मायानगरी -1





   

       ओम गणपतये नमः


             मायानगरी :–

         इंजीनियरिंग कैम्पस के खचाखच भरे कॉरिडोर में विद्यार्थी अपनी अपनी क्लास रूम का नम्बर देखने या फिर फीस अमाउंट का पता लगाने लाइन में लगे थे।
   कुछ बाहर गार्डन में इधर उधर घूमते अपने कॉलेज को आंखों ही आंखों में आंकने की कोशिश में थे…..
 
   कुछ लड़के एक ओर जमा इधर उधर की बातों में लगे थे कि एक लड़की भागती सी उनके पास चली आयी।
   आते ही उसने एक लड़के को पीछे से कंधो से पकड़ अपनी ओर घुमाया और फटाफट बोलना शुरू कर दिया…

” कहाँ थे अब तक। तुम्हें पता है कितनी देर से तुम्हें ढूंढ रही थी मैं ? “

   लड़का उस अनजानी लड़की को अपनी बड़ी बड़ी आंखें फैला कर  देख सोचने लगा। दूर दूर तक दिमाग के घोड़े दौड़े लेकिन खाली हाथ वापस चले आये…

” आप जानती हैं मुझे? “
 
इस सवाल को पूछते ही लड़के के चेहरे पर एक लंबी सी मुस्कान छा गयी..
    लड़की तो पहले ही मुस्कुरा रही थी…

” हाँ फिर? मेरे दिल ने तुम्हारी रूह को पहचाना है। हम जन्म जन्म से एक हैं। “

“अच्छा ! और कुछ बोलिए ना।  अच्छा लग रहा है एक सुंदर लड़की का मुझे लाइन मारना । ”

” ये रूहानी मुहब्बत है पागल? बोलो क्या तुम मुझसे शादी करोगे ? क्योंकि मैं तुमसे शादी करना चाहती हूँ। “

” हाँ करूँगा ! ज़रूर करूँगा !हर जन्म में करूँगा । बार बार करूँगा। अब तो तुम मना भी कर दो तब भी करूँगा। ”
    वो शायद और भी कुछ कहता रहता , लेकिन तब तक वो लड़की अपने दुपट्टे को संभालती वहाँ से वापस निकल गयी…..

    और लड़का अपने बालों पे हाथ फिराता उसके कदमों के निशान देखता रह गया….
  
******


       ये हैं कहानी के नायक अभिमन्यु मिश्र ! मध्यम वर्गीय परिवार के सबसे बड़े लड़के। जिनके कंधो पर जन्म के साथ ही ढेरों ज़िम्मेदारियों का बोझ आ जाता है,कुछ उसी तरह के।।
    लेकिन अपने बेलौस और बेपरवाह स्वभाव के कारण ये किसी बात को बहुत ज्यादा दिल से नही लगाते।
   इंजीनियरिंग भी इन्होंने तुक्के में ही जॉइन कर डाली। गणित कुछ ज्यादा ही अच्छी थी,आसपड़ोस के लोगों ने आर्यभट्ट बुलाना शुरू कर दिया। और बस आर्यभट्ट जी ने खुद को नवाजे इस नाम को इतना सीरियसली लिया कि ग्यारहवीं में गणित ले बैठे।
    पढ़ाई लिखाई में दीदे लगते न थे। स्कूल के शुरुवाती दो महीने स्कूल से चोरी छिपे भाग कर फिल्में देखने में या स्कूल के पीछे की तलैया में दोस्तों के साथ बैठ सिगरेट फूंकने में निकाल दिए।
   तीसरे महीने फर्स्ट टर्म्स के इम्तिहान होने पर नानी दादी सब एक साथ याद आ गयी।
    रिजल्ट्स बुरे नही बेहद बुरे आये। नतीजा ये हुआ कि मार्कशीट घर पर पिता जी को दिखाने से उतारी जाने वाली चप्पलों की आरती से बचने का एकमात्र उपाय यही दिखा की आर्यभट्ट जी ने अपने पिता के नकली साइन मारे और परीक्षाफल जमा कर दिया।

    अब ये छोटी मोटी सी गलती कोई पाप तो है नही की जिसके लिए नरक की अग्नि में जलाने की सज़ा दी जाए। लेकिन यही समझ जाती तो प्रिंसिपल इंसानियत के दायरे में न आ जाती।
  पर उसे तो खून पीने वाली चुड़ैल का ही टाइटल भाता है। आर्यभट्ट बाबू के पिता श्री अनिल मिश्र जी के साईन होने के बाद भी धड़धड़ा के मिश्र जी के ऑफिस के लैंडलाइन पर फ़ोन दे मारा और उन्हें उनके लख्ते जिगर का कांड कह सुनाया वो भी सारी लगाई बुझाई के साथ।
    अब जब छौंक ही मिर्ची हींग की लगी हो तो स्वाद मीठा कैसे आये?
   उस रात घर के बड़े राजकुमार की जबरदस्त पिटाई हुई। एक मिडल क्लास बाप अमूमन जो जुमले सुनाता है वो सब मिसिर जी ने कह सुनाए…
    और उस रात स्वाभिमानी बेटा बिना कुछ खाये ही सो गया।  अगले दिन उठते ही उसने एक कसम ले ली कि अब इस साल चाहे विषय कठिन से कठिनतम हो जाये पढ़ कर ही पास होना है।
    इस बार न तो फर्रे बनाये जाएंगे और न ही स्कूल बाथरूम की दीवारों को रंगा जायेगा।
   अभिमन्यु का अभिमान जागा था आखिर!

   ग्यारहवीं वो अच्छे नंबरों से पास हो गया। अब क्लास के होशियार लड़कों से ज़रा सी दोस्ती बढ़ी और दोस्ती के साथ बढ़ता गया छिटपुट ज्ञान।
   बारहवीं के लड़कों के जिस ग्रुप में अभिमन्यु शामिल हुए वहाँ आये दिन एन आई टी , आई आई टी , आर आई टी के चर्चे होने लगे। और फिर अभिमन्यु को दिखा अपनी आजादी का पहला रास्ता।
    पहले तो उसने कभी अपनी आगे की पढ़ाई को लेकर कुछ सोचा ही नही था।
    लेकिन अब उसे अंधियारे में एक हल्की सी रोशनी दिखने लगी थी।
   उसके सारे दोस्त इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे थे। उन लोगों के मुताबिक अच्छे सारे कॉलेज उनके शहर से दूर थे और बस यही तो उसे चाहिए था। अपने शहर से दूर , अपने घर से दूर कोई ठिकाना जहाँ वो पढ़े न पढ़े पर सुकुन से रह तो सकें।
     यहाँ घर में तो उसका जीवन कतई अस्थिर हो रखा था। पिता जी की प्रोमोशन पेंडिंग है अभी को मार लो, किसी से कहा सुनी हो गयी अभी को मार लो। मतलब अभी उनका बेटा न हुआ डस्टर हो गया जब तब हाथ साफ कर लो।
  माँ अक्सर उसके पक्ष में बोलती ” जवान लड़का है उस पर हाथ न छोड़ा करें । किसी दिन गुस्से में घर छोड़ गया तो? ”
   पर मिसिर जी हर बार कोई ऐसी कैफियत दे जाते की उन दोनों का झगड़ा बढ़ता चला जाता और अभिमन्यु चुपचाप घर से निकल सड़क पर चला आता।
  वो भी अपने परिवार की समस्या को समझता था। कमाने वाला एक और खाने वाले पांच। घर चलाना भी तो मुश्किल था। उसके पीछे उसके एक भाई और जो था। उसके बाद वाला उससे डेढ़ साल ही छोटा था।
  मतलब उसकी कॉलेज की पढ़ाई तक ये  भी तैयार हो जाना था।
   उसे इतना तो समझ आ ही गया था कि ज़िन्दगी की खींच तान में थोड़ा आगे बढ़ना है,  तो उसे इंजीनियरिंग में प्रवेश लेना ही पड़ेगा।

   और बस उसने तैयारी शुरू कर दी थी। उसकी तैयारी और उसके गणित का ज्ञान देख उसके एक करीबी दोस्त ने उसे आई आई टी और बाकी बड़े महाविद्यालयों के फार्म भी भरने की सलाह दी थी। लेकिन महंगे फॉर्म्स के साथ ही महंगे कॉलेज की फीस सुन उसकी घर पर बात करने की हिम्मत ही नही हुई ।

    बारहवीं के साथ ही उसने इंजीनियरिंग का इम्तिहान दे दिया  और जिसमें उसका चयन भी हो गया ।
  काउंसिलिंग के बारे में घर पर उसने डरते डरते ही बताया था…
     क्योंकि अब तक फार्म भरने से लेकर इम्तिहान देने तक का काम उसने अपने पिता हिटलर मिश्रा जी से छिप कर अपने छोटे मामा की सहायता से ही किया था।
  अभिमन्यु का डर सही साबित हुआ। आज तक पापा किसी बात से खुश या संतुष्ट हुए थे जो आज होते?  जहाँ उसके दोस्तों के पिता बेटों के सेलेक्शन पर मिठाई बाँट रहे थे अभि के पिता का अलग ही राग चल रहा था।

” क्या ज़रूरत थी इंजीनियरिंग की? चार साल बर्बाद करने के बाद जाने कब नौकरी मिले? आजकल इंजिनिंयर्स ढेरों हो गए हैं, सरकारी नौकरियों के लाले पड़े हैं। इससे अच्छा तो तीन साल की ग्रेड्यूएशन की डिग्री लेकर पी सी एस कर लेना था। “

  पिता जी की नाराजगी इस बार अभि के समझ से बाहर थी।
  काउंसिलिंग के दौरान वो कॉलेज चुन पाता इसके पहले ही कॉलेज ने उसे चुन लिया था।

*****

   मायानगरी विश्वविद्यालय ने खुलने के साथ ही अपने कैम्पस में हर एक डिग्री के कॉलेज की स्थापना कर रखी थी। इसके साथ ही सभी कॉलेज में विद्यार्थियों के लिए भी फ्री सेलेक्शन, स्कॉलरशिप  के साथ ही मैनेजमेंट कोटा भी रख छोड़ा था।
   कुछ बच्चे अपने दम पर सेलेक्ट होकर आते थे तो कुछ मैनेजमेंट सीट से। उनके अलावा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स की टीम अलग अलग जगह की काउंसिलिंग में घूम कर कुछ विशेष होशियार बच्चों को छात्रवृत्ति देकर भी अपने विश्वविद्यालय का हिस्सा इसीलिए बना रही थी कि विश्वविद्यालय का नाम  हो सके।

  विश्विद्यालय की मेहनत का नतीजा था कि ” मायानगरी ” अपने खुलने के पांच ही सालों में पढ़ने और पढ़ाने वालों के बीच अपना अच्छा नाम बना चुकी थी।

    अभिमन्यु को यहाँ चुन कर लाया गया था। और ये विश्विद्यालय खुलने के तीसरे साल से यहाँ मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ रहे हैं।
     अभी इनका पांचवा सेमेस्टर चल रहा है। और अब ये वापस अपने पुराने रंग में आ चुके हैं।
  
    वही बेफिक्री वहीं बेपरवाही का आलम है । न इन्हें किताबो से मुहब्बत है ना किताबों को इनसे। इनका इंजीनियरिंग में घुसने का मुख्य उद्देश्य था अपने घर से दूर भागना जो पूरा हो चुका था इसलिए अब इनका पढना लिखना भी दो साल से लगभग बंद ही है।
 
      वो तो दिमाग ऐसा पैना है बंदे का की कोई भी सेमेस्टर हो और कोई भी पेपर इनका रिकॉर्ड रहा है सिर्फ एक रात दिन की पढ़ाई में ही इन्होंने अपनी नैय्या तो पार लगाई ही है अपने आगे पीछे आजु बाजू वालों को भी वैतरणी पार कराई है।
   इसलिए भाई साहब का नाम चल गया है, लेकिन सिर्फ इनकीं ब्रांच में। यहाँ तक कि इनकी ब्रांच के बाहर भी लोग इन्हें ज्यादा नही जानते पहचानते।
   
   पर फिर भी ये अपने चेलों यानी दोस्तों को जमा कर जब तब ज्ञान देते ही रहतें हैं।
  कॉलेज का नया नया सत्र शुरू ही हुआ है और अभी उसी पर कुछ ज्ञान गंगा बह रही थी कि बिल्कुल किसी आंधी सी वो आयी और तूफान सी लौट गई…

और अभिमन्यु मिश्रा बस उसे देखते ही रह गए..

” अबे थी कौन ये?”

   आंधी सी आने वाली का नाम था रंगोली…..
रंगोली तिवारी !! ये मेडिकल प्रथम वर्ष की छात्रा हैं। दिखने में नाजुक सी खूबसूरत सी रंगोली का कॉलेज का पहला दिन बहुत बुरा बीता।

********

    बारहवीं के बाद मेडिकल सेलेक्शन लिस्ट में उसका नाम नदारद था । तो वैसे ही उसने रो रोकर घर सर पर उठा लिया था कि ठीक अगले दिन एक और नई लिस्ट आयी जिसमें वेटिंग लिस्ट वालों के नाम थे और यहाँ सातवें नम्बर पर रंगोली तिवारी का नाम और अनुक्रमांक मिल गया।
   बस घर वालों की खुशी का ठिकाना नही रहा लेकिन रंगोली को हर काम जब तक पूरा न हो जाये विश्वास नही होता था।
  उसने कितनी मेहनत की थी ये वही जानती थी। रात दिन एक कर उसने पढ़ाई की थी। किताबों को ऐसे रट घोंट लिया था कि उसे सपने भी एग्जाम हॉल और पेपर के ही आते थे।
  तैयारी बहुत अच्छी होने के बावजूद वो पेपर बनाते समय एंजाइटी की शिकार हो गयी और अच्छा खासा बनता पेपर थोड़ा सा बिगाड़ आयी।
     पेपर्स के बाद उसका पूरे एक हफ्ते का शोक चला जिसमें अपनी खिड़की पर खड़ी वो बाहर लगी रातरानी की बेल सूंघती अपने लैपटॉप पर आबिदा परवीन की गज़लें सुन सुन कर रोने की कोशिश में लगी रहती।

   लेकिन ज़िन्दगी कब तक उदास बैठेगी। रंगोली की मीठी सी कमज़ोरी आइसक्रीम को उसकी माँ ने औजार बना कर उपयोग किया और दुखियारी के सामने चार दिन बाद उसकी पसंदीदा आइसक्रीम पेश कर दी।
     रंगोली की पसंदीदा नॉवेल उसके हाथ में देकर मम्मी ने अपने हाथो से उसे आइसक्रीम खिलाई और बस रंगोली अपना गम भूल गयी।

मम्मी ने एक अच्छा सा ऑप्शन भी रख दिया..” बेटा अगर इस साल सेलेक्शन नही भी हुआ तो कोई नही। ड्राप लेकर अगले साल कर लेना तैयारी। मुझे पूरा विश्वास है मेरी बेटी अव्वल दर्जे की डॉक्टर बनेगी। चाहे कितना भी समय ले लेना बेटा पर हिम्मत नही हारना। “

   रंगोली माँ के सीने से लग गयी। उसके कमरे के बाहर खड़े उसके पापा उसके चेहरे की खोई मुस्कान वापस पा कर खिल उठे।
   दो महीने बाद रिज़ल्ट आया और वेटिंग लिस्ट में ही सही रंगोली का सेलेक्शन हो गया।

   परिणामों के दो हफ्ते बाद ही एक शाम जब पूरा परिवार साथ बैठे चाय की चुस्कियों के साथ गप्पे मारने में लगा था कि रंगोली के पिता जी के मोबाइल पर किसी अनजान नम्बर से फोन आया…

” तिवारी जी बोल रहे है .?

” जी हाँ ! कहिये कौन काम है हमसे ?”

” आपकी बिटिया का सलेक्सन नही हुआ महाराज ?”

” तो तुमको इससे क्या लेना देना भाई? “

” लेना देना है ना तिवारी जी। आपकी बिटिया आई है वेटिंग में सातवें स्थान पर। अब मान लीजिए छै तक आकर सेलेक्सन रुक गया तो क्या करेंगे। का बिटिया का एक साल फिर बर्बाद कर देंगे।

“तुम हो कौन और कहना क्या चाहते हो? “

” नाम में हमारे कोई खास बात नही जो हम बताएं। पर जो बताने जा रहे वो बहुत खास है। आप पांच लाख तैयार रखियेगा हम नार्मल सीट से सेलेक्शन करवा देंगे।

” पगला गए हो क्या ? इत्ता पैसा देना होगा तो मैनेजमेंट सीट नही खरीद लेंगे। “

” पगला तो आप गयें हैं गुरु। मेडिकल की सीट वो भी मैनेजमेंट सीट! कम से कम तीस पैंतीस लाख लगेगा। घर द्वार बेच के बिटिया को पढ़ाएंगे का? और फिर रंगोली के पीछे एक और गुड़िया भी तो है ना मेहंदी। उसके लिए क्या बचाएंगे। पांच लाख बहुत सस्ता ऑफर दिए हैं हम। वो तो बिटिया आपकी होशियार है वरना हम किसी को सामने से होकर फ़ोन नही करते। जिसको सीट चाहिए वो खुद ही हमें ढूँढ़ लेता है। समझे? “

  तिवारी जी ने खिसिया कर फोन पटक दिया। ठीक था वो घर से सम्पन्न थे , अच्छी नौकरी में थे। पर थे तो मध्यम वर्गीय ही। तीस लाख तो पूरी उम्र कमाई कर जोड़ लेंगे तब भी शायद ही जोड़ पाएं। और फिर रंगोली के पीछे ही मेहंदी भी थी। वो गणित लिए तैयार खड़ी थी।
   इस साल रंगोली का किसी अच्छे कॉलेज मे सेलेक्शन हो जाता तो दो साल बाद मेहंदी के लिए सोचना शुरू करना था उन्हें ।
    वो सोच ही रहे थे कि रंगोली ने उनकी मुश्किल आसान कर दी…

” ड्राप ले लुंगी पापा। आप चिंता न करो। ऐसे किसी को पैसे क्यों दे हम। जाने कहाँ का फ्रॉड हो ये। “

  बिटिया की समझदारी भरी बात पर पापा मुस्कुरा उठे लेकिन फ़ोन वाली बात उनके दिमाग से गयी नही।
  कुछ दो दिनों के बाद ही काउंसिलिंग लेटर आ गया और घर की रौनक वापस आ गयी।
  रंगोली अपने पिता के साथ काउंसिलिंग में आ गयी। एक से एक बड़े बड़े चिकित्सा महाविद्यालयो की भीड़ में उसे दो महाविद्यलयों में आखिरी की दो तीन बची सीट मिल रही थी।
  सीट तो भाई शुरू की मिले या आखिरी की मेडिकल सीट मेडिकल सीट होती है।
  रंगोली बुरहानपुर की सीट के लिए हां कहने वाली थी कि उसके सामने बैठे व्यक्ति के पीछे की स्क्रीन जिस पर सीट्स और कॉलेज दिखाए जा रहे थे में एक नए चिकित्सा महाविद्यालय का नाम सात खाली सीट्स के साथ नज़र आया ” रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह चिकित्सा महाविद्यालय ” …
   ये नाम देखते ही रंगोली ने सामने बैठे व्यक्ति के सामने टेबल पर अपने फॉर्म पर एकदम से हाथ रख दिया…

“वेट सर ! सर ये बाँसुरी मेडिकल कॉलेज कौन सा है? “

सामने बैठे व्यक्ति ने अपने एक किनारे रखे ब्रोशर को उठा कर उसके सामने कर दिया…

” मायानगरी विश्वविद्यालय का एक कॉलेज है। मायानगरी में भी बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की तर्ज़ पर एक ही कैम्पस में लगभग सारे कॉलेज खोल रखें हैं। अभी नया बना विश्विद्यालय है लेकिन रेप्युटेशन अच्छी हैं।।
  यहाँ मेडिकल में सात सीट उपलब्ध है। “

” सर मुझे यही एडमिशन लेना है। “

” आर यू श्योर ? “

” डेफिनेटली सर ” मुस्कुरा कर रंगोली पीछे स्क्रीन पर चमकते नाम को देख मुस्कुरा उठी।
   कौन सा मुझे एम्स या ए एफ एम सी मिल रहा था। बुरहानपुर की सीट से तो यही भला है। कम से कम कॉलेज का नाम तो सुंदर है।
   रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह मेडिकल कॉलेज। यानी मेडिकोज की भाषा में R B A S medical collage….

क्रमशः

aparna …….


  
  

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प्यार # 62 kg

यह नीरा खुद को समझती क्या है यार जब देखो तब मोटापे पर लेक्चर देती रहती है मुझे,,          खुद उसने अपनी पूरी जिंदगी में बस एक ही काम किया है जो अपने पचासी किलो के वजन को 65 में लेकर आ गई अब मेरे पीछे पड़ी हुई है।।”  ” छोड़ो ना तुम भी किसकी किसकी बात लेकर बैठ जाती हो अब उन लोगों के पास और काम भी क्या है??असल में तो सब जलती है तुमसे।।”  ” किससे मेरी जॉब से??”  ” नहीं मेरी जान तुम्हारे हैंडसम पति से सबको लगता कितना हैंडसम पति मिला हुआ है इसे”  “ओहो मिस्टर हैंडसम आपने उन लोगों के हस्बैंड को नहीं देखा है क्या?? मुझे तो बल्कि यह लगता है कि इतने पढ़े लिखे स्मार्ट लड़कों को ऐसी गंवार लड़कियां कैसे मिल गई मैं तो फिर भी बहुत क्लासी हूँ, बस थोड़ी सी मोटी हो गई हूं।”  ” अरे कुछ मोटी वोटी नहीं हुई हो,,हाँ  हेल्थ वाइज चाहो तो कुछ कर लो,योग या जिम!! थोड़ा बहुत वेट रिड्यूस करने में कोई बुराई नहीं है पर अपने बढ़ते वजन को लेकर टेंशन में मत आ जाओ समझी, और हां शाम को याद रखना एक बर्थडे पार्टी है जाना है।।”” ओह नो आज से डाइटिंग शुरू करने की सोची थी आज ही बर्थडे पार्टी में जाना है चलो ठीक है आज खा लूंगी कल से शुरू कर लूंगी  डायटिंग।।”रागिनी भी महिलाओं की इंटरनेशनल समस्या मोटापे से ग्रस्त थी,वो उतनी मोटी थी नही पर खुद को अपने टीन एज के रूप से कम्पेयर कर के दुखी हो जाती थी।।    कॉलेज के दिनो में उसका वेलशेप्ड फिगर और कपड़े सबके ध्यान का केंद्र होते थे,उसे कभी अपने आपको मेनटेन करने की ज़रूरत ही नही पड़ी ….   इसी मुगालते में वो जी रही थी कि वो कभी मोटी नही हो सकती।।    शादी के बाद जो हल्का फुल्का एक दो के जी गेन हुआ भी वो उस पर और फ़बने लगा,और बस यही एक चूक हो गयी…….कम्बख्त बॉडी को फलने फूलने की आदत लग गयी,और ज़बान को स्वाद का चस्का ..     रही सही कसर डिलीवरी में पूरी हो गयी,उस वक्त आस पास के हर किसी का प्यार रागिनी की खाने की प्लेट पर ही उमड़ पड़ा ,  वेज नॉनवेज,मीठा तीखा जिससे जो बन पड़ा उसने आगे बढ़ बढ़ कर रागिनी को खिलाया,नतीजा बेबी तो 2.75 किलो का हुआ पर रागिनी खुद 75 में पहुंच गयी।।   बच्चे के साथ एक साल तो सोते- जागते,हँसते- रोते, सूसू पॉटी में निकल गये,पर उसके बाद जब एक बार फिर सोशल लाईफ में इंटरफेयर शुरु हुआ तब जाकर रागिनी की नींद खुली।।     अपने आस पास नज़र फिरायी तो देखा उसे जम के खिलाने वाली सखियाँ खुद स्लिम ट्रिम बनी हुई है…..     उन्हीं सखियों के साथ एक ही फ्रेम शेयर करना अब उसके लिये मुसीबत का सबब बनने लगा, हर पार्टी में जाने के पहले यक्ष-प्रश्न सामने मुहँ बाया खड़ा होता __ ” क्या पहन के जाऊँ ” और फिर तरह तरह के गाउन ,साड़ियाँ ट्राई करने मे बाद अंत में जीन्स के साथ कोई भी लम्बी कुरती या श्रग ही पेट छुपाने का हथियार बनता।।    रागिनी को जितनी कोफ्त अपने बढ़े पेट को देखकर नही होती थी उससे कहीं ज्यादा चिढ़ उसे दूसरों की दी हुई एडवाइज़ से होती….   वही सारी औरतें जो कल तक उसके फैशन ट्रेंड को फॉलो करती थी,आज उसे रह रह कर पतले दिखने की टिप्स दिया करती थी।।       ” जिम शुरु कर ले रागिनी,वर्ना तेरा दुबला होना असम्भव है”  ” पर्सनल ट्रेनर क्यों नही रख लेती।”  ” अरे शिल्पा शेट्टी का योगा विडियो देखा कर बहुत फायदा होगा।”   इसी तरह के एक से बढ़ कर एक नुस्खे उसे थमाए जाने लगे,जिनके पीछे छिपी काली सच्चाई की ” हाँ तुम मोटी हो रागिनी” उसका दिल दुखा जाती।    वजन कम करना कोई आसान काम तो है नहीं, फिर भी एक दृढ़ निश्चय के साथ रागिनी ने उस ओर कदम बढ़ाया अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित किया शेडूल बनाया, और हफ्ते में 3 दिन जिम जाना शुरु किया ……इसके साथ ही दिन भर में 8 से 10 गिलास पानी पीना सिर्फ उबली सब्जियां खाना सलाद खाना फल खाना शुरु कर दिया…  हफ्ते में 2 दिन योगा भी करने लगी….    लगभग पन्द्रह दिन की कड़ी मेहनत का नतीजा सामने आया,वजन का कांटा 2 किलो कम दिखाने लगा…     खुशी से बौराई रागिनी शाम का इन्तजार करने लगी।।     शाम में राजीव के बेल बजाते ही दरवाज़ा खुद ब खुद खुल गया,भीतर आते ही बैठक में कैंडल्स की मद्धिम रोशनी और खुशबू जादू सा असर दिखा रही थी,सेंटर टेबल पर एक खूबसूरत सी ट्रे में गुलाब की पंखुडियों के ऊपर दो चाय के कप,चाय की भरी केतली के साथ रखे थे,और पास की प्लेट पर सजी थी हाई फाईबर डाईट बिस्किट्स, जिन्हें देख राजीव के चेहरे पर मुस्कान खिल गयी,  वो सोफे पर बैठा ही था कि रेड कलर के पार्टी गाउन में रागिनी भी सामने आ गई, उसे इतना सजा धजा देख राजीव को अन्दर से घबराहट सी हुई कि कहीं आज रागिनी का जन्मदिन तो नही जो वो भूल गया,फिर अचानक याद आया अभी पिछले महीने ही तो उसके जन्मदिन के लिये डायमंड्स खरीदे थे,बिल भी अब तक किसी शर्ट की जेब में पड़ा होगा…..     फिर कहीं उन दोनों की एनिवर्सरी तो नही,पर ऐसे डायरेक्ट पूछना शोभा नही देता,बेचारी ने इतनी तैय्यारियाँ की है,क्या सोचेगी निकम्मे पति को शादी की तारीख तक याद नही ,अभी वो अपनी सोच मे डूबा ही था की ब्लास्ट हुआ__   ” कैसी लग रही हूं मैं??”    ” बहुत खूबसूरत “पानी की घूंट निगल कर राजीव ने कहा और ध्यान से रागिनी को देखने लगा कि आखिर आज क्या विशेष है??  ” मतलब स्लिम होकर मैं अच्छी लग रही हूँ ना,राजीव पता है इन पन्द्रह दिनों में ना तो मैंने राईस का दाना खाया,ना कोई मीठा,,तुम्हें पता है चाय तक छोड़ रखी थी मैंने,पर आज मेरी सारी तपस्या का फल मिल गया तुम्हें पता है मेरा 2 किलो वजन कम हो गया।।  राजीव की सांस में सांस आई,, तो यह बात है मैडम जी इसलिए इतना सेलिब्रेट कर रही है,, कुछ देर पहले राजीव के चेहरे का उड़ा हुआ रंग वापस आ गया,उसने रागिनी को खींच कर गले से लगा लिया__       ” इतना क्यों परेशान होती हो,तुम वैसे ही बहुत खूबसूरत हो मेरी जान।”   ” पर स्लिम होकर और ज्यादा लग रही हूँ ना!!”    ” हाँ बाबा!! तुम खुश हो ना?”    ” बहुत ज्यादा खुश हूँ राजीव।”    ” तो बस,जिसमें तुम्हारी खुशी!! अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हें स्लिम ट्रिम रहना है तो ऐसे ही रहो,मुझे कोई दिक्कत नही है,,मैंने तो तुमसे प्यार किया है रागिनी, तुम्हारी हाइट तुम्हारा फिगर तुम्हारे बाल आंखें होंठ हाथ पैर इन सब से नहीं,, तुमसे मैंने तुमसे प्यार किया है कल को तुम्हारे बाल कम हो जाएंगे या सफेद हो जाएंगे तो मेरा प्यार कम थोड़ी ना हो जाएगा,, बल्कि वो तो समय के साथ बढ़ता जाएगा हमेशा….. पहले तुम मेरी पत्नी थी लेकिन आज तुम मेरे बेटे की मां हो,,, मां बनने के बाद तुम्हारे लिए मेरे मन में आदर सत्कार और बढ़ गया और प्यार भी….. कल को तुम मेरी बहू की सास बनोगी, तब तुम्हारे लिए सम्मान और भी ज्यादा बढ़ जाएगा और उसके साथ ही प्यार भी।। उसके बाद तुम मेरे पोते पोतियो की दादी बन जाओगी तब तो वह सम्मान पीक पर होगा और उसके साथ ही प्यार भी…..        तुम्हारे शरीर के घटते बढ़ते इंचेज मेरे प्यार को कम नहीं कर सकते, कभी नही ।।   “ओह्ह यू आर सच अ स्वीटहार्ट राजीव,अच्छा सुनो अब जल्दी से फ्रेश होकर आ जाओ ,बहुत भूख लग रही है ,आज सेलेब्रेट करने के लिये मैंने पालक पनीर, भरवां बैगन, मटर पुलाव ,बूंदी का रायता और खीर बनाई है ,जल्दी आओ तब तक मैं टेबल रेडी करती हूँ ।”   ” हे भगवान!! इतना सारा खाना!!”    ” हाँ तो!! पन्द्रह दिन की भूखी भी तो हूँ ।   पर सुन लो बहारें मुझसे रूठी नही हैं,बहारें फिर से आयेंगी।।”    राजीव हँसते हुए कपड़े बदलने अन्दर चला गया।। 

aparna….

चंदा

चंदा:   “अरे कहा मर गई,चंदा जल्दी कर।””जल्दी जल्दी हाथ चला भाई,चाय नाश्ता लगा दे टेबल पे,साहब का ऑफ़िस का समय हो गया है।”

चंदा:   “अरे कहा मर गई,चंदा जल्दी कर।””जल्दी जल्दी हाथ चला भाई,चाय नाश्ता लगा दे टेबल पे,साहब का ऑफ़िस का समय हो गया है।”    “बस अभी आई दीदी।” रसोई से ही चंदा ने आवाज लगायी और अपने काम मे जुट गई।ये शिल्पा मेहरा के घर का रोज का सीन है,सुबह साढे आठ से नौ के बीच इनके घर इसी तरह का तूफान मचा रहता है।    शिल्पा के पति मिस्टर मेहरा के ऑफिस निकलने के बाद शिल्पा और उनका बेटा नाश्ता करते हैं और फिर चंदा।  इधर कुछ दिनो से शिल्पा रोज नाश्ते के बाद अपने बेटे को बैठा के कुछ ना कुछ पढाती रहती हैं।अभी तक उनका बाल गोपाल उनकी  कॉलोनी के ही किंडरगार्टन मे पढता आया था,अब तीसरी कक्षा के लिये ,उसे शहर के सबसे महंगे और बड़े स्कूल मे भर्ती कराने ही  रोज ये कवायद की जा रही है।        सेंट स्टीफेंस वहाँ का सबसे बड़ा और शानदार कॉन्वेन्ट है,जहां भर्ती की अनिवार्य शर्त है,वहाँ के कड़े इम्तिहान मे पास होना।स्कूल महंगा भी है पर अगर कोई विद्यार्थी उनके पर्चे मे पूरे नंबर ले आये तो उसकी पूरी पढाई स्कूल की तरफ से मुफ्त होती है।”शिल्पा यार मत सोच वहाँ का,ऐसा जब्बर पेपर होता है की कोई बिरला ही निकाल पाता है,मेरी तनु तो देखा ही है तूने कितनी होशियार है,कहाँ क्लीयर कर पायी।””हाँ अनिता ,बात तो सही है तेरी।एक बार मै भी प्रयास कर ही लेती हूं,वर्ना तेरी तनु के साथ के वी मे ही डाल दूंगी।”   “ये क्या बात हुई,उसकी तनु का नही हुआ तो क्या   विहान का भी नही होगा,मेरा तो दिमाग खराब हो गया,अब तो ऐसे तैय्यारी कराउन्गी की मेरा बच्चा फर्स्ट आयेगा वहाँ,देख लेना।”   ” हाँ ,बाबा करा लो तैय्यारी,इतना क्यों कुढ रही हो।तुम्हारी ही प्रिय सखी हैं अनिता जी।”और विवेक ज़ोर से हंस पड़ा पर शिल्पा का दिमाग अलग ही उधेड़बुन मे उलझा था।बस दूसरे दिन से ही युद्धस्तर पर तैय्यारियाँ शुरु हो गई,  नौ साल के बच्चे पर हर तरह का अत्याचार हुआ। 15तक की टेबल,हिन्दी मे गाय पे निबंध, सामान्य ज्ञान मे सारा जो कुछ शिल्पा को पता था सब रटवाया गया,अन्ग्रेजी तो पुछो मत,क्या क्या नही पढाया,गनीमत रही टॉलस्टॉय तक नही पहुची शिल्पा ।    दस दिन बाद एक छोटा मोटा सा पेपर बना के विवान को पकड़ा दिया,”बेटा देखो सिर्फ एक घन्टे मे ये पेपर बना के दे दो,इसमे पास तो कल का एग्ज़ाम भी पास कर लोगे।”     शिल्पा अनिता से फ़ोन पे लग गई,एक घंटा पलक झपक के बीत गया।”मम्मा लो मैने पेपर कर लिया।”मम्मा ने पेपर देखा और बेटे को गले लगा लिया,आंखों मे खुशी के आंसू आ गये,पर आंसू देख विवान पिघल गया।”मम्मा पेपर मैने नही चंदा ने बनाया है,आप बात कर रही थी ,तो मै शिन चेन देखने लगा ,मम्मा सॉरी ” शिल्पा ने चन्दा को देखा ,चन्दा ने अपनी माल्किन को।”चांद तुझे कैसे ये सब आ गया ,तू तो कभी स्कूल गई ही नही।””तो क्या हुआ दीदी,आपको विवान भईय्या को पढाते तो देखते थे ना ,,बस सीखते गये।””अरे पर तू तो बड़े अच्छे से लिख लेती है,अच्छा 7का टेबल सुना।”चंदा ने सुना दिया,उसके पीछे 9का फिर 13का और आखिर मे 15का भी सुना दिया।शिल्पा का कुछ देर पहले का चन्दा पर का गुस्सा उड़न छू हो गया।मुस्कुराते हुए उसने एक निर्णय ले लिया।    दूसरे दिन शिल्पा विवान और चंदा दोनो बच्चों को इम्तिहान दिलाने ले गई।   2दिन बाद ही रिजल्ट भी आ गया,अनिता रिजल्ट जानने को सबसे ज्यादा उत्सुक थी,,दौडी दौडी आई।   “क्या हुआ शिल्पा ,हुआ कुछ विवान का।””हाँ अनिता तेरी बात ही सही निकली यार,पेपर वाकई जब्बर था। विवान को तो अब के वी ही डालूंगी पर।””पर क्या शिल्पा बोल ना ”  “पर ये  की चंदा का सेंट स्टीफेंस मे चयन हो गया है,और वो भी प्रथम स्थान के साथ,विवान से एक साल ही तो बड़ी है,उसका एडमिशन मैनें वहाँ करा दिया। साल भर की सारी फीस भी भर आई और उसकी माँ को बता भी दिया की अब चंदा स्कूल जायेगी,काम नही करेगी।”      अनिता भी मुस्कुरा उठी “शिल्पा यार अब तेरे घर चाय कौन बनाएगा ।”  “”चंदा की अम्मा “”हँसते हुए शिल्पा चाय बनाने रसोई मे चली गई।इति।मेरी ये कहानी एक छोटा सा प्रयास है उन बच्चियों के लिये जिन्हे उनका हक नही मिलता,बचपन नही मिलता ,इतनी छोटी उम्र की बच्चियों से घर पे काम करा कर हम उनका कोई भला नही करते ,सिर्फ उनका बचपन छीन लेते हैं।।अपर्णा…

कोहिनूर !

रूही, प्लीज़ रुक जाओ। प्यार करता हूँ तुमसे”|

छी! गटर कहीं के! अपनी शक्ल देखी है कभी?”   

“हाँ कई बार! तुमसे ज़रा कम ही हूँ।”      

रूही ज़ोर से हँस पड़ी ” देख रिहाना ये मुहँ और मियाँ मिट्ठू। सुन घर जाकर अपनी अम्मा से पूछ कहीं कोयला खा के तो पैदा नही किया तुझे। पूरी शक्ल में जैसे कोलतार पुता है, छी मुझे तो देख कर ही घिन आती है, कैसे कोई इतना काला हो सकता है।”  रूही मटक कर चली गई …      

” क्यों इतनी जिल्लत सहता है भाई, तू बोल एक बार डी बी लैब का मजूमदार दोस्त है अपना, ऐसा स्ट्रांग एसिड ला दूंगा कि फिर ये घमंडी कबुतरी अपनी ही आँख नाक देख डर ना गयी तो नाम बदल देना भाई का।”           

“भाई बस रंग का काला हूँ ईमान का नही जो अपने इश्क़ को तेज़ाब से रंग दूं। माफ करना, लेकिन वो जो अभी अभी कर गयी वो मैं उसके साथ कभी नही कर पाऊंगा।” 

  दोस्त ने दोस्त को गले से लगा लिया__  ” अंधी है कम्बख्त, कोयले के पीछे छिपा कोहिनूर नज़र नही आया उसे…..सही कहा है किसी ने हीरे की परख सिर्फ जौहरी को ही होती है।

aparna….

 इतिहास

मैं छोटी थी उस समय ,उमर तो याद नही पर शायद नौ या आठ बरस की रही होंगी।     मेरे घर की छत से लगी छत थी उनकी,उनके घर के अमरूद मेरी छत पर झांकते थे और मेरे घर के गुलमोहर उनकी बालकनी पर….. रोजाना शाम में मैं उनकी बातें सुनने कभी उनकी कहानियां सुनने छत पर चली जाती थी,असल में उन्हे सुनना नही देखना मेरा मकसद होता था,वो थी ही इतनी खूबसूरत,,पूरे मोहल्ले की क्लियोपेट्रा!!       ताज़गी भरा गुलाबों सा चेहरा,होंठ ऐसे थे जैसे भगवान ने उन्हें पर्मानेंट लिपस्टिक लगा कर भेजा हो , लाख कोई ढूंढना चाहे उनके चेहरे पे कोई एब ना ढूँढ पाये ऐसा नूरानी चेहरा था,और वैसी ही चटकीलि बातें।।       नाम था नितेश!!   रज्जू दा अक्सर मुझे नितेश दीदी के लिये कुछ रंग बिरंगे परचे दिया करते थे,जिन्हे एक छोटी सी एक्लेयर के बदले मैं सात तालों में छिपाकर दीदी तक पहुंचा दिया करती थी    वो मोहल्ले के जुलियस सीज़र थे, इन्जीनियरिन्ग द्वितीय वर्ष के घनघोर जुझारू विद्यार्थी,मैं उन्हें अक्सर ड्राफ्ट और स्केल दबाये शाम को कॉलेज से हारा थका लुटा पिटा घर लौटते देख कर सोचा करती कि ये महापुरुष आगे चल कर कोई ना कोई इतिहास ज़रूर लिख जायेगा     इतिहास का तो पता नही पर उन्होने चिट्ठियां बहुत लिखी,गुलाबी लिफाफे मे गम से चिपका कर अच्छी तरह सील पैक कर के ही मुझे देते थे और जब मैं डाकिए का सीरियस रोल अदा कर चिट्ठी को माफिक जगह पहुंचा आती तब एक एक्लेयर पकड़ा देते…..    …..पहले पहले मिलने वाली एक्लेयर बाद मे दस रुपये की डेरी मिल्क में बदली और डाकिए के पद से मेरे त्यागपत्र देने के ठीक पहले मुझे रोस्टेड एल्मंड मिलने लगी थी।।    समय के साथ ये प्रेम कहानी भी अपने अंजाम को पहुंच गयी ,डीग्री के बाद रज्जू दा एम टेक करने बाहर चले गये……          विरह मे विरहणी भी कितना रास्ता तकती ,बी ए,एम ए सब हो चुका था,घर वालों ने रिश्ता ढूँढ़ा,फेरे हुए और नितेश दी हम सब को छोड़ कर आस्ट्रेलिया उड़ गयी।।।   *   अब ससुराल नौकरी सब से फुरसत ही नही होती की मायके में रुक पाऊँ,पर इत्तेफ़ाक़ से वैलेन्टाइन वीक पर ही घर पर भी कुछ आयोजन में आना और रुकना हुआ ।।।       शाम को मोहल्ले के गणपति मन्दिर में आरती के लिये गयी,वहाँ से लौट ही रही थी कि रज्जू दा के घर की ओर नज़र चली गयी,एक चौदह पन्द्रह साल का लड़का बालकनी मे खड़ा मेरी छत की तरफ देख रहा था,मैने ध्यान से उसकी निगाहों पे गौर किया ,उसकी आंखे मेरी छत से लगी दुसरी छत पर टिकी थी जहां नितेश दीदी की बिटिया अपने नाना की छत पर टहल रही थी….     ध्यान आ गया की माँ ने सुबह ही बताया था नितेश दीदी के भाई के बेटे का मुंडन संस्कार होना है जिसमें वो भी सपरिवार आई हुई हैं।।    चेहरे पर अनायास ही मुस्कान चली आयी,सच कहा है किसी ने “इतिहास खुद को दोहराता है”।aparna…  

Yes I am spexcy …..

मासूम मुहब्बत ….
           ऐनक की…..

  आज का टॉपिक मासूम देख कर मुझे मेरी बचपन की मासूम मुहब्बत याद आ गयी…
बड़ी अजीब सी मुहब्बत थी ये … चश्मों की मुहब्बत…

  कॉलेज सेकंड ईयर में पहुंचते ही हम सब एकदम से सीनियर्स बन गए, और कॉलेज में आई जूनियर्स की बहार…

  एक सतर पंक्ति में सर झुकाये चलती फर्स्ट ईयर की लड़कियों में चौथे या पांचवे नम्बर पर उसे देखा मैंने…
  सुंदर सी मासूम सी लड़की और उसकी छोटी सी नाक पर टिका ब्लैक प्लास्टिक फ्रेम का बड़ा सा चश्मा..
पर सच कहूँ तो ये समझना मुश्किल था कि चश्मा लगा कर वो ज्यादा खूबसूरत लगने लगी या उसके लगाने से चश्मा सुंदर हो गया..
  मेरी एक दोस्त ने कहा भी” हाय कितनी सुंदर है और अभी से चश्मा चढ़ गया”
  ” अच्छी तो लग रही है। और चश्मा तो सुपर है। “

मेरी दोस्त ने मुझे अजीब नज़रों से घूर कर देखा…

  और मुझे मेरे बचपन का पागलपन यानी चश्मे से प्यार याद आ गया…

  घर पर कोई भी मेहमान आये मैं उनका टेबल पर रखा चश्मा चुपके से ले उड़ती…….
   फिर अपने कमरे में वो चश्मा अपनी नाक पर चढ़ाये आड़े तिरछे मुहँ बना कर खुश होती रहती…
  मेहमानों के जाने के पहले चुपके से वापस चश्मा रख आती…
   जिन्हें चश्मा लगा होता उनके लिए मन में एक अलग सा सम्मान पैदा हो जाता, यूँ लगता इनसे सिंसियर कोई हो ही नही सकता।
  घर पर मम्मी पापा दोनो को चश्मा लगा था…शायद इसलिए चश्मे के लिए आदर भाव था…
    स्कूल में पसंदीदा टीचर भी चश्मे पहनते थे, पर लाख कोशिशों के बावजूद मुझे चश्मा नही लग पा रहा था।

मम्मी अक्सर कहतीं “मोनी रात में लैम्प जला कर मत पढ़ा करो बेटा चश्मा लग जाएगा और मैं सोचती काश लग जाये…

पापा अक्सर सुबह सूरज की रोशनी में पढ़ने की सलाह देते…आंखों की ज्योति बढ़ती है सुबह उगते सूर्य के दर्शन करो, आंखों में पानी के छींटे डाला करो, सुबह सवेरे नंगे पैर गीली घास पर चलो, ओस से पैर भीगते हैं तो आंखों की रोशनी बढ़ती है।
    और मैं सोचती क्या पैर के तलुओं से ओस आंखों तक पहुंच पाएगी( इस बात पर भरोसा करना मुश्किल होता) लेकिन पापा ने कहा है तो कोई लॉजिक तो होगा इसलिए इस बात को पूरी तरह नकारा भी नही जा सकता था..
   यही सोच कर पापा के नेत्र ज्योति बढ़ाने वाले कोई उपाय नही करती, मुझे  चश्मा जो चाहिए था…

  पर लगातार पढ़ने, टीवी देखने के बावजूद मुझे चश्मा नही लगा…
   लेकिन मेरी बहुत प्यारी सहेली को चश्मा लग गया और उस रात मैं फुट फुट कर रोई…
तब तक शाहरुख खान ने बताया नही था कि जिस चीज़ को शिद्दत से चाहो कायनात उसे आपसे मिलने…. वगैरह वाला डायलॉग..
    पर कुछ दिनों बाद एक चमत्कार हुआ…
, उस वक्त बारहवीं जमात में थी, शायद पढ़ाई या मेडिकल एंट्रेंस का टेंशन था।  हफ्ते भर से सर का दर्द जाने का नाम नही ले रहा था…
  आखिर पापा डॉक्टर के पास ले गए… आंखों की जांच हुई और डॉक्टर ने पापा को अगले दिन अकेले बुला लिया…

डॉक्टर से मिल कर पापा वापस आये और मुझे अपने पास बुला कर बिठा लिया, प्यार से सर पर हाथ फेरते मुझे समझाने लगे…

” बेटा परेशान होने की बिल्कुल ज़रूरत नही है!”

  मैं घबरा गई,लगा अभी तो एंट्रेंस दिया भी नही रिज़ल्ट भी आ गया…
  पापा फिर धीरे से आगे बढ़े, पापा को बहुत धीमी गति से बोलने की आदत है और उनकी स्पीड पर मैं कई बार इमपेशेंट हो जाती हूँ……

” देखो बेटा डॉक्टर ने कहा है….

  मेरा दिल शताब्दी से होड़ लगाने लगा, मुझे एक पल को लगा मुझे ब्रेन ट्यूमर तो नही हो गया जो पापा इतनी भूमिका बांन्ध रहे।
   मुझे ब्रेन ट्यूमर से ज्यादा चिंता ट्रीटमेंट के लिए मुंडाए जाने वाले बालों की होने लगी कि पापा ने बात आगे बढ़ाई…

” डॉक्टर का कहना है लगातार लगाओगी तो एनक उतर जाएगी।”

हाय! बस अब और कुछ नही चाहिए उस ऊपर वाले से। उसने मेरी झोली चश्मे से जो भर दी….
  इधर मेरी खुशी सम्भल नही रही थी, उधर पापा की समझाइश खत्म नही हो रही थी……

  फ़ायनली वो ऐतिहासिक दिन मेरे जीवन में भी आ गया जब मैं अपने शहर के सबसे बड़े चश्मे के शो रूम में खड़ी थी। चारो तरफ चश्मे ही चश्में देख कर मेरे चेहरे की मुस्कान जा नही रही थी और मुझे मुस्कुरातें देख पापा के चेहरे पर राहत थी…
हालांकि इतने शौक से बनवाया मेरा पहला सुनहरी फ्रेम का पतला सा चश्मा सिर्फ छै महीनों में उतर गया…
मैं तो उतारना नही चाहती थी पर पापा की ज़िद  थी आंखे चेक करवाओ…
   और एक बार फिर मेरा दिल हार गया और आंखें जीत गयी..
   और मेरी मासूम मुहब्बत मेरा चश्मा जाने कहाँ खो गया….

कभी कभी कुछ बेमतलब की बातें कुछ बेखयाली खयाल भी लिख लेने चाहिए….
    बस ऐसे ही लिख दिया… कुछ बेसर पैर का…

aparna

नाम…..

    ”  नाम “
       बचपन में रानी गुड़िया गोलू बिटिया छुटकी लाडो जाने कितने लाड भरे नाम सुनते हुए बड़ी हुई।
     कुछ और बड़ी हुई तो घर पर काम करने वाले अर्दली और चाकर बेबी साहब कहने लगे।
     कॉलेज फर्स्ट ईयर में पहुंचते ही ‘ हे यू थर्ड बटन”या फिर “राइट से सेकंड” “पीछे की लाइन में सबसे आखिरी वाली” या ” मिड लाइन की यू दो चोटी” इसी तरह के शब्दों से नवाजी गई।।
    सीनियर बनते ही सारे जूनियर मैडम कहने लगे।।

   शादी हुई ससुराल गई, नाम किसी और के नाम के साथ जुड़ गया, पर वहां भी बहुत से अलग-अलग नामों से पुकारा गया नानी सास जब तक जीवित रही बहुरिया ही कहती रही, कोई दुल्हनिया कोई बहू कोई बहुरानी कहता रहा।।

     नौकरी भी लग गयी ,और एक बहू मैडम बन गयी,।
     उम्र और पदवी के हिसाब से हर दफा नाम बदलता गया,,कब गुड्डे-गुड़िया के साथ खेलने वाली छुटकी मैडम बन गयी पता ही नही चला।।
      छोटे-छोटे बच्चों की माँ बनते ही दुनिया भर की आँटी भी बन गयी।।
      समय गुज़रता गया और हर एक नये नाम के साथ अपने हस्ताक्षर चेहरे पर खिंची झुर्रियों मे करता गया।।

    बहुत से रिश्ते भी जुडे ,चाची ताई मामी मासी ,जिसकी जो ज़रूरत थी उसी नाम से पुकारा।

    भारतीय समाज और इसके संस्कार बड़े गहरे हैं, हाथ भरी लाल हरी चूडियां खनकाने वाली, मांग भर सिन्दूर माथे पर चमकाने वाली आँटी ही होती है भले वो महज़ इक्कीस की हो फिर भी सिर्फ छै महीने छोटा लड़का भी बड़े अदब से आँटी का तमगा लगा निकल लेता है,पहले पहले सुन कर खीझ होती थी,फिर मुस्कुराने लगी,अब तो हँसी आती है,और आदत भी पड़ गयी है।।
      कुछ एक तो मन्दिर की लाइन मे आजकल अम्मा जी ज़रा हटिये कहने से भी गुरेज़ नही करते।।
    पैंतालीस की उमर में अम्मा जी!! किस एंगल से इन  नासपीटों को अम्मा लगतीं हूँ,जी में आता है चीख चीख के कहूं__” अम्मा होगी तेरी माँ ” फिर खुद पर ही फिक्क से हँस देती हूँ ।।
    सुबह बैंक के लिये तैय्यार होते समय कई बार मांग पर के कच्चे सफेदी छूते बालों को करीने से काले बालों से ढांप चुकी हूँ,अब तो कई बार ये भी कह देते हैं ” बालों को रन्गना क्यों नही शुरु कर देती??”

   पर मैं ही डर जाती हूं,,बालों को रंगना मतलब पक्का बुढ़ापा!!” क्यों क्या बूढ़ी लगने लगी हूँ जो बालों को रंगना शुरु कर दूं।”

   औरत का सबसे बड़ा डर __” बुढ़ापा “
             अब तो उसी आँटी शब्द से प्यार होने लग गया है जो कभी बेहद नागवार था।ऐसा लगता है,चलो किसी को तो अब भी आँटी ही लगती हूँ,दादी अम्मा नही।।
      वर्ना कोई भरोसा नही मर्दूद ज़माने का!! कल को अचानक सब के सब माँ जी,अम्मा जी, दादी जी  कह कर टूट पड़ेंगे ,फिर कहाँ जाऊंगी,किस किस से कहूँगी _” दादी मत कहो ना!”
     कभी यही एहसास होता था ,मन टूक टूक चिल्लाता था __” आँटी मत कहो ना”

   पर उस शाम गज़ब हो गया__ ऑफिस का समय समाप्त होने को एक डेढ़ घंटा ही शेष था ,,चपरासी सबकी टेबल पर गरम गरम चाय की प्याली रख कर गया था,,अपनी प्याली से उठते धुयें को देख ही रही थी कि बाजू वाली लता ने टोक दिया” आपकी टेबल पर ही आ रहा है मैडम,,अब तो आपकी चाय गयी काम से,ठंडी हो जायेगी,इशारा कर दो कि चाय पीने के बाद ही आये।”

    पर जब तक लता की बात समझ उस लड़के को बैठ कर इन्तजार करने का इशारा कर पाती वो मेरी विंडो के सामने था।
    बड़ी अदा से मेरी डेस्क पे मेरी नेम प्लेट को ध्यान से देखने के बाद उसने कहा__” चित्रा!! क्या आप मुझे बता सकती हैं कि ये पेपर्स मैं कहाँ सबमिट करुँं।।”

चित्रा!! चित्रा!! चित्रा!!
    मैं आज भी चित्रा हूँ।। एक बेटी ,पत्नि,बहु,माँ, भाभी, ननद ,एक बैंक ऑफीसर इन सब से इतर मेरा वजूद आज भी मेरा नाम है,,चित्रा!!
    ऐसा नही था कि एक तीस साल के लड़के के मुहँ से अपना नाम सुन कर मन बावरा हुआ जा रहा था।।
      ये खुशी मन की थी,अपने उसी स्कूली नाम को वापस किसी के मुहँ से सुनने की खुशी,अपने बचपन की यादों मे उलझे अपने नाम को सुनने की खुशी।।
    सिर्फ अपने नाम को सुनने की खुशी।।

अपनी खुशी छिपाते हुए मैने उसे डेस्क न 5 पर भेज दिया।।
    शाम को जाकर पतिदेव के लिये क्या पकाना है, सासु माँ की दवा खतम हो गयी वो लेते हुए जाना है, बेटे की कराटे क्लास की फ़ी भेजनी है ,सारी चिंताएं कुछ पलों के लिये चाय के कप से उठते धुयें के साथ उड़ चली थी ,मन फूल सा हल्का हो चला था…..

    और कहीं दूर एक गाना चल रहा था__ मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया,हर फिक्र को धुयें में उड़ाता चला गया…..

aparna..