम फर्माओ, मैं तुम्हारी थाली परोस कर लाता हूँ ।”
    मेरे कुछ कहने से पहले एक तरह से जबर्दस्ती धकिया के इन्होंने मुझे अपने आसन पर बैठा दिया और खुद गुनगुनाते हुए रसोई की ओर चल पड़े

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  ” रोज़ तो तुम्हारा खाना ठंडा हो जाता है, आज मेरे हाथ से गरमा गरम फुल्के खा ही लो।”

  ” पर सुनो एक ही बनाना!!”

  ” क्यों?? आज के लिये ये कैलरी काउंटींग छोड़ो, एक की जगह तीन रोटियाँ ना खा ली तो मेरा नाम बदल देना।”

   कुछ इनकी रसीली बातें और कुछ गरम स्वाद भरा खाना , मैं सच थोड़ा ज्यादा ही खा गयी, चेहरे पर बिल्कुल वही संतुष्टी थी जो दिन भर थक हार के काम से लौटे मजदूर के हाथ में रोटी होने से होती है…..

    पर दिल के आगे एक दिमाग भी है, जिसने तुरंत सोचना शुरु कर दिया था, पर उसी समय मैंने मन ही मन एक छोटी सी कसम ले ली कि ऐसी शानदार थाली परोसने के बदले में पतिदेव ने किचन स्लैब और गैस चूल्हे का जो सत्यानाश किया होगा चुपचाप बिना किसी हील हुज्जत के झेल लूंगी, एक बार फिर सफाई कर लूंगी लेकिन इनके इतने ढ़ेर सारे प्यार के बदले कोई ज़हर नही उगलूंगी…..
     अपनी कसम मन ही मन दुहराती प्लेट रखने रसोई में आयी की मेरी आंखे फटी की फटी रह गईं…….

…..ये क्या मेरे स्वामी तो लिक्विड सोप स्प्रे कर कर के स्लैब को रगड़ रगड़ कर साफ़ कर चुके थे, सारा काम समेट कर गुनगुनाते हुए वो हाथ धो रहे थे, पूरे 20 सैकेण्ड से और मैं उन्हें देखती सोच रहीं थी__

   हाय मैं वारी जांवा , शायद इसे ही कहतें हैं once in a blue moon……….

aparna…..

समिधा-27

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   समिधा- 27

    केदारनाथ त्रासदी को घटे सात महीने बीत चुके थे। जिन्होंने अपने अपनों को खोया था वो उस त्रासदी को इन सात महीनों में भी नही भूल पा रहे थे, यही हाल उनका भी था जिनके अपने इस त्रासदी से वापस लौट चुके थे।

        वरुण मंदिर ट्रस्ट में स्थायी सदस्यता पा चुका था। उसके माता पिता ने भी इस बार न उसे रोका न टोका,और सहर्ष सहमति दे दी। कादम्बरी के परिवार ने ज़रूर कुछ टोकाटाकी करने की कोशिश की लेकिन वरुण का परिवार वरुण के सामने दीवार बन खड़ा रहा, फिर अपना सा मुहँ लेकर उन्हें भी लौटना ही पड़ा।
    कोलकाता के मंदिर में दो महीने बिताने के बाद वरुण और दो चार अन्य सेवादारों को मथुरा राधाकृष्ण मंदिर भेज दिया गया था।

    मंदिर में सुबह सवेरे उठ कर सारे मंदिर परिसर में झाड़ू लगाने के बाद पानी का छिड़काव कर वरुण अपने दो साथी सेवादारों के साथ पोंछा लगाया करता।
     मंदिर की ही पुष्पवाटिका से चुन चुन कर लाये फूलों की फिर सारे लोग मिल कर लंबी सी माला गूंथते और द्वारिकाधीश का श्रृंगार होता।
      दोपहर बाद सभी एक साथ बैठे भजन गाया करते।
   इस सब के साथ ही सुबह और शाम का समय वेदाध्ययन के लिए भी निश्चित था।
   वरुण को ये सारे कार्य प्रिय थे। वह इन सभी कार्यों को करते हुए अपने मन को शांत रखने का पूरा प्रयास करता और उसे इन कुछ महीनों में इन कार्यों में एक सुख मिलने लगा था एक शांति मिलने लगी थी ऐसा लगने लगा था कि वह अपने कृष्ण के आसपास है और कृष्ण सिर्फ उसके ही नहीं हर किसी के आसपास हैं। और इसीलिए धीरे-धीरे वरुण की श्रद्धा इस बात पर बढ़ने लग गई थी कि जो जिसके साथ होता है वह सब कृष्ण का रचा रचाया है और इसीलिए उससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता ।
  वरुण की यही सोच उसे धीरे-धीरे शांति की तरफ ले जा रही थी, लेकिन बीच-बीच में कभी अचानक एक चेहरा उसकी खुली आंखों में झांकने चला आता। जैसे पूछ रहा हो…-” मेरा क्या कसूर था जो तुम्हारे कृष्ण ने मुझे ऐसी सजा दी ?” ऐसे समय में वरुण अपने विचारों को झटक कर कोई ना कोई किताब खोल कर पढ़ने बैठ जाया करता। लेकिन इन सारी व्यस्तताओं के बाद भी बार बार एक जोड़ी पनीली आंखें उसका पीछा करती सी लगती जैसे कह रहीं हो “वापस आ जाओ!”  उसे अक्सर यूँ लगता कि वो मन से यही सब करना चाहता तो है पर उसकी आत्मा इस सब में शामिल ही नही होना चाहती। 
सुबह और शाम के समय के अतिरिक्त रात में भी जब उसे समय मिलता वह मंदिर परिसर के कोने में बैठ अपनी किताब को पढ़ने में डूब जाया करता। वेदों का अध्ययन करते करते धीरे-धीरे उसे हिंदू धर्म की जटिलताएं समझ में आने लगी थी।
   आज तक जिन रीति-रिवाजों को मानने के लिए वह अपनी मां का मजाक उड़ाया करता था और रीति-रिवाजों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को देख पढ़ कर समझ कर उसके ज्ञान चक्षु भी खुलने लगे थे।
    मंदिर का पूरा कार्य एक ट्रस्ट के अधीन था वह ट्रस्ट पूरे भारतवर्ष ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कृष्ण मंदिर की स्थापना कर चुका था। मंदिरों में होने वाले आय-व्यय के साथ ही दानदाताओं को अधिक से अधिक दान के लिए प्रेरित करने के लिए भी मंदिर ट्रस्ट को पढ़े लिखे शिक्षित वर्ग की आवश्यकता थी और अगर वरुण जैसे युवा इस कार्य में उनका सहयोग करें तो मंदिर ट्रस्ट को लाभ ही लाभ था इसलिए वरुण की तरफ मठाधीशों का कुछ अधिक ही झुकाव था।

   मंदिर में अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग पद सृजित बहुत से सेवादार ऐसे थे जो स्वेच्छा से जीवन पर्यंत सिर्फ सेवादार ही बने रह जाते थे।लेकिन कुछ उनमें से ऐसे भी थे जो सेवादार से ऊपर के कुछ 1 पदों तक जाकर रुक जाए करते थे। लेकिन वरुण जैसे उच्च शिक्षित युवाओं को मंदिर ट्रस्ट द्वारा सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ाते हुए मंदिर के मठाधीश तक के पद तक पहुंचाए जाने की व्यवस्था थी। वैसे मंदिर में जाति धर्म या गरीबी अमीरी के नाम पर किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं था। सभी के लिए समान कार्य बांटे गए थे , और सभी को अपने हिस्से के कार्य करने ही होते थे। अंतर बस इतना होता था कि शिक्षित लोग जो विद्या अध्ययन करने में सक्षम थे उन्हें वेदों का अध्ययन करवा कर उनसे प्रवचन आदि दिलवाए जाने की व्यवस्था की जाती थी।
     पिछले कुछ समय में ही वरुण ने बहुत सारी किताबों का अध्ययन कर लिया था और जैसे-जैसे अध्ययन करता जा रहा था उसका दिमाग भी विस्तृत होता जा रहा था।
       मंदिर परिसर हर किसी के लिए खुला था लोग दर्शनों के लिए आते मंदिर में चढ़ावा चढ़ाते, और चले जाते। सब के जाने के बाद हफ्ते में एक दिन चढ़े हुए सारे चढ़ाव की गणना की जाती और उसके बाद उस धनराशि को मंदिर ट्रस्ट के पास भेज दिया जाता।
    ट्रस्ट से हर महीने एक निश्चित धनराशि मंदिर में रहने वालों के खाने पीने आदि के लिए भेज दी जाती। इन सब का हिसाब योगेंद्र जी रखा करते थे।

   मंदिर परिसर बहुत विशाल था। चारों तरफ फैली वृहत वाटिका के बीचो बीच स्थापित मंदिर में पीछे तरफ कमरे बने हुए थे जहां सेवादार और बाकी के मंदिर कर्मचारी रहा करते थे।
      उसी परिसर में एक और हटकर विधवा आश्रम बना हुआ था जहां वृद्ध युवा और बाल विधवाये रहा करती थी। आश्रम के कर्मचारियों तथा अन्य लोगों के लिए भोजन पकाने बर्तन साफ करने आदि की जिम्मेदारी इन्हीं महिलाओं की थी । महिलाओं की संख्या कम अधिक होती रहती थी। वैसे तो एक बार जिस महिला को उसके घर वाले इस आश्रम में छोड़ जाते उसका वापस अपने घर लौट पाना असंभव ही था। इसलिए अधिकतर समय उस आश्रम में महिलाओं की संख्या में वृद्धि ही हुआ करती थी, संख्या में कमी तभी आती थी जब उनमें से कोई देवलोक को चली जाया करती थी।
     उनका जीवन कठिन नहीं कठिनतम था। क्योंकि उनके जीवन में वेद अध्ययन को स्थान नहीं दिया गया था। उनमें से अधिकतर वृद्ध महिलाएं अपने आपको कृष्ण समर्पित कर चुकी थी । इसलिए उनका मन सिर्फ कृष्ण को समर्पित लोगों की सेवा से ही प्रसन्न हो जाता था। लेकिन कुछ युवा और बाल विधाएं भी थी जिन्हें अच्छा खाने और अच्छा पहनने का शौक हुआ करता था। लेकिन उस स्थान में जहां उन्हें पर्याप्त आहार भी ना मिल पाता हो,उनके शौक कौन पूछता और कौन पूरे करता?

    वह औरतें एक रटी रटाई दिनचर्या का पालन करती हुई बस जीवन जीती चली जा रही थी! जिसका ना कोई आदि था ना अंत। बहुत बार ऐसा लगता जैसे वह वहां रहते हुए बस अपनी सांसें गिन रही हैं, कि किस तरह उनकी सांसो की अवधि पूरी हो और वह स्वयं कृष्ण के लोक पहुंच जाएं। कुछ महिलाओं ने एक आध बार वहां से निकलने की भी कोशिश की, लेकिन बाहर भी उनके पास कोई और आश्रय नहीं था दो-चार दिन बाद लौट कर वापस ही आ गई थी।
        जैसे ज़िन्दगी कट रही हो बस…. बिना जीने की आरज़ू के।
   लेकिन वरुण इन बातों से अनजान था….
….. पर अब अधिक समय नही बचा था कि वो इन सारी अव्यवस्थाओं से अपरिचित रह पाता…

******

   
     देव को गए वक्त बीत चुका था। जब उसके जाने का पता चला था उस समय उसके परिवार द्वारा किये कर्मकांड में पारो की माँ और बाकी सदस्य आये और जाते वक्त पारो की माँ देव की माँ के चरणों में लोट गयी….-” गरीब की बेटी का कोई आसरा नही होता बऊ दी! पहले ही बिना बाप की थी अब माथे से पति का साया भी सरक गया। पता नही इतनी बदकिस्मत लड़की क्यों मेरे घर ही पैदा हुई। इससे तो पैदा होते ही मर जाती तो सही होता,लेकिन फिर ये बदकिस्मती कैसे देखती?
  आपके पांव पड़ती हूँ, इसका आसरा मत छीनना। यहीं कहीं किसी कोने में पड़ी रहेगी। घर की नौकरानी को भी तो दो वक्त का खाना दिया ही जाता है। उससे अधिक की अब इसे दरकार भी कहाँ रही? “

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   बोलते-बोलते जाने कितनी बार वो भरभरा के रो पड़ीं। इतने कठोर शब्द मुहँ से भी तो नही निकल पा रहे थे। कैसी मर्मान्तक पीड़ा के साथ अपनी ही बेटी के लिए नौकरानी जैसा अलंकार जोड़ना पड़ा। किस्मत लड़की से ज्यादा तो उनकी खराब थी। पहले पति का दुख सहा फिर लक्ष्मी सी बेटी का …
  … इतनी छोटी सी उम्र में ये रंगविहीन साड़ी ! ये देखने से पहले दुर्गा माँ उसे उठा लेती तो कितना अच्छा होता। कम से कम अपनी ही बेटी का ये रूप तो न देखना पड़ता।
    दिल में तो आ रहा था कि बेटी को सीने से लगाये अपने साथ ले जाये। कैसे भी कर के अपने पास रख लेगी लेकिन अभी तो वो अकेली अपनी ससुराल की गुलामी में टूट रही है फिर अपने साथ अपनी फूल सी बेटी को वैसे ही टूटते कैसे देख पाएंगी?
   दूसरी बात जब घर भर मछली भात खा रहा होगा उसकी लाड़ली को सिर्फ शाक खा कर संतोष करना पड़ेगा। पान की कितनी शौकीन थी,अब तो वो भी कहाँ खा पाएगी।
   ये सारा सब अपनी आंखों से देखना उसके लिए मृत्युतुल्य कष्ट सहने के बराबर था।
   इससे तो अपनी ससुराल में रह कर क्या कर रही क्या नही इन सब बातों से तो उन्हें फुर्सत रहेगी।
  वैसे उनके मन में एक छोटा सा लालच और भी तो था…..
   देव का छोटा भाई दर्शन पारो से एक दो साल ही तो बड़ा था। अगर पारो यहीं अपनी ससुराल में रह गयी तो हो सकता है घर वालों के मन में पारो का ब्याह दर्शन से कर देने का विचार जाग जाए। और अगर ऐसा हो गया तो इससे अच्छा पारो के लिए क्या होगा भला।
   इतने गहन दुख के बीच एक बहुत छोटी सी खुशी उनके मन को उद्भासित कर गयी ..
…..-“ऐसा क्यों कह रही हो बऊ माँ। नौकरानी सी क्यों रहेगी भला। देव के पीछे अब यही तो हमारी देव है। पारोमिता जैसी अब तक रहती आयी है वैसे ही रहेगी।”

   देव की ठाकुर माँ का स्वर उस कमरे में गूंज गया और फिर घर के किसी सदस्य की पारो को वहाँ से हटाने या निकालने की हिम्मत नही हुई।

*****

  दिन कट रहे थे सिर्फ पारो के ही नही बल्कि घर के अन्य सदस्यों के भी।
  पहले पहल किसी ने पारो से कुछ नही कहा। वो अपने कमरे में सारा सारा दिन चुपचाप पड़ी देव को याद कर ऑंसू बहाती रहती।
   कभी खिड़की पर घंटो खड़ी रह जाती। यूँ लगता जैसे उसी का इंतज़ार कर रही हो।
  उसे पता नही क्यों अंदर से यही लगता कि समय को चीरता देव उसके पास वापस चला जायेगा।
कभी अचानक ही उसका मन ये मानने से इनकार कर देता की देव नही रहा।
वो उसकी कमीज़ें धोती अपनी साड़ी के साथ सुखाती और आयरन कर अलमीरा में सजा देती। जूते भी रोज़ रोज़ साफ करती और जब देखती की पहनने वाला तो दूर दूर तक नज़र नही आ रहा तो बिलख उठती।
    अब उसका खाना उसकी सास उसकी जेठानी के हाथों उसके कमरे में ही भिजवा दिया करतीं। शायद उन्हें मन ही मन लगने लगा था कि उन सब सुहागिनों के बीच बैठ पारो अपनी रूखी थाली का निवाला कैसे ले पाएगी। लेकिन पारो की जेठानी से ये पक्षपात जाने क्यों सहन नही हुआ जा रहा था।।
  रोज़ रोज़ उसकी रूखी सूखी थाली ऊपर लेकर जाना उसके मन को मसले दे रहा था, आखिर एक दिन घर भर की औरतों की नज़र बचा कर उसने मछली के झोल भरी कटोरी पारो की थाली में रखी और दाल की कटोरी में घी भर अपने आँचल से ढाँक ऊपर ले चली।
  पारो की तो नही लेकिन उसकी खुद की सास ने देख कर उसे आधी सीढ़ियों पर ही टोक दिया। पारो उस समय छज्जे पर कपड़े सूखा रही थी। उसने भी बड़ी माँ की रुबावदार आवाज़ सुन ली और ऊपर से झांकने लगी…-” ए आनंदी! की होलो? पारो के लिए क्या माछ लेकर जा रही हो? “

आनन्दी सकपका गई। उसे नही लगा था कि उसकी चोरी ऐसे पकड़ी जाएगी। उसने बहुत धीमी आवाज़ में अपनी बात रखी…-” उसकी अभी उम्र ही क्या है माँ। इतनी छोटी सी उम्र में इतना कुछ झेल गयी , अब कम से कम ठीक से खा पी तो सके। यही तो खाने पहनने की उम्र…”

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  उसकी बात बीच में ही काट कर उसकी सास लगभग उस पर चीख पड़ी…-“अब तुम आज की लड़कियां हमें नियम बताओगी, उसकी उम्र क्या है ये हमे बताने की ज़रूरत नही है।तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है हमने। चुपचाप माछेर झोल उठा कर थाली से बाहर कर दो। “

” धीमे बोलिए मां ,वो सुन लेगी। अच्छा नही लगेगा।”

” तुम्हें नियम भंग करते हुए अच्छा लगा न तो अब मुझे कोई लेना देना नही की किसे बुरा लगेगा और किसे नही। जो सच्चाई है सो है। अगर भगवान को उस पर इतना ही तरस था दयादृष्टि थी तो उसके पति को ऐसे अकालमृत्यु नही मिलती.।

   आगे की पंक्तियों के साथ ही भावुकता में बड़ी माँ रोने लगी,क्योंकि बेटा भले ही देवरानी का था लेकिन प्रेम तो उन्हें भी उससे बहुत था। और देव की असमय मृत्यु का दुख अब पारो पर गुस्से और नाराज़गी के रूप में उतारना शुरू हो रहा था।

आनन्दी समझ गयी कि इस वक्त सास से लड़ने में कोई लाभ नही है। वो चुपचाप मछली की कटोरी हटा कर फिर थाली ऊपर ले गयी….
… धीरे से उसने पारो के कमरे के दरवाज़े को धक्का दिया,पारो पलंग पर सिर टिकाए ज़मीन पर बैठी थी।
” आओ पारो !खाना खा लो!”
 
  पारो ने ऑंसू भरी आंखों से अपनी जेठानी को देखा और फिर बाहर देखने लगी…-“मेरी प्यारी छोटी बहन कुछ तो खा लो। देखो ऐसे भूखा रहने से क्या होगा। बल्कि तुम ऐसे भूखी रहोगी तो देव बाबू की भी आत्मा तड़प उठेगी। वो कैसे सुख से रह पाएंगे भला। चलो खा लो चुपचाप। बड़ी माँ की बातों को दिल से न लगा लेना। वो सब अभी बहुत दुखी हैं। उबर नही पाएं हैं ना । तुम तो समझ सकती हो।”

पारो ने हाँ में सिर हिला दिया और नीचे देखती चुप बैठी रही।
आनन्दी को उसी वक्त नीचे से किसी ने आवाज़ दी और वो एक बार फिर पारो से खा लेने का इसरार करती बाहर चली गयी।
पारो का थाली देखने का भी जी नही किया…  उसने धीरे से थाली सरका दी जैसे थाली से नाराजगी हो कि तुम उस समय क्योँ सामने नही इठलाई जब देव बाबू साथ थे और अपने हाथो से अपनी प्रेयसी अपनी पत्नी को खिलाना चाहते थे। उस वक्त इसी थाली ने क्यों चुपके से उसके कान में  नही कहा कि खा ले पारो! फिर इतना प्रेम करने वाला जीवन में कोई नही आएगा। “

  देव के बारे में सोचते हुए वो फफक के रो पड़ी। वहीं उस गांव से कई किलोमीटर दूर मथुरा में स्वामी वरुण के सामने सेवादार थाली परोस कर रख गया, पर जाने अंदर से वरुण को कैसी बेचैनी ने घेरा की उसने उस थाली को धीरे से आगे सरका दिया…-” स्वामी ऐसा क्यों? क्या आज भोजन नही लेंगे।”

” मालूम नही केवल लेकिन आज बिल्कुल भी खाने का जी नही कर रहा। अंदर से ऐसा लग रहा जैसे हृदय में किसी बात की पीड़ा सी उबर रही है। यूँ लग रहा कोई बहुत करीबी दुख में है, अपार दुख में और मैं उसकी कोई सहायता नही कर पा रहा हूँ। अब बस कृष्ण से यही प्रार्थना है कि वो जो कोई भी है उसे जल्दी से जल्दी मुझसे मिलवा दे, जिससे अपने मन की इस बेचैनी से छुटकारा पा सकूं।”

  वरुण क्या जानता था कि उसके कॄष्ण उसके प्रिय को उससे मिलवाने की भूमिका बांध ही चुके हैं…..

क्रमशः

aparna…..
  


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जब तुम बूढ़े हो जाओगे…..

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मैं बन जाऊंगी फिर मरहम
वक्त के ज़ख्मों पर तेरे और
मुझे देख हौले हौले से
फिर तुम थोडा शरमाओगे।
जब तुम बूढे हो जाओगे।।

सुबह सवेरे ऐनक ढूंड
कानों पे मै खुद ही दूंगी ,
अखबारों से झांक लगा के
तुम धीरे से मुस्काओगे।
जब तुम बूढे हो जाओगे ।।

दवा का डिब्बा तुमसे पहले
मै तुम तक पहुँचा जाऊंगी,
मुझे देख फिर तुम खुद पे
पहले से ही इतरा जाओगे।
जब तुम बूढे हो जाओगे।।

सुनो नही बदलेगा कुछ भी
हम भी नही और प्रीत नही
हम तुम संग चलेंगे  ऐसे
की तुम फिर लहरा जाओगे
जब तुम बुढे हो जाओगे।।

मैं तो ऐसी थी,ऐसी हूँ ,
ऐसी ही मैं रह जाऊँगी,
मेरे मन के बचपने से
तुम भी संग इठला जाओगे
जब तुम बूढ़े हो जाओगे।।

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मुझसी मिली है तुमको जग मे,
सोच के खुश हो रहना तुम,
फिर अपनी किस्मत पे खुद ही
धीरे धीरे इतराओगे
जब तुम बूढ़े हो जाओगे।।

aparna …….

फ़िल्म समीक्षा- माचिस

movie review

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पानी पानी रे

   सुबह सुबह खिड़की पर खड़ी थी कि एक गीत फ़िल्म माचिस का सुनाई पड़ा, और पानी पानी रे याद दिला गया।
    गीत गुलज़ार साहब ने लिखा है और विशाल भारद्वाज के संगीत को लता जी ने इस कदर खूबसूरती से गाया है कि सुनते वक्त ये गीत आपको एक अलग ही रूहानी दुनिया में ले जाता है।

     स्कूल में थे बहुत छोटे तब ये मूवी आयी थी और मैंने देखी भी थी लेकिन सच कहूं तो समझ में नही आई थी, बिल्कुल भी नही।
    बहुत बाद में कभी आधी अधूरी सी देखी तो जो सार समझ आया वो ये की आज का हो या बीते समय का युवा हमेशा माचिस की तीली सा होता है जो एक चिंगारी से ही सुलग उठता है।

    एक आम आदमी कृपाल के आतंकवादी बनने की कहानी है माचिस।
     उसके गांव में किसी सासंद को मारने की असफल कोशिश कर भागे जिमी को ढूंढने आयी पुलिस को जसवंत सिंह( राज जुत्शी) का मज़ाक में अपने कुत्ते जिमी से मिलवाना इतना अखर जाता है कि वो उसे अपने साथ थाने ले जाते हैं और 15 दिन बाद मार पीट के वापस छोड़ देते हैं। उसकी हालत से दुखी और नाराज़ उसका दोस्त कृपाल जब किसी सरकारी महकमे से मदद नही पाता तब अपने चचेरे भाई जीत जो किसी आतंकवादी संगठन का हिस्सा है की तलाश में निकल जाता है और सनाथन ( ओम पुरी ) से टकरा जाता है, यहां से उसका सफर शुरू होता है। सनाथन उसे कमांडर से मिलवाता है जहाँ कृपाल की कहानी सुनने के बाद कमांडर उसे खुद अपना बदला लेने की सलाह देता है।

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    उस संगठन को परिवार मान कृपाल ट्रेनिंग लेने के बाद भरे बाज़ार में खुराना ( पुलिस वाले) पर गोली चला देता है।
   अगली कार्ययोजना के लिए जिस मिसाइल लॉन्चर का इंतज़ार किया जा रहा होता है वो होती है वीरा( तब्बू)
    वीरा कृपाल की मंगेतर और जसवंत की बहन होती है।
     कृपाल से मिलने पर बताती है कि पुलिस वाले खुराना को कृपाल के द्वारा मारने के बाद पुलिस एक बार फिर जसवंत को पकड़ कर ले गयी और वहाँ पुलिस के टॉर्चर से तंग आकर उसने आत्महत्या कर ली। उसकी मौत की खबर नही सहन कर पाने से वीरा की माँ भी चल बसी , बार बार पुलिस के घर आने से परेशान वीरा भी कृपाल के रास्ते चल पड़ती है।
   कृपाल और वीरा दो प्यार में डूबे दिलों के मिलन पर फिल्माया यह गीत बहुत खाली सा लगता है…
     गीत की पंक्तियां ..

    ये रुदाली जैसी रातें जगरातों में बिता देना
   मेरी आँखों में जो बोले मीठे पाखी को उड़ा देना
         बर्फों में लगे मौसम पिघले
             मौसम हरे कर जा
             नींदें खाली कर जा..

   पानी से गुहार लगाती नायिका की मौसम हरे कर जा और नींदे खाली कर जा … सहज ही अपनी उदासी अकेलापन और अपने साथ हुए अत्याचारों की तरफ ध्यान ले जाती है।
     कितना अकेलापन झेला होगा जब नायिका ने इन पंक्तियों को गाया होगा…..

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       एक गांव आएगा, मेरा घर आएगा…
       जा मेरे घर जा, नींदे खाली कर जा…

    इसके बाद नायक नायिका चुपके से शादी करने का फैसला कर लेते हैं।
    बहुत सारी घटनाएं घटती चली जातीं है…. नायक को कमांडर की तरफ से सासंद को मारने का काम दिया जाता है।
   उसके कुछ पहले ही वीरा कृपाल के पास से उसकी सायनाइड चुरा कर रख लेती है।
   ( यही वो सीन था जहाँ से मुझे सायनाइड का महत्व पता चला था कि उसे निगल कर मौत को गले लगाया जा सकता है)
    कृपाल का प्लान फेल हो जाता है और वो पुलिस के द्वारा पकड़ लिया जाता है।
   यहाँ फिर बहुत कुछ होता घटता जाता है। वीरा के हाथ से सनातन मारा जाता है।
   वो बड़ी मुश्किल से कृपाल से मिलने पहुंचती है और सबसे छिपा कर उसके हाथ में उसका सायनाइड रख कर वहाँ से बाहर निकल कर अपना सायनाइड भी खा लेती है।

    कहानी बहुत ही ज्यादा  ब्लैक थी। दुख अवसाद त्रासदी आंसूओं से भरी हुई लेकिन एक गहरी छाप छोड़ जाती है।
   जैसा कि मैं कोई समीक्षक तो हूँ नही इसलिए टेक्निकल कुछ नही कह सकती लेकिन गुलज़ार साहब की लिखी कहानी सीधे दिलों में उतर जाती है।
   सारे किरदार अपना पार्ट बखूबी निभाते हैं।।
जिम्मी शेरगिल की शायद पहली ही फ़िल्म थी , और वो अपनी छाप छोड़ने में सफल भी रहे।

   तब्बू तो बेस्ट हैं ही।

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पूरी फिल्म में मुझे सबसे ज्यादा पसंद आये फ़िल्म के गीत!
   
    चप्पा चप्पा चरखा चले हो या
    छोड़ आये हम वो गलियां या फिर
      पानी पानी रे।
  
  लेकिन सबसे खूबसूरत गीत था…

   तुम गए सब गया
   कोई अपनी ही मिट्टी तले
    दब गया…

   गुलज़ार साहब के शब्दों का जादू सभी उनके चाहने वालों के सर चढ़ कर बोलता है।

    अगली समीक्षा या चीर फाड़ अपने किसी पसंदीदा गीत की करने की कोशिश रहेगी।
   तब तक सुनते रहिए…

    पानी पानी इन पहाड़ो के ढलानों से उतर जाना
    धुंआ धुंआ कुछ वादियां भी आएंगी गुज़र जाना।
    एक गांव आएगा, मेरा घर आएगा..
    जा मेरे घर जा, नींदे खाली कर जा..
    पानी पानी रे, खारे पानी रे…

  aparna….

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उधेड़बुन

एक छोटी सी प्रेम कहानी

‘उधेड़बुन ‘
          
           आज सुबह से ही धानी बड़ी व्यस्त है, कभी सलाईयों में फंदे डाल रही है,कभी निकाल रही है,कल ही से उसने नयी नयी बुनाई सीखना शुरू किया है॥  

अहा!  कितना मजे का समय है ये,,बुनाई कितनी कलात्मक होती है,,और भी कलायें होतीं हैं संसार में ,पेटिंग करना,कढ़ाई करना,पॅाट बनाना,वास बनाना पर ये सब एक हद तक सिर्फ अपने शौक पूरे करने जैसा है।बुनाई ही एक ऐसी कला दिखती है जिसमें कलाकार अपने सारे प्रेम को निचोड़ कर रख देता है।
              कुछ फंदे सीधे कुछ उल्टे बीनना ,कहीं फंदा गिराना कही फंदा उठाना,उफ पूरा गणित है बुनाई भी॥ और इतनी त्याग तपस्या के बाद बुना स्वेटर जब हमारा करीबी कोई पहनता है तो कितना गर्व होता है बनाने वाले को खुद पर। ऐसे ही बहुत सारे मिले जुले भावों के साथ धानी ने भी अपना पहला स्वेटर बुनना शुरू किया था,,पिंटू दा के लिये।
        
               स्वेटर बुनते हुये कितनी प्रसन्न कितनी विभोर थी धानी,अपने उपर अचानक मान भी होने लगता कि कोई भी नया काम हो वो कितनी जल्दी सीख लेती है।खाना बनाने में तो उसे महारथ हासिल है,कैसी भी पेचीदगी भरी जटिल रसोई हो,वो आधे घण्टे में सब सुलझा के रख देती है,चने की भाजी बनाना हो या मटर का निमोना उसके बायें हाथ का खेल है बस । कचौडि़याँ और मूंग का हलवा तो घर पे वही बस बनाती है,,मां को रसोई मे इतनी देर खड़ा होने मे थकान होने लगती है। घर को सजा  संवार केे रखना कपड़़ोंं को सहेजना,रसोई  बनााना इन सारे नारी सुलभ गुणोंं की खान है धानी।
              
           बस एक ही चीज है जो उसे बिल्कुल नही सुहाती ,वो है पढ़ाई। जाने कैसे लोग किताबों में प्राण दिये रहतें हैं,ना उसे पढ़ना पसंद है ना लिखना,,नापंसदगी की हद इतनी है कि लड़की गृहशोभा,गृहलक्ष्मी जैसी गृहिणियों की पहली पसंद रही किताबों पर भी आंख नही देती।

            आलम ये है कि दो बार में ही सही धानी ने बारहवीं पास कर ली ,उसके बाद होम साईंस लेकर अभी कालेज का सेकण्ड इयर पढ़ रही है,वो भी दुबारा। पढ़ाई से इतनी वितृष्णा का कारण भी बहुत वाजिब है,धानी की अम्मा ने अपने जमाने में बी.ए. किया था ,उसके बाद उनकी शादी हो गयी।मन में तरह तरह के सपने सजाये धानी की मां ससुराल आई तो उन्हे पता चला कि उस घर में उनकी डिग्री की कोई कीमत नही। वो अपने पैरों पर खड़ा होना चाहतीं थीं,एक अच्छी सरकारी नौकरी करना चाहतीं थीं पर उनकी पढ़ाई उनका ज्ञान उनके चौके तक ही सिमट कर रह गया। इसी कारण उन्होंने बचपन से ही धानी के मन में ये बात भली प्रकार बैठा दी जैसे तैसे वो थोड़ा बहुत पढ़ लिख ले फिर उसकी अच्छे घर में शादी करनी हैं।

                   बालिका धानी के मन में ये बात अच्छे से पैठ गयी की उसे सारा ज्ञान ऐसा ही अर्जित करना है,जिससे उसकी एक अच्छे घर में शादी हो सके।  उसी ज्ञान का नया सोपान था बुनाई।

           बहुत खुश और खुद मे मगन थी धानी बुनाई सीखते हुये।पड़ोस में रहने वाली लाली दीदी मायके आई थीं दो महीनों की लम्बी छुट्टी पर,बस उन्ही से ये गुरू ज्ञान मिला था,वो अपने पति के लिये बुन रही थी और धानी अपने पिंटू दा के लिये।
   
             पिंटू दा ! पिंटू दा से धानी की मुलाकात यही कोई 7-8 साल पहले हुई थी, तब वो स्कूल जाती थी,शायद नौंवी या दसवीं में थी,। पिंटू दा ने उसी साल ईंजिनियरिंग काॅलेज में प्रवेश किया था,दोनो सेमेस्टर पास करने के बाद की छुट्टियों में अपनी मामी के घर आ गये थे घूमने।
   
         पहली मुलाकात में ही उसे पिंटू दा बहुत भा गये थे,,कितने लंबे थे, चौड़ा माथा ,घने बाल,गोरा रंग,और गहरी आवाज ॥ कोई भी बात कितना समझा के बोलते थे,कि सामने वाला उनकी हर बात मान जाये।

               उस दिन मां ने धानी के हाथ से साबुदाने के बड़े भिजवाये थे रीमा चाची के घर,,बड़े लेकर जब धानी वहांं पहुंची तब चाची चाय चढा़ रहीं थीं,उसे देखते ही खिल गयीं ” आ तू भी चाय पी ले।”
     “नही चाची मैं तो बस ये देने आयी हूं,मां ने रज्जू दा के लिये भेजा है।”
       “अरे दिखा जरा क्या भेजा है जिज्जी ने,वाह साबुदाने के बङे।” 
      ” अच्छा रूक जरा मैं ये चाय भी साथ ही छान देतीं हूं,तू जरा ऊपर रज्जू के कमरे तक पहुचां दे ।”        “ये चाय के दो कप क्यों चाची,मैं तो नही पियूंगीं।” “हां बिटिया ये दूसरा कप पिंटू के लिये है,कलकत्ता वाली ननंद का बेटा।” “बहुत होशियार लड़का है,पहली बार में ही वो क्या कहते हैं आई.आई.टी. निकाल लिया उसने,,कानपुर में पढ़ रहा अभी।”
    “अच्छा मैं चाय दे के आती हूं।”
           
                  धानी का आज अपनी सहेली ममता के साथ पिक्चर जाने का प्लान था,ममता सज धज के उसके घर पहुंच चुकी थी,वो दोनो निकलने ही वाली थीं कि माता जी का फरमान सुनाई दिया ,
           ” बिट्टो जा जरा जाते जाते ये बड़े रीमा के यहां दे जा।”
           “क्या मां तुम भी ना,बनाने का इतना शौक है तो पहुंचाया भी खुद करो ,मुझे वैसे ही देर हो गयी है।”
        “अरे जा ना धनिया दे आ,पांच मिनट लगेगा मुश्किल से” भुनभुनाती पैर पटकती धानी वहां गयी तो रीमा चाची ने एक नया काम पकड़ा दिया। ऊपर पहुंच कर कमरे के दरवाजे को खटकाने जा ही रही थी कि दरवाजा खुल गया, पर सामने रज्जू दा तो नही थे,ये तो कोई और था। तब तक सामने खड़े आगंतुक ने हाथ बढ़ाकर धानी के हाथ से ट्रे ले ली ,और वापस अंदर मुड़ गया।अच्छा तो यही था पिंटू,,चाची का आई आई टियन भांजा।

                 धानी वापस मुड़ कर जाने लगी तो पीछे से एक थैंक्यू सुनाई दिया,मुड़ कर मुस्कुरा कर वो जल्दी जल्दी नीचे उतर गयी।
                             यही थी वो मुलाकात जिसके बाद धानी का मन  “मैनें प्यार किया “देखने मे भी नही लगा,कितने मन से आयी थी ,और यहां सारा वक्त उसी के बारे मे सोचते गुजर गया।

                   इसके दो तीन दिन बाद धानी दोपहर मैं स्कूल से वापस आयी तो रज्जू दा और पिंटू उसके घर पे बैठे खाना खा रहे थे,वो रसोई में गयी तो मां ने बताया कि रीमा चाची की तबीयत कुछ नासाज है इसी से मां ने दोनों को यही बुला लिया खाने पे।

      उसके बाद तो सिलसिला सा चल निकला ,जाने क्यो धानी को पिन्टू दा को छुप छुप के देखना बड़ा भाता था।अपनी छत पे बने लोहे के दरवाजे के ऊपर बनी जाली से वो बीच बीच मे झांक लगा लेती की बाजू वाली छत पे पिन्टू दा आ गये या नही।
   और जैसे ही देखती की आ गये वो झट किसी ना किसी बहाने छत पे आ जाती।
           कभी पहले से पानी मे तर पौधों मे पानी डालती ,कभी सुखे कपड़े पलटने लगती।
    और इन्ही सब के बीच कभी रज्जू दा उसे कैसे छेड़ देते ,कितना गुस्सा आता था उसे।
   “अरी धानी कभी पढ़ लिख भी लिया कर,बस इधर उधर डोलती फिरती है।”इस साल भी फेल होना है क्या।”
     पिन्टू के सामने कट के रह गयी धानी।रज्जू दा भी कभी कैसा बचपना कर जाते हैं ।
   पर पिन्टू उससे हमेशा बहुत प्यार से बात करता ,धानी जी बोलता ,,आप आप कर के उसे किसी राजकुमारी सा अह्सास कराता ।

   अक्सर शाम को उनकी ताश की बाजी जमती।रीमा चाची ,रज्जू दा,वो और पिन्टू।
उसकी और रज्जू दा की जोडी हमेशा ही जीत जाती और वो बड़ी अदा से पिन्टू को देख मुस्कुरा देती।
     एक बार चाची के साथ पकौड़ी तल रही थी,तभी कोई किताब पढते पढ़ते पिन्टू रसोई मे आया,उसे लगा मामी खड़ी है,उसने चट प्लेट से एक पकौड़ा उठाया और मुहँ मे भर लिया।
गरम पकौड़े की जलन से तिलमिला गया की तभी धानी पानी भरा ग्लास ले आयी।
    पिन्टू की जान मे जान आयी “थैंक यू धानी जी! मेरा ध्यान ही नही गया ,पढ़ने मे लगा था ना।”और हँसते हुए पिन्टू वहाँ से चल दिया।
  पर इस खाने पीने के चक्कर मे अपनी किताब भूल गया।
     धानी उसे उठा ले गयी।”मिल्स ऐण्ड बून” !
हे भगवान ! ये प्यार जो ना कराये,,धानी के लिये एक किताब पढ्ना उतना ही दुष्कर था जितना एक लंगडे के लिये रेस मे भागना और एक गून्गे के लिये गीत गाना।
    पर फिर भी बिचारी डिक्शनरी खोल के पढ़ने बैठी।उसकी बुद्धि जितना समझ सकती थी उतना उसने भरसक प्रयत्न किया फिर किताब को पकड़े ही सो गयी।

     कुछ दिन बाद होली थी।इस बार धानी ने अपनी जन्म दायिनी की भी उतनी सहायता नही की जितनी रीमा चाची के घर लोयियाँ बेली,उनके हर काम मे कदम ताल मिलाती धानी यही मनाती की चाची किसी तरह पिन्टू के लिये उसे उसकी माँ से मांग ले।
      होली का दिन आया ,हर होली पे पूरे मोहल्ले को रंगती फिरती धानी इस बार नव वधु सी लजिली बन गयी।उसे एक ही धुन थी।
   पिन्टू रज्जू के साथ उनके घर आया ,उसके माँ बाबा के पैर छुए आशीर्वाद लिया,उसके गालों पे भी गुलाबी रंग लगाया और चला गया।
    बस धानी ने सब जान लिया,उसने प्रेम की बोली अपने प्रियतम की आँखो मे पढ़ ली।

सारे रस भरे दिन चूक गये,और एक दिन पिन्टू कानपुर लौट गया।
      धानी चाची के घर आयी तब चाची ने बताया “अरे धानी ,बेटा एक कप चाय तो पिला दे।”आज सुबह से जो रसोई मे भीड़ि तो अभी फुर्सत पायी है,आज पिन्टू निकल गया ना,उसीके लिये रास्ते का खाना बनाने मे लगी रही।”
” कब निकले पिन्टू दा,कुछ बताया नही उन्होनें ।क्या अचानक ही जाना हुआ क्या उनका।”
    अपनी आवाज की नमी को छिपाते हुए उसने पुछा।
“रिसेर्वेशन तो पहले ही से था ना लाड़ो,इतनी दूर कही बिना रिसर्वेशन जाया जा सकता है क्या।”

हाँ जाया तो नही जा सकता पर बताया तो जा सकता है,इतनी भी ज़रूरत नही समझी,की मुझे बता  के जायें।
 
            ठीक है कभी हमने एक दूसरे से नही कहा लेकिन क्या हम दोनो ने एक दूसरे की आंखो मे प्यार देखा नही।
     
                 एक 14वर्ष की किशोरी दुख के अथाह सागर मे डूबने उतराने लगी।उसका पहला प्यार उससे बहुत दूर चला गया था,पर उसे अपने प्यार पे विश्वास था,एक दिन  उसका प्यार अपने पैरों पे खड़ा होके उसके घर बारात लिये आयेगा और उसे चंदन डोली बैठा के ले जायेगा।

     पिन्टू धानी के हृदय की कोमलता से सर्वथा अनभिज्ञ था,वो छुट्टियां मनाकर वापस लौट अपनी पढाई मे व्यस्त हो गया।

    समय बीतता गया,जीवन आगे बढता गया,पर धानी के मन से पिन्टू नही निकल पाया।

     धानी ने बहुत सुन्दर स्वेटर बुना है,जाने कब मिलना होगा पिन्टू से,पर जब भी होगा तभी वो अपनी प्रेम भेंट उसे देगी।ऐसा सोच कर ही धानी गुलाबी हो जाती।

    रज्जू के दादा 89बरस के होके चल बसे,पूरा घर परिवार शोकाकुल है,धानी भी,पर बस एक खयाल उसे थोड़ा उत्फुल्ल कर रहा की अब तो पिन्टू आयेगा।
        पिन्टू आया,पूरे 8बरस बाद!  धानी का पहला प्यार वापस आ गया।
     रीमा चाची के घर पूजा पाठ संपन्न हो रहा,तेरह बाम्हण जिमाने बैठे है,धानी दौड दौड कर सारे कार्य कर रही जैसे उसके खुद के ससुराल का काम है।अभी तक पिन्टू की झलक नही मिली पर उसी इन्तजार का तो मज़ा है।
      सारे काम निपटा के चाची बोली “जा धानी पिन्टू उपर रज्जू के कमरे मे है,जा ये थाली वहाँ दे आ।”
     थाली लिये राजकुमारी चली।मन ऐसे कांप रहा की अभी गिर पड़ेगी ।थाली ऐसी भारी लग रही की कही हाथ से छूट ना जाये,घबड़ाहट से हथेलियों मे पसीना छलक आया है,दिल की धड़कन तो धानी खुद सुन पा रही है।
   
             उफ्फ कैसा होगा वो समय ! जब वो पिन्टू को देखेगी ,उसे स्कूल मे पढी एक कविता की लाइन याद आ रही।
    ‘”चित्रा ने अर्जुन को पाया,शिव से मिली भवानी थी”।
   प्रेम का अपना अनूठा ही राग होता है वीर रस की कविता मे भी शृंगार रस की एक ही लाइन याद रही लड़की को।
  
  धडकते हृदय और कांपते हाथों से द्वार पे दस्तक दी उसने।
  “दरवाजा खुला है”वही भारी आवाज,सुनते ही धानी का हृदय धक से रह गया।धीरे से किवाड़ धकेल उसने खोला।
    
   अन्दर कुर्सी पे बैठा पिन्टू कुछ पढ़ रहा है,हाँ पिन्टू  ही तो हैं।पिन्टू ने आँख उठा कर धानी को देखा, धानी ने पिन्टू को, नजरे मिली,पिन्टू मुस्कुराया, पूछा
“कैसी है धानी ?” धानी के गले मे ही सारे शब्द फंस गये ,लगा कुछ अटक रहा है।
  “ठीक हूं पिन्टू दा।आप कैसे हो ?” इतना कह कर थाली नीचे रख धानी वापस सीढिय़ां उतर गयी।
  “मै तो एकदम मस्त ।”पिन्टू की आवाज सीढियों तक उसका पीछा करती आयी।

   हां मस्त तो दिख ही रहे,हे भगवान !कोई आदमी इतना कैसे बदल गया वो भी 8 ही वर्षों मे।
   नही! हे मेरे देवता! कोई मुझे आके बोल दो ,ये पिन्टू नही है।
    धानी को ज़ोर की रुलायी फूटने लगी,वो वहाँ से भागी ,अपने कमरे मे जाके ही सांस ली।
  अपनी आलमारी मे अपने कपडों के बीच छिपा के रखा स्वेटर निकाला और उसे अपने सीने से लगाये रोती रही।
     कितना मोटा आदमी सा हो गया था पिन्टू,पेट तो ऐसे निकल आया था जैसे कोई आसन्न पृसुता है जिसे अभी तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ेगा।उफ्फ सर के घने बाल भी गायब,ये तो बिल्कुल ही गंजा हो गया।
     पूरा चेहरा फूल के कुप्पा हो गया है,इतने लाल से गाल ,गालों का इतना उभरा मांस की बड़ी बड़ी आंखे भी चीनियों सी छोटी दिख रही। पूरी शकल ही बदल गयी जनाब की बस नही बदली आवाज।
     तो क्या आवाज के भरोसे ही शादी कर लुंगी।।
  ” हे भगवान !  बचा लिया मुझे,अच्छा हुआ अपनी बेवकूफी किसी से कही नही मैने।”
   “अपने प्रथम प्रेम को अपने ही मन तक सीमित रखा।”
  
बेचारी धानी जब रो धो के फुरसत पा गयी तब अपने बुने स्वेटर को लेके बैठी,अब उसे उधाड़ना जो था ,ये स्वेटर अब उसका प्रेमी कभी नही पहन पायेगा।।

उधेड़बुन  एक छोटी सी प्यारी सी प्रेम कथा है ,जो किशोर वय के प्रेम को दर्शाती है,जिसमे नायिका को हमेशा ही लगता है, उसका प्रेम बहुत उंचे आदर्शों पे टिका है,जबकी वास्तव मे उसके प्रेम का  आधार सिर्फ रूप ही है,और जीवन की वास्तविकता से दो चार होते ही धानी का गुलाबी प्रेम विलोपित हो जाता है।।।

कहानी को पढ़ने के लिये धन्यवाद!

अपर्णा।