शादी.कॉम-25

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शादी डॉट कॉम-25

     दो दिन कब पलक झपकते बीत गये बांसुरी को पता भी नही चला,तीसरे दिन से टीम द्वारा एक ट्रेनिंग सेशन का आयोजन किया जाना था जिसमें
टीम के अलग अलग सदस्यों द्वारा विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दिया जाना था,हालांकि बैंक के रूटीन कार्य में व्यवधान ना हो इसलिये कुछ चुने हुए बैंक कर्मियों को ही इस ट्रेनिंग सेशन का हिस्सा बनाया जाना था।
      बांसुरी बस इसी चिंता में थी कि उसे इसका हिस्सा बनने मिलेगा या नही।।

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टीम के द्वारा बैंक के सीनियर कर्मचारियों की लिस्ट तैयार कर सिद्धार्थ को दे दी गयी थी जिनमें बांसुरी का नाम नही था ,,पर सिद्धार्थ चाहता था कि बांसुरी भी इस प्रशिक्षण का हिस्सा बने।।बाकी तीन मेंबर्स काफी सीनियर थे इसलिये उसने राजा से ही बात करने की सोची__

” सर आपकी लिस्ट से मेरी सबसे अच्छी एम्प्लायी का नाम गायब है,,,आप एक बार फिर से देख लेते तो अच्छा रहता।।”

” सिद्धार्थ साहब!! ये लिस्ट नायर सर ने बनाई है और मैं उनके निर्णय के खिलाफ नही जा सकता , हमसे काफी सीनियर हैं वो।।”

” मैं समझ सकता हूँ,,पर क्या आप एक बार ट्राई कर सकते हैं प्लीज़,असल मे बांसुरी बहुत कुशल कर्मी है,उसे ये ट्रेनिंग मिलेगी तो वो और चमक जायेगी।

राजा– समझा सकता हूँ,लेकिन……

राजा ने अपनी बात पूरी भी नही की थी कि सिद्धार्थ फिर शुरु हो गया।।

सिद्धार्थ– वो सर बात दरअसल ये है,  की असल में हम शादी करने वाले हैं,,क्या है उसकी भी ट्रेनिंग हो जाये तो हम दोनो के लिये ही अच्छा रहेगा।।

   राजा के हाथ से चाय उसके कपडों पर छलक गयी,उसने सिद्धार्थ की तरफ देखा__

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राजा — कब ?? I mean कब करने वालें  हैं??

सिद्धार्थ- बस जल्दी ही!! हमारी तरफ से तो सब ओके ही है,मेरी माँ को तो बांसुरी बहुत पसंद भी है, जल्दी ही वो शुभ दिन भी आ जायेगा।।

     गलतफहमी!!!ऐसी ही जटिल वस्तु होती है,जिसे हो जाती है वो फिर सामने वाले की प्रत्येक बात को अपने विशिष्ट चश्में से देखने लगता है।।
    हमारी तरफ से सब ओके है में सिद्धार्थ का तात्पर्य उसके और उसकी माँ की तरफ से था,पर राजा ने सोच लिया बाँसुरी और सिद्धार्थ की तरफ से।।
     इस चर्चा के बाद उसे सिद्धार्थ से कोई बात करने का मन नही किया।।

   क्या क्या नही किया था उसने बांसुरी के लिये…..
उस शाम के बाद पलट के देखा भी नही बांसुरी ने , कितनी देर वहाँ बैठा रह गया था,वो तो बाद में बन्टी जबर्दस्ती उठा कर घर ले गया,,पूरे दो दिन ना कुछ खाया ना पिया।।
    तीसरे दिन कैसा तेज़ बुखार आ गया था उसे… सारा सारा दिन एक ही बात तो दिमाग मे चल रही थी,माँ को समझाए या बांसुरी को!!
    दोनो में से एक ने भी उसका साथ दे दिया होता तो क्या ऐसे घुल घुल के रोग पाल लिया होता उसने।।
     इसके बावजूद उसने बांसुरी के इम्तिहान वाले दिन एक चिट्ठी देकर प्रेम को उसके पास भेजा था, फोन करने का तो सवाल ही नही था,ऐसे बुखार मे तप रहा था कि माँ सारा समय उसके सर के पास ही बैठी थी।।।

      प्रेम को कैसा खोटे सिक्के सा फिरा दिया था बांसुरी ने,ना ही उसके खत को पढ़ा और ना जवाब ही भेजा।।
     
     वो तो उसे खुद को पता भी नही चल पाया था कि ज्वर की तीव्र पीड़ा में वो रात भर बाँसुरी का नाम जपता रहा था,और उसकी उसी तड़प ने आखिर अम्मा का कलेजा भी मरोड़ के रख दिया था।।

     बेचारी दिन निकलते ही बन्टी को साथ लिये अपने सारे मान को ताक पर रख बांसुरी के घर भी पहुंच गयी,पर क्या लाभ हुआ आखिर??
     वहाँ उसकी बुआ ने क्या क्या नही सुनाया था अम्मा को___
        ” माफ करना दुल्हीन हमरी बांसुरी की तो नौकरी लग गयी, पढ़ी लिखी जो ठहरी।।देखो बुरा ना मान जाना पर सिर्फ सकल सूरत ही सब कुछ ना होवे है,सोने की प्रतिमा को घर मे सजाया जा सकता है पेट की आग नही बुझाई जा सकती।।छोरी ने तो कह दिया है…सादी करेगी तो अपने जैसे पढ़े लिखे लड़के से वर्ना कन्वारी रह जायेगी।।

अम्मा– क्या सच!! उसने खुद ऐसा कहा??

बुआ– हाँ तो,जो हम झूठ बोलेंगी तो जे जीभ अभी के अभी गल के गिर जाये…..
     जाते जाते एक बात और सुन लो दुल्हीन ,जितना दहेज का लिस्ट तुमने हमे थमाया था ना उतना तो छोरी दो साल में कमा के तुम्हारे चरणों में डाल देती पर सबर कहाँ था तुममें,जाओ अब सम्भालो अपने लल्ला को,कहीं ज़हर वहर ना खा ले।।

    ये सारी बातें और किसी ने कही होती,तो एक बार को राजा अविश्वास कर भी लेता पर वापस लौटने के बाद अम्मा ने ही बन्टी के सामने हर एक बात उसे बता दी थी,,कितना रोयी थी अम्मा उसे गले से लगा के……
      जिस लाड़ले के लिये अम्मा ने अपने स्वाभिमान को नही देखा उस माँ के लिये फिर बेटा कैसे इतना निष्ठुर हो सकता था।।

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    उसे भी समझ आ गया था,बांसुरी कभी उसके जैसे अनपढ़ गंवार से ब्याह नही कर सकती।।
    बांसुरी से ब्याह का उसे भी कहाँ कोई उत्साह रह गया था,बस उसके पीछे से रह गयी थी अम्मा के अपमान की कड़वी घूंट।।
    वो भी पढ़ा लिखा होता बड़के भैया की तरह तो मजाल थी कि बुआ उसकी अम्मा पर इतना कीचड़ उछाल पाती।।

     ठीक है बुआ जी ने जो कहा वो उनकी बुद्धि के हिसाब से कहा __ पर पढ़ी लिखी समझदार बांसुरी को क्या हो गया था,मान लिया की जब बुआ और अम्मा की भेंट हुई तब वो वहाँ नही थी,नौकरी करने दूसरे शहर चली गयी थी,पर क्या उसकी मां या दीदी ने उसे इस बार में कुछ भी नही बताया,, और अगर बता दिया तो क्या दोस्ती के नाते भी एक बार बांसुरी का फर्ज नही बनता था कि हमें फोन कर ले,अम्मा के अपमान के लिये माफी मांग ले।।
    कौन सा पहाड़ टूट जाता,इसे स्वाभिमान नही अभिमान कहा जाता है।।
   ये भी मान लिया कि हो सकता है उसकी माँ और बहन ने ना बताया हो,तो क्या इतना प्रेम भी दोनो के बीच नही था कभी,कि एक बार खुद ही हाल चाल पूछ ले।।

     उसने बांसुरी से जुड़ी किस वस्तु को खुद से अलग किया था ….ना उसने अलग होने की कोशिश की और ना हो पाया।।

    उसे पढाते समय के सारे छोटे छोटे नोट्स जो बांसुरी ने अपनी लेखनी से उकेरे थे,आज भी उसकी कॉपी में वैसे के वैसे दबे पड़े थे।।
     उसे याद है बांसुरी हर दिन पढ़ाना शुरु करने के पहले पन्ने पर सबसे ऊपर ‘राम ‘ लिखा करती थी, क्या उसकी वही आदत आज राजा के जीवन का हिस्सा नही हो गयी थी।।
      उसे खुद को चाय कभी पसंद नही थी,वो तो घर पे हमेशा दूध लस्सी या छांछ ही पिया करता था,वो तो बांसुरी की संगत में चाय की ऐसी लत लगी कि आज तक नही छूटी  और ना वो छोड़ना चाहता है।।

   उसे आज भी याद है ,जब पहली बार बांसुरी को अपनी बुलेट पे बैठाए वो हनुमान जी के मन्दिर गया था,,वहाँ मन्दिर से बाहर निकलते समय एक बूढ़ी अम्मा ने कुछ प्रसाद और फूल के साथ एक रक्षा सूत्र भी उसके हाथ में रख दिया था,उस रक्षासूत्र को बांसुरी ने उसकी कलाई पर बड़े प्यार से बांध दिया था…..
      आज इतने सालों में भी रोज़ रोज़ अपने खुशबूदार साबुन से उसे सुवासित कर उसके जीर्ण शीर्ण कलेवर के बावजूद अपने हाथ में बांधे रखा है।
एक से एक महंगी ब्रांडेड कमीज़ों से होड़ लगाता वह धागा आज भी उसके हाथ में वैसे ही बंधा है जैसा वो बांध गयी थी।।

    उस शाम के बाद सिर्फ उसी के बारे में सोच सोच के कैसा भयानक राज रोग पाल लिया था उसने…..
    दस दिन के ज्वर ने बुरी तरह से तोड़ कर रख दिया था,जब कुछ स्वस्थ अनुभव हुआ तो धीरे धीरे उसने अपने आसपास की दुनिया पर गौर करना शुरु किया,वापस अपना काम शुरु किया ,हालांकि मन तो किसी काम में नही लग रहा था,उस पर सदा सर्वदा बने रहने वाला गरदन का दर्द….
        पूरे छह महिनों तक उसने अपने दर्द को नज़र अंदाज कर दिया था…..
      नज़र अंदाज किया या शायद समझ ही नही पाया कि दर्द शारीरिक अधिक है या मानसिक!! उस पर उसके जाने के बाद किताबों से मोहब्बत सी हो गयी थी,,हर किताब में वही तो नज़र आने लगी थी, चाहे इतिहास हो या भूगोल,उससे इतर कुछ भी कहाँ दिखता था….
     पता नही उसे भूलने के लिये या उसकी यादों में और ज्यादा डूब जाने के लिये वो किताबों में समाता चला गया।।
   
     ऐसी ही एक दोपहर अपने कमरे में एक किताब में सर झुकाये पढ़ते में ऐसी तीव्र पीड़ा उठी की कराह के रह गया,बड़े भैय्या परेशान से उसे लिये डॉक्टर के पास भागे भागे गये थे।।
     सी टी स्कैन,एम आर आई और भी जाने कितनी जांचे हुई थी,और डॉक्टर साहब की बात ने घर भर को कितना डरा दिया था__सर्वाइकल में ब्लैक पैच दिख रहे हैं,या तो टी बी हो सकता है या फिर….. कैन्सर!!!

       अम्मा तो सुनते ही महामृत्युन्जय जाप मे बैठ गयी थी,दादी का रो रो के बुरा हाल था,भैया रात दिन एक कर मुम्बई के सबसे बड़े अस्पताल का अपोइंटमेंट जुगाड लिये थे …..
      कैसा बुरा समय था,जैसे हर तरफ सिर्फ और सिर्फ अन्धेरा ही अन्धेरा छा गया था।।
     उस समय भी एक मन कहता था कि काश बांसुरी वापस आ जाये पर दूसरा मन कहता कि अच्छा ही हुआ जो वो पहले ही चली गयी क्योंकि अगर जिंदगी इतनी छोटी ही थी तो उसके साथ गुजारने के बाद उसे छोड़ कर मरना भी कहाँ आसान होता।।

    ऐसे ही बुरे वक्त में तो लोगों की पहचान होती है, कोई ऐसा दोस्त नही बचा था,जो गले लग के ना रोया हो,वो तो बड़े भैया ने डपट के रोक दिया था वरना प्रेम प्रिंस के साथ साथ लगभग मोहल्ले के 40 लड़के खड़े थे मुम्बई तक साथ जाने के लिये।।
     इतना सब होने पर भी क्या बांसुरी के घर वालों को कोई खबर नही पहुंची थी,और अगर पहुंची भी तो क्या वो लोग इतने निर्दयी थे कि उसे कुछ बताया तक नही!! और अगर इस सब के बाद उन लोगों ने उसे सब बता दिया तो फिर वो इतनी निष्ठुर कैसे हो गयी।।

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     तीन दिन की लगातार एक के पीछे एक हो रही जांचों ने कितना थका दिया था उसे,पर बड़े भैय्या किसी पहाड़ की तरह अडिग उसे संभाले खड़े रहे थे, हर जांच की रिपोर्ट के लिये एक जगह से दूसरी जगह भागते भैया का खुद का वजन एक हफ्ते में गिर गया था,पर उनके चेहरे पे उसने कोई खीज कोई झुन्झलाहट नही देखी थी।।
       कहीं जांच में कैन्सर आ गया तो इस बात से वो खुद कांप रहा था पर भैया का चेहरा आत्मविश्वास से दमक रहा था जैसे उसे बार बार आंखो ही आंखो मे दिलासा दे रहे हों__” छोटे तुझे कुछ नही होने दूंगा, यमराज की गोद से भी तुझे संजीवनी चखा के खींच लाऊँगा।।”
     आखिर भैया के विश्वास की ही जीत हुई,रिपोर्ट्स में बोन टी बी ही निकला।।घर के लोगों ने राहत की सांस ली….
     डॉक्टर की छै महीने की दवा के साथ ही अम्मा जाने कहाँ कहाँ के मन्नत के धागे भभूत क्या क्या नही ले आयी।।
     ऐसा लगने लगा था घर का बेटा नही पूरा घर बीमार है।।
      सभी की साधना सफल हुई,छै महीने की दवा के बाद एक बार फिर सारी जांच हुई और सब कुछ सामान्य आ गया।।
   पर इस पूरे समय अन्तराल में क्या कोई भी एक दिन एक क्षण ऐसा गया जब उसने बांसुरी को याद ना किया हो,,घर वालों के अपार प्रेम के सामने वैसे बांसुरी का कोई मह्त्व नही बचता था पर पागल मन को ये छोटी सी बात सम्झानी बड़ी मुश्किल थी,वो तो अपने पर ही अड़ा था।।

     पढ़ाई और किताबों में उसे दिन रात घुसे देख युवराज भैया ने ही बैंक की तैयारी को कहा और फॉर्म भी भर डाला ।।
     पता नही बांसुरी के जाने के बाद ऐसा क्या हुआ जो वो जब कभी कोई भी इम्तहान देने बैठता ऐसा लगता जैसे बांसुरी का साया उसके ऊपर सवार है, पेपर हाथ में आते ही बांसुरी की आत्मा जैसे उसके अन्दर समा जाती और वो सारे प्रश्न बड़ी आसानी से हल कर जाता,पूरे आत्मविश्वास के साथ।।

     ये आत्मविश्वास असल मे बांसुरी का नही उसका खुद का था,उसके प्रेम का था।।

    उसे खुद को भी नही पता था की अपने आप को रात दिन किताबों में डूबा कर उसने अपने लिये प्रतियोगी परीक्षाओं को कितना आसान कर लिया था।
     ग्रेड बी निकालने के बाद उसे युवराज भैया से उसके मह्त्व का पता चला था।।

  अपनी बिमारी से उठने के बाद उसने कभी बांसुरी के बारे मे पता करने की ज़रूरत नही समझी थी,।।
  बस उसे इतना ही पता था की वो महाराष्ट्र मे कहीं रहती है।।

    पुणे के लिये निकलते समय उसे भैया ने एक बार याद भी दिलाया था__ ” राजा तुम्हारी बिमारी के समय सिद्धिविनायक मन्दिर में नारियल रख आये थे हम कि अब जब भी इधर आयेंगे उनके दर्शन को ज़रूर जायेंगे,अब जब पुणे तक जा ही रहे हो तो एक बार मुम्बई जाकर गणपति बप्पा को धन्यवाद भी बोलते आना।।”

    भैया की बात पहले भी उसके लिये पत्थर की लकीर थी पर अब जैसे उन्होनें उसे अपने बेटे की तरह संभाला था उनकी किसी बात को काटने का सवाल ही नही उठता था।।
     वैसे भी 5 दिन की कार्यशाला में दो दिन ऑडिट और तीन दिन ट्रेनिंग के थे,उसके बाद अगले दिन मुम्बई मे दर्शन कर वही से लौटने के लिये फ्लाईट की टिकट उसने करा रखी थी।।

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   आज सिद्धार्थ के मुहँ से उसके और बांसुरी के रिश्ते के बारे में सुन अनजाने ही उसे अपने बीते साल याद हो आये थे ।।
      भले ही बांसुरी उसे छोड़ कर बहुत आगे बढ़ गयी थी पर क्या आज भी वो वहीं उसी मोड़ पर खड़ा उसका इन्तजार नही कर रहा था।।

       ये साथ गुज़ारे हुए लम्हात की दौलत
    जज़्बात की दौलत ये ख़यालात की दौलत
कुछ पास न हो पास ये सौगात तो होगी बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी…..

यही गाना तो था जो जब कभी रेडियो पर बजता झट अम्मा आकर बन्द कर दिया करती थी,जैसे इस गाने को बन्द कर देने से राजा उन सभी लम्हों से बाहर निकल आयेगा।।

   खैर उसके नौकरी में आते ही घर वालों को लगने लगा था कि वो सामान्य होने लगा है…..
    उनका सोचना किसी हद तक सही भी था,वो सामान्य हो चला था ऐसा तो उसे खुद को तब तक लगता रहा जब तक उसने बांसुरी को देखा नही था।

  पहले दिन जब वो दरवाजा खोल के अन्दर आकर खड़ी हुई,उसे देखने के बाद क्या चाह कर भी वो उससे नजरें हटा पा रहा था…..
     उसे देखते ही सारी रंजिशे कैसे छू मंतर हो चली थी,अपना खुद का हृदय भी अदृश्य रूप से उसीके चरणों में जा बैठा था,,कितनी प्यारी लग रही थी और उतनी ही मासूम!! उसे देख लगा ही नही कि राजा की कोई भी तकलीफ उसे पता थी,क्योंकि अगर उसकी एक भी तकलीफ का पता बांसुरी को होता तो वो कभी उसे छोड़ कर नही जाती ।।

     लंच में उसे दूर अपने दोस्तों के साथ बैठा देख कैसे मन मसोस के रह गया था,कैसी जलन सी उठ रही थी हृदय मे,लग रहा था एक बार गले से लगा लूँ तो सारी जलन दूर हो जाये,ठन्डक पड़ जाये कलेजे में ।।
      पर हाय रे मन!!!होता भले अपना है पर सोचता दुनिया के बारे मे है।।
     अगर मैंने ऐसा किया तो लोग क्या सोचेंगे ,दुनिया क्या सोचेगी ।।और हम रह जाते हैं अपने विचारों के साथ अकेले,एक शून्य में!!
      जिस शून्य से हमें उबारने उसी दुनिया से कोई नही आता जिसके बारे में सोच कर हम अकेले पड़  जाते हैं।

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  सिद्धार्थ के जाते ही नायर सर से बात कर उसने बांसुरी का नाम भी लिस्ट में जोड़ दिया।।
    ट्रेनिंग शुरु हुई,,नारायण सर के लेक्चर के बाद उसे ही वैश्विक अर्थव्यवस्था और मुद्रा के स्थिरीकरण के बारे में बोलना था।।

    बोलना शुरु करने के पहले उसने अपनी वॉलेट में एक बार झांक के उसमें लगी तस्वीर को देखा और राजा से वापस आर के बन अपनी स्पीच बोलने में लग गया।।

     लगातार 3 घन्टे बोलने के बाद वो वापस अपनी सीट पर आ गया,लंच के बाद के सेशन में लोग अपनी क़्वेरीस पूछने वाले थे।।

    लंच में कैन्टीन में माला और राहुल के साथ बैठी बांसुरी  की निगाहें दरवाजे पर ही टिकी थी कि कब राजा आयेगा,,,उसकी टीम  के सद्स्य एक एक कर आते गये,पर वो नही आया।

   क्रमशः

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aparna…

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शादी.कॉम-17

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  “ तुम सिखा रहे हो,तुम सिखा रहे हो
   जिस्म को हमारे रूहदारियां……
   काफिराना सा है,इश्क़ है या क्या है।।”

  गाने के बोलों के साथ ही राजा के मन में भी बांसुरी बजने लगी।।
    कॉफ़ी खतम कर बाँसुरी और निरमा उठ खड़े हुए घर वापसी के लिये।।
    राजा और प्रेम दोनों को छोड़ने बाहर तक आये_

” बंसी आज तुम्हें मेसेज करेंगे,फोन अपने पास ही रखना,तुम इधर उधर रख कर भूल जाती हो।”

  राजा की बात का जवाब बाँसुरी की मुस्कान ने दिया,उसने हँस के सिर हिला के हामी भर दी,और हाथ हिला के बाय करती हुई चल दी।

    घर पहुंचते ही बांसुरी ने फोन को चार्ज पे लगा दिया।।नीचे माँ के साथ रसोई का काम निपटाते भी उसका पूरा ध्यान फोन पर ही था,उसने दो तीन बार अपनी अम्मा से पूछा भी__” अम्मा हमारा फोन बजा क्या”

” नही लाड़ो हमें तो ना सुनाई दिया।”

आखिर सब्र की इन्तिहा हो गयी,बाकी दिनों में  रात के खाने के बाद भी घंटों अपनी माँ के साथ इधर उधर की बतकही करने वाली बांसुरी आज खाना निपटते ही तुरंत ऊपर अपने कमरे में चली गयी।।

  रात के नौ बज चुके थे,पर राजा का कोई मेसेज अब तक नही आया था__” हद दर्जे का भुलक्कड़ है, खुद ही बोला मेसेज करूंगा और गायब है।”
   बांसुरी ने राजा का लास्ट ऑनलाइन चेक किया वो भी शाम का 5 बजे दिखा रहा था,मतलब उसके बाद से राजा ने फोन छुआ तक नही।दिल बहलाने के लिये बंसी ने एक किताब खोल ली,और बिना रूचि के भी उसे पढ़ने के लिये प्रयास करने लगी।पर घूम फिर कर दिमाग फ़ोन की तरफ ही जा रहा था।।
   उसने एक बार फिर फोन उठाया ,साधारण टेक्स्ट मेसेज चेक किया,वॉट्सएप्प चेक किया,कहीं कुछ नही था,समय देखा नौ बजकर दस मिनट हुए थे।।
     ऐसा कैसे हो सकता है ,क्या सिर्फ दस मिनट पहले ही फ़ोन देखा था,पर ऐसा लग रहा जैसे एक घंटा बीत गया हो,उफ्फ आज घड़ी ही पिछड़ गयी है या मैं ही कुछ ज्यादा उतावली हो रही। ऐसा सोच के बंसी को खुद पर थोड़ी शर्म सी आयी और उसने यही सोचा कि इस द्वंद से बचने का उपाय है कि चादर को तान कर आराम से सो लिया जाये,जब मेसेज आयेगा देखा जायेगा।।

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   बांसुरी खिड़की की ओर करवट किये लेट गयी,पर आंखों में नींद कहाँ __ जिन आंखों में सपने बसते हैं उनमें फिर नींद नही रुकती।।
    खुली आंखों से पूर्णमासी का चांद देखते हुए मन ही मन कोई गाना गुनगुनाती बन्सी बड़ी देर तक चंदा को निहारती रही,फिर उसे महसूस हुआ कि अब बहुत रात बीत चुकी है,अब कोई मेसेज नही आने वाला,अब उसे सच में सो जाना चाहिये,पर सोने से पहले पानी पीने को उठी बांसुरी ने सोचा मेसेज तो नही पर हाँ समय कितना हो रहा ये जानना आवश्यक है,उसने मोबाईल पे दिखा रहे समय पे नज़र डाली__ साढ़े नौ

    अरे ऐसे कैसे चमत्कार हो रहा,इतनी देर तक लेटी पड़ी रही और अब समय देख रही तो बस साढ़े नौ!!
क्या उसे लेटे हुए सिर्फ बीस मिनट ही बीता है,उसे लगा मोबाईल की घड़ी सही वक्त नही दिखा रही,उसने दीवार घड़ी पर नज़र डाली,संयोग से वही समय उस घड़ी ने भी दिखाया।।अब क्या किया जाये,,बंसी को खुद पर खीझ भी हो रही थी और गुस्सा भी आ रहा था,ऐसा इतना बेताब होने की क्या ज़रूरत है,ऐसा लगा जैसे खुद से ही कोई युद्ध लड़ रही हो,बन्सी ने उठ कर रेडियो पे एफ एम ट्यून किया और खिड़की पर बैठ गयी__

       “नमकीन सी बात है हर नई सी बात में
        तेरी खुशबू चल रही है जो मेरे साथ में
        हल्का-हल्का रंग बीते कल का
        गहरा-गहरा कल हो जाएगा (हो जाएगा)
       आधा इश्क़, आधा है, आधा हो जाएगा
        कदमों से मीलों का वादा हो जाएगा।।

  गाने को सुनते हुए बंसी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गयी,वहीं लेटे लेटे वो जाने कब सो गयी।।

   अगले दिन सुबह उठते ही सबसे पहले उसे याद आया रात राजा का मेसेज आने वाला था,पर रात जब तक वह जाग रही थी कोई मेसेज नही आया था,उसने लपक के फ़ोन उठाया फ़ोन बन्द पड़ा था….मेसेज देखने की हड़बड़ी में फोन चार्जिन्ग पे लगाना ही भूल गयी।।सुबह सुबह खुद पर ही गुस्सा आने लगा__
       पता नही क्या मेसेज करने वाला था,राजा को भी आजकल क्या हो गया है,क्या ज़रूरत थी ऐसे सस्पेंस क्रियेट करने की,अरे ना बोलता कि रात मेसेज करूंगा,सीधे मेसेज ही कर देता।।

” बंसी ! अरी का बड़बड़ा रही हो सुबह सुबह!! आज तुम नही उठी तो हम ही तुम्हारे लाने चाय बना लाये।।लो पी लो और तैयार हो जाओ,जिम नही जाना का??”

  ” हाँ जायेंगे ना अम्मा!! “

” दस बजे तक तो आ जाओगी ना,तुम्हें नाश्ता करा के फिर हमें गुड्डन के घर जाना है,दस दिन बाद उसका तिलक चढ़ना है,तो आज उसकी अम्मा बुलाई है,सारी तैयारी जोड़ने।।”

” हाँ दस तक तो आ जायेंगे, तुम चले जाना अम्मा  ,हम नाश्ता कर लेंगे, इतनी चिंता ना किया करो।”

  ” अरे काहे ना करे!! अब कुछ दिन में तुम भी बियाह कर चली जाओगी,फिर कहाँ तुम्हारी देखभाल कर पायेंगे,फिर ससुराल वाली हो जाओगी, उनकी मर्ज़ी से आना उनकी मर्ज़ी से जाना, फिर हमारे हाथ में का रहेगा।। अभी अपनी मन मर्ज़ी से तुम्हे खिला पिला तो सकते हैं ।”

” तुम तो ऐसे इमोशनल हो रही हो अम्मा जैसे कल ही हमारा ब्याह हुआ जा रहा??”

  ” सब सकुन साइत सही रहा तो एक महीना में तुम्हरा ब्याह भी हुये जायेगा,तुम्हरे पापा के दोस्त हैं ना वर्मा अंकल उन्होनें एक बहुत अच्छा लड़का बताया है,लड़का रेल्वे में नौकरी करता है,दू जन भाई हैं बस.. ये छोटा है,माँ बाप बड़के  के साथ गांव में रहते हैं ,और ये लड़का यहीं इसी सहर मे रहता है,हमरे लिये भी अच्छा रहेगा तुम यहीं के यहीं बिदा होगी तो।।”

   बाँसुरी सिर झुकाये बैठी चाय पीती रही,अभी इस मौके पे कुछ भी बोलने का उसका जी ना किया,बस बिना किसी कारण के मन खट्टा हो गया।।,उसे चुपचाप देख उसकी अम्मा नीचे गयी और एक फोटो लिये वापस आयी और उसके सामने रख दी…

    ” कैसा है?”

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   बांसुरी का इस बारे में बात करने का बिल्कुल मन नही था पर बात टालने के लिये उसने ” ठीक है” बोलकर पीछा छुड़ाना चाहा और वहाँ से उठ गयी।।उसके बाथरूम में घुसते ही प्रमिला के चेहरे पे हल्की सी मुस्कान दौड़ गयी और फोटो उठाये वो नीचे चली गयी।

             ************************

   इधर बाँसुरी से जाने कैसे राजा बोल तो गया कि मेसेज करेंगे पर रात में अपने कमरे में बैठे जाने कितनी बार हुआ कि राजा  ने मोबाइल उठाया और कुछ लिखा फिर डिलीट किया,फिर लिखा और मिटाया,,यही सिलसिला चल रहा था कि उसकी अम्मा ऊपर चली आयी।।

  ” अरे राजा तुम हियाँ बैठे हो,चलो नीचे तुम्हरी भौजी के बाऊजी आये हैं,रेखा के गमना पे विचार करने ।”

” रेखा के बिदाई से हमारा का लेना देना अम्मा?? हम का करेंगे बड़े बुजुर्गों के बीच??”

   ” तुमको कोनो सलाह मसवीरा के लिये नही बुला रहे,तुम जाओ भाग के पाड़े जी (पण्डित जी) को बुला लाओ।”

  बिल्कुल ही बिना मन के राजा उठा और नीचे उतर गया।
     पाड़े जी को सादर लेकर आया,उन्हें सम्मान पूर्वक घर की बैठक में बैठा कर लम्बे लम्बे डग अपने कमरे की तरफ बढा ही रहा था कि पीछे से बाऊजी ने आवाज़ लगायी __
  
    ” अरे राजा सुनो!! ज़रा चौक से सब के लिये कुल्हड़ वाली रबड़ी ले आओ,समधि जी को बड़ी पसंद है।”

   दिमाग के अन्दर एक ज़ोर का ज्वालामुखी फूटा ज़रूर पर गुस्से का लावा किसी को दिखा नही, चुपचाप अपने मन को समेट राजा वहाँ से जाने लगा तो भाभी के बाऊजी ने उसे आवाज़ लगायी __

   ” राजकुमार!! बेटा रुपये तो हमसे ले जाओ,भई खुशी राजी का मौका है,मुहँ तो मीठा हम ही करायेंगे ना।।”

  ” कैसन बात कर रहे समधि जी, रेखा का हमार बिटिया नही है,जाओ जाओ राजा ,तुम ले आओ।”

  हम रुपये देंगे,हम रुपये देंगे कर के  दोनो समधि उलझे ज़रूर रहे पर पूरे पन्द्रह मिनट भिड़ने के बाद भी किसी की अंटि से अधन्ना भी नही निकला, उन्हें बहस में उलझा छोड़ राजा अपनी बाईक उठा कर निकल लिया,और कुल्हड़ वाली रबड़ी के साथ साथ चौरसिया के यहाँ से बनारसी पान बीड़े का बंडल भी बंधवा लाया,क्योंकि कहीं ना कहीं वो समझ गया था कि इस गोष्ठी का समापन पान के साथ ही होगा।।

    सब कुछ सही हाथों में यानी अपनी अम्मा के हाथों में सौंप के जब राजा ऊपर अपने कमरे में पहुंचा तो देखा बड़े भैय्या उसके कमरे में अपने ब्याज के रुपैये के देयक लोगों की लिस्ट थामे राजा का ही इन्तजार कर रहे थे,उसे देखते ही उसके सामने हिसाब का बही खाता शुरु कर दिया,किसने कितना चुका दिया,किसने कुछ और समय की गुजारिश की ,सब कुछ बड़े भैय्या को समझा बुझा के संतुष्ट करने में लगभग डेढ़ घन्टे और बीत गये।।

” चलो फिर ठीक है,थोड़ा अपने लड़कों को भेज वसूली करा लेना टाईम पे,,हम अब जाते हैं रात बहुत हो गया है,तुम भी सो जाओ,हम देखे ज़रा ससुर जी का क्या व्यवस्था करना है।”

राजा ने हाँ में सिर हिला दिया,भैय्या के जाते ही समय देखा साढ़े ग्यारह हो चुके थे,फिर भी बड़ी आस से राजा ने मेसेज करने फ़ोन निकाला कि नीचे से बड़के भैय्या की आवाज़ आयी।।

” राजा गाड़ी निकालो ज़रा!! पापा जी अभी ही घर निकलने कह रहे,रुकने मना कर रहे,,चलो उन्हें छोड़ आते हैं ।।”

  ” आया भैय्या।”

      लक्ष्मण ने भी कभी राम को किसी काम के लिये मना किया है भला!!

           राजा को पता था कि भाभी का घर लगभग 45 किलोमीटर दूर था,आना जाना मिला कर डेढ़ दो घंटा तो लग ही जाना था,फिर भी बड़े भैय्या की आज्ञा शिरोधार्य कर दोनों भाई समधि जी को छोड़ने निकल गये।।
      वापस आने के बाद थकान से कब नींद लग गयी ध्यान ही नही रहा,सुबह नींद नही खुली और राजा जिम नही जा पाया।।

            ***********************

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    “पहले मैं समझा कुछ और वजह इन बातों की
    लेकिन अब जाना कहाँ नींद गयी मेरी रातों की
    जागती रहती हूँ मैं भी, चांद निकलता नही
    दिल तेरे बिन कहीं लगता नही,वक्त गुज़रता नही।    क्या यही प्यार है….. हाँ यही प्यार है।।”
  

    जिम में ट्रेड मिल पे चलते चलते बांसुरी को 20 मिनट हो गये,वो बार बार पलट कर दीवार घड़ी पे नज़र डाल लेती,समय गुज़रता जा रहा था,जिम की भीड़ बढ़ती ही जा रही थी,सब आ रहे थे बस एक वो ही नही था।।

     एक बार बंसी ऑफिस में भी झांक आयी,पर राजा वहाँ भी नही था,,कल शाम के बाद से कोई बात नही हुई थी,जाने कैसी बेचैनी थी जो रह रह कर गुस्से में बदलती जा रही थी।।
  
    ” क्या यही प्यार है” गीत को सुबह से जाने कितनी दफा प्रिंस से रिवाइंड करवा करवा के सुना जा रहा था,पर भीड़ बढ़ने के साथ ही बंसी ने गाने को वापस बजाने से मना कर दिया।।

  सिर्फ बीस मिनट में ही बंसी बेइंतिहा बोर होने लगी, और ट्रेड मिल से उतर कर ऑफिस रजिस्टर में अपने नाम के आगे साईन कर वहाँ से जाने लगी।।
       
    ” का हुआ बंसी ?? आज और कुछ नही करोगी का?? जल्दी निकल ले रही हो।।”

    ” हाँ प्रिंस!! तबीयत खराब लग रही,इसलिये आज मन नही कर रहा,घर जाकर आराम करेंगे।”
 
   बंसी दरवाजे तक पहुंची ही थी कि दरवाजा खोल राजा सामने खड़ा था।।

   ‘ ये बचपन का प्यार अगर खो जायेगा
     दिल कितना खाली खाली हो जायेगा
     तेरे ख़यालों से इसे आबाद करेंगे
     तुझे याद करेंगे जब हम जवां होंगे जाने कहाँ होंगे’

   गीत के बोल सुनने के साथ दोनो कुछ देर एक दूसरे को देखते रह गये।।

” कल मेसेज काहे नही किये।”

” काहे तुम रस्ता देख रही थी क्या??”

” हम !! तुम्हारे मेसेज का रास्ता देखेंगे,और कोई काम नही है क्या??”

” तो पूछी काहे?”

” ऐसे ही पूछ लिये भई ,कोई पाप हो गया क्या”

” नही नही,कोई पाप नही हुआ,तुम इत्ती जल्दी कहाँ चल दी,चाय तो पी लो।।”

” भैय्या जी बंसी का तबीयत खराब था,इसीसे घर जा रही बेचारी आराम करने।।आईये आपके लिये चाय तैय्यार है।”

राजा ने तबीयत की बात सुन बंसी को देखा और आंखों ही आंखों में हाल पूछा,बंसी ने भी सिर हिला के सब ठीक है कहा और राजा के पीछे पीछे ऑफिस में प्रवेश कर गयी।।

दोनो साथ साथ चाय पीते रहे….फिर राजा ने ही बात छेड़ी __

     “बंसी तुमको पता है ,जैसा तुम हमे सोचती हो ना हम वैसे सीधे सादे लड़के नही हैं ।।बहुत दुर्गुन हैं हममें ।।”

बाँसुरी राजा की बात सुन खिलखिला कर हँस पड़ी

” जैसे?? कोई एक आध दुर्गुण बताओ,हम भी तो जाने।।”

  राजा सिर नीचे किये थोड़ी देर अपना हाथ अपने बालों पे फिराता रहा फिर बड़ी हिम्मत जोड़ के बोलना शुरु किया__

    ” लोगों को डरा धमका के वसूली करते हैं,बड़के भैय्या के ब्याज के पैसों की।।और इस सब में कई बार गाली गलौच सब करना पड़ता है,जवान बुज़ुर्ग किसी को नही छोड़ते,हमारे लिये ब्याज की लिस्ट का एक एक आदमी हमारा दुसमन हो जाता है,।।
पढ़ाई लिखाई का हमारा हाल तो तुमको पता ही है,और इसके अलावा एक और बात है…..”

  ” बोलो राजा!! हम सुन रहे हैं ।”

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   ” हम जब स्कूल में थे ना तब एक लड़की हमे बहुत भा गयी थी,बहुते जादा,उस टाईम तो लगने लगा था उसके बिना जिंदा नही रह पायेंगे पर वो स्कूल बदल कर चली गयी,और हम यहीं रह गये……शायद हम अपनी स्कूल की जिंदगी छोड़ना ही नही चाहते थे इसिलिए फेल होते रहे और स्कूल में ही पड़े रहे,स्कूल में हर जगह उसकी यादें थी।। ,हमे तो अभी कुछ समय पहले तक यही लगता था कि हम अब भी उसिसे प्यार करते हैं,पर कुछ दिन पहले हमें समझ आ गया की वो बचपना था हमारा,,वो तो अपनी जिंदगी में बहुत आगे बढ़ चुकी है,और हमें भी बढ़ जाना चाहिये,तुम जानती हो हम तुम्हें ये सब क्यों बता रहे??”

बांसुरी ने बिना कुछ कहे ना में सिर हिला दिया

” क्योंकि हम चाहते हैं तुम्हारे हमारे बीच कोई बात छिपी ना रहे,तुम्हे सब मालूम होना चाहिये।।
    
        बाँसुरी तुम्हारी आदत सी पड़ गयी है हमें,तुम दो दिन भी जिम नही आती तो जिम ऐसा सुनसान लगने लगता है,जैसे कोई है ही नही यहाँ ।।हमें  पता है तुम्हारे घर वाले तुम्हारे लिये रिश्ता देख रहे,हमारे घर वाले भी!! हमने सोचा किसी अंजान से शादी करोगी उससे अच्छा है हमसे ही कर लो,हम तुम्हारी पढ़ाई लिखाई किसी चीज़ को नही रोकेंगे।।पर हम चाह रहे थे पहले हम अपनी अम्मा से तुम्हरे बारे में बात कर लें ।।
      अगर अम्मा हाँ बोल दी तो ठीक है वर्ना जैसे पहले दोस्त थे वैसे दोस्त ही बने रहेंगे,,क्या बुराई है इसमें ।।”

  बांसुरी अचरज से राजा का मुहँ देखती रह गयी,ये कैसा प्रपोसल था,अगर अम्मा हाँ बोली तो हाँ वर्ना फिर से दोस्त!!! एक बार एक दूसरे को अपने दिल की बताने के बाद क्या वापस पहले जैसी दोस्ती सम्भव है??

बांसुरी बिना कुछ कहे ही उठ गयी और ऑफिस से बाहर निकल गयी,राजा उसके पीछे भागता चला आया__
     ” क्या हुआ बांसुरी?? कोई बात बुरी लगी क्या??हम कुछ गलत बोल गये क्या??”

  ” नही राजा!! तुम्हारी भावनाओं की कद्र करते हैं,तुम बात कर लो अम्मा जी से,क्या बोलती हैं बताना!! हम आज रात तुम्हारे मेसेज का इन्तजार करेंगे।।आज भूलना मत मेसेज ज़रूर करना ।”

” अरे हम तो कल भी नही भूले थे,वो तो घर वाले एक के बाद एक काम पकड़ाते चले गये कि समय ही नही मिला,पर सुनो आज हम अम्मा से बात कर ही लेंगे।।”

दोनों बात कर ही रहे थे कि भैय्या जी का मोबाइल थामे प्रिंस दौडता चला आया__

” भैय्या जी रेखा दीदी का फोन आ रहा है।”

” हेलो!! हाँ रेखा,हाँ साथ ही है,हाँ बोल देंगे,अच्छा लो तुम्ही बोल दो।”

राजा ने फोन बांसुरी को पकड़ा दिया,लगभग पांच मिनट की बातचीत के बाद बांसुरी ने फोन वापस कर दिया__

  ” कल रेखा की बिदाई है,उसीके लिये बुला रही है।”

” तो चलो ना हम सब भी तो जायेंगे कल,तुम भी हमारे ही साथ चलो।”

” और अम्मा जी??” बांसुरी के सवाल पर राजा मुस्कुरा दिया__

” अम्मा तो जायेंगी ही,भई अब तुम्हें रहना तो उन्हीं के साथ है।”

” ओहो हीरो जी इतना उड़िये मत!! अभी उन्होनें हाँ नही की है,,अगर उनकी ना हुई तो हम पहले जैसे सिर्फ दोस्त ही रह जायेंगे,इसलिये थोड़ा जज्बात पे काबू रखिये।।”

   मुस्कुराती हुई बांसुरी घर चली गयी,राजा जिम की ओर पलटा तो प्रिंस खड़े खड़े मुस्कुरा रहा था और प्रेम हाथ बांधे खड़े राजा को घूर रहा था।।

  दोनो से नज़र बचाते हुए राजा अन्दर ऑफिस में चला गया,,कुछ ज़रूरी काम निपटाने के बाद बांसुरी को ” घर पहुंच गयी या नही?” का मेसेज किया और जैसे ही उधर से जवाब आया,एक नया सवाल भेज दिया……दोपहर हुई फिर शाम ढली और रात हो गयी पर राजा और बाँसुरी के सन्देशों का अथक आदान प्रदान चलता रहा।।

    जब एक बार किसी रिश्ते को प्यार की राह में कुछ आगे बढ़ा दिया जाये तब वो वापस दोस्ती के चौक पर पुन: वापसी नही कर पाता,,इस बात से अंजान दोनो नये नवेले प्रेमी शाम भर और फिर रात भर अपनी ही बातों में खोये रहे।।
     बचपन की बातें,घर परिवार की बातें,दोस्तों की बातें,अम्मा ,बड़के भैय्या,रूपा भाभी,वीणा जिज्जी, बुआ जी,पापा का ऑफिस, पिंकी की पढ़ाई, रतन का किस्सा ,निरमा और प्रेम की बातें …..उफ्फ कितनी सारी बातें थी दोनो के बीच।।रात में एक मौका ऐसा भी आया जब दोनों को ही फ़ोन को चार्जींग में लगाये लगाये ही बात करना पड़ा …..
    पर वो रात गुजरते गुजरते दोनो को एक नयी सुबह दे गयी।।

   दोनो में कितना कम सम सा था,और कितनी अधिक थी विषमताएं!! पर फिर भी एक वस्तु थी जो दोनों के पास लगभग बराबर थी!! एक दूसरे के लिये अपार प्रेम और असीम सम्मान!!उस एक कच्चे धागे ने ऐसी मजबूती से दोनों को बान्ध लिया कि अब हर स्वतंत्रता पे ये बंधन भारी पड़ गया।।

             **********************

  ” अब तक सोये पड़े हो लल्ला!! उठो राजू !! देखो समधि जी के घर जाना है आज रेखा का बिदाई है ना,उठो उठो बेटा आठ बज गया है,लो चाय पियो और जल्दी से तैयार हो जाओ।”

    भोर में चार बजे तो प्रेमी जोड़ा थक कर सोया था,आठ बजे अम्मा की आवाज़ सुनते ही राजा उठ बैठा।।आज सुबह भी अलग ही रंग में रंगी थी, मुस्कुरा के अम्मा के गले में बाहें डाले झुलते हुए राजा कुछ गुनगुनाने लगा।।

” बस बस ,लड़ियाओ नही,जाओ बिटवा नहा धो लो।”

” अम्मा तुमसे एक बात पूछनी थी।”

” हां पूछ लेना बाद में,हम जा रहे अभी तैयारी देखने।।” राजा की बात पूरी सुने बिना ही माता जी काम निपटाने भागती चली गयी।।

  नौ बजे तीन तीन गाड़ियों पे सवार अवस्थी परिवार समधियाने की ओर निकल पड़ा, राजा ने पहले ही रूपा को रेखा द्वारा बांसुरी को बुलाये जाने के बारे में बता दिया था,और रूपा को बांसुरी को अपने साथ बैठाने के लिये मना भी लिया था,अपनी गाड़ी में बांसुरी के लिये एक सीट रिसर्व रखे राजा ड्राईविंग सीट पर बैठा खुश था कि अम्मा जी बड़ी सी मिठाई की टोकरी संभाले राजा की गाड़ी के निकट चली आयी ।।

  ” खोलो दरवाजा,,ए राजा ,सुन नही रहे का।’

” अम्मा तुम इसमें बैठोगी क्या?? तुम उसमें भैय्या के साथ बैठ जाओ,बाऊजी भी उसिमे हैं।”

” हाँ पता है तुम्हरे बाऊजी उसमें बैठे हैं तभी तो तुम्हारी गाड़ी में आ गये,खाली तो है एक सीट ।”

  ” अरे अम्मा जी वो बांसुरी है ना लल्ला जी की सहेली वो भी जायेंगी हमारे साथ!! उन्ही के लिये लल्ला जी ….

” अरे बाँसुरी के लिये कब बोले हम भाभी,आप भी कुछ भी बोलती हैं,आओ बैठो अम्मा!! बाँसुरी पीछे भाभी के साथ बैठ जायेगी।।”

  तभी युवराज राजा की गाड़ी के पास चला आया__
” कोई परेशानी छोटे?? क्या बाँसुरी को भी लेना है क्या?? तो ऐसा करो ये रधिया और श्यामा को हम अपनी गाड़ी में ले लेते हैं,चलो तुम दोनो वो फल फुल की टोकरी में उठा के हमारी इनोवा में आ जाओ।”

  एक बार फिर  बड़के भैय्या  अपने लाड़ले छोटे भाई के लिये संकटमोचन बन अवतरित हुए और उसकी उलझन को निपटा चलते बने।।

   बांसुरी के घर के आगे अपनी गाड़ी रोके राजा ने बंसी को फ़ोन लगाया ही था कि प्रमिला दरवाजा खोले बाहर चली आयी,सबको सादर अभिवादन कर उसने बड़े प्रेम से राजा की अम्मा को प्यारा सा उलाहना दिया__
        ” बाहरे से चल देंगी जिज्जी,भीतर नही आयेंगी, सुदामा की  कुटिया में भी जरा चरण फिरा दीजिये।।”

   प्रमिला के स्वभाव में ही मिसरी घुली थी,इससे अंजान सुशीला को यही लगा कि ये अस्वाभाविक माधुर्य सिर्फ और सिर्फ उसके सजीले बेटे को फांसने के लिये ही है,इसिलिए उसने अपने चेहरे को यथासम्भव कठोर दिखाते हुए कड़े शब्दों मे अपनी व्यस्तता की दुहाई दे डाली__

   ” ऐसे जगह जगह रुकते रहे तो बडी अबेर हो जायेगी,आप जल्दी से लड़की को भेजिए,फिर हम निकले।”

  ” चाय पी लेती जिज्जी , बस 5 मिनट ही लगेगा।”

  प्रमिला की विनम्रता सुशीला के तन बदन को सुलगा रही थी

” नही ! अभी तो हो ही नही सकता।” इतने में बांसुरी आसमानी रंग के लहन्गे में सजी संवरी चली आयी, उसे देखते ही राजा के चेहरे पे लजीली मुस्कान चली आयी,होंठों की नाचती कोर अम्मा से कैसे छिपी रह सकती थी,आते ही बांसुरी ने सुशीला को प्रणाम किया __
” हाँ! बस बस!! खुस रहो,,पीछे बैठ जाओ।।

   एक दूसरे में खोये ताज़े ताज़े प्रेमियों को ये रुखाई नज़र नही आयी पर पीछे कोई और भी थी जिसे ये सारा सब कुछ समझ आने लगा था और जो भविष्य में घर में छिड़ने वाले महायुद्ध की प्रस्तावना को मन ही मन तैयार कर आनंदित हो रही थी।।

” हियाँ आ जाओ बंसी !! हमारे पास।” रूपा की चाशनी  पे सास की जलती हुई नज़र भी कडवाहट ना ला पाई

  बांसुरी ने आंखों ही आंखों में राजा से इजाज़त ली, राजा ने पलकें झपका कर इजाज़त दी और बांसुरी पीछे चली गयी…..कुछ देर पहले का पुत्र की बगल वाली सीट पर विराजमान होने का मातृ विजय गर्व चकनाचूर हो गया।।

    इत्ता सुन्दर गोरा चिट्टा सजीला सा लड़का!!!
  कुछ सोच समझ कर ही सुशीला ने अपने दोनों लाड़लों का नाम रखा था,दोनो ही तो दिखने सुनने में राजा राजकुमार ही लगते थे….जैसे उंचे पूरे वैसा ही गठीला कसरती बदन,उसपे बिल्कुल पिघले हुए सोने सा लपटें मारता रंग…..राजा को इस सांवली सी बित्ते भर की लड़की में क्या भा गया ऐसा,ठीक है बामण घर की छोकरी है,पर है तो सरजूपारीन, राजा के बाबूजी कभी ना मानेंगे,कहाँ हम कानपुरिया बीस बीसवां कान्यकुब्ज बामण और कहाँ ये लड़कोरि।।
  किसी भी कीमत पर अपने लल्ला को इस बिदेसिनी से बचाना ही पड़ेगा।।

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    सुशीला अपनी सोच में मगन थी,,राजा ने गाड़ी में गाने बजा दिये….

   ” जब से तुम्हारे नाम की मिसरी होंठ लगायी है
      मीठा सा गम है और मीठी सी तन्हाई है….
      रोज़ रोज़ आंखो तले एक ही सपना चले…”

    गाड़ी अपनी गति से गन्तव्य की ओर बढ़ती चली गयी।।।

क्रमशः

aparna..

शादी.कॉम -15

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  “ शाही जोड़ा पहन के आई जो बन ठन के वही तो     
मेरी स्वीटहार्ट है,  शरमाई सी बगल में जो बैठी है दुल्हन के….”

   जिम में  मस्ती के मूड़ में गाना बज रहा था,सभी अपने अपने क्रिया-कलापों में व्यस्त थे,राजा कभी किसी को कुछ बताता,कभी किसी को।।कभी किसी की स्पीड सही करता,कभी किसी के वेट सही करता इधर से उधर चक्कर लगा रहा था,साथ ही घड़ी पर भी नज़र डाल लेता,,आज 9.30 हो चुके थे पर समय की पाबंद बांसुरी अब तक जिम नही पहुंची थी।।
     ऐसा तो वो कभी नही करती थी,इन चार पांच महिनों में राजा इतना तो बन्सी को जान ही गया था, अगर कभी उसे ना आना हो,या कोई काम हो तो वो बाकायदे राजा को मेसेज कर के बता देती थी, पर आज बिना कुछ बोले बताये ही गायब थी।।

   एक एक कर पूरे दो घन्टे बीत गये,पर बांसुरी नही आई।।अब राजा सोच मे पड़ गया,कुछ तो बात है।।

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    वो पूरा दिन सिर्फ सोचने सोचने में ही बीत गया।
जब कभी दोस्ती प्यार में बदल जाती है तब दिल तो मजबूर होता है पर दिमाग कुछ अधिक कार्य करने लगता है,दिमाग का ध्यान सारा समय इसी बात पे रहता है कि दिल की कमजोरी किसी के पकड़ मे ना आ जाये,और इसी अतिरिक्त सतर्कता के कारण जो बात किसी ने सोची भी ना हो सब के सामने आ जाती है।।
    ऐसे किसी भी बात पे चट से बाँसुरी को फ़ोन करके पूछने वाले राजा भैय्या ने उस दिन बार बार चाहते हुए भी बांसुरी को फ़ोन नही लगाया।।

” का हुआ भैय्या जी आज बांसुरीया नही आई।” प्रेम के पूछते ही राजा भड़क गया

” अबे हमे का पता बे,तुम तो ऐसे पूछ रहे जैसे वो हमे सब बता के ही करती है,,कॉलेज वॉलेज में काम होगा,नई आ पाई,इतना काहे बखेड़ा बना रहे।”

” हमने कहाँ  बखेड़ा बनाया,हम तो पूछ रहे बस।आज तो कॉलेज भी नही गई रही।”

” तो हम का करे,नही गयी तो नही गयी।।तुम हमारा सर काहे खा रहे।।”

” नै भैय्या जी हम बता रहे बस,,आपने कहा ना कॉलेज वॉलेज में काम होगा,इसिलिए बता रहे कॉलेज तो गई ही नही।”

” प्रेम तुम्हें कैसे पता।” प्रिंस को राजा की हालत का कुछ कुछ आभास हो चला था

” अरे हम अपनी वाली के चक्कर में जाते तो हैं ही ना,तो आज वहीं कॉलेज में निरमा अकेली ही दिखी हमे,,बांसुरी कॉलेज गयी होती तो दोनो जनी साथ ही होतीं ।”

भैय्या जी ने सामने तो बिल्कुल यही दिखाया की उन्हें कोई विशेष फर्क नही पड़ा इस जानकारी से,पर मन ही मन में उथल पुथल मच गई कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो बांसुरी ना ही जिम आयी और ना कॉलेज गई ।।

  इसी उधेड़बुन में वो दिन बीत गया,उसके बाद के दो और दिन बीत गये,पर इन कुल जमा तीन ही दिनों में राजा को ये समझ आ गया कि बांसुरी अब सिर्फ एक दोस्त,एक गाइड या एक जिम स्टूडेंट भर नही है, बल्कि वो उससे कहीं अधिक विशिष्ट स्थान रखती है।।जाने अनजाने राजा को पता ही नही चला कि कब सांवली सलोनी बांसुरी उसके हृदय आसन पर अपने समस्त आयुधों के साथ विराजमान हो गयी।

बहुत कठिनाई से खुद को समझा बुझा कर राजा ने रात मे निश्चित किया कि कल सुबह किसी बहाने से बांसुरी के घर जाना ही पड़ेगा,ऐसा सोचते ही एक सुखद अनुभूति के साथ राजा के चेहरे पे मुस्कान बिखर गयी और वो उसे याद करते करते सो गया।।

  जो काम दोस्ती के समय बहुत आसान होते हैं वही प्रेम का आभास होते ही अति दुष्कर होने लगते हैं ।
 
       जो राजा कभी किसी भी समय बांसुरी को फ़ोन कर लेता था,कभी भी मुहँ उठाये उसके घर पहुंच जाता था,वो आज ना तो उतनी आसानी से फ़ोन कर पा रहा था,और ना ही उसके घर जा पा रहा था।।
प्रिंस जो सदा राजा के साथ छाया सा लगा डोलता था,उसे राजा की अवस्था समझने में बिल्कुल भी देर नही लगी,वो अपनी बुद्धि अनुसार सब सही करने की कोशिश करने लगा।।

” भैय्या जी हमको लगता है बन्सी की तबीयत सही नही है,आपको क्या लगता है??”

” अरे हमे क्या मालूम,हम कोई ज्योतिष हैं जो बिना बताये सब जान ले।”

” नही भैय्या जी हमारे कहने का मतलब था कि एक बार क्यों ना बांसुरी के कॉलेज चल के उससे मिल लिया जाये,क्या है ना हम घर भी जा सकते हैं,पर बंसी की बुआ आपपे कुछ जादा ही फिदा है,इसिलिए हम कह रहे कॉलेज चलने की,हो सकता है थोड़ी बहुत बीमार हो ,जैसे सर्दी वर्दी तो उसमे कॉलेज जा रही हो,पर जिम नही आ रही।।”

” तुम्हें बड़ी चिंता हो रही मुटल्लो की,हैं काहे भई ?”

प्रेम के कटाक्ष पे प्रिंस भड़क उठा _ ” काहे नही होगी बे !! बहन मानते हैं उसको।।इत्ती अच्छी लड़की से बिना मतलब जले भुने बैठे हो, चले भैय्या जी।”

” अब तुम इत्ता जिद कर रहे हो प्रिंस तो चलो !! पर हमें काम बहुत सारा है,चलो कोई बात नही,अब तुम्हे चिंता हो रही तो देख ही आते हैं ।।”

रॉयल एनफील्ड में पीछे बमुश्किल प्रिंस और प्रेम को ऐडजस्ट कर राजा ने राजकीय कॉलेज की तरफ बुलेट भगा दी।।

फेडेड ब्लू डेनिम और सफेद शर्ट पे दोसा कबाना के गॉगल्स चढ़ाये राजा भैय्या ने जब कॉलेज के अन्दर बाईक पे एन्ट्री मारी तो बिल्कुल धूम वाला समा बान्ध दिया,ऐसा लगा जैसे बैकग्राउंड पे गाना बज रहा हो_

       “Dhoom again and run away with me on a roller coaster ride
        dhoom again and see your wildest dreams slowly come alive……dhoom machaale….”

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   लड़कों की आंखों मे जलन थी,तो लड़कियों की आंखों में तारीफ और उत्सुकता कि आखिर इतना हैंडसम बंदा मिलने किससे आया है।।

  प्रेम उस कॉलेज का ना होकर भी कॉलेज के चप्पे चप्पे से वाकिफ था,वो पार्किंग में गाड़ी खड़ी करवा कर भैय्या जी को लिये कैन्टीन में आ गया।।
   निरमा के मामा जी को नाना जी की बीमारी के कारण वापस जाना पड़ा,और निरमा एक बार फिर बांसुरी के साथ कॉलेज आने जाने लगी थी,पर कॉलेज के अलावा कहीं भी निकलने की मनाही के कारण निरमा जिम नही जा पा रही थी।।

  एक तयशुदा समय पर निरमा और बांसुरी कैन्टीन आते थे,पहले कैन्टीन में भकाभक समोसे आलू गुंडे पेलने वाली बांसुरी आजकल सिर्फ वर्जिन मोइतो ( नीम्बू पानी) से काम चला रही थी,आज भी दोनो अपने तय समय पर कैन्टीन को चल दी।।

इन्तजार का फल मीठा होता है,ये राजा को अपने जीवन मे उस दिन पहली बार समझ आया।।पूरे तीन दिन के बाद उसे बांसुरी दिखाई दी थी,दूर से पीले कुर्ते पे गुलाबी दुपट्टा ओढ़े नीचे सर किये चुपचाप आती बांसुरी को देख पहले पहल तो राजा को ज़ोर का गुस्सा आ गया__” कॉलेज आने का समय है,इधर उधर जा सकती हैं मैडम पर जिम आने का समय नही!!! अरे कुछ काम है ना आओ! पर एक फ़ोन करने में भी महारानी जी का हाथ दुख गया।”
पर प्रकट में राजा ने ऐसा कुछ नही कहा,हाँ ध्यान से देखने पर उसे बांसुरी बहुत थकी सी दुखी सी लगी।।

  बांसुरी और निरमा के वहाँ पहुंचते में प्रेम कूद कर निरमा तक पहुंच गया,दोनो आंखों ही आंखों मे मुस्कुरा उठे,उन्हें सादर अपनी सीट तक लाकर निरमा के लिये एक कुर्सी खींच प्रेम उसके बाजू वाली कुर्सी पर बैठ गया,तब जाकर कहीं बांसुरी ने राजा को देखा__” अरे राजा तुम यहाँ कैसे??कॉलेज में कुछ काम था क्या?”

” अरे कहाँ?? भैय्या जी तो तुम्हे ही…..” प्रिंस की बात को आधे मे ही काट कर राजा ने अपनी बात बांसुरी के सामने रख दी।।

” हाँ वो एक लड़के के एडमिशन की बात करने आये थे,तो सोचा तुम्हारा भी हाल चाल ले लें ।कैसी हो बाँसुरी ??”

राजा के “कैसी हो बांसुरी “पे जाने क्यों बांसुरी की आंखें छलक आईं जो राजा के सिवा कोई ना देख सका।।
     जब कोई रोता होता है तब उस समय अगर कोई सांत्वना से भरा हाथ कंधे पर रखे और चुप कराने की कोशिश करे तो आंसू और भी ज्यादा ज़ोर शोर से बहने लगते हैं,वैसे ही जब कोई सबसे बड़ा शुभचिंतक हितैषी ऐसे समय पर हाल पूछे जब वाकई हाल अच्छा ना हो तो दिल का दर्द आंखों के रास्ते बहना लाजिमी है।।बस वही बन्सी के साथ हुआ।।
   पर बांसुरी दिल की कच्ची लड़की नही थी,उसे अपना दुख दुनिया को दिखाना सख्त नापसंद था,इसिलिए उसने निरमा से भी अपने दिल का हाल नही बताया था,पर आज राजा को एकबारगी सब कुछ बताने को वो व्याकुल हो उठी,पर यहाँ कैन्टीन में सबके सामने उसके लिये कुछ भी बोलना बताना बहुत कठिन था,उसने एक पूरी नज़र राजा पे डाली,  राजा ने आंखों से ही बन्सी के मन की बात पढ़ ली,वो समझ गया कि बांसुरी उसे कुछ बताना चाह रही है।।
    
        इतनी देर में एक दूसरे में खोये प्रेम और निरमा अपनी बातों में लगे थे,निरमा अपने घर पर उसके ऊपर हो रहे अत्याचारों को बढ़ा चढ़ा कर प्रेम से बता रही थी,कि कैसे वो जब भी शाम को छत पर प्रेम की एक झलक पाने के लिये चढ़ती है तो पीछे से उसकी अम्मा ठीक उसी वक्त सूखे कपड़े निकालने छत पर पहुंच जाती है,कैसे जब निरमा रेडीयो पर__

    “ आते जाते हँसते गाते सोचा था मैंने मन में कई बार,वो पहली नज़र हल्का सा असर करता है क्यों इस दिल को बेकरार…..” सुनते हुए प्रेम को याद कर कर के मुस्कुराती है तो उसकी अम्मा आ कर रेडियो पे भजन वाला चैनल सेट कर जाती है__

  “ राधे राधे रटो चले आयेंगे बिहारी।।”
 
कैसे जब निरमा खिलती चांदनी में खिड़की पर खड़ी होकर चांद मे अपने प्रेम का चेहरा देख देख शर्माती है तब उसकी अम्मा आ कर खट से खिड़की बन्द कर जाती है, कैसे जब लौकी और तोरी की सब्जियों को देख कर निरमा मुहँ बनाती है तो अम्मा ताना मार जाती है कि ‘ हाँ अब हमरे हाथ का कुछु काहे भाये,जो बना रहे चुपचाप खा लो,जब अपना घर अपनी गिरस्ती होगी तो पका लेना अपने मन का।।”इसी तरह के तानों उलाहनो के बीच जीवन कैसा कठिन हुआ पड़ा है और अब प्रेम ही है जो निरमा के जीवन के बिखरे रंग समेट कर उसके जीवन के कैनवास को एक खूबसुरत तस्वीर मे बदल सकता है।।
  
   ये प्रेमी जोड़ा अपने में लीन, दीन दुनिया से बेखबर था,राजा भैय्या ने ये नोटिस कर लिया ,उन्होनें प्रिंस को पानी की बोतल लाने भेजा और अपनी कुर्सी बांसुरी की तरफ खींच ली।।

” अब बताओ क्या हुआ?? जिम क्यों नही आ रही आजकल??”

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राजा की गहरी आवाज़ और उससे भी गहरी ये बात सुन कर बांसुरी विहल हो गई

” यहाँ नही बता पायेंगे।।”

” फिर कहाँ?? बोलो,, कहीं बाहर मिलना चाहती हो।”

बांसुरी ने आंखें उठा कर राजा को देखा और हाँ मे सर हिला दिया

” कहाँ?? रॉयल पैलेस आ जाओगी अकेले??

बांसुरी ने फिर हाँ में सर हिला दिया।।बांसुरी की चुप्प्पी ने राजा के मन मे हाहाकार मचा दिया,आखिर ऐसी कौन सी गुम चोट खा ली जो इतनी चुपचाप सी हो गई,कहाँ तो बांसुरी को अधिक बोलने पर टोकना पड़ता था और कहाँ आज हाँ भी बोलने के लिये मुहँ नही खोल रही।।
       राजा का मन ऐसे कचोटने लगा कि कुछ भी कर के बांसुरी के दुख को दूर करना ही है,उसे ऐसी गुमसुम नही देख सकता।।प्रिंस के पानी की बोतल लेकर आते ही राजा उठ गया।

” ठीक है फिर हम चलते हैं अभी!! अपना ध्यान रखना बांसुरी ।।”

” अरे जिस काम से आये थे,वो तो कर लो।।एडमिशन ऑफिस उधर है।” बांसुरी ने एक तरफ को इशारा कर दिया,उसकी उंगली की दिशा में देखने के बाद मुस्कुराते हुए राजा ने बांसुरी को देखा_

” हम जिस काम से आये थे,वो हो गया बांसुरी,कल शाम 4 बजे मिलतें हैं फिर,,आ तो जाओगी ना।।”

हाँ मे सर हिला के बांसुरी चुपचाप खड़ी राजा को जाते देखती रही।।

रात में राजा अपने कमरे की खिड़की पे खड़ा बाहर खुले आसमान में चमकते चांद को देख सोच रहा था,हो सकता है बाँसुरी भी इस वक्त अपनी खिड़की पे खड़ी चांद देख रही हो,चलो अच्छा है इसी चांद के बहाने ही सही निगाहें तो मिल रही हैं ।।
   कहीं दूर एक गाना बज रहा था_

    “ सुनो किसी शायर ने ये कहा बहुत खूब ,
      मना करे दुनिया लेकिन मेरे मेहबूब
      ही जाता है जिस पे दिल आना होता है
       हर खुशी से हर गम से बेगाना होता है।
       प्यार दीवाना होता है मस्ताना होता है….”

 
       ******************************

  ” राजा!! उठो, आज बड़ी अबेर कर दी उठने में,ऐसे तो रोज़ भोरे उठ के दौड़ लगाने चले जाते हो आज सात बज गया ,अभी तक सो रहे,तबीयत तो ठीक है ।।” ऐसा कहते हुए राजा के माथे पर उसकी अम्मा ने हाथ रख कर ठेठ हिन्दुसतानी स्टाइल में बेटे का बुखार चेक किया।।

  शरीर का ताप हो तो पकड़ भी आये,मन के ताप का कहाँ निपटारा!!!

   रात बड़ी देर तक जागती आंखों के सपनों में विचरते हुए राजा को सोने में देर हो गई,सुबह सुबह रोज़ का अलार्म बन्द कर वो वापस सो गया,और सोता ही रह गया,वो तो अम्मा की आवाज़ से नींद टूटी,सुबह सुबह अम्मा को अपने कमरे में देख उसके चेहरे पे एक बड़ी सी मुस्कान आ गयी,अम्मा के हाथ से चाय लेकर वो चुपचाप पीने लगा।।

” का हुआ लल्ला? आज बहुते खुस लग रहे,कोई हड़बड़ी भी नही है तुम्हें जिम जाने की।।”

” जायेंगे अम्मा जायेंगे!!! सुबह सुबह तुम्हरे दरसन हुए, तुम चाय लिये सीधा कमरे में चली आयी ,ये सब खुशी का कारण नही हो सकता का??” हँसते हुए राजा पलंग से उतर बाहर निकल गया।।

  जिम में ऑफिस में अपना काम निपटाता राजा मन ही मन खुश था ,आखिर बांसुरी की उदासी का कारण पता चलेगा तो उसे दूर करने का कुछ उपाय भी कर पायेगा।।सुबह से जाने कितनी बार अपने हाथ में बंधी राडो पे समय देख चुका था,पर भई घड़ी चाहे रिको हो टाइटन हो या राडो दिखायेगी तो एक ही समय!!
      दिल ही दिल में एक हल्का सा डर भी था कि जाने क्या बात होगी जो बांसुरी जैसी दुरुस्त दिल लड़की ऐसी गुमसुम हुई पड़ी थी।।
    अपने विचारों में खोया राजा अपना काम निपटा रहा था कि दरवाज़े पे हल्की सी दस्तक हुई__

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” हम अन्दर आ जायें राजा!!”

राजा ने सर उठा के देखा सामने बांसुरी खड़ी थी

” अरे पूछने की क्या ज़रूरत ,,आओ आओ अन्दर आओ,,बैठो ।।”
  बाँसुरी आ कर राजा के सामने बैठ गयी,दोनो ही लोग बात शुरु करने का बहाना ढूँढ रहे थे,आखिर बांसुरी ने ही चुप्पी तोडी__

” राजा तुमसे कुछ कहना चाह रहे थे,कल तुमने पूछा था ना,उसी बारे में …..बस सोच रहे कि कैसे बोलें ।”

” कैसे मतलब? अरे जैसे बोलते हैं बतियाते हैं वैसे ही बताओ,,बात क्या है आखिर?? तुम इतनी उदास चुपचाप सी क्यों हो?”

” राजा तुम्हें भास्कर सर के बारे में बताया था ना? हमारे गणित के लेक्चरर!!जिन्हें हम पसंद करते थे।”

” हाँ हाँ!! क्या हुआ उन्हें ” राजा का दिल ज़ोर से धड़कने लगा

” उन्हें कुछ नही हुआ,,बिल्कुल ठीक हैं वो”

” फिर?”

” कैसे बतायेँ राजा!! वो भास्कर सर हैं  ना,वो असल में शादीशुदा निकले!!” ये बोलते ही बांसुरी का चेहरा मुरझा गया उसकी आँख से दो बूंद आंसू लुढ़क कर उसके गालों तक चले आये।।और राजा के दिल में सरगम बजने लगी।।

    “अपने आप को सम्भालो बांसुरी!! हमे तो नाम सुन कर ही ये लड़का तुम्हारे लिये ठीक नही लगा था,अब ऐसा भी क्या बन सँवर के कॉलेज आना कि मासूम नादान लडकियों को यही ना समझ आये कि सामने वाला शादीशुदा है,,ये तो सख्त बदतमीजी है नामुराद की।”

‘” अरे तो लड़कों का समझ भी कैसे आयेगा,वो ना तो सिन्दूर लगाते ना मंगलसूत्र पहनते।”

” तो क्या हुआ,पर चेहरा लटका हुआ तो रहता है ,घर से बीवी की डांट खा के जो निकलते हैं,,खैर वो सब छोड़ो,तुम खुद पे ध्यान दो ,इतनी अच्छी हो तुम्हे सच बहुत अच्छा लड़का मिलेगा।।” बांसुरी को समझाने के साथ ही राजा ने सामने लगे आदमकद आईने में खुद को देखा और मुस्कुरा दिया,,उसके मन में जलतरंग बज उठी।।
     
   
            “आ मैं तेरी याद में सबको भुला दूँ
    दुनिया को तेरी तसवीर बना दूँ
            मेरा बस चले तो दिल चीर के दिखा दूँ
    दौड़ रहा है साथ लहू के प्यार तेरा नस-नस में
ना कुछ तेरे बस में जूली ना कुछ मेरे बस में
      दिल क्या करे जब किसी को किसी से प्यार हो जाये।।”
 
  उसी समय दरवाजा खोल कर दो कप चाय लिये प्रिंस भीतर आया ,,अन्दर आते ही उसे आभास हुआ की जिम में  ‘ दिल क्या करे बज रहा है’ वो चाय रख वापस मुड़ गया_
         ” भैय्या जी अभी गाना बदल देतें हैं ।”

  ” काहे बे,,काहे बदलोगे गाना,इत्ता सुरीला गाना बदल दोगे,ससुरे तुम भी एक नम्बर के बकलोल हो।

  प्रिंस को कुछ समझ नही आया,वो अपना सर झटकता बाहर चला गया,राजा बाँसुरी की तरफ घूम गया,वो अभी भी गुमसुम सी थी,पर राजा की खुशी संभाले नही संभल रही थी,उसने अपने मन के भावों को मन तक ही सीमित रख अपनी ज़बान को भरसक उदास करते हुए बांसुरी को सांत्वना देना शुरु किया।।

” अरे तो का हुआ बांसुरी,शादीशुदा हैं तो इसमें कौन बड़ी बात हो गयी ।”

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” अच्छा तो ये तुमको बड़ी बात नही लग रही???” अरे बुद्धू राम ! अब जब उनकी अपनी घरवाली है तो वो हमे काहे देखेंगे,चाहे हम कितनी भी सज धज मचा लें, उन्हीं के लिये दुबली होना चाहते थे,इसिलिए जिस दिन पता चला उसी दिन से जिम आना बन्द कर दिये,पर ….”

” पर क्या बांसुरी??”

” पर ये कि अब हमको भी तुम्हारे जिम की थोड़ी थोड़ी आदत सी लग गयी है,,अब दो तीन दिन वर्क आउट नही करते हैं तो अच्छा नही लगता,,कल कॉलेज में तुमसे मिल कर घर लौटने के बाद हम सोचते रहे और फिर ये फैसला किया कि हम तुम्हारा जिम नही छोडेंगे।।”

” वाह बहुत ही अच्छा सोची,पर ये बताओ कि जिम नही छोड़ोगी या भैय्या जी का जिम नही छोड़ोगी?

प्रिंस के सवाल पर बांसुरी ने घूर के प्रिंस को देखा और __” ना तुम्हारे भैय्या जी को छोडूंगी ना उनका जिम ।।अब तो जब तक राजा लॉ पास कर के लॉयर ना बन जाये मैं ये जिम नही छोडून्गी।।

” ये हुई ना बात” प्रिंस की तालियों से ऑफिस गूँज गया।।।

राजा भैय्या के मन की खुशी पूरे उत्साह से उनके चेहरे को अबीरी कर गई ।।

” तो बाँसुरी फिर शाम का क्या प्लान है??”

” शाम का प्लान?? वही है 4 से 5 तुम्हें पढायेंगे,और क्या??”

” अरे नही!! हम तो होटल में मिलने के बारे में पूछ रहे थे।”

” अब यहीं तो सब कुछ बता दिये,अब क्या ज़रूरत होटल में मिल के पैसे उड़ाने की,अब तुम्हारे एग्ज़ाम को भी समय कम बचा है,,पढ़ाई पे पूरा पूरा ध्यान देना है,समझे!! ये घुमाई फिराई थोड़ा बन्द करो अब।।जब देखो तब फटफटी में उड़ते फिरते हो।।”

राजा  नीचे सर किये हाँ में सर हिलाता मुस्कुराता रहा,दोनो ने अपनी अपनी चाय उठाई और मुस्कुराते हुए पीने लगे।।

बाहर जिम में नया ट्रैक बज रहा था__

   “ शुद्ध देसी देसी देसी रोमांस …..हाय रे!!
      हाय रे क्रेज़ी क्रेज़ी क्रेज़ी रोमांस …..

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क्रमशः

aparna..

शादी.कॉम -5

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  “अम्मा जी खीर बना के रख दिये हैं,और कद्दू भी छौंक दियें हैं,ये देख लिजिये पूड़ी का आटा,इत्ता हो जायेगा कि और ले लें ।।”

  रूपा यानी युवराज अवस्थी की दुल्हनीया और राजा भैय्या की भाभी आज बड़ी प्रसन्न हैं,हो भी क्यों ना !! आज उनके पिता और भाई शाम के भोजन पर उन सब से मिलने आ रहे हैं ।।
    गिरिधर शास्त्री यानी रुपा के पिता कभी कोई काम निराधार नही  करते ,,उनके हर कार्य के पीछे लम्बी चौडी योजना होती है।।
      गिरिधर शास्त्री का भी शहर में अच्छा खासा नाम है,उस ज़माने के वकालत पढ़े हैं,भले ही प्रैक्टिस ना करें पर मोहल्ले भर के फ़्री के पटवारी हैं,किस की ज़मीन कहाँ अटकी भटकी पड़ी है,उसे कैसे पार लगाना है आदि आदि के आँकड़े उनके जिव्हाग्र पे हमेशा अंकित रहते हैं ।।
     किसी के मिट्टी के मोल बिकती जमीन पे उन्होनें करोडों का नफ़ा करवाया है तो किसी के सदियों से फंसे वकालती विरासत के मामले को चुटकियों मे यूँ सुलझा के रख दिया,जैसे कोई मसला था ही नही।।

  पहले पहले तो कुछ लोगों ने उनपे तंज कसने ही उन्हें वकील बाबु कहना शुरु किया पर धीरे धीरे बच्चे बूढ़े सभी के लिये वो वकील बाबु बन गये,यहाँ तक की उनकी अपनी खुद की सगी बीवी भी उन्हें वकील बाबु ही बुलाती है।।
     और जब जब वो अपने पल्लू के ओट से उन्हें मीठी सी झिड़की के साथ ‘ओकील बाबू’ बुलाती ,वकील बाबू खुद को कहीं का मजिस्ट्रेट समझने लगते ,और इसी समझने समझाने में तीन तीन लड़कों के साथ दो दो बिटिया भी घर के आंगन को निहाल करने लगीं ।।
   दो बड़े भाईयों के बाद रुपा फिर रेखा और फिर एक छोटा भाई नाहर।।

    राधेश्याम अवस्थी के बड़े पुत्र युवराज को एक बार उन्होनें पटवारी कार्यालय में अपने पैट्रोल पम्प के कागजों के लिये माथा पच्ची करते देखा था,और वो गोरा चिट्टा उंचा नौजवान उन्हें अपनी बड़ी के लिये भा गया था,बस उन्होनें पूरे परिवार की जन्मकुण्डली बांची और चट मंगनी पट ब्याह निबटा दिया।।
      इधर कुछ दिनों से वो रेखा के ब्याह के लिये घर वर ढूँढ रहे थे।।ऐसे ही कभी मायके आई रुपा ने अपनी माँ के कान मे रेखा और राजा भैय्या के रिश्ते की बात डाली थी…
     जब पति को रात दिन एक ही उलझन मे परेशान देखा तो एक रात श्रीमती जी ने खाने की थाली में आलू मेथी के साथ अपना आइडिया भी परोस दिया-
  “ए जी सुनो!! हम का कह रहे,ई बिटिया का देवर है ना ,राजा!! हमरी रेखा के लिये उसका रिस्ता काहे नई देखते,घर का घर में ही रिस्ता हो जायेगा, वैसने पहली बार में इत्ता सारा दे चुके हैं अब दुसरी में थोड़ा राहत हो जायेगा।।””

   गिरिधर शास्त्री बाहरी बातों में औरतों का हस्तक्षेप अच्छा नही मानते थे,पर इस बात में उन्हें थोड़ा दम लगा।।

“राहत हो जायेगा से मतलब का है तुम्हरा।”

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“अरे रूपा के टाईम जो सोफा आलमारी फिज टीवी दिये रहे ,ऊ अब रेखा के टाईम देने की का ज़रूरत।
एकै घर मा दू दू ठो सोफा दू दू फ्रिज का करेंगे समधि ।”

“अच्छा ऐसा बोल रही हो,हां पर गहना उहना तो देबै पड़ी ।”

“तो हम कब मना किये,गहना तो हम बनबा रख्खे हैं,पर तुम एक बार बात तो करो समधि जी से।”

“ठीक बोल रही हो गुड्डू की अम्मा ,हम कलै फ़ोन करते हैं अवस्थी जी को,,उनका छुटका देखा भाला है,अच्छा लड़का है।।”

  अगले दिन शास्त्री जी के फ़ोन से अवस्थी जी की बांछे खिल गई,उन्हें मन मांगी मुराद मिल गई,इत्ते बड़े आदमी की दोनो बेटियाँ उनके घर आ जायेंगी तो समझो उनकी वसीयत का 2 बटा 5भाग उनका हुआ,हालांकी वो जानते थे,शास्त्री पुरानी रीति का आदमी है ,वो लडकियों को जितना देना है शादी मे दे दुआ के खतम करने वालों मे से है,और लडकियों का वसीयत पे कोई अधिकार हो सकता है ये वो कभी नही मान सकता,पर अपनी लड़ाकू फूलन देवी सरीखी बहु रूपा पे उन्हें पूरा विश्वास था,80 एकड़ खेती का ज़मीन नही भी दिये तो 40 एकड़ का आम का बगैचा तो बिटिया लोगों के नाम कर ही देगा गिरिधर  शास्त्री!!
       उन्होनें युवराज के ब्याह मे रेखा को देखा था, लड़की ऐसी बुरी भी नही थी,कॉलेज तक की पढ़ाई कर चुकी थी,और अभी कोई फैसन वाला कोई कोर्स कर रही थी,उन्होनें इस बारे में अपनी श्रीमती जी से बात की-
        “अरे का कह रहे आप,ऊ सिडबिल्ली को हम अपनी बहु ना बनाएँगे, रुपा तो चलो कम से कम काम भी कर लेती है,ज़बान चलाने के साथ,पर ऊ लड़की का तो लक्षनै ठीक नई लगता,जब देखो अन्ग्रेजी मा गिटर पिटर करती रहती है।।”

    “अरे तुम कहाँ से कहाँ पहुंच जाती हो,देखो हमरा राजा भी तो पढ़ लिख नही पा रहा,उसके लिये कहाँ से कलक्टरनी लायोगी खोज के, औ ई सोचो दुनो बहन एक ही घर मे रहेंगी तो झगड़ा फसाद भी नई होगा,बांट बखरा का झमेला से मुक्ति,भई हमरा तो दुई ठो लड़का है,दुनो एक संग निभा लेंगे।।”

   “अरे तो लडकियों का अकाल पड़ गया है का,,जो इक्के घर की दुनो को बहू बनाना चाह रहे।”

  “अब तुमसे बहस नही करना चाहते कल शास्त्री आ रहा अपने लड़का के साथ,इहै बातचीत करने,अच्छा से खान पान की तैय्यारी कर लेना, हम जा रहे ठीका में देखने,बहुत दिन से उधर गये नही।

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   राधेश्याम ज्यादा औरतों के पर्पंच में पड़ने वाले आदमी नही थे,सीधे और शान्त स्वभाव के थे,अपनी बात रखने के बाद एक बार ज़रूर पत्नि का पक्ष सुनते पर जब उसे अपने पक्ष मे नही पाते तो बिना मतलब की बहस करने की जगह एक बार मे अपना निर्णय सुना कर निकल लेते थे,,कम उम्र से उठाई जिम्मेदारियों के कारण पैसों के थोड़े लालची थे,कहीं से मुफ्त में आ रही लक्ष्मी से उन्हें कोई वैराग्य नही था,हालांकी उनकी दिली ख्वाहिश हमेशा ही थी कि उनके दोनो लड़कों की शादी पढ़ी लिखी लड़कियों से हो,पर जब युव के लिये रूपा का रिश्ता आया तो बारहवीं पास रूपा में उन्हें सुलक्षणी बहु का रूप दिखा या सरस्वती मैय्या पे लक्ष्मी मैय्या भारी पड़ गई,पर जो भी हो उन्होनें सहर्ष उस रिश्ते को स्वीकार लिया था,अबकी बार रेखा थी सामने,जो कि अपने पूरे घर परिवार में अकेली थी जिसने अन्ग्रेजी माध्यम से पढ़ाई करी थी,तो उस अंग्रेज़ी माध्यम का मोह भी अवस्थी जी संवरण नही कर पा रहे थे।।

   रेखा शास्त्री!! रूपा की छोटी बहन ,अपने पूरे कुनबे में सबसे ज्यादा लिखी पढ़ी मानी जाती थी,एक तो इनकी शिक्षा ‘कार्मल कॉन्वेन्ट ‘ से हुई थी, इन्होनें स्कूल में अपने बाकी भाई बहनों के जैसे सरस्वती वन्दना की जगह प्लेज किया था,,जहां इनके भाई बहन बचपन में किसी भी मेहमान के आने पर समवेत स्वर में “हम होंगे कामयाब एक दिन “गाया करते थे,वही घर की छुटकी बिटिया रेखा उसकी जगह अकेले पूरे गर्व से “we shall overcome ,one day..” गाया करती थी।।
    बचपन से इस भेद भाव का असर हुआ कि रेखा के मन में ये पैठ गया कि वो कुछ विशेष है,क्योंकि वो इंग्लिश मीडियम से पढ़ी है,,उसके इंग्लिश मीडियम में पढ़ने का श्रेय जाता था उसकी मासी को,शादी के चार सालों में भी जब हीरा व्यापारी तिलोकचंद त्रिपाठी के घर बाल ग्वाल नही विराजे तो उनकी धर्मपत्नी सुलोचना ने अपनी बड़ी बहन की छोटी लड़की रेखा को गोद लेने की सोची।।
     इस सोच-सोच में ही उन्होनें उसे ढेरों कपड़े दिलवाये,विदेशी गुड़िया दिलवाई,चॉकलेट खिलवाई और शहर के सबसे बड़े इंग्लिश मीडियम स्कूल में उसे भर्ती कराया….पर विधाता के खेल!!! जिस दिन से गोद लेने का कानूनी तीन पांच शुरु होना  था उसी दिन सुबह नाश्ते की टेबल पर नाश्ता  देख कर ही सुलोचना का जी मचल गया,डॉक्टर ने आते ही हाथ की नब्ज थाम कर हीरा व्यापारी को बधाई दे डाली,,आनन फानन घर में उत्सव का माहौल बन गया,और इस सब में उलझे त्रिपाठी दंपति गोद लेंने लिवाने की रस्म भूल गये….
      सब छूट गया,सभी का जीवन खुद मे व्यस्त हो गया पर रेखा का स्कूल नही छूटा,,बीच बीच में जब भी हीरों से लदी फदी मासी अपने बाल गोपाल को कमर पे टिकाई बड़ी बहन से मिलने आती अपनी प्यारी रेखा की इंग्लिश मीडियम बातें सुन खुशी से चौडी हो जाती,और इन्ही सब बातों का धीमा धीमा ज़हर रेखा के खून मे घुलता चला गया।।

    दिखने में ठीक ठाक परन्तु कपडों जूतों से बेहद स्टाईलिश रेखा ने जब अपनी दीदी की शादी में अपने दीदी के लुभावने देवर को देखा तो पहली ही नज़र में अपना दिल हार गई,उसे पूरी शादी में अपने खुद के अन्दर माधुरी और राजा भैय्या के अन्दर सलमान खान दिखता रहा।।
      उसने बड़ी नज़ाकत से जूते भी चुराये और जूतों के बदले पैसों की गुहार भी लगाई,पर उधर सलमान खान नही था,जो ‘ जूते दो पैसे लो ‘की गुजारिश करता,उधर तो राजा भैय्या थे,उन्होनें साफ साफ पूछ लिया”कितने चाहिये??”
       अब इधर रेखा के पहले ही किसी एक नाज़नीँ ने लपक के -“पूरा पांच हज़ार एक रुपैय्या चाहिये भैय्या जी” बोल दिया।।
   
    भैय्या जी हो हो कर हँस दिये-” बस इत्ता ही चाहिये,अरे हमरे बड़के भैय्या का जूता ही ग्यारह हज़ार का है,ई लो रख लो,और ला दो हमरे भैय्या का जूता।।”

   अब बेचारी रेखा जब तक बाकी सखियों को जूते और पैसों के लिये लड़ने का मह्त्व सिखाती बताती तब तक में  लाली दौड़ कर जूते का डिब्बा उठा लायी,भैय्या जी नये करारे नोट गिन के लाली के हाथ में रख दिये और जूते का डिब्बा उठाये बिना अपनी माधुरी दीक्षित को देखे ही चल दिये।।

     बेचारी रेखा मन मसोस के रह गई ।।

दुसरी बार आस जगी जब उसकी बड़ी बहन रूपा ने उसे कुछ दिन अपने पास रहने को बुलाया,किसी दूर की रिश्तेदारी में होने वाली शादी में पूरा अवस्थी परिवार जाने वाला था,बस राजा भैय्या और रूपा ही नही जाने वाले थे।।
    बिल्कुल माधुरी जैसी कातिल रेड ड्रेस पहन के रेखा अपने सलमान के इंतज़ार मे पलक पांवडे बिछाए बैठी थी कि अब राजा आयेगा और उसकी खुली जिप्सी में जाते समय वो भी मन भर के गायेगी-” फूलों कलियों की बहारें,चंचल ये हवाओं की पुकारें…..ये मौसम का जादू है मितवा “

   पर एक बार फिर भगवान ने उसकी इच्छाओं पे घडों पानी फेर दिया।।राजा भैय्या तो आये,जिप्सी में ही आये ,पर भाभी को साथ लिये आये, वहाँ घर में कोई बड़ा ना होने के कारण रुपा को कुछ दो चार दिन के लिये मायके भेज दिया गया।।

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    मायके के नाम पे खिली रूपा दौड़ी चली आई,दोपहर का भोजन खा कर सलमान खान अपने घर मोहल्ले को निकल गया और माधुरी अकेली विरह अग्नि में जलती रही,और बैकग्राउंड में गाना बजता रहा- “सोचेंगे तुम्हें प्यार करें कि नही।”

  रुपा कुछ चार दिन रह कर,अपनी सास को मन भर गालियाँ देकर चली गई,पर जाते जाते अपनी माँ के कान में अपनी छुटकी बहना और राजा की शादी का मन्त्र भी फूंक गई।।
    ना ना ऐसा बिल्कुल भी नही था कि रुपा की सास दुष्ट थी,जालिम थी,बहुओं पर अत्याचार करने वाली शशिकला और बिंदू टाईप की सास थी,अरे ऐसा होता तो ऐसे नर्क में रूपा अपनी बहन को झोंकने क्यों तैय्यार हो जाती???
    पर मायके आ कर अपनी माँ बहन के सामने दुखड़ा रोना भी एक कला है,इसका अपना अलग एक मज़ा है,और पकौड़ी की प्लेट के साथ वो मज़ा दुगुना हो जाता है।।

माँ और दीदी को बात करते सुन रेखा खुशी से बावली हो गई,,उसकी मन मांगी मुराद ऐसे टप से उसकी गोद में आ गिरेगी ,इसका उसे भान भी नही था।।
    कहाँ वो “हम आपके हैं कौन “के सपने देख रही थी और कहाँ उसे “हम साथ साथ हैं “मिल गई ।।

  इन चार दिनों में रेखा ने अपनी बड़ी बहन की खूब सेवा की,बिल्कुल सगी जेठानी मान के।।
    उसकी बिदाई के एक दिन पहले उसे अपने साथ शॉपिंग पर ले गई,उसकी साड़ी से मैचींग नेल पॉलिश दिलाई,क्लचर दिलाया,एक छोटा पर्स दिलाया और ब्लू लेडी का पर्फ्यूम भी दिलाया,बड़ी बहन निहाल हो गई,जाते जाते रेखा के गले लग खूब रोयी(रोने का नेग भी ज़रूरी होता है)और चुपके से बोली”अब अगली बार तुम्हें अपने देवर के लिये बिदा करा ले जायेंगे।।”

  दीदी के रवाना होते ही रेखा अपने कमरे में जाकर राजा की यादों में खोने जा ही रही थी कि फ़ोन पे मैसेज आ गया__
             “कैसी हो जान?? दीदी गई? अब तो हमारे लिये समय निकाल लो।”

उफ्फ ये वॉट्सएप्प भी ना,जब ज़रूरत ना हो तभी घि घि बजने लगेगा,रेखा मेसेज चेक कर चुकी थी, अब जवाब ना देना मतलब आधे घन्टे का सर फुटौव्वल,इसिलिए बेचारी ने जवाब दिया-

  “मैं ठीक हूं बेबी,अभी मम्मी काम से बुला रही, बाद में बात करती हूं ।”

  असल में दीदी की शादी और बाद में भी राजा ने कभी रेखा  में कोई विशेष दिलचस्पी नही दिखाई थी।उसी समय फैशन डिज़ाइनिंग का शार्ट टर्म कोर्स करने रेखा दिल्ली गई,जहां उसकी मुलाकात रोहित से हो गई,वो भी वहाँ किसी शार्ट टर्म कोर्स के लिये आया था,दोनो अपने अपने शहर से निकल कर इतने बड़े अंजान शहर में अकेले थे सो दोस्ती हो गई पर नही वो दोस्ती वहाँ प्यार में नही बदली,वहाँ दोनो सिर्फ दोस्त ही थे,साथ साथ टपरी में चाय पीना, सैंडविच खाना,और अपनी अपनी क्लास के बारे में चर्चा करना,बस इतना ही!! यहाँ तक की दोनों ने अपने घर परिवार और शहर की भी बात नही की।।
  इस पन्द्रह दिन की दोस्ती के बाद दोनो मोबाईल नम्बर एक्सचेंज कर अपने अपने शहर चले गये।।
   
   शुरुवात हुई रोज सुबह की good morning और रात की good night से…फिर धीरे धीरे क्या कर रहे हो??
खाना खाया? क्या खाया?क्या पहना ? वगैरह वगैरह से होते हुए दिन भर की लम्बी चैट में बदल गई ,और आखिर एक दिन दोनो को समझ आ गया कि दोनो प्यार में हैं…..प्यार का इजहार हुआ और दोनो की दुनिया बदल गई ।।
     अब तो दोनो को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण काम मिल गया “चैटींग “और बाकी सारे काम इस काम के सामने निरे नीरस और बेवजह हो गये।।
      रोहित कुछ ज्यादा ही सीरियस होने लगा इसलिए धीरे से अपने परिवार के बारे में बताना शुरु किया….पापा अधिकारी है,बड़ा भाई भी अधिकारी ,दीदी टीचर ,रेखा ने पूछा और तुम??
  “मैं तुम्हारा आशिक” इस खुशनुमा रंगीन चैटींग में पहला रोड़ा बनके आयी जात पात की दीवार
    बातों बातों में जब रोहित ने बताया कि उसका नाम है रोहित सूर्यवंशी!!!! हाय राम !! सूर्यवंशी !!
     रेखा का कलेजा मुहँ को आ गया,अब क्या करूं?? पापा तो नही मानेंगे!! दिखने में इतना साफ सुन्दर चिट्टा लड़का ,उसने तो देख कर by defalut सोच लिया था कि कोई दुबे चौबे तिवारी त्रिपाठी उपाध्याय ही होगा बंदा,पर अब क्या करे…..
     इतनी गहरी उलझन में डूबी लैला को और डुबाने उसकी बड़ी बहन धमक पड़ी और ये आ गया प्रेम कहानी में दूसरा रोड़ा ।।
    जब रूपा ने माँ से रेखा और राजा की बात की तो रेखा को वापस “हम आपके हैं कौन “वाले दिन याद आ गये और आज के ज़माने की लैला ने अपने सपनों को नई दिशा में मोड़ लिया….पर बेचारी अपनी सपनों की ज़मीन पे राजा के प्यार की फसल बो पाती उसके पहले ही 3 दिन से वैराग्य धारण किये रोहित का उबलता खनकता हुआ मेसेज आ गया….
   माँ किसी काम से बुला रही है,बोलकर किसी तरह रेखा ने जान बचाई और इसी सोच में डूब गई कि आगे रोहित को क्या और कैसे बोलना है,ऐसा नही था कि उसे रोहित पसंद नही था,या उसे राजा अधिक पसंद था,,असल मे उसे इन दोनो से कही ज्यादा पसंद था शादी का उत्सव उत्साह!!
    उसे भी बाकी लडकियों की तरह 3महीने का bridal course करना था,हर मौके के लिये अलग अलग थीम में सजे लहन्गे लेने थे,खूब सारे जेवर लेने थे,कपड़े लेने थे,इतनी महत्वपूर्ण विमर्श वाली चीज़ों के मध्य कोई इनसे कमतर (दूल्हा) के बारे में सोच के क्यों मगजमारी करे।।
    इसिलिए अपने मन को समझा कर रेखा अब रोहित को समझाने की तैय्यारी करने लगी।।

क्रमश:

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aparna..

शादी.कॉम-2

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           भैय्या जी के लिये औरतें सिर्फ और सिर्फ आदर की वस्तु थीं।
   
             अपनी उबलती हुई उमर में भी आज तक किसी कंचन कामिनी की छाया उन्होनें अपने हृदय पे पड़ने नही दी थी,कहीं ना कहीं इसका कारण उनका स्कूल भी रहा होगा।।
      राधेश्याम  जी पक्के जनसंघी थे, जब तक जा पाये हर रविवार गोशाला में होने वाली शाखा का हिस्सा बनते रहे,फिर पिता की असामयिक मृत्यु के बाद मिली अनुकम्पा नियुक्ति में एक सरकारी दफ्तर की बाबूगिरी निभाने और घर की जिम्मेदारियां उठाने में बेचारे धीरे धीरे गोशाला भूलने लगे,पर उनका शाखा प्रेम बना रहा।।अपने पिता के बाद उन्होनें सारे उत्तरदायित्वों को बखूबी निभाया,अपनी बड़ी बहन की शादी की,अपनी बुआ की जचकी उठवाई,अपनी माँ को तीरथ कराये, अपने फेरे फिराये और छोटे भाई को भी ठिकाने लगाया,इन सब में बेचारे राधेश्याम जी की उमर ही निकल गई,पर उनका शाखा प्रेम नही चूका ,इसीसे जब धर्मपत्नी सुशीला ने बड़े होते लड़कों की तरफ इशारा किया कि अब इनका स्कूल भेजने का समय हो चला तो तिवारी जी ने  बिना आगा पीछा देखे दोनो लड़कों को सरस्वती विद्या मन्दिर में डाल  दिया।।
     दोनों सुंदर सजीले बालक जब सुबह नहा धो कर बालों में खूब सारा तेल डाल भली प्रकार चपटा कर स्कूल बैग को कंधे पे टाँगे भूरी निकर घुटनों तक झुलाये स्कूल को निकलते तिवारी जी के कंधे अभिमान से चौड़े हो जाते।।

   विद्या मन्दिर में पढ़ने वाले बालकों में संस्कार कूट कूट कर भरे होतें हैं,पर शहर के बाकी स्कूल के बच्चों का यही मानना है कि पढ़ाई लिखाई के लिये तो स्कूल अच्छा है,पर सबसे मनभावन उमर में उमड़ने घुमड़ने वाली भावनाओं का कचरा कर देता है,सीधे शब्दों में ये स्कूल रोमांस को पनपने ही नही देता,एक तो सभी सहपाठीयों को एक दूसरे को दीदी भैय्या बोलना पड़ता है, दूसरे ये लोग हर त्योहार स्कूल मे मनाते हैं,और सबसे ज्यादा हर्षोल्लास से रक्षाबंधन का पवित्र त्योहार मनाया जाता है…..अब ऐसे में किसी बालक के मन में किसी सुन्दर सहपाठिनी  के लिये कोई कोमल भावना पैदा हो भी गई तो ये स्कूल वाले राखी बंधवा के सब गुड़ गोबर कर डालते हैं ।।

    भैय्या जी जब नौवीं में पहुँचे तब उनके बड़े भैय्या बारहवीं पास कर स्कूल से निकल चुके थे,इसिलिए राजा भैय्या ने आज़ादी की सांस ली,और अपने आप में अपने मन में कुछ कोमल बदलाव भी महसूस किये,अभी तक जितने आराम से कक्षा की लडकियों को दीदी कह लेते थे,अब ऐसा कहने में थोड़ा संकोच होने लगा,उसी समय उनकी बैंच पे उनके साथ बैठने वाले जयेश ने उन्हें एक अद्भुत खेल सिखा दिया….. एक ऐसा अनोखा खेल जिसे अब वो अक्सर कक्षा में सबसे पीछे की बैंच पे बैठे अकेले ही खेलते खोये रहते,उस खेल का नाम था -“FLEMS “
F- friend , L- love, E- enemy,  M-marriage ,  S- sister..
  इस खेल मे लड़की के नाम की स्पेलिंग और खुद के नाम की स्पेलिंग लिख के जितने कॉमन अल्फ़ाबेट कट सकते उन्हें काट कर बचे हुए जोड़ कर flems को काटना होता ,और अंत में जो आखिरी बचा अल्फ़ाबेट होगा,वो आपका भविश्य तय करता।।।

   राजा भैय्या कक्षा में बैठे इधर उधर नज़र फिराते और जो सुन्दरी भाती उसके साथ FLEMSकाटते।।
कभी किसी के साथ फ्रेंड आता तो खुश,किसी के साथ लव आ जाता तो बहुत खुश,पर जिस किसी के नाम के साथ सिस्टर आता उससे वो पूरी शिद्दत से सिस्टर का रिश्ता निभाते,तो इसी तरह फ्लेम में डूबे भैय्या जी नौवीं में लुढ़क गये।।
       दूसरे साल होम एग्ज़ाम होने के कारण आचार्य जी लोगों ने उन्हें किसी तरह पास कर दिया।।

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    दसवीं कक्षा में भैय्या जी की रूचि गुल्ली-डंडा और क्रिकेट में भी जाग गई ….कक्षा में तो टाईम पास करने के लिये फ्लेम्स और दोस्त थे,कक्षा के बाहर क्रिकेट था,जीवन सहज और सुन्दर था, पर पढ़ाई कठिन थी,भैय्या जी दसवीं में भी लुढ़क गये।।दो बार में किसी तरह आगे पीछे बैठे दोस्तों की मदद से दसवीं पार लगी।।

ग्यारहवीं आचार्य जी लोगों की कृपा से एक बार मे पास कर भैय्या जी बारहवीं में पहुंच गये,और इन पांच सालों में उनके बड़े भैय्या यानी युवराज अवस्थी कहाँ से कहाँ पहुंच गये।।
      स्कूल की पढ़ाई के बाद बड़के भैय्या ग्रैजुएशन के साथ साथ अपने चाचा जी के काम मे उनका हाथ बंटाने लगे,चाचा जी का पुश्तैनी धंधा ब्याज पे पैसे देने का था,चाचा जी उतने में ही संतुष्ट थे पर बड़के भैय्या ने अपना दिमाग दौड़ाया और ब्याज के सारे काले धन को श्वेत दिखाने सिटी कॉलेज के बाहर दो मंजिला आर्चीस का शो रुम डाल लिया, जवान लड़के लडकियों ने और पूरे सात दिन तक मनाये जाने वाले प्रेम पर्व वैलेंटाइन डे ने उनके बिजनेस को 3साल में ही चमका दिया।।
       राधेश्याम तिवारी के पुण्य प्रताप का असर था या उनकी धर्मपत्नी के निरंतर व्रत पूजन का कि धन की देवी माता लक्ष्मी को तिवारी जी की देहरी और उनकी तिजोरी से प्रेम हो गया,और सदा की चंचला माता लक्ष्मी अपने वाहन के साथ उनके घर पे जम के बैठ गई,माता लक्ष्मी के आगमन का संकेत देते बड़के भैय्या के काम और माता के वाहन का संकेत देते राजा भैय्या के काम।।।

   इसके बाद बड़के भैय्या ने इंडेन की गैस एजेंसी ले ली,उसके अगले साल रिलांयस का पैट्रोल पम्प, बड़के भैय्या की जय हो!! जल्दी ही गिरिधर शास्त्री जी की कन्या रूपा से उनका ब्याह हो गया,और बड़के भैय्या का जीवन खुशहाल गृहस्थी का विज्ञापन हो गया,पर इधर छुटके भैय्या यानी राजकुमार अवस्थी! यानी राजा भैय्या अब तक स्कूल में बारहवीं में ही अटके थे।।

    जिस साल राजा भैय्या बारहवीं दुसरी बार कर रहे थे,उस साल किसी ट्रांसफर केस में एक नई कन्या ने बारहवीं जीव विज्ञान में प्रवेश लिया,सुबह प्रार्थना कक्ष में सबको विश्राम सावधान कराते राजा भैय्या ने जब दो चोटी को जुही चावला(गज़ब का है दिन देखो ज़रा) स्टाइल में आगे पीछे करते बला की खूबसूरत लड़की को देखा तो उनका दिल  शताब्दी एक्सप्रेस से टक्कर लेता धड़कने लगा,,जैसे तैसे प्रार्थना समाप्त कर दोस्तों के साथ उसका नाम पता करने का प्रयास करने लगे,बहुत जद्दोजहद के बाद उस कन्या का नाम पता चला रानी !!!

     राजा भैय्या ने तुरंत अपने पर्सनल भविष्यवक्ता से जानना चाहा अपना और रानी का भविष्य़ ।। फ्लेम्स मे कट पिट के भविष्य आया M याने मैरिज।
राजा भैय्या का दिल प्रफुल्लित हो उठा,अब तो सुबह शाम जीवविज्ञान की कक्षा के चक्कर लगने लगे,कला संकाय का बंदा रसायन शास्त्र की लैब में क्लोराइड के नारंगी छल्ले उड़ाती अपनी लैला को खिड़की से देख देख के मोहित होने लगा।।

“दिल क्या करे जब किसी से,किसी को प्यार हो जाये….जाने कहाँ कब किसी को किसी से प्यार हो जाये।।””

             अब सारा समय भैय्या जी का दिल यही गुनगुनाता, वो वैसे भी दुनिया भर की ऊंची-ऊंची रस्मे मानने वालों में से थे नही…..आखिर दोस्तों के बहुत समझाने पे और कुछ रानी के इकरार भरी आंखों के इशारे ने उन्हें हिम्मत दी और उन्होनें अपने जीवन का पहला प्रेमपत्र लिख डाला।।

   रानी,
    हमको तुम बहुत अच्छी लगती हो,जब प्रार्थना के समय सामने खड़े होकर सबको सावधान कराते हैं,तुम्ही को देखते रहते हैं,और क्या कहें,आगे तुम खुद समझदार हो तभी तो जीव विज्ञान ली हो।।
   हमसे दोस्ती करोगी।

            राजा।।

राजा भैय्या के चेले गुड्डू ने रानी की सहेली को चिट्ठी पकड़ा दी और भाग गया,चिट्ठी पढ़ कर आधी छुट्टी में रानी राजा भैय्या की कक्षा में आई और इशारे से राजा को बाहर बुला लिया।।

“ए सुनो!! तुमसे कुछ कहना है,वहाँ इमली के पेड़ के पास चल के बैठो,हम आ रहे।”

धड़कते दिल को समेटे राजा भैय्या इमली के चबूतरे पे जा बैठे तभी रानी भी आ गई ।

“राजा सुनो! हम पढ़ने लिखने वाली लड़की हैं, ये सब प्यार मोहब्बत के चक्कर मे हमारा फ्यूचर खराब हो जायेगा,हमारा सपना डॉक्टर बनने का है,और इसके लिये हमको बहुत पढ़ना है, अभी भी रात दिन सुबह शाम पढ़ाई करते हैं,ट्यूशन जातें हैं कोचिंग जाते हैं,हमारी माँ डॉक्टर नही बन पाई थी,नाना जी के पास पैसे नही थे ना,इसिलिए माँ हमे डॉक्टर बनाना चाहती हैं,राजा तुम हमें भी अच्छे लगते हो,पर तुम से प्यार कर बैठे तो हम अपने और माँ के सपने को भूल जायेंगे,तुम समझ रहे हो ना,हम क्या कह रहे?? देखो अभी हमारी सिर्फ पढ़ने लिखने की उमर है,प्यार मोहब्बत के लिये पूरी जिंदगी पड़ी है,हो सके तो हमे भूल जाना,तुम बहुत अच्छे लड़के हो राजा।।
    इतनी सारी ज्ञान भरी बातें सुन सचमुच राजा भैय्या के ज्ञान चक्षु खुल गये,कुछ देर पहले की प्रेयसी में उन्हें माता सरस्वती के दर्शन होने लगे, उनकी आत्मा भी इस पवित्रता से जगमगा उठी और बहुत श्रद्धा से उन्होनें अपनी आंखें बन्द कर ली,तभी अचानक ऐसा लगा जैसे ज़ोर का भूचाल आया….धड़ाम की आवाज़ के साथ भैय्या जी चबूतरे से नीचे गिर पड़े,उन्होनें आंखें मलते देखा तो बाजू में उनके बाँसुरी गिरी पड़ी थी।।

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    असल में हर खाने योग्य वस्तु पर अपना एकाधिकार समझने वाली बाँसुरी उस समय दसवीं की छात्रा थी,और बाकी छोटे बच्चों को पीछे धकेल धकेल के वो इमली की पकी पकी फलियां जमा करने में लगी थी,तो उससे बदला लेने तीन चार बच्चों ने एक साथ मिल कर “ज़ोर लगा के हाइशा” का नारा लगाते हुए उसे ऐसा धक्का दिया कि वो सामने बैठे अपने सीनियर राजा भैय्या के ऊपर से होती हुई चबूतरे के नीचे गिर पड़ी , दोनों की नजरें मिली,बांसुरी की आंखों की आंच बड़ी तेज़ थी,जाने अपनी गलती पर भी वो भैय्या जी को क्यों खा जाने वाली नजरों से घूर रही थी,जब भैय्या जी ने ये जानने के लिये आंखों से ही बाँसुरी से सवाल किया तो बाँसुरी ने भी आंखों से ही जवाब देते हुए उनके जूतों की तरफ इशारा कर दिया,भैय्या जी ने झुक कर अपने पैरों की तरफ देखा ,वहाँ उनके निहायत ही गंदे कीचड़ मिट्टी से सने जूतों के नीचे बाँसुरी की कमाई बिखरी चपटी पड़ी थी,सारी इमली जूतों में दब कर बुरी तरह से कुचला चुकी थी,भैय्या जी एकदम से हड़बड़ा कर बाँसुरी से माफी मांगते वहाँ से जान बचा के भागे,इस सब में अपने प्रथम प्रेम और प्रथम सन्गिनी को बेचारे भूल ही गये…. और बस उस दिन रानी की कही बातों का ये असर हुआ कि राजा भैय्या के मन में सदा सदा के लिये औरतों के प्रति बेइन्तिहा इज्जत आ गई,और उन्होंने जाने अनजाने एक कसम उठा ली कि किसी लड़के को कभी किसी लड़की का अपमान करने नही देंगे।।
    अपने बड़े भैय्या की तरह वो भी अपनी माँ की पसंद की लड़की से ही ब्याह करेंगे ,और अपना पूरा जीवन समाज की सेवा में लगायेंगे।।
       फिर उसी साल रानी का पी,एम टी में सलेक्शन हो गया और वो उस शहर को छोड़ कर मेडीकल कॉलेज पढ़ने चली गई,पर राजा भैय्या का अपने स्कूल और इमली के पेड़ से लगाव बना रहा,और वो बारहवीं में ही जमे रहे।।
     
     अब तो ऐसा था कि बाँसुरी भी बारहवीं गणित से कर कॉलेज के दूसरे साल में पढ़ाई के साथ साथ बैंक के एग्ज़ाम की तैय्यारी कर रही थी….पर अब राजा भैय्या इतने सारे समाज के कामों मे संलग्न हो  चुके थे कि उन्होंने स्कूल जाना लगभग बन्द कर दिया था ।।वो कभी कहीं मुफ्त रक्तदान शिविर का आयोजन करते,कभी रेल्वे स्टेशन के भिखारियों के लिये मुफ्त में खिचड़ी भोग बँटवाते।।

    उनका ठिकाना था उनके मोहल्ले के बाहर के चौक पर की पान की गुमटी,,पर मजाल जो सारा दिन पान की गुमटी में बिताने के बाद भी राजा भैय्या एक सिगरेट तो पी लें,उनमें ऐसा कोई राजसी ऐब नही था,पान गुटका बीड़ी सिगरेट शराब ठर्रा सब से दूर भोले भंडारी के भक्त राजा भैय्या हर सावन कांवर उठा कर भोले नाथ को जल चढ़ाने भी जाते।।

   राजा भैय्या के भलमनसाहत के किस्से जितने फेमस थे उससे कहीं ज्यादा भैय्या जी के कातिल रंग रूप के चर्चे थे मोहल्ले की लडकियों के बीच।।।।
      क्या कुंवारी कन्यायें और क्या शादीशुदा ,सभी सुबह सुबह भैय्या जी एक झलक पाने को किसी ना किसी बहाने अपने द्वारे खिंची चली आती,कोई खिड़की से झांक लेती कोई छत से,कोई उसी समय अपने कुत्ते को टहलाती ,कोई अपनी गाय का सानी भूसा करती, सब चोर नजरों से राजा भैय्या को एक झलक देख कर ही तृप्त हो जाती,और भोले भंडारी राजा भैय्या इन सब बातों से बेखबर सुबह सुबह अपने जिम पहुंच जाते।।

     नीले रंग का  ट्रैक सूट पहने  अपनी रेशमी ज़ुल्फे उड़ाते राजा भैय्या जॉगिन्ग ट्रैक पे दौड़ते हुए जाने कितने कन्या रत्नों का हृदय अपनी मुट्ठी में भींचे दूर तक दौडे चले जाते….. और पीछे रह जातीं उनकी अनन्य प्रशंसिकायें।।।

क्रमशः

aparna..

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