जीवनसाथी-124

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  जीवनसाथी-124

       राजा साहब के कार्यालय में मीटिंग पर मीटिंग चल रही थी अब लगभग उनके मंत्रिमंडल का गठन हो चुका था और शपथ ग्रहण का समय भी आ गया था।

     अगला दिन बहुत महत्वपूर्ण था राजा के लिए। राजनीति में उसकी पारी की शुरुवात होने जा रही थी। आज तक वो अपने महल और रियासत की साज सम्भाल करता आया था लेकिन अब वो सरकार बनाने जा रहा था। अब वो पूरे एक राज्य को संभालने जा रहा था।
    अपने काम समेट कर वो कमरे में पहुंचा तब बाँसुरी बच्चे को गोद में लिए इधर से उधर टहलती उसे सुलाने की कोशिश कर रही थी।
   बाँसुरी ने राजा को देखा और मुस्कुरा उठी…-“आजकल तो राजा साहब के दर्शन मिलने कठिन हो गए हैं। “
  राजा मुस्कुरा कर हाथ मुहँ धोने चला गया… उसके बाहर आते ही बाँसुरी एक बार फिर शुरू हो गयी…
” कल रात आप सोने भी नही आये? कहाँ रह गए थे?

राजा ने अपने बाल पोंछते हुए उसे देखा और फिर बच्चे को गोद में ले लिया…-” कल काम बहुत ज्यादा था। सारा काम निपटाने के बाद आदित्य, रेखा और केसर के पिता से मिलने की ज़िद लिए भी बैठा था तो रात में सारा काम में निपटने के बाद समर और आदित्य के साथ रेखा के पिता से मिलने चला गया था। हालांकि वह खुद भी यही सोच रहे थे कि वह एक-दो दिन में महल आएंगे, लेकिन हम लोगों के जाने से वो खुश नजर आए। वह अपने घर वापस लौटना चाहते थे उन्होंने अपने मन की बात हम लोगों के सामने ही कहीं तो आदित्य ने उसी समय कह दिया कि चले हम आप को छोड़ देते हैं। उसके बाद उन्हें लेकर उनके घर तक गए। वहां पर नौकरों से कहकर सब कुछ ठीक-ठाक करवाया फिर वहां से वापस लौटते में हम लोगों को बहुत देर हो गई थी। रात में दो बजे फिर मैंने सोचा तुम्हें आधी नींद से जगाना सही नही होगा इसलिए ऑफिस में ही सो गया।”

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” हम्म ! मैं परेशान न हो जाऊं इसलिए ऑफिस में ही सो गए! मैं तो इस बात से और ज़्यादा परेशान हो गयी। रात में उठ उठ कर आपको रिंग करती रही। “

राजा को याद आया उसका फ़ोन बंद हो चुका था..-” ओह्ह मेरा तो फ़ोन ही बंद पड़ा था।”
” जी हाँ! अब आप मुझे अपना फ़ोन असिस्टेंट ही बना लीजिए। आपके कॉल्स देखा और संभाला करूँगी। “
” अभी तो बस मुझे संभाल लीजिये हुकुम। उतना ही काफी है।”
  राजा ने सो चुके शौर्य को बिस्तर पर रखा और बाँसुरी को बाहों में भर लिया। दोनों खिड़की पर खड़े बाहर निकलते चांद को देख रहे थे। बाँसुरी की कुछ उलझी सी लटें उसके माथे पर इधर उधर हवा से उड़ कर उसे परेशान कर रहीं थीं। राजा ने उन्हें उंगली से उसके कान के पीछे समेट दिया… उसकी उंगलियां बाँसुरी की गर्दन पर फिसलने लगी कि उनका नन्हा राजकुमार नींद में कोई सपना देख डर के मारे चिल्ला कर रोने लगा, और बाँसुरी राजा को एक तरफ कर बच्चे के पास भाग गई…
” आजकल हमारी हुकुम के पास हमारे लिए वक्त नही है।”
“हाँ जैसे आपके पास ढेर सारा वक्त है।”
” नन्हे नवाब नही चाहते कि प्रोपर्टी में उनका कोई हिस्सेदार आ जाये। बस जैसे ही पापा मम्मी पास आये की बुक्का फाड़ दहाड़ लगातें हैं।”
  राजा की बात सुन बाँसुरी ने मुस्कुरा कर शौर्य को गोद में लिया और वापस उसे सुलाने की कोशिश में लग गयी…-“साहब सो मत जाना। मैं बस इसे सुला कर अभी आयीं।”
   बाँसुरी ने इधर उधर टहलते हुए आखिर बच्चे को सुला ही लिया।
   वो उसे बिस्तर पर रखने आई की देखा राजा गहरी नींद में डूबा किसी मासूम बच्चे सा नज़र आ रहा था। उसका माथा चूम कर वो कमरे की बत्तियां बुझाने चली गयी।

****

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          अगली सुबह राजा का पूरा दिन व्यस्त गुजरना था।
   शपथ ग्रहण होना था। इसी से वो तैयार होकर सुबह ज़रा जल्दी ही निकल रहा था। उसके साथ उसके मंडल के बाकी सदस्य और समर प्रेम भी थे। युवराज और आदित्य भी उनके साथ हो लिए थे।
   विराज के पास भी और कोई चारा नही बचा था।  रूपा ने ही राजा को टीका लगाया,बाँसुरी उसके पास खड़ी मुस्कुरा रही थी।
  रेखा भी वहीं थी…-“तुमसे एक बात पूँछे बाँसुरी?”
” हाँ पूछो रेखा।”
” राजा साहब को तुमने बताया क्यों नही कि आज तुम्हे शौर्य को वैक्सीन लगवानी है? क्या अकेले ही वैक्सीन लगवाने जाओगी। “
“वैसे जाना क्यों पड़ेगा भला ? तुम्हारे बुलाने पर डॉक्टर यहीं आ जाएंगे। “रूपा ने रेखा की बात पर बाँसुरी की तरफ देख कर कहा। अब तक राजा और उसकी सेना वहाँ से निकल चुकी थी।
  ” जी भाभी साहब ! पिया से बात कर लुंगी, वो भेज देगी किसी को। और जहाँ तक साहब को रोकने की बात है रेखा, वो मैंने जानबूझ कर नही किया।
  हम औरतों से यहीं तो गलती हो जाती है। जब हमारे पति हमसे और हमारे बच्चे से अधिक समय अपने काम को देने लगतें हैं तब हम उनकी मजबूरी समझे बिना ज़बरदस्ती उन पर अपने काम लादते चले जाते हैं! बस फ़िज़ूल की अपनी महत्ता दिखाने! और ऐसे में होता कुछ नही बस सामने वाले का तनाव बढ़ता है । हम हमेशा अपने आप को महत्वपूर्ण दिखाने के लिए पतिदेव के कामों को समझे बिना उन पर अपना बोझ भी ला देते हैं और मुझे यह हम औरतों की बेवकूफी लगती है।
   मुझे तो शुरु से पता था कि आज शपथ ग्रहण है । इसलिए साहब के पास वक्त नहीं होगा इत्तेफाक से आज ही शौर्य की वैक्सीनेशन की डेट भी है। अब अगर मैं इस वक्त साहब से यह उम्मीद करूं कि पहले वह मेरे साथ बच्चे को वैक्सीनेट करवाएं और उसके बाद सदन में जाएं तो यह तो गलत उम्मीद है ना।
मैं यह भी जानती हूं कि अगर मैं साहब को बता देती तो उनका मन शपथ ग्रहण में नहीं लगता। और बार-बार उनका मन उनके लाडले की तरफ लगा रहता।  ऐसे में परेशान होकर वह मुझे फोन करते और अपना खुद का वक्त भी बर्बाद करते , इसीलिए मैंने उनसे कुछ कहा ही नहीं। और फिर मेरे साथ रूपा भाभी साहब है, तुम हो, फिर मुझे किस बात की चिंता?”

” तुम्हारी बातें सुनकर हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है बांसुरी! हमने पति पत्नी के रिश्ते को कभी इस नजरिए से देखा ही नहीं। हमने हमेशा यही सोचा कि हमारा सबसे पहला हक है विराज सा पर और बाकियों का हमारे बाद। लेकिन तुमने अपने राजा साहब पर सारी दुनिया को हक जताने दिया, और खुद हर वक्त उनके किनारे खड़ी रही, उनका सहारा बनकर। और इसीलिए तो आज इतनी सारी जिम्मेदारियां होने के बाद भी राजा साहब सब कुछ मुस्कुराते हुए निभा ले जाते हैं।
      तुम दोनों सच्चे अर्थों में “जीवन साथी” हो ! ऐसे साथी जिनके जुड़ने से एक दूसरे का जीवन संवर गया।”

” धन्यवाद रेखा।  ऐसा तुम्हें लगता है कि हम दोनों बहुत परफेक्ट है। पर ऐसा नहीं है । हम दोनों में भी कमियां हैं , और थोड़ी  नहीं बहुत सारी हैं। लेकिन हमने एक दूसरे को एक दूसरे की कमियों के साथ स्वीकार किया है। और मजे की बात यह है कि हम एक दूसरे की कमियों को सुधारने की कोई कोशिश नहीं करते। क्योंकि जब हम सामने वाले की कमियों को सुधारने की कोशिश करने लगते हैं, तो हम उसे बदलने की कोशिश करने लगते हैं। और यहीं पर जाकर बातें बिगड़ जाती हैं । जो जैसा है अगर हम उसे वैसे ही स्वीकार लें, और पूरे मन से स्वीकार लें तो हमारी जिंदगी आसान हो जाती है।
    और दूसरी बात एक दूसरे की कमियां सुधारने की जगह अगर हम अपनी कमियों पर काम करना शुरू कर दें तो जिंदगी और आसान हो जाती है।  मैं तुमसे बहुत दिनों से एक बात कहना चाह रही थी पता नहीं तुम मेरी बात समझ पाओगी या नहीं।”

“कहो ना बाँसुरी! बेझिझक कहो क्योंकि अब हम देवरानी जेठानी से ज्यादा सहेलियां बन गई हैं।”

” बस उसी सहेली वाले रिश्ते के लिए तुमसे कह रही हूं कि केसर ने तुम्हारे लिए जो सोच रखा है उसे पूरा करने के लिए कोशिश तो करके देखो।

“पर हमने आज तक कोई काम नहीं किया बांसुरी हमें किसी भी चीज का कोई अनुभव नहीं है।”

“अनुभव लेकर कोई भी पैदा नहीं होता रेखा। अनुभव काम करने से आता है , तुम्हें क्या लगता है मुझे कलेक्ट्री का बहुत अनुभव था। कुछ भी नहीं था। मैंने बहुत सारी गलतियां की हैं लेकिन अपने काम में  डटी रही। “

“अरे हां तुम्हारी छुट्टियां कब तक है?”

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“पूरे 6 महीने की छुट्टियां मिली है मुझे! और इन छुट्टियों में यह छोटा सा नन्हा सा राजा साहब भी संभलने लायक तो हो ही जाएगा। उसके बाद देखूंगी अगर यह छोड़कर जाने लायक हुआ तब तो ऑफिस ज्वाइन करूंगी वरना एक दो महीने की और छुट्टियां बढ़ा लूंगी। अब कल से तुम भी एनजीओ का काम देखना शुरू करो। “

  रेखा को खुद के ऊपर इतना भरोसा तो नहीं था लेकिन बांसुरी की बात सुनकर उसे लगा कि उसे वाकई अपने और अपनी केसर दीदी के लिए कुछ करना ही होगा।


*******

दिन बीतते देर नहीं लगती और खासकर जब कोई किसी काम में व्यस्त हो तब तो समय का पता भी नहीं चलता ।
   आदित्य ने केसर की बॉडी के बारे में रेखा से कोई अधिक चर्चा नहीं की थी क्योंकि वह नहीं चाहता था कि वो रेखा को किसी भी तरह की उम्मीद दे । क्योंकि अगर यह वाकई केसर की बॉडी होगी और वह रेखा से यह कह जाएगा कि यह केसर नहीं है तो रेखा फिर से एक उम्मीद में जी उठेगी और कहीं उसकी उम्मीद पूरी नहीं हुई तो वह वापस टूट पड़ेगी इसलिए आदित्य ने इस बारे में रेखा से कुछ भी नहीं कहा।
   
     विराज अपने कामों में व्यस्त था और अब रेखा ने उससे किसी भी तरह की कोई भी उम्मीद रखनी छोड़ दी थी। रेखा का बेटा अब स्कूल जाने लगा था और इसलिए रेखा के पास भी वक्त था और इसलिए उसने केसर के दिए सारे कागजों को सरसरी तौर पर देखना शुरू किया।
      रेखा अक्सर केसर की यादों में डूब जाया करती थी। उसे हमेशा लगता कि केसर दुनिया के लिए बेशक गलत थी लेकिन अपने खुद के परिवार के लिए उसने कितना कुछ किया था। आज तक देखा जाए तो रेखा ने अपने पिता के लिए कुछ भी नहीं किया था। क्योंकि केसर ने उसे करने का कुछ मौका ही नहीं दिया। और अब जब रेखा के पास मौका था कि वह केसर और अपने पिता के लिए कुछ कर सकती थी तब भी केसर उसके लिए ही इतना कुछ छोड़ कर चली गई ।
        ऐसे ही एक शाम जब रेखा केसर को बहुत याद कर रही थी, तब अपने पिता से मिलने चली गई उसके पिता भी रेखा को देखकर खुश हो गए और उन्होंने केसर के सारे बिजनेस के पेपर और एनजीओ के कागज भी रेखा के हवाले कर दिए…;” अब हमसे यह सब संभाला नहीं जाता बेटा, अगर हो सके तो तुम अपना यह बिजनेस ही संभाल लो। हम जानते हैं तुम महलों की रानी हो। तुम्हें काम करने की कोई जरूरत नहीं है लेकिन फिर भी घर का बिजनेस है हमसे अब सम्भल नहीं पा रहा।  केसर ने बड़े प्यार से संवारा था इस सारे काम को तो अगर तुम चाहो…

रेखा ने अपने पिता की बात आधे में ही काट दी… “जी पिता साहेब आप चाहते हैं तो हम यह काम कल से ही संभाल लेंगे। बस एक बार घर पर सभी से पूछ लें।”

   रेखा ने वापस लौट कर बांसुरी से इस बारे में बात की। बांसुरी और रूपा यह सुनकर बहुत खुश हुए। वहाँ तो सभी ये चाहते थे कि रेखा अपने खोल से बाहर निकले।
    उसी शाम खाने की मेज पर रेखा ने अपने काम को शुरू करने की बात वहां मौजूद सभी लोगों के सामने रखी और युवराज से आग्रह किया कि वह उसे अपना काम करने की अनुमति दें। युवराज इस बात पर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने रेखा  के सिर पर हाथ रख दिया…-” आप हमारी छोटी बहन जैसी है रेखा! आपको कहीं किसी मोड़ पर भी हमारी जरूरत पड़े तो आप बेझिझक कहिएगा ! हम जानते हैं कि केसर ने बहुत मजबूती से अपना बिजनेस खड़ा किया है, आप उस बिजनेस को बहुत आगे ले जाएंगी। हमारा आशीर्वाद आपके साथ है।
   एक तरह से अब उस परिवार में युवराज ही सबसे बड़ा था और उस से अनुमति लेने के बाद ही वहां के सारे कार्य संपन्न होते थे। रानी मां की मौत के बाद महाराजा साहब अब खाने की टेबल पर नहीं आया करते थे। उनका खाना हर वक्त उनके कमरे में पहुंचा दिया जाता था। दादी साहब भी बहुत बुज़ुर्ग हो गई थी। इसलिए उनका भी कमरे से बाहर आना जाना कम ही हुआ करता था। खाने की टेबल पर बाकी सभी लोगों के साथ अब महाराजा साहब की कुर्सी खाली जरूर होती थी लेकिन उनकी बाजू वाली कुर्सी पर युवराज ही बैठा करता था।
   राजा अजातशत्रु अब मुख्यमंत्री बन चुके थे और इसलिए उनकी व्यस्तताएं अलग तरीके से बढ़ गई थी। कई बार कार्य की अधिकता के कारण उन्हें अपने मुख्यमंत्री आवास पर ही रुकना पड़ता था। तब ऐसे में वह अपने ड्राइवर को भेजकर बांसुरी और अपने छोटे नवाब को भी अपने पास बुला लिया करते थे। और दो-चार दिन के काम को निपटाने के बाद उनका परिवार वापस महल आ जाया करता था।
    बहुत बार जब वह दूसरे प्रदेशों के दौरे पर होते थे तब बांसुरी महल में ही रहा करती थी।
  ऐसा ही कोई जरूरी काम था जिसके सिलसिले में राजा अजातशत्रु को दिल्ली के दौरे पर जाना पड़ा था। उन्होंने विराज से भी साथ चलने की गुजारिश की थी लेकिन विराज उनके साथ नहीं गया था। महल में होने के बावजूद वह रात्रि के सह भोज में कभी भी समय पर नहीं पहुंचा करता था जब उसका मन किया करता वह सब के साथ खाने चला आता और कभी अपने कमरे में ही अपना खाना मंगवा लिया करता था।
   आज भी जब रेखा ने सबके सामने अपना काम शुरू करने की बात रखी विराज अपने कमरे में बैठा शराब में डूबा पड़ा था। सब का आशीर्वाद और सहमति देखा प्रसन्नता से विभोर होती वह अपने कमरे में चली गई थी।
 
            विराज को एक तरफ सोफे पर बेसुध पड़ा देख उसका मन वितृष्णा से भर गया।
क्यों उसका मन अपने ही पति के लिए स्नेह से नहीं भर उठता है। उसकी समझ से परे था। ऐसा तो नहीं था कि उन दोनों के बीच हमेशा सिर्फ तकरार और लड़ाई झगड़े ही हुआ करते थे। कुछ प्यार भरे लम्हे भी तो बीते थे उनके बीच, और आज भी बीतते थे।  जब कभी विराज नशे में नहीं होता था तब वह रेखा से बहुत प्यार से पेश आता था।
   तब उसे रेखा बहुत सुंदर भी नजर आती थी। रेखा कि हर बात भी अच्छी लगती थी। लेकिन अक्सर उनके साथ होता था कि जब वह शांत बैठे बातचीत करने लगते थे तो जाने कैसे बातें ऐसा मोड़ ले लेती थी कि दस मिनट में ही उनकी बातों में टकराव आ जाता था कभी रेखा भड़क उठती थी तो कभी विराज।
   शायद इसी को कहते हैं मन का मेल ना हो पाना। तन तन से जुड़ चुके थे। दोनों की अपनी ज़रूरतें थी और उन्हें पूरा भी कर लिया जाता लेकिन मन का मेल कभी नहीं हो पाया था और शायद इस जीवन में अब कभी होना भी नहीं था।
    रेखा की सहायिका उसके बेटे को सुला कर जा चुकी थी। विराज की बोतल एक तरफ लुढ़की पड़ी थी। उसकी आधी खाई प्लेट भी एक ओर पड़ी थी। रेखा ने सहायिका से कह वो सब साफ करवा दिया। विराज सोफे पर ही सो चुका था।
   रेखा भी कपड़े बदल कर सोने चली गयी। अगले दिन से उसका काम शुरू होना था।

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*****

  
     बड़े दिनों के बाद समर को फुरसत मिली थी उसने पिया को कॉल लगा लिया…-“क्या बात है? आज मंत्री जी ने खुद फ़ोन किया है? कुछ तो गड़बड़ है।”
” क्या यार शर्मिंदा मत करो। मैं तो हमेशा कॉल करना चाहता हूँ,मिलना चाहता हूँ पर जानती तो हो वक्त की कितनी कमी है।”
“जानती हूँ तभी तो मैं भी सुबह शाम फोन कर कर के परेशान नही करती। वरना मन तो मेरा भी करता है कि मैं अपने क्यूट बेबी से रोज़ पूंछू ” मेरे शोना बाबू ने खाना खाया!”
” ओह्ह रियली ! तुम्हें ऐसा बोलना अच्छा लगता है?”
” ऑफकोर्स ! गलत क्या है इसमें। इट्स क्यूट यार। अब आजकल सोशल मीडिया पे बाबू शोना का मज़ाक उड़ाने का ट्रेंड चल रहा है, जिसे देखो वही “बाबू शोना ” जोक्स बना रहा मीम्स बना रहा, इसका मतलब ये थोड़े न हो गया कि मुझे अच्छा नही लगता। और एक मज़े की बात ये जो लोग आज ऐसी बातों का मज़ाक बनाने वाले ही कभी खुद ऐसी बातें करते रहें होंगे। खैर वो छोड़िए मंत्री जी आप बताइए कैसे फ़ोन किया ?”
” मिलना था तुमसे।”


” अरे वाह! तो आ जाइये फिर !”
” अभी तो हॉस्पिटल में होंगी ना?”
” हॉं ! बस दस मिनट में वापस निकलूंगी। किसी कॉफी शॉप में मिल लें।”
” न न ! अकेले मिलना है। तुम्हारे रूम पर आ जाऊँ?”
” बड़े शरारती हो रहें हैं आप। क्या बात है?”
” बस वही, जो तुम समझ रही हो।”
” आज कॉफी शॉप पे मिल लेतें हैं। बहुत दिन से साथ में कोल्ड कॉफी नही पी।”
“मतलब तुम नही चाहती कि मैं तुम्हारे रूम पर आऊं?”
“अरे नही बाबा! ऐसा कुछ नही है, चलिए ठीक है रूम पर ही आ जाइये। कब तक आएंगे।
” दस मिनट में पहुंचता हूँ। आज ज़रा फ्री हूं तो सोचा तुम से ज़रा अच्छे से मिल लिया जाए।
” दस मिनट बस ! नही रुकिए , आप बीस मिनट में आइये। तब तक मैं भी पहुंच जाऊंगी। “
” अरे मैं तुम्हें लेता हुआ चलता हूँ ना। क्या प्रॉब्लम है? “ओके!”
   पिया ने तुरंत फ़ोन रखने के बाद अपनी काम वाली दीदी को फ़ोन लगाया। वो चार दिन से नदारद थी। पिया के अस्पताल की सीनियर डॉक्टर छुट्टी पर गयी थीं, इसी से अस्पताल में भी भारी मगजमारी हो रही थी। और घर की साफ सफाई नही हो पा रही थी।
छोटा सा फ्लैट था। चार दिन से वो खुद बर्तन ज्यादा न निकलें इसलिए कभी मैगी तो कभी सैंडविच पर गुज़ारा कर रही थी। और चारो दिन के बर्तन सिंक पर पड़े अपनी किस्मत को रो रहे थे।
   घर के कामों से उसे वैसे भी मौत आती थी। उसकी मेड ही सुबह उसका बिस्तर ठीक करने से लेकर साफसफाई बर्तन खाना बनाना सब किया करती थीं।
  पिया को घबराहट सी होने लगी। समर ऐसे उसके साथ गया तो उसका कबाड़ घर देख कर क्या सोचेगा? उसे लगेगा छि कितनी गंदी है। जब घर सही नही रख सकती तो शादी क्या निभाएगी।
   मेड को दो बार पूरी रिंग देने पर भी उस नामुराद ने फ़ोन नही उठाया।
  गिरती पड़ती पिया अपना एप्रन उठाये वहाँ से घर के लिए भागी…
   उसका फ्लैट दो गलियों के बाद ही था, वैसे वो कई बार पैदल ही आ जाया करती थी पर अधिकतर स्कूटी से ही आती थी। आज स्कूटी भी उसकी सामने रहने वाली आँटी का बेटा मांग कर ले गया था।
    जान हथेली पर लेकर वो मरती पड़ती अपने फ्लैट की तरफ भागी। जाते जाते ही उसने समर को मैसेज कर दिया कि एक केस आ गया है, आधा घंटा लगेगा।
   भाग कर वो घर पहुंची, दरवाज़ा खोलते ही उसका सिर घूम गया।
   दो दिन के धुले कपड़े सामने काउच पर अंबार लगाए पड़े थे। सामने टेबल पर एक तरफ किताबें, न्यूजपेपर्स,  चिप्स के पैकेट्स, कुछ अधखुली बिस्किट्स के रैपर, कोल्ड ड्रिंक्स के कैन पड़े हुए थे।

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    उसे भी तो अजीबोग़रीब शौक थे। सुबह उठ कर उसे रनिंग भी करनी होती थी लेकिन रातों को उल्लू के समान जाग कर टीवी पर आंखें भी फोड़नी होती थी। और मूवीज़ के साथ उसके मुहँ कान चलते ही रहते थे।  फटाफट खुद पर बड़बड़ाती पिया इधर उधर फैला कबाड़ समेटने में लग गयी कि उसका फ़ोन बजने लगा….-” मैनूं डर जेहा लगदा ए, दिल टूट न जाये वेचारा।” उसने तुरंत कॉल लिया और स्पीकर में डाल दिया।
  ” क्या कर रही थी मेरी बच्ची?”
” मम्मी घर साफ कर रही थी यार, प्लीज़ अभी फ़ोन रखो बिज़ी हूँ।”
” हैं ? तू घर साफ कर रही थी? झूठ मत बोल!”
” सच्ची कह रही हूँ मम्मी।”
” सुन सुन फ़ोन न रखियो ,मैं वीडियो कॉल ट्रांसफर कर रही हूँ। एक बार न तुझे घर साफ करते देखने की बड़ी तमन्ना है।”
” हद करते हो यार मम्मी आप? दुनिया की कौन सी माँ होगी जो अपनी बच्ची को काम करते देख खुश होती है?”
” बेटा जी। ये हम माओं से पूछो, हर माँ के कलेजे में ठंडक पड़ जाती है जब उसकी बेटी अपने हाथ से पानी लेकर पीती है। सच्ची स्वर्ग का सुख मिल जाता है।”
” ओह्ह मेरी फेकता भरपूर माँ! अपने डायलॉग अपने पास संभाले रखो और मुझे काम करने दो।”
” पर ये तो बता आज सूरज पश्चिम से निकला क्या जो तू साफ सफाई में लगी है।अच्छा अब समझी पक्का समर आने वाला होगा मिलने।”
   पिया अपनी जीभ काट कर रह गयी। ये मम्मी हर बात समझ कैसे जाती है।
” अच्छा सुन तू अपना काम निपटा ले , और सिर्फ हॉल की सफाई करके छोड़ न दियो, अपना कमरा रसोई और बाथ रूम भी साफ कर लेना।”
अब यार ये मम्मी ने अलग ही पेंच डाल दिया। अब बाथरूम साफ करने की क्या ज़रूरत?
   इतनी सारी सफाई के बाद उसे खुद भी तैयार होना था और वापस अस्पताल भागना था, जिससे समर के साथ फ्लैट पर वापस आये तो समर भी उसका चमकीला घर देख कर खुश हो जाये, लेकिन अभी तो हॉल भी साफ नही हो पाया था। वो धड़ाधड़ हाथ चला रही थी कि दरवाज़े पर बेल बज गयी और उसका दिल धक से रह गया।
    ” नहीईईई ….  उसे सरप्राइज देने के लिए कहीं मंत्री जी अस्पताल में पता करके उसे ढूंढते यहाँ तो नही चले आये।
   हे भगवान! ऐसे फ़िज़ूल स्यापे उसी की किस्मत में क्यों लिखें हैं।।।
    अब इतना तबाहो बर्बाद घर देख कर समर के दिल का रोमांस हवा न हो जाये।
  वो सोच ही रही थी कि वापस कॉल बेल बज गयी….

क्रमशः

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aparna

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दिल से ……

       कैसे है आप सब दोस्तों!!
  
   कल हमारे  समाज की अंताक्षरी प्रतियोगिता में भाग लेने का मौका मिला। और क्या कहूँ इतना मज़ा आया।
    गानों के साथ वैसे भी मेरा कनेक्शन बड़ा पक्का है। बॉलीवुड तो लगता है मेरे खून में घुला है।
    हमारी पांच लोगों की टीम थी, खूब धमाल हुआ खूब मस्ती की। कुल जमा 17 टीम्स थी। एक से एक धुरंधर पुराने गानों के सुर सम्राट टाइप।
  लेकिन  हम दूसरी पोजीशन के साथ जीत गए। इक्कीस सौ रुपये हमने जीते। और सासु माँ ने सभी के सामने बड़े लाड़ से प्यार भरा आशीर्वाद दिया। मौसी सास और मामी सासों ने आकर गले से ही लगा लिया।
    ज़माना बदल गया है भाई, अब बहु को रोटी बनानी न भी आये तो सासु जी बड़े प्यार से सम्भाल लेती हैं। अरे बेचारी को किताबों से फुर्सत मिलती तब तो रोटी बेलना सीखती।
   न ऐसा नही है कि कुछ नही आता।
   लेकिन जिन चीजों पर मास्टरी है वो किसी काम की नही हैं।

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    मेरे साथ अक्सर होता है कि जब तक मैं रसोई पर खड़ी उबलते दूध पर नज़र रखी होतीं हूँ, सीधे सादे बच्चे सा चुपचाप पड़ा रहता है। और जैसे ही फोन की बीप सुन बाहर निकलती हूँ, कमबख्त सुनामी से टक्कर लेता उफान मार मार के गिर पड़ता है।
    क्या आपके साथ भी होता है?

  चलिये जल्दी ही मिलतें है कहानी के अगले भाग के साथ तब तक पढ़ते रहिये ….
 
   मैंने किसी ज़माने में एक फ़िज़ूल सी हॉरर भी लिखी थी ” थैंक यू” अगर आप लोग चाहे तो वो भी पलट सकतें हैं। ( उनके लिए जो मुझसे हॉरर लिखने की गुज़ारिश करतें हैं)

   आपके ढेर सारे प्यार, समीक्षा स्टिकर्स के लिए दिल से आभार , शुक्रिया नवाज़िश

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aparna ….


    

समिधा -31

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     समिधा – 31

      भगिनी आश्रम एक तीन मंजिला आश्रम था, जिसमें बहुत बड़े बड़े हॉल एक ऊपर एक बने हुए थे। इनमें सबसे ऊपरी मंजिल पर कुछ कमरे और खुली छत थी। ये कमरे भगिनी आश्रम के सामान रखने के लिए उपयोग में लाइ जाती थीं। इन्हीं में एक कमरा चारु दीदी को मिला था,जिसमें वो जब कभी आकर आश्रम की लिखा पढ़ी भी जांच लिया करती थीं।
    एक कमरे में आश्रम की महिलाओं के उपयोग के लिए दानदाताओं द्वारा मिली सामग्री रखी थी तो दूसरे कमरे में पहले कभी सन्यासिनों द्वारा बुने कपडे चटाइयां आदि पड़े थे।
    एक दो कमरे खाली पड़े थे लेकिन बाहर से उन पर ताला पड़ा था। उसकी निचली मंज़िल पर बड़े से हॉल में पारो को साथ लिए सरिता खड़ी थी और उसे सबसे पीछे की तरफ खाली पड़े एक पलंग को दिखा कर इशारा कर दिया, कि वही पलंग उसका है।
    लंबे चौड़े से हॉल में आमने सामने दोनो तरफ दीवार से लग कर पलंग बिछे थे, और हर एक पलंग के पीछे खिड़की खुलती थी। पलंग के बाजू से एक छोटी अलमीरा बनी थी जिसमें साध्वियां अपना सामना, पानी का बर्तन चंदन माला आदि रखा करती थीं।
     उस पूरे हॉल में लगभग बाइस पलंग बिछे थे। हर पलंग के पीछे खिड़की होने से कमरा बहुत ही ज्यादा खुला और हवादार लग रहा था। हॉल के एक तरफ सामने बड़ा सा दरवाजा था जिस के ठीक सामने ही नीचे जाने और ऊपर जाने की सीढ़ियां बनी हुई थी। हॉल के दूसरी तरफ जो दरवाजा खुलता था उसके पीछे  गुसल खाने बने हुए थे।
     ” सुबह उठने के बाद हमें अपनी अपनी जगह की सफाई करने के साथ ही नीचे के हॉल की सफाई करनी होगी। सबसे नीचे खाने का कमरा बना हुआ है। वहां झाड़ू पोछा करने के बाद हमें बाथरूम आदि धोना होता है। और उसके बाद नहा कर हम भजन के लिए मंदिर पहुंच जाते हैं।
      वहां का पूजा पाठ भजन आरती होने के बाद हमें पीछे बनी रसोई की तरफ जाना होता है ।वहां पर दोपहर के खाने की तैयारी करनी होती है। दोपहर का खाना बनने के बाद जब गुरु आचार्य और सभी संतो के लिए भोजन चला जाता है, तब हम सभी बहने अपने हिस्से का भोजन लेकर अपने आश्रम में आ जाती हैं।  वहां सबसे नीचे जो हॉल बना हुआ है वही बैठकर हम सब एक साथ भोजन करते हैं।
    उसके बाद चाहो तो दोपहर में अपने कक्ष में आकर आराम कर सकती हो । शाम को होने वाली संध्या आरती के पहले एक बार फिर हमें फूल तोड़कर उन्हें धोकर मंदिर में पहुंचाना होता है।”

” फूलों की माला नहीं बनानी होती?”

” नहीं फूलों की माला हम नहीं बनाते! फूलों की माला वहीं रहने वाले आचार्य या गुरुवर ही बनाते हैं। क्योंकि फूलों की माला तो सीधे गोपाल जी को चढ़ाई जाती है ना हमारी बनाई माला कैसे चढ़ेगी वहां?”

जाने क्यों पारो का चेहरा कसैला सा हो गया वह चुपचाप सरिता के दिखाए पलंग की तरफ आगे बढ़ गई उसके हाथ में एक ही बैग था। उसने उस बैग को नीचे रखा और उसमें से सामान निकाल कर उस छोटी सी अलमारी में जमाने लग गई।

   ******

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      पारो को आश्रम में आए 2 दिन ही हुए थे कि एक दोपहर जब रसोई में मदद कर रही थी कि तभी ऑफिस से एक लड़का उसे ढूंढता हुआ वहां चला आया….-” पारोमिता दीदी कौन है? “

  वहां काम करती सभी औरतों की आंखें उसकी तरफ उठ गई। आश्रम में मौजूद औरतों के लिए यह बहुत बड़ी बात होती थी, कि बाहर से उनसे कोई मिलने आया है। क्योंकि उनमें से अधिकतर के परिजनों ने तो उन्हें यहां छोड़ने के बाद शायद यह मान लिया था कि वह सब अब उनके लिए हमेशा हमेशा के लिए मर चुकीं हैं। एक बार यहां छोड़कर जाने के बाद ना कोई परिजन मिलने आते थे और ना ही इनमें से कभी किसी को घर बुलाया जाता था।
     उसकी बात सुन पारोमिता धीरे से खड़ी हो गई…-” जी मैं हूँ पारोमिता!”
” दीदी आपको उधर ऑफिस में बुलाया जा रहा है।”
    पारो ने एक नज़र सरिता पर डाली और उन सभी की प्रवर सुलोचना दीदी से आंखों ही आंखों में बाहर जाने की आज्ञा ले बाहर निकल गयी। सरिता ने भी दीदी की तरफ एक बारगी देखा, उन्होंने आंखों से ही उसे भी साथ जाने की इजाज़त दे दी।
   वो खुशी से पारो के साथ हो ली।

   उदयाचार्य जी के साथ ऑफिस में सिर झुकाए दर्शन बैठा था। पारो के वहाँ पहुंचते ही वो झट से खड़ा हो गया…
“कैसी हो बऊ दी!”
   दर्शन को देख पारो की आंखें भर आई उससे एकाएक कुछ कहते नहीं बना उसने अपना सिर झुका लिया। और “हां” में सर हिला दिया।  उसे देखकर दर्शन की भी आंखे भर रही थी लेकिन उसने खुद को संभाल लिया। उसने मुड़कर एक बार सामने बैठे उदयाचार्य जी की तरफ देखा उन्होंने शायद दर्शन का इशारा समझ लिया…-” हां हां आप बिल्कुल आश्रम घूम सकते हैं। सरिता इन्हें और पारो बहन को ले जाओ बाहर हमारी वाटिका और आश्रम घुमा दो।”

    दर्शन ने अपने हाथ में थाम रखी बैग को कस कर पकड़ा और धीमे से बाहर निकल गया । उसके पीछे पारो भी बाहर चली गई । सरिता ने मुड़कर एक बार उदयाचार्य जी को प्रणाम किया और वहां से बाहर निकल गई। उदयाचार्य अजीब सा मुहँ बनाकर वापस अपने रजिस्टर में गड़ गए। उन्हें हमेशा यही लगता कि आश्रम की सबसे मोटी जिम्मेदारियां उन्हीं के कंधों पर हैं और इसीलिए जब भी बाहर से कोई मिलने आता तो उनका सिर दर्द और बढ़ जाता ,क्योंकि आने वाले की पूरी जीवन कुंडली उन्हें एक अलग रजिस्टर में लिखनी पड़ती। कि वह किस से मिलने आया है? जिससे मिलने आया है उनसे वह कैसे परिचित है ?किस समय आया? किस शहर से आया ?कितनी देर यहां रहा? उसने आश्रम में क्या-क्या देखा? आश्रम के किन-किन कमरों में वह गया? और कब वापस लौटा? उसके साथ कोई सामान तो नहीं था? आदि इत्यादि।
    इतनी सारी लिखा पढ़ी का काम करने में अक्सर आचार्य झल्लाते रहते थे।

    उस ऑफिस से निकल कर वह लोग एक तरफ बने रास्ते से चलते हुए आश्रम की वाटिका में पहुंच गए। वहाँ ढेर सारे पेड़ों के बीच कुछ बड़े-बड़े पेड़ भी लगे हुए थे उन बड़े पेड़ों के चारों तरफ गोलाकार चबूतरे बने हुए थे जो साफ-सुथरे उजले थे । वही चबूतरे पर जाकर दर्शन बैठ गया, पारो उसके पास ही खड़ी रही।  सरिता ने दर्शन की तरफ देखा…-” आप आश्रम नहीं देखना चाहते? “
    सरिता भी पारो से कुछ दो-तीन साल ही बड़ी थी और उसकी भी किस्मत काफी कुछ पारो से मिलती जुलती थी। दर्शन ने उसे देखकर “ना” में सर हिला दिया और पारो की तरफ देखने लगा पारो उसके पास ही सर झुकाए खड़ी थी।

“बैठो ना बाउदी। “

  पारो वही चबूतरे पर दर्शन से जरा हट कर बैठ गई।

“क्या हुआ अचानक तुम यहां क्यों चली आई? मैं बस 1 दिन के लिए ही तो दूसरे गांव गया था,बाबा के साथ! और वापसी पर पता चला कि तुम्हारी मां आई थी और उसके बाद तुमने यहां आश्रम आने की जिद पकड़ ली। आखिर ऐसा क्या हुआ बाउदी जो तुम घर छोड़ कर हम सब को छोड़ कर यहां चली आई?

पारो समझ गई थी कि उसके आने का असली कारण किसी ने भी दर्शन को और उसके बाबा को नहीं बताया होगा। सब ने इस बार भी उसके आश्रम आने की जिम्मेदार उसी को ठहरा दिया होगा। वह अपनी किस्मत पर मुस्कुरा कर रह गई।

“बस ऐसे ही दर्शन अब वहां मन नहीं लग रहा था!”

“तो क्या यहां लग रहा है? यहां कैसे रह पाओगी बऊ दी? यहां इतने परायों के बीच जहाँ ना अपनी जमीन है ना अपनी मिट्टी ना ही अपनी बोली ना अपना खान-पान । इन सबके बीच रहना मुश्किल नहीं लग रहा तुम्हें। “

अपनों की आंखों में अपने लिए पारो इतना सारा पराया पन देख चुकी थी कि अब उसके मन ने अपना और पराया सोचना ही छोड़ दिया था।

“ऐसा क्यों सोचते हो दर्शन कि यहां मिट्टी अपनी नहीं है! लोग अपने नहीं हैं ! यह सब हमारी सोच पर ही तो निर्भर करता है, बल्कि यहां तो भगिनी आश्रम में सब मेरे जैसी ही किस्मत की मारी हैं। और हम एक दूसरे के साथ सब अपना दुख भुला लेते हैं, बांट लेते हैं। कुछ अपने आंसू बहा लेते हैं तो कुछ सामने वाले के आंसू पोंछ लेते हैं। मुझे तो यहां अच्छा लग रहा है दर्शन।”

“तुम्हारे चेहरे से तो नहीं दिख रहा कि तुम्हें अच्छा लग रहा है। बउ दी एक बात बोलूं मेरे साथ वापस चलो कम से कम तुम्हें देखकर लगता है, कि  मेरे देव दादा…”

इसके आगे दर्शन कुछ नहीं बोल पाया लेकिन पारो समझ गई कि वह क्या कहना चाहता है।

“नहीं दर्शन अब वापस नहीं जाऊंगी। अब मेरे हिस्से जितनी भी सांसे बची हैं ,वह मुझे यही इसी आश्रम में लेनी है । अब यहां से कहीं नहीं जाऊंगी। एक बात बताओ क्या तुम अकेले आए हो?”

“हां बउ दी , और मेरे साथ कौन आता अकेला ही आया हूं।

पारो के चेहरे पर एक मुस्कान खेल गई।  वह समझ गई कि दर्शन घर पर बिना किसी से कुछ बोले आया है।

“घर पर बिना बताए मुझसे मिलने चले आए हो फिर किसके सहारे मुझे वापस लेकर जाना चाहते हो दर्शन?”

दर्शन पारो की बात पर इधर-उधर देखने लगा। सच ही तो कह रही थी पारो अब इतने दिन में वह भी घर वालों को अच्छे से जानने लग गई थी। जब यहां आने से पहले उसके घर पर बात करने की हिम्मत नहीं हुई तो आखिर किस आधार पर वो पारो को वापस लेकर जाना चाहता है।
   हालांकि वह यही सोच कर आया था कि किसी भी तरीके से पारो को घर वापसी के लिए मना लेगा लेकिन उसके मन में एक शंका यह भी था कि पता नहीं पारो उसके साथ वापस जाना चाहेगी या नहीं और इस लिए….

“मेरे बारे में सोच सोच कर दुखी मत हो दर्शन। मैं यहां बड़े सुख से हूं।”

“हां वह तो देख पा रहा हूं। पहले ही इतनी दुबली थी अब तो ऐसा लगता है जैसे हड्डियां उभर आई हैं।”

उसकी बात सुन पारो खिलखिला कर हंस पड़ी।

“ठीक है अब से खा पीकर थोड़ी मोटी हो जाऊंगी! अगली बार मिलने आओगे तो इससे बेहतर पाओगे मुझे।”

दर्शन ने अपने धोखेबाज आंसुओं को जो उसकी बिना मर्जी के भी उसके गालों पर लुढ़क आये, उन्हें पोंछ लिया और खड़े होकर पारो का हाथ पकड़ लिया।
” बउ दी आपके लिए कुछ सामान लेकर आया हूं मना मत करना।”

“क्या है दिखाओ तो सही।”

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दर्शन ने इतनी देर से अपने कंधे पर टांग रखे बैग को अपनी गोद में रखकर उसकी चेन खोल दी उसमें पारो के लिए किताबें रखी थी।
     घर पर किसी तरह से जुगत लगा कर आखिर दर्शन और आनंदी के जोर देने पर पारो को 11वीं की परीक्षा देने का मौका मिल चुका था।
    पारो के आश्रम आने के बाद ही उसका परीक्षा फल भी आ गया था। और वो अच्छे नंबरों से पास हो चुकी थी।
     दर्शन को जब पारो के परीक्षाफल का पता चला तब वो बाहर ही था, वो खुशी से बांवरा मिठाई लिए जब घर पहुंचा तब उसकी प्यारी बऊ दी उसे घर भर में कहीं नही नज़र आई ।
   जब माँ से उसने पूछा तो माँ ने उसकी पूछताछ से परेशान हो कह दिया…-“मर गयी तेरी बऊ दी” और वो नाराज़ हो घर से बाहर चला गया था।
    गुस्सा उतरने के बाद जब आधी रात वो घर लौटा तब आनन्दी बऊ दी ने खाना परोसते हुए उसे पारो के जाने की सारी बात सिलसिले वार बता दी।
    और अगले ही दिन घर पर बिना किसी से कुछ कहे वो उससे मिलने निकल गया।
    पर जाने क्यों अपनी माँ की बात सुन उसका मन कड़वाहट से भर गया था। बऊ दी से ऐसी भी क्या नाराज़गी। उनकी तकलीफ समझने की जगह हर कोई उनकी तकलीफ बढ़ाने में लगा था।
   रास्ते भर सोच सोच कर उसका सिर फटने लगा था। उसे पारो की घर वापसी का कोई मार्ग दिखाई नही दे रहा था, फिर भी मन ही मन वो उसे वापस ले जाने को मना लेने का एक प्रयास तो करना ही चाहता था।
       पारो के लिए क्या लेकर जाना चाहिए  उसे नही सूझ रहा था कि एकदम से उसे लगा अगर पारो उसके साथ नही भी आई तो कम से कम जहाँ हैं वहीं से अपनी आगे की पढ़ाई ही कर ले। और इसलिए उसने उसके लिए किताबें रख ली थीं, वो भी अगली कक्षा की।
   बैग खोलते ही पारो की नज़र किताबों पर गयी और उसकी आंखें भर आयीं।

“अब इन किताबों का क्या करूँगी ? “

“पढना ! किताबों का भला और क्या किया जाता है? “

   वो दोनों बातें कर रहे थे कि उनके पास से होकर वरुण किसी अन्य आचार्य से बात करता निकल गया। और उसे पीछे से देख दर्शन के मुहँ से बेसाख्ता “देव दादा”निकल गया।
     दर्शन की आवाज़ पर वरुण चौन्क कर पलट गया।

   वरुण ने दर्शन को देखा और दर्शन ने वरुण में छिपे देव को।
   वरुण को देखते ही जाने क्यों दर्शन के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कुराहट चली आई वरुण ने भी दर्शन को पहचान लिया वरुण कदम बढ़ाता दर्शन तक चला आया।

  ” आप तो हमारे घर आये थे ना…?

  ” कैसे पहचान लिया मुझे ?”
वरुण के सवाल पर दर्शन के मुहँ से उसके बिना चाहे भी वो बात निकल गयी जो सुन वहीं खड़ी पारो भी चौन्क गयी
   ” आपको देख बिल्कुल ऐसा लगा जैसे मेरे देव भैया वापस आ गए। बऊ दी ये वहीं तो हैं जो उस वक्त हमारे घर आये थे, जब…। “

  पारो ने बिना वरुण का चेहरा देखे ही उसकी ओर हाथ जोड़ दिए, और इतनी देर में वरुण पारो की सारी आपबीती समझ गया।
   उस दिन पहली बार आश्रम में उसे देखने के बाद एकाएक वो उसे नही पहचान पाया था लेकिन जाने क्यों जब तक वो नज़र आती रही थी उस पर से नज़रे नही हटा पा रहा था।
   बादबाकी उस रात वो अपने इस कृत्य पर बेहद शर्मिंदा भी हुआ था।
   आश्रम में होते हुए वो ऐसे कैसे किसी औरत को अपलक देख सकता था?
आश्रम आने के बाद से ही उसने डॉक्टर की बताई दवाएं भी लेनी छोड़ दी थीं……
   यही सब सोचते सोचते जाने रात की किस पहर उसकी नींद लग गयी थी, सुबह भोर की पहली किरण से जब उसकी नींद खुली तब उसे एहसास हुआ कि कल रात वो जाने कितनी जागती रातों के बाद चैन की नींद सो पाया था….

क्रमशः

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aparna….

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जीवनसाथी-121

विराज की गाड़ी में कौन था। क्या भगवान उसे उसकी गुनाहों की सज़ा दी रहे

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   जीवनसाथी -121

         आदित्य पिंकी के बेटे को बाहों में लिए बगीचे में घूम रहा था कि ऊपर खड़ी केसर पर उसकी नज़र पड़ गयी। केसर उसे ही देख रही थी। आदित्य ने उसे भी इशारे से नीचे बुला लिया लेकिन केसर ने ना में सिर हिला दिया।
   कुछ समय बाद केसर अपना फ़ोन लिए उसमें कुछ करने लगी कि आदित्य के फ़ोन पर मैसेज की बीप आयीं।
   उसने तुरंत फ़ोन निकाला, मेसेज देखा… केसर का ही था…-“तुमसे कुछ बेहद ज़रूरी बात करनी है। कुछ देर के लिए हमारे कमरे में आ सकते हो?”
   आदित्य ने ऊपर देख कर हां में सिर हिला दिया। कमरे में वापस जाकर उसने बच्चे को पिंकी को थमाया और उल्टे पैरों वापस लौट रहा था कि पिंकी ने उसे टोक दिया…-“आदित्य भैया हमारे साथ चाय ले लीजिए।”
  आदित्य मना नही कर पाया, आखिर पिंकी ने पहली बार उससे कुछ मांगा था। वो वहीं उन लोगों के साथ बैठ गया।
   काकी सा और पिंकी के साथ बैठ आदित्य चाय तो पी रहा था लेकिन उसका दिमाग केसर की तरफ ही था।
  इधर काकी सा ये सोच कर की आदित्य उन सब के साथ सहज हो जाए उससे  बातें किये जा रहीं थीं। पिंकी के बचपन की बातों से लेकर, अपने जोड़ों की तकलीफ अपनी वेनिस की यात्रा तक सब कुछ उसे सुना दिया।
    बातों ही बातों में वक्त बीतता जा रहा था, आखिर आदित्य अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ।

  ” काकी सा हमें ज़रा कुछ काम है , हमें निकलना होगा।”
” हॉं ठीक है आप निकल जाये आदित्य लेकिन अब अगर आप हमें काकी सा की जगह  माँ बुलाएंगे तो हमें ज्यादा खुशी होगी।”
  आदित्य ने मुस्कुरा कर उनके पैर छू लिए…-“आप वाकई हमारी माँ ही तो हैं। हमने उनकी सिर्फ तस्वीर ही देखी है। रोज़ हमारी सुबह उनकी तस्वीर से ही हुआ करती थी, लेकिन अब से आप भी हैं जो हमारी सुबह को रोशन बना देंगी। “

  काकी सा ने उसके सिर पर हाथ फेरा और वो बाहर निकल गया। तेज़ कदमों से चलते हुए वो केसर के कमरे तक पहुंच गया…
… लेकिन केसर वहाँ नही थी। रेखा उसके कमरे में  आँसू बहाती खड़ी खिड़की से पार कुछ देख रही थी।
” रेखा  क्या हुआ ? केसर कहाँ है?”
रेखा ने आदित्य को देखा और वापस रोने लगी। रोते रोते उसने एक चिट्ठी आदित्य की ओर बढ़ा दी…

  आदित्य ने धीरे से चिट्ठी खोली चिट्ठी केसर की ही थी जो उसने आदित्य के लिए लिख छोड़ी थी…

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   आदित्य,

  वैसे तो हमने सोचा था तुमसे मिलकर हर एक बात तुमसे सामने बैठकर कहेंगे लेकिन जाने क्यों हमारी हिम्मत ही नहीं हुई और इसीलिए हमने कल रात ही ये चिट्ठी लिखी।
   सोचा था तुम्हें अपने हाथ से यह चिट्ठी दे देंगे और तुम अपने कमरे में जाकर तफसील से इसे पढ़ कर इस चिट्ठी का जवाब दे देना।
   हमने जिंदगी में बहुत सारे गलत काम किए हैं बल्कि अगर हम यह कहें कि हमने सिर्फ गलत काम किए हैं तो भी गलत नहीं होगा। लेकिन तुमने हमेशा हमारा साथ दिया।  उस वक्त जब तुम और हम दोनों किसी के हाथ का मोहरा थे तब भी तुमसे जब बन पड़ता था हमारी मदद किया करते थे। और बाद में जब हम इस बात को जान गए कि हम किसी के हाथों का मोहरा है उस वक्त भी तुमने हमारा साथ नहीं छोड़ा।
  ठाकुर साहब के आदमी जब हमारी जान के पीछे पड़े हुए थे। उस वक्त एक तुम ही थे, जो हमें उन सब से बचाकर सुरक्षित महल तक ले आए। हम यह बिल्कुल नहीं कहेंगे कि इसमें तुम्हारा कोई स्वार्थ था क्योंकि भले ही हम ठाकुर साहब के गुनाहों का सबूत थे लेकिन हम जानते हैं तुम ने हमें बचाया है तुम्हारे दिल में छिपी इंसानियत के कारण। तुम वाकई दिल का हीरा हो।
   हम भी औरों की तरह राजा अजातशत्रु से बहुत प्रभावित थे, लेकिन हमारे मन में उनके लिए जो झूठी कड़वाहट भरी गई थी उसके कारण कुछ समय के लिए ही सही हमें उनसे नफरत हो गई और उनसे और उनकी बीवी से बदला लेने के लिए हम इस हद तक नीचे गिर गए कि हमने कुछ हत्याएं भी की ।
      इतने बड़े गुनाहों की सजा इतनी आसानी से नहीं मिलती आदित्य।
     हम मानते हैं कि राजा अजातशत्रु और बांसुरी ने हमें माफ कर दिया। हम यह भी जानते हैं कि तुम भी हमें माफ कर चुके हो लेकिन हमारा जमीर हमारी आत्मा हमें माफ नहीं कर रही।
   जिस वक्त हम राजा अजातशत्रु को धोखा दे रहे ,थे उस वक्त भी वह हमारे पिता के स्वास्थ्य के लिए, उनकी जिंदगी के लिए चिंतित थे। वो हर पल हमारी खुशी के लिए दुआएं मांग रहे थे, और ऐसे भले इंसान को हमने धोखा दिया है।
    कभी-कभी यही सब सोचकर हमारा ज़मीर हमें कचोटने लगता है कि आज भी हम उन्हीं लोगों के महल में पड़े हैं , कभी जिनकी जिंदगी हम छीन लेना चाहते थे।
   आदित्य हमारे गुनाहों की सजा यह नहीं है, कि हमें माफ कर दिया जाए। क्योंकि आप लोगों की माफी हमारे दिल को अंदर तक और ज्यादा मरोड़ उठती है।
हमें माफ करने की जगह अगर राजा अजातशत्रु और तुमने हमें कोई सजा दी होती ना, तो हमारी आत्मा का बोझ शायद उतर गया होता । लेकिन तुम लोगों ने हमारे हर गुनाह बख्श दिये और हमें गले से लगा कर माफ कर दिया।
    जिस वक्त हम जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे तुमने इतने प्यार ,इतनी शिद्दत से हमारी सेवा की, कि हम उसका एहसान अपनी सारी जिंदगी नहीं उतार पाएंगे। हमारे साथ कुछ वक्त बिताने के बाद तुम्हें मालूम चल ही गया होगा कि लड़कियों वाला कोई अच्छा गुण हममें मौजूद नहीं है। बावजूद तुमने कदम कदम पर हमारी मदद की। चाहे रसोई में  रोटियां सेकने की बात हो या सब्जी बनाने की। चाहे घर की सफाई हो या कपड़े धोने की। हर काम हम बिगाड़ कर रख देते थे, और तुम उसे वापस तरतीब से सही कर दिया करते थे।
    आखिर क्या क्या करोगे आदित्य हमारे लिए और क्यों किया इतना सब हमारे लिए?
           हम इस लायक नहीं है। बिल्कुल भी नही।
   देखा जाए तो हम इस लायक कभी थे ही नहीं और ना अब है।
   हम जानते हैं हमारी जगह कोई और लड़की होती तब भी आप उसकी ऐसे ही मदद करते, क्योंकि यह मदद का जज्बा आपके खून में है। आखिर आप राजा अजातशत्रु के ही तो भाई है ना । आप सभी भाइयों में चाहे युवराज सा हों, या अजातशत्रु, आप हो या विराट आप सभी में आप लोगों का राजसी खून नजर आता है।
    आप सभी वाकई राजपूतों की शान है, और आप सभी की यह शान हमेशा बरकरार रहे। हम जिंदगी भर भी आप लोगों के लिए दुआ करेंगे तो भी वह कम ही होगा । जिस ढंग से आप लोगों ने हमारे पापा साहेब को बीमारी में मदद की, उनकी सेवा का इंतजाम करवाया, उसके लिए हम दिल से आप सब के आभारी रहेंगे।
   विराज और रेखा एक ऐसा जोड़ा है आप के महल में जो कभी एक साथ सुखी नहीं रह सकता। अभी भी जब से हम इस महल में आए हैं रेखा को हमेशा परेशान ही देखते आ रहें हैं। हमारी छोटी बहन है।  उसकी चिंता हमें लगी ही रहती है। जब से हम यहां महल में आए हमने रेखा को हमेशा हमारे पिता साहब की सेवा करते पाया। उसे भी तो अभी-अभी ही मालूम हुआ है कि उसके जीवन की कड़वी सच्चाई क्या है? पर फिर भी रेखा अपनी परिस्थितियों से समझौता करने में हम से कहीं ज्यादा कुशल है हम शायद अब थकने लगे हैं।
   आप लोगों ने विराज और रेखा के मामले में भी हमेशा रेखा का साथ दिया। और विराज को सही रास्ते पर लाने के लिए राजा अजातशत्रु आज भी प्रयासरत हैं। विराज का स्वभाव चाहे कितना भी कसैला क्यों ना हो लेकिन राजा अजातशत्रु इतने मीठे हैं कि वह एक ना एक दिन विराज को भी सुधार ही लेंगे । हमें पूरा विश्वास है। और इसी विश्वास के कारण हम अपनी बहन रेखा को आप लोगों के पास छोड़े जा रहे हैं।
    हम अपने पिता को अपने साथ लिए जा रहे हैं।  क्योंकि पहले तो ऐसा लगा था कि हम उन्हें भी रेखा के साथ आप लोगों के पास, आप लोगों के सहारे ही छोड़ कर आप सब की दुनिया से कहीं दूर चले जाएंगे। लेकिन फिर लगा कि उनकी सेवा करने का सौभाग्य हमें मिला है, और उस सौभाग्य को हम आप लोगों को सौंप देंगे तो आप लोगों के हम पर और भी एहसान चढ़ते चले जाएंगे ।
     यही सोचकर हम अपने पिता साहब को अपने साथ लेकर जा रहे हैं। आप लोगों ने हमारे बुरे कामों के बावजूद हम पर जो एहसान किए हैं और जो एहसान लगातार करते चले जा रहे हैं, उसके लिए हम आप सभी के शुक्रगुजार हैं। लेकिन अब इन एहसानों का बोझ हम पर भारी होने लग गया है। अगर हम यही महल में रुक गए तो कहीं इन एहसानों के बोझ तले दबकर मर ना जाए, इसलिए आप सब को छोड़कर जा रहे हैं। हमारा खुद का जमा जमाया बिजनेस है हमें उसे भी देखना है ।
  भले ही आज तक हम ठाकुर साहब के हाथ की कठपुतली थे, लेकिन हमारा एक छोटा सा ही सही अपना व्यक्तित्व था जो कहीं दबा छुपा सा रह गया था।

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    हमें मालूम है हमारा खत पढ़ते वक्त आपको शायद ऐसा लगा हो कि हम अपनी जिंदगी से बेज़ार होकर अपने आप को खत्म करने ना चले जाएं, लेकिन नहीं आदित्य।
     आपके साथ रहकर हमने इतना तो समझ लिया है कि कोई इंसान अंदर से कितना भी टूटा हुआ हो, जिंदगी हमेशा उसे जुड़ने का मौका जरूर देती है।
अगर हमने हमारी जिंदगी में बेइंतिहा दुख देखे हैं तो आपने कौन सा कम देखें । आपका टूटा हुआ बचपन बिखरी हुई जवानी सभी को समेटकर आज भी आप जिंदगी से जूझ रहे हैं , लड़ रहे हैं। जिंदगी को जी रहे हैं। आप देखिएगा आदित्य एक दिन खुशियां आप के गले लग जाएंगी।
    आप जो चाहते हैं अपनी जिंदगी में, आपको वह सब मिलेगा। आपका परिवार आपके पिता साहब आपकी छोटी बहन पिंकी सब कुछ।
  हम सिर्फ इन बातों की दुआ कर सकते हैं और हमेशा करते रहेंगे आपके लिए।
     हम जितना राजा अजातशत्रु से प्रभावित थे कहीं उतना ही आपसे भी प्रभावित हो चुके हैं ।आप पहली नजर में जितने संगदिल और गुस्सैल नजर आते थे आप अंदर से वैसे बिल्कुल भी नहीं है।
   आप सब ने तो अपने आप को दुनिया के सामने साबित कर दिया है पर हमें आज तक मौका नहीं मिला। अब हम भी जा रहे हैं खुद को साबित करने, लेकिन दुनिया के सामने नहीं अपने आप के सामने।
    आज तक हम जो करते आ रहे थे किसी और के लिए करते आ रहे थे और इसीलिए शायद सही और गलत का फर्क नहीं समझ पा रहे थे लेकिन अब हम जो करेंगे अपने लिए करेंगे अपनी बहन के लिए करेंगे।

   इतने दिन महल में रहते हुए हमने एक निर्णय लिया था जिसके बारे में हम आपसे चर्चा करना चाहते थे। लेकिन वक्त ही कुछ ऐसा चल रहा था कि हमारा कुछ ज्यादा बोलने का मन ही नहीं किया करता था हमने एक निर्णय लिया है आदित्य।
   हम हमारे जैसे बेचारे बच्चों के लिए एक बाल आश्रम खोलने की सोच रहे हैं।
   हमारे पास तो फिर भी हमारे पिता साहब थे बावजूद हम भटक गए। लेकिन बहुत से ऐसे बच्चे होते हैं जो अच्छी परवरिश ना मिल पाने के कारण कम उम्र में भटक जाते हैं। गलतियां करने लगते हैं। और बाद में उनके पास पछताने या आत्महत्या करने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचता।
    जिन बच्चों के पास उनके मां बाप नहीं है , उनके लिए तो फिर भी ढेर सारे आश्रम खुले हुए हैं लेकिन कई बच्चे ऐसे भी होते हैं जो मां बाप के होते हुए भी उनकी कमी महसूस करते हैं। हम ऐसा ही एक आश्रम बनाएंगे जहां ऐसे बच्चों की काउंसलिंग के लिए डॉक्टर मौजूद रहेंगे।
   किशोरवय के वह बच्चे जो किन्हीं भी कारणों से भटक गए हैं । कम उम्र में ड्रग्स लेने लग गए हैं, या बुरी आदतों के शिकार हो गए हैं। उनके लिए हमारा यह आश्रम होगा। , जहां अनुभवी चिकित्सकों की देखरेख में इन बच्चों को उनकी नशे की नशे की लत और बाकी बुरी लतों से निजात दिलाई जाएगी।
   हम जब से आप के साथ थे इसी प्रोजेक्ट को करने में व्यस्त होते थे। अब जाकर हमारा सोचा हुआ प्रोजेक्ट पूरा हुआ है । कुछ 2-4 में प्रायोजकों से भी बात चल रही थी जिन्होंने अपनी सहमति दे दी है। बाकी तो हमारा खुद का बिजनेस भी है। जिसका एक मोटा पैसा हम यहां पर लगाएंगे हमारे पिता साहब और रेखा भी इस प्रोजेक्ट में हमारा साथ देने तैयार है।
     तो अब तुम समझ ही गए होंगे कि हमने अपनी जिंदगी ढूंढ ली है अब हम यह खत लिखना बंद करते हैं कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया है ।
  लेकिन क्या करें बातें भी तो इतनी ढेर सारी थी।
हम तुम्हारे सामने ज्यादा कुछ बोल नहीं पाते हैं। लोगों को लगता है हम बहुत गुस्सैल हैं, घमंडी हैं, बदतमीज है । हो सकता है लोगों को सही लगता हो। शायद हम ऐसे ही हैं लेकिन हम जो भी हैं अपने आप में खुश हैं। और अब अपने इस काम के साथ  हम नई शुरुआत करने के लिए अपने पिता साहब को लेकर निकलने की सोच चुके हैं। हमारा इस शहर में भी बंगला है और दून में भी। आप जहां भी चाहे आकर हमसे मिल सकते हैं फिलहाल हम आपके ही शहर में यानी यही रहेंगे।
    आप जब हमारी जरूरत महसूस करें हम बस एक फोन कॉल की दूरी पर ही है। वैसे तो आप के आस पास आपके अपने मौजूद हैं। तो जाहिर है आपको हमारी कमी नहीं खलेगी, लेकिन कभी अगर किसी भी मौके पर आपको यह लगे कि हम आपकी मदद कर सकते हैं , तो प्लीज हमें याद करने में गुरेज मत कीजिएगा।बिना कोई दूसरा विचार मन में लाए सीधे हमें बुला लीजिएगा हम तुरंत आपके पास मौजूद रहेंगे।
   हमारी एक छोटी सी जिम्मेदारी रेखा को हम आपके पास छोड़ कर आए हैं। उसका ध्यान रखिएगा आदित्य। अब खत लिखना बंद करते हैं कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया।

  केसर !!!

   केसर के खत को पढ़ने के बाद आदित्य ने मोड़ कर अपनी जेब में रख लिया। वह खत पढ़ते-पढ़ते कमरे से जरा बाहर आ गया था उसने मुड़कर देखा दरवाजे पर खड़ी रेखा ने अपने आंसू पोंछ लिए…-” आप जाएंगे क्या दीदी से मिलने?”

” जरूर जाऊंगा! आपकी दीदी से मिलने भी और उन्हें वापस लेकर आने भी।”

रेखा ने हां में सर हिलाया और वापस अंदर चली गई। उसे उस वक्त जाने क्यों बांसुरी के पास बैठने का मन कर रहा था, अंदर से निकल अपने बेटे का हाथ थामे वह बांसुरी के कमरे की तरफ चली गई।

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  रेखा बांसुरी के कमरे में पहुंची तो उसने देखा वहाँ निरमा पहले ही मीठी को साथ लिए बैठी थी। दोनों सखियों को साथ देख रेखा वापस मुड़कर जाने लगी कि बांसुरी ने उसे आवाज देकर अंदर बुला लिया।

“अंदर आ जाओ रेखा बाहर से क्यों जा रही हो।”

सकुचाती हुई वह भीतर चली आई निरमा ने भी आगे बढ़कर रेखा का अभिवादन किया।

   बांसुरी के बच्चे को गोद में लिए रेखा प्यार से देखने लगी…-‘ कितना मिलता है ना इसका चेहरा हुकुम से!”

” सही कहा बच्चे अधिकतर अपने पिता की ही तो परछाई होते हैं ।कहा जाता है ना कि गर्भावस्था में मां जिसका चेहरा सबसे ज्यादा देखती है, उसी की छाप बच्चे पर पड़ती है। और जाहिर है एक पत्नी अपने पति को ही तो सबसे ज्यादा देखती है । और दिल से चाहती है कि उसी की परछाई उनकी संतान बने। “

निरमा की बात पर रेखा ने मुस्कुराकर हामी भर दी…-” लेकिन निरमा तुम्हारी मीठी प्रेम भैया जैसी बिल्कुल नहीं लगती। “

  कुछ पलों को निरमा हड़बड़ा कर चौन्क गयी कि तभी बांसुरी ने मुस्कुराकर बात ही बदल दी।

” हां भई कुछ बच्चे मां पर भी तो पड़ेंगे वरना औरतें नाराज़गी में मां बनने से इस्तीफा नहीं दे देंगी। “

  तीनों सखियां हंसती खिलखिलाती बातचीत में लग गई । बच्चे भी आपस में खेल रहे थे। बांसुरी का बेटा उसकी गोद में ही था कि कुछ देर में ही रेखा के फोन की घंटी बजने लगी….

रेखा ने फोन उठाया, दूसरी तरफ से जाने किसका फोन था लेकिन रेखा फोन में बात करते हुए काफी घबरा गई….” क्या लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? नहीं ऐसा नहीं हो सकता वह किसी और की गाड़ी होगी। अभी कुछ देर पहले ही तो ….” अपनी बात पूरी करने से पहले ही वो फफक पड़ी।

  “क्या हुआ रेखा किसका फोन था? “

बांसुरी के सवाल पर रेखा जोर से रोने लगी।  रोते रोते ही उसने फोन पर हुई बातचीत बांसुरी और निरमा को बता दी फोन पुलिस चौकी से किन्ही पुलिस वाले का था।
   शहर से बाहर जाने वाले हाईवे पर एक एक्सीडेंट हुआ था।  गाड़ी पलट कर नीचे खाई में गिर गई थी। गाड़ी को ऊपर निकालने की कोशिश की जा रही थी। ऊपर से देखने पर गाड़ी का जो नंबर समझ में आया उसको ट्रैक करने पर मालूम चला कि गाड़ी महल की ही थी और विराज के नाम से रजिस्टर्ड थी।
      महल की गाड़ी जो विराज के नाम से रजिस्टर्ड थी, इतना  पता चलने पर पुलिस वालों ने विराज के नंबर पर कॉल लगाया लेकिन विराज का नंबर लगातार बंद आ रहा था इसलिए पुलिस वाले ने रेखा के नंबर पर फोन लगा लिया था।
    बांसुरी और निरमा को यह सब बताते हुए रेखा की हिचकियां बंध गई।
    बांसुरी ने तुरंत अपना फोन उठाया और समर को फोन लगा दिया उधर निरमा भी अब तक प्रेम को फोन लगा चुकी थी।
    अपने आंसू पूछती खुद को संभालती रेखा भी विराज को फोन लगाने कांपते हाथों से उसका नंबर डायल करने लगी……

क्रमशः

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aparna….

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वापसी ….

समय के चक्र को घुमा कर रख देने वाली एक प्रेम कहानी…

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वो कितना कुछ कर रहा था खुद को संभालने के लिए। ऐसा लगने लगा था उसने यामिनी को नही अपने जीवन को खो दिया है। यामिनी की कही हर बात, उसकी मुस्कान, उसकी आंखें कुछ भी तो भुला नही पा रहा था। जब सब कुछ सही था तो यामिनी ऐसे उसे छोड़ क्यों चली गयी। वो खुद को ही मनाता समझाता रहता कि वो एक दिन वापस आएगी। ज़रूर आएगी।

हर वो जगह जहां वो यामिनी के साथ एक बार भी गया था छान आया। यामिनी का कोई दोस्त और सहेली नही बचे थे जिनसे उसने उसके बारे में पूछताछ न कि हो। यामिनी से जुड़ी हर चीज़ को उसने गले से लगा कर सम्भाल रखा था। पहले पहल लोग उस पर तरस खाते थे, उसे समझाने की कोशिश करते थे, लेकिन अब लोगों ने उससे और उसके पागलपन से कन्नी काटना शुरू कर दिया था।

वजह !!! वजह यही थी कि लोग अब उसे समझा कर थक चुके थे कि रागिनी मर चुकी है। उसका प्लेन 35000 फीट की ऊंचाई पर क्रैश हो चुका है। उसके अस्थि पंजर भी किसी को नसीब नही हो सकते….

लेकिन वो लोगों की कही बातों में भी उसे ढूंढ ही लेता था। और ऐसे ही एक दिन किसी की इस बात को की मरे हुए लोग वापस नही आते, उनसे मिलने के लिए खुद मरना पड़ता है , पूरा करने वो भी शहर की सबसे ऊंची पहाड़ी पर नीचे छलांग लगा कर मरने ही तो खड़ा था, कि किसी के कोमल हाथों ने उसे अपनी तरफ खींच लिया था।

वो भोर थी!! मानवविज्ञान की विद्यार्थी। जो जाने कब से उसके मोहपाश में बंधी खुद को ही भूल बैठी थी। और फिर उसने उसे बाहों में समेट लिया। जिस प्यार की तलाश में वो अपनी ज़िंदगी भूल बैठा था उसी ज़िन्दगी से उसे प्यार करना सीखा दिया भोर ने।

उसकी जिंदगी ने जैसे दूसरी करवट ले ली थी। भोर के साथ ने उसके जीवन में मधुमास वापस ला दिया था। अब उसके भी दिन रात चाशनी में भीगे बीतने लगे थे। दोनों ने शादी कर ली थी, और फिर भोर ने उसे उसकी जिंदगी का सबसे सुंदर तोहफा दिया था… उसका अपना बेटा।

ज़िन्दगी ऐसी खुशगवार भी हो सकती है, उसने नही सोचा था। देखते ही देखते तीस साल बीत चुके थे। आज वो खुद पचपन बरस की उम्र में अपने आप को कितना खुश और संतुष्ट पाता था और इसका एकमात्र कारण थी भोर। भोर वाकई उसके जीवन में सवेरा लेकर आई थी। अपने नाम के जैसे ही सुंदर, हालांकि अब तो उसके चेहरे पर भी उम्र के निशान नज़र आने लगे थे। माथे पर कुछ समय की लकीरें खींच गयीं थी और कनपटी और मांग पर के बालो में चांदी झलकने लगी थी, ये और बात थी कि वो हर पंद्रह दिन में बड़े करीने से अपने बालों को डार्क ब्राउन शेड्स से रंग लेती थी। पर कमर पर की परिधि, पेट के आसपास का बढ़ता वृत्ताकार घेरा उसे भी बावन का न सहीं अड़तालीस का तो दिखाने ही लगा था।

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आईने के सामने खड़े वो खुद भी तो अपनी कनपटी पर की सफेदी देख मुस्कुरा उठता था, और बालों की स्टाइल बदल बदल कर उन्हें छिपाने की असफल कोशिश में लग खुद ही ठठा कर हँस पड़ता था। आज भी इसी कोशिश में था कि दरवाज़े पर घंटी बजी। घंटी सुनते ही उसके चेहरे पर लंबी सी मुस्कान खेल गयी थी। आज ही उसके बेटे का पच्चीसवाँ जन्मदिन था, और आज ही उसे एक नई कंपनी में जॉइन करना था। वो ही घर वापस आया होगा ये सोच कर दिनकर दरवाज़ा खोलने आगे बढ़ गया।

दरवाज़ा खुला लेकिन सामने उसका बेटा नही यामिनी खड़ी थी। यामिनी !!! वही यामिनी, जिसके लिए वो कभी पागल हो चुका था। वही यामिनी जिसके लिए वो खुद को मारने जा रहा था। लेकिन ये तो सचमुच वही यामिनी थी। वही आज से तीस साल पहले वाली यामिनी। सिर्फ बाइस साल की यामिनी। पर ऐसा कैसे संभव है? गुलाबी टॉप और ब्ल्यू डेनिम में सीधे सतर बालों को दोनो तरफ के कंधों पर सामने रखे खड़ी वो वैसे ही मुस्कुरा रही थी जैसे उस दिन जब वो उसे प्लेन में बैठाने गया था…..

क्या ये सम्भव था ? या यामिनी किसी तूतनखामेन की ममी में अब तक सोई पड़ी थी जो जस की तस वापस लौट आयी थी।

मेरे प्यारे पाठकों , ये रही मेरी नई कहानी की छोटी सी झलक। ये कहानी भी मेरी बाकी कहानियों की तरह प्रेम कहानी ही होगी लेकिन बहुत सारे रहस्य और रोमांच से भरी इस कहानी का अंत कुछ अलग हट के होगा।

ये कहानी नवंबर में दीवाली के बाद शुरू होगी। और इसके भाग रोज़ आएंगे। एक और बात ये कहानी एक्सक्लुसिवली सिर्फ और सिर्फ मेरे ब्लॉग पर ही आएगी।

मुझे पढ़ने और सराहने के लिए आप सभी का दिल से शुक्रिया….

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जीवनसाथी -120

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   जीवनसाथी – 120

     चुनाव के नतीजे आने लग गए थे रुझानों से साफ जाहिर था कि राजा और उसकी टीम ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया था। राजा की जीत तो पहले ही 100% तय थी।
समर अपने ऑफिस में बैठा हुआ इन्हीं सब जोड़ घटाव को देख रहा था कि मंत्री जी का फोन आ गया।

   समर उनसे बात कर ही रहा था कि आदित्य भी ऑफिस में चला आया। इस सारी प्रक्रिया में आदित्य ने भी समर का पूरा पूरा सहयोग किया था। वह हर जगह राजा के छोटे भाई की हैसियत से उस का साथ निभाता जा रहा था।
   राजा को उसने एक पल को भी अकेला नहीं छोड़ा था। आज तक जहां समर और प्रेम राजा के दाएं और बाएं हाथ थे अब आदित्य भी उनकी टीम में शामिल हो गया था।
    अब धीरे-धीरे महल आदित्य को भी अपनाने लग गया था। युवराज भैया, रूपा, जया, जय, विराट यह सभी लोग जहां आदित्य को पूरी तरह दिल खोलकर अपना चुके थे, वही पिंकी आज भी आदित्य से कुछ हद तक नाराज ही लगा करती  थी।
     राजा के बेटे यश के कार्यक्रम में शामिल होने आई पिंकी को उसकी मां ने कुछ समय के लिए महल में ही रोक लिया था।
    पिंकी और उसके बेटे के रुकने से पिंकी की मां को भी सहारा हो जाता था। अपनी जेठानी की मौत के बाद से वह कुछ ज्यादा ही डूबा हुआ सा महसूस करने लगी थी। आदित्य के बारे में पता चलने के बाद उनकी जो थोड़ी बहुत बातचीत अपने पति से हुआ करती थी, वह भी पूरी तरह से बंद हो चुकी थी। बल्कि अभी पिछले कुछ समय से उन्होंने हरिद्वार जाकर रहने का मन बना लिया था लेकिन पिंकी और राजा ने उन्हें किसी तरह रोक लिया।

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   आजकल उनकी तबीयत भी कुछ ऊपर नीचे ही रहा करती थी।
   उन्हीं के बारे में सोचते विचारते आदित्य समर के ऑफिस में प्रवेश कर गया। समर को चिंतित सा फोन में बात करता देख आदित्य भी उसके सामने बैठ गया।

“क्या हुआ समर कोई चिंता की बात है?”

“हां! ऐसा ही कुछ समझ लो।”

“हुआ क्या? चुनाव के नतीजे तो कल घोषित होने वाले हैं! और जहां तक मुझे लगता है राजा भैया और उनके सारे लोग जितने ही वाले हैं।”

“जितने ही वाले हैं कि बात नहीं आदित्य।। यह सभी लोग जीत चुके हैं।”

” ये तो बड़ी अच्छी बात है। फिर किस बात की चिंता में इतना विचार मगन बैठे हो।”

“इसी बात की चिंता है ! मैं नहीं चाहता था कि यह सारे लोग एक साथ जीते।”

“यह क्या कह रहे हो समर? होश में तो हो?”

“मेरा कहने का यह मतलब है, कि मैं नहीं चाहता था कि विराज भी जीते! लेकिन हुकुम का प्रभाव ही ऐसा है, कि उनके आस पास खड़ा हर व्यक्ति उनके प्रभाव के कारण हर जगह सफल हो ही जाता है।
   विराज अपने बलबूते तो कभी यह चुनाव नहीं जीत सकता था लेकिन लोगों ने  उसे हुकुम की टीम है यह मानकर विराज को भी जिता दिया और वह भी भारी बहुमत से।”

“मेरे ख्याल से तो यह खुश होने की बात है।”

“खुश होने की बात होती आदित्य अगर विराज हमारे सब के लिए लॉयल होता।”

“मतलब विराज आज हमारे लिए लॉयल नहीं है।”

“नहीं बिल्कुल भी नही। बात दरअसल यह है की हुकुम और उनके आदमी इतनी ज्यादा संख्या में नहीं थे कि सरकार बना सकें, लेकिन हुकुम और उनके सारे लोग अपने अपने जगह से चुनाव जीत चुके हैं। अब अगर हमें सरकार में शामिल होना है, तो हुकुम को अपने सारे जीते हुए विधायकों के साथ सरकार से हाथ मिलाना होगा यानी पक्ष या विपक्ष से हाथ मिलाना होगा।
   मैं खुद अब तक यही सोच रहा था की किसी एक पार्टी से तो हमें हाथ मिलाना ही पड़ेगा तो जिस पार्टी से हाथ मिला कर हमें अधिक लाभ हो उसी पार्टी से मैं चाहता था कि हुकुम हाथ मिला ले।
    मैं उस पार्टी के सामने यही शर्त रखने वाला था कि भले ही कम सदस्यों के कारण हुकुम अपनी सरकार नहीं बना सकते लेकिन जैसे चुनाव के नतीजे घोषित हुए हैं उससे यही साबित होता है कि जनता हुकुम को अपने मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है तो हम हुकुम को मुख्यमंत्री के पद पर देखने की शर्त पर ही अपने सारे विधायक किसी भी एक पार्टी को देते। हम उसी पार्टी की तरफ जाते जो हुकुम को मुख्यमंत्री का पद देगी।”

“पर यह तो बहुत बड़ी शर्त हो जाती ।  इस बात के  लिए तो वो लोग शायद ही तैयार हों।”

“देखो हमेशा यह होता है, कि जीती हुई पार्टी ही सरकार बनाती है !अभी हुकुम की पार्टी के अलावा बाकी दोनों बड़ी पार्टीयों में बहुत ज्यादा संख्याओं का अंतर नहीं है हुकुम जिस पार्टी की तरफ जाएंगे वही पार्टी सरकार बनाएगी तो ऐसे में हुकुम का पद बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।
   वैसे मुख्यमंत्री पद तो जीतने वाली पार्टी से ही चुना जाता है और हमारे विधायक सिर्फ उनकी पार्टी की संख्या बढ़ाने वाले विधायक ही कहलाएंगे । लेकिन हमारे राजा साहब कोई ऐसे साधारण व्यक्ति तो है नहीं। और न ही वह कोई साधारण विधायक हैं।  उनके साथ जनता का बेशुमार प्यार है।
    बात ऐसी थी कि उनकी पार्टी नई पार्टी थी इसलिए उन्होंने कम जगह से लोगों को खड़ा किया। अगर बड़ी पार्टी के समान इतनी बड़ी संख्या में वो अपने लोगों को चुनाव लड़वा पाते और अपने लोगों को खड़े कर पाते तो बेशक भारी बहुमत के साथ हमारे हुकुम की निर्विवाद रूप से सरकार बनती और हमारे हुकुम बिना किसी शक शुबहें के मुख्यमंत्री होते।
       पार्टी और प्रत्याशी तो बहुत से खड़े हुए लेकिन अभी हमारे सामने जो दो मुख्य पार्टी खड़ी हैं उनमें से एक है राजदल  पार्टी और दूसरी है जन जागरण दल।
दोनों ही तरफ के नेताओं का लगातार मेरे पास फोन आ रहा है, कि मैं हुकुम की तरफ से सारे विधायकों को उनके सपोर्ट में भेज दूं। जिससे कि वह सरकार बना सके और मैंने अभी-अभी राजदल पार्टी से कह दिया है कि अगर वह हम से हाथ मिलाना चाहते हैं तो यह मेरी शर्त है कि हमारे राजा साहब ही मुख्यमंत्री बनेंगे।
    देखो जाहिर सी बात है कि जैसे ही हम किसी पार्टी से हाथ मिलाते हैं हम सारे मिलकर एक पार्टी बन जाएंगे और उस समय मुख्यमंत्री उस पूरी पार्टी में से किसी को भी चुना जा सकता है। इसलिए राजा साहब एक बार फिर निर्विवाद रूप से मुख्यमंत्री पद के दावेदार बन जाएंगे।”

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“क्या यह सारी बातें राजा भैया जानते हैं।”

“अब तक तो नहीं जानते।”

“हां मुझे भी यही लगा था। क्योंकि मुझे नहीं लगता राजा भैया किसी दूसरी पार्टी से हाथ मिलाने के लिए तैयार होंगे। उन्हें मुख्यमंत्री बनने का कोई लालच नहीं है। वह तो विधायक बन कर भी अपने क्षेत्र की सेवा कर ही लेंगे। भगवान ने चाहा तो अगले चुनाव तक उनकी पार्टी इतनी सक्षम हो जाएगी कि वह अपने बलबूते पर बिना किसी से हाथ मिलाए मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी कर सकते हैं।”

“तुम्हारी कहीं एक एक बात बिल्कुल सही है आदित्य। राजा साहब को जब मेरा यह प्लान पता चलेगा तो वह मुझ पर बहुत नाराज होंगे , लेकिन इसीलिए मैंने यह सोच रखा है कि यह सारी बातें उनसे युवराज भैया कहेंगे मैं नहीं। दूसरी बात राजनीति ऐसी काजल की कोठरी है जिसमें आप अंदर घुसकर बिल्कुल बेदाग बाहर नहीं आ सकते।
  राजा साहब फिर भी बेदाग हैं। उनके सारे दाग मैं अपने ऊपर लेने को तैयार हूं। लेकिन उनके राजनैतिक कैरियर के लिए फिलहाल किसी एक पार्टी से हाथ मिलाना बेहद जरूरी है।
   हां यह किया जा सकता है कि एक बार मुख्यमंत्री बनने के बाद राजा साहब अपने कार्यों से वैसे भी जनता का दिल इतना जीत ही लेंगे कि अगले 5 सालों में उनकी अपनी नई पार्टी बना कर वो अलग हो जाएं।”

“तुम्हें लगता है कि अगर राजा भैया एक बार किसी पार्टी से जुड़ गए तो कभी भी उस पार्टी को छोड़ेंगे?”

“नही छोड़ेंगे!,मैं जानता हूँ इस बात को। इसलिए ऐसी पार्टी से हुकुम को जुड़वाने की कोशिश में हूँ जो बाकी राजनैतिक पार्टियों से ठीक हो। बाकी तो हुकुम वो पारस हैं कि जिस पत्थर को छू ले वह सोना बन जाए! जाहिर है वो जिस पार्टी से जुड़ेंगे उस पार्टी को भी अपने मुताबिक बना ही लेंगे।”

“सही कह रहे हो समर! लेकिन अब भी मुझे इस बात पर यकीन करना मुश्किल लग रहा है कि राजा भैया अपनी पार्टी को किसी और पार्टी से मिला लेंगे।”

“कोशिश करने में क्या बुराई है आदित्य?”

“बिल्कुल कोशिश तो हम सब करेंगे ही। अभी यह बताओ कि मंत्री जी से बात करने के बाद तुम इतने चिंतित क्यों हो गए थे। और यह विराज की धोखा देने वाली क्या बात है?”

“मैं चाह रहा था कि राजा साहब राज दल पार्टी के साथ हाथ मिला लें। यह बात विराज को मालूम चल गई हैं। और अब वह जन जागरण दल से बातचीत करने में लगा हुआ है। तुम जानते ही हो कि राजा साहब के अलावा कुल 11 सीटों पर हमारे लोग खड़े हुए थे, यानी राजा साहब को मिलाकर हमारे पास कुल 12 विधायक हैं। इनमें से तीन लोग विराज के खास हैं। अगर विराज अपने उन तीन लोगों को लेकर जन जागरण दल की तरफ चला जाता है, तो हमारे विधायक कम हो जाएंगे और ऐसे में राज दल पार्टी के ऊपर प्रेशर बनाने में हमें समस्या खड़ी हो जाएगी।”

“यह तो बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर दी विराज ने! अगर वह अपने तीन लोगों को साथ लेकर जाता है, इसका मतलब हमारी पार्टी से कुल चार लोग कम हो जाएंगे और सिर्फ आठ लोग ही बचेंगे राज दल पार्टी से जुड़ने के लिए।”

“बिल्कुल सही समझे आदित्य! अब अगर सिर्फ आठ लोगों के साथ हम हाथ मिलातें हैं तो मेरा गणित वापस गलत हो जाएगा और मैं दबाव बनाने में असमर्थ हो जाऊंगा।

“तो अब क्या सोचा है आगे?”

“सोचा तो यही है कि आज विराज के उन तीन लोगों से जाकर मीटिंग करता हूं। पहले तो रुपए पैसे देकर ही उन्हें अपनी तरफ मिलाने की कोशिश करूंगा और अगर नहीं तैयार होते हैं तो…”

” तो उस सूरत में क्या करोगे?”

समर ने अपनी जेब से गन निकल कर सामने टेबल पर रख दी।

“उस सूरत में बस एक ही उपाय बचेगा मेरे पास।”

“यह क्या समर तुम लोगों को जान से मारने की धमकी दोगे।”

“देना ही पड़ेगा आदित्य और कोई चारा भी नहीं है! राजनीति रुपया या खून मांगती ही है। मेरे पास और कोई उपाय नहीं है अगर विराज के वह तीन विधायक हमारी तरफ आ गए तो फिर विराज अकेला कुछ नहीं कर पाएगा। मन मार कर ही सही उसे हमारी तरफ आना ही पड़ेगा। “

“सही कह रहे हो। “

“कौन सही कह रहा है और क्या सही कह रहा है आदित्य?”

आदित्य और समर अपनी बातों में लगे थी कि राजा और युवराज भी उस कमरे में चले आए। राजा के इस सवाल पर आदित्य मुस्कुराकर समर की ओर देखने लगा।

“आपके अलावा और कौन हर वक्त सही हो सकता है हुकुम?”

“यह तो गलत बात है समर ! हमारे अलावा एक और इंसान है, जो हर वक्त सच्चाई और ईमानदारी पर अडिग खड़ा रहता है। और वह है हमारे बड़े भाई युवराज सा।”

“जी सही कहा हुकुम! इन की तो बात ही निराली !है आप लोगों के लिए चाय या कॉफी कुछ मंगवाया जाए।”

“हां मंगवा लो! उसके बाद जरा रियासत के दौरे पर जाना है। “
   राजा के ऐसा कहते ही समर ने बैल बजा कर बाहर खड़े सहायक को अंदर बुला कर कॉफी के लिए कह दिया।
    राजा इस वक्त रियासत के दौरे पर निकलने वाला है यह सुनकर समर के चेहरे पर मुस्कान खिल गई… क्योंकि उसे युवराज से बात करने के लिए वैसे भी एकांत चाहिए था।

   सबके साथ कॉफी पीने के बाद राजा प्रेम के साथ रियासत के दौरे पर निकल गया! उसने जाती बेला आदित्य से भी पूछा, आदित्य उनके साथ जाने को तैयार था, लेकिन निकलते वक्त अचानक उसका पैर हल्का सा मुड़ा और मोच खा गया। जिसके कारण वह वही बैठ गया। उसकी हालत देख राजा ने उसे आराम करने की सलाह दी और प्रेम के साथ बाहर निकल गया।
     समर युवराज से क्या बातें करना चाहता है यह आदित्य जान ही चुका था इसीलिए उन दोनों को कमरे में छोड़ वह भी बाहर निकल गया । समर ने उसके जाते ही अपने ऑफिस के बाहर खड़े सहायक से कह दिया कि किसी भी हाल में अगले दो घंटे तक वह उसे और युवराज को डिस्टर्ब ना करें।

    आदित्य अपने कमरे की तरफ जा रहा था कि उसे पिंकी की माँ के कमरे से कुछ अजीब सी आवाज़ें सुनाई पड़ीं।
  उसे एकाएक समझ नही आया कि हुआ क्या है?और ये आवाज़ कैसी आ रही है?
    उसे एकाएक अंदर जाने में भी संकोच सा लग रहा था। झिझकते हुए उसने दरवाज़े पर दस्तक दी लेकिन अंदर से कोई जवाब नही आया। उसने दो तीन बार दस्तक देने के बाद उसने आवाज़ लगा दी, लेकिन जब अंदर से कोई आवाज़ नही आई तब वो दरवाज़े को हल्का सा धक्का दिए भीतर चला गया।
    आश्चर्य की बात ये थी कि कमरे में अंदर कोई नही था,एक नौकर तक नही।
   आदित्य ने बाथरूम का दरवाजा खटकाना चाहा वो खुला हुआ ही था। उसने धीरे से झाँक कर देखा अंदर कोई नही था।
   उसे अब वो आवाज़ बड़ी करीब से सुनाई दे रही थी, जैसे कोई रोते हुए हिचकियाँ ले रहा हो। आवाज़ की दिशा में उसने आगे बढ़ना शुरू किया तो आवाज़ और साफ सुनाई पड़ने लगी।
    आवाज़ बालकनी की तरफ से आ रही थी।

   वो धीरे से बालकनी में पहुंच गया। उसने देखा बालकनी की एक तरफ बनी मेहराब पर जाने कैसे पिंकी का बेटा चढ़ गया था, और अब वहां की जालीदार लकड़ियों पर खुद को संभालने की कोशिश में सिसक रहा था।
   आदित्य ने उसे देखने के बाद एक बार नीचे झाँक कर देखा और उसका सिर घूम गया। कमरा तो पांचवी मंज़िल पर ही था लेकिन आदित्य को अलटोफोबिया था यानी उसे ऊंचाई से डर लगता था। डर भी कोई सामान्य डर नही बेहद घबराहट और रक्तचाप बढ़ा देने वाला डर।
     उसे इतनी ऊंचाई पर चक्कर से आने लगते थे। उसने अपनी आंखें एक पल को बंद की और एक गहरी सांस भरी।
   आंखें खोल कर वो बिना दुबारा नीचे देखे बच्चे की तरफ बढ़ने लगा बच्चा उसे देखकर घबराहट में कहीं अपना संतुलन ना बिगाड़ बैठे इसलिए आदित्य एकदम शांति से बिना कोई शोर किए उस कंगूरे तक पहुंच गया।  बहुत धीमे से उसने बिना आवाज किए पास रखे मोढ़े को कंगूरे तक रखा और उस  पर चढ़ गया।  धीरे से अपना एक पैर बालकनी के किनारे बनी रेलिंग पर रख वह उस रेलिंग पर कंगूरे को पकड़कर चड गया। अब उसका एक हाथ बच्चे तक आसानी से पहुंच पा रहा था। अपने दूसरे हाथ से कंगूरे को पकड़े हुए उसने एक हाथ से बच्चे को धीमे से अपनी गोद में उठाना चाहा। बच्चा आदित्य को देख कर और जोर से रोने लगा। आदित्य ने बहुत कोमलता से उसका जाली में फंसा पैर बाहर निकाला और एक हाथ से ही बच्चे को गोद में लेकर अपनी तरफ खींच लिया।  इस झटके में एक बार उसका खुद का संतुलन बहुत बुरी तरह से बिगड़ गया लेकिन उसने दूसरे हाथ से कंगूरे को इतनी जोर से थाम रखा था कि वह गिरने से बाल-बाल बच गया। अगर इस वक्त आदित्य वहां से गिरा होता तो वह पांचवीं मंजिल से सीधे महल की पथरीली जमीन पर गिरता।
भगवान का शुक्र मनाते आदित्य ने बच्चे को कस कर पकड़ा और वापस मोढ़े की सहायता से बालकनी में उतर गया।
   
     आदित्य जिस वक्त बालकनी में आया था उसी वक्त काकी साहब की सहायिका उस कक्ष में कुछ सामान रखने आई थी। उसने आदित्य को बालकनी की तरफ जाते देखा तो आदित्य को क्या चाहिए यह पूछने वह भी उसके पीछे-पीछे बालकनी तक चली आई और जैसे ही उसने बच्चे को कंगूरे पर लटके देखा वह तुरंत भाग कर बगल वाले कक्ष में बैठी पिंकी और काकी साहब को बताने चली गई थी।
   
आदित्य जैसे ही बच्चे को लेकर बालकनी के फर्श पर बैठा उतने में ही एक किनारे सांस रोके खड़ी पिंकी आदित्य तक चली आई और रोते-रोते उसने अपने बच्चे को आदित्य की गोद से ले लिया।
    पिंकी के पीछे काकी साहब भी आदित्य तक चली आई।  उसके बालों में हाथ फेर कर उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया और उसके सामने अपने दोनों हाथ जोड़ दिये।
    वह उनके हाथ थाम कर सिर हिला कर उन्हें मना करने की कोशिश में था कि उसकी आंखें बंद हुई और वह बेहोश होकर वहीं गिर पड़ा।
     घबराई हुई पिंकी ने तुरंत पास खड़ी सहायिका से पानी का गिलास मंगवाया और उसे डॉक्टर को इत्तिला करने के लिए भेज दिया। काकी साहब ने आदित्य का सिर अपनी गोद पर रख लिया। आदित्य के माथे पर पसीने की बूंदें छलक आई थी । पिंकी ने ग्लास से पानी निकालकर आदित्य के चेहरे पर छींटना शुरू किया। कुछ देर में ही सहायिका ने दो और सहायकों को बुला लिया। जिन लोगों की सहायता से काकी साहेब ने आदित्य को अंदर कमरे में ले जाकर अपने पलंग पर लेटा दिया । कुछ देर में ही डॉक्टर साहब भी चले आए। आदित्य की जांच करने के बाद उन्होंने एक गोली उसकी जीभ के नीचे रख दी और काकी साहब और बाकी लोगों की तरफ मुड़ गए।
    पिंकी के पिता भी इतनी देर में आकर पीछे हाथ बांधे खड़े हो गए थे

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“अरे ये तो दिल्ली वाले आदित्य सिंह है ना। मैं जानता हूँ इन्हें। मुझे लगता है शायद स्ट्रेस के कारण इनका बीपी बहुत ज्यादा बढ़ गया है। बीपी कम करने के लिए फिलहाल मैंने एक गोली इन्हें  खिला दी है। जैसे ही स्ट्रेस थोड़ा कम होता है इन्हें होश आ जाएगा। बेहोश हो जाने का फिलहाल यही एक कारण मुझे समझ में आ रहा है। मैं यह कुछ दवाइयां लिख कर दिए जा रहा हूं, इनके होश में आने के बाद आप इन्हें   खिला दीजिएगा और कल एक बार इन्हें मेरी क्लीनिक पर भेज दीजिएगा मैं एक बार फिर से सारी जांच कर लूंगा।”

पिंकी डॉक्टर साहब के सामने हाथ जोड़ें अनुनय करने लगी …-“डॉक्टर साहब कोई घबराने की बात तो नहीं है।”

“अरे नहीं बिल्कुल घबराने की बात नही है। असल में आदित्य जी अलटोफोबिक हैं। इन्हें ऊंचाई से डर लगता है, लेकिन जब इन्होंने बच्चे को कंगूरे पर फंसा देखा तो अपने डर को एक तरफ कर यह बच्चे को बचाने के लिए जुट गए और बस उसी सब में इन्होंने इतना ज्यादा स्ट्रेस ले लिया कि इनका बीपी एकदम से शूट कर गया। बच्चे को बचाने के बाद यह अपने उसी बढ़े हुए बीपी के कारण बेहोश होकर गिर गए। “

   डॉक्टर की बातें सुन पिंकी आश्चर्य से सामने लेटे आदित्य को देखने लगी। उसे यकीन नहीं आ रहा था कि जिस आदमी से वह सिर्फ इस वजह से नफरत किया करती थी कि वह उसके पिता की ही अवैध संतान है, वही लड़का अपनी जान की परवाह किए बिना अपने डर को एक तरफ रख उसके बच्चे को बचाने के लिए जी जान से जुट गया । अगर कहीं डर के कारण वह अपना संतुलन खो कर जमीन पर गिर जाता तो उसकी जान भी जा सकती थी। लेकिन उसके बेटे को बचाने के लिए आदित्य ने अपनी जान की भी परवाह नहीं की।
      और वह आदित्य की कोई गलती ना होने पर भी बिना वजह उसे सजा दिए जा रही थी। क्या आदित्य वाकई उसके भाई होने का हक नहीं रखता?
   क्या आदित्य महल का उत्तराधिकारी होने का हक नहीं रखता?
    और यह सब सोचने और तय करने वाली वह खुद होती कौन है? एक तरह से देखा जाए तो आदित्य उसके पिता की पहली पत्नी की संतान है इस हिसाब से वह अवैध कैसे हुआ?
   सिर्फ सोचने का ही तो फर्क है। आखिर उसके बड़े पिता साहेब ने भी दो-दो शादियां की। क्या राजा भैया और युवराज भाई साहब ने विराज और विराट को नहीं अपनाया?
   युवराज भाई साहब ने तो आज तक विराज विराट और राजा भैया में कोई अंतर ही नहीं किया और यही हाल राजा भैया का भी है। तो उन दोनों भाइयों के संरक्षण में पली वह खुद कैसे इतनी कठोर ह्रदय हो गई?
   पिंकी को अपने आप पर बहुत ज्यादा शर्मिंदगी महसूस होने लगी। उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह चली! पिंकी की मां ने आकर उसे प्यार से अपनी बाहों में समेट लिया…-” मत रोइये बेबी! आपके भाई को कुछ नहीं होगा।”
अपनी मां के मुंह से आदित्य के लिए यह संबोधन सुन वह अपनी मां के गले से लग गई। मां और बेटी दोनों ही एक साथ जी भर कर रो लेना चाहती थी।  उन दोनों को रोते देख पिंकी के पिता भी उनके पास आकर बैठ गये। पिंकी की मां ने पिंकी को शांत करवाने के बाद उसके पिता के हाथों पर अपना हाथ रख दिया….-” आप चिंता मत करिए! आदित्य को कुछ नहीं होगा! हम हमारे बेटे को कुछ भी नहीं होने देंगे।”

    पिंकी के पिता की आंखों में खुशी की दो बूंदें छलक आई। कुछ देर में ही आदित्य को होश आ गया। उसने आंखें खोली, सामने पिंकी बैठी थी। पिंकी को देखते ही उसे उसके बच्चे का ध्यान आया और उसने तुरंत आसपास नजरें दौड़ानी शुरू की। तभी पिंकी की मां ने आगे बढ़कर आदित्य के सर पर हाथ रख दिया। उसके माथे पर हाथ फेरते हुए वह प्यार से कहने लगी…-“घबराइए मत आदित्य। आपका भांजा बिल्कुल सही सलामत है ।”
  पिंकी ने सहायिका की तरफ इशारा किया। सहायिका उसके बेटे को गोद में लिए उस तक चली आई । पिंकी ने अपने बेटे को अपनी गोद में बैठाया और आदित्य की तरह उसका चेहरा कर दिया…-” बेटा मामा जी को नमस्ते करो!”
    पिंकी के मुंह से अपने लिए ऐसा प्यार भरा संबोधन सुनकर आदित्य का भी दिल भर आया। धीरे से उठकर आदित्य तकिए का सहारा लिए पलंग पर टिक कर बैठ गया। उसके आसपास उसकी बहन पिंकी , उसकी माँ और उसके पिता खड़े थे। और इन सब के पीछे अदृश्य रूप से खड़े मुस्कुरा रहे  थे राजा अजातशत्रु सिंह!! जो आदित्य को उसका हक दिलवाने के लिए इस महल में लेकर आए थे। आज उनका वह सपना सही अर्थों में पूरा हो रहा था।
आदित्य के पिता ने सामने बढ़कर आदित्य को गले से लगा लिया…-” हमें  हमारी हर गलती के लिए माफ कर दो बेटा और पूरी तरह से वापस लौट आओ।”
  काकी साहब ने भी अपने पति की हां में हां मिलाई…-” आदित्य बेटा! आज तक हमें कभी बेटे की कमी महसूस नहीं हुई, क्योंकि पिंकी के साथ ही युवराज, कुमार,  विराज विराट सभी हमें भी छोटी मां का दर्जा ही देते आए हैं। लेकिन आज तुम्हें पाकर हमारा वह स्थान और थोड़ा ऊंचा हो गया है। तुम पिंकी के बड़े भाई थे, और सदा रहोगे। अब इस महल से वापस लौटने की कभी सोचना भी मत।”

  पिंकी का बेटा आदित्य की गोद में जाने के लिए  मचलने लगा। आदित्य ने प्यार से हाथ बढ़ाकर उसे गोद में ले लिया।

“आदित्य भैया संभल कर यह बहुत शैतान है! आपको परेशान कर देगा।”

पिंकी के मुंह से खुद के लिए भैया शब्द सुन आदित्य मुस्कुराने लगा बच्चे को गोद में लिए ही वो बाहर निकल गया।
   उसका दिल इस वक्त मिली खुशियों से ऐसा भर आया था कि कहीं उसकी आंखें छलक ना आए, इसी डर से वहां बैठे सब लोगों को छोड़ यह खुशखबरी फोन पर राजा अजातशत्रु को सुनाने ही वहां से बाहर निकल गया…..

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क्रमशः

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aparna …….


शादी.कॉम-17

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  “ तुम सिखा रहे हो,तुम सिखा रहे हो
   जिस्म को हमारे रूहदारियां……
   काफिराना सा है,इश्क़ है या क्या है।।”

  गाने के बोलों के साथ ही राजा के मन में भी बांसुरी बजने लगी।।
    कॉफ़ी खतम कर बाँसुरी और निरमा उठ खड़े हुए घर वापसी के लिये।।
    राजा और प्रेम दोनों को छोड़ने बाहर तक आये_

” बंसी आज तुम्हें मेसेज करेंगे,फोन अपने पास ही रखना,तुम इधर उधर रख कर भूल जाती हो।”

  राजा की बात का जवाब बाँसुरी की मुस्कान ने दिया,उसने हँस के सिर हिला के हामी भर दी,और हाथ हिला के बाय करती हुई चल दी।

    घर पहुंचते ही बांसुरी ने फोन को चार्ज पे लगा दिया।।नीचे माँ के साथ रसोई का काम निपटाते भी उसका पूरा ध्यान फोन पर ही था,उसने दो तीन बार अपनी अम्मा से पूछा भी__” अम्मा हमारा फोन बजा क्या”

” नही लाड़ो हमें तो ना सुनाई दिया।”

आखिर सब्र की इन्तिहा हो गयी,बाकी दिनों में  रात के खाने के बाद भी घंटों अपनी माँ के साथ इधर उधर की बतकही करने वाली बांसुरी आज खाना निपटते ही तुरंत ऊपर अपने कमरे में चली गयी।।

  रात के नौ बज चुके थे,पर राजा का कोई मेसेज अब तक नही आया था__” हद दर्जे का भुलक्कड़ है, खुद ही बोला मेसेज करूंगा और गायब है।”
   बांसुरी ने राजा का लास्ट ऑनलाइन चेक किया वो भी शाम का 5 बजे दिखा रहा था,मतलब उसके बाद से राजा ने फोन छुआ तक नही।दिल बहलाने के लिये बंसी ने एक किताब खोल ली,और बिना रूचि के भी उसे पढ़ने के लिये प्रयास करने लगी।पर घूम फिर कर दिमाग फ़ोन की तरफ ही जा रहा था।।
   उसने एक बार फिर फोन उठाया ,साधारण टेक्स्ट मेसेज चेक किया,वॉट्सएप्प चेक किया,कहीं कुछ नही था,समय देखा नौ बजकर दस मिनट हुए थे।।
     ऐसा कैसे हो सकता है ,क्या सिर्फ दस मिनट पहले ही फ़ोन देखा था,पर ऐसा लग रहा जैसे एक घंटा बीत गया हो,उफ्फ आज घड़ी ही पिछड़ गयी है या मैं ही कुछ ज्यादा उतावली हो रही। ऐसा सोच के बंसी को खुद पर थोड़ी शर्म सी आयी और उसने यही सोचा कि इस द्वंद से बचने का उपाय है कि चादर को तान कर आराम से सो लिया जाये,जब मेसेज आयेगा देखा जायेगा।।

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   बांसुरी खिड़की की ओर करवट किये लेट गयी,पर आंखों में नींद कहाँ __ जिन आंखों में सपने बसते हैं उनमें फिर नींद नही रुकती।।
    खुली आंखों से पूर्णमासी का चांद देखते हुए मन ही मन कोई गाना गुनगुनाती बन्सी बड़ी देर तक चंदा को निहारती रही,फिर उसे महसूस हुआ कि अब बहुत रात बीत चुकी है,अब कोई मेसेज नही आने वाला,अब उसे सच में सो जाना चाहिये,पर सोने से पहले पानी पीने को उठी बांसुरी ने सोचा मेसेज तो नही पर हाँ समय कितना हो रहा ये जानना आवश्यक है,उसने मोबाईल पे दिखा रहे समय पे नज़र डाली__ साढ़े नौ

    अरे ऐसे कैसे चमत्कार हो रहा,इतनी देर तक लेटी पड़ी रही और अब समय देख रही तो बस साढ़े नौ!!
क्या उसे लेटे हुए सिर्फ बीस मिनट ही बीता है,उसे लगा मोबाईल की घड़ी सही वक्त नही दिखा रही,उसने दीवार घड़ी पर नज़र डाली,संयोग से वही समय उस घड़ी ने भी दिखाया।।अब क्या किया जाये,,बंसी को खुद पर खीझ भी हो रही थी और गुस्सा भी आ रहा था,ऐसा इतना बेताब होने की क्या ज़रूरत है,ऐसा लगा जैसे खुद से ही कोई युद्ध लड़ रही हो,बन्सी ने उठ कर रेडियो पे एफ एम ट्यून किया और खिड़की पर बैठ गयी__

       “नमकीन सी बात है हर नई सी बात में
        तेरी खुशबू चल रही है जो मेरे साथ में
        हल्का-हल्का रंग बीते कल का
        गहरा-गहरा कल हो जाएगा (हो जाएगा)
       आधा इश्क़, आधा है, आधा हो जाएगा
        कदमों से मीलों का वादा हो जाएगा।।

  गाने को सुनते हुए बंसी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गयी,वहीं लेटे लेटे वो जाने कब सो गयी।।

   अगले दिन सुबह उठते ही सबसे पहले उसे याद आया रात राजा का मेसेज आने वाला था,पर रात जब तक वह जाग रही थी कोई मेसेज नही आया था,उसने लपक के फ़ोन उठाया फ़ोन बन्द पड़ा था….मेसेज देखने की हड़बड़ी में फोन चार्जिन्ग पे लगाना ही भूल गयी।।सुबह सुबह खुद पर ही गुस्सा आने लगा__
       पता नही क्या मेसेज करने वाला था,राजा को भी आजकल क्या हो गया है,क्या ज़रूरत थी ऐसे सस्पेंस क्रियेट करने की,अरे ना बोलता कि रात मेसेज करूंगा,सीधे मेसेज ही कर देता।।

” बंसी ! अरी का बड़बड़ा रही हो सुबह सुबह!! आज तुम नही उठी तो हम ही तुम्हारे लाने चाय बना लाये।।लो पी लो और तैयार हो जाओ,जिम नही जाना का??”

  ” हाँ जायेंगे ना अम्मा!! “

” दस बजे तक तो आ जाओगी ना,तुम्हें नाश्ता करा के फिर हमें गुड्डन के घर जाना है,दस दिन बाद उसका तिलक चढ़ना है,तो आज उसकी अम्मा बुलाई है,सारी तैयारी जोड़ने।।”

” हाँ दस तक तो आ जायेंगे, तुम चले जाना अम्मा  ,हम नाश्ता कर लेंगे, इतनी चिंता ना किया करो।”

  ” अरे काहे ना करे!! अब कुछ दिन में तुम भी बियाह कर चली जाओगी,फिर कहाँ तुम्हारी देखभाल कर पायेंगे,फिर ससुराल वाली हो जाओगी, उनकी मर्ज़ी से आना उनकी मर्ज़ी से जाना, फिर हमारे हाथ में का रहेगा।। अभी अपनी मन मर्ज़ी से तुम्हे खिला पिला तो सकते हैं ।”

” तुम तो ऐसे इमोशनल हो रही हो अम्मा जैसे कल ही हमारा ब्याह हुआ जा रहा??”

  ” सब सकुन साइत सही रहा तो एक महीना में तुम्हरा ब्याह भी हुये जायेगा,तुम्हरे पापा के दोस्त हैं ना वर्मा अंकल उन्होनें एक बहुत अच्छा लड़का बताया है,लड़का रेल्वे में नौकरी करता है,दू जन भाई हैं बस.. ये छोटा है,माँ बाप बड़के  के साथ गांव में रहते हैं ,और ये लड़का यहीं इसी सहर मे रहता है,हमरे लिये भी अच्छा रहेगा तुम यहीं के यहीं बिदा होगी तो।।”

   बाँसुरी सिर झुकाये बैठी चाय पीती रही,अभी इस मौके पे कुछ भी बोलने का उसका जी ना किया,बस बिना किसी कारण के मन खट्टा हो गया।।,उसे चुपचाप देख उसकी अम्मा नीचे गयी और एक फोटो लिये वापस आयी और उसके सामने रख दी…

    ” कैसा है?”

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   बांसुरी का इस बारे में बात करने का बिल्कुल मन नही था पर बात टालने के लिये उसने ” ठीक है” बोलकर पीछा छुड़ाना चाहा और वहाँ से उठ गयी।।उसके बाथरूम में घुसते ही प्रमिला के चेहरे पे हल्की सी मुस्कान दौड़ गयी और फोटो उठाये वो नीचे चली गयी।

             ************************

   इधर बाँसुरी से जाने कैसे राजा बोल तो गया कि मेसेज करेंगे पर रात में अपने कमरे में बैठे जाने कितनी बार हुआ कि राजा  ने मोबाइल उठाया और कुछ लिखा फिर डिलीट किया,फिर लिखा और मिटाया,,यही सिलसिला चल रहा था कि उसकी अम्मा ऊपर चली आयी।।

  ” अरे राजा तुम हियाँ बैठे हो,चलो नीचे तुम्हरी भौजी के बाऊजी आये हैं,रेखा के गमना पे विचार करने ।”

” रेखा के बिदाई से हमारा का लेना देना अम्मा?? हम का करेंगे बड़े बुजुर्गों के बीच??”

   ” तुमको कोनो सलाह मसवीरा के लिये नही बुला रहे,तुम जाओ भाग के पाड़े जी (पण्डित जी) को बुला लाओ।”

  बिल्कुल ही बिना मन के राजा उठा और नीचे उतर गया।
     पाड़े जी को सादर लेकर आया,उन्हें सम्मान पूर्वक घर की बैठक में बैठा कर लम्बे लम्बे डग अपने कमरे की तरफ बढा ही रहा था कि पीछे से बाऊजी ने आवाज़ लगायी __
  
    ” अरे राजा सुनो!! ज़रा चौक से सब के लिये कुल्हड़ वाली रबड़ी ले आओ,समधि जी को बड़ी पसंद है।”

   दिमाग के अन्दर एक ज़ोर का ज्वालामुखी फूटा ज़रूर पर गुस्से का लावा किसी को दिखा नही, चुपचाप अपने मन को समेट राजा वहाँ से जाने लगा तो भाभी के बाऊजी ने उसे आवाज़ लगायी __

   ” राजकुमार!! बेटा रुपये तो हमसे ले जाओ,भई खुशी राजी का मौका है,मुहँ तो मीठा हम ही करायेंगे ना।।”

  ” कैसन बात कर रहे समधि जी, रेखा का हमार बिटिया नही है,जाओ जाओ राजा ,तुम ले आओ।”

  हम रुपये देंगे,हम रुपये देंगे कर के  दोनो समधि उलझे ज़रूर रहे पर पूरे पन्द्रह मिनट भिड़ने के बाद भी किसी की अंटि से अधन्ना भी नही निकला, उन्हें बहस में उलझा छोड़ राजा अपनी बाईक उठा कर निकल लिया,और कुल्हड़ वाली रबड़ी के साथ साथ चौरसिया के यहाँ से बनारसी पान बीड़े का बंडल भी बंधवा लाया,क्योंकि कहीं ना कहीं वो समझ गया था कि इस गोष्ठी का समापन पान के साथ ही होगा।।

    सब कुछ सही हाथों में यानी अपनी अम्मा के हाथों में सौंप के जब राजा ऊपर अपने कमरे में पहुंचा तो देखा बड़े भैय्या उसके कमरे में अपने ब्याज के रुपैये के देयक लोगों की लिस्ट थामे राजा का ही इन्तजार कर रहे थे,उसे देखते ही उसके सामने हिसाब का बही खाता शुरु कर दिया,किसने कितना चुका दिया,किसने कुछ और समय की गुजारिश की ,सब कुछ बड़े भैय्या को समझा बुझा के संतुष्ट करने में लगभग डेढ़ घन्टे और बीत गये।।

” चलो फिर ठीक है,थोड़ा अपने लड़कों को भेज वसूली करा लेना टाईम पे,,हम अब जाते हैं रात बहुत हो गया है,तुम भी सो जाओ,हम देखे ज़रा ससुर जी का क्या व्यवस्था करना है।”

राजा ने हाँ में सिर हिला दिया,भैय्या के जाते ही समय देखा साढ़े ग्यारह हो चुके थे,फिर भी बड़ी आस से राजा ने मेसेज करने फ़ोन निकाला कि नीचे से बड़के भैय्या की आवाज़ आयी।।

” राजा गाड़ी निकालो ज़रा!! पापा जी अभी ही घर निकलने कह रहे,रुकने मना कर रहे,,चलो उन्हें छोड़ आते हैं ।।”

  ” आया भैय्या।”

      लक्ष्मण ने भी कभी राम को किसी काम के लिये मना किया है भला!!

           राजा को पता था कि भाभी का घर लगभग 45 किलोमीटर दूर था,आना जाना मिला कर डेढ़ दो घंटा तो लग ही जाना था,फिर भी बड़े भैय्या की आज्ञा शिरोधार्य कर दोनों भाई समधि जी को छोड़ने निकल गये।।
      वापस आने के बाद थकान से कब नींद लग गयी ध्यान ही नही रहा,सुबह नींद नही खुली और राजा जिम नही जा पाया।।

            ***********************

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    “पहले मैं समझा कुछ और वजह इन बातों की
    लेकिन अब जाना कहाँ नींद गयी मेरी रातों की
    जागती रहती हूँ मैं भी, चांद निकलता नही
    दिल तेरे बिन कहीं लगता नही,वक्त गुज़रता नही।    क्या यही प्यार है….. हाँ यही प्यार है।।”
  

    जिम में ट्रेड मिल पे चलते चलते बांसुरी को 20 मिनट हो गये,वो बार बार पलट कर दीवार घड़ी पे नज़र डाल लेती,समय गुज़रता जा रहा था,जिम की भीड़ बढ़ती ही जा रही थी,सब आ रहे थे बस एक वो ही नही था।।

     एक बार बंसी ऑफिस में भी झांक आयी,पर राजा वहाँ भी नही था,,कल शाम के बाद से कोई बात नही हुई थी,जाने कैसी बेचैनी थी जो रह रह कर गुस्से में बदलती जा रही थी।।
  
    ” क्या यही प्यार है” गीत को सुबह से जाने कितनी दफा प्रिंस से रिवाइंड करवा करवा के सुना जा रहा था,पर भीड़ बढ़ने के साथ ही बंसी ने गाने को वापस बजाने से मना कर दिया।।

  सिर्फ बीस मिनट में ही बंसी बेइंतिहा बोर होने लगी, और ट्रेड मिल से उतर कर ऑफिस रजिस्टर में अपने नाम के आगे साईन कर वहाँ से जाने लगी।।
       
    ” का हुआ बंसी ?? आज और कुछ नही करोगी का?? जल्दी निकल ले रही हो।।”

    ” हाँ प्रिंस!! तबीयत खराब लग रही,इसलिये आज मन नही कर रहा,घर जाकर आराम करेंगे।”
 
   बंसी दरवाजे तक पहुंची ही थी कि दरवाजा खोल राजा सामने खड़ा था।।

   ‘ ये बचपन का प्यार अगर खो जायेगा
     दिल कितना खाली खाली हो जायेगा
     तेरे ख़यालों से इसे आबाद करेंगे
     तुझे याद करेंगे जब हम जवां होंगे जाने कहाँ होंगे’

   गीत के बोल सुनने के साथ दोनो कुछ देर एक दूसरे को देखते रह गये।।

” कल मेसेज काहे नही किये।”

” काहे तुम रस्ता देख रही थी क्या??”

” हम !! तुम्हारे मेसेज का रास्ता देखेंगे,और कोई काम नही है क्या??”

” तो पूछी काहे?”

” ऐसे ही पूछ लिये भई ,कोई पाप हो गया क्या”

” नही नही,कोई पाप नही हुआ,तुम इत्ती जल्दी कहाँ चल दी,चाय तो पी लो।।”

” भैय्या जी बंसी का तबीयत खराब था,इसीसे घर जा रही बेचारी आराम करने।।आईये आपके लिये चाय तैय्यार है।”

राजा ने तबीयत की बात सुन बंसी को देखा और आंखों ही आंखों में हाल पूछा,बंसी ने भी सिर हिला के सब ठीक है कहा और राजा के पीछे पीछे ऑफिस में प्रवेश कर गयी।।

दोनो साथ साथ चाय पीते रहे….फिर राजा ने ही बात छेड़ी __

     “बंसी तुमको पता है ,जैसा तुम हमे सोचती हो ना हम वैसे सीधे सादे लड़के नही हैं ।।बहुत दुर्गुन हैं हममें ।।”

बाँसुरी राजा की बात सुन खिलखिला कर हँस पड़ी

” जैसे?? कोई एक आध दुर्गुण बताओ,हम भी तो जाने।।”

  राजा सिर नीचे किये थोड़ी देर अपना हाथ अपने बालों पे फिराता रहा फिर बड़ी हिम्मत जोड़ के बोलना शुरु किया__

    ” लोगों को डरा धमका के वसूली करते हैं,बड़के भैय्या के ब्याज के पैसों की।।और इस सब में कई बार गाली गलौच सब करना पड़ता है,जवान बुज़ुर्ग किसी को नही छोड़ते,हमारे लिये ब्याज की लिस्ट का एक एक आदमी हमारा दुसमन हो जाता है,।।
पढ़ाई लिखाई का हमारा हाल तो तुमको पता ही है,और इसके अलावा एक और बात है…..”

  ” बोलो राजा!! हम सुन रहे हैं ।”

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   ” हम जब स्कूल में थे ना तब एक लड़की हमे बहुत भा गयी थी,बहुते जादा,उस टाईम तो लगने लगा था उसके बिना जिंदा नही रह पायेंगे पर वो स्कूल बदल कर चली गयी,और हम यहीं रह गये……शायद हम अपनी स्कूल की जिंदगी छोड़ना ही नही चाहते थे इसिलिए फेल होते रहे और स्कूल में ही पड़े रहे,स्कूल में हर जगह उसकी यादें थी।। ,हमे तो अभी कुछ समय पहले तक यही लगता था कि हम अब भी उसिसे प्यार करते हैं,पर कुछ दिन पहले हमें समझ आ गया की वो बचपना था हमारा,,वो तो अपनी जिंदगी में बहुत आगे बढ़ चुकी है,और हमें भी बढ़ जाना चाहिये,तुम जानती हो हम तुम्हें ये सब क्यों बता रहे??”

बांसुरी ने बिना कुछ कहे ना में सिर हिला दिया

” क्योंकि हम चाहते हैं तुम्हारे हमारे बीच कोई बात छिपी ना रहे,तुम्हे सब मालूम होना चाहिये।।
    
        बाँसुरी तुम्हारी आदत सी पड़ गयी है हमें,तुम दो दिन भी जिम नही आती तो जिम ऐसा सुनसान लगने लगता है,जैसे कोई है ही नही यहाँ ।।हमें  पता है तुम्हारे घर वाले तुम्हारे लिये रिश्ता देख रहे,हमारे घर वाले भी!! हमने सोचा किसी अंजान से शादी करोगी उससे अच्छा है हमसे ही कर लो,हम तुम्हारी पढ़ाई लिखाई किसी चीज़ को नही रोकेंगे।।पर हम चाह रहे थे पहले हम अपनी अम्मा से तुम्हरे बारे में बात कर लें ।।
      अगर अम्मा हाँ बोल दी तो ठीक है वर्ना जैसे पहले दोस्त थे वैसे दोस्त ही बने रहेंगे,,क्या बुराई है इसमें ।।”

  बांसुरी अचरज से राजा का मुहँ देखती रह गयी,ये कैसा प्रपोसल था,अगर अम्मा हाँ बोली तो हाँ वर्ना फिर से दोस्त!!! एक बार एक दूसरे को अपने दिल की बताने के बाद क्या वापस पहले जैसी दोस्ती सम्भव है??

बांसुरी बिना कुछ कहे ही उठ गयी और ऑफिस से बाहर निकल गयी,राजा उसके पीछे भागता चला आया__
     ” क्या हुआ बांसुरी?? कोई बात बुरी लगी क्या??हम कुछ गलत बोल गये क्या??”

  ” नही राजा!! तुम्हारी भावनाओं की कद्र करते हैं,तुम बात कर लो अम्मा जी से,क्या बोलती हैं बताना!! हम आज रात तुम्हारे मेसेज का इन्तजार करेंगे।।आज भूलना मत मेसेज ज़रूर करना ।”

” अरे हम तो कल भी नही भूले थे,वो तो घर वाले एक के बाद एक काम पकड़ाते चले गये कि समय ही नही मिला,पर सुनो आज हम अम्मा से बात कर ही लेंगे।।”

दोनों बात कर ही रहे थे कि भैय्या जी का मोबाइल थामे प्रिंस दौडता चला आया__

” भैय्या जी रेखा दीदी का फोन आ रहा है।”

” हेलो!! हाँ रेखा,हाँ साथ ही है,हाँ बोल देंगे,अच्छा लो तुम्ही बोल दो।”

राजा ने फोन बांसुरी को पकड़ा दिया,लगभग पांच मिनट की बातचीत के बाद बांसुरी ने फोन वापस कर दिया__

  ” कल रेखा की बिदाई है,उसीके लिये बुला रही है।”

” तो चलो ना हम सब भी तो जायेंगे कल,तुम भी हमारे ही साथ चलो।”

” और अम्मा जी??” बांसुरी के सवाल पर राजा मुस्कुरा दिया__

” अम्मा तो जायेंगी ही,भई अब तुम्हें रहना तो उन्हीं के साथ है।”

” ओहो हीरो जी इतना उड़िये मत!! अभी उन्होनें हाँ नही की है,,अगर उनकी ना हुई तो हम पहले जैसे सिर्फ दोस्त ही रह जायेंगे,इसलिये थोड़ा जज्बात पे काबू रखिये।।”

   मुस्कुराती हुई बांसुरी घर चली गयी,राजा जिम की ओर पलटा तो प्रिंस खड़े खड़े मुस्कुरा रहा था और प्रेम हाथ बांधे खड़े राजा को घूर रहा था।।

  दोनो से नज़र बचाते हुए राजा अन्दर ऑफिस में चला गया,,कुछ ज़रूरी काम निपटाने के बाद बांसुरी को ” घर पहुंच गयी या नही?” का मेसेज किया और जैसे ही उधर से जवाब आया,एक नया सवाल भेज दिया……दोपहर हुई फिर शाम ढली और रात हो गयी पर राजा और बाँसुरी के सन्देशों का अथक आदान प्रदान चलता रहा।।

    जब एक बार किसी रिश्ते को प्यार की राह में कुछ आगे बढ़ा दिया जाये तब वो वापस दोस्ती के चौक पर पुन: वापसी नही कर पाता,,इस बात से अंजान दोनो नये नवेले प्रेमी शाम भर और फिर रात भर अपनी ही बातों में खोये रहे।।
     बचपन की बातें,घर परिवार की बातें,दोस्तों की बातें,अम्मा ,बड़के भैय्या,रूपा भाभी,वीणा जिज्जी, बुआ जी,पापा का ऑफिस, पिंकी की पढ़ाई, रतन का किस्सा ,निरमा और प्रेम की बातें …..उफ्फ कितनी सारी बातें थी दोनो के बीच।।रात में एक मौका ऐसा भी आया जब दोनों को ही फ़ोन को चार्जींग में लगाये लगाये ही बात करना पड़ा …..
    पर वो रात गुजरते गुजरते दोनो को एक नयी सुबह दे गयी।।

   दोनो में कितना कम सम सा था,और कितनी अधिक थी विषमताएं!! पर फिर भी एक वस्तु थी जो दोनों के पास लगभग बराबर थी!! एक दूसरे के लिये अपार प्रेम और असीम सम्मान!!उस एक कच्चे धागे ने ऐसी मजबूती से दोनों को बान्ध लिया कि अब हर स्वतंत्रता पे ये बंधन भारी पड़ गया।।

             **********************

  ” अब तक सोये पड़े हो लल्ला!! उठो राजू !! देखो समधि जी के घर जाना है आज रेखा का बिदाई है ना,उठो उठो बेटा आठ बज गया है,लो चाय पियो और जल्दी से तैयार हो जाओ।”

    भोर में चार बजे तो प्रेमी जोड़ा थक कर सोया था,आठ बजे अम्मा की आवाज़ सुनते ही राजा उठ बैठा।।आज सुबह भी अलग ही रंग में रंगी थी, मुस्कुरा के अम्मा के गले में बाहें डाले झुलते हुए राजा कुछ गुनगुनाने लगा।।

” बस बस ,लड़ियाओ नही,जाओ बिटवा नहा धो लो।”

” अम्मा तुमसे एक बात पूछनी थी।”

” हां पूछ लेना बाद में,हम जा रहे अभी तैयारी देखने।।” राजा की बात पूरी सुने बिना ही माता जी काम निपटाने भागती चली गयी।।

  नौ बजे तीन तीन गाड़ियों पे सवार अवस्थी परिवार समधियाने की ओर निकल पड़ा, राजा ने पहले ही रूपा को रेखा द्वारा बांसुरी को बुलाये जाने के बारे में बता दिया था,और रूपा को बांसुरी को अपने साथ बैठाने के लिये मना भी लिया था,अपनी गाड़ी में बांसुरी के लिये एक सीट रिसर्व रखे राजा ड्राईविंग सीट पर बैठा खुश था कि अम्मा जी बड़ी सी मिठाई की टोकरी संभाले राजा की गाड़ी के निकट चली आयी ।।

  ” खोलो दरवाजा,,ए राजा ,सुन नही रहे का।’

” अम्मा तुम इसमें बैठोगी क्या?? तुम उसमें भैय्या के साथ बैठ जाओ,बाऊजी भी उसिमे हैं।”

” हाँ पता है तुम्हरे बाऊजी उसमें बैठे हैं तभी तो तुम्हारी गाड़ी में आ गये,खाली तो है एक सीट ।”

  ” अरे अम्मा जी वो बांसुरी है ना लल्ला जी की सहेली वो भी जायेंगी हमारे साथ!! उन्ही के लिये लल्ला जी ….

” अरे बाँसुरी के लिये कब बोले हम भाभी,आप भी कुछ भी बोलती हैं,आओ बैठो अम्मा!! बाँसुरी पीछे भाभी के साथ बैठ जायेगी।।”

  तभी युवराज राजा की गाड़ी के पास चला आया__
” कोई परेशानी छोटे?? क्या बाँसुरी को भी लेना है क्या?? तो ऐसा करो ये रधिया और श्यामा को हम अपनी गाड़ी में ले लेते हैं,चलो तुम दोनो वो फल फुल की टोकरी में उठा के हमारी इनोवा में आ जाओ।”

  एक बार फिर  बड़के भैय्या  अपने लाड़ले छोटे भाई के लिये संकटमोचन बन अवतरित हुए और उसकी उलझन को निपटा चलते बने।।

   बांसुरी के घर के आगे अपनी गाड़ी रोके राजा ने बंसी को फ़ोन लगाया ही था कि प्रमिला दरवाजा खोले बाहर चली आयी,सबको सादर अभिवादन कर उसने बड़े प्रेम से राजा की अम्मा को प्यारा सा उलाहना दिया__
        ” बाहरे से चल देंगी जिज्जी,भीतर नही आयेंगी, सुदामा की  कुटिया में भी जरा चरण फिरा दीजिये।।”

   प्रमिला के स्वभाव में ही मिसरी घुली थी,इससे अंजान सुशीला को यही लगा कि ये अस्वाभाविक माधुर्य सिर्फ और सिर्फ उसके सजीले बेटे को फांसने के लिये ही है,इसिलिए उसने अपने चेहरे को यथासम्भव कठोर दिखाते हुए कड़े शब्दों मे अपनी व्यस्तता की दुहाई दे डाली__

   ” ऐसे जगह जगह रुकते रहे तो बडी अबेर हो जायेगी,आप जल्दी से लड़की को भेजिए,फिर हम निकले।”

  ” चाय पी लेती जिज्जी , बस 5 मिनट ही लगेगा।”

  प्रमिला की विनम्रता सुशीला के तन बदन को सुलगा रही थी

” नही ! अभी तो हो ही नही सकता।” इतने में बांसुरी आसमानी रंग के लहन्गे में सजी संवरी चली आयी, उसे देखते ही राजा के चेहरे पे लजीली मुस्कान चली आयी,होंठों की नाचती कोर अम्मा से कैसे छिपी रह सकती थी,आते ही बांसुरी ने सुशीला को प्रणाम किया __
” हाँ! बस बस!! खुस रहो,,पीछे बैठ जाओ।।

   एक दूसरे में खोये ताज़े ताज़े प्रेमियों को ये रुखाई नज़र नही आयी पर पीछे कोई और भी थी जिसे ये सारा सब कुछ समझ आने लगा था और जो भविष्य में घर में छिड़ने वाले महायुद्ध की प्रस्तावना को मन ही मन तैयार कर आनंदित हो रही थी।।

” हियाँ आ जाओ बंसी !! हमारे पास।” रूपा की चाशनी  पे सास की जलती हुई नज़र भी कडवाहट ना ला पाई

  बांसुरी ने आंखों ही आंखों में राजा से इजाज़त ली, राजा ने पलकें झपका कर इजाज़त दी और बांसुरी पीछे चली गयी…..कुछ देर पहले का पुत्र की बगल वाली सीट पर विराजमान होने का मातृ विजय गर्व चकनाचूर हो गया।।

    इत्ता सुन्दर गोरा चिट्टा सजीला सा लड़का!!!
  कुछ सोच समझ कर ही सुशीला ने अपने दोनों लाड़लों का नाम रखा था,दोनो ही तो दिखने सुनने में राजा राजकुमार ही लगते थे….जैसे उंचे पूरे वैसा ही गठीला कसरती बदन,उसपे बिल्कुल पिघले हुए सोने सा लपटें मारता रंग…..राजा को इस सांवली सी बित्ते भर की लड़की में क्या भा गया ऐसा,ठीक है बामण घर की छोकरी है,पर है तो सरजूपारीन, राजा के बाबूजी कभी ना मानेंगे,कहाँ हम कानपुरिया बीस बीसवां कान्यकुब्ज बामण और कहाँ ये लड़कोरि।।
  किसी भी कीमत पर अपने लल्ला को इस बिदेसिनी से बचाना ही पड़ेगा।।

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    सुशीला अपनी सोच में मगन थी,,राजा ने गाड़ी में गाने बजा दिये….

   ” जब से तुम्हारे नाम की मिसरी होंठ लगायी है
      मीठा सा गम है और मीठी सी तन्हाई है….
      रोज़ रोज़ आंखो तले एक ही सपना चले…”

    गाड़ी अपनी गति से गन्तव्य की ओर बढ़ती चली गयी।।।

क्रमशः

aparna..

समिधा-28

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      ससुराल में पारो का समय कैसे बीत रहा था उसे खुद ख्याल नही था। इसी बीच एक बार लाली भी उससे मिलने आई। लाली पेट से थी और इसी कारण उसे पहले आने नही दिया गया था।
   मांग भर लाल सिंदूर हाथ में शाखा पोला पहनी लाली पारो को अति सौभाग्यशाली दिख रही थी। उसके सामने पारो अपनी किस्मत का रोना लेकर नही बैठना चाहती थी। इसलिए उसे अपने कमरे में बैठा कर उसके लिए वो मुस्कुराती उसके सामने बैठ गयी। कुछ देर इधर उधर की बातों के बाद आनन्दी उन दोनों के लिये कुछ खाने पीने का सामना लिए ऊपर ही चली आयीं।
   बहुत दिनों बाद पारो के चेहरे पर मुस्कान आई थी , लाली को देख कर।
  जाने क्यों उसे लाली में देव नज़र आ रहा था। देव अपनी भतीजी पर जान भी तो छिड़कता था।।
  लाली भी पारो से मिल कर प्रसन्न थी, उसे पारो में उसके देव काका दिखाई दे रहे थे…-” पारो एक बात पूछूं”

” हाँ पूछ ना? “

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” तुम वापस पढ़ाई क्यों नही शुरू कर देती? “

पारो अनमनी सी लाली को देखने लगी..-” अपने घर के रीति रिवाजों से तो परीचित हो भली तरह। जब तक देव बाबू थे फिर भी किसी तरह सम्भव था लेकिन अब पारो का पढना एक तरह से असंभव है!”
   जवाब आनन्दी ने दिया । जवाब कड़वा ज़रूर था पर सत्य था। घर में पहले भी देव ने चोरी छिपे ही पारो को पढ़ने में मदद की थी और अब उसके जाने के बाद पारो में भी वो उत्साह कम दिख रहा था।

” आप कह तो सहीं रहीं हैं बऊ दी , लेकिन पढेंगी लिखेगी तो मन लगा रहेगा। वरना करेगी क्या दिन भर?”..

  लाली की बात सुन पारो की आंखों में पानी भर आया। आनन्दी भी पारो को देख दुख में डूब गई। तीनों औरतें कुछ पलों को चुप रह गईं की क्या किया जाए क्या नही… उसी वक्त कहीं से घूम घाम कर लौटा दर्शन भी ऊपर ही चला आया…-” ये लो दर्शन चला आया। सुन तू ही पारो की मदद क्यों नही कर देता पढ़ने लिखने में। थोड़ा उसका भी मन लगा रहेगा।”

” तो मैंने कब मना किया ? बऊ दी जब चाहें पढ़ लें। मैं इन्हें पढ़ाने में पूरी मदद कर दूंगा।”

“पर मदद सबसे छिप कर करनी होगी दर्शन बाबू। अगर घर भर को पता चल गया तो एक और नई मुसीबत हो जाएगी।”
  आनन्दी की बात पर दर्शन ने भी हामी भर दी….
पारो का अब किसी काम में मन नही लगता था। न रसोई में न पढ़ाई में। उसे अब सारा सारा दिन देव के बारे में सोचना ही बस भाता था। खिड़की की बल्लियां पकड़े खड़े वो देव में खोई रहती।
  पर घर की बाकी औरतों को ये कैसे सहन होता। आखिर उनके भी अपने दुख थे। तो अकेली पारो को ही गमगीन रहने का अवसर क्यों मिले भला? जब बेटा खो कर भी माँ कामधाम में लगी है?
  आखिर देव की माँ ने पारो को भी गृहस्थी के जंजाल में वापस बुला लिया। अब सुबह उठ कर आंगन को पानी से धो कर पारो घर भर के लिए चाय चढ़ा कर फिर नहाने चली जाती। नहा कर आने के बाद ठाकुर माँ  के पूजा पाठ का सरंजाम जुटाने के बाद एक बार फिर रसोई बनाने में डूब जाती। दोपहर सबके खाने पीने के बाद ही उसे छुट्टी मिलती। तब कुछ देर को अपने कमरे में आराम करने का मौका उसे मिल पाता। हालांकि दोपहर सोने की आदत न होने से वो दर्शन की दी हुई किताबें पढ़ने लगती।
  अक्सर किताब के सबसे रस भरे अध्याय में डूबी होती कि नीचे से शाम की चाय बना लेने की पुकार चली आती और वो अपनी किताब बंद कर नीचे भाग जाती।
  वो इतना काम करते हुए भी नही थकती क्योंकि अब उसे देव की माँ में अपनी सास कम और देव की माँ का अंश अधिक नज़र आने लगा था। अब उसे उस सारे घर से प्यार हो गया था। वो प्यार जिसका अधिकारी जा चुका था उसके उस अधिकार को उसके प्यार को अब पारो उसके घर और सम्बन्धों पर लुटा देना चाहती थी। वैसे भी अब इसके अलावा उसके जीवन में और बचा क्या था?
   देव के बाबा का अब वो और ज्यादा खयाल रखती। बिल्कुल जैसे वो सुबह नाश्ते के बाद और रात खाने के बाद कि गोलियां उन्हें निकाल कर दिया करता वैसे ही वो गोलियां निकाल उनकी टेबल पर पानी के गिलास के साथ रख आती।
   और वो धीमे से अपने चश्मे पर चढ़ आई भाप को चुपके से साफ कर लेते।
  ठाकुर माँ को शाम में बैठ कर सुखसागर पढ़ कर सुनाती बिल्कुल जैसे वो सुनाया करता था। माँ की कही हर बात वैसे ही जी जान से लग कर पूरा करती जैसे वो किया करता था लेकिन बस एक ही जगह वो चूक जाती…
   जहाँ खुद से प्यार करने की बारी आती वो लाचारगी से खिड़की पर खड़ी खुद पर तरस खा कर रह जाती। उसे तो वो टूट कर चाहता था, उसका प्यार जब तब वो महसूस कर पाती थी लेकिन न कभी उसने खुल कर कहा और न पारो ने ही उससे खुल कर कहने कहा लेकिन समझते तो दोनो ही थे।
  कितनी कोमलता थी देव के प्यार में। उसे छूता भी ऐसे था कि कहीं वो मैली न हो जाये और आज उसे इस अनजान सी दुनिया में अनछुआ अकेला तड़पता छोड़ गया था।
अब जब उसे शादी प्यार पति पत्नी के सम्बन्धो के बारे में थोड़ा बहुत मालूम चलने लगा तब वो ही चला गया।
  यही सोचती कभी कभी वो एकदम गुमसुम रह जाती तो कभी रोते रोते उसकी हिचकियाँ बंध जाती।
    लेकिन अब उसे सासु माँ अधिकतर समय काम में भिड़ाये रखती जिससे वो सुकून से कमरे में बैठ रो भी नही पाती थी।
  ऐसे ही एक शाम वो अपनी खिड़की पर खड़ी बाहर डूबते सूरज को देख रही थी कि उसकी सास और बड़ी बुआ अंदर चली आयी…-” क्या देख रही है पारो? “वो चौन्क कर मुड़ी और माँ के साथ बड़ी माँ और बुआ को भी आया देख चुप खड़ी रह गयी।
“दिन भर ऊपर अकेली पड़ी पड़ी उकता नही जाती हो? नीचे चली आया करो। हम सब के साथ बैठोगी तो अच्छा लगेगा न। “
  हाँ में सिर हिला कर वो ज़मीन पर अपने पैर के अंगूठे से गुणा भाग के चिह्न बनाती रही।
  वो तीनों एक साथ उसके कमरे में क्या सचमुच उसकी चिंता में ही चली आयीं थीं ? पारो सोच नही पा रही थी। पर जाने क्यों आज इतने दिनों में पहली बार उसे उसकी सास के चेहरे पर खुद के लिए एक अलग सी ममता दिखी थी। फिर भी वो उस वक्त उनके भावों का अर्थ नही जान पायी…
   बड़ी बुआ ने बोलना जारी रखा…-”  बेटा पारो ! तुझे ऐसे अकेले ऊपर अब छोड़ा नही जाता। वैसे भी इतने बड़े कमरे में अकेले घबराहट सी होती होगी न। ऐसा करना अपना सामान कल नीचे ठाकुर माँ के कमरे में रख लेना।
   उनका कमरा बड़ा भी बहुत है। उसी में एक ओर तेरे लिए खाट भी पड़ जाएगी, और तेरी ठाकुर माँ के साथ रहने पर तुझे अकेले डर भी न लगेगा।”
  पारो का जी किया कि चिल्ला के कह दे कि मुझे अभी भी किसी से डर नही लगता। और मैं ये कमरा छोड़ कही नही जाऊंगी। लेकिन देव जाते जाते उसकी ज़बान उसकी बोली भी अपने साथ ले गया था।
  वो चुप खड़ी रही।

” क्यों बऊ दी मैं गलत कह रही हूँ क्या? इतने बड़े पलंग का और इतने बड़े कमरे का अब इसे क्या काम?वैसे भी अब इसे पलंग पर नही खाट पर सोना चाहिए। पुराने लोग तो ज़मीन पर सोने कहते थे, पर चलो हम लोग वैसे पुराने खयालों वाले नही हैं। दूसरी बात यह नीचे माँ के साथ रहेगी तो उन्हें भी आसरा हो जाएगा। रात बरात कभी पानी पीना है कभी बाथरूम जाना है आखिर कोई तो साथ रहेगा। और फिर बऊ दी तुम्हें माँ के लिए नर्स रखने की भी ज़रूरत न होगी। अरे जब घर की बहु नहला धुला सकती है तो इसी काम के लिए पैसे बहाने की क्या ज़रूरत?”

पारो ने बड़ी मुश्किल से आँख उठा कर अपनी सास को देखा उन्होंने उससे नज़रे चुरा लीं। पारो समझ गयी देव के न रहने पर शोक जताने आयी बड़ी बुआ इसी घर में अपना पक्का आवास बनाना चाह रहीं थीं। एक ही लड़का था उनका, जो पढ़ लिख नही पाया था। वो पहले भी एक बार देव से उसे अपने साथ काम सिखाने कह चुकी थी लेकिन अब तो लग रहा था वो उसे देव की दुकान पर ही बैठाने के मंसूबे लिए आयीं थीं। क्योंकि सारे काज निपटने के बाद जब उनके पतिदेव ने उनसे भी वापस चलने की बात कही तो उन्होंने कुछ दिन बाद आने की बात कह कर उन्हें अकेले ही भेज दिया था। उनके पति पोस्टमास्टर रह कर रिटायर हुए थे इसी से कुछ खास आमद थी नही पर मायके की सम्पन्नता उनकी आंखें चौन्धिया जाती थी।

  जबसे वो यहाँ आई थी कोई न कोई तिकतिक लगाये ही रहतीं। कभी उन्हें माछ में सरसों की झाल कम लगती तो कभी मिष्टी दोई में मीठा। कुल मिलाकर वो किसी से संतुष्ट नही थीं। पारो से तो कतई नही।
  अब आज वो एक तरह से पारो का कमरा हथियाने चली आयी थीं। पारो ने एक नज़र सासु माँ पर डाली उनके चेहरे पर कष्ट की हल्की सी छाया आकर गुज़र गयी, अपनी भावनाओं पर अपने गुस्से को जबरदस्ती लादती वो भी अपनी ननंद के सुरों में सुर मिलाने लगी…-“ठीक ही तो कह रहीं है दीदी। तुम इतने बड़े कमरे में घबराओगी ही,इससे अच्छा है वहीं नीचे रहोगी तो माँ को वक्त पर कुछ ज़रूरत हो तो तुम कर सकोगी। वैसे भी अब तुम्हारे जीवन में और बचा ही क्या है? “

  ” ऐसा क्यों बोल रहीं है काकी माँ! उसका पूरा जीवन बचा है और जीवन से अनमोल क्या है भला? वो भी अपने जीवन को किसी सुंदर और सार्थक कार्य में लगा सकती है। अपने जीवन को एक सुंदर आकार दे सकती हैं। आखिर भगवान ने तो हमें अकेला ही पैदा किया है,रिश्ते नाते तो हम जोड़ते चले जातें हैं। और फिर उन्हीं नातों में अपना जीवन ढूंढने लगते हैं ये सोचे बिना की उस ऊपर वाले ने हमें क्यों पैदा किया…”


  
    आनन्दी अपनी लय में बोलती चली जा रही थी, की उसकी सास ने उसे टोक दिया…-“तुम्हारे जितना दिमाग हम लोगों के पास तो है नही बऊ माँ! कनकलता दीदी घर पर सबसे बड़ी हैं, ये अपना घर छोड़ हमारे यहाँ दुख के समय में खड़ी हैं, हम सब के साथ। इनका सम्मान करना भी हमारा ही धर्म है। नीचे उनके लिए अलग से कोई कमरा नही है। माँ और बेटा दो लोग हैं। इस इतने बड़े कमरे में आराम से रह सकतें हैं। पारो का क्या है कुछ दिन ठाकुर माँ के कमरे में रह जायेगी तो क्या बिगड़ जायेगा। नीचे हम सब भी तो साथ होंगे।
   और फिर दीदी के जाने के बाद तो कमरा देव का ही है, पारो को मिल ही जायेगा।”

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  अपनी सास के सामने आनन्दी कम ही बोलती थी, लेकिन आज उसका धैर्य चूक गया था। उसे बुआ जी के वहाँ रहने से कोई परेशानी नही थी, लेकिन उनका बात-बात पर घर परिवार के मामले में दखल देना उसे अखर जाता था।
   पर अब सासु माँ की तीखी आँखों के चाबुक ने उसे एक किनारे चुप खड़ा रहने की ताकीद कर दी थी। वो चुप खड़ी पारो को देख रही थी…-” जी ठीक है, मैं रात तक अपनी जरूरत का सामना लेकर नीचे चली जाऊंगी। ” पारो ने कह तो दिया लेकिन वो उन सब से और क्या कहती कि जब वो अपनी सास तक में अपने पति को देख पा रही थी तो इस कमरे में तो कितनी अनगिनत यादें गुंथी पड़ी थी। इसी खिड़की की बल्लियों पर उसके हाथों के निशान थे, जिन्हें पकड़ कर खड़ी वो यही महसूस करती की उसका हाथ देव के हाथों पर हैं। जिस तकिए पर वो सिर रखता था, जिस चादर को वो ओढता था, जिस तौलिए को काम में लाता था, वो सारी अनमोल धरोहरों को साथ ले पारो नीचे चली गयी। ठाकुर माँ के कमरे में एक ओर उसके लिए एक पुरानी चारपाई डाल दी गयी।
   उसमें एक पतले से रुई के गद्दे पर तकिया डाले जब वो रात में लेटी तो उसकी आंखें झर झर बहने लगीं… कहाँ देव के सामने वो अकेले उस हिंडोले से पलंग पर अकेली सोती थी। उन रेशमी चादरों मखमली तकियों के बाद आज ये पतला गद्दा उतना नही चुभ रहा था जितना देव का ऐसे चला जाना।
   किसी एक व्यक्ति के चले जाने से संसार कैसा वीरान और सूना हो जाता है, पारो महसूस कर रही थी। और सोचते सोचते अचानक एक बात उसके दिमाग में आई की क्या अगर वो देव की जगह मर जाती तो देव का जीवन भी ऐसा ही कठिन हो जाता? या उसके जीवन में कुछ और तरह की बातें होतीं।
  सभी तरह की बातें सोचती वो सो गई।
       रात उसे ऐसा लगा जैसे देव की उंगलियां उस पर चल रहीं हैं। चेहरे पर से फिसलती उंगलियां गले से नीचे उतरने को थीं कि नींद में भी उसे याद आ गया कि देव तो अब है नही फिर ये कौन था। वो चौन्क कर उठ बैठी। खिड़की पर कुछ सरसराहट सी हुई और सब कुछ एकदम शांत हो गया।
  उसकी खाट खिड़की से लगी हुई थी, उसने बैठे बैठे ही बाहर झांक कर देखा, बाहर कोई नज़र नही आया। तब क्या वो सच में सपने में देव को ही महसूस कर रही थी, या फिर खिड़की से किसी ने अपना हाथ अंदर डाल रखा था?
  पर कौन हो सकता था वहाँ इस वक्त? उसके बदन में एक झुरझुरी सी दौड़ गयी… उसके बाद वो रात उसकी आँखों ही आंखों में कट गई…रात बीत गयी, सुबह हो गयी लेकिन वो रात की बात किसी से कह न सकी।

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   दिन बीत रहे थे। लाली भी कुछ दिन मायके रह कर वापस चली गयी थी। अब घर भर में दो ही लोग थे जिन्हें पारो की चिंता थी, एक आनन्दी और दूसरी ठाकुर माँ। उन्हें हमेशा पारो को देख कर यही लगता कि उसकी इस हालत की ज़िम्मेदार वो खुद हैं। ना वो देव को अपने साथ लेकर जाती और न देव के साथ ये हादसा होता।
   पर घर भर की सबसे बुज़ुर्ग होने पर भी कई बातों में उनकी भी नही चलती थी। जो नियम थे वो तो थे ही।
   आनन्दी ने दर्शन से कह कर पारो को पढ़ने के लिए किताबें दिलवानी शुरू कर दी थीं। अब दोपहर में पारो ठाकुर माँ के कमरे में एक किनारे बैठी किताबें पढ़ती रहती।
   और कभी जब दर्शन उससे किसी पढ़े गए पद की व्याख्या पूछता या उसे गलत बताता तो वो उसे सहीं कर देती।
  एक शाम वो बाहर से आते हुए ढेर सारे अमरूद ले आया। नीचे आंगन में बैठी पारो कोई काम कर रही थी कि पीछे से आकर उसने उसकी झोली में अमरूद डाल दिए। चौन्क कर दर्शन को देख पारो मुस्कुरा उठी। उसके मन के अंदर कहीं छिपी बैठी लड़की मुस्कुरा उठी। वो सारे अमरूद समेट कर रसोई की तरफ जाने लगी…-” अरे कहाँ चल दीं सारे अमरूद समेट कर? क्या हम लोगों को एक भी न दोगी? “
  दर्शन के सवाल पर वो पलट कर थम गई…-“सारे ही तुम्हारे हैं। मैं तो अंदर धोने लेकर जा रही थी। “
   ” मैं क्या जानूं? मुझे तो लगा तुम अकेली ही खा लोगी!”
   ” इतनी भुक्खड़ लगती हूँ तुम्हें”  हँस कर उसे घूरती पारो आगे बढ़ने लगी कि उसके सिर पर पीछे से एक टपली मार दर्शन सीढ़ियों पर भागता हुआ चढ़ गया, और उसकी टपली का जवाब देने आँचल से सारे अमरूद फेंक कर पारो उसके पीछे दौड़ पड़ी। बड़े दिनों बाद पारो ने जतन से जिस बावली सी लड़की को अपने भीतर छिपा रखा था बाहर आ गयी।
  ” अरे सम्भल के ! फिसल न जाना तुम दोनों। ” आनन्दी दोनो की चुलहबाज़ी देखती मुस्कुराती हुई अपने आँचल से अपना हाथ पोंछती रसोई में चली गयी, और उसकी बात पर वहीं आंगन में बैठी बुआ जी ज़हर बुझा तीर छोड़ गई…-” समय रहते इन्हें न रोका तो फिसल ही तो जाएंगे। “
   वही बैठ कर चांवल चुनती पारो की सास का जी धक से रह गया, उन्होंने साथ बैठी अपनी जेठानी की ओर देखा, उनकी अनुभवी आंखों में भी चिंता की रेखाएं नज़र आने लगीं थीं…..

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क्रमशः

aparna…..

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दिल से …..

     समाज के कायदे कौन बनाता है? कौन हैं वो समाज के ठेकेदार जिन्होंने औरतों के लिए अलग और मर्दों के लिए अलग नियम बना रखें हैं।
  हम कितना भी लिख पढ़ जाएं , कितने भी आगे निकल जाएं लेकिन अब भी बिना पति के एक औरत का जीवन उतना सुगम और सहज नही हो पाया है। दुर्भाग्यवश अगर जीवनसाथी बिछड़ जाएं या अलग हो जाएं तो इसमें किसी का कोई दोष तो नही फिर क्यों उसके साथ ऐसा सुलूक किया जाता है कि उसका दुख कम होने की जगह और बढ़ता चला जाता है।


   काश लोग फ़िज़ूल नियमों की जगह एक ही नियम प्रेम का नियम मान लें तो किसी का दुख समाप्त भले न कर सकें कुछ हद तक कम तो ज़रूर कर पाएंगे।
  
     आगे के भाग हो सकता है पढ़ने में थोड़े और तकलीफदेह हों लेकिन अगर कृष्ण दुख देते हैं तो उससे उबारने वाले भी वहीं हैं।

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  आपका सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ। आप मुझे पढ़ते हैं सराहतें हैं, दिल से शुक्रिया नवाज़िश!!!

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aparna…


 

शादी.कॉम -12

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   “पहला पहला प्यार है,,पहली पहली बार है,
     जान के भी अनजाना कैसा मेरा यार है।।”

” अबे कौन बजाया बे! बदलो ई पहला पहला प्यार को!!”

” तो का लगायें भैय्या जी।” राजा की दहाड़ सुनते ही प्रिंस लपक पड़ा ।।जिम में लोगों का आवागमन शुरु हो चुका था,ऐसे में प्रिंस वर्कआउट के लिये गाने सेलेक्ट कर रहा था।।

” अब ये भी हमी बताएँ!! तुम्हारी अकल में ना बिल्कुले पत्थर पड़े हैं प्रिंस।।यार कैसे बनिये हो तुम ,, हमरी अम्मा तो कहती हैं बनियों से जादा दिमाग किसी के पास नई होता,,पर तुम तो बिल्कुल बमपिलाट हो।।”

  प्रिंस सदा से बाँसुरी का तरफदार था,इसिलिए आजकल प्रिंस और प्रेम में  ज़रा तनातनी रहने लगी थी।।राजा भैय्या की बात सुन प्रेम चहक उठा __

” भैय्या जी आप हम ठहरे बामण के छोकरे,हमारा तो जन्म ही होता है अपने बाप की चप्पल से पिटने के लिये।।
     ऑफ़िस में बाऊजी को उनका बॉस चमकाया आके हमको धुन देंगे,,गांव में पड़ोसी से जमीन का चिल्ला चिल्ली हुआ आके हमको सून्त देंगे,घर में बहन की शादी नही लग रही पिटाई हमारी होगी,और तो और अम्मा ने लौकी बना दी तब भी हमी धरे जातें  हैं ।।।
    ई तो पुन्यात्मा हैं बनिया घर में पैदा हुआ है, जैसें इनके बाप दादा सोना सहलाते हैं,ऐसे ही फूल की छड़ी से अपना लड़का बच्चा को भी सुधारते हैं, तो भैय्या जी इनको किसी का डर है ये नई,काहे दिमाग दौड़ाएंगे।।”

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” अच्छा बे तुमको बहुत बड़ी बड़ी बात सूझ रही हैं,, देख रहें हैं आजकल कुछ ज्यादा ही टर्रा रये हो।”

प्रिंस राजा की घुड़की सुन चुपचाप वहाँ से सटक लिया,।। उसे असल में भैय्या जी के दिल का हाल मालूम नही था,उसने जाकर दूसरा रोमैंटिक ट्रैक बजा दिया__
             ‘ सदियाँ समा गईं इस एक पल में,दिखने लगा सुकून दुनिया की हलचल में ….’

  तभी हल्के से दरवाजा खुला,हमेशा सलवार और कुर्ती पे चोटी बना के आने वाली बांसुरी के सुर आज कुछ बदले से थे।।
     ट्रैक पैंट पे टी शर्ट पहनी बांसुरी ने खुले बालों की उँची सी पोनीटेल बना रखी थी।।

   बांसुरी के प्रवेश करते ही सब उसकी तरफ देखने लगे…राजा भैय्या ने सिर्फ एक उड़ती नज़र डाली और वापस अपने रजिस्टर में मिलाए हुए नामों को वापस मिलाने लगे।।प्रिंस बांसुरी के इस परिवर्तन पे अति प्रसन्न हुआ और उसे बधाई देने कूद कर उस तक पहुंच गया,थोड़ी देर के लिये प्रेम भी चकरा गया।।

” वाह बंसी तुम तो बहुत-बहुत बहुत इस्मार्ट लग रही हो,।”
  बाँसुरी मुस्कुरा कर राजा की तरफ देखने लगी,इस उम्मीद से कि राजा भी शायद उसके नवेले रूप पे कोई टिप्पणी देगा,पर राजा ने सर उठा कर भी नही देखा।।बांसुरी चुपचाप अपने ट्रेड मिल पे चली गई ।
    लगभग 10 मिनट बीत जाने पर भी जब राजा एक बार भी बांसुरी का हाल चाल पूछने नही आया तो बांसुरी ने वहीं से हांक लगाई__
     ” आज क्या स्पीड रखना है हमें,,कुछ बताओगे भी या ऐसे ही बस भागते रहें ।”

  6km/hrs पे आकर राजा ने ट्रेड मिल सेट किया और वापस जाने लगा।।उसे ऐसे वापस जाते देख बांसुरी ने प्रिंस से इशारे से पूछा कि ‘ आज क्या हो गया राजा को?”जैसे इशारे मे उसने पूछा वैसे कंधे ऊपर कर प्रिंस ने जवाब दे दिया कि हमे नही पता।

  ” कब तक चुप बैठें अब तो कुछ है बोलना,
     कुछ तुम बोलो कुछ हम बोलें ओ ढोलना।।”

जैसे ही गाने के बोल जिम में गूंजे राजा ने सर उठा के प्रिंस को देखा,और बस उतने ही मे__” बदल रहें हैं भैय्या जी,बस अभी बदले।।”
  राजा की घूरती आंखों को देख प्रिंस हडबडी में म्युसिक सिस्टम तक भागा,पर तभी बांसुरी के बोल गूंजे__
         ” ए प्रिंस रुको!! काहे बदल रहे,हमें अच्छा लगता है ये गाना।।”

  ” ऊ भैय्या जी को नही ना पसंद इसिलिए बदले दे रहे।”

” अबे हम कब बोले तुमको बदलने।” राजा की घुड़की से घबराया प्रिंस मुहँ लटकाये बाहर निकल गया,बांसुरी राजा के पास आ कर बैठ गई ।।

” क्या हुआ राजा?? कुछ मूड ऑफ़ लग रहा तुम्हारा, घर पे कुछ हुआ क्या।।”

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” इस बार भैय्या जी के बाऊ जी ने कसम ले ली है कि अबकी बार अगर राजा भैय्या पास नही हुए तो इनकी हत्या कर देंगे या खुद चूहा मार दवा पी के आत्महत्या कर लेंगे।।”लल्लन बोला

बांसुरी ने आंखे तरेर के लल्लन को देखा फिर पूरी सहानुभूति से राजा को निहारने लगी।।

” अरे इसमें इत्ता परेशान होने की क्या बात,इस बार  राजा सिर्फ पास नही होंगे बल्कि बोर्ड एग्ज़ाम टॉप भी करेंगे,,हम पर भरोसा रखो।।”
  बांसुरी के ऐसा बोलते ही प्रेम भी उछल पड़ा

” हम भी यही कह रहे,भैय्या जी क्यों परेशान हो रहे, अरे पास हो गये तो ठीक वर्ना हम पूरे शहर से चूहा मार दवा खरीद कर यहाँ से बहुत दूर ले जाकर फेंक आयेंगे।।जब बाऊजी को दवा मिलेगा ही नही तो का खा कर मरेंगे।।

राजा ने खा जाने वाली नजरों से प्रेम को देखा और उठ कर अपने में ऑफिस में चल दिया,उसके पीछे पीछे बाँसुरी भी भागी,जाते जाते प्रिंस को दो कप चाय लाने कहती गई ।।

” हमें तो बताओ हुआ क्या है राजा?? कल तो बड़े खुश लग रहे थे, हनुमान जी ने ऐसा क्या मन्त्र फूंक दिया कान मे जो उदासे बैठे हो।”

” काहे परेशान कर रही हो,हमने कहा ना कोई बात नही।।”

” जब कोई बात नही ,तो हमें देखा क्यों नही,??  , हमारी नई ड्रेस पे कोई टीका टिप्पणी नही,,देखो तुम्हारे जैसे हमने भी रीबॉक के जूते पहने हैं, सुबह से तुम्हारे आगे पीछे घूम रहे,पर तुम तो जैसे इस दुनिया में हो ही नही,जाने कहाँ विचर रहे हो।।”

” थोड़ा सर मे दर्द था,और कुछ नही!! बस इसिलिए थोड़े चुप चाप बैठे थे।वैसे अच्छी लग रही हो तुम।।

” थैंक यू!! अब बताओ कि हमारी ट्रेनिंग कबसे शुरु कर रहे,,भास्कर सर के बारे में बताया था ना तुम्हें ।।”

” देखो ट्रेनिंग का जहां तक बात है,हमने लड़की पटाने में कोई पी एच डी तो की नही है,जो हम तुम्हें कुछ सीखा सके बता सकें।।तुम तो हमसे जादा समझदार हो।”

” अरे बाबा कम से कम यही बता दो कि तुम किसी लड़की में क्या देख कर इंप्रेस होते हो।।”

” अब देखो ,जहां तक हमारा सवाल है,हमें ना सभ्य संस्कारी लड़कियाँ अच्छी लगती हैं,सीधी साधी,  भोली सी,,अपने बड़ों का बात मानने वाली,कम बोलने वाली,झगड़ा फसाद ना करने वाली।।”

” बस बस हम समझ गये,,मतलब बिल्कुल हमारे अपोजिट लड़की तुम्हें पसंद है,है ना??”

” अरे नही बाबा!! वो मतलब नही है हमारा,,पर देखो एक बात सच्ची बताएँ,लड़कों को ना बहुत ही जादा ज्ञानी लड़की नही पसंद आती,उन्हें वही भाती है जिसके सामने वो जादा ज्ञानी दिखे,,वो लड़को की इस आदत को का कहते हैं …… अरे वो बोलते हैं ना का ….

” ईगो!!! मेल ईगो!! यही कहते हैं,यही बताना चाह रहे ना।।”

” अब देखो सच्ची बात बताये तो तुम बुरा मान गई,अब यही थोड़ा घुमा फिरा के बोलते तो खुश हो जातीं।।अच्छा सुनो तुम कुछ बातों का ध्यान रखना अपने सर के सामने फिर देखना कैसे तुम्हारा जादू चलता है,,, पहला तो उनकी क्लास मे कभी उचक उचक के जवाब मत बताना , नही उन्हें लगेगा इसे पढ़ाने का कोनो ज़रूरत ही नही,,दूसरा जो सवाल बन रहा उसे भी उनसे पूछना क्योंकि इससे उन्हे अन्दर से खुशी मिलेगी कि तुम उनसे कम हो,और वो तुमसे कहीं जादा बुद्धिमान हैं।।
     धीरे से दोस्ती हो जाये,तब उनका हर बात का ध्यान रखना,जैसे हमारा रखती थी,कि कौन सी आंटी फीस भरी है कौन सी नही।”
  ये बोल कर राजा हंसने लगा,बांसुरी भी।।

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” हर छोटी छोटी बात उनसे पूछ कर करना ,भले तुम करो अपने मन की पर सामने वाले को ये लगे कि तुम उनके हिसाब से सब कर रही हो,,बस यही दो चार बातें आजमा लो,तुम्हारा काम हो जायेगा।”

” काम हो जायेगा तो ऐसे बोल रहे जैसे तुम कोई गुरू घंटाल हो,,एक घन्टे में मोहिनी,सौतन से छुटकारा,प्रेमी को वश मे करें,वाले विज्ञापन के बाबा जी की तरह।।”
  बाँसुरी की खिलखिलाने की आवाज़ सुन कर निश्चिंत हो प्रिंस चाय लिये अन्दर आया।।

” बताओ अब आये हो चाय लेकर,अब तो हमारा जाने का समय हो गया।।” बान्सूरी के ऐसा बोलते ही राजा ने  भी खबर ली

“ये पहले गौ माता के पास जाकर दूध निकलवातें हैं,उसके बाद ऊ दूध लिये चमन के पास लाते हैं तब जाके कहीं चाय बनती है,,क्यों हो प्रभु,सही बोले ना हम।।”

” अरे का भईया जी,कतना तारीफ करेंगे हमारा,  लिजिये चाय लिजिये आप दुनो,हम अपनी भी यहीं ले आये।।

अभी तीनों ने अपनी अपनी चाय पीनी शुरु की थी कि जिम में बाहर से किसी ने राजा भैय्या के नाम की पुकार लगा दी,प्रिंस हम देखते हैं बोलकर बाहर दौड़ा, जितनी द्रुत गति से बाहर गया था वैसी ही त्वरित गति से अन्दर भागा__
    ” भैय्या जी ऊ भौजाई आई हैं ।।”
 
  ” हमरी तो शादी ही नही हुई,कहाँ से तुम्हारी भौजाई पैदा हो गई  बे!! कुछ भी बकते हो।

  ” अरे भैय्या जी बड़की भौजाई आई हैं,उनके साथ एक और कोनो लड़की है।।”

राजा भैय्या ने अपना एक हाथ हल्के से अपने माथे पर मारा_ ” अरे यार !! हम भूल गये रहे,,आज भाभी की बहन को स्टेशन लेने जाना था……राजा भैय्या की बात पूरी भी नही हो पाई थी कि दरवाज़ा खोल रुपा भाभी कमर पर हाथ टिकाये खड़ी हो गई।

” काहे लल्ला जी,जब जाना ही नही रहा तो हमे पहले काहे नई बता दिये,,बेचारी रेखा स्टेसन में खड़े खड़े आधा घंटा बेट करी,तब बिचारी हमें फ़ोन करी और हम इसे लेने गये।।”

” काहे इत्ती अनपढ़ है कि अकेले रिक्सा में घर नही आ सकती।।” प्रेम ने धीरे से फुलजड़ी छोड़ी और प्रेम  प्रिंस बांसुरी खिलखिला पड़े

” का बोले तुम प्रेम” ।

” कुछ नही भौजी!! हम बोले तनिक बैठ जाओ,हम समोसा मँगा देते हैं,ए प्रिंस लगाओ यार लल्लन को फ़ोन लगाओ , कहाँ है आजकल??”

प्रेम की इस बात का सभी ने एक स्वर में समर्थन किया।।
रेखा राजा में अपने होने वाले पति को देख रही थी, इसलिये उसके चेहरे पर लज्जा का अभिनय था, शर्म की लुनायी थी।।

राजा अपने मन में त्रस्त था,उसके मन में कुछ समय पहले खिला प्रेम का फूल हवा पानी के अभाव में अकेला इधर उधर डोल रहा था,उसे जिस माली के स्नेह सिंचन की आवश्यकता थी,वो माली अवकाश ग्रहण कर दूसरे की बगिया संवारने में खुद को व्यस्त किये था।।

  बांसुरी रेखा को देख रही थी जो  लगातार राजा को ताड़ रही थी,,बांसुरी राजा भैय्या के चार्म से अपरिचित थी,ऐसा नही था।।वो आये दिन ही जिम में आने वाली अनोखी अलबेली वारान्गनाओं के लटकों झटकों का कारण भली प्रकार समझती थी,पर रेखा की दृष्टी उसे चुभ गई ।।

“कहाँ है भई तुम्हारा समोसा?? इत्ती देर लगा दी,ए प्रेम ऊ लल्लन को फोन घुमाओ की तली मिर्ची भी हमारे लिये अलग से लेता आयेगा।।”

रूपा की इस बात पे राजा ने फ़ोन लगाया__” भाभी औ कुछ मँगा दें,,जलेबी खाओगी??”

” जो मँगाना है जल्दी मँगा दो,,हम तो रेखा को लेके घर जा रहे थे,यही बोली कि राजा हमे लेने कैसे नही आया,चलो दीदी देखे क्या कर रहा ,इसिलिए आ गये,बस चाय पी के निकल जायेंगे हम,,पूरा काम बिखरा पड़ा है,,हम ना करें तो इस घर का एक पत्ता ना हिले,,बहू नही नौकरानी हैं हम….

” अरे का भौजी,नौकरानी नही आप रानी हैं रानी!! कभी रूप देखी हैं अपना,,एकदम किसी रियासत की महारानी सी लगती हैं ।”प्रिंस की बात पर रूपा का बिगड़ा मूड संभल गया

” ऊ तो हम खानदानी रईस जो ठहरे।”भाभी की इस बात को सुन राजा को हँसी आ गई,,वो कई बार अपनी माँ की बड़बड़ इस बाबत सुन चुका था,जब कभी घर पे सास बहु की महाभारत छिड़ती और रूपा अपने कोप भवन में प्रस्थान कर जाती तब पीछे से सासु माँ का रूपा के खानदान का जो बखान शुरु होता ” हूंह बड़ी आई रईस !! जैसे हम नई जानती कि इनके बाप मिट्टी का तेल ( क्रूड ऑयल) प्लाण्ट से चुरा चुरा के बेच बाच के तो रुपया जोड़े,किसके किसके हाथ पांव जोड़ के बकालत का डिग्री खरीदे,अब चार पैसा घर में आ गया तो बडे जमींदार बन रहे।” अम्मा की ये बात याद करके राजा मुस्कुरा रहा था कि रेखा ने उससे सवाल कर दिया_

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” ये लड़की कौन है राजा?? जो आपके साथ खड़ी है?” किसी को ऐसे रूखे सवाल की अपेक्षा नही थी

” मैं बाँसुरी हूँ,यहाँ राजा का जिम जॉइन किया हुआ है।।” बांसुरी को पता था कि राजा अपने पढ़ने वाली बात किसी को नही बताना चाहता था।।

” और हमारी टीचर जी भी,क्यों ठीक है ना बांसुरी ।”

राजा मुस्कुरा कर बांसुरी को देखने लगा,,पर उसका इस तरह किसी और लड़की को देख कर मुस्कुराना दोनो बहनों को अन्दर तक भस्म कर गया।।अभी रूपा कुछ कहने ही जा रही थी कि दरवाजा खोल कर लल्लन समोसों की खुशबू से हवा को महकाते अन्दर आया।।

  अन्दर आते ही सारा सामान सामने रखे टेबल पर रख उसने जैसे ही सर ऊपर किया उसकी नज़र रेखा पर पड़ी __” अरे शोना तुम?”

” रोहित तुम?? तुम यहाँ कैसे?? रेखा ने लल्लन से सवाल किया,दोनो के सवाल सुन रूपा ने रेखा को घूर के देखा__” तुम दोनो एक दूजे को कैसे जानते हो,और ये तुम्हारा शोना नाम कब से पड़ गया रेखा।”

रूपा भाभी के अलावा वहाँ बैठे सभी लोगों को सब समझ आ चुका था,,प्रिंस ने धीरे से चुटकी ली__

” तो ई हैं हमरे लल्लन की शोना बाबु।””प्रिंस चुटकी ले और प्रेम चुप बैठा रहे,ये असम्भव था,अगला वार उसका हुआ_
           ” जी हाँ और दढ़ियल लल्लन हैं इनके बेबी।।।”

” तुम दोनो का खुसर फुसर कर रहे हो हैं??” हम देख रहे ,लल्ला जी के जिम में आजकल यारी दोस्ती की महफिल जादा सज रही,,ए रेखा जल्दी जल्दी ई समोसा ठूसो और घर चलो,घर पहुंच के जानेंगे तुमसे सब ।।”

बाँसुरी सर झुकाये अपनी हँसी रोकने के प्रयास में थी,कि राजा ने सबसे पहले उसी के सामने समोसे बढ़ा दिये।

” पक्का बताओ हम खा लें,जब से तुमने मना किया , तबसे कचौड़ी और समोसा छुआ तक नही,, तीन महीने हो गये।।” हँसते हुए बांसुरी ने कहा।।

” बहुत कहा मानती हो लल्ला जी का,,ऐसा भी क्या हो गया।” रूपा के इस सवाल का जवाब दिया प्रिंस ने

” अरे भौजी ,,बांसुरी तो कम ही बात मानती है भैय्या जी की। पर भैय्या जी तो हर काम बांसुरी के मन का ही करते हैं, हम पे भरोसा ना हो तो पूछ लो भैय्या जी से।।” प्रिंस के बौड़मपने पे प्रेम ज़ोर से हंसने लगा और उसने आगे बढ़ कर बात संभाल ली__

” अरे आप लोग पहिले समोसा तो खाईये,ऊ भी चीख चीख कर कह रहा,हमरे ठन्डे होने से पहले हमे खा लो।”

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          रूपा रेखा को लेकर जब जिम की सीढिय़ां उतरने लगी,तब उसे कार में बैठा कर रेखा दो मिनट में आई कह कर वापस जिम में घुस गई __

” रोहित सुनो!! तुम से कुछ बहुत ज़रूरी बात करनी है,घर से फ़ोन नही कर पायेंगे,दीदी हमारे सर पे सवार रहेगी,,, तुम शाम को यहीं जिम मे हमसे मिलना,,हम किसी बहाने यहाँ आ जायेंगे,समझे।।”

” हाँ हम आ जायेंगे,शाम को 5 बजे जिम खुलेगा,  आज प्रिंस से चाबी हम ले जायेंगे,तुम समय से आ जाना बस।।”

रेखा लल्लन को बाय बोल कर बाहर निकल गई, हल्की सी मुस्कान के साथ जैसे ही लल्लन पलटा सांमने राजा और बाकी लोगों को खड़ा देख हडबडा गया।।

” तो ई है तुम्हरी नैकी जिसके लिये ‘ चदरिया झिनी रे झिनी ‘ सुना सुना के हमारे कान फाड़ दिये तुम?”

लल्लन नीचे सिर किये अपने बालों पे हाथ फिराता शर्माता खड़ा रहा।।

सभी मुस्कुराने हंसने खिलखिलाने लगे तभी राजा को जैसे कुछ याद आया_ ” अबे लल्लन तुम तो सूर्यवंसी लिखते हो ना।।अबे गज़ब कर दिये गुरू,,अब फिर पिंकी औ रतन वाला किस्सा दोहराना पड़ेगा।।”

” तो क्या हुआ,तुम हो ना सबके तारणहार!! तुम्हारे रहते किसी का बुरा हो सकता है,,,कभी कभी तो हमे लगता है,अगर तुम नही होते तो इन सब का क्या होता।।” बांसुरी की बात सुन राजा के मुहँ से निकल गया__” और तुम्हारा??”

” हाँ सही कह रहे,हमारा भी!! हम भी तो तुम्हारे कारण ही ऐसे दिखने लगे।।बाँसुरी खिल्खिलाती हुई वहाँ से बाहर चली गई,और बाकी सारे के सारे लल्लन को घसीटते हुए उसपे लात घूंसे चलाते हुए उसकी राम कथा सुनने लगे।।

क्रमशः

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aparna..

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शादी.कॉम-11

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   पिंकी और रतन की सगाई संपन्न हुई।।।सारे लोगों को व्यस्तता का जो बहाना मिला था चूक गया,, सारे रस भरे दिन चूक गये,रसोइये ने अपने साजो सामान को समेटा ,तगडा नेग लिया और चलता बना,एक एक कर मेहमानो ने भी जाना शुरु कर दिया।।
  पर ऐसे मौकों पे कुछ ऐसे मेहमान भी आते हैं,जो आते ही लम्बा टिकने के लिये हैं,,ऐसी ही एक मेहमान थी राजा की अम्मा की चचेरी बहन शन्नो मौसी।।।
     शन्नो मौसी का वहाँ टिकने का मुख्य उददेश्य था,राजा भैय्या की शादी।। एक तो कान्यकुब्ज ब्राम्हण परिवारों में मिलने वाला ऊँचा दहेज उसपे उनकी सहेली की ननंद की भतीजी जिसके फूफा स्वयं जज महोदय!!! अब ऐसा जानदार रिश्ता कोई हाथ से निकलने दे सकता है क्या,,कम से कम शन्नो मौसी जैसी व्यवहार कुशला और सामाजिक महिला तो बिल्कुल नही।।
   राजा की अम्मा पहले ही रूपा की बहन रेखा को लेकर परेशान थी,अब शन्नो जिज्जी एक नया फसाद लिये खड़ी थी,,पर इन सबसे बेखबर राजा भैय्या अपने में मगन थे।।।

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  राजा भईया का सारा दिन जिम मे पसीना बहाने बहवाने में निकल जाता और रात थोड़ा बहुत किताबें खोलने में ।।
    राजा भैय्या ऐसे जीव थे जिन्हें ज्यादा सोचने की आदत नही थी,जो बात उन्हें एक बार में समझ नही आती,उसे वो दुबारा पलट के भी नही देखते।। ऐसा नही था कि वो दिमाग से पैदल थे,पर बात ये थी कि उन्होनें आज तक ये नही जाना था कि दिमाग संभाल कर तिजोरी में रखने की वस्तु नही बल्कि दिल खोल कर खर्च करने की चीज़ है,और जितना ही उसे खर्चोगे उतनी ही बढेगी।।पर उनकी इस खूबी को बांसुरी ने पकड़ लिया।।।
   बांसुरी इतने दिनों की राजा की संगत में ये बात समझ गई कि राजा को पढ़ाई बोल कर पढ़ाने पर उसका डब्बा गोल ही होना है,इसिलिए उसने राजा को अलग ढंग से पढ़ाना शुरु कर दिया,,इतिहास में उसने सिलसिलेवार सन लिख कर उन उन काल में हुई घटनाओं दुर्घटनाओं की कहानी सी तैयार की और जिम में वर्क आउट करते हुए वो राजा को सतत उन कहानियों का स्मरण और पाठ कराती,जल्दी ही राजा  को सारा सब कुछ कंठस्थ होने लगा,कब प्रथम महायुद्ध हुआ,किसके बीच हुआ,,पहली सभ्यता का नाम,गान्धी जी का कब स्वदेश आगमन हुआ से लेकर कब गोलमेज सम्मेलन हुआ,और कब हमे आज़ादी मिली,कब हमारा संविधान तैयार हुआ।।
    जब एक बार किसी इन्सान को दिमागी मेहनत करने की आदत हो जाती है तो इससे इतर अन्य कोई कार्य रुचिकर नही लगता।।ये सब पढ़ते हुए राजा को ऐसी रूचि उत्पन्न हुई कि अब उसकी दिमागी खुराक के लिये बारहवीं के सिलेबस की रसद कम पड़ने लगी,अब राजा खोज खोज कर पढ़ने योग्य अयोग्य सभी कुछ पढ़ने लगा।।।

” हमको तो लगने लगा है,हम इत्ता पढ़ डाले हैं कि अगर हम कौन बनेगा करोड़पति खेलने गये तो हम पूरा एक करोड़ एके बार में जीत डालेंगे ऊ भी बिना लाईफ लाइन के,,क्यों गुरू जी।।”

राजा ने बांसुरी से हँसके पूछा,पर जवाब मिला प्रेम से…..

” बिल्कुल सही बोले भईया जी,औ ई बसुरीया इत्ता बजन कम कर डाली है की अगर मिस इंडिया बनने गई तो अकेली ही सब जीत डालेगी,ऊ का का होता है ना मिस वर्ड,मिस ब्रम्हाण्ड औ जाने का का।।”

” हमारे लिये काहे इतना कड़वे हो प्रेम,,हमने सुना था लड़के लड़कों से जलतें हैं,लड़कियाँ लड़कियों से,पर तुम तो हमी से जले कटे बैठे रहते हो,,दिमाग को थोड़ा ठंडा रखा करो।।”

बाँसुरी ऐसा बोल कर वहाँ से उठ गई,और दिनों की तरह उसके चेहरे पे वो उल्लास नही दिखा राजा को, जिसके कारण राजा भी उठ कर उसके पीछे पीछे चला आया।।

” क्या हुआ बांसुरी? कोई परेसानी है?? आज तुम थोड़ा चिंतित दुखी परेसान लग रही हो।।”

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” समझ गये कि हम परेशान लग रहे पर तुमको तीन पर्यायवाची बोलने की क्या ज़रूरत??आजकल हर जगह अपनी परीक्षा की तैयारी में ही भिडे रहते हो।।” ऐसा बोल कर बांसुरी मुस्कुरा पड़ी और राजा शरमा के नीचे देखने लगा।।

” बांसुरी हम बहुत दिनों से एक बात सोच रहे थे,तुम हमारी सबसे करीबी दोस्त बन गई हो,तुमने हमें इतना अच्छे से पढ़ाया है कि हमको अब पढ़ाई लिखाई अच्छी लगने लगी है।” बांसुरी खड़ी मुस्कुराती रही
” हम और कुछ तो दे नही सकते,,आज तुमको एक छोटा सा पार्टी देना चाहतें हैं ।””

” अरे अभी पास तो हो जाओ,,फिर हम तुमसे पार्टी भी ले लेंगे।।”

” हमारे पास होने की पार्टी तो तुम दोगी हमे,देखो ई दू  तीन महीना में तुम भी दुबला गई और हम भी पढ़ लिख लिये तो अब हमको लगता है पार्टी तो देना ही पड़ेगा।।”

बांसुरी के मन की उदासी राजा के पकड़ में नही आई, अभी वो दोनो खड़े बात कर ही रहे थे कि डॉ रानी वहाँ चली आई ।।

” कैसे हो राजा,क्या चल रहा आजकल!! बहुत दिन से तुम दिखे नही तो हमनें सोचा हम ही मिल आते हैं तुमसे ।।”
उन दोनों को बातों में उलझा छोड़ बाँसुरी वहां से निकल गई ,,रानी और राजा भईया वहीं जिम की सीढियों पर बैठ गये,,रानी दुनिया भर की तमाम बातें राजा को बताती रही,बीच बीच में ” सुन रहे हो ना”  ” अच्छा बताओ मैने अभी अभी क्या कहा था” जैसे क़्विज़ कॉंटेस्ट भी खेलती रही पर बाँसुरी का इस तरह चुपचाप चले जाना राजा को बुरी तरह खलने लगा,वो दूर तक बाँसुरी को जाते हुए देखता रहा,, बार बार राजा का मन हुआ कि जाकर बाँसुरी को रोक ले और पूछ ले कि ऐसे बिना कुछ बोले कैसे चली गई ,पर वक्त की नजाकत देखते हुए वो चुप चाप बैठा रानी की बातों को सुनता रहा।।

   लोग कहतें हैं पहला प्यार कभी नही भूलता,अब लोग कहतें हैं तो ऐसा होता ही होगा पर लोगों के साथ ही,, क्योंकि राजा के साथ ऐसा कुछ नही हुआ।।
     राजा ने जितनी शिद्दत से रानी से अपनी अल्हड़ सी उम्र में प्यार किया था,उतनी ही शिद्दत से आज वो उस प्यार को भूल बैठा।।रानी में आज भी कोई कमी नही थी,खूबसूरत तो पहले ही थी अब डॉक्टरी की पढाई के आत्मविश्वास ने चेहरे को एक अलग लुनायी से रंग दिया था,बावजूद इसके अब राजा को रानी में सिर्फ एक अच्छी सच्ची दोस्त ही नज़र आ रही थी।।
     प्यार मोहब्बत ऐसा एहसास होता है कि जो करता है और जिससे करता है,उसे बताने और जताने की ज़रूरत नही रह जाती,,और जब वही प्यार करने वाला प्यार नही करता है,तब तो लगता है जैसे सारा संसार चीख चीख कर आपको ये बताने पे अमादा है कि ‘ अब ये तुझसे प्यार नही करता’।।
रानी भी राजा की भावनाओं को समझ चुकी थी,पर उसे कोई शिकायत ना थी,या शिकायत करने कि अवधि वो पार कर चुकी थी।।अपने मन की दुविधा को खुद में ही समेटे उसने बहुत सारी बातें राजा से करी,ये जानते हुए भी कि राजा उसके पास बैठा हो कर भी बांसुरी के साथ उसके घर तक चला गया है।

” राजा एक बात पूछें तुमसे?अरे हमे सुन भी रहे हो या नही?? माना की बहुत पतली हो गई है तुम्हारी मुटकि पर अभी भी हमसे तो मोटी ही है।”  रानी अपनी ही बात पर हंसने लगी,राजा चौंक कर उसे देखने लगा__ ” क्या कहा तुमने रानी,अच्छा सुनो हमे कुछ काम से घर जाना है,चलो तुम्हें तुम्हारे घर उतार देंगे।।”

” जी मेहरबानी आप मुझे मेरे घर तक लिफ्ट देंगे,,एक बात पूछना चाहतें हैं आपसे राजा बाबु।”

” हाँ पूछो।” अपनी गाड़ी स्टार्ट करते हुए राजा ने कहा

” बुरा मत मान जाना,,हम कुछ दिन से जो नोटिस किये वही पूछ रहे हैं,,तुम्हें बाँसुरी कैसी लगती है।।”

” कैसी लगती है मतलब?? ठीके है,मेहनती है,होशियार है,जो ठान लेती है कर के रहती है,,अब देखो ,,जब जिम मे आई रही 68 किलो की रही ,और अभी 60 की हुई गई,,बहुत मेहनती है,एकदम जी जान से जुट जाती है,,पढ़ाई में तो पुछो मत,हमें सोचो हमार जैसे लठ को आदमी बना डाली( राजा भैय्या की नजरों में जिसे शिक्षा का मह्त्व पता हो और जो शिक्षित हो वही असली पुरूष संज्ञा है)
राजा भैय्या की बात को बीच में ही काट कर रानी ने कहना शुरु किया__

” हाँ समझ गये!! बस करो अब तारीफ ,,तो मतलब हम जो सोच रहे वो सच है।”

” अब हमे क्या पता तुम क्या सोच रही??”

” ये कि तुम्हें बांसुरी अच्छी लगने लगी है।।है ना?”

” अच्छी है तो अच्छी लगेगी ही??”

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रानी मुस्कुराने लगी ” हम्म अच्छी तो है,पर तुम्हें कुछ ज्यादा ही अच्छी लगने लगी है।।”

जब किसी की चोरी पकड़ी जाती है तो उस वक्त उस इन्सान का सारा प्रयास इसी ओर रहता है कि किसी तरह उसकी बेगुनाही साबित हो जाये,ऐसा ही कुछ राजा के साथ हुआ!!! अभी वो बेचारे स्वयं अपने मन की थाह नही पा पाये थे उन्हें स्वयं अपने हृदय के अन्दर बहने वाले इस प्रेमझरने का स्त्रोत पता नही था कि उस झरने को पहचान कर लोग बाग उसका रसास्वादन करने लगे।।।राजा भैय्या सोच में पड़ गये कि शाम को बांसुरी से मिलने जाना चाहिये या नही, उन्हें उस समय यही उचित लगा कि मिलने नही जाना ही ठीक रहेगा।।वो बार बार अपने मन को तरह तरह से यही समझाने में लगे रहे कि रानी को कुछ गलतफहमी हुई है,और उनके मन में बाँसुरी को लेकर कोई विकार नही है।।

  वो पूरा दिन बस यही सोचते निकल गया कि अगर मिलने चला गया तो सब क्या सोचेंगे,और अगर मिलने नही गया तो बांसुरी क्या सोचेगी!! आखिर बांसुरी सब पर भारी पड़ी ।।
    तरह तरह के विचारों को सोचते सोचते अंतत: राजा ने यही सोचा कि जब उनका मन साफ है स्वच्छ है बांसुरी से मिलने जाने मे कोई परहेज नही।।ऐसा सोचने के बाद मन फूल सा हल्का हो गया,सुबह से सोच सोच के जो पीड़ा के बादल राजा ने अपने दिमाग मे जमा कर लिये थे,सब एकाएक बरस गये,और उजली चांदनी छिटक गई ।।

  अपने आप को भली तरह से सजा संवार कर राजा बाबु बाँसुरी से मिलने जाने निकले,ये प्रथम अनुभव था जब राजा अपनी किसी महिला मित्र से मिलने जा रहा था,इसके पहले तो हमेशा अपने चेलों के साथ घूमने के लिये कभी कोई तैयारी नही लगी पर आज कुछ विशेष यत्न से सारी साज संवार की गई थी,,मन ही मन अपने आप पे खुश होते राजा भईया निकल ही रहे थे कि भाभी जी का स्वर सुनाई पड़ा

” किधर को चली सवारी लल्ला जी?? बड़े बन ठन के निकल रहे हैं ।”
   ‘काली बिल्ली रास्ता काट गई ‘ वैसे भैय्या जी ये सब बातों को नही मानते थे,उन्हें अपनी भाभी पर स्नेह भी था पर उनकी इस कदर की टॉन्ट वाली बातों पे अरुचि भी थी।।

” कुछ नही भाभी बस मन्दिर तक जा रहे थे।।”

” आज कौन से मन्दिर जा रहे लल्ला जी??”
भाभी तो एकदम ही पीछे पड गई,अब बेचारे राजा भैय्या क्या बोलते

” बड़े हनुमान जा रहे,,आप चलेंगी??” आप चलेंगी कुछ इस ढंग से पूछा गया कि इस सवाल का जवाब आपको ना में ही देना है कहीं गलती से हाँ कह दिया तो भईया जी कहीं गाड़ी सहित आपको गंगा जी में ना डूबा आयें।।

” ना ना आप ही जाओ,,बस आते बखत उधर जो सेंतराम हलवाई है ना उसकी चाट हमारे लिये लेते आना,और उसे बोलना छोले कम डालेगा,ज्यादा गीला ना करे,टिकिया को अलग से बाँधेगा नही क्या होता है ना टिकिया गल जाती है सारी की सारी।”

” और कुछ भाभी।।”

” नही बस इत्ता ही याद से ले आना,बहुत है।”

अब राजा बाबु को जाना था रॉयल पैलेस होटल और बड़े हनुमान पड़ते थे घड़ी चौक से दाहिना जाकर,बेचारे झूठ बोल कर बुरा फंसे।।चाट तो वो अपने अनुचरों से भी मँगा लेते पर हनुमान जी का नाम ले दिया,अब मन्दिर नही गये तो भगवान नाराज और होटल टाईम से नही पहुँचे तो बांसुरी ।।

उन्होनें बांसुरी को फ़ोन लगाया,,रिंग बजने पे फ़ोन उठाया उधर से बांसुरी की अम्मा ने__ ” हेलो कौन बोल रा।”

बेचारे राजा भईया पहली बार किसी लड़की के नम्बर पे फ़ोन किये वो भी उसकी माँ उठा ली,अब का करे का ना करें की स्थिति थी।।

” नमस्ते !! बांसुरी है क्या?”
” ऊ तो अभिचे कहीं निकल गई!! बोल के गई है आने में थोड़ा देरी हो जायेगा।।तुम कौन बोल रये बेटा…..इतने में फ़ोन कट गया,राजा भईया को बड़ा गुस्सा आया,अरे इतनी भी क्या हड़बड़ी,,थोड़ा देर में नही निकल सकती थी।।
  हर बात पे बांसुरी की राय लेने की ऐसी आदत हो गई की अब इस आड़े वक्त में क्या करें,राजा भैय्या को सूझ ही नही रहा था।।उन्होनें अपनी गाड़ी उठाई और चल दिये।।

कुछ 20 मिनट बाद राजा भैय्या रॉयल पैलेस होटल की पार्किंग में थे।।गाड़ी खड़े करते हुए जाने क्यों एक अजीब सी बेचैनी उन्हें घेरने लगी।।आज तक किसी काम को करने के पहले दुबारा ना सोचने वाले राजा की हालत खराब थी,इतना तो उसने अपने सारे जीवन मे नही सोचा जितना आज अकेले एक दिन मे सोच लिया।खैर अपने आप को मजबूत कर अन्दर बढ़ ही रहे थे कि__” सर क्या आप अपनी पहली डेट पर आये हैं,अगर हाँ तो हमारे पास आपके लिये कुछ है”

अचानक से दरबान के साथ खड़े होटल मैनेजर के इस सवाल पर राजा भईया घबड़ा गये,एकाएक उनसे बोल ना फूटा__”सर अगर ये आपकी फ़र्स्ट डेट है तो ये रहा आपके लिये एक गुलाब !! हमारी ओर से!! आप अपनी गर्लफ्रैंड को ये दीजिये।।

” पर भैय्या तुम काहे दे रहे फ़्री में गुलाब??”

” सर पॉलिसी है हमारी,आज की तारीख पे हमारे साहब की शादी हुई थी तो आज के दिन जो कपल डेट पे आते हैं उन्हें हम गुलाब और कोम्प्लिमेन्ट्री ड्रिंक और स्टार्टर खिलाते हैं ।”

राजा का ये प्रथम अनुभव था,आज तक अपने चेलों के साथ सेंतराम की कचौड़ियाँ पेली थी या टिक्की।। पीने पिलाने का ऐसा था कि कभी एक बार प्रेम कहीं  से पी पिला के लौटा तो उसकी लटपटाती जिव्हा और उठने वाली कड़वी गन्ध से भी राजा नही समझ पाया तब प्रिंस ने ही सहायता की” अरे ई प्रेम कहीं से पी के आ रहा है भैय्या जी” बस इतना सुनना था कि राजा ने उसे 2 थप्पड़ लगा दिये__
               ” अरे बस बियरे तो पिये हैं,ऊ हार्ड ड्रिंक थोड़ी होता है भैय्या जी,,पुराने सब दोस्त मिल गये रहे जबरिया पिला दिये,औ जो थोड़ी बहुत चढ़ी रही ऊ आपका थप्पड़ उतार दिया।।”
  हालाँकि बाद में राजा ने प्रेम को ताकीद करी की जिम में जहां महिलायें भी आती हैं,वहाँ इस तरह पी कर आना वर्जित है,माफ कर दिया।।
   
  अब आज इस तरह मैनेजर से डाइरेक्ट फ़्री ड्रिंक की बात सुन भैय्या जी ज़रा झेंप गये और सिर्फ गुलाब लिये अन्दर चल दिये।।

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   अन्दर बड़े से हॉल में हल्की-सी रोशनी में हल्का धीमा सा कर्णप्रिय संगीत गूँज रहा था।।रूम फ्रेशनर की खुशबू सारे माहौल को खुशनुमा कर रही थी, ऐसे में भईया जी चारों तरफ नज़र दौड़ाते बांसुरी को ढूँढ रहे थे।।
     राजा को बांसुरी दिख गई,,,वो एक बार फिर अजीब सी परेशानी में घिरने लगा,आज सुबह तक जिसे सिर्फ एक छोटी सी पार्टी समझ कर देना चाहता था, वो रानी से बात होने के बाद से एक छोटी सी डेट में बदल गई ।।कितना भी नादान हो पर राजा डेट का मतलब तो समझता ही था।।
   
” कब आईं बांसुरी?? हमको थोड़ा ट्रैफिक के कारण देर हो गया।”

आज सब कुछ बदला सा लग रहा था राजा को।।
रानी की बातों का असर था या मैनेजर की बातों का, या उस रोमैंटिक माहौल का असर आज बांसुरी वाकई बाकी दिनों से अलग लग रही थी।।
बहुत सुन्दर तो बांसुरी को नही कहा जा सकता था पर वो स्मार्ट थी,अपने आप को सलीके से रखना उसे आता था,अब आठ किलो वजन कम करने के बाद उसका आत्मविश्वास और चमक गया था।।
कुल मिलाकर आज के ज़माने में कही जाने वाली स्मार्ट प्रेजेंटेबल लड़की थी।।

” अरे तुम खड़े क्यों हो राजा बैठो ना।”

” क्या कर रही थी अब तक ” अपनी कुर्सी पर बैठते हुए राजा ने सवाल किया

” कुछ नही ,बस मेन्यू देख रहे थे कि तुम्हारे लायक क्या हेल्दी खाने को मिल सकता है।”

” अरे हमारे चक्कर में ना पड़ो,जो तुम्हें पसंद हो वो मँगा लो।।” राजा के ऐसा बोलते ही बांसुरी मुस्कुरा पड़ी

” अरे राजा अब हमें भी तुम्हारी तरह मूँग और चना ही भाने लगा है,पता है एक दिन तो अम्मा बेचारी रो पड़ी,बुआ से बोलती हैं” लगता है हमार बांसुरी को जिन ऊन पकड़ लिया है,आज कल खाने को देखती भी नही,सिर्फ फलाहार करे है छोरी जिज्जी।” मुझे तो ऐसी हँसी आई,मैनें कहा अम्मा उस जिन्न का एक नाम भी है ” राजा”

बांसुरी तो ऐसा बोल कर फिर हंसने लगी पर राजा बेचारा शरमा गया।।

” अच्छा राजा सुनो तुमसे एक बात पूछना चाहते हैं “

” हाँ पूछो”
” सच तो बोलोगे ना??”
धड़कते दिल से राजा ने कहा” बिल्कुल सच बोलेंगे।”
उसे लगा जाने क्या पूछने वाली है।असल में तो राजा को खुद ही समझ नही आया था,कि इन कुछ महिनों के साथ में कब बांसुरी उसके मन में रात दिन बजने लगी,हर काम उस से पूछ पूछ कर करने की ऐसी आदत हुई कि कई बार जिम के काम से भी कहीं जाना हो तो पहले बांसुरी का अप्रूवल लगने लगा।।राजा तो नही समझा कि ये क्या है लेकिन उसके आस पास के लोगों जैसे प्रेम रानी यहाँ तक की पिंकी को भी समझ आने लगा कि राजा को बांसुरी भा गई है।।

” हम कैसे दिखते हैं,देखो एकदम सच बोलना ,तुम्हें तुम्हारे भगवान की कसम।”

भगवान की कसम सुनते ही भैय्या जी को बड़े हनुमान याद आ गये,दोनों हाथ कान से लगा कर मन ही मन भगवान से माफी मांग कर राजा ने कहा__

” हम सच बोलें तो तुम बहुत ही प्यारी दिखती हो,मासूम सी ।। और होशियार तो बहुतै दिखती हो।।”
  अभी राजा अपनी बात पूरा भी नही किया था कि वेटर उनका ऑर्डर ले कर आ गया।।

” अरे कॉफ़ी मंगाए हो राजा??”

” हाँ बांसुरी ऐसे होटल में चाय नही पी जाती, इसिलिए हम कॉफ़ी मँगा लिये,जल्दी से कॉफ़ी पी लो,फिर तुम्हे किसी से मिलवाने ले कर जाना है।।”

दोनो कॉफ़ी पीकर निकलने लगे तब बांसुरी ने राजा को टेबल पर गलती से भूले हुए गुलाब की याद दिलाई,,” किसके लिये लाये हो गुलाब”

” बताते हैं!! पहले हमारे साथ चलो।।”

बांसुरी को सिर्फ एक गुलाब देने की भी हिम्मत राजा नही जुटा पाया,दोनो उसकी रॉयल एनफील्ड में बैठ कर बड़े हनुमान मन्दिर को निकल चले।।रास्ते भर इधर उधर की बातें बताती बांसुरी ने अपने गणित के प्रोफेसर भास्कर सर की ढ़ेर सारी बातें राजा को बताईं,और बताते बताते अंत में धीरे से अपने मन में उपजी प्यार की भावना को भी राजा को बता दिया__
         ” देखो राजा जाने अनजाने तुम हमारे बहुत ही ज्यादा अच्छे दोस्त बन गये हो!! निरमा से तो अब मिलना भी कम हो पाता है,उसे बताएंगे भी तो हमारी बात समझेगी नही,और ना ही कोई मदद करेगी,क्योंकि वो हमसे इतना प्यार करती है कि उसे हममे कोई कमी नज़र ही नही आती।। तुम भी हमारे बहुत सच्चे दोस्त बन गये हो,हो ना।।”

बहुत धीरे से राजा ने कहा” हाँ हैं,बोलो क्या मदद चाहिये।”

” पहली बार जब भास्कर सर से मिले तभी हमें सर बहुत भा गये थे,,फिर उनका गणित पढ़ाने का स्टायल!!ऐसा पढाते हैं राजा की पूछो मत!! नये नये समीकरण खुद तैय्यार कर देते हैं ।।तुम हमारी इतनी मदद बस कर दो कि वो भी हमारी तरफ ध्यान देने लगे,,मतलब समझ रहे हो,हम क्या कर रहे।।

बिल्कुल रुआंसा होकर राजा ने कहा” नही समझे”

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” अरे बुद्धू!! तुम खुद लड़के हो,तुम हमें बता सकते हो ना कि लड़कों को क्या पसंद होता है,मतलब कैसी लडकियों से बात करना पसंद है ….अब और कितना खुल के बताएँ ।।”

” हम्म समझ गये!! कर देंगे तुम्हारी मदद।।”

” थैंक यू राजा ,हमे पता था,तुम बहुत अच्छे हो हमारी मदद ज़रूर करोगे,,अच्छा ये तो बताया ही नही तुमने कि ये गुलाब किसके लिये रखे हो।।”

” हनुमान जी के लिये,,वही चढाना है हमें,सुनो बांसुरी तुम्हें घर जाने की देरी हो रही तो तुम्हे घड़ी चौक पे उतार देते हैं!! हमको हनुमान मन्दिर जाना है।।”

” नही ऐसी कोई देर नही हो रही ,तुम्हारे साथ ही तो हैं,आज हमारे पतले होने की पार्टी जो है,पर तुम तो बस कॉफ़ी में निपटा दिये।।”

” अरे तुम वो भास्कर भास्कर किये जा रही थी तो हमे कुछ सूझा ही नही,बस कॉफ़ी मँगा लिये।।

” चलो कोई बात नही!! अभी हमे चार पांच किलो और कम करना है,उसके बाद जी भर के खायेंगे, अच्छा सुनो !! तुम मिलवाने किससे वाले हो।।’

” अरे किसी से नही!! ऐसे ही कह दिये रहे!! हमको मन्दिर जाना था।।हम बचपन से जब भी परेशान होते थे या बहुत खुश होते थे तब बड़े हनुमान मन्दिर ही जाया करते थे,उन्हीं से अपना सारा सुख दुख साझा करते रहे हैं,आज भी तुम्हें वहीं ले जाने की सोचे थे।”

” अरे वाह!! चलो हम भी मिल लेंगे अपने दोस्त के बाल सखा से।। पर सुनो भूल मत जाना राजा, पटला होने में इतनी मदद किये हो अब इस मामले में भी थोड़ी मदद कर दो,और किसी से कहना नही,समझे।।”

” हाँ मेरी माँ किसी से नही कहेंगे। और कल से तुम्हारी एक हफ्ते की एक और ट्रेनिंग शुरु कर देंगे,,उसके बाद वो भास्कर की क्या औकात तुम्हारे सामने।।भास्कर को मारो गोली सलमान खान भी पट जायेगा।।”

” अरे अरे अरे गोली क्यों मार रहे हो भई !! भास्कर सर ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ,रही बात सलमान की तो हमें सलमान खान पसंद ही नही….

बातों ही बातों में बड़े हनुमान मन्दिर पहुंच कर दोनों ने दर्शन किये,और सेंतराम के यहाँ से आलू टिक्की खा कर और पैक करा कर दोनो अपने अपने घर वापस आ गये।।

क्रमशः

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aparna..

मैं मैं हूँ!! जब तक तुम तुम हो!

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मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

तुमसे सारे रंग रंगीले
तुमसे सारे साज सजीले,
नैनों की सब धूप छाँव तुम,
होठों की मुस्कान तुम ही हो।
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

तुमसे प्रीत के सारे मौसम
तुमसे सूत,तुम ही से रेशम
तुमसे लाली,तुमसे कंगन,
मन उपवन के राग तुम ही हो
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

जीवन का यह सार तुम्हारा,
मेरा सब संसार तुम्हारा,
गुण अवगुण मेरे सब जानो,
मुझमे बसे मेरे प्राण तुम ही हो।
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !।।

शादी.कॉम -9

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  …………..

     बांसुरी के प्लान के मुताबिक राजा ने प्रेम के घर पे और बांसुरी ने निरमा के घर पे जाकर बात की,पर उम्म्मीद के विपरीत दोनों ही घर की अम्मा लोंगो ने और बड़ी बड़ी कसमें किरिया उठा ली कि,”हमरे जीते जी ई ब्याह ना हो सकब,हमरी ठठरी उठ जाये के बाद अपन अपन मर्ज़ी से निबटा लो जो करना धरना है,एक बार सादी हुई जाये फिर आटे दाल का भाव पता चल जई ।।”

    निरमा के घर से बाहर निकलने पे पूरी तरह से रोक लगा दिया गया,अब बेचारी कॉलेज भी जाती तो उसका एक नकारा मामा उसे लेने और छोड़ने जाता और बेचारी जब तक कॉलेज में रहती वो गेट के बाहर की गुमटी में अपना अड्डा जमाये रहता, उसके इस मामा के पास कोई विशेष कार्य भी नही था,जुआ खेल खेल के अपने बाप को पैसों को स्वाहा कर रहा था,जब उसके बाप यानी निरमा के नाना को इस बात का पता चला तो लात घुन्सों से अच्छी तरह आरती उतार कर उसे घर से निकाल दिया ,और वो अपने में झूमता बीड़ी पीता अपनी जिज्जी के घर आ गया,जिज्जी ने रो धोकर जीजा को उसके यहाँ रहने के लिये मना लिया,तब से मामा जी का निवास यही था,अपने जीजा को भरोसे में लेने के लिये आये दिन कोई ना कोई जुगाड भिड़ाता फिरता और आखिर वो मौका मिल ही गया ,जब बांसुरी ने निरमा की प्रेम कहानी के बारे में उसकी अम्मा को बताया तब सबसे ज्यादा उछल उछल कर घर की बदनामी की फिकर करने वाले मामा ने अपनी बडी बहन को भड़का भड़का कर भांजी का कॉलेज बन्द करा दिया,,बाद में चुपके से भांजी से पैसे वसूल कर उसे कॉलेज जाने की अनुमती दिला दी और जिज्जी से भांजी को रोज कॉलेज छोड़ने लाने के बदले मेहनताना वसूला जाने लगा।।

  इस पूरे प्रकरण को लगभग 40-45दिन बीत गये,बंसी का जिम यथावत चलता रहा ।।
     कि तभी एक दिन सुबह जिम के समय पर अचानक पिंकी फिर जिम पहुंच गई ___

    “प्रिंस !!! भैय्या जी कहाँ है?? जल्दी बुलाओ!!”

   “भैय्या जी तो प्रोटीन पाउडर खरीदने गये हैं,दीदी आप ऑफिस में बैठिए भैय्या जी आते ही होंगे।।”

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  पिंकी ऑफिस पहुंची तो अन्दर बाँसुरी बैठी कुछ लिख रही थी,पूरी तन्मयता से__
     “क्या लिख रही हो बंसी?? इतना खो कर??”

  “अरे दीदी आप !! आप कब आई? ? मैं राजा के लिये कठिन सवालों को अलग छान्ट कर उनके जवाब तैय्यार कर रही हूं,बस ये याद कर लेने से पेपर पास करने में दिक्कत नही होगी।।”

“Very good बंसी!!! तुम पहले से थोड़ी दुबली भी लग रही हो,कुछ वजन तो कम हो ही गया है तुम्हारा।”

” हाँ लगभग साढे तीन से चार किलो कम कर लिया है इन्होनें ।।”राजा ने दरवाजा खोल ऑफिस में प्रवेश करते हुए जवाब दिया,

  बांसुरी ने पलट के राजा को सवालिया नजरों से देखा “पर हमने तो नापा ही नही,तुम्हें कैसे पता चला।।

“भैय्या जी की आंखो मे एक्स रे मशीन फिट है,किस लड़की का कितना वजन बढा कितना घटा सिर्फ देख कर ही बता लेते हैं भैय्या जी”प्रिंस अनजाने में कुछ भी मूर्खता पूर्ण अतिशयोक्ति कर जाता था

“अबे बौरा गये हो का बे!! कुछो भी बकते हो! पिंकी तुम अभी कैसे यहाँ आई,,घर में सब ठीक है ना??”

“कहाँ ठीक है भैय्या!!! वही तो बताने आये हैं,अभी सबेरे भाभी के पापा का फ़ोन आया था,वो लोग हमारी सगाई की तारीख पक्की कर दिये हैं,आज से ठीक पन्द्रह दिन बाद हमारी सगाई है,,,और आप अभी तक बड़े भैय्या से भी बात नही कर पाये।।”

“अरे ई तो नया काण्ड हुई गया!! तुम तो जानती हो पहले ऊ प्रेम के चक्कर में बिज़ी रहे उसके बाद ई जिम का सामान खरीदने दिल्ली चले गये इसी सब में बड़का भैय्या से बात करना रह गया ,अब रुको आजे कुछ जुगाड़ जमाते हैं भैय्या से बात करने का।”

“हम बताएँ राजा ,ऐसा करो ,कोरा बात करने से अच्छा ये है कि किसी तरह भैय्या से रतन की मुलाकात करवा दो,,मुलाकात ऐसी की भैय्या खुद प्रभावित हो जायें,और उसके बाद का प्लान हम बाद मे बताएँगे ।।”

बांसुरी के ऐसा बोलते ही राजा ने सवाल किया

“अब ऐसी कैसी मुलाकात करायें की भैय्या परभावित होई जाये,तुमही आइडिया देई दो।।”

“देखो सुनने में थोड़ा फिल्मी लगता है ,पर काम का  आइडिया है…… अभी बांसुरी बोल ही रही थी कि बीच में प्रेम कूद पड़ा

“भगवान बचाये भैय्या जी इ मुटकि के आइडिया से,हमरे लिये ऐसन खतरू आइडिया दी कि निरमा के दरसन भी दुरलभ हो गये,पहले कम से कम मिल जुल तो पाते थे,अब तो साला घर के अन्दर अम्मा ताने मार मार के जीना मुहाल की है और बाहर ऊ कनफड़े के गुंडे हमार रस्ता ताकते हैं कि कब हम उनके हाथ लगे औ ऊ हमार हड्डी मांस नोच नोच खा जायें  ।।

“प्रेम तुम चुप रहो!! इस बार हमारा आइडिया फेल नही होगा,,तुम्हारा और निरमा का भी ब्याह करायेंगे भाई चिंता ना करो।।”

“अरे काहे ना करे चिंता!! जिसके पास तुम जैसा दोस्त हो जो घरफुक्का राय दे बात बात पे, उसको चिंता छोड़ डायरेक्ट चिता मा चढ़ जाना चाही।।”

“कन्ट्रोल करो यार प्रेम !! तुम्हारा समय आयेगा ,तुम्हारा भी ब्याह हो जायेगा यार अभी बांसुरी का आइडिया सुनो!! हाँ बोलो बांसुरी तुम का बोल रही थी,कुछ फिल्मी उल्मी सा!!”

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” हाँ सुनो!! भैय्या जब अपनी गैस एजेन्सी में बैठे होंगे,,दोपहर को जब सब लंच के लिये जायेंगे और भैय्या अकेले होंगे उसी समय चेहरे पे नकाब बांध के दो नकाबपोश उन्हें लूटने जायेंगे,,सीधे जाकर उनकी कनपटी पे बन्दूक तान देंगे और तभी रतन आयेगा और उन दोनो से लड़ के भैय्या की जान बचा लेगा।।।और जब भैय्या उसको धन्यवाद देकर नाम पूछेंगे तब रतन अपना पूरा हिस्ट्री जॉग्रफ़ी उन्हें बता देगा बस अपना पूरा नाम नही बतायेगा,, बिल्कुल ऐसा माहौल जम जाना चाहिये की भैय्या को लगे काश ये लड़का पहले मिलता तो पिंकी की शादी इसीसे तय करते।।।

“बहुत फिल्मी है बंसी!! पता नही रतन मानेगा या नही।”पिंकी ने कहा

“धमल्लो जी ये भी बता दीजिये की ये गुंडे कहाँ से किराया मा लाने वाली है आप”प्रेम ने सवाल किया

“कही से लाने की का ज़रूरत,हमारे पास आलरेडी हैं गुंडे!! तुम और प्रिंस!!”

“पर बांसुरी तुमको लग रहा ये आइडिया काम करेगा??”भैय्या जी इतनी देर में पहली बार बोले

“भैय्या जी पगलाए गये हो का,ई मोटकी कुच्छो भी बकवास कर रही और आप इसका बात सुन रहे।”प्रेम बौखला गया

“हां तो तुम ही सूझा दो प्रेम बाबु कोई आइडिया है तुम्हरे दिमाग में,,देखो हमारा आइडिया फिल्मी है पर काम ज़रूर करेगा,,पिंकी दीदी रतन को आप मना लेना ,आज ठीक डेढ़ से 2बजे के बीच उसको एजेन्सी में भेज देना कैसे भी कर के,, आगे का सब राजा संभाल लेगा,।”

“हम कैसे बांसुरी??”

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राजा भैय्या के इस सवाल पर बाँसुरी ने उसे घूरा और __”यार हर बात तुम को समझानी पड़ती है,खाना लेकर तुम्ही जाते हो ना ,जब कभी ड्राईवर छुट्टी पर होता है,तो आज भी चले जाना और जब रतन और भैय्या जी की बात होने लगे तब तुम वहाँ पहुंच के ऐसी ऐक्टिंग करना जैसे रतन तुम्हे बड़ा पसंद आ गया ,,अब रतन वहाँ क्या करने जा रहा ,ये बताने की ज़रूरत तो नही है ना,फिर भी आप सबके लिये बता देते हैं,रतन वहाँ नया गैस कनेक्शन लेने जायेगा।।

“अब इसके आगे का प्लान भी सुन लो,राजा तुम अपनी तरफ से सिर्फ रतन की तारीफ करोगे पर पिंकी दीदी के लिये कुछ नही कहोगे उल्टा बढ़ चढ़ के सगाई की तैय्यारी मे लगे रहना, और रतन बड़के भैय्या से धीरे धीरे दोस्ती बढा लेगा।।
          जब सगाई को सिर्फ एक दिन बचेगा उस दिन तुम अपनी इस टोली के साथ चुपके से लड़के को किडनैप कर लेना,,जब सगाई के दिन भी लड़का अपने घर नही पहुंचेगा तो उसके घर वाले तुम्हारे घर फ़ोन करेंगे और माफी मांगेंगे ,तब तुम्हारे बाबूजी अपना सर पकड़ के बैठ जायेंगे क्योंकि सगाई के लिये हाल बुक हो गया है,सारे मेहमान आ गये हैं ,अब क्या किया जाये ,,तभी तुम बड़के भैय्या से कहना कि भैय्या आपका वो दोस्त जो अभी अभी आई ए एस का इंटरव्यू पास किया है उसिसे पिंकी की सगाई करा दो,,तब भैय्या बड़ी लाचारी से कहेंगे कि ऊ हमरे जात का नही है छोटे नही हम अभी इ सगाई कर देते ,लोग कहेंगे अपनी सगी बहन होती तो का ऐसे दुसरी जात में ब्याह देते तब पिंकी दीदी आयेगी और रोते हुए कहेगी भैय्या आपको जो सही लगे मैं करने को तैय्यार हूँ,आज जमाना इन्सान के काम से उसे पहचान रहा ना कि उसकी जात से,आपका दोस्त किसी भी जात का हो ,मैं तैय्यार हूँ,बस आपकी और बडे पापा की नाक नही कटनी चाहिये।।दीदी की ये बात सुनकर बड़के भैय्या खुश हो जायेंगे और जाकर आपके बाऊजी को मनाएंगे समझायेंगे और ये सगाई हो जायेगी।।”

“अरे वाह सुनने में तो अच्छा लग रहा है,पर क्या सच मे ये आइडिया काम करेगा??”

“अरे पिंकी तुमहू इसकी बतकही में आ गई,ये जैसन हमार कोल्हू पिराई है ना ,ऐसने तुम्हे भी पेर के मानेगी ,काहे इसकी बात सुनते हो यार तुम लोग।।”

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“प्रेम चुप रहो अम्मा कसम नही धर देंगे तुमको!! अबे सही लग रहा हमको ई आइडिया,क्यों पिंकी?? लगाओ जरा रतन गुरू को फ़ोन और समझाए बुझाये दो ,हम इन दोनो लामलेट को तैय्यार करते हैं ।
   इस पूरे प्लान में बिल्कुल अनिच्छा से प्रेम को भाग लेना ही पड़ा ,पर जाने क्यों अन्दर ही अन्दर उसे किसी अनिष्ट की आशंका कंपकंपा रही थी,,खैर राजा भैय्या की खातिर नकाब चेहरे पे बांध अपनी हीरो होंडा मे प्रिंस को पीछे बैठाए प्रेम निकला, निरमा की गली से निकलते हुए बड़ी हसरत भरी निगाहों से उसने छत की ओर देखा पर वहाँ खड़ी निरमा ने प्रेम को देख कर भी अनदेखा कर दिया__
               “देखा प्रिंस उस कजरौटी की ऐसी काली नज़र लगी है की हमरी निरमा भी हमारी तरफ देख नही रही।।”
           “अबे प्रेम तुम भी पूरे उल्लू हो यार!! पहला तो चेहरे पे गमछा बांधे हो,और दूसरा उसके ऊपर हेल्मेट चढाये हो ,गाड़ी का नम्बर प्लेट भी बदल दिये हो तो भाभी चिन्हेंगी भी कैसे बे??”
 
               प्लान के मुताबिक प्रिंस और प्रेम नकाब पहन कर युवराज के ऑफिस मे दाखिल हुए ,अभी उन्होनें गन निकाल के युवराज की तरफ मोड़ी ही थी की रतन वहाँ पहुंच गया__
               “आप बिल्कुल मत घबराइये ,मैं आपको बचा लूंगा ।”रतन की बात पूरी होने के पहले एक ज़ोर का चाँटा गन तानने वाले  प्रेम के चेहरे पे पड़ा _”अरे मर गया रे ,मार डाला रे मार डाला !!! “
  चिल्लाते हुए प्रेम अपना नकाब संभाले वहाँ से भागने को हुआ पर जाते जाते भी युवराज का ज़ोर का घूंसा उसकी और प्रिंस की पीठ पर पड़ ही गया, दोनों सर पे पैर रख कर वहाँ से भागे ।।।

  रतन घबराया सा कभी युवराज को कभी जान बचा कर भागते प्रेम और प्रिंस को देख रहा था,,जब दोनो आंखों से ओझल हो गये तब युवराज का दहाड़ना बन्द हुआ,तब तक वो उन दोनो को पानी पी पी कर गालियाँ देता रहा,अब उसने रतन की तरफ देखा !! तब तक रतन यही सोचता रहा कि उसे वहाँ खड़ा रहना चाहिये या भाग जाना चाहिये।।अभी रतन कुछ कहता उसके पहले ही युवराज ने उससे उसका परिचय जानना चाहा लेकिन तभी अचानक उसे तबीयत खराब सी लगने लगी,,सीने में उठने वाले दर्द और घबराहट से वो  दिवार का सहारा लेकर खड़ा हो गया,,युवराज का चेहरा पसीने से भीग गया और कलेक्टर साहब को “जी के “में पढ़े स्ट्रोक के सिम्पटम याद आ गये,,उसने फौरन युवराज को कुर्सी पर आराम से बैठाया और युवराज की बाई गरदन पर हलके हाथों से मसाज करते हुए उसे गहरी सांसे लेने के लिये कहने लगा और फिर धीरे से उसकी रीवोल्विंग चेयर को हल्के हाथों से खींचते हुए गाड़ी तक ले गया,,,युवराज को अपनी गाड़ी में बैठा वो तुरंत अस्पताल की ओर भागा।।


 
     जब रतन की स्विफ्ट एजेन्सी के गेट से निकल रही थी,उसी समय राजा भैय्या अपनी एक्स यू वी में अन्दर दाखिल हो रहे थे,रतन का भैय्या को गाड़ी मे ले कर कहीं जाना तो प्लान का हिस्सा था नही,उन्होनें अपने छोटे से दिमाग पर बहुत ज़ोर दिया पर उन्हें बांसुरी का बताया ऐसा कोई प्लान याद नही आया…..अभी राजा सोच में डूबा खड़ा था की कान्खते कराहते प्रिंस और प्रेम नकाब हटा कर वहाँ चले आये।।

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“हम कहे रहे ,,ई सनिचर हमरी जान की दुसमन है भैय्या जी!! हमको तो लगता है निरमा की अम्मा हमारी सुपारी दे रखी है ई बंसुरीया को,,जब देखो तब हमे मारे का प्लान बनाती रहती है।।आज तो बड़का भैय्या का हाथ से हमारा हत्या हो जाना था, ऊ तो सुबह सुबह चौकी के बजरंग बली का आसिर्वाद ले आये थे ,वर्ना अभी आप हमरी अर्थी सजाते होते।।

  प्रेम अपना दुखड़ा रो रहा था की भैय्या जी का फ़ोन बजा__’ जय हो जय हो शंकरा …..

“हेलो!! राजा बोल रहे हैं ।”

“राजा भैय्या हम रतन बोल रहे हैं,बडे भैय्या को हार्ट अटेक आया है,आप जल्दी से जल्दी सिटी हॉस्पिटल पहुंच जाइये,हम बस अभी पार्किंग मे गाड़ी डाल रहे हैं,,पहले चला रहे थे,इसलिए फ़ोन नही कर पाये,,,जल्दी आ जाईये आप !!”

“हे शिव शंकर ये क्या हो गया,चलो बैठो दोनो,अभी के अभी अस्पताल जाना है,भैय्या का तबीयत बिगड़ गया है,,,साला ई कलेक्टर उलेक्तर से रिस्ता जोडना भी रिस्की है,अब देखो ससुर गाड़ी चला रहा तो फ़ोन नई किया,हमको देरी से खबर मिली,,चलो यार प्रिंस कहाँ अटक गये तुम??”

“ऊ भैय्या जी घर मा फ़ोन करने लग गये थे।”

“किसके घर मे बे??”

“आपके औ किसके,आपकी अम्मा बाऊजी को बता रहे थे ,भैय्या को हार्ट फेल हुआ है।।”

“अबे तुम ना गधे हो एक नम्बर के,,का जरुरत रही अभी से अम्मा को बताने की ,अब ऊ वहाँ रो रो के जो रामायण गायेगी,,तुम्हरी ना ये हडबड़ी की आदत से बहुते परेसान हो गये हैं ।।”

हैरान परेशान राजा प्रिंस और प्रेम जब तक हॉस्पिटल पहुँचे तब तक में वहाँ रतन के फ़ोन से पिंकी और बांसुरी भी पहुंच चुके थे।।

   रतन ने उन्हें बताया की बड़े भैय्या को इमरजेन्सी में भर्ती करा दिया गया है,डॉक्टरों की टीम सारी जांच मे लगी हुई है,अभी किसी को भी अन्दर जाने की इजाज़त नही है।।राजा को बहुत ज्यादा परेशान देख बांसुरी उसके पास पानी की बोतल लिये आई__”पानी पी लो राजा!! और ज्यादा परेशान मत हो!! देखो भैय्या को समय पे अस्पताल तो ले आये ना ,तो अब कुछ भी बुरा तो होगा नही ।।और दुसरी बात तुम चिंता कर कर के अपनी तबीयत बिगाड़ लोगे,जबकि अभी यहाँ सारी भागदौड तुम्हें करनी है।।”अभी बांसुरी राजा से बात कर ही रही थी कि ओब्सर्वेशन रुम का दरवाजा खुला और एक जूनियर डॉक्टर बाहर निकल कर आई__

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  “आप में से युवराज अवस्थी के साथ कौन है”

   रतन पिंकी और राजा दौड़ पड़े “हम हैं ।”

“लिजिये ये कुछ दवाएं और इन्जेक्शन ले आईये , नीचे फार्मेसी है” उस लेडी डॉक्टर ने पर्ची रतन को पकड़ा दी और फिर राजा की तरफ बड़ी गहरी नजरों से देखने लगी__”सुनो तुम राजा हो ना !! राजकुमार अवस्थी!!”

  प्रेम और प्रिंस के साथ साथ पिंकी और बांसुरी की भी आंखे फट गई,ये इतनी सुन्दर डॉक्टरनी राजा को कैसे जानती है।।

“हां हम राजा ही है!! अरे !! तुम ,,तुम तो रानी हो ना ,,अरे यहाँ कैसे ,,और हमारे भैय्या कैसे हैं,पहले ऊ बताओ।।”

“तुम्हारे भैय्या बिल्कुल ठीक है,उन्हे हाइपर ऐसिडिटी हुई थी,,जलन कुछ ज्यादा बढ़ने के कारण और गर्मी से डिहाइड्रेशन से बेहोश हो गये थे,,अब वो ठीक हैं ।।

“का मतलब भैय्या को हार्ट उर्ट अटेक नई आया।”

राजा की बात पर डॉक्टर हँस पड़ी “नही कोई हार्ट अटैक नही आया,,उनका ई सी जी और बाकी सारे टेस्ट नॉर्मल आये हैं ,,घबराने की कोई बात नही है।।
   “तुम यहाँ कैसे रानी ?? तुम तो बाहर गांव चली गई रही पढ़ने”?? राजा के सवाल पर रानी मुस्कुरा दी।।
     “हां पढ़ाई पूरी हो गई,अभी हमे इंटर्नशिप करना था,तो हमने सोचा अपने शहर से ही किया जाये ,इसलिए हम यहीं आ गये।।और बताओ तुम क्या कर रहे अभी।।”
    रानी को देख पहले ही गुलाबी हो रहे राजा भैय्या उसके सवाल पे पूरे लाल हो गये,,अब उस डॉक्टरनी  के सामने क्या बोलते कि पांच साल में भी स्कूल का साथ नही छूटा ,बेचारे जवाब सोचने में व्यस्त हो गये।।

अभी वो दोनो बात कर ही रहे थे कि पूरा का पूरा अवस्थी खानदान वहाँ पहुंच गया,,रूपा और उसकी सास एक दूसरे से होड़ लगाती तार सप्तक में लयबद्धता के साथ रो रही थी,,पिंकी ने रूपा को और बांसुरी ने रूपा की सास को सम्भाला, सब कुछ बता देने पर भी दोनो में से कोई चुप होने को राज़ी ना था ,तब बाँसुरी ने धीरे से रूपा के कान मे कहा__

    “भाभी ,भैय्या एकदम ठीक है अब आप भी शान्त हो जाइये,वैसे भी रोने से आपका काजल फैल के पूरा चेहरा को काला काला कर दिया है,, आप तो हमसे भी अधिक कलूटी लग रही है।।”

   रूपा काली और भयानक दिखने के डर से एकदम से चुप हो गई,और उसकी हालत देख उसकी सास को हँसी आ गई,और वो भी अपना रोना भूल गई ।।
       कुछ देर पहले के चिंता के बादल छंट गये और शीतल मन्द समीर बहने लगी,,डॉक्टर ने बाहर आकर सबको मरीज से मिलने की इजाज़त दे दी।।

राधेश्याम जी युवराज के पैरों की तरफ बैठे और माताजी बेटे के सिरहाने बैठी,धीरे धीरे सर सहलाने लगी__”ये सब हुआ कैसे युव ?? पर अच्छा हुआ तुम समय पे अस्पताल पहुंच गये,अरे पर तुम यहां पहुँचे कैसे ,,मतलब राजा तो हमसे कुछ मिनट पहले ही यहाँ पहुंचा था ना,तो तुम्हे यहाँ लेकर कौन आया??”

“जी बाबूजी !! एक लड़का आया था एजेन्सी में शायद कनेक्शन के लिये आया होगा,वही हमारी तबीयत बिगड़ते देखा तो फौरन अपनी गाड़ी में हमे डाल यहाँ ले आया,,हो सकता है बाहर हो,देखो तो राजा कोई दुबला पतला सा लड़का खड़ा है क्या बाहर,बुला लाओ भीतर,आँख पे चश्मा लगा था,पढा लिखा टाईप का दिख रहा था।।”

अभी युवराज ने अपनी बात पूरी भी नही की थी कि डॉक्टर रानी ने कहा__पढा लिखा टाईप का दिख नही रहा था,वो बहुत पढा लिखा है,,जी आपको अस्पताल लेकर आने वाला कोई और नही अभी अभी आई ए एस का इंटरव्यू अच्छी रैंक से पास करने वाले भावी कलेक्टर रत्नप्रकाश हैं,आप लोग मिल कर जल्दी से धन्यवाद दे दीजिये वर्ना आपके धन्यवाद देने के पहले ही कही मसूरी ना उड़ जाएँ ।।””

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तब तक राजा रतन को अन्दर लेकर आ गया ,, राधेश्याम ने उठ कर रतन के दोनो हाथ पकड़ लिये __”बेटा कैसे धन्यवाद कहूँ आपको ,,आपने जो किया है उसके लिये धन्यवाद बहुत छोटा शब्द है,,वैसे बेटा कौन गांव के हो ,,किसके घर के हो,,हियाँ तो हम लगभग सभी को भले से जानते हैं ।।”

“अंकल जी धन्यवाद की ज़रूरत नही है,,ये तो मेरा फर्ज था,मै नही होता तो कोई और होता जो इन्हें सही समय पर अस्पताल ले आता।।””

“नही दोस्त !! तुमने वाकई बहुत उपकार किया,,कुछ समय के लिये मुझे भी लगा की मुझे हार्ट अटैक आ गया है,,अच्छा डॉक्टरनी साहिबा कह रही थी ,,तुमने आई ए एस निकाल लिया है, ये तो बहुत खुशी की बात है,ये हमारी छोटी बहन है पिंकी!!! इसका भी इंटरव्यू में हो गया है सेलेक्शन !!अच्छा है हम लोग भी सोच में थे इतनी दूर मसूरी अकेले कैसे भेजेंगे ,अब कम से कम कोई जान पहचान का तो रहेगा।।”

  युवराज के ऐसा बोल के चुप होते ही राजा जो अब तक सबसे पीछे चुपचाप खड़ा था ने अचानक अपना मुहँ खोला__” रतन गुरू !! तुम्हें तो ट्रेनिन्ग में जाने मे अभी टाईम है ना।””

“बस पन्द्रह दिन में जाना है मसूरी।।”

“हां तो हमारी बहन की सगाई तक रुक जाओ गुरू,,उसके बाद चले जाना।।”राजा की इस बात का वहाँ सभी ने समर्थन किया,कुछ देर युवराज के साथ बैठ कर घर के लोग वापस चले गये,,जब कमरे में अकेले युवराज और राजा थे,राजा बडे भैय्या के लिये जूस लेकर आया __”राजा पता है हम हमेशा से एक बात सोचते थे”

“क्या भैय्या??”

“हमे ना हमेशा से पिंकी के लिये ऐसे ही लड़के की तलाश थी।।”

“कैसे लड़के की भैय्या??”

“अरे रतन जैसे लड़के की यार!! कितना सोच सोच के बात करता है,,हर शब्द नाप तौल के बोलता है, बिल्कुल सुलझा हुआ समझदार सा लड़का है,,हमारी पिंकी के जैसा ,है ना राजा !!! और देखो पिंकी जैसे ही प्रशासनिक सेवा में भी जा रहा है!! कितना ही अच्छा होता अगर ये लड़का पहले मिल गया होता ,,है ना??”

“तो अभी भी का बिगाड़ होई भईया,,अगर आप चाहो तो सब कर सकते हो,””

“अरे कैसी बात कर रहे हो राजा !! अब तो शादी तय हो गई है पिंकी की ,अब कुछो नई हो सकता भाई।।
वर्ना हमारा ससुर हमारा गला पकड़ लेगा।।”

  दोनो भाई साथ साथ हंसने लगे।।।

  क्रमशः


 
aparna..

शादी.कॉम -8

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    हनुमान गली का गुड्डा असल में गुड्डा नही गुण्डा था,एक नम्बर का मवाली और नकारा गुड्डा अपने मोहल्ले ही नही सारे शहर का सर दर्द था।।
  मोहल्ले में घूम घूम के दुकानदारों को सताना और चिढ़ाना उसका प्रिय शगल था।।
     “काका कचौरी वाले” की दुकान हो या चौरसिया का पान ठेला सभी जगह उसकी उधारी की किताब के पन्ने भरते चले जा रहे थे,और वो ऐसे ताव से सब जगह से वसूली करता फिरता जैसे फ़्री में खाने का उसने लाइसेंस ले रखा हो।।
    उसके ताऊ हवलदार थे,जिनके नाम का डर दिखा कर वो हर किसी पर अपना रौब मारता था। एक बार ऐसे ही मंदिर के बाहर किसी बुज़ुर्ग से गलती से लगी ठोकर के बदले जब गुड्डा ने उस बुज़ुर्ग का गला पकड़ लिया और उन्हें एक पर एक बड़ी बड़ी गालियों से नवाजने लगा तभी जाने कहाँ से हवा में लहराता एक थप्पड़ आया और उसकी कनपटी को झनझनाते हुए निकल गया।।।
      दस सेकंड के लिये उसके कान में सिर्फ मख्खी भिनभिनाने की आवाज़ होती रही,अपनी आंखों को अच्छे से झटक के उसने नेत्र गोलकों को सही जगह टिका कर चेहरे को उस ओर घुमाया जहां से थप्पड़ पड़ा था,सामने ब्लू जीन्स और ब्लैक टी शर्ट में राजा भैय्या खड़े थे।।
            दायें हाथ के मणिबंध में रुद्राक्ष की माला लपेटे,माथे पर अगुरू चंदन का तिलक लगाये, आंखों पे गुची का चश्मा लगाये भैय्या जी बिल्कुल महादेव शिव शंकर का मॉर्डन अवतार लग रहे थे।।
   
    उन्हें देख कुछ 2 सेकंड के लिये गुड्डा  अपने थप्पड़ की तिलमिलाहट भूल कर उन्हें प्रनाम करने ही वाला था कि उसे याद आ गया कि इन्हीं चौड़े तगड़े हाथों ने कुछ समय पहले उसके चौखटे का भूगोल बिगाड़ने की कोशिश की थी।।
      तैश में आकर उसने उन्हें मारने को अपना हाथ उठाया जिसे बड़ी आसानी से अपने बाएं हाथ से ही पकड़ कर भैय्या जी ने मरोड़ कर रख दिया।।।
     दोनों तरफ की सेना मुहँ बाये ये सीन देख रही थी,जो बिल्कुल किसी पुरानी फिल्म की याद दिलाता सा लग रहा था,जिसमें सुनील दत्त ने आशा पारेख का हाथ मरोड़ दिया और वो बेचारी छटपटाते हुए गीत गा रही”मैं तुझसे मिलने आई मन्दिर जाने के बहाने”।।

   इस पहली मुलाकात के बाद गुड्डा ,भैय्या जी से खार खा बैठा।।।अब वो कोई ऐसा मौका  छोड़ना नही चाहता था जहां भैय्या जी की  नेकनामी को बदनामी में बदल सके पर ईश्वर इच्छा बलवती, आज तक उसे ऐसा कोई सुनहरा मौका नही मिला था।।
      परसों शाम जब बनवारी की टपरी पे बैठा अपनी पच्चीसवी मुफ्त की चाय गटक रहा था तभी उसका चेला भागा भागा आया,और उसे अपने मोहल्ले की निरमा और प्रेम को साथ  साथ देखे जाने की खबर दे दी।।
    गुड्डा का मन बल्लियों उछलने लगा ,पर उस वक्त शाम हो चुकी थी,इसलिए मन मार के अगली सुबह का इन्तजार किया,और अगले दिन सुबह उठते ही भैय्या जी के जिम पहुंच गया,,हालांकी वहाँ भी उसे निराशा ही हाथ लगी,क्योंकि प्रिंस ने बड़ी ढिठाई से उसे बोल दिया”भैय्या जी नई हैं,कल आना।।”

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“अबे साले हम भिकारी है का बे!! जो बोल रहे कल आना,,जाके अपना भैय्या जी को बोल देना ,अगर हमरे मोहल्ला की लड़की की तरफ आँख उठा कर देखा तो हम सीधा सरिया आँखी में घुसा देंगे।।समझे!”

इतनी मोटी धमकी जिसके मूर्तरूप में परिणत होने के कोई आसार नही थे,दे कर अपना सीना चौड़ा किये गुड्डा वहाँ से निकल गया,प्रेम की तलाश में!!

    प्रेम का मिलना असम्भव था!!!वो यहाँ जिम मे छिपा बैठा था,जो राजा भैय्या के हत्थे चढ़ चुका था।।

“अबे इधर आओ बे!! का गदर मचा रक्खे हो !! जिसे देखो साला हमे धमकाने चला आ रहा है तुम्हरे कारन !! का है गुरू?? इसक उसक में पड़ गये हो हम सुने!! कौन है भाई ,कुच्छो बताओगे।।”

  प्रेम जो अब तक चुपचाप जिम के बाथरूम में गुड्डा के डर से दुबका बैठा था,उसे राजा भैय्या की बड़ी बड़ी आंखे देख एक बार फिर से प्रेशर आ गया,वो वापस पेट पकड़ कर बाथरूम जा ही रहा था कि भैय्या जी ने पीछे से कन्धे पर हाथ रख उसे रोक दिया__”अब साले जो आ रहा है तुमको ,यहीं करो!! पर पहले बताओ का माजरा है ई ,वर्ना ऐसा धोबी पछाड़ लगायेंगे ना कि सीधा देवरिया जा कर गिरोगे अपन मामा घर!! समझे।।”

“भैय्या जी दुई मिनट दे दो ,बस हल्का होके आके सब बतातें हैं ।।”

  प्रेम जैसे ही वापस लौटा जिम में 4जोड़ी आँखो को खुद को घूरता पाया।।

*********************

  प्रेम ने जवानी में कदम रखते ही अपने नाम को बड़ा सीरियसली लेना शुरु कर दिया था,पुराना दिलजला था,और ऐसा दिलजला था की छांछ से भी मुहँ जलाता फिरता था।।

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   पण्डित रामसनेही दुबे डिग्री कॉलेज में पहुंचते ही जैसे प्रेम के अरमानों को पंख लग गये थे,जो लड़की सामने दिख जाती ,वही दिल को भा जाती,और पूरा दिन प्रेम उसके सपनों में काट देता।।
   फिर एक दिन जब प्रेम अपनी हीरो हौंडा को कॉलेज की पार्किंग में खड़ा कर “कमला पसंद” को निगलने ही जा रहा था,कि अचानक उसकी गाड़ी से किसी की टक्कर हुई और उसकी बाईक आगे वाली और आगे वाली उसके भी आगे वाली बाईक को लेकर गिरती चली गई,गुस्से में गाली देने ही वाला था कि मिसरी जैसी आवाज़ कान मे घुल गई_
     “सॉरी हम जान बूझ के नई गिराये।।”

  पलट के देखा तो देखता ही रह गया,वो और भी कुछ कुछ बोलती रही पर प्रेम के कानों में एक ही गाना सुनाई देता रहा_ एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा ……
     “जैसे खिलता गुलाब,जैसे शायर का ख्वाब
       जैसे उजली किरण,जैसे बन मे हिरण
        जैसे चांदनी रात जैसे नरमी की बात
         जैसे मन्दिर में हो एक जलता दिया !!!!

   जब तक गाने का प्रथम अन्तरा समाप्त हुआ, लड़की जा चुकी थी,परन्तु प्रेम को अपना पहला प्यार मिल गया था।।
     अगले दिन सारी खोज बीन कर ली,राजकीय कन्या इंटर कॉलेज से आई सकीना डिग्री कॉलेज में बी ए फाइनल इयर की छात्रा थी।।
 
“साला आधा साल खराब कर दिये इस कॉलेज में,आज तक हमारा नजरे नई पड़ा,और जब पड़ा तो सीधा प्यारे होई गया।।”प्रेम की इस बात पे नन्हे ने चुटकी ली

“तो परपोस करे दो फिर बेलेन्टाईन आने में तो अभी समय है।।”

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“अरे नई कर सकते भैय्या,हमार महतारी नई मानब!! सकीना की जगह सुसीला ,सीला,कबिता उबिता होती तो अलगे बात होता,,छोड़ो हटाओ।।”
  इस प्रकार प्रेम का पहला प्यार उसके सीने में दफन हो गया,अभी वो देसी दारु और चना चटपटी के साथ अपने गम को अच्छे से भुला भी नही पाया था कि ,उसके जीवन में फिर से एक बार प्यार ने दस्तक दी।।

  अबकी बार दस्तक उसके दरवाजे पे हुई,उसिने दरवाजा खोला__ “नमस्ते!! हम ई पड़ोस वाले घर में आये हैं,कल ही शिफ्ट हुए हैं,थोड़ी चीनी मिलेगी,हमें चाय बनानी है।।”

अभी बातचीत चल ही रहा था,कि अम्मा बाहर निकल आई __”अरे चीनी भी ले जाना,पहले बैठो और चाय पी लो”।

   प्रेम का दूसरा प्रेम अम्मा के संग चाय पीते बतियाता रहा पर प्रेम को कुछ और ही सुनाई दे रहा था__  “एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा………..
          जैसे सुबह का रूप,जैसे सर्दी की धूप।
          जैसे वीणा की तान जैसे रंगो की जान
           जैसे बल्खाये बेल जैसे लहरों का खेल
           जैसे खुशबू लिये आई ठंडी हवा।।।

जब तक दूसरा अन्तरा समाप्त हुआ ये लड़की भी जा चुकी थी,पर बेचारी चीनी लेने आई और भूल कर चली गई,उसके जाने के बाद अम्मा ने प्रेम को कटोरी पकड़ा दी कि नये पड़ोसी को चीनी दे आये।

   मुहँ धो के मर्दों की गोरेपन वाली क्रीम लगा कर बालों को भीगा कर अच्छे से ज़ुलफे संवार कर ,खूब पर्फ्यूम डियो डाल कर पूरी तैय्यारी से प्रेम शक्कर की कटोरी लिये चला।।
 
  “अरे का हमरी पतोहू लेने जाई रहे हो जो अतका सज धज मचा दिये,जल्दी जल्दी आओ,हिया सिलिंडर मरा खतम हुई गवा है,ई टाँकी को अपना फटफटी मा पीछे रख के बदला लाओ।।”

  प्रेम तो खुद मे खोया सा था,अम्मा की इतनी गैर-जरूरी बातें सुनने का उसके पास वक्त ही नही था।।पड़ोस के दरवाजे पे बिल्कुल जेंटलमैन स्टायल में खड़े होकर उसने बेल बजाया,दरवाजा खुला और
ये तो कोई उसकी ही उमर का लड़का खड़ा था_

“जी कहिये!! किससे मिलना है??”

“जी वो !! हमको लग रा हम गलत घर मा आ गये,वो थोड़ी देर पहले सक्कर मांगने…….प्रेम की बात पूरी भी नही हुई कि अन्दर से वही रूपसी जो सुबह चिनी माँगने गई थी ,बाहर आई__
     “बेबी !! ये हमारे पड़ोसी हैं,मै अभी इन्ही के घर से चाय पीकर आ रही हूँ,देखो आंटी जी इस सो स्वीट ,मै भूल गई तो उन्होनें खुद चीनी भेज दी।
  आप अन्दर आईये ना भैय्या!! इनसे मिलिये ये मेरे पति है अतुल शर्मा,और मै आभा।।”

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अच्छा हुआ दिल टूटने की आवाज़ नही होती वर्ना उस नाज़नीँ के मुहँ से भैय्या सुन के प्रेम का दिल जो चाक हुआ था कि बेचारा चीनी उन्हें बमुश्किल थमा भागा वहाँ से।।

  बेचारा प्रेम !!! माँ ने सलमान सोच कर नाम रखा पर किस्मत प्रेम चोपड़ा वाली हो गई ।।एक तो फष्ट इयरे मा लटक गये उसपे लडकियों का सनिचर !!
     इसिलिए जब अम्मा बोली चलो सनी देब  के मन्दिर मा मन्नत का तेल ऊल चढ़ा आये तो प्रेम तुरंते मान गया।।

    सनी देब में तेल चढ़ाया ,सत्ती गुड़ी में रोट चढ़ाया,बस वहीं माता का चमत्कार भवा!!!
   
    रोट चढ़ा के प्रेम मन्दिर की सीढिय़ां उतर अपनी चप्पल ढूँढ ही रहा था कि एक  नाज़ुक नवेली की साईकल की चेन उतर गई ,,अब किसी लड़की को  इतना बड़ा प्राब्लम हो और प्रेम अपनी चप्पल ढूँढता रहे शोभा देता है क्या?? बेचारा नंगे पैर गर्म तवे से जलते रोड पे खड़ा होकर चेन बनाता रहा,और लड़की अपनी गुलाबी चुन्नी से अपना आप को हवा झलती रही!! दो मिनट में चढ़ने वाली चेन भी उस दिन पूरा इक्कीस मिनट में चढ़ी,खैर चेन चढ़ा कर प्रेम ने नजरें ऊपर उठाई,लड़की ने प्रेम को देखा ,प्रेम ने लड़की को देखा ,और पहली बार दोनो दिलों में एक साथ घंटी बजी!!!

     पर ना ये घंटी जो दोनो को संग संग सुनाई दी ये सत्ती माता की आरती की घंटी थी,पर दोनो के हृदय ने एक दूसरे को चीन्ह लिया,,निरमा ने धीमे से कहा-” थैंक यू ….. अबकी बार प्रेम को अन्तिम अन्तरा सुनाई दिया जो सार्थक हो गया__
     “एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा ….
          जैसे नाचता मोर,जैसे रेशम की डोर
          जैसे परियों का राग,जैसे संदल की आग
          जैसे सोलह सिंगार जैसे रस की फुहार
          जैसे आहिस्ता आहिस्ता चढता नशा ।।

    अभी निरमा का नशा प्रेम पे चढ़ने ही वाला था कि बाँसुरी अपनी साईकल हाथ से खींचती चली आई__”तुम यहाँ कहाँ अटक गई,क्या हो गया निरमा??”

“हमारी साईकल का चेन उतर गया था,इन्होने ठीक किया।।”

“तो अब तो ठीक हो गया ना चेन,,अब चलो ,देर हो रही कॉलेज को।।”

  निरमा बाँसुरी के साथ चली गई और छोड़ गई प्रेम के दिल पे अपनी छाप!!!

   ये प्रेमप्रताप पाण्डेय की सम्पूर्ण जीवन गाथा थी जिसमें से सुविधानुसार प्रेम ने अन्तिम अंतरे वाली लड़की वाला अपना किस्सा वहाँ मौजूद सभी को कह सुनाया।।।
               सदियों से होता आ रहा कि किस्से कहानियाँ हम कानों से सुनते हैं लेकिन जाने क्यों हमारी आंखें फैल जाती हैं सुनते हुए,,वहाँ मौजूद सभी के साथ वही हुआ।

“अब करना क्या है गुरू?? सादी वादी का विचार है की नही।”प्रिंस के ऐसा पूछते ही प्रेम ने जवाब दिया

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“हैं काहे नही बे!! शादी तो निरमा से ही करना चाहतें हैं,पर हमारी अम्मा भी कसम खाये बैठीं हैं,कहती है ,वा वर्माइन हमार  बहुरिया ना बनी,, नही ता हम जहर खा ले और मर जाब, ,,अब बोलो का करें,भैय्या जी आप ही कुछ रस्ता सुझाओ।।अभी तक अम्मा से डरे बैठे थे,अब ई गुड्डा और आ गया चौधरी बन के,हम भी कोनो डरते नई हैं,हम तो साले के पनही न पनही लगाते पर आपका और जिम का लिहाज कर के चुप रह गये।।”

“तुम चुप नही रहे बल्कि छुप गये ,अब जादा बतियाओ ना ,नही  हम तुमको सही का पनही (चप्पल)धर देब।।लल्लन के ऐसा बोलते ही प्रिंस के बंमपिलाट दिमाग में एक खतरनाक आइडिया आया

  “हम तो कहते हैं,तुम निरमा को ले कर देवरिया निकल जाओ,हम फ़ोन पे तुम्हें यहाँ का सब खबर देते रहेंगे ,जब मामला ठंडा हो जायेगा तो सादी उदी कर के वापस आ जाना।।”प्रिंस की इस बात का जवाब दिया बांसुरी ने

“वाह ! प्रिंस जवाब नही क्या आइडिया दिये हो” अपनी तारीफ सुन प्रिंस चौड़ा हो गया,तब बांसुरी ने अपनी बात आगे बढ़ाई

“काहे तुम क्राईम पैट्रोल बिल्कुल ही नई देखते क्या?? अरे भागने वालों का फ़ोन नम्बर सबसे पहले ट्रैक करती है पुलीस,उसके बाद इन लोगो का गला पकड़ कर पुलीस लायेगी और दोनो के घर वालो के हवाले कर देगी,उसके बाद मुश्किल से एक महीना मे निरमा की शादी उसके समाज में हो जायेगी और प्रेम यहाँ जिम मे चदरिया झीनी रे झीनी सुनेगा,और हम सब को सुनाएगा।।”

राजा ने बांसुरी को देखा और पूछा__”फिर तुम ही बताओ का करना चाहिये।।”

  “हां हम बताते हैं एक नम्बर आइडिया देंगे जिसका फेल होने का चांस बस फिफ्ती परसेन्ट है।”और बांसुरी हंसने लगी__”सुनो राजा तुम जाओ प्रेम के घर और उसकी अम्मा से बात करो,और हम जायेंगी निरमा के घर उसकी अम्मा से बात करने।।एक बार दोनो घर के गृहमंत्री तैय्यार हो गये तो प्रधान मंत्री को मनाना आसान हो जायेगा।।”

  “लेकिन बंसी अगर हमारी अम्मा नई मानी तो,का करेंगे फिर।””निरमा ने पूछा

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“अगर ऐसा हुआ निरमा तो तुम फिर वही करना जो तुम्हरी अम्मा कहेंगी,क्योंकि एक बात याद रखो अपना अम्मा से ज्यादा तुमको कोई प्यार नही कर सकता ई प्रेम भी नही।।।अपनी जिद अपनी इच्छा अपने घर वालों को बताओ उन्हें मनाने की भी कोशिश करो पर जीने मरने की धमकी मत देना,,अगर प्रेम प्यार से मान गये तो अच्छा है नही तो तुम लोग उनकी बात मान जाना,उसी मे सब का भलाई है निरमा,,आज तुम भले हमारा बात ना समझो पर एक दिन हमारा बात तुम्हारा भेजा में घुस जायेगा।।”

  जिम में सन्नाटा छा गया ,तभी पिंकी ने आगे बढ़ कर बंसी को गले से लगा लिया___प्राउड ऑफ़ यू बंसी !! अब तुम और राजा भैय्या पहले इस प्रेम के प्रकरण को सुलझाओ फिर इसके बाद हमारे लिये काम करना है तुम दोनो को।।है ना।।”

“हां दीदी!!! बड़के भैय्या मान जायेंगे,और बस एक बार वो मान जाये फिर घर वाले भी ।।”दोनो सखियाँ एक साथ मुस्कुराने लगी

“राजा भैय्या अब हम घर जाते हैं,आप भी इस प्रेम का गणित बैठा के जल्दी से घर आ जाओ।।।”

जाते जाते पलट के पिंकी ने राजा को देखा और बोली__”अरे हाँ रेखा को भी फ़ोन कर लेना ,उसका फ़ोन आपने उठाया नही था।।और ज़ोर से खिल्खिलाती हुई पिंकी जिम से बाहर निकल गई ।।

प्रिंस और प्रेम शातिर मुस्कान के साथ भैय्या जी को देखने लगे वहीं लल्लन मन ही मन सोच मे पड़ गया कि बताओ क्या किस्मत है राजा भैय्या की होने वाली दुल्हीन और हमारी गर्ल फ्रेंड का एक ही नाम है।।सोचते सोचते वो भी मुस्कुराते हुए प्रिंस और प्रेम के साथ भैय्या जी को छेड़ने मे लग गया कि तभी उसके फ़ोन की रिंग बजने लगी__

  “हाँ बेबी!! बोलो …..बोलते हुए लल्लन बाहर की ओर निकल लिया।।।

उसके पीछे से एक ज़ोर का ठहाका उसका पीछा करता चला आया।।।
 
  क्रमशः

aparna..

शुभकामनाएं … हिंदी दिवस की

महादेवी वर्मा

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जो तुम आ जाते एक बार

जो तुम आ जाते एक बार

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग

आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार

हँस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग

आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार

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समिधा-27

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   समिधा- 27

    केदारनाथ त्रासदी को घटे सात महीने बीत चुके थे। जिन्होंने अपने अपनों को खोया था वो उस त्रासदी को इन सात महीनों में भी नही भूल पा रहे थे, यही हाल उनका भी था जिनके अपने इस त्रासदी से वापस लौट चुके थे।

        वरुण मंदिर ट्रस्ट में स्थायी सदस्यता पा चुका था। उसके माता पिता ने भी इस बार न उसे रोका न टोका,और सहर्ष सहमति दे दी। कादम्बरी के परिवार ने ज़रूर कुछ टोकाटाकी करने की कोशिश की लेकिन वरुण का परिवार वरुण के सामने दीवार बन खड़ा रहा, फिर अपना सा मुहँ लेकर उन्हें भी लौटना ही पड़ा।
    कोलकाता के मंदिर में दो महीने बिताने के बाद वरुण और दो चार अन्य सेवादारों को मथुरा राधाकृष्ण मंदिर भेज दिया गया था।

    मंदिर में सुबह सवेरे उठ कर सारे मंदिर परिसर में झाड़ू लगाने के बाद पानी का छिड़काव कर वरुण अपने दो साथी सेवादारों के साथ पोंछा लगाया करता।
     मंदिर की ही पुष्पवाटिका से चुन चुन कर लाये फूलों की फिर सारे लोग मिल कर लंबी सी माला गूंथते और द्वारिकाधीश का श्रृंगार होता।
      दोपहर बाद सभी एक साथ बैठे भजन गाया करते।
   इस सब के साथ ही सुबह और शाम का समय वेदाध्ययन के लिए भी निश्चित था।
   वरुण को ये सारे कार्य प्रिय थे। वह इन सभी कार्यों को करते हुए अपने मन को शांत रखने का पूरा प्रयास करता और उसे इन कुछ महीनों में इन कार्यों में एक सुख मिलने लगा था एक शांति मिलने लगी थी ऐसा लगने लगा था कि वह अपने कृष्ण के आसपास है और कृष्ण सिर्फ उसके ही नहीं हर किसी के आसपास हैं। और इसीलिए धीरे-धीरे वरुण की श्रद्धा इस बात पर बढ़ने लग गई थी कि जो जिसके साथ होता है वह सब कृष्ण का रचा रचाया है और इसीलिए उससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता ।
  वरुण की यही सोच उसे धीरे-धीरे शांति की तरफ ले जा रही थी, लेकिन बीच-बीच में कभी अचानक एक चेहरा उसकी खुली आंखों में झांकने चला आता। जैसे पूछ रहा हो…-” मेरा क्या कसूर था जो तुम्हारे कृष्ण ने मुझे ऐसी सजा दी ?” ऐसे समय में वरुण अपने विचारों को झटक कर कोई ना कोई किताब खोल कर पढ़ने बैठ जाया करता। लेकिन इन सारी व्यस्तताओं के बाद भी बार बार एक जोड़ी पनीली आंखें उसका पीछा करती सी लगती जैसे कह रहीं हो “वापस आ जाओ!”  उसे अक्सर यूँ लगता कि वो मन से यही सब करना चाहता तो है पर उसकी आत्मा इस सब में शामिल ही नही होना चाहती। 
सुबह और शाम के समय के अतिरिक्त रात में भी जब उसे समय मिलता वह मंदिर परिसर के कोने में बैठ अपनी किताब को पढ़ने में डूब जाया करता। वेदों का अध्ययन करते करते धीरे-धीरे उसे हिंदू धर्म की जटिलताएं समझ में आने लगी थी।
   आज तक जिन रीति-रिवाजों को मानने के लिए वह अपनी मां का मजाक उड़ाया करता था और रीति-रिवाजों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को देख पढ़ कर समझ कर उसके ज्ञान चक्षु भी खुलने लगे थे।
    मंदिर का पूरा कार्य एक ट्रस्ट के अधीन था वह ट्रस्ट पूरे भारतवर्ष ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कृष्ण मंदिर की स्थापना कर चुका था। मंदिरों में होने वाले आय-व्यय के साथ ही दानदाताओं को अधिक से अधिक दान के लिए प्रेरित करने के लिए भी मंदिर ट्रस्ट को पढ़े लिखे शिक्षित वर्ग की आवश्यकता थी और अगर वरुण जैसे युवा इस कार्य में उनका सहयोग करें तो मंदिर ट्रस्ट को लाभ ही लाभ था इसलिए वरुण की तरफ मठाधीशों का कुछ अधिक ही झुकाव था।

   मंदिर में अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग पद सृजित बहुत से सेवादार ऐसे थे जो स्वेच्छा से जीवन पर्यंत सिर्फ सेवादार ही बने रह जाते थे।लेकिन कुछ उनमें से ऐसे भी थे जो सेवादार से ऊपर के कुछ 1 पदों तक जाकर रुक जाए करते थे। लेकिन वरुण जैसे उच्च शिक्षित युवाओं को मंदिर ट्रस्ट द्वारा सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ाते हुए मंदिर के मठाधीश तक के पद तक पहुंचाए जाने की व्यवस्था थी। वैसे मंदिर में जाति धर्म या गरीबी अमीरी के नाम पर किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं था। सभी के लिए समान कार्य बांटे गए थे , और सभी को अपने हिस्से के कार्य करने ही होते थे। अंतर बस इतना होता था कि शिक्षित लोग जो विद्या अध्ययन करने में सक्षम थे उन्हें वेदों का अध्ययन करवा कर उनसे प्रवचन आदि दिलवाए जाने की व्यवस्था की जाती थी।
     पिछले कुछ समय में ही वरुण ने बहुत सारी किताबों का अध्ययन कर लिया था और जैसे-जैसे अध्ययन करता जा रहा था उसका दिमाग भी विस्तृत होता जा रहा था।
       मंदिर परिसर हर किसी के लिए खुला था लोग दर्शनों के लिए आते मंदिर में चढ़ावा चढ़ाते, और चले जाते। सब के जाने के बाद हफ्ते में एक दिन चढ़े हुए सारे चढ़ाव की गणना की जाती और उसके बाद उस धनराशि को मंदिर ट्रस्ट के पास भेज दिया जाता।
    ट्रस्ट से हर महीने एक निश्चित धनराशि मंदिर में रहने वालों के खाने पीने आदि के लिए भेज दी जाती। इन सब का हिसाब योगेंद्र जी रखा करते थे।

   मंदिर परिसर बहुत विशाल था। चारों तरफ फैली वृहत वाटिका के बीचो बीच स्थापित मंदिर में पीछे तरफ कमरे बने हुए थे जहां सेवादार और बाकी के मंदिर कर्मचारी रहा करते थे।
      उसी परिसर में एक और हटकर विधवा आश्रम बना हुआ था जहां वृद्ध युवा और बाल विधवाये रहा करती थी। आश्रम के कर्मचारियों तथा अन्य लोगों के लिए भोजन पकाने बर्तन साफ करने आदि की जिम्मेदारी इन्हीं महिलाओं की थी । महिलाओं की संख्या कम अधिक होती रहती थी। वैसे तो एक बार जिस महिला को उसके घर वाले इस आश्रम में छोड़ जाते उसका वापस अपने घर लौट पाना असंभव ही था। इसलिए अधिकतर समय उस आश्रम में महिलाओं की संख्या में वृद्धि ही हुआ करती थी, संख्या में कमी तभी आती थी जब उनमें से कोई देवलोक को चली जाया करती थी।
     उनका जीवन कठिन नहीं कठिनतम था। क्योंकि उनके जीवन में वेद अध्ययन को स्थान नहीं दिया गया था। उनमें से अधिकतर वृद्ध महिलाएं अपने आपको कृष्ण समर्पित कर चुकी थी । इसलिए उनका मन सिर्फ कृष्ण को समर्पित लोगों की सेवा से ही प्रसन्न हो जाता था। लेकिन कुछ युवा और बाल विधाएं भी थी जिन्हें अच्छा खाने और अच्छा पहनने का शौक हुआ करता था। लेकिन उस स्थान में जहां उन्हें पर्याप्त आहार भी ना मिल पाता हो,उनके शौक कौन पूछता और कौन पूरे करता?

    वह औरतें एक रटी रटाई दिनचर्या का पालन करती हुई बस जीवन जीती चली जा रही थी! जिसका ना कोई आदि था ना अंत। बहुत बार ऐसा लगता जैसे वह वहां रहते हुए बस अपनी सांसें गिन रही हैं, कि किस तरह उनकी सांसो की अवधि पूरी हो और वह स्वयं कृष्ण के लोक पहुंच जाएं। कुछ महिलाओं ने एक आध बार वहां से निकलने की भी कोशिश की, लेकिन बाहर भी उनके पास कोई और आश्रय नहीं था दो-चार दिन बाद लौट कर वापस ही आ गई थी।
        जैसे ज़िन्दगी कट रही हो बस…. बिना जीने की आरज़ू के।
   लेकिन वरुण इन बातों से अनजान था….
….. पर अब अधिक समय नही बचा था कि वो इन सारी अव्यवस्थाओं से अपरिचित रह पाता…

******

   
     देव को गए वक्त बीत चुका था। जब उसके जाने का पता चला था उस समय उसके परिवार द्वारा किये कर्मकांड में पारो की माँ और बाकी सदस्य आये और जाते वक्त पारो की माँ देव की माँ के चरणों में लोट गयी….-” गरीब की बेटी का कोई आसरा नही होता बऊ दी! पहले ही बिना बाप की थी अब माथे से पति का साया भी सरक गया। पता नही इतनी बदकिस्मत लड़की क्यों मेरे घर ही पैदा हुई। इससे तो पैदा होते ही मर जाती तो सही होता,लेकिन फिर ये बदकिस्मती कैसे देखती?
  आपके पांव पड़ती हूँ, इसका आसरा मत छीनना। यहीं कहीं किसी कोने में पड़ी रहेगी। घर की नौकरानी को भी तो दो वक्त का खाना दिया ही जाता है। उससे अधिक की अब इसे दरकार भी कहाँ रही? “

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   बोलते-बोलते जाने कितनी बार वो भरभरा के रो पड़ीं। इतने कठोर शब्द मुहँ से भी तो नही निकल पा रहे थे। कैसी मर्मान्तक पीड़ा के साथ अपनी ही बेटी के लिए नौकरानी जैसा अलंकार जोड़ना पड़ा। किस्मत लड़की से ज्यादा तो उनकी खराब थी। पहले पति का दुख सहा फिर लक्ष्मी सी बेटी का …
  … इतनी छोटी सी उम्र में ये रंगविहीन साड़ी ! ये देखने से पहले दुर्गा माँ उसे उठा लेती तो कितना अच्छा होता। कम से कम अपनी ही बेटी का ये रूप तो न देखना पड़ता।
    दिल में तो आ रहा था कि बेटी को सीने से लगाये अपने साथ ले जाये। कैसे भी कर के अपने पास रख लेगी लेकिन अभी तो वो अकेली अपनी ससुराल की गुलामी में टूट रही है फिर अपने साथ अपनी फूल सी बेटी को वैसे ही टूटते कैसे देख पाएंगी?
   दूसरी बात जब घर भर मछली भात खा रहा होगा उसकी लाड़ली को सिर्फ शाक खा कर संतोष करना पड़ेगा। पान की कितनी शौकीन थी,अब तो वो भी कहाँ खा पाएगी।
   ये सारा सब अपनी आंखों से देखना उसके लिए मृत्युतुल्य कष्ट सहने के बराबर था।
   इससे तो अपनी ससुराल में रह कर क्या कर रही क्या नही इन सब बातों से तो उन्हें फुर्सत रहेगी।
  वैसे उनके मन में एक छोटा सा लालच और भी तो था…..
   देव का छोटा भाई दर्शन पारो से एक दो साल ही तो बड़ा था। अगर पारो यहीं अपनी ससुराल में रह गयी तो हो सकता है घर वालों के मन में पारो का ब्याह दर्शन से कर देने का विचार जाग जाए। और अगर ऐसा हो गया तो इससे अच्छा पारो के लिए क्या होगा भला।
   इतने गहन दुख के बीच एक बहुत छोटी सी खुशी उनके मन को उद्भासित कर गयी ..
…..-“ऐसा क्यों कह रही हो बऊ माँ। नौकरानी सी क्यों रहेगी भला। देव के पीछे अब यही तो हमारी देव है। पारोमिता जैसी अब तक रहती आयी है वैसे ही रहेगी।”

   देव की ठाकुर माँ का स्वर उस कमरे में गूंज गया और फिर घर के किसी सदस्य की पारो को वहाँ से हटाने या निकालने की हिम्मत नही हुई।

*****

  दिन कट रहे थे सिर्फ पारो के ही नही बल्कि घर के अन्य सदस्यों के भी।
  पहले पहल किसी ने पारो से कुछ नही कहा। वो अपने कमरे में सारा सारा दिन चुपचाप पड़ी देव को याद कर ऑंसू बहाती रहती।
   कभी खिड़की पर घंटो खड़ी रह जाती। यूँ लगता जैसे उसी का इंतज़ार कर रही हो।
  उसे पता नही क्यों अंदर से यही लगता कि समय को चीरता देव उसके पास वापस चला जायेगा।
कभी अचानक ही उसका मन ये मानने से इनकार कर देता की देव नही रहा।
वो उसकी कमीज़ें धोती अपनी साड़ी के साथ सुखाती और आयरन कर अलमीरा में सजा देती। जूते भी रोज़ रोज़ साफ करती और जब देखती की पहनने वाला तो दूर दूर तक नज़र नही आ रहा तो बिलख उठती।
    अब उसका खाना उसकी सास उसकी जेठानी के हाथों उसके कमरे में ही भिजवा दिया करतीं। शायद उन्हें मन ही मन लगने लगा था कि उन सब सुहागिनों के बीच बैठ पारो अपनी रूखी थाली का निवाला कैसे ले पाएगी। लेकिन पारो की जेठानी से ये पक्षपात जाने क्यों सहन नही हुआ जा रहा था।।
  रोज़ रोज़ उसकी रूखी सूखी थाली ऊपर लेकर जाना उसके मन को मसले दे रहा था, आखिर एक दिन घर भर की औरतों की नज़र बचा कर उसने मछली के झोल भरी कटोरी पारो की थाली में रखी और दाल की कटोरी में घी भर अपने आँचल से ढाँक ऊपर ले चली।
  पारो की तो नही लेकिन उसकी खुद की सास ने देख कर उसे आधी सीढ़ियों पर ही टोक दिया। पारो उस समय छज्जे पर कपड़े सूखा रही थी। उसने भी बड़ी माँ की रुबावदार आवाज़ सुन ली और ऊपर से झांकने लगी…-” ए आनंदी! की होलो? पारो के लिए क्या माछ लेकर जा रही हो? “

आनन्दी सकपका गई। उसे नही लगा था कि उसकी चोरी ऐसे पकड़ी जाएगी। उसने बहुत धीमी आवाज़ में अपनी बात रखी…-” उसकी अभी उम्र ही क्या है माँ। इतनी छोटी सी उम्र में इतना कुछ झेल गयी , अब कम से कम ठीक से खा पी तो सके। यही तो खाने पहनने की उम्र…”

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  उसकी बात बीच में ही काट कर उसकी सास लगभग उस पर चीख पड़ी…-“अब तुम आज की लड़कियां हमें नियम बताओगी, उसकी उम्र क्या है ये हमे बताने की ज़रूरत नही है।तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है हमने। चुपचाप माछेर झोल उठा कर थाली से बाहर कर दो। “

” धीमे बोलिए मां ,वो सुन लेगी। अच्छा नही लगेगा।”

” तुम्हें नियम भंग करते हुए अच्छा लगा न तो अब मुझे कोई लेना देना नही की किसे बुरा लगेगा और किसे नही। जो सच्चाई है सो है। अगर भगवान को उस पर इतना ही तरस था दयादृष्टि थी तो उसके पति को ऐसे अकालमृत्यु नही मिलती.।

   आगे की पंक्तियों के साथ ही भावुकता में बड़ी माँ रोने लगी,क्योंकि बेटा भले ही देवरानी का था लेकिन प्रेम तो उन्हें भी उससे बहुत था। और देव की असमय मृत्यु का दुख अब पारो पर गुस्से और नाराज़गी के रूप में उतारना शुरू हो रहा था।

आनन्दी समझ गयी कि इस वक्त सास से लड़ने में कोई लाभ नही है। वो चुपचाप मछली की कटोरी हटा कर फिर थाली ऊपर ले गयी….
… धीरे से उसने पारो के कमरे के दरवाज़े को धक्का दिया,पारो पलंग पर सिर टिकाए ज़मीन पर बैठी थी।
” आओ पारो !खाना खा लो!”
 
  पारो ने ऑंसू भरी आंखों से अपनी जेठानी को देखा और फिर बाहर देखने लगी…-“मेरी प्यारी छोटी बहन कुछ तो खा लो। देखो ऐसे भूखा रहने से क्या होगा। बल्कि तुम ऐसे भूखी रहोगी तो देव बाबू की भी आत्मा तड़प उठेगी। वो कैसे सुख से रह पाएंगे भला। चलो खा लो चुपचाप। बड़ी माँ की बातों को दिल से न लगा लेना। वो सब अभी बहुत दुखी हैं। उबर नही पाएं हैं ना । तुम तो समझ सकती हो।”

पारो ने हाँ में सिर हिला दिया और नीचे देखती चुप बैठी रही।
आनन्दी को उसी वक्त नीचे से किसी ने आवाज़ दी और वो एक बार फिर पारो से खा लेने का इसरार करती बाहर चली गयी।
पारो का थाली देखने का भी जी नही किया…  उसने धीरे से थाली सरका दी जैसे थाली से नाराजगी हो कि तुम उस समय क्योँ सामने नही इठलाई जब देव बाबू साथ थे और अपने हाथो से अपनी प्रेयसी अपनी पत्नी को खिलाना चाहते थे। उस वक्त इसी थाली ने क्यों चुपके से उसके कान में  नही कहा कि खा ले पारो! फिर इतना प्रेम करने वाला जीवन में कोई नही आएगा। “

  देव के बारे में सोचते हुए वो फफक के रो पड़ी। वहीं उस गांव से कई किलोमीटर दूर मथुरा में स्वामी वरुण के सामने सेवादार थाली परोस कर रख गया, पर जाने अंदर से वरुण को कैसी बेचैनी ने घेरा की उसने उस थाली को धीरे से आगे सरका दिया…-” स्वामी ऐसा क्यों? क्या आज भोजन नही लेंगे।”

” मालूम नही केवल लेकिन आज बिल्कुल भी खाने का जी नही कर रहा। अंदर से ऐसा लग रहा जैसे हृदय में किसी बात की पीड़ा सी उबर रही है। यूँ लग रहा कोई बहुत करीबी दुख में है, अपार दुख में और मैं उसकी कोई सहायता नही कर पा रहा हूँ। अब बस कृष्ण से यही प्रार्थना है कि वो जो कोई भी है उसे जल्दी से जल्दी मुझसे मिलवा दे, जिससे अपने मन की इस बेचैनी से छुटकारा पा सकूं।”

  वरुण क्या जानता था कि उसके कॄष्ण उसके प्रिय को उससे मिलवाने की भूमिका बांध ही चुके हैं…..

क्रमशः

aparna…..
  


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जब तुम बूढ़े हो जाओगे…..

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मैं बन जाऊंगी फिर मरहम
वक्त के ज़ख्मों पर तेरे और
मुझे देख हौले हौले से
फिर तुम थोडा शरमाओगे।
जब तुम बूढे हो जाओगे।।

सुबह सवेरे ऐनक ढूंड
कानों पे मै खुद ही दूंगी ,
अखबारों से झांक लगा के
तुम धीरे से मुस्काओगे।
जब तुम बूढे हो जाओगे ।।

दवा का डिब्बा तुमसे पहले
मै तुम तक पहुँचा जाऊंगी,
मुझे देख फिर तुम खुद पे
पहले से ही इतरा जाओगे।
जब तुम बूढे हो जाओगे।।

सुनो नही बदलेगा कुछ भी
हम भी नही और प्रीत नही
हम तुम संग चलेंगे  ऐसे
की तुम फिर लहरा जाओगे
जब तुम बुढे हो जाओगे।।

मैं तो ऐसी थी,ऐसी हूँ ,
ऐसी ही मैं रह जाऊँगी,
मेरे मन के बचपने से
तुम भी संग इठला जाओगे
जब तुम बूढ़े हो जाओगे।।

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मुझसी मिली है तुमको जग मे,
सोच के खुश हो रहना तुम,
फिर अपनी किस्मत पे खुद ही
धीरे धीरे इतराओगे
जब तुम बूढ़े हो जाओगे।।

aparna …….

शादी.कॉम-7

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     राधेश्याम जी के घर पे पूरा त्योहार का माहौल हो गया था,शाम को समधि जो आने वाले थे,राधे श्याम और उनके छोटे भाई सीता राम अपने अपने काम धन्धे से जल्दी वापस आ चुके थे लेकिन युवराज अपने पैट्रोल पम्प पर ही था,जाहिर है वो उनका दामाद ठहरा उसे तो अपने ससुराल में ये दिखाना ही है कि वो कितना व्यस्त रहता है,इसी से आज वो पूरी तन्मयता से पेट्रॉल पम्प,फिर एजेन्सी सब जगह घूम घूम कर मुआयना कर रहा था।।

   घर की महिलायें सुबह से रसोई मे जुटी थीं ऐसे जैसे मास्टर शेफ उन्हें ही चुनने आ रहें हैं,खैर उनकी परीक्षा परिणाम का समय आ गया,गिरिधर शास्त्री मय बेटा पधारे –

  “का हो समधि जी ,सब कुशल मंगल??ऐसा प्रस्ताव लाएं हैं कि आप खुशी से नाच उठोगे।”

“अरे आईये आईये !!! आपके आने से ही प्रसन्न हैं, बताईये कौन प्रस्ताव लाये हैं आप??”

“अरे बहू कुछु मीठा उठा पानी वानी लाओ भाई।।”

  “जी बाबूजी अभी लाये,,,आप कैसें है पापा और मम्मी कैसी है??”

  “सब कुशल है बिटिया !! ये लो सब तुम्हारी मम्मी भेजी है तुम्हरे लिये।।”
   रुपा अपने पिता का लाया सारा सामान समेट जल्दी से रसोई में आ गई,उसे चाय चढ़ाने से ज्यादा जल्दी अपने लिये भेजी साड़ी  देखने की थी,और साथ ही उसे बैठक में चल रही बातचीत सुनने की भी हड़बड़ी थी,,इसी सब चक्करों में जल्दी जल्दी चाय चढ़ाने मे लगी थी,तभी उधर से रुपा के चाचा ससुर की लड़की पिंकी गुजरी _”अरी ओ पिंकी हियाँ आओ ज़रा,इ देखो हम पानी खौलने रख दिये हैं,तुम तनिक पत्ती शक्कर दूध डाल डुला के छान लायोगी।”

“तो साफ साफ कहिये ना भाभी कि हम चाय बना दें।”

“अरे चाय बनाने कहाँ कह रहे हम !! हम तो बस ज़रा सा देख लो कह रहे,ना करना चाहो तो जाओ ,हम तो बहु हैं,हमे तो करना है,हमे कहाँ छुटकारा है इस घर गिरस्ती से,तुम तो भैय्या राज्कन्या हो,जाओ जाओ लाड़ो आराम करो।।”

“अरे भाभी इतनी सी चाय के लिये बात कहाँ से कहाँ पहुंचा दी आपने,जाइये मैं चढ़ा दूंगी चाय।”

“हाय सच्ची! देखो हमारे लिये बस इत्ती सी छानना,हम अभी आये।।”और रूपा लपक झपक भागी वहाँ से,और जाकर अपने कान दीवानखाने की दीवार से लगा कर खड़ी हो गई,बीच बीच में देखती भी जाती थी,कि कोई देख ना ले,उसे अपनी बुद्धि मे जितनी बात समझ मे आई उसका सार ये था कि पिंकी के लिये उसके मायके के पड़ोसी श्यामू चाचा के लड़के का रिश्ता उसके पापा उसके ससुर को बता रहे थे,श्यामू चाचा का बीड़ी पत्ते का करोबार था,अच्छे खानदानी रईस आदमी थे,उनके बेटे पप्पू को उसने बचपन में देखा था एकदम गोल मटोल गोलू गप्पू सा था,अब बड़ा होकर वो भी अपने बाबूजी का हाथ बंटा रहा था,,अच्छा है मालदार और बड़े घर चली जायेगी तो बार बार पलट कर मायके नई आयेगी,ननंद के ब्याह लगने से रूपा को अन्दर ही अन्दर प्रसन्नता ही हुई,वैसे पिंकी का जो स्वभाव था उससे इस घर के किसी सद्स्य को कभी कष्ट नही पहुंच सकता था।।

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   पिंकी राधेश्याम जी के छोटे भाई की इकलौती कन्या थी,और इस घर की अकेली   राजकुमारी !!!  ,वैसे उससे पहले उसका एक भाई भी था जो थैलेसिमीया की भेंट चढ़ गया जब मात्र 2साल का था!!! उसके जाने के और 2 साल बाद पिंकी का जन्म हुआ था,इसीसे घर भर की अत्यधिक लाड़ली थी,पर राजा भैय्या के तो जिगर का टुकड़ा थी उनकी ये छोटी लाड़ली बहन ,पूरा घर पिंकी पिंकी की पुकार से गुंजायमान रहता था,और पिंकी घर के किसी कोने या छत पे बैठी अपनी यू पी एस सी की किताबों में खोई रहती।।
    अपने प्रथम प्रयास में ही पिंकी ने मेन्स तक की यात्रा बिना किसी रुकावट के पार कर ली थी,तीव्र बुद्धि की स्वामिनी पिंकी बांसुरी की सीनियर भी थी और उसकी गाइड भी।।
   पिंकी ने अभी शादी ब्याह जैसे समय व्यर्थ करने वाले परिश्रम की तरफ सोचा भी नही था,अभी उसका एकमात्र सपना था प्रशासनिक अधिकारी के पद पर आसीन होकर लाल बत्ती वाली गाड़ी में घूमना।।
      वैसे तो यू पी और बिहार दोनो ही ऐसे राज्य हैं जहां हर दूसरे घर का लड़का यू पी एस सी ही निकालना चाहता है,पर अब लड़कियाँ भी इन मामलों में पीछे नही है।।
   चाय छानकर बाहर लेकर जाती पिंकी से रूपा ने आकर ट्रे अपने हाथ में ले ली और बैठक में जाकर धीरे धीरे सब को चाय पकड़ाने लगी जिससे और कुछ देर वहाँ की बातें स्पष्ट रूप से सुन सके ।।।
     अन्ततः उसके कान जो सुनने को तरस रहे थे, उस बात की अमृतवर्षा से उसके तृशार्त कान सिक्त हो उठे।।

“देखिए समधि जी जादा घुमा फिरा के बोलने की हमारी आदत नही है,हम सीधे सच्चे आदमी हैं।”
गिरिधर के ऐसा कहते ही राधेश्याम जी बिना बात मुस्कुरा उठे-“इसमें कोनो दो राय नही वकील बाबु, जो कहना चाहतें हैं,कह दीजिये,एकदमे स्पस्ट ।।”

“हां तो हम कह रहे ,अगर श्याम त्रिपाठी के लड़का के लिये आप पिंकी का रिश्ता हाँ बोल देते हैं तो आपके राजा के लिये हमरी रेखा की भी हाँ ही होगी,  देखिए समधि जी आपका लड़का सुन्दर सुसील(सुशील) तो है पर का है ना हम ठहरे वकील ,हमे थोड़ा पढ़ाई लिखाई से कुच्छो जादा ही लगाव है,हमरी रेखा तो दिल्ली तक से जाके पढ आई है,बस यही बात है।।”

“अरे कैसी बात करते हैं समधि जी हमरे राजा के लिये एक से बढकर एक पढ़ा लिखा लडकियों का रिस्ता आ रहा है,ऊ कोनो कलेक्टर से कम दिखता है का??”अपने बेटे के बारे में सुन माँ का हृदय चिन्घाड़ उठा।

“बहन जी कलेक्टर दिखना और होना में बहुतै फरक होता है, हमे राजा पसंद है ,हम ये थोड़े कह रहे कि राजा और रेखा की सादी नही करेंगे ,हम तो बस कह रहे एक हाथ दे एक हाथ ले।”

“तुम भीतर जाओ ,खाना उना की तैय्यारी करो,हम हैं ना यहां बैठे,इ सब बात व्यवहार हम देख लेंगे।।”

  श्रीमती जी सनसनाती हुई रसोई में चली गई,जो लड़की उन्हें निपट नापसंद थी,और जिसके  लिये वो पतिदेव के सामने अपनी नाराज़गी  जाहिर कर चुकी थी,उसी लड़की के लिये उनके राजा और पिंकी का ऐसा मोल भाव उस सरल हृदय सरला नारी को कचोट गया,,कैसा आदमी है रिश्तों का भी मोल भाव तैय्यार कर रखा है,,मन मे इतना गुस्सा समेटे भी बेचारी ऊपर से खुशी दिखाती हुई पूरियां छानती रहीं,रसोई में ही रूपा भी थी जो जल्दी जल्दी हाथ चलाती खाना परोसने में लगी थी,उसके सामने कुछ भी कहना आफत मोल लेना था।।
   
                पिंकी की माँ नही थी,और उन्होनें अपने दोनो लड़कों और पिंकी में कभी भेदभाव नही किया था, उन्हें भी पिंकी के ब्याह की जल्दी थी,पर उन्हें ऐतराज गिरिधर शास्त्री के लाये रिश्ते के कारण अधिक था।।
    रूपा ने सारी थालियां टेबल पर सजा कर सभी बड़ों को बुला लिया और सबका भोजन कार्यक्रम शुरु हो गया,इस कार्यक्रम के मध्य ही दामाद बाबु युवराज का भी आगमन हो गया जिन्हें देखते ही गिरिधर शास्त्री का मुखमंडल प्रसन्नता से चमक उठा।।
      अब युवराज भी उस गोष्ठी का हिस्सा था,उसे उसके साले साहब ने सारी बातें सविस्तार समझाई और नये जमाने के व्यापारी युवराज ने सहर्ष सभी बातों के लिये हामी भर दी,वैसे हामी भरने के पहले उसने एक गहरी दृष्टी अपने बाऊजी की ओर फिराई और आंखों ही आंखों में दोनों गुणी जनो ने इस रिश्ते का नफ़ा नुकसान माप लिया ,बाऊजी की तरफ से हरी झण्डी मिलते ही युवराज ने अपनी स्वीकारोक्ती दे दी।।।
      सबका भोजन समाप्त होने के पहले ही राजा भैय्या भी गर्मा गर्म जलेबी संभाले चले आये, जलेबी अपनी अम्मा को पकड़ा कर और मेहमानों को नमस्ते कर भैय्या जी अपने कमरे में चलते बने,उन्हें वैसे भी ऐसी महफिलों में वो रस नही मिलता था,जो उनकी वानर सेना के साथ था।।
    
          ***************************

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    अगले दिन सुबह से रूपा कोयल की तरह कूक रही थी,उसे ब्याह के समस्त क्रियाकलाप के लिये क्या कैसे और कहाँ से करना है की अत्यंत आतुरता थी,और इसी हड़बड़ी में उसने बिना किसी भूमिका के पिंकी को सारी बात कह सुनाई!!

“क्या बात कर रही हो भाभी!!! हमारी शादी ?? अभी से,अरे अभी तो हमे पढ़ना है,किसने तय कर दी हमारी शादी??”

“क्या बात करती हो नंद रानी!! और कौन तय करेगा,घर के बुजुर्गों ने तय की ।।। और पढ़ाई का क्या है,वो तो ससुराल जा के भी हो जायेगी।।इत्ता बड़ा काम है उन लोगों का ,वैसे भी राजरानी बन के रहोगी,का ज़रूरत फिर पढ़ाई लिखाई का।।”

“देखिए भाभी आपसे हमें बहस नही करनी,बड़ी अम्मा कहाँ हैं,ये बताओ!! उन्होनें कुछ नही बोला?? और राजा भैय्या??”

“किसी ने कुच्छो नई बोला,सब बड़े खुस हैं,और तुम भी हो जाओ,,लाखों का दूल्हा है,मिट्टी के मोल मिल रहा है समझीं,,उनका करोबार देख कर एक से एक बड़ा घर का रिस्ता आ रहा है,वो तो हमारे पापा के साथ अच्छे संबंध हैं इसिलिए तुम्हें हमारे कारण मांग लिया,वर्ना कमी है क्या उनके पास??”

“तो जब उनके लड़के मे कमी नही है तो अपने जैसी या आपके जैसी सर्वगुण सम्पन्न लड़की ढूँढ लें हमें काहे फंसा रहे,उनके बीड़ी पत्ता के गोदाम में बैठ के पढेंगे क्या हम,खैर छोडिए आप ये बताईये राजा भैय्या कहाँ हैं,सुबह से दिखे नही।।”

“लल्ला जी तो सबेरे ही जिम निकल गये,वहीं मिलेंगे तुम्हें ,,अरे रुको तो कहाँ भागी जा रही हो,चाय तो खतम कर लो।।”भाभी की बात खतम होने से पहले ही पिंकी जिम को निकल ली।।

“हे भगवान!! इ भगवान ने थोड़ा सा बुद्धि का दे दिया रानी जी खुद को जाने का समझ बैठी हैं,अरे ऊ तो हमारा सादी हो गया नही तो हम भी कलेक्टरनी नई भी बनते तो कम से टीचर उचर तो बनी जाते।”

“सही कह रही हो बहु जी!! आपका तो कदर इ नई करता ई घर का लोग,कहाँ आप अऔ कहाँ ओ।”

“चल चल बस कर !! जल्दी जल्दी हाथ चला,ढ़ेर सा काम पड़ा है यहाँ,मुझे तो सांस लेने की भी फुर्सत नही।।” घर की मुहँ लगी नौकरानी नागेश्वरी को काम समझा अपनी चाय उठा रूपा वहाँ से चली गई ।।

  उधर पिंकी जिम पहुंची तब राजा भैय्या सभी महिलाओं को कसरत करवा रहे थे।।

“अरे पिंकी तुम यहाँ?? घर पे सब ठीक तो है??” प्रिंस ने पिंकी को देखते ही पूछा

“राजा भैय्या कहाँ है?? जल्दी बुलाओ उन्हें ।।”

“हां हम बुला रहे,तुम इधर भैय्या जी के ऑफिस में आ जाओ,वहाँ बैठो,हम भैय्या जी को भेजते हैं ।”
  
  पिंकी जैसे ही ऑफ़िस में घुसी वहाँ बाँसुरी बैठी राजा के लिये नोट्स तैय्यार कर रही थी।।

“बंसी तुम यहाँ??”

“हाँ हम भी थोड़ा दुबला होना चाहते हैं, पर आप इस समय यहाँ कैसे दीदी।।बांसुरी ने मुस्कुराते हुआ जवाब पे सवाल दाग दिया।।

तभी राजा भी दरवाजा खोल अन्दर आ गया,और उसके पीछे से प्रिंस 3कप में चाय लाकर रख गया।

“प्रिंस तुम बाहर जाओ ,हमे राजा भैय्या से कुछ प्राईवेट बात करनी है।”प्रिंस के साथ बांसुरी भी उठने लगी –“अरे तुम बैठी रहो बंसी,तुमसे हमे कोई परहेज नही।।

“बोल छुटकी ऐसा क्या हो गया,कि तू सुबह सुबह यहाँ दौड़ी आई??”

“राजा भैय्या आपको पता भी है घर मे क्या चल रहा है।।

“क्या चल रहा है,तू ही बता दे।”

“हे भगवान !! मेरे भोले भंडारी भैय्या!! आपके रिश्ते की बात चल रही ,और मेरी भी।।
   भाभी के पड़ोसी के अनपढ़ लड़के के साथ हमे बान्ध देना चाहते हैं ,और भाभी की बहन के साथ आपको,कुछ पता है आपको??”सब आटा बाटा, अदला-बदली चल रही है।।”

“अरे मेरी प्यारी छुटकी बहना शादी तो करनी ही है ना,तो कर लो जिससे अम्मा बाऊजी कह रहे।।”

“आप कर लेंगे रेखा से शादी??”

“अरे उसमें का बवाल हो गया ,,अम्मा कहेगी तो ज़रूर कर लेंगे ,बस हम पहले पास हो जायें,उसके बाद जो बड़े भैय्या अम्मा बाऊजी कहेंगे हम कर लेंगे।।”

“हाँ तो आप कर लिजिये,हम नही कर सकते,ऐसे किसी ऐरे गैरे से शादी,इतनी मेहनत से पढ़ाई किये हैं …..अभी पिंकी की बात पूरी भी नही हो पाई थी कि राजा भैय्या बोल पड़े-

“अरे तो तुम्हारे ससुराल वाले तुम्हरी पढ़ाई के खिलाफ है क्या??हम दो मुक्का मार के अभी सीधा कर देंगे ससुरों को।।”

“नही भैया बात वो नही है!! असल में हम किसी और को पसंद करते हैं,उसका नाम है रतन !! पूरा नाम रतन मराबी।।”

“अरे दीदी ये तो हमारे स्कूल वाले भैय्या है ना जो बारहवीं मे हेड बॉय थे,आपकी कक्षा में ही थे ना।।”
बांसुरी चहकी

“हाँ बंसी वही रतन!! स्कूल के बाद वो बी ई करने चला गया और हम बी एस सी।।उसिने हमे यू पी एस सी के लिये प्रेरित किया,,हम दोनो ने साथ ही सारी पढ़ाई करी है भैय्या,और अब हम रतन को पसंद करने लगे हैं ।।”

“का गजब कर रही हो छुटकी,हमारे यहाँ आज तक किसी ने अपनी मर्ज़ी से शादी ब्याह नही किया!! बाऊजी तो तुम्हारे साथ हमे भी मार डालेंगे।।”

“दीदी तो रतन भी मेन्स निकाल चुके हैं??”बांसुरी ने पूछा।।

“हां बंसी!! और इंटरव्यू के रिजल्ट के बाद ही हम लोग घर में बात करने वाले थे,उसके पहले ही ये सारा काण्ड हो गया,हम नही जानते भैय्या ,आपको बडी अम्मा और बड़े भैय्या से बात करना ही पड़ेगा,वर्ना??”

“वर्ना का करोगी तुम,घर से भाग जाओगी??”
भैय्या जी के ऐसा बोलते ही पिंकी ने उन्हें घूर के देखा।।

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“नहीं वर्ना हम खुद ही बात करेंगे!! हमे लगा पहले आप से बात करनी चाहिये,भैय्या आप तो कम से कम अपनी छुटकी की बात मान जाओ,रतन बहुत अच्छा लड़का है,आप एक बार मिल लो खुश हो जाओगे।।”

“अरे बौड़म हमारी खुशी तो तेरी खुशी में है,पर हमे बाऊजी से बहुत डर लगता है,इन सब मामलों में, अच्छा पूरा नाम का बताया लड़के का।।”

“तुम अभी तक क्या सुन रहे थे राजा!! मराबी है सरनेम,यही जानना चाहते थे ना,तो सुन लो रतन ब्राम्हण नही है।।”बांसुरी इतना बोल के मुस्कुराने लगी।।

राजा आँखें फाड़े कभी बाँसुरी को कभी पिंकी को देखने लगा,वो पहले ही परेशान हो रहा था कि घर पे कैसे बात की जाये अब ये जाति वाला मामला हल निकालने की जगह बात को और बिगाड़ गया।।

“नही हो सकता !! ये बिल्कुल नही हो सकता छुटकी ।। अम्मा की  कसम, बाऊजी तुझे और मुझे गोली से उड़ा देंगे ,उनके गोली मारने के पहले अम्मा हम दोनो को जहर देके मार डालेगी ,और कहीं इन दोनों से बचे तो भाभी के ताने जान ले लेंंगे।।भूल जा छुटकी ,तू भूल जा उस लड़के को।।”

“नही भैय्या हम नही भूल सकते,और ना आपको भूलने देंगे,अब इस मुसीबत से आप ही हमे निकालेंगे और आप ही हमारी शादी रतन से करायेंगे।।”

“राजा !!! एक बात बताओ ,तुमने डर के मारे सबका नाम लिया बस बड़े भैय्या का नही,,इसका मतलब तुम्हारा सब कॉन्शियस माइंड कहीं ना कहीं ये जानता और मानता है कि बड़े भैय्या हमारी मदद करेंगे।।”
          बांसुरी ने अपना ज्ञान दिया,जो राजा भैय्या के लिये काला अक्षर भैंस बराबर था।।

“का बोली तुम बांसुरी??कौन सा माइंड??”
राजा भैय्या के इस सवाल का जवाब दिया पिंकी ने

“सही कहा बंसी!! अब राजा भैय्या को बड़के भैय्या को पटाना पड़ेगा,अगर वो मान गये तो फिलहाल हमारे इंटरव्यू के रिजल्ट तक के लिये शादी टल जायेगी या कैन्सिल हो जायेगी,और बस उसके बाद हमारे दोनो भाई मिल कर हमारे लिये रास्ता बना देंगे।।”

दोनो सखियाँ एक दूजे को देख मुस्कुराने लगी और राजा भैय्या सर पकड़ के बैठे रहे ,तभी प्रिंस ने दरवाजा खोला और भैय्या जी को आवाज़ दी–

“भैय्या जी ऊ पुडुष वाली (घोष) आंटी तो रिलेक्सर से उतरे नई रई हैं,और उनके पीछे सब आंटी लोग उसी में चढ़ने के लिये अपना पारी का रस्ता देख रही है,का करे हम।।”

“सर फोड़ लो अपना,और हमारा भी।”भैया जी का बौखलाया जवाब सुन के प्रिंस वापस भाग गया।।

तभी भैय्या जी का फ़ोन खनखनाया “नमो नमो श्री शंकरा”
रेखा का नाम देख भैय्या जी का मुहँ बन गया,बड़ी लाचारी से उन्होनें पिंकी को देखा

“उठाओ उठाओ,अब काहे नई उठा रहे,आपकी होने वाली बीवी का फ़ोन है।”

“अरे !! अभी हुई थोड़ी ना है,पहले तुम्हारे पचड़े से बाहर तो निकलें तब जाके अपना बारे मे सोचेंगे।।”

“अच्छा,तो मतलब तैय्यार बैठे हैं आप रेखा से शादी के लिये,भैय्या जी सुन लो ,ना मेरी उस बीड़ी वाले से शादी होगी और ना आपकी इस बिलाई से मै होने दूंगी।।”

पिंकी की बिलाई वाली बात में बांसुरी को इतना रस मिला की वो हो हो कर हंसने लगी,और उसे हँसते देख राजा भैय्या को भी हँसी आ गई,तीनों के सम्मिलित ठहाकों से बाहर खड़े प्रिंस को थोड़ी राहत मिली और वो एक बार फिर अन्दर झाँका–

“भैय्या जी !! एक बात बोलनी थी।।”

“अबे बोलो बे!! तुम तो साले मरे जाते हो ,हम ना रहे तो।।ऐसा का आफत हो गया अब।।बोलो।”

“भैय्या जी वो हनुमान गली वाला गुड्डा है ना चार पांच चेलों को लिये आया था,आपको पूछ रहा था,हमने बोल दिया ,आप नई हैं अभी।।”

“हमे काहे पूछ रहा था बे,,पूछे नही तुम??”

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“पूछे ना ,तो बोलता है ,प्रेम उनकी गली की किसी लड़की को पटा लिया है,इसिलिए प्रेम के हाथ पैर तोड़ने से पहले आपको चमकाने आया था,कह रहा था,बोल दियो अपने राजा भैय्या से हमरी गली की तरफ आँख उठाया तो सरिया घुसा देंगे आँखी में।”

“हे शिव शंकर!! आज का दिन दिखा रहे हो परभू ,, एक के बाद एक नारियल हमारे ही सर फोड़ रहे हो।
  अब ई प्रेम कौन सी लड़की को फंसा लिया यार।।
तुम ठीके कहती हो बांसुरी!! हम बहुतै बड़े बौड़म है।।”

“हम समझ गये कौन है वो लड़की”बांसुरी के ऐसा कहते ही प्रिंस राजा पिंकी सब उसकी तरफ देखने लगे__
         “निरमा!! हाँ 100% निरमा ही है।।”

तभी बाहर से कुछ हल्ले गुल्ले की  आवाज़ आयी और चारों के चारों बाहर की ओर लपके।।

क्रमशः

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aparna..

शादी.कॉम- 6

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                    राजा भैय्या के जिम में उन्होनें पहले महिलाओं और पुरूषों के लिये अलग अलग समय रखा था,परन्तु उनके चेले चपाडों का उन्हे वक्त बेक़क्त घेरे रहना उस मे दिक्कत डालने लगा था इसिलिए सारा कॉमन समय कर दिया,फिर भी अधिकतर घरेलू महिलायें,कॉलेज जाने वाली लड़कियाँ 9बजे के बाद जब घर के पुरूष ऑफिस और बच्चे स्कूल निकल जाते तभी आती,।।
     भैय्या जी ने सारी समय सारिणी बांसुरी को बता दी,,अभी कुछ दिनों के लिये कॉलेज की छुट्टियां होने से बाँसुरी ने भी 9बजे का टाईम स्लॉट चुन लिया।।

    भैय्या जी ने जिम में पहनने योग्य कपडों के बारे में उसे उतनी ही जानकारी दी जितनी ना भी देते तो काम चल जाता ।।

   पहले दिन एक हाथ में पानी की बड़ी सी बोतल थामे बांसुरी ठीक 9 बजे जिम पहुंच गई ।।
    उस समय तक एक भी लड़की नही आई थी,पर हाँ मोहल्ले के जाने किस किस कोने से निकल के अर्नोल्ड श्वाज़नेगर के बाप वहाँ आये हुए थे।।कोई पूरी तल्लीनता से डम्बल कर रहा था,कोई पुश अप्स, कोई बाइसेप्स पे भिड़ा था तो कोई चेस्ट पे काम कर रहा था,,ऐसा लग रहा था अगले मिस्टर इंडिया की तैय्यारी यही लोग कर रहे ,और इन्ही मे से कोई एक मिस्टर इंडिया बनने वाला है।।

“अरे आ गई तुम,बड़ी समय की पाबंद हो,अच्छा है,ये अच्छा की अपना पानी का बोतल भी लाई हो।” भैय्या जी ने आगे बढ़ कर बांसुरी का स्वागत किया

“पानी नई ग्लूकोस का बोतल है,हमे लगा पहली बार मेहनत का काम करेंगे ,कहीं चक्कर वक्कर आ गया तो।”

“ठीक बोल रही हो,कमजोर भी तो हो।”लल्लन ऐसे बोल के हंसने लगा,,भैय्या जी ने घूर के उसे देखा और बांसुरी को एक ट्रेड मिल पे ले गये,तभी दरवाजा खुला और एक आंटी जी ने अन्दर झाँका
  “पुडुषो का भी एही टाईम है क्या??”

  “क्या बोल रही हो आंटी??”प्रिन्स ने पूछा

  “मैं ए जानना चाहती हूं कि लेडीश लोगों का अलग टाईम है या पुडुषों के साथ ही उनको भी जिम कडणा (करना) है।””

“का बोल रही है यार ये आंटी?”प्रिन्स ने लल्लन से कहा -“अबे चुप रहो तुम ,कलकत्ता की हैं आंटी जी समझे।।”लल्लन ने कहा

तब तक भैय्या जी चले आये,-“आईये आईये मैडम ,आज आपका पहला दिन है ,आपको एक फॉर्म भरना पड़ेगा, आपका हाईट और वेट चेक कर के आपका बी एम आई निकाले देते हैं,जिससे पता चले कि आपको कितना वजन कम करना है।”

“अडे बाबा हमको बजन कम नही कडणा ,हम तो इहाँ देखने आया था कि हमाडा हश्बैंड भी घड(घर) से जिम बोलके निकलता है,यहाँ आया है कि धेलू के यहाँ बैठ के रोशोगुल्ला खा रहा है।”

“अरे बाप रे आंटी तो करमचंद निकली यार!!”

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राजा भैय्या ने उन्हें जाकर प्यार से जाने क्या समझाया अगले दिन से खुद ही जिम आने की कसम खा कर घोष आंटी वहाँ से चलती बनी।।

अब हो चुके थे सवा नौ और धीरे धीरे कर के जिम की रौनक बढ़ने लगी,एक एक कर शहर की दुबली पतली लम्बी गोरी छरहरी वामायें धीरे धीरे दरवाजा खोल खोल कर अन्दर आने लगी,ये वही लड़कियाँ थी जिनके इन्तजार में लड़के पुश अप्स कर कर के अपना सीना फुलाए जा रहे थे…..इन लडकियों के अन्दर आते ही जिम का माहौल बदलने लगा था,हर लड़का कुछ अधिक ही जोश में वर्क आउट कर रहा था,और मज़े की बात ये थी कि इंस्ट्रक्टर राजा भैय्या के अलावा हर लड़का इंस्ट्रक्टर बना बैठा था,,और ये सब एक दूसरे को नही सिर्फ लडकियों को ही ज्ञान दे रहे थे…….
                   आज बाँसुरी का पहला दिन था,ऐसी पतली छरहरी लडकियों को देख उस बेचारी को समझ ही नही आ रहा था कि ये यहाँ करने क्या आयी हैं,उन में से कुछ का ये हाल था कि अगर ट्रेड मील पे 5मिनट भी दौड़ ले तो उन्हें फिर सीधे स्ट्रेचर पे डाल कर सीधा एम्स रिफर करना पड़ता वो भी एयर लिफ्ट,,कुछ एक जितना तो वर्क आउट नही कर रही थी ,उतना अपने आप को हर एंगल से पलट पलट के आईने में देख रही थी….एक ने तो गज़ब ही कर दिया ,ट्रेड मील में चढ़ने के पहले जाकर अपनी लिपस्टिक डार्क की,फिर क्रॉस ट्रेनर पे चढ़ने के पहले भी ,फिर साईकल के भी,इस तरह से हर वर्क आउट सेशन के पहले उसका एक टच’प हो जाता …….
                     बांसुरी बेचारी को पहला दिन था इसिलिए 5km/hrs की स्पीड पे 20 मिनट चलने का आदेश हुआ था,वो अपनी मशीन पे चलती इधर उधर देखती जा रही थी……. कुछ देर बाद एक बड़ा लॉट आंटियों का अन्दर आया,उन्हें देख बांसुरी को कुछ तसल्ली हुई क्योंकि भले ही वो अलग अलग साइज़ ऐंड शेप की थी,पर थी सब की सब मोटी।।
      अब इतनी सारी महिलायें जहां हो वो जगह गुलजार ना हो ,ऐसा कैसे हो सकता है…..पूरे जिम का माहौल कुछ ही देर मे किट्टी पार्टी के माहौल मे तब्दील हो गया।।

   इनमें से कुछ एक ही लोकल थी,अधिकतर दिल्ली गुडगाँव से थी।।

  “क्यों बेटा जी,आज क्या पहला दिन है आपका??”
  उनमें से एक ने बांसुरी से पूछा।

“हाँ!! पर आपको कैसे पता ?”

“हा हा !! अब बोलो पटियाला सलवार पहन के कौन जिम करने आता है।” ये बोल कर वो फिक से हँस दी।।

  “और ऐसे स्किन कलर की जेगिंग पहन के कौन आता है आंटी।।”

  आंटी वहाँ से उतर के साईकल चलाने चली गई ।।

  बांसुरी चलती रही अभी भी 20मिनट पूरे होने मे 10मिनट बाकी थे,अभी वो चल ही रही थी कि अचानक से वहाँ रखे साउंड बॉक्स पे किसी लड़के ने गाना बजा दिया

   “चदरिया झीनी रे झीनी ,आंखे भीनी ये भीनी ये भीनी, यादें झीनी रे झीनी रे झीनी।।”

बांसुरी को वर्क आउट के साथ गाना अच्छा लग ही रहा था कि किसी लड़की ने ट्रैक बदल दिया-

“आजा पिया तोहे प्यार दूँ,गोरी बहियां तो पे वार दूँ ।”
  बांसुरी को ये भी पसंद आने ही वाला था कि फिर ट्रैक बदला-

“दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है,हम भी पागल हो जायेंगे,ऐसा लगता है।।”

ये भी ठीक लगना शुरु होता उसके पहले फिर ट्रैक बदला-
    “लैमबोर्गिनी चलाई जान्दे ओ”

अब ट्रैक बदलता इसके पहले ही भैय्या जी की आवाज़ जिम मे गूँज उठी

“अरे देवदास की छठी औलाद तू यहाँ वर्जिश करने आता है या,मनहूस गाने बजाने….मैडम लोग जो गाना सुनना चाहते हैं वो बजा लेने दो भई,काहे इतना चिरै चिरैय्या लगा रख्खे हो,थोड़ा फास्ट ट्रैक बजाएंगे तो लोगों को भी वर्जिश करने में मज़ा आयेगा ,और तुम झीनी चदरिया बजाये पड़े हो।।

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बीच बीच में भैय्या जी आकर बांसुरी को कुछ ज़रूरी बातें बता जाते।।अबकी बार बांसुरी के दोनो ओर की मशीनों पे आंटी लोगों ने कब्जा जमा लिया और चलते चलते अपनी बातों में भी लग गई ।।

“कल तुम क्लब के “सावन सुन्दरी “में क्यों नही आई,बड़ा गज़ब इन्तेजाम था,इस बार क्लब की लेडिस को अकल आई ,थोड़ा अच्छा खाना पीना था।।

  “अरे नाग-पंचमी थी ना कल,,, तो हमारी सासु जी कहा करती हैं,,नाग पंचमी के दिन घर से मत निकला करो,इसिलिए क्लब नही आ पाये,वैसे क्या रखा था खाने में ।”

(सास सही कहती है,नागिनों को निकलना भी नही चाहिये कोई पिटारा मे बन्द कर लिया तो)प्रिन्स और लल्लन उंन लोगों की बातों में अपनी अलग कॉमेन्ट्री कर रहे थे

“लिट्टी चोखा था,स्वाद अच्छा था….पर घी ज़रा कम शुद्ध लगा मुझे ,अब वैसे भी होटल वाले हमारे जैसा शुद्ध घी कहाँ बना पायेंगे।।”

“बस लिट्टी!! और मीठा में कुछ नही दिये??”आंटी जी की आत्मा कलप गई कि हाय बेचारी लेडिस लोग 2 घन्टे के तपस्या कर के इतना लीप पोत के क्लब पहुंची और इतना सूखा सूखा निपटा दिये।।

“था ना,,मीठा में इमरती खिलाए थे,और चाय कॉफ़ी था,जिसको जो पीना हो,लगभग सभी ने दोनो पिया।।”

  “पीना भी चाहिये जी!! महीना का 300रुपया लेते भी तो हैं ये लेडिस क्लब वाले,हम होते तो 2चाय और 2कॉफ़ी पी लेते।।”

(भगवान बचाये!!) फिर प्रिन्स चहका।।
“कहाँ से वजन कम हो,जितनी कंजूसी से पसीना बहाती हैं जिम में ,,उतनी दरियादिली से ठूंसती हैं।।
  अब यहीं देख लो,जब से चढ़ी है मशीन मे खाना पीना में ही अटकी हैं “__लल्लन ने अपना ज्ञान दिखाया।।

“अरे ये तो बताओ बनी कौन इस बार सावन सुन्दरी?”

“सोनी बनी है इस बार की सावन सुन्दरी।”

“हैं!!! ऐसा तो कोई खास चेहरा मोहरा है नही,मैनें तो कल तुम्हारे फोटो देखे थे फेसबुक पे,तुम ज्यादा सुन्दर लग रही थी।।”

“अरे चेहरा देख के नही दिया ना !!वो तो जो जितना ज्यादा हरा पहन के आयेगा उसपे जोड़ घटाव किया,मेरा तो साड़ी ब्लाऊस,चूड़ी बिन्दी,कान का गले का ,नेल पोलिश ,हेयर क्लिप,रुमाल सब हरा  था,बल्कि सैंडल और पर्स भी।।

“तो फिर सोनी कैसे जीत गई जी।”??

“ये दुसरी वाली आंटी ना बस मजे ले रही है,इसे कोई सहानुभूति नही है,की वो हरा रुमाल वाली आंटी इत्ता कर के भी नही जीती,बल्कि हमको लगता है दिल ही दिल में खुस हो रई है कि हाँ बेटा देखा !! ससूरी  खुद को ऐस्वर्या राय समझती है।”
   प्रिन्स ने लल्लन के कान मे फुसफुसाया

“अर्र्रे क्या बताऊँ,वो सोनी ने बाल भी हरे रंग से हाईलाईट करा लिया था,अब देखो मैनें इतना किया ,सब फेल हो गया….आँख के ऊपर हरा रंग का शेडो लगाये थे,उसी को थोड़ा गाल पे भी मार लिये थे,लिपस्टिक तक हरा था हमारा ,,अब सोचो।।

“हे भगवान !!! इसके पति का हार्ट फेल कैसे नही हुआ इसको देख के,,ये तो पूरी दमदमी माई लग रही होगी।””लल्लन बोला।

“तुम दोनो यहाँ का कर रहे हो बे!! जाओ उधर वो योगा मैट बिछाओ ,,हम योग शुरु करेंगे अब।।”
  राजा भैय्या के फटकार लगाते ही दोनो लोग मशीन से कूद कर दूसरी तरफ भाग गये।।

   राजा भैय्या के योग सेशन के बाद सभी महिलायें बड़ी आत्मीयता से अपनी अपनी परेशानियां राजा भैय्या को बताने लगी,जिस सब का सार यही था कि इतनी मेहनत कर के भी वजन का कांटा 10grm भी इधर से उधर नही हिलता जबकि खाने में पूरा परहेज बरता जा रहा है,राजा भैय्या ने रोज की तरह उन्हें दो चार पते की बातें बताईं ,जैसे दिन भर पानी पीना,सुबह खाली पेट में गर्म पानी में शहद मिला के लेना वगैरह वगैरह,,पर उस पे भी अधिकतर महिलाओं का तुर्रा यही था कि,हम तो 10-12ग्लास पानी पी जातें हैं,फिर भी यही हाल ….
       खैर किसी तरह भैय्या जी का सेशन समाप्त हुआ और एक एक कर सारी महिलायें जिम से निकल गई ।।

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“तुम तो बहुतै सहनशील हो राजा।”बाँसुरी के ऐसा बोलने पर राजा ने पूछा

“काहे?? ऐसा काहे बोल रहीं।”

“तो और क्या?? सब को इत्ता प्यार से समझा रहे हो ,और सब समझने की जगह उल्टा ‘ हम तो यही करते हैं ‘ की रट लगाये बैठी हैं,अरे अगर यही करती हो,तो दुबला काहे नही जाती,हम तो सच्ची कहें राजा !! अगर तुम जो जो बताये हो वो वो हम रोज करें तो हम पक्का पतले हो जायेंगे।।”

  बांसुरी और राजा के चेहरों पे मुस्कान आ गई ।।
तभी भैय्या जी का फ़ोन रिंग हुआ ,और प्रिन्स फ़ोन लिये भागता आया “भैय्या जी बाबूजी का फ़ोन है।”

“कहाँ हैं लाट साहब??”

“जिम में हैं बाबूजी कहिये क्या काम है।”

“काम तो ऐसा कुच्छो नई है,पर शाम को इहाँ उहाँ घूमने ना चले जाना,आज शाम को तुम्हारी भाभी के फादर आ रहें हैं,तो तुम्हारा भी घर पे रहना ज़रूरी है,समझे।।”

“भाभी के बाऊजी आ रहें,उसमें हमारा रहना नई रहना से का होगा,सामान सब्जी मिठाई उठाई हम अभी पहुंचा देते हैं,जो आप बोलो।”

“अरे जब हम बोल रहे कि तुम्हारा रहना ज़रूरी है तो है,ऊ अपनी रेखा के बारे में कुछ बात चीत करना चाहते हैं,समझे!!! तो समय पे घर आ जाना,और बाकी सब तो हम ले आये हैं तुम आते समय गर्मा गर्म जलेबी लेते आना।”

“ठीक है हम आ जायेंगे बाबूजी,और कुछ?”

“और कुछ तो ऐसा पूछ रहे जैसे बहुत काम के हो,सारा जमाना का फाल्तू काम बस करा लो इनसे, भूलना मत ,हम दुबारा फ़ोन नई करेंगे,ठीक है!!”

“ठीक बात”

तभी लल्लन का फ़ोन बजने लगा, प्रिन्स ने फ़ोन उठाया ,उधर से एक मधुर सी आवाज़ आई- “हेलो रोहित??”

“नही ,यहाँ तो कोई रोहित नई है बहन जी” प्रिंस ने जवाब दिया।।

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“अरे ऐसे कैसे,इसी नम्बर पे तो सुबह रोहित से मेरी बात हुई थी,एक मिनट रुको……..उधर से उस लड़की ने फ़ोन में चैट खोल के नम्बर एक बार और चेक किया “हाँ जी मैने सही नम्बर लगाया है,अभी कुछ देर पहले ही इसी नम्बर से रोहित ने एक साई बाबा वाला  मेसेज मुझे भेजा था जिसके बाद हमारा झगड़ा हो गया था,तो बस उतनी ही बात से गुस्सा होकर उसने नम्बर बदल दिया??”

“नही दीदी नम्बर तो किसी ने नही बदला ,वैसे ऐसा क्या मेसेज था कि झगड़ा हो गया आपका?”

“वेट वेट!! तुम मुझे दीदी क्यों बोल रहे हो,, i m not a दीदी type material और दुसरी चीज़ उस बुद्धू राम ने मुझे मेसेज किया कि ये साई बाबा की असली फोटो है,पन्द्रह लोगो को भेजो तो गुड न्यूज़ मिलेगी,,whatever!! इसी लिये झगड़ा हो गया मेरा ,पर यार मैं तुम्हे क्यों ये सब बता रही हूं,तुम फ़ोन रखो।।

अभी वो मोहतरमा फ़ोन काटने ही वाली थी कि, लल्लन गिरता पड़ता भागता हुआ आया और प्रिंस से फ़ोन छीन लिया

“हेलो ,हेलो बेबी !! मैं आ गया,सॉरी वो वॉश रुम में था ,तभी फ़ोन नही उठा पाया,बेबी सॉरी।।”

बांसुरी राजा भैय्या प्रिंस सभी लल्लन को आंखे फाड़ फाड़ के देखने लगे

“अबे तुम्हारा नाम रोहित कब से हो गया बे??”

  लल्लन के फ़ोन रखते ही राजा भैय्या ने सवाल किया।।

“भैय्या जी हमारा स्कूल में नाम रोहित ही था,वो तो घर पे अम्मा लोग फिर आप लोग सब लल्लन ही कहने लगे तो वही चल पड़ा।।”

“बड़ा फैंसी नाम रखे हो रोहित बबुआ ” प्रेम ने कहा

“तुम भी तो बड़ा फिल्मी नाम रखे हो प्रेम बाबु।”

“हां वो हमारी अम्मा मैनें प्यार किया देख के आई और उसी रात हम पैदा हो गये,तो बस हमारा नाम प्रेम पड़ गया।।।”

“वाह बहुत बढ़िया!!! हमारी सहेली निरमा की अम्मा को निरमा के पैकेट पे बनी लड़की इतनी सुहाई की वो अपनी बिटिया का नाम निरमा रख दी।।

बांसुरी के ऐसा बोलते ही सब हंसने लगे–“तुम हमेशा बोलती रहती हो इसिलिए तुम्हारी अम्मा तुम्हारा नाम बांसुरी रख दी।।है ना।”प्रिंस ने बोला

“हां और ये बिल्कुल साक्षात कहीं के राजकुमार दिखते हैं,इसलिए इनका नाम राजकुमार पड़ा ,है ना राजा??”

बांसुरी के ऐसा कहते ही राजा भैय्या का चेहरा गुलाबी हो गया और बेचारे शरमा के रह गये।।।

…….

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……………तो यहाँ लल्लन बाबु ही थे जो रेखा से जुदाई के गम में जिम में सुबह जुदाई वाले गानों की बहार सजाये हुए थे…..अभी कोई उनसे उनके फ़ोन के बारे में पूछता ,उसके पहले ही उन्होनें वहाँ से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी,वो निकल ही रहे थे कि प्रिंस ने पूछ ही लिया- “अरे लल्लन तुम बताये नई,वो लेडिस कौन थी जिसका फ़ोन आया था तुम्हारे लिये??”

“तुम गधे के गधे ही रहोगे प्रिंस,लेडिस नही एकवचन के लिये लेडी कहा जाता है,तुमको पूछना चाहिये कि वो लेडी कौन थी जिसका फ़ोन आया था।।”बांसुरी के ऐसा बोलते ही प्रिंस बिखर गया

“यार तुम ना भैय्या जी को पढ़ाने आई हो,उन्हें ही पढ़ाओ,हमे ना समझाओ सिखाओ ,समझी।।”

अभी प्रिंस और बांसुरी का फसाद चल ही रहा था की लल्लन सबकी नज़र बचा कर वहाँ से निकल लिया।।।

क्रमश:

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aparna…

जीवनसाथी -116

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   जीवनसाथी – 116

        कोर्ट से मिले 2 दिन पलक झपकते कब बीत गए समर को पता ही नहीं चल पाया केस से संबंधित कागजों की तैयारी में ही उसके दिन और रात निकल गए।
         अगले दिन सुबह की तारीख उन्हें कोर्ट की तरफ से मिली हुई थी। अगले दिन ही जज साहब बचाव पक्ष के वकील द्वारा प्रस्तुत सबूतों को देखने वाले थे। हालांकि समर इस बात से परिचित था कि उस लिफाफे में सबूत नहीं होंगे, फिर भी वह अपनी तरफ से कोई पेंच खाली नहीं छोड़ना चाहता था। उसने अपने वाद और सबूतों को एक साथ कर रखा था।
     अगले दिन केस की सारी तैयारी करने के बाद उसने दून की हवेली के नंबर से किसी को फोन किया…-” ध्यान रहे ये बात इस तरह से उनके कान में पड़नी चाहिए कि वो खुद कोर्ट के लिए रवाना हो जाएं, उन्हें हरगिज़ ये पता न चल पाये की तुम मेरे लिए काम कर रहे हो । “

  इतना कहकर समर ने फोन रख दिया और राजा से मिलने उसके कक्ष की ओर चला गया।

********

   पिया की मां ने पिया से अगले दिन ही उसके पास पहुंचने का वादा जरूर किया था लेकिन  उन्हें टिकट नहीं मिल पाने के कारण उनका आना दो दिन बाद का तय हुआ था…
    इसी बीच बाँसुरी अपने रूटीन चेकअप के लिए पिया के पास आ गयी…-“कैसी हो पिया?”

पिया ने मुस्कुरा कर हाँ में सिर हिला दिया और बाँसुरी का बीपी जांचने लगी।
बाकी जांचों के बाद उसे बांसुरी पूरी तरह सामान्य लग रही थी…-“आप पूरी तरह से फिट हैं रानी साहेब, और अब बस कुछ ही दिनों में आप खुशखबरी दे सकती हैं।”

” वो तो ठीक है पर तुम्हारे चेहरे पर ऐसे बारह क्यों बजे हैं? सब ठीक है ना? “

” हाँ सब ठीक है! आपके लिए कुछ मंगवाऊँ? चाय कॉफी या ज्यूस? “

” नही ! तुम्हारे घर पर थोड़े न आई हूँ। ये अस्पताल है यहाँ मेहमाननवाजी की ज़रूरत नही है। घर भी तो तुम्हारा यहीं कहीं पास ही है ना? “

” हां जी !” उदास सी पिया ज्यादा कुछ बोल नही रही थी, और उसे ऐसे देख बाँसुरी को समझ में आ गया था कि पिया अंदर ही अंदर परेशान है , पर कुछ कहेगी नही। उसी वक्त पिया का फ़ोन घनघना उठा, फोन उसकी माँ का था….
    पिया अपनी माँ को अपना हालचाल बता रही थी कि उसके केबिन पर किसी ने दस्तक दी और दरवाज़ा हल्का सा खुल गया, पिया की माँ उसकी मासी , उनके बच्चे सब धड़धड़ाते हुए अंदर घुसते चले आये… पीछे पिया के पापा और बाकी लोग थे। उन सब को एक साथ देख पिया आश्चर्य में डूबी अपनी जगह पर खड़ी रह गयी कि उसकी माँ ने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया…-” कैसा लगा हमारा सरप्राइज? हम सारे लोग एक साथ चले आये। “

  पिया कुछ कह पाती की मौसी ,फूफी सारे बच्चे उसके गले से लग उसे बधाइयाँ देने लगे, और वो हड़बड़ाई सी कभी किसी को तो कभी किसी को देख मुस्कुराती रही…-” एक बार बताना तो था मम्मी कि आप इतने लोग आ रहे हो। मेरा सिर्फ दो कमरों का घर है, सब के बैठने पर ही भर जाएगा। सब सोएंगे कहाँ?”

” अरे तू उसकी चिंता मत कर। जिस होटल में तेरी सगाई होनी है ना वहीं हम सब के लिए कमरे भी बुक हैं। और फिर ज्यादा रुकने भी कौन वाला है। कल शाम सगाई निपटेगी ,परसों आस पास थोड़ा घूम लेंगे और उसके अगले दिन ही हम सब की वापसी की फ्लाइट है।”

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शाम ढलती देख बाँसुरी भी वापसी के लिए उठ खड़ी हुई…-“बधाई हो पिया! वैसे तुमने बताया नही सगाई के बारे में।”

  पिया ने बाँसुरी की तरफ देखा और फिर अपनी माँ की तरफ देखने लगी…..-“जी संकोची बहुत है हमारी पिया। वैसे आप…

  माँ कुछ और कह पाती इसके पहले ही पिया ने उन्हें टोक दिया…-“मम्मी ये रानी बाँसुरी साहेब हैं। ये अस्पताल इन्हीं का बनाया हुआ है। “

” अरे मेरा बनवाया नही है, मेरे साहब का है। ” बाँसुरी ने पिया की माँ के सामने हाथ जोड़ दिये, बाँसुरी वहाँ की रानी है ये सुनते ही पिया की माँ के चेहरे पर एक लंबी सी मुस्कान चली आयी…

” माफ कीजियेगा मैं आप को पहचान नही पायी। आप भी सादर आमंत्रित है पिया की सगाई में। “

” जी !तबियत सही रही तो ज़रूर आऊंगी, और अगर कल शाम तक केस का निपटारा हो गया तब तो साहब भी वापस लौट चुके होंगे, उन्ही के साथ आ जाऊंगी।”

  पिया हां में सिर हिला कर एक तरफ खड़ी रह गयी, बाँसुरी ने पिया को देखा और मुस्कुरा कर वापस कहने लगी…-” राजा साहेब एक केस के सिलसिले में दून गए हुए हैं। समर सा भी साथ है। ” समर का नाम आते ही पिया बाँसुरी की ओर देखने लगी….-” ये लोग काम में ऐसे व्यस्त हैं कि किसी को अपने फ़ोन तक का होश नही है। साहब का फोन बंद आ रहा था तो मैंने समर के फोन पर कॉल किया,पता चला उसके दोनों ही नम्बर बंद आ रहे हैं। काम के चक्कर में भूख प्यास भूल जातें हैं ये लोग, फोन क्या चीज़ है।”

  पिया को अब तक समर यहाँ नही है ये बात पता ही नही थी। वो किसी ज़रूरी काम से बाहर गया है और इसी कारण उसका फोन भी बंद आ रहा है। मतलब ये भी तो हो सकता है कि उसने पिया के मैसेज देखे ही न हों।
   पिया के मन में घबराहट सी होने लगी कि काश किसी तरह एक बार समर से बात हो जाती। वो अपनी सोच में थी कि बाँसुरी ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखा और बाहर निकल गयी…

   उसके जाते ही पिया ने अपने घर वालों की तरफ देखा,सभी अति उत्साहित थे। सब उसे घेर घार कर अपने साथ घर ले गए।
       घर पर त्योहार जैसा माहौल हो गया था। पिया को एकांत ही नही मिल पा रहा था कि वो वापस समर को फ़ोन लगा सके। दूसरी बात वो ये भी जान चुकी थी कि उसका फोन बंद आ रहा है। उससे कैसे सम्पर्क करें पिया अभी यही सोच रही थी कि दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी….
   वो दरवाज़े तक जाती कि उसके पहले ही उसकी मौसी की बेटी ने जाकर दरवाज़ा खोल दिया…-“अरे जीजू आप यहाँ? आइये आइये। ” 
    पिया की जिससे अगले दिन सगाई होनी थी,वो लड़का और उसकी बड़ी बहन और जीजा दरवाज़े पर खड़े मुस्कुरा रहे थे।
   पिया ने मन ही मन अपना सिर पीट लिया। वैसे ही भीड़ भाड़ कम थी क्या उसके छोटे से घर में जो ये लोग भी चले आये।
  वो अपनी माँ से बात करने की भी सोच रही थी कि सगाई करने की इतनी क्या जल्दी है? लेकिन इन लोगों के आ जाने से अब वो बात भी टल गई थी।
    वैसे उसने खुद ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी थी, बल्कि कहा जाए कि रखी कुल्हाड़ी पर जाकर पैर ही दे मारा था तो और सही होता।
   ” आप क्या सोचती खड़ी हैं पिया जी। इनसे मिलिए ये मेरी दीदी और ये जीज़ हैं!”
   लड़के ने आंखों से पिया को दीदी के पैर छूने का इशारा किया जिसे समझते हुए भी पिया नासमझ बनी रही…-“जीज़? “उसके सवाल पर लड़का और भी चहक कर उसे समझाने लगा…-“जीजा जी साउंड्स प्रिटी ओल्ड नो? इसलिए जीज़ बोलता हूँ। “
   धीमे से सिर हिला कर पिया अंदर जाने लगी कि लड़के की दीदी ने टोक दिया…-” कहाँ जा रहीं हो पिया? आओ हमारे साथ बैठो!”
” जी दीदी ! आप लोगों के लिए चाय बनाने जा रही थी, आप सब आराम से बैठ कर बातें कीजिये मैं चाय लेकर आती हूँ।”
    रसोई में जाते जाते पिया ने एक नज़र अपनी माँ पर डाली की वो भी उसके साथ रसोई में चली आएं तो वो उनसे खुल कर सगाई की डेट आगे बढ़ाने को कह सकें, लेक़िन वो भी पिया के इशारे समझे बिना वहीं लोगों की भीड़भाड़ में बैठी हंसी मजाक में उलझी रहीं!

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    चाय के साथ ही सबने बाहर खाने जाने का कार्यक्रम भी बना लिया। पिया की माँ ने उसे तैयार होने अंदर भेज दिया और खुद मेहमानों के साथ बैठी रही। मन ही मन खीझती पिया के पास चुपचाप तैयार होने के अलावा और कोई चारा नही था।
   अब उसे हर किसी पर गुस्सा आ रहा था,माँ पर मौसी पर, उस लड़के पर और सबसे ज्यादा समर पर। हद से ज्यादा खड़ूस है, एक बार बता कर भी तो जा सकता था, पर नही अपनी राजशाही दिखानी है ना। इतना घमंडी लड़का उसने अपने जीवन में कभी नही देखा था, हद दर्जे का अकड़ू,घमंडी, सिरफिरा और महा बदतमीज।
   लेकिन इतनी सारी बुराइयों के बाद भी क्यों पिया का दिल उसी पर अटका जा रहा था ये उसकी समझ से परे था।
   पिया का एक मन बोलता..-” हां है अकड़ू, और थोड़ा बहुत नही बल्कि बहुत ज्यादा है। ऐसे लड़कों के साथ निभाना आसान नही होता। कोई बात हुई पहले ही मुहँ फुला लेगा फिर मनाते रहना ज़िन्दगी भर। इससे अच्छा है ऐसे लड़के को उसकी अकड़ और ज़िद के साथ छोड़ दो और उसे चुन लो जो तुम्हें ज़िन्दगी भर खुश रख सके। तुमसे प्यार कर सके, तुम्हारे गुस्से को झेल कर ज़िन्दगी भर तुम्हें मनाने की चाह रखे। भूल जा पिया उस सनकी सम्राट को और आगे बढ़ जा।
   मम्मी का चुना लड़का डॉक्टर है, ज़िन्दगी सेट हो जाएगी। जमा जमाया अस्पताल मिलेगा, वेल ट्रेंड स्टाफ मिलेगा, जमे जमाये मरीज़ होंगे और ज़िन्दगी बेहद आसान हो जाएगी…
….. इतना सब सोचते ही पिया का दूसरा मन बगावत पर उतर आता…-इतना सब तो रहेगा मगर दिल का चैन, सुकून वो सब कहाँ से खरीद पाओगी पिया मैडम। समर से अगर शादी नही हुई तो क्या इतनी आसानी से उसे भूल पाओगी।
   और मान लो कहीं नही भूल पायीं तो??

  ये “तो” उसे चैन नही लेने दे रहा था कि मम्मी आ गयी…-” बेटा तैयार हो गयी, चल बाहर सब इंतेज़ार कर रहें हैं। अरे ये क्या जीन्स पहनी है तूने। ” पिया की माँ ने अपने माथे पर हाथ मारा और आलमारी से एक हरी सी लहरिया निकाल उसके हाथ में रख दी…
…-“ससुराल वालों के साथ डिनर पर पहली बार जा रही है बेटा! साड़ी पहन कर चल, उन्हें भी अच्छा लगेगा।”
    पिया ने मुहँ बनाकर साड़ी ली और बदलने चली गयी…

******

   अगले दिन सुबह कोर्ट के समय से कुछ पहले ही समर राजा और आदित्य कोर्ट में पहुंच चुके थे। कुछ देर में ही ठाकुर साहब के वकील भी अपने लाव लश्कर के साथ वहां पहुंचकर समर की ओर देखते हुए उन्होंने एक अजीब सी मुस्कान उसे दी और अपने कागज पत्तर सही करने लग गए।
   न्यायाधीश महोदय के आते ही न्यायालय की कार्य प्रक्रिया शुरू हो गई। आज सबसे पहले ठाकुर साहब के वकील के द्वारा जमा किए गए सबूतों को कोर्ट द्वारा अवलोकन करना था।
    न्यायाधीश महोदय के सामने जैसे ही सबूतों को रखा गया उन्होंने देखा कि वह लिफाफा पूरी तरह से खाली था। न्यायाधीश महोदय ने सवालिया नजरों से ठाकुर साहब के वकील की तरफ देखा ठाकुर साहब के वकील पहले ही इस बात के लिए तैयार बैठे थे….-” देख लिया न्यायाधीश महोदय मैंने पहले ही कह रखा था ठाकुर साहब के खिलाफ वाद दायर करने वाली पार्टी कोई ऐसी वैसी पार्टी नहीं है। राजा अजातशत्रु का नाम यूं ही नहीं लिया जाता, इन्होंने एक बार फिर अपनी चाल चली और उनके वकील ने मेरे द्वारा जमा किए सारे सबूतों को गायब करवा दिया है।”

समर इस बात के लिए पहले ही तैयार बैठा था उसके चेहरे पर एक मुस्कुराहट खिल गई।

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ठाकुर साहब के वकील अपनी रौ में बोलते चले गए…..-” हुजूर मैं बचाव पक्ष का वकील हूं इसलिए आपकी और मेरे अजीज दोस्त समर की नजरें मुझ पर गड़ी हुई हैं, कि मैं किस तरह से अपने मुवक्किल ठाकुर साहब का बचाव करता हूं। लेकिन इसके पहले मैं यही कहना चाहूंगा कि हम जिनके खिलाफ खड़े हैं वह काफी मजबूत पक्ष है। ठाकुर साहब जैसे व्यक्तित्व को डिगाने के लिए उन्हें गिराने के लिए किसी बहुत मजबूत इंसान का उनके सामने खड़ा होना बहुत जरूरी है। जैसा कि आप जानते हैं ठाकुर साहब एक इमानदार और कर्मठ व्यक्तित्व हैं इसलिए उनके समक्ष खड़े होने के लिए समर और उनके मुवक्किल राजा अजातशत्रु सिंह और रानी बांसुरी अजातशत्रु सिंह को इस हद तक नीचे गिरना पड़ा कि मेरे द्वारा लाए सबूतों को भी उन लोगों ने गायब कर दिया। अब इसी से आप यह अंदाजा लगा सकते हैं कि राजा अजातशत्रु के मन में हार का कितना भय हैं । उन्हें लगा कि इन्होंने जो भी एलिगेशन मेरे मुवक्किल ठाकुर साहब पर लगाए हैं वह सत्य तो प्रमाणित हो नहीं पाएंगे उल्टा रानी बांसुरी पर मैंने प्रतिवाद दायर कर दिया, जिसका अब तक इनकी तरफ से कोई भी सही जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया है। अब ऐसे में इन लोगों का डर कर मेरे द्वारा दाखिल किए गए सबूतों को गायब कर देना यही दिखाता है कि हमारी जीत पक्की है हुजूर। मैं आपसे गुजारिश करता हूं कि  मुझे सबूत इकट्ठा करने में कुछ और वक्त लगेगा इसलिए केस की अगली तारीख को कुछ महीनों के लिए मुल्तवी कर दिया जाए।”

  समर जानता था कि ठाकुर साहब के वकील का मुख्य उद्देश्य सिर्फ केस को जितना हो सके उतना लंबा खींचना था जिससे कि केस लंबा चलता रहे और ठाकुर साहब आराम से बाहर तफरीह कर सकें….
  समर अपनी जगह से उठ कर खड़ा हो गया..-” माननीय न्यायाधीश महोदय अब मैं अपने विचार आपके सम्मुख रखना चाहता हूं। हमारी वकालत के भी कुछ नियम होते हैं वैसे वकील साहब का अनुभव मेरी उम्र से भी कहीं ज्यादा है तो यह मुझसे कहीं ज्यादा इस बात को समझते होंगे कि जब हम न्यायालय में सबूत प्रस्तुत करते हैं तब उन साक्ष्य की दो से तीन प्रतियां बनवाई जाती हैं। एक प्रति हम अपने पास सुरक्षित रखते हैं एक प्रति अपने मुवक्किल के मार्गदर्शन में उनके ऑफिस में जमा की जाती है। एक प्रति हमारे खुद के ऑफिस में जमा होती है। और इसके साथ ही 2 प्रतियां न्यायालय में हम जमा करते हैं । ऐसा करने का कोई स्थिर प्रोटोकॉल हमें नहीं दिया जाता यह हम करते हैं सिर्फ अपनी सुविधा के लिए।
    ऐसा हम इसीलिए करते हैं जिससे अगर कोई भी प्रति कहीं गुम हो जाए तो बाकी प्रतियों के सहायता से कोर्ट में केस आगे बढ़ाया जा सके और कोर्ट का समय खराब ना हो। इसी बाबत मैं वकील साहब से जानना चाहता हूं कि उन्होंने अगर एक प्रति न्यायालय में जमा की थी तो बाकी की प्रतियां उनके पास मौजूद होनी चाहिए तो ऐसे में वह अपनी बाकी की प्रतियों को यहां जमा कर सकते हैं जिससे कि माननीय न्यायालय का समय खराब ना हो और कोर्ट केस को आगे बढ़ाया जा सके।
    लेकिन अगर इस वक्त वही कहते हैं कि उनके पास सबूतों और साक्ष्यों की एक ही प्रति मौजूद थी जो उन्होंने न्यायालय में जमा कर दी थी तो इसे उनकी गैर जिम्मेदाराना हरकत मानते हुए कोर्ट उन पर भी सवाल लगा सकता है।
          जहां तक यह बार-बार ठाकुर साहब को एक कर्मठ और इमानदार व्यक्तित्व बता रहे हैं, तो इस हिसाब से हिंदुस्तान ही नहीं सारी दुनिया के वह सारे खूनी हत्यारे ड्रग डीलर और गुनाहगार बेगुनाह साबित हो जाते हैं और ईमानदार और कर्मठ साबित हो जाते हैं ,क्योंकि उन लोगों ने भी हत्याएं जरूर की चोरी डकैती जरूर किए गुनाह जरूर किए लेकिन वह अपने स्वयं के लिए तो इमानदार ही थे। उन्होंने अपने आप से तो कभी कोई बेईमानी नहीं की। अपने परिवार के लिए वो सदा कर्मठ रहे और इसीलिए पैसे कमाने की ललक और जुनून ने उन्हें गुनाहों के दलदल में धंसा दिया ।
     तो इस तरह से ठाकुर साहब वाकई एक कर्मठ और इमानदार व्यक्तित्व हैं। उन्होंने भले ही कितनी भी नृशंस हत्याएं की  लेकिन यह खून उन्होंने अपने खुद के व्यापार को बढ़ाने के लिए किए। उन्होंने जहरीली शराब  जरूर बनाकर बेची लेकिन इसे बेचने के पीछे उनका उद्देश्य था पैसों की कमाई और पैसों की कमाई इसलिए जरूरी थी कि उन्हें अपने घर परिवार को पालना था।
  उन्होंने गैर कानूनी ढंग से हथियारों को खरीदा और बेचा लेकिन यह भी उनके व्यापार का एक हिस्सा था और अपने व्यापार को चलाने के लिए व्यापारी किसी भी हद तक बेईमानी कर सकता है और इस तरह की बेईमानी बेईमानी नहीं मानी जाती बल्कि ठाकुर साहब तो एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तित्व बनकर उभरे।
    उनका साथ देने वाले जिन व्यापारियों की फौज वकील साहब ने खड़ी की है वह सारे के सारे ठाकुर साहब की ही तरह ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति हैं। न्यायाधीश महोदय मैं आपसे बताना चाहता हूं कि शहर और आसपास के इलाकों में जितनी भी गुंडागर्दी गैरकानूनी ढंग से हथियारों और ड्रग्स की सप्लाई आदि इत्यादि के काम फैले हुए हैं इन सब के पीछे ठाकुर साहब और इनकी सेना का ही नाम है। मैं यह लिखित में साक्ष्य आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं । जिन्हें पढ़कर आप मेरी बात को और भी अच्छे से समझ सकते हैं। इन सभी में ठाकुर साहब के किए कानूनी गैरकानूनी धंधों का कच्चा चिट्ठा तो है ही लेकिन इसके साथ ही वह सारे व्यापारी जो रानी बांसुरी के खिलाफ एकजुट होकर ठाकुर साहब के पास मदद मांगने गए थे उनके भी कारोबार का कच्चा चिट्ठा लिखा हुआ है। रानी बांसुरी जब दून में एडिशनल कलेक्टर बनकर आई तो उन्होंने आते ही पूरे जिले की बागडोर संभाल ली । यहां आते ही जैसे ही उन्हें इन व्यापारियों के गैरकानूनी धंधों के बारे में पता चला उन्होंने सभी के सब को एक साथ नोटिस जारी कर दिया।
   एक औरत जैसे ही कानून का सहारा लेकर इन सभी के गैरकानूनी कामों के सामने आकर खड़ी हुई तो वह इन सब की आंखों में चुभने लगी, वह रोड़ा बन गई इन लोगों के कामों के लिए और इसीलिए उन्हें फंसाने के लिए यह लोग एक पर एक चाल चलने लगे। रानी बांसुरी का कार्यकाल इतना साफ और सफेद था कि उन पर दाग लगाना इतना आसान भी नहीं था। और इसीलिए यह सब मिलकर ठाकुर साहब को साथ ले रानी बांसुरी के खिलाफ जंग लड़ने को निकल पड़े। यह लोग इतने गिरे हुए हैं न्यायाधीश महोदय कि इन्होंने रानी बांसुरी पर जानलेवा हमला करने से पहले भी नहीं सोचा कि वह एक औरत को उसके कर्तव्यों से डिगाने के लिए उसकी जान भी ले सकते हैं ।
    लगभग दो तीन बार रानी बांसुरी पर ऑफिस आते और जाते समय प्राणघातक हमला ठाकुर साहब द्वारा करवाया गया  और इस दौरान ठाकुर साहब खुद वहाँ मौजूद थे जिसके सबूत मेरे पास हैं।

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   समर ने एक और लिफाफा न्यायाधीश महोदय की ओर बढ़ा दिया लेकिन उसके ऐसा करते  ही कोर्ट में पीछे कहीं बैठे ठाकुर साहब अपना कंबल हटा कर जोर से चिल्ला उठे….-” इसकी बातों में कोई सच्चाई नहीं है हुजूर। इसकी सारी बातें गलत है । झूठ है, यह ना जाने कहां से फर्जी और झूठे सबूत उठाकर ले आया है। मैंने आज तक ऑफिस से आते और जाते वक्त बांसुरी पर जानलेवा हमला नहीं करवाया। समर मेरे केस को कमजोर करने के लिए सिर्फ मनगढ़ंत बातें कर रहा है और आपके सामने नकली सबूत पेश कर रहा है मैं जानता हूं अच्छे से…

अपनी बात पूरी करते हुए अचानक ठाकुर साहब चुप हो गए।उन्हें  समझ आ गया था कि उनसे बहुत बड़ी गलती हो गयी है।अब तक उनके पीछे से उनकी पीठ पर पुलिस वाले अपनी गन तान चुके थे। और उन्हें हाथ से पकड़ कर कोर्ट के सामने  लाकर खड़ा कर चुके थे।
    ठाकुर साहब के वकील ने ठाकुर साहब को इस तरह कोर्ट की कार्यवाही के बीच कूदते देखा और अपने सर पर हाथ मार कर एक तरफ बैठ गया। उसे महसूस हो गया था कि वो समर के जाल में फंस चुके है। ठाकुर साहब की अनुपस्थिति को वह अब तक राजा अजातशत्रु पर इल्जाम के रूप में लगाते आये थे,अब ठाकुर साहब के अचानक इस तरह यहाँ प्रस्तुत हो जाने से उन्हें इस केस से बचाने का उसका काम अधूरा रह जाने वाला था। उसने समर की ओर देखा, समर ने उन्हें देख कर अपने हाथ जोड़ दिये और धीमे से गुनगुना कर कुछ कह गया…-” वो क्या है ना आपका अनुभव कहीं अधिक है मेरी उम्र से लेकिन मेरी उम्र कमबख्त बावली और सिरफिरी है।”
वकील साहब भी उसे देख मुस्कुरा उठे…-” आज के पहले तो ये यहाँ नही आये, आज इन्हें यहाँ तक कैसे पहुंचा दिया? “
               उनके सवाल पर समर एक किनारे खड़ा मुस्कुराता रहा… उसने पीछे देखा, कोर्ट रूम के दरवाजे पर एक आदमी अपना चेहरा आधा ढके खड़ा था उसने आंखों ही आंखों में समर को अभिवादन किया समर ने भी धीरे से बाकियों की नजर बचाकर उसके अभिवादन को स्वीकार किया और मुस्कुराकर ठाकुर साहब की तरफ देखने लगा।
   यह वही आदमी था जिसे समर ने 1 दिन पहले फोन करके ठाकुर साहब को कोर्ट तक पहुंचाने की बात कही थी……
….

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क्रमशः

aparna….
    

शादी.कॉम -4

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  ,”पर्मिला अरी ओ पर्मिला,,कहाँ मरी पड़ी है,,हे राम!!! एक तो मरे घुटने के दर्द से चला फिरा नही जाता फिर भी तेरी बेटी के लिये कैसे रात दिन एक किये हूँ,,देख तो सही।।”

  अपने पेट पर के टायरों को संभाले घुटनों को सहलाते बुआ जी प्रमिला को आवाज़ देती भीतर चली आईं, उनकी आवाज़ से प्रमिला रसोई से हाथ पोछती भागी भागी आई और उन्हें प्रणाम किया।।उनकी आवाज़ बिना सुने ही सीढियों से नीचे उतरती बाँसुरी ने जैसे ही बुआजी को देखा वापस ऊपर को जाने लगी पर बुआजी की गिद्ध नजरों से बच ना सकी_
     “अरी लाड़ो तू भी आ जा,तेरे लिये ही तो आती हूँ बिटिया,,देख कैसा हीरो जैसा रिश्ता लेकर आई हूँ,,आ आकर देख तो जा।।”

अभी उनकी बात पूरी भी नही हुई थी कि वीणा अपनी चमचमाती रानी कलर की साड़ी में लसर फसर वहाँ पहुंच गई ।।

प्रमिला ने दोनो के हाथ में बादाम का हलुआ पकड़ा दिया,”जिज्जी पहले इ खा के बताओ ,कैसा बना है,हमरी लाड़ो को बड़ा पसंद है,उसी के लिये बनाया है,बहुत दिमाग का काम करती है रात दिन बेचारी,खटती रहती है किताबों के बीच।।

“बस अम्मा यही सब घी में तर हलुआ पूड़ी ठून्गो अपनी लाड़ली को,दिन बा दिन बरगद बनती जा रही है,अरे  इतना तेजी से महंगाई नही मोटाती जैसी तेजी से तुम्हरी पेटपुन्छनी मुटा रही, कुछ तो रहम करो अम्मा।।”

“अरे तो का भूका मार दे अपनी लड़कोर को, तुम्हे भी तो खिला पिला के पाला पोसा है बड़की ।।

“हमें खिला पिला के पाला है इसे खिला पिला के मुट्वा रही हो,फरक है दोनो में अम्मा।।

“प्रणाम करते हैं बुआजी,और दीदी कैसी हो,गोलू को कहाँ छोड़ आई आज।”

“उसकी दादी के पास छोड़ा है,अरे दादी हैं इतना तो करे अपने पोता के लिये।।”

किसी बात पे बुआजी ने अपना प्रिय राग छेड़ दिया और वीणा भी उनके सुर से सुर मिलाने लगी।।

“करेला उसपे नीम चढ़ा”बाँसुरी ने धीरे से गुनगुना कर कहा।।

“का बोली तुम ,हैं!! ए बांसुरी,हमे नीम बोल रही हो।खुद का सकल(शक्ल) देखी हो आईना में, कोनो साईड से लड़की नही लगती हो,हम तो समझा समझा के थक गये,कि कभी पार्लर भी चली जाओ।”

“ठीक ए बोल रही हो बिटिया,ऐसा करो लड़का वाला आने वाला है बांसुरी को देखने,,….. दुई चार दिन में आ जायेगा,तब तक तुम इसका थोड़ा रंग रोगन करा दो।।”
बुआ जी के इस प्रस्ताव का वीणा ने पूरा पूरा समर्थन किया ,पर बाँसुरी अड़ गई

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“हम वो अदनान सामी के लिये पार्लर नही जायेंगे,,हमको नही पसंद वो मौत का कुआँ मे जाना ।”

“पगला गई हो का,,कौन बोला तुमको ऊ मौत का कुआँ है??हम तो जातें हैं थ्रेडिंग कराने,और फेसियल कराने ।”

“हाँ तो तुम जाओ ना दीदी,हमको नही पसंद वहाँ जाना ।।जब हमारा मन करेगा तभी जायेंगे।।”

“तो इतना खेती काहे बढ़ा डाली हो आँखी के ऊपर , कम से कम थ्रेडिंग ही करा लो।।”

“हम काहे करायें,वो लड़का तो हमारे लिये कुछ नही करा रहा।।”

“हाय राम!! मैं कहाँ जाके मरूं,अरे लड़के कभी थ्रेडिंग कराते हैं क्या?? कैसा पागल समान बात करती हो बंसी।।””

“जानती हो दीदी लड़के काहे थ्रेडिंग नही कराते जिससे उनका बात सही साबित हो जाये कि ‘ मर्द को दर्द नही होता’ अरे जब तक औरतों वाले काम करोगे ही नही तब तक दर्द पता कैसे चलेगा।।

“अरे सुन ना हमको पता है तू बहुतै ज्ञानी है,अभी चल हमारे साथ कम से कम क्लीन अप करा ले लड़की!!!चल बुआजी की बात का लाज रख ले………..अम्मा तुम आज रात के खाने पे आलू टिक्की बना लो,जिससे हमारी धमल्लो खुस हो जाये,चल अब टिक्की के नाम पे चल पार्लर।।”

जाने क्या सोच बाँसुरी वीणा के साथ चली गई,लौटते में उसे जिम में रुकना था भैय्या जी को सुबह 7:30 पे ज्यादा कुछ पढा नही पाई थी इसीसे शाम 4 का समय फिर से दिया था,,4बजे निरमा वहीं पहुंचने वाली थी।।
   
        पार्लर से लौटते हुए बांसुरी ने जैसे ही जिम में रुकने की इच्छा जाहिर की,वीणा का मन मयूर नाच उठा,अपने मोहल्ले की परिपाटी को निभाते हुए वो भी किसी ज़माने में भैय्या जी की फैन हुआ करती थी,पर नारी सुलभ शील संकोच ने खिड़की से झांक लगा के रोड पे जॉगिन्ग करते भैय्या जी को देखने से ज्यादा की अनुमती नही दी और फिर सरकारी नौकरी करते यू डी सी का आया चमचमाता रिश्ता उसके घर वालों ने लपक लिया,और कभी भैय्या जी को बड़ी अदा से राजकुमार बुलाने वाली वीणा भी संसार के सुर में सुर मिलाती भैय्या जी बोलने लगी।।
   
        पर आज बांसुरी की इच्छा सुन उसके मन में सोया प्यार जाग उठा,,अरे अपने प्रथम प्यार को एक झलक देख लेना पतिदेव से चीटिँग थोड़े है !! वो तो बस ऐसे ही………जैसे लगातार चलते बोरिंग से सीरियल के बीच सलमान खान का तूफानी ठंडा एडवरटाइजमेंट ……….जैसे थाली भर बेस्वाद खिचड़ी के साथ भरवा लाल मिर्च का अचार!!! हाय !!
  
       “ठीक है चलो फिर बंसी!! हम भी तुम्हारे साथ जिम चले चलतें हैं ।”

  “काहे?? तुम क्या करने जाओगी दीदी??”

  “अरे तो तुम का करने जा रही हो,,पतला होने का भूत सवार हो गया क्या??”

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भैय्या जी नही चाहते थे कि उनकी ट्यूशन वाली बात जिम से बाहर लीक हो इसिलिए उन्होनें अपनी आदत के अनुसार बांसुरी को ‘मम्मी की कसम’ खिला दी थी,अब उस कसम के बोझ तले दबी बाँसुरी ने असल कारण नही बताया- “हाँ दीदी हम सोच रहे थोड़ा जिम वीम करें,बहुत हट्टी कट्टी हो गये हैं …… नही!!”

“हाँ हो तो गयी हो एकदमी टुनटुन लगने लगी हो।।”

“अब इतना तारीफ भी मत करो दीदी,हम सोनाक्षी सिन्हा जैसे फिगर के हैं ।”

“ओह्हो बड़ी आई सोनाक्षी!! तो अब का करीना बनने का विचार है।।”

“अब यही मान लो दीदी,बचपन से हमे जानती हो,जो ठान ली तो फिर कर के रह्ते हैं,है ना!!, अब तुम जाओ,हम एक घंटा में घर आ जायेंगे।”

बड़े बेमन से जिम में झांकती फाँकती वीणा घर की तरफ मुड़ गई,उसे बाँसुरी पे पूरा पूरा विश्वास था,कि  चाहे प्रलय आ जाये राजा भैय्या उसकी छुटकी बहन जैसी रूपवती पे कभी दृष्टिपात नही करेंगे, इसी विश्वास पे अडिग बाँसुरी को वहाँ अकेली छोड़ वो घर चली गई ।।

   बाँसुरी वहाँ पहुंची तो निरमा और प्रेम एक ट्रेड मिल पे बैठे गप्पे मार रहे थे,भैय्या जी ज़मीन पे योगा मैट बिछाए किताबों के जाल मे उलझे बौराये बैठे थे,,दो चार छुटभैये इधर उधर वर्जिश करने की बहुत बुरी एक्टिंग कर रहे थे ।।
         हड़बड़ाती हुई बांसुरी अन्दर गई और भैय्या जी के पास पहुंच के बैठ गई,और किताबें देखने लगी

“अरे इत्ता सारा किताब काहे ले आये,आपको सिर्फ बारहवीं पास करना है,कोई आई ए एस थोड़े ही बनना है अभी।।”

“हमारे पास जो जो रख्खा था,हम सब उठा लाये,काम की तो सभी है ना।।”

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“नही!! आपके काम की कोई नही….आप मान लिजिये कि आप गधे पैदा हुए हैं,स्कूल मे भी गधे ही रहे और कॉलेज में भी गधे ही रहेंगे।।’

“भैय्या जी आपका लिहाज करके चुप हैं,समझा दीजिये इस लड़की को,कहीं हमारा दिमाग सटक गया तो हमारे हाथ से खून ना हो जाये इसका।”
एक गपोड़ी चिल्लाया

   भैय्या जी ने बिल्कुल सरकार वाले अमिताभ की स्टायल मे उसे हाथ दिखा के चुप करने का इशारा किया और बाँसुरी से बोले-“काहे हमरा इतना बेज्जती करती हो बात बात पे!! क्या मज़ा आता है इसमें ।”

“अरे तुम्हारी बेइज्जती नही कर रहे भई!! बस इत्ती सी बात कह रहे कि इतना सब किताब को मारो गोली,बस एक किताब पकड़ो नाम है ‘ युगबोध’!! और उसमें भी सब पढ़ने का ज़रूरत नही है,हम पिछले दस साल का पेपर देख के महत्वपूर्ण सवाल टिक कर देंगे,बस उसी उसी को तुमको रट्वा देंगे,,समझे।।”इतना सब किताब पकड़ के रट्टा मारोगे,हाथ में और दिमाग में दर्द हो जायेगा,समझे।

“देखा भैय्या जी ई लड़की फिर आपका बेज्जती कर रही,अरे भैय्या जी मर्द हैं ,उनको किताब पकड़ने से दर्द नही होता।।”

“का नाम है तुम्हारा ??”

“प्रिन्स!! प्रिन्स नाम है हमारा।”चेले ने सीना ठोक के जवाब दिया,उसे नही पता था कि उसने कैसी चतुर बिलाई से पंगा ले लिया था।।

“तो प्रिन्स तुम मर्द नही हो??”

“अरे काहे नही है,,हम भी हैं ।”

” जल्लाद देखे हो कभी?? कैसा दिखता है।”

“नही असली का नही देखे,,हम पिच्चर वाला जल्लाद देखे हैं ,अरे वही मिथुन चक्रवर्ती वाला जल्लाद।”प्रिन्स के चेहरे पे अभूतपूर्व ज्ञान की छटा फहर रही थी।।

“ब्यूटी पार्लर जानते हो?? वहाँ जो काम करती है ना, असल में वो जल्लाद होतीं हैं,समझे !!! भयानक खून की प्यासी!!
       पीपल पे उल्टी लटकी चुड़ैल भी इन पार्लर वालियों से बहुत डरती हैं ।।”

“आपको  कैसे पता बाँसुरी मैडम जी ।।”भैय्या जी ने अपनी भोली मुस्कान बिखेरते हुए पूछा ।।

“अरे कभी टी वी पे किसी भूतनी को मेक’प किये देखे हैं क्या?? सब बाल बिखराये पगलाये घूमती हैं ।।”

“आप मजाक बहुत करती हैं,हैं ना!!” भैय्या जी हँसते हुए बोले

“नही मजाक नही कर रहे,,आज ही दोपहर को हमारी दीदी और हमारी बात हो रही थी,मर्द और औरत की बराबरी के बारे मे….हम बोले मर्द कभी औरत का बराबरी कर ही नही सकते,जितना दर्द औरत झेल सकती है ,मर्द झेल पायेंगे भला??”

“ए बांसुरी तुम बहुत जादा बोलती हो,कहाँ हम मर्द और कहाँ तुम औरतें ।।।प्रिन्स की बात सुन बाँसुरी ने अपनी बीन बजानी चालू रखी

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  ”  तो प्रिन्स बाबू इतने बड़े मर्द हो तो आ जाओ अखाड़े में ब्यूटी पार्लर के ,और फिर हम देखेंगे तुम्हरी मर्दानगी ….एक कुर्सी मे बैठा दो एक लड़की को और दूसरे में तुम्हें या किसी भी मर्द को ,हम लिख के दे रहे हैं बाबु  , जब यमराज जैसी शकल की दो ब्युटिशियन हाथ में धागा पकड़ी भौंहो को नोचने आयेंगी ना तब तुम ससुरे मर्द ज्यादा जोर से चिल्लाओगे ।।
     अरे थ्रेडिंग तो सबसे सिम्पल दर्द है।।।जब दो खतरनाक खूनी खेल खेलने वाली नागिन आयेंगी तुम्हारे सामने और उनमें से एक तुम्हारा खरीफ की फसल से लहलहाता खेत वाला  हाथ पकड़ के उबलता हुआ वैक्स पलट देंगी और उसके बाद अपनी आंखों से आग उगलते हुए एक बोरी का टुकड़ा तुम्हारे हाथ पे बिछा के उसको जमा के जोर से सटाक !!!खींचेंगी ना तब कसम से कह रहे तुम्हें तुम्हरी अम्मा के साथ साथ नानी भी याद नही आ गई ना तो हमारा नाम बदल देना,,एक बार सह के देखो वो दर्द बबुआ और फिर बोलो मर्द को दर्द होता है कि नही….ऐसे बिलबिला के भागोगे ना कि सीधा मंगल यान से उड़ान भरोगे फिर चाहे कोई कितना  भी आवाज़ दे ले रुकने वाले नही  तुम मर्द!!!
          बड़े आये मर्द!!! खुद को कुच्छो नई कराना और हम सलगे ज़माने का दर्द झेले इनके लिये।।

“और सुनो ये फेशियल से चेहरा चमकाने का दावा करने वाली नागिने सबसे पहले चेहरा साफ कर चेहरे पे ब्लीच पोत देती हैं,वो कभी चेहरे पे पुतवा के देखो,रोंम रोम से ऐसे अंगारे फूटेंगे की जीते जी नरक की दावग्नी का स्वाद चख लोगे बबुआ।।
     ये सब करा लो उसके बाद हमसे कहना कि मर्द को दर्द नही होता।।”

“अरे बंसी !! हुआ क्या?? इत्ता काहे भरी बैठी हो।।”निरमा के पूछते ही बाँसुरी का ध्यान गया कि वो पढ़ना पढाना छोड़ कर बस इधर उधर की बतकही में लगी है।।

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  “अरे कुछ नही निरमा आज हमें दीदी जबर्दस्ती पकड़ के पार्लर ले गई थी,और बस ये ही कोई काम बिना मर्ज़ी के करना हमे पसंद नही।।”

“अरे कोई बात नही मैडम जी !! पर एक बात है,,आज आप अच्छी भी लग रही हैं ,कुछ कुछ सोनक्षी सिन्हा जैसी  ।।” राजा भैय्या के ऐसा बोलते ही बांसुरी मुस्कुरा पड़ी -” पर राजा हमें सोनाक्षी नही पसंद,हमें तो श्रीदेवी पसंद है,भले ही हमारी मम्मी के जमाने की हेरोइन है पर पसंद वही है।।”

  राजा भैय्या का मुहँ खुला रह गया क्योंकि दिल ही दिल में उनके भी ख्वाबों की शहजादी श्रीदेवी ही थी।।उनके आसमान के बादल श्रीदेवी के दम पे थे और उस आसमान की बिजलियां थी श्रीदेवी की अंगड़ाई ।।

“तो क्या हुआ आप बन सकती हैं श्रीदेवी !! अगर आप चाहें।”

“वो तो ठीक है पर तुम हमें ये आप आप क्यों कहते हो,तुम हमें बाँसुरी ही कहा करो,जैसे हम तुम्हें राजा कहते हैं ।।”

“ठीक है,,अच्छी बात है,तो अगर बुरा ना मानो तो एक बात कहें बांसुरी,तुम जिम शुरु कर दो।।तुम हमें पढ़ा दिया करो,और हम तुम्हें कसरत करवायेंगे, बस छै महीने मे तुम पूरी श्रीदेवी बन जाओगी।।”

“हाय !! सच्ची”

“और का! चाहे तो हम मम्मी की कसम खा लेते हैं ।”

“अरे नई नई कसम ना खाओ,,चलो तो फिर कल सुबह से हम आते हैं ,सुबह व्यायाम और शाम को पढ़ाई,ठीक है??”

“ठीक है।”राजा भैय्या ने मुहर लगा दी।।

बाँसुरी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और राजा भैय्या ने अपनी मैनिक्यूर्ड (मैनिक्यूर की हुई जैसी दिखती)
उंगलियों से उसका हाथ थाम लिया।।

    एक तरफ जहां राजा भैय्या बांसुरी की बुद्धिप्रद कुशाग्र बातों में आकन्ठ डूबते जा रहे थे ,वही बाँसुरी को भी भैय्या जी की भोली हरकतों मे कम से कम बात करने लायक मित्र की झलक मिलने लगी थी।।

  बांसुरी ने जाते जाते पलट के प्रिन्स को बुलाया, प्रिन्स जो अभी तक ब्यूटी पार्लर के स्केरी हाऊस के डर के साये मे कांप रहा था,चुप चाप आकर उसके सामने खड़ा हो गया।।

“ए सुनो!! इतना ना डरो ,तुम्हे इस जनम पार्लर नही जाना पड़ेगा।।और एक बात कहें??”

“जी बांसुरी जी !! कहिये।।”

“ये जो शर्ट के दो बटन खोल के सिंघम बने घूमते हो ना कुछ नही होने वाला बबुआ,एक तो दिखते हो जैसे टी बी का मरीज एकदम सुख्खड़,,और उसपे बटन खोले और अपनी सच्चाई दिखा देते हो….
बन्द करो वर्ना लड़कियाँ तुम्हरे फेफड़े की हड्डियां गिन डालेंगी,और फिर शर्त लगाएंगी ,एक बोलेगी 12थी रे तो दुजी कहेगी नही मैनें तो 14 गिनी।।

हँसते हँसते बांसुरी और निरमा घर निकल गये।।

क्रमशः

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aparna..

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जीवनसाथी – 115

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     जीवनसाथी 115

   वकील साहब ने अपनी जिरह समाप्त करने के बाद एक सबूतों का लिफाफा न्यायाधीश महोदय की तरफ बढ़ा दिया, लेकिन सुबह से चल रही जिरह में कोर्ट का समय समाप्त हो चुका था। उन सबूतों को कोर्ट में ही संभाल कर रख लिया गया। और न्यायाधीश महोदय ने कोर्ट की समय समाप्ति की घोषणा कर दी। केस की अगली तारीख दो दिन बाद के लिए तय करके न्यायाधीश महोदय ने उस दिन के समापन की घोषणा कर दी।

   राजा समर और आदित्य के साथ बाहर चला आया। यह तीनों लोग हवेली के लिए निकल गए….
आदित्य के चेहरे से नजर आ रहा था कि वह बहुत गुस्से में था । उसने समर की तरफ देखा और बोलना शुरु कर दिया…-” हद दर्जे का बदतमीज वकील था। जिस तरह से भाभी साहेब के लिए उल्टा सीधा कह रहा था मुझे तो डर था कहीं राजा भैया उठ के वही उसका मुंह ना तोड़ दें।”
” राजा अजातशत्रु हैं यह! हर काम अपने पद की गरिमा अनुरूप ही करते हैं। “
समर के जवाब पर राजा मुस्कुराने की कोशिश करने के बावजूद मुस्कुरा नहीं पाया…-” तुम सही कह रहे हो आदित्य! बांसुरी पर लगाए झूठे आरोप सुन सुनकर मुझे भी बहुत बुरा लग रहा था। लेकिन कोर्ट की कार्यवाही के बीच  मेरा कुछ भी कहना सही नहीं होता।”
राजा की बात पर आदित्य ने हां में सिर हिला दिया…-” जी आप सही कह रहे हैं भैया! लेकिन समर अब क्या सोचा है आगे इनके लिए?”
“तुम परेशान मत हो आदित्य! इनकी एक-एक बात झूठी और खोखली है। इनकी बातों का कोई साक्ष्य कोई सबूत इनके पास नहीं है। इसलिए बड़ी चालाकी से वकील साहब ने कोर्ट रूम की समय समाप्ति तक उल्टी सीधी दलीलें देकर समय को खींचा, और उस समय अपने सबूत पेश किए जिस वक्त कोर्ट के पास सबूत देखने का वक्त ही नही बचा।
  इसका कारण यही है कि वकील के पास कोई सबूत हैं ही नही। लेकिन इतनी लंबी चौड़ी कहानी के साथ सुबूत तो देने ही पड़ते हैं। सो दे दिये , अब जब अगली तारीख पर सबूत खुलेंगे, तब ये वकील साहब एक बार फिर वहीं नाटक करेंगे जो आज ठाकुर साहब की अनुपस्थिति के लिए किया …
  इनका कहना होगा कि मैंने तो रखे थे, जाने सारे सबूत गायब कहाँ से हो गए?”
   आदित्य ध्यान से समर की बातें सुन रहा था!
” लेकिन ये तो बहुत बड़ा रिस्क ले लिया वकील साहब ने। क्योंकि अगर जज साहब लिफाफा खोल लेते तो?”
” अगर उसी वक्त लिफाफा खुलता तब भी ये वहाँ यही एक्टिंग करते कि अरे सबूत कहाँ गए? मैंने तो यहीं रखे थे। ये सब इनकी चाल है और इनकी ही चाल से हमें इन्हे मात देनी है। वैसे भी सोच कर देखो उनके पास किस बात का सबूत होगा? जब उनकी कोई बात तथ्यपरक है ही नही…
         न रानी बाँसुरी की आई ए एस की परीक्षा पर उन्होंने सच बोला! न उनके और राजा साहब के विवाह पर। खैर एक बात जरूर उनकी सच थी, लेकिन अफसोस की बात है कि उसके लिए भी उनके पास सबूत नही है। “
   बातों ही बातों में वो लोग हवेली पहुंच चुके थे..
“उनकी कौन सी बात सच थी समर? “
आदित्य के सवाल पर समर मुस्कुराने लगा…. -” पहले कुछ खा पी तो लीजिये राजकुमार आदित्य ! फिर आपको सारी बातें बता दूंगा। “
राजा भी आदित्य की तरफ देखने लगा जैसे उसे भी समर की कोई बात समझ में न आई हो ….
समर मुस्कुरा कर एक तरफ बैठ गया…-” हुकुम सुबह से आपने भी कुछ नही खाया पिया है। मुझे लगा नही था कि ठाकुर साहब का वकील बात को इतना लंबा खींच लेगा। आपको वहाँ तकलीफ हुई उसके लिए माफी चाहता हूँ। आप लोग जल्दी ही कुछ खा पी लीजिये फिर आप लोगों को किसी से मिलवाना है।”
   आदित्य और राजा आश्चर्य से उसे देखने लगे… केसर और प्रेम भी आ चुके थे।
राजा कुछ और पूछ पाता कि बाँसुरी का फ़ोन आ गया, उसका हालचाल लेने के बाद उसने फोन ज़रूर रख दिया लेकिन उसके चेहरे से ज़ाहिर हो रहा था कि उसे इस वक्त बाँसुरी के साथ न रह पाना मन ही मन कितना साल रहा है। सबका खाना पीना निपटते ही आदित्य एक बार फिर समर की तरफ देखने लगा…- “छोटे कुंवर सा उतावले बहुत हैं। “और समर मुस्कुरा कर अपनी जगह पर खड़ा हो गया.. आदित्य की समझ से परे था कि इतने खराब दिन के बावजूद समर मुस्कुरा कैसे ले रहा है?
   -” आइये हुकुम आपको और बाकी लोगों को मुझे कुछ दिखाना है? आप सभी के लिए तोहफा है। “

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   समर के पीछे सभी उठ गए …
हवेली बहुत पुरानी बनी थी। उस ज़माने में हवेली जितनी सतह से ऊपर नज़र आती थी उतनी ही भीतर भी होती थी। एक तरह से तहखाने की शक्ल में ! समर आगे सीढियां उतरता तहखाने की तरफ बढ़ गया…-“कहाँ लेकर जा रहे हो समर?” राजा के सवाल पर वो मुस्कुरा उठा…-” आप सभी के सवालों के जवाब से मिलवाने!”
   तहखाने में अलग अलग कई कमरे थे। एक कमरे के बाहर मोटे कांच की दीवार थी जिसके उस पार बाहर खड़ा इंसान तो देख सकता था लेकिन भीतर रहने वाले को कुछ नज़र नही आता।
    ऐसी ही एक दीवार के सामने समर खड़ा हो गया। उसके पीछे आये सभी उसके आसपास खड़े आश्चर्य से कमरे के अंदर का हाल देख रहे थे।
  अंदर ठाकुर साहब बैठे मज़े से खाना खा रहे थे..-” ये क्या समर? तो इसका मतलब ये यहाँ हैं। इसका मतलब इनका वकील सही कह रहा था कि इन्हें हम लोगों ने किडनैप कर रखा है। “
” अब जो सोच लीजिये आप लोग। हमने किडनैप कर रखा है या ये खुद अपने शौक से यहाँ है!”
” क्या मतलब ? समर मैं भी तुम्हारी बात नही समझा?” राजा के सवाल पर समर ने एक नज़र ठाकुर पर डाली और बोलने लगा…-” ठाकुर साहब को साथ लेकर पुलिस वाले जब दून आ रहे थे। तब हम सभी जानते ही थे कि वो पुलिस कस्टडी से भागेंगे ही। इसी तरह वो भी जानते थे कि हम उन्हें भागने नही देंगे। तब उन्होंने एक पुलिस वाले को पैसों का लालच देकर अपनी तरफ मिलने का ऑफर दिया। उन्हें इसमें सफलता मिल गयी। उस पुलिस वाले ने उनसे हाथ मिला लिया। जब ठाकुर साहब ने उससे कहा कि दूर जाते समय वह किसी भी तरह बीच रास्ते से भाग निकलेंगे तब उस पुलिस वाले ने एक मोटी रकम के बदले उनसे वादा किया कि वह उनके भागने में उनकी पूरी मदद करेगा।
ठाकुर साहब यही चाहते थे क्योंकि उन्हें मालूम था अगर वह पुलिस कस्टडी में रहेंगे, तो उन पर केस भी बनेगा और कोर्ट में उन्हें पेश भी होना पड़ेगा।  ऐसे में सारे सबूतों के आधार पर कोर्ट उनके खिलाफ ही  फैसला देगी। क्योंकि  जिस वक्त ठाकुर साहब पुलिस के द्वारा पकड़े गए उस वक्त भी वह राजा अजातशत्रु के ऊपर गोली चलाने के लिए ही वहां खड़े थे ,और उनकी चलाई गोली से राजमाता की मृत्यु हो गई थी। तो असल में पहला मुद्दा कोर्ट पर पेश करने का तो यही है क्योंकि इस केस में राजमाता की मृत्यु भी हुई है। इसलिए वह सीधे-सीधे हत्या के आरोपी कहलाते हैं । इसके अलावा रानी बांसुरी के तैयार किए गए केस भी उन पर चलने ही थे। इन सभी से एक साथ बचने का उपाय उन्हें यही लगा कि वह पुलिस की कस्टडी से भाग जाएं और कहीं गुमनाम ज़िन्दगी जियें। जब मामला ठंडा पड़ जाता, तब वह एक बार फिर अपने कारनामों में लिप्त हो जाते ।
   जैसा जैसा उन्होंने प्लान किया था सब कुछ वैसा ही होता गया। उन्होंने उस पुलिस वाले की सहायता से अपने कुछ आदमियों से बात की और एक जगह निश्चित कर उन्हें उनका इंतजार करने को कहा। उसी वक्त पर अपने प्लान के मुताबिक वह ट्रेन से उतर कर भाग गये। पुलिस वाले ने वाकई उनकी बहुत मदद की थी । तयशुदा जगह पर ठाकुर साहब के आदमी अपनी गाड़ी में उनका इंतजार कर रहे थे। ठाकुर साहब उन दोनों आदमियों को पहचानते तो नहीं थे, लेकिन उन्हें अपने आदमियों पर पूरा विश्वास था। वह निश्चिंतता के साथ उनकी गाड़ी में बैठकर निकल गये। ठाकुर साहब को मालूम नहीं था कि शुरू से उनके इस प्लान में मैं उनका साथ दे रहा था, क्योंकि मैं चाहता था कि वह पुलिस कस्टडी से भाग जाएं।
  वह पुलिस वाला जिसने ठाकुर साहब की मदद की, असल  में मेरा आदमी था। ट्रेन से उतरने के बाद ठाकुर साहब को भागने में मदद करने वाले सारे लोग मेरे ही थे । ठाकुर साहब के आदमी उन्हें उन्हीं के अनुसार खुफिया जगह पर ले आए।
    आज भी ठाकुर साहब यहां बड़े मजे से हैं। उनके आदमियों ने उन्हें यही कहा है कि सुरक्षा कारणों के कारण ही उन्हें ऐसी खुफिया जगह में रहना पड़ रहा है। इस जगह की सबसे अच्छी बात यह है कि ठाकुर साहब के पास मोबाइल होते हुए भी उनका नेटवर्क यहां पर काम नहीं करता , लेकिन आप लोगों का नेटवर्क काम नहीं कर रहा है ऐसा नहीं है। उनके नेटवर्क को मैंने जाम कर रखा है। ठाकुर साहब को यह नहीं लगना चाहिए कि मैंने उन्हें किडनैप किया है। उन्हें अब भी यही लगता है कि वह अपने आदमियों के साथ हैं, और पूरी तरह सुरक्षित हैं। और उनका हम लोग कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।
  यहां पर बैठे ठाकुर साहब अपना मास्टर प्लान बना रहे हैं।  और वह यह नहीं जानते कि उनका मास्टर प्लान असल में मेरा मास्टर प्लान है।”
” पर वह इन अनजान लोगों पर भरोसा कैसे कर बैठे?”
” भरोसा ना करने का कोई कारण ही नहीं बनता। एक तो इन लोगों में से दो-तीन लोग उनके पुराने खास हैं। जिन्हें मैंने अपनी तरफ मिला लिया था। बाकी के लोग मेरे हैं, जिनके बारे में ठाकुर साहब को यह लगता है कि यह नए रिक्रूट किये बंदे हैं।
हुकुम मुझे माफ कीजिएगा मैं जानता हूं आप सारी लड़ाइयां नियम कायदे कानूनों में रहकर लड़ना चाहते हैं। लेकिन कुछ ऐसे लोग आज भी जमाने में हैं जिनके लिए हमें भी नियम कायदों से अलग हट कर चलना पड़ता है।
” वह तो ठीक है समर लेकिन इन्हें इस तरह यहां रखने का क्या औचित्य है? मेरा मतलब है इससे हमें क्या फायदा होगा?”
” कोर्ट की अगली तारीख पर आप लोगों को फायदा भी समझ में आ जाएगा। आइये तब तक बाहर चलतें हैं। “
” पर समर तुमने ये सब किया कब और क्यों? “राजा के सवाल पर समर मुस्कुरा उठा…-“बस कर लिया हुकुम! आप राजा हैं। आपके लिए नीति नियमों का पालन करना आवश्यक है लेकिन मैं मंत्री हूँ, मुझे बस मेरे राजा के हितों को ध्यान में रख कर काम करना होता है। और मैं उसके लिए किसी भी हद तक जा सकता हूँ। आपके लाभ के लिए मुझे कुछ भी करने से परहेज़ या गुरेज नही है। आइये अब हम सब ऊपर ही चलतें हैं। अगली तारीख पर मुझे मौका मिलेगा मेरी बात रखने का। तब आप लोग समझते जाएंगे कि मेरे ऐसा करने के पीछे क्या कारण है। तब तक चलिए आप लोग भी आराम कीजिये….

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   अगली सुबह भी समर कुछ कामों में व्यस्त था.. उसका फ़ोन लगातार बज रहा था लेकिन किसी भी तरह का व्यवधान न आये इसलिये उसने फ़ोन को साइलेंट में रखा हुआ था।
  पिया ने उसे मेसेज भेजा था , जिसे अब तक समर ने नही देखा था… -”   मैं जानती हूँ, तुम मुझे जानबूझ कर अवॉयड कर रहे हो ना! मैंने तुम्हारा मेसेज समय पर नही देखा, इसलिए तुम भी मेरे साथ वही कर रहे हो ना।
  समर प्लीज़ मेरा कॉल तो उठा लो।”

  कोर्ट केस के पेपर्स ,वकील साहब के सिलसिलेवार जवाब तैयार करने में समर अपने फ़ोन पर ध्यान ही नही दे पाया। उसका एक और नम्बर था जो सिर्फ राजमहल के लोगों को मिलता था और जिससे राजमहल के लोगों से सम्पर्क में रहा जा सकता था! ये नम्बर सुरक्षा कारणों से बाहर वालों को नही दिया जाता था। इसी नम्बर पर फिलहाल समर ने अपनी माँ से बात कर उन्हें अपनी जानकारी दे दी थी। लेकिन पिया को बताना उसके दिमाग से निकल गया था। फ़ोन चार्ज नही होने के कारण पिया के इक्कीस मिस्ड कॉल्स के साथ ही समर का फोन बंद हो गया और समर पिया के मैसेज भी नही पढ़ पाया।
   पिया भी कुछ अधीर थी, अपना फ़ोन उठाये जाते न देख कर उसने एक आखिरी मेसेज और भेज दिया…
“अब अगर तुमने मेरे इस मैसेज का भी कोई जवाब नही दिया तो मैं उसी लड़के को शादी के लिए हाँ कह दूँगी जिसे उस दिन मेरे साथ देख कर तुम जल भुन गए थे।
   प्लीज़ समर एक बार तो फ़ोन उठा लो। आखिर किस बात की इतनी नाराज़गी है। “

   पिया ने मेसेज भेजने के बाद कई बार देखा जांचा लेकिन समर का कोई जवाब नही आया। पिया को लगा नाराज़गी में समर जवाब नही दे रहा।
आखिर वो भी कब तक रास्ता देखती गुस्से में उसने अपनी माँ को फ़ोन लगा लिया….- ” मम्मी आपने जिस लड़के के लिए मुझे कहा था न ,उसके लिए मैं तैयार हूँ। “

पिया की माँ की आंखे आश्चर्य से खुली रह गयीं। उन्होंने नही सोचा था कि उनकी नखरीली इतनी आसानी से उनके पसन्द किये रिश्ते के लिए हाँ बोल देगी….-” क्या ? तू सच तो बोल रही है ना? फिर कहीं ये मत कर देना की मैं लड़के वालों के घर हाँ बोल दूँ और तू मुकर जाए। “
” नही माँ ! तुम हाँ बोल दो। अब नही मुकरना मुझे। बस अब ज़िन्दगी तुम्हारे फैसलों के हिसाब से चलेगी।”

” क्या हुआ पिया ? तू कुछ परेशान लग रही है। वहाँ अस्पताल में कुछ हुआ क्या?”

” हाँ यही समझ लो । अब बहुत परेशान हो गईं हूँ। वहीं बीमारियां, उदासियां, कलपते तड़पते लोग। मैं भी कितना सहूँ , मेरी भी तो सहनशीलता की एक सीमा है ना। मैं अब थकने लगीं हूँ माँ। हो सके तो मेरे पास आ जाओ। “
” ठीक है बेटा! तू परेशान न हो मैं और तेरे पापा कल ही तेरे पास आ जातें हैं। पंडित जी से मुहूर्त निकलवा कर आऊंगी, जिससे वहीं तेरी सगाई भी निपटा लें। अपना ख्याल रखना पिया।”
      मन में समर से नाराज़गी थी और उसी नाराज़गी में पिया ने बिना सोचे समझे इतना बड़ा निर्णय ले लिया।
   समर क्या सोच रहा है, उसने क्यों फ़ोन नही उठाया, उसने क्यों किसी मेसेज का जवाब नही दिया, बिना सच जाने पिया ने अपना रास्ता ही बदलने का फैसला ले लिया था। और उसके इस फैसले से अनजान समर वहाँ अपने केस की तैयारियों में लगा था….

क्रमशः

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दिल से….

   प्यारे दोस्तों आप सभी के मुझ पर प्यार और विश्वास ने मुझे खुद पर भरोसा करना भी सीखा दिया। आप सबने जिस तरह मेरे ब्लॉग पर आकर मेरा हौसला बढ़ाया है उसके लिए वाकई मेरे पास शब्द नही है। देखा जाए तो असली सुपर फैन्स के टैग आप सभी को मिलता है।
  हम जब किसी मज़बूत प्लेटफॉर्म पर लिखते हैं तब हमें काफी सारी चीज़ें वहाँ अपने आप मिल जाती हैं लेकिन जब हम अपना पर्सनल ब्लॉग लिखना शुरू करतें हैं तब काफी सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। लेकिन आप सब के साथ ने मुश्किलों को बहुत आसान कर दिया।
जिसके लिए आप सब की शुक्रगुज़ार हूँ।
एक और बात आप सब से कहनी थी, वो ये की अब मेरे ब्लॉग के बारे में मैं प्रतिलिपी पर चर्चा नही कर सकती लेकिन आप सब तो स्वतंत्र हैं क्योंकि आप वहाँ के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है । जी हाँ क्योंकि आप पाठक हैं। और एक पाठक के बिना न लेखक का कोई अस्तित्व है और न ही किसी लेखन प्लेटफार्म का।
  आपको ज्यादा कुछ नही करना है। अगर आपको मेरा ब्लॉग पर लिखना गलत नही लगता तो आप अपने बेहद करीबी दोस्तों से भी मेरा ब्लॉग लिंक शेयर कर सकतें हैं।
   आप लगभग 250 लोग हैं , अगर आप सब 5-5 लोगों को भी जोड़ सकें तो काफी लोगों को यहाँ पहुंचने में मदद मिल सकती है।
प्रतिलिपी नही छोड़ना चाहती क्योंकि वहाँ भी पाठक हैं और कुछ ऐसी आदरणीया पठिकाएँ  भी हैं जो नए नए एप पर आकर मुझे नही ढूंढ सकती।
  इसलिए लिखती वहाँ भी रहूंगी लेकिन सबसे पहले सारी रचनाएं सिर्फ मेरे ब्लॉग पर ही प्रकाशित होंगी।
  एक बार फिर आप सभी का हृदयतल से आभार व्यक्त करती हूँ।

आपकी
aparna…..

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दहकते पलाश …

कुछ मोहब्बतें वक्त की मोहताज नही होतीं…

दहकते पलाश

बालकनी के ग्लास डोर के पास रखे कैनवास पर जंगलों में बेतरतीब दहकते पलाश उकेरते हुए माया इतनी मगन हो गयी थी कि सरु की लायी हुई दुसरी कॉफ़ी भी रखे रखे ठंडी हो गयी।

उसके टोकने पर जब ध्यान गया तब उसे एक और कॉफ़ी लाने बोल बाहर बालकनी में आकर खड़ी हो गयी, वही महीना, वही फ़ाग, वही सिन्दूरी पलाश … उसका कितना कुछ जुड़ा था इन सब से, और वैसे सोचा जाये तो कुछ भी नही जुड़ा था, बस कशिश का आसमान था और शिद्दत सी ज़मीन, पर किस्मत थी कि ना आस्माँ मिला ना ज़मीं ।।

उसे सब कुछ ऐसे याद है जैसे सब कल की ही बात हो, लगता ही नही कि पन्द्रह साल बीत गये उस होली को।
आज भी उस दिन की एक एक बात याद थी, सारा कुछ जैसे अब भी आंखों के सामने एक फिल्म की तरह चल रहा हो…..

कितनी चहल पहल होती थी उन दिनों उस मोहल्ले में। उसकी उम्र के ढ़ेर सारे बच्चे इधर उधर तूफान मचाए घूमते थे, और वो था इन सब का सरगना।
जाने कहाँ से ढूँढ ढूँढ के शरारतें लाता था, सारा मोहल्ला उसका सताया हुआ था,कभी किसी की छत पर सूखने वाले पापड़ चकनाचूर कर जाता, कभी किसी की पानी की टंकी में रंग घोल जाता, इन्हीं सारे बेमतलब के कामों में दिल लगता उसका, पढ़ाई लिखाई से दूर, अपने और अपनी मस्तियों में मगन ।
उसकी पक्की सहेली का भाई ना होता तो कभी उसका चेहरा तक ना देखती, पर ऐसा सोचना आसान था करना कठिन, क्योंकि उस निर्मोही को एक नज़र देखने के बाद कोई बिरला ही होगा जो उसका लुभावना चेहरा भूल सके, गोरे रंग पे काली बड़ी बड़ी आँखें और उनसे टक्कर लेता चौड़ा माथा, उसके लिये अक्सर माया की दादी कहा करती _” जे मिसराईन के घर कोई यक्ष गन्धर्व पैदा हुआ है, तभी हम मानुसों से नही निभे है इस खर्राट की। कितना हडकंप मचाए रखता है पर जे के लाने कितना भी गुस्सा हो मन में, इसकी मुस्कान देख सब उड़ जाती है बहुरिया।।
अगर कुछ पढ लिख जाये, नौकरी पा जाये तो कल अपनी माया के लिये हाथ पसार कर मिसराईन से इस छोरे को मांग लूंगी।”

” आप भी अम्मा, सुबह सुबह कलेस मचाई रहती हो, लक्षण देखें है रावण है पूरा, और फिर माया भी तो…..

माया की माँ ने तो बात वही खत्म कर दी पर उसके मन में कोई बीज जम ही गया था, जो होली के दिन खाद पानी पाकर बेल सा लहलहाने लगा था।।

सभी रंग गुलाल में डूबे थे, बस वही साफ सुथरी अपनी छत पर खड़ी मोहल्ले की भीड़ भाड़ देख देख कर हँस रही थी, तभी नीचे उसकी सहेलियों का झुंड गुज़रा और सब उससे नीचे आने का आग्रह करने लगे, सब की बात और थी पर उन सभी में उसकी पक्की सहेली रोली भी थी, उसकी बात काटना माया के लिये कठिन था, अपनी सोच में डूबी माया को उसकी दादी ने समझा बुझा कर नीचे भेज ही दिया था।
सारी सखियाँ माथे पर टीका लगा के उससे गले मिल रही थी कि किसी के मज़बूत हाथों ने उसे पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया, और उसका पूरा चेहरा गुलाल से भर दिया।
वो अबीर था!! जिसके कुँवारे हाथों ने माया के गालों पर जाने कितने दहकते पलाश खिला दिये थे।
उसके कानों में चुपके से “हैप्पी होली” बोल वो एक बार फिर अपनी टोली में मगन हो गया था।।

वो होली बीत गयी पर उसके लिये छोड़ गयी थी ढ़ेर सारे एहसास, जिन्हें वो चाह कर भी किसी से साझा नही कर सकती थी।
उसे हमेशा से खुद पर और अपनी किस्मत पर तरस आता था, पर अब एक नाराज़गी थी क्यों भगवान ने उसकी किस्मत ऐसी काली स्याही से लिख दी थी जिसे वो चाह कर भी मिटा नही पा रही थी।
उसके दादा और उनके बचपन के दोस्त का अपनी बचपन की दोस्ती को पक्का करने का निर्णय उसकी जीवन नैय्या डूबा गया था, सिर्फ सात बरस की तो थी जब मृत्यशैय्या पर लेटे उसके दादा ने अपनी आखिरी इच्छा के तौर पर अपने दोस्त के पोते से उसके फेरे फिरवा दिये थे, उस समय बाल विवाह होना बन्द हो चुका था पर अक्षय तृतीया के ही दिन उसके घर वालों ने उसे भी गड्डे गुडियों सा ब्याह दिया था, उसके विवाह को एक माह भी नही बीता की उसके दादा जी सिधार गये पर घर वालों के मन में एक संतुष्टी छोड़ गये थे अपनी अन्तिम इच्छा पूरी कर पाने की।

उसके ब्याह को दो साल हुआ ही था कि, किसी बीमारी की चपेट में आकर उसका पति भी नही रहा और ना रहे उसके दादा ससुर।
नौ साल की उम्र में जब उसे शादी और ससुराल का मतलब तक पता नही था, सुहागन का मतलब पता नही था, वो विधवा हो चुकी थी।।
माँ और दादी उसे गले से लगाये बिलखती रहीं, और कुछ देर सहने के बाद कसमसा कर उसने खुद को उनसे छुड़ाया और खेलने बाहर भाग गयी।।

धीरे धीरे समय के साथ उसे अपनी काली किस्मत का लेखा जोखा समझ आने लगा था, और जैसे ही उसने अपनी किस्मत से समझौता करने की सोची अबीर किसी खुशबूदार हवा के झोंके सा उसके जीवन की नीरस बगिया में फूल खिलाने धंसता चला आया था।

उस होली के बाद अबीर के एग्ज़ाम्स हुए और आगे की पढ़ाई के लिये वो बाहर चला गया था, वो शाम भी वो कैसे भूल सकती थी, रोली से उसे पता चल ही चुका था कि उसके अबीर भैया कोटा जा रहें हैं पढ़ने, उसके निकलने के समय पर वो चुपके से अपनी छत पर जा खड़ी हुई थी, उसे एक बार पूरी नज़र देखने के लिये!!
अपना सारा सामान कार की डिक्की में भरने के बाद उसने पलट कर एक बार उसकी छत की तरफ देखा भी था और घबराहट में माया दीवार की ओट में हो गयी थी, उसे देखने की अधूरी आस लिये ही वो चला गया था।
वो तो उसके जाने के बाद उसके जाने का असली कारण माया को पता चला था, जब एक शाम वो स्कूल से लौटी और अपनी माँ और दादी को बातें करते सुना__” क्या ज़रूरत थी अम्मा उनके घर जाने की, ऐसा भी लड़के में कौन सा हीरे मोती जड़ें हैं, ना होगी माया की शादी तो ना होगी, मैं अपनी बेटी को जीते जी कोई दुख ना होने दूंगी।”

” और तुम्हारे बाद उसका क्या होगा बहुरिया?? यही सोच कर तो जी घबराता है कि हम सब के बाद उस बेचारी का क्या होगा?”

” पढ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो जायेगी अम्मा, वो खुद अपना सहारा बनेगी।। आइंदा आप किसी के घर माया का रिश्ता लेकर ना जाना, देखा नही मिश्राइन ने कैसे रातों रात लड़के को पढ़ाई के नाम पर बाहर भेज दिया जैसे हमारी माया की छूत लग जायेगी अगर यहाँ रहा तो।”

उसका कलेजा धक से रह गया था, तो इसलिये उसे बाहर भेज दिया!!
उस दिन के बाद से उसने रोली के घर आना जाना बिल्कुल बन्द कर दिया था, रोली ही क्या धीरे धीरे अपनी हर सखी सहेली से दूरी बना ली थी, और उसी समय उसकी मासी उसके लिये देवदूत बन कर आ गयी__
” दीदी माया का हाथ बहुत साफ है, बहुत अच्छी पेंटिंग करती है , इसे फाइन आर्ट्स में क्यों नही भेज देतीं ।”

और फिर सारे घर भर को मना मुनु के आखिर मासी उसे अपने साथ ले ही गयी थी। वल्लभ एकेडमी ऑफ़ आर्ट्स में प्रवेश लेते ही उसका जीवन बदलने लगा था, अपनी फाइन आर्ट्स की डीग्री पूरी कर स्कॉलरशिप लेकर वो वेनिस से भी कोई एक्स्ट्रा डिप्लोमा कर आयी थी।।

रंगों से खेलती उसकी तुलिका अब उसके कैनवास में ही जीवन ढूँढने लगी थी।
रंग बिरंगे रंगों से सजी उसकी पेंटिंग्स देख कर कोई उसके बिना रंगों के जीवन को सोच भी नही सकता था।।

” दीदी कॉफ़ी पी लो वर्ना फिर ठंडी हो जायेगी।”
सरु की आवाज सुन वो वापस वर्तमान में लौट आयी, अगले हफ्ते ठीक होली से एक दिन पहले उसकी पेंटिंग एक्सीबिशन होनी थी, उसी के लिये वो तन मन से जुटी थी।।

मासी के साथ उसके जाने के चार महीने बाद ही उसके पापा का ट्रांसफर भी दूसरे शहर हो गया था और उस शहर उस गली से सारे नाते छूट गये थे, बस नही छूटा था अबीर का लगाया वो रंग जो अब भी माया अपने गालों पर महसूस कर पाती थी।।

*******

शाम हो चुकी थी, लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी, लोग घूम घूम कर अपनी पसंद की पेंटिंग्स देख रहे थे, उनमें से कुछ खरीद भी रहे थे, एक्सीबिशन हॉल के एक ओर बने छोटे से ऑफिस में माया अपनी साथी पेंटर के साथ बैठी कुछ ज़रूरी बातों में लगी थी कि उनकी एक हेल्पर ने अन्दर आ कर उन्हें बताया कि कोई एक आदमी है जो माया की वो पेंटिंग खरीदने की ज़िद पर अड़ा है जो वहाँ बेचने के लिये रखी ही नही गयी।।

” उनसे कह दो, वो पेंटिंग बिकाऊ नही है, उसे बस “एज़ अ मास्टर पीस” रखा है।”

” पर मैडम वो समझ ही नही रहे, कह रहे जब बेचना नही था तो यहां रखने की क्या ज़रूरत थी?”

” कौन सी पेंटिंग माया ‘ दहकते पलाश’?

” हाँ नेहा! मैं उसे किसी कीमत पर बेचने को तैय्यार नही हूँ, पता नही कौन रईसजादा है, जो ऐसे ज़िद पर अड़ा है।”

” हम्म तुम्हारा चेहरा पसंद आ गया होगा, तुम्हारे जैसी ही तो लगती है वो पेंटिंग, भले ही तुमने खूब सारे रंगों से चेहरे को रंग दिया है बिल्कुल जैसे किसी ने होली पर चेहरे पर खूब सारा अबीर गुलाल छिड़क दिया हो, बस हँसते हुए दांत नज़र आते हैं पर पेंटिंग लाजवाब है।”

” मैडम जी आप ही बात कर लो एक बार, हमारी तो सुन नही रहे वो साहब”

माया और नेहा ऑफिस से बाहर निकल आये, माया ने आगे बढ़ कर उस आदमी से कुछ कहना चाहा ही था कि पेंटिंग को देखता वो पलट कर माया के सामने हो गया, दोनो कुछ देर एक दूसरे को देखते ही रह गये।।

” मैं कैसे समझ नही पाया कि ये तुम हो माया।”
अबीर की बात पर माया ने शरमा कर आंखे नीची कर लीं….

” बहुत खूबसूरत पेंटिंग है, बिल्कुल तुम्हारी तरह, अभी तक समझ नही पा रहा था की बनाने वाला इसे बेचना क्यों नही चाहता, पर अब तुम्हें देख कर समझ आ गया…..”

” कैसे हो अबीर?”

” बिल्कुल वैसा ही जैसे पहले था, तुम कैसी हो?”

उसके सवाल पर वो मुस्कुरा उठी__

” क्या समझ गये? मैं आखिर क्यों नही बेचना चाहती इस पेंटिंग को?”

“बस उसी कारण जिसके लिये मैं इस पेंटिंग को खरीदना चाहता था, पर खैर अब मैं नही खरीदूंगा, तुम्हारी यादें तुम्हें मुबारक!! हाँ अगर तुम्हारी जगह किसी और ने ये बनाया होता तो किसी भी कीमत पर खरीद ही लेता, मेरी वाईफ को पेंटिंग्स का बहुत शौक है माया, आज अपनी सालगिरह पर सोचा उसे उसकी पसंद का तोहफा दूंगा पर यहाँ इस पेंटिंग ने मुझे रोक लिया, इसके आगे और कुछ देख ही नही पाया, इस पेंटिंग में मुझे तुम नज़र आई थी, पर जब ये देखा कि बनाने वाली भी तुम ही हो तो सब समझ आ गया मुझे।।”

उन दोनों को बातें करता छोड़ नेहा और बाकी लोग वहाँ से जा चुके थे….

” तुमने शादी की माया?”

” नही!! पहली टिकी नही और जब दूसरी करनी चाही तो जिससे चाहा वो जाने कहां गुम हो गया।”

” एक बार मुझसे कहा तो होता?”

” कब कहती, कैसे कहती? अगर तुम्हारी ‘ना’ होती तो मैं जीते जी मर जाती, अब तक जी रहीं हूँ और तुम्हारे दिये उन रंगों से ही अपना कैनवास भर रही हूँ, इतना काफी है अबीर , तुम मेरी तरफ से ये पेंटिंग रख लो।”

” मिलना नही चाहोगी मेरी वाईफ से?”

” वो भी आईं हैं क्या यहाँ?”

” हम्म !!, वो तुम्हारा ऑफिस है शायद।”

” अरे हाँ!! आओ उन्हें भी बुला लो, मैं तब तक कॉफ़ी के लिये बोलती हूँ!” कह कर माया आगे बढ़ गयी, उसके पीछे अबीर भी उसके ऑफिस में प्रवेश कर गया…..

” कहाँ हैं?? तुम्हारी वाईफ अन्दर नही आई??”

” मिलवाता हूँ, पहले चैन से बैठ तो जाऊँ!! इतने सालों की कितनी सारी बातें हैं, मेरे कोटा जाने के कुछ समय बाद तुम्हारा परिवार वो शहर ही छोड़ गया….
पहले तो रोली से तुम्हारे बारे में कुछ सुनने को भी मिल जाता था पर तुम लोगों के शहर छोड़ने के बाद तो तुम लोगों से सम्पर्क के सभी साधन बन्द हो गये, रोली को भी तुम्हारी कोई खबर ना थी, खुद को कहाँ कैद कर रखा था माया?”

” पता नही अबीर!! पर तुम्हारे घर से ना सुनने के बाद मेरी भी हिम्मत चूक गयी थी, और शायद घर वालों की भी, दादी तो अब रहीं भी नही, मेरे घर भर में सबसे ज्यादा उन्हें ही तुम पसंद थे।”

” और तुम्हें??”

अबीर की बात अनसुनी कर माया ने कॉफ़ी उसके आगे बढ़ा दी__” अब मिलवा भी दो अपनी वाईफ से।”

अबीर ने हाँ में सिर हिला कर अपने जेब से अपना वॉलेट निकाला और खोल कर माया के सामने कर दिया, उसमें उसकी वही पन्द्रह साल पुरानी रंगों से भीगी मुस्कुराती तस्वीर लगी थी__” ये कब निकाल ली थी तुमने ?”

” रोली को कह कर तुम्हें नीचे बुलाने से लेकर मोहित से छिप कर तस्वीर खिंचवाने तक की प्लानिंग थी मेरी, वो तो उसके बाद मैं पढ़ने बाहर चला गया वर्ना ….”

अबीर अपनी बात पूरी भी नही कर पाया था कि नेहा हाथ में गुलाल से भरी प्लेट थामे दोनो के पास चली आयी …..
” आप दोनों को होली की शुभ कामनाएँ “

अबीर ने मुस्कुरा कर माया को देखा__” उस दिन एक काम अधूरा रह गया था माया”

प्लेट से ढ़ेर सारा गुलाल उठा कर अबीर माया की तरफ बढ़ा ही था कि माया ने अपने हाथों से गुलाल अबीर के गालों पर मल दिया ” उस दिन अधूरा रह गया था ये अरमान!! हैप्पी होली अबीर!!

aparna….

उधेड़बुन

एक छोटी सी प्रेम कहानी

‘उधेड़बुन ‘
          
           आज सुबह से ही धानी बड़ी व्यस्त है, कभी सलाईयों में फंदे डाल रही है,कभी निकाल रही है,कल ही से उसने नयी नयी बुनाई सीखना शुरू किया है॥  

अहा!  कितना मजे का समय है ये,,बुनाई कितनी कलात्मक होती है,,और भी कलायें होतीं हैं संसार में ,पेटिंग करना,कढ़ाई करना,पॅाट बनाना,वास बनाना पर ये सब एक हद तक सिर्फ अपने शौक पूरे करने जैसा है।बुनाई ही एक ऐसी कला दिखती है जिसमें कलाकार अपने सारे प्रेम को निचोड़ कर रख देता है।
              कुछ फंदे सीधे कुछ उल्टे बीनना ,कहीं फंदा गिराना कही फंदा उठाना,उफ पूरा गणित है बुनाई भी॥ और इतनी त्याग तपस्या के बाद बुना स्वेटर जब हमारा करीबी कोई पहनता है तो कितना गर्व होता है बनाने वाले को खुद पर। ऐसे ही बहुत सारे मिले जुले भावों के साथ धानी ने भी अपना पहला स्वेटर बुनना शुरू किया था,,पिंटू दा के लिये।
        
               स्वेटर बुनते हुये कितनी प्रसन्न कितनी विभोर थी धानी,अपने उपर अचानक मान भी होने लगता कि कोई भी नया काम हो वो कितनी जल्दी सीख लेती है।खाना बनाने में तो उसे महारथ हासिल है,कैसी भी पेचीदगी भरी जटिल रसोई हो,वो आधे घण्टे में सब सुलझा के रख देती है,चने की भाजी बनाना हो या मटर का निमोना उसके बायें हाथ का खेल है बस । कचौडि़याँ और मूंग का हलवा तो घर पे वही बस बनाती है,,मां को रसोई मे इतनी देर खड़ा होने मे थकान होने लगती है। घर को सजा  संवार केे रखना कपड़़ोंं को सहेजना,रसोई  बनााना इन सारे नारी सुलभ गुणोंं की खान है धानी।
              
           बस एक ही चीज है जो उसे बिल्कुल नही सुहाती ,वो है पढ़ाई। जाने कैसे लोग किताबों में प्राण दिये रहतें हैं,ना उसे पढ़ना पसंद है ना लिखना,,नापंसदगी की हद इतनी है कि लड़की गृहशोभा,गृहलक्ष्मी जैसी गृहिणियों की पहली पसंद रही किताबों पर भी आंख नही देती।

            आलम ये है कि दो बार में ही सही धानी ने बारहवीं पास कर ली ,उसके बाद होम साईंस लेकर अभी कालेज का सेकण्ड इयर पढ़ रही है,वो भी दुबारा। पढ़ाई से इतनी वितृष्णा का कारण भी बहुत वाजिब है,धानी की अम्मा ने अपने जमाने में बी.ए. किया था ,उसके बाद उनकी शादी हो गयी।मन में तरह तरह के सपने सजाये धानी की मां ससुराल आई तो उन्हे पता चला कि उस घर में उनकी डिग्री की कोई कीमत नही। वो अपने पैरों पर खड़ा होना चाहतीं थीं,एक अच्छी सरकारी नौकरी करना चाहतीं थीं पर उनकी पढ़ाई उनका ज्ञान उनके चौके तक ही सिमट कर रह गया। इसी कारण उन्होंने बचपन से ही धानी के मन में ये बात भली प्रकार बैठा दी जैसे तैसे वो थोड़ा बहुत पढ़ लिख ले फिर उसकी अच्छे घर में शादी करनी हैं।

                   बालिका धानी के मन में ये बात अच्छे से पैठ गयी की उसे सारा ज्ञान ऐसा ही अर्जित करना है,जिससे उसकी एक अच्छे घर में शादी हो सके।  उसी ज्ञान का नया सोपान था बुनाई।

           बहुत खुश और खुद मे मगन थी धानी बुनाई सीखते हुये।पड़ोस में रहने वाली लाली दीदी मायके आई थीं दो महीनों की लम्बी छुट्टी पर,बस उन्ही से ये गुरू ज्ञान मिला था,वो अपने पति के लिये बुन रही थी और धानी अपने पिंटू दा के लिये।
   
             पिंटू दा ! पिंटू दा से धानी की मुलाकात यही कोई 7-8 साल पहले हुई थी, तब वो स्कूल जाती थी,शायद नौंवी या दसवीं में थी,। पिंटू दा ने उसी साल ईंजिनियरिंग काॅलेज में प्रवेश किया था,दोनो सेमेस्टर पास करने के बाद की छुट्टियों में अपनी मामी के घर आ गये थे घूमने।
   
         पहली मुलाकात में ही उसे पिंटू दा बहुत भा गये थे,,कितने लंबे थे, चौड़ा माथा ,घने बाल,गोरा रंग,और गहरी आवाज ॥ कोई भी बात कितना समझा के बोलते थे,कि सामने वाला उनकी हर बात मान जाये।

               उस दिन मां ने धानी के हाथ से साबुदाने के बड़े भिजवाये थे रीमा चाची के घर,,बड़े लेकर जब धानी वहांं पहुंची तब चाची चाय चढा़ रहीं थीं,उसे देखते ही खिल गयीं ” आ तू भी चाय पी ले।”
     “नही चाची मैं तो बस ये देने आयी हूं,मां ने रज्जू दा के लिये भेजा है।”
       “अरे दिखा जरा क्या भेजा है जिज्जी ने,वाह साबुदाने के बङे।” 
      ” अच्छा रूक जरा मैं ये चाय भी साथ ही छान देतीं हूं,तू जरा ऊपर रज्जू के कमरे तक पहुचां दे ।”        “ये चाय के दो कप क्यों चाची,मैं तो नही पियूंगीं।” “हां बिटिया ये दूसरा कप पिंटू के लिये है,कलकत्ता वाली ननंद का बेटा।” “बहुत होशियार लड़का है,पहली बार में ही वो क्या कहते हैं आई.आई.टी. निकाल लिया उसने,,कानपुर में पढ़ रहा अभी।”
    “अच्छा मैं चाय दे के आती हूं।”
           
                  धानी का आज अपनी सहेली ममता के साथ पिक्चर जाने का प्लान था,ममता सज धज के उसके घर पहुंच चुकी थी,वो दोनो निकलने ही वाली थीं कि माता जी का फरमान सुनाई दिया ,
           ” बिट्टो जा जरा जाते जाते ये बड़े रीमा के यहां दे जा।”
           “क्या मां तुम भी ना,बनाने का इतना शौक है तो पहुंचाया भी खुद करो ,मुझे वैसे ही देर हो गयी है।”
        “अरे जा ना धनिया दे आ,पांच मिनट लगेगा मुश्किल से” भुनभुनाती पैर पटकती धानी वहां गयी तो रीमा चाची ने एक नया काम पकड़ा दिया। ऊपर पहुंच कर कमरे के दरवाजे को खटकाने जा ही रही थी कि दरवाजा खुल गया, पर सामने रज्जू दा तो नही थे,ये तो कोई और था। तब तक सामने खड़े आगंतुक ने हाथ बढ़ाकर धानी के हाथ से ट्रे ले ली ,और वापस अंदर मुड़ गया।अच्छा तो यही था पिंटू,,चाची का आई आई टियन भांजा।

                 धानी वापस मुड़ कर जाने लगी तो पीछे से एक थैंक्यू सुनाई दिया,मुड़ कर मुस्कुरा कर वो जल्दी जल्दी नीचे उतर गयी।
                             यही थी वो मुलाकात जिसके बाद धानी का मन  “मैनें प्यार किया “देखने मे भी नही लगा,कितने मन से आयी थी ,और यहां सारा वक्त उसी के बारे मे सोचते गुजर गया।

                   इसके दो तीन दिन बाद धानी दोपहर मैं स्कूल से वापस आयी तो रज्जू दा और पिंटू उसके घर पे बैठे खाना खा रहे थे,वो रसोई में गयी तो मां ने बताया कि रीमा चाची की तबीयत कुछ नासाज है इसी से मां ने दोनों को यही बुला लिया खाने पे।

      उसके बाद तो सिलसिला सा चल निकला ,जाने क्यो धानी को पिन्टू दा को छुप छुप के देखना बड़ा भाता था।अपनी छत पे बने लोहे के दरवाजे के ऊपर बनी जाली से वो बीच बीच मे झांक लगा लेती की बाजू वाली छत पे पिन्टू दा आ गये या नही।
   और जैसे ही देखती की आ गये वो झट किसी ना किसी बहाने छत पे आ जाती।
           कभी पहले से पानी मे तर पौधों मे पानी डालती ,कभी सुखे कपड़े पलटने लगती।
    और इन्ही सब के बीच कभी रज्जू दा उसे कैसे छेड़ देते ,कितना गुस्सा आता था उसे।
   “अरी धानी कभी पढ़ लिख भी लिया कर,बस इधर उधर डोलती फिरती है।”इस साल भी फेल होना है क्या।”
     पिन्टू के सामने कट के रह गयी धानी।रज्जू दा भी कभी कैसा बचपना कर जाते हैं ।
   पर पिन्टू उससे हमेशा बहुत प्यार से बात करता ,धानी जी बोलता ,,आप आप कर के उसे किसी राजकुमारी सा अह्सास कराता ।

   अक्सर शाम को उनकी ताश की बाजी जमती।रीमा चाची ,रज्जू दा,वो और पिन्टू।
उसकी और रज्जू दा की जोडी हमेशा ही जीत जाती और वो बड़ी अदा से पिन्टू को देख मुस्कुरा देती।
     एक बार चाची के साथ पकौड़ी तल रही थी,तभी कोई किताब पढते पढ़ते पिन्टू रसोई मे आया,उसे लगा मामी खड़ी है,उसने चट प्लेट से एक पकौड़ा उठाया और मुहँ मे भर लिया।
गरम पकौड़े की जलन से तिलमिला गया की तभी धानी पानी भरा ग्लास ले आयी।
    पिन्टू की जान मे जान आयी “थैंक यू धानी जी! मेरा ध्यान ही नही गया ,पढ़ने मे लगा था ना।”और हँसते हुए पिन्टू वहाँ से चल दिया।
  पर इस खाने पीने के चक्कर मे अपनी किताब भूल गया।
     धानी उसे उठा ले गयी।”मिल्स ऐण्ड बून” !
हे भगवान ! ये प्यार जो ना कराये,,धानी के लिये एक किताब पढ्ना उतना ही दुष्कर था जितना एक लंगडे के लिये रेस मे भागना और एक गून्गे के लिये गीत गाना।
    पर फिर भी बिचारी डिक्शनरी खोल के पढ़ने बैठी।उसकी बुद्धि जितना समझ सकती थी उतना उसने भरसक प्रयत्न किया फिर किताब को पकड़े ही सो गयी।

     कुछ दिन बाद होली थी।इस बार धानी ने अपनी जन्म दायिनी की भी उतनी सहायता नही की जितनी रीमा चाची के घर लोयियाँ बेली,उनके हर काम मे कदम ताल मिलाती धानी यही मनाती की चाची किसी तरह पिन्टू के लिये उसे उसकी माँ से मांग ले।
      होली का दिन आया ,हर होली पे पूरे मोहल्ले को रंगती फिरती धानी इस बार नव वधु सी लजिली बन गयी।उसे एक ही धुन थी।
   पिन्टू रज्जू के साथ उनके घर आया ,उसके माँ बाबा के पैर छुए आशीर्वाद लिया,उसके गालों पे भी गुलाबी रंग लगाया और चला गया।
    बस धानी ने सब जान लिया,उसने प्रेम की बोली अपने प्रियतम की आँखो मे पढ़ ली।

सारे रस भरे दिन चूक गये,और एक दिन पिन्टू कानपुर लौट गया।
      धानी चाची के घर आयी तब चाची ने बताया “अरे धानी ,बेटा एक कप चाय तो पिला दे।”आज सुबह से जो रसोई मे भीड़ि तो अभी फुर्सत पायी है,आज पिन्टू निकल गया ना,उसीके लिये रास्ते का खाना बनाने मे लगी रही।”
” कब निकले पिन्टू दा,कुछ बताया नही उन्होनें ।क्या अचानक ही जाना हुआ क्या उनका।”
    अपनी आवाज की नमी को छिपाते हुए उसने पुछा।
“रिसेर्वेशन तो पहले ही से था ना लाड़ो,इतनी दूर कही बिना रिसर्वेशन जाया जा सकता है क्या।”

हाँ जाया तो नही जा सकता पर बताया तो जा सकता है,इतनी भी ज़रूरत नही समझी,की मुझे बता  के जायें।
 
            ठीक है कभी हमने एक दूसरे से नही कहा लेकिन क्या हम दोनो ने एक दूसरे की आंखो मे प्यार देखा नही।
     
                 एक 14वर्ष की किशोरी दुख के अथाह सागर मे डूबने उतराने लगी।उसका पहला प्यार उससे बहुत दूर चला गया था,पर उसे अपने प्यार पे विश्वास था,एक दिन  उसका प्यार अपने पैरों पे खड़ा होके उसके घर बारात लिये आयेगा और उसे चंदन डोली बैठा के ले जायेगा।

     पिन्टू धानी के हृदय की कोमलता से सर्वथा अनभिज्ञ था,वो छुट्टियां मनाकर वापस लौट अपनी पढाई मे व्यस्त हो गया।

    समय बीतता गया,जीवन आगे बढता गया,पर धानी के मन से पिन्टू नही निकल पाया।

     धानी ने बहुत सुन्दर स्वेटर बुना है,जाने कब मिलना होगा पिन्टू से,पर जब भी होगा तभी वो अपनी प्रेम भेंट उसे देगी।ऐसा सोच कर ही धानी गुलाबी हो जाती।

    रज्जू के दादा 89बरस के होके चल बसे,पूरा घर परिवार शोकाकुल है,धानी भी,पर बस एक खयाल उसे थोड़ा उत्फुल्ल कर रहा की अब तो पिन्टू आयेगा।
        पिन्टू आया,पूरे 8बरस बाद!  धानी का पहला प्यार वापस आ गया।
     रीमा चाची के घर पूजा पाठ संपन्न हो रहा,तेरह बाम्हण जिमाने बैठे है,धानी दौड दौड कर सारे कार्य कर रही जैसे उसके खुद के ससुराल का काम है।अभी तक पिन्टू की झलक नही मिली पर उसी इन्तजार का तो मज़ा है।
      सारे काम निपटा के चाची बोली “जा धानी पिन्टू उपर रज्जू के कमरे मे है,जा ये थाली वहाँ दे आ।”
     थाली लिये राजकुमारी चली।मन ऐसे कांप रहा की अभी गिर पड़ेगी ।थाली ऐसी भारी लग रही की कही हाथ से छूट ना जाये,घबड़ाहट से हथेलियों मे पसीना छलक आया है,दिल की धड़कन तो धानी खुद सुन पा रही है।
   
             उफ्फ कैसा होगा वो समय ! जब वो पिन्टू को देखेगी ,उसे स्कूल मे पढी एक कविता की लाइन याद आ रही।
    ‘”चित्रा ने अर्जुन को पाया,शिव से मिली भवानी थी”।
   प्रेम का अपना अनूठा ही राग होता है वीर रस की कविता मे भी शृंगार रस की एक ही लाइन याद रही लड़की को।
  
  धडकते हृदय और कांपते हाथों से द्वार पे दस्तक दी उसने।
  “दरवाजा खुला है”वही भारी आवाज,सुनते ही धानी का हृदय धक से रह गया।धीरे से किवाड़ धकेल उसने खोला।
    
   अन्दर कुर्सी पे बैठा पिन्टू कुछ पढ़ रहा है,हाँ पिन्टू  ही तो हैं।पिन्टू ने आँख उठा कर धानी को देखा, धानी ने पिन्टू को, नजरे मिली,पिन्टू मुस्कुराया, पूछा
“कैसी है धानी ?” धानी के गले मे ही सारे शब्द फंस गये ,लगा कुछ अटक रहा है।
  “ठीक हूं पिन्टू दा।आप कैसे हो ?” इतना कह कर थाली नीचे रख धानी वापस सीढिय़ां उतर गयी।
  “मै तो एकदम मस्त ।”पिन्टू की आवाज सीढियों तक उसका पीछा करती आयी।

   हां मस्त तो दिख ही रहे,हे भगवान !कोई आदमी इतना कैसे बदल गया वो भी 8 ही वर्षों मे।
   नही! हे मेरे देवता! कोई मुझे आके बोल दो ,ये पिन्टू नही है।
    धानी को ज़ोर की रुलायी फूटने लगी,वो वहाँ से भागी ,अपने कमरे मे जाके ही सांस ली।
  अपनी आलमारी मे अपने कपडों के बीच छिपा के रखा स्वेटर निकाला और उसे अपने सीने से लगाये रोती रही।
     कितना मोटा आदमी सा हो गया था पिन्टू,पेट तो ऐसे निकल आया था जैसे कोई आसन्न पृसुता है जिसे अभी तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ेगा।उफ्फ सर के घने बाल भी गायब,ये तो बिल्कुल ही गंजा हो गया।
     पूरा चेहरा फूल के कुप्पा हो गया है,इतने लाल से गाल ,गालों का इतना उभरा मांस की बड़ी बड़ी आंखे भी चीनियों सी छोटी दिख रही। पूरी शकल ही बदल गयी जनाब की बस नही बदली आवाज।
     तो क्या आवाज के भरोसे ही शादी कर लुंगी।।
  ” हे भगवान !  बचा लिया मुझे,अच्छा हुआ अपनी बेवकूफी किसी से कही नही मैने।”
   “अपने प्रथम प्रेम को अपने ही मन तक सीमित रखा।”
  
बेचारी धानी जब रो धो के फुरसत पा गयी तब अपने बुने स्वेटर को लेके बैठी,अब उसे उधाड़ना जो था ,ये स्वेटर अब उसका प्रेमी कभी नही पहन पायेगा।।

उधेड़बुन  एक छोटी सी प्यारी सी प्रेम कथा है ,जो किशोर वय के प्रेम को दर्शाती है,जिसमे नायिका को हमेशा ही लगता है, उसका प्रेम बहुत उंचे आदर्शों पे टिका है,जबकी वास्तव मे उसके प्रेम का  आधार सिर्फ रूप ही है,और जीवन की वास्तविकता से दो चार होते ही धानी का गुलाबी प्रेम विलोपित हो जाता है।।।

कहानी को पढ़ने के लिये धन्यवाद!

अपर्णा।
           

समिधा- 24




   समिधा -24


     वो औरत इतनी देर से लॉज में ऊपर नीचे हर जगह जाकर शायद अपने पति और बच्चे को ही ढूंढ रही थी। लेकिन इतनी भीड़ में कहीं भी उन दोनों का पता नही चला, परेशान हाल नीचे आकर सबसे पूछती आखिर वो अपना संयम खो बैठी….

“शादी के इतने सालों में बच्चा हुआ और उसे लेकर दोनो मियां बीवी दर्शनों के लिए आये थे, हे भगवान क्या हो गया ये।
   रक्षा करना महादेव !!”

   पानी का स्तर लगातार बढ़ता चला जा रहा था जिस हॉल में अब तक लोग खड़े और बैठे थे, वहां पानी भरने लग गया था । धीरे-धीरे हॉल से ऊपर जाने वाली सीढ़ियों में भी पानी आने लग गया था। लोग डर के मारे इधर-उधर हो रहे थे उस हॉल के सामने रोड से जो सीढ़ियां हॉल तक जाती थी वह पहले ही बह चुकी थी। वरुण को देव ने दीवार से लगाकर एक किनारे एक छोटी सी मछिया पर बिठा रखा था, लेकिन जल का बढ़ता स्तर देख वरुण को खड़ा होना पड़ गया था।
     उस धर्मशाला में कुछ देर पहले तक रसोई का काम चल रहा था, इसलिए जैसे तैसे देव ने भागदौड़ कर वहाँ रसोइए की मदद से चाय बनवा ली थी।
   चाय पीने के बाद वरुण थोड़ा ठीक महसूस कर पा रहा था…..

   ” कोई मेरे पति को ढूंढ़ के ले आओ। मैं क्या करूँगी उन दोनों के बिना।”  रो रो कर उसका बुरा हाल था, हिचकियाँ बंध गयीं थीं लेकिन उसके आँसू बहे चले जा रहे थे।
   उसी के क्या वहाँ मौजूद हर एक इंसान की सांसे अटकी पड़ी थी… इस महाप्रलय से कौन ज़िंदा बच पायेगा कौन नही?
  सब घबराए से भगवान का नाम जप रहे थे…

” आप इस तरह घबराएँगी तो उन्हें कैसे ढूंढ पाएंगे। आप सभी धीरज रखिये। पानी जैसे चढ़ रहा है, उतरेगा भी। पानी उतरने के साथ ही हम सभी खोए लोगों को ढूंढना भी शुरू कर लेंगे।”

  देव के समझाने पर कुछ औरतें उस औरत को सहारा देकर एक ओर ले चलीं।
  उसी वक्त एक बड़े से पाटे की सहायता से तैरते हुए उसी औरत का खोया हुआ पति वहाँ तक पहुंच गया…
    सीढियां बह चुकी थीं लेकिन दोनो तरफ लोहे का जंगला लगा था, उसे पकड़ वो बड़ी मुश्किल से ज़मीन पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था कि धर्मशाला के स्टाफ के एक दो लड़कों ने आगे बढ़ उसे पानी से ऊपर खींच लिया….
   उसे देखते ही लगभग बेहोश सी हो चुकी उस महिला में नए प्राण फुंक गए। वो भाग कर अपने पति के सीने से लिपट गयी…
    दोनो रोते ही जा रहे थे कि उस औरत को अपने बच्चे का ख्याल चला आया….
  उसका सवाल समझ कर उसके पति ने अपनी पीठ पर एक दुपट्टे से बांध रखा बच्चा खोल कर सामने गोद में ले लिया। बच्चे को गोद में लेते ही माँ की आंखों से वापस एक बार गंगा जमुना बहने लगी। और आसपास बैठे लोगों में हर्ष की लहर दौड़ गयी…

   कितना अजीब होता है मानव स्वभाव ! अभी कुछ देर पहले जिनसे दूर दूर का भी नाता नही था , अचानक ही कुछ देर पहले उसके दुख से दुखी होने वाले लोग अब उसके सुख से सुखी हो कुछ देर को उस प्रचंड प्रलय को भी भूल बैठे थे…
   हर हर महादेव के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठा था….

  पानी बढ़ते हुए अब लोगों के सीने तक पहुंचने को था। किसी किसी के पैर उखड़ने को हो रहे थे कि देव ने एक आध लोगो की सहायता से बुजुर्गों औरतों और बच्चों को सीढ़ियों से ऊपरी मंजिल पर भेजना शुरू कर दिया।
   ऊपरी मंजिल पर पहले ही बहुत से लोग थे। ये सभी लोग भी घबराए हुए थे अपनी घबराहट को कम करने यह सभी लोग ऊपरी मंजिल के कमरों पर जमीन पर बैठे महादेव का जाप करने में लगे थे। सीढ़ियों पर भी कुछ लोग किनारे किनारे पर खड़े और बैठे थे। देव फटाफट ऊपर चला आया , उसने सभी लोगों से हाथ जोड़ कर विनती शुरू कर दी… कहा कि

“आप लोग अगर जगह बना दें तो नीचे की मंजिल पर जो लोग हैं वह भी ऊपर चले आएंगे!”

इस पर कई लोग देव से वाद-विवाद में लग गए। सभी को इस वक्त सिर्फ अपनी जान की पड़ी थी। बाकियों से किसी को क्या लेना? देव ने सबके सामने हाथ जोड़ दिये…

” आप लोग समझने की कोशिश कीजिए।  आप भगवान के द्वार पर आए हैं। भगवान के दर्शन करने पर भी क्या इतनी इंसानियत भी नहीं जागी कि दूसरों को बचाने के लिए आप लोग थोड़ी सी जगह दे दे। आप सभी जिस ढंग से बैठे हैं उसकी जगह अगर आप सब पंक्तिबद्ध होकर खड़े हो जाए , तो हम ज्यादा से ज्यादा ज्यादा लोग इस मंजिल पर खड़े हो सकेंगे।

देव की बात सुनकर किसी ने जोर से उसकी बात काट दी…

” अगर इसी मंजिल पर सारे लोग आ गए तो यह माला तो इतना बोझ सहन ना कर ढह जाएगा।”

देव ने उसकी तरफ मुस्कुरा कर देखा …

” भैया ढहना हुआ तो लोग नीचे रहें चाहे ऊपर, वैसे ही ढह जाएगा। क्योंकि पानी का बहाव बहुत तेज है… लेकिन अगर सारे लोग ऊपरी मंजिल पर आ गए तो कम से कम कुछ उम्मीद तो बचेगी…”

बहुत देर बहस के बाद आखिर लोग देव की बात मान गए और जो लोग अब तक इधर-उधर फैल कर बैठे थे एक ओर सिमटने लगे। औरतों और बुजुर्गों बच्चों को छोड़कर ज्यादातर आदमी खड़े हो गए, और एक दीवार से सटकर पंक्ति बनाते हुए एक के पीछे एक खड़े होते गए…. देव ने फटाफट जाकर नीचे से बुजुर्गों और बच्चों को ऊपर लाना शुरू कर दिया और सभी को एक एक कर ऊपर ले आया। एक-एक कर उसने पंक्ति में लोगों को खड़ा करना शुरू कर दिया । उसके इस तरह  ढंग से खड़ा करने से जितने भी लोग नीचे मौजूद थे वह सभी ऊपरी मंजिल पर आ गए अब नीचे की मंजिल पर सिर्फ कुछ एक पुरुष ही बचे थे। नीचे का हॉल पानी से पूरी तरह भरने लग गया था । देव ने वरुण को पहले ही सीढ़ियों पर खड़ा कर दिया था।
   उस धर्मशाला का स्टाफ और मैनेजर देव की पूरी तरह से सहायता कर रहा था। हॉल और मैनेजर के ऑफिस केबिन में पूरी तरह पानी भर चुका था। केबिन के सामने रखी लकड़ी की अलमारी की दराज़ इतने सब तूफान में खुल चुकी थी। और उसमें रखे सारे पैसे पानी में बह चुके थे। पानी में इधर से उधर बहते रुपयों की भी उस वक्त किसी को कोई कदर नहीं थी। कहा जाता है  ना, “वक्त सब कुछ दिखा देता है” वही पैसा जिसके लिए इंसान जिंदगी भर मारा मारा फिरता है, उस समय सिर्फ एक कागज का टुकड़ा रह जाता है। जब इंसान को अपने जीवन और उस पैसे में से किसी एक को चुनना हो। आज सभी के लिए अपना जीवन अनमोल था और उन पैसों की कोई कदर नहीं थी। पैसे पानी में बहते हुए आगे चले जा रहे थे और इंसान अपनी अपनी जगह पर स्थिर खड़े उस पैसे को बहते हुए देख रहे थे पानी का स्तर सीढ़ियों पर भी पहुंचने लग गया था।

   धर्मशाला का  स्टाफ और मैनेजर भी अब सीढ़ियों से ऊपर पहुंच गए थे। कई लोगों को देव ने छत पर चले जाने के लिए भी मना लिया था। बारिश जरूर हो रही थी लेकिन नदी में डूब जाने से बेहतर बारिश में भीग जाना ही इस वक्त लोगों को ज्यादा सुरक्षित लग रहा था। बहुत से आदमी छतों पर जाकर खड़े हो गए थे लेकिन इतनी तेज बादल और बिजली में छत पर खड़े होना भी बहुत सुरक्षित नहीं था हॉल का पानी भरते भरते सीढ़ियों तक पहुंच चुका था।
  रात आ अंतिम पहर बीत रहा था….
    जो लोग छत पर खड़े थे उन्होंने अपने सामने ही कई छोटी-बड़ी इमारतों को भी पानी में तिनके के समान बह जाते देखा और डर के मारे उनकी सांस अटक कर रह गई थी। सभी प्रार्थना कर रहे थे कि किसी तरह यह महाप्रलयंकारी बारिश रुक जाए। और उन लोगों का जीवन सुरक्षित बच जाए। छत पर खड़े लोगों ने जीवन की आस बिल्कुल ही छोड़ दी थी। कोई भगवान का नाम जप रहा था तो कोई अपने बुरे कर्मों को याद करके रो रहा था। कोई ऐसा भी था जिसने आज तक अपना कोई सपना पूरा नहीं किया था । वह अपने उन सपनों को याद करके रो रहा था कि आज तक जब समय था तो उसने अपना जीवन सिर्फ कमाई में लगा दिया और अब जब अपने सपनों को पूरा करने की पहली सीढ़ी केदारनाथ दर्शन से शुरू की तो जीवन ही तिनके के समान हो चला था। सभी के आंसू बह रहे थे किसी के पश्चाताप के आंसू थे तो किसी के दुख के, लेकिन इन सबके बीच कोई ऐसा भी था जो पूरी तरह से सुखी और संतोषी दिख रहा था। उसकी भी आंखों से आंसू की बूंदे गिर रही थी लेकिन वो आंसू करुणा के थे प्रेम के थे। उसके होंठ लगातार हर हर महादेव का जाप कर रहे थे। कुछ देर तक छत पर भीगते हुए उसने बाकियों को देखा और अपने दोनों हाथ ऊपर आकाश की तरफ जोड़ दिए..
…. उसी समय वरुण को संभाले हुए देव छत पर पहुंच गया छत पर एक तरफ टिन का छोटा सा शेड बना हुआ था देव ने वरुण को वहीं खड़ा कर दिया।
    और उनकी तरफ बढ़ गया….

” पंडित जी आप बुज़ुर्ग हैं,वहाँ ज़रा सी जगह है जहाँ आप बारिश से बच सकतें हैं। वहाँ आ जाइये। “

  मुस्कुरातें हुए उन्होंने देव को देखा और ऊपर आसमान को देखने लगे…..

” हम तो महादेव के आशीर्वाद में भीग रहें हैं, हमारे जीवन भर की तपस्या के सार्थक होने का समय आ गया है बेटा , पर जाते जाते तुम्हें आशीर्वाद देने का मन कर रहा है। “

  देव उनकी ऐसी अजूबी बातें सुन कर उन्हें देखने लगा…

” ये कैसा महादेव का आशीर्वाद है पंडित जी? ये तो तबाही है, आपके महादेव सबको मारने पर आमादा क्यों हैं? “

  उन्होंने देव को गहरी आंखों से देखा और स्वत: बड़बड़ाते हुए शुरू हो गए….

” जब अंधाधुंध पेड़ों को काटते हो तब तुम लोगों को प्रलय का डर नही लगता। जब सूखी पड़ी नदियों को पानी से भरने का तरीका सोचने की जगह उस पर दस दस मंजिला बिल्डिंग खड़ी कर देते हो तब डर नहीं लगता। जब धर्म के नाम पर एक दूसरे का खून बहा जाते हो तब भी तो डर नही लगता…..
   जब अपने घर की बहू बेटियों को सुरक्षित कर दूसरे के घर की बहू बेटियों की इज्जत तार तार कर जाते हो तब कौन सा डर जाते हो। कहीं दहेज के नाम पर जला देते हो, कहीं छोटी उम्र में माँ बना कर प्राण लील लेते हो।
  इन्हीं सब की आह लगी है…..
उन वृक्षों का करुण क्रंदन, उन नदियों का, उन बच्चियों का, उन मरते लोगों का करुण क्रंदन है ये देव!
   जब पाप का घड़ा छलकता है तब रूद्र ऐसे ही अपना रौद्र रूप दिखाते हैं। उनसे क्षमा मांग लो सभी। अभी भी समय है……

   वो अचानक देव को देख कर शांत हो गए…

“पर इनमें से तूने कोई पाप नही किया, लेकिन सुना तो होगा न गेहूं के साथ घुन भी पिसता है। वही तेरे जैसे कइयों के साथ हो गया है।
   तुझे तो मैं शुरू से मानवता की सेवा ही करते देख रहा हूँ। हे प्रभु ! इसके जैसे लड़कों की तो ज़रूरत हैं संसार में…. फिर क्यों ?
 
“आपके पैर पड़ता हूँ गुरुदेव! भीतर चलिए, यहाँ पानी की तेज धार आपका स्वास्थ्य बिगाड़ सकती है।”

  देव तेज़ बादल बिजली से घबराता उन्हें अंदर ले जाने की ज़िद पर अड़ा था…

” बोलने से नही होगा। पैर पड़ने भी पड़ेंगे।”

  देव को लगा अपनी आंखों के सामने महाप्रलय देख कर उनका दिमाग चल गया है, पर उन्हें उस कोडे बरसाती बारिश से बचाने का कोई और उपाय न देख देव उनके पैरों में झुक गया।
     वो संत वो पंडित उसके सर पर हाथ रखे होंठो ही होंठो में कुछ बुदबुदाते हुए आंखें बंद किये जैसे कुछ क्षणों को किसी दूसरी ही दुनिया में चले गए।
     उसी वक्त देव को अपने साथ शेड में लेकर जाने वरुण चला आया।
  देव ने हाथ पकड़ कर उसे भी नीचे अपने साथ खींच लिया…
     रह रह कर बिजली चमक रही थी। शेड पर खड़े लोग भयभीत थे, वो अपनी आंखों के सामने ये सब कुछ देख रहे थे….

    बंद आंखों से होंठों में कुछ बुदबुदाते हुए उस संत ने एक बार अपने दोनो हाथ ऊपर किये और जोड़ लिए , उसके बाद अपने चेहरे के सामने लाकर दोनो हाथों को आपस में घिसने के साथ ही अपना दांया हाथ नीचे झुके देव के सर पर रख दिया…..

” दीर्घायुष्य भव! चिरंजीवी भव! “

  ऐसा लग रहा था जैसे सिर्फ ये दो छोटे छोटे वाक्य बोलने में भी उन्हें अपनी पूरी ताकत लगानी पड़ी हो। अपने अंदर से उन्होंने अपने प्राण खींच कर ही ये आशीर्वाद दिया हो….
    उन्होंने धीरे से अपनी आंखे खोलीं , उनके सामने देव और वरुण दोनो झुके थे और उनका हाथ वरुण के सर पर था….
   क्षण भर को उनके चेहरे पर विषाद की एक धूमिल सी रेखा आयी और तुरंत ही चली गयी। उन्हें वो दोनो ही लड़के समान रूप से प्रिय थे पर देव के माथे की रेखाओं में जाने क्या देख कर वो उसे अपनी सम्पूर्ण शक्ति को एकत्र कर आशिर्वाद देना चाहते थे। जो पूरी तरह से फल नही पाया था।
     ये सब कुछ पलक झपकते बीत गया। वरुण और देव अपनी जगह पर खड़े हो गए, वो वापस उन्हें अंदर चलने कहते इसके पहले ही लंबे लंबे डग भरते वो छत की मुंडेर पर चले गए और ” हर हर महादेव “का जयकारा लगाते मंदाकिनी में छलांग लगा दी। ..

   उन्हें विस्मय से देखते वरुण और देव भागतें हुए वापस शेड में चले आए……..

  एक के बाद एक ऐसा सब देख वहाँ खड़े सभी स्तब्ध थे।
   नीचे से आने वाला कोलाहल और बढ़ गया था….
नीचे के हॉल में पूरी तरह पानी भर चुका था। ऊपर को जाने वाली सीढियां भी पानी से पटने लगी थीं।
ऊपर के कमरों में बैठे लोगों में हाहाकार मचा था।
  छत पर खड़े लोगों ने आसपास की कई इमारतों को ताश के पत्तों सा ढहते अपनी आंखों से देखा था….
   अब तो आसपास से पानी में बहतें चले जा रहे लोग, पेड़ पौधे, गद्दे चादरें, बैग्स नज़र आ रहे थे।
     वही जगह जो कल तक जीवन का पर्याय नज़र आ रही थी आज मृत्यु का संसार लग रही थी….
सभी ने खुद के जीवन को,स्वयं को महादेव को सौंप दिया था, अब तो जो होगा, जैसा होगा महादेव ही रक्षा करेंगे।

    समय का किसी को होश नही था,सबके मोबाइल या तो पानी में भीग कर और चार्ज न होने से बंद हो चुके थे या फिर बह चुके थे।

   किसी समय ” जान से ज्यादा मोबाइल संभाल कर रखता हूँ “के जुमले फेंकने वाले आज वक्त आने पर जान को ही संभालने में लगे थे, लाख रुपये के मोबाइल कहाँ कैसे स्वाहा हो रहे थे किसी को होश नही था….
   धीरे धीरे सुबह होने लगी थी…..
  कि तभी आकाश में एक उम्मीद की किरण चमकी…

  एक एक कर दो हैलीकॉप्टर उनकी बिल्डिंग के ऊपर से गुज़र कर निकल गए….
  सेना के जवानों की रेस्क्यू टीम आ चुकी थी।
नीचे खड़े लोगों में भी उम्मीद जाग गयी थी… छत पर एक बार फिर पहली मंजिल से भाग कर आते लोगों की भीड़ जमा होने लगी थी.. कि हेलीकॉप्टर से माइक पर एक आवाज़ गूंज उठी…

” आप लोग हड़बड़ी न करें। हम लोग एक एक कर आप सभी को सुरक्षित स्थानों में पहुंचा देंगे। हम रस्सी फेंक रहें हैं एक एक कर आप लोग रस्सी पकड़ कर ऊपर आते जाइये। आप सभी से अनुरोध है पहले बच्चों बुजुर्गों और महिलाओं को भेजिएगा…”

  सेना के जवान की कड़क रौबदार आवाज़ ने कुछ ही देर में वहाँ भी शांति का वतावरण बना दिया। एक एक कर लोग रस्सी की सीढ़ियों की सहायता से चढ़ने लगे…
   ठाकुर माँ को हैलीकॉप्टर में बैठा कर देव ने सुकून की गहरी सान्स ली, लेकिन ठाकुर माँ लगातार उसका नाम पुकारे जा रहीं थीं।
    कई लोग सवार हो चुके थे, और बहुत से अब भी बाकी थे कि वो मज़बूत इमारत जो अब तक अपनी पूरी क्षमता से खड़ी थी भरभराकर गिर गयी। बचे हुए सारे लोग मंदाकिनी में गोता लगा बैठे….
   पानी की तेज धार में बहतें चले जाते लोगो के साथ ही देव और वरुण भी बह गए….

क्रमशः

दिल से ….

   आज कोई खुरापात नही लिख पाऊँगी क्योंकि अंतिम पंक्तियां लिखते हुए मेरी खुद की आंखे भीग गयीं।
   चाहती तो मैं भी हूँ कि सब अच्छा ही हो, और शायद होगा भी।

  इसलिए विश्वास बनाएं रखें।

  देव और वरुण की तकदीर दोनो को कहाँ बहा कर लिए जा रही है? आखिर देव के माथे की लकीरों में उस संत ने क्या देख लिया ?
    वरुण को ये सारा सब पहले ही दिख रहा था तो क्या उसे पूर्वाभास हो रहा था?

माथे की रेखाएं पढना, पूर्वाभास होना! क्या ये सब सच होता है?
  हम अपने अधकचरे ज्ञान के कारण इन सब बातों को मिथ बता जातें हैं और इन्हें चमत्कार का नाम दे जातें हैं पर क्या वास्तविकता यही है।

  असल में तो विज्ञान की अपनी लिमिट्स हैं और हमारे गर्न्थो की या आसपास की जो बातें विज्ञान के दायरे में नही बंध पाती उन्हें हम चमत्कार का दर्जा दे देते हैं।
     लेकिन बहुत बार ये सारी बातें चमत्कार से परे कुछ और हैं।
   जैसे आत्मा का अस्तित्व ….

  अब आप सोचते रहिये की मैंने इतना फ़िज़ूल ज्ञान क्यों दिया? इन बातों का कोई लिंक अगले भाग से है या नही?

   जल्दी ही मिलेंगे अगले भाग में…

 

aparna …..






समिधा -23




  समिधा -23



वरुण शंकराचार्य मंदिर के लिए धीमे से आगे बढ़ रहा था कि एक बालक भागता हुआ उसके पास चला आया। हाथ से एक ओर बैठे पंडित की ओर इशारा कर उसने वरुण को अपनी बात बता दी…

” भैया वहाँ वो जो पंडित जी बैठे हैं ना उनके पास अपना नाम पता नम्बर दर्ज करवा दीजिये।

” क्यों ?” वरुण के इस सवाल पर वो मुस्कुरा कर जवाब देता उस तेज़ बारिश में सिर्फ अपने दोनो हाथो से खुद को बचाता मंदिर के सामने की गली में उतर कर भाग गया…

” ये ज़रूरी होता है। इससे ये पता चलता है कि आज की तारीख में मंदिर दर्शन के लिए कितने दर्शनार्थी आये और कितने वापस लौट पाए ज़िंदा।”
  वहीं खड़े एक दूसरे पंडा ने जवाब दिया और वरुण उन बही खाता भरते पंडित की तरफ कदम बढ़ा दिए…
   अब तक देव भी उसके पास चला आया था..

” देव आज तारीख क्या है? पूरी बताना। “

” आज है 16 जून 2013 की तारीख है मेरे भाई। लिखवा दो। अपने साथ ही मेरा नाम भी जुड़वा देना…

    पंडित जी दोनों का नाम लिख रहे थे कि एकाएक मंदिर में भगदड़ मच गई…. लोग अचानक इधर से उधर भागने लगे।
  मंदिर के पट बंद करने का समय नही हुआ था, लेकिन बाहर से भागते हुए आकर किसी ने अंदर गर्भगृह में पूजा करते पंडित जी को आवाज़ दी…

” मंदिर बंद कर निकलिए पंडित जी। जल्दी कीजिये!”

“क्यों हुआ क्या है केशव , बताओ तो सहीं।।”

“मंदाकिनी में बाढ़ आ गयी है। जल्दी से घर पहुंचिए वरना आज रात मंदिर  ही में रुकना पड़ जाएगा….”

  पंडित जी कुछ सोच कर खड़े हो गए, लेकिन फिर उन्होंने एक नज़र शिवलिंग पर डाली और प्रणाम की मुद्रा में हाथ ऊपर उठा दिये…

” प्रभु अभी पट बंद करने का समय हुआ नही है। तो कैसे आपको अकेला छोड़ जाऊँ। आपके शयन के समय ही बस आपको अकेला छोड़ता हूँ। तो मैं अभी आपको छोड़ कर नही जाने वाला।”

  पंडित जी वापस अपनी आसनी पर बैठ गए, और फूलों पत्तियों को जो फर्श पर इधर उधर बिखरी पड़ी थी को समेटने लगे…

  मंदिर परिसर में भागमभाग देख वरुण और देव भी घबरा गए…
  इधर से इधर सबको भागतें देख देव तुरंत बाहर की ओर भागा, बाहर उसकी ठाकुर माँ एक किनारे परेशान बैठी शायद उसी का रास्ता देख रही थीं।
   कई घोड़े खच्चर वाले लोगों को बैठा बैठा कर उतरने लगे थे… लेकिन बारिश ऐसी तेज़ हो चली थी कि बूंदे पीठ पर कोड़ों सी बरस रहीं थीं।
    देव इधर-उधर भागता हुआ ठाकुर मां के डोले वाले को ढूंढने लगा पर वह शायद तेज बारिश देख डोला वहीं छोड़कर नीचे उतर गया था।

   ” यार वरुण डोले वाला तो दिख नही रहा? क्या करूँ? ”

देव और वरुण दोनों परेशान हाल इधर उधर देखते हुए डोले वाले को ढूंढ रहे थे कि शर्मा जी भागतें हुए  चले आए

“जल्दी-जल्दी सभी अपने अपने घोड़ों पर बैठिये और नीचे उतर जाइए । पानी का बहाव इतना तेज है कि कुछ ही देर में मंदिर परिसर पहुंच जाएगा नीचे उतरने के बाद हमें सुरक्षित स्थानों पर भी पहुंचना है..
जल्दी कीजिये सब….

दोपहर बीत रही थी, और बारिश कम होने का नाम नही ले रही थी….

     डोला वाला जब कहीं नही दिखा तब देव ने खुद ही ठाकुर माँ को अपने कंधों पर उठाने की सोची और वापस मंदिर परिसर को दौड़ पड़ा…
  वरुण का दिल देव को छोड़ कर आगे बढ़ने का नही कर रहा था।
   वो शर्मा जी की सहायता करवाता, एक एक कर सभी सहयात्रियों को घोड़ों पर बैठाता जा रहा था।कुछ एक आध खच्चर वाले अपना खच्चर यात्रियों को सौंप कर नीचे भाग चुके थे। पर कई उनमें से बिना यात्रियों का भरोसा तोड़े पूरी तरह से अपने कर्तव्य पालन में जुटे थे।
    एक के पीछे एक यात्रियों का जत्था उतरता जा रहा था।

  जहाँ कुछ देर पहले बारिश से भीगने लोग इधर उधर छिप रहे थे अब उसी बारिश में भीगते सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचने की होड़ में लगे थे।

   मंदिर तक पहुंचने की गली के दोनों ओर बनी दुकानों के शटर पट पट गिरने लगे थे। लोग शटर में ताले घुमाते आजू बाजू वालों से मौसम का हाल समाचार भी लेते जा रहें थे….
  
   ” हुआ क्या है भाई, बारिश तो धुंआ धार होती ही है।”

” अरे भाई जी चमोली में बादल फट गया सुनने में आ रहा है… “

” अरे बाप रे। महादेव रक्षा करना। “

   पत्थरों की बनी सीढ़ियों से सम्भल संभल कर उतरते लोग भागतें चले जा रहे थे।
   मंदिर ज़रा ऊंचाई पर था, और रास्ता नीचे गौरीकुंड उतरने का था। एक दूसरे पर गिरते पड़ते लोग जान बचा कर भागतें चले जा रहे थे…

   देव मंदिर परिसर में ठाकुर माँ को लेने पहुंचा तो देखा वो दीवार से टेक लगाए आंखें बंद किये बैठी मन ही मन जाप कर रही थी। देव ने धीरे से उनके कंधे पर हाथ रखा और उन्होंने आंखें खोल दीं…

” तू आ गया बाबून!”

” तो तुम्हें क्या लगा? तुम्हें अकेला छोड़ जाऊंगा यहाँ।”

” नही ऐसा तो बिल्कुल नही लगा। मैंने सोचा बाकियों की मदद में लग गया होगा तू।

   देव ने हंसते हुए ठाकुर माँ को डोले पर सहारा देकर बैठाया और डोला उठाने ही जा रहा था कि बाहर से एक लड़का घबराया सा भीतर चला आया…

” पंडित जी बंद कर दीजिए मंदिर, बाहर सुरक्षाकर्मी भी अनाउंस करते फिर रहे है कि जल्दी से जल्द ये परिसर खाली कर दीजिए। “

” मैं समय से पहले मंदिर नही बंद करूँगा। “

“यह कैसा हठ है पंडित जी? आप भी जानते हैं ऐसी ज़िद का कोई परिणाम नहीं! इस वक्त अपनी जान की रक्षा करना सबसे महत्वपूर्ण है , मंदाकिनी में जबरदस्त बाढ़ आ चुकी है।  कुछ ही देर में मंदिर तक पानी पहुंच जाएगा जल्दी निकलिये यहां से…”

घबराता हुआ सा आदमी हाथ जोड़े मंदिर के गर्भ गृह के सामने खड़ा पंडित जी को पुकारने लगा पर पंडित जी पहले के समान अपनी जगह पर बैठे हुए मंदिर की सार संभाल में लगे रहे।

” मैं तो साक्षात प्रभु के चरणों में बैठा हूं। अब यहां बैठकर जीवन और मरण का सवाल ही कहां उठता है? अगर प्रभु चाहेंगे तो मुझे अपने बैकुंठ धाम में स्थान दे देंगे, लेकिन अपने जीते जी बिना समय के मंदिर बंद करके अपने प्रभु को छोड़ कर तो नहीं जाऊंगा! अपने प्रभु को अपने जीवन का हिस्सा माना है मैंने अपना पिता माना है मैंने। फिर कैसे इस विपत्ति में उन्हें छोड़कर चला जाऊं? ना मैं उन्हें छोड़ कर जाऊंगा और ना मेरे प्रभु मुझे छोड़कर जाएंगे!  तुम निश्चिंत रहो तुम निकलो!”

  घबराए हुए से उस व्यक्ति ने मंदिर को एक बार प्रणाम किया पंडित जी को और समझाने की कोशिश की लेकिन बारिश बढ़ती देख आखिर वह अपने सिर पर दोनों हाथ रखे पानी से खुद को बचाता गली में उतर गया देव ने भी एक बार मुड़कर मंदिर को प्रणाम किया पंडित जी को प्रणाम किया और ठाकुर माँ के डोले को अपने दोनों कंधों पर लादकर निकल गया।

मंदिर परिसर से नीचे पथरीली गली में देव उतरा ही था कि वरुण भी उसके साथ हो लिया ।

“अरे तुम अब तक यहीं थे तुम गए नहीं?”

“ऐसे कैसे तुम्हें अकेला छोड़ कर चला जाता? अब तो साथ साथ ही दोनों भाई जाएंगे आगे। “

   खच्चर पर बैठे लोगों को लिए खच्चर वाले लगभग उस पहाड़ी ढलान पर दौड़ते चले जा रहे थे ….बारिश के कारण रास्ता चिकना हो गया था. एक तरफ खाई थी दूसरी तरफ पहाड़…
     इंद्र देवता लग रहा था जैसे कुछ ज्यादा ही कुपित हो गए हैं… बरसात होती जा रही थी। रास्ते पर खच्चरों की लीद के कारण रास्ता और भी फिसलन भरा हो गया था। घोड़े पर बैठे लोग बार-बार सामने की तरफ झुकते गिरते जा रहे थे।
   खच्चर पर होती असुविधा से बचने कुछ लोग उतर कर पैदल ही चलने लगे थे।

   नया नवेला जोड़ा भी अपने अपने घोड़ों पर बैठा सवारी कर रहा था , लेकिन लड़की को बहुत असुविधा हो रही थी। बारिश से डरकर और इतनी अफरा-तफरी देखकर वह खुद को संभाल नहीं पा रही थी, उसके आंसू बहते जा रहे थे उसे संभालता समझाता उनका पति आखिर नीचे उतर कर उसके साथ चलने लगा….

” भैया यह सब ड्रामा नहीं चलेगा या तो खच्चर पर बैठकर चलो या फिर पैदल ही जाओ जिससे हम अपना खच्चर लेकर भागते हुए निकले यहां से। आप लोग जितना देरी करेंगे हमारे लिए परेशानी उतनी ही बढ़ जाएगी”

” भाई देख नही रहे कितना घबरा गई है वो। साथ चलूंगा तो उसे ढाँढस बंधा रहेगा। “

  खच्चर वाले ने मुहँ बनाया और तेज़ी से खच्चरों को खींचता आगे बढ़ गया….
   उसके तेज़ी से चलने से वो लड़कीं फिर अपना संतुलन  खोती कभी सामने तो कभी इधर उधर झूला सा झूल जाती। जितना ही उसका संतुलन बिगड़ता वो उतना ही घबरा कर चिल्लाने लगती।

“सुनिए आप भी इसी में मेरे पीछे या सामने बैठ जाइए न, तब मेरा भी संतुलन नही बिगड़ेगा। प्लीज़।

लड़के ने घोड़े वाले कि तरफ देखा…

” सोचना भी मत । ये घोड़ा नही खच्चर है, कहीं नही संभाल पाया और गिर गया तो अभी बारिश में लेने के देने पड़ जाएंगे। “

  उसकी बात सुन खच्चर पर बैठी लड़कीं ने अपने दूसरी ओर बहती नदी को देखा… नदी बिल्कुल अपने उफान पर थी। पहले जहाँ यहीं मंदाकिनी दूध की श्वेत धारा सी लग रही थी, अब पानी मटमैला सा दिखने लगा था।
   समझ नही आ रहा था कि कलकल बहती नदी की आवाज़ ज्यादा तेज थी या आसमान से गिरती बूंदों की।
       नदी इतने उफान पर थी कि अब ऐसा लग रहा था हाथ बढ़ा कर पानी को आसानी से छुआ जा सकता है।

  सब तेज़ी से उतरते जा रहे थे…. की अचानक सामने चल रहा एक खच्चर अपना सन्तुलन खोकर फिसल गया और गिर पड़ा।
   उसमें उन चारों बुज़ुर्ग महिलाओं में से एक बैठी थी। उनके गिरते ही आगे पीछे चल रहे लोगों में भी हाहाकार मच गया। उस महिला को उठाने की कोशिश करते घोड़े वाले को पीछे वाले जल्दी आगे बढ़ने चिल्लाने लगे वहीं उस महिला की सहेलियाँ उसके साथ रुकने अपने घोड़े वाले को कहने लगीं। लेकिन ऐसी अफरातफरी में कौन किसकी सुन पा रहा था। सभी को भागने की जल्दी थी।
   शाम ढलती जा रही थी, पहाड़ों पर सूर्यास्त देर से होने के कारण अभी भी हल्का उजाला था।
    कि उसी वक्त पीछे चल रहा एक घोड़ा बिदक गया और अपने मालिक के हाथ से अपनी लगाम छुड़ाकर सरपट भागता निकला , उसके बिदकने से बाकी के घोड़े भी इधर-उधर होने लग गए। वह गिरी हुई महिला उठ पाती कि उसके पहले ही उसे रौंदकर वह घोड़ा आगे बढ़ गया। कराहती हुई वह जैसे तैसे किनारे हुई थी घोड़े वाला भी अपने घोड़े के पीछे भागता हुआ निकल गया।
     उस घोड़े वाले के जाते ही नए नवेले जोड़े में से जो लड़की घोड़े पर बैठी थी उसने अपने पति को एक बार फिर अपने साथ बैठने के लिए कहना शुरू कर दिया। असल में उसके पति का ही घोड़ा बिदक कर आगे भागा था जिसे पकड़ने के लिए घोड़ा वाला भी चला गया था। अब चूंकि उन दोनों के साथ घोड़ा वाला नहीं था इसलिए वह अपने मन की कर सकते थे अपनी पत्नी की पानी भरी आंखों की गुजारिश देख आखिर उसका पति उसकी बात मान गया ,….
    और जिस खच्चर में उसकी पत्नी बैठी थी उसी खच्चर में खुद भी पीछे सवार हो गया उन दोनों के बैठते ही उस खच्चर का संतुलन एकाएक बिगड़ा लेकिन उसने खुद को संभाल लिया और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।
    बीच बीच में घबरा कर  नदी की तरफ देखती उस औरत की अचानक चीख निकल गयी….
    उसके चीखते ही सब की नज़र उसी ओर उठ गई और सभी के मुहँ से एक हल्की चीख निकल ही गयी। पानी में पेड़ों ठूंठों के साथ ही दो लड़के भी बहते चले जा रहे थे।
     उन्हें बहतें देख सभी ने घबरा कर अपनी चाल तेज़ कर दी….
    घबराहट में घबराती पत्नी को समझाता पति खुद भी अंदर ही अंदर परेशान था लेकिन उससे कहा नही जा रहा था….
    लेकिन उसकी पत्नी का रोना बंद ही नही हो रहा था..

” कोमल घबराओ मत। मैं हूँ न साथ में, फिर क्यों इतना डर। अरे साथ जियें हैं और साथ मरेंगे।।”

” ऐसा मत बोलो धीरज! अब बहुत डर लगने लगा है, हम ज़िंदा वापस लौटेंगे भी या नही।”

“क्यों नही लौटेंगे। मुझ  से प्यार करती हो ना!”

” बहुत ज्यादा।”

” और भरोसा करती हो? “

” खुद से ज्यादा। “

” तो बस आंखें बंद कर लो। मुस्कुराओ और अपना शहर अपना घर अपने लोगों के चेहरे , हमारी शादी की तस्वीरें, हमारे फेरे सोचती रहो।सब अच्छा होगा।

आखिर कोमल के चेहरे पर मुस्कान चली आयी। अपने रिश्तेदारों के चेहरे याद करती अपने फेरे याद करती कोमल मुस्कुरा उठी, उसे पीछे से धीरज ने अपनी बाहों में जकड़ रखा था। उसकी बाहों को खुद में और कस लिया कोमल ने और अचानक उनके खच्चर का पैर फिसला और कोमल और धीरज के साथ वो मंदाकिनी में गिर पड़ा।

  आसपास चलते लोगों के मुहँ से चीखें निकलने लगीं। पानी की धार इतनी तेज थी कि पलक झपकते ही कोमल और धीरज आंखों से ओझल हो गए।
   शर्मा जी के साथ आये सारे लोग घबराए हुए से थे। पर सभी आगे बढ़ते जा रहे थे।

  भागतें हुए जत्थे के जत्थे बीच बीच में हर हर महादेव का जयकारा भी लगाते जा रहे थे। लेकिन अब लोगों का सब्र टूटने लगा था।

  देव कंधो पर ठाकुर माँ को लिए था इसलिए उसकी चाल धीमी हो जा रही थी। पर वरुण उसके कदम से कदम मिलाता चल रहा था। कुछ दूर चलने के बाद वरुण ने देव को मना कर ठाकुर माँ की पालकी अपने कंधों पर उठा ली। वरुण की तबियत के बारे में पता होने से देव उसे ये काम नही करने देना चाहता था लेकिन अपनी दोस्ती की कसम दे वरुण ने दादी माँ को उठा ही लिया।

  काफी सारा उतार दोनो उतर चुके थे कि सामने से पालकी वाला लड़का भागता चला आया…

” माफ कीजियेगा भैया। आप लोगो को मंदिर उतार कर कुछ काम से नीचे चला गया था कि ये आपदा चली आयी। बड़ी मुश्किल से भागता आया हूँ। लाइये माँ जी को मेरे कंधो पर दे दीजिए।”

  उस दुबले से लड़के को देख देव आश्चर्य से भर गया..

” जब तुम एक बार यहाँ से सुरक्षित जगह में पहुंच चुके थे तब फिर वापस आने की क्या ज़रूरत थी? तुम्हारा डोला तो था ही ,हम लोग ले आते दादी को।”

अपने कानों में हाथ लगता वो लड़का एक बार मंदिर की दिशा में हाथ जोड़ वापस उनकी ओर मुड़ गया…

“” ऐसे कैसे अपनी रोजी से दगा कर जाता भैया जी। वैसा करूँगा तो महादेव कभी माफ नही करेंगे। लाइये दीजिये दादी को हमारे कंधे पर। आप लोगो की आदत जो नही है पहाड़ी रास्तों में चलने की ..आप लोगो को वक्त लगेगा, मैं तो पैदा ही पहाड़ों पर हुआ हूँ। अभी दौड़ते भागतें दादी अम्मा को नीचे पहुंचा दूंगा। “

  हंसते हुए वरुण ने दादी को उतार कर उसके हवाले कर दिया..

“भैया आप लोग भागतें हुए निकलिए , मैं इन्हें लेकर आ जाऊंगा…और सुनिए हो सके तो पंजो के बल चलिएगा गिरेंगे नही। ये देखिए ऐसे। “

  उसने अपने पैरों की ओर इशारा किया और दादी को लिए फटाफट आगे बढ़ गया।

     शर्मा जी की टोली के समान ही और भी टोलियां आयी हुई थी। सभी उतरने की हड़बड़ी में थे…. रास्ते में गलियों से कुछ ऊपर को सीढियां चढ़ कर धर्मशालाएं भी बनी थी,जिनमें पहले ही क्षमता से अधिक लोग पनाह ले चुके थे।
  फिर भी होटल बासा और धर्मशाला के मालिक दरवाजों पर खड़े लोगो को अंदर बुलाते जा रहे थे।

   रामगढ़ी के पास पहुंचते हुए लोग अब थक कर चूर होने लगे थे…. वहाँ शर्मा जी ने सभी को एक साथ लेकर एक धर्मशाला में प्रवेश किया तो लेकिन अंदर भीड़ देख सहम कर एक तरफ खड़े रह गए। ऐसा लग रहा था केदारनाथ घूमने आए आधे लोग वहीं चले आये थे।
   किसी तरह जगह बनाते शर्मा जी अपने जत्थे के लोगो को गिनने में लगे थे। पांच लोग कम हो रहे थे ,ये कहते ही सभी की आंखों में सुंदर सा नया नवेला जोड़ा झूल गया। दोनों कहाँ गिरे? कहाँ बहे? पता ही नही चला। डूब गए या कहीं आगे जाकर किनारे लग गए किसी को समझ नही आ रहा था पर हर कोई यही मना रहा था कि वो लोग  जीवित बच जाएं पर ये भी सत्य था कि मंदाकिनी का रौद्र रूप देख चुके वो लोग मन ही मन समझ चुके थे कि उसमें गिर कर बचना मुश्किल ही नही नामुमकिन था।

  पर बार बार सभी को गिनने पर उन लोगो को समझ आया कि देव और वरुण भी वहाँ नही पहुंच पाए थे।

सब के सब घबराए से इधर उधर देख रहे थे, कुछ बुज़ुर्ग महिलाएं एक तरफ दीवार से टिक कर अपने लिए जगह बनाती बैठ गईं थीं….
    बाकी लोग इधर उधर जगह देख रहे थे कि सीढ़ियों पर डोला वाला चला आया, उसने धीमे से दादी माँ को नीचे उतारा और अपने गमछे से अपना चेहरा पोंछने लगा।

    भीड़भाड़ का ये फायदा था कि लोगों को ठंड नही लग रही थी ।
   सुरक्षित स्थान पर पहुंच जाने के कारण लोगों के चेहरों पर राहत नज़र आने लगी थी।
   सब कोई न कोई किनारा पकड़े बैठे या खड़े थे की उनके साथ आयी रिटायरमेंट के बाद वाली टुकड़ी में से दो जोड़े जिन्होंने बाहर अपने जूते उतार रखे थे…
   अपने जूते लेने हॉल से बाहर की तरफ निकल गए, उसी वक्त वरुण और देव भागते हुए से आये और फटाफट सीढियां चढ़ भीतर की ओर हो गए, ठीक वहीं उन लोगों का आमना सामना हो गया..

” अंकल जी इतनी बारिश में बाहर कहाँ निकल रहे।”

” देव बेटा ये हमारी चप्पलें बाहर रह गईं थीं, वही लेने हम चारों बाहर चले आये,बस चप्पल पहन कर…

   उनका आगे का वाक्य पूरा होने से पहले ही पथरीली सीढ़ियां भरभरा के पानी में गिर पड़ीं, और उसी के साथ वो चारों पानी में बहतें डूबते उतराते आंखों से ओझल हो गए।

  देव अचानक से ऐसा होते देख उन्हें बचाने अपना हाथ उन्हें देने झुक ही रह था कि पीछे से वरुण ने उसे खींच लिया।
   देव और वरुण के पीछे हटते ही सीढ़ियों के बाद का वो हिस्सा जिसमें अब तक वो दोनो खड़े थे भी बाढ़ के साथ गिर कर बह चला।

  मौत को इतने करीब से देख कर सब की सांसे थम गयीं थी।
   वही साथी जो कल तक साथ गाते बजाते एक दूसरे का हाथ बटाते जा रहे थे आज एक एक कार साथ छोड़ते जा रहे थे।
   इस यात्रा से पहले किसी ने भी सोचा रहा होगा कि ये उनकी अंतिम यात्रा भी हो सकती है।
  अंदर बैठी औरतें ही क्या आदमी भी रोने लगे थे।

  वरुण की धड़कन बहुत तेज़ चलने लगी थी, ऐसा सब आंखों के सामने देख उसकी सांस उखड़ने लगी थी।
  देव ने उसकी हालत देख उसे एक तरफ जगह बना कर बैठाया और लॉज के मालिक के पास से खोज बीन कर एक टॉवेल लाकर उसे अच्छी तरह से लपेट दिया….

   वरुण खुद को संभालने की कोशिश कर रहा था कि किसी के ज़ोर ज़ोर से रोने चिल्लाने की आवाज़ आने लगी…
  
  “शर्मा जी प्लीज़ देखिए , ये कहाँ रह गए। फ़ोन भी नही लग रहा। गुड़िया भी इन्ही के पास है। मुझे अब घबराहट हो रही।”

  वो औरत इतनी देर से लॉज में ऊपर नीचे हर जगह जाकर शायद अपने पति और बच्चे को ही ढूंढ रही थी। लेकिन इतनी भीड़ में कहीं भी उन दोनों का पता नही चला, परेशान हाल नीचे आकर सबसे पूछती आखिर वो अपना संयम खो बैठी….

“शादी के इतने सालों में बच्चा हुआ और उसे लेकर दोनो मियां बीवी दर्शनों के लिए आये थे, हे भगवान क्या हो गया ये।
   रक्षा करना महादेव !!”

क्रमशः


aparna …..
 

समिधा -22

समिधा-22



           हरिद्वार से बस आगे निकल चुकी थी। पिछली
रात से होती बारिश अब भी नही रुकी थी ।
   ऋषिकेश से जैसे जैसे बस आगे बढ़ती जा रही थी पहाड़ी रास्ता शुरू होता जा रहा था, एक तरफ बारिश से धुलते पहाड़ थे तो दूसरी तरफ गरजती गंगा बह रही थी। धूल भरा रास्ता बारिश के पानी से कीचड़ भरा हो गया था। छोटे छोटे गांव पीछे छूटते जा रहे थे और आगे बढ़ते हुए शर्मा जी का उत्साह भी बढ़ता जा रहा था…

” ये देख रहें हैं आप लोग, ये शिवपुरी कहलाता है। यहाँ ये गंगा जी के किनारे पर की रेत पर लोग टेंट लगा कर रुकतें हैं। अभी लगातार होती बारिश के कारण ही कम नज़र आ रहें हैं। फिर भी इक्का दुक्का आप लोग देख ही सकतें हैं।
  गर्मियों में व्यास और कौड़ियावलिया में जबरजस्त रिवर राफ्टिंग होती है जी।”

  शर्मा जी की बातों में वरुण को कोई रस नही मिल रहा था वो तो पूरी तरह से प्रकृति की सुंदरता में खोया खिड़की से बाहर देख रहा था वहीं देव शर्मा जी से खोद खोद कर वहाँ के बारे में पूछ रहा था।

” ये तो हम शायद देवप्रयाग पहुंच गए हैं ना शर्मा जी!”

” बिल्कुल सही पहचान गए हो बेटे। ये देवप्रयाग ही है,  यहीं भागीरथी और अलकनंदा का संगम होता है। यहीं के बाद गंगा गंगा कहलाती है यहाँ तक वो भागीरथी होती है।मुख्य रूप से अलकनंदा के पाँच प्रमुख प्रयाग है. पाँच प्रयागो मे यह पाँचवा प्रयाग है. पहला प्रयाग विष्णु प्रयाग है जहाँ अलकनंदा से धौली गंगा मिलती है. दूसरा प्रयाग  नन्दप्रयाग है यहाँ नन्दकिनी नदी अलकनंदा मे मिलती है. तीसरा प्रयाग कर्ण प्रयाग है यहाँ पिंडर नदी अलकनंदा मे मिलती है.  चौथा प्रयाग रुद्रप्रयाग है. रुद्रप्रयाग मे मंदाकिनी अलकनंदा से मिलती हैं और पाँचवा देव प्रयाग.”

“बहुत जानकारी है आपको शर्मा जी।”

” अरे बेटा काम ही यही है हमारा। अभी देवप्रयाग के बाद श्रीनगर पड़ेगा उत्तराखंड वाला, उसके बाद जगह पड़ती है कालिया सौर जहाँ धरा देवी का सुप्रसिद्ध मंदिर पड़ता है। आप लोग चाहें तो दर्शन कर सकतें हैं वहाँ।”

  शर्मा जी और देव की बातों को सुनते गाते बजाते लोग आगे बढ़ते चले गए। एक नया नवेला जोड़ा तोता मैना बना एक दूसरे के सर में सर घुसाये बस के बाकी लोगों से बेखबर  खिड़की से बाहर देखने में लगा था।
     तिलवारा से आगे अगस्त्यमुनि में बस कुछ देर को रुक गयी…  ऊंची नीची चट्टानों पर अस्तांचलगामी सूर्य की किरणें पड़ रहीं थी, लेकिन सुबह से होती बारिश अब भी नही रुकी थी।
   वहाँ गुफाओं में बने आश्रम में घूमते वरुण को वहाँ कुछ और देर रुकने का मन कर रहा था लेकिन बाकियों को आगे बढ़ने की जल्दी थी। ड्राइवर का कहना था कि रात में पहाड़ी में जितना कम गाड़ी चलाया जाए उतना सुरक्षित रहेगा। उसे आज की रात सोनप्रयाग तक पहुंचना ही था। सोनप्रयाग में डेरा डाल दिया गया।

   अगली सुबह सब वहाँ से गौरीकुंड के लिए निकल गए।

   गौरीकुंड से थोड़ा आगे बढ़ा कर बस वाले ने बस रोक दी। वहाँ ढेर सारे खच्चर वाले और डोले वाले खड़े थे।
  ठाकुर माँ को डोले में बैठा कर देव वरुण के साथ घोड़े वाले के पास चला आया। अधिकतर लोग अपनी सुविधा से घोड़ा या डोला चुनतें जा रहे थे।
  शर्मा जी घोड़े वालों से बातचीत कर उनसे पैसे कम करने की चिकचिक कर रहे थे,घोड़े वाले अपनी ही परेशानी में थे… ” ये बारिश बंद नही हुई तो बड़ी मुसीबत हो जाएगी। “

  ” हाँ मैंने भी सुना है मंदाकिनी जो पच्छिम को बहती है उफान पर आ रही है। दद्दा कह रहे थे ऐसे ही पानी बरसात रहा तो पूरब को मुड़ जाएगी , और पूरब को अगर मुड़ी तो ये जो सब गेस्ट हाउस ,होटल बासा सब खोल दिया है ना सब बह जाएगा कसम से! “

” महादेव रक्षा करें!
     हाँ भाई बोलो कित्ते आदमी हो आप लोग । रुपया तो कम नही हो पायेगा। रास्ता देखो न आप उस पर ये बारिश,हम तो सब भीगते भीगते ही चलेंगे न दादा।”

” इतने लोगों को एक साथ लेकर जाने का भी कुछ कम नही करोगे।?”

” चलो ठीक है सौ पचास कम दे देना, बैठते जाओ एक एक पर। हमारे और आदमी भी है यहाँ ।

  सबके बैठते ही घोड़े वाले घोड़े लिए आगे बढ़ने लगे। पहाड़ पर के संकरे रास्ते पर भी घोड़ा खाई की तरफ बढ़ कर ठुमकता हुआ आगे बढ़ रहा था, कुछ को इस यात्रा में आनन्द आ रहा था तो कुछ को डर भी लग रहा था…

” अरे भैया जरा किनारे चलाओ न अपने घोड़े को। ये तो खाई से नीचे गिर पड़ेगा लग रहा है।”

” आराम से बैठिये बहन जी। ये घोड़े यहीं पहाड़ियों पर पैदा हुए हैं , दिन भर में तीन चार चक्कर लगा ही लेते हैं। इन्हें इन रास्तों की आदत है। अच्छा आप सभी लोग अपना अपना घोड़ा पहचान लीजियेगा। मंदिर दर्शन कर निकलेंगे तो पहचान कर बैठ जाइयेगा उतरने के लिए। “

   गौरीकुंड से आगे बढ़ते चलते खच्चर वाले अपनी अपनी सवारियों को केदारनाथ के किस्से भी सुनाए जा रहे थे।
   रास्ते में पड़ने वाले मंदिर दिखाते उसका प्राचीन किस्सा सुनते वो आगे बढ़ रहे थे।
भीम मंदिर पार करने के बाद और आगे बढ़ने पर रामबाड़ा आ चुका था।
   वहाँ घोड़ो को एक किनारे बांध घोड़े वाले आराम करने लगे थे।
   एक छोटी सी दुकान पर वरुण और देव साथ ही बैठे थे। दादी को चाय का गिलास देकर देव वरुण के पास अपनी चाय लिए आ रहा था कि बारिश के कारण वो फिसलने को हुआ लेकिन पास पड़ी टेबल का सहारा लिए वो गिरने से बच गया। लेकिन उसे देखते बैठा वरुण ज़ोर से उसका नाम ले चिल्ला उठा  ” देव बचो!”

  देव आश्चर्य से उसे देखता उस तक चला आया” मैं ठीक हूँ वरुण ! अचानक क्या हुआ? “

” पता नही मुझे ऐसा लगा जैसे इन पथरीली संकरी गलियों में तेज़ी से पानी बहता चला आ रहा है और तुम उसी में गिरने जा रहे हो।।”

” लगातार होती बारिश से डर गए हो लगता है।”

” हाँ दोस्त शायद तुम सही कह रहे। आजकल समझ नही आता, मेरे साथ क्या हो रहा है। अचानक कुछ सेकंड्स को आंखों के सामने एक तस्वीर सी बन जाती है और पलक झपकते में ही गायब हो जाती है।”

” पूर्वाभास तो नही होने लगा है कहीं तुम्हें?”

” क्या पता! “दोनों बातें करते हुए चाय भी पी गए कि उनके घोड़े वाले उन्हें बुलाते चले आये। एक बार फिर वो मनोहारी सफर शुरू हो गया।
     रामबाड़ा  से थोड़ा आगे बढ़ते ही सामने विशाल केदार पर्वत हल्की सी निकली धूप में पल भर को चांदी सा चमक उठा। आसपास उड़ते बादलों के बीच ऊंची चमकती गौर धवल पर्वत श्रृंखला देखने वालों को अभिभूत कर रही थी।
   यूँ लग रहा था प्रकृति अपना सारा सौंदर्य यही उड़ेल चुकी है , एक तरफ बहती दूधिया मंदाकिनी और दूसरी तरफ ऊंचा खड़ा केदार ऐसा अपरूप सौंदर्य था कि किसी की आंखें नही झपक रही थी…

” बस गरुड़ चट्टी से थोड़ा आगे से आप लोगों को पैदल जाना होगा बाबू लोग।
  बारिश की वजह से यहाँ गरुड़ नही दिख रहे वरना तो ऐसा लगता है जैसे छोटे छोटे यान उड़ रहे हों। “

  घोड़े वाले कि बात पर हामी भर सब इधर उधर देखते आगे बढ़ते रहे। घोड़े वाले लड़के चलते हुए आपस में कुछ खुसर पुसुर भी करते चल रहे थे।
   शायद लगातार होती बारिश उन लोगों को अब डराने लगी थी…

  मंदिर से कुछ पहले ही उन्हें उतार वो लोग एक तरफ चले गए। मंदिर के सामने पथरीली सी गली के दोनों ओर छोटे छोटे दुकान वाले बैठे थे, कुछ छोटे होटल भी थे।

   ठाकुर माँ को साथ लिए देव ने उनके लिए पूजा की थाली खरीदी और अंदर बढ़ गया….

  मंदिर के प्रथम भाग में पांचों पांडवों की मूर्ति स्थापित थी। श्रद्धालुओं की पंक्ति दर्शनों के लिए खड़ी थी, उसी पंक्ति में देव और वरुण भी खड़े हो गए। साथ आया पंडा उन सब को मंदिर धाम की कहानी सुनाने लगा..

“कहा जाता है , पांडव यहीं अपना पश्चाताप करने शिव जी के दर्शनार्थ आये थे परंतु शिव जी उन्हें अपने दर्शन देना नही चाहते थे इसलिए वो वृषभ रूप में जानवरों के बीच चले गए…
      तब भीम दो पहाड़ों के बीच अपने पैर फैलाये खड़े हो गए और नकुल को सभी जानवरों को उनके पैरों के मध्य से निकलने को कहा, उन्हें मालूम था भगवान शिव कभी ऐसा नही करेंगे।
  जब शिव ने यह देखा तो वहीं भूमि पर अपना सिर गड़ा कर  धरती मे  समाहित होने लगे. भीम ने जब यह देखा तो दौड़ कर उन्हें पकड़ना चाहा पर तब तक व्रष रूपी शिव की केवल पीठ ही पृथ्वी के उपर बची थी. और वही व्रष के प्रष्ठ भाग को केदारनाथ के नाम से जाना जाता है और उसी रूप मे यहाँ भगवान शिव की पूजा की जाती है….”

   पीछे खड़े एक नवविवाहित जोड़े ने तुरंत अपना मोबाइल निकाला और गर्भ गृह के बाहर से ही विग्रह की तस्वीर लेनी शुरू कर दी..

” अरे आप मोबाइल अंदर लिए कैसे चले आये। बाहर जमा करना था। यहाँ गर्भगृह की फ़ोटो लेना मना है। “

” अरे भाई एक तस्वीर ले लेने से तेरा क्या बिगड़ जाएगा,ये सौ रुपये रख ले, दो चार तस्वीरें ले लेने दे। हमारी शादी को बस पंद्रह दिन हुए हैं , सोचा केदारनाथ दर्शनों के साथ ही अपना वैवाहिक जीवन शुरू करेंगे। “

देव ने पलट कर देखा वो सुंदर शर्मिला सा जोड़ा एक दूसरे का हाथ थामे खड़ा था,बीच बीच में लड़की अपने पंजो पर उचक कर गर्भगृह से अंदर झांकने की कोशिश कर रही थी।

“ओ भाई मेरे हम भी दर्शनों के लिए ही आये हैं। दस साल हो गए थे हमारी शादी को लेकिन संतान नही थी, अब जाकर हुई। इसके पैदा होने के पहले ही मन्नत की थी कि इसके जन्म के साल भर में दर्शनों को जाएंगे। “

  वरुण ने देखा बोलने वाले के पास ही उसकी पत्नी मुस्कुराती हाथ जोड़े खड़ी थी और उसकी गोद में दस ग्यारह महीने का बच्चा शांति से सो रहा था।

  उनके पीछे तीन चार महिलाएं खड़ी थीं …

” बहुत बहुत बधाई हो आपको ,बच्चे के लिए। हम चारों किस मन्नत से आयीं हैं यहाँ वो सुनेंगे तो और खुश हो जाएंगे आप लोग”

लंबी पंक्ति में अपनी पारी का इंतज़ार करते सब आपस में बातें कर रहे थे

” हाँ बताइये न दीदी। “उस आदमी की बात पर वो महिला मुस्कुरा उठी…

” दीदी नही तुम मुझे आंटी भी बुला सकते हो बेटा। तुम्हारी उम्र का बेटा है मेरा। हम चारों सखियां स्कूल के समय की दोस्त हैं। स्कूल के बाद किसी की शादी हो गयी तो कोई आगे पढ़ने चली गयी ऐसे हम चारों बिछड़ गयीं। फिर ये आजकल का डाकिया है ना इसने हमें मिला दिया । अरे वही तुम लोगों का फ्रेंडबुक!
मेरी पोती ने मेरा फ्रेंडबुक पर अकाउंट बनाने के बाद मेरी सहेलियों के नाम पूछ पूछ कर ढूंढना शुरू किया तो एक एक कर  सभी मिल गयीं।
  सभी अपने अपने जीवन में आगे बढ़ गईं थीं। अधिकतर के बच्चों की भी शादी हो चुकी है। किसी के नाती पोते हो चुके तो किसी के होने वाले हैं। ऐसे ही एक दिन बातों बातों में कहीं मिलने का सोचा। पर चारों अलग अलग शहर के थे तो कहाँ मिलते। तब मैंने ही कहा कि चलो एक साथ कहीं घूम कर आतें हैं। सब राजी हो गए। और सबसे सुखद आश्चर्य ये था कि हमारे पतियों ने भी पहली बार हमें घर से अकेले निकलने की सहमति दे दी।
   सब कलकत्ता के आसपास ही थे सो वहीं से एक साथ केदारनाथ निकल आये।”

” वही मैं नोटिस कर रहा था आंटी जी , आप चारों पल भर को चुप नही बैठती थी। लग रहा था जैसे जीवन भर की बातें किये जा रहीं हैं।

  देव की बात पर चारों हँसने लगी। उनके ठीक पीछे दो तीन जोड़े और भी खड़े थे…

” बस हमारा भी कुछ ऐसा ही किस्सा है । हम सब अपने रिटायरमेंट का इंतेज़ार कर रहे थे।हम तीनों दोस्त कम कुलीग साथ ही रिटायर हुए और पत्नीयों को साथ लिए चले आये दर्शनों को।
  घर की ज़िम्मेदारी बच्चों ने उठा ही ली है।”

  सभी को अपनी अपनी बात रखते देख ठाकुर माँ भी अपनी कथा कहने लगीं।

” मुझे तो ये मेरा पोता लेकर आया है दर्शनों के लिए। इस बुढ़ापे में वरना यहाँ तक आना बहुत मुश्किल था। लेकिन ये मेरा पोता हीरा है हीरा। इसके जैसा बेटा पुण्य से मिलता है। ये जिस घर में रहे वहाँ उजाला ही उजाला है…

  ” बस बस ठाकुर माँ। ” देव ने उनकी बात बीच में ही काट दी

”  एबे की होलो!”

” अरे बाकी लोग बोर हो जाएंगे आपके इस पोता पुराण से। “

  सभी हँसने लगे । पंक्ति धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी…

आखिर एक एक कर सभी को गर्भगृह से अंदर प्रवेश करने का मौका मिल ही गया…
      9 फीट लंबा और लगभग 3 फीट चौड़ा विग्रह दर्शन मात्र से ही चमत्कृत कर उठा।
    वरुण पहली बार ऐसे किसी मंदिर में मूर्ति पूजने बैठा था।
  
       शिवलिंग के बाईं ओर बैठा कर पूजा आरंभ की गयी, वहीं मंदिर की दीवार  पर दिव्य ज्योति जल रही थी. पूजा के मध्य उसके दर्शन के लिए कहा  तत्पश्चात  घी को शिवलिंग पर मल कर जल से स्नान करवाया गया और अंत मे पंडित जी ने सबसे कहा, अपना मस्तक शिवलिंग मे लगा लीजिये, आप सभी का कल्याण होगा….

   उसी वक्त बाहर इतने ज़ोर की बिजली कड़की की कुछ क्षणों को मंदिर का गर्भगृह भी बिजली की रोशनी से उजाले से भर गया।
  बाहर तेज़ बादलों की गड़गड़ाहट बढ़ती चली जा रही थी।

  रुक रुक कर तेज़ बिजली चमक रही थी।ऐसा लग रहा था बादलों और बिजलियों में होड़ सी मची थी कि कौन ज्यादा तेजी से लोगों को डरा सकता है।

वहाँ बैठे पंडितो में भी आपस में मौसम को लेकर चर्चा शुरू हो गयी थी।

  “ऐसा लग रहा है महादेव तांडव कर रहें हैं।”

   घी हाथों में लिए शिवलिंग पर चढ़ाते हुए वरुण को सिहरन सी हुई, ऐसा लगा जैसे साक्षात महादेव सामने खड़े हों।
   लेकिन जाने क्यों उसे महादेव कुपित से लगे। ऐसा लग भगवान किसी बात पर रूष्ट हैं। उसने डर कर आंखे खोल दीं।

” माथा टेक लीजिये शिवलिंग पर!”

  वरुण ने जल्दी से अपना माथा टेका और बाहर निकल गया।

  उसके साथ कृष्णमंदिर आश्रम के तीन लड़के और भी थे। बीच बीच में उन सब से भी बातें होती रहती थी।सभी मंदिर ट्रस्ट की किताबें हाथ में लिए अक्सर पढ़ते मिलते लेकिन इस पूरी यात्रा में वरुण ने अब तक एक भी किताब नही पढ़ी थी।

” भैया मंदिर के पीछे शंकराचार्य जी का समाधि स्थल भी है।देखने चलेंगे क्या? “

देव को ठाकुर माँ के साथ बातों में लगा देख वरुण उन लोगों के साथ आगे बढ़ गया…
  
   बारिश इतनी तेज हो चुकी थी कि अब सामने गली के दोनो पार की दुकाने भी नज़र नही आ रही थी। चटपट की तेज ध्वनि ऐसी थी कि साथ खड़ा आदमी क्या बोल रहा सुनाई नही पड़ रहा था।

    वरुण को कृष्णमंदिर ट्रस्ट द्वारा यहाँ तक भेजने का मुख्य
उद्देश्य ही यही था, शंकराचार्य समाधि के दर्शन
  
   शंकराचार्य जी की समाधि मंदिर के पीछे बाईं ओर स्थित थी, यह एक बड़ा सा हाल था, यहाँ शंकराचार्य जी की मूर्ति, उनकी माता की मूर्ति एवं अन्य मूर्तियाँ स्थापित थी।
    सनातन हिन्दू धर्म के संस्थापक श्री श्री आदिगुरु शंकराचार्य के दर्शन पाकर वरुण का मन कुछ पलों को शांत सा हो गया था।
  उसके मन में चलती उथलपुथल को जैसे एक राह मिल गयी थी।
    अब तक यही सोच सोच कर वो परेशान था कि उसे सन्यास लेना चाहिए या नही लेकिन अब यहाँ इस समाधि पर आकर उसे समझ आने लगा था कि उसके जीवन का ध्येय क्या होना चाहिए।
  उसके जीवन का अर्थ क्या है?

  उसने मान लिया था समझ लिया था कि उसका जीवन अब पूरी तरह उसे कृष्ण समर्पित करना था।
वहाँ प्रणाम कर बाहर निकल रहा था कि एक आदमी मंदिर के एक तरफ भीगता सा बैठा था। अपने आप में सिमटा गठरी सा बना वो मैले कुचैले कपड़ों में एक फटा सा झोला रखे बैठा था। उसे देख वरुण को दया आ गयी उसने झुक कर उससे पूछा…” यहाँ भीगते हुए क्यों बैठे हो भाई। ये लो कुछ रुपये रख लो कुछ खा लेना। “

  उसने डबडबायी आंखों से वरुण को देखा और रुपये उससे ले लिए।
   फिर जाने क्या सोच कर उसने वो रुपये वापस कर दिए…

” अब नही चाहिए भाई ये रुपया। मैं सारी उम्र इसी रुपये के पीछे भागता रहा। खूब कमाया और खूब उड़ाया भी। पैसा कमाने में इतना मगन था कि कब पत्नी एक गंभीर रोग से ग्रस्त हो गयी पता भी नही चला। उसे लेकर हर बड़े अस्पताल के चक्कर काटा लेकिन मेरा रुपया किसी काम नही आया।
   पानी की तरह पैसों को बहा कर भी उसे नही बचा पाया।
  उसके मरते ही बेटों ने जायदाद के लिए शोर मचाना शुरू कर दिया। और सगे भाइयों को रुपयों के पीछे लड़ते देख मन वितृष्णा से ऐसा भर गया कि सब कुछ उन चारों के नाम लिख कर घर छोड़ केदारनाथ के लिए निकल गया।
  मन में विश्वास था कि भले एक कौड़ी न हो मेरे पास लेकिन मैं धाम पहुंच कर रहूंगा। और देखो किसी न किसी सहायता से यहाँ तक पहुंच गया। अब यहाँ से मुझे बद्रीनाथ जाना था , उसी के लिए बैठा था कि तुमने रुपये दे दिए। जानता हूँ तुम जैसे और भी आएंगे और मुझे बद्रीनाथ के लिए रुपये दे जाएंगे लेकिन अब लग रहा इससे आगे नही जा पाऊंगा।
  यूँ लग रहा है वो आसमान से हाथ बढ़ा कर मुझे बुला रही है कि बस अब बहुत हुआ संसार का मोह अब आ जाओ।
  वो देखो उस ऊंची पहाड़ी पर शिव नृत्य कर रहे हैं। साक्षात नटराज खड़े हैं वहाँ।
    उनकी एक एक भाव भंगिमा उनकी पदचाप उनके ताल ही तो ये गर्जन पैदा कर रहें हैं।
   इसी गर्जन तर्जन में रम जाने का दिल करता है अब। इस प्रलय में बह जाने का दिल करता है अब।
  अब कहीं नही जाना है मुझे। अब सीधे शिव के धाम ही जाऊंगा ।
   हर हर महादेव!!

  वरुण उसे देखता आगे बढ़ गया..
  वरुण शंकराचार्य मंदिर के लिए धीमे से आगे बढ़ रहा था कि एक बालक भागता हुआ उसके पास चला आया। हाथ से एक ओर बैठे पंडित की ओर इशारा कर उसने वरुण को अपनी बात बता दी…

” भैया वहाँ वो जो पंडित जी बैठे हैं ना उनके पास अपना नाम पता नम्बर दर्ज करवा दीजिये।

” क्यों ?” वरुण के इस सवाल पर वो मुस्कुरा कर जवाब देता उस तेज़ बारिश में सिर्फ अपने दोनो हाथो से खुद को बचाता मंदिर के सामने की गली में उतर कर भाग गया…

” ये ज़रूरी होता है। इससे ये पता चलता है कि आज की तारीख में मंदिर दर्शन के लिए कितने दर्शनार्थी आये और कितने वापस लौट पाए ज़िंदा।”
  वहीं खड़े एक दूसरे पंडा ने जवाब दिया और वरुण उन बही खाता भरते पंडित की तरफ कदम बढ़ाता आगे बढ़ गया…
   अब तक देव भी उसके पास चला आया था..

” देव आज तारीख क्या है? पूरी बताना। “

” आज  16 जून 2013 की तारीख है मेरे भाई। लिखवा दो। अपने साथ ही मेरा नाम भी जुड़वा देना…


क्रमशः

  दिल से ….


    अब तक आपमें से बहुत से पाठक समझ ही चुके हैं कि कहानी किस मोड़ पर मुड़ने वाली है। कहानी के अगले कुछ भाग दिल को दहलाने वाले भी हो सकते हैं। केदारनाथ त्रासदी ने स्तब्ध कर दिया था सभी को। प्रकृति अपना रौद्र रूप ऐसे भी दिखा सकती है किसी ने सोचा नही था।

16 जून 2013 की रात केदारनाथ में भयंकर जल प्रलय आया था और  इस भयानक जल प्रलय ने केदार घाटी की शक्ल ही बदल कर रख दी थी। इस रौद्र प्रलय ने केदारनाथ को मौत की चादर से ढंक दिया और हजारों लाशें नदी में बह गई। इतना ही नहीं कई लोगों का पता भी नहीं चला। … पूरे उत्तराखंड की नदियां किनारे तोड़कर बहने लगी थीं।
   उस दौरान चौराबाड़ी का ग्लेशियर पिघल गया था, चमोली में बादल फटने के साथ ही होती धुंआधार बारिश ने 16 जून की रात भयानक तबाही मचाई थी। मंदाकिनी का जलस्तर इतना ऊंचा बहने लगा था कि पानी मंदिर में भी घुस आया था।
   पूर्वी प्रवाहिका में बहने वाली मंदाकिनी पश्चिमी में भी बहने लगी थी। अपने साथ गांव के गांव बहा ले जाने वाली मंदाकिनी भी केदारनाथ मंदिर का कुछ नही बिगाड़ पायी थी।

  हज़ारों लोग उस पानी में बह गए,लापता लोगों का आज भी कोई पता नही है। तबाही से त्रस्त उत्तराखंड का वो हिस्सा आज भी अपने में भयानक दर्द समेटे है। लेकिन वहाँ फैली तबाही से मंदिर पर लेश मात्र भी असर नही हुआ।

इस आपदा में फंसे लोगों को बचाने के लिए भारतीय सेना को केदारनाथ घाटी के लिए तुरंत भेजा गया था। हमारी सेना के जवानों ने लाखों लोगों को रेस्क्यू किया । लगभग 110000 लोगों को सेना ने जीवित बचा लिया।
    इस दौरान मार्ग में आने वाले काफी सारे घर, होटल और रेस्‍तरा पानी में बह गए।
      लेकिन आठवीं सदी में बने केदारनाथ मंदिर को ज्‍यादा नुकसान नहीं पहुंचा। कई शोध संस्थानों ने ये समझने की कोशिश की कि आखिर इतनी विकराल आपदा में मंदिर कैसे सुरक्षित रहा? इसके पीछे कई कारण दिए गए, जिसमें मंदिर की भौगोलिक स्थिति को सबसे महत्‍वपूर्ण बताया गया।

   लेकिन क्या ये चमत्कार नही था? या थी  उस भोले भंडारी की महिमा जिसके आगे सब नतमस्तक हैं।

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  मुझे पढ़ने सराहने के लिए आप सभी का हार्दिक आभार शुक्रिया नवाज़िश!!!

  aparna….

समिधा -21

 वहीं मेरी मुक्ति है!!!
      वही मेरा मोक्ष है!!!
       वही मेरा निर्वाण……

    उन पंडित की बातों को सुनते शर्मा जी ने उन्हें प्रणाम किया और गाड़ी को आगे बढ़ाने का इशारा कर दिया…..

    कहीं उबड़ खाबड़ रास्ते तो कहीं लंबी चिकनी सड़क, कहीं ताल तलैय्या तो कहीं ऊसर पार करती बस आगे बढ़ती चली गयी।
  पहले दिन कहीं और सीट न मिलने से इत्तेफाक से साथ बैठे देव और वरुण में अब गाढ़ी दोस्ती हो गयी थी।

   दिन रात के इस साथ ने दोनो को ही मैत्री की एक भीनी सी डोर में बांन्ध दिया था। देव के हर वक्त खुश रहने की छूत वरुण को भी लगने लगी थी।
   कभी जब देव खाना बनाने वाले महाराज को एक ओर कर सबके लिए नाश्ता बनाने लगता तब अपनी डायरी एक ओर रख वरुण भी उसका हाथ बंटाने चला आता।
   हंसते बोलते सफर कटता जा रहा था। देव जहान भर की बातें वरुण को बता चुका था। और देव से बातें करते अब वरुण को ऐसा लगने लगा था कि वो देव के घर में हर किसी को भली प्रकार जानने लगा है चाहे वो बाबा हो माँ हो काकी हों लाली हो या हो पारोमिता!

  पारो की शैतानियां उसके पढ़ने की ललक उसकी लजीली मुस्कान सब कुछ बताते हुए देव जैसे खुद पारो हो जाता था….

” इतना प्यार करते हो तो उसे घर पर छोड़ कर कैसे निकल आये ? “

” मेरा घर और घरवाले अभी भी ज़रा पुराने विचारों वाले हैं ना। इसलिए ठाकुर माँ को तीर्थ के लिए लाते समय पारो को भी साथ ले लूँ ये पूछने की हिम्मत ही नही हुई!”

” हम्म ! यहाँ तुम्हारे लिए जितना मुश्किल है उसके लिए भी उतना ही मुश्किल हो रहा होगा, तुम्हारे बिन रहना। “

” उसका तो नही पता लेकिन अब मेरी बेसब्री बहुत बढ़ती जा रही है। “

” अभी से बेसब्री, अभी तो धाम पहुंचें भी नही। वहाँ पहुंचना है फिर वहां से लौटना है तब जाकर तुम्हारा दस दिन का ब्रम्हचर्य व्रत टूटेगा बेटा। तब तक तो सब्र करना ही पड़ेगा। “

” सही कह रहे हो दोस्त। जब साल भर निकाल लिया तो दस दिन क्या हैं? निकल ही जायेंगे… पर आज तक उसके सामने जितना ही संयमी बना हुआ था उससे दूर जाते ही जाने क्यों इतनी याद आ रही उसकी। ऐसा लग रहा नही मिली तो पागल हो जाऊंगा। “

” कितनी अच्छी बात है देव। प्यार ऐसा ही तो होना चाहिए, शायद मेरे और कादम्बरी के बीच इसी आकर्षण की कमी थी। पता नही मुझे कभी उसे छूने का मन ही नही किया”

” करेगा वरुण जिस दिन किसी से टूट कर प्यार हुआ न तो छूना बस क्या सब कुछ करने का मन करने लगेगा। और ये कोई पाप नही है। भैया आत्मा की गहराई से किसी को प्यार करने के लिए उसके शरीर का रास्ता चुनना ही पड़ता है। आखिर इसी देह की आड़ी टेढ़ी गलियों से गुज़र कर ही तो इंसान उस चरम को पाता है जिससे उसकी आत्मा तृप्त होती है और यही तृप्ति आत्मा से आत्मा के लगाव को जोड़ती है तभी तो हमारे समाज में ” विवाह आश्रम की व्यवस्था की गई है आखिर। “

  ” पता नही अब कि