गुल्लक-3 ……

मेरी नजर से….. समीक्षा

आजकल के कानफोड़ू गाली गलौज और वीभत्स रस के स्पष्ट उदाहरण कहीं जा सकने वाली भयंकर एक्शन से सजी महा पकाउ और बोरिंग एक जैसी ढेर सारी वेब सीरीज के बीच मिडल क्लास फैमिली की सौम्य शांत और सभ्य कहानी गुल्लक आपके मन को मोह लेगी…

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गुल्लक टीवी पर चलती ढेर सारी सीरीज के बीच में बिल्कुल वैसी ही लगेगी जैसी तेज गर्मी में गन्ने के रस की रसवती फुहार या फिर बादलों की ओट से झांकती रिमझिम बारिश…

निखिल विजय की कहानी पर अमृत राज गुप्ता के निर्देशन में सजी गुल्लक सीजन 3 को tvf ने प्रस्तुत किया है सोनी लाइव पर 7 अप्रैल से यह सीजन ऑन एयर हो चुका है…

कहानी एक महा मिडल क्लास फैमिली की है। कानपुर का रहने वाला मिश्रा परिवार।

जहां एक पिता है संतोष मिश्रा, जो विद्युत विभाग में कार्यरत हैं… इनके दो बेटे हैं बड़ा अन्नू मिश्रा..जो इस सीजन में नौकरी पा चुका है और नौकरी भी उसने टिपिकल मध्यमवर्गीय पाई है। एमआर की पोस्ट पर काम करने वाला अन्नू मिश्रा तरह-तरह की जुगत लगा कर अपने कंपनी की सेल्स बढ़ाना चाहता है, और इसमें उसका साथ देते हैं उसके तीन और दोस्त! कहानी के तीसरे मुख्य किरदार है अन्नु मिश्रा के छोटे भाई अमन मिश्रा। जिन्होंने दसवीं में तीसरी रैंक कमाई है, और इसी कमाई के कारण इनके गुरु जी और परिवार वाले इन्हें साइंस दिलवाना चाहते हैं …लेकिन अमन मिश्रा जी की दिली ख्वाहिश है कि वे आर्ट स्ट्रीम को चुने और उपन्यासकार बने। कहानी की सबसे मुख्य पात्र है घर भर को अपने तानों से अशांत बनाए रखने वाली हमारी गृहिणी शांति मिश्रा जी, जिन्हें जब अपनी परेशानियों से निकलने का कोई रास्ता नहीं नजर आता तभी बड़े मंदिर के पंडित जी को बुलवाकर शांति पाठ रखवा लिया करती हैं….

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गुल्लक एक साधारण से सामान्य से परिवार की कहानी है जो देखते हुए आप बिल्कुल ऐसा महसूस करते हैं कि यह तो हमारे अपने घर की कहानी है… किरदारों के बीच के डायलॉग बहुत सिंपल से हैं लेकिन भाव से भरे हुए हैं…

सीजन 3 के पहले एपिसोड में अमन के स्कूल की लंबी चौड़ी फीस देखकर परेशान मिश्रा दंपति जब अपने बड़े कमाऊ पूत से पैसों के बारे में बात करने में हिचकते हैं तो उन्हें टीवी पर देखते हुए कई जोड़ा मां-बाप की आँखें उनकी उस पीड़ा को देख बरस पड़ती है..जब बड़ी मुश्किल से वह दोनों अपनी पूरी हिम्मत जुटाकर अन्नू से अमन की फीस के बारे में बात करते हैं तो अन्नू अपने महंगे ब्रांडेड जूते खरीदने के सपने को 1 महीने के लिए पोस्टपोन करके अमन के लिए अपनी जेब खाली कर देता है, लेकिन इसका बदला वो जल्दी ही अमन के बालों को नाई के पास ले जाकर कटवा कर पूरा भी कर लेता है… लेकिन इस सारे सीन में दोनों भाइयों के बीच की केमिस्ट्री बहुत लाजवाब ढंग से निखर कर आती है.. इसी के बाद किसी एपिसोड में जब छोटा भाई अमन अपने केमिस्ट्री लैब के फेलियर को अपने बड़े भाई के सामने स्वीकार करता है और साथ ही उसके सामने अपने मन की यह बात रखता है कि वह विज्ञान नहीं पढ़ना चाहता बल्कि आर्ट्स लेना चाहता है तब उसके सामने बैठा बड़ा भाई अन्नू अपने चेहरे के भावों से यह स्पष्ट कर देता है कि “कोई बात नहीं छोटे तुझे जो करना है वह कर तेरे ऊपर मेरा हाथ हमेशा था, है…और रहेगा।

कहानी के छोटे छोटे हिस्से इतनी बारीकी से रचे गए हैं जो बाप बेटे भाई भाई और माता पिता के आपसी संबंधों की मजबूती को बहुत अच्छे से और सुंदर तरीके से चित्रित करते हैं। कहानी में एक और मुख्य किरदार है बिट्टू की मम्मी जिन्हें इस ढंग से रचा गया है कि उनकी एंट्री पर ही हम और आप हंसने को मजबूर हो जाते हैं…

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सुनीता राजधर एक लाजवाब एक्टर है… बहुत बार वह बिना डायलॉग बोले सिर्फ अपने चेहरे के एक्सप्रेशन और अपनी बॉडी लैंग्वेज से ही दर्शकों को गुदगुदा जाती हैं। बिट्टू की मम्मी का किरदार एक बहुत खास किरदार है जो अक्सर गली मोहल्लों में हमारे अड़ोस पड़ोस में देखने को मिल ही जाता है…

कहानी की एक खास बात और है कि इस कहानी में घर की गृहिणी कभी अड़ोस पड़ोस में ताका झांकी करके गॉसिप नहीं करती। इस काम का भार पूरी तरह से घर के बड़े लड़के अन्नू के कंधों पर है… जैसे ही कोई भी घर का सदस्य किसी बात को जानना चाहता है और गलती से भी पूछ लेता है ,तो हमारे अन्नु मिश्रा जी पूरी तरह से तैयार होकर रामायण बांचने का काम शुरू कर देते हैं… अपने गली मोहल्ले के बारे में उनका नॉलेज अगाध है और अपने इस अभूतपूर्व नॉलेज को वह समय समय पर अपने परिवार के सदस्यों से बांटते रहते हैं…

सीजन 3 का मुख्य प्लॉट था मध्यमवर्गीय परिवार की इमानदारी!!! उस ईमानदारी के वास्ते अपने रास्ते पर सीधे चलते संतोष मिश्रा जी को जब सस्पेंशन लेटर थमा दिया जाता है तब घर के सभी सदस्य यह सोचना छोड़कर कि संतोष मिश्रा जी मन में क्या सोच रहे होंगे? यह सोचने लगते हैं कि अब घर का खर्च कैसे चलेगा? इतनी ढेर सारी प्रैक्टिकैलिटि भरी है इस सीरिज में की आनंद आ जाता है..

बाकी मध्यमवर्गीय परिवारों में ऐसा ही तो होता है, लोग भावुक बहुत ज्यादा होते हैं लेकिन प्रैक्टिकल होना उनकी मजबूरी हो जाती है । कहानी के अंतिम एपिसोड में जब घर का मुखिया कमरे का दरवाजा बंद कर बेहोश हो जाता है तब उस वक्त उनके दोनों बेटे और पत्नी भावुकता में बहते कैसे उन्हें अस्पताल तक लेकर जाते हैं भर्ती करवाते हैं और किस ढंग से उनका उपचार करवाते हैं यह देखने वालों को हर बार रुला जाता है…. उसी एपिसोड में जब अन्नू अपने पिता को गोद में उठाकर बाहर की तरफ भागता है और उसके पीछे उसकी मां भी उस कमरे से बाहर निकल जाती है, तब चुपचाप खड़ा अमन धीरे से जाता है और अपने पिता की चप्पले उठाकर अपने सीने से लगाए घर से बाहर निकल जाता है इस छोटे से सीन में अमन ने इतना भावपूर्ण अभिनय किया है कि हर बेटा अपने पिता की चप्पलों की तरफ देख कर एक बार को नतमस्तक जरूर होता है…

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कहानी के तीसरे एपिसोड में अगुआ की कहानी भी बताई गई है .. अगुआ गांव का वह पुरुष होता है जो अपने नाते रिश्तेदारों दोस्तों यारों के बीच किसी भी निर्णय को लेने के लिए सर्वाधिक सक्षम होता है और बाकी सभी लोग उसके निर्णय को सर्वमान्य मानकर उसकी कहीं बात पर अपनी मुहर लगा देते हैं… संतोष मिश्रा का कोई भूला बिसरा मित्र अपनी बेटी की शादी की बातचीत मिश्रा जी के घर से करने के लिए उनके घर में बेटी पहुंच जाते हैं और इस पूरे आयोजन में संतोष मिश्रा जी की धर्मपत्नी और उनके मित्र की बेटी के बीच एक बहुत ही ममतामई रिश्ता बन जाता है जिसमें शांति मिश्रा जी फुर्तीली से स्पष्ट रूप से कहती हैं फुर्तीली भी इस रिश्ते में अपने मन की बात जरूर रखें….

अभीनय की बात करें तो सभी कैरेक्टर लाजवाब है… संतोष मिश्रा के रोल में जमीन खान हो या शांति मिश्रा जी के रोल में गीतांजलि कुलकर्णी हो, अनु के रोल में वैभव राज गुप्ता या अमन के रोल में हर्ष मायरो सभी ने अपने अभिनय से हंसाया भी है और रुलाया भी है… कुल मिलाकर यह एक फैंटास्टिक फोर सीरीज है जिसे अगर आपने अब तक नहीं देखा तो जरूर देखिए इसके पिछले 2 सीजन भी बेहद शानदार है और अगर आपने पिछले दोनों नहीं देखे तो गुल्लक फर्स्ट सीजन से शुरू कीजिए….

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दो आने ,चार आने ,आठ आने की पुलक

छोटे-छोटे किस्सों से भर गयी ये गुल्लक।।

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aparna…..

दिल से….

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खुशियां आंखें गीली कर जातीं हैं जब कोई ऐसा मौका आये कि किसी ज़मीन से जुड़े शख्स को सिंहासन पर बैठे देखती हूँ……

मेरी नज़रों में ही असल नायक होता है। फल बेचकर 150 रुपये प्रतिदिन कमाने वाले हरिकेला को संतरे को orange कहा जाता है ये मालूम न था। अंग्रेज़ी की ये छोटी सी भाषयी अज्ञानता ने उनके ज्ञान चक्षु खोल दिए। स्वयं की अशिक्षा को मानक मान कर उन्होंने अपनी जीवन भर की कमाई से अपने गांव के बच्चों के लिए स्कूल खोल दिया।

मेंगलुरु के हरिकेला के एक छोटे से प्रयास ने सफलता रची और आज सरकारी अनुदान और कई प्राइवेट ऑर्गेनाइजेशन के सहयोग से उनका हजब्बा स्कूल सफलता के सोपान छू रहा है।

स्नेह सम्मान से लोग इन्हें अक्षर संत भी कहतें हैं। आपके हाथों में पद्मश्री अवार्ड भी मुस्कुरा रहा है।

दिल से…

चिकित्सा के देवता भगवान धनवंतरी आप सभी पर अपनी कृपा बनाएं रखें, और धन की देवी लक्ष्मी आपके घरों पर स्थायी आवास बना लें।

आप सभी को महापर्व दीपावली के प्रथम दिवस धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं…💐

दिल से…

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बॉक्सर आमिर खान  अक्षय कुमार से पूछते हैं ” हे ब्रो!! एंजॉइंग? और खिलाड़ी कुमार अपने मस्तमौला अंदाज में जवाब देते हैं येह एंजॉइंग ! बेटर लक नेक्स्ट टाइम!!!
   ये सारा स्पोर्ट्समैनशिप इमानदारी की हार बेईमानी की जीत, अलाना फलाना सब कुछ हम भूल जाते हैं जब इंडिया पाकिस्तान के खिलाफ मैच खेलती है।

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   इतना तो कल दिन भर व्रत रखने के बाद औरतों का खून कम नहीं हुआ होगा जितना इंडिया की हार से हो गया।
  

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अगली बार जीत के आना है बता देती हूं( फ्रॉम अनुष्का)

#दिल से देसी❤️
#छोटी सी भड़ास

ओ स्त्री!!!

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पुरुष के मन मस्तिष्क
शब्द हृदय
हर जगह छाई हो।
ओ स्त्री!!!
तुम कहाँ से आई हो?

वो कहता है
मैंने तुझे पंख दिए।
परवाज़ दिए
उड़ लो, जितना मैं चाहूं
ओ स्त्री !!!
क्या तुम उसकी मोहताज हो?

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उसका घरौंदा बनाया
तिनका तिनका सजाया
पर जब वक्त आया तुम्हारा
उसने तुम्हें
अपने पैरों पे गिराया
ओ स्त्री!!!
तुम कैसे उसकी सरताज हो?

वो बेबाक है बिंदास है
जो जी में आये
करने को आज़ाद है
कूबत तो तुम्हारी भी है
फिर
ओ स्त्री!!!
तुम क्यों हर मर्तबा
झुकने को तैयार हो?

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कभी ये ना पहनो
का अधिकार
कभी ऐसे न बोलो
का अहंकार
पर हर दफा उसकी
सुन कर चुप
रह जाने वाली
ओ स्त्री!!!
तुम खुद में एक अंगार हो

क्यों जानती नही,
तुम खुद को मानती नही
वो ‘मैं’ में अड़ा रहता है,
क्यों  पहचानती नही?
तुम खुद को घोल घोल
ज़िन्दगी को पी गयी
ओ स्त्री !!!
तुम स्वयं एक संसार हो…

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  To be continued …..

आप सब चाहें तो मेरी इस रचना को अपने शब्दों से सजा कर आगे बढ़ा सकतें हैं…. ” ओ स्त्री!!”
  बिंदास लिखिए
   बेबाक लिखिए..

  क्योंकि..
कलम को जितना चला लो ये शिकायत नही करती…

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aparna…


लड़कियाँ

आंसूओं को छिपाने के लिए

जबरन मुस्कुराती लड़कियाँ….

दिल के दर्द को, बस यूं ही

हंसी में उड़ाती लड़कियाँ…

दिन भर खट कर पिस कर

तुम करती क्या हो सुन कर भी

चुप रह जाने वाली लड़कियां

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बाप की खुशी के लिए

अपना प्यार ठुकराती लड़कियां….

भाई की सम्पन्नता के लिए

जायदाद से मुहँ मोड़ जाती लड़कियां….

पति के सम्मान के लिए

अपना घर द्वार खुशी छोड़ जाती लड़कियां….

बच्चों को बढ़ाने के लिए

ऊंची नौकरी को लात मार जाती लड़कियां…

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डूबते से संसार की

अजूबी सी ये लड़कियां

जाने कब किस जगह इनकी मुस्काने

छिन जाएंगी…

उन बेपरवाह हंसी के गुब्बारों से

खुद को सजाती ये लड़कियां….

इन लड़कियों का जहान कुछ अलग सा होता है

इतनी आसानी से कैसे समझ पाओगे इन्हें

की क्या होती हैं ये लड़कियां!!!

aparna …

मैं मैं हूँ!! जब तक तुम तुम हो!

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मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

तुमसे सारे रंग रंगीले
तुमसे सारे साज सजीले,
नैनों की सब धूप छाँव तुम,
होठों की मुस्कान तुम ही हो।
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

तुमसे प्रीत के सारे मौसम
तुमसे सूत,तुम ही से रेशम
तुमसे लाली,तुमसे कंगन,
मन उपवन के राग तुम ही हो
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

जीवन का यह सार तुम्हारा,
मेरा सब संसार तुम्हारा,
गुण अवगुण मेरे सब जानो,
मुझमे बसे मेरे प्राण तुम ही हो।
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !।।

शुभकामनाएं … हिंदी दिवस की

महादेवी वर्मा

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जो तुम आ जाते एक बार

जो तुम आ जाते एक बार

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग

आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार

हँस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग

आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार

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समिधा-27

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   समिधा- 27

    केदारनाथ त्रासदी को घटे सात महीने बीत चुके थे। जिन्होंने अपने अपनों को खोया था वो उस त्रासदी को इन सात महीनों में भी नही भूल पा रहे थे, यही हाल उनका भी था जिनके अपने इस त्रासदी से वापस लौट चुके थे।

        वरुण मंदिर ट्रस्ट में स्थायी सदस्यता पा चुका था। उसके माता पिता ने भी इस बार न उसे रोका न टोका,और सहर्ष सहमति दे दी। कादम्बरी के परिवार ने ज़रूर कुछ टोकाटाकी करने की कोशिश की लेकिन वरुण का परिवार वरुण के सामने दीवार बन खड़ा रहा, फिर अपना सा मुहँ लेकर उन्हें भी लौटना ही पड़ा।
    कोलकाता के मंदिर में दो महीने बिताने के बाद वरुण और दो चार अन्य सेवादारों को मथुरा राधाकृष्ण मंदिर भेज दिया गया था।

    मंदिर में सुबह सवेरे उठ कर सारे मंदिर परिसर में झाड़ू लगाने के बाद पानी का छिड़काव कर वरुण अपने दो साथी सेवादारों के साथ पोंछा लगाया करता।
     मंदिर की ही पुष्पवाटिका से चुन चुन कर लाये फूलों की फिर सारे लोग मिल कर लंबी सी माला गूंथते और द्वारिकाधीश का श्रृंगार होता।
      दोपहर बाद सभी एक साथ बैठे भजन गाया करते।
   इस सब के साथ ही सुबह और शाम का समय वेदाध्ययन के लिए भी निश्चित था।
   वरुण को ये सारे कार्य प्रिय थे। वह इन सभी कार्यों को करते हुए अपने मन को शांत रखने का पूरा प्रयास करता और उसे इन कुछ महीनों में इन कार्यों में एक सुख मिलने लगा था एक शांति मिलने लगी थी ऐसा लगने लगा था कि वह अपने कृष्ण के आसपास है और कृष्ण सिर्फ उसके ही नहीं हर किसी के आसपास हैं। और इसीलिए धीरे-धीरे वरुण की श्रद्धा इस बात पर बढ़ने लग गई थी कि जो जिसके साथ होता है वह सब कृष्ण का रचा रचाया है और इसीलिए उससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता ।
  वरुण की यही सोच उसे धीरे-धीरे शांति की तरफ ले जा रही थी, लेकिन बीच-बीच में कभी अचानक एक चेहरा उसकी खुली आंखों में झांकने चला आता। जैसे पूछ रहा हो…-” मेरा क्या कसूर था जो तुम्हारे कृष्ण ने मुझे ऐसी सजा दी ?” ऐसे समय में वरुण अपने विचारों को झटक कर कोई ना कोई किताब खोल कर पढ़ने बैठ जाया करता। लेकिन इन सारी व्यस्तताओं के बाद भी बार बार एक जोड़ी पनीली आंखें उसका पीछा करती सी लगती जैसे कह रहीं हो “वापस आ जाओ!”  उसे अक्सर यूँ लगता कि वो मन से यही सब करना चाहता तो है पर उसकी आत्मा इस सब में शामिल ही नही होना चाहती। 
सुबह और शाम के समय के अतिरिक्त रात में भी जब उसे समय मिलता वह मंदिर परिसर के कोने में बैठ अपनी किताब को पढ़ने में डूब जाया करता। वेदों का अध्ययन करते करते धीरे-धीरे उसे हिंदू धर्म की जटिलताएं समझ में आने लगी थी।
   आज तक जिन रीति-रिवाजों को मानने के लिए वह अपनी मां का मजाक उड़ाया करता था और रीति-रिवाजों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को देख पढ़ कर समझ कर उसके ज्ञान चक्षु भी खुलने लगे थे।
    मंदिर का पूरा कार्य एक ट्रस्ट के अधीन था वह ट्रस्ट पूरे भारतवर्ष ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कृष्ण मंदिर की स्थापना कर चुका था। मंदिरों में होने वाले आय-व्यय के साथ ही दानदाताओं को अधिक से अधिक दान के लिए प्रेरित करने के लिए भी मंदिर ट्रस्ट को पढ़े लिखे शिक्षित वर्ग की आवश्यकता थी और अगर वरुण जैसे युवा इस कार्य में उनका सहयोग करें तो मंदिर ट्रस्ट को लाभ ही लाभ था इसलिए वरुण की तरफ मठाधीशों का कुछ अधिक ही झुकाव था।

   मंदिर में अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग पद सृजित बहुत से सेवादार ऐसे थे जो स्वेच्छा से जीवन पर्यंत सिर्फ सेवादार ही बने रह जाते थे।लेकिन कुछ उनमें से ऐसे भी थे जो सेवादार से ऊपर के कुछ 1 पदों तक जाकर रुक जाए करते थे। लेकिन वरुण जैसे उच्च शिक्षित युवाओं को मंदिर ट्रस्ट द्वारा सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ाते हुए मंदिर के मठाधीश तक के पद तक पहुंचाए जाने की व्यवस्था थी। वैसे मंदिर में जाति धर्म या गरीबी अमीरी के नाम पर किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं था। सभी के लिए समान कार्य बांटे गए थे , और सभी को अपने हिस्से के कार्य करने ही होते थे। अंतर बस इतना होता था कि शिक्षित लोग जो विद्या अध्ययन करने में सक्षम थे उन्हें वेदों का अध्ययन करवा कर उनसे प्रवचन आदि दिलवाए जाने की व्यवस्था की जाती थी।
     पिछले कुछ समय में ही वरुण ने बहुत सारी किताबों का अध्ययन कर लिया था और जैसे-जैसे अध्ययन करता जा रहा था उसका दिमाग भी विस्तृत होता जा रहा था।
       मंदिर परिसर हर किसी के लिए खुला था लोग दर्शनों के लिए आते मंदिर में चढ़ावा चढ़ाते, और चले जाते। सब के जाने के बाद हफ्ते में एक दिन चढ़े हुए सारे चढ़ाव की गणना की जाती और उसके बाद उस धनराशि को मंदिर ट्रस्ट के पास भेज दिया जाता।
    ट्रस्ट से हर महीने एक निश्चित धनराशि मंदिर में रहने वालों के खाने पीने आदि के लिए भेज दी जाती। इन सब का हिसाब योगेंद्र जी रखा करते थे।

   मंदिर परिसर बहुत विशाल था। चारों तरफ फैली वृहत वाटिका के बीचो बीच स्थापित मंदिर में पीछे तरफ कमरे बने हुए थे जहां सेवादार और बाकी के मंदिर कर्मचारी रहा करते थे।
      उसी परिसर में एक और हटकर विधवा आश्रम बना हुआ था जहां वृद्ध युवा और बाल विधवाये रहा करती थी। आश्रम के कर्मचारियों तथा अन्य लोगों के लिए भोजन पकाने बर्तन साफ करने आदि की जिम्मेदारी इन्हीं महिलाओं की थी । महिलाओं की संख्या कम अधिक होती रहती थी। वैसे तो एक बार जिस महिला को उसके घर वाले इस आश्रम में छोड़ जाते उसका वापस अपने घर लौट पाना असंभव ही था। इसलिए अधिकतर समय उस आश्रम में महिलाओं की संख्या में वृद्धि ही हुआ करती थी, संख्या में कमी तभी आती थी जब उनमें से कोई देवलोक को चली जाया करती थी।
     उनका जीवन कठिन नहीं कठिनतम था। क्योंकि उनके जीवन में वेद अध्ययन को स्थान नहीं दिया गया था। उनमें से अधिकतर वृद्ध महिलाएं अपने आपको कृष्ण समर्पित कर चुकी थी । इसलिए उनका मन सिर्फ कृष्ण को समर्पित लोगों की सेवा से ही प्रसन्न हो जाता था। लेकिन कुछ युवा और बाल विधाएं भी थी जिन्हें अच्छा खाने और अच्छा पहनने का शौक हुआ करता था। लेकिन उस स्थान में जहां उन्हें पर्याप्त आहार भी ना मिल पाता हो,उनके शौक कौन पूछता और कौन पूरे करता?

    वह औरतें एक रटी रटाई दिनचर्या का पालन करती हुई बस जीवन जीती चली जा रही थी! जिसका ना कोई आदि था ना अंत। बहुत बार ऐसा लगता जैसे वह वहां रहते हुए बस अपनी सांसें गिन रही हैं, कि किस तरह उनकी सांसो की अवधि पूरी हो और वह स्वयं कृष्ण के लोक पहुंच जाएं। कुछ महिलाओं ने एक आध बार वहां से निकलने की भी कोशिश की, लेकिन बाहर भी उनके पास कोई और आश्रय नहीं था दो-चार दिन बाद लौट कर वापस ही आ गई थी।
        जैसे ज़िन्दगी कट रही हो बस…. बिना जीने की आरज़ू के।
   लेकिन वरुण इन बातों से अनजान था….
….. पर अब अधिक समय नही बचा था कि वो इन सारी अव्यवस्थाओं से अपरिचित रह पाता…

******

   
     देव को गए वक्त बीत चुका था। जब उसके जाने का पता चला था उस समय उसके परिवार द्वारा किये कर्मकांड में पारो की माँ और बाकी सदस्य आये और जाते वक्त पारो की माँ देव की माँ के चरणों में लोट गयी….-” गरीब की बेटी का कोई आसरा नही होता बऊ दी! पहले ही बिना बाप की थी अब माथे से पति का साया भी सरक गया। पता नही इतनी बदकिस्मत लड़की क्यों मेरे घर ही पैदा हुई। इससे तो पैदा होते ही मर जाती तो सही होता,लेकिन फिर ये बदकिस्मती कैसे देखती?
  आपके पांव पड़ती हूँ, इसका आसरा मत छीनना। यहीं कहीं किसी कोने में पड़ी रहेगी। घर की नौकरानी को भी तो दो वक्त का खाना दिया ही जाता है। उससे अधिक की अब इसे दरकार भी कहाँ रही? “

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   बोलते-बोलते जाने कितनी बार वो भरभरा के रो पड़ीं। इतने कठोर शब्द मुहँ से भी तो नही निकल पा रहे थे। कैसी मर्मान्तक पीड़ा के साथ अपनी ही बेटी के लिए नौकरानी जैसा अलंकार जोड़ना पड़ा। किस्मत लड़की से ज्यादा तो उनकी खराब थी। पहले पति का दुख सहा फिर लक्ष्मी सी बेटी का …
  … इतनी छोटी सी उम्र में ये रंगविहीन साड़ी ! ये देखने से पहले दुर्गा माँ उसे उठा लेती तो कितना अच्छा होता। कम से कम अपनी ही बेटी का ये रूप तो न देखना पड़ता।
    दिल में तो आ रहा था कि बेटी को सीने से लगाये अपने साथ ले जाये। कैसे भी कर के अपने पास रख लेगी लेकिन अभी तो वो अकेली अपनी ससुराल की गुलामी में टूट रही है फिर अपने साथ अपनी फूल सी बेटी को वैसे ही टूटते कैसे देख पाएंगी?
   दूसरी बात जब घर भर मछली भात खा रहा होगा उसकी लाड़ली को सिर्फ शाक खा कर संतोष करना पड़ेगा। पान की कितनी शौकीन थी,अब तो वो भी कहाँ खा पाएगी।
   ये सारा सब अपनी आंखों से देखना उसके लिए मृत्युतुल्य कष्ट सहने के बराबर था।
   इससे तो अपनी ससुराल में रह कर क्या कर रही क्या नही इन सब बातों से तो उन्हें फुर्सत रहेगी।
  वैसे उनके मन में एक छोटा सा लालच और भी तो था…..
   देव का छोटा भाई दर्शन पारो से एक दो साल ही तो बड़ा था। अगर पारो यहीं अपनी ससुराल में रह गयी तो हो सकता है घर वालों के मन में पारो का ब्याह दर्शन से कर देने का विचार जाग जाए। और अगर ऐसा हो गया तो इससे अच्छा पारो के लिए क्या होगा भला।
   इतने गहन दुख के बीच एक बहुत छोटी सी खुशी उनके मन को उद्भासित कर गयी ..
…..-“ऐसा क्यों कह रही हो बऊ माँ। नौकरानी सी क्यों रहेगी भला। देव के पीछे अब यही तो हमारी देव है। पारोमिता जैसी अब तक रहती आयी है वैसे ही रहेगी।”

   देव की ठाकुर माँ का स्वर उस कमरे में गूंज गया और फिर घर के किसी सदस्य की पारो को वहाँ से हटाने या निकालने की हिम्मत नही हुई।

*****

  दिन कट रहे थे सिर्फ पारो के ही नही बल्कि घर के अन्य सदस्यों के भी।
  पहले पहल किसी ने पारो से कुछ नही कहा। वो अपने कमरे में सारा सारा दिन चुपचाप पड़ी देव को याद कर ऑंसू बहाती रहती।
   कभी खिड़की पर घंटो खड़ी रह जाती। यूँ लगता जैसे उसी का इंतज़ार कर रही हो।
  उसे पता नही क्यों अंदर से यही लगता कि समय को चीरता देव उसके पास वापस चला जायेगा।
कभी अचानक ही उसका मन ये मानने से इनकार कर देता की देव नही रहा।
वो उसकी कमीज़ें धोती अपनी साड़ी के साथ सुखाती और आयरन कर अलमीरा में सजा देती। जूते भी रोज़ रोज़ साफ करती और जब देखती की पहनने वाला तो दूर दूर तक नज़र नही आ रहा तो बिलख उठती।
    अब उसका खाना उसकी सास उसकी जेठानी के हाथों उसके कमरे में ही भिजवा दिया करतीं। शायद उन्हें मन ही मन लगने लगा था कि उन सब सुहागिनों के बीच बैठ पारो अपनी रूखी थाली का निवाला कैसे ले पाएगी। लेकिन पारो की जेठानी से ये पक्षपात जाने क्यों सहन नही हुआ जा रहा था।।
  रोज़ रोज़ उसकी रूखी सूखी थाली ऊपर लेकर जाना उसके मन को मसले दे रहा था, आखिर एक दिन घर भर की औरतों की नज़र बचा कर उसने मछली के झोल भरी कटोरी पारो की थाली में रखी और दाल की कटोरी में घी भर अपने आँचल से ढाँक ऊपर ले चली।
  पारो की तो नही लेकिन उसकी खुद की सास ने देख कर उसे आधी सीढ़ियों पर ही टोक दिया। पारो उस समय छज्जे पर कपड़े सूखा रही थी। उसने भी बड़ी माँ की रुबावदार आवाज़ सुन ली और ऊपर से झांकने लगी…-” ए आनंदी! की होलो? पारो के लिए क्या माछ लेकर जा रही हो? “

आनन्दी सकपका गई। उसे नही लगा था कि उसकी चोरी ऐसे पकड़ी जाएगी। उसने बहुत धीमी आवाज़ में अपनी बात रखी…-” उसकी अभी उम्र ही क्या है माँ। इतनी छोटी सी उम्र में इतना कुछ झेल गयी , अब कम से कम ठीक से खा पी तो सके। यही तो खाने पहनने की उम्र…”

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  उसकी बात बीच में ही काट कर उसकी सास लगभग उस पर चीख पड़ी…-“अब तुम आज की लड़कियां हमें नियम बताओगी, उसकी उम्र क्या है ये हमे बताने की ज़रूरत नही है।तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है हमने। चुपचाप माछेर झोल उठा कर थाली से बाहर कर दो। “

” धीमे बोलिए मां ,वो सुन लेगी। अच्छा नही लगेगा।”

” तुम्हें नियम भंग करते हुए अच्छा लगा न तो अब मुझे कोई लेना देना नही की किसे बुरा लगेगा और किसे नही। जो सच्चाई है सो है। अगर भगवान को उस पर इतना ही तरस था दयादृष्टि थी तो उसके पति को ऐसे अकालमृत्यु नही मिलती.।

   आगे की पंक्तियों के साथ ही भावुकता में बड़ी माँ रोने लगी,क्योंकि बेटा भले ही देवरानी का था लेकिन प्रेम तो उन्हें भी उससे बहुत था। और देव की असमय मृत्यु का दुख अब पारो पर गुस्से और नाराज़गी के रूप में उतारना शुरू हो रहा था।

आनन्दी समझ गयी कि इस वक्त सास से लड़ने में कोई लाभ नही है। वो चुपचाप मछली की कटोरी हटा कर फिर थाली ऊपर ले गयी….
… धीरे से उसने पारो के कमरे के दरवाज़े को धक्का दिया,पारो पलंग पर सिर टिकाए ज़मीन पर बैठी थी।
” आओ पारो !खाना खा लो!”
 
  पारो ने ऑंसू भरी आंखों से अपनी जेठानी को देखा और फिर बाहर देखने लगी…-“मेरी प्यारी छोटी बहन कुछ तो खा लो। देखो ऐसे भूखा रहने से क्या होगा। बल्कि तुम ऐसे भूखी रहोगी तो देव बाबू की भी आत्मा तड़प उठेगी। वो कैसे सुख से रह पाएंगे भला। चलो खा लो चुपचाप। बड़ी माँ की बातों को दिल से न लगा लेना। वो सब अभी बहुत दुखी हैं। उबर नही पाएं हैं ना । तुम तो समझ सकती हो।”

पारो ने हाँ में सिर हिला दिया और नीचे देखती चुप बैठी रही।
आनन्दी को उसी वक्त नीचे से किसी ने आवाज़ दी और वो एक बार फिर पारो से खा लेने का इसरार करती बाहर चली गयी।
पारो का थाली देखने का भी जी नही किया…  उसने धीरे से थाली सरका दी जैसे थाली से नाराजगी हो कि तुम उस समय क्योँ सामने नही इठलाई जब देव बाबू साथ थे और अपने हाथो से अपनी प्रेयसी अपनी पत्नी को खिलाना चाहते थे। उस वक्त इसी थाली ने क्यों चुपके से उसके कान में  नही कहा कि खा ले पारो! फिर इतना प्रेम करने वाला जीवन में कोई नही आएगा। “

  देव के बारे में सोचते हुए वो फफक के रो पड़ी। वहीं उस गांव से कई किलोमीटर दूर मथुरा में स्वामी वरुण के सामने सेवादार थाली परोस कर रख गया, पर जाने अंदर से वरुण को कैसी बेचैनी ने घेरा की उसने उस थाली को धीरे से आगे सरका दिया…-” स्वामी ऐसा क्यों? क्या आज भोजन नही लेंगे।”

” मालूम नही केवल लेकिन आज बिल्कुल भी खाने का जी नही कर रहा। अंदर से ऐसा लग रहा जैसे हृदय में किसी बात की पीड़ा सी उबर रही है। यूँ लग रहा कोई बहुत करीबी दुख में है, अपार दुख में और मैं उसकी कोई सहायता नही कर पा रहा हूँ। अब बस कृष्ण से यही प्रार्थना है कि वो जो कोई भी है उसे जल्दी से जल्दी मुझसे मिलवा दे, जिससे अपने मन की इस बेचैनी से छुटकारा पा सकूं।”

  वरुण क्या जानता था कि उसके कॄष्ण उसके प्रिय को उससे मिलवाने की भूमिका बांध ही चुके हैं…..

क्रमशः

aparna…..
  


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मैं हूँ…..

मैं खुशबू से भरी हवा हूँ
मै बहता जिद्दी झरना हूँ
कठिन आंच मे तप के बना जो
मै ऐसा सुन्दर गहना हूँ ।।

छोटा दिखता आसमान भी,
मेरे हौसलों की उड़ान पे,
रातें भी जो बुनना चाहे,
मैं ऐसा न्यारा सपना हूँ ।।

हरा गुलाबी नीला पीला
मुझसे हर एक रंग सजा है,
इन्द्रधनुष भी फीका लगता
प्रकृति की ऐसी रचना हूं ।।

मैं हूँ पत्नी ,मै हूँ प्रेयसी
मै हूँ  बेटी, मै ही बहू भी,
तुझको जीवन देने वाली
मै ही माँ,मै ही बहना हूं ।।

मैं हूँ मीठी धूप सुहानी,
मैं ही भीगी सी बयार भी,
मुझमें डूब के सब कुछ पा ले,
मै ऐसा अमृत झरना हूं ।।।

अपर्णा ।

ओ स्त्री: कभी खुद को भी जिया करो……..

जल्द आ रही है, मेरे ब्लॉग पर !!

दहकते पलाश …

कुछ मोहब्बतें वक्त की मोहताज नही होतीं…

दहकते पलाश

बालकनी के ग्लास डोर के पास रखे कैनवास पर जंगलों में बेतरतीब दहकते पलाश उकेरते हुए माया इतनी मगन हो गयी थी कि सरु की लायी हुई दुसरी कॉफ़ी भी रखे रखे ठंडी हो गयी।

उसके टोकने पर जब ध्यान गया तब उसे एक और कॉफ़ी लाने बोल बाहर बालकनी में आकर खड़ी हो गयी, वही महीना, वही फ़ाग, वही सिन्दूरी पलाश … उसका कितना कुछ जुड़ा था इन सब से, और वैसे सोचा जाये तो कुछ भी नही जुड़ा था, बस कशिश का आसमान था और शिद्दत सी ज़मीन, पर किस्मत थी कि ना आस्माँ मिला ना ज़मीं ।।

उसे सब कुछ ऐसे याद है जैसे सब कल की ही बात हो, लगता ही नही कि पन्द्रह साल बीत गये उस होली को।
आज भी उस दिन की एक एक बात याद थी, सारा कुछ जैसे अब भी आंखों के सामने एक फिल्म की तरह चल रहा हो…..

कितनी चहल पहल होती थी उन दिनों उस मोहल्ले में। उसकी उम्र के ढ़ेर सारे बच्चे इधर उधर तूफान मचाए घूमते थे, और वो था इन सब का सरगना।
जाने कहाँ से ढूँढ ढूँढ के शरारतें लाता था, सारा मोहल्ला उसका सताया हुआ था,कभी किसी की छत पर सूखने वाले पापड़ चकनाचूर कर जाता, कभी किसी की पानी की टंकी में रंग घोल जाता, इन्हीं सारे बेमतलब के कामों में दिल लगता उसका, पढ़ाई लिखाई से दूर, अपने और अपनी मस्तियों में मगन ।
उसकी पक्की सहेली का भाई ना होता तो कभी उसका चेहरा तक ना देखती, पर ऐसा सोचना आसान था करना कठिन, क्योंकि उस निर्मोही को एक नज़र देखने के बाद कोई बिरला ही होगा जो उसका लुभावना चेहरा भूल सके, गोरे रंग पे काली बड़ी बड़ी आँखें और उनसे टक्कर लेता चौड़ा माथा, उसके लिये अक्सर माया की दादी कहा करती _” जे मिसराईन के घर कोई यक्ष गन्धर्व पैदा हुआ है, तभी हम मानुसों से नही निभे है इस खर्राट की। कितना हडकंप मचाए रखता है पर जे के लाने कितना भी गुस्सा हो मन में, इसकी मुस्कान देख सब उड़ जाती है बहुरिया।।
अगर कुछ पढ लिख जाये, नौकरी पा जाये तो कल अपनी माया के लिये हाथ पसार कर मिसराईन से इस छोरे को मांग लूंगी।”

” आप भी अम्मा, सुबह सुबह कलेस मचाई रहती हो, लक्षण देखें है रावण है पूरा, और फिर माया भी तो…..

माया की माँ ने तो बात वही खत्म कर दी पर उसके मन में कोई बीज जम ही गया था, जो होली के दिन खाद पानी पाकर बेल सा लहलहाने लगा था।।

सभी रंग गुलाल में डूबे थे, बस वही साफ सुथरी अपनी छत पर खड़ी मोहल्ले की भीड़ भाड़ देख देख कर हँस रही थी, तभी नीचे उसकी सहेलियों का झुंड गुज़रा और सब उससे नीचे आने का आग्रह करने लगे, सब की बात और थी पर उन सभी में उसकी पक्की सहेली रोली भी थी, उसकी बात काटना माया के लिये कठिन था, अपनी सोच में डूबी माया को उसकी दादी ने समझा बुझा कर नीचे भेज ही दिया था।
सारी सखियाँ माथे पर टीका लगा के उससे गले मिल रही थी कि किसी के मज़बूत हाथों ने उसे पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया, और उसका पूरा चेहरा गुलाल से भर दिया।
वो अबीर था!! जिसके कुँवारे हाथों ने माया के गालों पर जाने कितने दहकते पलाश खिला दिये थे।
उसके कानों में चुपके से “हैप्पी होली” बोल वो एक बार फिर अपनी टोली में मगन हो गया था।।

वो होली बीत गयी पर उसके लिये छोड़ गयी थी ढ़ेर सारे एहसास, जिन्हें वो चाह कर भी किसी से साझा नही कर सकती थी।
उसे हमेशा से खुद पर और अपनी किस्मत पर तरस आता था, पर अब एक नाराज़गी थी क्यों भगवान ने उसकी किस्मत ऐसी काली स्याही से लिख दी थी जिसे वो चाह कर भी मिटा नही पा रही थी।
उसके दादा और उनके बचपन के दोस्त का अपनी बचपन की दोस्ती को पक्का करने का निर्णय उसकी जीवन नैय्या डूबा गया था, सिर्फ सात बरस की तो थी जब मृत्यशैय्या पर लेटे उसके दादा ने अपनी आखिरी इच्छा के तौर पर अपने दोस्त के पोते से उसके फेरे फिरवा दिये थे, उस समय बाल विवाह होना बन्द हो चुका था पर अक्षय तृतीया के ही दिन उसके घर वालों ने उसे भी गड्डे गुडियों सा ब्याह दिया था, उसके विवाह को एक माह भी नही बीता की उसके दादा जी सिधार गये पर घर वालों के मन में एक संतुष्टी छोड़ गये थे अपनी अन्तिम इच्छा पूरी कर पाने की।

उसके ब्याह को दो साल हुआ ही था कि, किसी बीमारी की चपेट में आकर उसका पति भी नही रहा और ना रहे उसके दादा ससुर।
नौ साल की उम्र में जब उसे शादी और ससुराल का मतलब तक पता नही था, सुहागन का मतलब पता नही था, वो विधवा हो चुकी थी।।
माँ और दादी उसे गले से लगाये बिलखती रहीं, और कुछ देर सहने के बाद कसमसा कर उसने खुद को उनसे छुड़ाया और खेलने बाहर भाग गयी।।

धीरे धीरे समय के साथ उसे अपनी काली किस्मत का लेखा जोखा समझ आने लगा था, और जैसे ही उसने अपनी किस्मत से समझौता करने की सोची अबीर किसी खुशबूदार हवा के झोंके सा उसके जीवन की नीरस बगिया में फूल खिलाने धंसता चला आया था।

उस होली के बाद अबीर के एग्ज़ाम्स हुए और आगे की पढ़ाई के लिये वो बाहर चला गया था, वो शाम भी वो कैसे भूल सकती थी, रोली से उसे पता चल ही चुका था कि उसके अबीर भैया कोटा जा रहें हैं पढ़ने, उसके निकलने के समय पर वो चुपके से अपनी छत पर जा खड़ी हुई थी, उसे एक बार पूरी नज़र देखने के लिये!!
अपना सारा सामान कार की डिक्की में भरने के बाद उसने पलट कर एक बार उसकी छत की तरफ देखा भी था और घबराहट में माया दीवार की ओट में हो गयी थी, उसे देखने की अधूरी आस लिये ही वो चला गया था।
वो तो उसके जाने के बाद उसके जाने का असली कारण माया को पता चला था, जब एक शाम वो स्कूल से लौटी और अपनी माँ और दादी को बातें करते सुना__” क्या ज़रूरत थी अम्मा उनके घर जाने की, ऐसा भी लड़के में कौन सा हीरे मोती जड़ें हैं, ना होगी माया की शादी तो ना होगी, मैं अपनी बेटी को जीते जी कोई दुख ना होने दूंगी।”

” और तुम्हारे बाद उसका क्या होगा बहुरिया?? यही सोच कर तो जी घबराता है कि हम सब के बाद उस बेचारी का क्या होगा?”

” पढ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो जायेगी अम्मा, वो खुद अपना सहारा बनेगी।। आइंदा आप किसी के घर माया का रिश्ता लेकर ना जाना, देखा नही मिश्राइन ने कैसे रातों रात लड़के को पढ़ाई के नाम पर बाहर भेज दिया जैसे हमारी माया की छूत लग जायेगी अगर यहाँ रहा तो।”

उसका कलेजा धक से रह गया था, तो इसलिये उसे बाहर भेज दिया!!
उस दिन के बाद से उसने रोली के घर आना जाना बिल्कुल बन्द कर दिया था, रोली ही क्या धीरे धीरे अपनी हर सखी सहेली से दूरी बना ली थी, और उसी समय उसकी मासी उसके लिये देवदूत बन कर आ गयी__
” दीदी माया का हाथ बहुत साफ है, बहुत अच्छी पेंटिंग करती है , इसे फाइन आर्ट्स में क्यों नही भेज देतीं ।”

और फिर सारे घर भर को मना मुनु के आखिर मासी उसे अपने साथ ले ही गयी थी। वल्लभ एकेडमी ऑफ़ आर्ट्स में प्रवेश लेते ही उसका जीवन बदलने लगा था, अपनी फाइन आर्ट्स की डीग्री पूरी कर स्कॉलरशिप लेकर वो वेनिस से भी कोई एक्स्ट्रा डिप्लोमा कर आयी थी।।

रंगों से खेलती उसकी तुलिका अब उसके कैनवास में ही जीवन ढूँढने लगी थी।
रंग बिरंगे रंगों से सजी उसकी पेंटिंग्स देख कर कोई उसके बिना रंगों के जीवन को सोच भी नही सकता था।।

” दीदी कॉफ़ी पी लो वर्ना फिर ठंडी हो जायेगी।”
सरु की आवाज सुन वो वापस वर्तमान में लौट आयी, अगले हफ्ते ठीक होली से एक दिन पहले उसकी पेंटिंग एक्सीबिशन होनी थी, उसी के लिये वो तन मन से जुटी थी।।

मासी के साथ उसके जाने के चार महीने बाद ही उसके पापा का ट्रांसफर भी दूसरे शहर हो गया था और उस शहर उस गली से सारे नाते छूट गये थे, बस नही छूटा था अबीर का लगाया वो रंग जो अब भी माया अपने गालों पर महसूस कर पाती थी।।

*******

शाम हो चुकी थी, लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी, लोग घूम घूम कर अपनी पसंद की पेंटिंग्स देख रहे थे, उनमें से कुछ खरीद भी रहे थे, एक्सीबिशन हॉल के एक ओर बने छोटे से ऑफिस में माया अपनी साथी पेंटर के साथ बैठी कुछ ज़रूरी बातों में लगी थी कि उनकी एक हेल्पर ने अन्दर आ कर उन्हें बताया कि कोई एक आदमी है जो माया की वो पेंटिंग खरीदने की ज़िद पर अड़ा है जो वहाँ बेचने के लिये रखी ही नही गयी।।

” उनसे कह दो, वो पेंटिंग बिकाऊ नही है, उसे बस “एज़ अ मास्टर पीस” रखा है।”

” पर मैडम वो समझ ही नही रहे, कह रहे जब बेचना नही था तो यहां रखने की क्या ज़रूरत थी?”

” कौन सी पेंटिंग माया ‘ दहकते पलाश’?

” हाँ नेहा! मैं उसे किसी कीमत पर बेचने को तैय्यार नही हूँ, पता नही कौन रईसजादा है, जो ऐसे ज़िद पर अड़ा है।”

” हम्म तुम्हारा चेहरा पसंद आ गया होगा, तुम्हारे जैसी ही तो लगती है वो पेंटिंग, भले ही तुमने खूब सारे रंगों से चेहरे को रंग दिया है बिल्कुल जैसे किसी ने होली पर चेहरे पर खूब सारा अबीर गुलाल छिड़क दिया हो, बस हँसते हुए दांत नज़र आते हैं पर पेंटिंग लाजवाब है।”

” मैडम जी आप ही बात कर लो एक बार, हमारी तो सुन नही रहे वो साहब”

माया और नेहा ऑफिस से बाहर निकल आये, माया ने आगे बढ़ कर उस आदमी से कुछ कहना चाहा ही था कि पेंटिंग को देखता वो पलट कर माया के सामने हो गया, दोनो कुछ देर एक दूसरे को देखते ही रह गये।।

” मैं कैसे समझ नही पाया कि ये तुम हो माया।”
अबीर की बात पर माया ने शरमा कर आंखे नीची कर लीं….

” बहुत खूबसूरत पेंटिंग है, बिल्कुल तुम्हारी तरह, अभी तक समझ नही पा रहा था की बनाने वाला इसे बेचना क्यों नही चाहता, पर अब तुम्हें देख कर समझ आ गया…..”

” कैसे हो अबीर?”

” बिल्कुल वैसा ही जैसे पहले था, तुम कैसी हो?”

उसके सवाल पर वो मुस्कुरा उठी__

” क्या समझ गये? मैं आखिर क्यों नही बेचना चाहती इस पेंटिंग को?”

“बस उसी कारण जिसके लिये मैं इस पेंटिंग को खरीदना चाहता था, पर खैर अब मैं नही खरीदूंगा, तुम्हारी यादें तुम्हें मुबारक!! हाँ अगर तुम्हारी जगह किसी और ने ये बनाया होता तो किसी भी कीमत पर खरीद ही लेता, मेरी वाईफ को पेंटिंग्स का बहुत शौक है माया, आज अपनी सालगिरह पर सोचा उसे उसकी पसंद का तोहफा दूंगा पर यहाँ इस पेंटिंग ने मुझे रोक लिया, इसके आगे और कुछ देख ही नही पाया, इस पेंटिंग में मुझे तुम नज़र आई थी, पर जब ये देखा कि बनाने वाली भी तुम ही हो तो सब समझ आ गया मुझे।।”

उन दोनों को बातें करता छोड़ नेहा और बाकी लोग वहाँ से जा चुके थे….

” तुमने शादी की माया?”

” नही!! पहली टिकी नही और जब दूसरी करनी चाही तो जिससे चाहा वो जाने कहां गुम हो गया।”

” एक बार मुझसे कहा तो होता?”

” कब कहती, कैसे कहती? अगर तुम्हारी ‘ना’ होती तो मैं जीते जी मर जाती, अब तक जी रहीं हूँ और तुम्हारे दिये उन रंगों से ही अपना कैनवास भर रही हूँ, इतना काफी है अबीर , तुम मेरी तरफ से ये पेंटिंग रख लो।”

” मिलना नही चाहोगी मेरी वाईफ से?”

” वो भी आईं हैं क्या यहाँ?”

” हम्म !!, वो तुम्हारा ऑफिस है शायद।”

” अरे हाँ!! आओ उन्हें भी बुला लो, मैं तब तक कॉफ़ी के लिये बोलती हूँ!” कह कर माया आगे बढ़ गयी, उसके पीछे अबीर भी उसके ऑफिस में प्रवेश कर गया…..

” कहाँ हैं?? तुम्हारी वाईफ अन्दर नही आई??”

” मिलवाता हूँ, पहले चैन से बैठ तो जाऊँ!! इतने सालों की कितनी सारी बातें हैं, मेरे कोटा जाने के कुछ समय बाद तुम्हारा परिवार वो शहर ही छोड़ गया….
पहले तो रोली से तुम्हारे बारे में कुछ सुनने को भी मिल जाता था पर तुम लोगों के शहर छोड़ने के बाद तो तुम लोगों से सम्पर्क के सभी साधन बन्द हो गये, रोली को भी तुम्हारी कोई खबर ना थी, खुद को कहाँ कैद कर रखा था माया?”

” पता नही अबीर!! पर तुम्हारे घर से ना सुनने के बाद मेरी भी हिम्मत चूक गयी थी, और शायद घर वालों की भी, दादी तो अब रहीं भी नही, मेरे घर भर में सबसे ज्यादा उन्हें ही तुम पसंद थे।”

” और तुम्हें??”

अबीर की बात अनसुनी कर माया ने कॉफ़ी उसके आगे बढ़ा दी__” अब मिलवा भी दो अपनी वाईफ से।”

अबीर ने हाँ में सिर हिला कर अपने जेब से अपना वॉलेट निकाला और खोल कर माया के सामने कर दिया, उसमें उसकी वही पन्द्रह साल पुरानी रंगों से भीगी मुस्कुराती तस्वीर लगी थी__” ये कब निकाल ली थी तुमने ?”

” रोली को कह कर तुम्हें नीचे बुलाने से लेकर मोहित से छिप कर तस्वीर खिंचवाने तक की प्लानिंग थी मेरी, वो तो उसके बाद मैं पढ़ने बाहर चला गया वर्ना ….”

अबीर अपनी बात पूरी भी नही कर पाया था कि नेहा हाथ में गुलाल से भरी प्लेट थामे दोनो के पास चली आयी …..
” आप दोनों को होली की शुभ कामनाएँ “

अबीर ने मुस्कुरा कर माया को देखा__” उस दिन एक काम अधूरा रह गया था माया”

प्लेट से ढ़ेर सारा गुलाल उठा कर अबीर माया की तरफ बढ़ा ही था कि माया ने अपने हाथों से गुलाल अबीर के गालों पर मल दिया ” उस दिन अधूरा रह गया था ये अरमान!! हैप्पी होली अबीर!!

aparna….