शादी.कॉम- 28

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  शादी डॉट कॉम-28

     खाना खा कर सब एक साथ बैठे गप्पे मारते रहे ,इसी बीच सिद्धार्थ की माँ सबके लिये दक्षिण भारतीय फिल्टर कॉफ़ी बना कर ले आईं ।
   स्टील की छोटी छोटी ग्लास में सबको सर्व करती वो जब राजा के सामने पहुंची तब बांसुरी अचानक कह उठी__

बांसुरी– आँटी ये कॉफ़ी नही पीते।।

   बांसुरी की बात सुन उन्होनें मुस्कुरा कर कॉफ़ी का गिलास राजा के हाथ मे थमा दिया __” ये कोई ऐसा वैसा कॉफ़ी नही है बेटा ये हमारा साऊथ का स्पेशल फिल्टर कॉफ़ी,,एक बार पी कर तो देखो,,अमृत है अमृत ।सिड के नाना (पिता) तो डेली सुबह एक बड़ा गिलास भर के पीते थे।।

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बांसुरी– अंकल को क्या हुआ था आंटी  हमारा मतलब क्या उनकी तबीयत खराब थी।।

  बांसुरी की बात सुन सिद्धार्थ की मां मुस्कुराते हुए बांसुरी की तरफ देखने लगी उसे देखते हुए उन्होंने ना में सिर हिलाते हुए कहा
      “ओह नो नो  उनका तबीयत ठीक है वह दिल्ली में अपना प्रैक्टिस कर रहे हैं वकालत की।।
  एक्चुली हम सेपरेट हो गए।। सिड के होने के बाद मुझे और सिड  को उनकी जितनी जरूरत थी वह उतना समय हम दोनों को नहीं दे पाते थे उनका सारा समय उनके केस और अदालत ही ले जाते थे घर पर आने के बाद भी सारा समय केस से जुड़ी फाइलें पढ़ना उस पर काम करना यही उनका काम था।।
     मैं अकेले घर और बच्चे को संभालते हुए फ्रस्ट्रेट होने लगी थी इसीलिए हमारे बीच झगड़े बढ़ने लगे और लड़ झगड़ के साथ रहने से हमने अलग हो जाना ज्यादा सही समझा।। वह वहां रहते हैं ,, मंथ में कभी एक दो बार हमसे मिलने आते हैं अभी भी लीगली हम हस्बैंड वाइफ ही हैं।।।

    उनकी बात सुन बांसुरी झेंप के रह गई क्योंकि अब तक वो यह सोचा करती थी कि सिद्धार्थ के पिता किसी रोग या बीमारी के कारण चल बसे हैं।। आज सिद्धार्थ की मां से यह सच्चाई सुनकर उसे अपने उतावले पन पर शरम सी आ गई इस शर्मिंदगी से बचने के लिए उसने घड़ी की तरफ देखा और सिद्धार्थ की मां से घर वापस जाने की गुजारिश कर दी।।

    शाम के 5:00 बज रहे थे राजा बांसुरी और माला सिद्धार्थ से विदा लेकर उसके घर से निकल पड़े घर से निकलने के पहले बांसुरी ने जैसे ही सिद्धार्थ की मां के पैर छूने चाहे उसी समय राजा भी उनके पैर छूने को झुका दोनों को एक साथ ही अपने दोनों हाथ से आशीर्वाद देते हुए सिद्धार्थ की मां ने कहा “हमेशा खुश रहो”

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    वहां से निकलने के बाद माला का विचार फ्लैट पर वापस जाने का था लेकिन बांसुरी ने उसे भी अपने साथ ले लिया तीनो के तीनो वहां से कैब बुक करके फिनिक्स मॉल के लिए निकल गए।

     मॉल में एक जगह से दूसरी जगह घूमते ,हर दुकान के चक्कर लगाते  और गप्पे लड़ाते तीनों घूमते रहे माला ने उन दोनों से कहा कि “जब हम मॉल आए ही हैं तो तुम दोनों अपनी शादी की शॉपिंग भी क्यों नहीं कर लेते,, माला का यह आइडिया राजा को भी जँच  गया और दोनों के दोनों मान्यवर और मोहि में घुस गए।।
       हालांकि वहां अंदर जाने से पहले बांसुरी ने एक बार राजा से कहा भी कि तारीख तय होने के पहले हमारे यहां कोई भी तैयारी नहीं की जाती तब राजा ने हंसकर कहा__” शादी तो हम दोनों की तय हो चुकी है एकदम पक्की ही समझो !!और तारीख 2 दिन बाद निकलने ही वाली है तो शॉपिंग करने में कोई बुराई तो नहीं ।।”

   राजा की बात पर बांसुरी मुस्कुरा कर रह गई ।।

   राजा के बहुत इसरार करने के बाद भी बांसुरी ने शादी का जोड़ा नहीं खरीदा और ना ही राजा को शेरवानी लेने दी,, पर उसकी जिद मानकर तीन-चार भारी भरकम साड़ियां और राजा के लिए कुछ कपड़े जरूर खरीद लिए।। उसने एक बहुत सुंदर गुलाबी सी साड़ी माला के लिए भी खरीद ली।।

     इतना सब दिलवा कर भी राजा का तो जैसे मन ही नहीं मान रहा था यहां से निकल कर जूते चप्पलों की दुकान में वह बांसुरी को लिए घुस गया।।
     कई जोड़े फुटवियर्स दिलवा कर भी उसे चैन नहीं मिला।।
      एक-एक कर ब्राइडल खरीदारी की सभी दुकानों पर राजा बारी-बारी से बांसुरी को ले जाता गया और शॉपिंग करवाता गया।।

   हर एक साड़ी से मैचिंग सैंडल बालों में लगाने का क्लच, चूड़ियां ,कंगन ,झुमके और भी बहुत कुछ।।

    और सबसे आखिर में वह बांसुरी को लिए गहनों की सबसे बड़ी दुकान में घुस गया बांसुरी के लाख मना करने पर भी उसने एक बहुत सुंदर  जड़ाऊ कंगन खरीद लिया………….और तभी उसकी नज़र माणिक की एक अँगूठी पर चली गयी,,छोटे छोटे माणिको से सजा एक मोर अँगूठी मे बना था,राजा ने उसे भी लपक के बांसुरी के लिये खरीद लिया।।
      बांसुरी ने भी एक सॉलिटियर राजा के लिये खरीद लिया।।

     राजा तो वो अँगूठी वहीं बांसुरी को पहना देना चाहता था,पर  अपने राशिरत्न को बिना सिद्ध किये पहनने को बांसुरी का मन नही माना।।
    राजा ने अपने लिये बांसुरी द्वारा ली गयी अंगूठी भी उसके ही सामान में रखवा दी।।

राजा –बांसुरी अब घूम घूम के बहुत थक गये हैं,कहीं बैठ के कुछ खा लिया जाये।।

माला — गुड आइडिया!! वैसे भी तुम दोनों तो अपनी शादी की तैयारी कर रहे और मेरे पैर बिना मतलब को कबड्डी कबड्डी खेल रहे हैं,यहाँ घुसो वहाँ निकलो बस।।

  माला की बात पर दोनो हंसने लगे।।तीनो वही नीचे बने एक कैफे में चले गये,उसी मे एक तरफ म्युज़िकल नाइट चल रही थी,जिसमें कोई भी जाकर गाना गा सकता था,,एक एक कर वहाँ बैठे लोग उठ के जाते और कुछ भी आड़ा टेढा गा कर आ जाते,,आखिर इन सब को देखने के बाद बांसुरी ने राजा से भी गाना गाने की गुजारिश कर ही दी__

बांसुरी– जाओ ना राजा,प्लीज़ गाओ ना।।देखो कोई भी मख्खीमार यहाँ गा ले रहा है तुम तो सच में बहुत ही अच्छा गाते हो,,जाओ ना ।।
     बांसुरी की बात पर मुस्कुराते हुए राजा उस तरफ बढ गया।।

      चाहे बना दो,चाहे मिटा दो,
      मर भी गये तो देंगे दुआयें ।
      उड़ उड़ के कहेगी खाक सनम
      ये दर्द ए मुहब्बत सहने दो
      मुझे तुमसे मुहब्बत हो गयी है
      मुझे पलकों की छाँव में रहने दो
      एहसान तेरा होगा मुझ पर
      दिल चाहता है जो कहने दो…

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राजा के गाने को खतम करते ही लोगों की तालियाँ गूँज उठी पर बांसुरी का मन जाने कैसा तो हो गया__

बांसुरी– ये मरने जीने वाला गाने की क्या ज़रूरत थी,कुछ और ढंग का नही गा सकते थे।।

राजा– अरे बुद्धू गाने मे प्यार छिपा है वो नज़र नही आया ,बस एक शब्द पकड़ के बैठ जाओगी!  वहमी औरत!! अच्छा तुम्हारे लिये कुछ और भी गा देते हैं,, रुको।।

          सांसो की सरगम ,धड़कन की वीणा
          सपनों की गीतांजली तू
          मन की गली में महके जो हरदम
          ऐसी जुही की कलि तू
          छोटा सफर हो लम्बा सफर हो
          सूनी डगर हो या मेला।।
          याद तू आये मन  हो जाये
          भीड़ के बीच अकेला
         बादल बिजली चंदन पानी जैसा अपना प्यार
         लेना होगा जनम हमें कई कई बार…..
          इतना मदिर इतना मधुर तेरा मेरा प्यार..

************
   अलग अलग बैग्स में ढ़ेर सारा सामान समेटे तीनों वहाँ से निकल गये।।
    मॉल से बाहर निकलते ही माला फ्लैट में जाने के लिये कैब बुक करने लगी__

माला– गाईस मैं बहुत थक गयी हूँ , तुम दोनों का मन तो भरा नहीं होगा ……तो ऐसा करो तुम दोनों साथ साथ घूमो मैं यह सारा सामान लेकर फ्लैट पर जाती हूं, जब तुम लोग घूम कर थक जाओगे तब फ्लैट पर आ जाना।।

   राजा और बांसुरी माला की बात सुनकर मुस्कुराने लगे राजा ने माला को मुस्कुरा कर हामी भर दी।।
    उन दोनों को वहीं छोड़ माला सारा सामान समेटे कैब लेकर फ्लैट के लिए निकल गई राजा और बांसुरी एक बार फिर पिछली रात की तरह हाथों में हाथ डाले सड़क के किनारे किनारे चलते रहे  …..     उनके पास दुनिया जहान की बातें थी जो इतनी जल्दी खत्म नहीं होने वाली थी ,,अभी वह दोनों चल ही रहे थे कि बाजू से दो बाइक पर तीन लड़के गुजरे उन्होंने आगे जाकर बाइक घुमाकर राजा और बांसुरी के सामने लाकर रोक दी।

   उनमें से एक लड़के ने कड़क के उनसे कहा जो जो सामान तुम्हारे पास है जल्दी से निकालो,, तब तक में बाकी दोनों लड़के भी बाइक से उतर के उनके पास चले आए ।। एक तरह से राजा और बांसुरी को तीनों तरफ से उन तीनों मुस्टंडो  ने घेर लिया राजा ने चुपचाप अपने जेब में हाथ डाला वॉलेट निकाला और उन लड़कों के हाथ में रख दिया।
         उनमें से एक लड़के ने बांसुरी की तरफ देखा और उससे कहा
          “तुझे समझाने के लिए क्या अंग्रेजी में बोले जो जो है पर्स में निकाल गले की चेन कानों के टॉप्स अंगूठी सब कुछ हमारे हवाले कर दे।”
 
     ” भाई तमीज से भी तो बोल सकते हो हम तो वैसे ही सब कुछ तुम्हारे हवाले कर रहे हैं बांसुरी दे दो यह जो मांग रहे हैं ,”।।
      उसकी बात सुन राजा ने बांसुरी की तरफ देख कर कहा।
   बांसुरी ने राजा की तरफ देखा राजा ने आंखें झुका के उसे वैसा ही करने के लिए कहा बांसुरी  ने एक-एक कर अपने कान के टॉप्स अंगूठी यहां तक की अपनी घड़ी भी उतार कर राजा के हाथ में  रख दी।।

   राजा ने सारा का सारा सामान उनमें से एक लड़के के हवाले कर दिया सामान लेते समय उस लड़के ने  राजा का हाथ पकड़ लिया __
               “वाह बच्चू सबसे कीमती सामान छुपा ले गए यह घड़ी भी हमारे हवाले करो जो तुमने अपने हाथ में बांध रखी है।”

   राजा ने अपनी घड़ी की तरफ देखा और बालों को झटका देकर घड़ी निकालने लगा पर बांसुरी ने राजा का हाथ पकड़ कर रोक दिया __
          “नहीं राजा यह घड़ी तुम नहीं दोगे”

” अरे ओ मैडम बैंडिट क्वीन जब राजा जी खुद अपना खजाना लुटाने को तैयार हैं तो आपको मिर्ची काहे लग रही है जब इतना कुछ दे दिया तो एक घड़ी भी दे दो।”

   उनमें से एक बदमाश ने बांसुरी से कहा।

” राजा हम कह रहे हैं ना तुम किसी भी कीमत पर इस घड़ी को नहीं दोगे। और हां हम हैं बैंडिट क्वीन बोलो क्या करोगे दे तो दिया इतना कुछ,, काफी नहीं है क्या ??चुपचाप लो और रफा दफा हो जाओ वरना तुम जानते नहीं कि हम कौन हैं??

  बांसुरी की बात पर उनमें से एक बदमाश आगे बढ़कर आ गया और डरने के हावभाव  दिखाते हुए हाथ जोड़कर बांसुरी से कहने लगा__
      ” मैं तो डर गया मैडम!! बहुत डर गया अब क्या करूं भाग जाऊं? या तुम्हें भगा के ले जाऊं??

   जब तक वह अपनी बात पूरी करता एक जोर का झन्नाटेदार  तमाचा उसके गाल पर पड़ा ।। वो जब तक अपने गाल को सहलाता तब तक में दूसरे बदमाश के पेट पर एक जोर  का घूंसा पड़ा और तीसरे बदमाश के पैर में बांसुरी की हील वाली सैंडल।।
       
       अभी तीनों लड़खड़ा कर उठ पाते की बांसुरी ने उनके हाथ से जमीन पर गिरा अपना पर्स उठाया और उसमें से एक स्प्रे निकालकर तीनों की आंखों पर जोर से मार दिया तीनों अपनी-अपनी आंखों को मलते जैसे तैसे उठे और बाकी का  सारा का सारा सामान वहां पर पटक कर अपनी अपनी बाइक पर सवार होकर भाग निकले।।
       बांसुरी ने मुड़कर राजा को देखा राजा हाथ बांधे खड़े बांसुरी को मुस्कुराते हुए देख रहा था।।

बांसुरी– तुमने उन बदमाशों को मारा क्यों नहीं ऐसे तो खुद कानपुर  के ईतने बड़े गुंडे हो,, यहां पुणे में आकर सारी हेकड़ी निकल गई।।

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राजा– हम झगड़ा करना ही नहीं चाहते थे बन्सी इसीलिए।।
     हम खुश थे,तुम्हारे साथ…….. इसीलिए लगा वो तीनों भी खुश हो लें ।।अरे हमारा सामान ले जाकर हमें कौन सा गरीब कर जाएंगे पर उन गरीबों का ही थोड़ा भला हो जाता यह सोचकर हम चुप रहे।। पर तुम्हें अचानक क्या हो गया?? इस घड़ी के लिए इतना काहे इमोशनल हो गई??
     और इतना सारा फाइटिंग वाइटिंग कहां से सीख गई??

बांसुरी– काहे तुम भूल गए क्या ये घड़ी तुम्हें कब मिला था?? यह घड़ी तुम्हारे बाबूजी लेकर आए थे जिस साल तुम 12वीं पास किए थे,,, याद है, तुम जिम में कितने खुशी के साथ आए थे ये घड़ी हमें दिखाने।।
       हमें याद है जब तुम हमें ये घड़ी दिखा रहे थे तुम्हारी आंखों में आंसू आ गए थे हमको पता है राजा तुमको घड़ियों का कलेक्शन करने का शौक है और तुम्हारे पास नहीं नहीं में  26 घड़ियां तो होंगी ही,, लेकिन इस घड़ी की कीमत तुम्हारे लिए क्या है यह हम से ज्यादा कौन समझ सकता है??

राजा– क्या बात है!! हमारी बंसी को तो हम से जुड़ी सारी बातें याद है।

बांसुरी– भूला तो उन्हें जाता है जो कोई याद हो!! तुम तो हमारे अंदर ही बसे हुए हो राजा हमसे अलग थोड़े ही हो कि तुम्हें भूल जाएं हमें तो अपने आप को देख कर भी तुम्हारी ही याद आती थी।।।
     और यह फाइटिंग भी तुम्हारे ही चक्कर में सब सीखे।। जब से पुणे आए जिम जाना 1 दिन भी नहीं छोड़ा,  रोज नई कसरत करते थे….. कभी किक बॉक्सिंग कभी वजन उठाना,, और यही सब की प्रैक्टिस करते करते हमारा हाथ साफ हो गया।।। हालांकि आज तक किसी गुंडे मवाली के ऊपर अपना हाथ साफ किया नहीं,, लेकिन आज तुम्हारी इस घड़ी के लिए हमारे अंदर की पुरानी वाली लड़ाकू बांसुरी बाहर निकल आई।।

राजा बांसुरी की बात सुनकर जोर जोर से हंसने लगा उसे देख बांसुरी भी खिलखिलाने लगी दोनों हंसते खिलखिलाते वापस आगे बढ़ गये।।

   दोनों ने कुछ आगे पहुंच कर टैक्सी ली और बांसुरी के फ्लैट की ओर निकल गये,थोड़ा आगे ही बढ़े थे कि राजा का फ़ोन घनघना उठा__

राजा– हेलो कौन??

” राजा हम बोल रहे हैं युवराज!! कहाँ हो तुम?? बॉम्बे पहुंच गये होगे ना?? अभी एक घन्टे बाद की तो तुम्हारी फ्लाईट होगी ना?”

युवराज की आवाज़ सुन राजा ने एक बार फिर फोन की स्क्रीन देखी,पर वहाँ भैया का नम्बर तो नही दिखा रहा था__

” भैय्या ये किसके नम्बर से बोल रहे हैं आप?”

” वो सब हम बाद में बताएंगे,पहले तुम बताओ बॉम्बे एयरपोर्ट मे हो ना।”

” नही भैया !! हम वो पुणे ही रुक गये थे ,असल मे कुछ काम आ गया था,दो दिन बाद यहाँ से निकलेंगे, हम आप को फ़ोन करने ही जा रहे थे कि आपका फोन आ गया।।”

” अरे ऐसे कैसे! ऐसा कौन ज़रूरी काम आ गया? खैर वो सब छोड़ो तुम अभी के अभी बॉम्बे पहुँचो और वहाँ से दिल्ली की फ्लाईट पकड़ कर चले आओ।।हम भी दिल्ली पहुंच गये हैं ।।

” भैया का  बात हो गयी,कुछ तो बताइये ।”

” बस इतना समझ लो,कुछ बहुते जरुरी काम है, अभी किसी को कुच्छो बोलने बतियाने का ज़रूरत नही है,तुरंत जहां हो वहाँ से गाड़ी लो और बाम्बे भागो।”

” पर भैया….”

” राजा समझो बात को ,तुरंत निकलो !अभी और कुछ नही बता पायेंगे ,,बॉम्बे निकलते ही इसी नम्बर पे हमे फोन कर लेना।”

    बांसुरी को भी भैया की कुछ कुछ आवाज़ आ तो रही थी लेकिन कुछ समझ नही आ रहा था,उसने राजा की तरफ देखा__” क्या हो गया।”

” पता नही बंसी !! पर भैया बोले हैं तो हमे अभी के अभी निकलना पड़ेगा,कुछ समझ नही आ रहा कि हुआ क्या है।।”

” सबकी तबीयत तो ठीक है ना??”

” पता नही बंसी पर भैया ने किसी से भी बात करने मना किया है अभी ,तो हम घर पे भी नही पूछ सकते,और तुम तो जानती हो बड़के भैय्या का आदेश हमारे लिये सबसे बड़ा है,तुमको तुम्हारे फ्लैट में उतार कर हमको बॉम्बे निकलना पड़ेगा बंसी ।”

” हमारा दिल बहुत घबरा रहा है राजा !! आज मत जाओ!!”

” अब नही रुक सकते बंसी ,,भैया का कहा किसी हाल मे नही टाल सकते।”

” पर राजा सुबह गणपति मन्दिर मे भी दर्शन नही हुआ ,फिर सोचे थे की परसो मुम्बई में सिद्धिविनायक के दर्शन कर लेंगे उसके बाद फ्लाईट पकड़ेंगे पर तुम अभी निकलोगे तो वो भी नही हो पायेगा।।”

” अरे यार !! तुम भी कहाँ की बात कहाँ जोड़ने लगती हो ।।सुनो निश्चिंत रहो,सिर्फ दर्शन ना कर पाने से भगवान हमसे गुस्सा होके अपने पास नही बुला लेंगे।”

” फिर बकवास शुरु कर दिये,,तुमको मना किये हैं ना राजा ऐसी मरने वरने की बात ना किया करो,,अच्छा सुनो मुम्बई पहुंचते तक पूरे रास्ते हमसे बात करते हुए जाना और जब फ्लाईट पकड़ लोगे तब भी बताना जब दिल्ली मे उतर जाओगे तब भी बताना, समझ गये।”

” हाँ समझ गये बंसी !! इत्ता परेशान ना हो !! तुम तो यार अभी से बिवियों जैसे जासूसी करने लगी।।”

” हाँ तो!! बस फेरे होने से ही बीवी बनूँगी क्या ,मन से तो पति मान ही लिया तुम्हें ।”

          तेरे संग संग राह सारी कट जानी ए
      मै ता तेरे नाल रहना, मान इन्ना मेरा कहना
     मेरी अखियो से होना कदी दूर ना
           तेरे बिन …….तेरे बिन …….
      तेरे बिन नई लगदा दिल मेरा ढोलना
       तेरे बिन नई लगदा दिल मेरा ढोलना
          सब छड जाये तू ना मेनू छोडना
      तेरे बिन नई लगदा दिल मेरा ढोलना….

   टैक्सी में बजते गाने के साथ ही बांसुरी की आंखों से आंसू भी बहते रहे,,उसके फ्लैट के नीचे उसे उतारने के बाद राजा ने उसे एक बार फिर अपनी  बाहों मे भर लिया,,,कुछ देर ऐसे ही रहने के बाद राजा ने बांसुरी को खुद से अलग किया और वापस टैक्सी में बैठने मुड ही रहा था कि बंसी ने उसका हाथ पकड़ उसे रोक लिया__” मत जाओ राजा!! अब तुमसे अलग होकर जी नही पायेंगे।”

   राजा ने अपने आंसू छिपाते हुए बाँसुरी का चेहरा अपने हाथों मे भर लिया__” हम जल्दी वापस आ जायेंगे बंसी ,हमारा रस्ता देखना।।”
     राजा ने एक बार बंसी के माथे को चूमा और वापस टैक्सी में बैठ गया।।

     बांसुरी तब तक वहाँ खड़ी रही,जब तक टैक्सी उसकी आंखों से ओझल नही हो गयी।।

क्रमशः

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शादी.कॉम-27

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शादी डॉट कॉम-27

बांसुरी– नही ,पहले हमारी बात सुनो!! क्या कह रहे थे सिद्धार्थ सर ,मुझसे शादी करेंगे,हो चुकी तब तो।।तुमने कहा नही उनसे कि बांसुरी सिर्फ और सिर्फ राजा की है,और राजा से ही बांसुरी की शादी होगी।।

राजा– नही कहा!! लेकिन कल उनके घर जायेंगे ना तब कह देंगे,,अब खुश!!

बांसुरी– हाँ बहुत बहुत खुश ।।

राजा– तो फिर आओ इधर।

बांसुरी– कब से देख रहे हैं,घूम फिर के एक ही जगह तुम्हारा कांटा अटक जा रहा

राजा– इत्ते साल से इन्तजार भी तो किया है तुम्हारा बन्सी!!!
      मुस्कुराती हुई बांसुरी आगे बढ़ कर राजा के गले से लग गयी,और राजा उसके चेहरे पे झुकता चला गया।।

    आंखो में खो जाये आंखे
    बोले हाथों से हाथ
    बाहों में छिप कर
    सांसों से जैसे डोले रात
    उंगलियों को उंगलियों से
     मौसमों को शोखियों से बात करने दो
     चुप तुम रहो,चुप हम रहें
    खामोशी को खामोशी से
    जिंदगी को जिंदगी से बात करने दो।।

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बांसुरी में धीरे से राजा को अपने से अलग कर दिया

राजा– क्या हुआ बन्सी??

बाँसुरी — कुछ नही बस ऐसे ही।।
   अच्छा सुनो तुमने यहां पर कुछ भी नहीं देखा है ना 4 दिन से तो सिर्फ काम में ही भिडे हो बैंक से होटल होटल से बैंक।। चलो तुम्हें पुणे घूमाती हूं यहां ऐतिहासिक महत्व की बहुत सी चीजें हैं पुराने अंग्रेजों के जमाने के स्मारक हैं शिवाजी महाराज के जमाने के किले हैं बाजीराव मूवी देखी थी ना ,उसमें दिखाया काशीबाई का महल भी यही है शनिवार वाडा में।। पांच नदियां हैं कई ब्रिज है बहुत बड़े-बड़े कॉलेजेस हैं चलो सब तुम्हें दिखाऊं।

राजा– हम जो देखने आए थे वह तो देख लिया बंसी

बांसुरी राजा की बात सुन मुस्कुराने लगी।।

राजा– सुनो अब देखना वेखना छोड़ो यार जोर की भूख लगी है चार-पांच दिन से कुछ ढंग से खाया नहीं कुछ अच्छा सा खिलाओ तो कोई बात बने।।

बांसुरी– कानपुर सी कचौड़ीयां और पकौड़ीयां  तो यहां मिलने से रहीं फिर भी एक अच्छी जगह है एफसी रोड पर वहां चलते हैं वहां की चाट  खिलाती हूं तुम्हें।।

राजा– यहां की चाट से तो तौबा कर ली बंसी हमने। उस दिन तुम्हारे सिद्धार्थ सर तुम्हारी कैंटीन में बड़ी शान से हमारे सामने लेकर आए कहा सर यह चख कर  देखिए हमारे यहां का रगड़ा पेटिस आपके कानपुर की चाट ना भूल गए तो हमारा नाम बदल दीजिएगा।
     वो  चाट खाकर जो जबान का स्वाद बिगड़ा है तो आज जाकर सुधरा है,, अब तब से हम सोच रहे हैं कि तुम्हारे सिद्धार्थ सर को क्या नया नाम दें।।

बांसुरी– तुम नही सुधर सकते।।

राजा– हाँ तो सुधरे भी क्यों,,जैसे हैं अच्छे हैं ।।

बांसुरी– राजा हम चाहते हैं ,यह रात कभी खत्म ना हो बस ऐसे ही चलती रहे और हम दोनों एक दूसरे का हाथ हाथ थामे आगे बढ़ते रहें।

राजा– बंसी हम तो अब तुम्हें एक पल के लिए नहीं खोना चाहते ।।हम तो चाहते हैं __हम कल जल्दी से घर पहुंचे और सबसे, तुरंत अपनी शादी की बात कर ले, और बस एक हफ्ता बीतते  बीतते तुम हमारी दुल्हन बनकर हमारे घर आ जाओ हमेशा के लिए।।

बांसुरी– बड़े बेसबर हो  रहे तुम तो।

राजा– हां तो क्यों ना हो?? इतने साल इंतजार भी तो किया है तुम्हारा….. हमारा बस चले तो अभी यहीं फेरे ले ले तुम्हारे साथ।।
    हम तो कहते हैं बंसी तुम भी हमारे साथ कानपुर चलो ,तुम तुम्हारे घर बात कर लेना…. हम हमारे घर और सब मान गए तो अगले दिन ही शादी कर लेंगे।।

बांसुरी– अरे इतनी शॉर्ट नोटिस पर छुट्टी कहां मिलेगी राजा ऐसे कहां जा पाएंगे हम,, ऐसा करो अभी तुम ही जाओ दो-तीन दिन में सर से बात करके छुट्टियां लेकर हम भी आ जाएंगे और जैसा तुम चाहते हो …भगवान ने चाहा तो 1 हफ्ते में ही तुम्हारी दुल्हन बनकर तुम्हारे घर आ जाएंगे।।

राजा– सोच लो अब हमारे बिना रह पाओगी??

  दोनों इसी तरह हंसते बोलते एक दूसरे का हाथ थामे रास्ते के किनारे किनारे चलते रहे।। इतने सालों के ताने उलाहने, प्यार भरी मीठी झिड़कियां,, सवाल जवाब और ढेर सारी बातें …..न सुलझने वाली समस्याएं और उलझने वाली मीठी-मीठी बातें करते करते दोनों जाने कहां तक चलते चले गए……… जब कहीं थक जाते तो रास्ते के किनारे पड़ी बेंच पर बैठ जाते हैं जो ठेला मिला उससे कुछ खा लिया कहीं चाय मिली वहां पी ली…….. एक पानी की बोतल पकड़े दोनों सारी रात पूरे शहर की खाक छानते रहे।।

     रात के अंधियारे से सुबह हल्की हल्की सी उगने  लगी।।। तब राजा ने बांसुरी को उसके फ्लैट पर छोड़ा और अपने होटल चला गया दोनों ने विदा होते समय सिद्धार्थ के घर एक ही समय में पहुंचने का वक्त तय कर लिया।।।

********

माला– बंसी अरे उठ जा कब तक सोती रहेगी सुबह का 10:00 बज गया है तू कल रात पार्टी में अचानक गायब हो गई रात भर पता नहीं कहां भटकती रही किस समय फ्लैट पर आई मुझे तो कुछ पता ही नहीं चला ??यार यह चल क्या रहा है ??

बांसुरी– सब बता देंगे थोड़ा तो धैर्य रखो पहले 1 कप प्यारी सी चाय पिला दो।।

माला– जो आज्ञा मैडम जी मैं जा रही हूं ,आपके लिए चाय चढ़ाने …..आप ऐसा कीजिए हाथ मुंह धो लीजिए।।

बाँसुरी उठ कर बाथरुम में घुसने ही वाली थी कि दरवाजे पर किसी ने घंटी बजाई, दूध वाला दूध दे चुका,पेपर वाला आ चुका,फिर ये कौन आ गया,,सर को झटक कर बांसुरी बाथरूम में घुस गयी।।

   नहा धोकर निकलकर बालों को झटकते हुए बांसुरी जब बैठक में आई तो वहाँ राजा को बैठे देख आश्चर्यचकित रह गई।।

बांसुरी– अरे तुम!! तुम यहाँ कैसे??

माला– सर बस अभी कुछ देर पहले ही यहां आए हैं बांसुरी,, तुम यहां बैठो मैं सर के लिए कॉफी बना कर लाती हूं।।

राजा– माला जी अगर आपको तकलीफ ना हो तो चाय बना दीजिए कॉफी हमें जरा कम पसंद है।।

माला–  हाँ  बिल्कुल!! तकलीफ क्यों होगी मैं चाय ही बनाकर ले आती हूं।।

   माला अन्दर जाते जाते बांसुरी को भी साथ में खींच ले गयी।।

माला– चल क्या रहा है मैडम कुछ बताइन्गी  आप?? यह आरके सर आखिर हैं कौन?? तुम्हें कैसे जानते हैं?? यह सुबह-सुबह हमारे घर पर क्या कर रहे हैं ??
     और सुन यार तू कॉफी फेंट ले तब तक मैं थोड़ा चेहरे का रंग रोगन कर लूँ  वरना बंदा सोचेगा कैसी वाहियात लड़की है भूतनी बनी घूम रही है घर पर।। सारा इंप्रेशन खराब हो जाएगा।।

बांसुरी– तुमने सुना नहीं उन्हें कॉफी नहीं चाय पीनी है तुम जाओ आराम से तैयार हो जाओ हम तब तक चाय चढ़ातें हैं ।।

दस मिनट में माला तैयार होकर आ गयी,बांसुरी चाय चढ़ा कर राजा के साथ बैठी बातें कर रही थी और चाय खौल खौल कर काढ़ा बन चुकी थी।।

माला– बंसी चाय को छान दूं या थोड़ी और जलानी है।।

बांसुरी माला की आवाज सुन भागती हुई रसोई में आई और चाय को झांक कर देख हंस पड़ी।।

” कुछ ज्यादा ही खौल गई ना” उसने हंस के माला से पूछा

माला– चाय तो जो पकी सो पकी ,,, तुम दोनों के बीच क्या पक रहा है ??अब तो सब सच सच बता दे।

बांसुरी ने तीन कप में चाय छानी एक प्लेट में कुकीज निकाली और माला को साथ लिए बैठक में चली आई।।

बांसुरी– राजा इनसे मिलो यह है हमारी प्यारी सहेली माला।।

राजा — अच्छे से जानते हैं हम।।

मुस्कुराते हुए बांसुरी ने राजा को देखा और कहा

बांसुरी– माला हमारे बारे में सब जानना चाहती है।

राजा– क्यों तुमने आज तक कुछ बताया नहीं चलो कोई बात नहीं…. आइए माला जी आपको हम ही बता देते हैं हमारी और बांसुरी की कहानी।।

माला–  कुछ कुछ समझ तो आने लग गया है कि बांसुरी की अलमारी का वह स्पेशल कोना आप ही हैं।।
जहां  कुछ अजीबोगरीब सामान रखती है ये ।।

राजा– अच्छा!! जैसे क्या क्या रखती है??

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माला– एक रुद्राक्ष की माला,एक जेंट्स परफ्यूम,, एक टूटी से पैन रखी हुई है, एक छोटी सी नोटबुक पड़ी है, एक टी-शर्ट भी है ।।।रुद्राक्ष की माला को कभी-कभी निकाल कर अपने हाथ में लपेट लेती है और फिर वापस निकाल कर वही रख देती है।

राजा– टी-शर्ट कौन सी रखी है तुमने??
 
ऐसा बोलते में उसके हाथ से छलक कर चाय उसकी शर्ट पर गिर गयी।।

बांसुरी– वाह टी शर्ट रखी है,ये सुनते ही शर्ट खराब कर ली।।लायो उतार कर हमे दो,हम साफ करके ले आते हैं ।।

राजा– क्या बात है बंसी !! हमें शर्ट लेस देखने की बड़ी जल्दी है तुम्हें ।।

बांसुरी– बकवास बन्द करो ,और लाओ इधर दो

राजा– पर ये टी शर्ट तुम्हें मिली कहां से??

बांसुरी– और कहां से मिलेगी तुम्हारी जिम से।। जिस दिन हम जॉइनिंग के लिए निकल रहे थे उस दिन जिम गए थे तब प्रिंस से बोलकर तुम्हारे लॉकर से तुम्हारी यह टीशर्ट निकलवा ली थी हमने,, और अपने साथ ले आए इसमें तुम्हारी खुशबू बसी है आज तक वैसी की वैसी रखी है।।

राजा–  छी फिर मैं नहीं पहनूंगा  बिना धुली गंदी टीशर्ट।।

बांसुरी– अरे अपने कपड़ों के साथ इसे भी धोते थे बाबा !! और फिर से तुम्हारा परफ्यूम डालकर आयरन करके वापस रख देते थे,साफ है पहन लो।

राजा ने हंसते हुए कपड़े बदले और माला को अपनी कहानी सुनाने बैठ गया।
      प्रिंस प्रेम और निरमा, पिंकी और रतन, बंटी और रानी,रेखा और लल्लन युवराज भैया रूपा भाभी अम्मा बाबूजी दादी बुआ जी जितने लोग उनकी प्रेम कहानी का हिस्सा थे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सबको दोनों ने याद किया।।। पूरी कहानी में दोनों जाने कितनी बार पागलों की तरह हंसे और बहुत बार दोनों की आंखें  भीग गई।।

बांसुरी– प्रिंस कैसा है राजा?? कानपुर छोड़ने के बाद से तो उसने हमसे कभी बात ही नहीं की!!

राजा– तुम से सब नाराज जो हो गए थे,, तुम उनके हीरो को छोड़कर जो चली आई थी।।

बांसुरी मुस्कुरा कर रह गयी__” बात तो करी जा सकती थी ना!!”

राजा– हां बात तो करी जा सकती थी पर एक-एक कर ऐसी छोटी-छोटी बातें जुड़ती चली गई कि सब का गुस्सा बढ़ता ही चला गया।। उस दिन तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारे एग्जाम वाले दिन हमने चिट्ठी लेकर प्रेम को तुम्हारे सेंटर भेजा था तुमने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि उल्टे पैरों उसे बिना हमारी चिट्ठी पढ़े ही वापस भेज दिया…. इस बात के बाद से हमें तेज बुखार आ गया हमें बुखार में पड़े देखकर अम्मा पसीज गई और तुम्हारे घर गई बंटी को लेकर तुम्हारे और हमारे बारे में बात करने चली गयी।। तुम्हारी बुआ ने हमारी अम्मा को भी खोटे सिक्के सा वापस भेज दिया।।उसके बाद हम बीमार पड़ गए बहुत बीमार पड़ गए थे बंसी !!इतने बीमार कि हमें लेकर युवराज भैया को मुंबई तक दौड़ लगाना पड़ा पर इसके बाद भी तुमने हमारी कोई खोज खबर नहीं ली इस घटना के बाद घर में सब टूट गए हर किसी ने अलग-अलग हमें कसम दे दी कि हम अब तुमसे कोई संबंध ना रखें तुम्हें भूल जाए पर क्या हमारे लिए यह संभव था कि हम तुम्हें भूल जाते ।।

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    अविश्वास से राजा को देखती बांसुरी की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बहती रही जिसे पोंछने की उसने कोई कोशिश नहीं की उसने बहुत धीमी सी आवाज में राजा से पूछा “क्या अम्मा जी खुद हमारे घर आई थी”?

राजा– हाँ अम्मा खुद गयी थी।।

बांसुरी– राजा हमारा विश्वास करो किसी ने इस बारे में हमें कुछ नहीं बताया !!हमें समझ नहीं आ रहा कि हमारी मम्मी तक ने हमें कुछ  क्यों नहीं बताया।। हमसे सच में बहुत भूल हुई हमें दोबारा तुम्हें फोन करना चाहिए था,, कानपुर से निकलने के बाद जब हम पहली बार ज्वाइन करने गए तो हमने एक ही बार तुम्हें फोन किया रूपा भाभी से थोड़ी बहस हो गई…… और फिर हमारा दिमाग गरम हो गया उसके बाद कई बार सोचा और फोन भी उठाया लेकिन हिम्मत ही नहीं पड़ी तुमसे बात करने की….
     हमें माफ कर दो राजा अब तुम रूपा भाभी अम्मा जी कोई हमें कुछ भी कह ले कितना भी सुना ले हम अब तुम्हें छोड़कर कभी नहीं जाएंगे।।

    बांसुरी सर झुकाए रोती रही राजा अपनी जगह से उठकर बांसुरी के पास आया और उसने उसे गले से लगा लिया।। इन दोनों को अपने आंसुओं में भीगा देख माला वहां से उठकर चुपचाप चली गई कुछ देर बाद एक ट्रे में दो गिलास  में पानी और तीन कप चाय लिए वह वापस चली आई।

माला– मुझे लगता है अब हमारे लव बर्ड्स की सारी शिकायतें दूर हो गई होंगी,अब ऐसा करो आंसू पोछो ,चाय पियो और बंसी तैयार हो जाओ ,सिद्धार्थ सर के घर भी तो जाना है।।

  बांसुरी आंखें पोंछ कर तैयार होने अंदर चली गई माला ने रेडियो पर एक गाना ट्यून किया और फोन पर कैब बुक करने दरवाजा खोलकर बाहर निकल गई राजा वहीं सोफे पर दोनों हाथ सीने पर रखें आंख बंद करके लेट गया__

       मोहे लगे प्यारे सभी रंग तिहारे
       सुख दुख में हर पल रहूं संग तिहारे
       मगन अपनी धुन में रहे मोरा सैयां
       पग पग लिए जाऊं मैं तोहरी  बलैया।।

राजा आंखें बन्द किये लेटा रहा और बांसुरी वही खड़ी उसे देखती रही।।गाना खतम होते ही राजा ने आंखें बन्द किये हुए ही कहा__

राजा– मन भर कर निहार लिया हो हमें तो अब जाकर तैयार भी हो जाओ वरना तुम्हारे सिद्धार्थ सर गोली मार देंगे हमें ।।
    बांसुरी लजा कर तुरंत अन्दर चली गयी।।

   कुछ देर बाद तीनो कैब में सवार सिद्धार्थ के घर की ओर निकल पड़े,,रास्ते मे बांसुरी को अचानक कुछ याद आ गया__

बांसुरी– राजा एक बात बोलूं नाराज तो नहीं होंगे

राजा– हां बोलो

बांसुरी– यहां एक गणपति मंदिर है बहुत मानता ( मान्यता) है उनकी!!  बहुत दिनों से हमारी इच्छा थी की कभी जब हमारे बीच सब सुलझ जाए तब तुम्हारे साथ हम उनके दर्शन को जाएंगे क्या हम वहां चल सकते हैं??

राजा– इसमें पूछने की क्या बात है बंसी उन्हीं के कारण तो आज हम एक हो पाए हैं।। हमने भी बड़े हनुमान जी के पास अर्जी लगा रखी थी,, अब जब तुम कानपुर आओगी ना ,तो तुम्हें वहां भी लेकर जाना है।।

   कुछ आगे जाकर उन्होनें कैब छोड़ दी और तीनों मन्दिर के लिये मुड़ गये। तीन चार छोटी छोटी गलियां पार करने के बाद आखिरी गली के छोर पर बड़ा सा गणपति मंदिर था।। तीनों ने वहां के सदर दरवाजे से अंदर प्रवेश किया ,,प्रांगण को पार करते जब वह मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचे तभी पंडित जी ने आगे बढ़कर कपाट बंद कर दिया।।

माला– अरे यह क्या हो गया यह तो अच्छा नहीं माना जाता है।। मंदिर पहुंचो और दर्शन भी ना मिले।। है ना बंसी अपशकुन होता है ना यह।।

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बांसुरी– पंडित जी थोड़ा सा कपाट खोल दीजिए ना हम बस झांक कर ही  दर्शन कर लेंगे और तुरंत चले जाएंगे।
   बांसुरी की बात पर पंडित जी ने कान तक नहीं दिए और अपने काम में लगे रहे। भीड़ एक-एक कर प्रसाद और फूल समेटे छन्टने लगी ।।
      तीनों बहुत देर तक इधर-उधर कोशिश में रहे कि शायद कोई पंडित कपाट खोल दे पर वह बंद कपाट फिर नहीं खुले।।
     ना चाहते हुए भी बांसुरी के मन में अजीब सा संशय घर कर गया,, उसे वह अपशगुन वाली बात अच्छी नहीं लगी।। बार-बार उसके मन में यह डर बैठने लगा कि कहीं फिर से वह राजा को खो ना दे।।

   तीनों वहां से निकल कैब बुक कर सिद्धार्थ के घर पहुंच गए।।
       उनके वहां पहुंचने तक में लगभग सभी मेहमान आ चुके थे ।।अपने साथ के लोगों के साथ राजा भी बातचीत में व्यस्त हो गया।।

नायर– क्या बात है आरके!! तुम तो बहुत पंक्चुअल हो आज कैसे लेट हो गए??

राजा– सर हम निकल तो टाइम पर गए थे पर एक बिल्ली रास्ता काट गई।।

    हँसते हुए राजा ने बांसुरी को देखा और वापस अपने साथियों के साथ बातों में लग गया।।
    बनावटी गुस्सा दिखाते हुए बांसुरी भी माला के साथ रसोई में सिद्धार्थ की माँ की मदद करने चली गयी।।

     रसोई मे तीनों औरते खाने की तैयारियों मे लग गयी,वहीं बातों बातों मे माला ने सिद्धार्थ की माँ को मन्दिर वाला किस्सा भी कह सुनाया जिसे सुन उन्होनें भी माला की अपशगुन वाली बात पर अपनी मोहर लगा दी,इस सब को सुन कर बांसुरी का मन और बुझ गया,अब वो किसी भी हाल में राजा से अलग नही होना चाहती थी….आखिरकार उसने सोच लिया कि किसी तरह आज राजा रुक जाये,क्योंकि ऐसे अपशगुन के साथ यात्रा करना कहीं से भी सही नही रहेगा,,अगर दो दिन राजा रुक जाये तो वो भी छुट्टी लेकर उसके साथ ही कानपुर चली जायेगी।।
    ऐसा सोचने के बाद उसके मन को तसल्ली मिली और एक बार फिर वो पूरे उत्साह से अपने काम में लग गयी।

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        सिद्धार्थ की मां को बांसुरी पहली ही नजर में बहुत भा गई थी वो रसोई में बहुत उत्साह से हर एक दक्षिण भारतीय व्यंजन की रेसिपी और उसके पोषक तत्वों की व्याख्या संदर्भ सहित बांसुरी को समझाती रही।
     सिद्धार्थ को कब क्या खाना पसंद है ,कब ब्लैक कॉफ़ी पीता है कब दूध वाली ,ये सब कुछ सिलसिलेवार बांसुरी को महा उत्साह से बताती उसकी माँ चह्कती रहीं।।बांसुरी के अपने मन में राजा चल रहा था,आगे के दो दिन राजा के साथ कैसे गुजरेंगे उसी खुशी में अपने में मगन बांसुरी भी पूरी लगन से उनकी बातें सुनती रही और कहीं उन्हे ये ना लगे की वो कहीं और खोयी है इसलिये बीच बीच मे अपनी तरफ से सवाल भी करती गयी।।

    जब सारे लोग बैठक में खाने पीने में लगे हुए थे बांसुरी ने इशारे से राजा को बालकनी मे बुलाया और अपनी घबराहट, और उसके दो दिन बाद साथ साथ निकलने वाला प्रस्ताव भी रख दिया, जिसे राजा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया__

राजा– बस इतनी सी बात !! राजा ने मोबाईल निकाल और अपनी शाम की फ्लाइट कैन्सिल कर दी ।।

राजा– अब आज रात को सुकून से बैठ कर दो दिन बाद की तुम्हारी हमारी टिकट बुक कर लेंगे।।अब खुश!!

बांसुरी– बहुत बहुत खुश!!

   बैठक में धीमी धीमी आवाज़ में बजते गाने को सुन अपने धड़कते दिलों  को काबू करते दोनों ही अलग अलग जाकर बैठ गये।।

       ख़्वाब है तू, नींद हूं मैं
        दोनों मिले रात बने
        रोज़ यही मांगूं दुआ
     तेरी मेरी बात बने, बात बने

        मैं रंग शर्बतों का
     तू मीठे घाट का पानी
       मैं रंग शर्बतों का
    तू मीठे घाट का पानी
    मुझे खुद में घोल दे तो
   मेरे यार बात बन जानी

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क्रमशः

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aparna..

शादी.कॉम – 26

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शादी डॉट कॉम-26


      
     “मल्टीनेशनल बैन्क्स की तर्ज पर खालिस देसी बैंक भी अपने कर्मचारियों को इस तरह की पार्टी और आयोजन का झुनझुना पकड़ा कर अत्यधिक परिश्रम  कार्य से होने वाली  मानसिक और शारीरिक थकान को दूर करने का सरल उपाय सिखाने की आड़ में उन पर क्षमता से अधिक कार्य थोप रहे हैं,” उस विषय पर प्रस्तावित अन्तिम दिन की कार्यशाला में सारे आयोजन उसी हिसाब से रखे गये थे।।

   पांचवे दिन के ट्रेनिंग सेशन के अंत में सभी की डिनर की व्यवस्था पास के ही एक फाईव स्टार होटल  में की गयी थी,हल्की फुल्की साज सज्जा के साथ ही बैंक कर्मियों में से कुछ एक द्वारा गीत संगीत पेश करने की भी तैयारी थी,इसके अलावा सवेरे के विषय को अनुपूरक करने कुछ एक छोटे मोटे सहभागिता गेम्स का भी आयोजन किया गया था।।
ये पार्टी पूरी तरह से पारिवारिक थी जिसमे कर्मचारी चाहें तो अपने परिवार को भी लेकर आ सकते थे।

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     तीसरे दिन के अपने सेशन के बाद लंच किये बिना ही राजा जो गया था वो चौथे दिन भी बांसुरी को नही दिखा था,ये कैसा बदला ले रहा था वो,जब तक लिस्ट मे बांसुरी का नाम नही था वो मौजूद था और उसका नाम जोड़ने के बाद खुद गायब हो गया था।।
     पर अन्तिम दिन सारी टीम की उपस्थिति अनिवार्य थी,इसीसे बांसुरी को उम्मीद थी,कि आज तो वो आयेगा और हुआ भी वही,राजा आ गया।।

     ऐश ग्रे साड़ी में धागे से बने गुलाबी बूटे बहुत सुंदर लग रहे थे,और उस साड़ी में संवरी बांसुरी भी।।
    माला और बांसुरी साथ ही बैठे थे कि माईक हाथ में लिये सिद्धार्थ ने गाना शुरु कर दिया

        कब कहाँ सब खो गयी
      जितनी भी थी परछाईयाँ
      उठ गयी यारों की महफ़िल
         हो गयी तन्हाईयाँ
       क्या किया शायद कोई
         पर्दा गिराया आपने

      दर्द-ए-दिल, दर्द-ए-जिगर
         दिल में जगाया आपने……….

  हर एक अंतरे पर बांसुरी को निहारता सिद्धार्थ बडे लय में अंदाज में  गा रहा था…..
    बांसुरी सोच ही रही थी कि अच्छा है राजा नही है,वरना सिद्धार्थ की इस बेशर्मी पर जाने उसके बारे में क्या कुछ सोच बैठता,अभी ऐसा सोच के उसने अपने बालों को पीछे किया ही था कि उसके पीछे थोड़ा हट के एक टेबल से टिक के खड़े राजा पर उसकी नज़र पड़ गयी।।
      गहरे ग्रे रंग की शर्ट और काली पैंट में खड़े राजा पर से उसकी आंखें एकाएक हट नही पायीं।।
     तब तक में राजा ने भी उसे देख लिया लेकिन तुरंत ही दुसरी तरफ मुहँ फेर किसी से बातों मे लग गया।।

      पहले दूसरे दिन तो ऐसी निर्लिप्तता नही दिखा रहा था,अचानक ऐसा क्या हो गया ….
     आज अन्तिम दिन था,आज के बाद राजा वापस चला जायेगा,आज ही का दिन है और यही कुछ पलछिन जिनमें वो अपनी बिगडी बना सकती है,पर क्या करे?? कैसे कहे?? कि राजा आज भी हमे फर्क नही पड़ता कि तुम बैंक अधिकारी हो गये!! तुम्हारी नौकरी लग गयी!!
    हमारे लिये तो आज भी तुम हमारे कानपुर के हमारी गलियों के वही राजा हो,कभी जिसकी ज़ुल्फों के साथ हमारी सांसे ऊपर नीचे होती थी।।

    अपनी सोच मे गुम बांसुरी को अचानक स्टेज की तरफ जाते राजा दिखा और तभी सिद्धार्थ ने राजा को गाने के लिये माईक थमा दिया,थोड़ी ना नुकुर के बाद राजा ने माईक संभाल लिया__


       बावरा मन राह ताके तरसे रे
      नैना भी मल्हार बन के बरसे रे
    आधे से अधूरे से, बिन तेरे हम हुए
    फीका लगे है मुझको सारा जहां
     बावरा मन राह ताके…

     ये कैसी ख़ुशी है, जो मोम सी है
    आँखों के रस्ते हँस के पिघलने लगी
      मन्नत के धागे, ऐसे हैं बाँधे
   टूटे ना रिश्ता जुड़ के तुझसे कभी
     सौ बलाएँ ले गया तू सर से रे
          नैना ये मल्हार…

गाने के प्रवाह में खोयी बांसुरी की नज़र राजा पर से हट ही नही पा रही थी,और वो था कि गाते समय उसने एक बार भी उसकी तरफ देखना ज़रूरी नही समझा।।

     डिनर के लिये कर्मियों के परिवारों का भी निमन्त्रण था,बहुत से कर्मचारी अपने बीवी बच्चों के साथ आये हुए थे।।
     
   राजा ने अपना गीत समाप्त किया और स्टेज पर से उतर ही रहा था कि उसकी नज़र सिद्धार्थ पर पड़ गयी और एक बार फिर उसके मुहँ मे एक कड़वाहट घुल गयी,सिद्धार्थ अपनी माँ को सबसे मिलवाते हुए बांसुरी की तरफ ही बढ रहा था।
     दक्षिण भारतीय पोचमपल्ली साड़ी में एक साधारण सा जूड़ा बनाई हुई सिद्धार्थ की माँ चेहरे से ही बेहद सुलझी हुई समझदार गृहिणी लग रही थी, अकेले ही ज़माने की ठोकरें खाती बेटे की अकेले परवरिश ने उनके चेहरे को एक दिव्य तेज़ से रंग दिया था।।

     बांसुरी स्टेज के दूसरी तरफ अकेली ही खड़ी थी कि सिद्धार्थ वहाँ पहुंच गया__

सिद्धार्थ- बांसुरी इनसे मिलो,ये मेरी मॉम है,and mom she is bansuri ,I’ve already told u about her..

  सिद्धार्थ की माँ ने मुस्कुरा कर बांसुरी का अभिवादन किया कि अपने उत्तर भारतीय संस्कारों में लिपटी बांसुरी ने झट आगे बढ कर उनके पैर छू लिये।।
     बांसुरी का लपक के इस तरह पैर छूना उन्हें मोहित कर गया,उन्होँने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया,अपनी टूटी फूटी अन्ग्रेजी मिश्रित हिन्दी में उन्होनें अगले दिन सुबह के सह्भोज पर उसे भी आमन्त्रित कर लिया।।

    अगले दिन महीने का दूसरा शनिवार होने से बैंक की छुट्टी थी,इसीसे टीम की वापसी के पहले जितने लोग आज रात की फ्लाईट से नही वापस हो रहे थे उन सब को बड़े इसरार के साथ सिद्धार्थ ने अपने घर सुबह के खाने पर बुला लिया था।।
      राजा ने सिद्धार्थ के आग्रह को सिरे से नकार कर अपने आने की असमर्थता प्रकट कर दी थी।।
     कभी किसी आयोजन का हिस्सा ना बनने वाली सिद्धार्थ की माँ एक तरह से टीम को स्वयं आमंत्रण देने ही आयी थी।।

    बांसुरी से जब तक उनकी बातें होती रही,राजा उन्हें  ही देखता रहा,पर जब उसने देखा की वो बांसुरी को साथ लिये उसी की तरफ आ रही हैं, तो वो एकाएक पलट कर दूसरी ओर देखने लगा।।

    ” हेलो ,कैसे हैं आप??”

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  राजा- जी नमस्कार!!! मैं ठीक हूँ,आप कैसी हैं।

” देखिए आप हमारे घर आये बिना नही जा सकते, मैं स्पेशली आप को इन्वाईट करने ही यहाँ  तक आयी हूँ ,कल का लंच आपको हमारे घर पर ही लेना है।”
    पता नही ये उनका स्नेह भरा आग्रह था या आश्चर्यजनक रूप से उनके व्यक्तित्व की अम्मा से समानता पर उस भद्र महिला के आग्रह को फिर राजा ठुकरा नही पाया, आखिर उसने भी झुक कर उनके पैर छू ही लिये।।

   तभी माला हाथ में स्टार्टर की प्लेट थामे वहाँ चली आयी,चार लोगों के बीच अकेली प्लेट पकड़ी खड़ी खुद को देख उसे अपनी भूल का आभास हुआ,और उसने अपनी प्लेट राजा की तरफ बढ़ा दी__

” सर लिजिये ना,आप कुछ ले ही नही रहे।”

” आप इतने प्यार से देंगी तो कोई लेने से कैसे मना कर सकता है।”
   बांसुरी एक बार फिर बुझ के रह गयी,आखिर हुआ क्या है राजा को।।

    पर बांसुरी को अब हर पल यही लग रहा था कि कैसे भी करके इस गलतफहमी को दूर करना ही पड़ेगा,चाहे इसके लिये उसे किसी भी हद तक जाना पड़े ।।

    माला ने उसी समय माईक बांसुरी के हाथ थमा दिया,बहुत सहम के आखिर उसने गाना शुरु किया

    मैं कागज़ की कश्ती, तू बारिश का पानी
           ऐसा है तुझसे अब ये रिश्ता मेरा
          तू है तो मैं हूँ, तू आए तो बह लूँ
            आधी है दुनिया मेरी तेरे बिना
           जी उठी सौ बार तुझपे मर के रे
                 नैना भी मल्हार…

बांसुरी ने बहुत मन से राजा के गाये हुए गाने को ही आगे बढ़ाया,पर उसके गीत को समाप्त करते में राजा वहाँ से जा चुका था।।

     राजा के जाने के बाद फिर बांसुरी का मन भी उस पार्टी से उचाट हो गया,जैसे तैसे समय काटती आखिर वो भी सर दर्द का बहाना बनाये वहाँ से निकल पड़ी ।।

  पार्टी हॉल में नेटवर्क ना होने से कैब बुक नही हो पा रही थी,इसीसे पैदल मेन रोड पर आगे बढ़ती बांसुरी अपने मोबाइल पर सर झुकाये कैब बुक करने में ही लगी हुई थी__

” अरे सम्भल के,ऐसे चलोगी तो गिर पड़ोगी!!

   राजा की आवाज़ सुन बांसुरी ने झटके से ऊपर देखा,सामने से उसीकी तरफ आते राजा को देख उसका चेहरा खिल उठा__

बांसुरी– ऐसे बीच में पार्टी छोड़ कर कहाँ निकल गये।।

राजा– बहुत बेचैनी सी लगने लगी थी अन्दर, इसिलिए बाहर खुली हवा में सांस लेने निकल गया।

राजा– तुम यहाँ कैसे?? पार्टी तो अभी चल ही रही होगी।।

बांसुरी– हाँ हमें भी थोड़ा अच्छा सा नही लग रहा था,इतनी भीड़ भाड़,हल्ला गुल्ला रास नही आ रहा था।तुमने खाना खाया राजा ??

राजा — खा लेंगे….तुम्हें अचानक हमारी फिक्र कैसे होने लगी।।

बांसुरी– अरे ऐसे क्यों बात कर रहे ,,हम फिक्र नही करेंगे तो और कौन करेगा तुम्हारी??

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राजा — जो हमारे लिये बनी होगी वो करेगी।।

बांसुरी– अच्छा !!! कौन है वो ज़रा हम भी सुनें,तुमने बताया ही नही कि शादी के लिये लड़की भी ढूँढ लिये।।

राजा– हाँ जैसे तुमने तो मिलते साथ ही सब बता दिया।।

बांसुरी– क्या बोल रहे हो तुम?? हमे समझ नही आ रहा,कभी भी साफ साफ बोलने की आदत भी तो नही है तुम्हारी।।

राजा– जैसे तुम सब साफ साफ बोलती हो,जब इतनी ही सफाई है बातो में तो अब तक बताई काहे नही कि उससे शादी करने जा रही हो।।

बांसुरी– पगला गये हो क्या?? किससे शादी करने जा रहे हम??

राजा — बनो मत बांसुरी!! सिद्धार्थ ने हमे सब कुछ बता दिया है।।

बांसुरी– अरे बाबा क्या बता दिया उसने,,हमें भी तो बताओ।।

राजा– यही कि तुम दोनों शादी करने वाले हो।।

बांसुरी– पगला गये हो क्या तुम?? एक बात बोले चाहे तुम कितने बड़े ऑफीसर बन जाओ ,
रहोगे गधे के गधे ,,  उसने कहा और तुमने मान लिया,अरे एक बार हमसे पूछना तो था।।

राजा — सवाल पूछने और जवाब देने का कोई रस्ता पीछे छोड़ गयी थी क्या ,जो हम कुछ पूछ पाते।।

बांसुरी– तुमने भी तो आवाज़ नही दी पीछे से….क्या इतनी सी बात पे कोई ऐसा जीवन भर का बैर मोल लेता है।।कहते कहते बाँसुरी की आंखें भीग गयी

   राजा ने आगे बढ़कर बांसुरी के दोनो हाथ अपने हाथों में ले लिये एक हाथ से उसके बहते आँसूं पोंछ उसकी आंखों में झांकते हुए उसने कहा__

राजा– आज भी तुमसे उतना ही प्यार करते हैं बांसुरी, कभी भूल ही नही पाये तुम्हें ।।
हमारे अनपढ़ होने से हमे छोड़ गयी यही सोच सोच कर पागल हो गये,और तुम्हारे जाने के बाद पढ़ने की ऐसी लत लगी की पागलों के समान किताबों में  ही घुसे रहने लगे,किताबें ही जीवन हो गयी थी हमारे लिये…..तुम्हारे बिन सब कुछ कितना फीका हो गया था ,कितना बेरंग !! चाय भी अच्छी नही लगती थी, फिर भी पीते थे,सिर्फ और सिर्फ तुम्हें याद करने के लिये…..जिम छूट गया!! दोस्त छूट गये!! यहाँ तक की हमारी खुद की तबीयत हमसे रूठ गयी पर तुम नही छूटी,कितना याद किया ये कैसे बताएँ क्योंकि तुम तो हमारे अन्दर ही समा गयी थी,इस कदर हमसे जुड़ गयी थी कि सोते जागते दिमाग में एक ही नाम चलता था ….बांसुरी!!

   बांसुरी के आँसू रूकने के बजाय बहते चले जा रहे थे,और अब राजा के आँसू भी उसका साथ दे रहे थे।।

बांसुरी– तुम्हें क्या लगता है,हम यहाँ बहुत खुश थे,किसी से तुम्हारे बारे में पूछ नही पाते थे,प्रिंस प्रेम सबने हमसे बात करना बन्द कर दिया,यहाँ तक की निरमा ने भी,,बस बुआ की चिट्ठी में कभी कोई हाल तुम्हारा मिला तो मिला,वर्ना कुछ नही।।

राजा– एक बार फोन भी तो कर सकती थी ना, राजा जिंदा है या मर गया,जानने की भी इच्छा नही हुई तुम्हारी ।।

बांसुरी–तुम तो फिर भी अपने अम्मा बाऊजी के साथ थे युवराज भैय्या के साथ थे,,हम तो यहाँ एकदम अकेले हो गये थे!! कभी तुम्हें नही लगा कि अकेले क्या कर रही कैसे जी रही एक बार फोन ही कर लूँ ।।
      कभी कहीं से गुजरते और तुम्हारे पर्फ्यूम की खुशबू आ जाती तो पागलों जैसे इधर से उधर भटकते फिरते,तुम्हें ढूंढते रहते थे,जबकि जानते थे की तुम यहाँ नही हो।।
     हमारे पागलपन की हद बताएँ राजा,तुम्हें हमेशा अपने पास महसूस करने के लिये लड़की होते हुए भी तुम्हारा जेंट्स पर्फ्यूम लगाते हैं,माला जाने कितनी बार इस बात पर हमारा मजाक भी बना चुकी है,पर हमे अपने कपडों से आने वाली तुम्हारी खुशबू ही भाती है ,क्या करें।।

     दोनो एक दूसरे का हाथ थामे एक दूसरे की आंखों में इतने सालों के अपने पलछिन देखते हुए सवाल जवाब में लगे थे कि अचानक राजा बांसुरी के चेहरे पे झुकने लगा__

बांसुरी– क्या कर रहे हो ये राजा ??

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राजा– उस शाम एक काम अधूरा रह गया था बंसी …… आज वही पूरा करने जा रहे …..

मुस्कुराते हुए बांसुरी ने राजा को पीछे धकेल दिया

बांसुरी– इतनी सारी शिकायतें जमा कर रखी है हमने,उन्हें सुनने की फुरसत नही है?? आये बड़े प्यार करने वाले….

राजा– कर लेना बाबा, शिकायतें भी कर लेना,,सब सुन लूंगा……
      राजा ने अपने दोनो हाथों में बड़े प्यार से बांसुरी का चेहरा पकड़ा और….
   ” पहले उस रात का हिसाब तो पूरा कर लेने दो।”

बांसुरी– नही ,पहले हमारी बात सुनो!! क्या कह रहे थे सिद्धार्थ सर ,मुझसे शादी करेंगे,हो चुकी तब तो।।तुमने कहा नही उनसे कि बांसुरी सिर्फ और सिर्फ राजा की है,और राजा से ही बांसुरी की शादी होगी।।

राजा– नही कहा!! लेकिन कल उनके घर जायेंगे ना तब कह देंगे,,अब खुश!!

बांसुरी– हाँ बहुत बहुत खुश ।।

राजा– तो फिर आओ इधर।

बांसुरी– कब से देख रहे हैं,घूम फिर के एक ही जगह तुम्हारा कांटा अटक जा रहा

राजा– इत्ते साल से इन्तजार भी तो किया है तुम्हारा बन्सी!!!
      मुस्कुराती हुई बांसुरी आगे बढ़ कर राजा के गले से लग गयी,और राजा उसके चेहरे पे झुकता चला गया।।

क्रमशः

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aparna..

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शादी.कॉम -23

मुलाकात : राजा और बांसुरी की

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   शादी डॉट कॉम:- 23

     समय!!! समय को किसी से लेना देना नही होता, उसे सिर्फ चलना है ,चाहे कोई लाख चाहे की वो रुक जाये ठहर जाये ,पर नही समय अपनी गति से ही भागेगा।।

      इन पांच साढ़े पांच सालों में राजा और बांसुरी के घरों में परिवारों में मुहल्ले में बहुत कुछ बदल गया।
   युवराज भैया ने दो नयी एजेंसी डाल दी,सिर्फ रुपयों पैसों मे ही उनका रुतबा नही बढ़ा बल्कि घर परिवार में भी बढ़ गया,जहां पहले वो घर के सबसे बड़े लड़के थे अब एक छोटे से बालक के पिता हो गये, रूपा पहले ही अभिमानिनी थी अब पुत्र की जननी होकर उस अभिमान के सोने पे सुहागा चढ़ गया।।
     खाता पीता परिवार सदा मधुमक्खियों के छत्ते सा होता है,छत्ते में एकत्र मधु के लालच में जैसे मक्खियां भिनकती हैं ऐसे ही नाते रिश्तेदार घेरे रहते हैं ।।
   
    राधेश्याम जी के घर पर भी बेला कुबेला कुछ ना कुछ होता ही रहता था,कोई तीज त्योहार,मुंडन छेदन,सीक सुहागिल हो,इसी बहाने घर परिवार की औरतों को बहाना मिल जाता,पहले तो सब दबी ढकी आवाज़ में ही राजा के ब्याह के प्रगति पत्र का जायजा लेती थी,पर अब वही ज़बान खुलने लगी थी।।
     जब घर की माल्किन ही मुहँ मे दही जमा के बैठी हो तो बोलने वालियों को मौका तो मिल ही जायेगा ना।।
    
” काये हो सुशीला बहन?? कब खिला रही हो रजुआ के ब्याह का लड्डू।”
     पड़ोस की बिन्नी काकी अपनी मित्र मंडली में अपने मुहँफट स्वभाव के लिये जानी जाती थी

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” अरे बिन्नी जिज्जी हम तो सुन रहे रजुआ कहीं का बड़ा आफीसर बन गया है,,क्यो सुसीला  तुम नही बताई कभी ,अरे कहाँ का लार्ड कमिस्नर हो गया है राजा।”

” अरे तुम लोग  भी ना!! अपने अपने कोच के पेड़े को निहारो ना,सुहागिल तो निबटने दो तब हम बताएंगे कहाँ का लार्ड गवर्नर बना है हमारा राजा।”

“चाची जी!! लल्ला जी के लाने ही तो अम्मा जी सुहागिल खिला रही हैं,जो मन्नत मानी थी वो पूरी जो हो गयी।।”

” हां भई रूपा !! अब तो जैसे तुम्हरे कन्हैय्या को गोद खिला रही ऐसे ही एक और बहुरिया आ जाये उसका भी एक आध लड़का लड़की कुछ हो जाये बस फिर तो सुसीला और भाई साहब के सब तीरथ हुई जायें।”

” तुम्हरे मुहँ मा घी सक्कर।।”

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         जी में आता है, तेरे दामन में सर झुका के हम
               रोते रहें, रोते रहें…….
        तेरी भी आँखों में, आंसूओं की, नमी तो नहीं
        तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई, शिकवा, तो नहीं..
       तेरे बिना ज़िन्दगी भी लेकिन, ज़िन्दगी, तो नहीं
       ज़िन्दगी नहीं, ज़िन्दगी नहीं, ज़िन्दगी नहीं……

माला– ओ मैडम !! और कोई गाना नही है आपके पास!!क्या यार,सुबह सुबह यही मनहूस गाना बजा देती हो।।

   माला की बात पर बांसुरी मुस्कुरा के वापस तैयार होने लगी….

माला– बस यही तो है!! आपसे हम कुछ भी कह लें आप बस अपनी कातिल मुस्कान फेंक दीजिये हम पे

बांसुरी- चलो चलो जल्दी से तुम भी तैयार हो जाओ, आज  बॉस ने तो सुबह सुबह ही मीटिंग बुलाई है।

माला- हाँ जी मुझे पता है, सुनने में आ रहा था की आर.बी.आई. की टीम आने वाली है।।

  बाँसुरी ने हाथ पे घड़ी बांधते हुए हामी में सर हिला दिया।।

     अम्बा जी गढी से एक साल पहले ही बांसुरी को अपनी दुसरी पोस्टिंग पुणे में मिल गयी थी, पहले पहल वर्किंग वीमेंस हॉस्टल मे  रहने के कुछ समय बाद सदाशिव पेठ में बांसुरी अपने ऑफिस की कुलीग माला के साथ शेयरिंग फ्लैट में  रहने चली आयी थी…..
        दोनों सखियाँ साथ ही ऑफिस आती जाती,
मस्तमौला और हंसमुख स्वभाव की माला बेहद बातूनी थी इसीसे उसके स्कूल कॉलेज घर परिवार ,पास के दूर के नाते रिश्तेदार हर किसी के बारे में बांसुरी को सब कुछ पता था,पर माला के बार बार पूछने पता करने पर भी जाने क्यों बांसुरी ने उससे उतनी ही बातें बताईं जितनी ना बताती तो भी कोई फर्क नही पड़ता।।

      बांसुरी का अपने घर जाना बहुत कम हो गया था,हर रविवार वो अपनी मम्मी को फोन कर घर परिवार का हाल समाचार लेती रहती थी, गाहे बगाहे बड़ी बहन वीणा भी उसे फोन कर शादी कर लेने का उलाहना सुनाती रहती थी।।

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     मम्मी पापा से बात कर घर की ,अपने मोहल्ले की अपने शहर की याद जब हद से ज्यादा सताने लगती तब वो अपनी छोटी सी टाउनशिप में बने बड़े से जिम पहुंच जाती,माला इस बात पे अक्सर उसे आड़े हाथों लिया करती __ ‘ अरे कभी समय भी तो देख लिया कर,,रोज़ तो सुबह सुबह जिम पहुंच ही जाती है,फिर अचानक क्या होता है तुझे जो कभी शाम मे कभी रात में 9 बजे जिम भाग जाती है, यार फिटनेस फ्रीक होना अच्छी बात है पर तू तो साइको होती जा रही है,अपने आप को देख ….बिल्कुल जीरो फिगर हो गयी है,कहीं कुछ समय बाद गायब ना हो जाना।।

      ” तेरी तो हर बात अजीब ही लगती है बन्सी!! अब इस मोबाइल के ज़माने में चिट्ठियां कौन लिखता है तुझे,,किसी दिन तेरे इस पेन फ्रेंड को पकड़ के रहूंगी।”
   पर माला बस ताने मार के अपनी बात खुद भूल जाती,इतने महिनों से आने वाली चिट्ठियों को ना कभी उसने पढ़ने की कोशिश की और ना चिट्ठी भेजने वाले को पकड़ने की।।
      हर पन्द्रह बीस दिन में आने वाली इन चिट्ठियों में जैसे बांसुरी की जान बसती थी,, बुआ की लिखी इन चिट्ठियों में सारे रिश्तेदारों का हाल समाचार रहता था,पर कहीं किसी कोने में बुआ हमेशा उसके बारे में भी एक लाइन लिख ही जाती थी और उसी एक नाम की अमृत बूंद पूरे महीने के लिये बांसुरी को जीने का बहाना दे जाती।।
      ” क्या बताऊँ छोरी!! तेरे पीछे से रजुआ ने तो घर से निकलना ही छोड़ दिया है।।”
  
    ” बिटिया सुनने मे आ रहा सुसीला का छोरा भी कोई परीक्षा दे रहा।।”
  
      ऐसे ही समय समय पर बिना बांसुरी के पुछे भी बुआ जी राजा के बारे में यत्न पूर्वक हर खबर उसे दे जाती।
    
      “कितना दुबला गया है का बताएँ लाड़ो,लम्बा तो पहले ही भतेरा था,अब तो पूरा ताड़ लगने लगा है।”
   
      ” सुना है सुसीला ने जहर खाने की भी धमकी दे डाली सादी कराने,,,पर मजाल लड़के के कान में जूं भी रेंग जाये।”
    
      “बिटिया कोई कोई तो जे भी कह रहा की रजुआ दीछा उक्छा (दीक्षा) लेने वाला है।”
     
       ” मुझे तो कभी कभी डर लागे है छोरी,जे छोरा किसी कनफड़े गुरू की शरण में हिमालय ना निकल जाये।”

    ऐसे ही बताने योग्य-अयोग्य हर बात बुआ जी बिना किसी आडम्बर के लिख जाती और मात्र उस एक पंक्ति में छिपे अपने जीवन की सार्थकता को बड़े यत्न से बांसुरी अपनी इत्र से सुवासित हाथी दांत की बनी डिबिया में सहेज लेती ।
      जैसे उसके जीवन में अब दो ही महत्वपूर्ण बातें बची थी,एक रोज़ का जिम और दूसरा बुआ जी की चिट्टीयां।।

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     दोनों भागती दौड़ती स्टॉप पे लगभग समय से पहुंच ही जाती थी,उनके बैंक की गाड़ी उन्हें लेने और छोड़ने आया करती जिसमें उनके अलावा आस पास के और भी एम्प्लायी हुआ करते।
     और दिनों की तरह उस दिन भी गाड़ी में सब होने वाली मीटिंग की चर्चा में लगे थे।।

” बांसुरी यार तू संभाल लियो ज़रा।। उस बड़बोले सिद्धार्थ की तेरे सामने ही बस बोलती बन्द रहती है,वर्ना हम सब को तो वो आंखो से ही गोली मार देता है हिटलर!।।

” शट अप राहुल!! फिजूल में बांसुरी को परेशान ना करो,और बॉस के बारे में ऐसा बोलते शरम नही आती।।”

” नो माला!! बिल्कुल शरम नही आती,उस खबीस बॉस को शरम आती है,इतनी सारी लड़कियों के सामने मुझ जैसे हैण्डसम बन्दे को यूँ लताड़ देता है, फिर!!! मुझे तो उसे कमीना बोलने मे भी शरम नही आती।।

” कम ऑन राहुल!! जब तुम बॉस बनोगे तब तुम भी ऐसे ही हो जाओगे,क्यों है ना बांसुरी ।।”

  बांसुरी मुस्कुरा के रह गयी

” बांसुरी यार कहाँ खोयी रहती है तू,बस हर बात का एक ही जवाब,तेरी स्माईल !! कोई लड़की इतना कम भी बोल सकती है मैनें कभी सोचा भी ना था,चलो यार भागे,,जल्दी से तैयारी कर लेते हैं,सिद्धार्थ आता ही होगा।।”

   कॉर्पोरेट जगत को कई मायनों में अन्ग्रेजी सभ्यता का अनुगामी माना जा सकता है,व्यवसायिक पाठ्यक्रमों में जहां सीनियर्स के लिये सर और मैडम बोलना प्रारंभ हुआ वही कॉरपोरेट में चाहे आपका सीनियर आपसे 30 साल भी बड़ा हो पूरे आदर के साथ उनका भी नाम ही लिया जाता है।

  बांसुरी के बैंक में भी कई सहकर्मी थे हर आकार प्रकार के,अलग अलग धर्म -जाति और उम्र के।।
    बांसुरी का ऑफिस का कार्य लोन इत्यादी से सम्बंधित था जहां उसे सिद्धार्थ को रिपोर्ट करना होता था,सिद्धार्थ 29-30 साल का नौजवान था जिसने बैंकिंग में कई श्रेणियाँ उत्तीर्ण कर अपने लिये यथोचित स्थान और सम्मान कमा लिया था।।

सिद्धार्थ- हेलो फ्रेंड्स ,जैसा की आप सभी जानतें हैं, आर बी आई का दौरा होने वाला है,और हमे इस बार उनकी हर बात उनकी हर चुनौती के लिये तैयार रहना है।।
     उनकी सबसे ज्यादा नज़र लोनधारकों से जुड़ी है,तो मैं चाहता हूँ बांसुरी,राहुल और नेहा आप तीन लोग टीम बनाकर इस काम में लग जायें।
    किसी भी खाता धारक के पेपर्स अधूरे नही होने चाहिये,कोई भी रैंडम पेपर्स वो लोग मांग सकते हैं।
         बड़ी सरकारी डील्स,एन जी ओ के साथ हुई डील्स और बड़ी ज़मीनों के लीज वगैरह के कोई पेपर कच्चे ना रहे,और हो सके तो आप लोग एक बार क्या क्या पूछा जा सकता है उनके जवाबों की रिहर्सल भी कर लेना,,ओके गाईज़।


 
   इसी तरह की कई अति महत्वपूर्ण चर्चाओ को निबटा कर सिद्धार्थ अपने केबिन में चला गया।।

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  ” भई हम तो सिर्फ टाईम पास कर रहे यहाँ,काम तो बस दो ही बन्दे करते हैं एक सिद्धार्थ दूसरा बांसुरी।”

  ” क्यों राहुल,ऐसा क्यों बोल रहे।”

   ‘” और क्या ,सही तो कह रहा हूँ,बन्दे को और कोई तो नज़र ही नही आता,सारी प्लानिंग्स बस एक ही को बताईं जाती हैं बांसुरी मैडम को,अमा यार हम भी खड़े हैं,जब हमारा नाम ले रहे हो तब तो हमें देख लो, यार बांसुरी इसने तुझे अब तक प्रपोज़ कैसे नही किया।।”

   बांसुरी- बकवास मत करो राहुल!! सिद्धार्थ को लगता है कि हमें जल्दी से कुछ समझ नही आता इसिलिए हमे ही सब कुछ एक्सप्लेन करते हैं।”

   राहुल- वॉव ग्रेट!! अच्छी जोड़ी है तुम दोनो की,सच कहता हूँ बांसुरी तुम सोच सकती हो बन्दे के बारे में,अरे दक्षिण भारतीय है तो क्या हुआ है तो वेदुला ब्राम्हण।।नार्थ वेद्स साऊथ,बेहतरीन जोड़ी जमेगी।”
      राहुल की बात अनसुनी कर बांसुरी अपने डेस्क पे चली गयी,राहुल की हमेशा की ही आदत थी जिसे बांसुरी ही क्या कोई भी गम्भीरता से नही लेता था, पर यही हँसी मजाक की बातें सिद्धार्थ के कानों में भी पहुंचने लगी थी।।

      29 साल का सिद्धार्थ तेलुगू ब्राम्हण परिवार का इकलौता लड़का था,इंजिनीयरिंग की पढ़ाई के दौरान ही विदेशों में आगे की पढ़ाई के लिये की जाने वाली टफेल में सफल नही हो पाने के बाद उसने प्रथम प्रयास में ही बैंक पी.ओ.का इम्तिहान पास कर लिया था,और उसके बाद सिलसिलेवार अपनी मेहनत और बुद्धि के बल पर अच्छे खासे सिनियर्स को पीछे छोड़ते हुए वो उच्च पद पर आसीन था।

       पढ़ा लिखा नये ज़माने का सिद्धार्थ जो पहले बात बात पे शादी का माखौल उडाया करता था,उसके लिये उसके कैरियर से अधिक कोई बात महत्वपूर्ण नही रही थी,पर अब इधर कुछ दिनो से शादी ब्याह को लेकर गम्भीर होने लगा था,एक दिन हँसी मजाक में उसने अपनी माँ से पूछ भी लिया__ कि अगर वो किसी उत्तर भारतीय कन्या से विवाह करना चाहे तो क्या उसकी माँ को आपत्ति हो सकती है के जवाब में उसकी माँ ने आगे बढ़कर अपने बेटे का माथा चूम लिया और उसकी खुशी में ही अपनी खुशी का ठप्पा लगा दिया था।।
         
       दुबली पतली सांवली सलोनी चुप चाप अपने काम में लगी रहने वाली बांसुरी पहली ही नज़र में उसे बहुत भा गयी थी,पर आज तक किसी बहाने भी सिद्धार्थ उससे अपने दिल की बात नही कह पाया था…..
     नये साल की पार्टी में जब उसे जबर्दस्ती माईक पकड़ा दिया गया था तब कितने मन से उसने बांसुरी की तरफ देखते हुए गाया था__

    एक अजनबी हसीना से यूँ मुलाकात हो गयी
  फिर क्या हुआ ये ना पूछो कुछ ऐसी बात हो गयी।

   उसी के बाद से राहुल और ऑफिस के कुछ एक उसके हमउम्र सहकर्मी बांसुरी को उसके नाम से छेड़ने लगे थे,उसे अपने केबिन से ये सब हल्की फुल्की गपशप सुनना बड़ा पसंद आता था पर आज तक उसके नाम पे बांसुरी को चहकते उसने कभी नही देखा था,बल्कि नये साल की पार्टी वाले दिन भी जब सबने उसे गाने का इसरार किया तब भी कैसा तो मनहूस सा गाना गाया था उसने__

     तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नही…

पर जो भी हो ,उसे धीर गम्भीर सी चुप चाप सी रहने वाली बांसुरी ने मोह लिया था। इसिलिए इतना ध्यान रखने पर भी कोई ना कोई चूक उससे हो ही जाती थी, जब कभी बांसुरी के साथ बाकी लोगो को वो काम के बारे में कुछ भी बताया करता उसकी नज़रे सिर्फ और सिर्फ बांसुरी पर ही टिकी होती।
 
    आज की इतनी महत्वपूर्ण मीटिंग में भी यही हुआ।

    इस मीटिंग के पूरी होते ही सारे लोग अपने अपने क्यूबिक पे जाकर काम पर जुट गये।।
     वैसे तो आर बी आई की टीम इसके पहले भी विज़िट पे आ चुकी थी,पर वो विजिट तकरीबन 8 साल पहले हुई थी,इसीसे इस बार तैयारियाँ कुछ अधिक ही उफान पर थी,इस बार 3 लोगों की टीम आ रही थी जो पूरे पांच दिन रह कर अलग अलग विषयों पर बैंकर्स को ट्रेनिंग देकर और उनका ऑडिट कर जाने वाली थी,जिनमें शुरु के दो दिन ऑडिट के थे और बाकी के दिन ट्रेनिंग के।।

    सभी को ऑडिट का ही डर सता रहा था,जितनी भी इमानदारी बरती जाये कही ना कहीं कोई ना कोई फाइल ऐसी कच्ची रह ही जाती है जिसपे ऑडिटर की पैनी नज़र पड़ ही जाती है।
     
   अपना काम जल्दी निपटा कर बांसुरी माला के क्यूबिक में पहुंची__

बांसुरी-” क्या हुआ माला मैडम?? अभी तक समेटा नही ,सब का सब फैला पड़ा है।।”

माला- अरे नही यार!! ये कहाँ कहाँ से आते है धारक!!बोल बोल के हम बैंकर्स मर जायेंगे पर मजाल है जो ये लोग सारे के सारे पेपर्स एक बार में जमा कर दें,खैर तूने कर लिया क्या सारा काम।

बांसुरी- हाँ डाटा हैंडलिंग तो कर ली सारी,बाकी भी फाइल्स कर ली है ,कुछ थोड़ा सा चेक करना है वो रूम पे हम कर लेंगे,तुम्हें और कितना समय लगेगा।

माला- क्यों तुझे निकलना है क्या??

बांसुरी- हां ….वो आज मंगल है ना हमे मन्दिर जाना है।

माला- अरे हाँ यार!! मैं भूल कैसे गयी?? तेरा तो हर मंगलवार एपॉइंटमेंट रहता है ना हनुमान जी के साथ, तो तू निकल ले,मैं सीधे रूम पे ही पहुंचती हूँ ।।और बन्सी यार आज कुछ अच्छा सा पका लेना खाने में,बॉस ने आज कुछ ज्यादा ही पका दिया ऑफिस में ।

बांसुरी- नाम भी बता दो डिश का ,क्या खाना है।।
  हँसते हुए बाँसुरी अपना बैग लटकाये माला से विदा लेकर मन्दिर के लिये निकल गयी।।

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   ऑफिस से मन्दिर दूर था,जल्दी जल्दी भागती दौड़ती बांसुरी ने बस पकड़ी और आरती शुरु होने के पहले पहुंच गयी।।
     मंदिर की भीड़-भाड़ में उसे आज काफ़ी पीछे खड़े होना पड़ा,अपनी जगह पर खड़ी दोनो हाथ जोड़े वो वापस अपने शहर पहुंच गयी थी।
    इसिलिए तो शायद हर मंगलवार वो यहाँ आया करती थी,यहाँ पहुंचते ही कितना सुकून मिलता था, सब कुछ सिलसिलेवार याद आने लगता था,हर मंगल के लिये एक ही स्मृति उसके मानस पटल पर अंकित थी,पर वही एक स्मृति हर बार उसे पुलकित कर जाती थी,जब वो राजा के पीछे उसकी बुलेट पे बैठी पहली बार बड़े हनुमान मन्दिर गयी थी, दोनो ने साथ ही हाथ जोड़े थे और उसके बाद लगभग दस मिनट तक आँख बन्द किये राजा के होंठ धीरे धीरे कुछ बुदबुदाते रहे थे और वो निर्निमेष उसे देखती खड़ी थी।।
      लोग कहतें हैं वस्तुएं बेजान होती हैं,पर वही किसी की स्मृति से जुड़ कर कैसी सजीव हो उठती हैं।
  इसी मन्दिर से पहली बार निकलते समय बाहर की छोटी सी फूलों की गुमटी में लटकी रुद्राक्ष की माला उसे कैसे मोह गयी थी,और उसने झट उसे खरीद लिया था,वैसा ही रुद्राक्ष तो वो सदा अपने दायें हाथ में पहना करता था।
       गोरे चौड़े से मणिबंध में कसा रुद्राक्ष कितनी ही बार उसकी धड़कनों में उथल पुथल मचा चुका था।।
 
    राडो की उसकी घड़ी,रे बैन के ग्लास ऐसा कौन सा उसका स्मृति चिह्न था जो बांसुरी ने सहेज के ना रखा हो,ये सारी वस्तुएं अपनी कमाई से खरीद खरीद कर उसने अपनी आलमारी के एक हिस्से में ऐसे सजा रखी थी जैसे खुद राजा ही उस हिस्से में आकर बस गया था।

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      अपने विचारों मे मगन बांसुरी ने आंखें खोली तो एक बारगी उसका दिल धक से रह गया…..
      उसके सामने खड़े लोगों में थोड़ा आगे राजा से डील डौल वाला कोई खड़ा था ।।

   हाँ वही तो लग रहा है,वही चौड़े कंधे,वही घने बाल!! फिर अपनी ही सोच पे बांसुरी को हँसी आ गयी__ ‘वो आकृति हृदय में ऐसी छप गयी है कि हर जगह वही नज़र आता है’  यहाँ कहाँ से राजा प्रकट हो जायेगा।।
        पांच साल से अधिक समय बीत चुका उसे देखे ,,उस शाम के बाद तो गुस्से में उसका नम्बर भी  फ़ोन से हटा दिया था,पर दिल से कहाँ  हटा पायी।।

     इसिलिए कभी कहीं कोई छै फुटिया गोरा चिट्टा नज़र आता तो मुस्कुरा के रह जाती,अपने आप को समझा के __ नही ये वो नही है।।
    उसके यहाँ दूध देने आने वाला गोपाल अलाहाबाद का ही तो है,उसकी आवाज़ और बोलने का तरीका कितना मिलता है राजा से,, इसिलिए आगे पीछे जब समय मिल जाये बांसुरी उससे दो बातें कर ही लेती है।।

     कई बार अपने मन को समझा चुकी,इतना सब उसके लिये कर के भी उसी से बात करने में इतना संकोच क्यों।।
     उस शाम के बाद कितना इन्तजार किया था बांसुरी ने कि एक बार वापस राजा फोन कर ले,तुरंत दौड़ कर उसके पास चली जाऊंगी ,उसकी माँ के भी
पांव पकड़ लूंगी…पर वो राह तकती रह गयी,कोई फ़ोन नही आया,और फिर इम्तिहान पास कर वो दूसरे शहर चली आयी ,,पर हर दफा उसकी आंखे और कान फोन की रिंग पर ही बने रहे।।
     एक फ़ोन तक करना राजा ने ज़रूरी नही समझा।।

    अपने मन को कितना मारा था उसने और आखिर अपनी सारी हिम्मत जुटा के अपनी पहली पोस्टिंग के बारे में बताने राजा को खुद ही फ़ोन लगा लिया।
      पर हाय री किस्मत!! फोन उठाया भी किसने, रूपा भाभी ने,,कैसी कड़वी थी वो बात चीत __ ” अच्छा तो नौकरी लग गयी तुम्हारी,चलो अच्छा हुआ, वर्ना जैसा रंग है ऐसे में लड़का मिलना बहुते मुस्किल होता,है ना बांसुरी!!! अब वहीं अपने बैंक में ही कोई ठीक ठाक छोकरा पकड़ ब्याह कर लेना,तुम्हारे लिये भी वही अच्छा रहेगा।”

” हमारे ब्याह की चिंता करने की आप को ज़रूरत नही है भाभी,हमारे मम्मी पापा हैं ये सब देखने के लिये।”

” मम्मी पापा को भी कहाँ मौका दे रही हो,तुम तो खुदे खोजे पड़ी हो,सोभा देता है का लडकियों का ऐसे उज्जडपना ,आप ही बता रहीं कि अम्मा हमारे फेरे फिरा दो अब…अब हमें मायके में नींद नही आती, वैसे तुम्हें बता दे कि हमारे लल्ला जी ने तो अम्मा के चरणों की सौगन्ध उठा ली है कि उनकी पसंद की लड़की से ही ब्याह करेंगे चाहे भले कानी लूली क्यों ना हो।।”

अपमान से बांसुरी के कान जलने लगे….

” आपकी रेखा से तो ठीक ही हैं,उसने तो बताने की भी ज़रूरत ना समझी ,खुद ही मन्दिर में माला बदल आयी,और सीधे आशीर्वाद लेने पहुंच गयी।”
   बोल कर तड़ाक से फोन काट दिया था उसने, बिस्तर पर पड़ी कितनी देर तक रोती रह गयी थी….
पता नही रूपा भाभी की बात में कितनी सच्चाई थी पर उस दिन के बाद से उसने कभी राजा को फ़ोन नही लगाया,,बहुत बार उठा कर फिर वापस रख दिया था।।
     आज मन्दिर में उस लड़के को पीछे से देख बिल्कुल ऐसा लगा जैसे मानो राजा ही दोनो हाथ जोड़े आंखे बन्द किये होंठो में कुछ बुदबुदाता खड़ा है,एक बार को मन किया कि उस तक पहुंच जाये,बाजू में जाकर कम से कम चेहरा तो देख ही सकती है,पर फिर अपनी ही बुद्धि पे हँसी आने लगी, कैसी बचकानी हरकत होगी ये,कहीं वो कोई और निकला तो?? क्या कहेगी ,कि क्यों उसे देख रही थी।।और चलो मान लिया कहीं राजा ही निकल गया तो???
     इस तो का कोई जवाब बांसुरी के पास नही था, ऐसा होना सर्वथा असम्भव था,मुस्कुरा के एक बार और प्रणाम कर वो मन्दिर से बाहर निकल गयी।।

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     रोज़ सुबह 9 बजे खुलने वाला बैंक आज सुबह 6 बजे से ही खुल गया था,पूरे बैंक को झाड़ पोंछ कर चमका दिया गया था,बैंक ऐसा दिख रहा था जैसे ताजी बनी काजू कतली पे लगा चांदी का वर्क।
      और दिनों की तरह सरकारी बैंक वाला ठप्पा आज यहाँ कही नज़र नही आ रहा था,बिल्कुल किसी शानदार प्राईवेट मल्टीनेशनल बैंक की तरह चमकते अपने बैंक को देख बांसुरी और माला की आंखें भी खुशी से चमक उठी थी।।
     वैसे उन लोगो का कोई फॉर्मल ड्रेस कोड नही था,पर आज सारे ही लोगों को समरसता दिखाने की ताकीद की गयी थी,इसीसे सभी पुरूष सफेद शर्ट में और महिलाएं केरला ओणम वाली क्रीम कलर की साड़ी में थी।।
       आर बी आई की आने वाली टीम के दो सीनियर मेंबर चेन्नई से आ रहे थे और एक मेंबर कोच्ची से था।।
        अपने निर्धारित समय से दस मिनट पहले ही टीम वहाँ पहुंच गयी, सभी कर्मचारी अपने क़्युबिक में अपने अपने काम पर लगे हुए थे, लोगों की भी भीड़-भाड़ बढ़ चुकी थी,ऐसे में टीम धीरे-धीरे सब जायजा लेती एक से दूसरी जगह तफरीह कर रही थी,पहले बताया गया था 3 लोग आने वाले हैं,पर कुल 4 लोग आये थे,जिनमें से 2 अन्दर वाले हॉल में ऑडिट शुरु करने चले गये थे…बाकी दो लोग कर्मचारियों से मिलते जुलते उनकी डेस्क पर ही किसी भी फाइल को पूछ ले रहे थे।।

     कुछ थोड़ी ही देर में सिद्धार्थ हडबडाया सा बांसुरी के डेस्क पे आया__” बाँसुरी वो लीज़ वाली फाइल ले कर तुम आ जाओ ,एक्सप्लेन करना पड़ेगा,असल में वो काम मैनें देखा ही नही था,और उसीकी फाइल मांग रहे हैं,तुम आ जाओ जल्दी!!

    बांसुरी फाइल लिये सिद्धार्थ के केबिन में पहुंची ही थी कि टीम में से किसी ने कॉफ़ी की फरमाइश कर दी __” हमें तो सिद्धार्थ जी चाय ही पिलवाइये, कल जब से पुणे आये हैं,ढंग की एक भी चाय नही मिली।”
 
     बांसुरी का दिल उछल कर मुहँ को आ गया,ये आवाज़ तो राजा की थी,हाँ उसी की थी….अपनी  आखिरी सांस तक भी कभी इस गहरी आवाज़ को भूल पायेगी क्या, आवाज़ की तरफ उसने मुड़ कर देखा, रिवॉलविंग चेयर पे वही तो बैठा था,अपनी सफेद कमीज की बाहों को कुहनीयों तक मोड़ कर दाहिने हाथ मे ऑडिटर वाली पेन्सिल पकड़े टेबल पर पड़ी फाइल को देखता,,बिल्कुल वैसे का वैसा।। पर बुआ सही कह रही थी ,कुछ दुबला हो गया था,और ये चश्मा कब लग गया जनाब को।।
       अपने इस अवतार में तो और भी लुभावना हो गया था राजा!!
      राजा को देख ही रही थी कि राजा से उसके किसी साथी ने कुछ कहा,जिसे सुन वो खिलखिला के ज़ोर से हँसा और तभी उसकी नज़र दरवाजे पे खड़ी बांसुरी पर पड़ गयी।।

क्रमश:

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aparna..

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वापसी ….

समय के चक्र को घुमा कर रख देने वाली एक प्रेम कहानी…

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वो कितना कुछ कर रहा था खुद को संभालने के लिए। ऐसा लगने लगा था उसने यामिनी को नही अपने जीवन को खो दिया है। यामिनी की कही हर बात, उसकी मुस्कान, उसकी आंखें कुछ भी तो भुला नही पा रहा था। जब सब कुछ सही था तो यामिनी ऐसे उसे छोड़ क्यों चली गयी। वो खुद को ही मनाता समझाता रहता कि वो एक दिन वापस आएगी। ज़रूर आएगी।

हर वो जगह जहां वो यामिनी के साथ एक बार भी गया था छान आया। यामिनी का कोई दोस्त और सहेली नही बचे थे जिनसे उसने उसके बारे में पूछताछ न कि हो। यामिनी से जुड़ी हर चीज़ को उसने गले से लगा कर सम्भाल रखा था। पहले पहल लोग उस पर तरस खाते थे, उसे समझाने की कोशिश करते थे, लेकिन अब लोगों ने उससे और उसके पागलपन से कन्नी काटना शुरू कर दिया था।

वजह !!! वजह यही थी कि लोग अब उसे समझा कर थक चुके थे कि रागिनी मर चुकी है। उसका प्लेन 35000 फीट की ऊंचाई पर क्रैश हो चुका है। उसके अस्थि पंजर भी किसी को नसीब नही हो सकते….

लेकिन वो लोगों की कही बातों में भी उसे ढूंढ ही लेता था। और ऐसे ही एक दिन किसी की इस बात को की मरे हुए लोग वापस नही आते, उनसे मिलने के लिए खुद मरना पड़ता है , पूरा करने वो भी शहर की सबसे ऊंची पहाड़ी पर नीचे छलांग लगा कर मरने ही तो खड़ा था, कि किसी के कोमल हाथों ने उसे अपनी तरफ खींच लिया था।

वो भोर थी!! मानवविज्ञान की विद्यार्थी। जो जाने कब से उसके मोहपाश में बंधी खुद को ही भूल बैठी थी। और फिर उसने उसे बाहों में समेट लिया। जिस प्यार की तलाश में वो अपनी ज़िंदगी भूल बैठा था उसी ज़िन्दगी से उसे प्यार करना सीखा दिया भोर ने।

उसकी जिंदगी ने जैसे दूसरी करवट ले ली थी। भोर के साथ ने उसके जीवन में मधुमास वापस ला दिया था। अब उसके भी दिन रात चाशनी में भीगे बीतने लगे थे। दोनों ने शादी कर ली थी, और फिर भोर ने उसे उसकी जिंदगी का सबसे सुंदर तोहफा दिया था… उसका अपना बेटा।

ज़िन्दगी ऐसी खुशगवार भी हो सकती है, उसने नही सोचा था। देखते ही देखते तीस साल बीत चुके थे। आज वो खुद पचपन बरस की उम्र में अपने आप को कितना खुश और संतुष्ट पाता था और इसका एकमात्र कारण थी भोर। भोर वाकई उसके जीवन में सवेरा लेकर आई थी। अपने नाम के जैसे ही सुंदर, हालांकि अब तो उसके चेहरे पर भी उम्र के निशान नज़र आने लगे थे। माथे पर कुछ समय की लकीरें खींच गयीं थी और कनपटी और मांग पर के बालो में चांदी झलकने लगी थी, ये और बात थी कि वो हर पंद्रह दिन में बड़े करीने से अपने बालों को डार्क ब्राउन शेड्स से रंग लेती थी। पर कमर पर की परिधि, पेट के आसपास का बढ़ता वृत्ताकार घेरा उसे भी बावन का न सहीं अड़तालीस का तो दिखाने ही लगा था।

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आईने के सामने खड़े वो खुद भी तो अपनी कनपटी पर की सफेदी देख मुस्कुरा उठता था, और बालों की स्टाइल बदल बदल कर उन्हें छिपाने की असफल कोशिश में लग खुद ही ठठा कर हँस पड़ता था। आज भी इसी कोशिश में था कि दरवाज़े पर घंटी बजी। घंटी सुनते ही उसके चेहरे पर लंबी सी मुस्कान खेल गयी थी। आज ही उसके बेटे का पच्चीसवाँ जन्मदिन था, और आज ही उसे एक नई कंपनी में जॉइन करना था। वो ही घर वापस आया होगा ये सोच कर दिनकर दरवाज़ा खोलने आगे बढ़ गया।

दरवाज़ा खुला लेकिन सामने उसका बेटा नही यामिनी खड़ी थी। यामिनी !!! वही यामिनी, जिसके लिए वो कभी पागल हो चुका था। वही यामिनी जिसके लिए वो खुद को मारने जा रहा था। लेकिन ये तो सचमुच वही यामिनी थी। वही आज से तीस साल पहले वाली यामिनी। सिर्फ बाइस साल की यामिनी। पर ऐसा कैसे संभव है? गुलाबी टॉप और ब्ल्यू डेनिम में सीधे सतर बालों को दोनो तरफ के कंधों पर सामने रखे खड़ी वो वैसे ही मुस्कुरा रही थी जैसे उस दिन जब वो उसे प्लेन में बैठाने गया था…..

क्या ये सम्भव था ? या यामिनी किसी तूतनखामेन की ममी में अब तक सोई पड़ी थी जो जस की तस वापस लौट आयी थी।

मेरे प्यारे पाठकों , ये रही मेरी नई कहानी की छोटी सी झलक। ये कहानी भी मेरी बाकी कहानियों की तरह प्रेम कहानी ही होगी लेकिन बहुत सारे रहस्य और रोमांच से भरी इस कहानी का अंत कुछ अलग हट के होगा।

ये कहानी नवंबर में दीवाली के बाद शुरू होगी। और इसके भाग रोज़ आएंगे। एक और बात ये कहानी एक्सक्लुसिवली सिर्फ और सिर्फ मेरे ब्लॉग पर ही आएगी।

मुझे पढ़ने और सराहने के लिए आप सभी का दिल से शुक्रिया….

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शादी.कॉम – 22

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      आँधी की तरह उड़कर इक राह गुज़रती है
       शरमाती हुई कोई क़दमों से उतरती है
           इन रेशमी राहों में इक राह तो वो होगी
         तुम तक जो पहुंचती है इस मोड़ से जाती है                                                              इस मोड़ से जाते हैं……  
      कुछ सुस्त कदम रस्ते,कुछ तेज़ कदम राहें…

  अपने कमरे में बैठी बांसुरी को समझ ही नही आ रहा था कि उसने सही किया या गलत….अपनी माँ का मुरझाया चेहरा वो कभी भी सहन नही कर पाती थी,उस समय भावावेश में आकर उसने राजा की अम्मा को खरी खोटी सुना तो दी पर अब रह रह के राजा का बुझा बुझा सा चेहरा ,जाते समय उसे रोकती हुई राजा की आंखें सब याद आ रहा था, बांसुरी जैसे खुद से ही बातें कर रही थी__ अच्छे से जानती हूँ,मेरे सामने तक तो मुहँ खोल नही पाता अपनी अम्मा के सामने क्या बोलेगा,बस नाम का राजा बाबू है,सारी होशियारी प्रिंस और प्रेम तक ही सीमित है,,बातें इनकी निकलेंगी जब वसूली करने जातें हैं,बाकी समय तो बस सर हिला के ही काम चला लेंगे….अरे पर एक बार तो अपनी अम्मा को टोक सकता था।”

  बांसुरी का मन राजा से बात करने के लिये व्याकुल हो उठा,

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          पर हाय रे मन!! मन की भी शायद अपनी आत्मा होती है, देह होता है ,तभी तो हर बड़ी छोटी बात को खुद से लगा लेता है,हाड़ मांस से बने शरीर को जितनी चोट नही पहुंचती उससे कहीं अधिक मन चोटिल हो जाता है….
         ऐसे समय जब कोई अपने प्रेम को  सर्वोपरी रख अपनी या सामने वाले की गलती पे झुक जाना चाहे ये मन देवदार बन जाता है,अकड़ के तन जाता है,और हर एक इच्छा को अपने नैनों से तोल कर निर्णय लेता है।।
    यही बांसुरी के साथ हुआ!!उसे मन्दिर में जो सही लगा उसने कर दिया पर अभी उसका मन राजा के लिये रो पड़ा,कैसे भी किसी भी हाल में उससे मिलने को वो तड़प उठी…..पर जैसे ही उसे मेसेज करने उसने फोन उठाया उसके अन्दर से एक आवाज़ आयी __ वो भी तो कर सकता है फ़ोन,,ठीक है शायद हमने बात बिगाड़ दी पर शुरु तो उसी की अम्मा ने किया था,और दोनो भाई मुहँ में कुल्फ़ी जमाये बैठे थे,हम भी आखिर क्या करते।। हम जाने लगे तब आगे बढ़ कर रोक भी तो सकता था,ठीक है अपनी अम्मा के सामने नही बोल सकता पर हमें तो बोलते समय रोक सकता था,हमे भी कोई शौक तो है नही की दूसरों का अनादर करें,बस हो गया जो होना था,अब एक बार फोन तो कर ले ,पूछ तो ले ,कैसी हो बांसुरी ।।पर नही जनाब तो अकड़ के बैठे होंगे,ये विचार आते ही बाँसुरी का दिल कसमसा के रह गया, उसे राजा का मासूम सा चेहरा याद आ गया,भला आज तक कब और किस बात पे वो अकड़ के खड़ा रहा था,वो तो बेचारा फलों से लदा ऐसा तमाल तरु था जिसकी छाँव से उसकी पूरी बिरादरी सुवासित थी।।

    बांसुरी ने फ़ोन करने को फ़ोन उठाया ही था की राजा के नम्बर से कॉल आ गया,थोड़ी देर पहले का क्षुब्ध स्वाभिमान एक बार फिर करवट ले खड़ा हो गया,बांसुरी ने तुरंत उचक कर फोन नही उठाया __ वो भी तो जाने हम बांसुरी  है।।
       हाय रे ये मिथ्या अभिमान!! जिसके लिये दिल टूक टूक रो रहा था,सामने से उसे ही उद्विग्न देख अपनी रोग और पीड़ा भूल गया,और उसके घावों पे मलहम देने की जगह नमक की बोरी उठा ली।।

    बांसुरी जब तक फोन उठाती फोन कट गया, उसके चेहरे पर एक मुस्कान खिल गयी__ अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे,अच्छा मज़ा चखाया!

    एक बार फिर फोन घनघना उठा__

बांसुरी- हेलो

राजा- बांसुरी!!
 
अपना नाम राजा के मुहँ से सुनना था की रहा सहा धैर्य गुस्सा सब भाटे की तरह उतर गया,वेगवती नदी सा बह गया।।

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बांसुरी-” इत्ती देर से याद आयी हमारी,सुबह से कहाँ मर रहे थे,एक बार को नही सोचा कि हम कैसे जी रहे होंगे।”

राजा- अरे सोचा नही होता तो अभी फ़ोन क्यों करते, सुबह से मौका ही नही मिला,सब हमी को घेरे खड़े थे,मन्दिर से आने के बाद अम्मा ने घर पर सब को सब बता दिया है,घर में कर्फ्यू वाली स्थिति हो गयी है।

बांसुरी- तो हमारे घर कौन सा हालात कन्ट्रोल में हैं, मन्दिर से आने के बाद बुआ ने ऐसा हंगामा मचाया है कि हमारे घर में भी इमरजेन्सी के से हालात हो गये हैं,,राजा एक बात बोलें

राजा- घर से भाग चलने बस मत बोलना।

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बांसुरी- हम वही बोलने वाले थे जादुगर सैंया।।

राजा- हम दोनो तरफ सब कुछ संभाल लेंगे बस तुम अपने आप को संभाले रखना,हमे ती समझ नही आता की हम किसे किसे देखे,बाकी सब को या तुम्हें ।कभी भी तमक जाती हो।।

बांसुरी– क्या करें?? हम अपनी अम्मा के लिये कुछ भी सुन नही पाते,,पर अब ध्यान रखेंगे,अच्छा सुनो!! कल कहीं मिल सकते हैं क्या?? अकेले?

राजा- क्या हो गया,अकेले काहे मिलना चाह रही??

बांसुरी- ऐसा कुछ नही,जैसा तुम सोच रहे,और सुनो!! सोचना भी मत!! हम तो प्लान बनाना चाह रहे कि आखिर ऐसा क्या हो सकता है कि तुम्हारी अम्मा की बात माननी भी ना पडे और पूरी भी हो जाये।

राजा- वही तो हम भी सोच रहे,क्या ऐसा किया जाये कि सब सही हो जाये और किसी को तकलीफ भी ना हो,चलो फिर यही ठीक रहा,कल रॉयल पेलेस चलते हैं,वहाँ बैठ के सोचेंगे ।।

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  बांसुरी- सुनो,एक बात बोलें ।

राजा- मना कर देंगे तो नही बोलोगी।

बांसुरी- तब तो और ज़ोर से चिल्ला के बोलेंगे,कान फाड़ के बोलेंगे,तुम्हें सता के बोलेंगे।।

राजा- तो बोलो ना,पूछती क्या रहती हो,सुनो सुनो सुनो!! जैसे बड़ा सम्मान दे देती हो।।

बांसुरी– कल तुम अपनी नीली शर्ट पहन के आना  और हम भी अपनी नीली कुर्ती ही पहनेंगे,ठीक है।

राजा बांसुरी की बात पर खिलखिला के हँस दिया, तभी अचानक किसी के आने की आहट से दोनो ही चौकन्ने हो गये_

राजा- बांसुरी बन्टी ऊपर आ रहा है,हम फोन रखते हैं ।।

बांसुरी- अरे रुको !! सुनो तो….

राजा– अरे रख रहे हैं यार,तुम तो पिटवा कर ही मानोगी लग रहा।।
   हँसते हुए दोनो ने अपना अपना फोन रख दिया।।

            पास बुला के गले से लगा के
             तुने तो बदल डाली दुनिया
             नए हैं नजारे नए हैं इशारे
           रही ना वो कल वाली दुनिया

           सपने दिखाके ये क्या किया
                 ओ रे पिया
           तुने ओ रंगीले कैसा जादू किया
          पिया पिया बोले मतवाला जिया।।

   रेडियो पे बजते गाने ने बांसुरी के चेहरे पे एक लाज भरी मुस्कान बिखेर दी।।

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              *********************

    अगले दिन दोनो परिवार अपनी अपनी दिनचर्या में लीन थे,सुशीला जहां खुश थी कि चलो उस लड़की से पीछा तो छूटा वही अपनी लाड़ली के दुख से प्रमिला दुखी थी,पर दोनो ही महिलाओं ने आम हिन्दुस्तानी औरतों की तरह ही अपने मन को पूर्ण रूपेण अपने नियन्त्रण में रखा हुआ था,एक दुखी थी एक सुखी थी पर दोनो में से किसी की दिनचर्या में कोई व्यवधान नही था।।
        घर के किसी सदस्य की किसी भी आवश्यकता को अधूरा नही रखा गया था,सब समुचित व्यवस्था थी।।
 
     बांसुरी कुछ गुनगुनाती सीढियों से नीचे उतरी, रसोई की खिड़की से झांक लगा के प्रमिला ने उसे आवाज़ लगायी

प्रमिला- लाड़ो!! नाश्ता ले आऊँ तेरा!!

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बांसुरी- नही मम्मी ,हम कुछ काम से बाहर जा रहे हैं, वापस आकर खा लेंगे

प्रमिला- अरे कम से कम दो पूड़ी तो खा ले।

बांसुरी ने मुस्कुराते हुए प्रमिला को देखा,__”पूड़ी तो हमने कब से खाना छोड़ रखा है मम्मी ,भूल जाती हो ,अभी 2 किलो और कम करना है,चलो हम जा रहे वर्ना देर हो जायेगी।।”

” अरे पर जा कहाँ रही छोरी?”

” कहीं नहीं बुआ,जल्दी आ जायेंगे।।

बांसुरी के निकलते ही बुआ जी ने प्रमिला को पृश्नवाचक निगाहों से भेद दिया__” परमिला कहीं उस रजुआ का बुखार फिर तो नही चढ़ गया छोरी को,कल तो बड़ा पांव पटकती निकली रही मन्दिर से।।

प्रमिला– नही पता जिज्जी,वैसे बांसुरी ऐसी है तो नही,ज़बान की बड़ी पक्की है मेरी बेटी।।

      यही तो लोग नही समझ पाते कि ना प्यार का भरोसा,ना प्यार करने वालों का।।जब एक बार इन्सान प्यार में पड़ जाये तब वो सिर्फ एक ही काम सलीके से और शिद्दत से कर सकता है वो है प्यार,
इसके अलावा हर एक काम बेमानी हो जाता है, ना तो फिर अपना वचन याद रहता है और ना मान सम्मान।।

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        रॉयल पैलेस जाते हुए बांसुरी ने निरमा को भी साथ ले लिया,वहाँ पहुंचने पे देखा राजा और बन्टी पहले से बैठे उनका रास्ता देख रहे थे।।

    बांसुरी को देखते ही राजा की आंखे मुस्कुरा पड़ी,
बन्टी ने आगे बढ़कर दोनो को अपने सामने की कुर्सियों पर बैठा दिया।।

बन्टी- देखो बांसुरी और राजा,तुम दोनो को ऐसा कोई हल निकालना पड़ेगा जिससे सांप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे।।

बांसुरी– भैय्या हम तो चाहतें हैं,ना सांप ही मरे ना लाठी ही टूटे,क्यों राजा!!

राजा– तो क्या सोचा ?? ऐसा क्या करें कि सब मान जायें,  बोलो बांसुरी!!

बांसुरी- राजा तुम हमारे तुम्हारे बारे में सब कुछ अपने पापा को बता दो,हमे यकीन है वो मान जायेंगे।

बन्टी- इत्ता आसान नही है बांसुरी पण्डित जी को भोग लगाना,वो भी परले दर्जे के जट्ठर हैं,बल्कि मौसी ही कुछ मुलायम हैं,जब वही इत्ती भरी बैठी हैं तो मौसा जी का सोचो भी मत,उसपे इनके घर के सब पुरखे अमृत पीकर आये हैं,90 की हो चुकी दादी अब तक अपने पसंद की मोहनथाल बनवाती है बहुओं से।।

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राजा- फिर करें तो क्या करें बन्टी,हमे तो समझ ही ना आ रहा??

बांसुरी– तुम्हें कभी कुछ आसानी से समझ आया भी है? भला हो ये समझ आ गया कि हमसे प्यार है।

बन्टी- देखो बिना दान दहेज ये शादी ना हो पायेगी, बांसुरी तुम भी अच्छे से जानती हो,कुछ काम समाज और दुनिया को दिखाने भी किया जाता है,है ना?

बांसुरी- हाँ तो?

बन्टी- तो ये कि मौसी जी ने जितना बोला उतना तो करना ही पड़ेगा,अब कुछ तो अंकल जी की भी तैयारी होगी ही,बाकी कमी बेसी को हम पूरा कर देंगे, मतलब हम नही हमारा भाई राजा!! क्यों राजा?

राजा ने बन्टी की बात पर बांसुरी को देखा,उसके चेहरे पर भी कोई भाव नही था,जैसे उसे समझने में दिक्कत आ रही थी कि ऐसा करना सही रहेगा या नही।।

बांसुरी– हमारे पापा को शायद अच्छा नही लगेगा राजा

बन्टी- लेकिन कुछ तो रास्ता निकालना ही पड़ेगा ना
तुम अपने पापा को समझा भी तो सकती हो।

बांसुरी- हां समझा सकते हैं,पर एक बात बताइये भैय्या ,हम पापा को ये समझायें की राजा से रुपये उधार ले कर हमारी शादी उसी से करा दे इससे कहीं ज्यादा आसान ये नही रहेगा कि  राजा अपनी अम्मा को ये समझा दे कि वो दहेज नही लेना चाहता।

राजा- बांसुरी तुम्हें क्या लगता है हमनें अम्मा से बात नही की,जितना कह सकते थे कह चुके हैं,,अब देखो यार अम्मा भी अपनी जगह कहाँ गलत है बताओ।

बांसुरी- तुम्हारी आँख मे ना तुम्हारी अम्मा भक्ति का चश्मा चढ़ा है,उस चश्मे को उतारो तब नज़र आयेगा की कौन गलत है और कौन सही,,हमे बन्टी भैय्या की बात अच्छी नही लगी।
      भले ही एक साधारण नौकरी में हैं हमारे पापा पर आज तक हमे किसी चीज़ की कमी नही महसूस होने दी,राजकुमारी बना के पाला पोसा,और आज हम अपने स्वार्थ के लिये अपने पापा के आत्मसम्मान को आग लगा दे,ये नही हो पायेगा राजा।।
     तुमसे प्यार करते हैं इसिलिए तुम्हारे आगे हमारा मान अपमान हम नही देखते पर अपने पापा को तुम्हारे पैरों में रुपयों के लिये झुकते नही देख पायेंगे।

राजा- यार तुम बात को कहाँ से कहाँ मोड़ दी,,काहे तुम्हारे पापा झुकेंगे?? हम चुपचाप जितने की उन्हें ज़रूरत होगी लाएंगे और तुम्हारे घर छोड़ जायेंगे। अब कल को हम उनके दामाद बन जायेंगे तो एक तरह से उनके बेटे जैसे हुआ ना,बेटे से कुछ लेने में कैसा संकोच?

बांसुरी- सही कह रहे हो ,बेटे से कैसा संकोच?? फिर चुपचाप आने का संकोच काहे कर रहे,डंके की चोट पे आना,अपने अम्मा बाऊजी को बोल कर आना की अपने होने वाले ससुर के लिये रुपये लिये जा रहे, उनके ज़रूरत है।।

राजा-बांसुरी तुम कोनो कसम खा कर आयी हो का कि लड़े बगैर नही जायेंगे

बांसुरी- हाँ बिल्कुल!! वैसे ही जैसे कल तुम्हारी अम्मा कसम खा के आयी रही ।।

राजा — बांसुरी!! हम कुछ कहते नही इसका मतलब ये नही कि तुम कुछ भी कहती जाओगी,,अम्मा है हमारी,उन्होनें जितना सहा है ना तुम उनकी पैर की धूल बराबर भी नही हो।। एक बात तो सुन के सही नही जाती तुमसे अम्मा से बराबरी करने चली हो।  अरे बचपन से अपने घर परिवार पड़ोस समाज सब जगह उन्होनें जो देखा है वही उनके दिमाग में बैठा है।। तुम्हारी तरह पढ़ी लिखी होती तब तो उनकी अपनी समझ होती ना,उनके खुद के ब्याह में दहेज मिला,सभी मौसियों का ब्याह ,चाचा का ब्याह फिर बुआ का ब्याह सभी जगह यही देखी है हमरी अम्मा इसे ही सही समझती है,तो इसमे उनकी क्या गलती।।
    जिस उम्र में तुम अपनी माँ के आंचल में दुबकी पड़ी थी उस उमर से घर गृहस्थी का बोझ उठा रही हमारी अम्म्मा।।बारह साल की उमर से ददिया सास चचिया सास और खुद की सास की सेवा में प्राण दिये जा रही हैं,और आज तक उनके सर का पल्लू कभी खिसका तक नही और तुम उनकी दो बातें सुन उन्हें पलट के चार बातें सुना गयी।।
       मजाल है जो आज तक हमारी अम्मा ने दादी को कभी पलट के जवाब दिया हो,ऐसा तो नही है कि हर बार बड़े बूढ़े सही बात ही बोलतें हों,पर जो भी बोला सुनाया हो दादी ने हमारी अम्मा ने उन्हें या बाऊजी को कभी जवाब नही दिया।।

बांसुरी– हम क्या बोल रहे और तुमने क्या समझ लिया।।

राजा- क्या समझ लिया,सही ही समझा।। हमारी ही आँख में चश्मा चढ़ा था,पर अम्मा का नही तुम्हरा,अब उतार फेंकने पर साफ साफ दिख रहा कि तुम्हारा ज्ञान कितना कोरा और उथला है बांसुरी ।।
   एक बात और कह दें,जो लड़की हमारी अम्मा का सम्मान नही करेगी ,इज्जत नही करेगी हम किसी जनम में उससे शादी नही करेंगे।।

बांसुरी– राजा तुम धमकी दे रहे हो हमे।।

राजा– हम सच बोल रहें हैं,,हमारी अम्मा से ज्यादा हम किसी से प्यार नही कर सकते,,तुम अपनी बताओ ,हमारी अम्मा के हिसाब से ढल सकती हो।तो ठीक है वर्ना जाओ,हमें भी तुम्हारी कोई ज़रूरत नही है।

बन्टी और निरमा चुपचाप बैठे दोनो की बातें सुन रहे थे,कुछ देर पहले की साधारण बातें अचानक ही ऐसे मोड़ ले लेंगी किसी ने सोचा भी ना था।।
     किसी ने सही कहा है__ बन्दूक से निकली गोली और ज़बान से निकली बात कभी वापस नही हो सकती।।

  काश दोनो में से एक ने भी अपनी जिह्वा पे समय रहते नियन्त्रण पा लिया होता तो स्थिति इतनी विकट ना होती।यहाँ गलती किसकी थी किसकी नही ये पक्ष विचारणीय रह ही नही गया,दोनों में से किसी ने उस समय झुकना अपनी शान के खिलाफ समझा।।

           ***************************

      इस पूरे वाकये को कई दिन बीत गये।। बांसुरी ने इम्तिहान पास कर लिया और एक महीने की ट्रेनिंग के लिये पुणे आ गयी,बन्टी भी वापस दिल्ली लौट गया, सभी अपने अपने कामों मे लग गये,जीवन का नाम ही चलना है,वो कभी किसी के लिये रुकता कहाँ है।।

     बांसुरी की ट्रेनिंग पूरी हो गयी और पहली नियुक्ति में उसे अम्बा जी गढी जाना पड़ा, उसने अपना कार्यभार संभाल लिया,कभी कुछ दिनों के लिये उसकी अम्मा या बुआ जी आ जाते हैं ।
     बन्टी की जिंदगी में एक बार फिर कोई लड़की आ गयी,वो अपने जीवन अपने बॉस और नयी नयी बनी गर्लफ्रैंड में व्यस्त रहने लगा।

    सभी का जीवन व्यस्त था,सभी अपने आप में लगे थे,बस एक राजा था जिसका जीवन उस शाम रुक गया,,उसने पहले की तरह जिम जाना छोड़ दिया, भैय्या के वसूली के काम में भी अब प्रिंस और प्रेम ही जाते ।।
    घर के लोग जैसे अम्मा,बाऊजी बड़े भैय्या चाचा जी सभी अपने लाड़ले के व्यवहार से क्षुब्द थे दुखी थे,पर वो खुश था अपने आप मे,अपने कमरे में अपनी किताबों के साथ।।
    अम्मा को लगा बांसुरी का भूत उतर गया,अम्मा को इस बात का कई एक बार प्रमाण भी मिल चुका था,, आखिर माँ थी कैसे अपने बेटे के जीवन से अनभिज्ञ रहती,उन्हें समझ आ चुका था की अब बांसुरी और राजा की हल्की फुल्की भी बातचीत नही होती।।
   खूब खोद कुरेद के उन्होनें बन्टी से भी सारी सच्चाई उगलवा ली थी,कि उस शाम के बाद दोनों में कभी कोई बात नही हुई ।।
      उस शाम को बीते पूरे पांच बरस गुज़र गये……बांसुरी चली गयी सिर्फ राजा के जीवन से ही नही उसके शहर से भी दूर ।।
  
   पर जब वो चली ही गयी थी राजा के जीवन से तो ऐसा क्या था जो राजा ने खुद को किताबों में इस कदर गुम कर लिया था…..

क्रमशः

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अपर्णा।।

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शादी.कॉम-18

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      ” नैना नु पता है, नैना दी खता है
       सानु किस गल दी फिर मिल दी सज़ा है
       नींद उड़ जावे, चैन छड  जावे
       इश्क़ दी फ़क़ीरी जद लग जावे
                 ऐ मन करदा है ठगी ठोरिया
                 ऐ मन करदा हैं  सीना ज़ोरियां
                 ऐने सिख लियाँ दिल दियां चोरियां
                 ऐ मन दियां ने कमज़ोरियाँ “

   एक के बाद एक गाने बजते रहे,गानों की ताल पे ताल मिलाता राजा गाड़ी चलाता रहा,बांसुरी पीछे से राजा को देख देख मुस्कुराती रही,पर राजा के ठीक बाजू में बैठी सुशीला का फिर किसी काम में मन नही लगा।।

     ऐसा नही था कि सुशीला को “लव मैरिज” से शिकायत थी ,अपनी बेटी जैसी पिंकी के लिये भी कुछ हल्की फुल्की ना नुकुर के बाद उसने खुद ने हामी भर दी थी……पर बेटों के नाम पर जाने क्यों उसका हृदय एक अजीब सी ममता से छलक उठता था,इस भाव में प्रेम था तो आधिपत्य भी था,स्नेह था तो एकाधिकार भी था।।
        वैसे भी शादी के बाद लड़का उतना माँ का कहाँ रह जाता है,और अगर शादी  खुद की मर्ज़ी से की हो तब तो पूछो मत !! माँ तो ऐसी शादियों में अमूमन ललिता पवार का किरदार निभाने लगतीं हैं।    

 

    वैसे सुशीला को पारंपरिक बहुओं को सताने वाली सास बनने का शौक भी नही था,इसीसे वो रूपा के लिये बिल्कुल माँ जैसी सास ना होकर भी एक  अच्छी सास तो थी ही, पर राजा के केस में बात अलग थी,यहाँ राजा किसी लड़की को पसंद करने लगा था,हालांकि अभी तक बांसुरी के लिये ऐसी कोई इच्छा उसने अपनी माँ के सामने जाहिर नही की थी पर पूरे नौ महीने अपने पेट में रख के अपने ही रक्त मांस से सींच कर उसे पैदा करने वाली जननी क्या अपने बालक के हृदय की अधीरता से इस हद तक अंजान रह सकती थी।।
       छठी इंद्रि के एंटीना द्वारा बार बार भेजी जा रही सूचनाओं को व्यर्थ भी नही माना जा सकता था ।।

       बिदाई के नियत मुहूर्त से कुछ पहले ही अवस्थी परिवार मय बांसुरी शास्त्री जी के घर पहुंच गया, आवश्यक आवभगत के बाद दोनो समधिने यहाँ वहाँ की तैयारियों में जुट गयी,रूपा बांसुरी को साथ लिये रेखा को सजाने में लग गयी,,सभी किसी ना किसी कार्य में व्यस्त थे।।

     घर के बीचो बीच बने बड़े से दालान में लोगों की आवाजाही लगी हुई थी,रूपा का कमरा ऊपर था जहाँ बांसुरी थी…..काफी देर से बांसुरी को राजा का कोई हाल समाचार नही मिला था,बांसुरी के भेजे सन्देश भी राजा ने व्यस्तता के कारण नही देखे थे, ऐसे में अपनी अधीरता से स्वयं परेशान बांसुरी ने रूपा से पानी पीने के बहाने नीचे जाने की आज्ञा ली और कमरे से निकल चली,लोगो से बचते बचाते नीचे को जाती गोलाकार सीढ़ियाँ उतर ही रही थी कि किसी काम से ऊपर को जाते राजा से टकरा गयी__

  ” कहाँ गायब हो सुबह से?? नज़र ही नही आ रहे,, और इतना काहे में बिज़ी हो गये की मेसेज तक देखने का समय नही मिला।”

  ” क्या मेसेज करी रही।”

  ” खुद ही देख लो,बताना होता तो लिखने में आँख काहे फोड़ते।”

  ” ये भी बात सही है,,यार इत्ता भन्नायी काहे हो,देख तो रही हो शादी ब्याह का घर है,अब भैय्या तो ठहरे जमाई ,उनको कोई काम नही बता रहा,हम ही सबसे छोटे हैं,हमी पेराते हैं हर जगह।।”

  ” हम काम करने मना कर रहे क्या?? पर एक तो हम किसी को जानते नही,तुम एकदम ही छोड़ कर चल दिये तो गुस्सा तो आयेगा ना,का करें बोलो।”

  ” हम तो सोचे थे आराम से तुम और हम कहीं बैठ के बातें करेंगे पर यहाँ तो इत्ता काम फैला रखा है इन लोगों ने,ऐसा लग रहा सारा काम हमारे लिये ही बचा रखा था कि राजा आयेगा और करेगा सब।।”

” अच्छा वो सब छोड़ो,ये बताओ अम्मा जी से बात हुई क्या??”

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” अजीब बात करती हो यार तुम!! देख रही हो मरने का भी फुर्सत नही है राजा के पास ,और पूछ रही अम्मा से बात हुई का!! अरे कहाँ से करे,अम्मा यहाँ वहाँ उड़ती जो फिर रही हैं ।”

” ना करो!! हम कौन सा मरे जा रहे कि तुम अम्मा जी से बात करो और उसके बाद हमको आई लव यू बोल दो।”

” रुको रुको! क्या बोली तुम!! क्या बोल दें।”

” हम कहाँ कुछ बोले?? हम तो कुछ नही बोले।।”

” अच्छा बाबू!! हम से चालाकी,अभी अभी तो बोली ना कि अम्मा से बात करके…..

दोनों एक दूसरे की आंखों में खोये एक दूसरे को ताने उलहने दे रहे थे कि राजा की अम्मा की गगनभेदी आवाज़ हवाओं में घुल गयी

” राजा ए राजा!! तुम हियाँ खड़े हो,वहाँ तुम्हारे बाबूजी कब से तुम्हें आवाज़ लगा रहे,,लड़के वाले निकले की नही पता करो जरा,उसके बाद जनमासा भी देखे आओ एक बार,सब ब्यब्स्था ठीक ठाक है की नही??”

” अम्मा बिदाई ही तो है,उसमें जनमासा की का ज़रूरत।”

“काहे अब तुम हमें बताओगे कि का नियम करना है और का नही।।कुंवर कलेवा करने के पहले दूल्हा का हाथ मुहँ नौआ कहाँ धुलायेगा,ईहे घर मे?? बिदाई के पहले दोनो का कोहबर पुजाई कहाँ  होगा?? बोलो? औ सबसे बड़ा बात कि यहाँ से रेखा को जनमासा  तक बिदा करके बापस ले आयेंगे औ एक बार फिर बिदाई कर देंगे तो गमना भी संगे संग निपट जायेगा। नही तो इतना महंगाई के जमाना में बिदाईये मा दुई तीन लाख रुपिया बकील बाबू का निपटा जायेगा, समझे।।हमसे बाते बनाएँगे ,जाओ हो लाला जल्दी करो,और ए सुनो तुम ,का नाम है तुम्हारा??”

  सुशीला ने बिल्कुल ऐसा अभिनय किया जैसे उसे सच में बांसुरी का नाम याद नही आ रहा हो,बांसुरी ने सिर झुका कर धीरे से अपना नाम बता दिया__” बाँसुरी “

  ” हाँ  हाँ बांसुरी!! जाओ देखो दुलहीन तैयार भई की नही।उसे नीचे लाना ,तब तक वहीं बैठो।।”

  बहुत प्यार से हां मे सिर हिला के बांसुरी ऊपर को वापस मुड गयी पर जाते जाते उसने आंखों के इशारों से राजा को अम्मा जी से बात करने को बोल ही दिया,जिसे राजा ने सर झुकाकर मान लिया,इस सारे प्रसंग को देख कर सुशीला के तन बदन में आग लग गयी।।
     उसे अपने लाड़कुंवर और इस छोकरी के बीच चल रही “आंखो की गुस्ताखियाँ ” माफ करने का बिल्कुल भी जी नही किया।।

   बिदाई के पहले होने वाली छोटी मोटी  रस्में चलती रहीं,सब रस्मों रिवाजों का आनंद ले रहे थे पर प्रेमी युगल अपने में ही मगन था,भले ही राजा पुरूषों की तरफ और बांसुरी औरतों के तरफ बैठी थी पर रह रह कर दोनो की आंखें आपस में टकरा ही जाती थी, और इस टकराहट में निपट जाते थे दुनिया भर के उलाहने,ताने,मान मनौव्वल,रूठना मनाना।।और इन सब बातों की साक्षी बनती जा रही थी सुशीला।।

    बरातियों के स्वागत सत्कार भोजन पानी के बाद बिदाई कार्यक्रम प्रारंभ हुआ__
    
“कैसे भूल पाऊँगी मैं बाबा ,सुनी जो तुमसे कहानियाँ छोड़ चली आँगन मैं मैय्या ,बचपन की निशानियाँ
सुन मेरी प्यारी बहना, सजाये रहना ये बाबुल की गली, सजन घर मैं चली ……”

     बरातियों के साथ आयी धुमाल पार्टी ने ऐसा मर्मस्पर्शी गीत पृष्ठभूमि में बजा दिया कि वहाँ खड़े कई उम्रदराज पुरूष भी अपनी अपनी दुहिताओं की बिदाई याद कर सिसक पड़े …..
        रेखा को शादी ब्याह की हर रस्म से बहुत प्यार था, पर उसकी शादी जिन हिसाबो में हुई उसे अपनी कल्पनाओं को साकार करने का कोई अवसर नही मिल पाया था,इसीसे आज उसने अपने एक मात्र सुख स्वप्न को पूर्ण करने शहर की सबसे बड़ी और महंगी चर्चित ब्युटिशियन “नीता जी “को अच्छी मोटी धनराशि दे कर बुक कर लिया था।।

    रेखा के पीछे पीछे रूपा भी ब्यूटी सलून की गंगा नहा आयी__” बस हमारा ज़रा सा जूड़ा सेट कर देना, ये कौन सी लिपस्टिक है थोड़ा सा हमें भी लगा देंगी नीता दीदी,ज़रा सा आपका वाला फेस पाउडर भी मार दो ना चेहरे पे।”
     इस तरह की टुच्ची हरकतों से परेशान होकर डिग्निफाईड,वेल मैनर्ड सुपर स्मार्ट ब्युटिशियन नीता जी ने अपनी असिस्टेंट को रूपा का टच’प करने का इशारा किया और खुद रेखा को सजाने में लग गयी।

      अपने कुशल चितेरे हाथों का कौशल दिखाती
ब्युटिशियन ने रेखा के साधारण रूप को ऐसे असाधारण रंगो से सजा दिया कि रूपा भी चकित हो देखती रह गयी….अब ग्यारह हज़ार खरच कर कराये इत्ते सुन्दर मेक’प को क्या बिदाई के आँसूओं में बहाया जा सकता था।।
       भले ही सारी मोहल्ले की औरतें ज़ार ज़ार रो रही थीँ पर दोनो बहनों के आंसू नदारद थे,,,जग दिखायी को दो एक आंसू रूपा ने बहा भी लिये,बहन को गले से लगाये बचपन की यादों को दुहराती रूपा ने धीमे से रेखा के कान में मन्त्र फूंक दिया__” दो आंसू बहा दो,बिदाई मे नही रोने से अपसकुन होता है।”

  ” मेक’प सारा बह जायेगा जिज्जी।”  रेखा की बात पर बन्सी ने चुपके से उसके कान के पास मुहँ ले जाकर कहा__
           ” वाटर प्रूफ मेक’प है ‘मैक’ का,आपकी ब्युटिशियन बोल रही थी,विदेशी कंपनी है,जा के नहा भी लेंगी ना तब भी चेहरा ऐसे का ऐसा ही दिखेगा।। बेझिझक रो लिजिये।”

  रेखा ने इशारे से बन्सी से पूछा ” पक्का??”
  
   बंसी ने आंखों से ही रेखा को आश्वस्त किया,और रेखा अपनी जिज्जी के गले से लगी रो पड़ी ।।

  लल्लन के पट से बंधी अपनी चुनरी की गांठ सहेजती रेखा अपने दोनों हाथों से लावे उलीचती आगे बढ़ कर कार में जा बैठी,उसके पीछे सभी को सादर नमन करता लल्लन भी अपनी नवेली पत्नि के बाजू में जा बैठा,,उनकी कार अपने पहिये से नारियल को दबाती धीरे धीरे आगे बढ़ धूल उड़ाती चली गयी।।।

     बिदाई के बाद सभी मेहमान खाना पीना निपटाने में लग गये, रूपा के साथ बैठी बांसुरी भी बिना मन आड़े टेढे कौर जैसे तैसे निगल रही थी।।

   जिसने भी ये कहा है कि प्यार होने के बाद भूख प्यास मर जाती है ,नींदे उड़ जाती है  …शत प्रतिशत सत्य कहा है,,उस बन्दे को वाकई ये सुखद अनुभूति ( पहले और सच्चे प्रेम की) कई कई बार हुई होगी।।

   अब इस आनंद उदधि में राजा और बांसुरी डुबकी लगा रहे थे ,जहां उनकी भूख प्यास सुख चैन सब खो चुका था,और कुछ बचा था तो बस एक सुकून __ एक दूसरे की आंखों में खोने का।।

   राजा अपनी प्लेट सजाये बांसुरी की तरफ बढ़ ही रहा था कि सुशीला ने आकर बीच में ही उसे रोक लिया__” लाला जा बेटा अपने बाऊजी को थाली दे आ!! वो कहाँ यहाँ बुफे उफे में घुसेंगे,और सुन पानी का गिलास भी रख आना,खाने के बीच उन्हें पानी लगता है,और सुनो मिर्ची का भजिया ना ले जाना , खाने को खा तो लेंगे फिर रात भर पेट मा जलन बोल के परेसान करेंगे,मीठा उठा अच्छे से ले जाना,वही तो चाव से खाते हैं मिठखौवा बामण ।।”

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   अम्मा की बात सुन राजा वापस मुड़ के अपने बाऊजी की तरफ चला गया,उन्हें थाली पकड़ा के निकल ही रहा था कि शास्त्री जी ने उसका हाथ थाम वही बैठा लिया__
 
    ” आज एक और जिम्मेदारी से मुक्त हो गये हम! अब हमारे सलगे लड़िका बच्चा अपने अपने ठौर को लग गये,,अवस्थी जी आप जैसा समधि पाकर सच हमने गंगा नहा ली ,, युवराज बाबू जैसा दामाद, आपका जैसा परिवार किस्मत से मिलता है भई !! अब देखो !! राजा ने कितना भाग दौड़ किया है,हमको तो लगता है जैसे राजा हमारे ही कोनो जनम का लड़का है।।
      अब एक पते की बात बताते हैं,हमारे एक साढू हैं, बलिया के रहवासी है,खूब खेती खार है,पुराने गोंटिया है जमीन जायदाद की कोनो कमी नही ,,इत्ता रुपया जोड़े रक्खे हैं कि सात पुश्ते आराम से बैठ के खा सकतीं हैं ……एक इकलौती लड़की है बस !! मालती!! अपने राजकुमार के लिये एकदम फिट रहेगी।।खूब माल दबा के रक्खा है मिसिर( मिश्रा) जी ने,मोटे आसामी है….इक्कीस लाख तो तिलके चढ़ा देंगे,पांच – सात में बरीक्षा निपटाएंगे।।
      गिरस्ती का पूरा समान,कार और पांच एकड़ का खेती भी देने बोल रहे।।हमरी बड़की के ब्याह में उन्होनें राजा को देखा रहा,अब जब वो देखे कि हमरी रेखा भी निपट गयी तब अपने मन की बात रक्खी हमारे सामने।।
      समधि जी इससे बढ़िया रिस्ता नही मिलेगा।”

” पापाजी लड़की पढ़ी कहाँ तक है।”

” दामाद बाबू अब ईहे मत पूछो,लड़की गोरी नारी सुन्दर है,अब बचपन से राजकुमारी बना के पाले, स्कूल में एक दिन कुछ जबाब गलत दे दी रही तो गणित की बहन जी ने वहीं दो लप्पड़ धर दिये अब लड़की डर गयी और घर आके ऐसा कोहराम मचाई कि फिर कोनो उसको स्कूल नही भेज पाया।”

“दसवीं तो पास होगी??”

” चौथी के बाद पाठसाला का दरसनो नही पायी लड़की पर काम काज में एकदम चतुर!! हमरी रूपा  का दूजा रूप समझो ।।।

” तब तो गये काम से ” युवराज की चिकोटि पे बिना ध्यान दिये उसके ससुर भावी पुत्रवधु के गुणों का व्याख्यान करते रहे।।

   महिलायें बिना वजह ही बतकही के नाम पे अधिक बदनाम है वर्ना पुरूष भी इधर उधर की गप्पे हाँकने में कहीं से पीछे नही रहते,,दस मिनट में समाप्त होने वाली पूरी कचौरी पूरे डेढ़ घन्टे तक थाली में अपने उदरस्थ होने की प्रतीक्षा करती रही।।
   
    तभी छन छन पायल छनकाती सुशीला वहाँ आयी और थोड़ी दूर से ही आवाज़ लगा दी__

   ” अजी सुनिये!! अब निकलना भी पड़ेगा,घर पहुँचते पहुँचते रात हो जायेगी,,बो तो अच्छा है फूलमणि को घर छोड़ आये थे तो सांझ का दिया बाती हो जायेगा।।”

” हाँ हाँ!! ठीके कह रही हो,चलो युव की अम्मा,निकलते हैं अब।।”

  अबकी बार सुशीला पूरी तैयारी में थी,कौन किस गाड़ी में सवार होगा,कहाँ बैठेगा उसने मन ही मन पूरा खाँचा खींच रखा था,उसने महिलाओं के बीच खड़ी बांसुरी और रूपा को ठेल ठाल के युवराज की गाड़ी में बैठा दिया,और खुद प्रिंस प्रेम और एक दो नौकरों को लिये राजा की गाड़ी में जा बैठी।।

    राजा जब शास्त्री जी की चरण वन्दना कर अपनी गाड़ी पे आया तो बाँसुरी को वहाँ ना पा कर असमंजस में प्रिंस को देखा,प्रिंस ने त्वरित गति से बड़े भैय्या की गाड़ी की ओर इशारा कर दिया, बड़े भैय्या की गाड़ी में बांसुरी को बैठे देख राजा को आश्चर्य हुआ __ :कि ये वहाँ कैसे चली गयी: पर प्रत्यक्ष में बिना कुछ कहे चुपचाप आकर ड्राईविंग सीट पर बैठ गया।।

   उधर अम्मा जी के कड़े तेवर देख बिना ना नुकुर किये बांसुरी चुपचाप युवराज भैय्या की गाड़ी में जा बैठी थी,रूपा भाभी से भी कम ही मिलना हुआ था उसका और उसे उनकी स्वप्रशंसा की बातें पसंद भी कम ही आती थी इसीसे मन ही मन उदास बांसुरी अपने ही मन के आगे लाचार हुई जा रही थी।।

    कैसा द्वंद उसके मन में चल रहा था,दो दिन पहले तक जिस राजा से सिर्फ जिम मे एक डेढ़ घन्टे की मुलाकात ही काफी होती थी आज उसके बिना पांच मिनट भी काटना कितना मुश्किल लग रहा था।। उसे पता था कि राजा की गाड़ी भी उसके आगे या पीछे ही चलेगी फिर भी कैसा खालीपन सा मन में भर गया था,जैसे बहुत सारे बादल छा तो गये हैं,पर बरस नही रहे…..तभी गाड़ी का सामने का दरवाजा खोल राजा अन्दर आकर बैठ गया__

  ” अरे राजा तुम यहाँ कैसे?? तुम्हारी गाड़ी कौन चला रहा बाबू??”

  ” भैय्या वो प्रिंस चला रहा,हमारा हाथ में ज़रा दर्द था तो प्रिंस को चलाने बैठा दिये,बाऊजी को उसी गाड़ी में बैठाए,काहे अम्मा नही तो अकेली हो जाती ,अम्मा बोली भी कि बाऊजी आपकी गाड़ी में बैठेंगे,तो हम बोल दिये हम चले जाते हैं भैय्या के पास,और यहाँ चले आये…अम्मा आवाज़ भी दी ,हम बोले चिंता ना करो अम्मा ,हम दोनो भाई समय से पहुंच जायेंगे घर।।ठीक है ना भैय्या।।”

   ” ठीके है छुटके ।चलो फिर गाड़ी भगायी जाये।।तुम्हरी भौजाई को अपना मायका गावँ का चाट भी खिलाना है,और उनको यहाँ तालाब पार शिव मन्दिर का दर्शन भी करना है,तो ये सब करते चलते हैं….काहे बांसुरी तुमको कोनो जल्दी तो नही है ना?”

  ” नही भैय्या जी कोई जल्दी नही,,हम मम्मी को फोन करके बता देते हैं ।”

    गाड़ी चारों को लिये सरपट कानपुर की ओर दौड़ चली।।

     तैनु ले के मैं जावांगा,दिल दे के मै जावांगा
      तेरे नाल मैं आवान्गी,ससुराल मैं जावान्गी।।।

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क्रमशः

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aparna …

समिधा-29

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समिधा- 29

    कितनी अजीब बात है! वही संसार है, वही हवा वही पानी सब कुछ भगवान में एक सा दिया है! सबको वही समय दिया है, लेकिन किसी का समय तो पंख लगाकर उड़ जाता है और किसी का काटे नहीं कटता।
पारो के साथ भी यही हो रहा था। चाहे वह दिन दिन भर अपने आपको काम में व्यस्त रखें लेकिन रात उसकी आंखों ही आंखों में कट जाती थी। वो दिन भर इतना सारा काम इसीलिए करती थी कि थक कर ऐसी चूर हो जाए कि पलंग पर लेटते ही उसे नींद आ जाये। वो सो जाए। लेकिन आंखें बंद करते ही देव का मुस्कुराता चेहरा उसके सामने झिलमिलाने लगता, और वह अपनी खाट पर पड़े-पड़े खिड़की से बाहर चांद को देखती आंखों ही आंखों में रात काट जाती थी।
    ******

   वहीं ऐसी ही कुछ बेचैनी वरुण के मन में भी उथल- पुथल मचाये थी! वह भी अपने काम में व्यस्त था। उसका सारा दिन मंदिर के कामकाज करने में निकल जाता था। वेद अध्ययन करने के समय के बाद भी वो रात में अपनी किताब  लिए पढ़ता रहता । लेकिन मंदिर के नियम थे कि रात्रि नौ के बाद विद्या अध्ययन नहीं किया जा सकता। मजबूरी में अपने तखत पर लेटा वह भी खिड़की से बाहर चमकते चांद को देखता रहता था।
   उसके मन में कुछ अलग ही तूफान चलता रहता था। वह अक्सर यह सोचता कि जब उसका एक मन वैराग्य की ओर अग्रसर है, तो क्यों उसका दिल चांद पर ऐसे लट्टू हुआ जा रहा है। आखिर चांद को देखते हुए वह किसे देखना चाह रहा है? अपने मन के सवालों का जवाब उसके पास नहीं था! पर फिर भी रात में लेटे-लेटे खिड़की पर से चांद को ताकते रहना उसे एक अलग सा सुकून देता था।

      ऐसा लगता था उस चांद के दूसरी तरफ कोई है जो उसे देख रहा है।

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*****

   इधर पारो की मुसीबतें खत्म होने की जगह बढ़ती जा रही थी। जैसे-जैसे समय बीत रहा था, पारो के लिए उसके घर के सदस्यों की सहानुभूति कम होती जा रही थी। और उसकी जगह गुस्सा बढ़ता जा रहा था। इन बातों में आग में घी का काम बुआ जी कर रही थी।
बुआ जी का मुख्य उद्देश्य था कि किसी भी तरीके से देव की दुकान उनके बेटे को मिल जाए । उनका बेटा भी देव की ही उम्र का था लेकिन वह अब तक उसकी शादी नहीं कर पाई थी। कारण उम्र हो जाने पर भी वो अब तक कोई काम धाम नहीं कर पाया था।
      वो अक्सर अपनी दोनो भाभियों के पास बैठी कुछ न कुछ इधर उधर की बातों में लगी रहतीं। उनकी सबसे छोटी भाभी यानी देव की काकी अक्सर कोई न कोई काम का बहाना बना कर इस गोष्ठी से उठ कर निकल जातीं। उन्हें बुआ जी की बातों में कोई मज़ा नही मिलता था।
    ऐसी ही एक दोपहर सभी औरतें चौका चूल्हा निपटा कर खा पीकर एक-एक झपकी लेकर फिर आंगन में बैठी थी। छोटी काकी चाय चढ़ाने के बहाने रसोई में ही थी। बाकी सारी बहुएं अपने कमरों में आराम कर रहीं थीं।
  आंगन में बुआ जी देव की माँ और बड़ी माँ के साथ बैठी अपनी ससुराल का कोई किस्सा सुना रहीं थीं कि ठाकुर माँ के कमरे से दर्शन भागता हुआ निकला और सीढ़ी चढ़ता ऊपर की ओर भागा!
  ” अरे ठहर तो जा! कहाँ भाग रहा है? ” ठाकुर माँ की आवाज़ के साथ-साथ ताल मिलाती उसके पीछे हाथ में पेंसिल लिए पारो भी बाहर भागती चली आयी। आखिर उसे सीढ़ियों पर चढ़ा देख पारो ने वहीं से पेंसिल उस पर फेंक कर मार दी…-“, ये क्या कर रही है? अगर उसे पेंसिल चुभ गयी तो? “देव की माँ चिल्ला उठी। सहम कर पारो वापस कमरे में जाने लगी कि रसोई से चाय लिए काकी बाहर चली आयीं। वहाँ बैठी औरतों को चाय देते उन्होंने एक कप पारो को थमा दिया…-” पारो जा ये कप ऊपर दर्शन को दे आ!” “
   देव की माँ नाराज़गी से खड़ी हो गयी और पारो के हाथ से कप ले लिया, और तेज़ी से ऊपर सीढियां चढ़ गयीं। काकी को इसका कारण समझ नही आया। उन्होंने दो कप उठा कर वापस पारो के हाथ में रख दिये…-” जा ठाकुर माँ और अपनी चाय ले जा, वहीं पी लेना। “
   हाँ में सिर हिलाती वो चाय लिए अंदर चली गयी। उसके अंदर जाते ही पैर पटकती देव की माँ वापस चली आयीं…-“मति मारी गयी है क्या तेरी छोटी बहू। उसके हाथ से दर्शन को चाय क्यों भिजवा रही थी? “
” क्यों क्या हुआ दीदी?”
उन्होंने अपने माथे पर हाथ मार लिया…-” अरे कैसे समझाऊं , मैं नही चाहती कि ये दोनों ज्यादा घुले मिलें। उसका हाथ अच्छा नही है। मैं नही चाहती दर्शन के किसी भी खाने पीने को ये हाथ लगाए, ज़हर हो जाएगा सब ज़हर।”
  सब कुछ सुनती बैठी बुआ जी को इस सारी बातचीत में बहुत रस मिल रहा था…-” ये सब क्या सोचने लगी बऊ दी? ऐसा भी होता है कभी। उसके हाथ में कौन सा ज़हर होगा? तुम भी कुछ भी सोचती हो। मैं तो बस इसलिए दोनो को दूर रखने कहती हूँ कि दोनो की उम्र ही ऐसी है कि बहक सकतें हैं।
   फिर रिश्ता भी वैसा ही है। आग और घी को साथ रखोगी तो आग तो भड़केगी ना। तुम खुद अनुभवी हो, सब जानती समझती हो। और कितना खुल कर कहूँ, हमारे मुहल्ले में ऐसा ही कुछ हुआ भी।”
   बुआ जी की बातों से देव की माँ का खून खौल रहा था, लेकिन कुछ कह नही पा रही थी कि साथ बैठी काकी ने धीरे से कुछ कहना शुरू किया…-“आप सभी मुझसे बड़े हैं ,अधिक ज्ञान है आपको। लेकिन मैं मेरे मन की बात आप सबके सामने रखना चाहती हूँ। क्या हम पारो और दर्शन की शादी नही करवा सकते?”
    बुआ जी ने ये बात सुनते ही देव की माँ की ओर देखा, उनकी आंखें आग उगल रही थी…-“वाह वाह छोटी बहू। तुम ऐसा भी सोच सकती हो मैंने कभी नही सोचा था। एक लड़के को तो वो खा गई अब दूसरे को भी जानबूझ कर उसी कुंए में धकेल दूँ, इतनी अंधी नही हूँ मैं? क्या तुम्हारा लड़का अभी ब्याह लायक होता तो उसका ब्याह कर देती तुम उससे। “
   देव की काकी को नही लगा था कि उसकी बात देव की माँ को इतनी खल जाएगी..
..” शांत हो जाओ , तुम दोनो आपस में ये सब क्या लेकर बैठ गईं। छोटी बहु , इसके मन की हालत समझो तुम लोग। अभी अभी इसने अपने बेटे को खोया है। इससे बड़ा दुख संसार में दूसरा नही है कि अपनी संतान को ऐसे ….
   देव की बड़ी माँ अपनी बात पूरी भी नही कर पायीं और सुबकने लगी।
  उनकी पीठ पर हाथ फेरती बुआ जी उन्हें और देव की माँ को सांत्वना देती बैठी थी कि उसी वक्त कहीं से धूल फांक कर उनका बेटा सतीश वापस लौट आया…-” माँ एक कप चाय बना देना।”अपनी माँ को आदेश देता वो सीधा सीढ़ी चढ़ ऊपर देव के कमरे में चला गया…-” एक ये हैं हमारे राजकुमार। दिखने सुनने में इतने सुंदर की लगता है कहीं के राजकुमार हैं और लक्षण देखो। न काम काज में मन लगता न पढ़ने लिखने में। पता नही क्या करेगा ये लड़का। ” अपने बेटे का गुणगान कर उन्होंने झूठ मूठ के दो ऑंसू बहा दिए।
   लोगों का दुख दूर करने का सबसे सुंदर उपाय है कि उनके सामने अपना दुखड़ा रो लो। बुआ जी को ऐसा कोई कष्ट नही था अपने बेटे से, लेकिन यहाँ बस अपनी भाभियों के सामने उन्होंने यूँ ही कह दिया।      उसी समय चाय के कप रसोई में रखने पारो चली आयी। उसे देखते ही उन्होंने उसे आवाज़ लगा दी…-” पारो ज़रा एक कप चाय बना कर ऊपर सतीश भैया को दे आ।”
   उसके पीछे कौन क्या कह रहा इन सब बातों से पारो भी पूरी तरह अनजान थी ऐसा नही था। लेकिन वो जानबूझ कर इन बातों में ध्यान नही दिया करती थी। वो जानबूझ कर खुद को किसी न किसी काम में उलझाए रखती।
   रसोई में चाय बना कर वो बाहर बुआ जी के पास कप ले आयी…-” जा ना ! ऊपर कमरे में हैं सतीश भैया उसे दे आ। देव से चार महीने बड़ा है तो तेरा भैया हुआ ना! “
   वो कप लिए ऊपर चली गयी। पलंग पर आराम से लेटा सतीश अपने फ़ोन पर कुछ देख रहा था कि दरवाज़े पर दस्तक दे पारो अंदर चली आयी। टेबल पर कप रख वो लौट रही थी कि सतीश ने उसे आवाज़ लगा दी…-” ज़रा यहीं ले आइये। अगर आपको तकलीफ न हो तो।”
पारो ने कप पलंग के पास वाले टेबल पर रखना चाहा कि सतीश ने हाथ बढ़ा दिया। पारो ने उसकी तरफ कप बढ़ाया और सतीश ने एक हाथ से कप थामते हुए दूसरे हाथ से उसके हाथ पर हाथ रख दिया।

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पारो ने चिहुंक कर अपना हाथ पीछे खींच लिया…-” अरे मुझसे डरने की ज़रूरत नही है आपको। और न ही इस कमरे में आने के लिए सोचने की ज़रूरत है। आप ही कमरा है। आप ही का पलंग है। जब जी चाहें आ जाया करें।”
   पारो को जाने क्यों ये आदमी कभी नही सुहाता था। वो पलट कर बाहर जाने को हुई कि उसने पीछे से उसके कंधे पर हाथ रख दिया…-“आपको किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो आप बेझिझक मुझसे कह सकती हैं। मैं समझता हूँ आपकी भी तो अपनी ज़रूरतें होंगी। “
  कंधो पर से फिसलती उसकी उंगलियां गर्दन से होती हुई पीठ तक आने लगी कि पारो को लगा वो पलट कर उसे एक झापड़ धर दे। लेकिन बिना कुछ कहे वो बाहर भाग गई। सीढ़ी से नीचे उतरते ही आंगन में सारी औरतें बैठी थीं। उनके सामने से अपनी रुलाई रोकते हुए निकल पाना मुश्किल जान वो छत के दूसरी तरफ बढ़ गयी। इतनी देर से रोकी हुई रुलाई आखिर फूट पड़ी और वो सिसक सिसक कर देव को याद करती रोने लगी।
    उसे मालूम नही था कि छत के उसी दूसरे किनारे में दर्शन बैठा कोई किताब पढ़ रहा था । पारो को ऐसे धार रोते देख वो उठ कर उसके पास चला आया…-” क्या हुआ बऊ दी ? आप अचानक इतना क्यों रोने लगी? सब ठीक तो है ना?
” अब क्या ठीक हो सकता है दर्शन? मेरा जीवन ही खत्म हो गया है समझो।”
” ऐसा क्यों कह रही हैं बऊ दी। अब देखिए परीक्षाएं भी पास आ रहीं हैं। अब बाकी बातों से मन हटा कर पढ़ने में लगा दीजिये। बाकी बातें कुछ समय के लिए भूल जाइए ना।”
  उसे बेचारे को सांत्वना के शब्द नही मिल पा रहे थे। वो जितना जैसा बन पड़ रहा था समझाने की कोशिश में था कि पारो सुबक उठी…-“मैं कुछ दिनों के लिए माँ के घर जाना चाहती हूँ।”
“हाँ बिल्कुल चली जाना आप। किसने रोका है, पर अभी शांत हो जाइए, देखिए आप को रोते देख फिर माँ भी रोने लगती है।”
  दर्शन और वो बात कर ही रहे थे कि देव की काकी पारो की माँ के साथ वहीं चली आई।
मां को देखते हैं पारो भाव विह्वल हो उनके गले से लग गई….-” मां! अच्छा हुआ तुम आ गईं। मैं अभी तुम्हें ही याद कर रही थी। मैं यही कह रही थी दर्शन से कि मुझे तुम्हारे पास जाना है।”
मां उसे सीने से लगाए चुप कराते हुए अपने साथ ले चली।
     वही सीढ़ियों पर दोनों मां बेटी बैठ गई काकी उन दोनों को वहीं छोड़कर नीचे रसोई में चली गई। दर्शन दूर छत की दीवार से टीका हाथ बांधे उन दोनों को एक दूसरे के दुख से दुखी होता देखता रहा । छुपकर उसने भी अपने आंखों से बहने वाले आंसुओं को पोंछ लिया।
“मुझे अपने साथ ले जाने आई हो ना माँ?”
“नहीं ! मेरी बेटी तुझे कैसे ले जा सकती हूं ? तू तो घर का हाल जानती ही है। तेरी मां का ही वहाँ कोई ठिकाना नहीं है । ऐसे में तुझे और साथ ले जाऊं।
     और वहां  जाकर तू अपने ही भाई भाभी और उनके बच्चों की गुलामी करें यह मैं कैसे देख पाऊंगी?  बोल तो।
अच्छा एक बात बता, क्या यहां तुझे कोई कष्ट है ? तेरी सास तो देवी स्वरूप है क्या तुझे प्यार से नहीं रखती?”

पारो अपनी मां से क्या कहती? उसने नीचे सिर झुका लिया और अपने आंसू पोंछ लिये।
“यहां घर पर सभी बहुत अच्छे हैं मां। मुझे किसी से कोई परेशानी नहीं है। और ऐसा भी नहीं है कि मुझे बहुत ज्यादा काम करना पड़ता है, लेकिन फिर भी तुम्हारी बहुत याद आती है। मन करता है कुछ दिन तुम्हारे साथ रह सकूं।”

“इतनी ही अच्छी किस्मत होती, तो अपने पति को थोड़े ही गंवा देती  बेटी? अगर तेरा पति होता तो तू भी शान से अपने मायके में आकर रह सकती थी। उतनी ही शान से मैं तेरे ससुराल में आकर रह सकती थी।
मेरी ही तरह तेरी किस्मत भी फूटी हुई है तो क्या किया जाये? पति से ही सारे सुख हैं। पति के बिना सिर्फ श्रृंगार नही छूटता, बल्कि छूट जाता है एक औरत का आत्मसम्मान, उसके होंठो की हंसी, उसके जीने की ललक….”
“अगर आप इसे अपने साथ नहीं रखना चाहती हैं, तो इसमें आपका कोई दोष नहीं है। ब्याह के बाद लड़की का घर उसका ससुराल ही होता है। “काकी ये कहती पारो की माँ के लिए कुछ खाने का सामना लिए ऊपर चली आयीं। उनके पीछे ही बुआ जी और देव की बड़ी माँ और माँ भी आ गईं।

  ” देखिए बहन जी बुरा मत मानियेगा। मेरी एक जान पहचान वाली हैं उन्होंने बताया था कि मथुरा में एक आश्रम है जो खास ऐसी औरतों के लिए ही बना है। “

  पारो की माँ की आंखें भीगने लगी..
और पारो के दुख की अब कोई सीमा नही रह गयी थी। वो सोचने लगी, यही वो औरतें थी जो देव के सामने उसे हाथों हाथ लिए रहती थीं और आज उसके जाते ही क्या सास और क्या माँ दोनो ही समाज का सोच सोच कर इतनी बदल गईं।
     क्या इन लोगों के लिए अपनी बेटी अपनी बहु का दुख समाज से ऊपर नही है?
   एक अपनी बेटी को नौकर बने नही देखना चाहती तो दूसरी को  ये डर सता रहा कि उनके दूसरे बेटे पर वो डोरे न डालने लगे।

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” आप दुख क्यों करती हैं। अगर भगवान दुख देते हैं तो निवारण भी वही करते हैं। वहाँ मथुरा आश्रम की बहुत तारीफ सुन रखी है मैंने। अच्छा खाना, पहनना और सारा दिन कृष्ण भक्ति। अब इससे ज्यादा सुख और क्या होगा? ” बुआ जी अपनी तीखी ज़बान से ज़हर बरसाए जा रहीं थीं और बाकी औरतें गुमसुम बैठी सुन रही थीं!

  ” अरे कोई मुझे भी बताओ ऊपर क्या चर्चा चल रही है। अब मरी बुड्ढी हड्डियों में ताकत नहीं कि मैं सीढ़ियां चढ़कर उपर आ सकूं, तो कम से कम तुम ही लोग नीचे आ कर बात कर लो।”
  ठाकुर मां की आवाज सुन बुआ जी मुंह बनाकर एक और देखने लगी…-” इनके सामने तो कुछ भी कहना व्यर्थ है! अब इस बुढ़ौती में इन्हें कुछ समझ में तो आता नहीं है। अपनी अलग ही रट लगाए बैठी रहती हैं। अगर इनके सामने बातचीत हुई तो यह पारो को कभी आश्रम नहीं जाने देंगी। पर आप सब से मैं एक बार फिर कहती हूं, कि उस आश्रम से बढ़कर सुंदर जगह पारो के लिए और कोई नहीं है। वही उसका भविष्य है आप लोग मेरी बात मानें और इसे जल्द से जल्द मथुरा के आश्रम भेजने की तैयारी कीजिये। “

  ऑंसू भारी आंखों से पारो की माँ ने अपनी लाडली को देखा। इन कुछ ही महीनों में चेहरा कैसा बुझ गया था। चेहरे पर बहुत पीलापन आ गया था। जैसे किसी ने शरीर का सारा रक्त निचोड़ लिया हो। सफेद साड़ी में में लिपटा चेहरा और सफेद लग रहा था। कितनी कमज़ोर हो गयी थी पारो।
    सोलह सत्रह की उम्र में उनकी बेटी का ये क्या हाल हो गया था।
” मैं पारो को अपने साथ ले जाना चाहती हूँ। “
   आखिर पारो की माँ ने हिम्मत कर ही ली, वहाँ बैठी बाकी औरतों के दिल से जैसे कोई बोझ उतर गया…
” नही माँ ! मैं तुम्हारे साथ नही जाऊंगी। ” पारो ने दृढ़ता से अपनी बात रखी और एक बार फिर वहाँ बैठी सभी औरतों का जी कसमसा गया!
“माँ ! मुझे मथुरा आश्रम पहुंचाने की व्यवस्था करवा दीजिये। “अपनी सास की ओर मुड़ कर पारो ने कहा और नीचे  उतर गई।
   उसके पीछे बैठी सभी औरतों के चेहरों पर रंग आते जाते रह गए…..

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क्रमशः

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aparna ….


  

शादी.कॉम- 16

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       ” ना मोहब्बत ना दोस्ती के लिये,वक्त रुकता नही किसी के लिये।।”

   जिसने भी कहा है या लिखा है,अटल सत्य है!! सब कुछ अपनी गति से चलता रहता है ,समय किसी के लिये नही रुकता,।।
     समय अपनी गति से चलता गया,बांसुरी को जिम जाते पूरे छै महीने बीत गये,अब वो पहली वाली गोल मटोल तबला सरीखी बांसुरी नही रही बल्कि वाकई दुबली सजीली बांसुरी बन गई,बिल्कुल अपने नाम को चरितार्थ करते हुए।।
       राजा भी अपनी परीक्षाओं से फारिग हो गया,इस बार उसने पेपर भी ठीक से लिखे।।पहले तो राजा के साथ ऐसा होता था कि जब वो पढ़ने बैठता था तो हर विषय एक दूसरे से होड़ लेता हुआ बकवास और बोरिंग लगता था,राजा हमेशा सोचा करता था,जब दिल को बहलाने वाले इतने साधन जीवन मे मौजूद हैं ( डम्बल,साईकल, ट्रेडमिल इत्यादी) तो कौन इन्सान होगा जो अपना जीवन किताबों में व्यर्थ करेगा,।
      वो जब कभी इतिहास पढ़ने बैठता तो आधा तो वो समय चक्र में उलझ के रह जाता ।।उसे  BC (before christ)और AD (anna domini) का झमेला बड़ा कठिन लगता,उसके ऊपर से अलग अलग आक्रमणकारी और अलग अलग सभ्यताएं ।
     वो हमेशा सोचा करता कि जब हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यता की खुदाई मे सिक्के मिले तो तुगलक ने कौन से सिक्के बदले।।
     ये तो सिर्फ एक विषय था,इसी तरह के कई विषय थे जो पूरी तरह वक्त की बर्बादी थे,नागरिक शास्त्र,भूगोल इत्यादी,,पर धीरे धीरे इन जटिल विषयों की गुत्थि को बांसुरी ने बड़ी सरलता से सुलझा कर रख दिया,बिल्कुल जैसे किसी उलझे हुए ऊन के गोले को कुशल हाथों से एक गृहिणी सुलझा कर अलग अलग बंडल तैयार कर लेती है,वैसे ही।।

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     पहले राजा पेपर बनाने बैठता था तो उसके साथ ये होता था कि एक सवाल नही आ रहा,आगे बढो, अरे दूजा भी नही आ रहा,फिर आगे बढ़ो, तीसरा भी तो नही आ रहा,क्या करना है आगे ही बढ़ना है,,पर चौथा भी नही आ रहा,अब क्लास से ही निकल लो।।।
   पर अबकी बार बांसुरी ने पक्की तैयारी की थी,उसे पता था उसका छात्र अड़ियल है,और इसे अभ्यास के चाबुक से ही सही किया जा सकता है,इसीसे उसने हर विषय के कई कई पेपर तैयार कर राजा से समय अवधि के भीतर पूर्ण करवाये थे,इसीसे इस बार जब राजा परीक्षा मे बैठा तो उसे खुद भी मालूम नही था कि उसके साथ इतना चमत्कार होगा।।
   
                प्रथम प्रश्नपत्र का प्रथम सवाल उसने गणपति को शीश नवा के जब देखा तो उसके आश्चर्य की सीमा ना रही__ अरे ये सवाल तो बनता है,,अगला देखा,अरे ये भी आता है,तीसरा?? हाँ ये भी तो याद है,चौथा सवाल देखा,अरे इसका जवाब तो बहुत अच्छे से आता है,!! ज्ञान और आत्मविश्वास का संगम जहां हो जाता है वहाँ फिर कोई विपत्ति आड़े नही आती।
    
        तीन घन्टे के प्रश्नपत्र में जहां राजा पहले दो ही घन्टे में बाहर निकल जाता था,आज पूरे तीन घन्टे उसे ऊपर नज़र उठाने की भी फुर्सत नही मिली।।
  सिर अपनी उत्तर पुस्तिका मे गडाये हुए वो बस सारे उत्तर एक के बाद एक लिखता गया,पैंतालीस मिनट बीते होंगे कि उसे अतिरिक्त उत्तर पुस्तिका की आवश्यकता पड़ गई ।।
      अब इतने सालों में शिक्षकों से भी भला परिचय हो चुका था इसीसे जब राजा ने अतिरिक्त उत्तर पुस्तिका की मांग की तो शिक्षक महोदय को हार्ट अटैक आते आते बचा,वो एक हाथ से अपना हृदय थामे दूसरे हाथ से कॉपी लिये राजा की बैंच तक चले आये
     “का हुई गवा राजा?? ऐसा का लिख डारे बाबू की सप्लीमेंट्री  की जरूरत पड़ गयी।देखो सभी कहते जरूर हैं कि कापी कोई पढ़ता नही किसी फिलिम की कहानी लिख डारो,पर होता नही ऐसा बबुआ,,कोनो पिच्चर विच्चर का कहानी थोड़े ही लिख मारे हो।।”
    
         शिक्षक महोदय ने अपनी बात पूरी करते करते राजा की कॉपी पर सरसरी नज़र भी मार ली,और अबकी बार उन्हें दूसरा हार्ट अटैक आते आते बचा।

  ” ई कैसा चमत्कार भवा,,राजा ही हो ना,,उंगली ना दुखी इत्ता सारा लिख मारे हो,अरे अभी तक पास होने के लाले थे तुम्हारे,अबकी लाने तो तुम गुरू टॉप कर जाओगे ,लग रहा।।

” गुरुजी इस बार पूरी तैयारी कर के आये हैं ,अब चाहे जो हो जाये हमको पास होना ही है।”

और इस प्रकार हर एक विषय के पेपर में अपने गुरूजनों को हल्का फुल्का अटैक देते हुए भैय्या जी ने सारे प्रश्नपत्र बड़ी सुगमता से हल कर लिये।।

   अन्तिम पेपर दे कर राहत और सुकून की सांस लेते हुए जिम की राह पकड़ लिये।।
     जिम पहुंच कर जैसे ही बड़े कांच के लगे स्लाइडिंग डोर को खोल कर भैय्या जी ने भीतर प्रवेश किया,उनके ऊपर पुष्पवर्षा होने लगी।।।पूरा जिम बड़े बड़े गुब्बारों से सजा पड़ा था,दरवाजे के एक किनारे बहुत सुन्दर रंगोली सजी थी,उस गोल रंगोली में एक तरफ डम्बल बने थे और एक तरफ क्रॉसट्रेनर ।।
   
      प्रिंस और प्रेम दौडे चले आये,भैय्या जी ने दोनों को ऐसे गले लगा लिया जैसे अलाउद्दीन खिलजी से चित्तौडगढ़ का किला जीत लाये हो।।बिल्कुल किसी शहंशाह का सा स्वागत हुआ,जिम में आने वाली हर नाज़नीन उस दिन कुछ अलग ही सजी धजी सी मौजूद थी,सभी ने परीक्षाफल आने के पहले ही भैय्या जी की भावी सफलता को आंक लिया था और उसी का जश्न मनाने की तैयारी थी।


   
           ऑफिस के अन्दर से एक बड़ा सा गोल रसमलाई फ्लेवर का केक लिये बांसुरी आई,,राजा ने मुस्कुरा कर केक काटा और सबसे पहला टुकड़ा बांसुरी की ओर बढ़ा दिया ,केक थामते हुए बांसुरी का हाथ ज़रा लड़खड़ा गया और उसने दूसरे हाथ से राजा की कलाई थाम ली__
    ” अरे!! बांसुरी तुम्हारा हाथ तो तप रहा है,तुम्हें तो तेज़ बुखार है,ऐसे मे यहाँ क्यों आई,घर में आराम करना चाहिये था ना।।”

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  ” कुछ नही बस हरारत है,अभी घर जाकर दवा ले लेंगे तो ठीक हो जायेंगे,तुम हमारी चिंता ना करो,तुम्हारे पेपर अच्छे बन गये उसी खुशी में पार्टी है,समझे……”

   बांसुरी अपनी बात पूरी किये बिना ही चकरा के नीचे गिर गई,अचानक उसके शरीर में अकड़न सी होने लगी,शरीर पीछे की ओर झटके के साथ मुड़ने लगा,ऐसे जैसे कोई धनुष!!!

   राजा को समझते देर ना लगी,एक दिन पहले ही एलो वेरा जूस का टिन खोलते समय बांसुरी के हाथ में लगी चोट ही मांसपेशियों की जकड़न और दर्द का कारण बनी थी, बचपन से उसने धनुषटँकार नामक बीमारी का उल्लेख सुन रखा था,कि कैसे जंग लगी धातु से खरोंच लगने पर टीटनस हो जाता है अगर समय रहते टीका ना लगवाया जाये तो।।
    
    बांसुरी के चेहरे और गरदन की पेशियों पे कसावट बढ़ने लगी,सभी किसी ना किसी दिशा में दौड़ पड़े, ऐसा अक्सर होता है,जब भी कभी कही कोई आपातकालीन स्थिति बनती है तो अमूमन भगदड़ मच जाती है,और इन भागते चीखते लोगों में से पचास प्रतिशत लोगों को तो पता भी नही होता कि वो क्यों भाग रहे हैं,और उन्हें कहाँ जाना है,वैसा ही कुछ जिम में हुआ,जिन्होनें बांसुरी को गिरते देखा वो तो उसकी सहायता को भागे लेकिन जिन्होने नही देखा वे भी उतनी ही तत्परता से भागते हुए ,काम करने वालों के रास्ते में व्यवधान उत्पन्न करने लगे।।  तभी सहसा राजा भैय्या ने सबको बांसुरी से दूर किया,और उसे अपने दोनों हाथों से उठा कर जिम से बाहर की ओर चल दिये, किसी ने पीछे से आवाज़ भी दी_
       ” अरे कमजोरी से सर घूम गया होगा,इत्ती सी बात के लिये कहाँ लिये भाग रहे हो राजा??”

  ” कमजोरी तो नही लगती,हमे तो लगता है कोई भूत परेत का चक्कर तो नही ना है।”

  किसी की बात पे कान दिये बिना राजा बांसुरी को लिये बाहर निकल गया।।

  राजा बांसुरी को लिये जब तक अस्पताल पहुंचा तब तक में बाँसुरी का दर्द और एँठन और बढ़ चुका था,ज्वर की बेहोशी टूटी नही थी,,बिल्कुल अवधूत रुद्र जिस प्रकार सती की अचल देह लिये क्रोध में कांपते पृथ्वी को नापते चले,कुछ वैसे ही अवतार में राजा बांसुरी की देह समेटे अस्पताल पहुँचा।।
    बाँसुरी को तुरंत इमरजेन्सी में भर्ती कर लिया गया,सीनियर जूनियर डॉक्टरों की टीम अपने काम में जुट गई।।

    लगातार दो दिन तक डॉक्टरों के किये अथक प्रयास से आखिर तीसरे दिन बांसुरी ने आंखें खोल दी।।इन दो दिनों में बांसुरी के हैरान परेशान परिवार का संबल बना राजा जैसे खाना पीना भी भूल गया था,हर दवा हर इन्जेक्शन के लिये दौड़ लगाता राजा अपने नाम की पद गरिमा को जैसे भूला बैठा था।

       इसी बीच बेटा घर क्यों नही आ रहा ये जानने माता जी ने प्रिंस से चर्चा की तो उन्हें बांसुरी की बीमारी और राजा की अवस्था का पता चला,बेटे से मिलने अस्पताल पहुंची अवस्थिन को वहाँ बेटे का एक अनोखा ही रूप देखने मिला,,घर पे पानी का एक गिलास स्वयं ना लेने वाला उनका लाड़ला यहाँ तो हर काम खुद करने की जिद पे अड़ा था,डॉक्टरों से चर्चा करने से लेकर हर छोटे बड़े काम की जिम्मेदारी राजा की ही थी।।
       
          जिसे किसी वस्तु की ज़रूरत होती फट राजा की पुकार मचती,बांसुरी की अम्मा तो ऐसे घुली मिली सी राजा से सिर भिड़ाये चर्चा करती की एक बारगी लगा राजा इनकी नही उनकी ही संतान है।।
      अपने कोखजाये को उन परायों के लिये इतना घिसते देख माँ के सीने में सांप लोट गये,कैसे भी हो इस लड़की और इसके परिवार से अपने राजकुमार को उन्हें बचाना ही होगा,जाने क्या घुट्टी पिला दी है इन लोगों ने_

    ” काहे राजा घर दुवार भुला गये हो का,दू दिन से उधर फिरे ही नही,तुम्हरे बाऊजी परेसान हो रहे थे,तब आज प्रिंस से पूछताछ कर तुम्हें ढूंढते आये हैं हम।”

” काहे अम्मा बड़के भैया नही बताये का?? हम तो जिस दिन बांसुरी को यहाँ ले के आये,तुरंते भैय्या को फोन लगा के बता दिये रहे कि बांसुरी को टिटेनस हुआ है, हमको अस्पताल में  ही रुकना पड़ेगा।।”

   बात सत्य थी,युवराज ने अम्मा को कुछ नही बताया था,बल्कि उल्टा अपने किसी कर्मचारी के हाथ राजा के पास कुछ पैसे भिजवा दिये थे।।

  अब तो माताजी का पारा और उबल पड़ा,दोनो लड़के मनमर्जी कर रहे,अपनी अम्मा से बताने की जरुरत ही नही समझी।।पर समझदारी उनमें कूट कूट कर भरी थी,उन्हें भली प्रकार ज्ञात था कहाँ क्या बोलना,किस शब्द से कब घात की जा सकती है और कब चाशनी में लपेट के परोसना है__

       ” अच्छा है बाबू,अम्मा की कोनो चिंता ही नही, कम से कम एक बार हमें भी बोल देते, किसी बात के लिये मना तो करते नही हैं,उल्टा हम घर से खाना पीना भिजा देते,जाने यहाँ का मिला होगा खाने को।”

  राजा के प्राण अपनी माँ में बसते थे,इन दो दिनों में बासुँरी की तीमारदारी में राजा जैसे खुद को ही भूल गया था,माँ को कुछ बताना कहाँ याद रहता,पर माँ की कही भावुक पंक्तियों ने मन में क्लेश और अफसोस जगा दिया,उससे वाकई बड़ी चूक हो गई थी,वो वहीं माँ के पैरों के पास ज़मीन पर बैठ गया, अपना सिर माँ की गोद में टिका कर आंखें बन्द कर ली__
      ” बस माँ का बतायें??,सब कुछ इत्ता अचानक हुआ कि कुछ समझ ही ना आया,बस बचपन की तुम्हारी बताई बात ही याद रही,उसी के लाने बन्सी को उठाये दौडे चले आये,लगा कि नही लाये तो जान ना बचेगी बेचारी की।”

  माँ अपने बेटे के बालों में हाथ फिराती सुनती रही, मन में बवंडर उठ रहा था,बांसुरी बंसी कब बन गई? बित्ते भर की छोकरी ने उसके लल्ला का दिमाग फिरा दिया,पर ऊपर से कुछ ना बोली__

” राजा ! हियाँ बैठे हो,चलो ना उधर डाकटर साहब बुला रहे,बोल रहे कल बंसी की छुट्टी कर देंगे।। नमस्ते बहन जी!! हम बाँसुरी की अम्मा !! अगर आपका राजा ना होता तो हमारी बांसुरी भी ना होती,बेचारी के प्राणों पे संकट पड़ गया था,भला हो राजा बाबू का समय रहते अस्पताल ले आये,सारी भाग दौड़ कर के भर्ती करा दिया तब हमें खबर की।”

  राजा तो बांसुरी की अम्मा की आवाज़ सुनते ही झट उठ कर बांसुरी के कमरे की ओर लपक लिया,और राजा की अम्मा के कलेजे पे सांप लोट गये।।पहले से जली भुनी बैठी थी कि ताबूत पे आखिरी कील ठोंकने बांसुरी की अम्मा स्वयं उपस्थित हो गई।।।अरे साफ साफ तो दिख रहा कि लड़का हाथ से निकला जा रहा अब ई तिवारीन काहे जले पे नमक छिड़क रही।।
 
    बांसुरी की अम्मा प्रमिला के मन में शुरु से अवस्थी परिवार के लिये एक विशेष सम्मान की भावना थी,मौके बेमौके राजा की भलमनसाहत वो देख भी चुकी थी,अवस्थी परिवार का नाम भी बहुत था,इसीसे वो खुद से आगे बढ़ कर राजा की अम्मा से खुले दिल से राजा की स्तुति कर गई, पर ऐसा करने से पहले ये नही सोच पाई की उनकी इस प्रशंसा के अर्ध्य को सामने वाली कैसे लेगी।। साफ मन और स्वछ हृदय से की गई प्रशंसा को राजा की माँ ने किसी और ही ऐनक से देखा और चोट खा बैठी।।

          ***********************

  बांसुरी को स्वस्थ हुए दिन बीत गये,वापस जीवन अपने ढर्रे पर चलने लगा।।कॉलेज के इम्तिहान भी निपट गये,अब बांसुरी का अधिकतर समय घर पर ही गुजरने लगा।।
       ऐसे में बुआ जी वापस अपने पुश्तैनी काम में जी जान से जुट गई,,घर बैठी जवान लड़की उनकी नज़र में सबसे बड़ी बोझ थी,जैसे भी इस छोकरी को भी पार लगाना था और अपने भाई भावज के लिये गंगा स्नान का मार्ग प्रशस्त करना था।।
   
    पहले बांसुरी मोटी थी अब पतली हो चुकी थी,लेकिन उसकी इस अवनति  से बुआ जी पर कोई विशेष प्रभाव नही पड़ा,वो अभी भी चुन चुन के ऐसे ही रिश्ते सहेज के भाभी के सामने परोसती की प्रमिला को उबकाई आ जाती पर रिश्ते के सम्मान को निभाने वो ननंंद के सामने चुप रह जाती।


     
             बांसुरी अब पहले की तरह अपनी तीखी ज़बान के प्रहार से बुआ को लहू-लुहान नही करती, बल्कि जैसे ही उसका विवाह प्रसंग छिड़ता वो उठ कर अपने कमरे में किसी किताब को खोल उसमें दुबक जाती।।एक शाम ऐसे ही बांसुरी जब बुआ जी के वार्तालाप से ऊब कर ऊपर चली गई तो उसके कुछ देर बाद प्रमिला भी ननंद को चाय का कप पकड़ा कर बाँसुरी की चाय लिये उसके कमरे में चली आई

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” का हुआ बंसी ,देख रहे हैं आजकल ब्याह का बात सुन के बड़ी अनमनी हो जाती हो,,कुछ मन मे चल रहा का??”

” अरे नही अम्मा,हमारे मन में का चलेगा।।पहले सोचा करते थे बैंक की परीक्षा देंगे नौकरी करेंगे पर अब सोच रहे जैसा बुआ और तुम सब ठीक समझो वही कर लेंगे।”

” अरे काहे वही कर लोगी!!! तुम्हरी बुआ तो सादी कराने पीछे पड़ी हैं,तो कर लोगी किसी से भी सादी।।”
   
बांसुरी ने चुपके से हाँ में सिर हिला दिया,अपनी बड़बोली बांसुरी को ऐसे चुपचाप देख प्रमिला का कलेजा मुहँ को आने लगा__

   ” अगर मन में कोई और है तो बता दो बंसी ,हम तो माँ हैं तुम्हारी,,कभी तुम्हरे साथ कुछ गलत ना होने देंगे।।
     तुम कहो तो राजा के घर सन्देसा भिजाये का।”

” काहे का सन्देश माँ?? जैसा सोच रही हो वैसा कुछ नही है।।राजा और हम सिर्फ दोस्त हैं ।”

अभी माँ बेटी अपनी बातों में लगी थी कि निरमा ने कमरे में प्रवेश किया__” प्रनाम चाची।”

” खुस रहो बिटिया!! आओ बैठो,तुम लोग बातें करो हम चाय भेजते हैं तुम्हारे लिये।”

  निरमा हंसते हुए आकर बांसुरी के पास बैठ गई ।

  ” क्या बात है छुपी रुस्तम!! क्या बोल रही थी चाची?? राजा भैय्या के घर रिश्ता भेजा जा रहा है हमारी राजकुमारी का,वाह वाह क्या बात है।”

  ” पगला गयी हो क्या निरमा,कुछ भी बोलती हो?”

  ” अरे तो बुराई क्या है राजा भैय्या में?? तुम जबर्दस्ती का ये सीरियसनेस का चोला जो ओढे बैठी हो ना,उतार फेन्को।।बहुत हुआ समझी ,वो भास्कर सर का शोक मनाना बन्द करो अब।।”

   ” तुमसे किसने कहा हम शोक मना रहे।”

   ” तुम्हारी शकल बता रही,अभी नीचे तुम्हारी बुआ जी मिली थी,मुझे एक से बढ़कर एक वाहियात लड़कों के फोटो दिखाने लगी__ बोलती हैं ये देखो कैसे हीरा मोती छाँट के लायी हूँ अपनी बंसी के लिये।मेरा मन किया बोल दूँ कद्दू !! इत्ते पसंद आ रहे तो किसी एक को चुन के आप ही फेरे फिरा लो,,पर संस्कार रोक देते हैं हमें,कुछ जादा बोलने से।”

  निरमा की बात सुन बांसुरी हँस दी__” देखो निरमा शादी तो करनी ही है,पापा चाह रहे उनके रिटायर होने के पहले पहले हमारा ब्याह भी हो जाये,हमारे लिये चिंता करते रहते हैं बेचारे! इसिलिये हमने भी अम्मा को शादी के लिये हाँ कह दिया है।।अगर हमारी किस्मत में पढ़ना और नौकरी करना बदा होगा तो शादी के बाद भी पढ़ लेंगे और कर लेंगे नौकरी।”

” बंसी तुम तो एकदम ही बदल गयी हो!!,अच्छा सुनो बड़े दिनों के बाद हमें घर से निकलने का मौका मिला है,चलो ना जिम चलते हैं प्रेम हमारा रस्ता देख रहा वहाँ ।।”

    बांसुरी ने मुहँ धोया कपड़े बदले और फेयर ऐण्ड लवली लगा कर तैयार हो गयी

” क्या बात है बंसी ,,पहले तो ये सब क्रीम वीम तुम्हे ढ़कोसला लगता था,अब क्या राजा भैय्या के चक्कर मे,हैं??”

” जी नही हमारी अम्मा के चक्कर में ये पोत रहें हैं आजकल!! हमारी गोरी नारी अम्मा को अपनी कलूटी बिटिया पे बड़ा तरस आता है,इसिलिये ये खरीद लायी,अब वो लायी है प्यार से इसीलिये लगा लेते हैं,अब चलो,वर्ना तुम्हारी अम्मा तुम्हें ढूँढते यहाँ चली आयेंगी।”

     जिम में शाम के पांच बजे की रौनक पसरी हुई थी,राजा अपने ऑफिस में बैठा था कि निरमा के साथ बांसुरी ने प्रवेश किया।।बांसुरी और राजा में पहले से ही तगड़ी दोस्ती थी पर अब कुछ हल्का फुल्का दुराव छिपाव भी ना रहा था।।
  
      अपनी तबीयत फिर परीक्षाओं के कारण कुछ समय के लिये जिम से अवकाश लेने वाली बांसुरी अब तक जिम मे वापसी नही कर पायी थी।।

  ” हाँ तो जिम कबसे शुरु करने का विचार है बंसी। दुबली हो गयी तो छोड़ दिया जिम ??”

  ” अरे नही राजा,तुम्हें बताया तो था परीक्षाओं में लगे थे,अभी एक हफ्ता तो हुआ है सब निपटे,बस अब कल से शुरु कर देंगे,हम ज़रा एक राउंड घूम कर आते हैं,जिम का चक्कर लगा लें,तुम बैठो निरमा।”

  निरमा प्रेम और राजा को वहीं छोड़ बंसी बाहर निकल गयी।।

” राजा भैय्या आपसे एक बात कहें ,हमें लगता है अब बांसुरी ज्यादा दिन तक जिम नही आयेगी,उसके घर में तो उसके लिये खूब जोर शोर से रिश्ता देख रहें हैं ।”

  ” अच्छा,,तो?? बांसुरी भी तैयार है क्या शादी के लिये,वो तो पढ़ना लिखना नौकरी करना चाहती थी।”

” चाहती थी! पर अब शादी के लिये तैयार है,ये देखिये ये फोटो, बंसी की बुआ जी की नज़र बचा के हम ले उड़े ,कैसा उजड़ा चमन लड़का है!! तानपूरा भी नही लग रहा और हमारी बांसुरी से शादी करेगा।।”

  फोटो देख कर राजा का चेहरा लटक गया__” इससे तो अच्छे हम हैं ।”

  ” कुछ कहा राजा भैय्या आपने।” निरमा के सवाल पर हड़बड़ा कर राजा ने फोटो निरमा को वापस कर दिया

  ” नही! कुछ नही।”

” वैसे बंसी की अम्मा तो उससे आपके बारे में भी पूछ रही थी,कि आप बंसी को कैसे लगते हैं ।।”

  ” क्या बात कर रही हो निरमा?? “

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  ” हाँ हम सच कह रहें हैं,पर हमारी बंसी है एक नम्बर की गंवार , कुछ नही बोली मुहँ में कुल्फ़ी जमाई बैठी रही।।हम भी सोचे भुगतो फिर,,जब इत्ते अच्छे रिश्ते को सुन के भी चुप बैठी रहेगी तो मिलेगा ऐसा ही कोई साम्बा और कालिया,हम क्या करें।”

  राजा नीचे सिर किये कुछ सोचते हुए मुस्कुराता रहा

  ” भैय्या जी! अब बस मुस्कुराने से कुछ नही होना जाना है।।आपको ही पहल करना पड़ेगा वर्ना बाद में पछताने के कुछ हाथ ना लगेगा।”

  ” निरमा तुम तो पीछे ही पड़ गयी हो,अरे अगर भैय्या जी के मन मे कुछ होगा ही नही तो वो बेचारे का करें।।तुम तो जबरिया उतर आयी हो यार।।चुप भी करो अपना बांसुरी पुराण,भैय्या जी बस दोस्त समझते हैं,और कुछ नही समझीं।क्यों भैय्या जी ठीक कहे ना??”

   ” अच्छा ऐसा है तो काहे उस दिन जैसे ही बन्सी चक्कर खा के गिरी तो सीधा उसे लिये अस्पताल भागे,काहे इत्ता उसकी बात सुनते हैं,काहे उसकी हर बात मानते हैं ।”

   ” क्योंकि भैया जी किसी का एहसान भूलते नही इसलिये,वो पढ़ाई है ना भैय्या जी को इसलिये उसकी मदद करते हैं,और कोई बात नही है,प्यार व्यार बहुत दूर की बात है,भैय्या जी तो उस मुटल्लो से बात कर लेते हैं ढंग से,वही बड़ी बात है।।

  ” अरे झगड़ा बन्द करो तुम दोनो यार!! हम देख लेंगे क्या करना हमें ।।वैसे प्रेम हमें लगता है निरमा सही कह रही…..यार एक बात बोलें हमे लगता है हमे बांसुरी की आदत सी पड़ गयी है,वो जिम नही आती तो जिम मे मन नही लगता,हमारे हर काम में उसकी राय लेना हमें अच्छा लगता है,और ये भी लगता है कि वो कभी गलत राय नही देगी,,हम भी सोच रहे कि एक बार बंसी से बात कर ही लेते हैं ।”

राजा अपनी बात पूरी कर भी नही पाया था कि बन्सी अन्दर आ गयी।।

  ” किस बारे में हमसे बात करने की सोच रहे राजा?”

  ” कुछ नही बंसी बाद में बताएंगे,, आओ लो कॉफ़ी पी लो,,आज तुम सब के लिये इंडियन कॉफ़ी हाऊस से कॉफ़ी मँगवाई है।।”

  ” क्या बात है राजा !! आज बड़े खुश लग रहे जो कॉफ़ी पिला रहे हम सब को।”

  चारों मुस्कुराते हुए कॉफ़ी का मज़ा लेने लगे बाहर जिम में गाने की पंक्तियाँ सुनाई दे रही थी।।

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तुम सिखा रहे हो,तुम सिखा रहे हो,जिस्म को हमारे रूहदारियां …….काफिराना सा है ,इश्क़ है या क्या है।।”

क्रमशः

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aparna..

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जीवनसाथी- 118

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  जीवनसाथी – 118




     अस्पताल में बांसुरी के कानों में चुपके से कुछ कह कर पिया वहां से बाहर निकल गई बांसुरी में समर की तरफ देखा वह पिया को ही देख रहा था पिया के जाने के बाद उसने सर झुका लिया।

” क्या हुआ समर सा कुछ उदास लग रहे हैं आप?

“ऐसी तो कोई बात नहीं रानी साहेब! मैं तो बहुत खुश हूं। आपने इतनी बड़ी खुशखबरी दी है मेरे हाथों में।

“तो आप हम सब को कब मौका दे रहे हैं खुश होने का।”

बाँसुरी के सवाल पर समर मुस्कुरा कर चुप रह गया।

“नहीं! अब ऐसे चुप रहने से काम नहीं चलेगा! आपको याद है एक दिन आपने मुझसे कहा था, कुछ गिफ्ट के लिए, और मैंने कहा था वक्त आने पर मांग लूंगी! तो क्या आज मैं अपना तोहफा मांग सकती हूं!”

” आप रानी है हुक्म कीजिये।”

” पहली बात कि आप मुझे बार-बार रानी साहेब कहना बंद कीजिए। मैं आपको अपना देवर मानती हूँ इस लिहाज से आप मुझे भाभी सा कहिये तभी मैं अपना तोहफा माँगूँगी। “

  समर मुस्कुरा उठा..-” ठीक है भाभी साहब! आप बताइए । “

” अब आप भी शादी कर लीजिए। कब तक ऐसे मारे मारे फिरते रहेंगे। आपके राजा साहब अपने अलावा और किसी की तरफ ध्यान देते ही नही। “

” ये बड़ी ज्यादती है। अगर वो खुद किसी बंधन में बंधना नही चाहता तो मैं कैसे उसे पकड़ कर उसकी शादी कर दूं। “
   राजा के जवाब पर समर बाहर की तरफ देखने लगा। उसे देखकर बांसुरी वापस मुस्कुरा कर उसे छेड़ने लगी…-” क्या हुआ कमरे से बाहर की तरफ आप देख रहे हैं? किसी का इंतजार कर रहे हैं या किसी के पीछे जाना चाहते हैं।”

“जी ऐसा तो कुछ भी नहीं है।”

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“क्यों अपने आप से झूठ बोल रहे हैं? अब इस कमरे में आपके राजा साहब और मेरे अलावा कोई नहीं है! आप हम दोनों को तो सच बता ही सकते हैं।”

“कैसा सच भाभी साहब?”

“यही कि आप पिया से प्यार करते हैं!”

“ऐसा किसने कहा आपसे! क्या पिया ने कुछ कहा?”

“जी नहीं आप एक नमूना हैं तो वह डबल नमूना है। उसने भी कुछ नहीं कहा । यही तो मैं कह रही हूं कि ना आप कुछ कहेंगे ना वह कुछ कहेगी और बस इसी अनकही में कहीं यह ना हो जाए कि वह शादी करके उस डॉक्टर का नर्सिंग होम संभालने चली जाए ! तब बैठे रहिएगा अपनी मंत्रीगिरी संभालते हुए यहां।
  और एक बात कहूं! आज नहीं तो कल काकासाहेब आपकी शादी कर ही देंगे ! किसी ना किसी के साथ तो जिंदगी आपको भी बितानी ही है, तो अगर मौका मिल रहा है कि आप अपनी पसंद की लड़की के साथ अपनी पूरी जिंदगी बिता सकते हैं, तो उस मौके को क्यों यूं ही गवा रहे हैं?
  आखिर अब आपको किस बात का इंतजार है? देखिए आपकी सगाई हुई थी केसर से। पर यह हम सब जानते हैं कि वह सगाई कितनी सच थी और कितनी झूठ।
यह आप भी जानते हैं और केसर भी। अगर आप यह सोच कर बैठे हैं कि उस झूठी सगाई के बाद भी केसर की सारी जिम्मेदारी आपके ऊपर है तो यह गलत है। केसर खुद पश्चाताप में  डूबी है कि मुझसे और राजा साहब से बदला लेने के लिए उसने आपको मोहरा बनाया। यह बात आप भी जानते हैं। इसलिए केसर की तरफ से अपने मन में किसी भी तरह का कोई गिल्ट मत रखिएगा ।
  अपनी जिंदगी संवारने का, उसे सजाने का मौका हाथ से मत जाने दीजिए समर सा, क्योंकि अगर आप जिससे प्यार करते हैं वह आपके साथ नहीं है तो जिंदगी बहुत कठिन हो जाती। हमने यह बात बहुत करीब से महसूस की है रेखा को देखते हुए।
और अगर आपने जिससे प्यार किया वह आपका हमसफर बन कर आपका जीवन साथी बन कर आपके ज़िन्दगी के सफर में साथ चलता रहे तो इस जिंदगी के सफ़र से खूबसूरत कोई सफर नहीं रह जाता, यह हमसे ज्यादा और कौन जानता है।



“एक और भी कोई है जो यह बात जानता है।”

राजा की बात पर बांसुरी मुस्कुरा कर वापस समर को देखने लगी…-” देख लीजिए अपने राजा साहब को और हमें!
क्या हम दोनों की जोड़ी देखकर आपको यह नहीं लगता कि आपकी भी ऐसी ही एक जोड़ी होनी चाहिए! अभी भी वक्त है जाइए और रोक लीजिए अपनी पिया को, वरना वह इतनी ज़िद्दी है, कि अगर आपने उसे नहीं रोका तो वह वाकई उस लड़के से सगाई करके शादी करके आप की दुनिया से दूर चली जाएगी।”

” जाने दीजिए! अगर वह जिद्दी है, तो मैं उससे बड़ा जिद्दी हूं।”

“अगर आपकी ज़िद से किसी का फायदा होता तो मैं आपको इस ज़िद से पीछे हटने नहीं देती। लेकिन आप दोनों की यह फिजूल तानाशाही और यह फिजूल की सनक एक दूसरे की जिंदगी बर्बाद कर देगी। इतना कहने पर भी आप मेरी बात नहीं सुन रहे हैं इसका मतलब है, कि आपकी जिंदगी में मेरी कोई अहमियत नहीं है। चलिए कोई बात नहीं अगर आप नहीं चाहते तो मैं आपको बिल्कुल भी फोर्स नहीं करूंगी।”

“यह क्या कह दिया आपने भाभी साहेब। हुकुम का और आपका स्थान मेरे जीवन में मेरे माता-पिता के समान है! आपकी आज्ञा मेरे सर माथे। मैं अभी जा रहा हूं ,उसके पीछे।  उसे पकड़ कर वापस आपके सामने पेश करता हूं।”

“जी नहीं! उसे इस तरह से पकड़ जकड़ कर मेरे सामने लाने की जरूरत नहीं है। आज उसकी सगाई है आप जाइए उसकी सगाई होने से पहले -पहले उसके घरवालों से उसका हाथ मांग लीजिए।
लेकिन उसके पहले मेरी एक बात सुनिए।”

“जी आज्ञा दीजिए आप।”

“आप वाकई पिया से प्यार तो करते हैं ना?”

समर बांसुरी से नजर चुरा कर इधर-उधर देखने लगा और उसे इधर उधर देखते हुए बांसुरी खिलखिला कर हंस पड़ी…-” देखिए यह हमारा छोटा शैतान भी खुश हो रहा है अपने चाचा को शर्माते हुए देखकर। वैसे एक बात कहूं आप की बोलती कोई बंद नहीं करा पाता है। एकमात्र पिया है जिसके सामने आप चुप खड़े रह जाते हैं और वह सरपट बोलती चली जाती है। मैंने तो पहली बार ही आप दोनों को देख कर समझ लिया था कि यह राम मिलाई जोड़ी है।”

“देखा समर कितनी समझदार है हमारी हुकुम। दूसरों के सब मामले में इनकी समझदारी ऐसे ही फूट-फूटकर बहती है, और हमारे मामले में इन्हें मुझसे मिलने के बाद यह समझ आने में कि मैं ही इनका जीवन साथी हूं महीनों लग गए।”

“होता है ऐसा भी हो जाता है कभी-कभी!
वैसे समझ में तो तब भी मुझे आ गया था, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। और खासकर आपका यह बड़ा सा महल देखने के बाद तो रही सही थोड़ी सी हिम्मत भी चूक गई थी।”

“चलो अब हम दोनों बातों में नहीं लगते समर कि यहां से छुट्टी करते हैं जिससे वह जाकर अपनी जीवनसंगिनी को रोक सके ! “
राजा की बात पर बांसुरी ने हां की मुहर लगाई और समर को उन दोनों ने वहां से बाहर भेज दिया।

समर कमरे से बाहर निकल कर गाड़ी की तरफ बढ़ा और जैसे ही ड्राइविंग सीट पर दरवाजा खोलकर अंदर बैठा बाजू वाली सीट पर प्रेम आकर बैठ गया। उसी वक्त पीछे के दोनों दरवाजे खुले और आदित्य और विराट भी अंदर आकर बैठ गए। समर उन सब को चौक कर देखने लगा…-” आप सब अचानक एक साथ यहां कैसे?”

“भाई दुल्हन लेने जा रहे हो तो बाराती तो साथ चलेंगे ना।

प्रेम की बात पर समर एक बार फिर चौन्क कर प्रेम को देखने लगा। प्रेम भी उसे देखते हुए हंस दिया….-” अरे पहली बार जा रहे हो बात करने उनके घर, अकेले जाना शोभा देता है क्या? हम सब तुम्हारे भाई बनकर मिलेंगे उनसे, और जब बातचीत पक्की हो जाएगी तब काका और काकी से मिलवा देना।”

प्रेम की बात पर हामी भरते हुए आदित्य और विराट भी हंसने लगे।
“समर गाड़ी तुम चलाओगे या मैं चला लूं? वैसे दूल्हा खुद ड्राइव करता हुआ जाए ये अच्छा नहीं लगता। तुम पीछे आ जाओ मैं ड्राइविंग सीट पर आता हूं ।”
समर में एक नजर आदित्य को देखा और वापस गाड़ी गियर में डाल दी।
“मैं देख रहा हूं जैसे ही किसी की कोई नाजुक रग दूसरों को पता चलती है सब बड़े मजे लेने लगते हैं।’

“हम सब तो मजे लेंगे ही, तुम हो ही ऐसे कमाल के। पूरी दुनिया को सुधारने चले हो और अपनी जिंदगी का कबाड़ कर रखा है। अरे जब अच्छी-खासी लड़की मिली हुई है ,तो उससे शादी करने की जगह उसे प्रपोज करने की जगह तुम दून जाकर में कोर्ट केस में जिरह कर रहे हो।”

“वह भी तो जरूरी था दोस्त।”

समर की बात पर आदित्य ने हंसकर ठप्पा लगा दिया ….-“और यह भी बहुत जरूरी है।”

हंसते मुस्कुराते चारों लड़के पिया के घर पहुंच गए।
पिया के घर के सामने समर ने जैसे ही गाड़ी रोकी प्रेम तिरछी नजरों से समर को देखने लगा …-“अच्छा तो तुम्हें घर भी पता है।”

“अरे यार अब इसमें कौन सी बड़ी बात हो गई, घर तो पता होगा ही।”

समर की बात सुन पीछे बैठा आदित्य भी दिल खोल कर हंसते हुए बोलने लगा…-” और क्या प्रेम भैया आप तो ऐसे पूछ रहे हैं? अब इतनी बार आना जाना हुआ होगा तो समर सा को घर तो याद होगा ही।”

समर ने एक नजर मुड़ कर आदित्य को देखा और गाड़ी से उतरकर मेन गेट की तरफ बढ़ गया। मेन गेट पर बैठे गार्ड से समर ने ऊपर पिया के फ्लैट में जाने के लिए बताया तो गार्ड ने उल्टा उन्हें अचंभित कर दिया…..-” नहीं साहब ! प्रिया मेम साहब के घर पर तो इस वक्त कोई नहीं है सब लोग शादी भवन गए है।”

“शादी भवन ! लेकिन वहां क्यों गए हैं?”

“आज पिया मैडम की सगाई है ना।”

गार्ड से पता ठिकाना पूछ कर वह चारों वापस गाड़ी में जा बैठे! आदित्य एक बार फिर समर को छेड़ने लगा……-” शादी भवन गए हैं, सुनकर तो मुझे लगा पिया सगाई छोड़ कर सीधे शादी करने को ही तैयार हो गई है। वैसे भी समर बाबू ने जितने झटके दिए हैं, उस हिसाब से अगर मैं पिया की जगह होता तो आज सुबह ही शादी कर चुका होता । वह तो बेचारी अब तक बैठी राह देख रही होगी।”

विराट भी आदित्य के साथ जुगलबंदी में लग गया….-” ठीक कह रहे हो आदित्य! मुझे भी यही लगा कि कहीं पिया की शादी तो नहीं हो रही । फिर जब गार्ड ने कहा सगाई है, तब मेरी सांस में सांस आई। और मैंने देखा समर ने भी बहुत चैन की सांस ली।”

“मैं देख रहा हूं आजकल तुम दोनों की कुछ ज्यादा ही नजर है मुझ पर।”

एक तो पिया की हरकतों से समर वैसे ही नाराज था। दूसरा आदित्य और विराट उसका इतनी देर से मजाक उड़ा रहे थे। उसका गुस्सा और बढ़ता जा रहा था कि तभी समर की बात पर प्रेम चहक उठा।

“उन दोनों की ही नहीं मेरी भी नजर है तुम पर।”

प्रेम के ऐसा बोलते हैं आदित्य और विराट जोर से हंस पड़े….

“ज्यादा हंसिए मत आदित्य बाबू अब इसके बाद आपकी ही पारी है।”

विराट की बात पर समर ने भी हामी भर दी और आदित्य खिड़की से बाहर देखने लगा! उसी वक्त प्रेम के फोन पर घंटी बजने लगी प्रेम ने फोन उठाया फोन निरमा का था।

“सुनिए कहां है इस वक्त आप ?”

“मैं जरा काम से बाहर था बोलो क्या हो गया ?”

“आते वक्त याद से मीठी के स्कूल के क्राफ्ट के लिए क्राफ्ट का सामान लेते आइएगा। भूलिएगा मत। कल भी आप निकले थे, तब भी आपको मैसेज किया था और आप भूल भाल कर घर वापस आ गए थे।”

“सॉरी बाबा नहीं भूलूंगा।”

“बस कहते तो ऐसा है जैसे एक मेरे और मीठी के अलावा दुनिया में आपको कुछ याद नहीं, और हम ही दोनों की सारी चीजें आप भूल जाते हैं। अभी के अभी लिखकर रख लीजिए कि नहीं भूलना है, वरना अगर आज बिना भूले वापस आए ना तो।”

“तो क्या खाना नहीं दोगी?”

“खाना तो दूंगी, लेकिन अकेले सोना पड़ेगा।”

प्रेम के गले में कुछ अटक गया और उसे हल्की सी खांसी आ गई….” चलो रखता हूं अभी आसपास लोग हैं।”

प्रेम के फोन रखते ही एक जोर का ठहाका गाड़ी में गूंज उठा और चारों लड़के मंगल भवन की तरफ आगे बढ़े चलें।

   मंगल भवन बाहर से बहुत खूबसूरती से सजा था। गेंदे और गुलाब की मालाओं से सजा हुआ था , जिनमें बीच बीच में रोशनी की झालर लगी थीं।
इतनी खूबसूरती से पूरा परिसर बाहर से सजा सँवरा दिख रहा था की एक पल को समर को लगा कि यहां आकर कोई गलती तो नहीं हो गई ।उसने प्रेम की तरफ देखा प्रेम ने उसे कंधे थपथपा कर इशारा किया और खुद आगे बढ़ गया समर ने बड़ी हिम्मत करके कदम आगे बढ़ाया।
    मुख्य दरवाजे के दोनों तरफ बड़े-बड़े कलसो में पानी भर कर रखा था जिनमें गुलाब की पंखुड़ियां तैर रही थी। सामने फूलों से सुस्वागतम लिखा हुआ था। और एक बड़ी सी फूलों की रंगोली बनी थी। एक तरफ बड़े से पानी के कलसे मैं खूब सारी खुशबूदार मोमबत्तियां जल रही थी। सब कुछ बहुत सुहावना लग रहा था। लेकिन मन ही मन समर को अजीब सा डर लग रहा था कहीं इतनी सारी तैयारियां के कारण इतने सारे लोगों के बीच पिया ने उसका साथ देने से मना कर दिया तो?
इतने सारे लोगों के बीच पहले से तय सगाई को तोड़ने की हिम्मत पिया कैसे कर पाएगी? यह कोई फिल्म तो है नहीं कि हीरो मौके पर पहुंचा और हीरोइन ने अपनी सगाई तोड़ दी, और हीरो के साथ चली गई!
ऐसा सिर्फ फिल्मों में कल्पनाओं में और कहानियों में होता है वास्तविक जिंदगी ऐसी तो नहीं होती ना।

यही सब सोचकर वह दरवाजे से ही वापस जाने लगा कि प्रेम ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया…-” क्या हुआ समर अब भी किसी सोच विचार में हो?”

“मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं सही कर रहा हूं या गलत।”

“क्यों इसमें क्या सोचने वाली बात है?”

“सोचने वाली बात यह है कि आज तक ना मैंने, ना पिया ने एक दूसरे से प्यार का इजहार किया। और मैं आज अचानक यहां उसकी सगाई में चला आया। अब अगर मैं उससे यह कहूं भी कि पिया मैं तुमसे प्यार करता हूं तुमसे शादी करना चाहता हूं। तो वह उस लड़के को इनकार करके आखिर क्यों मेरी बात मानेगी? और चलो एक बार को पिया मुझे स्वीकार भी कर ले, तब भी इस सब में उस लड़के का क्या कसूर? अगर मैं सही समय पर पिया से अपने मन की बातें नहीं कर पाया , और पिया ने जल्दबाजी में उस लड़के से शादी के लिए हां कह दी तो इस सब में वह बेचारा तो बुरी तरह से फंस गया? अब वह और उसका परिवार यहां इतने तामझाम के साथ सगाई करने आए हैं .. ऐसे में अगर पिया उस लड़के को ठुकरा देती है तो वह बेचारा क्या करेगा कहां जाएगा?

“और तुम! तुम्हारा क्या होगा ? तुम अपने बारे में भी तो सोचो ना।” आदित्य ने समर से ही उल्टा सवाल कर दिया

“मेरा क्या है दोस्त !मैंने तो आज तक कभी शादी के लिए सोचा ही नहीं था। ऐसा तो है नहीं कि मेरे जीवन में कभी लड़कियां थी नहीं। पर मैं शादी ब्याह कर जिम्मेदारी से भरी जिंदगी जीने वाला लड़का हूँ ही नहीं।  मेरे लिए यह सगाई शादी यह सारे चोंचले नहीं बने।

“ऐसा तुम्हें लगता है, समर पर ऐसा है नहीं। शादी सिर्फ जिम्मेदारियों को उठाना नहीं होता। अगर तुम सामने वाली की जिम्मेदारी उठा रहे हो, तो वह लड़की भी तो तुम्हारी जिम्मेदारी बराबरी से उठाती है। यह क्यों भूल जाते हो। शादीशुदा जिंदगी हर हाल में एक कुंवारे की जिंदगी से कहीं बेहतर है। एक बार जी कर तो देखो अपनी जिम्मेदारियों से मत डरो। अगर आज तुम पिया से बिना मिले यहां से निकल गए तो याद रखना जिंदगी भर पछताओगे।
   अगर तुम ने सच में कभी भी उससे प्यार किया है तो एक बार जाकर उसे बता दो। फिर जो होगा उसे अपना नसीब मान लेना। “

   प्रेम की बात मान कर समर एक बार फिर अंदर की ओर बढ़ चला, उसके पीछे ही वो तीनों भी बढ़ गए। लेकिन दरवाजे पर पहुंचकर उसकी हिम्मत फिर चूकने लगी वह वापस मुड़ा ही था कि प्रेम ने उसे पकड़ लिया …-” इतना घबराओ मत समर। अपने जीवन के समर में तुमने अब तक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। फिर अपने प्रेम के समर में पीछे क्यों हट रहे हो?

  समर कोई जवाब देता है इसके पहले ही दरवाजे से उसे किसी ने आवाज लगा दी….
“आइए आइए ! आप सभी तक चले आइए आप लोगों का स्वागत है।”

पिया के माता-पिता अभ्यागतों के स्वागत के लिए दरवाजे पर ही खड़े थे। उन लोगों ने उन चारों को आते देख कर रोक लिया और अंदर बुला लिया। अब समर के पास अंदर जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। वह चारों जैसे ही अंदर की तरफ प्रवेश करने लगे, पिया की मासी और उनकी बेटी ने उन लोगों के ऊपर गुलाब जल छिड़क कर चारों के माथे पर कुमकुम का तिलक लगा दिया।
    “यहां कुछ ज्यादा ही स्वागत नहीं हो रहा है?” विराट ने धीरे से आदित्य के कान में कहा जिसे समर और प्रेम ने भी सुन लिया कि तभी पिया की मां हाथ में थाली लिए चली आई और समर की आरती उतारने लगी। समर ऐसा होते देख हड़बड़ा कर एक कदम पीछे हट गया।

“अरे घबराइये मत बेटा हमारे यहां ऐसे ही आगंतुकों का स्वागत किया जाता है। आइये अब आप चारों अंदर पधारे।”

अंदर की रौनक देखते ही बन रही थी। समर ने आज तक पिया के रहन सहन की तरफ ध्यान नही दिया था, उसे हमेशा उसकी सादी कुर्तियों और जीन्स के पहनावे को देख यही लगता था कि वो एक मध्यमवर्गीय परिवार की सीधी सी लड़की है। इतना तामझाम और चकाचौंध देख उसे अपने महल के कार्यक्रमों की याद आ गयी। तभी उसकी नज़र सामने से आते युवराज पर पड़ गयी….-” युवराज सा आप यहाँ ?”

“हाँ क्यों ? हम नही आ सकते यहाँ। “

युवराज के सवाल पर समर खिसिया गया तभी रूपा भी चली आयी…-” हम तो पूछने वाले थे आप यहाँ कैसे? “

समर रूपा की बात का क्या जवाब देता? क्योंकि उसके मन में खुद यही उथल पुथल थी कि युवराज और रूपा को पिया भला कैसे जानती है?

वो अभी क्या कहूँ सोच रहा था कि रूपा ने जैसे उसके मन की बात ताड़ ली…-“आप शायद यह सोच रहे की हम लोग यहाँ कैसे? “

” हाँ बिल्कुल मैं यही…” अपने उतावलेपन पर समर एकाएक बोलते बोलते रुक गया… उसकी ये हालत देख रुपा को हंसी आ गयी…- पिया आपकी माँ यानी काकी सा की जांच और इलाज के लिए महल आती थी न तभी उससे हमारी जान पहचान हुई थी। इसलिए उसने अपनी सगाई में हमें बुलाया। और हम ही क्या काकी सा भी आयीं हैं।”

समर पर एक के बाद एक बम फूट रहे थे। उसके लिए ये बहुत आश्चर्य की बात थी कि उसकी माँ जो महल के अलावा बाहरी किसी कार्यक्रम में कभी शामिल नही होती वो भी पिया के बुलावे पर यहाँ चली आयीं हैं।
वो इधर उधर अपनी माँ को ढूंढ रहा था कि प्रेम ने उसे एक तरफ इशारा कर दिखा दिया। उसकी माँ आराम से सोफे पर बैठी किसी औरत के साथ बातचीत में लगी थीं।
समर को पिया के ऊपर एक बार फिर गुस्सा आने लगा…-” हद करती है ये लड़की। एक तो किसी और से सगाई कर रही उस पर मेरे सारे खानदान को बुला रखा है। और अब जाने कहाँ छिपी बैठी है। ये भी नही हो रहा कि बाहर आ जाये। “

वो इधर उधर पिया को ढूंढ रहा था कि उसकी नज़र अपनी माँ से मिली उन्होंने भी उसे उसी वक्त देखा और हाथ के इशारे से अपने पास बुला लिया।

वो भारी कदमों से उन तक पहुंच गया… – ” ये मेरा बेटा है समर! समर इनके पैर छुओ बेटा ये पिया की दादी हैं। “
समर आश्चर्य से उन्हें देख उनके पैरों में झुक गया। उन्होंने भी उसे आशीर्वाद देने के बाद हाथों से ही उसकी बलैय्या ले लीं..-” बहुत सुंदर है आपका बेटा !”
समर को ऐसे अपनी तारीफ सुनना बड़ा अजीब लग रहा था, वो वहाँ से खिसकने के बहाने सोचने लगा…-” पापा साहेब भी आये हैं क्या?”
“हाँ फिर !हम अकेले किसके साथ आते?”

समर का जी कर रहा था चीख चीख कर पूछे जब कहीं और नही जाती तो यहाँ अपने बेटे का तमाशा देखने का ही क्या शौक चढ़ा था? लेकिन वो बिना कुछ बोले एक तरफ को जाने लगा कि उसकी माँ ने उसे हाथ पकड़ कर रोक लिया और एक तरफ इशारा कर कुछ दिखाने लगी….- ” वो देख! ऑर्केस्ट्रा आया है, जा न तू भी कुछ गा ले।।”

समर को अब अपनी माँ के बचपने पर गुस्सा आने लगा था। जिसे देखो वही खुश नजर आ रहा था लेकिन जिसके लिए ये सारा तामझाम था वही कहीं नजर नही आ रही थी।
उसे ढूंढता समर आगे बढ़ रहा था कि सामने से आती एक दुबली सी लड़की उससे टकराते बची…-” ओह्ह सॉरी जीजू!” लेकिन दूसरे ही पल समर को देख वो जीभ काट कर रह गयी..
” जीजू?” समर के ऐसा बोलते ही उस लड़की ने एक किनारे बने स्टेज की तरफ इशारा कर दिया। वहाँ दो चार लड़के खड़े थे।
समर को उस लड़की का इशारा समझ में नही आया। उसकी आँखों में सवाल देख वो लडकी जल्दी जल्दी बोलने लगी…-“मैं पिया दी कि मासी की बेटी हूँ। अभी हड़बड़ी में मुझे लगा मैं मेरे जीजू से टकरा गई , यानी उनसे । फिर चेहरा देखने पर समझ आया कि आप तो कोई और है।”

समर को समझ आ गया कि यह पिया की छोटी बहन है और यह ही इस वक्त पिया का पता बता सकती है। वह जाने लगी तो उसे आवाज देकर समर ने रोक लिया…-” सुनो एक मिनट! क्या तुम मुझे बता सकती हो कि पिया इस वक्त कहां मिलेगी?”

उस लड़की ने भौंहे चढ़ाकर समर को देखा..-” आप उनसे मिलना चाहते हैं?”

“हां! कुछ बहुत जरूरी काम है!”

“ओके! यह पीछे वाली सीढ़ियां चढ़कर ऊपर चले जाइए। पहला ही कमरा पिया दीदी का है। वह अपने रूम में सगाई के लिए तैयार हो रही है।”

आगे बिना कुछ सुने समर सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया। अपने बालों पर हाथ फिराते हुए यही सोच रहा था कि पिछले 1 घंटे से तो वो इस हॉल में इधर से उधर भटक रहा है। जाने और कितना पिया तैयार होने वाली है? ऊपर पहुंच कर उसने पहले वाले कमरे के दरवाजे पर लगी बेल बजा दी…

” एक मिनट रुको अभी आई।”


अंदर से पिया की आवाज आई और कुछ देर में ही दरवाजा खुल गया। पिया ने समर को देखा, समर ने पिया को और दोनों कुछ देर के लिए एक दूसरे को देखते रह गए। पिया की आंखों में आंसू झिलमिलाने लगे…-” अब क्या यही खड़े रखोगी। अंदर भी नहीं आ सकता मैं?”

पिया एक एक तरफ हो कर खड़ी हो गई। समर अंदर चला आया, पिया ने दरवाजा बंद किया, और समर से आगे बढ़ गयी।
” पिया बिना मुझसे कुछ बोले तुमने ऐसे कैसे सगाई के लिए हां कर दी?”

बिना किसी भूमिका के समर सीधे मुद्दे पर चला आया….

“तुमसे क्या पूछना और क्या बोलना था समर?'”

“तुम्हें सच में इस बात की जरूरत नहीं लगी, कि एक बार मुझे बता दो कि तुम सगाई करने जा रही हो!”

“मुझसे यह सवाल पूछने से पहले अपना फोन चेक करके देखो।”

“उस वक्त व्यस्त था मैं। फोन नहीं उठा पाया। फोन चार्ज भी नहीं कर पाया ,और मेरा फोन बंद हो गया था। लेकिन तुम एक मैसेज तो डाल ही सकती थी मुझे।”

“क्या फर्क पड़ जाता समर, क्या तुम अपना काम छोड़कर मेरे लिए आ जाते?”

“नहीं आता! लेकिन तुमसे मेरा इंतजार करने तो कह देता।”

“देखा !! अभी भी तुम्हारी अकड़ कम नहीं हुई ना। अभी भी मुझसे ज्यादा तुम्हें तुम्हारे काम से प्यार है।”

समर मुस्कुराने लगा। उसने आगे बढ़कर पिया को पकड़ लिया…-” मतलब मानती हो ना कि मुझे तुमसे प्यार है!”

समर की बात सुन पिया गुस्से में दूसरी तरफ मुंह फेर कर खड़ी हो गई।

“अब यह नाराजगी कैसी ? मैं जानता हूं ,तुम मुझसे प्यार करती हो।”

“पर मैं नहीं जानती कि तुम मुझसे प्यार करते हो या नहीं?”

“करता हूं यार बहुत प्यार करता हूं । लेकिन हर बात बताने की तो नहीं होती ना। लेकिन तुमने हड़बड़ी में आकर यह जो निर्णय ले लिया क्या यह तुम्हें सही लग रहा है।”

“अब मैं सही हूं या गलत लेकिन यही मेरी किस्मत है।”

“मैं जानता हूं तुम जिद्दी हो! अपनी बात से पीछे नहीं हटोगी । लेकिन बस यह कहना चाहता हूं कि एक बार सोच लो जिंदगी बहुत खूबसूरत हो जाती है, अगर वह उसके साथ गुजरे जिसे आपने सबसे ज्यादा प्यार किया हो।”

“किस ने सिखा कर भेजा यह सब मंत्री जी! क्योंकि आप तो बही-खाते हिसाब वकालत इनसे ज्यादा कुछ बोल ही नहीं पाते।”

“जब अपने प्यार को अपने अलावा किसी और का जीवन साथी बनते देख रहा हूं तो सब कुछ बोलना आ ही गया। बस एक मौका दे दो पिया मुझे। मैं तुम्हें कभी निराश नहीं करूंगा । तुम्हारी जिंदगी के सुख-दुख, हर मोड़ पर, हर ऊंचाई और हर गहराई पर तुम्हारे साथ रहूंगा। बोलो पिया मेरी जीवन साथी बनोगी?’

समर ने पिया की तरफ हाथ बढ़ा दिया, पिया ने धीरे से उसके हाथ में हाथ रख कर कहा…-” लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है मंत्री जी। अब कुछ नही हो सकता।”

“तुम हां तो कहो मैं सब सही कर लूंगा।”

पिया कुछ कह पाती उसके पहले ही दरवाजे पर किसी ने दस्तक देनी शुरू कर दी। पिया घबराकर दरवाजा खोलने जा ही रही थी कि, समर ने पीछे से पकड़ कर उसे अपनी बाहों में ले लिया। उसके कानों के पास जाकर एक बार फिर गुनगुनाना गया…-” सोच लो पिया किसी और की बाहों में मुझे याद करती रहोगी उससे बेहतर है कि मेरी बाहों में जिंदगी भुला दो।”



“अब तुम पागल हो रहे हो छोड़ो मुझे।” समर की बाहों से खुद को छुड़ा कर पिया ने दरवाजा खोल दिया। सामने उसकी मौसेरी बहन और बाकी सहेलियां खड़ी थी सब उसे लेने आई थी। चहचाहती हुई सारी की सारी पिया का हाथ थामे उसे बाहर ले गईं।
समर उस कमरे में अकेला रह गया। कुछ देर वहीं बैठने के बाद वह फिर तेज कदमों से कमरे से निकलकर सीढ़ियां उतरता नीचे हॉल में पहुंच गया….
आखिरी सीढ़ी पर उसका कदम जैसे ही पड़ा सारे हॉल की बत्तियां बुझ गयीं। और वो एकदम से चौक कर इधर-उधर देखने लगा कि, यह हुआ क्या ? तभी एक गोल रोशनी का घेरा सिर्फ उसके ऊपर पड़ने लगा। उसे कुछ समझ में आता तभी एक दूसरा गोल रोशनी का घेरा हॉल के दूसरी तरफ खड़ी पिया के ऊपर उसी तरह पड़ने लगा।
उसने पिया को देखा वो मुस्कुरा कर उसी की तरफ देख रही थी।
पिया धीरे धीरे आगे बढ़ने लगी, उसे अपनी तरफ आते देख समर भी उसकी तरफ बढ़ने लगा।
दोनों के एक दूसरे के सामने आते ही एक गुलाब की पंखड़ियों से सजी प्लेट उनके सामने किसी ने कर दी। उसमें दो अंगूठियां रखी थीं ।
पिया ने मुस्कुरा कर एक अंगूठी उठा ली और बड़ी हसरत से समर की ओर देखने लगी। समर उसे देख रहा था कि समर के कानों में उसकी माँ की आवाज़ पड़ी..-“अब तुम भी उठा लो अंगूठी। और पहना दो हमारी होने वाली बहु को।”
समर ने चौन्क कर देखा, उसके ठीक बाजू में उसकी माँ खड़ी थीं।
समर ने अंगूठी पिया की उंगली में पहनाई और पिया ने समर की उंगली में।
तालियों के शोर के साथ ही कमरे में रौशनी की चकाचौंध फैल गयी…
दोनों के ऊपर ढेर सारे गुलाबों की पंखुड़ियां बरसने लगी। पिया ने आगे बढ़ कर समर के माता पिता के पैर छुए तब कहीं जाकर समर को होश आया कि यहाँ क्या हो रहा है।
उसने भी अपने माता पिता के साथ ही बाकियों का आशीर्वाद लिया और युवराज सा के पैर छूने के बाद प्रेम की ओर बढ़ गया। प्रेम के पैर छूने वो जैसे ही पिया के साथ झुकने को हुआ कि प्रेम ने उसे उठा कर सीने से लगा लिया…- ” पैरों में नही तुम्हारी जगह यहाँ हैं।”

” तो तुम सब कुछ जानते थे न प्रेम ?”

समर के सवाल पर प्रेम ही नही बाकी लोग भी मुस्कुरा उठे, की प्रेम के पीछे से राजा अजातशत्रु भी आगे निकल आये…-“हुकुम आप यहाँ? “

” क्या करें? तुम्हारी भाभी सा का हुक्म था कि समर की सगाई का सारा ड्रामा उन्हें लाइव देखना है। तो बस यहाँ खड़े खड़े उन्हें सब कुछ लाइव दिखा रहे थे। “

समर मुस्कुराने लगा …-” अब तो कोई बता दो की ये सारा माजरा क्या है? और अब उस लड़के का क्या होगा जिससे पिया की सगाई…”

समर की बात आधे में ही काट कर पिया ने उसकी बाहें थामते हुए उसका चेहरा स्टेज की तरफ घुमा दिया…- ” जिनसे मेरी सगाई होने वाली थी, उन्हें कल रात मैंने सारी बातें कह सुनाई। वो हमारे रास्ते से हटने को तैयार थे कि मौसी जी ने अपनी बेटी की शादी का प्रस्ताव उनके जीजा और जीजी के सामने रख दिया। वहीं तुरन्त दोनों का मिलना और बातचीत हुई और दोनो ने ही एक दूसरे को पसन्द कर लिया।
अब स्टेज पर उन्हीं दोनो की सगाई है। “

समर ने देखा स्टेज पर वही लड़कीं थी जो कुछ देर पहले उससे टकरा कर उसे सॉरी जीजू बोल गयी थी।
सारी बातें समझ में आते ही समर ने पास खड़ी पिया को देखा और धीरे से उसे अपनी बाहों के घेरे में समेट लिया…

क्रमशः

दिल से …

क्या करूँ भाग इतना लंबा हो रहा था कि इसे अंतिम भाग नही लिख पायी। एक और भाग लिखवाना चाहतें हैं अजातशत्रु जी।
तो इंतज़ार रहेगा आपको भी और मुझे भी अगले भाग का।
जल्दी ही मिलतें हैं…!!

aparna …







  



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समिधा-28

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      ससुराल में पारो का समय कैसे बीत रहा था उसे खुद ख्याल नही था। इसी बीच एक बार लाली भी उससे मिलने आई। लाली पेट से थी और इसी कारण उसे पहले आने नही दिया गया था।
   मांग भर लाल सिंदूर हाथ में शाखा पोला पहनी लाली पारो को अति सौभाग्यशाली दिख रही थी। उसके सामने पारो अपनी किस्मत का रोना लेकर नही बैठना चाहती थी। इसलिए उसे अपने कमरे में बैठा कर उसके लिए वो मुस्कुराती उसके सामने बैठ गयी। कुछ देर इधर उधर की बातों के बाद आनन्दी उन दोनों के लिये कुछ खाने पीने का सामना लिए ऊपर ही चली आयीं।
   बहुत दिनों बाद पारो के चेहरे पर मुस्कान आई थी , लाली को देख कर।
  जाने क्यों उसे लाली में देव नज़र आ रहा था। देव अपनी भतीजी पर जान भी तो छिड़कता था।।
  लाली भी पारो से मिल कर प्रसन्न थी, उसे पारो में उसके देव काका दिखाई दे रहे थे…-” पारो एक बात पूछूं”

” हाँ पूछ ना? “

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” तुम वापस पढ़ाई क्यों नही शुरू कर देती? “

पारो अनमनी सी लाली को देखने लगी..-” अपने घर के रीति रिवाजों से तो परीचित हो भली तरह। जब तक देव बाबू थे फिर भी किसी तरह सम्भव था लेकिन अब पारो का पढना एक तरह से असंभव है!”
   जवाब आनन्दी ने दिया । जवाब कड़वा ज़रूर था पर सत्य था। घर में पहले भी देव ने चोरी छिपे ही पारो को पढ़ने में मदद की थी और अब उसके जाने के बाद पारो में भी वो उत्साह कम दिख रहा था।

” आप कह तो सहीं रहीं हैं बऊ दी , लेकिन पढेंगी लिखेगी तो मन लगा रहेगा। वरना करेगी क्या दिन भर?”..

  लाली की बात सुन पारो की आंखों में पानी भर आया। आनन्दी भी पारो को देख दुख में डूब गई। तीनों औरतें कुछ पलों को चुप रह गईं की क्या किया जाए क्या नही… उसी वक्त कहीं से घूम घाम कर लौटा दर्शन भी ऊपर ही चला आया…-” ये लो दर्शन चला आया। सुन तू ही पारो की मदद क्यों नही कर देता पढ़ने लिखने में। थोड़ा उसका भी मन लगा रहेगा।”

” तो मैंने कब मना किया ? बऊ दी जब चाहें पढ़ लें। मैं इन्हें पढ़ाने में पूरी मदद कर दूंगा।”

“पर मदद सबसे छिप कर करनी होगी दर्शन बाबू। अगर घर भर को पता चल गया तो एक और नई मुसीबत हो जाएगी।”
  आनन्दी की बात पर दर्शन ने भी हामी भर दी….
पारो का अब किसी काम में मन नही लगता था। न रसोई में न पढ़ाई में। उसे अब सारा सारा दिन देव के बारे में सोचना ही बस भाता था। खिड़की की बल्लियां पकड़े खड़े वो देव में खोई रहती।
  पर घर की बाकी औरतों को ये कैसे सहन होता। आखिर उनके भी अपने दुख थे। तो अकेली पारो को ही गमगीन रहने का अवसर क्यों मिले भला? जब बेटा खो कर भी माँ कामधाम में लगी है?
  आखिर देव की माँ ने पारो को भी गृहस्थी के जंजाल में वापस बुला लिया। अब सुबह उठ कर आंगन को पानी से धो कर पारो घर भर के लिए चाय चढ़ा कर फिर नहाने चली जाती। नहा कर आने के बाद ठाकुर माँ  के पूजा पाठ का सरंजाम जुटाने के बाद एक बार फिर रसोई बनाने में डूब जाती। दोपहर सबके खाने पीने के बाद ही उसे छुट्टी मिलती। तब कुछ देर को अपने कमरे में आराम करने का मौका उसे मिल पाता। हालांकि दोपहर सोने की आदत न होने से वो दर्शन की दी हुई किताबें पढ़ने लगती।
  अक्सर किताब के सबसे रस भरे अध्याय में डूबी होती कि नीचे से शाम की चाय बना लेने की पुकार चली आती और वो अपनी किताब बंद कर नीचे भाग जाती।
  वो इतना काम करते हुए भी नही थकती क्योंकि अब उसे देव की माँ में अपनी सास कम और देव की माँ का अंश अधिक नज़र आने लगा था। अब उसे उस सारे घर से प्यार हो गया था। वो प्यार जिसका अधिकारी जा चुका था उसके उस अधिकार को उसके प्यार को अब पारो उसके घर और सम्बन्धों पर लुटा देना चाहती थी। वैसे भी अब इसके अलावा उसके जीवन में और बचा क्या था?
   देव के बाबा का अब वो और ज्यादा खयाल रखती। बिल्कुल जैसे वो सुबह नाश्ते के बाद और रात खाने के बाद कि गोलियां उन्हें निकाल कर दिया करता वैसे ही वो गोलियां निकाल उनकी टेबल पर पानी के गिलास के साथ रख आती।
   और वो धीमे से अपने चश्मे पर चढ़ आई भाप को चुपके से साफ कर लेते।
  ठाकुर माँ को शाम में बैठ कर सुखसागर पढ़ कर सुनाती बिल्कुल जैसे वो सुनाया करता था। माँ की कही हर बात वैसे ही जी जान से लग कर पूरा करती जैसे वो किया करता था लेकिन बस एक ही जगह वो चूक जाती…
   जहाँ खुद से प्यार करने की बारी आती वो लाचारगी से खिड़की पर खड़ी खुद पर तरस खा कर रह जाती। उसे तो वो टूट कर चाहता था, उसका प्यार जब तब वो महसूस कर पाती थी लेकिन न कभी उसने खुल कर कहा और न पारो ने ही उससे खुल कर कहने कहा लेकिन समझते तो दोनो ही थे।
  कितनी कोमलता थी देव के प्यार में। उसे छूता भी ऐसे था कि कहीं वो मैली न हो जाये और आज उसे इस अनजान सी दुनिया में अनछुआ अकेला तड़पता छोड़ गया था।
अब जब उसे शादी प्यार पति पत्नी के सम्बन्धो के बारे में थोड़ा बहुत मालूम चलने लगा तब वो ही चला गया।
  यही सोचती कभी कभी वो एकदम गुमसुम रह जाती तो कभी रोते रोते उसकी हिचकियाँ बंध जाती।
    लेकिन अब उसे सासु माँ अधिकतर समय काम में भिड़ाये रखती जिससे वो सुकून से कमरे में बैठ रो भी नही पाती थी।
  ऐसे ही एक शाम वो अपनी खिड़की पर खड़ी बाहर डूबते सूरज को देख रही थी कि उसकी सास और बड़ी बुआ अंदर चली आयी…-” क्या देख रही है पारो? “वो चौन्क कर मुड़ी और माँ के साथ बड़ी माँ और बुआ को भी आया देख चुप खड़ी रह गयी।
“दिन भर ऊपर अकेली पड़ी पड़ी उकता नही जाती हो? नीचे चली आया करो। हम सब के साथ बैठोगी तो अच्छा लगेगा न। “
  हाँ में सिर हिला कर वो ज़मीन पर अपने पैर के अंगूठे से गुणा भाग के चिह्न बनाती रही।
  वो तीनों एक साथ उसके कमरे में क्या सचमुच उसकी चिंता में ही चली आयीं थीं ? पारो सोच नही पा रही थी। पर जाने क्यों आज इतने दिनों में पहली बार उसे उसकी सास के चेहरे पर खुद के लिए एक अलग सी ममता दिखी थी। फिर भी वो उस वक्त उनके भावों का अर्थ नही जान पायी…
   बड़ी बुआ ने बोलना जारी रखा…-”  बेटा पारो ! तुझे ऐसे अकेले ऊपर अब छोड़ा नही जाता। वैसे भी इतने बड़े कमरे में अकेले घबराहट सी होती होगी न। ऐसा करना अपना सामान कल नीचे ठाकुर माँ के कमरे में रख लेना।
   उनका कमरा बड़ा भी बहुत है। उसी में एक ओर तेरे लिए खाट भी पड़ जाएगी, और तेरी ठाकुर माँ के साथ रहने पर तुझे अकेले डर भी न लगेगा।”
  पारो का जी किया कि चिल्ला के कह दे कि मुझे अभी भी किसी से डर नही लगता। और मैं ये कमरा छोड़ कही नही जाऊंगी। लेकिन देव जाते जाते उसकी ज़बान उसकी बोली भी अपने साथ ले गया था।
  वो चुप खड़ी रही।

” क्यों बऊ दी मैं गलत कह रही हूँ क्या? इतने बड़े पलंग का और इतने बड़े कमरे का अब इसे क्या काम?वैसे भी अब इसे पलंग पर नही खाट पर सोना चाहिए। पुराने लोग तो ज़मीन पर सोने कहते थे, पर चलो हम लोग वैसे पुराने खयालों वाले नही हैं। दूसरी बात यह नीचे माँ के साथ रहेगी तो उन्हें भी आसरा हो जाएगा। रात बरात कभी पानी पीना है कभी बाथरूम जाना है आखिर कोई तो साथ रहेगा। और फिर बऊ दी तुम्हें माँ के लिए नर्स रखने की भी ज़रूरत न होगी। अरे जब घर की बहु नहला धुला सकती है तो इसी काम के लिए पैसे बहाने की क्या ज़रूरत?”

पारो ने बड़ी मुश्किल से आँख उठा कर अपनी सास को देखा उन्होंने उससे नज़रे चुरा लीं। पारो समझ गयी देव के न रहने पर शोक जताने आयी बड़ी बुआ इसी घर में अपना पक्का आवास बनाना चाह रहीं थीं। एक ही लड़का था उनका, जो पढ़ लिख नही पाया था। वो पहले भी एक बार देव से उसे अपने साथ काम सिखाने कह चुकी थी लेकिन अब तो लग रहा था वो उसे देव की दुकान पर ही बैठाने के मंसूबे लिए आयीं थीं। क्योंकि सारे काज निपटने के बाद जब उनके पतिदेव ने उनसे भी वापस चलने की बात कही तो उन्होंने कुछ दिन बाद आने की बात कह कर उन्हें अकेले ही भेज दिया था। उनके पति पोस्टमास्टर रह कर रिटायर हुए थे इसी से कुछ खास आमद थी नही पर मायके की सम्पन्नता उनकी आंखें चौन्धिया जाती थी।

  जबसे वो यहाँ आई थी कोई न कोई तिकतिक लगाये ही रहतीं। कभी उन्हें माछ में सरसों की झाल कम लगती तो कभी मिष्टी दोई में मीठा। कुल मिलाकर वो किसी से संतुष्ट नही थीं। पारो से तो कतई नही।
  अब आज वो एक तरह से पारो का कमरा हथियाने चली आयी थीं। पारो ने एक नज़र सासु माँ पर डाली उनके चेहरे पर कष्ट की हल्की सी छाया आकर गुज़र गयी, अपनी भावनाओं पर अपने गुस्से को जबरदस्ती लादती वो भी अपनी ननंद के सुरों में सुर मिलाने लगी…-“ठीक ही तो कह रहीं है दीदी। तुम इतने बड़े कमरे में घबराओगी ही,इससे अच्छा है वहीं नीचे रहोगी तो माँ को वक्त पर कुछ ज़रूरत हो तो तुम कर सकोगी। वैसे भी अब तुम्हारे जीवन में और बचा ही क्या है? “

  ” ऐसा क्यों बोल रहीं है काकी माँ! उसका पूरा जीवन बचा है और जीवन से अनमोल क्या है भला? वो भी अपने जीवन को किसी सुंदर और सार्थक कार्य में लगा सकती है। अपने जीवन को एक सुंदर आकार दे सकती हैं। आखिर भगवान ने तो हमें अकेला ही पैदा किया है,रिश्ते नाते तो हम जोड़ते चले जातें हैं। और फिर उन्हीं नातों में अपना जीवन ढूंढने लगते हैं ये सोचे बिना की उस ऊपर वाले ने हमें क्यों पैदा किया…”


  
    आनन्दी अपनी लय में बोलती चली जा रही थी, की उसकी सास ने उसे टोक दिया…-“तुम्हारे जितना दिमाग हम लोगों के पास तो है नही बऊ माँ! कनकलता दीदी घर पर सबसे बड़ी हैं, ये अपना घर छोड़ हमारे यहाँ दुख के समय में खड़ी हैं, हम सब के साथ। इनका सम्मान करना भी हमारा ही धर्म है। नीचे उनके लिए अलग से कोई कमरा नही है। माँ और बेटा दो लोग हैं। इस इतने बड़े कमरे में आराम से रह सकतें हैं। पारो का क्या है कुछ दिन ठाकुर माँ के कमरे में रह जायेगी तो क्या बिगड़ जायेगा। नीचे हम सब भी तो साथ होंगे।
   और फिर दीदी के जाने के बाद तो कमरा देव का ही है, पारो को मिल ही जायेगा।”

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  अपनी सास के सामने आनन्दी कम ही बोलती थी, लेकिन आज उसका धैर्य चूक गया था। उसे बुआ जी के वहाँ रहने से कोई परेशानी नही थी, लेकिन उनका बात-बात पर घर परिवार के मामले में दखल देना उसे अखर जाता था।
   पर अब सासु माँ की तीखी आँखों के चाबुक ने उसे एक किनारे चुप खड़ा रहने की ताकीद कर दी थी। वो चुप खड़ी पारो को देख रही थी…-” जी ठीक है, मैं रात तक अपनी जरूरत का सामना लेकर नीचे चली जाऊंगी। ” पारो ने कह तो दिया लेकिन वो उन सब से और क्या कहती कि जब वो अपनी सास तक में अपने पति को देख पा रही थी तो इस कमरे में तो कितनी अनगिनत यादें गुंथी पड़ी थी। इसी खिड़की की बल्लियों पर उसके हाथों के निशान थे, जिन्हें पकड़ कर खड़ी वो यही महसूस करती की उसका हाथ देव के हाथों पर हैं। जिस तकिए पर वो सिर रखता था, जिस चादर को वो ओढता था, जिस तौलिए को काम में लाता था, वो सारी अनमोल धरोहरों को साथ ले पारो नीचे चली गयी। ठाकुर माँ के कमरे में एक ओर उसके लिए एक पुरानी चारपाई डाल दी गयी।
   उसमें एक पतले से रुई के गद्दे पर तकिया डाले जब वो रात में लेटी तो उसकी आंखें झर झर बहने लगीं… कहाँ देव के सामने वो अकेले उस हिंडोले से पलंग पर अकेली सोती थी। उन रेशमी चादरों मखमली तकियों के बाद आज ये पतला गद्दा उतना नही चुभ रहा था जितना देव का ऐसे चला जाना।
   किसी एक व्यक्ति के चले जाने से संसार कैसा वीरान और सूना हो जाता है, पारो महसूस कर रही थी। और सोचते सोचते अचानक एक बात उसके दिमाग में आई की क्या अगर वो देव की जगह मर जाती तो देव का जीवन भी ऐसा ही कठिन हो जाता? या उसके जीवन में कुछ और तरह की बातें होतीं।
  सभी तरह की बातें सोचती वो सो गई।
       रात उसे ऐसा लगा जैसे देव की उंगलियां उस पर चल रहीं हैं। चेहरे पर से फिसलती उंगलियां गले से नीचे उतरने को थीं कि नींद में भी उसे याद आ गया कि देव तो अब है नही फिर ये कौन था। वो चौन्क कर उठ बैठी। खिड़की पर कुछ सरसराहट सी हुई और सब कुछ एकदम शांत हो गया।
  उसकी खाट खिड़की से लगी हुई थी, उसने बैठे बैठे ही बाहर झांक कर देखा, बाहर कोई नज़र नही आया। तब क्या वो सच में सपने में देव को ही महसूस कर रही थी, या फिर खिड़की से किसी ने अपना हाथ अंदर डाल रखा था?
  पर कौन हो सकता था वहाँ इस वक्त? उसके बदन में एक झुरझुरी सी दौड़ गयी… उसके बाद वो रात उसकी आँखों ही आंखों में कट गई…रात बीत गयी, सुबह हो गयी लेकिन वो रात की बात किसी से कह न सकी।

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   दिन बीत रहे थे। लाली भी कुछ दिन मायके रह कर वापस चली गयी थी। अब घर भर में दो ही लोग थे जिन्हें पारो की चिंता थी, एक आनन्दी और दूसरी ठाकुर माँ। उन्हें हमेशा पारो को देख कर यही लगता कि उसकी इस हालत की ज़िम्मेदार वो खुद हैं। ना वो देव को अपने साथ लेकर जाती और न देव के साथ ये हादसा होता।
   पर घर भर की सबसे बुज़ुर्ग होने पर भी कई बातों में उनकी भी नही चलती थी। जो नियम थे वो तो थे ही।
   आनन्दी ने दर्शन से कह कर पारो को पढ़ने के लिए किताबें दिलवानी शुरू कर दी थीं। अब दोपहर में पारो ठाकुर माँ के कमरे में एक किनारे बैठी किताबें पढ़ती रहती।
   और कभी जब दर्शन उससे किसी पढ़े गए पद की व्याख्या पूछता या उसे गलत बताता तो वो उसे सहीं कर देती।
  एक शाम वो बाहर से आते हुए ढेर सारे अमरूद ले आया। नीचे आंगन में बैठी पारो कोई काम कर रही थी कि पीछे से आकर उसने उसकी झोली में अमरूद डाल दिए। चौन्क कर दर्शन को देख पारो मुस्कुरा उठी। उसके मन के अंदर कहीं छिपी बैठी लड़की मुस्कुरा उठी। वो सारे अमरूद समेट कर रसोई की तरफ जाने लगी…-” अरे कहाँ चल दीं सारे अमरूद समेट कर? क्या हम लोगों को एक भी न दोगी? “
  दर्शन के सवाल पर वो पलट कर थम गई…-“सारे ही तुम्हारे हैं। मैं तो अंदर धोने लेकर जा रही थी। “
   ” मैं क्या जानूं? मुझे तो लगा तुम अकेली ही खा लोगी!”
   ” इतनी भुक्खड़ लगती हूँ तुम्हें”  हँस कर उसे घूरती पारो आगे बढ़ने लगी कि उसके सिर पर पीछे से एक टपली मार दर्शन सीढ़ियों पर भागता हुआ चढ़ गया, और उसकी टपली का जवाब देने आँचल से सारे अमरूद फेंक कर पारो उसके पीछे दौड़ पड़ी। बड़े दिनों बाद पारो ने जतन से जिस बावली सी लड़की को अपने भीतर छिपा रखा था बाहर आ गयी।
  ” अरे सम्भल के ! फिसल न जाना तुम दोनों। ” आनन्दी दोनो की चुलहबाज़ी देखती मुस्कुराती हुई अपने आँचल से अपना हाथ पोंछती रसोई में चली गयी, और उसकी बात पर वहीं आंगन में बैठी बुआ जी ज़हर बुझा तीर छोड़ गई…-” समय रहते इन्हें न रोका तो फिसल ही तो जाएंगे। “
   वही बैठ कर चांवल चुनती पारो की सास का जी धक से रह गया, उन्होंने साथ बैठी अपनी जेठानी की ओर देखा, उनकी अनुभवी आंखों में भी चिंता की रेखाएं नज़र आने लगीं थीं…..

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क्रमशः

aparna…..

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दिल से …..

     समाज के कायदे कौन बनाता है? कौन हैं वो समाज के ठेकेदार जिन्होंने औरतों के लिए अलग और मर्दों के लिए अलग नियम बना रखें हैं।
  हम कितना भी लिख पढ़ जाएं , कितने भी आगे निकल जाएं लेकिन अब भी बिना पति के एक औरत का जीवन उतना सुगम और सहज नही हो पाया है। दुर्भाग्यवश अगर जीवनसाथी बिछड़ जाएं या अलग हो जाएं तो इसमें किसी का कोई दोष तो नही फिर क्यों उसके साथ ऐसा सुलूक किया जाता है कि उसका दुख कम होने की जगह और बढ़ता चला जाता है।


   काश लोग फ़िज़ूल नियमों की जगह एक ही नियम प्रेम का नियम मान लें तो किसी का दुख समाप्त भले न कर सकें कुछ हद तक कम तो ज़रूर कर पाएंगे।
  
     आगे के भाग हो सकता है पढ़ने में थोड़े और तकलीफदेह हों लेकिन अगर कृष्ण दुख देते हैं तो उससे उबारने वाले भी वहीं हैं।

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  आपका सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ। आप मुझे पढ़ते हैं सराहतें हैं, दिल से शुक्रिया नवाज़िश!!!

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aparna…


 

शादी.कॉम -12

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   “पहला पहला प्यार है,,पहली पहली बार है,
     जान के भी अनजाना कैसा मेरा यार है।।”

” अबे कौन बजाया बे! बदलो ई पहला पहला प्यार को!!”

” तो का लगायें भैय्या जी।” राजा की दहाड़ सुनते ही प्रिंस लपक पड़ा ।।जिम में लोगों का आवागमन शुरु हो चुका था,ऐसे में प्रिंस वर्कआउट के लिये गाने सेलेक्ट कर रहा था।।

” अब ये भी हमी बताएँ!! तुम्हारी अकल में ना बिल्कुले पत्थर पड़े हैं प्रिंस।।यार कैसे बनिये हो तुम ,, हमरी अम्मा तो कहती हैं बनियों से जादा दिमाग किसी के पास नई होता,,पर तुम तो बिल्कुल बमपिलाट हो।।”

  प्रिंस सदा से बाँसुरी का तरफदार था,इसिलिए आजकल प्रिंस और प्रेम में  ज़रा तनातनी रहने लगी थी।।राजा भैय्या की बात सुन प्रेम चहक उठा __

” भैय्या जी आप हम ठहरे बामण के छोकरे,हमारा तो जन्म ही होता है अपने बाप की चप्पल से पिटने के लिये।।
     ऑफ़िस में बाऊजी को उनका बॉस चमकाया आके हमको धुन देंगे,,गांव में पड़ोसी से जमीन का चिल्ला चिल्ली हुआ आके हमको सून्त देंगे,घर में बहन की शादी नही लग रही पिटाई हमारी होगी,और तो और अम्मा ने लौकी बना दी तब भी हमी धरे जातें  हैं ।।।
    ई तो पुन्यात्मा हैं बनिया घर में पैदा हुआ है, जैसें इनके बाप दादा सोना सहलाते हैं,ऐसे ही फूल की छड़ी से अपना लड़का बच्चा को भी सुधारते हैं, तो भैय्या जी इनको किसी का डर है ये नई,काहे दिमाग दौड़ाएंगे।।”

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” अच्छा बे तुमको बहुत बड़ी बड़ी बात सूझ रही हैं,, देख रहें हैं आजकल कुछ ज्यादा ही टर्रा रये हो।”

प्रिंस राजा की घुड़की सुन चुपचाप वहाँ से सटक लिया,।। उसे असल में भैय्या जी के दिल का हाल मालूम नही था,उसने जाकर दूसरा रोमैंटिक ट्रैक बजा दिया__
             ‘ सदियाँ समा गईं इस एक पल में,दिखने लगा सुकून दुनिया की हलचल में ….’

  तभी हल्के से दरवाजा खुला,हमेशा सलवार और कुर्ती पे चोटी बना के आने वाली बांसुरी के सुर आज कुछ बदले से थे।।
     ट्रैक पैंट पे टी शर्ट पहनी बांसुरी ने खुले बालों की उँची सी पोनीटेल बना रखी थी।।

   बांसुरी के प्रवेश करते ही सब उसकी तरफ देखने लगे…राजा भैय्या ने सिर्फ एक उड़ती नज़र डाली और वापस अपने रजिस्टर में मिलाए हुए नामों को वापस मिलाने लगे।।प्रिंस बांसुरी के इस परिवर्तन पे अति प्रसन्न हुआ और उसे बधाई देने कूद कर उस तक पहुंच गया,थोड़ी देर के लिये प्रेम भी चकरा गया।।

” वाह बंसी तुम तो बहुत-बहुत बहुत इस्मार्ट लग रही हो,।”
  बाँसुरी मुस्कुरा कर राजा की तरफ देखने लगी,इस उम्मीद से कि राजा भी शायद उसके नवेले रूप पे कोई टिप्पणी देगा,पर राजा ने सर उठा कर भी नही देखा।।बांसुरी चुपचाप अपने ट्रेड मिल पे चली गई ।
    लगभग 10 मिनट बीत जाने पर भी जब राजा एक बार भी बांसुरी का हाल चाल पूछने नही आया तो बांसुरी ने वहीं से हांक लगाई__
     ” आज क्या स्पीड रखना है हमें,,कुछ बताओगे भी या ऐसे ही बस भागते रहें ।”

  6km/hrs पे आकर राजा ने ट्रेड मिल सेट किया और वापस जाने लगा।।उसे ऐसे वापस जाते देख बांसुरी ने प्रिंस से इशारे से पूछा कि ‘ आज क्या हो गया राजा को?”जैसे इशारे मे उसने पूछा वैसे कंधे ऊपर कर प्रिंस ने जवाब दे दिया कि हमे नही पता।

  ” कब तक चुप बैठें अब तो कुछ है बोलना,
     कुछ तुम बोलो कुछ हम बोलें ओ ढोलना।।”

जैसे ही गाने के बोल जिम में गूंजे राजा ने सर उठा के प्रिंस को देखा,और बस उतने ही मे__” बदल रहें हैं भैय्या जी,बस अभी बदले।।”
  राजा की घूरती आंखों को देख प्रिंस हडबडी में म्युसिक सिस्टम तक भागा,पर तभी बांसुरी के बोल गूंजे__
         ” ए प्रिंस रुको!! काहे बदल रहे,हमें अच्छा लगता है ये गाना।।”

  ” ऊ भैय्या जी को नही ना पसंद इसिलिए बदले दे रहे।”

” अबे हम कब बोले तुमको बदलने।” राजा की घुड़की से घबराया प्रिंस मुहँ लटकाये बाहर निकल गया,बांसुरी राजा के पास आ कर बैठ गई ।।

” क्या हुआ राजा?? कुछ मूड ऑफ़ लग रहा तुम्हारा, घर पे कुछ हुआ क्या।।”

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” इस बार भैय्या जी के बाऊ जी ने कसम ले ली है कि अबकी बार अगर राजा भैय्या पास नही हुए तो इनकी हत्या कर देंगे या खुद चूहा मार दवा पी के आत्महत्या कर लेंगे।।”लल्लन बोला

बांसुरी ने आंखे तरेर के लल्लन को देखा फिर पूरी सहानुभूति से राजा को निहारने लगी।।

” अरे इसमें इत्ता परेशान होने की क्या बात,इस बार  राजा सिर्फ पास नही होंगे बल्कि बोर्ड एग्ज़ाम टॉप भी करेंगे,,हम पर भरोसा रखो।।”
  बांसुरी के ऐसा बोलते ही प्रेम भी उछल पड़ा

” हम भी यही कह रहे,भैय्या जी क्यों परेशान हो रहे, अरे पास हो गये तो ठीक वर्ना हम पूरे शहर से चूहा मार दवा खरीद कर यहाँ से बहुत दूर ले जाकर फेंक आयेंगे।।जब बाऊजी को दवा मिलेगा ही नही तो का खा कर मरेंगे।।

राजा ने खा जाने वाली नजरों से प्रेम को देखा और उठ कर अपने में ऑफिस में चल दिया,उसके पीछे पीछे बाँसुरी भी भागी,जाते जाते प्रिंस को दो कप चाय लाने कहती गई ।।

” हमें तो बताओ हुआ क्या है राजा?? कल तो बड़े खुश लग रहे थे, हनुमान जी ने ऐसा क्या मन्त्र फूंक दिया कान मे जो उदासे बैठे हो।”

” काहे परेशान कर रही हो,हमने कहा ना कोई बात नही।।”

” जब कोई बात नही ,तो हमें देखा क्यों नही,??  , हमारी नई ड्रेस पे कोई टीका टिप्पणी नही,,देखो तुम्हारे जैसे हमने भी रीबॉक के जूते पहने हैं, सुबह से तुम्हारे आगे पीछे घूम रहे,पर तुम तो जैसे इस दुनिया में हो ही नही,जाने कहाँ विचर रहे हो।।”

” थोड़ा सर मे दर्द था,और कुछ नही!! बस इसिलिए थोड़े चुप चाप बैठे थे।वैसे अच्छी लग रही हो तुम।।

” थैंक यू!! अब बताओ कि हमारी ट्रेनिंग कबसे शुरु कर रहे,,भास्कर सर के बारे में बताया था ना तुम्हें ।।”

” देखो ट्रेनिंग का जहां तक बात है,हमने लड़की पटाने में कोई पी एच डी तो की नही है,जो हम तुम्हें कुछ सीखा सके बता सकें।।तुम तो हमसे जादा समझदार हो।”

” अरे बाबा कम से कम यही बता दो कि तुम किसी लड़की में क्या देख कर इंप्रेस होते हो।।”

” अब देखो ,जहां तक हमारा सवाल है,हमें ना सभ्य संस्कारी लड़कियाँ अच्छी लगती हैं,सीधी साधी,  भोली सी,,अपने बड़ों का बात मानने वाली,कम बोलने वाली,झगड़ा फसाद ना करने वाली।।”

” बस बस हम समझ गये,,मतलब बिल्कुल हमारे अपोजिट लड़की तुम्हें पसंद है,है ना??”

” अरे नही बाबा!! वो मतलब नही है हमारा,,पर देखो एक बात सच्ची बताएँ,लड़कों को ना बहुत ही जादा ज्ञानी लड़की नही पसंद आती,उन्हें वही भाती है जिसके सामने वो जादा ज्ञानी दिखे,,वो लड़को की इस आदत को का कहते हैं …… अरे वो बोलते हैं ना का ….

” ईगो!!! मेल ईगो!! यही कहते हैं,यही बताना चाह रहे ना।।”

” अब देखो सच्ची बात बताये तो तुम बुरा मान गई,अब यही थोड़ा घुमा फिरा के बोलते तो खुश हो जातीं।।अच्छा सुनो तुम कुछ बातों का ध्यान रखना अपने सर के सामने फिर देखना कैसे तुम्हारा जादू चलता है,,, पहला तो उनकी क्लास मे कभी उचक उचक के जवाब मत बताना , नही उन्हें लगेगा इसे पढ़ाने का कोनो ज़रूरत ही नही,,दूसरा जो सवाल बन रहा उसे भी उनसे पूछना क्योंकि इससे उन्हे अन्दर से खुशी मिलेगी कि तुम उनसे कम हो,और वो तुमसे कहीं जादा बुद्धिमान हैं।।
     धीरे से दोस्ती हो जाये,तब उनका हर बात का ध्यान रखना,जैसे हमारा रखती थी,कि कौन सी आंटी फीस भरी है कौन सी नही।”
  ये बोल कर राजा हंसने लगा,बांसुरी भी।।

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” हर छोटी छोटी बात उनसे पूछ कर करना ,भले तुम करो अपने मन की पर सामने वाले को ये लगे कि तुम उनके हिसाब से सब कर रही हो,,बस यही दो चार बातें आजमा लो,तुम्हारा काम हो जायेगा।”

” काम हो जायेगा तो ऐसे बोल रहे जैसे तुम कोई गुरू घंटाल हो,,एक घन्टे में मोहिनी,सौतन से छुटकारा,प्रेमी को वश मे करें,वाले विज्ञापन के बाबा जी की तरह।।”
  बाँसुरी की खिलखिलाने की आवाज़ सुन कर निश्चिंत हो प्रिंस चाय लिये अन्दर आया।।

” बताओ अब आये हो चाय लेकर,अब तो हमारा जाने का समय हो गया।।” बान्सूरी के ऐसा बोलते ही राजा ने  भी खबर ली

“ये पहले गौ माता के पास जाकर दूध निकलवातें हैं,उसके बाद ऊ दूध लिये चमन के पास लाते हैं तब जाके कहीं चाय बनती है,,क्यों हो प्रभु,सही बोले ना हम।।”

” अरे का भईया जी,कतना तारीफ करेंगे हमारा,  लिजिये चाय लिजिये आप दुनो,हम अपनी भी यहीं ले आये।।

अभी तीनों ने अपनी अपनी चाय पीनी शुरु की थी कि जिम में बाहर से किसी ने राजा भैय्या के नाम की पुकार लगा दी,प्रिंस हम देखते हैं बोलकर बाहर दौड़ा, जितनी द्रुत गति से बाहर गया था वैसी ही त्वरित गति से अन्दर भागा__
    ” भैय्या जी ऊ भौजाई आई हैं ।।”
 
  ” हमरी तो शादी ही नही हुई,कहाँ से तुम्हारी भौजाई पैदा हो गई  बे!! कुछ भी बकते हो।

  ” अरे भैय्या जी बड़की भौजाई आई हैं,उनके साथ एक और कोनो लड़की है।।”

राजा भैय्या ने अपना एक हाथ हल्के से अपने माथे पर मारा_ ” अरे यार !! हम भूल गये रहे,,आज भाभी की बहन को स्टेशन लेने जाना था……राजा भैय्या की बात पूरी भी नही हो पाई थी कि दरवाज़ा खोल रुपा भाभी कमर पर हाथ टिकाये खड़ी हो गई।

” काहे लल्ला जी,जब जाना ही नही रहा तो हमे पहले काहे नई बता दिये,,बेचारी रेखा स्टेसन में खड़े खड़े आधा घंटा बेट करी,तब बिचारी हमें फ़ोन करी और हम इसे लेने गये।।”

” काहे इत्ती अनपढ़ है कि अकेले रिक्सा में घर नही आ सकती।।” प्रेम ने धीरे से फुलजड़ी छोड़ी और प्रेम  प्रिंस बांसुरी खिलखिला पड़े

” का बोले तुम प्रेम” ।

” कुछ नही भौजी!! हम बोले तनिक बैठ जाओ,हम समोसा मँगा देते हैं,ए प्रिंस लगाओ यार लल्लन को फ़ोन लगाओ , कहाँ है आजकल??”

प्रेम की इस बात का सभी ने एक स्वर में समर्थन किया।।
रेखा राजा में अपने होने वाले पति को देख रही थी, इसलिये उसके चेहरे पर लज्जा का अभिनय था, शर्म की लुनायी थी।।

राजा अपने मन में त्रस्त था,उसके मन में कुछ समय पहले खिला प्रेम का फूल हवा पानी के अभाव में अकेला इधर उधर डोल रहा था,उसे जिस माली के स्नेह सिंचन की आवश्यकता थी,वो माली अवकाश ग्रहण कर दूसरे की बगिया संवारने में खुद को व्यस्त किये था।।

  बांसुरी रेखा को देख रही थी जो  लगातार राजा को ताड़ रही थी,,बांसुरी राजा भैय्या के चार्म से अपरिचित थी,ऐसा नही था।।वो आये दिन ही जिम में आने वाली अनोखी अलबेली वारान्गनाओं के लटकों झटकों का कारण भली प्रकार समझती थी,पर रेखा की दृष्टी उसे चुभ गई ।।

“कहाँ है भई तुम्हारा समोसा?? इत्ती देर लगा दी,ए प्रेम ऊ लल्लन को फोन घुमाओ की तली मिर्ची भी हमारे लिये अलग से लेता आयेगा।।”

रूपा की इस बात पे राजा ने फ़ोन लगाया__” भाभी औ कुछ मँगा दें,,जलेबी खाओगी??”

” जो मँगाना है जल्दी मँगा दो,,हम तो रेखा को लेके घर जा रहे थे,यही बोली कि राजा हमे लेने कैसे नही आया,चलो दीदी देखे क्या कर रहा ,इसिलिए आ गये,बस चाय पी के निकल जायेंगे हम,,पूरा काम बिखरा पड़ा है,,हम ना करें तो इस घर का एक पत्ता ना हिले,,बहू नही नौकरानी हैं हम….

” अरे का भौजी,नौकरानी नही आप रानी हैं रानी!! कभी रूप देखी हैं अपना,,एकदम किसी रियासत की महारानी सी लगती हैं ।”प्रिंस की बात पर रूपा का बिगड़ा मूड संभल गया

” ऊ तो हम खानदानी रईस जो ठहरे।”भाभी की इस बात को सुन राजा को हँसी आ गई,,वो कई बार अपनी माँ की बड़बड़ इस बाबत सुन चुका था,जब कभी घर पे सास बहु की महाभारत छिड़ती और रूपा अपने कोप भवन में प्रस्थान कर जाती तब पीछे से सासु माँ का रूपा के खानदान का जो बखान शुरु होता ” हूंह बड़ी आई रईस !! जैसे हम नई जानती कि इनके बाप मिट्टी का तेल ( क्रूड ऑयल) प्लाण्ट से चुरा चुरा के बेच बाच के तो रुपया जोड़े,किसके किसके हाथ पांव जोड़ के बकालत का डिग्री खरीदे,अब चार पैसा घर में आ गया तो बडे जमींदार बन रहे।” अम्मा की ये बात याद करके राजा मुस्कुरा रहा था कि रेखा ने उससे सवाल कर दिया_

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” ये लड़की कौन है राजा?? जो आपके साथ खड़ी है?” किसी को ऐसे रूखे सवाल की अपेक्षा नही थी

” मैं बाँसुरी हूँ,यहाँ राजा का जिम जॉइन किया हुआ है।।” बांसुरी को पता था कि राजा अपने पढ़ने वाली बात किसी को नही बताना चाहता था।।

” और हमारी टीचर जी भी,क्यों ठीक है ना बांसुरी ।”

राजा मुस्कुरा कर बांसुरी को देखने लगा,,पर उसका इस तरह किसी और लड़की को देख कर मुस्कुराना दोनो बहनों को अन्दर तक भस्म कर गया।।अभी रूपा कुछ कहने ही जा रही थी कि दरवाजा खोल कर लल्लन समोसों की खुशबू से हवा को महकाते अन्दर आया।।

  अन्दर आते ही सारा सामान सामने रखे टेबल पर रख उसने जैसे ही सर ऊपर किया उसकी नज़र रेखा पर पड़ी __” अरे शोना तुम?”

” रोहित तुम?? तुम यहाँ कैसे?? रेखा ने लल्लन से सवाल किया,दोनो के सवाल सुन रूपा ने रेखा को घूर के देखा__” तुम दोनो एक दूजे को कैसे जानते हो,और ये तुम्हारा शोना नाम कब से पड़ गया रेखा।”

रूपा भाभी के अलावा वहाँ बैठे सभी लोगों को सब समझ आ चुका था,,प्रिंस ने धीरे से चुटकी ली__

” तो ई हैं हमरे लल्लन की शोना बाबु।””प्रिंस चुटकी ले और प्रेम चुप बैठा रहे,ये असम्भव था,अगला वार उसका हुआ_
           ” जी हाँ और दढ़ियल लल्लन हैं इनके बेबी।।।”

” तुम दोनो का खुसर फुसर कर रहे हो हैं??” हम देख रहे ,लल्ला जी के जिम में आजकल यारी दोस्ती की महफिल जादा सज रही,,ए रेखा जल्दी जल्दी ई समोसा ठूसो और घर चलो,घर पहुंच के जानेंगे तुमसे सब ।।”

बाँसुरी सर झुकाये अपनी हँसी रोकने के प्रयास में थी,कि राजा ने सबसे पहले उसी के सामने समोसे बढ़ा दिये।

” पक्का बताओ हम खा लें,जब से तुमने मना किया , तबसे कचौड़ी और समोसा छुआ तक नही,, तीन महीने हो गये।।” हँसते हुए बांसुरी ने कहा।।

” बहुत कहा मानती हो लल्ला जी का,,ऐसा भी क्या हो गया।” रूपा के इस सवाल का जवाब दिया प्रिंस ने

” अरे भौजी ,,बांसुरी तो कम ही बात मानती है भैय्या जी की। पर भैय्या जी तो हर काम बांसुरी के मन का ही करते हैं, हम पे भरोसा ना हो तो पूछ लो भैय्या जी से।।” प्रिंस के बौड़मपने पे प्रेम ज़ोर से हंसने लगा और उसने आगे बढ़ कर बात संभाल ली__

” अरे आप लोग पहिले समोसा तो खाईये,ऊ भी चीख चीख कर कह रहा,हमरे ठन्डे होने से पहले हमे खा लो।”

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          रूपा रेखा को लेकर जब जिम की सीढिय़ां उतरने लगी,तब उसे कार में बैठा कर रेखा दो मिनट में आई कह कर वापस जिम में घुस गई __

” रोहित सुनो!! तुम से कुछ बहुत ज़रूरी बात करनी है,घर से फ़ोन नही कर पायेंगे,दीदी हमारे सर पे सवार रहेगी,,, तुम शाम को यहीं जिम मे हमसे मिलना,,हम किसी बहाने यहाँ आ जायेंगे,समझे।।”

” हाँ हम आ जायेंगे,शाम को 5 बजे जिम खुलेगा,  आज प्रिंस से चाबी हम ले जायेंगे,तुम समय से आ जाना बस।।”

रेखा लल्लन को बाय बोल कर बाहर निकल गई, हल्की सी मुस्कान के साथ जैसे ही लल्लन पलटा सांमने राजा और बाकी लोगों को खड़ा देख हडबडा गया।।

” तो ई है तुम्हरी नैकी जिसके लिये ‘ चदरिया झिनी रे झिनी ‘ सुना सुना के हमारे कान फाड़ दिये तुम?”

लल्लन नीचे सिर किये अपने बालों पे हाथ फिराता शर्माता खड़ा रहा।।

सभी मुस्कुराने हंसने खिलखिलाने लगे तभी राजा को जैसे कुछ याद आया_ ” अबे लल्लन तुम तो सूर्यवंसी लिखते हो ना।।अबे गज़ब कर दिये गुरू,,अब फिर पिंकी औ रतन वाला किस्सा दोहराना पड़ेगा।।”

” तो क्या हुआ,तुम हो ना सबके तारणहार!! तुम्हारे रहते किसी का बुरा हो सकता है,,,कभी कभी तो हमे लगता है,अगर तुम नही होते तो इन सब का क्या होता।।” बांसुरी की बात सुन राजा के मुहँ से निकल गया__” और तुम्हारा??”

” हाँ सही कह रहे,हमारा भी!! हम भी तो तुम्हारे कारण ही ऐसे दिखने लगे।।बाँसुरी खिल्खिलाती हुई वहाँ से बाहर चली गई,और बाकी सारे के सारे लल्लन को घसीटते हुए उसपे लात घूंसे चलाते हुए उसकी राम कथा सुनने लगे।।

क्रमशः

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aparna..

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शादी.कॉम-11

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   पिंकी और रतन की सगाई संपन्न हुई।।।सारे लोगों को व्यस्तता का जो बहाना मिला था चूक गया,, सारे रस भरे दिन चूक गये,रसोइये ने अपने साजो सामान को समेटा ,तगडा नेग लिया और चलता बना,एक एक कर मेहमानो ने भी जाना शुरु कर दिया।।
  पर ऐसे मौकों पे कुछ ऐसे मेहमान भी आते हैं,जो आते ही लम्बा टिकने के लिये हैं,,ऐसी ही एक मेहमान थी राजा की अम्मा की चचेरी बहन शन्नो मौसी।।।
     शन्नो मौसी का वहाँ टिकने का मुख्य उददेश्य था,राजा भैय्या की शादी।। एक तो कान्यकुब्ज ब्राम्हण परिवारों में मिलने वाला ऊँचा दहेज उसपे उनकी सहेली की ननंद की भतीजी जिसके फूफा स्वयं जज महोदय!!! अब ऐसा जानदार रिश्ता कोई हाथ से निकलने दे सकता है क्या,,कम से कम शन्नो मौसी जैसी व्यवहार कुशला और सामाजिक महिला तो बिल्कुल नही।।
   राजा की अम्मा पहले ही रूपा की बहन रेखा को लेकर परेशान थी,अब शन्नो जिज्जी एक नया फसाद लिये खड़ी थी,,पर इन सबसे बेखबर राजा भैय्या अपने में मगन थे।।।

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  राजा भईया का सारा दिन जिम मे पसीना बहाने बहवाने में निकल जाता और रात थोड़ा बहुत किताबें खोलने में ।।
    राजा भैय्या ऐसे जीव थे जिन्हें ज्यादा सोचने की आदत नही थी,जो बात उन्हें एक बार में समझ नही आती,उसे वो दुबारा पलट के भी नही देखते।। ऐसा नही था कि वो दिमाग से पैदल थे,पर बात ये थी कि उन्होनें आज तक ये नही जाना था कि दिमाग संभाल कर तिजोरी में रखने की वस्तु नही बल्कि दिल खोल कर खर्च करने की चीज़ है,और जितना ही उसे खर्चोगे उतनी ही बढेगी।।पर उनकी इस खूबी को बांसुरी ने पकड़ लिया।।।
   बांसुरी इतने दिनों की राजा की संगत में ये बात समझ गई कि राजा को पढ़ाई बोल कर पढ़ाने पर उसका डब्बा गोल ही होना है,इसिलिए उसने राजा को अलग ढंग से पढ़ाना शुरु कर दिया,,इतिहास में उसने सिलसिलेवार सन लिख कर उन उन काल में हुई घटनाओं दुर्घटनाओं की कहानी सी तैयार की और जिम में वर्क आउट करते हुए वो राजा को सतत उन कहानियों का स्मरण और पाठ कराती,जल्दी ही राजा  को सारा सब कुछ कंठस्थ होने लगा,कब प्रथम महायुद्ध हुआ,किसके बीच हुआ,,पहली सभ्यता का नाम,गान्धी जी का कब स्वदेश आगमन हुआ से लेकर कब गोलमेज सम्मेलन हुआ,और कब हमे आज़ादी मिली,कब हमारा संविधान तैयार हुआ।।
    जब एक बार किसी इन्सान को दिमागी मेहनत करने की आदत हो जाती है तो इससे इतर अन्य कोई कार्य रुचिकर नही लगता।।ये सब पढ़ते हुए राजा को ऐसी रूचि उत्पन्न हुई कि अब उसकी दिमागी खुराक के लिये बारहवीं के सिलेबस की रसद कम पड़ने लगी,अब राजा खोज खोज कर पढ़ने योग्य अयोग्य सभी कुछ पढ़ने लगा।।।

” हमको तो लगने लगा है,हम इत्ता पढ़ डाले हैं कि अगर हम कौन बनेगा करोड़पति खेलने गये तो हम पूरा एक करोड़ एके बार में जीत डालेंगे ऊ भी बिना लाईफ लाइन के,,क्यों गुरू जी।।”

राजा ने बांसुरी से हँसके पूछा,पर जवाब मिला प्रेम से…..

” बिल्कुल सही बोले भईया जी,औ ई बसुरीया इत्ता बजन कम कर डाली है की अगर मिस इंडिया बनने गई तो अकेली ही सब जीत डालेगी,ऊ का का होता है ना मिस वर्ड,मिस ब्रम्हाण्ड औ जाने का का।।”

” हमारे लिये काहे इतना कड़वे हो प्रेम,,हमने सुना था लड़के लड़कों से जलतें हैं,लड़कियाँ लड़कियों से,पर तुम तो हमी से जले कटे बैठे रहते हो,,दिमाग को थोड़ा ठंडा रखा करो।।”

बाँसुरी ऐसा बोल कर वहाँ से उठ गई,और दिनों की तरह उसके चेहरे पे वो उल्लास नही दिखा राजा को, जिसके कारण राजा भी उठ कर उसके पीछे पीछे चला आया।।

” क्या हुआ बांसुरी? कोई परेसानी है?? आज तुम थोड़ा चिंतित दुखी परेसान लग रही हो।।”

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” समझ गये कि हम परेशान लग रहे पर तुमको तीन पर्यायवाची बोलने की क्या ज़रूरत??आजकल हर जगह अपनी परीक्षा की तैयारी में ही भिडे रहते हो।।” ऐसा बोल कर बांसुरी मुस्कुरा पड़ी और राजा शरमा के नीचे देखने लगा।।

” बांसुरी हम बहुत दिनों से एक बात सोच रहे थे,तुम हमारी सबसे करीबी दोस्त बन गई हो,तुमने हमें इतना अच्छे से पढ़ाया है कि हमको अब पढ़ाई लिखाई अच्छी लगने लगी है।” बांसुरी खड़ी मुस्कुराती रही
” हम और कुछ तो दे नही सकते,,आज तुमको एक छोटा सा पार्टी देना चाहतें हैं ।””

” अरे अभी पास तो हो जाओ,,फिर हम तुमसे पार्टी भी ले लेंगे।।”

” हमारे पास होने की पार्टी तो तुम दोगी हमे,देखो ई दू  तीन महीना में तुम भी दुबला गई और हम भी पढ़ लिख लिये तो अब हमको लगता है पार्टी तो देना ही पड़ेगा।।”

बांसुरी के मन की उदासी राजा के पकड़ में नही आई, अभी वो दोनो खड़े बात कर ही रहे थे कि डॉ रानी वहाँ चली आई ।।

” कैसे हो राजा,क्या चल रहा आजकल!! बहुत दिन से तुम दिखे नही तो हमनें सोचा हम ही मिल आते हैं तुमसे ।।”
उन दोनों को बातों में उलझा छोड़ बाँसुरी वहां से निकल गई ,,रानी और राजा भईया वहीं जिम की सीढियों पर बैठ गये,,रानी दुनिया भर की तमाम बातें राजा को बताती रही,बीच बीच में ” सुन रहे हो ना”  ” अच्छा बताओ मैने अभी अभी क्या कहा था” जैसे क़्विज़ कॉंटेस्ट भी खेलती रही पर बाँसुरी का इस तरह चुपचाप चले जाना राजा को बुरी तरह खलने लगा,वो दूर तक बाँसुरी को जाते हुए देखता रहा,, बार बार राजा का मन हुआ कि जाकर बाँसुरी को रोक ले और पूछ ले कि ऐसे बिना कुछ बोले कैसे चली गई ,पर वक्त की नजाकत देखते हुए वो चुप चाप बैठा रानी की बातों को सुनता रहा।।

   लोग कहतें हैं पहला प्यार कभी नही भूलता,अब लोग कहतें हैं तो ऐसा होता ही होगा पर लोगों के साथ ही,, क्योंकि राजा के साथ ऐसा कुछ नही हुआ।।
     राजा ने जितनी शिद्दत से रानी से अपनी अल्हड़ सी उम्र में प्यार किया था,उतनी ही शिद्दत से आज वो उस प्यार को भूल बैठा।।रानी में आज भी कोई कमी नही थी,खूबसूरत तो पहले ही थी अब डॉक्टरी की पढाई के आत्मविश्वास ने चेहरे को एक अलग लुनायी से रंग दिया था,बावजूद इसके अब राजा को रानी में सिर्फ एक अच्छी सच्ची दोस्त ही नज़र आ रही थी।।
     प्यार मोहब्बत ऐसा एहसास होता है कि जो करता है और जिससे करता है,उसे बताने और जताने की ज़रूरत नही रह जाती,,और जब वही प्यार करने वाला प्यार नही करता है,तब तो लगता है जैसे सारा संसार चीख चीख कर आपको ये बताने पे अमादा है कि ‘ अब ये तुझसे प्यार नही करता’।।
रानी भी राजा की भावनाओं को समझ चुकी थी,पर उसे कोई शिकायत ना थी,या शिकायत करने कि अवधि वो पार कर चुकी थी।।अपने मन की दुविधा को खुद में ही समेटे उसने बहुत सारी बातें राजा से करी,ये जानते हुए भी कि राजा उसके पास बैठा हो कर भी बांसुरी के साथ उसके घर तक चला गया है।

” राजा एक बात पूछें तुमसे?अरे हमे सुन भी रहे हो या नही?? माना की बहुत पतली हो गई है तुम्हारी मुटकि पर अभी भी हमसे तो मोटी ही है।”  रानी अपनी ही बात पर हंसने लगी,राजा चौंक कर उसे देखने लगा__ ” क्या कहा तुमने रानी,अच्छा सुनो हमे कुछ काम से घर जाना है,चलो तुम्हें तुम्हारे घर उतार देंगे।।”

” जी मेहरबानी आप मुझे मेरे घर तक लिफ्ट देंगे,,एक बात पूछना चाहतें हैं आपसे राजा बाबु।”

” हाँ पूछो।” अपनी गाड़ी स्टार्ट करते हुए राजा ने कहा

” बुरा मत मान जाना,,हम कुछ दिन से जो नोटिस किये वही पूछ रहे हैं,,तुम्हें बाँसुरी कैसी लगती है।।”

” कैसी लगती है मतलब?? ठीके है,मेहनती है,होशियार है,जो ठान लेती है कर के रहती है,,अब देखो ,,जब जिम मे आई रही 68 किलो की रही ,और अभी 60 की हुई गई,,बहुत मेहनती है,एकदम जी जान से जुट जाती है,,पढ़ाई में तो पुछो मत,हमें सोचो हमार जैसे लठ को आदमी बना डाली( राजा भैय्या की नजरों में जिसे शिक्षा का मह्त्व पता हो और जो शिक्षित हो वही असली पुरूष संज्ञा है)
राजा भैय्या की बात को बीच में ही काट कर रानी ने कहना शुरु किया__

” हाँ समझ गये!! बस करो अब तारीफ ,,तो मतलब हम जो सोच रहे वो सच है।”

” अब हमे क्या पता तुम क्या सोच रही??”

” ये कि तुम्हें बांसुरी अच्छी लगने लगी है।।है ना?”

” अच्छी है तो अच्छी लगेगी ही??”

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रानी मुस्कुराने लगी ” हम्म अच्छी तो है,पर तुम्हें कुछ ज्यादा ही अच्छी लगने लगी है।।”

जब किसी की चोरी पकड़ी जाती है तो उस वक्त उस इन्सान का सारा प्रयास इसी ओर रहता है कि किसी तरह उसकी बेगुनाही साबित हो जाये,ऐसा ही कुछ राजा के साथ हुआ!!! अभी वो बेचारे स्वयं अपने मन की थाह नही पा पाये थे उन्हें स्वयं अपने हृदय के अन्दर बहने वाले इस प्रेमझरने का स्त्रोत पता नही था कि उस झरने को पहचान कर लोग बाग उसका रसास्वादन करने लगे।।।राजा भैय्या सोच में पड़ गये कि शाम को बांसुरी से मिलने जाना चाहिये या नही, उन्हें उस समय यही उचित लगा कि मिलने नही जाना ही ठीक रहेगा।।वो बार बार अपने मन को तरह तरह से यही समझाने में लगे रहे कि रानी को कुछ गलतफहमी हुई है,और उनके मन में बाँसुरी को लेकर कोई विकार नही है।।

  वो पूरा दिन बस यही सोचते निकल गया कि अगर मिलने चला गया तो सब क्या सोचेंगे,और अगर मिलने नही गया तो बांसुरी क्या सोचेगी!! आखिर बांसुरी सब पर भारी पड़ी ।।
    तरह तरह के विचारों को सोचते सोचते अंतत: राजा ने यही सोचा कि जब उनका मन साफ है स्वच्छ है बांसुरी से मिलने जाने मे कोई परहेज नही।।ऐसा सोचने के बाद मन फूल सा हल्का हो गया,सुबह से सोच सोच के जो पीड़ा के बादल राजा ने अपने दिमाग मे जमा कर लिये थे,सब एकाएक बरस गये,और उजली चांदनी छिटक गई ।।

  अपने आप को भली तरह से सजा संवार कर राजा बाबु बाँसुरी से मिलने जाने निकले,ये प्रथम अनुभव था जब राजा अपनी किसी महिला मित्र से मिलने जा रहा था,इसके पहले तो हमेशा अपने चेलों के साथ घूमने के लिये कभी कोई तैयारी नही लगी पर आज कुछ विशेष यत्न से सारी साज संवार की गई थी,,मन ही मन अपने आप पे खुश होते राजा भईया निकल ही रहे थे कि भाभी जी का स्वर सुनाई पड़ा

” किधर को चली सवारी लल्ला जी?? बड़े बन ठन के निकल रहे हैं ।”
   ‘काली बिल्ली रास्ता काट गई ‘ वैसे भैय्या जी ये सब बातों को नही मानते थे,उन्हें अपनी भाभी पर स्नेह भी था पर उनकी इस कदर की टॉन्ट वाली बातों पे अरुचि भी थी।।

” कुछ नही भाभी बस मन्दिर तक जा रहे थे।।”

” आज कौन से मन्दिर जा रहे लल्ला जी??”
भाभी तो एकदम ही पीछे पड गई,अब बेचारे राजा भैय्या क्या बोलते

” बड़े हनुमान जा रहे,,आप चलेंगी??” आप चलेंगी कुछ इस ढंग से पूछा गया कि इस सवाल का जवाब आपको ना में ही देना है कहीं गलती से हाँ कह दिया तो भईया जी कहीं गाड़ी सहित आपको गंगा जी में ना डूबा आयें।।

” ना ना आप ही जाओ,,बस आते बखत उधर जो सेंतराम हलवाई है ना उसकी चाट हमारे लिये लेते आना,और उसे बोलना छोले कम डालेगा,ज्यादा गीला ना करे,टिकिया को अलग से बाँधेगा नही क्या होता है ना टिकिया गल जाती है सारी की सारी।”

” और कुछ भाभी।।”

” नही बस इत्ता ही याद से ले आना,बहुत है।”

अब राजा बाबु को जाना था रॉयल पैलेस होटल और बड़े हनुमान पड़ते थे घड़ी चौक से दाहिना जाकर,बेचारे झूठ बोल कर बुरा फंसे।।चाट तो वो अपने अनुचरों से भी मँगा लेते पर हनुमान जी का नाम ले दिया,अब मन्दिर नही गये तो भगवान नाराज और होटल टाईम से नही पहुँचे तो बांसुरी ।।

उन्होनें बांसुरी को फ़ोन लगाया,,रिंग बजने पे फ़ोन उठाया उधर से बांसुरी की अम्मा ने__ ” हेलो कौन बोल रा।”

बेचारे राजा भईया पहली बार किसी लड़की के नम्बर पे फ़ोन किये वो भी उसकी माँ उठा ली,अब का करे का ना करें की स्थिति थी।।

” नमस्ते !! बांसुरी है क्या?”
” ऊ तो अभिचे कहीं निकल गई!! बोल के गई है आने में थोड़ा देरी हो जायेगा।।तुम कौन बोल रये बेटा…..इतने में फ़ोन कट गया,राजा भईया को बड़ा गुस्सा आया,अरे इतनी भी क्या हड़बड़ी,,थोड़ा देर में नही निकल सकती थी।।
  हर बात पे बांसुरी की राय लेने की ऐसी आदत हो गई की अब इस आड़े वक्त में क्या करें,राजा भैय्या को सूझ ही नही रहा था।।उन्होनें अपनी गाड़ी उठाई और चल दिये।।

कुछ 20 मिनट बाद राजा भैय्या रॉयल पैलेस होटल की पार्किंग में थे।।गाड़ी खड़े करते हुए जाने क्यों एक अजीब सी बेचैनी उन्हें घेरने लगी।।आज तक किसी काम को करने के पहले दुबारा ना सोचने वाले राजा की हालत खराब थी,इतना तो उसने अपने सारे जीवन मे नही सोचा जितना आज अकेले एक दिन मे सोच लिया।खैर अपने आप को मजबूत कर अन्दर बढ़ ही रहे थे कि__” सर क्या आप अपनी पहली डेट पर आये हैं,अगर हाँ तो हमारे पास आपके लिये कुछ है”

अचानक से दरबान के साथ खड़े होटल मैनेजर के इस सवाल पर राजा भईया घबड़ा गये,एकाएक उनसे बोल ना फूटा__”सर अगर ये आपकी फ़र्स्ट डेट है तो ये रहा आपके लिये एक गुलाब !! हमारी ओर से!! आप अपनी गर्लफ्रैंड को ये दीजिये।।

” पर भैय्या तुम काहे दे रहे फ़्री में गुलाब??”

” सर पॉलिसी है हमारी,आज की तारीख पे हमारे साहब की शादी हुई थी तो आज के दिन जो कपल डेट पे आते हैं उन्हें हम गुलाब और कोम्प्लिमेन्ट्री ड्रिंक और स्टार्टर खिलाते हैं ।”

राजा का ये प्रथम अनुभव था,आज तक अपने चेलों के साथ सेंतराम की कचौड़ियाँ पेली थी या टिक्की।। पीने पिलाने का ऐसा था कि कभी एक बार प्रेम कहीं  से पी पिला के लौटा तो उसकी लटपटाती जिव्हा और उठने वाली कड़वी गन्ध से भी राजा नही समझ पाया तब प्रिंस ने ही सहायता की” अरे ई प्रेम कहीं से पी के आ रहा है भैय्या जी” बस इतना सुनना था कि राजा ने उसे 2 थप्पड़ लगा दिये__
               ” अरे बस बियरे तो पिये हैं,ऊ हार्ड ड्रिंक थोड़ी होता है भैय्या जी,,पुराने सब दोस्त मिल गये रहे जबरिया पिला दिये,औ जो थोड़ी बहुत चढ़ी रही ऊ आपका थप्पड़ उतार दिया।।”
  हालाँकि बाद में राजा ने प्रेम को ताकीद करी की जिम में जहां महिलायें भी आती हैं,वहाँ इस तरह पी कर आना वर्जित है,माफ कर दिया।।
   
  अब आज इस तरह मैनेजर से डाइरेक्ट फ़्री ड्रिंक की बात सुन भैय्या जी ज़रा झेंप गये और सिर्फ गुलाब लिये अन्दर चल दिये।।

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   अन्दर बड़े से हॉल में हल्की-सी रोशनी में हल्का धीमा सा कर्णप्रिय संगीत गूँज रहा था।।रूम फ्रेशनर की खुशबू सारे माहौल को खुशनुमा कर रही थी, ऐसे में भईया जी चारों तरफ नज़र दौड़ाते बांसुरी को ढूँढ रहे थे।।
     राजा को बांसुरी दिख गई,,,वो एक बार फिर अजीब सी परेशानी में घिरने लगा,आज सुबह तक जिसे सिर्फ एक छोटी सी पार्टी समझ कर देना चाहता था, वो रानी से बात होने के बाद से एक छोटी सी डेट में बदल गई ।।कितना भी नादान हो पर राजा डेट का मतलब तो समझता ही था।।
   
” कब आईं बांसुरी?? हमको थोड़ा ट्रैफिक के कारण देर हो गया।”

आज सब कुछ बदला सा लग रहा था राजा को।।
रानी की बातों का असर था या मैनेजर की बातों का, या उस रोमैंटिक माहौल का असर आज बांसुरी वाकई बाकी दिनों से अलग लग रही थी।।
बहुत सुन्दर तो बांसुरी को नही कहा जा सकता था पर वो स्मार्ट थी,अपने आप को सलीके से रखना उसे आता था,अब आठ किलो वजन कम करने के बाद उसका आत्मविश्वास और चमक गया था।।
कुल मिलाकर आज के ज़माने में कही जाने वाली स्मार्ट प्रेजेंटेबल लड़की थी।।

” अरे तुम खड़े क्यों हो राजा बैठो ना।”

” क्या कर रही थी अब तक ” अपनी कुर्सी पर बैठते हुए राजा ने सवाल किया

” कुछ नही ,बस मेन्यू देख रहे थे कि तुम्हारे लायक क्या हेल्दी खाने को मिल सकता है।”

” अरे हमारे चक्कर में ना पड़ो,जो तुम्हें पसंद हो वो मँगा लो।।” राजा के ऐसा बोलते ही बांसुरी मुस्कुरा पड़ी

” अरे राजा अब हमें भी तुम्हारी तरह मूँग और चना ही भाने लगा है,पता है एक दिन तो अम्मा बेचारी रो पड़ी,बुआ से बोलती हैं” लगता है हमार बांसुरी को जिन ऊन पकड़ लिया है,आज कल खाने को देखती भी नही,सिर्फ फलाहार करे है छोरी जिज्जी।” मुझे तो ऐसी हँसी आई,मैनें कहा अम्मा उस जिन्न का एक नाम भी है ” राजा”

बांसुरी तो ऐसा बोल कर फिर हंसने लगी पर राजा बेचारा शरमा गया।।

” अच्छा राजा सुनो तुमसे एक बात पूछना चाहते हैं “

” हाँ पूछो”
” सच तो बोलोगे ना??”
धड़कते दिल से राजा ने कहा” बिल्कुल सच बोलेंगे।”
उसे लगा जाने क्या पूछने वाली है।असल में तो राजा को खुद ही समझ नही आया था,कि इन कुछ महिनों के साथ में कब बांसुरी उसके मन में रात दिन बजने लगी,हर काम उस से पूछ पूछ कर करने की ऐसी आदत हुई कि कई बार जिम के काम से भी कहीं जाना हो तो पहले बांसुरी का अप्रूवल लगने लगा।।राजा तो नही समझा कि ये क्या है लेकिन उसके आस पास के लोगों जैसे प्रेम रानी यहाँ तक की पिंकी को भी समझ आने लगा कि राजा को बांसुरी भा गई है।।

” हम कैसे दिखते हैं,देखो एकदम सच बोलना ,तुम्हें तुम्हारे भगवान की कसम।”

भगवान की कसम सुनते ही भैय्या जी को बड़े हनुमान याद आ गये,दोनों हाथ कान से लगा कर मन ही मन भगवान से माफी मांग कर राजा ने कहा__

” हम सच बोलें तो तुम बहुत ही प्यारी दिखती हो,मासूम सी ।। और होशियार तो बहुतै दिखती हो।।”
  अभी राजा अपनी बात पूरा भी नही किया था कि वेटर उनका ऑर्डर ले कर आ गया।।

” अरे कॉफ़ी मंगाए हो राजा??”

” हाँ बांसुरी ऐसे होटल में चाय नही पी जाती, इसिलिए हम कॉफ़ी मँगा लिये,जल्दी से कॉफ़ी पी लो,फिर तुम्हे किसी से मिलवाने ले कर जाना है।।”

दोनो कॉफ़ी पीकर निकलने लगे तब बांसुरी ने राजा को टेबल पर गलती से भूले हुए गुलाब की याद दिलाई,,” किसके लिये लाये हो गुलाब”

” बताते हैं!! पहले हमारे साथ चलो।।”

बांसुरी को सिर्फ एक गुलाब देने की भी हिम्मत राजा नही जुटा पाया,दोनो उसकी रॉयल एनफील्ड में बैठ कर बड़े हनुमान मन्दिर को निकल चले।।रास्ते भर इधर उधर की बातें बताती बांसुरी ने अपने गणित के प्रोफेसर भास्कर सर की ढ़ेर सारी बातें राजा को बताईं,और बताते बताते अंत में धीरे से अपने मन में उपजी प्यार की भावना को भी राजा को बता दिया__
         ” देखो राजा जाने अनजाने तुम हमारे बहुत ही ज्यादा अच्छे दोस्त बन गये हो!! निरमा से तो अब मिलना भी कम हो पाता है,उसे बताएंगे भी तो हमारी बात समझेगी नही,और ना ही कोई मदद करेगी,क्योंकि वो हमसे इतना प्यार करती है कि उसे हममे कोई कमी नज़र ही नही आती।। तुम भी हमारे बहुत सच्चे दोस्त बन गये हो,हो ना।।”

बहुत धीरे से राजा ने कहा” हाँ हैं,बोलो क्या मदद चाहिये।”

” पहली बार जब भास्कर सर से मिले तभी हमें सर बहुत भा गये थे,,फिर उनका गणित पढ़ाने का स्टायल!!ऐसा पढाते हैं राजा की पूछो मत!! नये नये समीकरण खुद तैय्यार कर देते हैं ।।तुम हमारी इतनी मदद बस कर दो कि वो भी हमारी तरफ ध्यान देने लगे,,मतलब समझ रहे हो,हम क्या कर रहे।।

बिल्कुल रुआंसा होकर राजा ने कहा” नही समझे”

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” अरे बुद्धू!! तुम खुद लड़के हो,तुम हमें बता सकते हो ना कि लड़कों को क्या पसंद होता है,मतलब कैसी लडकियों से बात करना पसंद है ….अब और कितना खुल के बताएँ ।।”

” हम्म समझ गये!! कर देंगे तुम्हारी मदद।।”

” थैंक यू राजा ,हमे पता था,तुम बहुत अच्छे हो हमारी मदद ज़रूर करोगे,,अच्छा ये तो बताया ही नही तुमने कि ये गुलाब किसके लिये रखे हो।।”

” हनुमान जी के लिये,,वही चढाना है हमें,सुनो बांसुरी तुम्हें घर जाने की देरी हो रही तो तुम्हे घड़ी चौक पे उतार देते हैं!! हमको हनुमान मन्दिर जाना है।।”

” नही ऐसी कोई देर नही हो रही ,तुम्हारे साथ ही तो हैं,आज हमारे पतले होने की पार्टी जो है,पर तुम तो बस कॉफ़ी में निपटा दिये।।”

” अरे तुम वो भास्कर भास्कर किये जा रही थी तो हमे कुछ सूझा ही नही,बस कॉफ़ी मँगा लिये।।

” चलो कोई बात नही!! अभी हमे चार पांच किलो और कम करना है,उसके बाद जी भर के खायेंगे, अच्छा सुनो !! तुम मिलवाने किससे वाले हो।।’

” अरे किसी से नही!! ऐसे ही कह दिये रहे!! हमको मन्दिर जाना था।।हम बचपन से जब भी परेशान होते थे या बहुत खुश होते थे तब बड़े हनुमान मन्दिर ही जाया करते थे,उन्हीं से अपना सारा सुख दुख साझा करते रहे हैं,आज भी तुम्हें वहीं ले जाने की सोचे थे।”

” अरे वाह!! चलो हम भी मिल लेंगे अपने दोस्त के बाल सखा से।। पर सुनो भूल मत जाना राजा, पटला होने में इतनी मदद किये हो अब इस मामले में भी थोड़ी मदद कर दो,और किसी से कहना नही,समझे।।”

” हाँ मेरी माँ किसी से नही कहेंगे। और कल से तुम्हारी एक हफ्ते की एक और ट्रेनिंग शुरु कर देंगे,,उसके बाद वो भास्कर की क्या औकात तुम्हारे सामने।।भास्कर को मारो गोली सलमान खान भी पट जायेगा।।”

” अरे अरे अरे गोली क्यों मार रहे हो भई !! भास्कर सर ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ,रही बात सलमान की तो हमें सलमान खान पसंद ही नही….

बातों ही बातों में बड़े हनुमान मन्दिर पहुंच कर दोनों ने दर्शन किये,और सेंतराम के यहाँ से आलू टिक्की खा कर और पैक करा कर दोनो अपने अपने घर वापस आ गये।।

क्रमशः

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aparna..

शादी.कॉम-10

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……..

   युवराज के सकुशल घर वापसी से घर पे फिर एक बार उत्सव सा माहौल बन गया।।वैसे भी शादी ब्याह का घर त्योहारों का घर लगता है,,पन्द्रह दिन बाद होने वाली सगाई की तैय्यारियों में पूरा अवस्थी परिवार डूब गया,माहौल बिल्कुल दशहरा दिवाली जैसा हो गया।।
        हर कोई किसी ना किसी काम मे व्यस्त था,प्रेम प्रिंस जैसे लोग  सिर्फ व्यस्तता का दिखावा भी कर रहे थे।।घर की औरतें रोज किसी ना किसी वस्तु को खरीदने बाज़ार जा रही थी,फिर भी ज़रूरी सामान की सूची में कोई ना कोई कमी रह ही जाती थी।।।सगाई के तुरंत बाद ही वर को तिलक चढाना था ,उसकी भी तैय्यारियाँ साथ ही चल रही थी, कहीं नारियल पे सोने का पत्तर चढ़ाया जा रहा था कही,छोटी छोटी सोने और चांदी की सुपारियां बनवाई जा रही थी,,चांदी के पान के पत्तों पर अवस्थी सरनेम उकेरा जा रहा था।।
       राधेश्याम अपने छोटे भाई के साथ बैठे 500,100और 50के अलग अलग लिफाफे तैयार करा रहे थे,अरे भैय्या सभी को समधि के बराबर का लिफाफा थोड़े ही पकड़ा देंगे।।
    
           उनकी श्रीमती जी के तो काम की फेहरिस्त कम ही नही पड़ रही थी,,बेचारी रसोइये को देने के लिये रसद निकालने भण्डार में जाती ,और वहाँ फैले आलू प्याज को देख उन्हे याद आ जाता कि आलू तो अभी और दस बारह किलो मंगाने पड़ेंगे,मिज़ाज़ ये हो गया था कि बेचारी एक काम हाथ मे लेती उसे पूरा किये बिना ही दूसरे में भिड़ जाती,,आखिर घर भर की इकलौती बिटिया की सगाई थी,, अच्छा हुआ समय रहते ही उन्होनें बडियां तोड़ ली थी ,और पापड़ अचार बना कर रख छोड़े थे,क्योंकि जैसे समधि हडबडी मचा रहे थे,उससे उन्हें लग रहा था कहीं तिलक के दिन ही शादी की तारीख भी ना निकाल दें।।
     
      रूपा को जितना काम करना आता था,उससे अधिक दिखाना आता था,,वो किसी भी बड़े बुज़ुर्ग के आते ही अपने पल्लू को कमर पे कस कर इधर से उधर दौड़ चुटकियों में ऐसा माहौल बना जाती जैसे अब तक वही काम में जुटी थी।।रसोइये की तरफ वैसे तो उसका ध्यान ना रहता पर जब देखती सास आस पास से गुज़र रही तो हाथ हिला हिला कर उसे उपदेश देना शुरु कर देती “क्यों जी महाराज किलो भर घी का तो आपने मोमन ही डाल दिया,,अब आपकी कचौड़ियां खस्ता होंगी कद्दू,,ज़रा और मैदा गून्थिये,हमारी मम्मी हमको सिखाई थी कि मोमन इतना पड़े जे हाथ से लड्डू बंध जाये,,पर आपका तो यहाँ मैदा कम घी घी बस हुआ पड़ा है,,और बालूशाही के लिये मैदा अलग गुन्थीयो उसके लिये हम दही भिजा देंगे,,और एक बात सुन लो बूंदी मोटी ना छान देना,,कोई नही खाता यहाँ सब को मोतीचूर ही भावे है।।”
     कनखियों से जब देख लेती की सासु जी निकल गई हैं तो वापस अपने साज शृँगार में लग जाती, सगाई से ठीक 2दिन पहले उसकी फुलझडी सी बहन भी आने वाली थी,इसिलिए रूपा का उत्साह अपने चरम पे था।।

    पुरूष बाहर के कामों में व्यस्त थे,,इस सब के बीच बांसुरी की तरकीब के अनुसार रतन को युवराज भैय्या के साथ कर दिया गया था।।
   युवराज जिस किसी काम से बाहर जाता ,रतन को भी साथ ले जाता।।स्वभाव से अन्तर्मुखी रतन अधिकतर चुप ही रहता,जहां आवश्यकता हो वहाँ कम बोलता और जहां आवश्यकता ना हो बिल्कुल ही नही बोलता,,पर हाँ जब बोलता तो अपनी बुद्धिदीप्त बातों से युवराज को प्रभावित कर जाता।।
     रतन असल मे बुद्धिमान था उसके स्वभाव में छल कपट जैसी बातों का सर्वथा अभाव था,सब कुछ जानते हुए भी उसने एक बार भी युवराज को जान बूझ कर प्रभावित करने का कोई प्रयास नही किया,,,लेकिन सरस्वती के भक्त बुद्धि के अनन्य उपासक युवराज ने असली हीरा पहचान ही लिया।।

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   एक एक कर दिन बीतते गये, सगाई के ठीक 2दिन पहले युवराज राजा और रतन अँगूठी खरीदने गये,,दुकान पर बैठे तीनो अलग अलग तरह की अँगूठीयाँ देख रहे थे तभी युवराज ने कहा__
“मैं सोचता हूँ हीरे की अँगूठी लेना सही रहेगा,, आजकल तो हीरे का ही चलन है,लोग पसंद भी करते हैं,क्यों राजा ठीक है।।

  “बिल्कुल सही बात भैय्या ,,आपको जो सही लगे,हमरा तो ई सबमें दिमाग कम चलता है।।”

   “दिमाग तो चलता है भाई,तुम चलाना नही चाहते हो,,बस अपनी पहलवानी मे खुश रहते हो,,बात ये है।।।पर हम ये भी सोच रहे कि कहीं लड़का और उसके घर वालों को पसंद नही आयी तो।।”

  राजा ने पूछा”काहे पसंद नही आयेगी भैय्या,आखिर आप पसंद किये हैं,,पसंद तो आबे पड़ी ।”

  “अरे मेरे छोटे !!! तुम हमे इतना मानते हो कि हम जो कह दे तुम्हारे लिये पत्थर की लकीर है,पर वो लोग हमारे होने वाले समधि हैं,बेटा हो सकता है उनको हीरा ना पसंद आये,हो सकता है वो लोग ये सोचे कि सोने के जितनी हीरे की रीसेल वैल्यू नही है।।मतलब दुबारा बेचने पर कम कीमत मिलेगी, क्यों रतन सही कहा ना हमने।।”

  “भैय्या अगर लड़का और उसके घर वाले सगाई की अँगूठी का मोल देखने लगे और ये देखने लगे की उसकी रीसेल वैल्यू क्या है,तो फिर ऐसे लोगों को देने के पहले आपको कुछ भी सोचने की क्या ज़रूरत,????,मेरे खयाल से कुछ चीज़ों की कीमत नही आंकी जा सकती है,,वो कोई मूर्ख ही होगा जो अपनी सगाई की अँगूठी को बेचेगा ,तो रीसेल का सवाल ही नही उठता,वैसे मेरा भी इन सब बातों में दिमाग कम चलता है,,जैसा आपको सही लगे ,वही कीजिए।।”

  “लाख रुपये की बात कही मित्र,,बस यही सोच होनी चाहिये,,अच्छा ज़रा इसे पहन के देखो,,क्योंकि लड़का तुम्हारे डील डौल का ही है,,अगर तुम्हे सही आई अँगूठी तो उसे भी आ ही जायेगी।।”
    ऐसा कह कर युवराज ने अँगूठी रतन को पहना दी ,अँगूठी बिल्कुल सही नाप की आई,,रतन और राजा को वहीं छोड़ युवराज लेड़ीस काऊंटर की ओर चला गया।।

   सारा सामान लिये तीनो घर निकल गये,,घर की औरतों के लिये भी कुछ नये गहने युवराज ने ले लिये थे,पिंकी के लिये कुछ लेना हो तो रूपा के लिये उससे डबल नही भी लिया तो उतना तो लेना ज़रूरी ही था,वर्ना वो एक अलग बवाल मचा देती।।

    सगाई के एक दिन पहले शाम के समय अवस्थी जी सारी तैय्यारियों का जायजा ले रहे थे।।
    पूरे घर को गेंदें की फूल मालाओं से सजा दिया गया था,,छत पर  और बाहर बगीचे में चमकीला शामियाना  टांग दिया गया था,,बिजली के छोटे छोटे लट्टू और रंगीन रोशनियों से घर जगमगा गया था, सब तरफ लोंगो की आवाजाही थी,,मेहमानों से घर पटा पड़ा था,मऊ वाली बुआ जी सपरिवार पधार चुकी थी,,खंडवा वाले मामाजी रात तक पहुंचने वाले थे,,किसी की खातिर में कोई कमी ना रह जाये यही विचार करते राधेश्याम ऊपर नीचे सब जगह का जायजा ले रहे थे,,तभी प्रेम वहाँ से जल्दी जल्दी बाहर की ओर जाता दिखा ,जिसे रोक के उन्होनें एक नये काम का ऑर्डर थमा दिया ,,बेचारा अंकल जी की बात मान उनका काम करने निकल चला,,काम निपटा के वापसी में उसे दो घन्टे से अधिक हो गया,,तभी उसका फ़ोन बजा__

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“कहाँ??”भैय्या जी के इस सवाल पर प्रेम हडबडाते हुए बोला “बस भैय्या जी निकल रहे।”

“अबे ऊ जब पत्ता गोदाम से निकल घर पहुंच जायेगा तब जायोगे उठाने ,याद तो है ना का करना है।।”

“हाँ भैय्या जी !! हम बस प्रिंस को लिये निकल ही रहे,,आप निश्चिंत रहे,आज कोनो गड़बड़ नही होने देंगे।।”

प्रेम का आज एक बार फिर उस दिन जैसे ही जी घबड़ाने लगा,फिर प्रिंस के समझाईश से और थम्स अप पी कर उसको थोड़ा राहत हुआ और वो अपनी हीरो हौंडा में प्रिंस को बैठाए बीड़ी पत्ता गोदाम की ओर निकल लिया।।

  इधर रतन और युवराज कुछ विशेष तैय्यारियाँ करने के बाद युवराज के कमरे में बैठे चाय पी रहे थे।।
     रतन को जाने क्यों इस तरह छल कपट से पिंकी का हाथ पाना शुरु से ही रूच नही रहा था,पर सहज में ही किसी की अवज्ञा करने का स्वभाव ना होने के कारण वो इतने दिनो तटस्थ बना रहा,पर आज जब इस सारे नाटक का अन्तिम सीन फिल्माया जाना था,अपनी पूरी ताकत और हिम्मत सहेज के उसने युवराज के सामने अपना मन खोल कर रख दिया, शुरु से लेकर अंत तक का सारा किस्सा उसने युवराज को कह सुनाया,इसी सब में अपनी जाति और कुल को भी बताना वो नही भूला,सारी बातें बताते अंत मे उसकी आंखों में अपने होने वाले अपमान और पिंकी का हाथ ना मिल पाने की असमर्थता से आंसू छलक आये,जिन्हें उसने युवराज से छिपाकर पोंछ लिया लेकिन इतना छिपाने पर भी युवराज ने वो देख लिया जो उससे छिपाने की कोशिश की गई थी,,रतन सब बता चुका तब धीरे से उठ के वहाँ से जाने को हुआ,पर तभी युवराज की कड़कती आवाज़ उसके कानों में पड़ी ।।
 
“ये अच्छा न्याय है आपका कलेक्टर महोदय!!!खुद गलती की ,गलती मान भी ली और बिना सज़ा सुने ही चल दिये ।।”

“अरे नही भैय्या ऐसी कोई बात नही,,आप जो सज़ा देंगे मंजूर है।।”

राजा भैय्या इन सब बातों से अंजान कुछ गुनगुनाते हुए वहाँ पहुँचे और रतन को कंधो से पकड़ कर झिंझोड दिया”का हो कलेक्टर साहब आज बड़े चिंतित नज़र आ रहे,,का बात है।”

युवराज राजा को गहरी नजरों से घूर रहा था इस बात पे राजा का कोई ध्यान नही गया,उसका पूरा ध्यान अपने फ़ोन पे था,,क्योंकि जैसे ही प्रिंस और प्रेम का फ़ोन आयेगा कि लड़के को उठा लिया गया है,वैसे ही राजा को घर से निकलना था,पर तय समय से लगभग बीस मिनट ऊपर हो चुका था और प्रेम का कोई फ़ोन नही आया था,,आखिर थक हार के राजा ने खुद ही फ़ोन लगाने की सोची__

“का हुआ राजा?? किसी के फ़ोन का इन्तजार कर रहे हो ,लगता है।।”

“नही भैय्या,ऐसा तो कोई बात नही।।”

“तो फ़ोन को काहे घूर रहे बार बार,,,दीपिका पादुकोण का स्क्रीन सेवर रखे हो का।”युवराज के ऐसा कहते ही लजा के राजा ने फ़ोन नीचे रख दिया तभी राजा का फ़ोन बज उठा__

“हाँ बोलो” राजा के फ़ोन उठाने से पहले युवराज ने फ़ोन लपक लिया

“भैय्या जी ऊ लफंडर तो वहाँ मिला नही,अब का करे,कहाँ जाये उसे उठाने।।”

“कौन नही मिला बे ??”युवराज की ललकार सुन के प्रेम घबरा गया और फ़ोन प्रिंस को पकड़ा दिया ,,प्रिंस ने सोचा प्रेम राजा भैय्या से डर गया,उसने सोचा कौन सा इतने दूर से चपत लगा पायेंगे तो बिना डरे सविस्तार सारा प्रकरण कह सुनाया__”भैय्या जी हम लोग टाईम से पहुंच गये थे पर ऊ ससुर हमरे पहुँचने के पहले ही खिसक लिया ,,अब का करे भैय्या जी,,जैसन आपकी आज्ञा हो।।”

“दोनो के दोनो इसी वक्त घर आ जाओ,हम दंडा लेकर तैय्यार खड़े हैं तुम दोनो की पूजा करने।” फ़ोन काट कर युवराज राजा की तरफ मुखातिब हुआ।।

“ये का बचपना लगा रखे हो राजा?? तुमको का लगता है,ये सब कर के कोई फायदा होना है, और तुम्हारे वो जाहिल पण्टर किसी काम के हैं भी,अरे इतना सब नाटक करने की जगह एक बार हम से कहना तो था,,अब जब दोनों परिवार का सब ठीक ठाक हो गया तब तुम लोगों ने ये पर्पंच लगा दिया, अब जो होगा कल देखा जायेगा,अभी तुम जाओ रतन को उसके घर छोड़ आओ,,पर रतन कल बिना भूले सबेरे से चले आना,रातों रात कहीं भागने की जुर्रत की तो फेर हम दिखा देंगे की इस शहर का असल कलेक्टर कौन है।।”

राजा को अचानक से इतनी जटिल बात पल्ले नही पड़ी,उसे तब तक पता भी नही था कि रतन सब कुछ भईया को बता चुका है,,वो चुपचाप सर झुकाये रतन के साथ बाहर निकल गया।।

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  वो रात सभी की आंखों ही आंखों में कट गई,राधेश्याम जी और उनकी धर्मपत्नी को अति उत्साह के कारण नींद नही थी,तो वही राजा और बांसुरी को प्लान फेल होने के कारण,,दुसरी तरफ पिंकी और रतन ने अपने दुर्भाग्यपूर्ण भविश्य के खाके को सोच सोच कर अपनी नींद को अपना दुश्मन बना लिया था,,,घर भर में कोई था जो चैन से सो रहा था ,तो वो था युवराज हालांकी रूपा अपनी बहन के ना आ पाने के कारण जली कटी काफी देर तक जागती रही पर जागरण के कारण सुबह चेहरे पर दिखने वाले आलस्य को दूर भगाने वो सो गई ।।

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      सुबह से तो किसी को सांस लेने की भी फुरसत नही थी ,पन्द्रह दिन की तैयारियों के परीक्षाफल का समय था,लड़के वाले सगाई के लिये ठीक 11बजे घर आने वाले थे,,सगाई का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भोजन था और उसके बाद वर पक्ष की विदाई……उसके बाद शाम को वधु पक्ष को तिलक चढ़ाने जाना था शाम लगभग आठ बजे।।
   पूरे दिन का कार्यक्रम पूर्वनियोजित था,इसमे किसी प्रकार की कोई शंका शुबहा नही था।।

सब यंत्रवत अपने अपने कार्य में जुटे थे कि राधेश्याम जी का फ़ोन घनघना उठा__

“जी नमस्कार!! हाँ हाँ!! जी सब तैयार है,बस आप लोगों की प्रतीक्षा है,,क्या ??? ऐसा कैसे हो सकता है?? नही नही आप …..अभी राधेश्याम अपनी बात पूरी भी नही कर पाये कि दुसरी तरफ से फ़ोन कट गया।।
     राधेश्याम अपना सर पकड़ कर वहीं सोफे पर निढ़ाल हो गये,युवराज और राजा दौडे चले आये ,,तुरंत पानी मँगा कर उन्हें पिलाया गया,, श्रीमती जी ने पूछा __”किसका फ़ोन था ,क्या हो गया,,सब ठीक तो है ना??”

“लड़के वाले अभी नही आ पायेंगे,उन्हें कुछ आवश्यक काम आ पड़ा है,,इसीसे सगाई टालने की बात कह रहे हैं ।।”

जितने धीमे शब्दों में राधेश्याम जी ने कहा,उतने ही तेज़ आवाज़ में एक ज़ोर की हाय बोल कर श्रीमती जी भी दूसरे सोफे पर निढ़ाल हो गई ।।

  राजा गहन आश्चर्य से अपने पिता को देखने लगा

“क्या कहा बाऊजी,ऊ लोग सगाई तोड़ रहे।”

“पगला गये हो का राजा?? सगाई तोड़ नही रहे ,बाद में करने बोल रहे,,पर हम ई सोच रहे कि अब सब नातेदारों को का मुहँ दिखाएँगे ,सब तो सगाईये के नाम पे इकट्ठा हुए हैं,,हे भगवान का परीक्षा ले रहे हो हमारी।।”

“बाऊजी हम कुछ कहना चाहतें हैं आपसे।”युवराज ने इशारे से सब को बाहर जाने कहा और कमरे के किवाड़ बन्द कर दिये।।

कमरे के भीतर युवराज अपने पिता और चाचा से कुछ गहरी परिचर्चा में लग गया।।

इधर पूरे घर में सन्नाटा छाया था,,सुबह से शुभ अवसरों पर जो एक मीठी तान सी गूंजती है,बिना किसी शहनाई के भी ,वो अचानक एक नीरव स्तब्धता में बदल गई ।।घर में कुहासा छा गया,,अब तक घर का हर एक सदस्य एक विशिष्टता अनुभव करता अपने अलग अलग नखरों में डूबा था,चाहे वो घर की बहू हो चाहे रसोईया अब सभी एक गूढ़ मण्डप में छिपे छिपे से फिर रहे थे,सभी कछुए से अपने अपने खोल में दुबक गये थे ,,इतनी तैयारी इतनी रंगीनियाँ इतने मेहमान ,सब का क्या किया जाये,,कैसी शर्मनाक स्थिति से अवगत होना पड़ रहा था।।हर किसी के मन मे अलग अलग सवाल दौड़ रहे थे।।इस परिस्थिति से दो चार होने के बाद राजा को परिस्थिति की विकटता का एहसास हुआ था,,अब जाकर उसे असल में समझ में आया था कि किसी मंगल उत्सव का होते होते रुक जाना कैसा दुखद और कैसा मार्मिक होता है,,अब उसे उस परिवार और लड़के पे क्रोध आ रहा था।।
    उसने अपने दिमाग पर एक बार भी ज़ोर डाल कर ये सोचने का कष्ट नही उठाया कि अन्दर बडे भैय्या किस जोड़ घटाव में लगे हैं।।

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   अन्दर युवराज अपने पिता से जो भी आग्रह या परामर्श में लगा हो पर बाहर राजा प्रेम और प्रिंस की खबर ले रहा था कि __”जब तुम दोनो नहीं उठाये तो फिर लड़का वाले अचानक सगाई को टाले कैसे बे!!!! हमको लड़का वालोँ पर गुस्सा आ रहा है,ई का बात हुआ ,का हमरा कोनो इज्जत नही है,,ऐसन अपन मर्ज़ी से जब मन किया रिस्ता जोड़ दिया जब मन किया तोड़ दिया,,,चलो गुरू ज़रा खबर लेकर आये कि आखिर माजरा क्या है।।”

  राजा अपने चेलों को लेकर निकलने ही वाला था कि दरवाजा खोल कर युवराज बाहर निकल आया

“राजा रुको!!! किसी को कहीं जाने की ज़रूरत नही है,,पिंकी का सगाई आज ,अभी के मुहूर्त में ही होगा ,,वो भी रतन से।।रतन तुम से बिना पुछे हम ये तय कर दिये,,अगर तुम्हें कोई आपत्ति हो तो अभी बता दो।”

रतन की आंखों में आंसू छलक आये ,वो आगे बढ़ कर युवराज के पैर छूने झुका कि उसे युवराज ने अपने गले से लगा लिया,और राजा की तरफ घूम कर कहा__”राजा तुम फौरन गाड़ी निकालो और रतन के घर वालों को लेकर आ जाओ,रतन घर पर बोल दो किसी तरह की तैयारी की उन्हे ज़रूरत नही ,बस फौरन चले आयें,हमनें उसी दिन तुम्हरी तरफ से भी पिंकी के लिये अँगूठी खरीद ली थी।।।”

घर पे फिर एक बार अनदेखी शहनाई की मीठी करुण स्वर लहरी गूँज उठी,,घर की औरतों ने ज़रा ना नुकुर करना चाहा पर राधेश्याम जी के अटल आदेश पर सभी झट तैयार हो गये।।

  सगाई का कार्यक्रम शुरु हो गया,,पिंकी और रतन प्रसन्न मन प्रसन्न तन एक दूसरे को अपनाने की प्रक्रिया में आगे बढ़े,दोनो ने एक दूसरे को अँगूठी पहना दी।।

  सभी प्रसन्न थे बस एक तरफ राजा ज़रा गुस्से में खड़ा था तभी युवराज आकर उसके पास खड़ा हो गया।।

“का बात है आज तो भीम बड़ा गुस्से में नज़र आ रहा,अरे जो तुम सब चाहते थे वही तो हुआ,अब काहे मुहँ फुलाए खड़े हो।।”

“कुछ नही भैय्या,लड़के वाले अपना मर्ज़ी से सगाई से मुहँ फेर लिये इसिलिए थोड़ा दिमाग खराब है, बाकी तो सब ठीके हुआ।।”

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“अरे दिमाग है भी तुम्हारा?? अब सुनो हमारा बात।
हम जिस दिन पहली बार रतन से मिले उसी दिन हमे लड़का पसंद आ गया था,,हम उसी समय वो पप्पु के बारे में भी पता करा रहे थे,हमारे गुप्तचरों ने उसका अच्छा रीपोर्ट नही दिया था,हमें पता चल गया था कि लड़का खाता पीता सब है।।
   जिस दिन तुम्हारे ये दोनों घोन्चू हमारे ऊपर हमला किये थे उसी दिन हम ये दोनो को पहचान लिये थे,,बेटा !!! बड़े भाई हैं तुम्हारे,हम धीरे से गौर किये तो हमे समझ आने लगा कि गुरू तुम रतन के लिये फील्डिंग कर रहे हो।।
   बस हम भी मजे ले रहे थे,,पर एक बात थी रतन वाकई खरा सोना निकला ,हमसे झूठ नही बोल पाया और आखिर सब कुछ हमे सच सच बता दिया और बस हमारा दिल जीत लिया।।
   जिस दिन तुम्हारे ये पण्टर दूल्हे को अगवा करने गये उसके पहले ही उसको हमारे अनुचर लेकर निकल गये,,दूल्हा एक नम्बर का बेवडा था,बस उसे इतनी पिलाई की वो दूसरे दिन सुबह 11तक सोता ही रहा,उसकी हालत सगाई के लिये अवस्थियों के घर आने की थी ही नही,बस शर्मिंदगी से उसके बाप ने बाऊजी को तिथी टालने का फ़ोन घुमा दिया।।
    मौके का फायदा उठा कर हमने बाऊजी और चाचा को रतन के उजले पक्ष से परिचित करा दिया,हालांकी जात पात तो उनके अन्दर इतना घुसी है कि उसकी जड़ें खोदना मुश्किल था पर चाचा ने हमें उबार लिया,,सबसे पहले चाचा ही तैयार हुए अपनी पिंकी के आई ए एस दूल्हे के लिये।।
    फिर चाचा और हमने बाऊजी को हाथ पैर जोड़ कर मना ही लिया,बस एक छोटी सी शर्त बाऊ जी ने तब भी रख दी कि शादी के कार्ड मे रतन अपना सरनेम नही डालेगा,अभी तो हमनें हाँ कर दिया,,फिर देखते हैं क्योंकि अभी तो सगाई के बाद दोनो को ट्रेनिंग के लिये निकलना है,,बाद की बाद में देखेंगे।।

राजा की खुशी का ठिकाना नही रहा,पर वहीं उसे अपनी बेवकूफी पे झेंप भी लगी ,वो अपने बडे भाई के पैरों में झुक गया,युवराज ने उसे उठा कर अपने सीने से लगा लिया।।

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   मनभावन समय में उचित मुहूर्त में सगाई हसीं खुशी के माहौल में संपन्न हो गई ।।।

क्रमशः

aparna..

शादी.कॉम -9

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  …………..

     बांसुरी के प्लान के मुताबिक राजा ने प्रेम के घर पे और बांसुरी ने निरमा के घर पे जाकर बात की,पर उम्म्मीद के विपरीत दोनों ही घर की अम्मा लोंगो ने और बड़ी बड़ी कसमें किरिया उठा ली कि,”हमरे जीते जी ई ब्याह ना हो सकब,हमरी ठठरी उठ जाये के बाद अपन अपन मर्ज़ी से निबटा लो जो करना धरना है,एक बार सादी हुई जाये फिर आटे दाल का भाव पता चल जई ।।”

    निरमा के घर से बाहर निकलने पे पूरी तरह से रोक लगा दिया गया,अब बेचारी कॉलेज भी जाती तो उसका एक नकारा मामा उसे लेने और छोड़ने जाता और बेचारी जब तक कॉलेज में रहती वो गेट के बाहर की गुमटी में अपना अड्डा जमाये रहता, उसके इस मामा के पास कोई विशेष कार्य भी नही था,जुआ खेल खेल के अपने बाप को पैसों को स्वाहा कर रहा था,जब उसके बाप यानी निरमा के नाना को इस बात का पता चला तो लात घुन्सों से अच्छी तरह आरती उतार कर उसे घर से निकाल दिया ,और वो अपने में झूमता बीड़ी पीता अपनी जिज्जी के घर आ गया,जिज्जी ने रो धोकर जीजा को उसके यहाँ रहने के लिये मना लिया,तब से मामा जी का निवास यही था,अपने जीजा को भरोसे में लेने के लिये आये दिन कोई ना कोई जुगाड भिड़ाता फिरता और आखिर वो मौका मिल ही गया ,जब बांसुरी ने निरमा की प्रेम कहानी के बारे में उसकी अम्मा को बताया तब सबसे ज्यादा उछल उछल कर घर की बदनामी की फिकर करने वाले मामा ने अपनी बडी बहन को भड़का भड़का कर भांजी का कॉलेज बन्द करा दिया,,बाद में चुपके से भांजी से पैसे वसूल कर उसे कॉलेज जाने की अनुमती दिला दी और जिज्जी से भांजी को रोज कॉलेज छोड़ने लाने के बदले मेहनताना वसूला जाने लगा।।

  इस पूरे प्रकरण को लगभग 40-45दिन बीत गये,बंसी का जिम यथावत चलता रहा ।।
     कि तभी एक दिन सुबह जिम के समय पर अचानक पिंकी फिर जिम पहुंच गई ___

    “प्रिंस !!! भैय्या जी कहाँ है?? जल्दी बुलाओ!!”

   “भैय्या जी तो प्रोटीन पाउडर खरीदने गये हैं,दीदी आप ऑफिस में बैठिए भैय्या जी आते ही होंगे।।”

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  पिंकी ऑफिस पहुंची तो अन्दर बाँसुरी बैठी कुछ लिख रही थी,पूरी तन्मयता से__
     “क्या लिख रही हो बंसी?? इतना खो कर??”

  “अरे दीदी आप !! आप कब आई? ? मैं राजा के लिये कठिन सवालों को अलग छान्ट कर उनके जवाब तैय्यार कर रही हूं,बस ये याद कर लेने से पेपर पास करने में दिक्कत नही होगी।।”

“Very good बंसी!!! तुम पहले से थोड़ी दुबली भी लग रही हो,कुछ वजन तो कम हो ही गया है तुम्हारा।”

” हाँ लगभग साढे तीन से चार किलो कम कर लिया है इन्होनें ।।”राजा ने दरवाजा खोल ऑफिस में प्रवेश करते हुए जवाब दिया,

  बांसुरी ने पलट के राजा को सवालिया नजरों से देखा “पर हमने तो नापा ही नही,तुम्हें कैसे पता चला।।

“भैय्या जी की आंखो मे एक्स रे मशीन फिट है,किस लड़की का कितना वजन बढा कितना घटा सिर्फ देख कर ही बता लेते हैं भैय्या जी”प्रिंस अनजाने में कुछ भी मूर्खता पूर्ण अतिशयोक्ति कर जाता था

“अबे बौरा गये हो का बे!! कुछो भी बकते हो! पिंकी तुम अभी कैसे यहाँ आई,,घर में सब ठीक है ना??”

“कहाँ ठीक है भैय्या!!! वही तो बताने आये हैं,अभी सबेरे भाभी के पापा का फ़ोन आया था,वो लोग हमारी सगाई की तारीख पक्की कर दिये हैं,आज से ठीक पन्द्रह दिन बाद हमारी सगाई है,,,और आप अभी तक बड़े भैय्या से भी बात नही कर पाये।।”

“अरे ई तो नया काण्ड हुई गया!! तुम तो जानती हो पहले ऊ प्रेम के चक्कर में बिज़ी रहे उसके बाद ई जिम का सामान खरीदने दिल्ली चले गये इसी सब में बड़का भैय्या से बात करना रह गया ,अब रुको आजे कुछ जुगाड़ जमाते हैं भैय्या से बात करने का।”

“हम बताएँ राजा ,ऐसा करो ,कोरा बात करने से अच्छा ये है कि किसी तरह भैय्या से रतन की मुलाकात करवा दो,,मुलाकात ऐसी की भैय्या खुद प्रभावित हो जायें,और उसके बाद का प्लान हम बाद मे बताएँगे ।।”

बांसुरी के ऐसा बोलते ही राजा ने सवाल किया

“अब ऐसी कैसी मुलाकात करायें की भैय्या परभावित होई जाये,तुमही आइडिया देई दो।।”

“देखो सुनने में थोड़ा फिल्मी लगता है ,पर काम का  आइडिया है…… अभी बांसुरी बोल ही रही थी कि बीच में प्रेम कूद पड़ा

“भगवान बचाये भैय्या जी इ मुटकि के आइडिया से,हमरे लिये ऐसन खतरू आइडिया दी कि निरमा के दरसन भी दुरलभ हो गये,पहले कम से कम मिल जुल तो पाते थे,अब तो साला घर के अन्दर अम्मा ताने मार मार के जीना मुहाल की है और बाहर ऊ कनफड़े के गुंडे हमार रस्ता ताकते हैं कि कब हम उनके हाथ लगे औ ऊ हमार हड्डी मांस नोच नोच खा जायें  ।।

“प्रेम तुम चुप रहो!! इस बार हमारा आइडिया फेल नही होगा,,तुम्हारा और निरमा का भी ब्याह करायेंगे भाई चिंता ना करो।।”

“अरे काहे ना करे चिंता!! जिसके पास तुम जैसा दोस्त हो जो घरफुक्का राय दे बात बात पे, उसको चिंता छोड़ डायरेक्ट चिता मा चढ़ जाना चाही।।”

“कन्ट्रोल करो यार प्रेम !! तुम्हारा समय आयेगा ,तुम्हारा भी ब्याह हो जायेगा यार अभी बांसुरी का आइडिया सुनो!! हाँ बोलो बांसुरी तुम का बोल रही थी,कुछ फिल्मी उल्मी सा!!”

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” हाँ सुनो!! भैय्या जब अपनी गैस एजेन्सी में बैठे होंगे,,दोपहर को जब सब लंच के लिये जायेंगे और भैय्या अकेले होंगे उसी समय चेहरे पे नकाब बांध के दो नकाबपोश उन्हें लूटने जायेंगे,,सीधे जाकर उनकी कनपटी पे बन्दूक तान देंगे और तभी रतन आयेगा और उन दोनो से लड़ के भैय्या की जान बचा लेगा।।।और जब भैय्या उसको धन्यवाद देकर नाम पूछेंगे तब रतन अपना पूरा हिस्ट्री जॉग्रफ़ी उन्हें बता देगा बस अपना पूरा नाम नही बतायेगा,, बिल्कुल ऐसा माहौल जम जाना चाहिये की भैय्या को लगे काश ये लड़का पहले मिलता तो पिंकी की शादी इसीसे तय करते।।।

“बहुत फिल्मी है बंसी!! पता नही रतन मानेगा या नही।”पिंकी ने कहा

“धमल्लो जी ये भी बता दीजिये की ये गुंडे कहाँ से किराया मा लाने वाली है आप”प्रेम ने सवाल किया

“कही से लाने की का ज़रूरत,हमारे पास आलरेडी हैं गुंडे!! तुम और प्रिंस!!”

“पर बांसुरी तुमको लग रहा ये आइडिया काम करेगा??”भैय्या जी इतनी देर में पहली बार बोले

“भैय्या जी पगलाए गये हो का,ई मोटकी कुच्छो भी बकवास कर रही और आप इसका बात सुन रहे।”प्रेम बौखला गया

“हां तो तुम ही सूझा दो प्रेम बाबु कोई आइडिया है तुम्हरे दिमाग में,,देखो हमारा आइडिया फिल्मी है पर काम ज़रूर करेगा,,पिंकी दीदी रतन को आप मना लेना ,आज ठीक डेढ़ से 2बजे के बीच उसको एजेन्सी में भेज देना कैसे भी कर के,, आगे का सब राजा संभाल लेगा,।”

“हम कैसे बांसुरी??”

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राजा भैय्या के इस सवाल पर बाँसुरी ने उसे घूरा और __”यार हर बात तुम को समझानी पड़ती है,खाना लेकर तुम्ही जाते हो ना ,जब कभी ड्राईवर छुट्टी पर होता है,तो आज भी चले जाना और जब रतन और भैय्या जी की बात होने लगे तब तुम वहाँ पहुंच के ऐसी ऐक्टिंग करना जैसे रतन तुम्हे बड़ा पसंद आ गया ,,अब रतन वहाँ क्या करने जा रहा ,ये बताने की ज़रूरत तो नही है ना,फिर भी आप सबके लिये बता देते हैं,रतन वहाँ नया गैस कनेक्शन लेने जायेगा।।

“अब इसके आगे का प्लान भी सुन लो,राजा तुम अपनी तरफ से सिर्फ रतन की तारीफ करोगे पर पिंकी दीदी के लिये कुछ नही कहोगे उल्टा बढ़ चढ़ के सगाई की तैय्यारी मे लगे रहना, और रतन बड़के भैय्या से धीरे धीरे दोस्ती बढा लेगा।।
          जब सगाई को सिर्फ एक दिन बचेगा उस दिन तुम अपनी इस टोली के साथ चुपके से लड़के को किडनैप कर लेना,,जब सगाई के दिन भी लड़का अपने घर नही पहुंचेगा तो उसके घर वाले तुम्हारे घर फ़ोन करेंगे और माफी मांगेंगे ,तब तुम्हारे बाबूजी अपना सर पकड़ के बैठ जायेंगे क्योंकि सगाई के लिये हाल बुक हो गया है,सारे मेहमान आ गये हैं ,अब क्या किया जाये ,,तभी तुम बड़के भैय्या से कहना कि भैय्या आपका वो दोस्त जो अभी अभी आई ए एस का इंटरव्यू पास किया है उसिसे पिंकी की सगाई करा दो,,तब भैय्या बड़ी लाचारी से कहेंगे कि ऊ हमरे जात का नही है छोटे नही हम अभी इ सगाई कर देते ,लोग कहेंगे अपनी सगी बहन होती तो का ऐसे दुसरी जात में ब्याह देते तब पिंकी दीदी आयेगी और रोते हुए कहेगी भैय्या आपको जो सही लगे मैं करने को तैय्यार हूँ,आज जमाना इन्सान के काम से उसे पहचान रहा ना कि उसकी जात से,आपका दोस्त किसी भी जात का हो ,मैं तैय्यार हूँ,बस आपकी और बडे पापा की नाक नही कटनी चाहिये।।दीदी की ये बात सुनकर बड़के भैय्या खुश हो जायेंगे और जाकर आपके बाऊजी को मनाएंगे समझायेंगे और ये सगाई हो जायेगी।।”

“अरे वाह सुनने में तो अच्छा लग रहा है,पर क्या सच मे ये आइडिया काम करेगा??”

“अरे पिंकी तुमहू इसकी बतकही में आ गई,ये जैसन हमार कोल्हू पिराई है ना ,ऐसने तुम्हे भी पेर के मानेगी ,काहे इसकी बात सुनते हो यार तुम लोग।।”

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“प्रेम चुप रहो अम्मा कसम नही धर देंगे तुमको!! अबे सही लग रहा हमको ई आइडिया,क्यों पिंकी?? लगाओ जरा रतन गुरू को फ़ोन और समझाए बुझाये दो ,हम इन दोनो लामलेट को तैय्यार करते हैं ।
   इस पूरे प्लान में बिल्कुल अनिच्छा से प्रेम को भाग लेना ही पड़ा ,पर जाने क्यों अन्दर ही अन्दर उसे किसी अनिष्ट की आशंका कंपकंपा रही थी,,खैर राजा भैय्या की खातिर नकाब चेहरे पे बांध अपनी हीरो होंडा मे प्रिंस को पीछे बैठाए प्रेम निकला, निरमा की गली से निकलते हुए बड़ी हसरत भरी निगाहों से उसने छत की ओर देखा पर वहाँ खड़ी निरमा ने प्रेम को देख कर भी अनदेखा कर दिया__
               “देखा प्रिंस उस कजरौटी की ऐसी काली नज़र लगी है की हमरी निरमा भी हमारी तरफ देख नही रही।।”
           “अबे प्रेम तुम भी पूरे उल्लू हो यार!! पहला तो चेहरे पे गमछा बांधे हो,और दूसरा उसके ऊपर हेल्मेट चढाये हो ,गाड़ी का नम्बर प्लेट भी बदल दिये हो तो भाभी चिन्हेंगी भी कैसे बे??”
 
               प्लान के मुताबिक प्रिंस और प्रेम नकाब पहन कर युवराज के ऑफिस मे दाखिल हुए ,अभी उन्होनें गन निकाल के युवराज की तरफ मोड़ी ही थी की रतन वहाँ पहुंच गया__
               “आप बिल्कुल मत घबराइये ,मैं आपको बचा लूंगा ।”रतन की बात पूरी होने के पहले एक ज़ोर का चाँटा गन तानने वाले  प्रेम के चेहरे पे पड़ा _”अरे मर गया रे ,मार डाला रे मार डाला !!! “
  चिल्लाते हुए प्रेम अपना नकाब संभाले वहाँ से भागने को हुआ पर जाते जाते भी युवराज का ज़ोर का घूंसा उसकी और प्रिंस की पीठ पर पड़ ही गया, दोनों सर पे पैर रख कर वहाँ से भागे ।।।

  रतन घबराया सा कभी युवराज को कभी जान बचा कर भागते प्रेम और प्रिंस को देख रहा था,,जब दोनो आंखों से ओझल हो गये तब युवराज का दहाड़ना बन्द हुआ,तब तक वो उन दोनो को पानी पी पी कर गालियाँ देता रहा,अब उसने रतन की तरफ देखा !! तब तक रतन यही सोचता रहा कि उसे वहाँ खड़ा रहना चाहिये या भाग जाना चाहिये।।अभी रतन कुछ कहता उसके पहले ही युवराज ने उससे उसका परिचय जानना चाहा लेकिन तभी अचानक उसे तबीयत खराब सी लगने लगी,,सीने में उठने वाले दर्द और घबराहट से वो  दिवार का सहारा लेकर खड़ा हो गया,,युवराज का चेहरा पसीने से भीग गया और कलेक्टर साहब को “जी के “में पढ़े स्ट्रोक के सिम्पटम याद आ गये,,उसने फौरन युवराज को कुर्सी पर आराम से बैठाया और युवराज की बाई गरदन पर हलके हाथों से मसाज करते हुए उसे गहरी सांसे लेने के लिये कहने लगा और फिर धीरे से उसकी रीवोल्विंग चेयर को हल्के हाथों से खींचते हुए गाड़ी तक ले गया,,,युवराज को अपनी गाड़ी में बैठा वो तुरंत अस्पताल की ओर भागा।।


 
     जब रतन की स्विफ्ट एजेन्सी के गेट से निकल रही थी,उसी समय राजा भैय्या अपनी एक्स यू वी में अन्दर दाखिल हो रहे थे,रतन का भैय्या को गाड़ी मे ले कर कहीं जाना तो प्लान का हिस्सा था नही,उन्होनें अपने छोटे से दिमाग पर बहुत ज़ोर दिया पर उन्हें बांसुरी का बताया ऐसा कोई प्लान याद नही आया…..अभी राजा सोच में डूबा खड़ा था की कान्खते कराहते प्रिंस और प्रेम नकाब हटा कर वहाँ चले आये।।

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“हम कहे रहे ,,ई सनिचर हमरी जान की दुसमन है भैय्या जी!! हमको तो लगता है निरमा की अम्मा हमारी सुपारी दे रखी है ई बंसुरीया को,,जब देखो तब हमे मारे का प्लान बनाती रहती है।।आज तो बड़का भैय्या का हाथ से हमारा हत्या हो जाना था, ऊ तो सुबह सुबह चौकी के बजरंग बली का आसिर्वाद ले आये थे ,वर्ना अभी आप हमरी अर्थी सजाते होते।।

  प्रेम अपना दुखड़ा रो रहा था की भैय्या जी का फ़ोन बजा__’ जय हो जय हो शंकरा …..

“हेलो!! राजा बोल रहे हैं ।”

“राजा भैय्या हम रतन बोल रहे हैं,बडे भैय्या को हार्ट अटेक आया है,आप जल्दी से जल्दी सिटी हॉस्पिटल पहुंच जाइये,हम बस अभी पार्किंग मे गाड़ी डाल रहे हैं,,पहले चला रहे थे,इसलिए फ़ोन नही कर पाये,,,जल्दी आ जाईये आप !!”

“हे शिव शंकर ये क्या हो गया,चलो बैठो दोनो,अभी के अभी अस्पताल जाना है,भैय्या का तबीयत बिगड़ गया है,,,साला ई कलेक्टर उलेक्तर से रिस्ता जोडना भी रिस्की है,अब देखो ससुर गाड़ी चला रहा तो फ़ोन नई किया,हमको देरी से खबर मिली,,चलो यार प्रिंस कहाँ अटक गये तुम??”

“ऊ भैय्या जी घर मा फ़ोन करने लग गये थे।”

“किसके घर मे बे??”

“आपके औ किसके,आपकी अम्मा बाऊजी को बता रहे थे ,भैय्या को हार्ट फेल हुआ है।।”

“अबे तुम ना गधे हो एक नम्बर के,,का जरुरत रही अभी से अम्मा को बताने की ,अब ऊ वहाँ रो रो के जो रामायण गायेगी,,तुम्हरी ना ये हडबड़ी की आदत से बहुते परेसान हो गये हैं ।।”

हैरान परेशान राजा प्रिंस और प्रेम जब तक हॉस्पिटल पहुँचे तब तक में वहाँ रतन के फ़ोन से पिंकी और बांसुरी भी पहुंच चुके थे।।

   रतन ने उन्हें बताया की बड़े भैय्या को इमरजेन्सी में भर्ती करा दिया गया है,डॉक्टरों की टीम सारी जांच मे लगी हुई है,अभी किसी को भी अन्दर जाने की इजाज़त नही है।।राजा को बहुत ज्यादा परेशान देख बांसुरी उसके पास पानी की बोतल लिये आई__”पानी पी लो राजा!! और ज्यादा परेशान मत हो!! देखो भैय्या को समय पे अस्पताल तो ले आये ना ,तो अब कुछ भी बुरा तो होगा नही ।।और दुसरी बात तुम चिंता कर कर के अपनी तबीयत बिगाड़ लोगे,जबकि अभी यहाँ सारी भागदौड तुम्हें करनी है।।”अभी बांसुरी राजा से बात कर ही रही थी कि ओब्सर्वेशन रुम का दरवाजा खुला और एक जूनियर डॉक्टर बाहर निकल कर आई__

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  “आप में से युवराज अवस्थी के साथ कौन है”

   रतन पिंकी और राजा दौड़ पड़े “हम हैं ।”

“लिजिये ये कुछ दवाएं और इन्जेक्शन ले आईये , नीचे फार्मेसी है” उस लेडी डॉक्टर ने पर्ची रतन को पकड़ा दी और फिर राजा की तरफ बड़ी गहरी नजरों से देखने लगी__”सुनो तुम राजा हो ना !! राजकुमार अवस्थी!!”

  प्रेम और प्रिंस के साथ साथ पिंकी और बांसुरी की भी आंखे फट गई,ये इतनी सुन्दर डॉक्टरनी राजा को कैसे जानती है।।

“हां हम राजा ही है!! अरे !! तुम ,,तुम तो रानी हो ना ,,अरे यहाँ कैसे ,,और हमारे भैय्या कैसे हैं,पहले ऊ बताओ।।”

“तुम्हारे भैय्या बिल्कुल ठीक है,उन्हे हाइपर ऐसिडिटी हुई थी,,जलन कुछ ज्यादा बढ़ने के कारण और गर्मी से डिहाइड्रेशन से बेहोश हो गये थे,,अब वो ठीक हैं ।।

“का मतलब भैय्या को हार्ट उर्ट अटेक नई आया।”

राजा की बात पर डॉक्टर हँस पड़ी “नही कोई हार्ट अटैक नही आया,,उनका ई सी जी और बाकी सारे टेस्ट नॉर्मल आये हैं ,,घबराने की कोई बात नही है।।
   “तुम यहाँ कैसे रानी ?? तुम तो बाहर गांव चली गई रही पढ़ने”?? राजा के सवाल पर रानी मुस्कुरा दी।।
     “हां पढ़ाई पूरी हो गई,अभी हमे इंटर्नशिप करना था,तो हमने सोचा अपने शहर से ही किया जाये ,इसलिए हम यहीं आ गये।।और बताओ तुम क्या कर रहे अभी।।”
    रानी को देख पहले ही गुलाबी हो रहे राजा भैय्या उसके सवाल पे पूरे लाल हो गये,,अब उस डॉक्टरनी  के सामने क्या बोलते कि पांच साल में भी स्कूल का साथ नही छूटा ,बेचारे जवाब सोचने में व्यस्त हो गये।।

अभी वो दोनो बात कर ही रहे थे कि पूरा का पूरा अवस्थी खानदान वहाँ पहुंच गया,,रूपा और उसकी सास एक दूसरे से होड़ लगाती तार सप्तक में लयबद्धता के साथ रो रही थी,,पिंकी ने रूपा को और बांसुरी ने रूपा की सास को सम्भाला, सब कुछ बता देने पर भी दोनो में से कोई चुप होने को राज़ी ना था ,तब बाँसुरी ने धीरे से रूपा के कान मे कहा__

    “भाभी ,भैय्या एकदम ठीक है अब आप भी शान्त हो जाइये,वैसे भी रोने से आपका काजल फैल के पूरा चेहरा को काला काला कर दिया है,, आप तो हमसे भी अधिक कलूटी लग रही है।।”

   रूपा काली और भयानक दिखने के डर से एकदम से चुप हो गई,और उसकी हालत देख उसकी सास को हँसी आ गई,और वो भी अपना रोना भूल गई ।।
       कुछ देर पहले के चिंता के बादल छंट गये और शीतल मन्द समीर बहने लगी,,डॉक्टर ने बाहर आकर सबको मरीज से मिलने की इजाज़त दे दी।।

राधेश्याम जी युवराज के पैरों की तरफ बैठे और माताजी बेटे के सिरहाने बैठी,धीरे धीरे सर सहलाने लगी__”ये सब हुआ कैसे युव ?? पर अच्छा हुआ तुम समय पे अस्पताल पहुंच गये,अरे पर तुम यहां पहुँचे कैसे ,,मतलब राजा तो हमसे कुछ मिनट पहले ही यहाँ पहुंचा था ना,तो तुम्हे यहाँ लेकर कौन आया??”

“जी बाबूजी !! एक लड़का आया था एजेन्सी में शायद कनेक्शन के लिये आया होगा,वही हमारी तबीयत बिगड़ते देखा तो फौरन अपनी गाड़ी में हमे डाल यहाँ ले आया,,हो सकता है बाहर हो,देखो तो राजा कोई दुबला पतला सा लड़का खड़ा है क्या बाहर,बुला लाओ भीतर,आँख पे चश्मा लगा था,पढा लिखा टाईप का दिख रहा था।।”

अभी युवराज ने अपनी बात पूरी भी नही की थी कि डॉक्टर रानी ने कहा__पढा लिखा टाईप का दिख नही रहा था,वो बहुत पढा लिखा है,,जी आपको अस्पताल लेकर आने वाला कोई और नही अभी अभी आई ए एस का इंटरव्यू अच्छी रैंक से पास करने वाले भावी कलेक्टर रत्नप्रकाश हैं,आप लोग मिल कर जल्दी से धन्यवाद दे दीजिये वर्ना आपके धन्यवाद देने के पहले ही कही मसूरी ना उड़ जाएँ ।।””

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तब तक राजा रतन को अन्दर लेकर आ गया ,, राधेश्याम ने उठ कर रतन के दोनो हाथ पकड़ लिये __”बेटा कैसे धन्यवाद कहूँ आपको ,,आपने जो किया है उसके लिये धन्यवाद बहुत छोटा शब्द है,,वैसे बेटा कौन गांव के हो ,,किसके घर के हो,,हियाँ तो हम लगभग सभी को भले से जानते हैं ।।”

“अंकल जी धन्यवाद की ज़रूरत नही है,,ये तो मेरा फर्ज था,मै नही होता तो कोई और होता जो इन्हें सही समय पर अस्पताल ले आता।।””

“नही दोस्त !! तुमने वाकई बहुत उपकार किया,,कुछ समय के लिये मुझे भी लगा की मुझे हार्ट अटैक आ गया है,,अच्छा डॉक्टरनी साहिबा कह रही थी ,,तुमने आई ए एस निकाल लिया है, ये तो बहुत खुशी की बात है,ये हमारी छोटी बहन है पिंकी!!! इसका भी इंटरव्यू में हो गया है सेलेक्शन !!अच्छा है हम लोग भी सोच में थे इतनी दूर मसूरी अकेले कैसे भेजेंगे ,अब कम से कम कोई जान पहचान का तो रहेगा।।”

  युवराज के ऐसा बोल के चुप होते ही राजा जो अब तक सबसे पीछे चुपचाप खड़ा था ने अचानक अपना मुहँ खोला__” रतन गुरू !! तुम्हें तो ट्रेनिन्ग में जाने मे अभी टाईम है ना।””

“बस पन्द्रह दिन में जाना है मसूरी।।”

“हां तो हमारी बहन की सगाई तक रुक जाओ गुरू,,उसके बाद चले जाना।।”राजा की इस बात का वहाँ सभी ने समर्थन किया,कुछ देर युवराज के साथ बैठ कर घर के लोग वापस चले गये,,जब कमरे में अकेले युवराज और राजा थे,राजा बडे भैय्या के लिये जूस लेकर आया __”राजा पता है हम हमेशा से एक बात सोचते थे”

“क्या भैय्या??”

“हमे ना हमेशा से पिंकी के लिये ऐसे ही लड़के की तलाश थी।।”

“कैसे लड़के की भैय्या??”

“अरे रतन जैसे लड़के की यार!! कितना सोच सोच के बात करता है,,हर शब्द नाप तौल के बोलता है, बिल्कुल सुलझा हुआ समझदार सा लड़का है,,हमारी पिंकी के जैसा ,है ना राजा !!! और देखो पिंकी जैसे ही प्रशासनिक सेवा में भी जा रहा है!! कितना ही अच्छा होता अगर ये लड़का पहले मिल गया होता ,,है ना??”

“तो अभी भी का बिगाड़ होई भईया,,अगर आप चाहो तो सब कर सकते हो,””

“अरे कैसी बात कर रहे हो राजा !! अब तो शादी तय हो गई है पिंकी की ,अब कुछो नई हो सकता भाई।।
वर्ना हमारा ससुर हमारा गला पकड़ लेगा।।”

  दोनो भाई साथ साथ हंसने लगे।।।

  क्रमशः


 
aparna..

शादी.कॉम -8

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    हनुमान गली का गुड्डा असल में गुड्डा नही गुण्डा था,एक नम्बर का मवाली और नकारा गुड्डा अपने मोहल्ले ही नही सारे शहर का सर दर्द था।।
  मोहल्ले में घूम घूम के दुकानदारों को सताना और चिढ़ाना उसका प्रिय शगल था।।
     “काका कचौरी वाले” की दुकान हो या चौरसिया का पान ठेला सभी जगह उसकी उधारी की किताब के पन्ने भरते चले जा रहे थे,और वो ऐसे ताव से सब जगह से वसूली करता फिरता जैसे फ़्री में खाने का उसने लाइसेंस ले रखा हो।।
    उसके ताऊ हवलदार थे,जिनके नाम का डर दिखा कर वो हर किसी पर अपना रौब मारता था। एक बार ऐसे ही मंदिर के बाहर किसी बुज़ुर्ग से गलती से लगी ठोकर के बदले जब गुड्डा ने उस बुज़ुर्ग का गला पकड़ लिया और उन्हें एक पर एक बड़ी बड़ी गालियों से नवाजने लगा तभी जाने कहाँ से हवा में लहराता एक थप्पड़ आया और उसकी कनपटी को झनझनाते हुए निकल गया।।।
      दस सेकंड के लिये उसके कान में सिर्फ मख्खी भिनभिनाने की आवाज़ होती रही,अपनी आंखों को अच्छे से झटक के उसने नेत्र गोलकों को सही जगह टिका कर चेहरे को उस ओर घुमाया जहां से थप्पड़ पड़ा था,सामने ब्लू जीन्स और ब्लैक टी शर्ट में राजा भैय्या खड़े थे।।
            दायें हाथ के मणिबंध में रुद्राक्ष की माला लपेटे,माथे पर अगुरू चंदन का तिलक लगाये, आंखों पे गुची का चश्मा लगाये भैय्या जी बिल्कुल महादेव शिव शंकर का मॉर्डन अवतार लग रहे थे।।
   
    उन्हें देख कुछ 2 सेकंड के लिये गुड्डा  अपने थप्पड़ की तिलमिलाहट भूल कर उन्हें प्रनाम करने ही वाला था कि उसे याद आ गया कि इन्हीं चौड़े तगड़े हाथों ने कुछ समय पहले उसके चौखटे का भूगोल बिगाड़ने की कोशिश की थी।।
      तैश में आकर उसने उन्हें मारने को अपना हाथ उठाया जिसे बड़ी आसानी से अपने बाएं हाथ से ही पकड़ कर भैय्या जी ने मरोड़ कर रख दिया।।।
     दोनों तरफ की सेना मुहँ बाये ये सीन देख रही थी,जो बिल्कुल किसी पुरानी फिल्म की याद दिलाता सा लग रहा था,जिसमें सुनील दत्त ने आशा पारेख का हाथ मरोड़ दिया और वो बेचारी छटपटाते हुए गीत गा रही”मैं तुझसे मिलने आई मन्दिर जाने के बहाने”।।

   इस पहली मुलाकात के बाद गुड्डा ,भैय्या जी से खार खा बैठा।।।अब वो कोई ऐसा मौका  छोड़ना नही चाहता था जहां भैय्या जी की  नेकनामी को बदनामी में बदल सके पर ईश्वर इच्छा बलवती, आज तक उसे ऐसा कोई सुनहरा मौका नही मिला था।।
      परसों शाम जब बनवारी की टपरी पे बैठा अपनी पच्चीसवी मुफ्त की चाय गटक रहा था तभी उसका चेला भागा भागा आया,और उसे अपने मोहल्ले की निरमा और प्रेम को साथ  साथ देखे जाने की खबर दे दी।।
    गुड्डा का मन बल्लियों उछलने लगा ,पर उस वक्त शाम हो चुकी थी,इसलिए मन मार के अगली सुबह का इन्तजार किया,और अगले दिन सुबह उठते ही भैय्या जी के जिम पहुंच गया,,हालांकी वहाँ भी उसे निराशा ही हाथ लगी,क्योंकि प्रिंस ने बड़ी ढिठाई से उसे बोल दिया”भैय्या जी नई हैं,कल आना।।”

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“अबे साले हम भिकारी है का बे!! जो बोल रहे कल आना,,जाके अपना भैय्या जी को बोल देना ,अगर हमरे मोहल्ला की लड़की की तरफ आँख उठा कर देखा तो हम सीधा सरिया आँखी में घुसा देंगे।।समझे!”

इतनी मोटी धमकी जिसके मूर्तरूप में परिणत होने के कोई आसार नही थे,दे कर अपना सीना चौड़ा किये गुड्डा वहाँ से निकल गया,प्रेम की तलाश में!!

    प्रेम का मिलना असम्भव था!!!वो यहाँ जिम मे छिपा बैठा था,जो राजा भैय्या के हत्थे चढ़ चुका था।।

“अबे इधर आओ बे!! का गदर मचा रक्खे हो !! जिसे देखो साला हमे धमकाने चला आ रहा है तुम्हरे कारन !! का है गुरू?? इसक उसक में पड़ गये हो हम सुने!! कौन है भाई ,कुच्छो बताओगे।।”

  प्रेम जो अब तक चुपचाप जिम के बाथरूम में गुड्डा के डर से दुबका बैठा था,उसे राजा भैय्या की बड़ी बड़ी आंखे देख एक बार फिर से प्रेशर आ गया,वो वापस पेट पकड़ कर बाथरूम जा ही रहा था कि भैय्या जी ने पीछे से कन्धे पर हाथ रख उसे रोक दिया__”अब साले जो आ रहा है तुमको ,यहीं करो!! पर पहले बताओ का माजरा है ई ,वर्ना ऐसा धोबी पछाड़ लगायेंगे ना कि सीधा देवरिया जा कर गिरोगे अपन मामा घर!! समझे।।”

“भैय्या जी दुई मिनट दे दो ,बस हल्का होके आके सब बतातें हैं ।।”

  प्रेम जैसे ही वापस लौटा जिम में 4जोड़ी आँखो को खुद को घूरता पाया।।

*********************

  प्रेम ने जवानी में कदम रखते ही अपने नाम को बड़ा सीरियसली लेना शुरु कर दिया था,पुराना दिलजला था,और ऐसा दिलजला था की छांछ से भी मुहँ जलाता फिरता था।।

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   पण्डित रामसनेही दुबे डिग्री कॉलेज में पहुंचते ही जैसे प्रेम के अरमानों को पंख लग गये थे,जो लड़की सामने दिख जाती ,वही दिल को भा जाती,और पूरा दिन प्रेम उसके सपनों में काट देता।।
   फिर एक दिन जब प्रेम अपनी हीरो हौंडा को कॉलेज की पार्किंग में खड़ा कर “कमला पसंद” को निगलने ही जा रहा था,कि अचानक उसकी गाड़ी से किसी की टक्कर हुई और उसकी बाईक आगे वाली और आगे वाली उसके भी आगे वाली बाईक को लेकर गिरती चली गई,गुस्से में गाली देने ही वाला था कि मिसरी जैसी आवाज़ कान मे घुल गई_
     “सॉरी हम जान बूझ के नई गिराये।।”

  पलट के देखा तो देखता ही रह गया,वो और भी कुछ कुछ बोलती रही पर प्रेम के कानों में एक ही गाना सुनाई देता रहा_ एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा ……
     “जैसे खिलता गुलाब,जैसे शायर का ख्वाब
       जैसे उजली किरण,जैसे बन मे हिरण
        जैसे चांदनी रात जैसे नरमी की बात
         जैसे मन्दिर में हो एक जलता दिया !!!!

   जब तक गाने का प्रथम अन्तरा समाप्त हुआ, लड़की जा चुकी थी,परन्तु प्रेम को अपना पहला प्यार मिल गया था।।
     अगले दिन सारी खोज बीन कर ली,राजकीय कन्या इंटर कॉलेज से आई सकीना डिग्री कॉलेज में बी ए फाइनल इयर की छात्रा थी।।
 
“साला आधा साल खराब कर दिये इस कॉलेज में,आज तक हमारा नजरे नई पड़ा,और जब पड़ा तो सीधा प्यारे होई गया।।”प्रेम की इस बात पे नन्हे ने चुटकी ली

“तो परपोस करे दो फिर बेलेन्टाईन आने में तो अभी समय है।।”

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“अरे नई कर सकते भैय्या,हमार महतारी नई मानब!! सकीना की जगह सुसीला ,सीला,कबिता उबिता होती तो अलगे बात होता,,छोड़ो हटाओ।।”
  इस प्रकार प्रेम का पहला प्यार उसके सीने में दफन हो गया,अभी वो देसी दारु और चना चटपटी के साथ अपने गम को अच्छे से भुला भी नही पाया था कि ,उसके जीवन में फिर से एक बार प्यार ने दस्तक दी।।

  अबकी बार दस्तक उसके दरवाजे पे हुई,उसिने दरवाजा खोला__ “नमस्ते!! हम ई पड़ोस वाले घर में आये हैं,कल ही शिफ्ट हुए हैं,थोड़ी चीनी मिलेगी,हमें चाय बनानी है।।”

अभी बातचीत चल ही रहा था,कि अम्मा बाहर निकल आई __”अरे चीनी भी ले जाना,पहले बैठो और चाय पी लो”।

   प्रेम का दूसरा प्रेम अम्मा के संग चाय पीते बतियाता रहा पर प्रेम को कुछ और ही सुनाई दे रहा था__  “एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा………..
          जैसे सुबह का रूप,जैसे सर्दी की धूप।
          जैसे वीणा की तान जैसे रंगो की जान
           जैसे बल्खाये बेल जैसे लहरों का खेल
           जैसे खुशबू लिये आई ठंडी हवा।।।

जब तक दूसरा अन्तरा समाप्त हुआ ये लड़की भी जा चुकी थी,पर बेचारी चीनी लेने आई और भूल कर चली गई,उसके जाने के बाद अम्मा ने प्रेम को कटोरी पकड़ा दी कि नये पड़ोसी को चीनी दे आये।

   मुहँ धो के मर्दों की गोरेपन वाली क्रीम लगा कर बालों को भीगा कर अच्छे से ज़ुलफे संवार कर ,खूब पर्फ्यूम डियो डाल कर पूरी तैय्यारी से प्रेम शक्कर की कटोरी लिये चला।।
 
  “अरे का हमरी पतोहू लेने जाई रहे हो जो अतका सज धज मचा दिये,जल्दी जल्दी आओ,हिया सिलिंडर मरा खतम हुई गवा है,ई टाँकी को अपना फटफटी मा पीछे रख के बदला लाओ।।”

  प्रेम तो खुद मे खोया सा था,अम्मा की इतनी गैर-जरूरी बातें सुनने का उसके पास वक्त ही नही था।।पड़ोस के दरवाजे पे बिल्कुल जेंटलमैन स्टायल में खड़े होकर उसने बेल बजाया,दरवाजा खुला और
ये तो कोई उसकी ही उमर का लड़का खड़ा था_

“जी कहिये!! किससे मिलना है??”

“जी वो !! हमको लग रा हम गलत घर मा आ गये,वो थोड़ी देर पहले सक्कर मांगने…….प्रेम की बात पूरी भी नही हुई कि अन्दर से वही रूपसी जो सुबह चिनी माँगने गई थी ,बाहर आई__
     “बेबी !! ये हमारे पड़ोसी हैं,मै अभी इन्ही के घर से चाय पीकर आ रही हूँ,देखो आंटी जी इस सो स्वीट ,मै भूल गई तो उन्होनें खुद चीनी भेज दी।
  आप अन्दर आईये ना भैय्या!! इनसे मिलिये ये मेरे पति है अतुल शर्मा,और मै आभा।।”

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अच्छा हुआ दिल टूटने की आवाज़ नही होती वर्ना उस नाज़नीँ के मुहँ से भैय्या सुन के प्रेम का दिल जो चाक हुआ था कि बेचारा चीनी उन्हें बमुश्किल थमा भागा वहाँ से।।

  बेचारा प्रेम !!! माँ ने सलमान सोच कर नाम रखा पर किस्मत प्रेम चोपड़ा वाली हो गई ।।एक तो फष्ट इयरे मा लटक गये उसपे लडकियों का सनिचर !!
     इसिलिए जब अम्मा बोली चलो सनी देब  के मन्दिर मा मन्नत का तेल ऊल चढ़ा आये तो प्रेम तुरंते मान गया।।

    सनी देब में तेल चढ़ाया ,सत्ती गुड़ी में रोट चढ़ाया,बस वहीं माता का चमत्कार भवा!!!
   
    रोट चढ़ा के प्रेम मन्दिर की सीढिय़ां उतर अपनी चप्पल ढूँढ ही रहा था कि एक  नाज़ुक नवेली की साईकल की चेन उतर गई ,,अब किसी लड़की को  इतना बड़ा प्राब्लम हो और प्रेम अपनी चप्पल ढूँढता रहे शोभा देता है क्या?? बेचारा नंगे पैर गर्म तवे से जलते रोड पे खड़ा होकर चेन बनाता रहा,और लड़की अपनी गुलाबी चुन्नी से अपना आप को हवा झलती रही!! दो मिनट में चढ़ने वाली चेन भी उस दिन पूरा इक्कीस मिनट में चढ़ी,खैर चेन चढ़ा कर प्रेम ने नजरें ऊपर उठाई,लड़की ने प्रेम को देखा ,प्रेम ने लड़की को देखा ,और पहली बार दोनो दिलों में एक साथ घंटी बजी!!!

     पर ना ये घंटी जो दोनो को संग संग सुनाई दी ये सत्ती माता की आरती की घंटी थी,पर दोनो के हृदय ने एक दूसरे को चीन्ह लिया,,निरमा ने धीमे से कहा-” थैंक यू ….. अबकी बार प्रेम को अन्तिम अन्तरा सुनाई दिया जो सार्थक हो गया__
     “एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा ….
          जैसे नाचता मोर,जैसे रेशम की डोर
          जैसे परियों का राग,जैसे संदल की आग
          जैसे सोलह सिंगार जैसे रस की फुहार
          जैसे आहिस्ता आहिस्ता चढता नशा ।।

    अभी निरमा का नशा प्रेम पे चढ़ने ही वाला था कि बाँसुरी अपनी साईकल हाथ से खींचती चली आई__”तुम यहाँ कहाँ अटक गई,क्या हो गया निरमा??”

“हमारी साईकल का चेन उतर गया था,इन्होने ठीक किया।।”

“तो अब तो ठीक हो गया ना चेन,,अब चलो ,देर हो रही कॉलेज को।।”

  निरमा बाँसुरी के साथ चली गई और छोड़ गई प्रेम के दिल पे अपनी छाप!!!

   ये प्रेमप्रताप पाण्डेय की सम्पूर्ण जीवन गाथा थी जिसमें से सुविधानुसार प्रेम ने अन्तिम अंतरे वाली लड़की वाला अपना किस्सा वहाँ मौजूद सभी को कह सुनाया।।।
               सदियों से होता आ रहा कि किस्से कहानियाँ हम कानों से सुनते हैं लेकिन जाने क्यों हमारी आंखें फैल जाती हैं सुनते हुए,,वहाँ मौजूद सभी के साथ वही हुआ।

“अब करना क्या है गुरू?? सादी वादी का विचार है की नही।”प्रिंस के ऐसा पूछते ही प्रेम ने जवाब दिया

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“हैं काहे नही बे!! शादी तो निरमा से ही करना चाहतें हैं,पर हमारी अम्मा भी कसम खाये बैठीं हैं,कहती है ,वा वर्माइन हमार  बहुरिया ना बनी,, नही ता हम जहर खा ले और मर जाब, ,,अब बोलो का करें,भैय्या जी आप ही कुछ रस्ता सुझाओ।।अभी तक अम्मा से डरे बैठे थे,अब ई गुड्डा और आ गया चौधरी बन के,हम भी कोनो डरते नई हैं,हम तो साले के पनही न पनही लगाते पर आपका और जिम का लिहाज कर के चुप रह गये।।”

“तुम चुप नही रहे बल्कि छुप गये ,अब जादा बतियाओ ना ,नही  हम तुमको सही का पनही (चप्पल)धर देब।।लल्लन के ऐसा बोलते ही प्रिंस के बंमपिलाट दिमाग में एक खतरनाक आइडिया आया

  “हम तो कहते हैं,तुम निरमा को ले कर देवरिया निकल जाओ,हम फ़ोन पे तुम्हें यहाँ का सब खबर देते रहेंगे ,जब मामला ठंडा हो जायेगा तो सादी उदी कर के वापस आ जाना।।”प्रिंस की इस बात का जवाब दिया बांसुरी ने

“वाह ! प्रिंस जवाब नही क्या आइडिया दिये हो” अपनी तारीफ सुन प्रिंस चौड़ा हो गया,तब बांसुरी ने अपनी बात आगे बढ़ाई

“काहे तुम क्राईम पैट्रोल बिल्कुल ही नई देखते क्या?? अरे भागने वालों का फ़ोन नम्बर सबसे पहले ट्रैक करती है पुलीस,उसके बाद इन लोगो का गला पकड़ कर पुलीस लायेगी और दोनो के घर वालो के हवाले कर देगी,उसके बाद मुश्किल से एक महीना मे निरमा की शादी उसके समाज में हो जायेगी और प्रेम यहाँ जिम मे चदरिया झीनी रे झीनी सुनेगा,और हम सब को सुनाएगा।।”

राजा ने बांसुरी को देखा और पूछा__”फिर तुम ही बताओ का करना चाहिये।।”

  “हां हम बताते हैं एक नम्बर आइडिया देंगे जिसका फेल होने का चांस बस फिफ्ती परसेन्ट है।”और बांसुरी हंसने लगी__”सुनो राजा तुम जाओ प्रेम के घर और उसकी अम्मा से बात करो,और हम जायेंगी निरमा के घर उसकी अम्मा से बात करने।।एक बार दोनो घर के गृहमंत्री तैय्यार हो गये तो प्रधान मंत्री को मनाना आसान हो जायेगा।।”

  “लेकिन बंसी अगर हमारी अम्मा नई मानी तो,का करेंगे फिर।””निरमा ने पूछा

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“अगर ऐसा हुआ निरमा तो तुम फिर वही करना जो तुम्हरी अम्मा कहेंगी,क्योंकि एक बात याद रखो अपना अम्मा से ज्यादा तुमको कोई प्यार नही कर सकता ई प्रेम भी नही।।।अपनी जिद अपनी इच्छा अपने घर वालों को बताओ उन्हें मनाने की भी कोशिश करो पर जीने मरने की धमकी मत देना,,अगर प्रेम प्यार से मान गये तो अच्छा है नही तो तुम लोग उनकी बात मान जाना,उसी मे सब का भलाई है निरमा,,आज तुम भले हमारा बात ना समझो पर एक दिन हमारा बात तुम्हारा भेजा में घुस जायेगा।।”

  जिम में सन्नाटा छा गया ,तभी पिंकी ने आगे बढ़ कर बंसी को गले से लगा लिया___प्राउड ऑफ़ यू बंसी !! अब तुम और राजा भैय्या पहले इस प्रेम के प्रकरण को सुलझाओ फिर इसके बाद हमारे लिये काम करना है तुम दोनो को।।है ना।।”

“हां दीदी!!! बड़के भैय्या मान जायेंगे,और बस एक बार वो मान जाये फिर घर वाले भी ।।”दोनो सखियाँ एक साथ मुस्कुराने लगी

“राजा भैय्या अब हम घर जाते हैं,आप भी इस प्रेम का गणित बैठा के जल्दी से घर आ जाओ।।।”

जाते जाते पलट के पिंकी ने राजा को देखा और बोली__”अरे हाँ रेखा को भी फ़ोन कर लेना ,उसका फ़ोन आपने उठाया नही था।।और ज़ोर से खिल्खिलाती हुई पिंकी जिम से बाहर निकल गई ।।

प्रिंस और प्रेम शातिर मुस्कान के साथ भैय्या जी को देखने लगे वहीं लल्लन मन ही मन सोच मे पड़ गया कि बताओ क्या किस्मत है राजा भैय्या की होने वाली दुल्हीन और हमारी गर्ल फ्रेंड का एक ही नाम है।।सोचते सोचते वो भी मुस्कुराते हुए प्रिंस और प्रेम के साथ भैय्या जी को छेड़ने मे लग गया कि तभी उसके फ़ोन की रिंग बजने लगी__

  “हाँ बेबी!! बोलो …..बोलते हुए लल्लन बाहर की ओर निकल लिया।।।

उसके पीछे से एक ज़ोर का ठहाका उसका पीछा करता चला आया।।।
 
  क्रमशः

aparna..

समिधा-27

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   समिधा- 27

    केदारनाथ त्रासदी को घटे सात महीने बीत चुके थे। जिन्होंने अपने अपनों को खोया था वो उस त्रासदी को इन सात महीनों में भी नही भूल पा रहे थे, यही हाल उनका भी था जिनके अपने इस त्रासदी से वापस लौट चुके थे।

        वरुण मंदिर ट्रस्ट में स्थायी सदस्यता पा चुका था। उसके माता पिता ने भी इस बार न उसे रोका न टोका,और सहर्ष सहमति दे दी। कादम्बरी के परिवार ने ज़रूर कुछ टोकाटाकी करने की कोशिश की लेकिन वरुण का परिवार वरुण के सामने दीवार बन खड़ा रहा, फिर अपना सा मुहँ लेकर उन्हें भी लौटना ही पड़ा।
    कोलकाता के मंदिर में दो महीने बिताने के बाद वरुण और दो चार अन्य सेवादारों को मथुरा राधाकृष्ण मंदिर भेज दिया गया था।

    मंदिर में सुबह सवेरे उठ कर सारे मंदिर परिसर में झाड़ू लगाने के बाद पानी का छिड़काव कर वरुण अपने दो साथी सेवादारों के साथ पोंछा लगाया करता।
     मंदिर की ही पुष्पवाटिका से चुन चुन कर लाये फूलों की फिर सारे लोग मिल कर लंबी सी माला गूंथते और द्वारिकाधीश का श्रृंगार होता।
      दोपहर बाद सभी एक साथ बैठे भजन गाया करते।
   इस सब के साथ ही सुबह और शाम का समय वेदाध्ययन के लिए भी निश्चित था।
   वरुण को ये सारे कार्य प्रिय थे। वह इन सभी कार्यों को करते हुए अपने मन को शांत रखने का पूरा प्रयास करता और उसे इन कुछ महीनों में इन कार्यों में एक सुख मिलने लगा था एक शांति मिलने लगी थी ऐसा लगने लगा था कि वह अपने कृष्ण के आसपास है और कृष्ण सिर्फ उसके ही नहीं हर किसी के आसपास हैं। और इसीलिए धीरे-धीरे वरुण की श्रद्धा इस बात पर बढ़ने लग गई थी कि जो जिसके साथ होता है वह सब कृष्ण का रचा रचाया है और इसीलिए उससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता ।
  वरुण की यही सोच उसे धीरे-धीरे शांति की तरफ ले जा रही थी, लेकिन बीच-बीच में कभी अचानक एक चेहरा उसकी खुली आंखों में झांकने चला आता। जैसे पूछ रहा हो…-” मेरा क्या कसूर था जो तुम्हारे कृष्ण ने मुझे ऐसी सजा दी ?” ऐसे समय में वरुण अपने विचारों को झटक कर कोई ना कोई किताब खोल कर पढ़ने बैठ जाया करता। लेकिन इन सारी व्यस्तताओं के बाद भी बार बार एक जोड़ी पनीली आंखें उसका पीछा करती सी लगती जैसे कह रहीं हो “वापस आ जाओ!”  उसे अक्सर यूँ लगता कि वो मन से यही सब करना चाहता तो है पर उसकी आत्मा इस सब में शामिल ही नही होना चाहती। 
सुबह और शाम के समय के अतिरिक्त रात में भी जब उसे समय मिलता वह मंदिर परिसर के कोने में बैठ अपनी किताब को पढ़ने में डूब जाया करता। वेदों का अध्ययन करते करते धीरे-धीरे उसे हिंदू धर्म की जटिलताएं समझ में आने लगी थी।
   आज तक जिन रीति-रिवाजों को मानने के लिए वह अपनी मां का मजाक उड़ाया करता था और रीति-रिवाजों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को देख पढ़ कर समझ कर उसके ज्ञान चक्षु भी खुलने लगे थे।
    मंदिर का पूरा कार्य एक ट्रस्ट के अधीन था वह ट्रस्ट पूरे भारतवर्ष ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कृष्ण मंदिर की स्थापना कर चुका था। मंदिरों में होने वाले आय-व्यय के साथ ही दानदाताओं को अधिक से अधिक दान के लिए प्रेरित करने के लिए भी मंदिर ट्रस्ट को पढ़े लिखे शिक्षित वर्ग की आवश्यकता थी और अगर वरुण जैसे युवा इस कार्य में उनका सहयोग करें तो मंदिर ट्रस्ट को लाभ ही लाभ था इसलिए वरुण की तरफ मठाधीशों का कुछ अधिक ही झुकाव था।

   मंदिर में अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग पद सृजित बहुत से सेवादार ऐसे थे जो स्वेच्छा से जीवन पर्यंत सिर्फ सेवादार ही बने रह जाते थे।लेकिन कुछ उनमें से ऐसे भी थे जो सेवादार से ऊपर के कुछ 1 पदों तक जाकर रुक जाए करते थे। लेकिन वरुण जैसे उच्च शिक्षित युवाओं को मंदिर ट्रस्ट द्वारा सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ाते हुए मंदिर के मठाधीश तक के पद तक पहुंचाए जाने की व्यवस्था थी। वैसे मंदिर में जाति धर्म या गरीबी अमीरी के नाम पर किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं था। सभी के लिए समान कार्य बांटे गए थे , और सभी को अपने हिस्से के कार्य करने ही होते थे। अंतर बस इतना होता था कि शिक्षित लोग जो विद्या अध्ययन करने में सक्षम थे उन्हें वेदों का अध्ययन करवा कर उनसे प्रवचन आदि दिलवाए जाने की व्यवस्था की जाती थी।
     पिछले कुछ समय में ही वरुण ने बहुत सारी किताबों का अध्ययन कर लिया था और जैसे-जैसे अध्ययन करता जा रहा था उसका दिमाग भी विस्तृत होता जा रहा था।
       मंदिर परिसर हर किसी के लिए खुला था लोग दर्शनों के लिए आते मंदिर में चढ़ावा चढ़ाते, और चले जाते। सब के जाने के बाद हफ्ते में एक दिन चढ़े हुए सारे चढ़ाव की गणना की जाती और उसके बाद उस धनराशि को मंदिर ट्रस्ट के पास भेज दिया जाता।
    ट्रस्ट से हर महीने एक निश्चित धनराशि मंदिर में रहने वालों के खाने पीने आदि के लिए भेज दी जाती। इन सब का हिसाब योगेंद्र जी रखा करते थे।

   मंदिर परिसर बहुत विशाल था। चारों तरफ फैली वृहत वाटिका के बीचो बीच स्थापित मंदिर में पीछे तरफ कमरे बने हुए थे जहां सेवादार और बाकी के मंदिर कर्मचारी रहा करते थे।
      उसी परिसर में एक और हटकर विधवा आश्रम बना हुआ था जहां वृद्ध युवा और बाल विधवाये रहा करती थी। आश्रम के कर्मचारियों तथा अन्य लोगों के लिए भोजन पकाने बर्तन साफ करने आदि की जिम्मेदारी इन्हीं महिलाओं की थी । महिलाओं की संख्या कम अधिक होती रहती थी। वैसे तो एक बार जिस महिला को उसके घर वाले इस आश्रम में छोड़ जाते उसका वापस अपने घर लौट पाना असंभव ही था। इसलिए अधिकतर समय उस आश्रम में महिलाओं की संख्या में वृद्धि ही हुआ करती थी, संख्या में कमी तभी आती थी जब उनमें से कोई देवलोक को चली जाया करती थी।
     उनका जीवन कठिन नहीं कठिनतम था। क्योंकि उनके जीवन में वेद अध्ययन को स्थान नहीं दिया गया था। उनमें से अधिकतर वृद्ध महिलाएं अपने आपको कृष्ण समर्पित कर चुकी थी । इसलिए उनका मन सिर्फ कृष्ण को समर्पित लोगों की सेवा से ही प्रसन्न हो जाता था। लेकिन कुछ युवा और बाल विधाएं भी थी जिन्हें अच्छा खाने और अच्छा पहनने का शौक हुआ करता था। लेकिन उस स्थान में जहां उन्हें पर्याप्त आहार भी ना मिल पाता हो,उनके शौक कौन पूछता और कौन पूरे करता?

    वह औरतें एक रटी रटाई दिनचर्या का पालन करती हुई बस जीवन जीती चली जा रही थी! जिसका ना कोई आदि था ना अंत। बहुत बार ऐसा लगता जैसे वह वहां रहते हुए बस अपनी सांसें गिन रही हैं, कि किस तरह उनकी सांसो की अवधि पूरी हो और वह स्वयं कृष्ण के लोक पहुंच जाएं। कुछ महिलाओं ने एक आध बार वहां से निकलने की भी कोशिश की, लेकिन बाहर भी उनके पास कोई और आश्रय नहीं था दो-चार दिन बाद लौट कर वापस ही आ गई थी।
        जैसे ज़िन्दगी कट रही हो बस…. बिना जीने की आरज़ू के।
   लेकिन वरुण इन बातों से अनजान था….
….. पर अब अधिक समय नही बचा था कि वो इन सारी अव्यवस्थाओं से अपरिचित रह पाता…

******

   
     देव को गए वक्त बीत चुका था। जब उसके जाने का पता चला था उस समय उसके परिवार द्वारा किये कर्मकांड में पारो की माँ और बाकी सदस्य आये और जाते वक्त पारो की माँ देव की माँ के चरणों में लोट गयी….-” गरीब की बेटी का कोई आसरा नही होता बऊ दी! पहले ही बिना बाप की थी अब माथे से पति का साया भी सरक गया। पता नही इतनी बदकिस्मत लड़की क्यों मेरे घर ही पैदा हुई। इससे तो पैदा होते ही मर जाती तो सही होता,लेकिन फिर ये बदकिस्मती कैसे देखती?
  आपके पांव पड़ती हूँ, इसका आसरा मत छीनना। यहीं कहीं किसी कोने में पड़ी रहेगी। घर की नौकरानी को भी तो दो वक्त का खाना दिया ही जाता है। उससे अधिक की अब इसे दरकार भी कहाँ रही? “

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   बोलते-बोलते जाने कितनी बार वो भरभरा के रो पड़ीं। इतने कठोर शब्द मुहँ से भी तो नही निकल पा रहे थे। कैसी मर्मान्तक पीड़ा के साथ अपनी ही बेटी के लिए नौकरानी जैसा अलंकार जोड़ना पड़ा। किस्मत लड़की से ज्यादा तो उनकी खराब थी। पहले पति का दुख सहा फिर लक्ष्मी सी बेटी का …
  … इतनी छोटी सी उम्र में ये रंगविहीन साड़ी ! ये देखने से पहले दुर्गा माँ उसे उठा लेती तो कितना अच्छा होता। कम से कम अपनी ही बेटी का ये रूप तो न देखना पड़ता।
    दिल में तो आ रहा था कि बेटी को सीने से लगाये अपने साथ ले जाये। कैसे भी कर के अपने पास रख लेगी लेकिन अभी तो वो अकेली अपनी ससुराल की गुलामी में टूट रही है फिर अपने साथ अपनी फूल सी बेटी को वैसे ही टूटते कैसे देख पाएंगी?
   दूसरी बात जब घर भर मछली भात खा रहा होगा उसकी लाड़ली को सिर्फ शाक खा कर संतोष करना पड़ेगा। पान की कितनी शौकीन थी,अब तो वो भी कहाँ खा पाएगी।
   ये सारा सब अपनी आंखों से देखना उसके लिए मृत्युतुल्य कष्ट सहने के बराबर था।
   इससे तो अपनी ससुराल में रह कर क्या कर रही क्या नही इन सब बातों से तो उन्हें फुर्सत रहेगी।
  वैसे उनके मन में एक छोटा सा लालच और भी तो था…..
   देव का छोटा भाई दर्शन पारो से एक दो साल ही तो बड़ा था। अगर पारो यहीं अपनी ससुराल में रह गयी तो हो सकता है घर वालों के मन में पारो का ब्याह दर्शन से कर देने का विचार जाग जाए। और अगर ऐसा हो गया तो इससे अच्छा पारो के लिए क्या होगा भला।
   इतने गहन दुख के बीच एक बहुत छोटी सी खुशी उनके मन को उद्भासित कर गयी ..
…..-“ऐसा क्यों कह रही हो बऊ माँ। नौकरानी सी क्यों रहेगी भला। देव के पीछे अब यही तो हमारी देव है। पारोमिता जैसी अब तक रहती आयी है वैसे ही रहेगी।”

   देव की ठाकुर माँ का स्वर उस कमरे में गूंज गया और फिर घर के किसी सदस्य की पारो को वहाँ से हटाने या निकालने की हिम्मत नही हुई।

*****

  दिन कट रहे थे सिर्फ पारो के ही नही बल्कि घर के अन्य सदस्यों के भी।
  पहले पहल किसी ने पारो से कुछ नही कहा। वो अपने कमरे में सारा सारा दिन चुपचाप पड़ी देव को याद कर ऑंसू बहाती रहती।
   कभी खिड़की पर घंटो खड़ी रह जाती। यूँ लगता जैसे उसी का इंतज़ार कर रही हो।
  उसे पता नही क्यों अंदर से यही लगता कि समय को चीरता देव उसके पास वापस चला जायेगा।
कभी अचानक ही उसका मन ये मानने से इनकार कर देता की देव नही रहा।
वो उसकी कमीज़ें धोती अपनी साड़ी के साथ सुखाती और आयरन कर अलमीरा में सजा देती। जूते भी रोज़ रोज़ साफ करती और जब देखती की पहनने वाला तो दूर दूर तक नज़र नही आ रहा तो बिलख उठती।
    अब उसका खाना उसकी सास उसकी जेठानी के हाथों उसके कमरे में ही भिजवा दिया करतीं। शायद उन्हें मन ही मन लगने लगा था कि उन सब सुहागिनों के बीच बैठ पारो अपनी रूखी थाली का निवाला कैसे ले पाएगी। लेकिन पारो की जेठानी से ये पक्षपात जाने क्यों सहन नही हुआ जा रहा था।।
  रोज़ रोज़ उसकी रूखी सूखी थाली ऊपर लेकर जाना उसके मन को मसले दे रहा था, आखिर एक दिन घर भर की औरतों की नज़र बचा कर उसने मछली के झोल भरी कटोरी पारो की थाली में रखी और दाल की कटोरी में घी भर अपने आँचल से ढाँक ऊपर ले चली।
  पारो की तो नही लेकिन उसकी खुद की सास ने देख कर उसे आधी सीढ़ियों पर ही टोक दिया। पारो उस समय छज्जे पर कपड़े सूखा रही थी। उसने भी बड़ी माँ की रुबावदार आवाज़ सुन ली और ऊपर से झांकने लगी…-” ए आनंदी! की होलो? पारो के लिए क्या माछ लेकर जा रही हो? “

आनन्दी सकपका गई। उसे नही लगा था कि उसकी चोरी ऐसे पकड़ी जाएगी। उसने बहुत धीमी आवाज़ में अपनी बात रखी…-” उसकी अभी उम्र ही क्या है माँ। इतनी छोटी सी उम्र में इतना कुछ झेल गयी , अब कम से कम ठीक से खा पी तो सके। यही तो खाने पहनने की उम्र…”

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  उसकी बात बीच में ही काट कर उसकी सास लगभग उस पर चीख पड़ी…-“अब तुम आज की लड़कियां हमें नियम बताओगी, उसकी उम्र क्या है ये हमे बताने की ज़रूरत नही है।तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है हमने। चुपचाप माछेर झोल उठा कर थाली से बाहर कर दो। “

” धीमे बोलिए मां ,वो सुन लेगी। अच्छा नही लगेगा।”

” तुम्हें नियम भंग करते हुए अच्छा लगा न तो अब मुझे कोई लेना देना नही की किसे बुरा लगेगा और किसे नही। जो सच्चाई है सो है। अगर भगवान को उस पर इतना ही तरस था दयादृष्टि थी तो उसके पति को ऐसे अकालमृत्यु नही मिलती.।

   आगे की पंक्तियों के साथ ही भावुकता में बड़ी माँ रोने लगी,क्योंकि बेटा भले ही देवरानी का था लेकिन प्रेम तो उन्हें भी उससे बहुत था। और देव की असमय मृत्यु का दुख अब पारो पर गुस्से और नाराज़गी के रूप में उतारना शुरू हो रहा था।

आनन्दी समझ गयी कि इस वक्त सास से लड़ने में कोई लाभ नही है। वो चुपचाप मछली की कटोरी हटा कर फिर थाली ऊपर ले गयी….
… धीरे से उसने पारो के कमरे के दरवाज़े को धक्का दिया,पारो पलंग पर सिर टिकाए ज़मीन पर बैठी थी।
” आओ पारो !खाना खा लो!”
 
  पारो ने ऑंसू भरी आंखों से अपनी जेठानी को देखा और फिर बाहर देखने लगी…-“मेरी प्यारी छोटी बहन कुछ तो खा लो। देखो ऐसे भूखा रहने से क्या होगा। बल्कि तुम ऐसे भूखी रहोगी तो देव बाबू की भी आत्मा तड़प उठेगी। वो कैसे सुख से रह पाएंगे भला। चलो खा लो चुपचाप। बड़ी माँ की बातों को दिल से न लगा लेना। वो सब अभी बहुत दुखी हैं। उबर नही पाएं हैं ना । तुम तो समझ सकती हो।”

पारो ने हाँ में सिर हिला दिया और नीचे देखती चुप बैठी रही।
आनन्दी को उसी वक्त नीचे से किसी ने आवाज़ दी और वो एक बार फिर पारो से खा लेने का इसरार करती बाहर चली गयी।
पारो का थाली देखने का भी जी नही किया…  उसने धीरे से थाली सरका दी जैसे थाली से नाराजगी हो कि तुम उस समय क्योँ सामने नही इठलाई जब देव बाबू साथ थे और अपने हाथो से अपनी प्रेयसी अपनी पत्नी को खिलाना चाहते थे। उस वक्त इसी थाली ने क्यों चुपके से उसके कान में  नही कहा कि खा ले पारो! फिर इतना प्रेम करने वाला जीवन में कोई नही आएगा। “

  देव के बारे में सोचते हुए वो फफक के रो पड़ी। वहीं उस गांव से कई किलोमीटर दूर मथुरा में स्वामी वरुण के सामने सेवादार थाली परोस कर रख गया, पर जाने अंदर से वरुण को कैसी बेचैनी ने घेरा की उसने उस थाली को धीरे से आगे सरका दिया…-” स्वामी ऐसा क्यों? क्या आज भोजन नही लेंगे।”

” मालूम नही केवल लेकिन आज बिल्कुल भी खाने का जी नही कर रहा। अंदर से ऐसा लग रहा जैसे हृदय में किसी बात की पीड़ा सी उबर रही है। यूँ लग रहा कोई बहुत करीबी दुख में है, अपार दुख में और मैं उसकी कोई सहायता नही कर पा रहा हूँ। अब बस कृष्ण से यही प्रार्थना है कि वो जो कोई भी है उसे जल्दी से जल्दी मुझसे मिलवा दे, जिससे अपने मन की इस बेचैनी से छुटकारा पा सकूं।”

  वरुण क्या जानता था कि उसके कॄष्ण उसके प्रिय को उससे मिलवाने की भूमिका बांध ही चुके हैं…..

क्रमशः

aparna…..
  


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शादी.कॉम-7

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     राधेश्याम जी के घर पे पूरा त्योहार का माहौल हो गया था,शाम को समधि जो आने वाले थे,राधे श्याम और उनके छोटे भाई सीता राम अपने अपने काम धन्धे से जल्दी वापस आ चुके थे लेकिन युवराज अपने पैट्रोल पम्प पर ही था,जाहिर है वो उनका दामाद ठहरा उसे तो अपने ससुराल में ये दिखाना ही है कि वो कितना व्यस्त रहता है,इसी से आज वो पूरी तन्मयता से पेट्रॉल पम्प,फिर एजेन्सी सब जगह घूम घूम कर मुआयना कर रहा था।।

   घर की महिलायें सुबह से रसोई मे जुटी थीं ऐसे जैसे मास्टर शेफ उन्हें ही चुनने आ रहें हैं,खैर उनकी परीक्षा परिणाम का समय आ गया,गिरिधर शास्त्री मय बेटा पधारे –

  “का हो समधि जी ,सब कुशल मंगल??ऐसा प्रस्ताव लाएं हैं कि आप खुशी से नाच उठोगे।”

“अरे आईये आईये !!! आपके आने से ही प्रसन्न हैं, बताईये कौन प्रस्ताव लाये हैं आप??”

“अरे बहू कुछु मीठा उठा पानी वानी लाओ भाई।।”

  “जी बाबूजी अभी लाये,,,आप कैसें है पापा और मम्मी कैसी है??”

  “सब कुशल है बिटिया !! ये लो सब तुम्हारी मम्मी भेजी है तुम्हरे लिये।।”
   रुपा अपने पिता का लाया सारा सामान समेट जल्दी से रसोई में आ गई,उसे चाय चढ़ाने से ज्यादा जल्दी अपने लिये भेजी साड़ी  देखने की थी,और साथ ही उसे बैठक में चल रही बातचीत सुनने की भी हड़बड़ी थी,,इसी सब चक्करों में जल्दी जल्दी चाय चढ़ाने मे लगी थी,तभी उधर से रुपा के चाचा ससुर की लड़की पिंकी गुजरी _”अरी ओ पिंकी हियाँ आओ ज़रा,इ देखो हम पानी खौलने रख दिये हैं,तुम तनिक पत्ती शक्कर दूध डाल डुला के छान लायोगी।”

“तो साफ साफ कहिये ना भाभी कि हम चाय बना दें।”

“अरे चाय बनाने कहाँ कह रहे हम !! हम तो बस ज़रा सा देख लो कह रहे,ना करना चाहो तो जाओ ,हम तो बहु हैं,हमे तो करना है,हमे कहाँ छुटकारा है इस घर गिरस्ती से,तुम तो भैय्या राज्कन्या हो,जाओ जाओ लाड़ो आराम करो।।”

“अरे भाभी इतनी सी चाय के लिये बात कहाँ से कहाँ पहुंचा दी आपने,जाइये मैं चढ़ा दूंगी चाय।”

“हाय सच्ची! देखो हमारे लिये बस इत्ती सी छानना,हम अभी आये।।”और रूपा लपक झपक भागी वहाँ से,और जाकर अपने कान दीवानखाने की दीवार से लगा कर खड़ी हो गई,बीच बीच में देखती भी जाती थी,कि कोई देख ना ले,उसे अपनी बुद्धि मे जितनी बात समझ मे आई उसका सार ये था कि पिंकी के लिये उसके मायके के पड़ोसी श्यामू चाचा के लड़के का रिश्ता उसके पापा उसके ससुर को बता रहे थे,श्यामू चाचा का बीड़ी पत्ते का करोबार था,अच्छे खानदानी रईस आदमी थे,उनके बेटे पप्पू को उसने बचपन में देखा था एकदम गोल मटोल गोलू गप्पू सा था,अब बड़ा होकर वो भी अपने बाबूजी का हाथ बंटा रहा था,,अच्छा है मालदार और बड़े घर चली जायेगी तो बार बार पलट कर मायके नई आयेगी,ननंद के ब्याह लगने से रूपा को अन्दर ही अन्दर प्रसन्नता ही हुई,वैसे पिंकी का जो स्वभाव था उससे इस घर के किसी सद्स्य को कभी कष्ट नही पहुंच सकता था।।

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   पिंकी राधेश्याम जी के छोटे भाई की इकलौती कन्या थी,और इस घर की अकेली   राजकुमारी !!!  ,वैसे उससे पहले उसका एक भाई भी था जो थैलेसिमीया की भेंट चढ़ गया जब मात्र 2साल का था!!! उसके जाने के और 2 साल बाद पिंकी का जन्म हुआ था,इसीसे घर भर की अत्यधिक लाड़ली थी,पर राजा भैय्या के तो जिगर का टुकड़ा थी उनकी ये छोटी लाड़ली बहन ,पूरा घर पिंकी पिंकी की पुकार से गुंजायमान रहता था,और पिंकी घर के किसी कोने या छत पे बैठी अपनी यू पी एस सी की किताबों में खोई रहती।।
    अपने प्रथम प्रयास में ही पिंकी ने मेन्स तक की यात्रा बिना किसी रुकावट के पार कर ली थी,तीव्र बुद्धि की स्वामिनी पिंकी बांसुरी की सीनियर भी थी और उसकी गाइड भी।।
   पिंकी ने अभी शादी ब्याह जैसे समय व्यर्थ करने वाले परिश्रम की तरफ सोचा भी नही था,अभी उसका एकमात्र सपना था प्रशासनिक अधिकारी के पद पर आसीन होकर लाल बत्ती वाली गाड़ी में घूमना।।
      वैसे तो यू पी और बिहार दोनो ही ऐसे राज्य हैं जहां हर दूसरे घर का लड़का यू पी एस सी ही निकालना चाहता है,पर अब लड़कियाँ भी इन मामलों में पीछे नही है।।
   चाय छानकर बाहर लेकर जाती पिंकी से रूपा ने आकर ट्रे अपने हाथ में ले ली और बैठक में जाकर धीरे धीरे सब को चाय पकड़ाने लगी जिससे और कुछ देर वहाँ की बातें स्पष्ट रूप से सुन सके ।।।
     अन्ततः उसके कान जो सुनने को तरस रहे थे, उस बात की अमृतवर्षा से उसके तृशार्त कान सिक्त हो उठे।।

“देखिए समधि जी जादा घुमा फिरा के बोलने की हमारी आदत नही है,हम सीधे सच्चे आदमी हैं।”
गिरिधर के ऐसा कहते ही राधेश्याम जी बिना बात मुस्कुरा उठे-“इसमें कोनो दो राय नही वकील बाबु, जो कहना चाहतें हैं,कह दीजिये,एकदमे स्पस्ट ।।”

“हां तो हम कह रहे ,अगर श्याम त्रिपाठी के लड़का के लिये आप पिंकी का रिश्ता हाँ बोल देते हैं तो आपके राजा के लिये हमरी रेखा की भी हाँ ही होगी,  देखिए समधि जी आपका लड़का सुन्दर सुसील(सुशील) तो है पर का है ना हम ठहरे वकील ,हमे थोड़ा पढ़ाई लिखाई से कुच्छो जादा ही लगाव है,हमरी रेखा तो दिल्ली तक से जाके पढ आई है,बस यही बात है।।”

“अरे कैसी बात करते हैं समधि जी हमरे राजा के लिये एक से बढकर एक पढ़ा लिखा लडकियों का रिस्ता आ रहा है,ऊ कोनो कलेक्टर से कम दिखता है का??”अपने बेटे के बारे में सुन माँ का हृदय चिन्घाड़ उठा।

“बहन जी कलेक्टर दिखना और होना में बहुतै फरक होता है, हमे राजा पसंद है ,हम ये थोड़े कह रहे कि राजा और रेखा की सादी नही करेंगे ,हम तो बस कह रहे एक हाथ दे एक हाथ ले।”

“तुम भीतर जाओ ,खाना उना की तैय्यारी करो,हम हैं ना यहां बैठे,इ सब बात व्यवहार हम देख लेंगे।।”

  श्रीमती जी सनसनाती हुई रसोई में चली गई,जो लड़की उन्हें निपट नापसंद थी,और जिसके  लिये वो पतिदेव के सामने अपनी नाराज़गी  जाहिर कर चुकी थी,उसी लड़की के लिये उनके राजा और पिंकी का ऐसा मोल भाव उस सरल हृदय सरला नारी को कचोट गया,,कैसा आदमी है रिश्तों का भी मोल भाव तैय्यार कर रखा है,,मन मे इतना गुस्सा समेटे भी बेचारी ऊपर से खुशी दिखाती हुई पूरियां छानती रहीं,रसोई में ही रूपा भी थी जो जल्दी जल्दी हाथ चलाती खाना परोसने में लगी थी,उसके सामने कुछ भी कहना आफत मोल लेना था।।
   
                पिंकी की माँ नही थी,और उन्होनें अपने दोनो लड़कों और पिंकी में कभी भेदभाव नही किया था, उन्हें भी पिंकी के ब्याह की जल्दी थी,पर उन्हें ऐतराज गिरिधर शास्त्री के लाये रिश्ते के कारण अधिक था।।
    रूपा ने सारी थालियां टेबल पर सजा कर सभी बड़ों को बुला लिया और सबका भोजन कार्यक्रम शुरु हो गया,इस कार्यक्रम के मध्य ही दामाद बाबु युवराज का भी आगमन हो गया जिन्हें देखते ही गिरिधर शास्त्री का मुखमंडल प्रसन्नता से चमक उठा।।
      अब युवराज भी उस गोष्ठी का हिस्सा था,उसे उसके साले साहब ने सारी बातें सविस्तार समझाई और नये जमाने के व्यापारी युवराज ने सहर्ष सभी बातों के लिये हामी भर दी,वैसे हामी भरने के पहले उसने एक गहरी दृष्टी अपने बाऊजी की ओर फिराई और आंखों ही आंखों में दोनों गुणी जनो ने इस रिश्ते का नफ़ा नुकसान माप लिया ,बाऊजी की तरफ से हरी झण्डी मिलते ही युवराज ने अपनी स्वीकारोक्ती दे दी।।।
      सबका भोजन समाप्त होने के पहले ही राजा भैय्या भी गर्मा गर्म जलेबी संभाले चले आये, जलेबी अपनी अम्मा को पकड़ा कर और मेहमानों को नमस्ते कर भैय्या जी अपने कमरे में चलते बने,उन्हें वैसे भी ऐसी महफिलों में वो रस नही मिलता था,जो उनकी वानर सेना के साथ था।।
    
          ***************************

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    अगले दिन सुबह से रूपा कोयल की तरह कूक रही थी,उसे ब्याह के समस्त क्रियाकलाप के लिये क्या कैसे और कहाँ से करना है की अत्यंत आतुरता थी,और इसी हड़बड़ी में उसने बिना किसी भूमिका के पिंकी को सारी बात कह सुनाई!!

“क्या बात कर रही हो भाभी!!! हमारी शादी ?? अभी से,अरे अभी तो हमे पढ़ना है,किसने तय कर दी हमारी शादी??”

“क्या बात करती हो नंद रानी!! और कौन तय करेगा,घर के बुजुर्गों ने तय की ।।। और पढ़ाई का क्या है,वो तो ससुराल जा के भी हो जायेगी।।इत्ता बड़ा काम है उन लोगों का ,वैसे भी राजरानी बन के रहोगी,का ज़रूरत फिर पढ़ाई लिखाई का।।”

“देखिए भाभी आपसे हमें बहस नही करनी,बड़ी अम्मा कहाँ हैं,ये बताओ!! उन्होनें कुछ नही बोला?? और राजा भैय्या??”

“किसी ने कुच्छो नई बोला,सब बड़े खुस हैं,और तुम भी हो जाओ,,लाखों का दूल्हा है,मिट्टी के मोल मिल रहा है समझीं,,उनका करोबार देख कर एक से एक बड़ा घर का रिस्ता आ रहा है,वो तो हमारे पापा के साथ अच्छे संबंध हैं इसिलिए तुम्हें हमारे कारण मांग लिया,वर्ना कमी है क्या उनके पास??”

“तो जब उनके लड़के मे कमी नही है तो अपने जैसी या आपके जैसी सर्वगुण सम्पन्न लड़की ढूँढ लें हमें काहे फंसा रहे,उनके बीड़ी पत्ता के गोदाम में बैठ के पढेंगे क्या हम,खैर छोडिए आप ये बताईये राजा भैय्या कहाँ हैं,सुबह से दिखे नही।।”

“लल्ला जी तो सबेरे ही जिम निकल गये,वहीं मिलेंगे तुम्हें ,,अरे रुको तो कहाँ भागी जा रही हो,चाय तो खतम कर लो।।”भाभी की बात खतम होने से पहले ही पिंकी जिम को निकल ली।।

“हे भगवान!! इ भगवान ने थोड़ा सा बुद्धि का दे दिया रानी जी खुद को जाने का समझ बैठी हैं,अरे ऊ तो हमारा सादी हो गया नही तो हम भी कलेक्टरनी नई भी बनते तो कम से टीचर उचर तो बनी जाते।”

“सही कह रही हो बहु जी!! आपका तो कदर इ नई करता ई घर का लोग,कहाँ आप अऔ कहाँ ओ।”

“चल चल बस कर !! जल्दी जल्दी हाथ चला,ढ़ेर सा काम पड़ा है यहाँ,मुझे तो सांस लेने की भी फुर्सत नही।।” घर की मुहँ लगी नौकरानी नागेश्वरी को काम समझा अपनी चाय उठा रूपा वहाँ से चली गई ।।

  उधर पिंकी जिम पहुंची तब राजा भैय्या सभी महिलाओं को कसरत करवा रहे थे।।

“अरे पिंकी तुम यहाँ?? घर पे सब ठीक तो है??” प्रिंस ने पिंकी को देखते ही पूछा

“राजा भैय्या कहाँ है?? जल्दी बुलाओ उन्हें ।।”

“हां हम बुला रहे,तुम इधर भैय्या जी के ऑफिस में आ जाओ,वहाँ बैठो,हम भैय्या जी को भेजते हैं ।”
  
  पिंकी जैसे ही ऑफ़िस में घुसी वहाँ बाँसुरी बैठी राजा के लिये नोट्स तैय्यार कर रही थी।।

“बंसी तुम यहाँ??”

“हाँ हम भी थोड़ा दुबला होना चाहते हैं, पर आप इस समय यहाँ कैसे दीदी।।बांसुरी ने मुस्कुराते हुआ जवाब पे सवाल दाग दिया।।

तभी राजा भी दरवाजा खोल अन्दर आ गया,और उसके पीछे से प्रिंस 3कप में चाय लाकर रख गया।

“प्रिंस तुम बाहर जाओ ,हमे राजा भैय्या से कुछ प्राईवेट बात करनी है।”प्रिंस के साथ बांसुरी भी उठने लगी –“अरे तुम बैठी रहो बंसी,तुमसे हमे कोई परहेज नही।।

“बोल छुटकी ऐसा क्या हो गया,कि तू सुबह सुबह यहाँ दौड़ी आई??”

“राजा भैय्या आपको पता भी है घर मे क्या चल रहा है।।

“क्या चल रहा है,तू ही बता दे।”

“हे भगवान !! मेरे भोले भंडारी भैय्या!! आपके रिश्ते की बात चल रही ,और मेरी भी।।
   भाभी के पड़ोसी के अनपढ़ लड़के के साथ हमे बान्ध देना चाहते हैं ,और भाभी की बहन के साथ आपको,कुछ पता है आपको??”सब आटा बाटा, अदला-बदली चल रही है।।”

“अरे मेरी प्यारी छुटकी बहना शादी तो करनी ही है ना,तो कर लो जिससे अम्मा बाऊजी कह रहे।।”

“आप कर लेंगे रेखा से शादी??”

“अरे उसमें का बवाल हो गया ,,अम्मा कहेगी तो ज़रूर कर लेंगे ,बस हम पहले पास हो जायें,उसके बाद जो बड़े भैय्या अम्मा बाऊजी कहेंगे हम कर लेंगे।।”

“हाँ तो आप कर लिजिये,हम नही कर सकते,ऐसे किसी ऐरे गैरे से शादी,इतनी मेहनत से पढ़ाई किये हैं …..अभी पिंकी की बात पूरी भी नही हो पाई थी कि राजा भैय्या बोल पड़े-

“अरे तो तुम्हारे ससुराल वाले तुम्हरी पढ़ाई के खिलाफ है क्या??हम दो मुक्का मार के अभी सीधा कर देंगे ससुरों को।।”

“नही भैया बात वो नही है!! असल में हम किसी और को पसंद करते हैं,उसका नाम है रतन !! पूरा नाम रतन मराबी।।”

“अरे दीदी ये तो हमारे स्कूल वाले भैय्या है ना जो बारहवीं मे हेड बॉय थे,आपकी कक्षा में ही थे ना।।”
बांसुरी चहकी

“हाँ बंसी वही रतन!! स्कूल के बाद वो बी ई करने चला गया और हम बी एस सी।।उसिने हमे यू पी एस सी के लिये प्रेरित किया,,हम दोनो ने साथ ही सारी पढ़ाई करी है भैय्या,और अब हम रतन को पसंद करने लगे हैं ।।”

“का गजब कर रही हो छुटकी,हमारे यहाँ आज तक किसी ने अपनी मर्ज़ी से शादी ब्याह नही किया!! बाऊजी तो तुम्हारे साथ हमे भी मार डालेंगे।।”

“दीदी तो रतन भी मेन्स निकाल चुके हैं??”बांसुरी ने पूछा।।

“हां बंसी!! और इंटरव्यू के रिजल्ट के बाद ही हम लोग घर में बात करने वाले थे,उसके पहले ही ये सारा काण्ड हो गया,हम नही जानते भैय्या ,आपको बडी अम्मा और बड़े भैय्या से बात करना ही पड़ेगा,वर्ना??”

“वर्ना का करोगी तुम,घर से भाग जाओगी??”
भैय्या जी के ऐसा बोलते ही पिंकी ने उन्हें घूर के देखा।।

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“नहीं वर्ना हम खुद ही बात करेंगे!! हमे लगा पहले आप से बात करनी चाहिये,भैय्या आप तो कम से कम अपनी छुटकी की बात मान जाओ,रतन बहुत अच्छा लड़का है,आप एक बार मिल लो खुश हो जाओगे।।”

“अरे बौड़म हमारी खुशी तो तेरी खुशी में है,पर हमे बाऊजी से बहुत डर लगता है,इन सब मामलों में, अच्छा पूरा नाम का बताया लड़के का।।”

“तुम अभी तक क्या सुन रहे थे राजा!! मराबी है सरनेम,यही जानना चाहते थे ना,तो सुन लो रतन ब्राम्हण नही है।।”बांसुरी इतना बोल के मुस्कुराने लगी।।

राजा आँखें फाड़े कभी बाँसुरी को कभी पिंकी को देखने लगा,वो पहले ही परेशान हो रहा था कि घर पे कैसे बात की जाये अब ये जाति वाला मामला हल निकालने की जगह बात को और बिगाड़ गया।।

“नही हो सकता !! ये बिल्कुल नही हो सकता छुटकी ।। अम्मा की  कसम, बाऊजी तुझे और मुझे गोली से उड़ा देंगे ,उनके गोली मारने के पहले अम्मा हम दोनो को जहर देके मार डालेगी ,और कहीं इन दोनों से बचे तो भाभी के ताने जान ले लेंंगे।।भूल जा छुटकी ,तू भूल जा उस लड़के को।।”

“नही भैय्या हम नही भूल सकते,और ना आपको भूलने देंगे,अब इस मुसीबत से आप ही हमे निकालेंगे और आप ही हमारी शादी रतन से करायेंगे।।”

“राजा !!! एक बात बताओ ,तुमने डर के मारे सबका नाम लिया बस बड़े भैय्या का नही,,इसका मतलब तुम्हारा सब कॉन्शियस माइंड कहीं ना कहीं ये जानता और मानता है कि बड़े भैय्या हमारी मदद करेंगे।।”
          बांसुरी ने अपना ज्ञान दिया,जो राजा भैय्या के लिये काला अक्षर भैंस बराबर था।।

“का बोली तुम बांसुरी??कौन सा माइंड??”
राजा भैय्या के इस सवाल का जवाब दिया पिंकी ने

“सही कहा बंसी!! अब राजा भैय्या को बड़के भैय्या को पटाना पड़ेगा,अगर वो मान गये तो फिलहाल हमारे इंटरव्यू के रिजल्ट तक के लिये शादी टल जायेगी या कैन्सिल हो जायेगी,और बस उसके बाद हमारे दोनो भाई मिल कर हमारे लिये रास्ता बना देंगे।।”

दोनो सखियाँ एक दूजे को देख मुस्कुराने लगी और राजा भैय्या सर पकड़ के बैठे रहे ,तभी प्रिंस ने दरवाजा खोला और भैय्या जी को आवाज़ दी–

“भैय्या जी ऊ पुडुष वाली (घोष) आंटी तो रिलेक्सर से उतरे नई रई हैं,और उनके पीछे सब आंटी लोग उसी में चढ़ने के लिये अपना पारी का रस्ता देख रही है,का करे हम।।”

“सर फोड़ लो अपना,और हमारा भी।”भैया जी का बौखलाया जवाब सुन के प्रिंस वापस भाग गया।।

तभी भैय्या जी का फ़ोन खनखनाया “नमो नमो श्री शंकरा”
रेखा का नाम देख भैय्या जी का मुहँ बन गया,बड़ी लाचारी से उन्होनें पिंकी को देखा

“उठाओ उठाओ,अब काहे नई उठा रहे,आपकी होने वाली बीवी का फ़ोन है।”

“अरे !! अभी हुई थोड़ी ना है,पहले तुम्हारे पचड़े से बाहर तो निकलें तब जाके अपना बारे मे सोचेंगे।।”

“अच्छा,तो मतलब तैय्यार बैठे हैं आप रेखा से शादी के लिये,भैय्या जी सुन लो ,ना मेरी उस बीड़ी वाले से शादी होगी और ना आपकी इस बिलाई से मै होने दूंगी।।”

पिंकी की बिलाई वाली बात में बांसुरी को इतना रस मिला की वो हो हो कर हंसने लगी,और उसे हँसते देख राजा भैय्या को भी हँसी आ गई,तीनों के सम्मिलित ठहाकों से बाहर खड़े प्रिंस को थोड़ी राहत मिली और वो एक बार फिर अन्दर झाँका–

“भैय्या जी !! एक बात बोलनी थी।।”

“अबे बोलो बे!! तुम तो साले मरे जाते हो ,हम ना रहे तो।।ऐसा का आफत हो गया अब।।बोलो।”

“भैय्या जी वो हनुमान गली वाला गुड्डा है ना चार पांच चेलों को लिये आया था,आपको पूछ रहा था,हमने बोल दिया ,आप नई हैं अभी।।”

“हमे काहे पूछ रहा था बे,,पूछे नही तुम??”

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“पूछे ना ,तो बोलता है ,प्रेम उनकी गली की किसी लड़की को पटा लिया है,इसिलिए प्रेम के हाथ पैर तोड़ने से पहले आपको चमकाने आया था,कह रहा था,बोल दियो अपने राजा भैय्या से हमरी गली की तरफ आँख उठाया तो सरिया घुसा देंगे आँखी में।”

“हे शिव शंकर!! आज का दिन दिखा रहे हो परभू ,, एक के बाद एक नारियल हमारे ही सर फोड़ रहे हो।
  अब ई प्रेम कौन सी लड़की को फंसा लिया यार।।
तुम ठीके कहती हो बांसुरी!! हम बहुतै बड़े बौड़म है।।”

“हम समझ गये कौन है वो लड़की”बांसुरी के ऐसा कहते ही प्रिंस राजा पिंकी सब उसकी तरफ देखने लगे__
         “निरमा!! हाँ 100% निरमा ही है।।”

तभी बाहर से कुछ हल्ले गुल्ले की  आवाज़ आयी और चारों के चारों बाहर की ओर लपके।।

क्रमशः

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aparna..

शादी.कॉम -5

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  “अम्मा जी खीर बना के रख दिये हैं,और कद्दू भी छौंक दियें हैं,ये देख लिजिये पूड़ी का आटा,इत्ता हो जायेगा कि और ले लें ।।”

  रूपा यानी युवराज अवस्थी की दुल्हनीया और राजा भैय्या की भाभी आज बड़ी प्रसन्न हैं,हो भी क्यों ना !! आज उनके पिता और भाई शाम के भोजन पर उन सब से मिलने आ रहे हैं ।।
    गिरिधर शास्त्री यानी रुपा के पिता कभी कोई काम निराधार नही  करते ,,उनके हर कार्य के पीछे लम्बी चौडी योजना होती है।।
      गिरिधर शास्त्री का भी शहर में अच्छा खासा नाम है,उस ज़माने के वकालत पढ़े हैं,भले ही प्रैक्टिस ना करें पर मोहल्ले भर के फ़्री के पटवारी हैं,किस की ज़मीन कहाँ अटकी भटकी पड़ी है,उसे कैसे पार लगाना है आदि आदि के आँकड़े उनके जिव्हाग्र पे हमेशा अंकित रहते हैं ।।
     किसी के मिट्टी के मोल बिकती जमीन पे उन्होनें करोडों का नफ़ा करवाया है तो किसी के सदियों से फंसे वकालती विरासत के मामले को चुटकियों मे यूँ सुलझा के रख दिया,जैसे कोई मसला था ही नही।।

  पहले पहले तो कुछ लोगों ने उनपे तंज कसने ही उन्हें वकील बाबु कहना शुरु किया पर धीरे धीरे बच्चे बूढ़े सभी के लिये वो वकील बाबु बन गये,यहाँ तक की उनकी अपनी खुद की सगी बीवी भी उन्हें वकील बाबु ही बुलाती है।।
     और जब जब वो अपने पल्लू के ओट से उन्हें मीठी सी झिड़की के साथ ‘ओकील बाबू’ बुलाती ,वकील बाबू खुद को कहीं का मजिस्ट्रेट समझने लगते ,और इसी समझने समझाने में तीन तीन लड़कों के साथ दो दो बिटिया भी घर के आंगन को निहाल करने लगीं ।।
   दो बड़े भाईयों के बाद रुपा फिर रेखा और फिर एक छोटा भाई नाहर।।

    राधेश्याम अवस्थी के बड़े पुत्र युवराज को एक बार उन्होनें पटवारी कार्यालय में अपने पैट्रोल पम्प के कागजों के लिये माथा पच्ची करते देखा था,और वो गोरा चिट्टा उंचा नौजवान उन्हें अपनी बड़ी के लिये भा गया था,बस उन्होनें पूरे परिवार की जन्मकुण्डली बांची और चट मंगनी पट ब्याह निबटा दिया।।
      इधर कुछ दिनों से वो रेखा के ब्याह के लिये घर वर ढूँढ रहे थे।।ऐसे ही कभी मायके आई रुपा ने अपनी माँ के कान मे रेखा और राजा भैय्या के रिश्ते की बात डाली थी…
     जब पति को रात दिन एक ही उलझन मे परेशान देखा तो एक रात श्रीमती जी ने खाने की थाली में आलू मेथी के साथ अपना आइडिया भी परोस दिया-
  “ए जी सुनो!! हम का कह रहे,ई बिटिया का देवर है ना ,राजा!! हमरी रेखा के लिये उसका रिस्ता काहे नई देखते,घर का घर में ही रिस्ता हो जायेगा, वैसने पहली बार में इत्ता सारा दे चुके हैं अब दुसरी में थोड़ा राहत हो जायेगा।।””

   गिरिधर शास्त्री बाहरी बातों में औरतों का हस्तक्षेप अच्छा नही मानते थे,पर इस बात में उन्हें थोड़ा दम लगा।।

“राहत हो जायेगा से मतलब का है तुम्हरा।”

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“अरे रूपा के टाईम जो सोफा आलमारी फिज टीवी दिये रहे ,ऊ अब रेखा के टाईम देने की का ज़रूरत।
एकै घर मा दू दू ठो सोफा दू दू फ्रिज का करेंगे समधि ।”

“अच्छा ऐसा बोल रही हो,हां पर गहना उहना तो देबै पड़ी ।”

“तो हम कब मना किये,गहना तो हम बनबा रख्खे हैं,पर तुम एक बार बात तो करो समधि जी से।”

“ठीक बोल रही हो गुड्डू की अम्मा ,हम कलै फ़ोन करते हैं अवस्थी जी को,,उनका छुटका देखा भाला है,अच्छा लड़का है।।”

  अगले दिन शास्त्री जी के फ़ोन से अवस्थी जी की बांछे खिल गई,उन्हें मन मांगी मुराद मिल गई,इत्ते बड़े आदमी की दोनो बेटियाँ उनके घर आ जायेंगी तो समझो उनकी वसीयत का 2 बटा 5भाग उनका हुआ,हालांकी वो जानते थे,शास्त्री पुरानी रीति का आदमी है ,वो लडकियों को जितना देना है शादी मे दे दुआ के खतम करने वालों मे से है,और लडकियों का वसीयत पे कोई अधिकार हो सकता है ये वो कभी नही मान सकता,पर अपनी लड़ाकू फूलन देवी सरीखी बहु रूपा पे उन्हें पूरा विश्वास था,80 एकड़ खेती का ज़मीन नही भी दिये तो 40 एकड़ का आम का बगैचा तो बिटिया लोगों के नाम कर ही देगा गिरिधर  शास्त्री!!
       उन्होनें युवराज के ब्याह मे रेखा को देखा था, लड़की ऐसी बुरी भी नही थी,कॉलेज तक की पढ़ाई कर चुकी थी,और अभी कोई फैसन वाला कोई कोर्स कर रही थी,उन्होनें इस बारे में अपनी श्रीमती जी से बात की-
        “अरे का कह रहे आप,ऊ सिडबिल्ली को हम अपनी बहु ना बनाएँगे, रुपा तो चलो कम से कम काम भी कर लेती है,ज़बान चलाने के साथ,पर ऊ लड़की का तो लक्षनै ठीक नई लगता,जब देखो अन्ग्रेजी मा गिटर पिटर करती रहती है।।”

    “अरे तुम कहाँ से कहाँ पहुंच जाती हो,देखो हमरा राजा भी तो पढ़ लिख नही पा रहा,उसके लिये कहाँ से कलक्टरनी लायोगी खोज के, औ ई सोचो दुनो बहन एक ही घर मे रहेंगी तो झगड़ा फसाद भी नई होगा,बांट बखरा का झमेला से मुक्ति,भई हमरा तो दुई ठो लड़का है,दुनो एक संग निभा लेंगे।।”

   “अरे तो लडकियों का अकाल पड़ गया है का,,जो इक्के घर की दुनो को बहू बनाना चाह रहे।”

  “अब तुमसे बहस नही करना चाहते कल शास्त्री आ रहा अपने लड़का के साथ,इहै बातचीत करने,अच्छा से खान पान की तैय्यारी कर लेना, हम जा रहे ठीका में देखने,बहुत दिन से उधर गये नही।

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   राधेश्याम ज्यादा औरतों के पर्पंच में पड़ने वाले आदमी नही थे,सीधे और शान्त स्वभाव के थे,अपनी बात रखने के बाद एक बार ज़रूर पत्नि का पक्ष सुनते पर जब उसे अपने पक्ष मे नही पाते तो बिना मतलब की बहस करने की जगह एक बार मे अपना निर्णय सुना कर निकल लेते थे,,कम उम्र से उठाई जिम्मेदारियों के कारण पैसों के थोड़े लालची थे,कहीं से मुफ्त में आ रही लक्ष्मी से उन्हें कोई वैराग्य नही था,हालांकी उनकी दिली ख्वाहिश हमेशा ही थी कि उनके दोनो लड़कों की शादी पढ़ी लिखी लड़कियों से हो,पर जब युव के लिये रूपा का रिश्ता आया तो बारहवीं पास रूपा में उन्हें सुलक्षणी बहु का रूप दिखा या सरस्वती मैय्या पे लक्ष्मी मैय्या भारी पड़ गई,पर जो भी हो उन्होनें सहर्ष उस रिश्ते को स्वीकार लिया था,अबकी बार रेखा थी सामने,जो कि अपने पूरे घर परिवार में अकेली थी जिसने अन्ग्रेजी माध्यम से पढ़ाई करी थी,तो उस अंग्रेज़ी माध्यम का मोह भी अवस्थी जी संवरण नही कर पा रहे थे।।

   रेखा शास्त्री!! रूपा की छोटी बहन ,अपने पूरे कुनबे में सबसे ज्यादा लिखी पढ़ी मानी जाती थी,एक तो इनकी शिक्षा ‘कार्मल कॉन्वेन्ट ‘ से हुई थी, इन्होनें स्कूल में अपने बाकी भाई बहनों के जैसे सरस्वती वन्दना की जगह प्लेज किया था,,जहां इनके भाई बहन बचपन में किसी भी मेहमान के आने पर समवेत स्वर में “हम होंगे कामयाब एक दिन “गाया करते थे,वही घर की छुटकी बिटिया रेखा उसकी जगह अकेले पूरे गर्व से “we shall overcome ,one day..” गाया करती थी।।
    बचपन से इस भेद भाव का असर हुआ कि रेखा के मन में ये पैठ गया कि वो कुछ विशेष है,क्योंकि वो इंग्लिश मीडियम से पढ़ी है,,उसके इंग्लिश मीडियम में पढ़ने का श्रेय जाता था उसकी मासी को,शादी के चार सालों में भी जब हीरा व्यापारी तिलोकचंद त्रिपाठी के घर बाल ग्वाल नही विराजे तो उनकी धर्मपत्नी सुलोचना ने अपनी बड़ी बहन की छोटी लड़की रेखा को गोद लेने की सोची।।
     इस सोच-सोच में ही उन्होनें उसे ढेरों कपड़े दिलवाये,विदेशी गुड़िया दिलवाई,चॉकलेट खिलवाई और शहर के सबसे बड़े इंग्लिश मीडियम स्कूल में उसे भर्ती कराया….पर विधाता के खेल!!! जिस दिन से गोद लेने का कानूनी तीन पांच शुरु होना  था उसी दिन सुबह नाश्ते की टेबल पर नाश्ता  देख कर ही सुलोचना का जी मचल गया,डॉक्टर ने आते ही हाथ की नब्ज थाम कर हीरा व्यापारी को बधाई दे डाली,,आनन फानन घर में उत्सव का माहौल बन गया,और इस सब में उलझे त्रिपाठी दंपति गोद लेंने लिवाने की रस्म भूल गये….
      सब छूट गया,सभी का जीवन खुद मे व्यस्त हो गया पर रेखा का स्कूल नही छूटा,,बीच बीच में जब भी हीरों से लदी फदी मासी अपने बाल गोपाल को कमर पे टिकाई बड़ी बहन से मिलने आती अपनी प्यारी रेखा की इंग्लिश मीडियम बातें सुन खुशी से चौडी हो जाती,और इन्ही सब बातों का धीमा धीमा ज़हर रेखा के खून मे घुलता चला गया।।

    दिखने में ठीक ठाक परन्तु कपडों जूतों से बेहद स्टाईलिश रेखा ने जब अपनी दीदी की शादी में अपने दीदी के लुभावने देवर को देखा तो पहली ही नज़र में अपना दिल हार गई,उसे पूरी शादी में अपने खुद के अन्दर माधुरी और राजा भैय्या के अन्दर सलमान खान दिखता रहा।।
      उसने बड़ी नज़ाकत से जूते भी चुराये और जूतों के बदले पैसों की गुहार भी लगाई,पर उधर सलमान खान नही था,जो ‘ जूते दो पैसे लो ‘की गुजारिश करता,उधर तो राजा भैय्या थे,उन्होनें साफ साफ पूछ लिया”कितने चाहिये??”
       अब इधर रेखा के पहले ही किसी एक नाज़नीँ ने लपक के -“पूरा पांच हज़ार एक रुपैय्या चाहिये भैय्या जी” बोल दिया।।
   
    भैय्या जी हो हो कर हँस दिये-” बस इत्ता ही चाहिये,अरे हमरे बड़के भैय्या का जूता ही ग्यारह हज़ार का है,ई लो रख लो,और ला दो हमरे भैय्या का जूता।।”

   अब बेचारी रेखा जब तक बाकी सखियों को जूते और पैसों के लिये लड़ने का मह्त्व सिखाती बताती तब तक में  लाली दौड़ कर जूते का डिब्बा उठा लायी,भैय्या जी नये करारे नोट गिन के लाली के हाथ में रख दिये और जूते का डिब्बा उठाये बिना अपनी माधुरी दीक्षित को देखे ही चल दिये।।

     बेचारी रेखा मन मसोस के रह गई ।।

दुसरी बार आस जगी जब उसकी बड़ी बहन रूपा ने उसे कुछ दिन अपने पास रहने को बुलाया,किसी दूर की रिश्तेदारी में होने वाली शादी में पूरा अवस्थी परिवार जाने वाला था,बस राजा भैय्या और रूपा ही नही जाने वाले थे।।
    बिल्कुल माधुरी जैसी कातिल रेड ड्रेस पहन के रेखा अपने सलमान के इंतज़ार मे पलक पांवडे बिछाए बैठी थी कि अब राजा आयेगा और उसकी खुली जिप्सी में जाते समय वो भी मन भर के गायेगी-” फूलों कलियों की बहारें,चंचल ये हवाओं की पुकारें…..ये मौसम का जादू है मितवा “

   पर एक बार फिर भगवान ने उसकी इच्छाओं पे घडों पानी फेर दिया।।राजा भैय्या तो आये,जिप्सी में ही आये ,पर भाभी को साथ लिये आये, वहाँ घर में कोई बड़ा ना होने के कारण रुपा को कुछ दो चार दिन के लिये मायके भेज दिया गया।।

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    मायके के नाम पे खिली रूपा दौड़ी चली आई,दोपहर का भोजन खा कर सलमान खान अपने घर मोहल्ले को निकल गया और माधुरी अकेली विरह अग्नि में जलती रही,और बैकग्राउंड में गाना बजता रहा- “सोचेंगे तुम्हें प्यार करें कि नही।”

  रुपा कुछ चार दिन रह कर,अपनी सास को मन भर गालियाँ देकर चली गई,पर जाते जाते अपनी माँ के कान में अपनी छुटकी बहना और राजा की शादी का मन्त्र भी फूंक गई।।
    ना ना ऐसा बिल्कुल भी नही था कि रुपा की सास दुष्ट थी,जालिम थी,बहुओं पर अत्याचार करने वाली शशिकला और बिंदू टाईप की सास थी,अरे ऐसा होता तो ऐसे नर्क में रूपा अपनी बहन को झोंकने क्यों तैय्यार हो जाती???
    पर मायके आ कर अपनी माँ बहन के सामने दुखड़ा रोना भी एक कला है,इसका अपना अलग एक मज़ा है,और पकौड़ी की प्लेट के साथ वो मज़ा दुगुना हो जाता है।।

माँ और दीदी को बात करते सुन रेखा खुशी से बावली हो गई,,उसकी मन मांगी मुराद ऐसे टप से उसकी गोद में आ गिरेगी ,इसका उसे भान भी नही था।।
    कहाँ वो “हम आपके हैं कौन “के सपने देख रही थी और कहाँ उसे “हम साथ साथ हैं “मिल गई ।।

  इन चार दिनों में रेखा ने अपनी बड़ी बहन की खूब सेवा की,बिल्कुल सगी जेठानी मान के।।
    उसकी बिदाई के एक दिन पहले उसे अपने साथ शॉपिंग पर ले गई,उसकी साड़ी से मैचींग नेल पॉलिश दिलाई,क्लचर दिलाया,एक छोटा पर्स दिलाया और ब्लू लेडी का पर्फ्यूम भी दिलाया,बड़ी बहन निहाल हो गई,जाते जाते रेखा के गले लग खूब रोयी(रोने का नेग भी ज़रूरी होता है)और चुपके से बोली”अब अगली बार तुम्हें अपने देवर के लिये बिदा करा ले जायेंगे।।”

  दीदी के रवाना होते ही रेखा अपने कमरे में जाकर राजा की यादों में खोने जा ही रही थी कि फ़ोन पे मैसेज आ गया__
             “कैसी हो जान?? दीदी गई? अब तो हमारे लिये समय निकाल लो।”

उफ्फ ये वॉट्सएप्प भी ना,जब ज़रूरत ना हो तभी घि घि बजने लगेगा,रेखा मेसेज चेक कर चुकी थी, अब जवाब ना देना मतलब आधे घन्टे का सर फुटौव्वल,इसिलिए बेचारी ने जवाब दिया-

  “मैं ठीक हूं बेबी,अभी मम्मी काम से बुला रही, बाद में बात करती हूं ।”

  असल में दीदी की शादी और बाद में भी राजा ने कभी रेखा  में कोई विशेष दिलचस्पी नही दिखाई थी।उसी समय फैशन डिज़ाइनिंग का शार्ट टर्म कोर्स करने रेखा दिल्ली गई,जहां उसकी मुलाकात रोहित से हो गई,वो भी वहाँ किसी शार्ट टर्म कोर्स के लिये आया था,दोनो अपने अपने शहर से निकल कर इतने बड़े अंजान शहर में अकेले थे सो दोस्ती हो गई पर नही वो दोस्ती वहाँ प्यार में नही बदली,वहाँ दोनो सिर्फ दोस्त ही थे,साथ साथ टपरी में चाय पीना, सैंडविच खाना,और अपनी अपनी क्लास के बारे में चर्चा करना,बस इतना ही!! यहाँ तक की दोनों ने अपने घर परिवार और शहर की भी बात नही की।।
  इस पन्द्रह दिन की दोस्ती के बाद दोनो मोबाईल नम्बर एक्सचेंज कर अपने अपने शहर चले गये।।
   
   शुरुवात हुई रोज सुबह की good morning और रात की good night से…फिर धीरे धीरे क्या कर रहे हो??
खाना खाया? क्या खाया?क्या पहना ? वगैरह वगैरह से होते हुए दिन भर की लम्बी चैट में बदल गई ,और आखिर एक दिन दोनो को समझ आ गया कि दोनो प्यार में हैं…..प्यार का इजहार हुआ और दोनो की दुनिया बदल गई ।।
     अब तो दोनो को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण काम मिल गया “चैटींग “और बाकी सारे काम इस काम के सामने निरे नीरस और बेवजह हो गये।।
      रोहित कुछ ज्यादा ही सीरियस होने लगा इसलिए धीरे से अपने परिवार के बारे में बताना शुरु किया….पापा अधिकारी है,बड़ा भाई भी अधिकारी ,दीदी टीचर ,रेखा ने पूछा और तुम??
  “मैं तुम्हारा आशिक” इस खुशनुमा रंगीन चैटींग में पहला रोड़ा बनके आयी जात पात की दीवार
    बातों बातों में जब रोहित ने बताया कि उसका नाम है रोहित सूर्यवंशी!!!! हाय राम !! सूर्यवंशी !!
     रेखा का कलेजा मुहँ को आ गया,अब क्या करूं?? पापा तो नही मानेंगे!! दिखने में इतना साफ सुन्दर चिट्टा लड़का ,उसने तो देख कर by defalut सोच लिया था कि कोई दुबे चौबे तिवारी त्रिपाठी उपाध्याय ही होगा बंदा,पर अब क्या करे…..
     इतनी गहरी उलझन में डूबी लैला को और डुबाने उसकी बड़ी बहन धमक पड़ी और ये आ गया प्रेम कहानी में दूसरा रोड़ा ।।
    जब रूपा ने माँ से रेखा और राजा की बात की तो रेखा को वापस “हम आपके हैं कौन “वाले दिन याद आ गये और आज के ज़माने की लैला ने अपने सपनों को नई दिशा में मोड़ लिया….पर बेचारी अपनी सपनों की ज़मीन पे राजा के प्यार की फसल बो पाती उसके पहले ही 3 दिन से वैराग्य धारण किये रोहित का उबलता खनकता हुआ मेसेज आ गया….
   माँ किसी काम से बुला रही है,बोलकर किसी तरह रेखा ने जान बचाई और इसी सोच में डूब गई कि आगे रोहित को क्या और कैसे बोलना है,ऐसा नही था कि उसे रोहित पसंद नही था,या उसे राजा अधिक पसंद था,,असल मे उसे इन दोनो से कही ज्यादा पसंद था शादी का उत्सव उत्साह!!
    उसे भी बाकी लडकियों की तरह 3महीने का bridal course करना था,हर मौके के लिये अलग अलग थीम में सजे लहन्गे लेने थे,खूब सारे जेवर लेने थे,कपड़े लेने थे,इतनी महत्वपूर्ण विमर्श वाली चीज़ों के मध्य कोई इनसे कमतर (दूल्हा) के बारे में सोच के क्यों मगजमारी करे।।
    इसिलिए अपने मन को समझा कर रेखा अब रोहित को समझाने की तैय्यारी करने लगी।।

क्रमश:

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aparna..

शादी.कॉम -4

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  ,”पर्मिला अरी ओ पर्मिला,,कहाँ मरी पड़ी है,,हे राम!!! एक तो मरे घुटने के दर्द से चला फिरा नही जाता फिर भी तेरी बेटी के लिये कैसे रात दिन एक किये हूँ,,देख तो सही।।”

  अपने पेट पर के टायरों को संभाले घुटनों को सहलाते बुआ जी प्रमिला को आवाज़ देती भीतर चली आईं, उनकी आवाज़ से प्रमिला रसोई से हाथ पोछती भागी भागी आई और उन्हें प्रणाम किया।।उनकी आवाज़ बिना सुने ही सीढियों से नीचे उतरती बाँसुरी ने जैसे ही बुआजी को देखा वापस ऊपर को जाने लगी पर बुआजी की गिद्ध नजरों से बच ना सकी_
     “अरी लाड़ो तू भी आ जा,तेरे लिये ही तो आती हूँ बिटिया,,देख कैसा हीरो जैसा रिश्ता लेकर आई हूँ,,आ आकर देख तो जा।।”

अभी उनकी बात पूरी भी नही हुई थी कि वीणा अपनी चमचमाती रानी कलर की साड़ी में लसर फसर वहाँ पहुंच गई ।।

प्रमिला ने दोनो के हाथ में बादाम का हलुआ पकड़ा दिया,”जिज्जी पहले इ खा के बताओ ,कैसा बना है,हमरी लाड़ो को बड़ा पसंद है,उसी के लिये बनाया है,बहुत दिमाग का काम करती है रात दिन बेचारी,खटती रहती है किताबों के बीच।।

“बस अम्मा यही सब घी में तर हलुआ पूड़ी ठून्गो अपनी लाड़ली को,दिन बा दिन बरगद बनती जा रही है,अरे  इतना तेजी से महंगाई नही मोटाती जैसी तेजी से तुम्हरी पेटपुन्छनी मुटा रही, कुछ तो रहम करो अम्मा।।”

“अरे तो का भूका मार दे अपनी लड़कोर को, तुम्हे भी तो खिला पिला के पाला पोसा है बड़की ।।

“हमें खिला पिला के पाला है इसे खिला पिला के मुट्वा रही हो,फरक है दोनो में अम्मा।।

“प्रणाम करते हैं बुआजी,और दीदी कैसी हो,गोलू को कहाँ छोड़ आई आज।”

“उसकी दादी के पास छोड़ा है,अरे दादी हैं इतना तो करे अपने पोता के लिये।।”

किसी बात पे बुआजी ने अपना प्रिय राग छेड़ दिया और वीणा भी उनके सुर से सुर मिलाने लगी।।

“करेला उसपे नीम चढ़ा”बाँसुरी ने धीरे से गुनगुना कर कहा।।

“का बोली तुम ,हैं!! ए बांसुरी,हमे नीम बोल रही हो।खुद का सकल(शक्ल) देखी हो आईना में, कोनो साईड से लड़की नही लगती हो,हम तो समझा समझा के थक गये,कि कभी पार्लर भी चली जाओ।”

“ठीक ए बोल रही हो बिटिया,ऐसा करो लड़का वाला आने वाला है बांसुरी को देखने,,….. दुई चार दिन में आ जायेगा,तब तक तुम इसका थोड़ा रंग रोगन करा दो।।”
बुआ जी के इस प्रस्ताव का वीणा ने पूरा पूरा समर्थन किया ,पर बाँसुरी अड़ गई

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“हम वो अदनान सामी के लिये पार्लर नही जायेंगे,,हमको नही पसंद वो मौत का कुआँ मे जाना ।”

“पगला गई हो का,,कौन बोला तुमको ऊ मौत का कुआँ है??हम तो जातें हैं थ्रेडिंग कराने,और फेसियल कराने ।”

“हाँ तो तुम जाओ ना दीदी,हमको नही पसंद वहाँ जाना ।।जब हमारा मन करेगा तभी जायेंगे।।”

“तो इतना खेती काहे बढ़ा डाली हो आँखी के ऊपर , कम से कम थ्रेडिंग ही करा लो।।”

“हम काहे करायें,वो लड़का तो हमारे लिये कुछ नही करा रहा।।”

“हाय राम!! मैं कहाँ जाके मरूं,अरे लड़के कभी थ्रेडिंग कराते हैं क्या?? कैसा पागल समान बात करती हो बंसी।।””

“जानती हो दीदी लड़के काहे थ्रेडिंग नही कराते जिससे उनका बात सही साबित हो जाये कि ‘ मर्द को दर्द नही होता’ अरे जब तक औरतों वाले काम करोगे ही नही तब तक दर्द पता कैसे चलेगा।।

“अरे सुन ना हमको पता है तू बहुतै ज्ञानी है,अभी चल हमारे साथ कम से कम क्लीन अप करा ले लड़की!!!चल बुआजी की बात का लाज रख ले………..अम्मा तुम आज रात के खाने पे आलू टिक्की बना लो,जिससे हमारी धमल्लो खुस हो जाये,चल अब टिक्की के नाम पे चल पार्लर।।”

जाने क्या सोच बाँसुरी वीणा के साथ चली गई,लौटते में उसे जिम में रुकना था भैय्या जी को सुबह 7:30 पे ज्यादा कुछ पढा नही पाई थी इसीसे शाम 4 का समय फिर से दिया था,,4बजे निरमा वहीं पहुंचने वाली थी।।
   
        पार्लर से लौटते हुए बांसुरी ने जैसे ही जिम में रुकने की इच्छा जाहिर की,वीणा का मन मयूर नाच उठा,अपने मोहल्ले की परिपाटी को निभाते हुए वो भी किसी ज़माने में भैय्या जी की फैन हुआ करती थी,पर नारी सुलभ शील संकोच ने खिड़की से झांक लगा के रोड पे जॉगिन्ग करते भैय्या जी को देखने से ज्यादा की अनुमती नही दी और फिर सरकारी नौकरी करते यू डी सी का आया चमचमाता रिश्ता उसके घर वालों ने लपक लिया,और कभी भैय्या जी को बड़ी अदा से राजकुमार बुलाने वाली वीणा भी संसार के सुर में सुर मिलाती भैय्या जी बोलने लगी।।
   
        पर आज बांसुरी की इच्छा सुन उसके मन में सोया प्यार जाग उठा,,अरे अपने प्रथम प्यार को एक झलक देख लेना पतिदेव से चीटिँग थोड़े है !! वो तो बस ऐसे ही………जैसे लगातार चलते बोरिंग से सीरियल के बीच सलमान खान का तूफानी ठंडा एडवरटाइजमेंट ……….जैसे थाली भर बेस्वाद खिचड़ी के साथ भरवा लाल मिर्च का अचार!!! हाय !!
  
       “ठीक है चलो फिर बंसी!! हम भी तुम्हारे साथ जिम चले चलतें हैं ।”

  “काहे?? तुम क्या करने जाओगी दीदी??”

  “अरे तो तुम का करने जा रही हो,,पतला होने का भूत सवार हो गया क्या??”

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भैय्या जी नही चाहते थे कि उनकी ट्यूशन वाली बात जिम से बाहर लीक हो इसिलिए उन्होनें अपनी आदत के अनुसार बांसुरी को ‘मम्मी की कसम’ खिला दी थी,अब उस कसम के बोझ तले दबी बाँसुरी ने असल कारण नही बताया- “हाँ दीदी हम सोच रहे थोड़ा जिम वीम करें,बहुत हट्टी कट्टी हो गये हैं …… नही!!”

“हाँ हो तो गयी हो एकदमी टुनटुन लगने लगी हो।।”

“अब इतना तारीफ भी मत करो दीदी,हम सोनाक्षी सिन्हा जैसे फिगर के हैं ।”

“ओह्हो बड़ी आई सोनाक्षी!! तो अब का करीना बनने का विचार है।।”

“अब यही मान लो दीदी,बचपन से हमे जानती हो,जो ठान ली तो फिर कर के रह्ते हैं,है ना!!, अब तुम जाओ,हम एक घंटा में घर आ जायेंगे।”

बड़े बेमन से जिम में झांकती फाँकती वीणा घर की तरफ मुड़ गई,उसे बाँसुरी पे पूरा पूरा विश्वास था,कि  चाहे प्रलय आ जाये राजा भैय्या उसकी छुटकी बहन जैसी रूपवती पे कभी दृष्टिपात नही करेंगे, इसी विश्वास पे अडिग बाँसुरी को वहाँ अकेली छोड़ वो घर चली गई ।।

   बाँसुरी वहाँ पहुंची तो निरमा और प्रेम एक ट्रेड मिल पे बैठे गप्पे मार रहे थे,भैय्या जी ज़मीन पे योगा मैट बिछाए किताबों के जाल मे उलझे बौराये बैठे थे,,दो चार छुटभैये इधर उधर वर्जिश करने की बहुत बुरी एक्टिंग कर रहे थे ।।
         हड़बड़ाती हुई बांसुरी अन्दर गई और भैय्या जी के पास पहुंच के बैठ गई,और किताबें देखने लगी

“अरे इत्ता सारा किताब काहे ले आये,आपको सिर्फ बारहवीं पास करना है,कोई आई ए एस थोड़े ही बनना है अभी।।”

“हमारे पास जो जो रख्खा था,हम सब उठा लाये,काम की तो सभी है ना।।”

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“नही!! आपके काम की कोई नही….आप मान लिजिये कि आप गधे पैदा हुए हैं,स्कूल मे भी गधे ही रहे और कॉलेज में भी गधे ही रहेंगे।।’

“भैय्या जी आपका लिहाज करके चुप हैं,समझा दीजिये इस लड़की को,कहीं हमारा दिमाग सटक गया तो हमारे हाथ से खून ना हो जाये इसका।”
एक गपोड़ी चिल्लाया

   भैय्या जी ने बिल्कुल सरकार वाले अमिताभ की स्टायल मे उसे हाथ दिखा के चुप करने का इशारा किया और बाँसुरी से बोले-“काहे हमरा इतना बेज्जती करती हो बात बात पे!! क्या मज़ा आता है इसमें ।”

“अरे तुम्हारी बेइज्जती नही कर रहे भई!! बस इत्ती सी बात कह रहे कि इतना सब किताब को मारो गोली,बस एक किताब पकड़ो नाम है ‘ युगबोध’!! और उसमें भी सब पढ़ने का ज़रूरत नही है,हम पिछले दस साल का पेपर देख के महत्वपूर्ण सवाल टिक कर देंगे,बस उसी उसी को तुमको रट्वा देंगे,,समझे।।”इतना सब किताब पकड़ के रट्टा मारोगे,हाथ में और दिमाग में दर्द हो जायेगा,समझे।

“देखा भैय्या जी ई लड़की फिर आपका बेज्जती कर रही,अरे भैय्या जी मर्द हैं ,उनको किताब पकड़ने से दर्द नही होता।।”

“का नाम है तुम्हारा ??”

“प्रिन्स!! प्रिन्स नाम है हमारा।”चेले ने सीना ठोक के जवाब दिया,उसे नही पता था कि उसने कैसी चतुर बिलाई से पंगा ले लिया था।।

“तो प्रिन्स तुम मर्द नही हो??”

“अरे काहे नही है,,हम भी हैं ।”

” जल्लाद देखे हो कभी?? कैसा दिखता है।”

“नही असली का नही देखे,,हम पिच्चर वाला जल्लाद देखे हैं ,अरे वही मिथुन चक्रवर्ती वाला जल्लाद।”प्रिन्स के चेहरे पे अभूतपूर्व ज्ञान की छटा फहर रही थी।।

“ब्यूटी पार्लर जानते हो?? वहाँ जो काम करती है ना, असल में वो जल्लाद होतीं हैं,समझे !!! भयानक खून की प्यासी!!
       पीपल पे उल्टी लटकी चुड़ैल भी इन पार्लर वालियों से बहुत डरती हैं ।।”

“आपको  कैसे पता बाँसुरी मैडम जी ।।”भैय्या जी ने अपनी भोली मुस्कान बिखेरते हुए पूछा ।।

“अरे कभी टी वी पे किसी भूतनी को मेक’प किये देखे हैं क्या?? सब बाल बिखराये पगलाये घूमती हैं ।।”

“आप मजाक बहुत करती हैं,हैं ना!!” भैय्या जी हँसते हुए बोले

“नही मजाक नही कर रहे,,आज ही दोपहर को हमारी दीदी और हमारी बात हो रही थी,मर्द और औरत की बराबरी के बारे मे….हम बोले मर्द कभी औरत का बराबरी कर ही नही सकते,जितना दर्द औरत झेल सकती है ,मर्द झेल पायेंगे भला??”

“ए बांसुरी तुम बहुत जादा बोलती हो,कहाँ हम मर्द और कहाँ तुम औरतें ।।।प्रिन्स की बात सुन बाँसुरी ने अपनी बीन बजानी चालू रखी

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  ”  तो प्रिन्स बाबू इतने बड़े मर्द हो तो आ जाओ अखाड़े में ब्यूटी पार्लर के ,और फिर हम देखेंगे तुम्हरी मर्दानगी ….एक कुर्सी मे बैठा दो एक लड़की को और दूसरे में तुम्हें या किसी भी मर्द को ,हम लिख के दे रहे हैं बाबु  , जब यमराज जैसी शकल की दो ब्युटिशियन हाथ में धागा पकड़ी भौंहो को नोचने आयेंगी ना तब तुम ससुरे मर्द ज्यादा जोर से चिल्लाओगे ।।
     अरे थ्रेडिंग तो सबसे सिम्पल दर्द है।।।जब दो खतरनाक खूनी खेल खेलने वाली नागिन आयेंगी तुम्हारे सामने और उनमें से एक तुम्हारा खरीफ की फसल से लहलहाता खेत वाला  हाथ पकड़ के उबलता हुआ वैक्स पलट देंगी और उसके बाद अपनी आंखों से आग उगलते हुए एक बोरी का टुकड़ा तुम्हारे हाथ पे बिछा के उसको जमा के जोर से सटाक !!!खींचेंगी ना तब कसम से कह रहे तुम्हें तुम्हरी अम्मा के साथ साथ नानी भी याद नही आ गई ना तो हमारा नाम बदल देना,,एक बार सह के देखो वो दर्द बबुआ और फिर बोलो मर्द को दर्द होता है कि नही….ऐसे बिलबिला के भागोगे ना कि सीधा मंगल यान से उड़ान भरोगे फिर चाहे कोई कितना  भी आवाज़ दे ले रुकने वाले नही  तुम मर्द!!!
          बड़े आये मर्द!!! खुद को कुच्छो नई कराना और हम सलगे ज़माने का दर्द झेले इनके लिये।।

“और सुनो ये फेशियल से चेहरा चमकाने का दावा करने वाली नागिने सबसे पहले चेहरा साफ कर चेहरे पे ब्लीच पोत देती हैं,वो कभी चेहरे पे पुतवा के देखो,रोंम रोम से ऐसे अंगारे फूटेंगे की जीते जी नरक की दावग्नी का स्वाद चख लोगे बबुआ।।
     ये सब करा लो उसके बाद हमसे कहना कि मर्द को दर्द नही होता।।”

“अरे बंसी !! हुआ क्या?? इत्ता काहे भरी बैठी हो।।”निरमा के पूछते ही बाँसुरी का ध्यान गया कि वो पढ़ना पढाना छोड़ कर बस इधर उधर की बतकही में लगी है।।

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  “अरे कुछ नही निरमा आज हमें दीदी जबर्दस्ती पकड़ के पार्लर ले गई थी,और बस ये ही कोई काम बिना मर्ज़ी के करना हमे पसंद नही।।”

“अरे कोई बात नही मैडम जी !! पर एक बात है,,आज आप अच्छी भी लग रही हैं ,कुछ कुछ सोनक्षी सिन्हा जैसी  ।।” राजा भैय्या के ऐसा बोलते ही बांसुरी मुस्कुरा पड़ी -” पर राजा हमें सोनाक्षी नही पसंद,हमें तो श्रीदेवी पसंद है,भले ही हमारी मम्मी के जमाने की हेरोइन है पर पसंद वही है।।”

  राजा भैय्या का मुहँ खुला रह गया क्योंकि दिल ही दिल में उनके भी ख्वाबों की शहजादी श्रीदेवी ही थी।।उनके आसमान के बादल श्रीदेवी के दम पे थे और उस आसमान की बिजलियां थी श्रीदेवी की अंगड़ाई ।।

“तो क्या हुआ आप बन सकती हैं श्रीदेवी !! अगर आप चाहें।”

“वो तो ठीक है पर तुम हमें ये आप आप क्यों कहते हो,तुम हमें बाँसुरी ही कहा करो,जैसे हम तुम्हें राजा कहते हैं ।।”

“ठीक है,,अच्छी बात है,तो अगर बुरा ना मानो तो एक बात कहें बांसुरी,तुम जिम शुरु कर दो।।तुम हमें पढ़ा दिया करो,और हम तुम्हें कसरत करवायेंगे, बस छै महीने मे तुम पूरी श्रीदेवी बन जाओगी।।”

“हाय !! सच्ची”

“और का! चाहे तो हम मम्मी की कसम खा लेते हैं ।”

“अरे नई नई कसम ना खाओ,,चलो तो फिर कल सुबह से हम आते हैं ,सुबह व्यायाम और शाम को पढ़ाई,ठीक है??”

“ठीक है।”राजा भैय्या ने मुहर लगा दी।।

बाँसुरी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और राजा भैय्या ने अपनी मैनिक्यूर्ड (मैनिक्यूर की हुई जैसी दिखती)
उंगलियों से उसका हाथ थाम लिया।।

    एक तरफ जहां राजा भैय्या बांसुरी की बुद्धिप्रद कुशाग्र बातों में आकन्ठ डूबते जा रहे थे ,वही बाँसुरी को भी भैय्या जी की भोली हरकतों मे कम से कम बात करने लायक मित्र की झलक मिलने लगी थी।।

  बांसुरी ने जाते जाते पलट के प्रिन्स को बुलाया, प्रिन्स जो अभी तक ब्यूटी पार्लर के स्केरी हाऊस के डर के साये मे कांप रहा था,चुप चाप आकर उसके सामने खड़ा हो गया।।

“ए सुनो!! इतना ना डरो ,तुम्हे इस जनम पार्लर नही जाना पड़ेगा।।और एक बात कहें??”

“जी बांसुरी जी !! कहिये।।”

“ये जो शर्ट के दो बटन खोल के सिंघम बने घूमते हो ना कुछ नही होने वाला बबुआ,एक तो दिखते हो जैसे टी बी का मरीज एकदम सुख्खड़,,और उसपे बटन खोले और अपनी सच्चाई दिखा देते हो….
बन्द करो वर्ना लड़कियाँ तुम्हरे फेफड़े की हड्डियां गिन डालेंगी,और फिर शर्त लगाएंगी ,एक बोलेगी 12थी रे तो दुजी कहेगी नही मैनें तो 14 गिनी।।

हँसते हँसते बांसुरी और निरमा घर निकल गये।।

क्रमशः

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aparna..

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शादी.कॉम-3

राजा भैय्या के भलमनसाहत के किस्से जितने फेमस थे उससे कहीं ज्यादा भैय्या जी के कातिल रंग रूप के चर्चे थे मोहल्ले की लडकियों के बीच।।।।
      क्या कुंवारी कन्यायें और क्या शादीशुदा ,सभी सुबह सुबह भैय्या जी एक झलक पाने को किसी ना किसी बहाने अपने द्वारे खिंची चली आती,कोई खिड़की से झांक लेती कोई छत से,कोई उसी समय अपने कुत्ते को टहलाती ,कोई अपनी गाय का सानी भूसा करती, सब चोर नजरों से राजा भैय्या को एक झलक देख कर ही तृप्त हो जाती,और भोले भंडारी राजा भैय्या इन सब बातों से बेखबर सुबह सुबह अपने जिम पहुंच जाते।।

     नीले रंग का  ट्रैक सूट पहने  अपनी रेशमी ज़ुल्फे उड़ाते राजा भैय्या जॉगिन्ग ट्रैक पे दौड़ते हुए जाने कितने कन्या रत्नों का हृदय अपनी मुट्ठी में भींचे दूर तक दौडे चले जाते….. और पीछे रह जातीं उनकी अनन्य प्रशंसिकायें।।।

   लेकिन इसके बावजूद राजा भैय्या को अपनी किसी खूबी का कोई गुमान ना था,वो तो बेचारे रात दिन इसी जुगत में रहते कि कोई भगवत कृपा हो जाये और वो बारहवीं किसी तरह पास हो जायें।।
  स्कूल तो वो दो साल पहले ही त्याग चुके थे,अभी दो बार से प्राईवेट एग्ज़ाम दिलाने पर भी जाने शनी की कैसी साढ़े साती उनके बोर्ड एग्ज़ाम पे तिर्यक दृष्टी लगाये बैठी थी कि बेचारे अपने फेल होने के बोझ तले दबे जा रहे थे।।

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       ******************************
  
  वैसे तो हर माँ की तरह प्रमिला को भी अपनी बेटियों पे नाज़ था,पर बाँसुरी में उसके प्राण बसते थे,बसे भी क्यों ना एक तरफ जहां वीणा अपनी ही सज धज में लगी रहती वहीं घर भर में सिर्फ बांसुरी ही थी जो अपनी माँ की सबसे ज्यादा कदर किया करती….शायद ही किसी घर की बिन ब्याही कन्या ऐसा करती होगी जैसा बांसुरी करती नित्य सुबह अपनी माँ से पहले उठ कर रसोई को पोंछ पाछं कर माँ के जागने पे उनके हाथ गर्मा गर्म चाय पकड़ ,अपनी चाय लिये छत पे चली जाती और पढ़ने में लग जाती।।,दिन भर में सिर्फ यही एक काम बांसुरी करती पर उसी एक काम से प्रमिला को दिन भर अपनी गृहस्थी में जुते रहने की खुराक मिल जाती, जाने क्यों प्रमिला को हमेशा ऐसा लगता कि कभी ना कभी उसकी इस बावली छोरी के लिये कही से कोई राजकुमार ज़रूर आयेगा।।
     उसे अपनी बिटिया की बुद्धिदीप्त चमकती आंखों पर बड़ा नाज़ था,पर आजकल कुछ दिनों से उसकी राजकन्या के लिये बुआ जी जैसे आड़े तिरछे नकटों के रिश्ते ला रही थीं,कहीं ना कहीं अब उसके भी मन में विवाह को लेकर सन्देह की स्थिति उत्पन्न होने लगी थी।।

  “लाड़ो !! ले चाय पी ले,बड़ी शाम हो गई,तू क्या पढ़ी जा रही ,इतना ना पढ़ा कर,चश्मा ना लग जाये।”

“अरे मम्मी हमें कोई चश्मा वश्मा नही लगेगा,और सुनो बहुत पढ़ने से चश्मा नही लगता ,समझी !! देखो हम ये जो इत्ता सारा पढ़ते हैं ना,इससे हमारी नौकरी लगेगी बैंक में,फिर पहले अपने दिमाग से बैंक का वारा न्यारा करेंगे और बाद मे बैंक हमारा।’

“बिटिया एक काम और कर लिया करो,ये देखो तुम्हरे लिये का लाए हैं ।”

“का रखी हो दिखाओ, हैं ये क्या फेयर ऐण्ड लवली।”

“हाँ लाड़ो,हम जानते हैं तुम्हे चेहरे पे कुछ लगाना पसंद नही,पर देखो आजकल की सब लड़कियाँ इहै लगा रही,और टी वी में देखी हो,कैसी कोयला रहती हैं औ ये लगा के कैसी फकफका के गोरिया जाती हैं ।

“अरे मम्मी तुम भी बच्चों जैसी बात करती हो यार! वो लड़कियाँ ऑलरेडी गोरी होती है,उनको तो पहले काला बनाते हैं,मेक’प वाले,अब हमारे को तो कान्हा जी ही काला बना के भेजे हैं,अब इसपे और का रंग चढाये,बताओ।।”

“अरे वीणा की अम्मा ,हम भी आफिस से आ गये हैं,हमें भी कुछ चाय वाय दे दो,या दोनो माँ बेटी लगी रहोगी गप्पे मारने में ।”

“सुनो बांसुरी कम से कम एक काम तो कर लिया करो,रोज ना लगाओ पर बिटिया कही आने जाने के टाईम तो लगा ही सकती है,महंगी क्रीम है भाई खरीद के लाएं हैं तुम्हरे लाने,औ तुम मुहँ बिचका रही हो।”

बांसुरी ने अपनी अम्मा के हाथ से फेयर ऐंड लवली का डिब्बा लेकर अपनी टेबल पे रख लिया और मुस्कुरा दी,अम्मा भी खुशी से नीचे उतर गई

“अरे जाते जाते बताती तो जाओ ,रात के खाने में का बना रही हो मम्मी।।”

“कढ़ी,गुलगुला बना रहे हैं,ठीक है।”

“ठीक है!!”कढ़ी के नाम पे बांसुरी का खराब से खराब मूड भी बन जाता था।।

    बाँसुरी ठीक सुबह 8 बजे अपनी सहेली निरमा के साथ कॉलेज जाती और 1बजे तक वापस आ जाती।।निरमा का घर पीछे वाले मोहल्ले में था,और उसी तरफ के रास्ते से उनका कॉलेज पड़ता था,पर इसके बावजूद निरमा पहले बाँसुरी के घर आती,वहाँ चाय नाश्ता कर दोनो सहेलियां कॉलेज के लिये निकलती ।।
       बाँसुरी की अम्मा वाकई बहुत स्वादिष्ट भोजन बनाती थी,इसका जीता जागता इश्तेहार स्वयं बाँसुरी थी,और इसीसे बाँसुरी को लगता था की उसकी अम्मा के हाथ का स्वाद नाश्ता सुबह सुबह निरमा को उसके घर खींच लाता है,पर बाँसुरी का ऐसा सोचना सर्वथा गलत था।।

    निरमा और बांसुरी के कॉलेज के रास्ते पे राजा भैय्या का जिम भी पड़ता था,और सुबह के समय राजा भैय्या अपने चेले चपाटो को सलमान खान जैसी बॉडी बनाने की ट्रेनिंग दिया करते थे,उनकी ईमानदार टुकड़ी में एक ऐसा भी बंदा था ,जो इतनी सुबह कसरत के इरादे से ना आकर निरमा को ताडने के इरादे से वहाँ आता था,और जिम के बाहर बनी सीढिय़ों पे बैठा निरमा के वहाँ से निकलने का इन्तजार किया करता था,निरमा के वहाँ से निकलते ही जिम में जाकर थोड़ा इधर उधर कुछ समय खराब कर घर को निकल जाता था….पर ऐसा नही था कि वो अकेला ही दोषी था,,आग दोनो तरफ बराबर लगी थी।।
     निरमा और प्रेम पिछले कुछ समय से एक दूसरे को पसंद करते थे,पर राजा भैय्या के सामने कुछ भी बोलने की प्रेम की हिम्मत नही थी इसिलिये उसने एक उपाय सोचा और रमा को अपना आइडिया बता दिया।।

   “हम सही कह रहें हैं बंसी,तू एक बार सोच के देख ना।””

“अरे हम क्या सोचें,अगर उसे ट्यूशन पढना ही है,तो आके हमसे बात करे,हम थोड़े ना खुद जायेंगे ,, कभी सुनी हो क्या कि गुरू खुद चेला के पास जा रहें हैं कि आओ बबुआ तुम्हें पढ़ा दें,और फिर निरमा हम सुने हैं ओ राजा बहुतै गधा है।”

“हाय हाय राजा भैय्या के लिये ऐसा कैसे बोल रही हो,जानती नही कितना परोपकारी हैं बेचारे।”

“अरे तो परोपकार से उनका गधापन छुप जायेगा ? गधा है तो है, वैसे विषय क्या लिये हैं,तुम्हारे राजा भैय्या??

“आर्ट्स वालें हैं ,,वकील बनना चाहतें हैं ।”

“हम्म,अच्छा किये आर्ट्स ले लिये क्योंकि कहीं गलती से गणित लेके पास हो जाते और इंजीनियर बन जाते तो सोचो क्या होता,,जो पुल बनाते उसमें तो ससुरे धनिया बो आते,और चारे दिन मे वो पुल जो भरभरा के गिरता जाने कितनों को स्वर्ग के द्वार पहुँचा देता।।
       डॉक्टर बन जाते तब तो साक्षात यमराज को उतरना पड़ जाता पृथ्वी पे कि राजा भैय्या इतनी फास्ट डिलीवरी ना भेजिए,हमारा भैंसा ढो नही पा रहा,और आप दनादन लोगों का स्वर्ग का टिकट काट रहे हैं ।।
     बताओ वकील बनना चाहतें हैं,अरे वकालत आसान है क्या,पर चलो वो तो बाद की बात है, अभी इनको आर्ट्स पढा के बारहवीं की नैय्या तो पार लगाएं ।।
   फिर कुछ सोचते हुए बाँसुरी ने कहा -“ठीक कह रही हो यार,उस दिन बाबूजी का स्कूटर खराब हो गया था तो यही बिचारा खींचता हुआ पहुंचाया था घर तक,,चलो ठीक है,तुम्हारी मान के चलते हैं,पूछ लेते हैं,पढना चाहेगा तो हम बिना फीस के पढ़ा देंगे।।”

   प्रेम ने ही निरमा को ये आइडिया दिया था,इसी बहाने उसे लगा जब तक राजा भैय्या जिम में पढ़ाई करेंगे ,वो और निरमा साथ साथ बातें कर लेंगे और किसी दिन अच्छा सा मौका देख के भईया जी को सच्चाई से अवगत करा देंगे,अब इधर निरमा ने तो बाँसुरी को पढ़ाने के लिये मना लिया पर प्रेम की इस बारे में राजा से बात करने की हिम्मत ही नही हुई।।
    कॉलेज के लिये कुछ जल्दी निकल कर बाँसुरी निरमा के साथ जिम पहुंच गई

“ए राजा इधर आओ,सुनो हमारी बात।”

बाँसुरी की इतनी तीखी पुकार सुन सारी चंडाल चौकडी के कान खड़े हो गये,उनमें से एक लपक के सामने आया।।

“ए मोटी!! तुमको का बात करने का तमीज नई है, सब्बे भूला गई हो का,भैय्या जी का अईसे नाम पुकार रई हो।”

“तो और कैसे पुकारें तुम्हारे भैय्या जी को।?”

“राजा भैय्या बोलो जैसे सब बोलते हैं,समझी।”

“काहे बोलें,हम तो नाम ही लेंगे।”

“अरे ए धमल्लो,भईया जी कम से कम तुमसे दस बरस बड़े होंगे।।”ये दूसरा अनुचर चिल्लाया।।

तब तक में भैय्या जी बांसुरी तक पहुंच गये।।

“हां तो होने दो दस साल बड़े,कक्षा में तो हमी सीनियर हैं,तो इस हिसाब से इनको हमें मैडम बोलना चाहिये,समझे घसियारों !!!!,कभी स्कूल कॉलेज जाओगे तभी तो सीनियर जूनियर पता पड़ेगा।।

” अरे फेल होने से का होता है,बड़े तो हैं ही उमर में,जितने के भैय्या जी हैं इतने उमर में तो बड़के भैय्या का ब्याह भी हो गया रहा,ऊ तो भैय्या जी कसम खा के बैठ गये कि बारहवीं पास कर के ही ब्याह करेंगे,वर्ना तो हम लोग अभी तक इनका लड़का बच्चा खिला रहे होते।।”

“बस करो तुम लोग ,,सालों कितना बेज्जती कराओगे हमारी।” इस बार राजा भैय्या गरजे

“हां बताईये मैडम जी,कैसे हमारे जिम मे आना हुआ आज आपका , 6महीना का कोर्स करना है आपको,या साल भर का,वैसे 6महीना का कोर्स कठिन होगा।।”

“अरे हम काहे का कोर्स करेंगे भई ।”

बाँसुरी ने पूछा –
     “हमें लगा आप पतले होने के लिये आई हैं ।”

राजा के ऐसा बोलते ही बाँसुरी हिल हिल के हंसने लगी।।

“अरे नही हो राजा बाबू,हम यहाँ आपको पढ़ाने आये हैं,ट्यूशन !!वो भी बिना फीस के,अब समझे।।”
अब कितने साल लुढ़कते रहोगे,हमारे मोहल्ले की नाक का सवाल है,पर एक बात बोलें शकल से तो इतने गधे नही लगते हो,अरे नकल कर के ही पास हो जाते,नकल करना भ्रष्टाचार थोड़े है,नकल करने से देश की अर्थव्यवस्था पे भी कोई असर नही पड़ता,फिर काहे इतना ईमानदारी दिखाये भई ।।”

राजा भैय्या के गोरे चेहरे पे जैसे किसी ने मुट्ठी भर अबीर बिखेर दिया,बेचारे लजा के गुलाबी पड़ गये ,फिर धीमे से बोले-

“ऊ हम एक बार कोशिश किये थे,नकल मारने की, पर फुर्रे में जो लिख के ले गये थे उसको जल्दी जल्दी में मोजे के अन्दर डाल दिये और स्कूल जाते समय भूल गये और रास्ते में भरे पानी में छलांग लगाते स्कूल पहुँचे,जब वहाँ पेपर देख के अपना पर्ची ढूँढे तो वो पूरा गीला होके पूरा लिखा मटिया मेट हो गया रहा ।”

“धत ऐसे भी कोई चीटिंग करता है,तुमको तो चीटिंग करना  भी नही आता राजा।”

“अरे सुनो तो एक बार और कोशिश किये थे,हमारी ये बड़ी बड़ी ज़ुल्फों के भीतर पिंकी की हेयर पिन से फुर्रा छुपा लिये थे।।

“फिर,फिर क्या हुआ?”

“फिर का,वहाँ क्लास में पिन बाल मे ऐसा फंसा कि हम थक गये पिन निकाल निकाल के ,पिन निकले ही नही,हमको इ सर्कस करता देख के आचार्य जी आये बेचारे वो भी पूरा मेहनत किये,फिर उनके साथ और दो लड़के मिल के ओ पिन निकाले ,पिन तो निकल गया पर फुर्रा आचार्य जी के हाथ में,!!!    ऊ देखे उसको उल्टा पुलटा कर के,पुछे चीटिँग करने लाये थे बबुआ??
   हम सर झुकाये खड़े रहे ,फिर फुर्रा हमारी ओर उछाल दिये बोले बेटा कर लो चीटिँग बन पडे तो।।।हम खुस……..।।देखे तो ऊ पर्ची का चिन्दी चिन्दी हो गया था,,ऐसा रोना आया की हम कसम खा लिये कि अब भले जीवन भर पास ना हो पाये पर नकल नही करेंगे।।”

“तुम कसम बहुत जल्दी खा लेते हो राजा, तुम्हारी अम्मा खाना नही देती का।”ऐसा बोल के बाँसुरी फिर हिल हिल के हंसने लगी।।

“ए बाँसुरी देखो हम तुम्हारा मजाक नई उड़ाते तुम भी हमरी अम्मा तक ना जाओ।।”

“अच्छा ठीक है,तो सुनो, राजा !!हम ठहरे गणित वाले ,और तुम हो आर्ट्स वाले,हम तुमको आर्ट्स पढायेंगे वो भी मैथ्स के स्टायल में,समझे।।”

“नई समझे,इत्ते  समझदार होते तो पास ना हो जाते।”

“बात तो सही कह रहे तुम!!  अच्छा सुनो देखो हम कुछ पते की बात बताते हैं,,देखो विद्यार्थी दो तरह के होते हैं-पहला वो जो विद्या के सही अर्थों को जान ले समझ ले और अपने ज्ञान से संसार को तृप्त कर दे जैसे हम यानी बाँसुरी तिवारी ।।
  और दूसरे वो जो विद्या की अर्थी निकाल दे जैसे तुम यानी राजकुमार अवस्थी।।
तो बेटा राजा बाबू तुम अब कुछ जादा ही फेल हो लिये हो,तुम्हारा ये तकलीफ अब हमसे देखा नही जा रहा,वो क्या है ना ,जैसा तुम दुनिया को स्वस्थ बनाने का जिम्मा लिये हो,वैसे ही हम दुनिया को साक्षर बनाने का जिम्मा ले लिये हैं,अपने इन
नाजुक कंधो पे।।
   बस एक छोटी सी शर्त है हमारी,हफ्ते में एक दिन तुम हमें समोसा खिलाओगे,ठीक है?”

“खिला देंगे उसमें कौन बड़ी बात है? हम तो ई अटरम शटरम नई खाते पर तुम्हारे लिये हफ्ते में एक बार हमरे जिम में हम पार्टी कर देंगे ,एक दर्जन समोसा मंगाने मे का जायेगा हमरा?”

“काहे ?? हम अकेले खाएंगे का,ई बाकी के तुम्हारे घसियारे भी समोसा नई खाते का??”

“एक दर्जन तुम सब के लिये ही बोल रहे हैं भाई।”
राजा भैय्या की बात सुन बाँसुरी फिर हिल हिल के हँस पड़ी-“अरे एक दर्जन तो हम सिर्फ दसै मिनट में गप कर जाते हैं राजा बाबू,खैर चलो वो सब तो बाद में देख लेंगे ,अभी तुम्हें और कुछ ज़रूरी बात बता दे।”

“रुको तुम सब ज़रूरी बात बता देना पहले हमको
एक बात बताओ,तुम्हरे मन मे अचानक ये परोपकार कैसे जागा,हमे पढ़ाने कैसे चली आईं,हमारे बाबूजी कुछ बोले का तुमसे,या बडे भैय्या।।”

“नही !!!
       ना तुम्हारे बाबूजी ना बड़के भैय्या,हमे साक्षात सरस्वती मैय्या सपने में आ के बोली कि बाँसुरी तुम बुद्धि का पिटारा हो और तुम्हारे मोहल्ले का एक सांड लगातार फेल होता जा रहा है, और बोली की जाओ उस नादान की मदद करो,उसे पढ़ाओ,तो बस देवी मैय्या की इच्छा पूरी करने हम आ गये।।”

भैय्या जी प्रभावित !! नतमस्तक हो उन्होने बाँसुरी को नमस्कार किया।।

“सुनो राजा ,कुछ ज़रूरी पॉइंट!!! पढ़ने से पहले दिमाग में ये रखो की तुम्हें कैसे पास होना है,पढा तो हम देंगे पर पास होना ना होना तुन्हारे हाथ है।।
हम पहले भी बताये ना ,जो हमारे जैसे विद्यार्थी हैं वो पढ़ाई का भला करने पढ़ते हैं,पढ़ाई और किताबें हमे देख कर खुश होतीं है,पर जैसे ही तुम जैसों के हाथ आतीं हैं सौ सौ आंसू बहा के रोती है बेचारी।।
तो इसका मतलब ये है कि तुम्हरे पढ़ने से किसी का कोई फायदा नही है,तुम्हारे जीवन का एक मात्र लक्ष्य होना चाहिये पास होना।।।

साम दाम दण्ड भेद जिस तरीके से पास हो सको वैसे कोशिश करो और पास नही हो पाओ तो कोशिश करो की पेपर ही कैन्सिल हो जाये।।

“अब आज के लिये इत्ता सारा ज्ञान बहुत है,हम कल सुबह 7:30पे आयेंगे,अपनी सब किताबें ले कर आना,रख्खे तो हो ना किताबें की, कबाडी को बेच आये हो।”

“अब हम तो इत्ते साल से देखे ही नही,अम्मा से पूछना पड़ेगा किताब रख्खी हैं हमारी कि बेच डाली ,वैसे अम्मा को नही हमारे बाबूजी को ऐसे चिन्दी बेच के पैसे जमा करने का अजीबै शौक है।।
घर भर का पेपर रद्दी सद्दी जमा करेंगे और उसको चौक के ऊ पार नत्थू कबाड़ी के वहाँ बेचने जायेंगे, हम बोलतें भी हैं कि हमारे फ़ोन करने से वो घर आ जायेगा लेने तो बोलतें है घर आता है तो कबाड़ का दू रुपैय्या कम देता है,अब का बोले,इ बुढ़ापे में स्कूटर पे घिटर पिटर जातें हैं ।।”

“अर्र्रे राजा !!! बाबूजी को बोलना स्कूटर में चार रुपैय्या का तेल जला देते हो चौक तक जाके उससे तो कम नुक्सान है ना नत्थु घर आके ले जायेगा तो।।”

राजा भैय्या को आज पहली बार बड़के भैय्या से भी कहीं ज्यादा तेज़ दिमाग का कोई मिला था,अन्दर ही अन्दर वो बाँसुरी के पैने दिमाग का लोहा मान चुके थे,उन्होनें अपने नये नवेले गुरू को प्रणाम किया,बांसुरी मुस्कुरा कर कॉलेज निकल गई,और भैय्या जी उसकी बातों और विचारों को सोचते सोचते क्रॉस ट्रेनर पे चढ़ गये।।

            *********************

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   इधर बाँसुरी और निरमा कॉलेज पहुँचे ,आज निरमा  की खुशी संभाले नही संभल रही थी,अब उसे और उसके पहले प्यार को एक पर्मानेंट अड्डा मिल गया था,जहाँ दोनो अपने प्रेम को साकार कर सकते थे,ढेरों बातें कर सकते थे,एक दूसरे को नज़र भर देख सकते थे,अभी दोनों कॉलेज में प्रवेश कर ही रही थी कि गेट पे खड़े मजनुओं की टोली में से किसी ने बड़े सुरीले स्वरों को छेड़ दिया-

“वॉशिंग पाउडर निरमा,वॉशिंग पाउडर निरमा!!  ढूध सी सफेदी निरमा से आई,रंगीन कपड़ा भी खिल खिल जाये,सबकी पसंद…..”

अभी गायक अपने गायन को चरम पे पहुंचाता उसके पहले ही बाँसुरी पहुंच गई

“काहे बहुत गाना फूट रहा है,क्या बात है??”

“हम तो गाने में ही बता दिये का बात है,तुमको जलन तो नही ना हो रही कि तुमको नही छेड़े ।”

इतना कहते ही सब खी खी हंसने लगे

“तुम्हारा औकात भी नही है,हमको छेड़ने का समझे,अभी एक हाथ देंगे ना बत्तिसी बाहर आ जायेगी,,फिर हम भी वो वाला विज्ञापन है ना, का हो राजू तुम्हारे दांत तो मोतियों जैसे चमक रहे हैं,वही गा गा के सुनायेंगे।समझे बेटा,।।”

“एक्सक्यूज़ मी!! क्या चल रहा है यहाँ ।”बहुत भारी गहरी सी आवाज़ सुन बाँसुरी के साथ सभी आवाज़ की दिशा में पलट के देखने लगे

आवाज़ देने वाले ने बहुत शालीनता से बाँसुरी को देखा और पूछा-“क्या ये लोग आप लोंगो को परेशान कर रहें हैं?”

“हां कर रहे हैं बे!! बोलो का करोगे?? जादा चौधरी ना बनो,समझे।”उनमें से एक कूद पड़ा

“नही समझे,आप समझा दीजिये,कि अगर मैं बीच में बोला तो आप महानुभाव क्या करेंगें।”

“तुम्हारा चौखटा बिगाड़ देंगे घूंसा मार के,वैसे तुम हो कौन बे,जो इतना चपड़ चपड़ कर रहे हो।”

“हम इस महाविद्यालय के एक छोटे से अदना से लेक्चरर हैं,गणित पढ़ाने आये हैं,नाम है भास्कर शुक्ला।”

“ओह हो हो पण्डित जी क्षमा करें “बोल के सारे लड़के गिरते पड़ते भास्कर की चरण धूलि ले लेकर वहाँ से भाग खड़े हुए।।

भास्कर मुस्कुराते हुए अपनी रॉयल एनफील्ड पे बैठ के कॉलेज के भीतर चला गया और जाते जाते बाँसुरी के नाज़ुक से दिल को भी अपने साथ ले गया।।

बाँसुरी के हृदय पर आज तक किसी के नाम की तख्ती नही लगी थी,इसका कारण लड़कों का उसमें रूचि ना लेना नही अपितु खुद बांसुरी का किसी लड़के को अपने लायक ना समझना था।।
    कॉलेज जाने वाली लडकियों पे अगर सर्वे किया जाये तो 70%लड़कियाँ लड़कों के लुक्स की जगह उनके स्वभाव और उनके दिमाग से प्रभावित होती हैं,उन्हीं 70% में बांसुरी भी थी।।। अपने प्रेम के योग्य पाना तो बहुत दूर की बात वो किसी लड़के को खुद से बात करने योग्य भी नही पाती थी।।
      जहां एक ओर मोहल्ले की सारी लड़कियाँ राजा भैय्या की दिवानी थी वही भैय्या जी के किलर लुक्स भी उसके हृदय में बसंत खिलाने में अक्षम रहे थे।।

    पर आज अचानक भास्कर को देख के बांसुरी की चिर प्रतीक्षा को विराम मिला,उसके हृदय को नया आयाम मिला,लम्बा चौड़ा छै फुट का लिवाईस की जीन्स और एरो की ब्लैक शर्ट पहनने वाला, रे बैन के ग्लासेस और वूडलैंड के जूते पहनने वाला इत्ता  हैंडसम लेक्चरर!!!
      उसपे रॉयल एनफील्ड का टशन!!! उफ्फ!!! क्या ऐसे भी पढ़ाने वाले होते हैं,,ऐसा टीचर हो तो कॉलेज की हर लड़की गणित ले कर ही पढना चाहेगी ,फिर चाहे वो एम एस डब्लयू वाली ही क्यों ना हो,और उसे दो और दो पूछो तो जवाब चार की जगह बाईस देने वाली ही क्यो ना हो।।”

  बांसुरी को मम्मी की फेयर ऐंड लवली की याद आ गई,आज तक नहाने के बाद उसने चेहरे को किसी तरह के पृलेप से दूषित नही होने दिया था,आज उसकी वही कमनीय त्वचा फेयर ऐंड लवली के स्पर्श को आतुर होने लगी,उसने कुछ सोच कर निरमा से कहा-

“निरमा हम सोच रहे,जब राजा को पढ़ाने जायेंगे ही तो थोड़ा बहुत व्यायाम कसरत भी कर लिया जाये क्या,तुम क्या सोचती हो इस बारे में?”

“हाँ हाँ क्यों नही,ये तो अच्छी बात है,हम भी कर लेंगे कुछ”

“अरे तुम तो ऐसे ही मरकट्टी रेगड़ी हो एकदम सुखी बिलाई लगती हो,और कितना दुबराओगी, हम थोड़ा ज्यादा ही हरे भरे लगते हैं,है ना ?”

“अरे नही बंसी तुम ऐसे ही प्यारी लगती हो,पर हाँ अगर थोड़ा कम हो जाओगी तो और प्यारी लगोगी,अच्छा बात है ये तो।”

“तो ठीक है,कल राजा को पढ़ाने के बाद पूछेंगे की क्या क्या करना है हमको।”

“नेकी और पूछ पूछ,कल तक काहे रुक रही,आज ही यहाँ से लौटते में पूछ लेना।।”

“अरे नही भई,आज सुबह सुबह हम बहुत सारा ज्ञान दे डालें हैं,अब शाम को पहुंच जाये कि हमको पतला कर दो,ये हमे शोभा नही देता,,कल जब पढ़ाने जायेंगे तब थोड़ा घुमा फिरा के स्टायल से बोलेंगे,,समझी।।”

“हाँ मेरी माँ समझी।।”दोनो सहेलियां खिलखिलाती हुई आगे बढ़ गई ।।।

क्रमशः

aparna…
  

शादी.कॉम

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शादी डॉट कॉम कहानी है …. एक ऐसी लड़की की जो सांवली है, मोटी भी है आज के ज़माने के हिसाब से कहा जाए तो किसी एंगल से सिंड्रेला नही लगती लेकिन आत्मविश्वास से लबरेज़ है….

शादी डॉट कॉम कहानी है … एक ऐसे लड़के की जो लंबा चौड़ा गोरा चिट्टा है, आज के ज़माने के हिसाबों से पक्का प्रिंस चार्मिंग है लेकिन दिल का उतना ही भला और मासूम है।

ये कहानी है दो बिल्कुल अलग विचारों के नायक नायिका के प्रेम बिछोह और फिर एक हो जाने की……

शादी डॉट कॉम कहानी है आप की या आप के आसपास किसी की… पढ़ते रहिये हो सकता है मेरे पात्रों में आप खुद को पा जाएं….

आ रही है बहुत जल्द मेरे ब्लॉग पर ….

शादी डॉट कॉम….