दिल से…

दोस्तो, कैसी रही आज की सुबह।

आज ज़रा समय की कमी है इसलिए बस थोड़े में ही अपनी बात रखूंगी। आप में से कुछ लोगो ने आर्थराइटिस के लिए किए जाने वाले योग के बारे में पूछा था। आर्थराइटिस में चूंकि हड्डियां थोड़ी कमज़ोर सी होने के कारण बहुत कठिन योग पोश्चर नही किये जा सकते। लेकिन जो आसानी से किये जा सकते हैं वो मै आपको चित्रों के साथ बता रहीं हूँ।

अर्थराइटिस की समस्या से छुटकारा पाने के योगासन

  • यौगिक जॉगिंग
  • सूक्ष्म व्यायाम
  • मंडूकासन
  • शशकासन
  • उष्ट्रासन
  • मंडूकासन
  • भुजंगासन
  • ताड़ासन
मंडूकासन

2) child’s pose .. ये करने में आसान भी होता है। इसमें आपको घुटने मोड़ कर वज्रासन में बैठना है और दोनो हाथों को सामने की ओर फैलाना है। श्वांस सामान्य गति से लेना और छोड़ना है। इसमें पीठ के दर्द में बहुत राहत मिलती है।

बालासन ( child’s pose)

3) वृक्षासन :- इसमें आपको सीधे खड़े होने के बाद एक पैर को घुटने से मोड़ कर दूसरे पैर के घुटने पर टिका कर सहारा देना है। और दोनो हाथ ऊपर नमस्कार की मुद्रा में जोड़ना है। एक बार में 30 सेकंड इस पोज़ में खड़े रहना है और दोनो पैरों से इसकी आवृत्ति करनी है।

वृक्षासन

4)सुखासन :- इसमें पहले पैरों को सामने की तरफ फैला कर फिर घुटनो से मोड़ कर पालथी बना कर बैठना है। इसमें सामान्य श्वांस के साथ ही अन्य प्राणायम आदि भी किये जा सकते हैं।

सुखासन

5) वज्रासन :- बेहद आसान है। इसमें घुटनो को पीछे की तरफ मोड़ कर उस पर अपनी कमर के भाग स्थिर कर बैठना होता है। शुरुवात में अगर कठिन लगे तो सिर्फ 10 की काउंटिंग तक करें, धीरे धीरे इसे 30 सेकंड से 1 मिनट तक बढ़ाया जा सकता है।

ध्यान रहे :- अगर आपको गठियावात के कारण जोड़ों को मोड़ने में तकलीफ है। अगर आपके घुटनों में सूजन है। अगर डॉक्टर ने आपको बताया है कि जोड़ों का पानी कम हो गया है। अगर आपको इन आसनों को करने में बहुत ही ज्यादा दर्द महसूस हो रहा है तो आप किसी योग शिक्षक या जिम इंस्ट्रक्टर की देख रेख में ही योग शुरू करें ,एक बार शुरू कर लेने के बाद आप आसानी सेसब कुछ कर पाएंगे।

याद रखिये :– करना है योग , तभी बनेंगे निरोग।

वज्रासन

दिल से…

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कायाकल्प चैलेंज

सुप्रभात दोस्तों,

आशा करती हूं कि आज का चैलेंज आपने अब तक पूरा कर लिया होगा… आज का चैलेंज था सिर्फ 20 सूर्य नमस्कार के साथ थोड़ी सी एब्स एक्सरसाईंज़। जो मैंने आपको कल बताई थी। और कल ही एक फैट कटर ड्रिंक भी बताया था आपको। जिंजर पाउडर ड्रिंक। उसे आप सभी लोग लेना शुरू कर दीजिए.. ये मेटाबोलिज्म बढ़ाने के साथ आपको चुस्त रखता है। अब हमारे अगले मुख्य बिंदु।

1) आप अगर किसी दिन सुबह का अपना 15 मिनट भूल जाएं तो कोई बात नही,किसी तरीके से शाम में उस 15 मिनट को अपने लिए निकालें और वॉक ज़रूर कर लें।

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2) वॉक के दौरान कोशिश कीजिये कि आप किसी से बात न करें। क्योंकि बात करते हुए हमारी गति धीमी हो जाती है। आप गाने सुनते हुए वॉक कर सकते हैं। और वॉक के बीच में 1 -1 मिनट की रनिंग ज़रूर ट्राय करें।

3)अपने खाने में तरह तरह के रंगों का प्रयोग ज़रूर करें। डायटिंग टिप्स बहुत आसान है। जो मैं इस चैलेंज के साथ साथ बताती जाऊंगी। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है रात का खाना। रात का खाना आप क्या खाते हैं इस पर आपका अगला दिन निर्भर करता है। अगर आप राइस ग्रेवी या हेवी भोजन खाते हैं तो उसे पचाने में शरीर को वक्त लगता है और इसलिए हमारा शरीर अधिक आराम मांगता है और इस कारण सुबह आपकी नींद खुलने में देर हो सकती है और व्यायाम के दौरान भी आपको मसल्स में स्पासम या जकड़न महसूस हो सकती है। इसलिए योग और व्यायाम करने वाले रात का खाना हल्का खाने पर ज़ोर देते हैं।

4) अगर आप वाकई वजन कम करना चाहते हैं तो रात का खाना शाम 7 के पहले कोशिश करें कि खा सकें। अगर उसके बाद आप 10 तक जागते हैं और आपको भूख लगती हैं तो आप दूध ले सकतें है या फिर भुने मखाने या सुगर फ्री बिस्किट। रात में 10 बजे सोना ज़रूरी है तभी तो आप सुबह जल्दी उठ पाएंगे। जल्दी मतलब 4 से 5 के बीच।

5) अब कल के लिए चैलेंज है…. 20 बार सूर्य नमस्कार करने के बाद आपको अपनी पसन्द का कोई भी तेज म्यूज़िक लगाना है और उस म्यूज़िक पर आपको लगातार 12 मिनट तक डांस करना है। और ये आपको जरूर करना है। इसके लिए भी आप यूट्यूब की मदद ले सकाते हैं। पर मेरा कहना है किसी की मदद लिए बिना अकेले ही कूद फांद के वो डांस कीजिये जो बारात में करने का आपका सपना रहा हो और अपने नही किया हो।

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तो फ्रेंड्स अगर आप रोज सिर्फ ये 15 मिनट मुझे देते हैं तो मैं वादा करती हूं, इस चैलेंज के बाद आपको आपकी ही कॉलेज पिक्चर से मिलवा कर रहूंगी।

हमारे जो साथी पहले से ही योग और व्यायाम करते आ रहे हैं उनके लिए ये शुरुवाती चैलेंज काफी कम और आसान होंगे, वो साथी अपना रूटीन ही फॉलो करें और बाकी की हेल्थ टिप्स के लिए ये अपडेट देखते रहें।

आगे आने वाले भागों में मैं आसन के नाम भी बताऊंगी और साथ ही ये भी ये कब किये जा सकते हैं और कब इन्हें करना मना है।

करते रहिए योग …. क्योंकि करने से ही होता है!!!

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दिल से…

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कायाकल्प चैलेंज

सुप्रभात दोस्तों

होप की आप लोगों ने कल अपनी तस्वीर उतार कर रख ली होगी और अपना वजन भी माप लिया होगा। वैसे व्यायाम और योग के हिसाब से आज भी मेरी अपडेट लेट हो रही है। क्योंकि देखा जाए तो व्यायाम का सबसे सही समय होता है सूर्योदय के पहले का। मतलब सूर्योदय से पहले आप व्यायाम शुरू करें और सूर्योदय आपके सामने हो।

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अब आज के कुछ खास टिप्स:-

1) कल का हमारा मुख्य मन्त्र था सिर्फ 15 मिनट। इस मंत्र को हमें अभी 1 हफ्ते तक फॉलो करना है, और यकीन मानिए अगर आप हफ्ते भर रोज़ 15 मिनट कसरत करते हैं तो आपको मालूम भी नही चलेगा कि कब आपका 15 मिनट आधे घण्टे में बदला और कब वो आधा घंटा 1 में।

2) आज का आपका चैलेंज है सूर्य नमस्कार की आवृत्ति को 20 तक बढ़ाना है। यानी एक टांग से 10 और दूसरी से भी 10…..

ये बहुत आसान है, सूर्य नमस्कार 20 की संख्या में करना अधिक नही है , कर के देखिए, बड़ा मजा आएगा।

अभी हमें बढाते बढाते ये संख्या 108 पर लेकर जानी है। मैं भी 108 सूर्य नमस्कार चैलेंज ले चुकी हूं और करने में बड़ा मजा आता है। जनवरी में हम एक बड़ा चैलेंज एक साथ करने वाले हैं।

3) सूर्य नमस्कार करने के बाद अगर आप करना चाहें तो थोड़ी सी एब्स की एक्सरसाइज़ कर सकतें हैं , ये भी आसान है… और ये आप खुद भी कर सकते हैं या यूट्यूब की मदद भी ले सकतें हैं। मैंने जब दो साल पहले योग करना शुरू किया था तब मैं Psyche Truth by शनेला को देखा करती थी। इनके वीडियोस छोटे और बहुत हेल्पफुल हैं।

4) आज का आपका 15 मिनट चैलेंज लेने के बाद आप अपने चेहरे पर एक चमक देखेंगे और इसके साथ ही आपको ज़रूरत होगी एक एनर्जी ड्रिंक की । ये ड्रिंक बहुत आसान है और इसे फैट कटर ड्रिंक भी कहा जाता है। उसे आपको दिन में दो बार लेना है। एक बार सुबह और एक बार शाम 4 के आसपास :-

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ड्रिंक – 1 बड़ा ग्लास गर्म पानी ( कुनकुना नही , गर्म पानी) लें उसमें आधा निम्बू ( अगर ज्यादा खट्टा पसन्द नही तो थोड़ा कम ) ,1चम्मच शहद, आधा चम्मच सूखे अदरक का पाउडर यानी सोंठ मिलाकर गर्मागर्म ही पी लीजिये जैसे चाय पी जाती है। ये कब्ज़ की समस्या को दूर करने के साथ ही हमारा मेटाबोलिज्म भी बढ़ाता है।

5) हममें से बहुत से लोग फलों को खाना नही पसन्द करते पर अगर आप अपने शरीर से प्यार करते हैं तो उसकी भी सुनें। हमेशा तो हम अपने मन की ही खाते हैं, आज से अपने हार्ट लिवर किडनी की मनपसंद चीज़े भी खाना शुरू कीजिए। इन्हें। फल कच्ची सब्जियां और सलाद बेहद पसंद है तो आज से इनके लिए कम से कम 1 फल रोज़ खाइए और साथ ही 5 बादाम भी( पानी में भिगोए हुए)

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आपको ये सब पढ़ कर लगेगा,इसमें नया क्या है? ये सब तो हम पहले से जानते थे। जानते तो हम सब कुछ हैं, पर फॉलो नहीं करते तो आइए फॉलो करें और अपने दिन को और अपने जीवन को हेल्दी बनाये।

Eat healthy live happily ❤️

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दिल से….

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कायाकल्प चैलेंज

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प्यारे दोस्तों, माफ कीजियेगा हमारे चैलेंज के लिए मैं ही लेट हो गयी, पर आप सब एकदम चुस्ती से तैयार हैं … यही देख कर दिल खुश हो गया।

आज इस चैलेंज से जुड़ी सिर्फ 5 बातें बताऊंगी…

1) आज आप सभी जो इस चैलेंज से जुड़ना चाहतें हैं अपना वजन और हाइट माप लीजिये। अगर घर पर इंच टेप रखते हैं तो अपने शरीर को कमर पेट सीना नाप कर डायरी में नोट कर लीजिए( बिना भूले) … अब आपका सबसे मनपसंद काम कीजिये अपनी एक फूल साइज़ तस्वीर ले लीजिए, और उसे भी आज की तारीख के साथ सुरक्षित कर लीजिए।

2) लोग कहतें हैं फिटनेस के लिए ढेर सारा पानी पीजिए। पर मेरा कहना है … रुकिए अपने पानी पीने के तरीके पर ध्यान दीजिए। पानी हम इसलिए पीते हैं कि वो हमारे शरीर से सारे टॉक्सिन्स बाहर निकाल दे,पर ध्यान दीजिएगा अगर आप पानी तो बहुत पीते है पर यूरिन आउटपुट उतना अधिक नही है तो ये पानी भी शरीर में जमा होने लगता है और ये भी वजन बढ़ाता ही है। इसलिए कोशिश यही रखें कि सुबह के समय खूब पानी पिये और उतना ही वाशरूम जाएं….. सूरज ढलने के बाद पानी भी कम कर दें।

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3 ) मैं किसी भी तरह की हरी नीली काली लाल चाय का समर्थन नही करती। मेरा मानना है कि आपको जो स्वाद लगे वही खाये पिये .. लेकिन इस बात का ध्यान रखते हुए की वो आप कितनी मात्रा में कंस्यूम करतें हैं। सबसे ज़रूरी बात है अगर आपको चाय या कॉफी की आदत है तो वो लेते रहें पर कोशिश करें कि सुबह और शाम बस 1 कप चाय के अलावा यानी कुल 2 कप चाय कॉफी के अलावा जब भी एक्स्ट्रा चाय लें वो बिना शक्कर की लें।

4) आपके भोजन के साथ भी यही बात है। आप चावल या रोटी एक बार में कोई एक ही तरह का कार्बोहाइड्रेट खाने में प्रयोग करें। अपने खाने को सभी रंगों से सजाएं… हरा साग, पीली दाल, सफेद दही , और रंगबिरंगे सलाद से।

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5 ) आज की आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण बात…. शारिरिक श्रम ज़रूर करें। किसी भी तरह का व्यायाम, योग सूर्य नमस्कार वाकिंग जॉगिंग… आप इनमें से जिसमें भी कुशल हैं या आपको करना पसंद है आप चुन सकतें हैं और शुरू कर सकते हैं… आज देर हो गयी पर अगर आप लोग आज ही मेरा ये ब्लॉग पढ़ लेते हैं तो आज से ही शुरू कीजिए… सिर्फ 15 मिनट …

सिर्फ 15 मिनट :-

हमारा फिटनेस मंत्र है सिर्फ 15 मिनट …

हममें से कई हैं जो सोचते ही रह जाते हैं कि आज नही काल से पूरा एक घंटा मेहनत करेंगे, जिम करेंगे पसीना बहाएंगे.. पर वो कल कभी आता ही नही। इसलिए एक मंत्र अपनाइए सर्फ 15 मिनट .. आज अभी कूद पड़िये मैदान में

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1) फ्रेश हो लीजिये।

2) अपना योग मैट बिछाइये।

3)अपने कुछ पसंदीदा गाने लगा लीजिये।

4) हाथ जोड़ कर खड़े हो जाइए…. and lets start…

5 ) सिर्फ 5 सेट ( यानी दोनो पैरों से करने पर कुल 10 ) सूर्य नमस्कार कीजिये।

6) आज की शुरुवात बस इतनी ही… आपमें से कइयों को लगेगा अरे बस इतना ही… तो मेरा जवाब है आप शुरू तो करो… ये चैलेंज की शुरुवात है… आगे अभी बहुत कुछ करना है। सो आज शुरू कर दीजिए… और कमेंट में बताइये कैसा लगा।

आप में से बहुत लोग जो ऑलरेडी अपनी फिटनेस के लिए कुछ न कुछ करते ही है वो भी ब्लॉग को पढ़ते रहें भले ही चैलेंज में भाग ले या न ले क्योंकि आगे मैं इसी में पीसीओएस , स्पाइनल प्रॉबलम्स, थयरॉइड , ब्लोटिंग आदि के बारे में भी बताती जाऊंगी।

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ऐसी महिलाएं जो बेबी प्लान करने की सोच रहीं हैं या जो प्रेग्नेंट हैं या जो लेक्टेटिंग मदर हैं इस चैलेंज में भाग न लें… बस पढ़ते रहें … ❤️

किसी भी तरह की हेल्थ इश्यूज वाले दोस्त भी अपने डॉक्टर से सलाह के बाद ही किसी भी तरह के व्यायाम या डाइट प्लान फॉलो करें।

आज बस 15 मिनट का मंत्रा अपनाएं… कल आपको एक सीढ़ी ऊपर चढ़नी है ।।

So be ready …. To fly❤️

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aparna ….

दिल से…..

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कायाकल्प चैलेंज…

प्यारे दोस्तों,

मुझे बेहद खुशी हो रही है कि आप लोग फिटनेस चैलेंज के लिए भारी संख्या में तैयार हो गए हैं।

फिटनेस सिर्फ आपके शरीर से ही नही जुड़ी होती, ये मानसिक आत्मिक और भावनात्मक भी होती है। औरतें अक्सर डिलीवरी के बाद शारीरिक रूप से तो कमज़ोर महसूस करती ही है लेकिन साथ ही भावनात्मक रूप से भी वो काफी कमजोर हो जाती है जिसे हम मूड स्विंग का नाम देते हैं, जिसके लिए काफी हद तक हमारे शरीर के हार्मोन्स ज़िम्मेदार होते हैं।

आपको पता है हम पूरी तरह अपने हार्मोन्स के कंट्रोल में होतें हैं। यानी हमारा हंसना, रोना, हमारा कभी अति उत्साहित होना तो कभी बिल्कुल ही निकम्मा हो जाना सब कुछ हमारे दिमाग में रहने वाली मास्टर ग्लैंड पिट्यूटरी निर्धारित करती है। अब सोचिए हम खुद को इतना बड़ा तीरंदाज मानतें हैं लेकिन एक छोटे मटर के दाने बराबर महज .6ग्राम की ग्लैंड हमारी बॉस होती है।

तो क्या कोई ऐसा तरीका है कि हम अपनी मास्टर ग्लैंड के मास्टर बन जाये…..हॉं है…..

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जब कभी हम अपनी फिटनेस के बारे में सोचते हैं और व्यायाम या योग शुरू करते हैं तो हमारी ये मास्टर ग्लैंड तुरन्त सतर्क हो जाती है,और कुछ न कुछ ऐसा करने लगती है जिससे हम अपने उद्देश्य से भटक जाए क्योंकि ये अच्छे से जानती है कि अगर हम रेगुलर व्यायाम या योग करेंगे तो हम इस ग्लैंड पर राज करने लगेंगे। और इसलिए ये हमे तरह तरह के प्रलोभन देना शुरू करती है और इसी कारण हम बहाने बनाने लगते हैं….

जैसे … मैं जिम नही जाना चाहती,कयोंकि सुना है जिम छोड़ते ही वजन और तेज़ी से बढ़ता है…

– ज्यादा लंबी वॉक नही कर सकते, घुटनों में दर्द होता है।

-खाते तो हम दो चपाती ही हैं पर जाने क्या लग जाता है जो वजन कम नही हो रहा?

इसी तरह के अनगिनत बहाने होते हैं हमारे पास… क्योंकि सच कहूं तो हर किसी को आराम भरी जिंदगी पसन्द है। लेकिन कहतें हैं ना जब तक पानी में कूदोगे नही तैराकी का लुत्फ नही उठा सकते, पानी से डर कर नही बैठना है….

तो आइए हम भी चलते है एक महीने के इस हसीन जहीन सफर पर ….

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हमारा फिटनेस चैलेंज है ” कायाकल्प” जिसमें हम पूरे महीने अपनी फिटनेस के लिए जो भी करेंगे उसे अपनी एक डायरी में नोट करते जाएंगे। आप सभी से अनुरोध है कि एक डायरी ज़रूर बना लें। डायरी ऐसी हो कि हम बीच बीच में अपनी तस्वीरें भी लगा सकें।

फिटनेस चैलेंज शुरू करने से पहले आप सभी अपनी हाइट और अपना वजन ज़रूर डायरी में नोट कर लीजियेगा। तारीख और समय के साथ।

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इस चैलेंज के लिए हमें बस कुछ चीज़ों की ज़रूरत पड़ेगी जिनमें सबसे ज़रूरी है योगा मैट। अगर नही भी है तो कोई मोटी दरी या कारपेट काम आ सकता है, बस वो ऐसा नही होना चाहिए जो फर्श पर फिसलने वाला हो। इसके अलावा सबसे ज़रूरी चीज़ है विल पॉवर जो मैं जानती हूं आप सब के पास है।

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तो हमारा चैलेंज शुरू होगा 1 december से….

गणेश हमारी मदद करेंगे कि हम अपना चैलेंज पूरी सफलता से पूरा कर सकें।

So be ready for a tremendous journey…

aparna …

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दिल से…

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हेलो दोस्तों

कैसे हैं आप सब ? जानती हूं अच्छे ही होंगे। बल्कि बहुत अच्छे… खुश स्वस्थ और खुद में मस्त।

स्वस्थ पर मैंने सबसे ज्यादा जोर दिया है…. अब चूंकि ये सिर्फ एक लेखिका का ब्लॉग तो है नही, इसमें एक डॉक्टर एक गृहिणी भी मौजूद है। तो सोचा कि क्यों ब्लॉग को सिर्फ कहानी जंक्शन बना कर छोड़ दिया जाए। क्यों न कुछ और भी इसमें शुरू किया जाए।

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तो मैं आगे जो बताने या पूछने जा रही हूं , वो हो सकता है आपको थोड़ा बोरिंग साउंड करे पर यकीन मानिए ये उतना बोरिंग और उबाऊ नही है, और न ही उतना टफ है जितना सन् कर हमें लगता है…

तो मेरे ब्लॉग के टॉपिक को शुरू करने से पहले आप सभी से सवाल है कि आपमें से कौन कौन मेरे साथ फिटनेस चैलेंज लेने को तैयार है….?

सवाल कठिन है? पर जवाब आसान है… आ जाइये मैदान में जूझ कर…

तो अगर कम से कम पचास लोग भी हामी भर देते हैं तो कल से मैं अपना फिटनेस चैलेंज आप लोगों के साथ शेयर करूँगी।

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Stay fit stay healthy n happy❤️❤️❤️

aparna ….

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दिल से….

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खुशियां आंखें गीली कर जातीं हैं जब कोई ऐसा मौका आये कि किसी ज़मीन से जुड़े शख्स को सिंहासन पर बैठे देखती हूँ……

मेरी नज़रों में ही असल नायक होता है। फल बेचकर 150 रुपये प्रतिदिन कमाने वाले हरिकेला को संतरे को orange कहा जाता है ये मालूम न था। अंग्रेज़ी की ये छोटी सी भाषयी अज्ञानता ने उनके ज्ञान चक्षु खोल दिए। स्वयं की अशिक्षा को मानक मान कर उन्होंने अपनी जीवन भर की कमाई से अपने गांव के बच्चों के लिए स्कूल खोल दिया।

मेंगलुरु के हरिकेला के एक छोटे से प्रयास ने सफलता रची और आज सरकारी अनुदान और कई प्राइवेट ऑर्गेनाइजेशन के सहयोग से उनका हजब्बा स्कूल सफलता के सोपान छू रहा है।

स्नेह सम्मान से लोग इन्हें अक्षर संत भी कहतें हैं। आपके हाथों में पद्मश्री अवार्ड भी मुस्कुरा रहा है।

दिल से…

चिकित्सा के देवता भगवान धनवंतरी आप सभी पर अपनी कृपा बनाएं रखें, और धन की देवी लक्ष्मी आपके घरों पर स्थायी आवास बना लें।

आप सभी को महापर्व दीपावली के प्रथम दिवस धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं…💐

दिल से…

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बॉक्सर आमिर खान  अक्षय कुमार से पूछते हैं ” हे ब्रो!! एंजॉइंग? और खिलाड़ी कुमार अपने मस्तमौला अंदाज में जवाब देते हैं येह एंजॉइंग ! बेटर लक नेक्स्ट टाइम!!!
   ये सारा स्पोर्ट्समैनशिप इमानदारी की हार बेईमानी की जीत, अलाना फलाना सब कुछ हम भूल जाते हैं जब इंडिया पाकिस्तान के खिलाफ मैच खेलती है।

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   इतना तो कल दिन भर व्रत रखने के बाद औरतों का खून कम नहीं हुआ होगा जितना इंडिया की हार से हो गया।
  

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अगली बार जीत के आना है बता देती हूं( फ्रॉम अनुष्का)

#दिल से देसी❤️
#छोटी सी भड़ास

मायानगरी -5

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मायानगरी – 5

      मेरे पास आओ मेरे
     दोस्तों एक किस्सा सुनो
       मेरे पास आओ मेरे
     दोस्तों एक किस्सा सुनो

    कई साल पहले की ये बात है
      बोलो ना चुप क्यों हो गए
         भयानक अंधेरी
        सी यह रात में
       लिए अपनी बन्दूक
             मैं हाथ में……

   ” अबे सालों बस सुनने आये हो क्या? साला आज कल के लड़कों को कोई तमीज ही नही है। हम सीनियर होकर हम ही गाना भी सुनाए। शर्म करो कुत्तों। ये मैं गुनगुना रहा था कमीने कान गड़ाए खड़े हैं।”

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     इंजीनियरिंग कैम्पस में कंप्यूटर साइंस के जूनियर्स को मैकेनिकल के सीनियर्स धरे बैठे थे कि कंप्यूटर वाले सीनियर्स वहीं चले आये…

” अरे सीपी यार इन लोगो को काहे दबोच रखे हो, हमारे वाले हैं ये। “

” निशांत यार हम भी जानते हैं । लेकिन देखो, शुरू से ही हमारे कॉलेज में फैकल्टी वाइज कभी फसाद नही हुआ। हम अगर तुम्हारे बंदों को रैंग करते है तो तुम्हे भी तो खुल्ली छूट है यार हमारे बंदों को नोचने की।

“भाई वो बात नही है यार। इस बार की बैच में ज़रा हाई फाई लड़के भी हैं। मैनेजमेंट कोटा खूब भरा है।”

” अरे तो क्या हुआ? मैनेजमेंट कोटा से आने वालों को क्या हम तमीज नही सिखाएंगे। भाई ये हमारी ही नैतिक जिम्मेदारी है कि लड़कों को लड़का बनाया जाए। अब स्कूल से ये क्या सिख पढ़ कर आते हैं। कुछ नही। सिर्फ होर्लिक्स पी लेने से टॉलर स्ट्रॉन्गर और स्मार्टर नही बना जाता। हम ही हैं जो इन टोडलर्स को चलना सिखाते हैं।
  कायदे से यही वो जगह है जहाँ इन जाहिलों को इंसान बनाया जाता है।”
  तभी सीपी की नज़र एक जूनियर पर पड़ी जो थर्ड बटन से सर ऊपर कर के देखने की कोशिश कर रहा था कि सीपी का जोरदार तमाचा उसके चेहरे को लाल कर गया।
   जोश ही जोश में तमाचा इतना ज़ोर का पड़ा की लड़का घूम कर ज़मीन पर गिरा और बेहोश हो गया…

  वहीं चबूतरे पर बैठे अभिमन्यु और बाकी लड़के भी भाग कर देखने चले आये।
  लड़कों में हड़कंप मच गया। कम्प्यूटर वाले लड़के डर के मारे अपनी बिल्डिंग को खिसक लिए। सीपी को लगा नही था कि उसका पंजा ऐसा फौलाद का है। आश्चर्य से वो कभी उस बेहोश जूनी को तो कभी अपने हाथ को देख रहा था कि अभिमन्यु ने लड़के को उठाया और अपने कंधे पर डाल मेडिकल की तरफ भाग चला।
   अधीर भी उसके पीछे हो लिया।

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   लंबा चौड़ा अभिमन्यु उस नाजुक दुबले पतले से जूनियर लड़के को कंधे पर लिए बिल्कुल साक्षात सती को कंधो पर लिये महादेव सा चला जा रहा था।

  मेडिकल में गेट पर  से घुसते ही बायीं ओर कॉलेज का हॉस्पिटल था। अभि उसी तरफ निकल गया…

“ला यार थोड़ी देर मैं भी पकड़ लूँ। “

  अधीर के इस प्रोपोजल के आते में ही मेडिकल कैम्पस में खड़ी स्ट्रेचर लिए वार्डबॉय भागा चला आया…

” क्या हुआ है लड़के को? “

  डॉक्टर के सवाल पर अभिमन्यु ने ही जवाब दिया..

” बेहोश हो गया है। “

” वो तो दिख रहा है। बेहोश कैसे हुआ? “

  अभि और अधीर एक दूसरे को देखने लगे। डॉक्टर के सामने ये बताना कि रैगिंग में पड़े थप्पड़ ने ये हाल किया है महंगा पड़ सकता था।

” इसने ब्रेकफास्ट नही किया था डॉक्टर!”

ड़ॉक्टर ने अजीब सी नज़रों से अभि को घूर कर देखा और लड़के को साथ लिए अंदर चला गया।

  अभी और अधीर के पीछे सीपी और उसके 1-2 चेले भी भागते हुए मेडिकल चले आए। सीपी और चेले वहीं बाहर बैठ गए।

   अभि और अधीर इधर उधर भटकते उस लड़के के होश में आने का इंतज़ार कर रहे थे कि कहीं से मधुर सी गाने की आवाज़ चली आयी। दोनों उसी दिशा में बढ़ चले…

  मेडिकल प्रथम वर्ष के छात्रों का आज अस्पताल विज़िट करने का पहला दिन था और आज ये नन्हे-मुन्ने बच्चे रेजिडेंट डॉक्टर्स के हत्थे चढ़ गए थे।
   असल में इन्हें इनके कुछ सीनियर्स ने अस्पताल की ओपीडी से कुछ आवश्यक सामान लाने का बेइंतिहा गैरजरूरी काम दिया था।
   इसी चक्कर में ये चार पांच लड़के लड़कियां यहाँ फंस गए थे।
वैसे रेजिडेंट डॉक्टर्स इतना व्यस्त होते थे कि वो जूनियर्स की रैगिंग लेते नहीं थे। लेकिन पिछले दिन की हेक्टिक शेड्यूल की थकान उतारने के लिए आज उनके पास जूनियर्स नाम का एंटरटेनमेंट मौजूद था। और बस इस एंटरटेनमेंट की बहार देखते हुए रेजिडेंट डॉक्टरों का भी उ ला ला करने का मन करने लगा।
  डॉक्टर्स ड्यूटी रूम में इन जूनियर्स की रैगिंग चल रही थी।
  इत्तेफाक से रंगोली ही उस रैगिंग की सबसे पहली शिकार बनी थी। सीनियर से उसे गाना सुनाने को कहा था और वह अपने गले को साफ कर गाना शुरू कर चुकी थी।

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देख लो हमको करीब से
आज हम मिले हैं नसीब से
     यह पल फिर कहां
    और यह मंजर फिर कहां
  गजब का है दिन सोचो जरा
   यह दीवानापन देखो जरा
तुम भी अकेले हम भी अकेले मजा आ रहा है कसम से…..

   कमरे के ठीक बाहर खड़े अभिमन्यु और अधीर के कानों तक भी यह स्वर लहरी पहुंच चुकी थी। आवाज का नशा अभिमन्यु पर ऐसा छाया कि बेहोशी के आलम में उसने दरवाजा धीरे से खोल दिया…
उसके दरवाजा खोलते ही सारे सीनियर्स अपनी जगह से उठकर खड़े हो गए। जूनियर्स पहले ही खड़े थे जो थर्ड बटन में थे   वह लोग भी दरवाजे की तरफ देखने लगे । अभिमन्यु और अधीर को ऐसे सामने खड़े देख एक सीनियर रेजिडेंट ने उन लोगों से पूछ लिया…-” आप लोग कौन हैं यहां क्या कर रहे हैं?”

“हम इंजीनियरिंग के हैं ,एक मरीज लेकर आए थे।”

“मरीज लेकर आए थे? क्या हुआ तुम्हारे मरीज को?”

“जरा चक्कर आ गया था।”

“हां तो ठीक है! लेकिन यहां क्या कर रहे हो? मरीज को भर्ती करवा दिया है ना ड्रिप चढ़ेगी शाम तक बंदा अपने पैरों पर चलकर इंजीनियरिंग कैम्पस वापस आ जाएगा इसलिए अब  फुटो यहां से।”

अभिमन्यु ने रंगोली को देखा रंगोली ने अभिमन्यु को और अभिमन्यु के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कुराहट आ गई!  पास खड़ी झनक ने रंगोली को तुरंत कोहनी मारी….-” देख आखिर तेरा पति  तुझे ढूंढता यहाँ तक चला आया।
“चुप कर बकवास मत कर।”
रंगोली  जितना धीमा बोल सकती थी उतना धीमा बोली लेकिन उसने इतना धीमा बोल दिया कि पास खड़ी झनक तक को सुनाई नहीं दिया और झनक ने इतनी जोर से “क्या” कहा कि सारे रेजीडेंट डॉक्टर उन दोनों को देखने लगे।

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  उसी वक्त बाहर से गुजरते मृत्युंजय की नजर डॉक्टर्स ड्यूटी रूम पर पड़ गई। वह अभिमन्यु और अधीर को हाथ से हटा कर दरवाजे से भीतर चला आया…-” क्या हो रहा है यहां पर?”
सारे जूनियर रेजीडेंट डॉक्टर घबराकर एक तरफ खड़े हो गए …-“कुछ नहीं सर! वह बस जरा यह फर्स्ट ईयर जूनियर्स हैं इन्हें एनाटॉमी पढ़ा रहे थे।”
“एनाटॉमी पढ़ाना है, तो लैब में पढ़ाया करो। यहां बिना बोन और बिना किसी ऑर्गन के तुम लोग एनाटॉमी कैसे पढ़ा रहे हो?”
मृत्युंजय ने जूनियर की तरफ देखा और उन्हें वहां से जाने की इजाजत दे दी।

  उस कमरे से बाहर निकलते ही जूनियर्स ने चैन की सांस ली… -“यहां तो यार हर मोड़ पर आतंक छाया हुआ है! वह गाना आज मेरी समझ में आ रहा है, यहाँ रोज-रोज हर मोड़ मोड़ पर होता है कोई ना कोई हादसा।  बस उन्हीं हादसों का अड्डा है हमारा कॉलेज। क्लास में बैठते हैं तो फँस जाते हैं। लैब में जाते हैं तो फँस जाते हैं। हॉस्पिटल आते हैं तो भी फँस जाते हैं। जहां देखो वहां सीनियर का आतंक है। आखिर कब बच पाएंगे हम लोग।”
   झनक की बात पर साथ चल रहा लड़का राहुल हंसने लगा…-” तुम लोग तो फिर भी लड़कियां हो यार! तुम बच जाती हो, हम लोगों के साथ हॉस्टल में भी इतनी ज्यादा अति होती है कि हम बता नहीं सकते।”
  “प्लीज बता ना क्या रैगिंग होती है तुम लोगों के साथ।”
  ” चुप कर! नहीं बताना।”
“अरे ऐसा क्या करते हैं भई सीनियर बता ना प्लीज।”
“होती है बॉयज वाली रैगिंग! जैसे तुम्हारी गर्ल्स प्रॉब्लम तुम हमसे शेयर नही कर सकती, हम भी नही कर सकते ।”
” बड़ा आया। मत बता।”
   वो लोग बातें करते अगर बढ़ ही रहे थे कि पीछे से उन्हें आवाज़ लगाते अभिमन्यु और अधीर चले आये…
” एक्सक्यूज मी गाइज़! आप लोग मेडिकोज हैं?
   अभिमन्यु के सवाल पर रंगोली के अलावा बाकी लोगों ने उसे घूर कर देखा..-” हां जी आपको क्या प्रॉब्लम है?”
“नो नो! कोई तकलीफ नहीं है । एक्चुली मैं कुछ जानना चाहता था मेडिकल टर्म्स में।”
राहुल ने उसे बिल्कुल ही हिकारत भरी नज़रों से घूर कर देखा।
” भाई मेरे! ऐसे घूर कर मत देख! मैं भी कोई ऐवें नहीं हूं। इंजीनियरिंग कर रहा हूं, मेकेनिकल से। और उम्र के लिहाज से देखा जाए तो तुम सबसे दो-तीन साल बड़ा ही हूंगा। और प्रोफेशनल कॉलेज के हिसाब से देखा जाए तो यूनिवर्सिटी सीनियर हूं तुम्हारा।”
अबकी बार जवाब राहुल की जगह अतुल ने दिया…-” जी कहिए क्या पूछना है आपको।”

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“दोस्त कहीं आराम से बैठ कर बात कर सकते हैं । ज़रा सीरियस मुद्दा है।”
“ओके बाय गाइज़। तुम लोग बैठ कर बातें करो मैं और रंगोली चलते हैं।” झनक रंगोली का हाथ थामे आगे बढ़ने लगी कि अभिमन्यु उन दोनों के सामने अचानक से जाकर खड़ा हो गया….-” अरे मैडम! प्लीज रूके ना आप चार डॉक्टर रहेंगे, तो मेरी समस्या को आप लोग आसानी से समझ कर सुलझा सकते हैं । आप मेडिकल की पढ़ाई करने आई हैं। आप लोगों का तो पेशा ही है लोगों के दुख दर्द सुनना।”
   झनक ने एक नजर अभिमन्यु को देखा और हां में सर हिला दिया।
   रंगोली का वहां रुकने का बिल्कुल मन नहीं था वह झनक का हाथ पकड़े बार-बार उसके हाथ पर दबाव बनाती वहां से निकल चलने की गुजारिश कर रही थी।
    उन चारों डॉक्टरों के साथ अभिमन्यु और अधीर मेडिकल कैंटीन में पहुंच गए।
  वह चारों अभी फर्स्ट ईयर में थे इसलिए कायदे से उन्हें कैंटीन जाना अलाउड नहीं था। और यह बात उन चारों को मालूम नही थी, अनभिज्ञता में वह चारों अभिमन्यु के साथ कैंटीन में प्रवेश कर गये।
   कैंटीन में काम करने वाला लड़का झाड़न अपने कंधे पर लटकाए उन तक चला आया…-‘ फर्स्ट ईयर के लगते हो आप लोग।”
  झनक ने उसे घूर कर देखा…-” हां तो!”
“तो यह कि अगर सीनियर्स ने देख लिया कि फर्स्ट ईयर में वेलकम पार्टी मिले बिना आप लोग कैंटीन चले आए हो तो…?”
“तो क्या बे? हम लोगों को सिखा रहा है!” अबकी बार राहुल उलझ पड़ा।
“मैं क्या सिखाऊंगा? आप लोगों को रात में वह सामने पीपल पर लटकी उल्टी चुड़ैल सब कुछ सिखा देगी।”
“अरे गुरु घंटाल! यह लोग खुद से नहीं आए मैं इन लोगों को लेकर आया हूं! और मैं फिस्थ सेमेस्टर में हूं यानी कि सीनियर बन चुका हूं यूनिवर्सिटी का । और यूनिवर्सिटी के हर कैंटीन में हमें जाना अलाउड है, आई बात समझ में।”

अजीब सा मुहँ बनाकर उनके टेबल पर झाड़न मार कर वह लड़का जाने लग गया….-” अबे जाते-जाते ऑर्डर तो ले जा।”
“क्या लोगे आप लोग?” उसने एक नजर सब को घूर कर फिर पूछा….
” तेरे यहां का सबसे स्वादिष्ट व्यंजन क्या है ?”
“इस वक्त सिर्फ मैगी और सैंडविच मिलेगा।”
“और पीने के लिए ?”
   अभिमन्यु ने मुस्कुराते हुए पूछा…
” आप जो पीते हो वो कतई नही मिलेगा।
उस लड़के ने एक नज़रअभिमन्यु को देखा और अपनी ही कही बात संभाल ली…-” स्ट्रौबरी शेक।”
अभिमन्यु का मुंह बन गया उसने कहा …-“इन चारों के लिए वही ले आ।”
“अब बोलो? कौन सी  मेडिकल इमरजेंसी के बारे में पूछना था तुम्हें? झनक के सवाल पर अभिमन्यु मुस्कुराने लगा।
“अबे ओए टॉम क्रूज दांत बाद में दिखाना पहले फटाफट बता तेरी प्रॉब्लम क्या है ?” अबकी बार राहुल लपका
“वह प्रॉब्लम यह है कि मेरा एक दोस्त है उसकी याददाश्त जरा गुम होने लगी है! सुबह ब्रश किया है कि नहीं उसे कुछ याद नहीं रहता।  कई बार रात में सोता है लेकिन सुबह उठने पर फिर कहता है मैं तो रात भर सोया ही नहीं। नहा कर आता है, और फिर नहाने चला जाता है। खाने का तो पूछो ही मत जितनी बार दे दो हर बार खा जाता है। क्योंकि वह यही भूल चुका होता है कि वह खा चुका है। और तो और कई बार यह भी भूल जाता है कि वह सुसु पॉटी करके आ चुका है। इस प्रॉब्लम का इस समस्या का कोई समाधान है आप लोगों के पास डॉक्टर?”
“अबे यार कौन है यह नमूना? “
अभिमन्यु ने अधीर की तरफ इशारा कर दिया अधीर ने उसे घूर कर देखा और अपनी जगह से खड़ा हो गया…
” शरमा गया बेचारा। क्या है ना ऐसी समस्या है कि बाहर किसी से डिस्कस नहीं कर सकते, आप लोगों को देखकर लगा जैसे दिल से आपसे रिश्ता है। इसीलिए आपसे यह तकलीफ कह गया।”

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    अभिमन्यु अपनी बात कहते हुए रंगोली को देखता रहा। रंगोली ने घबराकर पलके नीचे कर ली। वह झनक का हाथ इतनी जोर से पकड़ी हुई थी, कि अब झनक को हाथ में दर्द होने लगा था। झनक अपनी जगह से खड़ी हो गई…-” चल रंगोली अब हम वापस जाते हैं हॉस्टल के लिए लेट हो रहे हैं।’
   वह दोनों वहां से निकलने को ही थी कि चार पांच सीनियर लड़कों की टोली उनका रास्ता रोक खड़ी हो गयी…
” फर्स्ट ईयर? “उनमें से एक ने कड़क कर पूछा।
“यस सर!” मिमियाती सी आवाज़ में राहुल ने जवाब दिया
” वेलकम पार्टी के पहले कैंटीन जूनीज़ के लिए अलाउड नही है। तुम लोगो को मालूम नही था।”
” वी आर सो सॉरी सर। हमें वाकई मालूम नही था। “
” अच्छा बेटा! और फर्स्ट मन्थ में ही तितलियों को लेकर कैंटीन घूम रहें हो। “
  रंगोली के लिए तितली सम्बोधन सुन अभिमन्यु का खून खौल उठा…-“माइंड योर लैंग्वेज, व्हाटएवर इस योर नेम? “
” तू कौन है बे? बीच में बोलने वाला? मेडिको तो नही है!”
” मेकेनिकल इंजीनियरिंग थर्ड ईयर का स्टूडेंट हूँ,नाम अभिमन्यु है। “
” तो बेटा अभिमन्यु तेरे गुर्दो में दर्द क्यों हो रहा जब हम अपने बच्चों को डांट रहे। “
” डाँटो लेकिन तमीज से। अगर गर्ल्स के लिए कोई बदतमीजी करोगे तो मैं सहन नही करूँगा। “
” क्यों बे तेरी सेटिंग है क्या ये। ” उसने रंगोली की तरफ इशारा किया..
” हां है। और आज के बाद इसे परेशान किया तो नाम याद रख लेना अभिमन्यु से बुरा कोई नही होगा।”
  अभिमन्यु उसे धमका कर निकल गया,अधीर भी उसके पीछे गिरता पड़ता भाग गया।
   इतनी सारी बहस के बीच पीछे खड़े सीनियर्स के इशारे पर वो सारे जूनियर्स भी वहाँ से खिसक लिए।
” वेलकम बेटा अभिमन्यु! मेडिकल के चक्रव्यूह में तुम्हारा स्वागत है। जानते नही हो तुम, तुम्हारा पाला ऋषि खुराना से पड़ा है।”
   खून का घूंट पीकर ऋषि खुराना भी अपनी गैंग के साथ निकल गया।

   वहीं पीछे एक सबसे किनारे की टेबल पर गौरी बैठी अपनी नोटबुक में कुछ लिख रही थी।
  उसकी एकमात्र खास सहेली प्रिया किसी काम से स्टाफ रूम गयी थी। उसी का इंतज़ार करती गौरी अपनी नोटबुक खोली बैठी थी कि तभी विधायक नारायण दत्त का लड़का वेदांत वहाँ अपनी टोली के साथ चला आया।
   यही वो लड़का था जिसके इधर उधर तफरीह करने से परेशान सीपी सर अभिमन्यु और बाकियों को लिए निरमा से मिलने गए थे।
   कैंटीन में सारे टेबल भरे थे। गौरी के सामने तीन कुर्सियां खाली पड़ी देख वेदांत ने एक कुर्सी पकड़ कर पीछे खींची और बैठने को था कि मृत्युंजय आकर उस कुर्सी पर बैठ गया।
    मृत्युंजय ने वेदांत को देख उसे थैंक्स बोला और गौरी की तरफ देखने लगा।
  गौरी वेदांत के व्यवहार को देखते हुए अचरज में थी कि मृत्युंजय आ गया और उसे देख गौरी के चेहरे पर सुकून लौट आया।
   उन दोनों को एक दूसरे को देखते देख वेदांत वहाँ से हट गया कि तभी उसके एक चेले ने उसे आवाज़ लगा दी…-” गुरु यहाँ टेबल खाली है। आ जाओ।”
   एक नज़र गौरी को घूर कर वेदांत आगे बढ़ गया…

“, थैंक यू सर। आप हमेशा मेरी परेशानी में मेरा साथ देने खड़े रहते हैं।”
” इट्स माय प्लेजर गौरी। और बताओ कैसी हो तुम?”
“ठीक हूँ । अभी एक हफ्ते से मेडिसिन बंद की है। और मुझे नींद भी सही या रही है।”
” इट्स गुड! लेकिन एकदम से विड्रॉ नही करेंगे। धीरे धीरे ही मेडिसिन छोड़ना।”

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” जी सर। “
” कॉफी लोगी? “
गौरी ने हाँ में सिर हिला दिया…
दोनो साथ बैठे कॉफी पीते इधर उधर की बातें करते रहे।
     जय के साथ होने पर गौरी के चेहरे पर काफी समय बाद मुस्काने लौटने लगीं थीं…..

क्रमशः

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aparna…

खुरापातें….

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Son :- मॉमा s e r लिखुँ या s r e ? सर की स्पेलिंग के लिए?

मॉम:- sir …..😡😡😡

#online classes rocks

#kids rockstars…

Originally mine u can share it…😂😂

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aparna …

कुछ खुरापातें…

She posted a ‘roti aloo ki sbji and dal ki thali ” photo on her wall and wrote …

Friday lunch….

खुरापाती ख्याल आया कि लिख दूँ

–चल finally तुझे खाना तो मिला।

पर मन की मन में रह गयी,नही लिख पायी, संस्कार बहुत है न मुझमें।

Next day she again posted her photo and wrote .. gain half kg after eating my favorite panipuri…

एक और खुरापात आई दिमाग में …

अच्छा हुआ बहन कुछ तो गेन किया वरना जिस ढंग से तू डाइट कर के पतली हो रही है, यूनेस्को वाले तुझे देख हमारे यहाँ अकाल न घोषित कर दें।

पर कह नही पायी क्योंकि संस्कार बहुत है ना मुझमें।

टायफाइड – लक्षण और उपचार

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टायफाइड:—

    टाइफाइड एक बैक्टीरिया से फैलने वाली  ऐसी बीमारी है जो ज्यादातर दूषित पानी और दूषित भोजन के कारण मनुष्य की आंतों में असर कर पूरे शरीर में लक्षणों को उत्पन्न करती है। टाइफाइड मुख्य रूप से एक तरह का ऐसा बुखार है जो कि बैक्टीरिया के संक्रमण से उत्पन्न होता है।
    टाइफाइड की उत्पत्ति में कारक है सालमोनेला टायफिमयूरीयम।
सालमोनेला पैराटायफी भी टाइफाइड की उत्पत्ति में सहयोगी बैक्टीरिया है।

    मुख्य रूप से बाहर के खाने पीने दूषित जल संक्रमित भोज्य पदार्थ आधे पके भोज्य पदार्थ, सड़े और पर्युषित खाने से टाइफाइड की उत्पत्ति होती है। टाइफाइड का बैक्टीरिया मनुष्य की आंत में संक्रमण उत्पन्न कर मुख्य रूप से पेट से संबंधित लक्षणों को उत्पन्न करता है। इंफेक्शन बढ़ने पर मनुष्य में सर्व शरीर गत लक्षणों की उत्पत्ति होती है, जिनमें मुख्य रुप से बुखार आना सिर में दर्द बना रहना सारे शरीर में दर्द बना रहना आदि प्रमुख लक्षण  हैं।

    टाइफाइड का इनक्यूबेशन पीरियड लगभग 1 से 2 सप्ताह है जब की बीमारी की अवस्था तीन से 4 सप्ताह तक बनी रहती है।

    टाइफाइड के लक्षण सामान्यता दवा शुरू करने के बाद 3 से 5 दिन में समाप्त हो जाते हैं कभी-कभी किसी केस में यह लक्षण 2 से 3 सप्ताह तक भी पाए जाते हैं ।
    सही चिकित्सा और पथ्य अपथ्य के अभाव में बहुत बार लक्षणों में जटिलताओं की उत्पत्ति होने के कारण टाइफाइड पलट कर दोबारा हो जाता है। बहुत बार एंटीबायोटिक का कोर्स करना टाइफाइड में जरूरी होता है कोर्स कंप्लीट नहीं करने पर भी टाइफाइड दुबारा पलटकर हो सकता है। टाइफाइड को गंभीर बीमारी माने जाने का मुख्य कारण यही है कि अगर पूरी तरह से बैक्टीरिया का सफाया ना किया जाए तो यह बार-बार होने वाली बीमारी में से एक है जो कि आगे चलकर आंतों को कमजोर कर देता है। इसीलिए टाइफाइड के लिए कहा जाता है कि बीमारी से बचाव अधिक कारगर है। टाइफाइड से बचाव आसान है पानी उबालकर पीना, साफ सफाई रखना और शुद्ध और गर्म भोज्य पदार्थों का सेवन करना हमेशा टाइफाइड से सुरक्षा का कारण बनता है।

  टाइफाइड के लक्षण:–

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बुखार या ज्वर टाइफाईड का सर्वप्रमुख लक्षण है।

-जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता जाता है वैसे-वैसे ही भूख भी धीरे-धीरे कम होती जाती है।

-टाइफाइड से ग्रस्त रोगी को सिर दर्द होता है।

-शरीर में दर्द का बने रहना, वेदना होना।

-ठण्ड तथा कंपकपी  की अनुभूति होना।

– शरीर में सुस्ती एवं आलस्य का अनुभव होना।

-शरीर में कमजोरी का बने रहना।

•- दस्त होना।

•-उल्टी होना।

कब जाने कि रोगी को डॉक्टर के पास जाना चाहिए?

टाइफाइड के रोगी को अगर बुखार लगातार बना हुआ है, सर में दर्द है खाने का मन नहीं करता तो ऐसे में रोगी को बिना देर किए डॉक्टर के पास चले जाना चाहिए । क्योंकि टाइफाइड का इन्फेक्शन बहुत देर तक आंतों में रहने पर आंत्रशोथ की स्थिति उत्पन्न करता है ऐसे में आंतों में घाव बनकर छेद हो जाते हैं यह टाइफाइड की वह गंभीर स्थिति है जिसमें मल त्याग के समय रोगी को कई बार रक्तस्त्राव भी हो सकता है। यह स्थिति आगे चलकर कई विषमताओं को उत्पन्न करती है, इसलिए समय रहते टाइफाइड के रोगी को लक्षणों के नजर आते ही डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

टाइफाइड एक ऐसी बीमारी है जिसमें चिकित्सा से बेहतर बचाव है आइए जानते हैं टाइफाइड के बचाव के उपायों के बारे में:–

खान पान में बदलाव कर:–

हमेशा हल्के और सुपाच्य आहार का सेवन करें।

ताजा और गर्म भोज्य पदार्थ ही सेवन करें

पानी उबालकर पिए अथवा फिल्टर कर अथवा बोतलबंद पानी का या केमिकल युक्त पानी का सेवन करें।

डिब्बाबंद भोज्य पदार्थ, बाहर की खाने-पीने की वस्तुएं, तथा बासी भोजन पदार्थों का सेवन ना करें।

अत्यधिक प्याज लहसुन आदि तेज गंध युक्त भोज्य पदार्थ अधिक मसालेदार अधिक तैलीय चटपटा मिर्च मसालेदार सिरका युक्त भोज्य पदार्थों का त्याग करे।

मांसाहार के सेवन से दूर रहें।

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पचने में भारी और गरिष्ठ सब्जियां और फल जैसे अनानास कटहल आदि का प्रयोग कम करें।

देर से पचने वाले आहार ओं का सेवन कम करें और अत्यधिक पेट भर कर कोई भी चीज ना खाएं

शराब सिगरेट चरस गुटका तंबाकू पान इत्यादि का सेवन न करें।

अन्य सावधानियां:–

भोजन से पहले हमेशा हाथों को गर्म पानी से धोएं।

खाने से पहले फलों और कच्ची सब्जियों को धोकर ही खाएं।

हमेशा साफ पानी का प्रयोग ब्रश करने चेहरे और हाथों को साफ करने तथा सब्जियों फल आदि को धोने के लिए करें।

कैसा भोजन करें:–

टाइफाइड में क्योंकि रोगी के शरीर में डिहाइड्रेशन के कारण बहुत बार कमजोरी पैदा हो जाती है इसलिए उस कमजोरी को दूर करने के लिए उच्च कैलोरी युक्त उच्च कार्बोहाइड्रेट से भरपूर भोजन को सम्मिलित करना चाहिए। इसके साथ ही शरीर में हुई जल धातु की कमी को पूरा करने के लिए तरल वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए। जैसे पतली खिचड़ी, फलों के रस ,सब्जियों के सूप इत्यादि के प्रयोग से रोगी के शरीर से हुई तरल की कमी को पूरा किया जा सकता है। टाइफाइड के रोगी को रोग से उठने के बाद उच्च मात्रा में डेरी प्रोडक्ट दूध दही पनीर अंडे अर्थात उच्च प्रोटीन का भी सेवन करना चाहिए।

  ओमेगा 3 फैटी एसिड से युक्त आहार शरीर में उत्पन्न सूजन को कम करने में सहायक होते हैं। टाइफाइड बुखार से होने वाली हानि को सही करने के लिए सही मात्रा में खनिज इलेक्ट्रोलाइट और ओमेगा 3 फैटी एसिड की भी आवश्यकता होती है।

टायफाइड की चिकित्सा:

   टाइफाइड बुखार की चिकित्सा मुख्य रूप से संक्रमण को रोककर या एंटीबायोटिक दवाओं द्वारा संक्रमण के उपचार को करके की जाती है।
   टाइफाइड संक्रमण को रोकने के लिए दी जाने वाली एंटीबायोटिक दवाइयों के नाम हैं 1)अमाक्सीसिलिन
2)एंपीसिलीन
3)क्लोरेंफेनीकोल
4)ट्राइमेथोप्रिम
5) सल्फेमेथाक्साजोल इत्यादि….

अगर रोगी दवाओं के साथ भोजन करने में समर्थ है तो तरल पदार्थों खिचड़ी फलों का जूस इत्यादि का सेवन दवाओं के साथ करवाना उचित रहता है। किंतु कई अन्य रोगी इस तरह के होते हैं जिनमें उल्टी की समस्या बहुत अधिक होती है ऐसे में वह मुख द्वारा कोई भी दवा लेने में अक्षम होते हैं ऐसे रोगियों को एन एस फ्लूइड पर रखकर इंजेक्टबल दवाओं का प्रयोग किया जाता है बहुत सारे उपद्रव से ग्रस्त टाइफाइड के रोगी में बहुत बार पित्ताशय की थैली सर्जरी करके निकालनी भी पड़ सकती है।

टायफाइड की रोकथाम :–

टाइफाइड से सुरक्षा का सर्वश्रेष्ठ उपाय है स्वच्छता के नियमों का पूर्ण पालन करना।

1) भोजन पकाने हेतु और फलों और सब्जियों को धोने के लिए सदा साफ और बहते जल का प्रयोग करें।

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2) घर पर पानी के जिस बर्तन में पानी को स्टोर किया जाता है हमेशा ढक कर रखें।

3) पीने के पानी को हो सके तो हर मौसम में उबालकर पीएं अथवा कम से कम बारिश के मौसम में उबालकर ही प्रयोग में लाएं ।

4)वाटर फिल्टर का प्रयोग भी किया जा सकता है।

5) भोज्य पदार्थ हमेशा गर्म और तुरंत पकाए हुए ही प्रयोग करें पर्युषित सड़ा गला अधपका खाना ना खाएं।

6) बाहर के भोज्य पदार्थों को चाट के ठेले गली नुक्कड़ के भुज पदार्थों को खाना अवॉइड करें।

7) घर पर पानी के निर्गमन और संधारण का प्रबंध स्वछता पूर्वक करें ।

8)भोजन बनाने वाले बर्तनों की सफाई पर भी उचित

ध्यान रखें।

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9) खाना हमेशा हाथ धोकर खाएं.. शौच के पश्चात घर में बाहर कहीं से आने के पश्चात और भोजन से पूर्व तथा भोजन के पश्चात हमेशा हाथ किसी मेडिकेटेड सॉप से धोना सुनिश्चित करें।

10) समय-समय पर हैंड सैनिटाइजर का प्रयोग भी करें।

11) टाइफाइड के लिए टीका भी उपलब्ध है जो लगभग 2 वर्षों तक प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखता है टीके का प्रयोग करके भी टाइफाइड से बचा जा सकता है।

टायफाइड में घरेलू उपाय:–

कई अन्य ऐसे घरेलू उपाय हैं जिनके प्रयोग से टाइफाइड से बचा जा सकता है यह उपाय निम्न है:–

1) फलों का रस:– मौसमी फलों का जूस निकालकर टाइफाइड के रोगी को दिया जा सकता है संतरा मोसंबी अनार आदि के जूस टाइफाइड में शरीर में होने वाली तरल की हानि को दूर करते हैं।

2) सेब का रस:– सेब के रस में समान मात्रा में अदरक का स्वरस मिलाकर रोगियों को देने से पद्य का कार्य करता है।

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3) तुलसी :– आयुर्वेद के अनुसार तुलसी पत्र स्वरस का प्रयोग भी किया जाता है।

4)लौंग:– आयुर्वेद के अनुसार लौंग का ताजा निर्मित क्वाथ भी टाइफाइड में दिया जाता है। इसमें लगभग 2 गिलास पानी में 4 लौंग डालकर इसे इतना उबालना है कि वह एक चौथाई शेष रह जाए तब  इसका पान करना है।
    सुबह और शाम समान मात्रा में एक कप लौंग का पानी अत्यधिक फायदेमंद है।

5) शहद :– गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद मिलाकर रोगी को दिया जा सकता है।

6 ) लहसन ;– आयुर्वेद मतानुसार 6 से 7 कच्ची लहसुन को कुचलकर लहसुन कल्क बनाकर सेंधा नमक के साथ मिलाकर टाइफाइड के रोगी को बुखार में दें।

7) कुछ आयुर्वेद औषधियां जैसे विषम ज्वरहरलोह ज्वरअंकुश रस ज्वर मुरारी इत्यादि ऐसी औषधियां है जो टाइफाइड के रोगी में बुखार को उतार कर उसके इम्यून सिस्टम को  मजबूत करती हैं।

8) आयुष 64 के कैप्सूल भी दिए जा सकते हैं।

  इस प्रकार सही समय पर टाइफाइड के लक्षणों को पहचान कर अगर रोगी डॉक्टर के पास पहुंच जाता है और उचित दवाओं के साथ पथ्य अपथ्य का भी सेवन करता है तो इस रोग को आसानी से पराजित कर सकता है और स्वास्थ्य लाभ पा सकता है।

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डॉ अपर्णा मिश्रा







ओ स्त्री!!!

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पुरुष के मन मस्तिष्क
शब्द हृदय
हर जगह छाई हो।
ओ स्त्री!!!
तुम कहाँ से आई हो?

वो कहता है
मैंने तुझे पंख दिए।
परवाज़ दिए
उड़ लो, जितना मैं चाहूं
ओ स्त्री !!!
क्या तुम उसकी मोहताज हो?

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उसका घरौंदा बनाया
तिनका तिनका सजाया
पर जब वक्त आया तुम्हारा
उसने तुम्हें
अपने पैरों पे गिराया
ओ स्त्री!!!
तुम कैसे उसकी सरताज हो?

वो बेबाक है बिंदास है
जो जी में आये
करने को आज़ाद है
कूबत तो तुम्हारी भी है
फिर
ओ स्त्री!!!
तुम क्यों हर मर्तबा
झुकने को तैयार हो?

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कभी ये ना पहनो
का अधिकार
कभी ऐसे न बोलो
का अहंकार
पर हर दफा उसकी
सुन कर चुप
रह जाने वाली
ओ स्त्री!!!
तुम खुद में एक अंगार हो

क्यों जानती नही,
तुम खुद को मानती नही
वो ‘मैं’ में अड़ा रहता है,
क्यों  पहचानती नही?
तुम खुद को घोल घोल
ज़िन्दगी को पी गयी
ओ स्त्री !!!
तुम स्वयं एक संसार हो…

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  To be continued …..

आप सब चाहें तो मेरी इस रचना को अपने शब्दों से सजा कर आगे बढ़ा सकतें हैं…. ” ओ स्त्री!!”
  बिंदास लिखिए
   बेबाक लिखिए..

  क्योंकि..
कलम को जितना चला लो ये शिकायत नही करती…

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aparna…


Once in a blue moon!!!

Once in a blue moon – रिश्ता.कॉम

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    डिनर की प्लेट इन्हें थमा कर मैं वापस रसोई की ओर मुड़ गयी, रसोई साफ़ करने और बरतन धोने।।…..
 
     हम औरतें काम भी सारा ऐसे करती हैं जैसे कोई जंग लड़ रही हों, हाथ काम निपटाते हैं और दिमाग में युद्ध चलता रहता है, कभी सामने वाली पड़ोसन की लाल लपटें मारती नयी साड़ी, कभी सास बहू का ना देख पाया सिरियल, कभी सखी सहेलियों का फॉरेन ट्रिप तो कभी किसी खास मौके पर मायके ना जाने पाने की पीड़ा….

    लेकिन अभी तो वक्त ऐसा चल रहा कि हर औरत के दिमाग में एक ही शमशीर लहरा रही है__ हे प्रभु और कितना काम करवाओगे?? कब खुलेगा लॉकडाऊन? कब दर्शन देगी वो जिसे देखने की राह तकते तकते आंखें पथराने लगी हैं।। इतना ढ़ेर सारा काम तो अपनी आज तक की जिंदगी में कुल जमा नही किया होगा जितना इन एक महिने में कर लिया, भगवान जाने ये कोरोना हम औरतों से किस जनम का बदला ले रहा है??

    यही सब सोचते हुए मैं भी काम में लगी रहती हूँ, लेकिन इसके साथ ही पतिदेव को आराम से सोफे पर पैर पसारे हाथ में थामे रिमोट के साथ मटरगश्ती करते देख अन्दर से सुलग जाती हूँ __ इन्हीं का जीवन सही है, कोई फेर बदल नही हुआ, उल्टा वर्क फ्रॉम होम के नाम पर जल्दी उठने और भागादौड़ी से राहत मिल गयी, कोई मदद नही करेंगे बस सोफे पर लेटे लेटे ऑर्डर पास करतें जायेंगे__” मैडम समोसे खाये बहुत दिन हो गये ना? तुम बनाती भी अच्छा हो, आज शाम ट्राई कर लो फिर!!

  कभी कहेंगे __” सुनो इतना बड़ा सा तरबूज़ ले आया हूँ, सड़ा कर फेंक मत देना, ना खा पाओ तो सुबह शाम मुझे जूस बना कर दे देना”

   अब झाड़ू पोन्छा बरतन कपड़े से कुछ राहत मिले तब तो कोई एक्स्ट्रा काम करे, उस पर इनकी फ़रमाइशें…..

बेचारे फ़रमाइश एक दिन करतें हैं और उसे पूरी कर मैं सात दिन तक उसको पूरा करने की पीड़ा में सुलगती हूँ …..

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  ऐसी ही किसी बिल्कुल ही फ़िज़ूल सी इनकी इच्छा पर मेरे दिल दिमाग में द्वंद चल रहा था और मैं समेट कर सारे धोने लायक बरतन सिंक में जमा कर चुकी थी कि  साहब अपनी प्लेट थामे रसोई में चले आये__ “पनीर पसन्दा बनाने में तुम्हारा कोई जवाब नही, बहुत यमी था, अरे इतने बरतन , लाओ आज मैं साफ़ कर देता हूँ “

   पहला तो खाने की तारीफ कर दी और दूजा मेरे हाथ से धोने के लिये थामी कटोरी छीन ली…..

   ” जाओ जाओ तुम भी खाना खा लो, मैं ये सब निपटाता हूँ ।”

   हाय कहाँ संभालू इतना प्यार……. मैंने प्यार भरे गुस्से से इन्हें देखा और कटोरी वापस ले ली__

  ” आप भी ना!!! जाओ आप न्यूज़ देखो मैं ये ज़रा से तो बरतन हैं , निपटा कर आती हूँ “
   एक तरह से धकिया कर मैने इन्हें रसोई से बाहर कर दिया….. ये काउच पे मैं रसोई में , कुछ देर पहले दिमाग में जो ज्वालामुखी फटने को तैयार था वहाँ मनभावन सावन की बूंदे बरस कर उसे शांत कर चुकी थी, अपने मोबाईल पर अपने पसंदीदा गानों को सेट कर मैंने चलाया और मुस्कुराते हुए काम पर लगा गयी__

   ” मेरे यारा तेरे सदके इश्क सीखा,
         मैं तो आई जग तज के इश्क सीखा,
               जब यार करे परवाह मेरी…..”

  मधुर रोमांटिक गानों के साथ बरतन धोने का मज़ा ही अलग है, बरतन धो कर पोंछ कर करीने से जमा कर , सारा सब कुछ यथावत कर अपनी चमकीली रसोई की नज़र उतार ली।

       चेहरे पर एक मुस्कान चली आयी, काम कुछ किया नही बस मुझे रिझा कर सब करवा लिया…… साहब भी ना पक्के मैनेजर हैं , इन्हें अच्छे से पता है किस लेबर से कब और कैसे काम  निकलवाना है , अब प्राईवेट सेक्टर के बंदे लेबर से कम तो होते नही और उनके सर पर बैठे मैनेजर ठेकेदार!! खैर …..

मैंने  अपनी प्लेट लगाने के लिये केसरोल खोला कि देखा रोटी तो है ही नही__उस समय ये सोच कर नही सेंकी थी कि काम निपटा कर गरमा गरम फुल्के सेंक लूंगी, पर अब मन खट्टा सा हो रहा था, एक ही तो रोटी खानी है , सेंकू या रहने दूँ, दूध ही पीकर सो जाऊंगी…..दिमाग का ज्वालामुखी वापस प्रस्फ़ुटित होने जा ही रहा था कि साहब वापस रसोई में चले आये__
      ”  लाओ ये बेलन दो मेरे हाथ में ” मैं इनकी बात समझ पाती कि तब तक ये मेरे हाथों से बेलन ले चुके थे….

” अब तुम जाओ मैडम!! जाकर सोफे पर आराम फर्माओ, मैं तुम्हारी थाली परोस कर लाता हूँ ।”
    मेरे कुछ कहने से पहले एक तरह से जबर्दस्ती धकिया के इन्होंने मुझे अपने आसन पर बैठा दिया और खुद गुनगुनाते हुए रसोई की ओर चल पड़े

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  ” रोज़ तो तुम्हारा खाना ठंडा हो जाता है, आज मेरे हाथ से गरमा गरम फुल्के खा ही लो।”

  ” पर सुनो एक ही बनाना!!”

  ” क्यों?? आज के लिये ये कैलरी काउंटींग छोड़ो, एक की जगह तीन रोटियाँ ना खा ली तो मेरा नाम बदल देना।”

   कुछ इनकी रसीली बातें और कुछ गरम स्वाद भरा खाना , मैं सच थोड़ा ज्यादा ही खा गयी, चेहरे पर बिल्कुल वही संतुष्टी थी जो दिन भर थक हार के काम से लौटे मजदूर के हाथ में रोटी होने से होती है…..

    पर दिल के आगे एक दिमाग भी है, जिसने तुरंत सोचना शुरु कर दिया था, पर उसी समय मैंने मन ही मन एक छोटी सी कसम ले ली कि ऐसी शानदार थाली परोसने के बदले में पतिदेव ने किचन स्लैब और गैस चूल्हे का जो सत्यानाश किया होगा चुपचाप बिना किसी हील हुज्जत के झेल लूंगी, एक बार फिर सफाई कर लूंगी लेकिन इनके इतने ढ़ेर सारे प्यार के बदले कोई ज़हर नही उगलूंगी…..
     अपनी कसम मन ही मन दुहराती प्लेट रखने रसोई में आयी की मेरी आंखे फटी की फटी रह गईं…….

…..ये क्या मेरे स्वामी तो लिक्विड सोप स्प्रे कर कर के स्लैब को रगड़ रगड़ कर साफ़ कर चुके थे, सारा काम समेट कर गुनगुनाते हुए वो हाथ धो रहे थे, पूरे 20 सैकेण्ड से और मैं उन्हें देखती सोच रहीं थी__

   हाय मैं वारी जांवा , शायद इसे ही कहतें हैं once in a blue moon……….

aparna…..

शुभकामनाएं … हिंदी दिवस की

महादेवी वर्मा

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जो तुम आ जाते एक बार

जो तुम आ जाते एक बार

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग

आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार

हँस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग

आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार

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समिधा-27

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   समिधा- 27

    केदारनाथ त्रासदी को घटे सात महीने बीत चुके थे। जिन्होंने अपने अपनों को खोया था वो उस त्रासदी को इन सात महीनों में भी नही भूल पा रहे थे, यही हाल उनका भी था जिनके अपने इस त्रासदी से वापस लौट चुके थे।

        वरुण मंदिर ट्रस्ट में स्थायी सदस्यता पा चुका था। उसके माता पिता ने भी इस बार न उसे रोका न टोका,और सहर्ष सहमति दे दी। कादम्बरी के परिवार ने ज़रूर कुछ टोकाटाकी करने की कोशिश की लेकिन वरुण का परिवार वरुण के सामने दीवार बन खड़ा रहा, फिर अपना सा मुहँ लेकर उन्हें भी लौटना ही पड़ा।
    कोलकाता के मंदिर में दो महीने बिताने के बाद वरुण और दो चार अन्य सेवादारों को मथुरा राधाकृष्ण मंदिर भेज दिया गया था।

    मंदिर में सुबह सवेरे उठ कर सारे मंदिर परिसर में झाड़ू लगाने के बाद पानी का छिड़काव कर वरुण अपने दो साथी सेवादारों के साथ पोंछा लगाया करता।
     मंदिर की ही पुष्पवाटिका से चुन चुन कर लाये फूलों की फिर सारे लोग मिल कर लंबी सी माला गूंथते और द्वारिकाधीश का श्रृंगार होता।
      दोपहर बाद सभी एक साथ बैठे भजन गाया करते।
   इस सब के साथ ही सुबह और शाम का समय वेदाध्ययन के लिए भी निश्चित था।
   वरुण को ये सारे कार्य प्रिय थे। वह इन सभी कार्यों को करते हुए अपने मन को शांत रखने का पूरा प्रयास करता और उसे इन कुछ महीनों में इन कार्यों में एक सुख मिलने लगा था एक शांति मिलने लगी थी ऐसा लगने लगा था कि वह अपने कृष्ण के आसपास है और कृष्ण सिर्फ उसके ही नहीं हर किसी के आसपास हैं। और इसीलिए धीरे-धीरे वरुण की श्रद्धा इस बात पर बढ़ने लग गई थी कि जो जिसके साथ होता है वह सब कृष्ण का रचा रचाया है और इसीलिए उससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता ।
  वरुण की यही सोच उसे धीरे-धीरे शांति की तरफ ले जा रही थी, लेकिन बीच-बीच में कभी अचानक एक चेहरा उसकी खुली आंखों में झांकने चला आता। जैसे पूछ रहा हो…-” मेरा क्या कसूर था जो तुम्हारे कृष्ण ने मुझे ऐसी सजा दी ?” ऐसे समय में वरुण अपने विचारों को झटक कर कोई ना कोई किताब खोल कर पढ़ने बैठ जाया करता। लेकिन इन सारी व्यस्तताओं के बाद भी बार बार एक जोड़ी पनीली आंखें उसका पीछा करती सी लगती जैसे कह रहीं हो “वापस आ जाओ!”  उसे अक्सर यूँ लगता कि वो मन से यही सब करना चाहता तो है पर उसकी आत्मा इस सब में शामिल ही नही होना चाहती। 
सुबह और शाम के समय के अतिरिक्त रात में भी जब उसे समय मिलता वह मंदिर परिसर के कोने में बैठ अपनी किताब को पढ़ने में डूब जाया करता। वेदों का अध्ययन करते करते धीरे-धीरे उसे हिंदू धर्म की जटिलताएं समझ में आने लगी थी।
   आज तक जिन रीति-रिवाजों को मानने के लिए वह अपनी मां का मजाक उड़ाया करता था और रीति-रिवाजों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को देख पढ़ कर समझ कर उसके ज्ञान चक्षु भी खुलने लगे थे।
    मंदिर का पूरा कार्य एक ट्रस्ट के अधीन था वह ट्रस्ट पूरे भारतवर्ष ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कृष्ण मंदिर की स्थापना कर चुका था। मंदिरों में होने वाले आय-व्यय के साथ ही दानदाताओं को अधिक से अधिक दान के लिए प्रेरित करने के लिए भी मंदिर ट्रस्ट को पढ़े लिखे शिक्षित वर्ग की आवश्यकता थी और अगर वरुण जैसे युवा इस कार्य में उनका सहयोग करें तो मंदिर ट्रस्ट को लाभ ही लाभ था इसलिए वरुण की तरफ मठाधीशों का कुछ अधिक ही झुकाव था।

   मंदिर में अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग पद सृजित बहुत से सेवादार ऐसे थे जो स्वेच्छा से जीवन पर्यंत सिर्फ सेवादार ही बने रह जाते थे।लेकिन कुछ उनमें से ऐसे भी थे जो सेवादार से ऊपर के कुछ 1 पदों तक जाकर रुक जाए करते थे। लेकिन वरुण जैसे उच्च शिक्षित युवाओं को मंदिर ट्रस्ट द्वारा सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ाते हुए मंदिर के मठाधीश तक के पद तक पहुंचाए जाने की व्यवस्था थी। वैसे मंदिर में जाति धर्म या गरीबी अमीरी के नाम पर किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं था। सभी के लिए समान कार्य बांटे गए थे , और सभी को अपने हिस्से के कार्य करने ही होते थे। अंतर बस इतना होता था कि शिक्षित लोग जो विद्या अध्ययन करने में सक्षम थे उन्हें वेदों का अध्ययन करवा कर उनसे प्रवचन आदि दिलवाए जाने की व्यवस्था की जाती थी।
     पिछले कुछ समय में ही वरुण ने बहुत सारी किताबों का अध्ययन कर लिया था और जैसे-जैसे अध्ययन करता जा रहा था उसका दिमाग भी विस्तृत होता जा रहा था।
       मंदिर परिसर हर किसी के लिए खुला था लोग दर्शनों के लिए आते मंदिर में चढ़ावा चढ़ाते, और चले जाते। सब के जाने के बाद हफ्ते में एक दिन चढ़े हुए सारे चढ़ाव की गणना की जाती और उसके बाद उस धनराशि को मंदिर ट्रस्ट के पास भेज दिया जाता।
    ट्रस्ट से हर महीने एक निश्चित धनराशि मंदिर में रहने वालों के खाने पीने आदि के लिए भेज दी जाती। इन सब का हिसाब योगेंद्र जी रखा करते थे।

   मंदिर परिसर बहुत विशाल था। चारों तरफ फैली वृहत वाटिका के बीचो बीच स्थापित मंदिर में पीछे तरफ कमरे बने हुए थे जहां सेवादार और बाकी के मंदिर कर्मचारी रहा करते थे।
      उसी परिसर में एक और हटकर विधवा आश्रम बना हुआ था जहां वृद्ध युवा और बाल विधवाये रहा करती थी। आश्रम के कर्मचारियों तथा अन्य लोगों के लिए भोजन पकाने बर्तन साफ करने आदि की जिम्मेदारी इन्हीं महिलाओं की थी । महिलाओं की संख्या कम अधिक होती रहती थी। वैसे तो एक बार जिस महिला को उसके घर वाले इस आश्रम में छोड़ जाते उसका वापस अपने घर लौट पाना असंभव ही था। इसलिए अधिकतर समय उस आश्रम में महिलाओं की संख्या में वृद्धि ही हुआ करती थी, संख्या में कमी तभी आती थी जब उनमें से कोई देवलोक को चली जाया करती थी।
     उनका जीवन कठिन नहीं कठिनतम था। क्योंकि उनके जीवन में वेद अध्ययन को स्थान नहीं दिया गया था। उनमें से अधिकतर वृद्ध महिलाएं अपने आपको कृष्ण समर्पित कर चुकी थी । इसलिए उनका मन सिर्फ कृष्ण को समर्पित लोगों की सेवा से ही प्रसन्न हो जाता था। लेकिन कुछ युवा और बाल विधाएं भी थी जिन्हें अच्छा खाने और अच्छा पहनने का शौक हुआ करता था। लेकिन उस स्थान में जहां उन्हें पर्याप्त आहार भी ना मिल पाता हो,उनके शौक कौन पूछता और कौन पूरे करता?

    वह औरतें एक रटी रटाई दिनचर्या का पालन करती हुई बस जीवन जीती चली जा रही थी! जिसका ना कोई आदि था ना अंत। बहुत बार ऐसा लगता जैसे वह वहां रहते हुए बस अपनी सांसें गिन रही हैं, कि किस तरह उनकी सांसो की अवधि पूरी हो और वह स्वयं कृष्ण के लोक पहुंच जाएं। कुछ महिलाओं ने एक आध बार वहां से निकलने की भी कोशिश की, लेकिन बाहर भी उनके पास कोई और आश्रय नहीं था दो-चार दिन बाद लौट कर वापस ही आ गई थी।
        जैसे ज़िन्दगी कट रही हो बस…. बिना जीने की आरज़ू के।
   लेकिन वरुण इन बातों से अनजान था….
….. पर अब अधिक समय नही बचा था कि वो इन सारी अव्यवस्थाओं से अपरिचित रह पाता…

******

   
     देव को गए वक्त बीत चुका था। जब उसके जाने का पता चला था उस समय उसके परिवार द्वारा किये कर्मकांड में पारो की माँ और बाकी सदस्य आये और जाते वक्त पारो की माँ देव की माँ के चरणों में लोट गयी….-” गरीब की बेटी का कोई आसरा नही होता बऊ दी! पहले ही बिना बाप की थी अब माथे से पति का साया भी सरक गया। पता नही इतनी बदकिस्मत लड़की क्यों मेरे घर ही पैदा हुई। इससे तो पैदा होते ही मर जाती तो सही होता,लेकिन फिर ये बदकिस्मती कैसे देखती?
  आपके पांव पड़ती हूँ, इसका आसरा मत छीनना। यहीं कहीं किसी कोने में पड़ी रहेगी। घर की नौकरानी को भी तो दो वक्त का खाना दिया ही जाता है। उससे अधिक की अब इसे दरकार भी कहाँ रही? “

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   बोलते-बोलते जाने कितनी बार वो भरभरा के रो पड़ीं। इतने कठोर शब्द मुहँ से भी तो नही निकल पा रहे थे। कैसी मर्मान्तक पीड़ा के साथ अपनी ही बेटी के लिए नौकरानी जैसा अलंकार जोड़ना पड़ा। किस्मत लड़की से ज्यादा तो उनकी खराब थी। पहले पति का दुख सहा फिर लक्ष्मी सी बेटी का …
  … इतनी छोटी सी उम्र में ये रंगविहीन साड़ी ! ये देखने से पहले दुर्गा माँ उसे उठा लेती तो कितना अच्छा होता। कम से कम अपनी ही बेटी का ये रूप तो न देखना पड़ता।
    दिल में तो आ रहा था कि बेटी को सीने से लगाये अपने साथ ले जाये। कैसे भी कर के अपने पास रख लेगी लेकिन अभी तो वो अकेली अपनी ससुराल की गुलामी में टूट रही है फिर अपने साथ अपनी फूल सी बेटी को वैसे ही टूटते कैसे देख पाएंगी?
   दूसरी बात जब घर भर मछली भात खा रहा होगा उसकी लाड़ली को सिर्फ शाक खा कर संतोष करना पड़ेगा। पान की कितनी शौकीन थी,अब तो वो भी कहाँ खा पाएगी।
   ये सारा सब अपनी आंखों से देखना उसके लिए मृत्युतुल्य कष्ट सहने के बराबर था।
   इससे तो अपनी ससुराल में रह कर क्या कर रही क्या नही इन सब बातों से तो उन्हें फुर्सत रहेगी।
  वैसे उनके मन में एक छोटा सा लालच और भी तो था…..
   देव का छोटा भाई दर्शन पारो से एक दो साल ही तो बड़ा था। अगर पारो यहीं अपनी ससुराल में रह गयी तो हो सकता है घर वालों के मन में पारो का ब्याह दर्शन से कर देने का विचार जाग जाए। और अगर ऐसा हो गया तो इससे अच्छा पारो के लिए क्या होगा भला।
   इतने गहन दुख के बीच एक बहुत छोटी सी खुशी उनके मन को उद्भासित कर गयी ..
…..-“ऐसा क्यों कह रही हो बऊ माँ। नौकरानी सी क्यों रहेगी भला। देव के पीछे अब यही तो हमारी देव है। पारोमिता जैसी अब तक रहती आयी है वैसे ही रहेगी।”

   देव की ठाकुर माँ का स्वर उस कमरे में गूंज गया और फिर घर के किसी सदस्य की पारो को वहाँ से हटाने या निकालने की हिम्मत नही हुई।

*****

  दिन कट रहे थे सिर्फ पारो के ही नही बल्कि घर के अन्य सदस्यों के भी।
  पहले पहल किसी ने पारो से कुछ नही कहा। वो अपने कमरे में सारा सारा दिन चुपचाप पड़ी देव को याद कर ऑंसू बहाती रहती।
   कभी खिड़की पर घंटो खड़ी रह जाती। यूँ लगता जैसे उसी का इंतज़ार कर रही हो।
  उसे पता नही क्यों अंदर से यही लगता कि समय को चीरता देव उसके पास वापस चला जायेगा।
कभी अचानक ही उसका मन ये मानने से इनकार कर देता की देव नही रहा।
वो उसकी कमीज़ें धोती अपनी साड़ी के साथ सुखाती और आयरन कर अलमीरा में सजा देती। जूते भी रोज़ रोज़ साफ करती और जब देखती की पहनने वाला तो दूर दूर तक नज़र नही आ रहा तो बिलख उठती।
    अब उसका खाना उसकी सास उसकी जेठानी के हाथों उसके कमरे में ही भिजवा दिया करतीं। शायद उन्हें मन ही मन लगने लगा था कि उन सब सुहागिनों के बीच बैठ पारो अपनी रूखी थाली का निवाला कैसे ले पाएगी। लेकिन पारो की जेठानी से ये पक्षपात जाने क्यों सहन नही हुआ जा रहा था।।
  रोज़ रोज़ उसकी रूखी सूखी थाली ऊपर लेकर जाना उसके मन को मसले दे रहा था, आखिर एक दिन घर भर की औरतों की नज़र बचा कर उसने मछली के झोल भरी कटोरी पारो की थाली में रखी और दाल की कटोरी में घी भर अपने आँचल से ढाँक ऊपर ले चली।
  पारो की तो नही लेकिन उसकी खुद की सास ने देख कर उसे आधी सीढ़ियों पर ही टोक दिया। पारो उस समय छज्जे पर कपड़े सूखा रही थी। उसने भी बड़ी माँ की रुबावदार आवाज़ सुन ली और ऊपर से झांकने लगी…-” ए आनंदी! की होलो? पारो के लिए क्या माछ लेकर जा रही हो? “

आनन्दी सकपका गई। उसे नही लगा था कि उसकी चोरी ऐसे पकड़ी जाएगी। उसने बहुत धीमी आवाज़ में अपनी बात रखी…-” उसकी अभी उम्र ही क्या है माँ। इतनी छोटी सी उम्र में इतना कुछ झेल गयी , अब कम से कम ठीक से खा पी तो सके। यही तो खाने पहनने की उम्र…”

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  उसकी बात बीच में ही काट कर उसकी सास लगभग उस पर चीख पड़ी…-“अब तुम आज की लड़कियां हमें नियम बताओगी, उसकी उम्र क्या है ये हमे बताने की ज़रूरत नही है।तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है हमने। चुपचाप माछेर झोल उठा कर थाली से बाहर कर दो। “

” धीमे बोलिए मां ,वो सुन लेगी। अच्छा नही लगेगा।”

” तुम्हें नियम भंग करते हुए अच्छा लगा न तो अब मुझे कोई लेना देना नही की किसे बुरा लगेगा और किसे नही। जो सच्चाई है सो है। अगर भगवान को उस पर इतना ही तरस था दयादृष्टि थी तो उसके पति को ऐसे अकालमृत्यु नही मिलती.।

   आगे की पंक्तियों के साथ ही भावुकता में बड़ी माँ रोने लगी,क्योंकि बेटा भले ही देवरानी का था लेकिन प्रेम तो उन्हें भी उससे बहुत था। और देव की असमय मृत्यु का दुख अब पारो पर गुस्से और नाराज़गी के रूप में उतारना शुरू हो रहा था।

आनन्दी समझ गयी कि इस वक्त सास से लड़ने में कोई लाभ नही है। वो चुपचाप मछली की कटोरी हटा कर फिर थाली ऊपर ले गयी….
… धीरे से उसने पारो के कमरे के दरवाज़े को धक्का दिया,पारो पलंग पर सिर टिकाए ज़मीन पर बैठी थी।
” आओ पारो !खाना खा लो!”
 
  पारो ने ऑंसू भरी आंखों से अपनी जेठानी को देखा और फिर बाहर देखने लगी…-“मेरी प्यारी छोटी बहन कुछ तो खा लो। देखो ऐसे भूखा रहने से क्या होगा। बल्कि तुम ऐसे भूखी रहोगी तो देव बाबू की भी आत्मा तड़प उठेगी। वो कैसे सुख से रह पाएंगे भला। चलो खा लो चुपचाप। बड़ी माँ की बातों को दिल से न लगा लेना। वो सब अभी बहुत दुखी हैं। उबर नही पाएं हैं ना । तुम तो समझ सकती हो।”

पारो ने हाँ में सिर हिला दिया और नीचे देखती चुप बैठी रही।
आनन्दी को उसी वक्त नीचे से किसी ने आवाज़ दी और वो एक बार फिर पारो से खा लेने का इसरार करती बाहर चली गयी।
पारो का थाली देखने का भी जी नही किया…  उसने धीरे से थाली सरका दी जैसे थाली से नाराजगी हो कि तुम उस समय क्योँ सामने नही इठलाई जब देव बाबू साथ थे और अपने हाथो से अपनी प्रेयसी अपनी पत्नी को खिलाना चाहते थे। उस वक्त इसी थाली ने क्यों चुपके से उसके कान में  नही कहा कि खा ले पारो! फिर इतना प्रेम करने वाला जीवन में कोई नही आएगा। “

  देव के बारे में सोचते हुए वो फफक के रो पड़ी। वहीं उस गांव से कई किलोमीटर दूर मथुरा में स्वामी वरुण के सामने सेवादार थाली परोस कर रख गया, पर जाने अंदर से वरुण को कैसी बेचैनी ने घेरा की उसने उस थाली को धीरे से आगे सरका दिया…-” स्वामी ऐसा क्यों? क्या आज भोजन नही लेंगे।”

” मालूम नही केवल लेकिन आज बिल्कुल भी खाने का जी नही कर रहा। अंदर से ऐसा लग रहा जैसे हृदय में किसी बात की पीड़ा सी उबर रही है। यूँ लग रहा कोई बहुत करीबी दुख में है, अपार दुख में और मैं उसकी कोई सहायता नही कर पा रहा हूँ। अब बस कृष्ण से यही प्रार्थना है कि वो जो कोई भी है उसे जल्दी से जल्दी मुझसे मिलवा दे, जिससे अपने मन की इस बेचैनी से छुटकारा पा सकूं।”

  वरुण क्या जानता था कि उसके कॄष्ण उसके प्रिय को उससे मिलवाने की भूमिका बांध ही चुके हैं…..

क्रमशः

aparna…..
  


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जब तुम बूढ़े हो जाओगे…..

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मैं बन जाऊंगी फिर मरहम
वक्त के ज़ख्मों पर तेरे और
मुझे देख हौले हौले से
फिर तुम थोडा शरमाओगे।
जब तुम बूढे हो जाओगे।।

सुबह सवेरे ऐनक ढूंड
कानों पे मै खुद ही दूंगी ,
अखबारों से झांक लगा के
तुम धीरे से मुस्काओगे।
जब तुम बूढे हो जाओगे ।।

दवा का डिब्बा तुमसे पहले
मै तुम तक पहुँचा जाऊंगी,
मुझे देख फिर तुम खुद पे
पहले से ही इतरा जाओगे।
जब तुम बूढे हो जाओगे।।

सुनो नही बदलेगा कुछ भी
हम भी नही और प्रीत नही
हम तुम संग चलेंगे  ऐसे
की तुम फिर लहरा जाओगे
जब तुम बुढे हो जाओगे।।

मैं तो ऐसी थी,ऐसी हूँ ,
ऐसी ही मैं रह जाऊँगी,
मेरे मन के बचपने से
तुम भी संग इठला जाओगे
जब तुम बूढ़े हो जाओगे।।

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मुझसी मिली है तुमको जग मे,
सोच के खुश हो रहना तुम,
फिर अपनी किस्मत पे खुद ही
धीरे धीरे इतराओगे
जब तुम बूढ़े हो जाओगे।।

aparna …….

घरवाली

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            “अरे कहाँ व्यस्त हो भाई लोग ,,सब के सब ऐसा क्या देख रहे कम्पयूटर पे…जरा हम भी तो देखें ।।””
    ” अरे कुछ नही रवीश ,ये मेरी एक दोस्त है ,उसने अपनी पार्टी की फोटो पे मुझे टैग किया है ,फेसबुक पे,तो बस वही देख रहे ,हम दोनो।”
     रवीश भी देखने लगा। कुछ आठ दस लड़कियों का ग्रूप फोटो था,सबने अजीब आढे टेढे मुहँ बना रखे थे,सबसे बीच मे एक निहायत ही खूबसूरत लड़की खड़ी थी ,फ्लाइंग किस करती।
 
       रवीश की आंखे अटक गई ,घूम फिर के बार बार वही चेहरा देखने का मन कर रहा था।
     रवीश एक 25  26साल का सॉफ़्टवेयर इंजीनियर है ,पुणे मे वाकड़ मे खुद का फ्लैट ले चुका है,दिखने मे भी ठीक है,घर वाले अब चाहते हैं,वो शादी कर ले……आज तक उसे अपनी आजादी बहुत प्यारी थी,हफ्ते मे 5दिन काम करो,और 2दिन आराम से दोस्तों के साथ पार्टी करो
  घर मे पानी की बोतल से ज्यादा बीयर की बोतलें पड़ी होती हैं, कोई टोकने वाली तो है नही।
  सामने वाली करंजकर आंटी की बाई आकर साफ सफाई कर जाती है।खाना कभी कैंटीन मे खा लेता है,कभी मैगी से काम चल जाता है।बिल्कुल राजा महाराजा सा जीवन है……पर आज एक अदद फोटो ने सारा खेल बिगाड़ दिया।

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      आज अचानक रवीश को अपने आप पर बहुत तरस आने लगा,कोई नही है ,जो फ़ोन करके पुछे,घर कब आ रहे…..अच्छा सुनो खाने मे क्या पका लूं ….बेचारा! इतवार की रात का कितना भी हैंगओवर हो अगले दिन सुबह खुद ही उठ के नीम्बू पानी बनाना पड़ता है।
      अब उसकी भी उमर हो रही है,उसे भी अब शादी कर के घर बसा लेना चाहिये,हर चीज़ वक्त पे हो जाये तभी अच्छा है….
           आज रवीश को अपनी आज़ादी बहुत खल रही है ।
        एक बार फिर तस्वीर पे उड़ती सी नज़र डाली और अपने क्यूबिक मे आके बैठ गया।

       ऐसा नही था की रवीश की जिन्दगी मे कभी कोई लड़की नही आई,स्कूल कॉलेज मे छोटे मोटे अफेयर हो चुके थे,पर दोनो ही पक्ष बहुत सीरियस नही थे….हाँ दो साल पहले ऑफ़िस मे एक नई लड़की आई थी,रूही…..वो उसे बड़ा भा गई थी।
         वो अक्सर अपने काम के लिये रवीश की राय लेती थी,कभी कभी दोनो साथ ही लंच भी किया करते थे…..उसे रूही अच्छी लगने लगी थी।
     एक शाम तो वो बाँका ज्वेलर्स भी पहूंच गया था,हीरे की अंगूठी लेने,सोचा अंगूठी देके ही प्रोपोस करूंगा ,पर तभी नासपीटे लोकेश का फ़ोन आ गया।
     “यार कहाँ है तू,जल्दी आ जा,,आज तेरी भाभी अपनी बहन के घर रुकेगी….अमित और विक्की भी आ रहे…party करेंगे।”
     “बस यही  ‘पार्टी करेंगे’ एक ऐसा शब्द है जिसे सुन के मरता हुआ लड़का भी जी उठे,और यमराज से लड झगड़ के अपने मित्रों के पास पहुंच जाये।
     बस वही रवीश के साथ हुआ,,हीरे की अंगूठी तो कभी भी आ जायेगी,पर भाभी जी रोज रोज तो मायके जाती नही,बेचारा लड़का पार्टी की तैय्यारियो मे चला गया।
         फिर एक शाम टी ब्रेक मे रूही और रवीश कैन्टीन मे थे -“अरे रवीश तुम्हे मैने बताया नही ना….मेरे मॉम डैड मक्का जा रहे”।
     “मक्का ! वहाँ क्यों? वहाँ तो मुस्लिम जातें हैं ना ?”
    “हाँ तो ! मैं मुस्लिम ही तो हूँ,मेरा पूरा नाम नही पता क्या?  रूही अंसारी।”
   “या अल्लाह! रवीश त्रिपाठी जी किस दुनिया मे रहतें हैं आप ! “
       रवीश चुपचाप मुस्कुराता रहा,चाय पीता रहा।उसे एक महिने मे कभी पता ही नही चला की रूही मुसलमान थी,,अच्छी बहुत लगती थी पर इतना भी नही की अपने घर वालों से शादी के लिये लडता झगड़ता।
     “यार लोकेश बचा लिया यार तूने, 38000बह जाते अंगूठी मे।”
        अभी 6महिने पहले हंसती खिलखिलाती रूही उसे अपने निकाह का कार्ड थमा गई तब उसकी जान मे जान आई,हालांकी रूही के मन मे ऐसा कभी कुछ नही था,फिर भी कार्ड पाके उसे बहुत खुशी हुई।

        पर इस बार बात हर बार से अलग थी,लड़की ऐसी थी की जिसके लिये सारे संसार से लड़ा जा सकता था,इस बार उसे जाति धर्म कुछ नज़र नही आ रहा था।
         बड़ी हिम्मत करके उसने अमित से उस लड़की के बारे मे पूछ ही लिया।
    “मुझे नही पता यार,वो तो रेणू मेरी स्कूल की दोस्त है,उसिने फोटो भेजी थी।”
    “हाँ तो उसी रेणू से पूछ ले”।
“पागल हो गया है क्या,,मरवायेगा तू….रेणु मेरी और मेरी बीवी दोनो की दोस्त है,उससे कुछ पूछा ना तो मेरे घर जाके आग लगा आयेगी।”
   “यार अमित अपने भाई के लिये इतना नही कर सकता तू।”
“और कहीं फिर से लड़की मुसलमान या किरिस्तांन निकली तो?? तेरे अन्दर का पण्डित फिर जाग जायेगा।”
    “नही भाई ,इस बार मुझे सच मे प्यार हो गया है,प्लीज उसका पता कर दे,तेरा अहसान जिंदगी भर नही भूलूंगा।”
       दो दिन बाद अमित ने रवीश को एक फ़ोन नम्बर दे दिया।
     “देख यार,रेणु खुद उस लड़की के बारे मे कुछ नही जानती,रेणु की पार्टी मे उसकी किसी सहेली के साथ ही ये आई थी,,नाम तक नही पता।अब तू जान ,कैसे बात करेगा,क्या करेगा।”

      खुशी से अमित को गले से लगा लिया रवीश ने ,घर जाते समय उसकी कार मे ‘लम्बोर्गिनी ‘बज रहा था,उसने ट्रैक बदल दिया और सोनू निगम का “अब मुझे रात दिन तुम्हारा ही खयाल है” सुनते सुनते घर पहुँचा।
          घर पहुच्ंते ही नम्बर सेव किया और वॉट्सएप्प पे तुरंत डी पी देखा।
     उफ्फ ,कैसा सलोना चेहरा है,कितनी मासूम है,
कितनी प्यारी मुस्कान है,,चेहरे से तो ब्राम्हण ही लग रही,पर चलो नही भी हुई तो भी कोई बात नही।
    अब शादी तो इसी से करनी है,चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाये……बहुत हिम्मत कर के अपने दिल को समेट के रवीश ने उसे मैसेज किया
  “हेल्लो ,कैसे हो आप।”
   “Sorry …who is this ?
” hi ,myself Raveesh …मै अमित का दोस्त हूं ।”
   “कौन अमित “?
“आपकी दोस्त है ना रेणु ,,उसी रेणु का दोस्त है अमित।”
“ओह्ह्ह्ह अच्छा आप रेणु के दोस्त हैं।”
“हांजी ,ऐसा ही समझ लिजिये,,क्या मै आपसे कुछ देर बात कर सकता हूँ,आप फ़्री हैं अभी?”
  “असल मे मै,मेरे बेटे का होमवर्क करा रही हूँ,तो अभी तो बात नही कर पाऊंगी।”
   “अच्छा ,बेटा भी है आपका।”और पति ?
  उफ्फ घबराहट मे ये क्या बोल गया….
“Obviously, पति भी है,और बेटा भी।आपको अगर कोई ज़रूरी काम नही है तो हम बाद मे बात करते हैं।”
   रवीश बेचारा रो पड़ा,तुरंत फ़ोन काटा और नम्बर डिलीट किया…..
      उसे बहुत बहुत ज़ोर का गुस्सा आ रहा था,थोड़ा सा रोना भी आया,पर हद है…..लड़कियों को शादी करने  का भी बड़ा शौक है,और शादीशुदा नही दिखने का भी।
         कहीं से भी फोटो मे समझ ही नही आ रहा की कम्बख्त बाल बच्चों वाली है…..पहले का समय अच्छा था कम से कम देख के समझ तो आता था की लड़की शादीशुदा है,किसी की घरवाली है।
            बेचारा रवीश !अपना गम गलत करने एक बार फिर अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने चल दिया।।।।

aparna ….

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मैं हूँ…..

मैं खुशबू से भरी हवा हूँ
मै बहता जिद्दी झरना हूँ
कठिन आंच मे तप के बना जो
मै ऐसा सुन्दर गहना हूँ ।।

छोटा दिखता आसमान भी,
मेरे हौसलों की उड़ान पे,
रातें भी जो बुनना चाहे,
मैं ऐसा न्यारा सपना हूँ ।।

हरा गुलाबी नीला पीला
मुझसे हर एक रंग सजा है,
इन्द्रधनुष भी फीका लगता
प्रकृति की ऐसी रचना हूं ।।

मैं हूँ पत्नी ,मै हूँ प्रेयसी
मै हूँ  बेटी, मै ही बहू भी,
तुझको जीवन देने वाली
मै ही माँ,मै ही बहना हूं ।।

मैं हूँ मीठी धूप सुहानी,
मैं ही भीगी सी बयार भी,
मुझमें डूब के सब कुछ पा ले,
मै ऐसा अमृत झरना हूं ।।।

अपर्णा ।

ओ स्त्री: कभी खुद को भी जिया करो……..

जल्द आ रही है, मेरे ब्लॉग पर !!

नींबू मिर्चें……ए हॉरर स्टोरी….

नींबू मिर्ची

    नेहा को उस कॉलोनी में आये दो चार दिन हो चुके थे लेकिन अब भी वो अपनी पुरानी कॉलोनी और दोस्तों को छोड़ने का गम भुला नही पा रही थी।
    विक्रम का क्या था , वो तो एक बार ऑफिस निकला फिर सीधे रात में ही लौटना होता था, सारा दिन घर पर अकेले तो उसे ही गुज़ारना होता था और उस पर इस नई कॉलोनी में आते ही जिन बातों से उसे रूबरू होना पड़ा था वो भी उसके किये कुछ कम ख़ौफ़नाक नही थी।

    अभी दूसरा दिन ही था जब वो घर के नीचे बनी दुकानों पर कुछ ज़रूरी सामान और राशन लेने गयी थी।
   विक्रम को रात में ही लौटना था इसलिए तफसील से आस पास घूम घूम कर उसने काफी समान खरीद लिया, अब अकेले ले जाना मुश्किल था। दुकान वाले ने काम करने वाले लड़के को सामान के साथ भेज दिया।
    कुछ बैग खुद थामे वो अपने फ्लैट पर पहुंची तो दरवाज़े पर एक पल को ठिठक कर खड़ी रह गयी, ” ये नींबू मिर्ची कौन फेंक गया”

   मन ही मन बुदबुदाती वो उसे पैर से एक तरफ करने वाली थी कि साथ वाला लड़का चिल्ला उठा__” नही मेमसाब, इसे छूना मत। जाने कौन टोटका कर गया आपके घर। किनारे से अंदर चले जाओ आप, सुबह सफाई वाला उठा ले जाएगा।”

  हाँ में सर हिला कर वो अंदर चली गयी। सारा सामान उससे अंदर रखवा कर वो दरवाज़ा बंद कर फ्रीज़ से पानी की बोतल निकाल लायी। हॉल में बैठी पानी पीती वो एक बार फिर उस नींबू मिर्ची के बारे में सोचने लगी।
   जाने क्या सोच कर वो दरवाज़े तक गयी और बाहर एक बार फिर झांक आयी, वहाँ अब भी वो नींबू मिर्ची पड़ी थी।

     दोपहर खाने का मन नही किया, वो टीवी पर कुछ देखते हॉल में ही सो गई, अचानक कॉल बेल बजने से उसकी नींद खुल गयी।
    वो दरवाज़े पर गयी वहाँ कोई नही था।
  वापस आ कर उसने अपने चेहरे आंखों पर ढेर सारा पानी डाला और बाहर बालकनी  में एक कप चाय लिए चली आयी,।
       बालकनी में आते ही उसकी नज़र किनारे रखे तुलसी के पौधे पर चली गयी। अरे ये क्या , उसके पुराने घर पर तो तुलसी एकदम हरी भरी खिली हुई थी, सिर्फ दो ही दिन में ये क्या हो गया?
   खुद से बात करती वो सोचने लगी। सिर्फ दो ही दिन हुए थे लेकिन इन दो दिनों में वो पौधों की तरफ ध्यान भी तो नही दे पाई थी। घर जमाने में इतनी व्यस्त हो गयी थी कि पौधों को भी पानी देना है ये भूल ही बैठी थी।
   हे भगवान! ये नया घर क्या क्या दिखाने वाला है? अभी सुबह ही निम्बू मिर्ची और अब ये सूखी तुलसी।
  उसने चाय का कप उठा लिया, नज़र तुलसी पर ही थी , कप मुहँ से लगाते ही अजीब सा स्वाद आया, उसने देखा उसकी चाय फट चुकी थी।
    एकदम से निराश हो वो कप लिए रसोई में चली गयी___” ये दूध वाले को भी फटकारना पड़ेगा, सुबह का दिया दूध है , और अभी शाम में ही चाय फट गई, ऐसा भी कभी होता है भला?”
    खुद के विचारों में नेहा गुम थी कि एक बार फिर दरवाज़े की घंटी बजी,वो चौन्क कर उठ गई…. तो क्या वो अब तक सपना देख रही थी? हाँ सपना ही तो था, क्योंकि वो तो अब भी हॉल के काउच पर ही थी। वो उठ कर दरवाज़ा खोलने चली गयी, सामने विक्रम को देख उसकी जान में जान आयी।
    विक्रम के अंदर आते ही वो उसे सुबह से बीता सब कुछ बताने को व्याकुल हो उठी लेकिन फिर वो उसके फ्रेश होकर आने का इंतज़ार करती उसके लिए चाय बनाने चली गयी।

   ” विक्रम तुमने बाहर देखा?”

  ” क्या नेहा?”

  “आज मैं कुछ सामान लेने गयी थी, लौटी तो हमारे दरवाज़े पर किसी ने निम्बू मिर्ची फेंकी हुई थी।”

  ” व्हाट रबिश बेबी! इस ज़माने में भी इस सब बकवास पर बिलीव करती हो।”

” मुझ पर भरोसा नही है तो खुद देख लो!”

  ” बात विश्वास की नही है नेहा। ये भी तो हो सकता है कि कोई पड़ोसी सब्जी लेकर जा रहा हो और उसके बैग से वो निम्बू मिर्ची गिर गयी हो।”

  ” वाह गिरने को मिली भी तो निम्बू मिर्ची, आलू बैगन टमाटर नही गिरे। लो बोलो।”

  ” हाँ उस बैग को पता नही होगा कि हमारी मैडम को आलू बैगन पसंद है , वर्ना आलू बैगन ही गिरते।

  विक्रम को हंसते देख फिर नेहा कुछ नही कह पायी, क्योंकि इसके अलावा तो उसने जो देखा वो उसका सपना ही था।

   रात का खाना निपटने के बाद वो रसोई समेटने में लग गयी। रसोई के बाहर की छोटी बालकनी से ही बाजू के घर की बालकनी जुड़ी थी।
    वो रसोई के कपड़ों को धो कर बालकनी की रॉड पर सूखाने जैसे ही बाहर आई एक काली बिल्ली अपनी हरी आंखें चमकाती वहाँ से निकल गयी। उस बिल्ली को देखते ही चौन्क कर उसकी चीख निकल गयी।
   नेहा की आवाज़ सुनते ही बाजू वाली बालकनी में खड़ी महिला उसकी ओर पलटी और उसे देखने लगी, अपनी  आवाज़ से उन्हें चौन्कते देख नेहा झेम्प गयी

  ” सॉरी वो काली बिल्ली थी ना, मैं उसे देख कर डर गई। मुझे पता नही क्यों बिल्लियाँ शुरू से पसंद नही हैं। बचपन से मेरी ताई हमेशा कहा करती थी कि कुत्ता मालिक का सगा होता है , वो मालिक को खाना खाते देख खुश होता है और मन ही मन सोचता है मालिक ऐसे ही खूब खाये और मुझे भी खिलाये जबकि बिल्ली मालिक को खाते देख सोचती है काश ये मर जाए और इसका सारा खाना मैं खा जाऊँ, इसलिए कहते हैं मालिक को बिल्ली के सामने खाना नही चाहिए।”

  अपनी कैफियत में नेहा हड़बड़ा कर कुछ ज्यादा ही कह गयी , सामने खड़ी महिला ने उसे भर नज़र देखा__

  ” वो मेरी पालतू बिल्ली है टिमी।”

  ” ओह्ह I m so sorry , मैं जल्दबाज़ी में कुछ का कुछ कह गयी शायद!”

  ” हम्म! नए आये हो सोसाइटी में ?”

  ” जी हाँ! मेरे हसबैंड का ऑफिस यहाँ से पास पड़ता है, इसके पहले हम गुलमोहर सोसाइटी में रहा करते थे। पर इनका सपना था मालपानी में घर खरीदने का, बस जैसे ही पैसे जुड़े, यहाँ घर ले लिया।”

  ” मैं मानिनी सरकार हूं , एक ही बेटी है शादी होकर विदेश चली गयी सात साल पहले, तबसे यहाँ अकेली रहती हूँ। उससे बात होती रहती है, अभी पंद्रह दिन पहले ही हुई थी।”

  ” ओह्ह अगेन सॉरी, आपके हसबैंड के लिए ?”

  ” अरे नही वो मरा नही है, हम पंद्रह साल पहले अलग हो गए।”

   एक पर एक बेवकूफियां करती नेहा को खुद पर गुस्सा आ रहा था, उसे लगा अब अगर उसने और एक गलती की तो ये मानिनी सरकार इस पंद्रहवें माले से उसे नीचे फेंक देगी।
    वो उनसे विदा ले भीतर चली आयी।

    मालपानी एक शानदार सोसाइटी थी जहाँ लगभग इक्कीस क्लस्टर थे जिनमें सभी बिल्डिंग्स दस से पंद्रह मालों की थी। 2bhk 3 bhk  की बिल्डिंग्स अलग अलग थी।
   उनका घर 3 bhk  वाले अपार्टमेंट में सबसे ऊपर था , जहाँ कुल जमा दो घर ही थे, एक उनका एक मानिनी सरकार का।

     अगले दिन विक्रम के ऑफिस निकलते ही वो अपना काम निपटा कर बाहर बालकनी में कॉफ़ी लिए चली आयी, उसका ध्यान वहाँ रखे पौधों पर नही था, आराम से बैठी वो जैसे ही कॉफी पीने जा रही थी कि उसकी नज़र सामने रखे तुलसी के पौधे पर पड़ी और उसकी आंखें आश्चर्य से फैल गईं।
    कल शाम का देखा उसका सपना सच हो गया था, उसके सामने तुलसी का पौधा सूख कर कुम्हला गया था। वो भाग कर पानी ले आयी। वहाँ रखे सभी पौधों में पानी डालती वो मन ही मन हनुमान चालीसा का जाप भी करती जा रही थी, पर दो लाइन के बाद उसे कुछ याद ही नही आ रहा था। बचपन में पापा उसे कितनी बार चालीसा याद करने कहा करते थे, पर वो हमेशा आलस कर जाती थी आज उसकी वो बेवकूफी उस पर ही भारी पड़ रही थी।
    वो पानी डाल उठी ही थी कि दरवाज़े पर किसी ने घण्टी बजा दी, उसने नीचे सिक्योरिटी वाले से मेड के लिए बात की थी, हो न हो मेड ही होगी सोचती वो दरवाज़ा खोलने चली गयी।
     दरवाज़ा खोलते ही उसने देखा सामने कोई ना था। वो घर से बाहर निकल आयी, आजू बाजू उसने हर तरफ देखा , कोई ना था। घर के ठीक सामने एक तरफ लिफ्ट और उसके बाजू में सीढियाँ थी। उसके घर के ठीक बाजू में मिसेस सरकार का घर था, जो बंद था।
     वो वापस अपने दरवाज़े की ओर मुड़ गयी, लेकिन ये क्या? दरवाज़े के ठीक सामने एकदम ताज़ी पीली निम्बू और हरी मिर्च पड़ी थी।
   उसके मुहँ से हल्की सी चीख निकल गयी।

  वो घबरा कर अंदर घुस गई, और दरवाज़े को बंद कर कुंडी लगा दी।
       अंदर आकर जल्दी से वो नहाने घुस गई। जिस दिन से शिफ्ट हुए थे इतना काम था कि काम की उलझनों में मंदिर अनपैक करना वो लोग भूल ही गए थे।
   इसलिए उसने सोचा नहा धो कर आज मंदिर खोल कर ही रहेगी।
     लेकिन ये क्या?

    ये भी आज ही होना था! अब अगले पांच दिन वो मंदिर छू भी नही सकती थी। उसे अचानक घबराहट सी होने लगी, यहाँ किससे वो अपनी तकलीफ साझा करें? आखिर कौन था जो उसके घर के बाहर निम्बू मिर्ची फेंक कर जा रहा? और क्यों ये ऐसा कर रहा?
   उसे बाजू वाली मानिनी आंटी याद आ गयी, उसे दरवाज़ा खोल कर उनके घर जाने में डर लग रहा था उसने घर पर मिले आई पी फ़ोन से उनके घर का नंबर डायल किया, पर लगातार रिंग जाने पर भी किसी ने फ़ोन नही उठाया।
   वो परेशान होकर रसोई के पीछे वाली बालकनी में चली आयी, वहाँ से वो उन्हें आवाज़ देती रही लेकिन जैसे उसकी आवाज़ उस सूने पंद्रहवें माले में कहीं खोकर रह गयी थी।

   ******

   उस शाम भी विक्रम के थके होने से वो उसे ज्यादा कुछ नही कह पायी लेकिन उस नींबू मिर्ची के बारे में बता दिया।
    विक्रम के कहने पर की वो नीचे के माले में जाकर लोगों से दोस्ती करे बातचीत करे तो उसके लिए भी अच्छा होगा सोचकर अगले दिन विक्रम के ऑफिस निकलते ही वो नहा कर तैयार होकर नीचे चली गयी।

  पर नीचे भी किसके घर जाकर ऐसे बेल बजा दे, अच्छा भी तो नही लगता। बडी सोसाइटी में रहने वाले लोगों के चोंचले भी तो बड़े होतें हैं, सोचते सोचते ही वो लिफ्ट से ग्राउंड फ्लोर पर चली आयी।

    उसकी बिल्डिंग के बाईं तरफ छोटा सा पार्क बना था, वो धीमे कदमों से चलती उसी तरफ आगे बढ़ गयी, रास्ते में सोसाइटी की आइसक्रीम शॉप से उसने अपनी पसंदीदा आइसक्रीम ली और उस बगीचे में एक बेंच पर जा बैठी।
   वो जहाँ बैठी थी, वहाँ से उसे अपनी रसोई वाली बालकनी साफ दिख रही थी ।
   वो आइसक्रीम खाती ऊपर अपनी बालकनी देख ही रही थी कि उसकी पड़ोसन मानिनी आंटी की काली बिल्ली उनकी बालकनी की पतली सी दीवार पर लचक मटक कर चलने लगी।
  उसे देखती नेहा घबरा गई कि कहीं इतनी ऊंचाई से बिल्ली गिरी तो सीधे परलोक ही जाएगी उसी वक्त बिल्ली का एक पैर फिसला और नेहा की चीख निकल गयी। हालांकि उसकी चीख बहुत घुटी सी थी बावजूद जाने कैसे उस बिल्ली ने सुन लिया और वो अपनी जलती आंखों से उसे घूरने लगी।
      नेहा उसे हाथ के इशारे से जाने कह रही थी कि उसकी आइसक्रीम पर मुहँ मारने वो काली बिल्ली ऊपर से कूद पड़ी।
     एक चीख के साथ नेहा ने आंखे बंद कर ली, तभी उसे लगा उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा, धीरे से आंख खोल उसने पीछे देखा एक उसी की उम्र की लड़की खड़ी थी__

  ” हैलो मैं शुभांगी! यहाँ  c block  में रहती हूँ, आप यहाँ नई लग रहीं, पहले कभी देखा नही आपको।”

  “जी ! मैं भी सी ब्लॉक में ही आयी हुँ 15 माले पर । “

“ओह्ह तो पेंट हाउस लिया है आपने , मैं 12 वें माले में रहती हूँ। मेरे हसबैंड का बिज़नेस है खुद का। और मैं इंटीरियर डिज़ाइनर हूँ। कभी आपको इंटीरियर करवाना हुआ तो बताइयेगा।”

  ” श्योर ! वैसे हमारे नीचे कौन रहता है ? क्या है आस पड़ोस में जान पहचान होनी चाहिए ना!”

  ” 14 वे माले पर एक ही घर ऑक्युपाइड है, बैचलर लड़के रहतें हैं शायद! सुबह से जो निकलते हैं सीधे रात में ही आते हैं सो उन लोगों से ज्यादा किसी को लेना देना नही होता। और 13वा माला जब से बना खाली ही है। लोगों का मानना है कि 13 अशुभ नंबर है !इसी से वहाँ कभी कोई रहने नही आया।”

  ” ओह्ह मतलब आपके बाद सीधे मैं और मानिनी आंटी ही हैं।”

  ” आप मानिनी सरकार को कैसे जानती हैं?”

  शुभांगी की बात सुन नेहा आश्चर्यचकित हो गयी, स्वाभाविक है मानिनी उसकी पड़ोसन है तो उसे जानना कौन सी बड़ी बात हो गयी?

  “जी जानती नही हूँ, पर मेरे ठीक बाजू वाला घर उन्हीं का तो है ना?”

  ” अरे हाँ ! वो भी तो पंद्रहवें माले में ही रहती हैं, मैं एक बार गयी थी उनके घर , उन्होंने इंटीरियर करवाने बुलाया तो था लेकिन मेरी कुछ सुने बिना सब अपनी मर्ज़ी से करवा रही थी। बहुत अजीब औरत हैं।”

” अच्छा ? अजीब तो उनकी बिल्ली भी है!”

  ” सही कहा ! मैं जब गयी तो उन्होंने बहुत अजीबोगरीब सजावट करवाई थी घर की। अजीब से गहरे रंगों से एक दीवार रंगवा कर उसमें कुछ अजीब मंत्र लिखवाने लगी।
       घर पर लाइट्स भी बहुत कम रखी थी उन्होंने सिर्फ कैंडल्स ही कैंडल्स जला रखे थे। मुझे तो अजीब घबराहट सी होने लगी थी, उस पर ज़बरदस्ती ज़िद कर के मिल्कशेक भी ले आईं। पीने का बिल्कुल मन नही था तभी उनकी काली बिल्ली आयी और मुझ पर कूद पड़ी , मिसेस सरकार तो मुस्कुराने लगी कहती है तुम टिमी को पसंद आ गयी हो इसलिए तुम्हारे ऊपर जम्प कर रही लेकिन मेरी सांस रुकने लगी थी, बड़ी मुश्किल से जान बचा कर भागी, और बाद में आस पास के लोगों ने कहा भी…

” क्या कहा?”

” यही की वो कुछ अलग सी है, उनकी अपनी दुनिया है, और वो जादू टोना भी करती हैं..  तुम ये बात किसी से कहना नही”

  ” व्हाट ? जादू टोना मतलब?”

  नेहा के सवाल पर शुभांगी आस पास देख कर उसके और करीब खिसक आयी

  ” मैंने सुना है अपनी बेटी की शादी के बाद बहुत अकेली हो गयी थी इसलिए ये सब करने लगी। कुछ लोग तो कहते हैं पहले से यह सब करती थी इसलिए उनके पति भी उन्हें छोड़ गए। अब सच्चाई तो मालूम नही जितने मुहँ उतनी बातें। भई सच तो हम भी नही जानते लेकिन अब अगर कहीं नींबू मिर्ची पड़ी मिलेगी तो दिमाग में खटका तो लगेगा ना?”

” क्या किसी के घर के सामने मिली क्या?

  शुभांगी फिर धीरे से फुसफुसाने लगी__

” ये सब कोई खुल के थोड़े ही बताता है! वैसे तुम्हें कुछ भी ज़रूरत हो तो बताना ज़रूर , आखिर पड़ोसी ही तो एक दूसरे के काम आते हैं। है ना?”

  “हाँ !
   शुभांगी हो सके तो कोई माली मिले तो भेजना न।
शिफ्टिंग में प्लांट्स खराब हो गए, तुलसी तो बिल्कुल मुरझा गयी।”

” ओहहो तुलसी मुरझा गयी? तुलसी का मुरझाना हमारे यहाँ अच्छा नही मानते, इसका मतलब जानती हो क्या होता है?”

  नेहा कुछ कह पाती की उसका फोन घनघना उठा, फ़ोन विक्रम का था। उसके ऑफिस में पार्टी थी उसे रात लौटने में देर हो सकती है ये सूचना देकर उसने फोन रख दिया….
    ये पता चलते ही कि वीरेन को देर होगी उसका मन डूबने लगा, वो साथ बैठी शुभांगी से विदा लेकर घर की ओर निकलने लगी, तभी उसे ध्यान आया कि शुभांगी के आने के पहले उसने टिमी को नीचे गिरते देखा था लेकिन वो वहाँ कहीं थी ही नही?
     वो बुझे मन से  आगे बढ़ गयी, शुभांगी के बारहवें माले पर अपने घर के लिए उतरते ही वो लिफ्ट में अकेली रह गयी।
         वो अकेली थी, अभी दो मालों का सफर तय करना था कि उसे कहीं से बिल्ली की आवाज़ सुनाई पड़ी , वो चौन्क कर इधर उधर देखने लगी।
   उसका माला आते ही वो जल्दी से लिफ्ट से निकल अपने घर की ओर बढ़ गयी, लेकिन  एक बार फिर उसकी आंखें आश्चर्य से खुली रह गईं जब उसने अपने दरवाज़े पर नींबू मिर्ची पड़ी देखी__

   ” अब तो हद ही हो गयी, ये पक्का इन मैडम मानिनी जी का ही काम है, आज तो इनसे बात करनी ही पड़ेगी। कमबख्त ने इतना डरा रखा है कि बैठे बैठे उटपटांग सपने देखने लगती हूँ, कभी इनकी बिल्ली को छत से कूदते देखती हूँ तो कभी कुछ! “

  गुस्से में बड़बड़ाती वो उनका दरवाज़ा खटखटाने लगी, बेल पर बेल बजाती वो बार बार दरवाज़े पर थाप भी देती जा रही थी।
  उसकी लगातार थाप सुन नीचे से दो लड़के भाग कर ऊपर चले आये__

  ” कोई प्रॉब्लम है मैडम?”

  ये शायद वही बैचलर लड़के थे जिनके बारे में शुभांगी ने उसे बताया था, लेकिन इन पढ़े लिखे सॉफिस्टिकेटेड लड़कों से वो नींबू मिर्ची वाली बात बोलेगी कैसे? ये लोग उसे जाहिल और गंवार नही समझने लगेंगे?

   क्या जवाब देना चाहिए सोच कर उसने आखिर एक जवाब तय कर ही लिया__

  ” जी वो मानिनी आंटी दरवाज़ा नही खोल रही और ना ही फोन उठा रही, इसलिए बस…

  ” ओह्ह ये तो चिंता की बात है। उनकी उम्र भी ज्यादा है , अकेले रहती हैं, और पिछले कई दिनों से नज़र भी नही आयीं।”

  नेहा ने तो सोचा था वो गुस्से में मानिनी को चार बातें सुना कर निकल लेगी लेकिन यहाँ ये लड़के चले आये और बात दूसरी ही तरफ मुड़ गयी, अब अगर इन लड़कों के सामने आंटी ने दरवाज़ा खोल भी दिया तो क्या वो बदतमीज़ी से उनसे लड़ पाएगी।
    और ये लड़के तो बड़े चिंतित से दरवाज़ा तोड़ने में ही लग गए थे। तीन लंबे चौड़े लड़को के लगातार  प्रहार से वो मज़बूत दरवाज़ा भी हिल गया, आखिर उसकी लीश खीँच खांच कर अंदर लगी चिटकनी उन लोगों ने खोल ली।
   दरवाज़ा खुलते ही एक तेज़ बदबू से उन सभी ने नाक बंद कर ली।
     उन तीनों के साथ नेहा भी अंदर चली गयी। बदबू बहुत तेज़ थी, हॉल पार करते ही एक अँधियारा गलियारा था जिसे पार करते ही एक कमरा था जिसके दरवाज़े को हल्का सा अंदर धकेलते ही अंदर का नज़ारा देख नेहा की चीख ही निकल गयी , लड़के भी स्तब्ध खड़े रह गए थे।
    पलंग पर मानिनी सरकार की लाश पड़ी थी। उनके पैरों के पास ही उनकी काली बिल्ली भी मरी पड़ी थी।
  उनमें से एक लड़के ने तुरंत सिक्योरिटी को बुलाने के बाद पुलिस को फ़ोन लगा दिया।
   नेहा के आँसू रुक ही नही रहे थे।
पुलिस के साथ आई फोरेंसिक टीम जांच में लग गयी। एक एक कर पड़ोसी भी आते चले गए, जिसे जो पता था वो बताता गया। फोरेंसिक टीम के अनुसार मानिनी सरकार की मृत्यु पंद्रह दिन पहले ही हो चुकी थी।
    पंद्रह दिन पहले उन्होंने कुछ सब्ज़ियां मंगवाई रही होंगी, क्योंकि उनके टेबल पर आलू बैगन लौकी तो रखी थी लेकिन नींबू मिर्ची टेबल से नीचे गिरी हुई थी।
   नेहा उनका हॉल और कमरा देख रही थी, उसकी नज़र उस कलात्मक दीवार पर जा कर अटक गयी जहाँ गहरे नारंगी रंगों के ऊपर गहरा हरा फिर नीला रंग गोलाई में पुता था और उसके एक ओर बुद्ध के चेहरे की रेखाएं खींची थी, और नीचे कुछ शांति पाठ से लिखा था।
     हॉल में एक तरफ छोटा सा मंदिर रखा था, जिसमें हनुमान चालीसा पर नज़र पड़ते ही नेहा के हाथ खुद ब खुद जुड़ गए।
   नही इतना पूजा पाठ करने वाली औरत कभी कोई टोना नही कर सकती , ये नींबू मिर्ची मानिनी उसे संदेश देने के लिए ही उसके घर के बाहर तक पहुंचा रही थी, शायद अपनी मौत के बारे में बताने।
 
   वो वहाँ तफ्तीश करती पुलिस से क्या कहती कि वो एक रात पहले ही मानिनी सरकार से लगभग पंद्रह मिनट बात कर चुकी थी। तभी उसके कानों में किसी की आवाज़ पड़ी

  ” अरे किसी ने नेहा को इन्फॉर्म किया या नही?”

  नीचे रहने वाली कोई पड़ोसन आंटी थी जो पूछ रही थी तभी किसी ने जवाब दिया कि नेहा के नंबर पर उसे बता दिया है ,वो कल तक पहुंच जाएगी।

  ओह्ह तो ये बात थी, उनकी बेटी का नाम भी नेहा था, शायद इसलिए मानिनी सरकार की आत्मा उसे हिंट पर हिंट दे रही थी और वो समझ ही नही पायी…
   सोचती नेहा वहाँ से बाहर निकल रही थी कि विक्रम भी हड़बड़ा कर वहाँ पहुंच गया।
   विक्रम का सहारा लिए वो वहाँ से बाहर निकल रही थी कि उसकी नज़र बालकनी में रखी आंटी की सूखी तुलसी पर चली गयी, वो बुझे मन और भीगी पलकों के साथ वापस अपने घर चली आयी।

  aparna…

दहकते पलाश …

कुछ मोहब्बतें वक्त की मोहताज नही होतीं…

दहकते पलाश

बालकनी के ग्लास डोर के पास रखे कैनवास पर जंगलों में बेतरतीब दहकते पलाश उकेरते हुए माया इतनी मगन हो गयी थी कि सरु की लायी हुई दुसरी कॉफ़ी भी रखे रखे ठंडी हो गयी।

उसके टोकने पर जब ध्यान गया तब उसे एक और कॉफ़ी लाने बोल बाहर बालकनी में आकर खड़ी हो गयी, वही महीना, वही फ़ाग, वही सिन्दूरी पलाश … उसका कितना कुछ जुड़ा था इन सब से, और वैसे सोचा जाये तो कुछ भी नही जुड़ा था, बस कशिश का आसमान था और शिद्दत सी ज़मीन, पर किस्मत थी कि ना आस्माँ मिला ना ज़मीं ।।

उसे सब कुछ ऐसे याद है जैसे सब कल की ही बात हो, लगता ही नही कि पन्द्रह साल बीत गये उस होली को।
आज भी उस दिन की एक एक बात याद थी, सारा कुछ जैसे अब भी आंखों के सामने एक फिल्म की तरह चल रहा हो…..

कितनी चहल पहल होती थी उन दिनों उस मोहल्ले में। उसकी उम्र के ढ़ेर सारे बच्चे इधर उधर तूफान मचाए घूमते थे, और वो था इन सब का सरगना।
जाने कहाँ से ढूँढ ढूँढ के शरारतें लाता था, सारा मोहल्ला उसका सताया हुआ था,कभी किसी की छत पर सूखने वाले पापड़ चकनाचूर कर जाता, कभी किसी की पानी की टंकी में रंग घोल जाता, इन्हीं सारे बेमतलब के कामों में दिल लगता उसका, पढ़ाई लिखाई से दूर, अपने और अपनी मस्तियों में मगन ।
उसकी पक्की सहेली का भाई ना होता तो कभी उसका चेहरा तक ना देखती, पर ऐसा सोचना आसान था करना कठिन, क्योंकि उस निर्मोही को एक नज़र देखने के बाद कोई बिरला ही होगा जो उसका लुभावना चेहरा भूल सके, गोरे रंग पे काली बड़ी बड़ी आँखें और उनसे टक्कर लेता चौड़ा माथा, उसके लिये अक्सर माया की दादी कहा करती _” जे मिसराईन के घर कोई यक्ष गन्धर्व पैदा हुआ है, तभी हम मानुसों से नही निभे है इस खर्राट की। कितना हडकंप मचाए रखता है पर जे के लाने कितना भी गुस्सा हो मन में, इसकी मुस्कान देख सब उड़ जाती है बहुरिया।।
अगर कुछ पढ लिख जाये, नौकरी पा जाये तो कल अपनी माया के लिये हाथ पसार कर मिसराईन से इस छोरे को मांग लूंगी।”

” आप भी अम्मा, सुबह सुबह कलेस मचाई रहती हो, लक्षण देखें है रावण है पूरा, और फिर माया भी तो…..

माया की माँ ने तो बात वही खत्म कर दी पर उसके मन में कोई बीज जम ही गया था, जो होली के दिन खाद पानी पाकर बेल सा लहलहाने लगा था।।

सभी रंग गुलाल में डूबे थे, बस वही साफ सुथरी अपनी छत पर खड़ी मोहल्ले की भीड़ भाड़ देख देख कर हँस रही थी, तभी नीचे उसकी सहेलियों का झुंड गुज़रा और सब उससे नीचे आने का आग्रह करने लगे, सब की बात और थी पर उन सभी में उसकी पक्की सहेली रोली भी थी, उसकी बात काटना माया के लिये कठिन था, अपनी सोच में डूबी माया को उसकी दादी ने समझा बुझा कर नीचे भेज ही दिया था।
सारी सखियाँ माथे पर टीका लगा के उससे गले मिल रही थी कि किसी के मज़बूत हाथों ने उसे पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया, और उसका पूरा चेहरा गुलाल से भर दिया।
वो अबीर था!! जिसके कुँवारे हाथों ने माया के गालों पर जाने कितने दहकते पलाश खिला दिये थे।
उसके कानों में चुपके से “हैप्पी होली” बोल वो एक बार फिर अपनी टोली में मगन हो गया था।।

वो होली बीत गयी पर उसके लिये छोड़ गयी थी ढ़ेर सारे एहसास, जिन्हें वो चाह कर भी किसी से साझा नही कर सकती थी।
उसे हमेशा से खुद पर और अपनी किस्मत पर तरस आता था, पर अब एक नाराज़गी थी क्यों भगवान ने उसकी किस्मत ऐसी काली स्याही से लिख दी थी जिसे वो चाह कर भी मिटा नही पा रही थी।
उसके दादा और उनके बचपन के दोस्त का अपनी बचपन की दोस्ती को पक्का करने का निर्णय उसकी जीवन नैय्या डूबा गया था, सिर्फ सात बरस की तो थी जब मृत्यशैय्या पर लेटे उसके दादा ने अपनी आखिरी इच्छा के तौर पर अपने दोस्त के पोते से उसके फेरे फिरवा दिये थे, उस समय बाल विवाह होना बन्द हो चुका था पर अक्षय तृतीया के ही दिन उसके घर वालों ने उसे भी गड्डे गुडियों सा ब्याह दिया था, उसके विवाह को एक माह भी नही बीता की उसके दादा जी सिधार गये पर घर वालों के मन में एक संतुष्टी छोड़ गये थे अपनी अन्तिम इच्छा पूरी कर पाने की।

उसके ब्याह को दो साल हुआ ही था कि, किसी बीमारी की चपेट में आकर उसका पति भी नही रहा और ना रहे उसके दादा ससुर।
नौ साल की उम्र में जब उसे शादी और ससुराल का मतलब तक पता नही था, सुहागन का मतलब पता नही था, वो विधवा हो चुकी थी।।
माँ और दादी उसे गले से लगाये बिलखती रहीं, और कुछ देर सहने के बाद कसमसा कर उसने खुद को उनसे छुड़ाया और खेलने बाहर भाग गयी।।

धीरे धीरे समय के साथ उसे अपनी काली किस्मत का लेखा जोखा समझ आने लगा था, और जैसे ही उसने अपनी किस्मत से समझौता करने की सोची अबीर किसी खुशबूदार हवा के झोंके सा उसके जीवन की नीरस बगिया में फूल खिलाने धंसता चला आया था।

उस होली के बाद अबीर के एग्ज़ाम्स हुए और आगे की पढ़ाई के लिये वो बाहर चला गया था, वो शाम भी वो कैसे भूल सकती थी, रोली से उसे पता चल ही चुका था कि उसके अबीर भैया कोटा जा रहें हैं पढ़ने, उसके निकलने के समय पर वो चुपके से अपनी छत पर जा खड़ी हुई थी, उसे एक बार पूरी नज़र देखने के लिये!!
अपना सारा सामान कार की डिक्की में भरने के बाद उसने पलट कर एक बार उसकी छत की तरफ देखा भी था और घबराहट में माया दीवार की ओट में हो गयी थी, उसे देखने की अधूरी आस लिये ही वो चला गया था।
वो तो उसके जाने के बाद उसके जाने का असली कारण माया को पता चला था, जब एक शाम वो स्कूल से लौटी और अपनी माँ और दादी को बातें करते सुना__” क्या ज़रूरत थी अम्मा उनके घर जाने की, ऐसा भी लड़के में कौन सा हीरे मोती जड़ें हैं, ना होगी माया की शादी तो ना होगी, मैं अपनी बेटी को जीते जी कोई दुख ना होने दूंगी।”

” और तुम्हारे बाद उसका क्या होगा बहुरिया?? यही सोच कर तो जी घबराता है कि हम सब के बाद उस बेचारी का क्या होगा?”

” पढ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो जायेगी अम्मा, वो खुद अपना सहारा बनेगी।। आइंदा आप किसी के घर माया का रिश्ता लेकर ना जाना, देखा नही मिश्राइन ने कैसे रातों रात लड़के को पढ़ाई के नाम पर बाहर भेज दिया जैसे हमारी माया की छूत लग जायेगी अगर यहाँ रहा तो।”

उसका कलेजा धक से रह गया था, तो इसलिये उसे बाहर भेज दिया!!
उस दिन के बाद से उसने रोली के घर आना जाना बिल्कुल बन्द कर दिया था, रोली ही क्या धीरे धीरे अपनी हर सखी सहेली से दूरी बना ली थी, और उसी समय उसकी मासी उसके लिये देवदूत बन कर आ गयी__
” दीदी माया का हाथ बहुत साफ है, बहुत अच्छी पेंटिंग करती है , इसे फाइन आर्ट्स में क्यों नही भेज देतीं ।”

और फिर सारे घर भर को मना मुनु के आखिर मासी उसे अपने साथ ले ही गयी थी। वल्लभ एकेडमी ऑफ़ आर्ट्स में प्रवेश लेते ही उसका जीवन बदलने लगा था, अपनी फाइन आर्ट्स की डीग्री पूरी कर स्कॉलरशिप लेकर वो वेनिस से भी कोई एक्स्ट्रा डिप्लोमा कर आयी थी।।

रंगों से खेलती उसकी तुलिका अब उसके कैनवास में ही जीवन ढूँढने लगी थी।
रंग बिरंगे रंगों से सजी उसकी पेंटिंग्स देख कर कोई उसके बिना रंगों के जीवन को सोच भी नही सकता था।।

” दीदी कॉफ़ी पी लो वर्ना फिर ठंडी हो जायेगी।”
सरु की आवाज सुन वो वापस वर्तमान में लौट आयी, अगले हफ्ते ठीक होली से एक दिन पहले उसकी पेंटिंग एक्सीबिशन होनी थी, उसी के लिये वो तन मन से जुटी थी।।

मासी के साथ उसके जाने के चार महीने बाद ही उसके पापा का ट्रांसफर भी दूसरे शहर हो गया था और उस शहर उस गली से सारे नाते छूट गये थे, बस नही छूटा था अबीर का लगाया वो रंग जो अब भी माया अपने गालों पर महसूस कर पाती थी।।

*******

शाम हो चुकी थी, लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी, लोग घूम घूम कर अपनी पसंद की पेंटिंग्स देख रहे थे, उनमें से कुछ खरीद भी रहे थे, एक्सीबिशन हॉल के एक ओर बने छोटे से ऑफिस में माया अपनी साथी पेंटर के साथ बैठी कुछ ज़रूरी बातों में लगी थी कि उनकी एक हेल्पर ने अन्दर आ कर उन्हें बताया कि कोई एक आदमी है जो माया की वो पेंटिंग खरीदने की ज़िद पर अड़ा है जो वहाँ बेचने के लिये रखी ही नही गयी।।

” उनसे कह दो, वो पेंटिंग बिकाऊ नही है, उसे बस “एज़ अ मास्टर पीस” रखा है।”

” पर मैडम वो समझ ही नही रहे, कह रहे जब बेचना नही था तो यहां रखने की क्या ज़रूरत थी?”

” कौन सी पेंटिंग माया ‘ दहकते पलाश’?

” हाँ नेहा! मैं उसे किसी कीमत पर बेचने को तैय्यार नही हूँ, पता नही कौन रईसजादा है, जो ऐसे ज़िद पर अड़ा है।”

” हम्म तुम्हारा चेहरा पसंद आ गया होगा, तुम्हारे जैसी ही तो लगती है वो पेंटिंग, भले ही तुमने खूब सारे रंगों से चेहरे को रंग दिया है बिल्कुल जैसे किसी ने होली पर चेहरे पर खूब सारा अबीर गुलाल छिड़क दिया हो, बस हँसते हुए दांत नज़र आते हैं पर पेंटिंग लाजवाब है।”

” मैडम जी आप ही बात कर लो एक बार, हमारी तो सुन नही रहे वो साहब”

माया और नेहा ऑफिस से बाहर निकल आये, माया ने आगे बढ़ कर उस आदमी से कुछ कहना चाहा ही था कि पेंटिंग को देखता वो पलट कर माया के सामने हो गया, दोनो कुछ देर एक दूसरे को देखते ही रह गये।।

” मैं कैसे समझ नही पाया कि ये तुम हो माया।”
अबीर की बात पर माया ने शरमा कर आंखे नीची कर लीं….

” बहुत खूबसूरत पेंटिंग है, बिल्कुल तुम्हारी तरह, अभी तक समझ नही पा रहा था की बनाने वाला इसे बेचना क्यों नही चाहता, पर अब तुम्हें देख कर समझ आ गया…..”

” कैसे हो अबीर?”

” बिल्कुल वैसा ही जैसे पहले था, तुम कैसी हो?”

उसके सवाल पर वो मुस्कुरा उठी__

” क्या समझ गये? मैं आखिर क्यों नही बेचना चाहती इस पेंटिंग को?”

“बस उसी कारण जिसके लिये मैं इस पेंटिंग को खरीदना चाहता था, पर खैर अब मैं नही खरीदूंगा, तुम्हारी यादें तुम्हें मुबारक!! हाँ अगर तुम्हारी जगह किसी और ने ये बनाया होता तो किसी भी कीमत पर खरीद ही लेता, मेरी वाईफ को पेंटिंग्स का बहुत शौक है माया, आज अपनी सालगिरह पर सोचा उसे उसकी पसंद का तोहफा दूंगा पर यहाँ इस पेंटिंग ने मुझे रोक लिया, इसके आगे और कुछ देख ही नही पाया, इस पेंटिंग में मुझे तुम नज़र आई थी, पर जब ये देखा कि बनाने वाली भी तुम ही हो तो सब समझ आ गया मुझे।।”

उन दोनों को बातें करता छोड़ नेहा और बाकी लोग वहाँ से जा चुके थे….

” तुमने शादी की माया?”

” नही!! पहली टिकी नही और जब दूसरी करनी चाही तो जिससे चाहा वो जाने कहां गुम हो गया।”

” एक बार मुझसे कहा तो होता?”

” कब कहती, कैसे कहती? अगर तुम्हारी ‘ना’ होती तो मैं जीते जी मर जाती, अब तक जी रहीं हूँ और तुम्हारे दिये उन रंगों से ही अपना कैनवास भर रही हूँ, इतना काफी है अबीर , तुम मेरी तरफ से ये पेंटिंग रख लो।”

” मिलना नही चाहोगी मेरी वाईफ से?”

” वो भी आईं हैं क्या यहाँ?”

” हम्म !!, वो तुम्हारा ऑफिस है शायद।”

” अरे हाँ!! आओ उन्हें भी बुला लो, मैं तब तक कॉफ़ी के लिये बोलती हूँ!” कह कर माया आगे बढ़ गयी, उसके पीछे अबीर भी उसके ऑफिस में प्रवेश कर गया…..

” कहाँ हैं?? तुम्हारी वाईफ अन्दर नही आई??”

” मिलवाता हूँ, पहले चैन से बैठ तो जाऊँ!! इतने सालों की कितनी सारी बातें हैं, मेरे कोटा जाने के कुछ समय बाद तुम्हारा परिवार वो शहर ही छोड़ गया….
पहले तो रोली से तुम्हारे बारे में कुछ सुनने को भी मिल जाता था पर तुम लोगों के शहर छोड़ने के बाद तो तुम लोगों से सम्पर्क के सभी साधन बन्द हो गये, रोली को भी तुम्हारी कोई खबर ना थी, खुद को कहाँ कैद कर रखा था माया?”

” पता नही अबीर!! पर तुम्हारे घर से ना सुनने के बाद मेरी भी हिम्मत चूक गयी थी, और शायद घर वालों की भी, दादी तो अब रहीं भी नही, मेरे घर भर में सबसे ज्यादा उन्हें ही तुम पसंद थे।”

” और तुम्हें??”

अबीर की बात अनसुनी कर माया ने कॉफ़ी उसके आगे बढ़ा दी__” अब मिलवा भी दो अपनी वाईफ से।”

अबीर ने हाँ में सिर हिला कर अपने जेब से अपना वॉलेट निकाला और खोल कर माया के सामने कर दिया, उसमें उसकी वही पन्द्रह साल पुरानी रंगों से भीगी मुस्कुराती तस्वीर लगी थी__” ये कब निकाल ली थी तुमने ?”

” रोली को कह कर तुम्हें नीचे बुलाने से लेकर मोहित से छिप कर तस्वीर खिंचवाने तक की प्लानिंग थी मेरी, वो तो उसके बाद मैं पढ़ने बाहर चला गया वर्ना ….”

अबीर अपनी बात पूरी भी नही कर पाया था कि नेहा हाथ में गुलाल से भरी प्लेट थामे दोनो के पास चली आयी …..
” आप दोनों को होली की शुभ कामनाएँ “

अबीर ने मुस्कुरा कर माया को देखा__” उस दिन एक काम अधूरा रह गया था माया”

प्लेट से ढ़ेर सारा गुलाल उठा कर अबीर माया की तरफ बढ़ा ही था कि माया ने अपने हाथों से गुलाल अबीर के गालों पर मल दिया ” उस दिन अधूरा रह गया था ये अरमान!! हैप्पी होली अबीर!!

aparna….

साबूदाना : स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है या नही?

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  साबूदाना:-



    साबूदाना नाम लेते ही हमारे सामने उपवास से भरे दिन के बाद की सजी हुई थाली नजर आने लगती हैं साबूदाना हमारे हिंदुस्तान का एक बहुत प्रचलित खाद्य पदार्थ है।
     उत्तर भारत हो मध्य भारत हो या महाराष्ट्र उपवास में मुख्य रूप से खाए जाने वाले आहार का हिस्सा है साबूदाना। साबूदाना से तरह-तरह की चीजें बनाई जा सकती हैं चाहे वह साबूदाना की खिचड़ी हो साबूदाना के बड़े हो या खीर ।
यह सारे ही भोज्य पदार्थ पोषकता के मानकों पर खरे उतरते हैं।

   व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में इधर कुछ दिनों से साबूदाने के ऊपर लंबे चौड़े वीडियोज़ रहे हैं कि इन्हें पशुओं की चर्बी से पॉलिश किया जाता है या साबूदाना बनाने में एनिमल फैट प्रयोग किया जाता है तो इन्हें उपवास में प्रयोग में कैसे लाया जाए?

सबसे पहली बात तो यह है कि बिना किसी विश्वसनीय साइट के आप सिर्फ व्हाट्सएप के वीडियोस के आधार पर कोई भी भ्रांति मन में ना पाले यह एक तरह से अफवाहों का अड्डा ही है कोई अफवाह चल गई तो ट्रेंड में आ जाती है और लगातार लगातार उस वीडियो को देखते हुए आप अपने मन में एक धारणा तैयार कर लेते हैं।

  साबूदाना का इतिहास खंगाला जाए तो यह मालूम पड़ता है कि यह हमारे परंपरागत आहार का हिस्सा नहीं था। यह मुख्य रूप से अफ्रीका में होने वाली टैपिओका की प्रजाति है।
    भारतवर्ष में इसे लाने का श्रेय त्रिवेंद्रम के राजा जी को जाता है। कई जगह इतिहास में यह भी वर्णित है कि साबूदाना की खेती सबसे पहले तमिलनाडु में शुरू की गई लेकिन बहुत सी जगह पर इसकी खेती सबसे पहले केरल में किए जाने के सबूत भी मिलते हैं।

साबूदाना पूरी तरह से वानस्पतिक आहार है। वनस्पतियों के रस से बनाया आहार उपवास के लिए पूरी तरह शुद्ध और सात्विक होता है।

  आइए देखते हैं साबूदाना बनता कैसे हैं…

भारतवर्ष में साबूदाना मुख्य रूप से टेपियोका की जड़ से बनाया जाता है सबसे पहले खेती वाली जगह से सारी टेपियोका की जड़ों को एक साथ निकाल लिया जाता है। यह जड़ें निकालते समय कुछ-कुछ मूली की तरह नजर आती हैं। बड़ी-बड़ी मशीनों में इन्हें डाल कर अच्छे से इनकी मिट्टी साफ कर ली जाती है तेज पानी की धार में धुली हुई यह जड़ें मशीन में आगे पहुंचती हैं। जहां पर इन्हें पील कर दिया जाता है, यानी कि इनके ऊपर का छिलका उतार दिया जाता है। छिलका उतारने के बाद एक बार फिर इन जड़ों को तेज पानी की धार से निकाला जाता है जिससे इन में लगी थोड़ी बहुत भी मिट्टी हो तो वह साफ हो जाती है। इसके आगे मशीनों में लगे चौपर से गुजरते हुए टेपियोका कि यह जड़ें छोटे-छोटे टुकड़ों में कट जाती हैं आगे एक बार फिर इन टुकड़ों को क्रश किया जाता है जिससे इन जड़ों का दूध पूरी तरह से निकाला जा सके। टेपियोका की जड़ों से निकाला गया यह दूध फिर सेट होने के लिए रख दिया जाता है।
क्योंकि यह दूध टैपिओका की जड़ से निकाला हुआ स्टॉर्च है कुछ देर तक स्थिर रखने से यह जम जाता है। अच्छी तरह जम जाने के बाद इसे वापस बड़े बड़े टुकड़ों में तोड़ लिया जाता है अब इन बड़े टुकड़ों को बहुत बारीक पीस लिया जाता है। इस पाउडर को वापस मशीनों की सहायता से आगे बढ़ाया जाता है कि यह छोटे-छोटे पारदर्शी गोलों में बदल जाते हैं।

  इस सारी तकनीक के बाद साबूदाना के दाने तैयार हो जाते हैं साबूदाना की यह मोती जैसे दाने मुख्य रूप से 2 तरह की साइज में उपलब्ध होते हैं।
    अब बाजार में तो वही बिकता है जो दिखता है इसीलिए साबूदाना के इन दानों को पॉलिश कर लिया जाता है। इस तरह यह साबूदाना के दाने आप की प्लेट में आने के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं। आइए अब देखते हैं कि साबूदाने की न्यूट्रीशनल वैल्यू क्या होती है?

  साबूदाना मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट का सोर्स माना जाता है। कार्बोहाइड्रेट के अलावा कैलशियम पोटैशियम और अन्य मिनरल्स और खनिज भी इसमें पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं।

  उपवास में क्यों है ये मुख्य आहार:-

साबूदाना उपवास का सर्वप्रमुख आहार है इसका मुख्य कारण साबूदाने का कार्बोहाइड्रेट रिच होना ही माना जाता है। जब पूरा दिन उपवास करने के बाद शरीर की शक्ति कम होने लगती है तब हमारे शरीर को कार्बोहाइड्रेट से मिलने वाली ऊर्जा की आवश्यकता होती है। पूरा दिन उपवास करने के बाद  अनाज नहीं लेना चाहिए और सिर्फ फलाहार करना चाहे तब ऐसे में साबूदाना सबसे अच्छा ऑप्शन माना जाता है। साबूदाना को अनाज में नहीं गिना जाता लेकिन बावजूद उसमें काफी मात्रा में कार्बोहाइड्रेट पाए जाते हैं जो उपवास से होने वाली थकान और ऊर्जा की क्षति को पूरा कर देते हैं।

वजन बढ़ाने में सहायक :– साबूदाना में पाए जाने वाला फैट और कार्बोहाइड्रेट दुबलेपन से ग्रस्त लोगों में वजन बढ़ाने के लिए उपयोग में लाया जाता है।  इसीलिए काफी समय पहले टीबी सेनेटोरियम में साबूदाने की खीर सभी मरीजों को आवश्यक रूप से बांटी जाती थी इसका मुख्य उद्देश्य टीबी के मरीजों में वजन को बढ़ाना ही होता था।

हड्डियों के लिए लाभदायक:-  साबूदाना में पाए जाने वाले पोषक तत्व हमारे शरीर की हड्डियों के वर्धन में सहायक हैं । साबूदाना में कैल्शियम आयरन और मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। साबूदाना में पाए जाने वाला कैल्शियम जहां हड्डियों के वर्धन और विकास के लिए सहायता करता है । वही इस में उपस्थित आयरन ऑस्टियोपोरोसिस को रोकने में भी सहायक होता है ।  इसके साथ ही साबूदाना में पाए जाने वाला मैग्नीशियम आज समय में होने वाले हड्डियों के रोगों से भी लड़ने में सहायक होता है । यह हड्डियों को मजबूत बनाता है और फिट रखता है।

ऊर्जा देने में सहायक:– साबूदाने में उपस्थित कार्बोहाइड्रेट आपके शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है अगर आप किसी काम से थके हुए हैं और आपके शरीर का एनर्जी लेवल नीचे गिरा हुआ है, तब ऐसे में साबूदाने का सेवन आपके एनर्जी लेवल को सुधार कर आपको तुरंत ताकत और बल प्रदान करता है।

मेटाबोलिज्म के संतुलन में सहायक :-   गर्मी के दिनों में जब हमारे शरीर को ग्लाइकोजन की अतिरिक्त आवश्यकता होती है उस समय साबूदाने में उपस्थित कार्बोहाइड्रेट और फैट ग्लूकोस में बदलकर हमारे शरीर को तुरंत शक्ति प्रदान करता है और शरीर में उपस्थित गर्मी को दूर करता है इसीलिए ताप से जुड़ी बीमारियों में भी साबूदाने को खीर के रूप में या पानी के साथ उबालकर रोगियों को दिया जाता है।

उच्च रक्तचाप में साबूदाना:–   साबूदाना में पोटैशियम और फास्फोरस प्रचुर मात्रा में पाया जाता है इसके कारण यह शरीर में बढ़ने वाले उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायता करता है साबूदाना में सोडियम की मात्रा काफी कम पाई जाती है जिसके कारण इसके सेवन से रक्तचाप बढ़ने की समस्या नहीं होती इसके अलावा इसमें पाए जाने वाले फास्फोरस और पोटेशियम के कारण बढ़ा हुआ रक्तचाप कम होता है तथा उच्च रक्तचाप के मरीजों के लिए यह एक उचित नाश्ते का विकल्प माना जाता है।

रक्ताल्पता में इसका प्रयोग:– शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी को एनीमिया माना जाता है। एनीमिया से ग्रस्त रोगी को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। साबूदाना में उपस्थित आयरन लाल रक्त कणिकाओं की वृद्धि कर खून की कमी को दूर करता है। शोध द्वारा यह मालूम चला है कि साबूदाने में बहुत अधिक मात्रा में आयरन नहीं पाया जाता इसलिए एनीमिया के लिए सिर्फ साबूदाने का सेवन पर्याप्त नहीं है , साबूदाने के साथ ही अन्य आयरन युक्त आहार अधिक लाभप्रद माना जाता है।


मस्तिष्क के लिए उपयोगी:- साबूदाना में प्राकृतिक रूप से फॉलिक एसिड भी पाया जाता है। इसमें पाए जाने वाला फॉलिक एसिड शारीरिक रोगों के साथ-साथ मानसिक रोगों में भी लाभप्रद है मस्तिष्क में उत्पन्न विकारों में साबूदाना एक उचित आहार होता है।


रक्त परिसंचरण में लाभप्रद:– साबूदाना में पाए जाने वाला आयरन और फोलिक एसिड रक्त धमनियों में जाकर रक्त के परिसंचरण को सुगम बनाता है।
   

अतिसार में लाभदायक :– किसी कारण से दस्त हो जाने या अतिसार में भी बिना दूध के पकाया हुआ साबूदाना बहुत लाभप्रद होता है।

गर्भावस्था में :- गर्भावस्था में गर्भ में पल रहे शिशु के पर्याप्त पोषण हेतु भी साबूदाना उपयुक्त आहार माना जाता है। साबूदाना में लौह और खनिज तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जातें हैं जो शरीर की बढ़त के लिए अति आवश्यक हैं।

   इसके अलावा साबूदाना का फेस पैक त्वचा में कसाव लाकर त्वचा को चमकदार बनाने में भी सहायक होता है।

   साबूदाना के इतने सारे लाभ जान कर अब आप भी इसे अपने रोजाना के आहार का हिस्सा बना सकतें हैं।  ये एक उच्च ऊर्जायुक्त सुपाच्य आहार है जिसके फायदे अनेक हैं।

  डॉ अपर्णा मिश्रा

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वो सात दिन …. एक प्रेम कहानी

प्यार में ज़रा सी दूरियां भी हैं ज़रूरी….

      रोहित और नीता की शादी तय हो चुकी है,सब कुछ बहुत- बहुत अच्छा चल रहा है,आज शाम को दोनों की शादी की डेट  भी निकल आयेगी।
    
           “हेलो ,रोहित! क्या कर रहा था मेरा शोना ?”
   “कुछ नही नीत ,बस अभी फ्रेश होके आया,अब डिनर करने जा रहा।”
“ओ के बेबी,अच्छा सुनो आज मम्मा-पापा ने पण्डित जी को बुलाया था ,आज से ठीक 45दिन बाद का मुहूर्त निकला है,28जनवरी का।
   “मम्मा ने तुम्हारी मॉम को भी फ़ोन कर दिया है ,अभी अभी,,बस तुम्हारी मॉम का भी तुम्हारे पास फ़ोन आने ही वाला होगा।”
” yeah off course! बल्कि आने ही लगा ,चलो मै मॉम से बात करके तुम्हे कॉल करता हूँ,बाय।”

      रोहित भोपाल का रहने वाला स्मार्ट खूबसूरत बन्दा था,एन आय टी से इंजीनियरिंग करने के साथ ही कैम्पस सेलेक्शन होके पुणे आ गया।’पटनी ‘ मे कुछ समय काम करने के बाद उसने अपने कैरिअर को देखते हुए कंपनी बदल दी,अपने तेज दिमाग और कार्य कुशलता के कारण 5साल मे ही टी एल बन गया ।
        
         नीता ने जब उसी कंपनी मे काम शुरु किया तब पूरे ऑफिस मे जैसे बहार सी आ गई।
हंसती खिलखिलाती नीता ने जैसे सारे ऑफ़िस मे जादू सा कर दिया,पर इस जादू का सबसे ज्यादा असर दिखा रोहित पे।

       रोहित और उसके दोस्तों मे होड़ सी लग गई नीत से दोस्ती करने की,रोहित जिस प्रोजेक्ट मे टीम लीड था,उसी प्रोजेक्ट मे नीता भी थी,बस रोहित ने बाजी मार ली।।आधी जंग तो उसने उसी दिन जीत ली,दोस्त बेचारे अपना सा मुहँ लेके रह गये।
 
      पर लड़के एक बात मे मानने लायक होते हैं,चाहे एक ही लड़की के पीछे सारे पड़े हों ,पर जब ये नज़र आता है की उस लड़की का उनमे से किसी एक की तरफ झुकाव है,तो सारे एक साथ मिल के अपने दोस्त की मदद मे जुट जातें हैं,बस वही हुआ।

     अब सारे मिल कर रोहित के लिये फील्डिंग करने लगे और उसे मैच जीता दिया,रोहित को ऐसा लगने लगा था की नीता नही मिली तो वो जी नही पायेगा,कुछ ना नुकुर के बाद नीता ने भी हाँ कर दी।

      अब रोहित को असल मे समझ आया की जीवन क्या है? बेचारा पांच साल से बैचलर जिंदगी जी रहा था,अपने मन का आप मालिक था ,मन किया तो खाया वर्ना सारा दिन सिर्फ चिप्स ठूंसते और टीवी पे मैच देखते निकाल दिया। घर पूरा अस्तव्यस्त पड़ा रहता और वैसा ही अस्तव्यस्त सा उसका जीवन भी पड़ा था।
    
     नीता के आने से उसके अन्धेरे जीवन मे रौशनी आ गई,पतझर मे जैसे बहार आ गई।
     उसने सीसीडी मे नीता से प्यार का इजहार किया और नीता ने हाँ कह दिया,उसके बाद वो उसे  घर तक छोडने गया,गाड़ी मे बजते ‘बादशाह’ को बदल कर नीता ने ‘तुम जो आये जिंदगी मे बात बन गई ‘  चला दिया,रोहित को बहुत पसंद आया ये गाना।
    “बहुत प्यारा सॉन्ग है,तुम्हारा फेवरेट है?”
“मुझे सारे रोमांटिक सॉंग्स बहुत पसंद हैं ।”और तुम्हे क्या पसंद है रोहित?”
“मुझे तुम पसंद हो ……नीत।”

    इसके बाद रोहित के संसार मे नीता घुलती चली गई।
    “हेल्लो ,रोहित क्या कर रहे हो? अभी तक उठे नही,बेबी आज रविवार है,मै तो सोच रही थी हम लंच साथ करेंगे।”
“हां करेंगे ना जान,तुम “सिगडी “पहुचों,मै बस तैय्यार होके आता हूँ ।”
” ओए ,मै तो सोच रही थी,तुम्हारे रुम पे आके कुछ बनाऊं और तुम्हे खिलाऊ ।”
      हे भगवान ! नीता रुम पे क्यों आना चाहती है,कल ही शनिवार था,और सारे यारों दोस्तों के साथ मिल कर जम के पार्टी की थी,सारी बोतलें कमरे मे ही पड़ीं हैं,हडबड़ा के उठा और घर की सफाई मे लग गया।

        घर ऐसे चमका दिया की रोहित को खुद पे ही नाज होने लगा,नहा धो के तैय्यार हुआ की नीता आ गई।
     “हेलो,ओह्ह ये रुम है तुम्हारा,रोहित कैसे रहते हो यहाँ पर,कितना मैसी है ,उफ,चलो मै ही कुछ करती हूँ ।”
    नीता ने खिड़की खोल दी ,और एक बार फिर घर समेटने मे लग गई,साफ सफाई कर के कॉफ़ी बनायी और लेके आई,रोहित दिल जान से नीता पे फिदा हो गया,घर अब वास्तव मे साफ हो गया था।

     रोहित को सब कुछ अच्छा लगता ,नीता का बहुत केयर करना,उसे बेबी बुलाना,मीटिंग मे कौन सी शर्ट पहनना है,ये बताना,और सबसे अच्छा लगता जब वो अपने दोस्तों के साथ रहता तब बार बार फ़ोन करके समय पे घर जाने,और कम पीने की सलाह देना।।

    रोहित और नीता बहुत खुश थे,दोनो के मॉम डैड भी पुणे आके मिल चुके थे,सब तरफ से सब अच्छा था,और अब दोनो की शादी की तारीख भी तय हो गई। पर अब अचानक ……

…..रोहित को कभी कभी डरावने सपने आने शुरु हो गये,वो नींद से चौंक के उठता,और घबरा जाता।
     पता नही कैसा अन्जाना सा डर उसके चारों ओर व्याप्त होने लगा,उसे खुद से डर लगने लगा था,उसे डर था की वो नीता को खुश रख पायेगा या नही,,असल मे उसे शादी से डर लगने लगा था।

      नीता हर बात मे पर्फेक्ट थी,समय की पाबंद, साफ सफाई पसंद,अच्छी कुक,इन्टीरियर डिजाइनर    ये,वो ……कोई ऐसा ज्ञान नही था जिसकी जानकारी नीता को नही थी,टी वी धारावाहिक मे क्या चल रहा है,से लेकर देश की राजनीति मे किसने कब कहाँ हलचल मचाई ,सब कुछ उसके जिव्हाग्र पे होता…….और जैसा की अक्सर इतने ज्ञानी लोगों के साथ होता है,ये लोग अनजाने ही अपने साथ वालों की हर बात मे दखल देने लगते हैं,उन्हे हर छोटी से छोटी बात भी सिखाने लगते हैं,बस वही हुआ…..

       ” रोहित !……ये क्या पहन के आ गये,आज तो गुरुवार है,मैने कहा था ना पीली शर्ट पहनना, तुम ब्लैक मे आ गये।”
      “रोहित! …… सुनो आज शनि देव पे तेल चढा देना,तुम्हारा शनि थोड़ा भारी है ना।”
      “रोहित!  वो तुम्हारा सुनील मुझे फूटी आँख नही भाता,उससे दूर रहा करो बाबू।खुद तो दिन भर पीने के बहाने ढूंडता है,और तुम्हे भी अपने साथ भिड़ाये रखता है।”
        ऐसे ही सुबह गुड मॉर्निंग से शुरु हुआ पीटारा रात मे एक झिड़की के साथ ही बन्द होता
    “तुम अभी तक ऑनलाइन हो,रात के साढे ग्यारह बज गये,चलो अच्छे बच्चों की तरह सो जाओ।”
      बेचारा रोहित डर के मारे ये भी नही बोल पाता की तू खुद ऑनलाइन नही होती तो मुझे ऑनलाइन पकड़ती कैसे मेरी माँ ।

     जहां प्यार होता है वहाँ भय नही होता,और अगर कही किसी के हृदय मे भय आ जाये तो उसका प्रेम महल हवा के झोंको से ही हिलने लगता है।

      नीता का मानना था की प्यार मे कोई दुराव छिपाव नही होना चाहिये,इसीसे वो कभी रोहित का फ़ोन भी खोल के उसके मैसेज पढ़ने लगती।
      एक बार ऐसे ही उसने सुनील का मैसेज पढ़ लिया।
   “अच्छा तो तुम्हारे ये सिरफिरे दोस्त मुझे हिटलर बोलते हैं।”
     “नो बेबी! किसने कहा तुमसे।”
   “मुझसे कौन कहेगा? हिम्मत है किसी की,वो तो तुम्हारा मैसेज पढा,तो पता चला की मैं हिटलर हूँ ।”

     “तुम्हे कोई हिटलर नही बोलता बेबी,वो तो सिर्फ सुनील कभी कभी मजाक मे……”
     नीता जितनी शिद्दत से रोहित से प्यार करती थी,उससे भी कहीं ज्यादा शिद्दत से सुनील से नफरत करती थी,और कुछ वैसी ही भावना सुनील की थी,नीता के लिये।वो भी रोहित को नीता के खिलाफ भडकाने का कोई मौका नही छोड़ता ।

    रोहित ये करो,वो मत करो,ऐसे खाओ,वैसे ना खाओ,योगा करो,जिम जाओ……ये,वो……रोहित रोहित रोहित।।।।।
     
     रोहित थकने लगा था,प्यार उसे अब भी था,पर जाने कैसी बेचैनी और उदासी उसके अन्दर भरने लगी थी।

      वो दोनो साथ ही शादी की शॉपिंग पे जाते पर एक तरफ जहां नीता चहक चहक के लेह्ंगो के ट्रायल लेती,वो चुपचाप बैठा,कुछ सोचता रहता, उसकी शेर्वानी भी नीता ने ही पसंद की अपने लहन्गे के कोन्ट्रास्ट मे।

      फिर एक दिन नीता ने रोहित को बताया कि उसे 7दिनों के लिये सिंगापुर जाना पड़ेगा,कुछ ऑफ़िस प्रोजेक्ट है,बताते समय लग रहा था,नीता रो ही पड़ेगी,पर इधर रोहित के मन मे तो बांसुरी बज रही थी।
        रोहित को खुद पे गुस्सा भी आ रहा था कि उसे दुखी होना चाहिये पर वो तो खुश है,,खुश भी नही बहुत खुश है।

      रोहित को तमाम बातें सिखा पढा के नीता बड़े बोझिल कदमों से फ्लाइट लेने चल दी,और अचानक रोहित ने महसूस किया ,की इतने दिनों से जो अजीब सा बोझिल पन था,वो खतम हो गया।
    सारे मनहूस काले बादल बरस गये,हर तरफ रोशनी फैल गयी,और उस रोशनी मे रोहित चमकने लगा।

       वो गाता गुनगुनाता वहाँ से सीधा सुनील को साथ लिये अपने कमरे मे पहुँचा,जी भर के दोनो ने बियर पी ,खूब उल्टा सुल्टा खाया,और मैच देखते पड़े रहे।
  दूसरे दिन इतवार था,रोहित की नींद फ़ोन की घंटी से ही खुली,नीता का फ़ोन था।
   “अभी तक सो रहे हो ना,अच्छा सुनो कल बहुत लेट पहुंची ,इसीसे तुम्हे फ़ोन नही किया,सोचा सुबह ही बता दूंगी ,गुस्सा तो नही हो ना।”
     उफ्फ रोहित को तो खयाल ही नही रहा था की उसे नीता से पूछना था की वो कब पहुंची।

     दो दिन बड़े आराम से सूकून भरे गुज़रे, मंगल को रोहित की क्लाइंट मीटिंग थी,तैय्यार होते होते उसने अपनी आलमारी खोली,उसे सुझा ही नही की क्या पहनूँ ।
     तुरंत नीता को फ़ोन लगाया,पर नीता ने फ़ोन काट दिया,दो बार रिंग करने पर उसका मैसेज आया।
  “I’m in meeting,call u later.”
    बेचारा कुछ तो भी पहन के चला गया।।।

मीटिंग्स में ऐसा उलझा की शाम के 7 बजे घर पहुँचा,सोचा एक कॉफ़ी बना लूं,पूरी रसोई छान मारी पर उसे चीनी का डब्बा नही मिला,फिर फ़ोन किया,नीता ने फ़ोन नही उठाया।

    दो दिन से जिस आज़ादी का जश्न मना रहा था आज उसी आज़ादी से कोफ्त हो गयी।

     समय काटने के लिये टी वी लगा लिया,,कुछ न्यूज़ सुनी,कुछ बहस सुनी,,पर मन कही नही लग रहा था,सुनील को फ़ोन किया,
    “कहाँ है भाई,घर आजा कोई मूवी देखेंगे।”
   “अरे नही रोहित ,तेरी भाभी को शॉपिंग पे ले के आया हूँ,यहीं से हम खाना खाते हुए ही घर जायेंगे,तू एन्जॉय कर भाई।”

   खाक एन्जॉय करुँ,खुद तो मुझे नीता के लिये भड़काता फिरता है और यहां अपनी बीवी से चिपका घूम रहा है।

    रात हो गयी ,नीता का कोई फ़ोन नही ,कोई मैसेज नही,रोहित ने फ़ोन उठाया वॉट्सएप्प खोला
  नीता ऑनलाइन थी
“हेल्लो जान ! सुबह से कहाँ बिज़ी हो यार।”
नीता का कोई रिप्लाई नही आया।
” ओ मैडम कहाँ हो भाई”
कोई रिप्लाई नही।
“नीता r u there? “
कोई रिप्लाई नही।अब तो हद ही हो गयी,यहाँ थी तो पीछे पीछे घूमती रहती थी,और अब देखो,दो दिन हुए की भूल गयी।

रोहित ऑफलाइन हो गया,और चादर ओढ कर सो गया,पर नींद खुद के चाहने से ही आ जाती तो प्यार करने वाले नींदों की शिकायत क्योंकर करते।

    आधे घन्टे बाद फिर फ़ोन खोला और देखा
नीता अब भी ऑनलाइन थी।।।।।

  अगले दिन सुबह नीता के गुड मॉर्निंग मैसेज से उसकी नींद खुली,एक प्यारी सी मुस्कान आ गयी चेहरे पे,तुरंत नीता को फ़ोन किया।
“हेल्लो कल कहाँ गायब थी?सारा दिन कोई मैसेज नही।”
“आज भी बिज़ी रहूंगी रोहित,हमारा टी एल है ना चैन्ग, बड़ा ही अनोखा बन्दा है,दिन भर काम करता भी है कराता भी है,पर ऐसे की कोई शिकायत ही ना कर पाये ।
  माहौल इतना स्पोर्टि कर देता है की लगता ही नही बॉस है।क्या नोलेज है बन्दे को ,क्या बताऊँ तुम्हे।”
“और तुम्हे पता है ,He just love Indian food”
उसे कुकिंग भी आती है,बिल्कुल मेरे जैसा पुलाव बनाता है……इसके बाद पूरे 5मिनट तक नीता चैन्ग के बारे मे ही बताती रही,पर अब रोहित को कुछ सुनाई नही दे रहा था।

    शाम को नीता को फ़ोन लगाया,उसने नही उठाया,अब तो रोहित को ऐसा लगा तुरंत उड़ के सिंगापुर पहुंच जाये और चैन्ग को गोली मार दे।
   पर हर बार मन का हो जाता तो मनमीत का दिल दुखे ही क्यों।

   क्या क्या सोचा था रोहित ने,उसे लगने लगा था की वो नीता के हाथ की कठपुतली बन गया है,शादी के नाम से इसीलिये तो डरने लगा था,उसे लगा नीता कुछ दिन के लिये चली जायेगी तो वो आज़ादी की खुशबू महसूस कर सकेगा ,पर जितना सराबोर होकर वो आज़ादी की महक सूंघना चाहता था,उससे कही ज्यादा वो नीता की खुशबू मिस कर रहा था।

     अभी तो नीता को गये सिर्फ 3 दिन हुए थे,और उसका ये हाल हो गया था।

     सुबह जल्दी नींद खुल गयी उसने,फेसबुक खोल लिया,नीता का प्रोफाइल फोटो बदला हुआ था,
     फोटो मे चार पांच लड़के लडकियां खड़े थे,सबसे बीच मे नीता ही थी,गुलाबी टॉप मे मुस्कुराती हुई कितनी प्यारी लग रही थी,और उसके बाजू मे उसके कन्धों पर हाथ रखा एक गोरा खड़ा था।
    ओह्ह्ह्ह तो यही है चैन्ग।,मुझे तो ये सारे चिंकी एक ही जैसे लगते हैं,पर ये नीता के कन्धे पर हाथ क्यों रखे खड़ा है।

   नीता को इस बारे मे कुछ भी टोकना प्रलय को दावत देना था,बेचारे का पूरा दिन खट्टा हो गया।चौथा दिन भी बीत गया।

  अगले दिन सुबह ऑफ़िस के लिये तैय्यार होने के बाद रोहित ने नीता को वीडियो कॉल किया, दोनो एक दूजे को देख के खिल गये मुस्कुरा उठे,तभी रोहित ने देखा नीता ने काफी छोटी ड्रेस पहनी थी,उसने पुछा,तो नीता ने कहा,”यहाँ तो यही फॉर्मल्स कहलाते हैं बाबू,मै तो सारी जीन्स ही लेके आई थी,आज पार्टी है तो कल ये चैन्ग के साथ जा के खरीद के लायी हूँ,उसी की पसंद है,मैने बहुत कहा पर देखो ना उसने मुझसे ड्रेस के पैसे भी नही लिये।”
     रोहित को पैर से सर तक आग लग गयी,यही काम है इन गोरों का ।।बस लड़की देखी की फिसले ,और खास कर शादीशुदा या एंगेज्ड लड़कियों पे तो ये कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो जातें हैं,अरे अपने जैसी ढूँढ ना भाई अपने लिये,मेरी वाली के पीछे क्यों पड़ा है,और चलो चैन्ग को मारो गोली ,ये नीता के उसूल कहाँ तफरीह करने चले गये,आज तो बात कर के रहूँगा।।

   पर पांचवा दिन भी बीत गया। रात बाकी थी………जो बिल्कुल नही बीत रही थी,बार बार नीता से पेहली मुलाकात,उसकी बातें,उसकी हंसी सब कुछ याद आ रहा था,वो दोनो जब भी लॉन्ग ड्राइव पे जाते हमेशा नीता एफ एम बन्द करके खुद ही कुछ गुनगुनाने लगती थी,कितना प्यारा गाती है,और कितना सारा गाती है,सोच के रोहित के चेहरे पे मुस्कान आ गयी…….
…………..क्यों बिना वजह इतना डर रहा था,नीता के बिना जीना तो ज्यादा मुश्किल है,उसके साथ डर डर के जीने से।।मॉम की कितनी फिक्र रहती है उसे
डैड को भी फ़ोन कर कर के अपना बी पी ,और शुगर समय समय पे चेक करवाने की हिदायत देती रहती है,,अब बेचारी ओवर परफ़ेक्ट है तो इसमें उसकी क्या गलती।
   रोहित का मन फूल सा हल्का होने लगा,उसने अपने तकिये को अपने सीने से लगाया और नीता को सोचते हुए सो गया।

  शुक्रवार को रोहित ने जल्दी जल्दी ही सारे काम निपटाए ,सुनील को लिये घर पहुँचा ,दोनो ने मिल के घर की सफाई की ,नीता के पसंदीदा ग्लौडियस फूलदान मे सजाये,और उसके बाद भीमजी भाई की दुकान पहुंच गये।

    शनिवार नीता की फ्लाइट आने के आधे घन्टे पहले ही दोनो दोस्त एयरपोर्ट पहुंच गये।
     रोहित का दिल ऐसे धड़क रहा था,जैसे आज पहली बार नीता को देखने वाला है,जैसे पहली बार नीता से बोलने वाला की वो उससे सच मे कितना प्यार करता है।
     नीता आई ,और दौड़ के रोहित के गले लग गयी,उफ्फ कितना सुकून,कितनी शान्ती,कितना प्यार है इस मिलन मे….
   “अब मुझे छोड़ के कही मत जाना नीत,मर जाऊंगा तुम्हारे बिना।” और फिर नीता की उंगली मे हीरे की अंगूठी पहना दी।
“अबे अगर नीता तुझे छोड़ के जाती नही तो तुझे पता कैसे चलता की वो क्या है तेरे लिये,चलो भाई अब मै चला अपने घर,शाम को मिलते हैं फिर,ओके नीता।”
  “जी भाई साहब ! शाम को भाभी जी को भी लेकर आना।”
   रोहित को समझा नही की अचानक नीता सुनील को भाई साहब क्यों कहने लगी।
  खैर वो दोनो बाहों मे बाहें डाले बाहर की तरफ बढ़ चले,जाते जाते नीता ने पलट के सुनील को देखा और आंखो ही आंखो मे आभार प्रकट किया,सुनील ने भी हल्के से मुस्कुरा के आभार ग्रहण कर लिया।।।

aparna…..

मायानगरी -4




   मायानगरी -4



       वो एक अंधेरा सा कमरा था। कमरे में टीवी फुल वॉल्यूम में चल रहा था और बस टीवी से निकलने वाली रोशनी उस कमरे में फैली हुई थी….
   कमरा बहुत खूबसूरती से सजा था। हर चीज़ अपनी जगह पर मौजूद थी। कमरे में एक तरफ बड़ी सी लकड़ी की अलमीरा में खूब सारे सॉफ्ट टॉयज सजे थे….
    उनमें से एक टेडी बियर नीचे गिरा पड़ा था। बाहर तेज़ बारिश का शोर था और अंदर टीवी पर चलते किसी शो का ।
      इसलिए शायद रसोई से आती सिसकारी की आवाज़ साफ नही सुनाई पड़ रही थी…
  लेकिन बहुत ध्यान से सुनने पर लग रहा था जैसी कोई बच्ची रो रही हो…
   उसी वक्त सीढ़ियों पर किसी के तेजी से चढ़ने की आवाज़ आयी।
   कोई लगभग दौड़ते हुए सीढियां चढ़ कर बाहर के बड़े से दरवाज़े को ठेलते हुए बाहर के ही जूतों के साथ भाग कर रसोई में चला आया…

” ये क्या कर रही हो देविका ? बच्ची है वो उसे छोड़ दो। “

” मेरी भी तो बच्ची है। सिर्फ तुम्हारी तो नही। “

” हाँ तुम्हारी ही है, फिर क्यों उस पर इतना ज़ुल्म कर रही हो। उसे छोड़ दो प्लीज़। तुम जो कहोगी मैं मानने को तैयार हूँ। “

  ” प्रॉमिस करो। गौरी के सर पर हाथ रख कर कसम खाओ पहले ।

  वो आदमी जैसे ही एक कदम आगे बढ़ा उस औरत ने उसे वापस रोक दिया..

“नही तुम वहीं रहो , इधर मत आओ। “

  उस औरत जिसे वो आदमी देविका कह रहा था ने अपनी आठ साल की मासूम सी बच्ची को रसोई गैस के सिलेंडर से बांध रखा था। हाथ में दियासलाई पकड़े वो उस आदमी यानी अपने पति से किसी बात को मनवाने की ज़िद कर रही थी।

   आखिर सामने खड़े पूरी तरह से मज़लूम और बेसहारा से दिखते उस आदमी ने उस औरत के सामने अपने हाथ जोड़ दिए…..

” तुम जो कहोगी मुझे सब मंज़ूर है। लाओ दो मुझे कहाँ रखें हैं तलाक के पेपर्स। “

देविका ने आंखों से पीछे  रखे टेबल की ओर इशारा किया। जयेश टेबल की ओर लड़खड़ाते हुए मुड़ा ही था कि देविका का पैर सिलेंडर से उलझा और वो सामने की ओर गिर पड़ी….
   देविका के गिरते ही सन्तुलन बिगड़ने से सिलेंडर भी अपनी जगह से लड़खड़ा कर गिरने ही वाला था कि उससे बंधी बच्ची ज़ोर से चिल्ला उठी… ” पापा..”

   गर्ल्स हॉस्टल के कमरा नम्बर 10 में अपने बेड पर बैठी गौरी पसीना पसीना हो चुकी थी। वो नींद से जाग चुकी थी… तो अब तक जो चल रहा था वो ?
   हाँ वो सपना ही तो था…. वही सपना जो उस भयानक रात के बाद उससे जैसे चिपक सा गया था…
   ये सपना बचपन से उसका पीछा कर रहा था। अक्सर वो अपने कड़वे बचपन को इसी तरह सपने में देख चौन्क चौन्क कर आधी रात को जाग जाया करती थी, और फिर घंटो उसे नींद नही आती थी…

    आज भी वो समझ गयी कि अब उसे नींद नही आनी है…. उसने अपने बिस्तर के बाजू में रखी टेबल पर पड़ा लैम्प जला लिया और गाइनेकोलॉजी की किताब खोल कर पढ़ने बैठ गयी।
    यही रात दिन की पढ़ाई ही तो उसके टॉपर होने का कारण थी। लोग परीक्षाओं में आगे बढ़ने के लिए पढ़ते थे और वो खुद से जंग लड़ने के लिए पढ़ती थी।
पढ़ते पढ़ते ही भोर हो गयी थी….  खिड़की से आती रोशनी देख उसने खुद के लिए चाय चढ़ाई और मुहँ हाथ धोने वॉशरूम में चली गयी….
    चाय लिए  बालकनी में खड़ी गौरी की नज़र बाहर कैम्पस में जॉगिंग करते मृत्युंजय पर पड़ गयी… वो उसे देख ही रही थी कि उसने भी उसे देख लिया और हाथ के इशारे से बाहर बुलाने लगा।
   हाँ में सर हिला कर वो बाहर चली गयी….

” ये क्या जॉगिंग वाला ट्रैक सूट क्यों नही पहना। नाइट सूट में ही बाहर चली आयीं।”

  अब गौरी को होश आया कि वो जैसे खिड़की पर खड़ी थी, वैसे ही बाहर चली आयी थी…

” वो ध्यान ही नही रहा सर ! आज जॉगिंग करने का मूड भी नही है। “

  जय को समझ में आ गया था कि गौरी ने आज फिर वही सपना देखा है।
   जय यानी मृत्यंजय उपाध्याय अभी मेडिकल कॉलेज में हाउस सर्जन शिप समाप्त करने के बाद  मनोरोग में पीजी कर रहा था। फिर भी जूनियर्स में वो हाउस सर्जन के पद से ही जाना जाता था।
   गौरी और मृत्युंजय की मुलाकात भी इत्तेफाक से हुई थी…. दोनो के बीच अफेयर जैसी बात फिलहाल नही थी लेकिन मेडिकल कॉलेज ऐसी जगह होती हैं जहाँ बिना आग के ही धुंआ उड़ता है।
   लोग बस धुंआ देख बात उड़ा देते हैं ये जाने बिना की धुँआ सिर्फ आग का ही नही  सिगरेट का भी हो सकता है…..

    मृत्युंजय गौरी का सिर्फ ट्रीटमेंट कर रहा था जिसके कारण गौरी को अक्सर मृत्युंजय की ओ पी डी जाना होता था और बस वहीं से दोनो के बीच कुछ चक्कर चल रहा है कि लहर सारे कॉलेज में बह चली। गौरी से तो किसी ने नही पूछा लेकिन जय को अक्सर उसके दोस्त इस बात पर छेड़ जाते और वो चुपचाप मुस्कुरा कर रह जाता……
   
     ऐसे ही थोड़े न मेडिकल कॉलेज अपने कांडो को लेकर बदनाम था…


*****

    फर्स्ट ईयर की पहली क्लास सेमिनार हॉल में लगी थी। सारे जूनियर्स कतार में बैठे प्रोफेसर का इंतेज़ार कर रहे थे कि धड़धड़ाते हुए सीनियर लड़कियों की टोली अंदर चली आयी….
   आते ही दरवाज़ा बंद कर दिया गया….

   सामने मंच पर कुछ सीनियर्स सवार हुई तो कुछ जूनियर्स के आगे पीछे कहीं न कहीं व्यवस्थित हो गईं…

  सारे जूनियर्स सांस रोके थर्ड बटन हो चुके थे।

” क्यों भई कौन है वो श्रीदेवी जिसने कॉलेज में पहले ही दिन कांड कर दिया ? “

  एक सिनीयर की तेज कड़कती आवाज़ पर भी सब चुप खड़े थे। ऐसा सन्नाटा पसरा था कि सुई भी गिरे तो टन्न की आवाज़ हो…

” काहे भाया सांप सूंघ गया ? ये जब से आमिर ताऊ ने बताया है कि म्हारी छोरियां छोरों से कम है के? तब से इस बात को मेडिकल की छोरियों ने कुछ ज्यादा ही सिरियसली ले लिया है!”

   अब जूनियर्स की सांसो की आवाज़ भी आनी बंद हो गयी थी….

” क्या हुआ? मैं पागल लग रही हूँ तुम लोगों को जो किसी के मुहँ से जवाब नही फूट रहा। अरे बको न कौन थी भई सलीम की अनारकली जो पहले ही दिन जाकर इंजीनियरिंग के लड़के को प्रोपोज़ कर आई? “

   रंगोली के आजू बाजू खड़े लोगों ने धीरे से उसकी तरफ उंगली से इशारा कर दिया….

” ओहो तो आप हैं वो मधुबाला! आइये ज़रा सामने, हम भी तो दीदार करें।
   भई शक्ल से तो सीधी सूदी दिख रही है फिर कैसे इत्ता बड़ा कांड कर आई।
  एक तो प्रोपोज़ कर दिया वो भी इंजीनियरिंग वाले बंदे को। कमाल है यार! अब वो बंदा तुझे ढूंढता यहाँ हनीमून मनाने आ गया न तो हमारे पास आकर रोने मन बैठ जाना।”

एक ने अपनी बात पूरी भी नहीं कि की दूसरी पट से बोल पड़ी…..

” यार और कोई नहीं मिला तुझे।  प्रपोज ही करना था तो अपने कॉलेज के किसी बंदे को कर देती। मिला भी तो इंजिस!
    लानत है यार लानत!  तुझे पता भी है सबसे घटिया बंदे पढ़ते इंजीनियरिंग कॉलेज में….
   फर्स्ट ईयर से क्या-क्या कांड नहीं करते हैं। रोंगटे खड़े हो जाएंगे अगर हम उनकी रैगिंग के किस्से तुम सबको  सुना दे तो ।
   आई बात समझ में?  हम तो पहले दिन से ही लड़कियों को आगाह कर देते हैं कि भैया एक बार को चलती ट्रेन में भले चढ़ जाना लेकिन इंजीनियरिंग कॉलेज के लड़कों के सामने मत पड़ना। यह इतने गए बीते होते हैं ना कि तू सोच भी नहीं सकती।
   लड़कों की सबसे घटिया जमात इन्हीं कॉलेज में इकट्ठा होती है ।
    फर्स्ट ईयर से इन्हें रैगिंग में सुट्टा मारना और दारु पीना सिखाया जाता है। यह होती है इनकी आगे की ट्रेनिंग। समझ रही है सेकंड ईयर थर्ड ईयर तक पहुंचते-पहुंचते   तो बंदा बिल्कुल ही पुरखा हो जाता है । गांजा हशीश चरस डोप क्या नहीं ट्राई करते हैं ये लोग।
  यह साले इतने स्लेविश होते हैं इतने स्लेविश होते हैं कि इनकी कमिनाई पर पूरा ग्रंथ लिख डालो। आई बात समझ में ? तो बेटा तुझे इतनी बड़ी माया नगरी में इंजीनियरिंग के अलावा और कोई बंदा ही नहीं दिखा।
आंखें ठीक तो है ना तेरी चश्मा वश्मा तो नहीं चढ़ा रखा।”

” अबे ये भी तो हो सकता है कि ये उसी की बंदी हो। दोनों की पहले ही डिंग डाँग चल रही हो। सीनियर्स ने रैंग किया तो चली गयी अपने पिया जी को बताने। ”

  रंगोली की सांस अटकी पड़ी थी और ये सीनियर उसे और डराये जा रही थी….

” नो मैम ! ऐसी कोई बात नही है। मैं तो यहाँ किसी को नही जानती। “.

” तो इतनी होशियारी मारने की क्या ज़रूरत थी?
पहले दिन आकर हमने रूल्स बताए नही और तुम लोग कूद पड़ीं। अरे क्या ज़रूरत थी सीनियर लड़को को रैगिंग देने की। हमारा कॉलेज एन्टीरैगिंग है इतना भी नही पता? “

“जाने दे सुचित्रा , हमें क्या ? हम तो इन नौनिहालों को बचाना चाहतें हैं और ये लोग है कि वो ऋषि एंड टीम के सामने सरेंडर कर गयीं।
  क्यों ऋषि खुराना ने रैंग किया है ना? “

  तभी एक जूनियर ने धीमे से गुनगुना कर कोई दूसरा नाम पुकार लिया…

” नो मैंम। अधिराज सर ने!”

” ओह्ह तो अधिराज के हत्थे चढ़े हो बेटा। मतलब अब तक ऋषि के साथ इंट्रो नही हुआ । ऋषि खुराना से बच के रहना, हम लोग एन्टीरैगिंग वाली हैं ना इसलिए पहले से खबरदार कर रहीं हैं। बाद में मत कहियो की मैडम ने बचाया नही। “

” मैम प्लीज़ हेल्प कर दीजिए। कैसे बचना है ऋषि सर से। “

   ” देखो भई मैं बहुत बड़े दिल वाली हूँ। परमार्थ में बहुत विश्वास है मेरा। बिना किसी स्वार्थ के बता रही हूँ। आज के आज फटाफट शाम में सारी गर्ल्स हमारे कमरों में आकर असाइनमेंट ले जाना और हफ्ते भर में लिख कर हमें वापस दे देना । “

“पर मैंम उससे हम सर लोगों की रैगिंग से कैसे बचेंगे?”

” अबे बता रहीं हूँ ना ज़रा सांस ले लूँ।”

” जी मैंम!”

  “एंड यू बॉयज, तुम लोगों के हॉस्टल में फर्स्ट फ्लोर के कमरा नम्बर 5 में अध्यक्ष का कमरा है। अध्यक्ष मतलब स्टूडेंट्स यूनियन मेडिकोज का अध्यक्ष।
   उसके पास तुम सारे लड़के पहुंच जाना। घर से जो भी खाना खज़ाना लेकर आये हो ना जैसे लड्डू चकली , निमकी .. सारी चीज़ें अध्यक्ष को पहुंचा देना। ये उनसे मिलने की फीस है। बस उसके बाद अध्यक्ष सर सब संभाल लेंगे। ”

” चल शर्मिला आज के लिए बहुत ज्ञान हो गया…”

” अरे हां मुमताज ! तूने सही कहा , चल अब निकलें वरना कहीं चतुर्वेदी आ गया न तो लेने के देने पड़ जाएंगे। “

  सारी की सारी सीनियर्स जैसे आयीं थी वैसे ही बाहर निकल गईं….

   उनके जाते ही जूनियर लड़के शाम को अध्यक्ष से मिलने जाने के मनसूबे तैयार करने लगे।

******

  सीपी सर की अगुआई में अभिमन्यु , अधीर और बाकी लोग सीईओ यानी निरमा से मिलने निकल गए।
  अभिमन्यु ने 400 की जगह 499 हस्ताक्षर तैयार कर लिए थे जिनमें कुछ नकली तो कुछ असली भी थे।

” अबे 499 का क्या फंडा है बे? या तो 400 रखता या 500,। 450 भी चल जाता । पर ये कुछ आधा अधूरा सा नही लगता। “

“सर जी यही तो फंडा है। जैसे मॉल और बड़े ब्रांड्स अपनी ब्रांडिंग करते हैं ना 499 लिख कर। देखने वाले का फोकस 4 पर ही जाता है दिमाग में आता है 400 कि रेंज का सामान है जबकि असल रेट तो 500 है। बस वहीं बात यहाँ लागू होगी।
  निरमा मैडम जब 499 देखेंगी तो उनके दिमाग मे  400 की रेंज आएगी और वो आसानी से सारे हस्ताक्षर मान जाएंगी।
   हम 10 लोग 500 के साइन लेकर जाते तो वो बिना पढ़े ही फाड़ के फेंक देती। इसलिए ऐसा किया। और जब उनकी टीम काउंटिंग में जाएगी तब 500 हस्ताक्षर एक बड़ा पैमाना बन जायेगा हमारी बात को प्रूव करने का। “

” अरे वाह अभिमन्यु। तुम तो यार बहुत ही बेकार सा ज्ञान दे डाले। चलो अब वहीं देखा जाएगा , क्या होता है?

  सारे लड़के निरमा के चेम्बर के बाहर खड़े थे। अंदर निरमा किसी मीटिंग में थी।
   लगभग घंटे भर बाद कमरे के अंदर से फैकल्टी मेंबर बाहर निकल आये।
  उनके बाहर आते ही निरमा ने पियोन से कह कर उन लड़कों को बुलवा भेजा…

“बैठिये आप लोग। “

  सामने रखी कुर्सियों पर सबके बैठते ही निरमा ने अपने सामने रखी फाइल को धीरे से बंद कर एक किनारे कर दिया..

   सारे लड़के उसे ही देख रहे थे। निरमा ने बीच में बैठे सीपी से इशारे से ही सवाल कर लिया…

” कहिये क्या तकलीफ है आप लोगों की?”

  सीपी ने साथ रखा पर्चा उसके सामने कर दिया… आंखों पर चश्मा सही करते हुए निरमा उनके द्वारा प्रस्तुत किये आवेदन को पढ़ने लगी। पढ़ते हुए उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ कर चली गयी..
  

” ओके । तो आप लोग चाहतें है सारे कैम्पस में बेरियर लगवा दिए जाएं।”

  ” नही मैम । नॉट बैरियर । पर लोगों का यहाँ वहाँ टहलना बंद हो जाये। “

“देखो वो तो ऐसा है की अगर आप सब अपनी अपनी क्लास में मन लगा कर पढ़ेंगे तो बाहर निरर्थक टहलने का किसी को वक्त ही कहाँ मिलेगा? “

” जी मैंम हम तो शिद्दत से पढ़ते ही है लेकिन आर्ट्स एंड स्पोर्ट्स कॉलेज के लड़के हमारे कैम्पस में खूब चक्कर लगातें हैं मैम।
  उन लोगो का चक्कर मेडिकल में भी खूब लगता है।”

“और आप लोग अपने ही कैम्पस में रहतें हैं? “

निरमा के सवाल पर सभी ने राजा बेटा बन कर हां में सर हिला दिया..

” गुड। लेकिन जब आप लोग अपने कैम्पस से निकलते नही तो ये कैसे पता चला कि वो लोग मेडिकल के भी चक्कर लगातें हैं।”

“मैडम ये सब तो पता चल ही जाता है।”

” अच्छा ! कैसे लेकिन? मैं तो देखो सारे कैम्पस में घूम सकती हूँ पर जब तक आप लोग न बताएं मुझे ये सब पता ही नही चलता। खैर…
   आप लोग अपनी पढ़ाई के लिए इतने कटिबद्ध है कि बाहर से आने वाले बच्चों के कारण डिस्टरबेंस फील करते हैं इससे आपको असुविधा हो रही है। ये बात सही नही है। अब ऐसे में मुझे कोई निर्णय तो लेना ही पड़ेगा।
  मैं ऐसा करती हूँ कल ही इंजीनियरिंग कैम्पस की बाउंड्री वाल को ऊंचा करवा देती हूँ। और आपका गेट परमानेंट लॉक करवा देती हूँ।
  वैसे भी आपके कॉलेज कैम्पस में ही आपकी फैकल्टी का भी हाउसिंग है, और आप लोगो का होस्टल भी।
  तो मेन गेट लॉक करवा देते हैं। न आप लोग बाहर आ सकेंगे न बाहर से कोई अंदर जा सकेगा।  
  इज़ इट ओके?”

“नो मैंम ! बिना बाहर निकले तो काम नही बनेगा। और बाउंड्री ऊंची हो गयी तो हवा कैसे आएगी? “

अभिमन्यु की बात सुन निरमा को ज़ोर से हंसी आ गई..

” फिर ? बोलो क्या करना चाहिए। “

” आप मेडिकल और हमारा कैम्पस ओपन रखिये बस आर्ट्स वालो का यहाँ  आना बंद करवा दीजिये।”

” नो ये तो पॉसिबल नही है। अगर खुले रहेंगे तो सारे खुले रहेंगे और अगर बंद किया तो सभी को बंद करवा दूँगी।
   एक बात और! मैं रोज़ रोज़ नए नियम अप्लाई करने में यकीन नही रखती। अगर एक बार निर्णय ले लिया तब फिर आप लोग मुझे मेरे निर्णय बदलने के लिए नही कह पाएंगे।
  इसलिए अभी एक हफ्ते के लिए सभी कैम्पस में कर्फ्यू कर लेते हैं।
कोई अपने कैम्पस से बाहर कहीं नही जाएगा। अगर ये ट्रायल सफल हुआ तो यही कार्यप्रणाली आगे अपनायी जाएगी वरना देखा जाएगा।
  पर इस एक हफ्ते की समयावधि में आप लोग ये इंश्योर कर लेना कि आप में से कोई किसी और कैम्पस में न दिखे वरना मैं फिर उसे सीधा रेस्टीकेट ही करूँगी।”

  निरमा की बातों को मंज़ूर कर वो लोग खड़े हो गए। निरमा को नमस्ते कर सभी बाहर निकल गए..

” यार ये तो पूरी डॉन है। पहले कैसे स्माइल देकर मीठी मीठी बातें कर एकदम से छुरी मार दी।मतलब हद है , अब आप इंजीनियरिंग वालों को भी  रूल्स बताएंगे। “

” सीपी भाई उनके लिए तो हम सब बराबर ही हैं। वो कौन सा इंजिस से खौफ खाएंगी। खैर चलो एक हफ्ते का ही सही कर्फ्यू तो लगा । अब देखते है वो जूनियर विधायक कैसे हमारे कैम्पस में फटकता है…..
   साला एक हफ्ते नही आएगा तो खुद यहाँ का रास्ता भूल जाएगा….”

  निरमा के ऑफिस से बाहर निकले वो लोग अपने कैम्पस की ओर बढ़ रहे थे कि अभिमन्यु ने अधीर को धीरे से पीछे खींच लिया…

” क्या हुआ? “

” यार आज मंगल है? “

” हाँ तो । तुम्हारा तो सब मंगल ही है। “

” अबे आज मंगलवार है तो आज के दिन मैं थोड़ा पुण्य कमा लेता हूँ न। मैं फटाफट यूनिवर्सिटी के मन्दिर से दर्शन कर के आता हूँ। तू कहाँ मिलेगा? “

” अबे और कहाँ, वहीं मिलूंगा अड्डे पे।

” चल ठीक है मैं  आता हूँ। इन गँवारू लोगो से कुछ मत कहना मैं कहाँ गया। “

” हाँ मेरे शाहरुख तू जा। जी ले अपनी ज़िंदगी। बस कोई नई सिमरन मत पटा कर आना। “

  अपने बालों पर हाथ फिराते हंसते गुनगुनाते अभिमन्यु यूनिवर्सिटी के अंदर की तरफ बने मंदिर की ओर चल पड़ा।
   बाहर जूते खोल वो फटाफट मंदिर में दाखिल हो गया…
   भगवान की मूर्ति के सामने आंखे बंद कर हाथ जोड़े वो मन ही मन में उनसे बातें करता रहा। होंठ धीमे से कुछ बुदबुदा रहे थे और उसने धीमे से आंखें खोल लीं। उसके ठीक सामने खड़ी लड़की ने भी शायद उसी वक्त आंखें खोली और पंडित जी के कहने पर नीचे झुक कर उसने सिंदूर उठा कर अपने माथे पर छोटा सा तिलक करने के बाद अपने साथ खड़ी अपनी सहेली को तिलक करने मुहँ पीछे घुमाया और ठीक सामने पड़ गए अभिमन्यु  के माथे पर तिलक की लंबी रेखा खींच दी।
    इतनी जल्दी ये सब हुआ कि वो लड़की और अभिमन्यु दोनो ही कुछ नही समझ पाये…

” आई एम सॉरी , आई एम सॉरी । मैंने तो झनक समझ कर तिलक आपको लगा दिया। “

” नो इट्स ऑलराइट । एब्सोल्यूटली ऑलराइट ! “

  अभिमन्यु तिलक पोंछने ही जा रहा था कि पंडित जी ने टोक लगा दी…

” अरे बेटा इतनी जल्दी मंदिर का लगा तिलक नही पोंछते। घर जाकर मुहँ धोओगे तो चेहरा साफ हो ही जायेगा…”

  हाँ में सर हिला कर उसने पंचामृत के लिए हाथ बढ़ा दिया।।उसके बाजू से ही  उस लड़की ने भी हाथ आगे कर दिया…
  अब तक में अभिमन्यु उस लड़की को पहचान चुका था।
   ये वही उस दिन वाली लड़की ही थी।
उस दिन तो लंबे लंबे बाल लहराती सुंदर सी कॉलेज फर्स्ट ईयर की लगती ये लड़की आज किसी शिशु मंदिर की गयरहवीं की छात्रा लग रही थी।
  नीला कुरता,सफेद सलवार, सफेद थ्री पिन की हुई चुन्नी पर ऊपर की ओर लाल रिबन से बंधी दो चोटियां।
   पर जो भी हो प्यारी बहुत लग रही थी।

  अभिमन्यु उसे देखता उसके पीछे मंदिर की सीढ़ियां उतर गया। वो अंतिम सीढ़ियों पर खोले अपने जूते पहन रही थी..

” हेलो ! माइसेल्फ अभिमन्यु … अभिमन्यु मिश्रा इंजीनियरिंग मैक फिफ्थ सेम। ”

  उस लड़की ने अपनी बड़ी बड़ी आंखें ऊपर कर उसे देखा , और सर नीचे किये जाने के लिए मुड़ गयी…

” अरे इत्ती घनघोर बेइज्जती । अपना नाम तो बताती जाओ यार। इतनी भी कर्टसी नही है? “

” रंगोली नाम है उसका और मैं हूँ झनक। मेडिकल फर्स्ट ईयर।
   हो गया इंट्रो अब हम लोग जाएं?”

  पानी पीकर आयी झनक ने अभिमन्यु की बात सुन ली थी। उसने रंगोली का हाथ पकड़ा और उसे खिंचती अपने साथ लिए आगे बढ़ गयी…

” रंगोली पहचाना इस लड़के को? “

  रंगोली के ना में सर हिलाते ही झनक हँसने लगी…

” अरे तेरा पति है ये। वही बंदा है जिसे तूने उस दिन प्रोपोज़ किया था।”

  झनक की बात सुन रंगोली का दिल धक से रह गया। कहीं सीनियर्स की कही बातें सच न हो जाएं। उसके मज़ाक को कहीं इसने सीरियसली ले लिया तो?
  उसका तो जीना दूभर हो जाएगा। पहले ही लड़कों को देख कर उसकी सिटी पिट्टी गुम हो जाती थी, और यहाँ तो उसने खुद आगे बढ़ कर कुल्हाड़ी में अपना पांव दे मारा था।
   उसने धीमे से पीछे मुड़ कर देखा वो वहीं हाथ बांधे खड़ा अपनी गहरी आंखों से उसे ही देख रहा था….

क्रमशः



aparna….
   

मायानगरी -3







  मायानगरी -3


      इंजीनियरिंग कैम्पस में भी नई नई चिड़िया चहक रहीं थीं वहीं कुछ कौए भी फुदक रहे थे…
   एक तरफ एक छोटा सा गार्डन बना था, जहाँ एक बड़े से बरगद के पेड़ पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था..
   “यहाँ रैगिंग करना सख्त मना है”

   उसी पेड़ के नीचे बैठे कुछ लड़कों ने उधर से गुजरते कुछ कौवों यानी  कुछ नए लड़कों को आवाज़ देकर बुला लिया..

” फर्स्ट ईयर? “

” यस सर !”

” बेटा पहले दिन ही जीन्स? और ये क्या बाल बना रखें हैं? खुद को नागराज समझते हो? “

” नो सर!”

” तो ये जो बालों का फुग्गा दिख रहा है ना कल कटवा के आना समझे। कल गंगाधर विद्याधर मायाधर ओंकारनाथ शास्त्री बन के आ जाना समझे।”

” ये सारे लोगों जैसा बन कर आना है सर? “

” अबे शक्तिमान नही देखे क्या बे ? हो सकता है तुम्हारे पैदा होने के पहले का सीरियल हो? अबे गूगल कर लेना।  .. और सुनो आज रात आठ बजे होस्टल नम्बर 5 में आ जाना। चलो फूटो अब…

   वो लड़के जान बचा कर भाग खड़े हुए। उन्हें यूँ भागतें देख सभी सीनियर्स में हंसी की लहर दौड़ गयी।
   
        तभी उस लड़की के प्रोपोजल से हैरान परेशान अभिमन्यु वहाँ चला आया। अभिमन्यु के साथ उसका दोस्त अधीर शर्मा भी था…
   दोनो बातें करते गार्डन में पहुंच गए…

” काहे इत्ता सोच विचार रहे हो अभि कोई नई चिरैया होगी आर्ट या कॉमर्स वाली, बेचारी रैगिंग की शिकार !”

” हाँ होगी तो रैगिंग की शिकार ही लेकिन सोचने वाली बात ये है कि उसने इतने लड़कों में मुझे ही प्रोपोज़ किया? “

” अबे ओए तू कोई जॉन इब्राहिम नही है समझा। जो सामने पड़ गया उसे प्रोपोज़ कर चलती बनी, अब इतना मत सोच , भूल जा उसे। “

” हाँ यार !मैं कौन सा सिरियस हूँ। बस ये पता चल जाये कि बंदी है किस फैकल्टी की। वैसे शक्ल सूरत से इतनी खूबसूरत सी थी पक्का आर्ट्स वाली होगी। है ना?

” कॉमर्स या साइंस ग्रैजुएट भी हो सकती है। सभी सुंदर लड़कियां आर्ट्स ही लें ये ज़रूरी तो नही? “

” हाँ यार वैसे बी एस सी में भी अच्छी लड़कियां आती हैं। एक हमारे हिस्से ही दुनिया भर की शशिकला और टुनटुन पता नही क्यों आती हैं। पता नही ये मैथ्स वाली लड़कियां इतना पढ़ती क्यों हैं कि अपने थोबड़े का भूगोल ही गड़बड़ा देती हैं। “

” मैथ्स बिना पढ़े निकलता भी तो नही भाई, अब हर कोई तेरे जैसा अनाप शनाप दिमाग तो नही पाए बैठा है ना?

” हाँ बात में तो दम है तेरी। वैसे तुझे वो पिछले साल की बी एस सी वाली याद है?

” कौन रूही ? जिसके चक्कर में तू उसके बॉयफ्रेंड से पिटने वाला था।

” अबे मैं नही पिटने वाला था, उल्टा उस साले को मैं पीट देता लेकिन रूही का चेहरा देख कर छोड़ दिया। अब यार जब मैं उसके चक्कर लगा रहा था तब वो कमबख्त भी तो फुल लाइन देती थी,मुझे क्या पता था मज़े ले रही है । अपने बॉयफ्रेंड की ताकत नापने का ये कौन सा तरीका होता है भाई। पहले खुद लाइन दो और फिर बॉयफ्रेंड से पिटवा दो।

  अधीर का हँस हँस कर बुरा हाल था…

” और वो याद है तुझे क्या नाम था “भाषा ” क्या स्मार्ट लड़की थी यार वो। मैथ्स ऑनर्स कर रही थी ना।”

  भाषा नाम सुनते ही अभिमन्यु के चेहरे पर चौड़ी सी मुस्कान चली आयी …..

” कैसे भूल सकता हूँ यार। इतनी टैलेंटेड बंदी सच आज तक नही देखी। अब कैंटीन में जब मैं उसे देखता वो भी मुझे देख मुस्कुरा देती। मुझे लगा पट गयी है। फिर धीरे धीरे मुझसे ज्यादा तो वो ही मुझे ताड़ने लगी थी …

” हाँ और फिर आया वो मनहूस दिन!”   अधीर अभिमन्यु की बात आगे बढ़ाता हँसने लगा…

“हम्म ! अबे कैंटीन में राखी लेकर कौन आता है यार!”

” हाँ सारे बवाल तेरे ही हिस्से लिखें हैं। तुझे उसकी आँखों में ममता नज़र नही आई थी जो लाइन मार रहा था। साले वो तुझमें अपना गुमशुदा भाई देखा करती थी और तू…”

” अब मैं क्या करूँ यार। इतनी प्यारी सी लड़की अगर मुझमें अपना भाई देखेगी तो फिर ज़िंदगी ही खत्म अपनी। अच्छा हाँ इसी बात से याद आया, आज भाषा की सहेली धरा छुट्टियों के बाद वापस आ रही है, उसे लेने स्टेशन जाना है मुझे।”

“हां अब बहन बन गयी है तो पूरी शिद्दत से भाई धर्म निभा तू। कब जाना है तुझे स्टेशन? अकेली आ रही है क्या”

” रात में ट्रेन है उसकी। अकेली ही होगी तभी तो भाषा ने स्पेशली फोन कर के कहा कि स्टेशन लेने चले जाना। “

“और ये नही कहा कि अपनी आदत से मजबूर लाइन मत मारना शुरू कर देना। “

  अभिमन्यु नीचे सर किये हँसता अपने बालों पर हाथ फिराता रहा….

” खैर अब भूल जा सुबह वाली को ,चल लाइब्रेरी चलते हैं। अबे यार….. सुबह वाली लड़की मेडिको भी तो हो सकती है। “

” तौबा तौबा , ऐसी नाजुक लड़की डॉक्टर नही बन सकती यार। डॉक्टर लड़कियां न अजीब छिपकली होती हैं पढ़ पढ़ कर इनके चेहरे सड़ जातें हैं, आंखों के नीचे काले घेरे और उस पर मोटा सा चश्मा लगाने वाली लड़कियां, डेडबॉडीज़ को चीरती फाङती लड़कियां , उफ्फ। मुझे तो इनमें चुड़ैल नज़र आती है। दुनिया में आखरी लड़कीं भी बची होगी न तब भी डॉक्टरनी से कभी प्यार नही करूँगा।”

“वैसे लड़कियों के मामले में तूने जो अभूतपूर्व ज्ञान कमाया है उसे देख कर समझ सकता हूँ तू सही ही कह रहा होगा।
   दर्जन भर तो तेरी सिर्फ ए अल्फाबेट से दोस्त रही होंगी , अवनी अनामिका,अनिका, आँचल, आरुषि ,अनन्या अपूर्वीनी और क्या थी वो चैताली मिताली … हे भगवान!

” बस करो यार। जलो मत तुम बराबरी करो। समझे। “

  दोनो बातें करते आगे बढ़ रहे थे कि सामने से एक हैरान परेशान लड़का चला आया…

“”अरे ज्ञानी भैया क्या हुआ ? बड़े टेंशनियाए घूम रहे हो। “

” यार अभिमन्यु सेमेस्टर शुरू हुआ नही की ये प्रोफेसर्स की किचकिच शुरू हो जाती है।

” अब क्या जुल्म हो गया गुरु?

” अब क्या बताएं यार , पिछले सेमेस्टर का बकाया मांग रहे हैं सारे। “

” ओहहो जे बात। चलिए लाइब्रेरी में चलिए कोई उपाय निकालतें हैं ज्ञानी जी।

  ज्ञानी जी का असली नाम हर्षवर्धन गेरा है। दिल्ली के रहने वाले हर्षवर्धन के पापा का रेस्टोरेंट है लेकिन वो अपने लड़के को सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनाना चाहते हैं। बड़े घिस तिस कर हर्षवर्धन को इंजीनियरिंग कॉलेज पहुंचाया गया था। इनके बारे में किवदंती ये है कि मैनेजमेंट कोटा के लिए आवश्यक मिनिमम मार्क्स भी ये नही ला पाए थे। मैनेजमेंट कोटा की मोटी धनराशि पर अपने रेस्टोरेंट की काजू कतली की रुपहली पतरी चिपका कर ही इन्हें इनके पिता ने पार लगवाया था।
पहले जैसे इनके रहने से इनका स्कूल धन्य हुआ पड़ता था अब कॉलेज का वही माहौल था यह कहने को तो पांचवे सेमेस्टर में पहुंच चुके थे लेकिन हर एक सेमेस्टर में कोई ना कोई विषय इन्हें मुंह चढ़ाता वहीं खड़ा रह गया था ।
    कहां जाता है इन्होंने फर्स्ट ईयर की पढ़ाई दो बार पढ़ी सेकंड ईयर की पढ़ाई भी दो बार पढ़ चुके हैं और अभी पांचवें सेमेस्टर में होते हुए भी पिछले सेमेस्टर के कुछ विषय लटके पड़े ही हैं।

     इतनी गहन पढ़ाई के कारण ही इंजीनियरिंग के बच्चों में यह ज्ञानी नाम से सुप्रसिद्ध हैं, अभिमन्यु का साथ मिलने पर उसने इन्हें रात-दिन एक करके पढ़ाया और यह किसी तरह सेमेस्टर की वैतरणी पार कर आगे बढ़ गए इसीलिए यह अभिमन्यु को बहुत माना करते हैं।
      दिल का साफ अभिमन्यु इन्हें सीनियर्स की तरह आदर भी देता था और एक मित्र की तरह प्रेम भी किया करता है अभिमन्यु और अधीर के साथ ही ज्ञानी जी भी इनके रूम मेट है।

  कुछ प्रोफेसर ज्ञानी जी के पांचवे सेमेस्टर में जाने के खिलाफ थे उनका कहना था कि ज्ञानी जी पहले सारे पुराने सेमेस्टर क्लियर कर लें तभी आगे बढ़े इसी बात के फसाद पर ज्ञानी जी अभी अभी किसी से उलझ कर बाहर चले आ रहे थे जिन्हें वापस समझा-बुझाकर अभिमन्यु ने लाइब्रेरी के लिए मोड़ लिया था।

नया सत्र शुरू हुआ था इसीलिए अभिमन्यु को किताबें अलॉट करवाने की जल्दबाजी थी, उसके पास इतने पैसे तो होते नहीं थे कि वह हर एक महंगी किताब खरीद सके, इसीलिए सबसे पहले लाइब्रेरी पहुंच कर अपने काम की किताबें  अलॉट कर के रख लिया करता था।
   भले पढ़ाई से कोई नाता नहीं था लेकिन एग्जाम में फेल होना उसके जमीर को गवारा नहीं था इसीलिए एग्जाम्स में पास होने किताबें और नोट्स उसके पास होना बहुत जरूरी हुआ करता था।
    सीनियर्स भी इस मैजिक माइंड लड़के से प्रभावित थे इसलिए अपने सबसे ज़रूरी नोट्स संभाल कर रखते और सेमेस्टर क्लियर होते ही अपनी वसीयत अभिमन्यु के नाम कर दिया करते।

वहां पहुंचे वह लोग किताबें अलॉट करवा ही रहे थे कि उन लोगों के भी सुपर सीनियर 5-6 के ग्रुप में वहां चले आए उन सभी को हैरान परेशान देख अभिमन्यु और अधीर एक दूसरे को देखने लगे यह सभी ज्ञानी के साथ ही इस कॉलेज को ज्वाइन किए हुए थे इसलिए सभी ज्ञानी को अच्छे से जानते थे वह लोग ज्ञानी और अभिमन्यु के पास ही चले आए।
    उन्हीं में से एक थे सीपी भाई !

  सीपी भाई का पूरा नाम था चंद्रप्रताप सुबोधन। ज्ञानी जी के साथ ही इन्होंने भी कॉलेज में कदम रखा था। पर जहाँ सीपी भाई सारे जहान के जोड़ घटाव गुणा भाग कर कैसे भी कर के पास होते चले गए ज्ञानी जी वहीं उसी सेमेस्टर में रहकर अपना ज्ञान सिंचित करते रहे।

सीपी (c p) ने अपने साथ रखा एक पर्चा अभिमन्यु की तरफ बढ़ा दिया …..

” यह क्या है सीपी सर ?”

” ध्यान से देख ले, पढ़ ले!”

अभिमन्यु उस पर्चे को ध्यान से देखने लगा और उन लड़कों में से एक लड़का उस पर्चे के बारे में बताने लगा ….

” यार अब हद होने लगी है ! ठीक है, माया नगरी एक पूरी यूनिवर्सिटी है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि किसी भी फैकल्टी का कोई भी बंदा कहीं भी घुस जाएगा।”
  हमारे इंजीनियरिंग केंपस में कुल जमा 3 कैंटीन। है कि नहीं?  यह राजा युवराज सिंह आर्ट्स एंड स्पोर्ट्स अकैडमी वाले लड़के जब देखो तब हमारी कैंपस की कैंटीन में चले आते हैं। एक तो साला उनमें विधायक का लड़का है अपनी जीप में धूल उड़ाता फिरता है । सारा वक्त अपनी एसयूवी में सवार रहता है अपने चेलों से घिरा खुद को पता नहीं कहां का राजा समझता है?

    माया नगरी में पढ़ रहा है तो उसे लगता है कि वह खुद भी राजा अजातशत्रु बन गया है। अरे ऐसे कोई थोड़ी अजातशत्रु बन सकता है।
     पता नहीं लीचड़ आदमी खुद को क्या समझता है? जब देखो तब हमारी कैंटीन में चलाएगा और हमारे कैंपस की लड़कियों को छेड़ता रहेगा। इसी सबके लिए यह पेपर लिखा गया है।  इस पेपर को हम डायरेक्ट यूनिवर्सिटी के चेयर पर्सन के पास देने वाले हैं । इसमें यह लिखा है कि जो जिस फैकल्टी का स्टूडेंट है उसी कैंपस में रहे , और उसे किसी और कैंपस में घुसने की मनाही कर दी जाए । हमारी ब्रांच के लड़के इसमें साइन कर चुके हैं। अभी 4 ब्रांच और बची हैं , वहां के भी सारे बच्चों के साइन होने के बाद काफी सारे लोग हमारे फेवर में आ जाएंगे , इसके बाद हम अपने कॉलेज के लेक्चरर और प्रोफेसर के साइन लेने के बाद सीधा माया नगरी की सीईओ के पास जाएंगे।”

” सर पता भी है मायानगरी की सीईओ है कौन?”

“हां पता है ना! वैसे तो माया नगरी के कर्ता-धर्ता राजकुमार विराज सिंह है लेकिन हम डायरेक्टली उनके पास नहीं पहुंच सकते ऑफिस मैनेजमेंट देखने के लिए ऑफिस सीईओ के पास ही हमें जाना पड़ेगा। और सीईओ है श्रीमती निरमा प्रेम सिंह चंदेल ।
      सुनने में आया है थोड़ी स्ट्रिक्ट है मैडम लेकिन है बहुत अच्छी । यह भी सुना है कि स्टूडेंट्स के भविष्य से वह कभी खिलवाड़ नहीं होने देती। कोई भी परेशानी हो वह दोनों पक्षों को सुनकर समझ कर वही निर्णय लेती हैं जिसमें विद्यार्थियों का भला हो।  मुझे तो भरोसा है कि वह हमारी बात सुनेंगे और समझेंगे और उस विधायक के लड़के को भी सही मजा चखा देंगे,  तो बेटा अभिमन्यु साइन कर दो इसमें।

“जी सर!   सर साइन ही नहीं करेंगे बल्कि मैडम के पास चलेंगे भी…
     हम जितने ज्यादा लोग जाएंगे उतना ज्यादा असर पड़ेगा। जाहिर सी बात है कि हमारे कैंपस में सिर्फ इंजीनियरिंग वाले लड़के लड़कियां ही रहें। ना तो आर्ट्स वाले यहां आएँ और ना ही साइंस वाले ।और  मेडिकल वाले भूत तो बिल्कुल ही न आ सकें। सबको अपनी अपनी फैकल्टी अपने अपनी ब्रांच दी गई है सभी के कैंपस सफिशिएंट बड़े हैं। सभी को कैंटीन की सुविधा लाइब्रेरी की सुविधा दी गई है । फिर क्यों इधर-उधर मारे मारे फिरना । सर मैं बिल्कुल आपके साथ चलने को तैयार हूं।

“गुड तुमसे यही उम्मीद थी।  तुम्हारे दोस्त भी बहुत सारे हैं,  तो सब के सब का साइन ले लेना इसमें। ठीक है ?यह पेपर रखो शाम को हमें दे देना

“सर मैं आज शाम तक इसमें 400 लोगों के साइन ले कर आ जाऊंगा भरोसा रखिए…

“गुड तुमसे यही उम्मीद थी ..अब हम चलते हैं बाकी जगह भी जाना है!

उन लोगों के वहां से जाते ही ज्ञानी और अधीर अधीरता से अभिमन्यु का चेहरा देखने लगे।

” अभी 400 साइन कहां से लेकर आएगा तू ?  कुछ ज्यादा ही फेकू नही है ? कुछ भी कह देता है….”

” अबे सिर्फ साइन लेने के लिए 400 लोगों के पास जाने की क्या जरूरत है? भगवान ने मुझे दो दो हाथ  और 10 उंगलियां दी है।
      इन दोनो हाथों की  उंगलियों से ऐसे ऐसे कारनामे करूंगा ना कि 400 ही नही 800 साइन बना लूंगा और किसी को पता भी नहीं चलेगा। “

“अबे साले हद फर्जीवाड़ा है तू। अपना सारा दिमाग बस इसी सब में झोंक दे। सही से पढ़ लिख लेता ना तो कलेक्टर बन जाता कहीं का।”

“कितना कंफ्यूज है यार तू और मुझे भी करता है। इंजीनियरिंग कर के मैं कलेक्टर काहे बन जाता भला? “

” चल अब चलें कम से कम आठ दस साइन तो असली वाले ले ले फिर रात में हॉस्टल रूम में बैठ कर बनाते रहना फर्जी सिग्नेचर। कल मैडम से मिलने भी जाना है।”

अभिमन्यु अधीर और ज्ञानी कैंटीन की ओर चल पड़े…..

**********

रंगोली तैयार होकर अपने गांधी झोले में किताबें और नोटबुक डाल रही थी कि झनक भी नहा कर निकल आयी…

” रंगोली तू तैयार नही हुई अब तक? “

” हो तो गयी हूँ। और क्या तैयार होना बाकी है।?”

” ओए मैडम हम फुज़ी हैं, हमें ये ऊंची सी पोनी टेल , ये चटकीले रंगों के कपड़े और ये स्टाइलिश सी जूतियां अलाऊ नही हैं। समझी।

” ओह्ह ! फिर ।।”

” फिर ? तुझे एडमिशन के समय मेधा रानी ने कुछ बताया नही क्या ? अजब डंबो है यार तू। ये सब तो हमें एडमिशन के साथ ही उसने बता दिया था।

” अब ये मेधा रानी कौन है? “

झनक ने अपने माथे पर हाथ मारा और फटाफट अपनी अलमीरा से एक जोड़ा यूनिफॉर्म निकाल कर रंगोली को थमा दिया…

” मेधा रानी मैडम कॉलेज में फीस कलेक्शन के बाहर इधर उधर भटकती आत्मा के समान टहलती रहतीं हैं। सेकंड ईयर स्टूडेंट हैं, हॉस्टल रूम अलॉटमेंट के साथ ही सारे नियम भी फटाफट बता देती हैं। असल में हर साल सेकंड ईयर की एक लड़की को इस काम के लिए चुना जाता है। जो जूनीज़ को पकड़ कर नियम रटवा दें।
  अब तू पूछेगी नियम क्या हैं। तो बेबी पहला तो हमें दो चोटियां बनानी है , वो भी रेड रिबन लगा कर ऊपर बांधनी हैं। दूसरा यूनिफॉर्म में यही नीला कुर्ता और सफेद सलवार पहनना है ,चुन्नी थ्री पिन करनी है। और पैरों में बिना हील्स के हद दर्जे के बोरिंग पंप शूज़।
  ये सिमिज़ की जलन है बस। क्योंकि हर नई खेप के साथ सीनियर लड़के क्लास में अपने लायक जूनी ढूंढने ही तो आते हैं। इसलिए ये लोग हमें ऐसे नमूना बनवा कर रखतीं हैं।

  झनक की बातों के दौरान ही रंगोली भी तैयार हो गयी।
  दोनो फटाफट अपने गांधी झोले टांगे कॉलेज के लिए भाग चले….

” जल्दी जल्दी कदम बढ़ा, आज सबसे सामने बैठना है एनाटॉमी लैब में। “.

“हां यार मुझे भी अच्छे से पढ़ाई करनी है, सामने बैठेंगे तभी तो समझ आएगा। “

” पढ़ाई वढ़ाई का कोई चक्कर नही है मेरे साथ…. वो तो आज मृत्युंजय सर क्लास लेने वाले हैं, उन्हें ताड़ना है बस इसलिए सामने बैठना है…”

रंगोली फिर आंखों में सवाल लिए झनक को देखने लगी…
  
  झनक रंगोली को देख मुस्कुरा उठी….

” ऑब्विसली तू मृत्युंजय सर को भी नही जानती होगी। हाउस सर्जन हैं अपने यहाँ , क्या डैम हैंडसम बंदा है यार उफ्फ, और जब कभी ब्लैक शर्ट में आता है ना कसम से कितनी लड़कियां तो ऐसे ही कत्ल हो जाती होंगी। वो साउथ का हीरो है ना सुधीर बाबू, वो भी फेल है मृत्युंजय सर के सामने।  ये ब्लैक शर्ट का किस्सा सिमिज़ के मुहँ से ही सुना था, अब तक देखने का सौभाग्य नही मिला। “

  झनक की बातें सुनती हंसती रंगोली झनक को गहरी आंखों से देखने लगी…

” बाकियों का पता नही तू तो अभी से फ्लैट हो गयी ,लग रहा है…”

” अरे कहाँ यार। सर की तो सेटिंग है पहले से। हम तो बस आंखों को सुकून मिले ऐसी चीज़ें देखनी चाहिए, इसलिए देख लेते हैं।”

” ओह्ह तो सर की सेटिंग किससे है? “

” गौरी मैम ! उस दिन दिखी थी न होस्टल में, वही हैं……

  




क्रमशः

aparna …

मायानगरी -2

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  मायानगरी -2



     काउंसिलिंग से वापस लौट कर रंगोली के पैर जमीन पर नही पड़ रहे थे। चार दिनों में वहाँ जाने रहने की सारी तैयारियां पूरी कर रंगोली बिल्कुल किसी राजकुमारी सी अपने घर से पहली बार विदा हुई।
   सत्रह की अल्हड़ उम्र में पहली बार अपनी माँ पापा बहन को छोड़ कर जाना उसके लिए बहुत मुश्किल था।
  यही हाल उसकी माँ का हो रहा था। उनकी कनक कलेवर लड़की जिसको मेडिकल की तैयारी के कारण उन्होंने ज़मीन पर पैर नही रखने दिए थे आज खुद अपनी ज़िम्मेदारी बन कर उनसे दूर जा रही थी।
   पिछले चार दिनों से वाकई रंगोली के जाने की ऐसी तैयारियां की जा रहीं थी जैसे वो घर से अपने ससुराल विदा हो रही हो।
   भर भर के रिश्तेदार रंगोली से मिलने आ रहे थे, आखिर घर परिवार से पहली बार कोई डाक्टरी पढ़ने बाहर जा रही थी।
  मामी जी किलो भर पिन्नियों के साथ चने के पापड़  ले आयीं तो वहीं ताई जी दो जोड़ी नए सूट के कपड़े लेती आयीं।
   सबसे खुशी खुशी मिलती रंगोली चहक रही थी…

” अरे बड़ी अम्मा इसकी क्या ज़रूरत थी? ” बोलते हुए भी उसने फटाफट पन्नी में से निकाल कर बंधेज का गुलाबी कुर्ता गले से लगा लिया..

” पर है बहुत सुंदर। थैंक यू !!!”

” अच्छे से पढना बेटा। फिर वापस आकर मेरे घुटनों का तू ही इलाज करना। मुये इनके मारे कही आना जाना मुश्किल हो रखा है ।”

” अरे अभी तो कॉलेज तक भी नही पहुंची है ये। ड़ॉक्टरी पढ़ने में बहुत समय लगता है अम्मा ? सिर्फ एम बी बी एस से कुछ नही होना जाना, उसके बाद पीजी भी तो करना पड़ेगा। पता नही ये झकली वहाँ क्या करेगी। ठीक से बोल तक तो पाती नही है। कोई ज़ोर से कुछ बोल भर दे तुरंत आंखों में आंसू चले आते हैं। ”

  मेहंदी की बात सुन रंगोली ज़रा सी रुआँसी हो गयी। बात तो सही थी। वो भले ही मेहंदी से दो साल बड़ी थी पर मेहंदी जैसी तेज़ तर्राट नही बन पाई थी।
   अपने विषय से इतर कुछ भी बोलने में उसे झिझक सी महसूस होती थी। पढ़ाई में अच्छी होने पर भी वाइवा में हमेशा पिछड़ जाया करती। कितनी भी अच्छी तैयारी हो वो सिर्फ लिख सकती थी,जवाब बोल कर बताना उसके लिए बहुत कठिन हो जाता था।
   अब तक तो चयन हो जाने की संतुष्टि में झूम रही थी लेकिन मेहंदी की बात ने उसे यथार्थ के धरातल पर पटक दिया था।
   वहाँ ढेर सारे सीनियर्स और टीचर्स के बीच वो कैसे और क्या करेगी।
  
  ” डरा क्यों रही है यार मेहंदी ? चल पैकिंग करवा मेरी। “

” मैं क्या पैकिंग करूँ। मम्मी तो ऐसा लग रहा है पूरा बाजार पैक कर चुकी हैं तेरे लिए। “

  मेहंदी की बात सुन सामान के पैकेट्स कमरे में लेकर जाती रंगोली की माँ उसकी तरफ पलट गई..

” मेहंदी बेटा! वहाँ से ज़रा वो बड़ा पैकेट भी इधर ले आना।।”

  सुबह से चल रही पैकिंग से परेशान मेहंदी ने पैकेट उठा कर पलंग पर पटका और अपना रैकेट उठाये बाहर निकल गयी, जाते जाते रंगोली के कान में एक और ज़हरीला तीर छोड़ गई….

” मम्मी का बस चले तो इस घर में चक्के लगा कर भेज दे तेरे साथ!”

” तुझे क्यों जलन हो रही है? दो साल बाद ऐसे ही तेरी भी पैकिंग होगी। समझी । “

” नही समझना मेरी माँ। ये सारा घरेलू सामान तुझे मुबारक। मैं दो साल बाद कॉलेज पढ़ने जाऊंगी, तेरे जैसे गृहस्थी बसाने नही। “

   अपने रैकेट को हवा में लहराती हंसती खिलखिलाती मेहंदी बाहर निकल गयी और रंगोली मुस्कुरा कर अपनी माँ से लिपट गयी…

” मम्मी हर सैटरडे मुझसे मिलने आ जाओगी न? मैं रह नही पाऊँगी आपके बिना!”



“हर शनिवार तो मुश्किल होगा बेटा लेकिन महीने में एक बार जरूर कोशिश करेंगे कि मैं ना भी आ पाऊं तो तेरे पापा को ही भेज दूं।”

  मुस्कुरा कर माँ बेटी दोनो ने अपने आंसू पोंछ लिए!

बड़े धूम धड़ाके से रंगोली की विदाई हो गयी। रंगोली को बात बात पर छेड़ने वाली उसकी छोटी बहन ही उस की विदाई पर उसके गले लग सबसे ज्यादा रोई और रंगोली अपने पापा के साथ पूरे  चार घंटों का लंबा सफर तय कर मायानगरी पहुंच गई…

   वहाँ रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह मेडिकल कॉलेज में उसके प्रवेश की सारी औपचारिकताएं पूरी कर उसके पिता ने उसके होस्टल आदि की व्यवस्था देखने के बाद उसका सामान उसके कमरे में रखवाया और उसे साथ ले बाहर शहर घूमने निकल गए। उनकी वापसी  रात की थी। इसी से बेटी को बाहर खिला पिला कर वापस कॉलेज कैम्पस में छोड़ वो बाहर निकल गए।
   रंगोली पापा के सीने से लगी बिलख उठी। उसे लगा ये मेडिकल सीट ये कॉलेज सब उसके ममी पापा के सामने बकवास है। वो क्यों चली आयी इससे अच्छा अपने ही शहर में कुछ पढ़ लेती। बी एस सी में भी तो आजकल कितनी सारी ग्लैमरस ब्रांच हो गईं हैं। माइक्रोबायोलॉजी है और …और… और उसे कुछ याद ही नही आया। उसकी आदत ही थी खुद में कुछ भी सोचते हुए खो जाने की। और अक्सर ऐसे खो कर वो बात की मुख्य जड़ ही भुला बैठती।
   उसके पापा ने उसके सर पर प्यार से हाथ फेरा और बाहर निकल गए। पापा का ऑटो आंखों से ओझल होने तक उन्हें बाय करती वहीं खड़ी रही फिर थके कदमों से अपने कैम्पस की ओर बढ़ गयी…

   अपने होस्टल पर पहुंच कर अपना कार्ड गार्ड भैया को दिखा कर वो सीढ़ियों की ओर धीमे कदमों से बढ़ी चली जा रही थी…

” बिटिया कोई ज़रूरत हो तो पूछ लेना हमसे। डरना बिल्कुल मत!”

  पीछे मुड़ कर एहसान भरी आंखों से उन्हें देख हाँ में सर हिलाती वो सीढियां चढ़ने लगी।
   फ़र्स्ट ईयर की लड़कियों के कमरे ऊपर ही थे , नीचे सीनियर्स के थे। डरना बिल्कुल मत ऐसा क्यों बोला उन्होंने ? कुछ देर सोच कर वो गर्दन को झटक कर ऊपर चढ़ती गयी। दूसरी मंजिल पर उसे कमरा मिला था।
   वो ऊपर जा रही थी कि सामने से उतरती दो लड़कियां टकरा गई…” फुजी है ? “
रंगोली चौन्क कर सामने देखने लगी…”जी ?”

” जी जी क्या बे? फुजी है तू? “

” फूजी मतलब ? “

” मतलब फर्स्ट ईयर जूनियर। “

” जी हाँ !”

” कौन सा कमरा अलॉट हुआ है?

” सत्रह नम्बर सी विंग में!”

  दोनो लड़कियां चौन्क कर एक दूसरे को देखने लगी…

” हद करती है यार ये हिटलर!मतलब क्या इस बार ग़दर मच गया कि हॉन्टेड रूम को भी लड़कियों को दे मारा।

“हम्म सुनने में तो आया है इस बार मैनेजमेंट कोटा से भीड़ आयी है…

” अरे तो इसका मतलब भुतहा कमरा भी उठा कर रहने दे दोगे। “

  दोनो लड़कियों की बातें सुनती रंगोली घबरा कर खड़ी रह गयी….

” सुन बहन कोई परेशानी हुई तो तुरंत कमरे से बाहर भाग निकलना। बस कुछ भी हो जाये उस कमरे की खिड़की से नीचे मत झांकना और ऊपर लगे फैन को मत देखना और हाँ सुन कान में रुई डाल कर पड़ी रहना जैसे कोई आवाज़ सुनाई नही दे रही हो। एक बात और सुन,अरे एक मिनट नाम क्या है तेरा? “

” जी रंगोली , रंगोली तिवारी। “

” ओहो बढ़िया है जेम्स बांड स्टाइल में नाम बता रही है। वैसे मेरा नाम वृंदा है और ये है भूमि। हम दोनों तेरी करंट सीनियर हैं। और हम एंटी रैगिंग वाले ग्रुप के हैं। किसी सीनियर ने सताया तुझे तो तुरंत हमारे पास आना। समझी?

हां में सर हिला कर रंगोली मुड़ कर जाने लगी…

“जा बेटा महादेव का नाम लेकर चुपचाप कान में रुई डाले सो जाना।”

  रंगोली पहले ही हद दर्जे की डरपोक थी। उसे रात में उठ कर वॉशरूम जाना हो तब भी वो मेहन्दी को उठा लेती थी। अब ऐसे में कमरे में अकेले रहना उसके लिए बहुत मुश्किल था। हालांकि कमरा एलॉट करते समय उसे होस्टल इंचार्ज सर ने कहा था कि कल से एक लड़की और उसके साथ आ जायेगी रहने। लेकिन आज की रात उसे अकेले ही रहना था।

   ताले में चाभी घुमाती  वो धीमे से अंदर घुस गई। कमरा छोटा ही था। दो अलग अलग दीवारों पर छोटी छोटी कैंप कॉट पड़ी थी, बिन चादर के गद्दे और और बिना लिहाफ के तकिए के साथ। उसी के एक ओर एक टेबल कुर्सी और लैम्प था, जिससे लग कर एक आलमारी खड़ी थी।
पहली नज़र में ऐसा डरावना नही था कमरा। सामान तो वो सुबह ही ऊपर भेज चुकी थी। गार्ड भैया के हाथ से। कमरे की चाबियां भी गार्ड के पास ही छोड़ दी थीं जो अभी उन्हीं से लेकर वापस आ रही थी।

   चाबी अंदर टेबल पर रख वो अपने बैग से टॉवेल और नाइट सूट निकाल कर नहाने वॉशरूम में घुस गई।
     बाल्टी में पानी लगा कर कपड़े टांगते वो वापस अपने खयालों में खो गयी थी। घर से निकलते समय उसकी सहेलियों ने उसे समझाया था, हॉस्टल के कमरे बाथरूम सब जगह कैमेरा चेक कर लेना। आजकल ज़माने का भरोसा नही रहा, उसी बात को याद कर वो बाथरूम में कैमेरा चेक करती रही कि बाल्टी के भरने की आवाज़ पर जैसे ही नल बंद करने उसने हाथ बढ़ाया चौन्क कर एक कदम पीछे हट गई। बाल्टी में पूरा लाल पानी भरा था,और वैसा ही खूनी पानी नल से आ रहा था।
   खून!!! उसके मुहँ से चीख निकल गयी, बड़ी मुश्किल से हाथ बढ़ा कर जैसे तैसे नल बंद कर वो बाहर भागी तो देखा पूरे कमरे में हल्का  धुंआ सा है… दोनो बेड पर सलीके से चादरें बिछी हैं और कमरे में किसी के गुनगुनाने की धीमी सी आवाज़ आ रही है पर नज़र कोई नही आ रहा…
    ” झूम झूम ढलती रात, लेके चली मुझे अपने साथ झूम झूम ढलती रात …”

  डर के मारे रंगोली की आत्मा शरीर छोड़ने को थी कि उसके दिमाग ने गोता खाया और उसे लगा ये सब रैगिंग का हिस्सा भी हो सकता है।
  वो धीमे कदमों से आगे बढ़ती एक बेड के पास रुकी जहाँ से गाने की आवाज़ें आ रही थी। ध्यान से देखने पर उसे लगा वहाँ क्विल्ट ओढ़े कोई लेटा है। उसने धीरे से चादर हटा दी और एक तेज़ चीख उसके मुहँ से निकल गई….

   सामने एक पूरा का पूरा कंकाल पड़ा था।

  उसकी चीख के साथ ही उस कमरे की बुझी हुई बत्तियां जल गई और एक साथ कई जोड़ी हंसती हुई आंखें उसके सामने चली आयीं।

” वेलकम वेल्कम रंगोली , रंगोली तिवारी उर्फ जेम्स बांड !

  बेहोश होने जा रही रंगोली जैसे होश में आ गयी.. उसने देखा सामने सीढ़ियों पर मिली उसकी करंट सीनियर्स खडी थीं वृंदा और भूमि मैंम। इनके अलावा वो किसी का चेहरा नही पहचानती थी।

   उसके माथे पर पसीने की बूंदे छलक आयीं, डर से गला सूख रहा था कि एक  लड़की पानी की बोतल लिए उस तक चली आयी…

” ले पानी पी ले। “

  कृतज्ञता से उसे देख रंगोली ने बोतल हाथ में ले ली, जाने कहाँ से दिमाग का फ्यूज बल्ब जल गया और उसने सीनियर्स से पानी पीने की परमिशन मांग ली…

” मैम क्या हम पानी पी सकतें हैं? “

” ज़रूर पियो, लेकिन हम में कौन कौन शामिल है भईया ? पूरा रामगढ़ साथ लिए घूमती हो क्या? “

” जी नही तो!”

“तो हम हम क्या लगा रखा है। सिंगुलर के लिए “मैं” यूज़ किया जाता है,नही मालूम क्या? ग्रामर भी सीखानी पड़ेगी ? “

” नो मैम!”

” तो आइंदा ये हीरोइनों वाली होशियारी मत मारना। चलो अब निकल लो तुम दोनों , जाओ सारे तीरथ कर आओ। फूटो अब यहाँ से। हम अपने कमरे में जा रहे। काम निपटा कर हमारे कमरे में आ जाना। समझीं !

” जी मैम ! ” रंगोली ने अपने साथ खड़ी लड़की की तरफ देखा , उसके आंखों के इशारे पर दोनों बाहर निकल गईं…

  कमरे से बाहर निकलते ही रंगोली ने चैन की सांस ली…

” बहुत घबरा गयीं थीं क्या?”

” हाँ फिर? कोई गधा ही होगा जो  ऐसे प्रैंक से नही घबराएगा ?

“मैं नही घबराई थी। मुझे समझ आ गया था ये प्रैंक है जो ज्यादातर मेडिकल कॉलेज होस्टल में किया ही जाता है। पहले सिर्फ बॉयज हॉस्टल में होता था अब गर्ल्स हॉस्टल में भी होने लगा है।”

” ओह्ह ! रियली?”

” यस!बाय द वे मेरा नाम झनक है, मैं तुम्हारी रूम मेट हूँ। “

” पर नीचे गार्ड भैया ने तो कहा कल आएगी रूममेट। “

” शायद कल कोई और भी आएगी। फिर उसके लिए भी बेड डल जाएगा । यहाँ वेल्कम करने का यही तरीका है।

” खतरनाक तरीका है यार। ऐसे हड्डियों वाला कंकाल दिखा कर कौन डराता है भला?”

” यार तू सच इतनी इनोसेंट है?  पागल लड़की वो कंकाल हमें गिफ्ट किया है वृंदा मैम और भूमि मैम ने, वो भी फ्री में।

” मतलब ?”

“मतलब फर्स्ट ईयर में एनाटॉमी पढ़नी पड़ती है ना जिसके लिए बोन सेट चाहिए होता है। वो इन दोनों ने हमें दे दिया।
  हॉस्टल में ऐसे ही होता है, आपके सीनियर्स आपको चुन लेते हैं उसके बाद आपकी जम के रैगिंग भी लेते हैं, अपने असाइनमेंट लिखवातें हैं और वक्त पड़ने पर आपकी मदद भी करतें हैं। मुझे लगता है तुझे कुछ नही पता। चल कोई नही मैं बताती जाऊंगी। तीन फ्लोर में सबसे ऊपर हम जूनीज़ और हमारे नीचे वाले में थर्ड एंड सेकंड ईयर और सबसे नीचे फायनल प्रोफ की मैम लोग रहतीं हैं।
  तीर्थ करना मतलब हमें हर किसी के रूम को नॉक करना है डोर खुलते ही चाइनीज़ लोगों की तरह हमें झुक कर उन्हें विश करना है वो भी तीन बार। फिर अगर सिमी ( सीनियर मैम) हमारा नाम पूछतें हैं तब अपना नाम बताना है और फिर से विश करके निकल जाना है। “

” ओह्ह ! तो ये हैं तीरथ ? “

” हाँ जी! ” किसी को सामने से आते देख झनक फटाफट रंगोली का हाथ पकड़ सामने वाली को झुक कर विश करने लगी। रंगोली भी उसकी देखादेखी वैसे ही कर के खड़ी हो गयी।

  सामने से गुजरती सीनियर ने बड़ी प्यारी सी मुस्कान दी और सीढियां चढ़ कर ऊपर चली गयी…

” कौन थी यार ये। बड़ी मीठी सी थीं? “

रंगोली के सवाल पर झनक मुस्कुरा उठी….

“हमारे कॉलेज की शान हैं ये। इनके जूनीज़ इन्हें ऐश्वर्या रॉय का टाइटल दे चुके हैं। देखा न तूने कितनी ज्यादा खूबसूरत हैं।
   जहाँ से निकल जाएं लोग इन्हें देखते रह जातें हैं। सब कहतें हैं इनके मरीज़ तो इन्हें देख कर ही ठीक हो जाएंगे। थर्ड ईयर में हैं  , इनका नाम है गौरी मैम।

” वाकई बहुत सुंदर हैं। मैं तो खुद उन्हें देख कर खो गयी। ”

” हम्म पढ़ने में भी अच्छी हैं। अगर फायनल ईयर में भी इनका रिज़ल्ट ऐसे ही आया तो हाउस सर्जन शिप पक्की है इनकी। देख लेना फर्स्ट अटेम्प्ट में ही पीजी क्लियर कर लेंगी। चल फटाफट , आगे बढ़े….

  दोनों भागती दौड़ती हर एक के कमरे पर नॉक कर विश करती अपने कमरे में लौट आईं….

” बाकी के हमारे साथ वाले कहाँ हैं? “

” सब आजू बाजू के कमरों में ही हैं। सुबह मिल लेंगे। चल अब फटाफट सोतें हैं, सुबह 7 बजे से एनाटॉमी की क्लास रहेगी। ”

  अपने बेड पर बिछे कंकाल को उठा कर रंगोली ने धीरे से एक तरफ रखा और एक बार गौर से अपने बिस्तर को देख लेट गयी…

” क्या हुआ डर तो नही लग रहा, की जिस बिस्तर पर अब तक कंकाल सोया था वहाँ सोना पड़ रहा है?

रिरियाती सी आवाज़ में नहीं बोल रंगोली ने अपनी चादर सर तक तान ली। अगली सुबह उसका कॉलेज का पहला दिन जो था….

  सुबह सवेरे भागती दौड़ती दोनों एनाटॉमी लैब पहुंच गई। पहला ही दिन था , कोई पढ़ाई लिखाई नही हुई। सभी विद्यार्थी आपस में एक दूसरे का परिचय पाते रहे…
   तभी कहीं पीछे से एक आवाज़ आयी  “गांव वालों तैयार रहना गब्बर की सेना कभी भी हमला बोल सकती है”

  रंगोली ने पीछे मुड़ कर आवाज़ को पहचानने की कोशिश शुरू की ही थी कि धड़धड़ाते हुए दस बारह लड़कों का एक जत्था लैब में घुसता चला आया। आते ही उन्होंने मुख्य दरवाज़े को बंद किया और क्लास के सामने खड़े हो गए।
   झनक ने रंगोली का हाथ खींच उसे नीचे देखने कहा और खुद भी सर झुका कर खड़ी हो गयी…

” थर्ड बटन हो जा रंगोली , यमदूतों की टोली आ गयी है। ये करंट सीनियर्स सर लोग है । हम इन्हें नही देख सकते लेकिन ये लोग अपनी आंखों से ही हमारा एक्स रे स्कैन सब कर लेंगे। “

धीमे से फुसफुसा कर झनक ने रंगोली के कान में कहा और वो दोनों भी बाकियों की तरह थर्ड बटन हो गईं।

  ” ओह हेलो ! क्या नाम है तुम्हारा? सेकंड रो में लेफ्ट से थर्ड ? “

  सब धीरे से इधर उधर देखने लगे। पर झुके सरों में देखना मुश्किल था तभी रंगोली को पीठ पर किसी ने पेन चुभाई और धीमी सी आवाज़ आयी ” तुम्हें ही बुला रहें हैं, जाओ आगे!”

  रंगोली अपनी जगह से थोड़ा आगे बढ़ गयी…

” इन के पीछे वाले सर आप भी आइये। ” उसी पेन वाले लड़के को जिसने रंगोली को आगे भेजा था भी बुला लिया गया। एक एक कर पांच छै लोगों जिनमें झनक भी शामिल थी को चुन कर सीनियर्स अपने साथ बाहर ले गए…

  “चलो बेटा एक एक कर अपना इंट्रो दो। ” सबके अपना परिचय देने के बाद सीनियर्स अपनी मस्ती में चले आये।
  मेडिकल कॉलेज गेट के ठीक बाहर बड़ा सा गार्डन था,वहीं सब ने महफ़िल जमाई थी।  कुछ सीनियर्स किनारे बनी रेलिंग पर पैर लटकाये बैठे थे तो कुछ जूनियर्स के चारों ओर घूम घूम कर उन्हें  घूरते हुए गाने गवा रहे थे…

” अबे सुनो जिसको गाना सुनाना है  तनिक चार कदम यहाँ सामने आ जाओ। “

रंगोली को छोड़ कर बाकी सारे चार कदम पीछे सरक गए, पर रंगोली को चुपचाप अपनी जगह खड़ा देख वही लड़का वापस चार कदम आगे बढ़ गया…

” क्या बात है फुज़े ! पहले ही दिन सेटिंग। जय हो!!
     अब बेटा सामने आ ही गए हो तो हमारी शान में ज़रा कुछ सुना दो !”

” सर गाना सुनाऊं?”

” हाँ बेटा गाना ही अच्छा लगेगा अब मेरे ऊपर निबंध सुनाएगा तो ये लोग तुझे ज़िंदा नही छोड़ेंगे न। चल शुरू हो जा, पर होना मेरे लिए चाहिए…

  कुछ देर सोचने के बाद उसने गाना शुरू कर दिया…

  “नफ़रत से देखना पहले अंदाज प्यार का है ये
   कुछ है आँखों का रिश्ता गुस्सा इकरार का है ये 
   बड़ा प्यारा है तेरा जुल्म , सनम तेरी कसम…
   कितने भी तू कर ले सितम हँस हँस के सहेंगे हम
    ये प्यार ना होगा कम, सनम तेरी कसम…”

” बस बस बेटा , गज़ब खुश कर दिए तुम तो। माहौल बना दिये यार,अब तो एकदम रोमैंटिक मूड बन गया है। अब कुछ यहाँ शादी ब्याह हो जाये बस, पिंक सूट वाली मैडम ज़रा अब आप आगे आइये…

  घबराती हुई रंगोली दो कदम आगे बढ़ गईं….

” यहाँ जो लड़का पसंद आ रहा है उसे आपको शादी के लिए प्रोपोज़ करना है। अगर तुम्हारे कहने पर उसने पलट कर ये कह दिया कि वो तुमसे शादी के लिए तैयार है तो मैं अभिराज सिंह तुम्हारा करंट सीनियर शपथ लेता हूँ कि पूरा साल तुम्हारी रैगिंग नही करूँगा। “

खुशी से रंगोली के चेहरे पर मुस्कान चली आयी… पर उसे झनक ने बताया था कि सीनियर्स के सामने बत्तीसी किसी हाल में मत दिखाना वरना कमीने कहर तोड़ने से बाज नही आएंगे।
  अपनी खुशी अपने अंदर संभालती रंगोली ने हाँ में सर हिला दिया…

” तो वेट किसका है? जस्ट गो एंड प्रोपोज़ योर ड्रीमबॉय!”

काहे का ड्रीमबॉय रंगोली को तो बस ये रोज़ रोज़ के तमाशे से छुटकारे का रास्ता मिल गया था। उसने धीमे से नज़रे उठायी, उनसे ज़रा दूर लड़कों का एक झुंड खड़ा था,वो उसी तरफ तेज़ी से बढ़ गयी।
       ग्रे शर्ट पहने उस लड़के की न रंगोली ने कभी पहले शक्ल देखी थी न उस लड़के ने रंगोंली को देखा था।
   उसे एक झटके से अपनी तरफ घुमा कर जो दिमाग में आया उल्टा पुलटा बोल कर वो वापस भाग गई। उस लड़के ने भी वही जवाब दे दिया था जो रंगोली को चाहिए था, वो वापस भागती सी अपने ग्रुप के पास पहुंच गई…

” आई एम इम्प्रेस्ड डॉक … क्या नाम बताया था अपना?

” सर रंगोली , रंगोली तिवारी !”

“तिवारी जी… ओके गुड लक। आज के लिए बहुत हो गया, अब निकलो सब के सब। वरना फिजियो की पहली क्लास मिस हो जाएगी।
   लीला पांडेय के कहर से बचना मुश्किल ही नही नामुमकिन है।

   सीनियर्स की आज्ञा मिलते ही सारे जूनियर अंदर की तरफ भाग चले।
    वही क्लास जो सुबह रंगोली को बड़ी मनहूस लगी थी , अब सुकून और शांति का ठिकाना लग रही थी।
  क्लास में पहुंचतें ही अपनी बेंच पर बैठते ही उसने राहत की सान्स ली कि अचानक उसे वो पेन वाला लड़का याद आ गया।
   कौन था वो ,जो बेचारा पहले दिन ही मदद के चक्कर में खुद फंस गया।

  उसने अपने पीछे मुड़ कर देखा। कोई एक लड़का नही पीछे बंदरों सी पूरी फौज थी। सीनियर्स के सामने विनम्रता और शिष्टाचार की मूर्ति बने खड़े लड़के अब अपने असली रंग में उन्हीं सीनियर्स को गालियों से नवाज़ते उनके नए नए नाम रख रहें थे…..
    उन्हें  देखती मुस्कुराती रंगोली सामने मुड़ गयी। कल झनक से पूछ लुंगी, सोच रही थी कि झनक उसके पास आकर खड़ी हो गयी…
   चल फिजियोलॉजी लैब में चलना है अब!”

  हां में सर हिलाती रंगोली झनक के साथ बाकी क्लास के पीछे लैब की तरफ बढ़ गयी…..


क्रमशः …..




दिल से…


   मायानगरी का भाग आने में ज़रा देर हो गयी, कारण ये था कि मुझे लगा मालूम नही ये कहानी आप लोगों को पसन्द आएगी भी या नही। क्योंकि अधिकतर प्रेम कहानियों में कॉलेज वाला एंगल कॉमन ही होता है। अगर किसी भी आदरणीय लेखक की किसी कहानी से मेरी कहानी का कोई हिस्सा मिलता सा लगे तो ये एक इत्तेफाक ही है।

  तो कहीं ये भी कॉमन सी न लगे….

  एक और बात आप में से बहुतों को लग रहा ये मेरी कहानी है, तो उसके लिए मैं ये कहना चाहूंगी कि ये मेरी कहानी बिल्कुल भी नही है।
    हां कहानी में कुछ मेरे कॉलेज के वहाँ की पढ़ाई के, रैगिंग , पार्टिस , कलचरल्स के अनुभव शामिल हो सकतें हैं लेकिन कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है।

   कहानी में ढेर सारे किरदार होंगे जिनमें से मुख्य किरदारों के आसपास घूमती कहानी से बाकियों की कहानियां जुड़ती चली जाएंगी। बाकी बातें आप लोगों को आगे के भागों में पढ़ने मिल ही जाएगी।

  मुझे पढ़ते रहने के लिए आप सभी का दिल से आभार व्यक्त करती हूँ।
   हार्दिक धन्यवाद !!!!

aparna …..


   

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