समिधा- 34

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    समिधा – 34

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    अगले दिन से हवन पूजन शुरू हो गया। ढेर सारे आचार्य अलग अलग वेदियों पर बैठे एक साथ हवन कर रहे थे।
   हवन में डालने वाली समिधा और सामग्री की तैयारियों में आश्रम की महिलाएं और लड़के लगे हुए थे।
   एक तरफ मंदिर के प्रमुख आचार्य माइक पर मंत्र बोलते जा रहे थे। इस कार्यक्रम के लिए मंदिर भक्तों के लिए बंद रखा गया था।
   पूरा आश्रम परिसर विशुद्ध घृत और गुग्गुल की मिली जुली खुशबू से गमक रहा था।
  
       प्रबोधानन्द आंखें बंद किये आव्हान कर रहे थे। आचमन के बाद उन्होंने शिखाबन्धन कर भूमि और कलश पूजा सम्पन्न की और हवन शुरू हुआ। वरुण दूसरे कुंड में बैठा था पर उसकी आंखें प्रबोधानन्द पर ही थी।
   महिलाओं को इधर उधर कार्यो में व्यस्त देख प्रबोधानन्द की आंखें कल की दिखी अप्सराओं सी सुंदर कमनीय सी उस लड़की को ढूंढ रहीं थीं कि आखिर उनकी आंखों ने पारो को देख ही लिया।
    बनाने वाले ने कितनी फुरसत से बनाया था। बिना किसी साजश्रृंगार के भी वो अपरूप सुंदरी थी। खुला हुआ सा रंग जो परिश्रम की अधिकता से थोड़ा दबा सा लगने लगा था। लंबे काले बालों को उसने बेतरतीबी से जुड़े का रूप दे रखा था। जिनमें से कुछ ज़िद्दी लटें हवा से इठलाती उसके चेहरे पर उड़ कर आती जा रहीं थी। काली भंवर सी पलकें जो ज़रा ऊपर को घूमी हुई थीं उन्हें वो जब सहम कर झपकाती तो उसे देखने वाला उन्हीं आंखों के भंवर में डूब जाता।
प्रबोधानन्द को भान ही नही रहा की दीन दुनिया से बेखबर वो उसे आंखों ही आंखों में पीते जा रहे थे। परिश्रम की अधिकता से माथे पर चमकती बूंदे उसके चेहरे को एक अलग लुनाई से रंगे थी। वो पद्मजा दीदी की बातें सुनती यहाँ से वहाँ सामान सजाती जा रही थी।
    प्रबोधानन्द ने अपने साथ बैठें आचार्य के कानों में कुछ कहा और उसके बाद उन गुरुवर ने वहाँ कार्यरत महिलाओं को भी हवन में बैठने बुला लिया।
  सभी औरतें इधर उधर बैठने लगी कि प्रबोधानन्द का धैर्य चूक गया और उन्होंने हाथ उठा कर पारो को आवाज़ लगा दी..-“आप यहाँ आ जाइये। ” पारो ने चौन्क कर उनकी तरफ देखा और आगे बढ़ने लगी। प्रबोधानन्द हवन पर सामने की तरफ बैठे थे। उन्होंने अपने ठीक बाजू में बैठे युवक को कुछ लेने उसी समय भेज दिया जब पारो उनके पास पहुंची और पारो को हाथ के इशारे से अपने ठीक पास में स्थित खाली जगह की ओर इशारा कर दिया।
   पारो सकुचाती सी आगे बढ़ी, और झुक कर बैठने को थी कि लपक कर वरुण वहाँ बैठ गया। वरुण के पास ही एक और गुरुवर थे उन्होंने वरुण के बैठते ही ज़रा सरक कर पारो के लिए जगह बना दी…;” आओ बहन ! यहाँ बैठ जाओ।”
   उन गुरुवर की बात सुन पारो वरुण और उनके बीच की जगह पर सिमट कर बैठ गयी।
  गुरुवर और वरुण ने पारो से उचित दूरी बनाए रखी थी,लेकिन वरुण के कारण पारो प्रबोधानन्द के पास नही बैठ पायी थी और इस बात से नाराज़ प्रबोधानन्द ने एक नज़र वरुण पर डाली और फिर अग्नि से उठती लपटें देखने लगे।
  पारो के वहाँ बैठते ही तीन चार महिलाएँ भी उसके पास आ बैठी ।
     लपटों के बीच रह रह कर प्रबोधानन्द की आंखें उन लपटों के ठीक पीछे बैठी पारो पर फिसलती चली जा रही थी।
    अग्नि की चंचलता

प्रबोधानन्द के अंदर एक तृष्णा को जगाती चली गयी….

हवन सम्पन्न होने के साथ बाकी कार्यक्रम शुरू हो गए। मंदिर दर्शनार्थियो के लिए खुल गया।लोगों की आवाजाही बढ़ने से मंदिर में एकाएक भीड़ बढ़ गयी।
   दोपहर बाद प्रसाद वितरण होने के साथ ही आचार्यों और गुरुजनों का भोजन प्रारम्भ हो गया।
    कुछ महिलाएं जहाँ रसोई में लगातार भोजन पकाने में लगीं थीं वहीं नई उम्र की लड़कियों को दौडाभागी वाला काम सौंपा गया था। वो लोग भोजन परोसने में लगी थीं।
   पारो भी यहाँ से वहाँ भोजन परोस रही थी। प्रबोधानन्द ने अपने कमरे में ही खाने की इच्छा जताई और अपने कक्ष की ओर बढ़ गए। उन्होंने अपने कमरे में जाने से पहले जिन आचार्य से बात की थी वो पारो के पास चले आये…-” बहन जी आप ये फल और दूध प्रबोधानन्द जी के कमरे में पहुंचा दें, उनका आदेश है कि आप ही लेकर जाएं।”
” लेकिन मैं ही क्यों?”
” बस जाते हुए उनकी दृष्टि आप पर ही पड़ी होगी इसलिए आपका नाम ले लिया। बड़े लोग हर कार्य प्रयोजन से करतें हैं बहन। आपको गुरुवर की सेवा का मौका मिला है मत छोड़िए। उनकी सेवा साक्षात गोपाल जी की सेवा है।”
   नही कभी नही, किसी इंसान की सेवा गोपाल जी की सेवा कैसे हो सकती है जब तक वो व्यक्ति रोग ज़रा या आयु से पीड़ित न हो।
  मन में उफनते विचारों को विराम दे पारो फल और दूध हाथ में लिए आगे बढ़ गयी।
वो कमरे में दाखिल होने वाली थी कि वरुण बाहर दरवाज़े पर ही उससे टकरा गया…-” ज़रा रुकिए।”
  पारो ने आँख उठा कर उसे देखा और जैसे चौन्क उठी।
  इन भावपूर्ण आंखों को, इस लजीली सी चितवन को कहीं देखा है। पर कहाँ? वो सोच में पड़ गयी कि आखिर कहां देखा है उसने। यह तो याद आ रहा था कि उसने वरुण को कहीं देखा है लेकिन बहुत जोर देने पर भी वह वरुण के चेहरे को याद नहीं कर पा रही थी।  या शायद मन से इतना दुखी थी कि उसका दिमाग उस तरफ काम ही नहीं कर पा रहा था।
  वरुण ने उसके हाथ से फलों की तश्तरी ले ली… “आप मेरे पीछे अंदर आइएगा, और सुनिए आप आगे अपने स्कूल की पढ़ाई पढ़ना चाहती है ना?”
पारो आश्चर्य से वरुण का चेहरा देखने लगी उसे अचानक से समझ में नहीं आया कि आश्रम के यह गुरुवर उससे उसकी पढ़ाई लिखाई के बारे में क्यों पूछ रहे हैं?  तभी उसे याद आया कि उस दिन दर्शन जब उसे किताबें देने आया था तब यह वहां से निकल रहे थे और दर्शन को देख कर रुक गए थे।
   पारो एक बार फिर सोच में पड़ गई कि शायद उसी समय उसने इन्हें देखा था और इसीलिए यह चेहरा उसे इतना पहचाना हुआ सा लग रहा था। लेकिन उस दिन तो इन्हें उसने शरमाते हुए नहीं देखा था , तो फिर क्यों उसे बार-बार इस चेहरे में एक शर्मिला सा प्रेमी नजर आ रहा था। वह अपनी सोच पर ही लजा गयी और वापस नीचे देखने लगी।
” आप मेरी बात सुन रही है ना मैं यह पूछ रहा हूं कि क्या आप अपनी आगे की पढ़ाई करना चाहती हैं? हां या ना में मुझे तुरंत जवाब दीजिए।”
” हां करना तो चाहती हूं लेकिन…
बहुत संकोच से पारो अपनी बात कहना शुरू कर ही रही थी कि वरुण ने उसकी बात आधे में ही काट दी…-” लेकिन किंतु परंतु कि अब कोई चर्चा नहीं होगी। आप पढ़ना चाहती हैं, यही बहुत है। आपकी तरह इस आश्रम में और भी औरतें होंगी जो पढ़ना लिखना या और भी कुछ सीखना चाहती होंगी। मैं आप सभी के लिए प्रबोधानंद जी से बात करना चाहता हूं। और इसके लिए आपको मेरा साथ देना होगा मेरे साथ साथ ही आप अंदर आइएगा।”
  “हां” में सिर हिला कर पारो वरुण के पीछे हो गई! वरुण ने कमरे के बाहर से पारो को आवाज लगाने को कहा और चुप खड़ा हो गया पारो ने अपनी मीठी सी आवाज में अंदर आने की अनुमति मांगी।
    अंदर बैठे प्रबोधानन्द की बांछे खिल उठी…
” आओ निसंकोच भीतर चली आओ।”
  प्रबोधानंद जी का आग्रह सुनते ही वरुण मुस्कुराते हुए भीतर दाखिल हो गया।
   अपने आसन पर अधलेटे से प्रबोधानंद वरुण को अचानक कमरे में आया देख चौंक कर सीधे बैठ गए। और आंखें फाड़े उसे देखने लगे। वह अभी उससे कुछ कहते कि तभी वरुण के पीछे उसकी अनुगामिनी सी पारो भी चली आई।
    पारो को देख उनकी आंखों में कुछ ठंडक जागी की तभी वरुण की गहरी सी आवाज़ उनके कानों को चीरती उनके सुकून को छीन गयी…-“गुरुवर आपकी आज्ञा हो तो ये आपसे कुछ कहना चाहती हैं।”
” हॉं हाँ ! क्यों नही, कहिये आप क्या कहना चाहती हैं?”
पारो के मन में वैसे तो कभी कोई डर या संशय नही रहा था लेकिन देव का अचानक उसकी जिंदगी में आना और फिर अचानक ही चले जाना उसे इस कदर भीतर से तोड़ गया था, कि उसका पूरा व्यक्तित्व ही बदल गया था। पहले की स्पष्टवादी पारो अब शांत और गंभीर हो गई थी। वरुण के इस तरह अचानक कह देने से उसे कुछ समझ नहीं आया और वह हड़बड़ा गई।
  उसके भोलेपन को देख प्रबोधानंद का हृदय एक बार फिर उछल कर उनके मुंह तक आ गया….-” आप यहां आ जाइए। यहां बैठिये और आराम से बताइए कि आप क्या चाहती हैं?”
   एक बार फिर उन्होंने पारो के लिए अपने बहुत पास का आसन दिखाया। पारो संकोच से गड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी कि वरुण फिर जाकर वहां बैठ गया। और पारो के लिए एक दूसरा आसन दिखा दिया। प्रबोधानंद कुछ समझ कर वरुण से बोल पाते कि उसके पहले ही वरुण ने बोलना शुरू कर दिया…-” गुरुवर इनके साथ नियति ने बहुत गलत किया है। यह हमेशा से शिक्षा प्राप्त करना चाहती थी, लेकिन भाग्य ने कुछ ऐसा पलटा खाया कि यह अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाई।

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  यहां आश्रम के नियमों से आप भी भलीभांति परिचित हैं यहां सदियों से जो नियम बन चुके हैं उन्हें बदलना आसान नहीं है। यहां पर जितनी भी महिलाएं उपस्थित हैं उनकी आजीविका के लिए या उनके समय काटने के लिए किसी भी तरह का कोई प्रबंध नहीं है। मेरा बस यह मानना है गुरुदेव की यह सब भी तो हमारी तरह ही कृष्ण भक्त हैं। तो जब हम पुरुषों को वेद अध्ययन करने का अवसर दिया जाता है, तो इन महिलाओं को उसी अवसर से वंचित क्यों रखा जाता है? आप ज्ञानी हैं! आप स्वामी हैं! आचार्य हैं ! आचार्य शिरोमणि है।
   अगर आप चाहें तो हर असंभव कार्य को संभव कर सकते हैं। मुझे आपको देखते ही यह अनुभूति होने लगी थी कि आप सब कुछ संभव करने योग्य हैं।
   यह बालिका अंतर्मन से शिक्षा के लिए इच्छित है।
  गुरुवर ऐसी एकाध बालिका या महिला नहीं है इनकी संख्या बहुत है जो आश्रम से बाहर निकल कर भी कार्य करना चाहती हैं। कुछ जो कम उम्र की बालिकाएं हैं उन्हें स्कूल की शिक्षा फिर आगे कॉलेज की शिक्षा अगर हमारा आश्रम दिलवा सके, तो यह बहुत बड़ी कृपा होगी आपकी इन सभी पर।
  इसके अलावा जो ऐसी महिलाएं हैं जिन्हें सिलाई कढ़ाई बुनाई आदि कार्यों में रुचि है उनके लिए अगर हम आश्रम में ही किन्ही विशेषज्ञों की नियुक्ति करके उन्हें इन कार्यों में पारंगत कर सकें तो वे आपका आभार जीवन भर नहीं भूल सकेंगी।
   मैं यह नहीं कह रहा कि हमारे आश्रम के गुरुवर या आचार्य वर महिलाओं के लिए सचेत नहीं है या उनके लिए नहीं सोचते लेकिन शायद हमारे यहां का नियम है ऐसा है कि भगिनी आश्रम की महिलाएं स्वयं अपने लिए नहीं सोचती ना यह महिलाएं अपने खाने-पीने का विचार करती हैं और ना ही अपने रहने का। मैं बस यह जानना चाहता हूं गुरुवर कि जब उसी मुरलीधर ने आपकी और मेरी सृष्टि की तो क्या उस मुरलीधर ने इन लोगों को नहीं रचा? आखिर उन्हीं की ही तो रचना यह सब भी हैं! तो फिर हम इन्हें इनकी मौलिक आवश्यकताओं और मौलिक अधिकारों से वंचित करने वाले कौन होते हैं ? यही सारी बातें बाकी आचार्य और गुरुवरो से भी कर सकता था, लेकिन जाने क्यों आपके चेहरे का तेज देख कर मुझे ऐसा लगा कि आप ही हैं जो मेरी इस समस्या को सुलझा सकते हैं। आप खुद देख रहे हैं कि यह मेरी व्यक्तिगत समस्या नहीं है। यह मेरी समस्या भगिनी आश्रम से जुड़ी है। अगर आपकी कृपा दृष्टि हो गई तो भगिनी आश्रम की महिलाएं भी अपने जीवन को सार्थक कर पाएंगी, उनके जीवन में आगे जितना भी समय शेष है वह आपका नाम लेकर खुशी से व्यतीत कर पाएंगी।

” तुम्हारा नाम क्या है? ” वरुण की बातें सुन प्रबोधानंद उसके बारे में जानने से अपने आप को रोक नहीं पाए। वरुण ने ऐसी लच्छेदार बातें बनाई थी, कि प्रबोधनंद अगर पीछे हटते तो पारो के सामने उनकी छवि धूमिल होने का खतरा था ….और अगर हां बोल देते हैं तो उन्हें भगिनी आश्रम की महिलाओं के लिए एक अलग से व्यवस्था करनी पड़ती। लेकिन अब वह वरुण की बातों में इस तरह फंस चुके थे कि उनके पास और कोई चारा नहीं बचा था।
” जी वरुण नाम है मेरा वरुण देव।”
जाने किस मानसिक अवस्था में वरुण के मुंह से अपना पूरा नाम वरुण देव निकला जबकि आज तक उसके मन में कभी यह भाव नहीं आया था कि उसका पूरा नाम क्या है? वह सदा से अपना नाम वरुण ही लेता आया था। लेकिन आज जाने कैसा चमत्कार हुआ था कि वह प्रबोधानंद जी के सामने बोलता ही चला गया। ऐसी प्रगल्भता और वाचालता तो उसके अंदर कभी थी ही नहीं।  वह तो बहुत शांत और सौम्य था। और इसीलिए तो वह देव का इतना अनुरागी हो गया था। क्योंकि देव ऐसा ही था । अगर उसने कुछ करने की ठान ली तो अपने उस कार्य को पूरा करने के लिए वह किसी ना किसी तरीके से मार्ग बना ही लिया करता था।
    वरुण सोच में पड़ गया कि आज उसके साथ क्या हो गया था ? अचानक उसे कुछ देर के लिए लगा जैसे उसके अंदर से देव निकल कर बाहर आ गया!  और पारो की शिक्षा के लिए प्रबोधनंद के सामने सीना ताने खड़ा हो गया था।
  खैर जो भी हुआ हो लेकिन वरुण अपने अंदर के इस परिवर्तन से खुश था संतुष्ट था क्योंकि आज तक वह हमेशा यही सोचता आया था कि वह बहुत दबा छुपा सा  है।  और अपने मन की वह चाह कर भी ना बोल पाता है ना कर पाता है। लेकिन आज पहली बार शायद पारो का चेहरा देखकर उसके मन के अंदर से आवाज आई कि ‘जो भी हो वरुण लेकिन तुझे इस लड़की को इस के सपनों को पूरा करना ही है।’

” ठीक है वरुण देव हम अभी दो दिन और आपके आश्रम में हैं। हमारे यहां रहते तक में आप इन के आश्रम की महिलाओं की संख्या और कितनी महिलाएं शिक्षित होना चाहती हैं? कितनी महिलाएं क्या सीखना चाहती हैं? क्या पढ़ना चाहती हैं? इसकी संख्या से हमें अवगत कराइए। हम यहां से जाने से पहले इनका कोई ना कोई समाधान करके जाएंगे। “
 
   प्रबोधानंद की आंखें एक बार फिर पारो पर जाकर अटक गई। इस बार पारो ने भी महसूस किया कि सामने बैठे उस आदमी की आंखें उस पर बुरी तरह से फिसल रही हैं।  ऐसा महसूस होते ही पारो वहां से उठ खड़ी हुई।
   उसे उठते देख वरुण भी खड़ा हो गया उसने झुककर प्रबोधानंद को प्रणाम किया और पारो की ओट बनाकर उसे आगे बढ़ने को कहा। पारो कमरे से बाहर निकल गई वरुण जैसे ही कमरे के बाहर आया उसने देखा परेशान सी पारो एक तरफ आगे बढ़कर सीढ़ियों पर बैठी हुई थी। वरुण भी उसके पास पहुंच गया….” क्या हुआ किसी बात से आप परेशान है क्या? क्या मुझे वहां पर आपकी शिक्षा के बारे में बात नहीं करनी चाहिए थी?”
“नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं!  मैं आपके कारण परेशान नहीं हूं।”
“फिर क्या बात हो गई ? आप चाहें तो मुझ पर विश्वास कर सकती हैं मुझे बता सकती हैं।”
  “आप पर अविश्वास का कोई सवाल ही नहीं उठता?  लेकिन जाने क्यों आजकल संसार से ही विश्वास उठ गया है। मुझे समझ में नहीं आता कि मेरा चित्त ही इतना व्याकुल है कि मुझे हर किसी पर शक होने लगता है। “
वरुण समझ गया के पारो ने भी प्रबोधनंद की दृष्टि पहचान ली थी।
   आखिर वो भी तो औरत ही थी, और औरत तो अपने पीठ पीछे भी पड़ने वाली नज़र को पकड़ने की क्षमता रखती थी।
   पारो को वो क्या दिलासा देता , वो तो खुद रात को लेकर चिंतित था। अभी तो सुबह से वो पारो के पीछे साये सा घूम रहा था लेकिन रात में तो वो भगिनी आश्रम के सामने गार्ड बन कर नही बैठ सकता था। और जाने क्यों उसे प्रबोधानन्द की आंखें देख खुद भी डर सा लग रहा था।
   उसे वाकई पारो की चिंता सताने लगी थी, और बार बार मन में ये आ रहा था की किसी तरह वो उसे यहाँ सब से छिपा कर रख पाता। अपने मन के कष्ट को छिपा कर उसने उसे ढाँढस बंधाया….
” आप घबराइए नही। मेरे रहते यहाँ आपको कोई परेशान नही कर सकता।”
   पारो उसकी तरफ देखने लगी, ,उसी समय प्रशांत भी वहाँ चला आया…-” वरुण बाहर कोई तुमसे मिलने आये हैं।”
” मुझसे मिलने ? लेकिन कौन आया है?”
” मालूम नही। मंदिर दर्शन के बाद ऑफिस में जाकर तुम्हारे लिए पूछताछ कर रहे थे तो उदयाचार्य जी ने मुझे बुला कर तुम्हें बताने कहा है।”
” ठीक है मैं देखता हूँ।”
   मन में ये संशय लिए की पता नही बाहर कार्यालय में कौन होगा , वो बाहर की तरफ बढ़ा की पारो भी लपक कर उसके पीछे हो गयी।
   वरुण ने उसे आते देखा और मुस्कुरा कर सामने बढ़ गया….

क्रमशः

aparna….

दिल से ……

          ट्रूकॉलर है आपके फ़ोन पर? होगा ही। मेरे में भी है।  आपके साथ भी होता होगा, अक्सर ये होता होगा कि ट्रूकॉलर नोटिफिकेशन आती है कि 56 लोगों ने आपका प्रोफ़ाइल चेक किया।
   आप चौन्क जातें हैं कि कौन हैं भाई ये लोग? किस संसार के हैं? क्योंकि आपके पास तो इतना वक्त ही नही होता कि नंबरों को जांचते फिरें।
  और कहीं ये देखने चले जाओ की कौन नम्बर की छानबीन कर रहा था तो अगला मेसेज आता है कि मंथली सब्स्क्रिप्शन abc  रुपयों में लीजिये और पूरे महीने अपने स्टॉकर्स पर नज़र रखिये।
   मतलब हद है यार !मार्केटिंग की भी। ये सब्सक्रिप्शन नाम के ट्रेंड ने जान ले रखी है कसम से।
यूट्यूब पर कोई खूबसूरत रंगोली की डिज़ाइन खोलते ही पहले एड आ जाता है और उसके नीचे एड फ्री देखने का सब्स्क्रिप्शन फी!!!

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    लगता है बसपन का प्यार के बाद सब्स्क्रिप्शन की बहारट्रेंडिंग हैं।

  चलिए मिलतें हैं अगले भाग के साथ जल्दी ही। तब तक पढ़ते रहिये कहानी समिधा!!!

  दिल से आभार व्यक्त करती हूँ आप सभी का की आप मुझे इतने मन से पढ़ते हैं सराहतें हैं!!!

aparna…..

समिधा -33

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  समिधा – 33

       वरुण अपनी तैयारियों के लिए खाना निपटने के साथ ही भगिनी आश्रम की तरफ निकल गया।
  आश्रम की महिलाएं खाने बैठीं थी । वहाँ की वरिष्ठ महिलाओं की खाने की पारी थी। पारो और बाकी कम उम्र की लड़कियां और महिलाएं खाना परोस रहीं थीं।
  भोजन कक्ष के बाहर ही एक छोटा कमरा और था, जहाँ वरुण पहुंच कर बैठ गया था। वो उस आश्रम की देखभाल करने वाली पद्मजा दीदी का इंतज़ार करने लगा।
  वो जहाँ बैठा था वहाँ से लगी खिड़की से वो बड़े आराम से अंदर देख सकता था पर मारे संकोच के वो अंदर नही देख रहा था।
   भोजन कक्ष में उसी समय अंदर से पारोमिता एक साथ चार पांच गिलास में पानी ले आयी। पद्मजा दीदी के इशारे पर एक गिलास पानी बाहर बैठे वरुण के लिए भी वो लेती गयी।
   उसने वरुण की तरफ ध्यान से देखे बिना ही उसके सामने गिलास बढ़ा दिया। वरुण ने एक नज़र पारो को देख नज़रें नीचे की और गिलास की तरफ हाथ बढ़ा दिया।

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  पारो की कंपकपाती उंगलियों के ठीक ऊपर वरुण की तपती उंगलियां छू गयीं।
    दोनों के ही शरीर में उन उंगलियों से गुज़रती तरंगे बहती चली गईं।
  घबराहट में पारो के हाथ से गिलास छूट गया। और वो हड़बड़ाती  सी अंदर चली गयी। गिलास की आवाज़ पर खिड़की से कई जोड़ी आंखें उन दोनों की तरफ उठ गई होंगी यही सोच वरुण ने शर्मिंदा होकर गिलास उठाया और खिड़की पर रखने को हुआ कि उसकी नज़र अंदर कक्ष में बैठी औरतों पर चली गयी। कुछ दो एक  उसे अब भी देख रहीं थी बाकियों का ध्यान अपनी थालियों पर ही था।
   वरुण की न चाहते हुए भी नज़र उनकी थालियों पर चली गई। और उससे कुछ देर पहले का अपना खाया भोजन याद आ गया।
  मंदिर में वैसे भी तामसिक भोजन तो नहीं बनता था लेकिन मंदिर के आचार्य गुरुवर उनके लिए बनाए जाने वाले भोजन में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि उनकी थाली हर तरह के पोषक आहार से बनी हो।
   वरुण की थाली में  मिलने वाली भोज्य सामग्री यहां अंदर आश्रम की महिलाओं की थाली में से गायब थी।  वह कुछ क्षणों के लिए चौक गया क्योंकि उसे यह मालूम था कि आश्रम की यही महिलाएं एक साथ मिलजुल कर पूरे आश्रम का खाना तैयार करती हैं। तो फिर खाने में यह भेदभाव कैसे? वहां बैठी महिलाओं में  किसी की भी थाली संपूर्ण नहीं थी बल्कि सभी के थाली में जरा जरा सी खिचड़ी ही परोसी हुई नजर आ रही थी।
    वह अभी इस भेदभाव के बारे में सोच ही रहा था कि अंदर से पद्मजा दीदी बाहर निकल आई….-” जय श्री कृष्णा वरुण जी आइए बैठिए। “

” जय श्री कृष्णा दीदी कैसी हैं आप।”
” हम ठीक हैं आप बताइए हम लोगों के लायक क्या सेवा है? हमें भी जानकारी मिल चुकी है के आश्रम के कार्यक्रम के लिए श्री प्रबोध आचार्य जी का आना तय हो चुका है।”
” जी दीदी आपने सही कहा! मुझे भगिनी आश्रम के साज संभाल का काम दिया गया है। आप सभी के साथ मिलकर मुझे पूरे आश्रम परिसर में फूलों की सज्जा देखनी है। इसके साथ ही गोपाल जी के लिए भी पुष्प वस्त्रों का निर्माण करना है। यह काम भी आप सभी के सुपुर्द किया गया है।
   हवन की तैयारी के लिए भी आप में से कुछ दो चार महिलाओं की आवश्यकता होगी। क्योंकि लगभग 21 हवन वेदियाँ तैयार होंगी, जिनके चारों तरफ अल्पना बनानी होगी। इसके लिए आप अपने आश्रम में से चुनकर कुछ महिलाओं का एक समूह तैयार कर दीजिएगा। मेरा इस सब में यही कार्य है कि आप लोगों को अपने कामों के लिए जितनी वस्तुओं की आवश्यकता होगी, आप मुझे एक लिस्ट तैयार करके दे दीजिएगा। मैं सारी सामग्री आप लोगों तक पहुंचा दूंगा। इसके साथ ही बीच बीच में आकर मैं कार्य की रूपरेखा देखता रहूंगा वैसे अब हमारे पास सिर्फ दो दिन ही बचे हैं कल और परसो दो दिन में यह सारी तैयारियां हो जाए तो बहुत अच्छा है। “

” जी आप सही कह रहे हैं वरुण जी वैसे हमारे आश्रम में जितनी महिलाएं हैं सभी अल्पना बनाने में फूलों के वस्त्र बनाने में पारंगत हैं तो हम चुन कर दो अलग-अलग समूह तैयार कर देते हैं। जिससे सारे काम सही समय पर निपट जाए हम अभी सबका भोजन निपटते ही सब से बात करके किन वस्तुओं की आवश्यकता होगी इसकी सूची तैयार करके आपके कक्ष में भिजवा देंगे। “

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” नहीं ! नहीं ! आप यहां से किसे हमारे कक्ष में भेजेंगी। यहां तो सभी महिलाएं हैं। आप शाम तक तैयार करके रखें। आरती के बाद मैं खुद आकर आप से ले लूंगा। “

  पद्मजा दीदी ने मुस्कुराकर वरुण के सामने हाथ जोड़ दिये। उनकी मुस्कान के बावजूद वरुण नहीं मुस्कुरा पाया उसने एक नजर खिड़की से अंदर की ओर देखा। अब आश्रम की बाकी बची महिलाएं भोजन के लिए बैठ चुकी थी।
   यह इत्तेफाक था या ईश्वर की इच्छा कि वह जहां बैठा था वहां से ठीक सामने उसे पारो बैठी नजर आ रही थी। उसकी थाली में तो और भी कम खिचड़ी थी। मुश्किल से दो से तीन  निवालों का भोजन सामने रखे वह धीरे-धीरे एक-एक दाना चुग रही थी। जैसे अपने भोजन को निगलने से पहले वह उससे माफी मांग रही हो।
    वरुण का ह्रदय कसमसा कर रह गया उसने पद्मजा दीदी की तरफ देखा…-” अगर आप बुरा ना माने तो क्या मैं आपसे कुछ सवाल पूछ सकता हूं। “
” जी बिल्कुल पूछिए। “
” सारे मंदिर परिसर में यहां रहने वाले सभी लोगों का भोजन आप लोग ही तो बनाते हैं ना। “
” हां हम ही लोग यह भोजन बनाते हैं।
” तो क्या आश्रम में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग भोजन तैयार होता है। “
   पद्मजा दीदी एकाएक यह सवाल सुनकर चौन्क गयी क्योंकि आज तक यहां के किसी अन्य पुरुष ने उन लोगों के खाने के बारे में कभी कोई सवाल नही किया था।
” आप ऐसा सवाल क्यों पूछ रहे हैं वरुण जी?”
” मैं भी नहीं पूछता अगर मैं अपनी आंखों के सामने ऐसा होते नहीं देखता। मैं अभी कुछ देर पहले ही भोजन करके आया हूं और मेरी थाली मैं जो सब था वह यहां नहीं है। “
” आप इस सब में क्यों पड़ रहे हैं। जाने दीजिए यह सब बातें आपके विचार करने योग्य नहीं है!  बल्कि हम तो यह कहेंगे कि भगिनी आश्रम ही आप लोगों के विचार करने योग्य नहीं है! अब जैसा जीवन मिला है वैसा यहां की औरतें काट ही लेंगी।”
” आप उसी जीवन को काटने की बातें कह रही हैं जिस जीवन को उस मुरलीधर ने आपको दिया है।  आपका जीवन उनकी भेंट है जिसे आप इस तरह गंवा रही हैं। और कह रही हैं कि हम किसी भी तरीके से जीवन काट लेंगे। “
” यह बड़ी-बड़ी बातें यहां की इन मूर्ख औरतों की समझ से परे है वरुण जी। “
” यहां कोई मूर्ख नहीं है दीदी और ना ही यह बातें किसी के समझ से परे हैं । यहां सभी का जीवन अनमोल है। क्योंकि हम सब उस मुरलीधर के चरणों में पड़े हैं। हमारे जीवन का रचयिता वही है और जब तक उसने हमारी सांसे लिखी हैं हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम उन सांसो का सदुपयोग करें। अब बताइये की ये भेदभाव क्यों ?”
” किसी ने ये भेदभाव नही किया है वरुण जी। हम महिलाओं को खुद के लिए यही खिचड़ी रुचिकर लगती है, इसलिए हम यही बना लेतें हैं। समय भी कम लगता है।”
” तो हम सबके लिए भी खिचड़ी बनाया कीजिए। हमारे लिए तो रोटियां भी बन रही हैं सब्जी बन रही है दाल है चावल भी बनाए जा रहे हैं इतना सारा क्यों? और इन सब के बावजूद हमें सलाद मिठाई और दही भी दी जाती है। जबकि आप लोग सिर्फ खिचड़ी खा रही हैं उसके साथ  आपको न घी परोसा गया  और ना ही दही। यह तो गलत है ना दीदी। “
” वरुण जी ऐसा कुछ भी नहीं है कि कोई भी हमें रोक रहा है इन सब चीजों को खाने से।
  हम लोगों का ही जी नहीं करता इतना सब खाने का। “
” चलिए अच्छी बात है ।लेकिन हो सकता है यह आपका व्यक्तिगत विचार हो, क्या आपने यहां उपस्थित बाकी लोगों से इस बारे में पूछताछ की है कि क्या वह सारी महिलाएं भी सिर्फ खिचड़ी खा कर गुजारा करने को तैयार है। “
” जब घर परिवार पूरा समाज हम से मुंह मोड़ कर खड़ा हो जाता है ना तो एक पेड़ की छांव भी हमें बहुत ममतामई लगने लगती है । फिर यहाँ इस आश्रम में तो हमें रहने को एक छत दी हुई है। खाने को दो वक्त का भोजन मिल ही रहा है। तो क्या हम लोग अपनी तरफ से आश्रम का खर्चा बचाने के लिए इतना भी नहीं कर सकते कि जितना हो सके कम खाएं। हम किसी को भी अनशन करने नहीं कहते। लेकिन हमारा यह कहना है कि शरीर को चलाने के लिए जितना भोजन आवश्यक है उससे अधिक खाकर हमारे शरीर में सिर्फ अनावश्यक चर्बी ही जमेगी आलस्य ही पनपेगा।  तो इसलिए हम सब के लिए यही अच्छा है उचित मात्रा में उचित आहार का ही सेवन करें। “
  वरुण समझ गया था कि बात कुछ और थी और पद्मजा दीदी उसे नहीं बता रही थी। अंदर से किसी के बुलाने पर पद्मजा उठकर अंदर चली गई उसके जाते ही एक बुजुर्ग सी महिला रसोई की तरफ की दीवार की ओर से निकलकर वरुण के सामने चली गई…
” वह कभी सच नहीं बताएगी । वो ही क्या इस आश्रम की कोई भी महिला तुम्हें पूरा सच नहीं बताएगी। “
” लेकिन क्यों ऐसी क्या बात है जो मुझसे छुपाई जा रही है। “
” देख बेटा मैं बहुत बुजुर्ग हो चुकी हूं। अब जाने कितने दिन का मेरा जीवन शेष है। लेकिन इस आश्रम में बहुत समय से हूं। और यहां का सारा कारोबार देखती और समझती हूँ।
   यह लोग कहते हैं औरत का मन बहुत चंचल होता है।  पति के बिना रहती औरत जैसे तैसे करके खुद के मन को संभालने की कोशिश करती है अब ऐसे में अगर वह गरिष्ठ और तामसिक भोजन करेगी तो उसका मन चंचल होकर इधर-उधर भागने को करेगा और ऐसे में कुछ ऊंच-नीच हो गई तो आश्रम का नाम खराब होगा इसीलिए…
    जबकि सच्चाई इन बातों से बहुत अलग है। क्या नहीं होता यहाँ? जितने गहरे में जाओगे उतनी सच्चाइयां जानते जाओगे। अभी तो तुम्हें कुछ भी नही पता…”
” काकी आप वहाँ क्या कर रही हैं?” भीतर से पद्मजा की तीखी पुकार सुन वो वृद्धा कुछ बड़बड़ाती हुई वापस रसोई में घुस गई।
    वरुण उस वृद्धा से इतनी कड़वी सच्चाई सुनकर कांप उठा। यह कैसा न्याय था समाज का भी और आश्रम का भी।  यह लोग इन महिलाओं को क्यों इतना अलग समझते हैं। क्या इन महिलाओं के शरीर में वही रुधिर नहीं बहता जो बाकियों के शरीर में बहता है।
   और बाकी जो भी हो लेकिन अभी आने वाले श्री प्रबोधानन्द से वह इस बारे में बात करके रहेगा। लेकिन ऐसे सीधी प्रबोधानन्द से बात करने पर कहीं उदयचार्य जी नाराज ना हो जाए। तो इसलिए एक बार उसे उनके कान में भी यह बात डालनी पड़ेगी कि आश्रम में सभी के लिए एक समान व्यवस्था होनी चाहिए।
   जब यहां इस आश्रम में किसी भी तरह का जातिगत भेदभाव, रंग से जुड़ा भेदभाव, अमीरी गरीबी का भेदभाव नहीं देखा जा रहा तो महिला और पुरुष के बीच का भेदभाव क्यों इतना व्यापक रूप से पांव फैलाए बैठा है।
    वहीं महिलाएं जो आश्रम के पुरुषों के लिए इतनी तरह का भोजन बनाती हैं। अपने लिए क्यों फिर खिचड़ी बना लेती हैं। वो यही सोचते हुए आश्रम की तरफ की रसोई के सामने से होकर निकल रहा था तब उसकी नजर भीतर की तरफ पड़ी …. वहाँ आचार्यों के भोजन हो जाने के बाद रसोई में स्थित बड़े-बड़े बर्तनों में जो भोजन बना बचा रह गया  था। उसी भोजन को आपस में मिलाकर खिचड़ी का रूप दे दिया गया था। यानी असल बात तो यह थी कि आश्रम में मौजूद पुरुषों के भोजन कर लेने के बाद जो भी भोजन बच जाता उसमें कमीबेसी को सही करने के लिए वहां की वरिष्ठ महिलाएं उस सारे भोजन को एक साथ मिलाकर गर्म करके महिला आश्रम की औरतों को परोस दिया करती थी।
   वरुण की आंखें छलकने को थी, लेकिन उसने अपने आप को मजबूत कर लिया। पता नहीं केदारनाथ से लौटने के बाद उसके साथ क्या हुआ था, कि जब पाए तब उसकी आंखें छलक उठने को तैयार हो जाती थी। वह अपनी अति भावुकता पर शर्मिंदगी सी महसूस करने लगा था।
 
        वो तेज़ कदमों से आगे बढ़ गया। सामने से आते प्रशांत ने उसे असमंजस से देखा..-“क्या हुआ कुछ परेशान लग रहे हो?”
वरुण कुछ भी कहने की हालत में नही था , वो चुपचाप आगे बढ़ गया।
   प्रशांत किसी काम से दूसरी तरफ जा रहा था,वो वरुण के चेहरे का क्रोध देख उसके पीछे ही हो लिया। वरुण सीधे उदयाचार्य जी के कमरे में पहुंच गया लेकिन वो इस समय किसी बहुत ज़रूरी काम से कहीं बाहर गए हुए थे।
   कुछ देर वहीं बैठा वरुण कुछ सोचता रहा फिर वाटिका की तरफ निकल गया।

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***
  
   अगला दिन बीत गया, और तैयारियों में डूबा आश्रम बाकी सारी बातें बिसरा गया। यही हाल वरुण का हुआ। उस दिन भगिनी आश्रम का भोजन देख
जितनी तेजी से उसका खून जला था, उस खून का उबाल उतनी ही तेज़ी से अगले दिन बैठ भी गया। उसके ऊपर आश्रम की जिम्मेदारियां भी तो थी। उन्हीं सब व्यस्तताओं में वो इस बात को भूल कर रह गया।

   कार्यक्रम के ठीक एक दिन पहले सभी अतिथियों का आना शुरू हो चुका था। स्वामी प्रबोधानन्द जी भी अपने निर्धारित समय पर पहुंच गए।
   स्वामी जी को स्टेशन से आश्रम लेकर आने के लिए आश्रम की सबसे महंगी गाड़ी भेज दी गयी थी।
   प्रबोधानन्द जी के आसन के सामने ही कलश स्थापना होनी थी।
    वाटिका में पीछे बने सरोवर से शुद्ध जल के कलश मंगवाए गए थे।
सीधी सतर पंक्तियों में महिलाएं सिर पर जल से भरा कलश लिए हवन स्थल पर रखने जा रही थीं।
नियमों के अनुसार उन सभी को आकंठ सरोवर में डूब कर ही अपना कलश भरना था। और उन्हीं भीगे वस्त्रों में कलश स्थापित कर वो लोग अपने कमरों में जा सकती थीं।
      महिलाएं कलश रख कर स्वामी प्रबोधानन्द को प्रणाम कर एक तरफ खड़ी होती जा रहीं थीं। पारोमिता भी अपना कलश सिर पर उठाए धीमे कदमों से आगे बढ़ती गयी।
       जल से भीगे श्वेत वस्त्रों में सिर पर पानी का कलश रखे वो स्वर्ग से उतरी मेनका सी लग रही थी। प्रबोधानन्द वैसे तो हवन कुंड की बाकी तैयारियों को देख रहे थे लेकिन जैसे ही उनकी नज़रे पारो पर पड़ी वो चाह कर भी उस पर से अपनी आंखें नही हटा सके।
   पारो के कदमों के साथ साथ उनके हृदय का कंपन भी बढ़ता जा रहा था। माथे पर छलक आई बूंदों को उन्होंने पोंछ लिया।
   उसने ठीक उनके सामने आकर उन्हें प्रणाम किया तब जाकर उन्हें चेत आया और हाथ उठाकर उसे आशीर्वाद दे वो खुद पर लज्जित से दूसरी तरफ देखने लगे।
    पारो धीमे कदमों से अपनी साथियों की तरफ बढ़ गयी। और वहाँ से वो सारी साध्वियां आश्रम की तरफ बढ़ चलीं।
     वहीं खड़े वरुण की कनपटी पर जैसे कोई हथौड़े चलाने लगा था। उसके मन में आ रहा था कि वो उसी वक्त प्रबोधानन्द का गला दबा दे।
   उसकी कामातुर दृष्टि वरुण की आंखों से बच नही पायी थी।
   और उसे ये भी समझ आ गया था कि अब उसे यहाँ आश्रम में हर समय पारो की परछाई बन उसके आसपास रहना होगा।
     आश्रम में धूप गुग्गुल की खुशबू के बीच मंत्रोच्चार प्रारम्भ हो चुका था लेकिन इस सब के बीच अपने अशांत मन को साधने वरुण गोपाल जी की मूर्ति के सामने हाथ जोड़े खड़ा पारो के लिए खुशियों का वरदान मांग रहा था……

क्रमशः

   दिल से ….

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    समिधा सिर्फ एक कहानी है। मैंने समिधा शुरू करने से पहले ही कहा था कि एक अजीबोग़रीब प्रेम कहानी दिल में कुलबुला रही है। और मुझे यकीन नही था कि ये कहानी आप लोगों को पसन्द आएगी।
      
    आजकल लोगों का जीवन व्यस्त से व्यस्ततम होता जा रहा है और साथ ही लोगों की पसन्द भी बदलती जा रही है। थ्रिल इस शब्द ने हमारे समाज में तेज़ी से पांव पसारें हैं।
   और मैं जानती हूँ मेरी कहानियों में थ्रिल नही होता।

  समिधा  वैसे तो बिल्कुल ही सादी सी कहानी है लेकिन आगे कई ऐसे मोड़ आएंगे जिन्हें लिखने पर शायद आप लोग मेरे खिलाफ भी हो सकतें हैं।
   मेरी ये कहानी किसी भी धर्म विशेष, किसी आश्रम विशेष या किसी संत महात्मा का विरोध नही करती। कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। अगर आश्रम का कोई काला हिस्सा मैं लिखतीं हूँ तो ये पूरी तरह मेरी कल्पना की उपज है उसे किसी भी मंदिर ट्रस्ट आदि से जोड़ कर न देखें।
    जहाँ ढेर सारी अच्छाई हैं वहाँ कुछ बुराई भी पनप सकती है।
     इतना सारा मैं इस लिए समझा रही हूँ क्योंकि कई बार आप पाठक पढ़ते हुए नाराज़ भी हो जातें हैं। और आपकी नाराज़गी झेलने की हिम्मत नही है रे बाबा मुझमें।
     
    वैसे मैं हमेशा हल्की फुल्की कहानियां ही लिखती हूँ पता नही इस बार इतना भारी विषय कैसे रास आ गया लिखने को।

   चलिए मेरी पाती बड़ी होती जा रही है। अब लिखना बंद करती हूँ। जल्दी मिलेंगे कहानी के अगले भाग के साथ।
  तब तक पढ़ते रहिये….

(कृष्ण मंदिर या कृष्ण आश्रम का मैं उल्लेख कर रहीं हूँ लेकिन प्लीज़ इसे इस्कॉन ट्रस्ट से जोड़ कर ना देखें ।)

  aparna ….

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शादी.कॉम – 21

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शादी डॉट कॉम: 21

       तेरे बिना चांद का सोना खोटा रे
          पीली पीली धूल उड़ावे रे
            तेरे संग सोना पीतल
             तेरे संग कीकर पीपल
              आजा कटे ना रतिया………
         ओ हम दम बिन तेरे क्या जीना
      तेरे बिना बेस्वादी बेस्वादी रतिया ओ सजना…

   ” लगे रहो बेटा!!! सही जा रहे हो,,एक एक लक्षण प्रेम मे पागल प्रेमी का दिख रहा तुममे।”

” क्या यार बन्टी,,अब ऐसा क्या देख लिये तुम?”

” जैसे गाने सुन रहे हो ना आजकल बेटा मैं ही क्या कोई अन्धा भी तुम्हारी आंखों में देख पढ लेगा कि बच्चा प्यार में है,,,मैं तो फिर भी पढा लिखा हूँ,और वो भी अच्छी खासी दिल्ली युनिवर्सिटी से…..तुमने ये तो ना सोच लिया कि झुमरितलैया से पढ कर भाई इतना ज्ञान बघार रहा है…” अपनी ही बात पे बन्टी ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा

” पता है एक बार हमारा बॉस अड़ गया कहता है __ लड़कों कुछ अच्छा करना है मुझे,जिससे मेरे बाद मेरा नाम हो,मैनें धीरे से कहा _ ट्रेन के टॉयलेट  में अपना नाम नम्बर लिख आईये,,सदियों तक लोग गंदे टॉयलेट की फ्रस्ट्रेशन में गालियाँ आपके नाम की निकालेंगे।।”

” तुमने ऐसा कह दिया बॉस से।”

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” अबे नही यार!! ऐसी पते की बातें तो मेरे मन में ही दफन रह जाती हैं,ऊपर से मैनें कहा __ क्या सोच रहे हैं आप बताइये सर जिससे आपकी कुछ मदद की जा सके,,कम्बख्त कहता है बाइजूज़ जैसा कोई काम का एप बनाना चाहता हूँ कि लोग उसमें बच्चों को पढ़ा कर मेरा नाम लें लाइक ‘ साहूज़’ ।।
    मैनें कहा सर एप सही नही है, मैनें एक बार बाईजूज में इतिहास पढ़ना चाहा,कम्बख्त इतना अनाप शनाप हड़प्पा की खुदाई में निकलवा दिया इन लोगों ने कि ‘साहनी साहब’ की आत्मा भी कलप गयी कि यार ये सब इन लोग कहाँ से निकाल निकाल ला रहे मुझे तो ना मिला आज तक….

” फिर मान गया बॉस??”

” जो अपने मातहत की बात मान जाये वो बॉस ही कैसा?? उसके बाद एप का भूत उतरा तो अब अपने क्लाइंट और खुद की प्रोजेक्ट डिस्कशन की विडियो यू ट्यूब पे लॉन्च करने की प्लान कर रहा है कमीना।।कुल मिला के ना खुद चैन से जियेगा,ना हमे जीने देगा….खैर मेरी बातें छोड़ और जल्दी से तैयार हो जा फिर मौसी को लेकर मन्दिर भी तो जाना है।”

दोनों भाई बातों में लगे थे कि सुशीला एक बड़ी सी ट्रे में दो प्लेट में नाश्ता और चाय लिये ऊपर चली आयी।।

” अरे मौसी जी हम नीचे ही आ रहे थे,आप यहाँ नाश्ता क्यों ले आईं ।”

” 9 बज गया अभी तक तुम लोग नीचे आये नही तो हम यहीं ले आये,चलो जल्दी से नाश्ता कर लो,तुम्हारी पसंद का आलू का पराठा और मूँग की दाल का हलुआ बनाये हैं बन्टी।।”

” अरे वाह!! मौसी जी इसी बात पे चलिये मन्दिर घूम आते हैं ।”

” मन्दिर?? अभी !! मतलब सुबह सुबह।।”

” मन्दिर तो सुबह सुबह ही जाया जाता है ना मौसी।”

     इतनी देर से चुप बैठे राजा ने अपनी माँ का हाथ पकड़ कर उन्हें कुर्सी पर बैठाया और माँ की आंखों में देखते हुए अपनी बात उनके सामने रख दी__

” माँ आज बांसुरी और उसकी माँ तुमसे मिलने आने वाली हैं शिव मन्दिर मे!! एक बार मिल लो उन लोगों से।”

सुशीला कभी राजा कभी बन्टी को भौचक नजरों से देखने लगी

” कर ली आखिर अपने मन की,जब हमसे पूछे बिना ही मिलनी तय कर आये तो टीका बरिक्षा भी तय कर आओ।।”

” अम्मा नाराज काहे हो जाती हो….बिना तुम्हरी मर्ज़ी कुछ नही करेंगे भई ,,कम से कम एक बार मिल तो लो,।।”

” का फायदा मिलने जुलने का ,जब हमरी राय कोनो मायने ही नही रखती तो का फायदा बोलो।”

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” कैसी बात कर रही हो मौसी,राजा को बचपन से देखे हैं,आज तक आपसे पूछे बिना तो पानी भी नही पीता लड़का,शादी तो बहुत दूर की बात है।”

” पानिये भर नही पीता है,बाकी सलगे काम अपन मर्ज़ी का ही कर रहा आजकल।”

” एक बार मिलने में कोई बुराई नही मौसी,मिल तो लो पहले,बाद की बाद में देखी जायेगी।”

   आखिर दोनो लड़कों की बहुतेरी जद्दोजहद ने सुशीला को मिलने जाने की हामी भरने मजबूर कर ही दिया…..
      सभी समय से तैयार हो कर मन्दिर पहुंच गये।।

” कहाँ हैं भई तुम्हरे मेहमान ?? अभी तक मन्दिरे नई पहुँचे, बड़ा लड़की ब्याहने चले हैं ।।”
    सुशीला की बड़बड़ जारी थी कि बुआ जी मन्दिर के अन्दर से निकल वहाँ उन लोगों के बीच धम्म से कूद पडीं …..

   ” कैसन हो सुसीला, पहले पहल तो मोहल्ले के सब कार्यक्रम में दिख भी जाती थी,आजकल तो दरसनों दुर्लभ है,अब तो बहु वाली हो फिर भी बाहर फिरे को टैम नही निकाल पाती ।”

” अरे हम बाहर घूमै फिरै लागें तो हुई जाये सब काम धाम।।बहु तो आन गयी पर आजकल की छोरियां ना काम की ना काज की….अपने मरे बिना सरग कहाँ दिखता है जिज्जी,लगे रहत हैं दिन भर काम मा, हम ना सकेलें तो पूरा घर पड़ा रहे,बचपना से एही करते आ रहे बस,अपनी मर्ज़ी से तो आज तक एक साड़ी भी नही ली,अब आजकल के बच्चे हैं सादी ब्याह भी अपनी मर्ज़ी से करना चाहतें हैं ।”

” का कहें सुसीला,आज कल के बच्चो में लाज शरम तो रह नही गया,एक हमारा जमाना था,हम सास के भी सामने अपने इनसे बात नही कर पाते थे,और आजकल के लड़िका लोग पहले ही कहे देते हैं ए अम्मा इन  संग हमर फेरे फिरा,लुगाई बना दो।”

” खाली लड़कों को काहे दोस दे रहीं,लड़कियाँ कम है का आजकल की,ऐसा तो चटक मटक बनी घूमेन्गी ,और फिर कहीं कोनो लड़का कुछ बोल भर दे तो उसके सर जूतियाँ बरसायेंगी….आजकल की लड़कियाँ बड़ी जब्बर हैं,इनसे पार पाना मुस्किल है बल्कि लड़के सीधे हो गये है इनके सामने।”

   बांसुरी ने राजा को देखा,वो सर नीचे किये जमीन पर पड़े छोटे से पत्थर के टुकड़े को अपने पैरों से इधर उधर करता बैठा था,बन्टी ने बांसुरी को देखा फिर उसकी माँ को और आखिर बीच बचाव करने कूद पड़ा …..

” इस चर्चा का तो कोई उपाय और कोई फल नही मौसी जी,,आप दोनो विदुषीयां जब बात कर रहीं तो मुझे बीच मे बोलना तो नही चाहिये,पर मैं कहना चाह रहा था कि राजा और बांसुरी के बारे में अगर बात कर लेते तो…..”

” तो और किसके बारे में बात कर रहे।” मौसी के कठोर जवाब पे बन्टी एक बार फिर मुखर हो उठा

” नहीं मेरा मतलब कि,इनकी शादी के बारे में बात कर लेते तो ….”

” अब यही तो तुम बच्चों के दिमाग मे नही आता, कैसे ये ब्याह सम्भव है?? कोई मेल मिलाप ही नही है दोनों घरों का,, आप ही बताइये जिज्जी!! आप बड़ी हैं घर की,,आप ठहरे सरजूपारी हम के के,,कैसे हो पायेगा,नही नही राजा के बाबूजी बिल्कुल नही मानेंगे।”

” देखो दुल्हीन हम का कह रहे कि एक बार दुनो के बाबूजी लोगो को बात करने देते हैं,हम भी जानते हैं, की रीत रीवाज, दान दहेज,मिलनी पूछनी सब अलग है ,पर हैं तो दुनो परिवार ब्राम्हण ।।तो एक बार बात बढाने मे हर्ज का है।”

” बुज़ुर्गवार हो कर कैसी बात कर रही जिज्जी,,पूरा समाज थू थू करेगा,कहेगा हमारे पास नही रही का लड़की जो बाहर से धरे लायी,और सही बोले अब कोई दुराव छिपाव भी नही रह गया,हमारे राजा के लिये 50-50 लाख का भी रिस्ता आ रहा है।।”

बहुत देर से चुप बैठी प्रमिला ने अपनी बात रखी__

” मैं कह रही थी,हमाई भी तो अकेली ही लड़की है अब शादी के लिये,इसके पापा ने जो जोड़ जाड़ के रखा है,सब इसी का तो है,हमलोग भी अपनी तरफ से बहुत अच्छी शादी ही करेंगे दीदी।”

” देखो मैं किसी को कम जादा नही आंक रही भाई,,बुरा मत मान जाना पर हमरे बड़के के में भी बिना मांगे पूछे ही सब कुछ आ गया था,अब ये हमारा आखिरी लड़का है,रुखा सूखा ब्याह देंगे तो समाज ताना मारेगा_ कहेगा लड़के में कोनो खोट रहा होगा जभी बिना लेन देन के हो गयी सादी।”

प्रमिला- हम पूछ तो रहे जिज्जी,आप अपनी बात रखिये ना ,हम कोसिस पूरी करेंगे कि आपको कोई असुविधा ना हो।

सुशीला- अरे का का करेंगी?? बरीक्षा ही सात आठ लाख की पड़ जायेगी,फिर तिलक कम से कम इक्कीस का तो चढायेंगी,जेवर जट्टा आप अपन बिटिया को जो दे वो आपकी मर्ज़ी पर पांव पखारते समय दामाद को चेन तो पहनाएंगी की नही….
    फिर तिलक बारात हर मौके पे मेहमानों को लिफाफ़ा पकडायेंगी,अब आजकल 20-50 रुपया का लिफाफ़ा भी तो नही चलता ,कम से कम 100 रुपैय्या तो डालना ही पड़ेगा और लड़के के ताऊ ,चाचा फूफा मौसा लोगो को 500 का ।।सास की पिटरिया रीति तो ना भेज देंगी,रूपा 3 तोले का हार लायी रही ,आप उतना ना सही पर कुछ तो डालेंगी,फिर सास के साथ जेठानि को एक आध कर्णफूल अँगूठी कुछ तो पकड़ाना पड़ेगा ही।।
   सामान के लिये चलो हम मना भी कर देंगे पर पार्टी तो देंगे ना आप लोग,कम से कम ग्यारह सौ बराति का खाना खरचा हो जायेगा ।।

प्रमिला- हाँ अब इतना तो करना ही पड़ेगा,,लड़की हमारी है आखिर।।
   प्रमिला के धीमे से शब्द जैसे गले में ही रुंध गये

बांसुरी- इतना कुछ नही करना पड़ेगा मम्मी ।।माफ कीजियेगा आँटी जी,पर बेटी पैदा करने का जो पाप हमारी मम्मी ने किया उसकी अच्छी खासी सज़ा आपने सुना दी,पर हमे ये सज़ा मंजूर नही है।
  राजा तुम अच्छे तो बहुत हो,हमे बहुत प्यारे भी हो पर अब हम तुमसे शादी नही कर पायेंगे ,चलिये मम्मी।।
    और आँटी आपको एक बात और बता दें,हम आगे पढ़ाई और नौकरी दोनो करना चाहतें हैं,पर शायद आपको ये भी पसंद नही आयेगा,वैसे आपकी पसंद का हममे कुछ भी नही है,आपको यहाँ आकर हमारे कारण जो भी परेशानी उठानी पड़ी उसके लिये माफी चाहतें हैं ।नमस्ते।।

बन्टी- अरे ऐसे कैसे!! बांसुरी बड़ों की बात चीत अभी चल रही है,ऐसे बीच मे तुम्हारा बोलना ठीक नही है,,ये सब तो शुरुवाती बाते हैं,धीरे धीरे सब सुलटाएंगे,तुम काहे इतना टेंशन ले रही हो।

बांसुरी- नही बन्टी भैय्या,जहां बातों की शुरुवात ही गलत नींव पर हो वहाँ हमारा सपनों का महल खड़ा नही हो पायेगा,चलिये मम्मी।

   बांसुरी को जाने कौन सी बात इतनी परेशान कर गयी,राजा की अम्मा का हद से ज्यादा बोलना या राजा की गम्भीर चुप्पी !! पर इसके बाद बिना रुके वो अपनी माँ का हाथ पकड़े मन्दिर से बाहर निकल गयी,उनके पीछे बुआ जी अपने पुरखों को कोसती दहेज लोभियों पे भाषण देती धीरे धीरे चल पडी,जाते जाते उन्होनें आखिरी व्यंग सुशीला पे भी दे मारा_

” अच्छा नही किया दुल्हिन!! जितना तुमने कहा उतनी सब की तैयारी रही हमारे भाई की,पर ऐसे इस ढंग से बच्चो के सामने…..का सोच रही अब खुस रह पाओगी तुम?? कर सकती हो तो हमरी बांसुरी के पहले राजा का ब्याह कर के दिखा दो, बड़ी खुसी से तुम्हरे द्वारे आयेंगे तुम्हरे राजकुमार के ब्याह का लड्डू खाने,और हम भी तुम्हें न्योत रहे एक महीना के अन्दर अन्दर तुम्हे बंसी के ब्याह का लड्डू खिला के रहेंगे।।”

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  आंखों से आग बरसाती बुआ जी अपने घुटने संभालती चली गयी।।

          ************************

              एक सौ सोलह चाँद की रातें,
               एक तुम्हारे काँधे का तिल
               गीली मेहंदी की खुशबू,
                झूठमूठ के शिकवे कुछ
          झूठमूठ के वादे भी, सब याद करा दो
         सब भिजवा दो, मेरा वो सामान लौटा दो……

  रेडियो पर बजते गाने के बोल सुन अनजाने ही दो आंसू बांसुरी के गालों पे लुढ़क आये,,खिड़की पर खड़ी वो अपनी सोच में गुम कहीं खो गयी।।

क्रमशः

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aparna..

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समिधा-30

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   समिधा – 30

    वरुण को मठ में आए लगभग आठ 9 महीने बीत चुके थे और अब उसका काम बदल चुका था। मठ में किस व्यक्ति को कितना समय हुआ है उसकी शिक्षा-दीक्षा क्या है इसके आधार पर कार्य विभाजित है बावजूद मठ में शुरुआती दिनों में हर एक व्यक्ति को सारे जरूरी काम करने पड़ते थे।
    वेद अध्ययन के लिए जितना समय निश्चित था वरुण ने उस समय से पहले ही सारी किताबें पढ़ ली थी उसका अध्ययन पुख्ता था।
    उसके मन में ढेर सारे प्रश्न थे और उन्हीं प्रश्नों का उत्तर ढूंढने ही तो वो कृष्ण आश्रम आया था। आखिर जीवन क्या है ? इसे किसने रचा है ? अगर इसे रचने वाला भगवान है तो उसने इस जीवन में इतनी मुश्किलें क्यों डाली है? रोग जरा और मृत्यु सदैव स्वाभाविक क्यों नहीं हो सकते? अगर जीवन देने वाला परमात्मा है तो उसने इस जीवन में रोगों की सृष्टि क्यों की?  आखिर क्यों इंसान यह समझता है कि अगर इनका जवाब यह है कि भगवान ऐसे दुख देकर अपने प्रति आस्था जगाने का काम करते हैं तो फिर हम उस ईश्वर को पिता क्यों मानते हैं?

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    क्या कोई पिता अपना महत्व दिखाने के लिए अपने पुत्र को दुख और दर्द दे सकता है?
   
     इसी तरह के कई सवाल थे जो वरुण के मन को मथते रहते थे और जिनके कोई जवाब उसे नहीं मिल पाते थे। अक्सर जब प्रभकराचार्य स्वामी प्रवचन दिया करते तब वरुण अपना कोई ना कोई सवाल उनके समक्ष प्रस्तुत कर दिया करता। अमृतानंद स्वामी पहले तो कोशिश करते कि उसकी समस्या का कोई समाधान उसे बता सकें लेकिन जब वह नहीं बता पाते तो सब कुछ ईश्वर इच्छा कहकर शांत हो जाया करते। लेकिन उनके शांत हो जाने पर भी वरुण के मन का कौतूहल शांत नहीं हो पाता था। और इसी उधेड़बुन में वह अपने प्रश्नों के साथ रात रात भर जागता चला जाता था। और फिर सुबह की पहली किरण के साथ ही वह वेद पुस्तिकाओं को खोलें अपने प्रश्न उनमें ढूंढने लगता था।
     अध्ययन करते करते धीरे-धीरे एक समय ऐसा आने लगा कि वरुण को स्वतः ही अपने मन में चलते सारे सवालों के जवाब मिलने लगे और इसके साथ ही उसे यह भी समझ में आने लग गया कि मठ में उसके ऊपर जितनी भी आचार्य बैठे हैं, यह आवश्यक नहीं कि उन्होंने भी वेद अध्ययन किया हो। या उन्हें वाकई इतना ज्ञान हो कि वह प्रवचन दे सकें। बावजूद वरुण उम्र में छोटा होने के कारण और अनुभव की कमी के कारण किसी को भी रोक टोक नहीं पाता था।

    यह सत्य भी है । धर्म और आस्था से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जिन्हें अनजाने ही सामान्य लोगों पर थोप दिया जाता है बिना किसी कारण को जाने। लेकिन जो सच्चे अर्थों में वेदों का अध्ययन करते हैं वह जानते हैं कि हर एक चीज के पीछे कोई ना कोई वैज्ञानिक तथ्य जरूर है।
     अब यही वरुण के साथ होने लगा उसका विज्ञानी दिमाग जब वेदों के अध्ययन के साथ उलझा तो उसमें से जुड़कर जो नया दर्शन निकला उसने वरुण के ज्ञान चक्षु खोल दिये।

       आश्रम में आचार्यों के अलग-अलग पद  सुनिश्चित थे। वेद अध्ययन के समय तक सभी सामान्य व्यक्ति शिष्यों की श्रेणी में आते थे। लेकिन छह महीनों के कठिन तप के बाद वरुण को आचार्य पद पर पहुंचने की पहली सीढ़ी प्राप्त हो चुकी थी। और अब वह अपने से ऊपर के गुरु प्रभाकर आचार्य के प्रवचन के बाद जनसमूह को सामान्य बोलचाल की भाषा में श्रीकृष्ण से जुडी कथाएं सुनाने लगा था।
    जनसमूह के सामने श्री कृष्ण कथा कहते हुए वरुण खुद श्री कृष्ण के अमृत में ऐसा डूबा रहता था कि उसके मन को अपरूप शांति मिलने लगी थी।
       आश्रम बहुत बड़ा था जहां अलग-अलग स्तर पर गुरु और आचार्य उपस्थित थे सभी के काम बटे हुए थे। लेकिन इतने महीने होने पर भी उस आश्रम के मुख्य और सर्व प्रमुख आचार्य श्री अमृताचार्य स्वामी जी से अब तक वरुण की भेंट नहीं हो पाई थी।
  
   स्वामी अमृत आचार्य के बारे में कई कहानियां आश्रम में सुप्रसिद्ध थीं। कहानियों के नायक पद से निकलकर अब वह किवदंती बन चुके थे । अपने धर्म के प्रचार को लेकर उनकी आस्था इतनी सुदृढ़ थी कि वह जगह-जगह घूमकर कृष्ण पर प्रवचन देते लोगों को कृष्ण भक्ति के मार्ग से जुड़ते चले जा रहे थे। और अब उनका सारा जीवन पूरी तरह से सिर्फ कृष्ण को समर्पित हो गया था। वरुण का उनसे मिलने का सबसे बड़ा लालच यही था कि उन आचार्य की कहानी बहुत कुछ वरुण को उस की कहानी से मिलती सी लगती थी। लेकिन शायद अब तक वरुण की किस्मत में उनसे मिलना नहीं लिखा था इसीलिए यह सुयोग उसके जीवन में अब तक नहीं आ पाया था।

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    भक्ति मार्ग पर प्रवचन देने के बाद शाम का कार्य समाप्त हो चुका था। वरुण अपनी किताबों को समेट एक तरफ रख मंदिर परिसर की आरती के बाद बाहर निकल रहा था कि तभी एक ओर बैठी आश्रम की महिलाओं ने भजन कीर्तन शुरू कर दिए।
   उन महिलाओं पर नजर पड़ते हैं वरुण ने अपने साथ चल रहे अपने मित्र से उनके बारे में पूछना शुरु कर दिया…- ” कौन है यह सब और कहां से आई हैं!”

   वरुण के सवाल का जवाब उस की जगह उदयाचार्य जी ने दिया।
    उदयाचार्य जी आश्रम में रहने वालों के रहने और खाने की व्यवस्था देखा करते थे। इसीलिए परिसर में पीछे स्थित भगिनी आश्रम की व्यवस्था का भार भी इनके कंधों पर ही था….-” दुनिया की सताई औरतें हैं। जिन्हें कहीं आसरा नही मिलता वो बेचरियाँ यहाँ आश्रम आ जाती हैं।
   कम से कम दोनों समय का खाना तो मिल ही जाता है।”

” ऐसा क्यों कह रहें हैं , गुरुवर? देखा जाए तो बेचारा  इस संसार में कोई नही, क्योंकि उस पालनहार ने पैदा किया है तो व्यवस्था भी वहीं करेंगे। और दूसरी तरफ देखें तो सभी बेचारे क्योंकि अब तक उस पालनहार के श्रीचरणों से दूर है।”

” अरे बाबा वरुणानँद स्वामी जी आप ये प्रवचन जन मानस के लिए ही बचाये रखिये। हम खुद स्वामी हैं और आपसे कहीं अधिक ये सब जानते समझतें हैं।”

” गुरुवर आपको उपदेश दे सकूं इतना ज्ञानी मैं नही हुआ अभी और न कभी हो पाऊंगा । मैं तो बस ये कहना चाहता हूँ कि अगर ये सभी महिलाएं अपने सभी अंगों से सक्षम है , दिव्यांग नही हैं तो इन्हें सिर्फ परिवार के ठुकराए जाने के कारण बेचारी कह देना तो इनका अपमान हुआ न।”

“हां दिव्यांग नही है इसलिए ही तो इनसे मंदिर परिसर की साफसफाई और रसोई का काम लिया जाता है। वरना क्या सिर्फ मुफ्त की रोटियां तोड़ने के लिए हैं ये?”

” ऐसा मत कहिये गुरु जी। मैं शायद अपनी बात आपको समझा नही पाया। इसलिए आप ज़रा नाराज़ से हो गए। मैं बस ये कहना चाहता था कि ये सब भी अगर सिलाई कढ़ाई बुनाई जैसे कार्य कर के अपना समय किन्हीं सकारात्मक कार्यो में लगा सकें तो इनके मन को भी एक आत्मसंतुष्टि तो मिलेगी। “

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     उदयाचार्य जाने क्यों वरुण से ज़रा रूष्ट ही रहा करते थे, कारण किसी को स्पष्ट ना था। शायद वरुण के उच्च शिक्षित होने से बाकी शिष्यों और प्रधान गुरुवर में उसका मान सम्मान था, उसने अपने व्यवहार से भी जल्दी ही अपने लिए एक जगह बना ली थी या और जो कोई भी कारण हो, और इसलिए वो अक्सर वरुण के सवालों के ऐसे ही उल्टे जवाब दिया करते।
    वो उससे बातों में उलझे ही थे कि एक शिष्य भागा हुआ सा उन तक आ पहुंचा…

” गुरु जी ! बाहर एक बहन आयीं हैं, आश्रम में जगह चाहिए उन्हें! चारु दीदी की चिट्ठी भी है उनके पास।”

  उदयाचार्य ने उस शिष्य की तरफ देख मुहँ टेढ़ा सा कर लिया…-“आश्रम में जगह कहाँ बची है, ये सारे संसार की दुखियारी यहीं क्यों चली आती हैं, मथुरा में और भी तो आश्रम हैं। वृंदावन चलीं जाएं पर नही सबको यहीं आकर मरना है।”
   बड़बड़ाते हुए उदयाचार्य बाहर की ओर निकल गए, और उनकी इस बिना वजह की चिड़चिड़ाहट से स्तब्ध वरुण अपने कमरे की ओर चल गया।
    
     उदयाचार्य ने बाहर आकर मंदिर परिसर के एक ओर स्थित कार्यालय में आगंतुकों को बैठाया और एक मोटा सा रजिस्टर अलमारी से निकाल कर उनके सामने बैठ गए।
   ” नाम बताइये ?”
   ” पारोमिता !”
   ” पूरा नाम , पति या पिता का नाम, अपने घर का पता, शहर । सब कुछ बताइये।”
  ” पूरे नाम का जब कोई अस्तित्व ही नही बचा तो उस नाम को लिख कर क्या फायदा। नाम पारोमिता ही लिखिए। पति और पिता दोनों ही नही हैं, इसलिए उनके नाम बताने से क्या प्रयोजन। और आपका तीसरा प्रश्न था घर का पता? तो अगर मेरे पास मेरे घर का पता होता तो मैं यहाँ क्यों आती? “
   पारो की बातें सुन उदयाचार्य ने रजिस्टर से तुरन्त अपना चेहरा ऊपर उठाया और ऐसी मोटी बातें बोलने वाली के चेहरे पर गड़ा दी।
   चेहरे से बाल विधवा ही लग रही थी। ऐसी परम सुंदरी और विधवा? विधाता के लिखे लेख कोई नही समझ सकता… उनके मुहँ से एक आह निकल गयी…” बेचारी!” और ये शब्द बोलते ही उन्हें वरुण याद आ गया। वो लपक के अपने इधर उधर देखने लगे, किसी ओने कोने से टपक पड़ा तो फिर एक बार बखिया उधेड़ना शुरू कर देगा।
   सामने बैठी पारो को स्वयं के लिए ये सम्बोधन बहुत चुभता था, लेकिन अब उसके पास सुनने के अलावा चारा भी क्या था?

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  “पता तो लिखवाना ही पड़ता है? देखिए भविष्य में कभी ये बीमार पड़तीं हैं, या इनकी मृत्यु हो जाती हैं तो संस्कार के लिए घर वालों को तो बुलाना ही पड़ेगा ना?”
   उदयाचार्य ने पारो के साथ बैठी महिला को देख कर अपनी बात समझानी चाही।
   ” क्या कृष्णभूमि में मेरा अंतिम संस्कार करने वाला भी कोई न होगा? जहाँ जीवित व्यक्ति की पूछ परख नही वहाँ उसके मरने से किसी को क्या दुःख होगा, उल्टा सभी प्रसन्न ही होंगे। “
   पारो की माँ ने उसकी बात सुन उसे अपने अंक में भर लिया…-“ऐसा मत बोल लाड़ो। मेरा दर्द तुझे कैसे समझाऊँ। तुझे अपने साथ ले भी जाऊंगी तो किस किस से तेरी रक्षा कर पाऊँगी बेटी। तेरी जो उम्र है तेरा जो रूप है ,अपने ही घर में भेड़िये पैदा हो जाएंगे। घर की औरतें तानों से तुझे छलनी करेंगी और पुरुष अपनी आंखों से!
   स्वयं भुक्तभोगी न होती तो क्या अपने कलेजे के टुकड़े को ऐसे किसी मंदिर में छोड़ देती? ये कृष्ण का स्थान है बेटी यहाँ हर कदम पर कृष्ण तेरे साथ होंगे और मुझे पूरा विश्वास है वो सदा तेरी रक्षा करेंगे। “

” क्यों क्या कृष्ण सिर्फ मंदिरों में रहतें हैं। और अगर तुम्हारे भगवान मंदिरों में रहतें हैं तो केदारनाथ में क्या वो आंखें मूंदे बैठे थे जो इतना बड़ा प्रलय उन्हें नही दिखा। मुझे मत बहलाओ माँ! तुम्हारे कृष्ण भी अपने रचे संसार की तरह ढोंगी हैं। जहाँ सब अच्छा होता है श्रेय लेने दौड़े चले आतें हैं और जहाँ कुछ गलत हुआ उसे मानव पर थोप देतें हैं। “

   रोते रोते पारो की माँ ने उसे गले से लगा लिया…. पारो की आंखें भी बरसने को थी लेकिन उसने खुद को संभाल लिया। वो अपनी माँ का दुख समझ पा रही थी लेकिन अब उसके मन में हर किसी के प्रति नाराज़गी ने घर कर लिया था। इसलिए जब ससुराल में उससे मिल कर उसकी माँ लौटने लगी तब उसने उन्हें पकड़ कर ज़िद कर ली कि वो उसी वक्त उसे आश्रम छोड़ दें।
   ससुराल में सास, ठाकुर माँ सब उसे समझा समझा कर हार गए कि वो लोग उसकी तैयारी करवा कर उसे कुछ दिनों में आश्रम छोड़ आएंगे पर वो राजी नही हुई। और उसकी ज़िद के आगे हारकर उसकी माँ को।लेने आये बाली दादा ने वहीं से मथुरा की टिकट निकाली और पारो और उसकी माँ को साथ लिए मथुरा निकल गए।
    ससुराल छोड़ने की ज़िद भले ही पारो ने पकड़ ली थी लेकिन देव से जुड़ी यादों से किनारा करना ऐसा भी आसान नही था। उस घर का आंगन जहाँ बैठ कर वो अपने बही खाते सहीं किया करता था, वहाँ की रसोई जहाँ उसने पहली बार खीर बना कर उसे खिलाई थी और उसने प्यार से पारो की उंगलियां चूम ली थी। ऊपर कमरे की ओर जाती सीढ़ियां जिन पर बैठे वो अक्सर उसे छेड़ता रहता था और उसका कमरा। वहाँ तो जगह जगह वो समाया हुआ था।
    सब कुछ याद करती वो ससुराल की दहलीज पर खड़ी फफक पड़ी थी। ये कैसा निर्वासन था उसका, जिसमें अब वापसी की कोई गुंजाइश नही बची थी। ये ऐसी घड़ी थी कि उसे अपनी सास, ठाकुर माँ और बाकियों के लिए भी कलेजे में ममता उमड़ घुमड़ रही थी। यूँ लग रहा था उसकी सास ही उसे अपने कलेजे से लगाये रोक ले।
   पर तभी उसकी नज़र सबसे पीछे खड़े उस नीच पर पड़ गयी जिसकी दृष्टि पड़ने से ही वो मैली हुई जा रही थी।

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    सौभाग्य कहा जाए या दुर्भाग्य कि उस समय दर्शन भी अपने पिता के साथ पास के गांव गया हुआ था वरना देव का वो छोटा भाई अपनी बऊ दी को शायद ऐसे वहाँ से कभी नही जाने देता।
   आनन्दी का अंदर रो रोकर बुरा हाल था। चलती बेला उसने पारो से छिपाकर उसके बैग में कुछ रुपये और लडडू डाल दिए थे। उससे अधिक करने की शायद उसकी भी हिम्मत नही थी।
  एक आनन्दी से ही वो जाकर खुद से उसके पैरों पर गिर कर आशीर्वाद ले आयी थी। और उसने उसे उठा कर आने सीने से लगा लिया था।
   बाकियों के पैर छूना तो औपचारिकता मात्र रह गयी थी।
      नही अब इस घर में उसका दाना पानी नही रहा था। अगर मोह माया में पड़कर वो यहाँ रुक भी गयी तो कब तक खुद को बचा कर रख पाएगी। उसका बुरा करने के बाद इल्जाम भी न हो उसी पर डाल दिया तो मरने के सिवा क्या बचेगा।
   वो भारी कदमों से उस चौखट को एक आखिरी प्रणाम कर वहाँ से निकल गयी।
    अपनी माँ के साथ गाड़ी में बैठते ही फिर उसके लिए खुद को संभालना मुश्किल हो गया था। लगातार रोती पारो को देख उसके बाली दादा ने एक बार उसकी माँ से उसे घर ले चलने की बात भी कही लेकिन माँ बेटी दोनों ही इस बात पर चुप लगा गयीं थीं।

    आश्रम पहुंच कर बाहर से उसका वृहदाकार रूप देख कर और बाहरी लोगों से उसके बारे में पूछ ताछ कर पारो की माँ और दादा आश्वस्त हो गए थे। बाहरी लोगों के अनुसार ये आश्रम सच्चे अर्थों में स्वर्ग था। वहाँ रहने वाली महिलाओं को ससम्मान वहाँ स्थान दिया जाता था। भगिनी आश्रम की संचालिका चारुलता दीदी असल में किसी एन जी ओ को चलाती थीं जिसके अंतर्गत वो महिलाओं और बालिकाओं के लिए ढेर सारे काम करतीं थीं। उनका बाहर शहर में ही एक अनाथ बालिका आश्रम भी था। विधवा महिलाओं के रहने आदि के लिए उन्होंने आश्रम के साथ मिलकर काम करना शुरू किया था तथा अपनी संस्था की महिलाओं के रहने की व्यवस्था आश्रम में करवाने की अर्जी दी थी जिसे मान लिया गया था और उसके बाद ही इस कृष्ण आश्रम में भगिनी आश्रम खुला था और उसके बाद से ही दुनिया भर की सताई हुई महिलाओं का ये ठिकाना हो गया था।
  बीच बीच में आश्रम संचालिका चारुलता दीदी भी आया करतीं थीं। भगिनी आश्रम में रहने वाली महिलाओं को सिर्फ पूरे आश्रम के लिए भोजन पकाने का ही काम था। इनमें से जिन्हें वहाँ रहते आठ दस साल व्यतीत हो चुके थे ऐसी महिलाओं को चारु दीदी अपने अनाथ आश्रमों और बाक़ी कामों में सहायता के लिए साथ ले जातीं थीं।
   यहीं सब जान कर पारो की माँ आश्वस्त सी हो गईं थीं।
 
  ” अब जो है जैसा है यही तेरा घर है लाड़ो!” पारो को खुद से अलग कर उन्होंने उसका सामान उसके हाथ में दिया और आँसू पोंछती बाहर निकल गईं। बाहर निकलते हुए बाली दादा उसकी माँ को उसके वहाँ रहने के लाभ समझाते जा रहें थे।

    उदयाचार्य जी ने वहीं  से गुज़रती एक महिला को आवाज़ लगा दी…-“सरिता ये नई आयीं है आश्रम में , इन्हें अपने साथ ले जाओ। इनके सोने आदि की व्यवस्था देख लेना और आश्रम के नियम आदि इन्हें समझा देना।”
” जी आचार्य जी! आओ बहन!”
  पारो अपना सामान लिए सिर झुकाए उस औरत के साथ चली गयी।

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   दोनों आगे बढ़ रहीं थीं बगीचे के बीच से गुजरते हुए उन्हें किसी की आवाज़ कानों में पड़ी। कोई  सामने खड़े बच्चे से कह रहा था…-“एकदम ताजे खिले फूलों को रहने दो। जो फूल अब तब में झरने को हैं उन्हें ही पूजा के लिए तोड़ लो।”
” पर गुरुवर पूजा में तो ताज़े फूल ही चढतें हैं।”
” हाँ तो पेड़ पौधों से तुरंत तोड़े फूल ताज़े ही तो हैं। उन नए खिलें फूलों को कुछ दिन तो ताज़ी हवा में सुकून की सांस भर लेने दो। ये फूल वैसे भी कल तक झर जाएंगे इसी से आज इनसे गोपाल जी का श्रृंगार करने से ये फूल भी चमक जाएंगे और हमारे गोपाल ज्यू तो सबको महका ही देते हैं।”
    वरुण उस बालक को यह सब कह कर पलटा ही था कि सामने पारो से टकराते बचा…-” थोड़ा ऊपर देख कर चलो बहन। वरना टकरा जाओगी। “
  पारो के साथ चलने वाली सरिता ने वरुण को प्रणाम किया तो उसे देख पारो ने भी हाथ जोड़ दिए। सरिता को प्रणाम का जवाब देने के बाद पारो को देख जाने क्यों वरुण कोई जवाब नही दे पाया। और जाती हुई पारो के पीछे दूर तक उसकी आंखें पारो को उसके आश्रम तक छोड़ आयीं….

क्रमशः

aparna…

मायानगरी -5

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मायानगरी – 5

      मेरे पास आओ मेरे
     दोस्तों एक किस्सा सुनो
       मेरे पास आओ मेरे
     दोस्तों एक किस्सा सुनो

    कई साल पहले की ये बात है
      बोलो ना चुप क्यों हो गए
         भयानक अंधेरी
        सी यह रात में
       लिए अपनी बन्दूक
             मैं हाथ में……

   ” अबे सालों बस सुनने आये हो क्या? साला आज कल के लड़कों को कोई तमीज ही नही है। हम सीनियर होकर हम ही गाना भी सुनाए। शर्म करो कुत्तों। ये मैं गुनगुना रहा था कमीने कान गड़ाए खड़े हैं।”

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     इंजीनियरिंग कैम्पस में कंप्यूटर साइंस के जूनियर्स को मैकेनिकल के सीनियर्स धरे बैठे थे कि कंप्यूटर वाले सीनियर्स वहीं चले आये…

” अरे सीपी यार इन लोगो को काहे दबोच रखे हो, हमारे वाले हैं ये। “

” निशांत यार हम भी जानते हैं । लेकिन देखो, शुरू से ही हमारे कॉलेज में फैकल्टी वाइज कभी फसाद नही हुआ। हम अगर तुम्हारे बंदों को रैंग करते है तो तुम्हे भी तो खुल्ली छूट है यार हमारे बंदों को नोचने की।

“भाई वो बात नही है यार। इस बार की बैच में ज़रा हाई फाई लड़के भी हैं। मैनेजमेंट कोटा खूब भरा है।”

” अरे तो क्या हुआ? मैनेजमेंट कोटा से आने वालों को क्या हम तमीज नही सिखाएंगे। भाई ये हमारी ही नैतिक जिम्मेदारी है कि लड़कों को लड़का बनाया जाए। अब स्कूल से ये क्या सिख पढ़ कर आते हैं। कुछ नही। सिर्फ होर्लिक्स पी लेने से टॉलर स्ट्रॉन्गर और स्मार्टर नही बना जाता। हम ही हैं जो इन टोडलर्स को चलना सिखाते हैं।
  कायदे से यही वो जगह है जहाँ इन जाहिलों को इंसान बनाया जाता है।”
  तभी सीपी की नज़र एक जूनियर पर पड़ी जो थर्ड बटन से सर ऊपर कर के देखने की कोशिश कर रहा था कि सीपी का जोरदार तमाचा उसके चेहरे को लाल कर गया।
   जोश ही जोश में तमाचा इतना ज़ोर का पड़ा की लड़का घूम कर ज़मीन पर गिरा और बेहोश हो गया…

  वहीं चबूतरे पर बैठे अभिमन्यु और बाकी लड़के भी भाग कर देखने चले आये।
  लड़कों में हड़कंप मच गया। कम्प्यूटर वाले लड़के डर के मारे अपनी बिल्डिंग को खिसक लिए। सीपी को लगा नही था कि उसका पंजा ऐसा फौलाद का है। आश्चर्य से वो कभी उस बेहोश जूनी को तो कभी अपने हाथ को देख रहा था कि अभिमन्यु ने लड़के को उठाया और अपने कंधे पर डाल मेडिकल की तरफ भाग चला।
   अधीर भी उसके पीछे हो लिया।

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   लंबा चौड़ा अभिमन्यु उस नाजुक दुबले पतले से जूनियर लड़के को कंधे पर लिए बिल्कुल साक्षात सती को कंधो पर लिये महादेव सा चला जा रहा था।

  मेडिकल में गेट पर  से घुसते ही बायीं ओर कॉलेज का हॉस्पिटल था। अभि उसी तरफ निकल गया…

“ला यार थोड़ी देर मैं भी पकड़ लूँ। “

  अधीर के इस प्रोपोजल के आते में ही मेडिकल कैम्पस में खड़ी स्ट्रेचर लिए वार्डबॉय भागा चला आया…

” क्या हुआ है लड़के को? “

  डॉक्टर के सवाल पर अभिमन्यु ने ही जवाब दिया..

” बेहोश हो गया है। “

” वो तो दिख रहा है। बेहोश कैसे हुआ? “

  अभि और अधीर एक दूसरे को देखने लगे। डॉक्टर के सामने ये बताना कि रैगिंग में पड़े थप्पड़ ने ये हाल किया है महंगा पड़ सकता था।

” इसने ब्रेकफास्ट नही किया था डॉक्टर!”

ड़ॉक्टर ने अजीब सी नज़रों से अभि को घूर कर देखा और लड़के को साथ लिए अंदर चला गया।

  अभी और अधीर के पीछे सीपी और उसके 1-2 चेले भी भागते हुए मेडिकल चले आए। सीपी और चेले वहीं बाहर बैठ गए।

   अभि और अधीर इधर उधर भटकते उस लड़के के होश में आने का इंतज़ार कर रहे थे कि कहीं से मधुर सी गाने की आवाज़ चली आयी। दोनों उसी दिशा में बढ़ चले…

  मेडिकल प्रथम वर्ष के छात्रों का आज अस्पताल विज़िट करने का पहला दिन था और आज ये नन्हे-मुन्ने बच्चे रेजिडेंट डॉक्टर्स के हत्थे चढ़ गए थे।
   असल में इन्हें इनके कुछ सीनियर्स ने अस्पताल की ओपीडी से कुछ आवश्यक सामान लाने का बेइंतिहा गैरजरूरी काम दिया था।
   इसी चक्कर में ये चार पांच लड़के लड़कियां यहाँ फंस गए थे।
वैसे रेजिडेंट डॉक्टर्स इतना व्यस्त होते थे कि वो जूनियर्स की रैगिंग लेते नहीं थे। लेकिन पिछले दिन की हेक्टिक शेड्यूल की थकान उतारने के लिए आज उनके पास जूनियर्स नाम का एंटरटेनमेंट मौजूद था। और बस इस एंटरटेनमेंट की बहार देखते हुए रेजिडेंट डॉक्टरों का भी उ ला ला करने का मन करने लगा।
  डॉक्टर्स ड्यूटी रूम में इन जूनियर्स की रैगिंग चल रही थी।
  इत्तेफाक से रंगोली ही उस रैगिंग की सबसे पहली शिकार बनी थी। सीनियर से उसे गाना सुनाने को कहा था और वह अपने गले को साफ कर गाना शुरू कर चुकी थी।

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देख लो हमको करीब से
आज हम मिले हैं नसीब से
     यह पल फिर कहां
    और यह मंजर फिर कहां
  गजब का है दिन सोचो जरा
   यह दीवानापन देखो जरा
तुम भी अकेले हम भी अकेले मजा आ रहा है कसम से…..

   कमरे के ठीक बाहर खड़े अभिमन्यु और अधीर के कानों तक भी यह स्वर लहरी पहुंच चुकी थी। आवाज का नशा अभिमन्यु पर ऐसा छाया कि बेहोशी के आलम में उसने दरवाजा धीरे से खोल दिया…
उसके दरवाजा खोलते ही सारे सीनियर्स अपनी जगह से उठकर खड़े हो गए। जूनियर्स पहले ही खड़े थे जो थर्ड बटन में थे   वह लोग भी दरवाजे की तरफ देखने लगे । अभिमन्यु और अधीर को ऐसे सामने खड़े देख एक सीनियर रेजिडेंट ने उन लोगों से पूछ लिया…-” आप लोग कौन हैं यहां क्या कर रहे हैं?”

“हम इंजीनियरिंग के हैं ,एक मरीज लेकर आए थे।”

“मरीज लेकर आए थे? क्या हुआ तुम्हारे मरीज को?”

“जरा चक्कर आ गया था।”

“हां तो ठीक है! लेकिन यहां क्या कर रहे हो? मरीज को भर्ती करवा दिया है ना ड्रिप चढ़ेगी शाम तक बंदा अपने पैरों पर चलकर इंजीनियरिंग कैम्पस वापस आ जाएगा इसलिए अब  फुटो यहां से।”

अभिमन्यु ने रंगोली को देखा रंगोली ने अभिमन्यु को और अभिमन्यु के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कुराहट आ गई!  पास खड़ी झनक ने रंगोली को तुरंत कोहनी मारी….-” देख आखिर तेरा पति  तुझे ढूंढता यहाँ तक चला आया।
“चुप कर बकवास मत कर।”
रंगोली  जितना धीमा बोल सकती थी उतना धीमा बोली लेकिन उसने इतना धीमा बोल दिया कि पास खड़ी झनक तक को सुनाई नहीं दिया और झनक ने इतनी जोर से “क्या” कहा कि सारे रेजीडेंट डॉक्टर उन दोनों को देखने लगे।

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  उसी वक्त बाहर से गुजरते मृत्युंजय की नजर डॉक्टर्स ड्यूटी रूम पर पड़ गई। वह अभिमन्यु और अधीर को हाथ से हटा कर दरवाजे से भीतर चला आया…-” क्या हो रहा है यहां पर?”
सारे जूनियर रेजीडेंट डॉक्टर घबराकर एक तरफ खड़े हो गए …-“कुछ नहीं सर! वह बस जरा यह फर्स्ट ईयर जूनियर्स हैं इन्हें एनाटॉमी पढ़ा रहे थे।”
“एनाटॉमी पढ़ाना है, तो लैब में पढ़ाया करो। यहां बिना बोन और बिना किसी ऑर्गन के तुम लोग एनाटॉमी कैसे पढ़ा रहे हो?”
मृत्युंजय ने जूनियर की तरफ देखा और उन्हें वहां से जाने की इजाजत दे दी।

  उस कमरे से बाहर निकलते ही जूनियर्स ने चैन की सांस ली… -“यहां तो यार हर मोड़ पर आतंक छाया हुआ है! वह गाना आज मेरी समझ में आ रहा है, यहाँ रोज-रोज हर मोड़ मोड़ पर होता है कोई ना कोई हादसा।  बस उन्हीं हादसों का अड्डा है हमारा कॉलेज। क्लास में बैठते हैं तो फँस जाते हैं। लैब में जाते हैं तो फँस जाते हैं। हॉस्पिटल आते हैं तो भी फँस जाते हैं। जहां देखो वहां सीनियर का आतंक है। आखिर कब बच पाएंगे हम लोग।”
   झनक की बात पर साथ चल रहा लड़का राहुल हंसने लगा…-” तुम लोग तो फिर भी लड़कियां हो यार! तुम बच जाती हो, हम लोगों के साथ हॉस्टल में भी इतनी ज्यादा अति होती है कि हम बता नहीं सकते।”
  “प्लीज बता ना क्या रैगिंग होती है तुम लोगों के साथ।”
  ” चुप कर! नहीं बताना।”
“अरे ऐसा क्या करते हैं भई सीनियर बता ना प्लीज।”
“होती है बॉयज वाली रैगिंग! जैसे तुम्हारी गर्ल्स प्रॉब्लम तुम हमसे शेयर नही कर सकती, हम भी नही कर सकते ।”
” बड़ा आया। मत बता।”
   वो लोग बातें करते अगर बढ़ ही रहे थे कि पीछे से उन्हें आवाज़ लगाते अभिमन्यु और अधीर चले आये…
” एक्सक्यूज मी गाइज़! आप लोग मेडिकोज हैं?
   अभिमन्यु के सवाल पर रंगोली के अलावा बाकी लोगों ने उसे घूर कर देखा..-” हां जी आपको क्या प्रॉब्लम है?”
“नो नो! कोई तकलीफ नहीं है । एक्चुली मैं कुछ जानना चाहता था मेडिकल टर्म्स में।”
राहुल ने उसे बिल्कुल ही हिकारत भरी नज़रों से घूर कर देखा।
” भाई मेरे! ऐसे घूर कर मत देख! मैं भी कोई ऐवें नहीं हूं। इंजीनियरिंग कर रहा हूं, मेकेनिकल से। और उम्र के लिहाज से देखा जाए तो तुम सबसे दो-तीन साल बड़ा ही हूंगा। और प्रोफेशनल कॉलेज के हिसाब से देखा जाए तो यूनिवर्सिटी सीनियर हूं तुम्हारा।”
अबकी बार जवाब राहुल की जगह अतुल ने दिया…-” जी कहिए क्या पूछना है आपको।”

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“दोस्त कहीं आराम से बैठ कर बात कर सकते हैं । ज़रा सीरियस मुद्दा है।”
“ओके बाय गाइज़। तुम लोग बैठ कर बातें करो मैं और रंगोली चलते हैं।” झनक रंगोली का हाथ थामे आगे बढ़ने लगी कि अभिमन्यु उन दोनों के सामने अचानक से जाकर खड़ा हो गया….-” अरे मैडम! प्लीज रूके ना आप चार डॉक्टर रहेंगे, तो मेरी समस्या को आप लोग आसानी से समझ कर सुलझा सकते हैं । आप मेडिकल की पढ़ाई करने आई हैं। आप लोगों का तो पेशा ही है लोगों के दुख दर्द सुनना।”
   झनक ने एक नजर अभिमन्यु को देखा और हां में सर हिला दिया।
   रंगोली का वहां रुकने का बिल्कुल मन नहीं था वह झनक का हाथ पकड़े बार-बार उसके हाथ पर दबाव बनाती वहां से निकल चलने की गुजारिश कर रही थी।
    उन चारों डॉक्टरों के साथ अभिमन्यु और अधीर मेडिकल कैंटीन में पहुंच गए।
  वह चारों अभी फर्स्ट ईयर में थे इसलिए कायदे से उन्हें कैंटीन जाना अलाउड नहीं था। और यह बात उन चारों को मालूम नही थी, अनभिज्ञता में वह चारों अभिमन्यु के साथ कैंटीन में प्रवेश कर गये।
   कैंटीन में काम करने वाला लड़का झाड़न अपने कंधे पर लटकाए उन तक चला आया…-‘ फर्स्ट ईयर के लगते हो आप लोग।”
  झनक ने उसे घूर कर देखा…-” हां तो!”
“तो यह कि अगर सीनियर्स ने देख लिया कि फर्स्ट ईयर में वेलकम पार्टी मिले बिना आप लोग कैंटीन चले आए हो तो…?”
“तो क्या बे? हम लोगों को सिखा रहा है!” अबकी बार राहुल उलझ पड़ा।
“मैं क्या सिखाऊंगा? आप लोगों को रात में वह सामने पीपल पर लटकी उल्टी चुड़ैल सब कुछ सिखा देगी।”
“अरे गुरु घंटाल! यह लोग खुद से नहीं आए मैं इन लोगों को लेकर आया हूं! और मैं फिस्थ सेमेस्टर में हूं यानी कि सीनियर बन चुका हूं यूनिवर्सिटी का । और यूनिवर्सिटी के हर कैंटीन में हमें जाना अलाउड है, आई बात समझ में।”

अजीब सा मुहँ बनाकर उनके टेबल पर झाड़न मार कर वह लड़का जाने लग गया….-” अबे जाते-जाते ऑर्डर तो ले जा।”
“क्या लोगे आप लोग?” उसने एक नजर सब को घूर कर फिर पूछा….
” तेरे यहां का सबसे स्वादिष्ट व्यंजन क्या है ?”
“इस वक्त सिर्फ मैगी और सैंडविच मिलेगा।”
“और पीने के लिए ?”
   अभिमन्यु ने मुस्कुराते हुए पूछा…
” आप जो पीते हो वो कतई नही मिलेगा।
उस लड़के ने एक नज़रअभिमन्यु को देखा और अपनी ही कही बात संभाल ली…-” स्ट्रौबरी शेक।”
अभिमन्यु का मुंह बन गया उसने कहा …-“इन चारों के लिए वही ले आ।”
“अब बोलो? कौन सी  मेडिकल इमरजेंसी के बारे में पूछना था तुम्हें? झनक के सवाल पर अभिमन्यु मुस्कुराने लगा।
“अबे ओए टॉम क्रूज दांत बाद में दिखाना पहले फटाफट बता तेरी प्रॉब्लम क्या है ?” अबकी बार राहुल लपका
“वह प्रॉब्लम यह है कि मेरा एक दोस्त है उसकी याददाश्त जरा गुम होने लगी है! सुबह ब्रश किया है कि नहीं उसे कुछ याद नहीं रहता।  कई बार रात में सोता है लेकिन सुबह उठने पर फिर कहता है मैं तो रात भर सोया ही नहीं। नहा कर आता है, और फिर नहाने चला जाता है। खाने का तो पूछो ही मत जितनी बार दे दो हर बार खा जाता है। क्योंकि वह यही भूल चुका होता है कि वह खा चुका है। और तो और कई बार यह भी भूल जाता है कि वह सुसु पॉटी करके आ चुका है। इस प्रॉब्लम का इस समस्या का कोई समाधान है आप लोगों के पास डॉक्टर?”
“अबे यार कौन है यह नमूना? “
अभिमन्यु ने अधीर की तरफ इशारा कर दिया अधीर ने उसे घूर कर देखा और अपनी जगह से खड़ा हो गया…
” शरमा गया बेचारा। क्या है ना ऐसी समस्या है कि बाहर किसी से डिस्कस नहीं कर सकते, आप लोगों को देखकर लगा जैसे दिल से आपसे रिश्ता है। इसीलिए आपसे यह तकलीफ कह गया।”

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    अभिमन्यु अपनी बात कहते हुए रंगोली को देखता रहा। रंगोली ने घबराकर पलके नीचे कर ली। वह झनक का हाथ इतनी जोर से पकड़ी हुई थी, कि अब झनक को हाथ में दर्द होने लगा था। झनक अपनी जगह से खड़ी हो गई…-” चल रंगोली अब हम वापस जाते हैं हॉस्टल के लिए लेट हो रहे हैं।’
   वह दोनों वहां से निकलने को ही थी कि चार पांच सीनियर लड़कों की टोली उनका रास्ता रोक खड़ी हो गयी…
” फर्स्ट ईयर? “उनमें से एक ने कड़क कर पूछा।
“यस सर!” मिमियाती सी आवाज़ में राहुल ने जवाब दिया
” वेलकम पार्टी के पहले कैंटीन जूनीज़ के लिए अलाउड नही है। तुम लोगो को मालूम नही था।”
” वी आर सो सॉरी सर। हमें वाकई मालूम नही था। “
” अच्छा बेटा! और फर्स्ट मन्थ में ही तितलियों को लेकर कैंटीन घूम रहें हो। “
  रंगोली के लिए तितली सम्बोधन सुन अभिमन्यु का खून खौल उठा…-“माइंड योर लैंग्वेज, व्हाटएवर इस योर नेम? “
” तू कौन है बे? बीच में बोलने वाला? मेडिको तो नही है!”
” मेकेनिकल इंजीनियरिंग थर्ड ईयर का स्टूडेंट हूँ,नाम अभिमन्यु है। “
” तो बेटा अभिमन्यु तेरे गुर्दो में दर्द क्यों हो रहा जब हम अपने बच्चों को डांट रहे। “
” डाँटो लेकिन तमीज से। अगर गर्ल्स के लिए कोई बदतमीजी करोगे तो मैं सहन नही करूँगा। “
” क्यों बे तेरी सेटिंग है क्या ये। ” उसने रंगोली की तरफ इशारा किया..
” हां है। और आज के बाद इसे परेशान किया तो नाम याद रख लेना अभिमन्यु से बुरा कोई नही होगा।”
  अभिमन्यु उसे धमका कर निकल गया,अधीर भी उसके पीछे गिरता पड़ता भाग गया।
   इतनी सारी बहस के बीच पीछे खड़े सीनियर्स के इशारे पर वो सारे जूनियर्स भी वहाँ से खिसक लिए।
” वेलकम बेटा अभिमन्यु! मेडिकल के चक्रव्यूह में तुम्हारा स्वागत है। जानते नही हो तुम, तुम्हारा पाला ऋषि खुराना से पड़ा है।”
   खून का घूंट पीकर ऋषि खुराना भी अपनी गैंग के साथ निकल गया।

   वहीं पीछे एक सबसे किनारे की टेबल पर गौरी बैठी अपनी नोटबुक में कुछ लिख रही थी।
  उसकी एकमात्र खास सहेली प्रिया किसी काम से स्टाफ रूम गयी थी। उसी का इंतज़ार करती गौरी अपनी नोटबुक खोली बैठी थी कि तभी विधायक नारायण दत्त का लड़का वेदांत वहाँ अपनी टोली के साथ चला आया।
   यही वो लड़का था जिसके इधर उधर तफरीह करने से परेशान सीपी सर अभिमन्यु और बाकियों को लिए निरमा से मिलने गए थे।
   कैंटीन में सारे टेबल भरे थे। गौरी के सामने तीन कुर्सियां खाली पड़ी देख वेदांत ने एक कुर्सी पकड़ कर पीछे खींची और बैठने को था कि मृत्युंजय आकर उस कुर्सी पर बैठ गया।
    मृत्युंजय ने वेदांत को देख उसे थैंक्स बोला और गौरी की तरफ देखने लगा।
  गौरी वेदांत के व्यवहार को देखते हुए अचरज में थी कि मृत्युंजय आ गया और उसे देख गौरी के चेहरे पर सुकून लौट आया।
   उन दोनों को एक दूसरे को देखते देख वेदांत वहाँ से हट गया कि तभी उसके एक चेले ने उसे आवाज़ लगा दी…-” गुरु यहाँ टेबल खाली है। आ जाओ।”
   एक नज़र गौरी को घूर कर वेदांत आगे बढ़ गया…

“, थैंक यू सर। आप हमेशा मेरी परेशानी में मेरा साथ देने खड़े रहते हैं।”
” इट्स माय प्लेजर गौरी। और बताओ कैसी हो तुम?”
“ठीक हूँ । अभी एक हफ्ते से मेडिसिन बंद की है। और मुझे नींद भी सही या रही है।”
” इट्स गुड! लेकिन एकदम से विड्रॉ नही करेंगे। धीरे धीरे ही मेडिसिन छोड़ना।”

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” जी सर। “
” कॉफी लोगी? “
गौरी ने हाँ में सिर हिला दिया…
दोनो साथ बैठे कॉफी पीते इधर उधर की बातें करते रहे।
     जय के साथ होने पर गौरी के चेहरे पर काफी समय बाद मुस्काने लौटने लगीं थीं…..

क्रमशः

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aparna…

शादी.कॉम-20

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           अगर लैला मजनूँ,हीर राँझा के घर वाले एक बार में ही उनके प्यार को कबूल लेते तो शायद ही ऐसी सफल प्रेम कहानियाँ रची जातीं।।

   अम्मा की ना ने दोनो के मन में छिपा रहा सहा संकोच भी समाप्त कर दिया,दोनो को ही समझ आ गया कि एक दूसरे के बिना जीना व्यर्थ है,और अब वो दोनों सिर्फ दोस्त से कहीं आगे निकल चुके हैं ।।

  ” राजा!! ऐसे क्यों देख रहे ,जैसे पहली बार देखा हो।।”

बांसुरी की बात पर राजा मुस्कुराने लगा।।।

” सुनो !! हम तुम्हें छूना चाहते हैं,तुम्हें छू कर तसल्ली करनी है कि हम सपना नही देख रहे,राजा बाबू सच में हमारे घर के सामने खड़े हैं ।

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” अच्छा!! सच में ??” और मुस्कुराते हुए राजा ने बांसुरी को अपनी तरफ खींच कर गले से लगा लिया।।

   दोनों एक दूसरे के गले से लगे एक दूसरे में डूबे खड़े थे कि __

   ” बांसुरी !!इत्ती रात गये यहां का कर रही हो।”

  दोनो इस आवाज़ को सुन झटके से अलग हो गये

  ” पापा आप!! ये ….वो राजा हैं,हमारे जिम इंस्ट्रक्टर,जिन्हें हम पढाते भी थे।” राजा ने लपक के बांसुरी के पिता के पैर छूने चाहे,पर उन्होनें हाथ बढ़ा कर उसे रोक दिया__” हाँ ठीक है ठीक है,तुम अभी घर चलो ।”

” हां पापा चल रहे!! ” बांसुरी ने आंखों ही में राजा से बिदा ली और अपने पापा के पीछे सर झुकाये घर चली गयी।।

  राजा अपने बालों पे हाथ फेरता रह गया,अपनी बुलेट वापस  उसने घर की तरफ मोड़ ली __

  पूरे रास्ते मुस्कुराते हुए राजा घर पहुँचा ,हालांकि बांसुरी के पिता ने उन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया था,पर इस बात से डरने की जगह उसे एक सुखद एहसास था कि बताना तो आखिर सभी को है,चाहे किसी ढंग से पता चला पर खुशी की बात है कि बंसी के घर पे भी पता तो चल ही गया।।

बांसुरी के पिता पढ़े लिखे सरकारी मुलाजिम थे, इसीसे उन्हें कितनी भी गम्भीर विषय से जुड़ी बात हो उसपे अनावश्यक हाय तौबा मचाना पसंद नही था,साधारण तबीयत के साधारण पुरूष थे।।

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       बांसुरी से ना उन्होनें कुछ पूछा ना बांसुरी ने ही आगे बढ़ कर कोई कैफियत दी,पर अपने धीर गम्भीर पिता की आवाज़ से ही उसने भांप लिया कि उसका यह कार्य पिता को कहीं अन्दर तक कष्ट दे गया है।।

    अगले दिन सुबह और दिनों की तरह बांसुरी जिम नही गयी,उसे घर पे ही इधर उधर निरर्थक डोलते देख उसकी अम्मा से रहा नही गया__

  ” का हुआ?? आज जिम नही जाओगी का बंसी ?”

प्रमिला के सवाल का जवाब बंसी की जगह उसके पिता ने दिया__

” नही! आज के बाद ये कभी जिम नही जायेगी, वर्मा से बात हुई है,कल लड़के वालों को घर बुला लिया है….सोच रहा हूँ अब इसी साल इसके भी हाथ पीले कर दूँ ।”

   बांसुरी ने अपनी माँ को देखा और उन्होनें बांसुरी को,आंखों ही आंखों में दोनो ने एक दूसरे की पीड़ा पढ़ ली।।

  ” हुआ क्या?? कुछ बताएंगे भी!!! ऐसे कैसे तुरंत हाथ पीले कर देंगे।”

   ” देखो प्रमिला,मेरा यही मानना है कि हर काम अपने समय पर हो जाना चाहिये,चाहे विद्या ग्रहण हो या पाणिग्रहण!! बहुत पढ लिख ली बांसुरी,अब इसका भी ब्याह कर दूँ तो मुझे भी चैन मिले।”

   ” मर गयी रे,ये जोड़ गठान का दर्द मुआ मेरे परान लेकर ही जायेगा…..” अपने घुटने हाथों से सहलाती बुआ जी ने घर में प्रवेश किया_” ठीके तो कह रहा है मेरा भाई,अब इत्ता सारा तो पढ़ लिख ली है,कौन सा हमें छोकरी को कलेक्टर कमिस्नर बनाना है,अब निबटो इससे भी,उमर हुई जा रही इसकी भी।”

” परनाम करते हैं जिज्जी!! छोटा मुहँ बड़ी बात हो जायेगी,पर अभी बाईस की तो हुई है और अगले हफ्ते इसका बैंक का पेपर भी है,एक बार चुन ली जाये फिर अपने पैर पे खड़ी हो जायेगी फिर निबटाते रहेंगे ब्याह।।”

” हम तुमसे पूछ नही रहे,तुम्हे बता रहे कल शाम को खाने पे बुला लिया है उन लोगों को,तुम अपना सब तैयारी ठीक-ठाक रखना।”

” जी अच्छी बात है!!” प्रमिला ने एक बार बांसुरी को देखा और रसोई में वापस चली गयी,बांसुरी भी सर झुकाये ऊपर अपने कमरे में चली गयी।।

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            **************************


   ” सांसों में बड़ी बेकरारी आंखों में कई रतजगे
कभी कही लग जाये दिल तो,कहीं फिर दिल ना लगे
अपना दिल मैं ज़रा थाम लूँ,जादू का मैं इसे नाम दूँ
जादू कर रहा है,असर चुपके चुपके …….”

    
      जिम में चलता गाना असल में राजा भैया के मन में चल रहा था,रह रह के नज़र दरवाजे पे जा कर अटक रही थी……..सब आ रहे थे जा रहे थे पर ना उसे आना था ना वो आई।।

    आखिर इन्तजार की घडियां पहाड़ बनने लगी और राजा ने बांसुरी को फ़ोन लगा दिया, पूरी रिंग बजती रही पर फ़ोन नही उठा,अब कल रात की एक एक बात किसी फिल्म की रील की तरह आंखों के सामने से गुजरने लगी।।।

     और समझ में आ गया कि बांसुरी क्यों नही आयी , उसने फोन क्यों नही उठाया।।राजा की मोटी अकल को आखिर समझ आ ही गया की बांसुरी के पापा को उन दोनों का यूँ मिलना रास नही आया, अजीब बेचैनी से राजा व्याकुल हो उठा,उसने एक बार फिर बांसुरी को फोन लगाया,इस बार थोड़ी देर में ही फ़ोन उठा लिया गया।।

” फोन क्यों नही उठा रही थी बांसुरी??”

” पापा थोड़ा गुस्से में लग रहे राजा,अब हमे जिम आने नही मिलेगा,अगले हफ्ते हमारा पेपर है,पता नही दे पाएँगे या नही?”

   दोनो अभी अपनी बातों में लगे थे कि राजा की अम्मा किसी से बात करती राजा के कमरे तक आ गयी__

” ए राजा!! देखो कौन आया है??आओ बेटा बन्टी, तुम राजा के कमरे में आराम करो हम तुम्हरा सामान ऊपरे भिजाये दे रहे।”

” जी मौसी जी।”



  राजा की मौसी का बेटा बन्टी राजा का ही हमउम्र था और पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली में रह कर नौकरी कर रहा था,वही अचानक बिना किसी पूर्वसूचना के अपना बैग टाँगे राजा के घर टपक पड़ा था।

” तुमसे बाद में बात करते हैं बांसुरी अभी मेहमान आ गये हैं,रख रहे फोन।”

राजा ने आगे बढ़ कर भाई को गले से लगा लिया__

” का हो गुरू!! एकदम दाढ़ी वाढी बढ़ाए बैठे हो, क्या हो गया ??”

” क्या बताऊँ राजा!! ब्रेक अप हो गया यार,दिमाग एकदम खराब हो गया,दिल्ली में मन नही लग रहा था साला,और मम्मी पापा के पास जाता तो शादी शादी रट लगा देते इसिलिए छुट्टी लेके यहाँ आ गया।”

” ब्रेक अप हो गया ,पर काहे,हमारा मतलब कैसे?”

” वो तो मैं बाद में बताऊंगा,पहले तुम बताओ,किससे इतना घुस घुस के बात कर रहे थे,जो मुझे और मासी को देखते ही फोन रख दिया।”

” अरे वो ?? वो कोई नही ,,बस ऐसे ही ,,तुम अपनी कहानी बताओ पहले।”

” अच्छा !! तो हमारी कहानी सुनने के बाद साहब अपनी सुनायेंगे।अबे कुछ नही रखा यार मेरी कहानी में,बस एक लड़की थी ,पसंद आ गयी थी ….

” फिर?”

” फिर क्या??फिर भाई ने प्रपोस कर दिया,और किस्मत खराब थी साला ,उसने भी एक बार में हाँ कह दी।।”

” इसमें किस्मत का क्या दोष बन्टी,ये तो अच्छा ही हुआ।”

” खाक अच्छा हुआ!!! राजा कानपुर से बाहर निकल के देखो,लोग कितना फॉरवर्ड हो गये हैं,अच्छा एक बात बताओ क्या पढ़ाई करी है मैनें?”

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” तुमने वो क्या कहते हैं …..

” हाँ हाँ बताओ बताओ,निसंकोच बोलो बे।”

” बन्टी वो इंजीनियरिंग वाली पढ़ाई…”

” हाँ वही बी टेक किया है मैनें ,एम बी ए करने वाला हूँ,अच्छी खासी नौकरी कर रहा हूँ,है की नही?”

” हाँ भाई सौ टका!!”

” अब इसके बाद सुनो ,,इतना सब करने के बाद भी मैं मैडम को गंवार लगता हूँ,कहती है तुम्हारी प्रनन्सियेशन सही नही है।।”

” क्या ??क्या सही नही है??”

” अबे उच्चारण यार!!! कहती है बेबी तुम ना सही से बोल नही पाते हो,मैनें कहा यार सेक्रेड हार्ट इंग्लिश मीडियम स्कूल से पढ़ा हूँ,कहती है_ होगा पर तुम्हारा एक्सेन्ट सही नही है,तुम ना ब्रिटिश इंग्लिश नही बोल पाते…..हिन्दुस्तानी हूँ यार अपनी इंग्लिश बोलूंगा ना भाई।।अब मैं तुझे शुरु से अपनी कहानी सुनाता हूँ ।”

” तो अभी तक क्या सुना रहे थे गुरू!!”

” दिमाग ना खराब कर भाई का यार,वर्ना नही सुनाऊंगा।”

” मजाक कर रहे थे भाई ,तुम सुनाओ यार अपनी राम कहानी।”

“जानते हो ,पहली बार कहाँ मिला उससे,,अरे वहीं यार!!!आजकल का प्रेम तीर्थ !! आज कल वही एक जगह है जहां रोज़ हजारों प्रेम कहानियाँ सुबह शुरु होती हैं और शाम होते होते खतम!! मेरी तो फिर भी तीन महीना चल गयी…..

” अबे ऐसी कौन जगह है दिल्ली में??”


“अबे दिल्ली नही ,,,,फेसबुक पे!! बन्दी ने ऐसी ऐसी खूबसूरत फोटो डाल रखी थी कि बस पूछ मत भाई!!! भाई बहक गया,,मैनें फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी उसने मान ली ,,गप्पे शप्पे शुरु हो गयी…..अब तो बन्दी  रोज़ नया प्रोफाइल पिक लगाये ,कभी लेफ्ट से कभी राईट से ,कभी सामने से,ऊपर से ,नीचे से…मतलब ये की फोटो देख देख के ही मैनें तो यार बच्चों के नाम तक सोच लिये,फिर एक दिन धीरे से प्रपोज़ भी कर दिया,उसने झट मान भी लिया,फिर मैनें मिलने को बुलाया,तब नखरे चालू हुए।।फिर भी आखिर मान गयी…..अच्छा उसके ऊपर भी पहली डेट कैसी होनी चाहिये पर भी घुमा फिरा के खूब क्लास ले ली मेरी,कहती है __ ‘मेरी हर फ्रेंड को उसके बी एफ ने पहली मुलाकात में कोई ना कोई गिफ्ट दिया है,जैसे टॉमी हाईफ्लायर की वॉच या रिंग..लायक दैट यू नो!!’ अब मैं इतना भी नासमझ नही हूँ यार एक सोने की अँगूठी खरीद के ले गया।”

” फिर क्या हुआ??”

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” फिर क्या ,जब मैं वहाँ पहुँचा और उसकी शकल देखी!!! कसम से भाई ,दिल का दौरा आते आते बचा,,भगवान बेड़ा गर्क करे इन चीनियों का ऐसे ऐसे फोन बनाये है ना,ओपो-विवो कि साला इस मोबाईल से अपनी ही फोटो खींच के बंदा ना पहचान पाये,जन्मजात कोयला भी इनमें फिरंगी लगे।। खैर मैनें अपना दिल सम्भाला और जाकर बैठ गया,अब उसके आत्मविश्वास की इन्तेहा देखो,पूछती है__ कैसी लग रही हूँ मैं? मैनें कहा_ तुम हूर हो परी हो, इस दिल्ली की नही लगती,शिमला मसूरी हो। मेरे इस भद्दे जोक पे भी हंसने लगी ,कहती है _ शुक्रिया !! खैर अँगूठी ले आया था तो मैनें निकाल लिया देने के लिये, कहती है __ omg ridiculous! तुम गोल्ड रिंग लाये हो ,मैं तो सिर्फ diamonds पहनती हूँ,,फिर सोच क्या हुआ।।”

” ब्रेकअप??”

” नही यार!! इतना झल्ला भी नही है तेरा भाई ,, बहुत सबर है भाई में….दिल में  तो आवाज़ उठी कि जाहिल औरत किसी भी एंगल से तू डायमन्ड के लायक नही लगती पर ऊपर से मैनें कहा__ चलो बेबी शॉपिंग चलतें हैं,ले लेना अपनी पसंद का कुछ!!
    अब भाई मैं तो उसे ‘ शाह जी’ ,’ अनोपचंद तिलोकचंद’ टिकाने वाला था,कम्बख्त ‘ गीतांजली’ ले गयी यार!!! पूरे बहत्तर हज़ार खरचे तब जाके मैडम के चेहरे पे स्माइल आयी।।
    फिर पूरा दिन घुमाती रही ,कभी यहाँ कभी वहाँ, शाम को जब उसे घर छोड़ने गया,तो मैने बाय बाय के साथ सोचा एक छोटी सी किस ले लूं,कहती है __ नो बेबी !! ये सब शादी के बाद!! मैनें कहा हमारे यहाँ भी गहने शादी में ही चढाये जाते हैं ।।पर मेरा ये खून्खार जोक भी उस नामुराद के पल्ले ना पड़ा ।।
    फिर तो बस सिलसिला ही चल निकला,हर वीकएंड पे शॉपिंग मूवी डिनर!! अब यार इतना भी नही कमा रहा था तेरा भाई!!!

” तो इस बात पे ब्रेकअप हुआ।”

” अबे नही यार!! इतना सब कर के देने के बाद मैडम को ये समझ आया की मैं केयरलेस हूँ मैं उससे रीलेटेड महत्वपूर्ण तारीखें भूल जाता हूँ,जैसे उसके कुत्ते का जन्मदिन, उसकी फुफी की शादी की सालगिरह,हम पहली बार कब एफ बी पे दोस्त बने, इसी तरह के कई बिल्कुल ही भुला देने योग्य तारीखों को कैसे कोई याद रखे।।कहने लगी_ ” तुम मुझसे सच्चा प्यार नही करते,तुम बस मेरी खूबसूरती से प्यार करते हो।।” माँ कसम भाई कलेजा मुहँ को आ गया,जी मे आया चिल्ला चिल्ला के कहूं __ कम्बख्त किसी अच्छे आंखों के डॉक्टर से इलाज करा अपना।।पर मैं फिर ज़ब्त कर गया।।फिर उसकी लाईफ मे आ गया एक एन आर आई बंदा!! बिल्कुल फिल्मी स्टाइल में!! उसके पापा के दोस्त का लड़का !! और भाई विदेशियों ने सदियों हम हिन्दुसतानीयों पे राज किया ही है,वही हुआ ।।मैडम भी उड़ गयी सात समंदर पार,और तेरा भाई पी पिला के गम गलत करने लगा।।”

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” अरे दारु की लत लगा ली तुमने गुरू।”

” अबे दारु की लत लगाये मेरे दुश्मन।।दारु तो बेटा ऐसा है कि भाई के खून में घुली है,इन्जीनियरिंग फर्स्ट ईयर में रैगिंग में कमीने सीनियर्स ने जब पहली बार पिलायी,हमने फुल एक्टींग करी जैसे हमे बिल्कुल नही जन्ची ।।उन्होनें और पिलायी,हमने भी खूब ढकोल के पिया,,तो दारु तो अब ऐसा है कि चढ़नी ही बन्द हो गयी बे।।हम तो चाय पीने पिलाने की लत की बात कर रहे थे।।
    तो बेटा इस तरह हमारी प्रेम कथा शुरु हुई और अपने अंजाम तक पहुंच भी गयी अब तुम बताओ,ये तुम्हारा क्या चक्कर चल रहा है।”

” क्या बताएँ बन्टी,हमारा ऐसा कुछ चलने लायक चल ही नही रहा!! एक लड़की है बांसुरी!! पहले हमारी दोस्त बनी, धीरे धीरे अच्छी लगने लगी…अब तो यार आदत सी पड़ गयी है उसकी,पर हमने पहले ही उसे कह दिया कि अम्मा से पूछ कर ही आगे कदम बढ़ाना है।”

” तो मान गयी मासी जी।”

” अबे कहाँ यार!! अम्मा तो अलगे राग छेड़े बैठी हैं सरजूपारी है तो ब्याह नही हो सकता।।”

” अरे तो सरजूपारी भी तो ब्राम्हण ही है,यहाँ तो हमारे पिता श्री ने हमारा नाम ही अजीब रख दिया __ ‘ रविवर्मा’ इसिलिए बन्टी नाम चलाते हैं ।।कोई बहुत फेमस पेंटर बाबू थे रवि वर्मा साहब!! तुम्हारे कला पारखी मौसा जी यानी मेरे पिताजी को और कोई नाम नही मिला…..पहले पहले तो मुझे कॉलेज में सब वर्मा समझते थे फिर जब पूरा नाम बताया तो खासा मजाक भी बन गया__ रविवर्मा उपाध्याय!!!
हां तो बेटा आगे क्या हुआ?”

” क्या होना था? कुच्छो नही हुआ,ना हो पायेगा,,हम सोच रहे अम्मा के एकदम पैर पकड़ लेते हैं,क्या बोलते हो तुम?”

” क्यों लड़की वाले तैयार बैठे हैं क्या?”



” अबे कहाँ यार!! पहले अम्मा तो तैयार हो जायें ।”

” और अम्मा के तैयार होने के बाद कहीं लड़की वाले मुकर गये तब,क्या करोगे।”

” ये तो सोचे ही नही भाई”

” हमारी मानो तो एक बार लड़की के घर वालों से मिल आओ!! अपने मन की बात बता दो उन्हें,,फिर वो लोग मां गये तो अम्मा तो यार मान ही जायेंगी, आत्महत्या की धमकी चमकी दे डालना और क्या।”

” हम्म!! तो मतलब हम पहले बांसुरी के घर वालों से मिल लें और बात कर लें ।”

” बिल्कुल!! और किसी तरह जुगत लगा के दोनो घर की औरतों की मीटिंग करा दो,किसी मन्दिर में!! घर की औरतें तैयार हो जायें ना तो आदमियों को मानना ही पड़ता है बंधु ।”

” बात तो पते की बोले हो बन्टी भाई ,तो फिर निकलते हैं हम बांसुरी के घर के लिये,तुम अपनी तलब मिटाओ चाय पीकर!!”

” अबे रुको यार!! बड़ी हडबडी में हो क्या बात है?? चाय पीकर मैं भी चले चलता हूँ,,देखूँ तो ज़रा कौन सी बांसुरी बजा रहे हो तुम।”


        **************************


            मेरी हर मन मानी बस तुम तक                         बातें बचकानी बस तुम तक
           मेरी नज़र दीवानी बस तुम तक
तुम तक तुम तक।।

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    दोनो भाई चाय खतम कर बाँसुरी के घर की ओर निकल चले।।

   ” क्या बात है राजा!!! तुम तो बेटा सच में प्यार में पड़ गये हो जभी रान्झणा के गाने सुन रहे हो।”

” क्यों ज़रूरी है प्यार में पड़ने पर रान्झणा के गाने ही सुने जाये।।”

” नही बिल्कुल नही!! मैं तो ब्रेकअप के बाद ‘ लम्बी जुदाई’ सुनने लगा तो एक दोस्त ने कहा ,कौन से जमाने में जी रहे हो यार,मैने कही क्यों__ तो कहता है आजकल लड़कियाँ ब्रेकअप के बाद दिल पे पत्थर रख के मुहँ पे मेक’प कर लेती हैं,और तुम्हारा बावरा मन जाने क्या चाह रहा,सम्भालो यार खुद को।मैनें संभाल लिया और तबसे जस्टिन बीबर सुनने लगा।।”

” वो क्या गाता है गुरू??”

” पता नही भाई!! मैं तो फैशन के मारे सुनता हूं, लोगो को भले गाने का एक शब्द ना समझ आये पर बनेंगे ऐसे जैसे बहुत बड़े अन्ग्रेजी संगीत के ज्ञाता हो,  आस पास इम्प्रेशन मारने एक आध गाना पता होना चाहिये ना।”

   कुछ देर पहले अपने दिल से दुखी राजा के मन का कुहासा बन्टी की बातों से छन्ट गया,अपनी पूरी ऊर्जा के साथ वो गाड़ी भगाता अगले ही पल बांसुरी के दरवाजे खड़ा था।।

   दरवाजे को प्रमिला ने खोला,और पूरे आदर के साथ दोनो लड़कों को अन्दर बिठाया।।।

    अपने पापा के ऑफिस निकलते ही माँ बेटी में सारी बातें हो चुकी थी,बांसुरी ने पापा की नाराजगी का कारण माँ को बता ही दिया था,प्रमिला को वैसे भी पहले से ही राजा पसंद था पर पति की खिलाफत करने की उस भारतीय नारी ने आज तक।कल्पना भी नही की थी,इसीसे अपनी सोच में गुम प्रमिला ने बांसुरी को आवाज़ लगाई।।
    इस वक्त पे माँ और बेटी दोनो यही चाहती थी की कोई भी बाहरी व्यक्ति ना आये और वो लोग राजा के साथ बैठ कर आगे क्या करना है कैसे करना है कि रूपरेखा पर चर्चा कर सकें….पर भगवान को भी कभी कभी अपने प्रियजनों से हँसी मजाक करने का मन करता है इसिलिए वो बुआ जी जैसे लोगों की सृष्टि करतें हैं ।।

    बांसुरी अपने कमरे से उतर कर आयी ही थी कि दरवाजे को भड़भड़ाती बुआ जी का आगमन हुआ।।

” अरे कौन मेहमान बैठे हैं परमिला?”

  बुआ जी का अक्समात आगमन सभी को चकित कर गया।।

“राधेश्याम जी गैस वाले हैं ना,, उन्ही के लड़कें हैं जिज्जी राजकुमार!! “

” हाँ हाँ!! मिले रहे उस दिन !! याद आ गया । औ बेटा कहो कैसन आना हुआ,सब कुसल मंगल घर में,कभी ऐसने अपन अम्मा को भी ले के आओ, अवस्थीन का भी चरन धूलि पड़े घर मा, ये कौन लड़का है जो साथ मे बैठा है।।”

” प्रणाम बुआ जी,ये हमारे भाई हैं मौसी के लड़के _ रविवर्मा नाम है।”

” हैं,तुम्हरी मौसी का सादी(शादी) वर्मा में हुआ रहा का,कायस्थों को ब्याह दिये लड़की।”

” नही नही बुआ जी इनका नाम ही रविवर्मा है सरनेम उपाध्याय लिखते हैं ।”



” तो बेटा तुम ऐसा उजबक नाम काहे रक्खे।”

” बुआ जी अब क्या बताएँ,ऐसे ही उटपटांग शौक हैं हमारे।”

  बुआ जी ने बहुत ही बुरा सा मुहँ बना के मुहँ फेर लिया __” परमिला चाय वाय पिलाओगी कि खुदै आके बना लें।।”
    वापस मुहँ घुमा के बन्टी से पूछा__” पढ़ते लिखते भी हो कुछ??”

” जी दिल्ली में नौकरी करते हैं ।”

नौकरी की बात सुनते ही बुआ जी की आंखों में चमक आ गयी,उन्हें बांसुरी के लिये घर बैठे चमचमाता रिश्ता दिखने लगा।।
” अरे वाह बचुआ!! कितना नोट कमा लेते हो ।।”

” बस बुआ जी आपके आशीर्वाद से अस्सी हज़ार महीना बना लेते हैं ।”

  बन्टी भी बुआ जी की गिद्ध दृष्टी को ताड़ चुका था इसिलिए वो भी मज़े लेने लगा

” और कौन कौन है घर में,मतलब भाई बहन ,दादी चाचा??”

” बस हम ,मम्मी और पापा!! इकलौते हैं ।।”

बुआ जी के चेहरे पे बिल्कुल ऐसे भाव थे जैसे कई दिनो से खिचड़ी का पथ्य सेवन करते पीलिया के रोगी के सामने छप्पन व्यंजनों से सजी थाल परोस दी गयी हो।।हर एंगल से देखने पर भी इस सजीले नौजवान मे उन्हें कोई कमी नज़र नही आयी।।

   वो अभी अपनी बात आगे बढ़ाती कि राजा ने अपनी बात कहनी शुरु की__

  ” बुआ जी ,हमें जादा घुमा फिरा के कहने की आदत तो है नही,हम साफ साफ ही कहेंगे।”

  अभी तो बस मन में आया था कि इस दिल्ली वाले से बात चलाऊँ और ये राजा समझ भी गया,जो दहेज की बात शुरु कर रहा,बुआ जी ऐसा सोच ही रही थी कि राजा ने विस्फोट कर दिया__

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” हम बांसुरी से शादी करना चाहते हैं ।”

प्रमिला और बांसुरी चुप बैठे रहे पर बुआ जी पर जैसे बिजली सी गिरी

” हैं!! क्या करना चाहते हो??”

” शादी करना चाहतें हैं बांसुरी से।”

बुआ जी कभी राजा को कभी बांसुरी को देखने लगी, उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास ही नही आ रहा था,जिस छोरी को उसके सांवले रंग के लिये आज तक वो माफ नही कर पाई थी आज उसके लिये साक्षात रामरतन पंचाग के श्री राम की छवि सा सुन्दर लड़का बाहें पसारे खड़ा था।
     बोलो इसे कहतें है किस्मत!! है क्या इस छोकरी मे,भले ही अपने सगे भाई की बेटी है पर ना रूप ना रंग,पर इसे ही किस्मत कहते हैं ।।
      बुआ जी को अपने रूप रंग पे इस बुढऊती आने तक भी नाज़ था,उनके अनुसार उनकी शादी किसी कलेक्टर से होनी थी ,वो तो कंजूस भाई ने दहेज बचाने को ऐसी सुन्दर गुलाब की कलि को एक अदना से क्लर्क से ब्याह दिया।।
        अपने सारे भावों को समेट कर उन्होनें राजा से पूछा __” काहे राजा बाबू तुम्हरे घर सब तैयार है का?

” नही अभी तो नही,पर हो जायेंगे।।”

” पर बेटा तुम ठहरे कान्यकुब्ज,हम सरजूपारी !! बडी मुस्किल आयेगी।।

बुआ जी की बात पर बन्टी उचक पड़ा __” बुआ जी मुश्किल सलटाने के लिये आप हैं ना,,देखिए बुआ जी,अब आपको ही तारणहार बन कर इन दोनो की नैया को पार लगाना पड़ेगा,,चाहे जो हो जाये।”

” हम !! हम ठहरे अनपढ़ ,तुम पढ़ो लिखो के बीच हम का बोलेंगे बेटा ।।”

” अरे बुआ जी खुद को कम ना समझिये!!! आप जितनी सुन्दर है उससे कहीं ज्यादा आप सुलझी हुई और समझदार लगती हैं हमे।।

” कह तो ठीके रहे हो बेटा पर बांसुरी का बाप भी कम ज़ीद्दी नही है,बचपन से अपने छोटे होने का फायदा उठाता रहा है,और आज तक उठा रहा है,एक बार उसने कह दी फिर कोई उसकी बात नही काट सकता।।”

” वो बाद में निबटाएंगे बुआजी,पहले ऐसा किजीये ना एक बार आप और आंटी जी चल कर राजा की अम्मा यानी हमारी मौसी से मिल लेते,देखिए शादी ब्याह तो असल में घर की औरतों को ही तय करना होता है,,है ना…जब घर में दामाद आता है सेवा जतन कौन करता है सास!!! बहू जब ससुराल जाती है,किसके साथ सबसे अधिक समय बिताती है,सास के साथ ना!! दोनों तरफ ही औरतों को ही सब बखेड़ा देखना समझना है तो सही यही रहेगा की एक बार आप लोग आपस में मिल लो,, फिर यदि आप लोगों को सही ना लगे तो ना करना दोनो का ब्याह।।

” ठीक है बेटा तो यहाँ लेते आओ अपनी मौसी को भी।”

” नही बुआ जी घर पर नही,,कल घाट वाले शिव मन्दिर पर आप दोनों आ जाईये बाँसुरी को लेकर, हम दोनों आ जायेंगे मौसी जी को लेकर।।पूरी बात वहीं तय कर लेंगे,,एक बार आप लोगों का मन मिल जाये,फिर तो जय शिव शंभू!!भोलेनाथ चाहेंगे तो भाई की बारात मे नागिन डांस करने के बाद ही अब दिल्ली जाऊँगा।।”

  बन्टी की बात पर सभी खिलखिला उठे….प्रमिला हँसते हुए मिठाई लेने अन्दर चली गयी और राजा और बन्टी वापस जाने उठ खड़े हुए।।

   बांसुरी दोनों को दरवाजे तक छोड़ने आयी।।मुस्कुराती हुई दरवाजे को पकड़ी खड़ी बांसुरी को देख राजा ने पूछा __

   ” क्या हो गया!! बहुत मुस्कुरा रही हो।”

   ” हम्म बना दिया ना अपने जैसा,कहाँ हम सोचते थे तुम्हें पढना लिखना सीखा देंगे उल्टा तुमने ही हमे हमारी पढ़ाई से दूर कर दिया।।”

” ऐसे काहे बोल रही हो,हमने कब मना किया पढ़ने से।।”

” जब दिमाग से बाहर जाओगे तब तो पढ़ पायेंगे, अगले हफ्ते पेपर है हमारा,सेलेक्शन हो गया तो एक महीना ट्रेनिंग करने बाहर चले जायेंगे यहाँ से।”

” ओह हो एक मिनट ,ये नया पेंच क्या है भाई!! बांसुरी नौकरी भी करने की सोच रही हो क्या!! लगता है राजा ने तुम्हें बताया नही,मैं बता देता हूँ,हमारी मौसी जी औरतों की नौकरी के तो सख्त खिलाफ हैं,तो कल जब मन्दिर आना अपनी पढ़ाई नौकरी पेपर इत्यादी से सम्बंधित कोई चर्चा वहाँ ना करना,वर्ना बनती बात बिगड़ जायेगी।।
    यार देखो !! तुम लोग ना धीरे धीरे घर में विस्फोट करो,ऐसा ना कर देना कि सब घनघोर विरोधी हो जायें तुम्हारे।”

” अच्छी बात है रविवर्मा जी,हम कल कुछ नही कहेंगे।।” बांसुरी और राजा फिर मुस्कुराने लगे।

” बना लो बेटा!! मेरे नाम का तुम भी मजाक बना लो, पर यही नाम तुम दोनो के शादी के कार्ड मे शुभाकांक्षी में छपने वाला है,समझे।।”

” समझ गये गुरदेव,चलें अब।।

       मैं ना मांगूंगा धूप धीमी धीमी……
              मैं ना मांगू चाँदनी
     मेरे जीने में तुझसे हो इश्क दी चाशनी।।

  दोनों भाई गाड़ी में गाने को ट्यून करते हँसते मुस्कुराते घर की ओर चल पड़े ।।

क्रमशः

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aparna…

















    



 

कुछ खुरापातें…

She posted a ‘roti aloo ki sbji and dal ki thali ” photo on her wall and wrote …

Friday lunch….

खुरापाती ख्याल आया कि लिख दूँ

–चल finally तुझे खाना तो मिला।

पर मन की मन में रह गयी,नही लिख पायी, संस्कार बहुत है न मुझमें।

Next day she again posted her photo and wrote .. gain half kg after eating my favorite panipuri…

एक और खुरापात आई दिमाग में …

अच्छा हुआ बहन कुछ तो गेन किया वरना जिस ढंग से तू डाइट कर के पतली हो रही है, यूनेस्को वाले तुझे देख हमारे यहाँ अकाल न घोषित कर दें।

पर कह नही पायी क्योंकि संस्कार बहुत है ना मुझमें।

शादी.कॉम-14

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       फेरे पड़ गये,,भान्वर हो गई….वर वधु ने पण्डित जी का आशीर्वाद लिया और अपने गृहस्थ जीवन के शुरुवाती सोपान पर कदम रख दिया।।

     ब्याह निपटने के बाद मन्दिर से नीचे उतर के सभी विमर्श में जुटे कि अब आगे क्या किया जाये।।
  लड़कों का कहना था कि लल्लन के घर जाया जाये,परन्तु अब तक अँग्रेजो के खिलाफ लड़ने वाले क्रान्तिकारियों सी धमक दिखाने वाला लल्लन अब एकदम ही सहमी भीगी बिल्ली बना बैठा था,अब रह रह के उसको गुस्से में चीखते हाँफते अपने बाऊजी और रोती मिमियाती अपनी माँ का करुण चेहरा दिख रहा था,उसकी घर जाने की बिल्कुल हिम्मत नही हो रही थी,उसने प्रस्ताव रखा __

” हम सोच रहे लखनऊ निकल जाते हैं,दो दिन बाद वैसे भी हमारी जॉईनिन्ग है,अम्मा को कह देंगे प्रिंस के साथ कमरा खोजने और बाकी काम निपटाने आये हैं,और अब जॉईनिंग के बाद ही वापस आयेंगे।”

” और बाद में का कहोगे लल्लन?”

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” बाद में कह देंगे काम बहुते जादा है अम्मा,कुछ समय बाद ही घर आ पाएँगे।।”

” कानपुर लखनऊ में दूरी ही कित्ता है,जैसे मथुरा की लड़की वृंदावन ब्याही,बस वैसा ही।।।तुम नही गये तो तुम्हारी अम्मा आ जायेगी तो,तब का करोगे??”

प्रिंस के इस विचारणीय प्रश्न पर सभी सोच में पड़ गये।।

” हमें तो लगता है,लल्लन और रेखा तुम लोग पहले जाओ राजा के घर ,वहाँ सब का आशीर्वाद लो और वहाँ से युवराज भैय्या को साथ लेकर लल्लन के घर जाना,,बड़े भैय्या को सभी मानते हैं,वो जायेंगे तो लल्लन के घर भी कोई परेशानी नही होगी,क्यों ठीक बोले ना राजा।।”

बांसुरी के इस आइडिया पर राजा ने भी हामी भर दी

” ई पनौती फिर बोली,,ई जब जब अपना आइडिया देती है तब तब कोनो का बंटाधार होता है,लिखवा लो हमसे प्रिंस।” प्रेम फुसफुसाया

” अबकी ना होगा,,सही बोल रई बांसुरी!! लल्लन राजा भईया के साथ निकल लो गुरू,अब जादा सोच बिचार में ना पड़ो ।।”

बहुत सारी हिम्मत जुटा के लल्लन रेखा के साथ राजा के घर को निकला,राजा ने बांसुरी को भी साथ ले लिया,प्रिंस और प्रेम पीछे अपनी फटफटी फटफटाते चले आये।।

घर पे पहले ही रूपा के बाऊजी पधारे हुए थे,उनकी अगुआनी में रूपा ऊपर नीचे हो रही थी,तभी दरवाजा खोल के राजा अन्दर आया,आते ही दुबारा उसने भाभी के पिता को चरण स्पर्श किया,और एक कोने में खड़ा हो गया।।

” काहे लल्ला जी,रेखा कहाँ रह गई,आई नई आपके साथ।” रूपा की बात खत्म होते होते बन्सी भी अन्दर आ कर खड़ी हो गई

” अरे इसे ही तो सजाने गई रही,ये यहाँ खड़ी है तो रेखा कहाँ है भई ।।”

रूपा की पृश्नवाचक निगाहों को बांसुरी ने दरवाजे की तरफ घुमवा दिया,दरवाजे से बहुत धीमे से रेखा और उसके पीछे लल्लन आकर अन्दर खड़े हो गये।।

   कई सारे टी वी सीरियल और फिल्मों में नायक नायिका के भाग के शादी करने वाले सीन देख चुकी रुपा ने जब रेखा को फूलों की लम्बी वरमाला पहने और माथे पे पीला सिन्दूर लगाये देखा तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गई।।।आज तक अपनी सास के सामने अपने खानदानी होने और संस्कारी होने की बड़ी बड़ी डीँगे हाँकने वाली रूपा का मुहँ रुआंसा हो गया।।

” रेखा!!!” बस इतना बोल कर अपने सर को पकड़े रूपा धम्म से नीचे गिर पड़ी,हालांकि इस गिरने में बराबर चोट ना लगे इस बात का ध्यान रखा गया, सोफे पर पसरने के बाद रूपा ने आंखे पलट दी,, आसपास के सभी लोग दौड़ पड़े,राजा की दादी जिनका दीवान खाने में एक ओर पर्मानेंट अड्डा था, घबरा कर चीखी__ ” अरे दांत ना जुड़ जई,देखो रे “

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  राजा की अम्मा और शन्नो मौसी पानी की कटोरी लिये दौडे ,जल्दी जल्दी रूपा की तीमारदारी मे लगी, घर की मुहँ लगी नौकरानी अपने राग मे थी __ ” अम्मा जी जूता सूंघा दौ,अब्भी उठ बैठेगी बहुरिया।”

” अरे मुह्नजली!! इन्ने मिर्गी ना आई है जो जूतो सूंघाने बोल रई,चकरा गई है तनिक, अभी पानी का छींटा से ठीक हो जायेगी।”

बेहोश पड़ी रूपा के कानों में जब जूता सून्घाने की बात पड़ी तो वो घबरा के थोड़ा कसमसाई पर दादी की बात कान में पड़ते ही उसे संतोष हुआ कि जूता नही सुन्घाया जायेगा,और वो फिर चित पड़ी रही।

इधर रूपा के पिता का बी पी रेखा के नये नवेले दूल्हे को देख बढ़ ही रहा था कि रूपा अचानक चक्कर खा गई,वो बेचारे जब तक कुछ समझ पाते ,समधन अपनी पायल चूड़ी बजाती दौड़ी चली आई और वो बेचारे रिश्ते के सम्मान के मारे एक किनारे खड़े रह गये,उतनी ही देर में घर के बड़े लड़के युवराज का पदार्पण हुआ।।
    अपने कमरे में आये दिन रूपा की ऐसी नौटंकी से परिचित युवराज ने आगे बढ़ कर रूपा की नब्ज थाम ली __
      ” अरे नब्ज तो बड़ी धीमी हो गई है,राजा वो क्या नाम है तुम्हारी डॉक्टर सहेली का?? हाँ रानी,ज़रा फ़ोन घुमाओ उसे,कहना बड़ा वाला विटामिन का इन्जेक्शन लेती आये,,इन्हें सुई ही लगवानी पड़ेगी।”

राजा को बड़े भैय्या की बात समझ नही आई,वो तुरंत अपनी जीन्स से मोबाइल निकालने लगा, उसका हाथ पकड़ बन्सी ने इशारे से उसे फोन करने से मना कर दिया,अपने पति की सुई वाली बात सुन रूपा को भी होश आने लगा,उसने धीरे से अपनी आंखें खोल दी__” कहाँ हैं हम?” हमेशा फिल्मों में होश मे आने के बाद नायिका द्वारा बोला जाने वाला पहला डायलॉग बोल कर आंखे फाड़ रूपा युवराज को देखने लगी,तभी उसे रेखा और लल्लन याद आ गये,और वो अपने पूरे फेफड़े फाड़ के दम लगा के चिल्ला के रो पड़ी ।।

  पूरे घर मे हाहाकार मच गया,ये ऐसा समय था जब लल्लन को अपने किये पे दिल से अफसोस होने लगा,उसे वहाँ से निकल भागने की राह नही सूझ रही  थी,जो महिला जैसे सुना सकती थी,वैसे सुना रही थी,चाहे राजा की दादी हो या रूपा,यहां तक की शन्नो मौसी को भी मौका मिल गया था,वो भी पानी  पी पीकर आज के नौ जवान छोकरे छोकरियों की विवाह प्रगती पे अपने विचार प्रकट कर रही थी,

” एक हमारा समय था,शकल सूरत तक ना देखी शादी होने तक,और एक आजकल के लड़के लड़कियाँ हैं,हद बद्तमीज़ी है।।”

” ठीके रहा तुम्हरे समय सकल ना देखे बनी ,नही तुम्हे कौन ब्याह  ले जाता सन्नो??” राजा की दादी के कथन पर शन्नो मौसी का पारा और चढ़ गया,सब नाराज थे,पर एक कोई ऐसी भी थी वहाँ जिसके मन में लड्डू फूट रहे थे!!!

   राजा की अम्मा थी जो बार बार रूपा को ना रोने और जो हुआ उससे समझौता करने की सीख दे रही थी,आखिर थक कर वो वहाँ से उठी और चुपके से अन्दर खिसक गई,दस मिनट बाद एक हाथ में पूजा की थाली और दूसरे हाथ में मिठाई का थाल उठाये राजा की अम्मा वापस आयी।।बांसुरी ने आगे बढ़कर उनके हाथ से एक थाल ले लिया।।
   रेखा रूपा के पैरों के पास उसे मनाने मे लगी थी,युवराज और राजा वकील बाबु को समझा रहे थे, दादी और शन्नो मौसी अपने राग दरबारी मे व्यस्त थे, वहीं प्रिंस और प्रेम में से एक दादी का तो एक मौसी का पक्ष ले आग मे घी डालने का काम कर रहे थे, इस पूरे सीन से विलग लल्लन एक किनारे खड़े खड़े अपने घर पे मिलने वाले सत्कार के बारे मे सोच सोच परेशान हुआ जा रहा था,,,उसे आज तक का अपना पूरा जीवन अपने सामने रील सा चलता दिख रहा था, बचपन में माँ को सताना,बाऊजी का मार मार के गिनती पहाड़ा रट्वाना,बड़े भईया की जेब से चुराये पैसों से पहली सिगरेट खरीद कर पीना,हर राखी पे दीदी के लिये कैसे भी कर के गिफ्ट खरीदना,इत्ती सारी खुशनुमा यादों को उसने खुद अपने हाथों कुएं में बहा दिया था,एकाएक उसे अपना निर्णय जल्दबाजी में किया गया फैसला लगने लगा था, पर अब समय उसके हाथ से रेत सा फिसल चुका था,वो अभी अपनी उधेड़बुन मे था कि राजा की अम्मा पूजा की थाली लिये आई ।।
     बाँसुरी ने आगे बढ़ दीवार से लग कर खड़े लल्लन को हाथ पकड़ कर आगे खींच लिया और रेखा के बाजू में बिठा दिया,अम्मा ने आगे बढ कर नवयुगल का तिलक किया और आरती उतारी,मुहँ मीठा करा दिया।।

    गुस्से मे बडबड करती रूपा रोती धोती अपने कमरे में चली गई,,युवराज ने लल्लन को बैठा कर उसके घर परिवार नौकरी चाकरी का हिसाब लेना शुरु किया,पढ़ाई लिखाई बताने के बाद जैसे ही लल्लन ने अपनी ताजा ताजा लगी सरकारी नौकरी का जिक्र किया,वहाँ उपस्थित सभी के चेहरों पर अलग अलग तरह की प्रतिक्रिया दिखने लगी,औरतों की खुसफुसाहत कुछ और मुखर हुई,वकील बाबु के चेहरे पर भी सन्तोष की झलक आ ही रही थी कि राजा के बाऊजी भी पिछले दालान से निकल बाहर आये,और आते ही उन्होनें अपना सबसे प्रिय सवाल छेड़ दिया__

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       ” किसके लड़के हो वैसे तुम,हमार मतलब कौन जात हो??”

   ” इरिगेशन में हमारे बाऊजी आफीसर है,बाबुलाल सूर्यवंशी।।”

लल्लन का ये वाक्य वकील बाबू के सीने मे घूंसे के समान लगा,उस समय उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी ने हाथ अन्दर डाल उनके फेफडों को जोर से मसल दिया हो,ऐसी प्राणान्तक पीड़ा मिली वो भी समधि के घर जहां ना वो खुल कर बोल पा रहे थे,और ना चिल्ला पा रहे थे।।आज तक वकील बाबू के लिये उनकी वकालत सबसे ऊपर थी,पर अदृश्य और अपरोक्ष रूप से उनकी वकालत के उपर था उनका ‘ ब्राम्हणत्व ‘।
     उन्हें सदा ही लगता आया था कि वो स्वयं ब्रम्हा की संतान हैं,इसीसे और कोई माने ना माने उन्होनें खुद को समाज में सबसे ऊपर स्थापित कर रखा था, उनके अनुसार उनके नीचे आने वाली हर जाति के लिये विभिन्न कार्य बनाये गये थे,और वो बने थे सबसे ऊपर बैठ कर सबके कार्यों का निर्धारण करने के लिये।।
      हालांकि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उनकी सोच और उनका स्थान बिल्कुल उलट हो चुका था,पर इसके बावजूद वो तन मन से इस नई व्यवस्था के खिलाफ थे,वो खिलाफ थे अन्तर्जातीय विवाह के।।उन्होनें अपने बच्चों के मन की मिट्टी को  भी सदा से जाति पाति के जटिल खाद और पानी से ही सींचा था,पर जाने कैसे ये कुलबोरनी अपने सारे संस्कार गंगा जी में बहाये आयी।अभी उनके हाथ में दुनाली होती तो ये नये नवेले जोड़े को सीधा परलोक पहुंचा देते पर एक तो समधि का घर दुजा वो मन ही मन युवराज का भी थोड़ा अधिक ही लिहाज करते थे,उनकी नज़र में उनकी जिंदगी भर की असली कमाई उनका दामाद युवराज ही था,लड़के तो शादी के बाद अपनी अपनी घर गिरस्ती में लीन थे,बस यही एक हीरा था जिसकी चमक से उन्होनें अपने तन मन को रोशन कर रखा था।।

   अपनी मर्मांतक पीड़ा को दबाते हुए उन्होनें बड़े कष्ट से युवराज को अपने पास बुलाया और तुरंत घर निकलने की इच्छा जाहिर की।।
      अपने श्वसुर के कट्टर स्वभाव से परिचित युवराज ने उनकी मंशा जानते ही राजा को गाड़ी निकालने का आदेश दिया और बैठ कर उन्हें सरकारी नौकरी के फायदे गिनाने लगा।।पर पल पल बदलते ससुर के चेहरे के रंगों का कुछ असाधारण होना युवराज को खटक रहा था कि वकील बाबू ने अपना सीना अपने हाथों सा पकड़ लिया__” क्या हुआ बाऊजी,कुछ तकलीफ है क्या??”

” हाँ,,कुंवर जी,लग रहा जैसे कोई कलेजा मरोडे दे रहा।।”
    बोलते बोलते ही वकील बाबू दर्द से कुम्हला कर एक ओर को झटक गये।

   युवराज और राजा ने आनन फानन उन्हें उठाया और बाहर गाड़ी में डाल तुरंत अस्पताल को दौड़ चले।। रूपा ने जैसे ही सुना की उसके बाऊजी को अस्पताल ले जाना पड़ा वो और हाथ नचा नचा के रेखा को सुनाने लगी_

  ” और कर लो लब मैरिज,अब पड़ गई कलेजे को ठंडक!! इत्ते में मत रुकना,बाऊजी को मार के ही दम लेना तुम,,कहे दे रहे रेखा ,आज के बाद हमे अपनी सकल ना दिखाना ,समझी।”

बहुत देर से चुप चाप खड़ी रेखा के लिये भी अब सब कुछ असहनीय हो गया,आखिर वो भी बिफर पड़ी

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” अरे शादी ही तो किये हैं,अपनी मर्ज़ी से कर लिये तो इतनी हाय तौबा काहे मचा रहे सब,और सुन लो दीदी बाऊजी भी अच्छे हो जायेंगे,तुम्हे ज्यादा चिंता करने की ज़रूरत नही है।” रेखा वहाँ से लल्लन का हाथ पकड़े बाहर निकली ही थी कि रूपा ने उसे रोक दिया__” कोई ज़रूरत नही तुम्हे अस्पताल जाने की।

” अरे अभी बखत नही है तुम दोनो का बिल्ली बन लड़ने का ,जल्दी अस्पताल चलो!! देखें वहाँ बकील बाबू को हुआ का है,भोले भंडारी रक्षा करे उनकी, समधन को भी खबर करना होगा।।”
  सबके सब बाहर निकले,प्रिंस और प्रेम अपनी बाईक में पहले ही राजा भईया की गाड़ी के पीछे निकल चुके थे,राजा के बाऊजी राजा लोगों के साथ निकल चुके थे,,अब बची थी घर की औरतें,बाँसुरी और लल्लन …..और बाहर खड़ी थी राजा की एस यू वी।।रेखा ने लल्लन को देखा __” हमें चलानी नही आती रेखा,हम बस आज तक वैगनार चलायें हैं,हम रोड पे एस यू वी नही उतार पायेंगे।”

  अभी लल्लन अपनी गाड़ी चलाने की योग्यता बता ही रहा था कि बांसुरी गाड़ी स्टार्ट कर गियर में डाल हॉर्न देने लगी,,

” चला तो लोगी ना,,बोज तो ना दोगी कहीं नाले वाले में ”  रूपा के सवाल पर बांसुरी ने मुस्कुरा कर नही में सर हिला दिया __” राजा सिखाये हैं हमें गाड़ी चलाना,बहुत सेफ ड्राइव करते हैं हम,,आप सब लोग  निश्चिंत होकर बैठिए।।

  सभी को लिये बांसुरी जब तक अस्पताल पहुंची तब तक वकील बाबू को इमरजेन्सी में भर्ती कर लिया गया था,कॉरिडोर में ही युवराज और राजा मिल गये,अभी सब मिल कर विचार विमर्श कर ही रहे थे कि डॉक्टर ने बाहर आकर एक परचा राजा को थमाया,और सारी दवाइयां जल्दी से जल्दी लाने की ताकीद की।।
   राजा के फोन पर रानी भी वहाँ पहुंच चुकी थी, वो भी अन्दर डॉक्टरों की टीम के साथ लगी हुई थी।।
  डॉक्टर और नर्सों की टीम भाग भाग कर अपने काम को अंजाम देने में लगी थी,लगभग दो ढाई घन्टे की मशक्कत के बाद एक सीनियर डॉक्टर बाहर आये __
         ” मरीज के साथ कौन है”  युवराज के आगे बढ़ते ही उन्होनें वकील बाबू के कमजोर हृदय का लेखा जोखा युवराज को थमा दिया

   ” देखिए इन्हें अटैक आया है,अभी तो हमने इमरजेन्सी दवाईयां दे दी हैं,पर आप लोग इनका एन्जियोग्राफ करवा लिजिये,जिससे ब्लॉकेज का परसेंटेज पता चल सके, अभी 4 दिन अस्पताल में ही रहना होगा,उसके बाद आप इन्हे लखनऊ मेडीकल कॉलेज ले जा सकते हैं ।”

इतना सुनते ही रूपा का पूर्वाभ्यासित रोने का कार्यक्रम शुरु हो गया,युवराज के बार बार समझाने पर भी उसने अपने राग तार सप्तक में ही छेड़े हुए थे, तभी वहाँ रानी आई__” अरे भाभी आप इतना परेशान मत होईये।।अभी अंकल ठीक है,आराम है उन्हें ।।लेकिन आगे चलकर कहीं वापस दुबारा अटैक आ गया तो बड़ी मुसीबत होगी इसिलिए डॉक्टर कह रहे कि एन्जियोग्राफी करवा लिजिये,उसमें अगर ज्यादा ब्लॉकेज आता है,तो आप एंजियोप्लास्टी करवा लीजियेगा,उसके बाद अंकल बिल्कुल स्वस्थ और सुरक्षित रहेंगे।।”

” ये सब का कारन ई कलमुही है,ना ये ऐसा भाग भगा के सादी करती ,और ना बाऊजी को हार्ट अटैक आता।”

” ऐसा नही होता भाभी,अंकल को शुरु से ब्लॉकेज रहा होगा,जो आज वेन्स को चोक कर गया और अटैक आ गया,आप बेवजह किसी को ब्लेम ना करें।”

” काहे ना करें,हमार बहिनी है,तुम्हारे पेट में काहे दरद हो रहा,ए लल्ला जी समझाओ अपनी डाक्टर्नी को,जादा चपर चपर ना करे,हम भी सब समझते हैं।।
बड़ी आई हमे समझाने वाली।”

कुछ ही देर में रूपा की माँ और भाई भी दौड़ा चला आया,अपनी माँ को देखते ही रूपा ने फिर एक बार रूदाली रूप धर लिया और आंखे और हाथ नचा नचा के रेखा के सर मत्थे सारा ठीकरा फोड़ दिया।।
  पर रूपा की माँ रूपा सी गंवार ना थी,समय की नज़ाकत को भांपते हुए उसने रूपा को समझा बुझा के शांत  कराया और रेखा के पास जाकर उसे अपने सीने से लगा लिया।।
    दुख की इस घड़ी मे,ऐसी अपार विपदा में जहां पति जीवन मृत्यु के बीच पीन्गे भर रहा था,बेटी का जात से बाहर जाकर शादी करना माताजी को कमतर दुखी कर पाया।।और शायद इसिलिए अपने दुख को दूर करने उन्होनें आगे बढ कर बच्चों को माफ कर दिया।।

  औरत ही औरत की पीड़ा समझती है,राजा की अम्मा ने आगे बढ़ कर समधन को गले से लगा लिया,दोनो औरतें साथ बैठी घंटों टन्सुये बहाती रहीं, अंत में रो धो कर फुर्सत पाई तो पति से मिलने की इच्छा जाहिर की,जिसे उस वक्त डॉक्टरों ने ठुकरा दिया।।

    शाम चार पांच बजे तक में मरीज की हालत स्थिर हुई,और सभी को उनके कक्ष में उनसे मिलने की इजाज़त मिल गई।।

   इतनी देर में राजा ने फ़ोन पे लल्लन के बड़े भाई को सारी जानकारी दे दी थी,राजा के फोन के बाद घर पे सोच विचार कर लल्लन का भाई,उसके बाबूजी और अम्मा भी अस्पताल चले आये।।
    आते ही लल्लन की अम्मा ने राजा की अम्मा से दुआ सलाम की और रेखा की अम्मा से मरीज का हाल पानी जानने लगी,वहीं लल्लन के पिता और भाई भी युवराज और बाकी पुरूषों से बाकी का हाल समाचार लेने लगे।।लल्लन को अपने पिता और भाई का तो उतना डर नही था जितना उसे अपनी अम्मा का डर सता रहा था,उसने आगे बढ़ कर पहले बाऊजी,भैय्या और फिर अम्मा के पैर छू लिये।।
   बाऊजी ने उसके सर पर हाथ फेरा तो लल्लन की आंखों की कोर भीग गई पर अम्मा ने आशीर्वाद की जगह दुसरी ओर मुहँ फेर लिया,और तो किसी को कुछ समझा नही पर कोखजाये ने अपनी जननी का दर्द उसकी पीड़ा समझ ली,पर अब क्या हो सकता था?? चुपचाप उठ कर लल्लन ने इशारे से रेखा को भी पैर छूने को कहा और एक तरफ खड़ा हो गया, रेखा ऐसी बातों को समझ कर भी कई बार नासमझ बन जाती थी,बांसुरी ने रेखा से मुहँ खोल कर कहा

” अपने सास ससुर की चरण धूलि तो ले लो रेखा, बड़ों का आशीर्वाद तुम्हारे भविष्य  को सफल बनाएगा,,चिंता ना करो सब ठीक हो जायेगा।।”

शाम ढलते ढलते सभी के चेहरों से चिंता की लकीरें भी छंट गई,रो के हँस के जैसे भी हो पर लल्लन और रेखा के विवाह को आखिर दोनो परिवारों की सहमती मिल ही गई।।
    वकील बाबू को भी हृदय मे उठी मर्मांतक पीड़ा  में जीवनरक्षक औषधियों ने ऐसा चमत्कार किया कि  अपने कष्ट से मुक्ति पाने के बाद वो यथासम्भव विनम्र होते चले गये,उन्होनें अपने मन की भावनाओं को समेट कर अपने नये जमाता को गले से लगा लिया।।

     वैसे भी मृत्यु के मुख से लौटे इन्सान को अपना जीवन और अधिक मूल्यवान लगने लगता है,वैसा ही कुछ वकील बाबू के साथ हुआ,और उन्होने हृदय से सबकी गलतियों को क्षमा कर दिया ।।

    रात मे अस्पताल में रूपा का भाई रुका,माँ को समझा बुझा कर रूपा अपने साथ ले गई,,शादी ऐसी जल्दी मे हुई परन्तु विदाई बिना परछन कैसे कर दे,ऐसा बोल रेखा को भी उसकी माँ अपने साथ ले गई,इधर लल्लन को उसके दोस्त बिना गाजे बाजे ही बाराती बने,, राजा भैय्या की गाड़ी में हँसी ठिठोली करते बिना दुल्हन ही उसके घर पहुँचा आये।।
    प्रेम प्रिंस और राजा भैय्या के साथ जैसे ही लल्लन अपने घर की चौखट लान्घने जा रहा था कि उसकी अम्मा की आवाज़ ने उसे वहीं रोक दिया, वो जल भरा कलश और आरती की थाल लिये चौखट पे आई,और पानी भरे कलसे को सात बार लल्लन के चारों ओर घुमा कर,बाहर निकल उस पानी को बहा आई__
       ” सादी बिना पूछे कर आये तो अब का हर जगह मनमानी चलेगी तुम्हारी,,अरे हल्दी नई चढ़ी तो का भवा,दूल्हा तो बनी गये,अब नैके दूल्हा का नज़र उतारे बिना,उसकी आरती उतारे बिना अन्दर कैसे ले लें,बोलो।।”

    नज़र उतार ,आरती कर,अम्मा ने लल्लन के मुहँ मे शगुन का गुड़ डाला और उसे अपने आंचल तले ढांप के घर के मन्दिर में ले चली।।
    कुल देवी के आगे प्रणाम कर लल्लन ने अपनी अम्मा के पांव छुए और अम्मा के आंसू लल्लन के चेहरे को भिगोते चले गये__” एक बार पूछने की ज़रूरत भी ना समझी लल्ला,आज तक किस बात के लिये रोका तुझे जो आज रोक लेती।।”

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” गलती हो गई अम्मा!! माफ कर दे।।” लल्लन अपनी अम्मा के गले से लगा रो पड़ा,,माँ बेटे के इस पावन मिलन के बीच घर के किसी सदस्य ने आने की जुर्रत नही की,राजा इसी बीच जाकर अपनी गाड़ी में बैठा प्रिंस और प्रेम का रास्ता देख रहा था,कि  बांसुरी का मेसेज आ गया ” वहाँ लल्लन के घर पे सब ठीक है ना??” जवाब में राजा ने भी लिख दिया _” हाँ सब ठीक!!”

  ” क्या भाई,चाय पीकर ही टरोगे तुम दोनो??” लल्लन की दीदी के सवाल पर प्रिंस हड़बड़ा गया

” नहीं दीदी!! बस जाते हैं हम दोनो।।” दोनो बाहर को भागे,देखा राजा भैय्या ड्राइविंग सीट पर अपना मोबाइल पकड़े मुस्कुरा रहें हैं ।।

” का बात है भैय्या जी,बड़ा मुस्कुरा रहे हैं,किसका मेसेज आ गया ??”

” अबे किसी का नही बे!! जल्दी चलो ,,घर जाये कुछु खाये पिये,,आज तो लल्लन की शादी के चक्कर में पानी तक नसीब नही हुआ,फिर भाभी के बाऊजी की तबीयत बिगड़ गई,,अब तो पेट मे चूहे रेस लगा रहे हैं,अम्म्मा जाते जाते इशारा कर गई थी कि आज हमारी पसंद की प्याज की कचौड़ी बना रही हैं,तो चलो जल्दी से चले और खाये पियें।”

” चलिये भैय्या जी फिर भगा लिजिये गाड़ी,किसका इन्तजार है।।”

तीनों साथ बैठे राजा के घर को निकल चले।।

क्रमशः

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aparna..

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जीवनसाथी- 118

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  जीवनसाथी – 118




     अस्पताल में बांसुरी के कानों में चुपके से कुछ कह कर पिया वहां से बाहर निकल गई बांसुरी में समर की तरफ देखा वह पिया को ही देख रहा था पिया के जाने के बाद उसने सर झुका लिया।

” क्या हुआ समर सा कुछ उदास लग रहे हैं आप?

“ऐसी तो कोई बात नहीं रानी साहेब! मैं तो बहुत खुश हूं। आपने इतनी बड़ी खुशखबरी दी है मेरे हाथों में।

“तो आप हम सब को कब मौका दे रहे हैं खुश होने का।”

बाँसुरी के सवाल पर समर मुस्कुरा कर चुप रह गया।

“नहीं! अब ऐसे चुप रहने से काम नहीं चलेगा! आपको याद है एक दिन आपने मुझसे कहा था, कुछ गिफ्ट के लिए, और मैंने कहा था वक्त आने पर मांग लूंगी! तो क्या आज मैं अपना तोहफा मांग सकती हूं!”

” आप रानी है हुक्म कीजिये।”

” पहली बात कि आप मुझे बार-बार रानी साहेब कहना बंद कीजिए। मैं आपको अपना देवर मानती हूँ इस लिहाज से आप मुझे भाभी सा कहिये तभी मैं अपना तोहफा माँगूँगी। “

  समर मुस्कुरा उठा..-” ठीक है भाभी साहब! आप बताइए । “

” अब आप भी शादी कर लीजिए। कब तक ऐसे मारे मारे फिरते रहेंगे। आपके राजा साहब अपने अलावा और किसी की तरफ ध्यान देते ही नही। “

” ये बड़ी ज्यादती है। अगर वो खुद किसी बंधन में बंधना नही चाहता तो मैं कैसे उसे पकड़ कर उसकी शादी कर दूं। “
   राजा के जवाब पर समर बाहर की तरफ देखने लगा। उसे देखकर बांसुरी वापस मुस्कुरा कर उसे छेड़ने लगी…-” क्या हुआ कमरे से बाहर की तरफ आप देख रहे हैं? किसी का इंतजार कर रहे हैं या किसी के पीछे जाना चाहते हैं।”

“जी ऐसा तो कुछ भी नहीं है।”

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“क्यों अपने आप से झूठ बोल रहे हैं? अब इस कमरे में आपके राजा साहब और मेरे अलावा कोई नहीं है! आप हम दोनों को तो सच बता ही सकते हैं।”

“कैसा सच भाभी साहब?”

“यही कि आप पिया से प्यार करते हैं!”

“ऐसा किसने कहा आपसे! क्या पिया ने कुछ कहा?”

“जी नहीं आप एक नमूना हैं तो वह डबल नमूना है। उसने भी कुछ नहीं कहा । यही तो मैं कह रही हूं कि ना आप कुछ कहेंगे ना वह कुछ कहेगी और बस इसी अनकही में कहीं यह ना हो जाए कि वह शादी करके उस डॉक्टर का नर्सिंग होम संभालने चली जाए ! तब बैठे रहिएगा अपनी मंत्रीगिरी संभालते हुए यहां।
  और एक बात कहूं! आज नहीं तो कल काकासाहेब आपकी शादी कर ही देंगे ! किसी ना किसी के साथ तो जिंदगी आपको भी बितानी ही है, तो अगर मौका मिल रहा है कि आप अपनी पसंद की लड़की के साथ अपनी पूरी जिंदगी बिता सकते हैं, तो उस मौके को क्यों यूं ही गवा रहे हैं?
  आखिर अब आपको किस बात का इंतजार है? देखिए आपकी सगाई हुई थी केसर से। पर यह हम सब जानते हैं कि वह सगाई कितनी सच थी और कितनी झूठ।
यह आप भी जानते हैं और केसर भी। अगर आप यह सोच कर बैठे हैं कि उस झूठी सगाई के बाद भी केसर की सारी जिम्मेदारी आपके ऊपर है तो यह गलत है। केसर खुद पश्चाताप में  डूबी है कि मुझसे और राजा साहब से बदला लेने के लिए उसने आपको मोहरा बनाया। यह बात आप भी जानते हैं। इसलिए केसर की तरफ से अपने मन में किसी भी तरह का कोई गिल्ट मत रखिएगा ।
  अपनी जिंदगी संवारने का, उसे सजाने का मौका हाथ से मत जाने दीजिए समर सा, क्योंकि अगर आप जिससे प्यार करते हैं वह आपके साथ नहीं है तो जिंदगी बहुत कठिन हो जाती। हमने यह बात बहुत करीब से महसूस की है रेखा को देखते हुए।
और अगर आपने जिससे प्यार किया वह आपका हमसफर बन कर आपका जीवन साथी बन कर आपके ज़िन्दगी के सफर में साथ चलता रहे तो इस जिंदगी के सफ़र से खूबसूरत कोई सफर नहीं रह जाता, यह हमसे ज्यादा और कौन जानता है।



“एक और भी कोई है जो यह बात जानता है।”

राजा की बात पर बांसुरी मुस्कुरा कर वापस समर को देखने लगी…-” देख लीजिए अपने राजा साहब को और हमें!
क्या हम दोनों की जोड़ी देखकर आपको यह नहीं लगता कि आपकी भी ऐसी ही एक जोड़ी होनी चाहिए! अभी भी वक्त है जाइए और रोक लीजिए अपनी पिया को, वरना वह इतनी ज़िद्दी है, कि अगर आपने उसे नहीं रोका तो वह वाकई उस लड़के से सगाई करके शादी करके आप की दुनिया से दूर चली जाएगी।”

” जाने दीजिए! अगर वह जिद्दी है, तो मैं उससे बड़ा जिद्दी हूं।”

“अगर आपकी ज़िद से किसी का फायदा होता तो मैं आपको इस ज़िद से पीछे हटने नहीं देती। लेकिन आप दोनों की यह फिजूल तानाशाही और यह फिजूल की सनक एक दूसरे की जिंदगी बर्बाद कर देगी। इतना कहने पर भी आप मेरी बात नहीं सुन रहे हैं इसका मतलब है, कि आपकी जिंदगी में मेरी कोई अहमियत नहीं है। चलिए कोई बात नहीं अगर आप नहीं चाहते तो मैं आपको बिल्कुल भी फोर्स नहीं करूंगी।”

“यह क्या कह दिया आपने भाभी साहेब। हुकुम का और आपका स्थान मेरे जीवन में मेरे माता-पिता के समान है! आपकी आज्ञा मेरे सर माथे। मैं अभी जा रहा हूं ,उसके पीछे।  उसे पकड़ कर वापस आपके सामने पेश करता हूं।”

“जी नहीं! उसे इस तरह से पकड़ जकड़ कर मेरे सामने लाने की जरूरत नहीं है। आज उसकी सगाई है आप जाइए उसकी सगाई होने से पहले -पहले उसके घरवालों से उसका हाथ मांग लीजिए।
लेकिन उसके पहले मेरी एक बात सुनिए।”

“जी आज्ञा दीजिए आप।”

“आप वाकई पिया से प्यार तो करते हैं ना?”

समर बांसुरी से नजर चुरा कर इधर-उधर देखने लगा और उसे इधर उधर देखते हुए बांसुरी खिलखिला कर हंस पड़ी…-” देखिए यह हमारा छोटा शैतान भी खुश हो रहा है अपने चाचा को शर्माते हुए देखकर। वैसे एक बात कहूं आप की बोलती कोई बंद नहीं करा पाता है। एकमात्र पिया है जिसके सामने आप चुप खड़े रह जाते हैं और वह सरपट बोलती चली जाती है। मैंने तो पहली बार ही आप दोनों को देख कर समझ लिया था कि यह राम मिलाई जोड़ी है।”

“देखा समर कितनी समझदार है हमारी हुकुम। दूसरों के सब मामले में इनकी समझदारी ऐसे ही फूट-फूटकर बहती है, और हमारे मामले में इन्हें मुझसे मिलने के बाद यह समझ आने में कि मैं ही इनका जीवन साथी हूं महीनों लग गए।”

“होता है ऐसा भी हो जाता है कभी-कभी!
वैसे समझ में तो तब भी मुझे आ गया था, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। और खासकर आपका यह बड़ा सा महल देखने के बाद तो रही सही थोड़ी सी हिम्मत भी चूक गई थी।”

“चलो अब हम दोनों बातों में नहीं लगते समर कि यहां से छुट्टी करते हैं जिससे वह जाकर अपनी जीवनसंगिनी को रोक सके ! “
राजा की बात पर बांसुरी ने हां की मुहर लगाई और समर को उन दोनों ने वहां से बाहर भेज दिया।

समर कमरे से बाहर निकल कर गाड़ी की तरफ बढ़ा और जैसे ही ड्राइविंग सीट पर दरवाजा खोलकर अंदर बैठा बाजू वाली सीट पर प्रेम आकर बैठ गया। उसी वक्त पीछे के दोनों दरवाजे खुले और आदित्य और विराट भी अंदर आकर बैठ गए। समर उन सब को चौक कर देखने लगा…-” आप सब अचानक एक साथ यहां कैसे?”

“भाई दुल्हन लेने जा रहे हो तो बाराती तो साथ चलेंगे ना।

प्रेम की बात पर समर एक बार फिर चौन्क कर प्रेम को देखने लगा। प्रेम भी उसे देखते हुए हंस दिया….-” अरे पहली बार जा रहे हो बात करने उनके घर, अकेले जाना शोभा देता है क्या? हम सब तुम्हारे भाई बनकर मिलेंगे उनसे, और जब बातचीत पक्की हो जाएगी तब काका और काकी से मिलवा देना।”

प्रेम की बात पर हामी भरते हुए आदित्य और विराट भी हंसने लगे।
“समर गाड़ी तुम चलाओगे या मैं चला लूं? वैसे दूल्हा खुद ड्राइव करता हुआ जाए ये अच्छा नहीं लगता। तुम पीछे आ जाओ मैं ड्राइविंग सीट पर आता हूं ।”
समर में एक नजर आदित्य को देखा और वापस गाड़ी गियर में डाल दी।
“मैं देख रहा हूं जैसे ही किसी की कोई नाजुक रग दूसरों को पता चलती है सब बड़े मजे लेने लगते हैं।’

“हम सब तो मजे लेंगे ही, तुम हो ही ऐसे कमाल के। पूरी दुनिया को सुधारने चले हो और अपनी जिंदगी का कबाड़ कर रखा है। अरे जब अच्छी-खासी लड़की मिली हुई है ,तो उससे शादी करने की जगह उसे प्रपोज करने की जगह तुम दून जाकर में कोर्ट केस में जिरह कर रहे हो।”

“वह भी तो जरूरी था दोस्त।”

समर की बात पर आदित्य ने हंसकर ठप्पा लगा दिया ….-“और यह भी बहुत जरूरी है।”

हंसते मुस्कुराते चारों लड़के पिया के घर पहुंच गए।
पिया के घर के सामने समर ने जैसे ही गाड़ी रोकी प्रेम तिरछी नजरों से समर को देखने लगा …-“अच्छा तो तुम्हें घर भी पता है।”

“अरे यार अब इसमें कौन सी बड़ी बात हो गई, घर तो पता होगा ही।”

समर की बात सुन पीछे बैठा आदित्य भी दिल खोल कर हंसते हुए बोलने लगा…-” और क्या प्रेम भैया आप तो ऐसे पूछ रहे हैं? अब इतनी बार आना जाना हुआ होगा तो समर सा को घर तो याद होगा ही।”

समर ने एक नजर मुड़ कर आदित्य को देखा और गाड़ी से उतरकर मेन गेट की तरफ बढ़ गया। मेन गेट पर बैठे गार्ड से समर ने ऊपर पिया के फ्लैट में जाने के लिए बताया तो गार्ड ने उल्टा उन्हें अचंभित कर दिया…..-” नहीं साहब ! प्रिया मेम साहब के घर पर तो इस वक्त कोई नहीं है सब लोग शादी भवन गए है।”

“शादी भवन ! लेकिन वहां क्यों गए हैं?”

“आज पिया मैडम की सगाई है ना।”

गार्ड से पता ठिकाना पूछ कर वह चारों वापस गाड़ी में जा बैठे! आदित्य एक बार फिर समर को छेड़ने लगा……-” शादी भवन गए हैं, सुनकर तो मुझे लगा पिया सगाई छोड़ कर सीधे शादी करने को ही तैयार हो गई है। वैसे भी समर बाबू ने जितने झटके दिए हैं, उस हिसाब से अगर मैं पिया की जगह होता तो आज सुबह ही शादी कर चुका होता । वह तो बेचारी अब तक बैठी राह देख रही होगी।”

विराट भी आदित्य के साथ जुगलबंदी में लग गया….-” ठीक कह रहे हो आदित्य! मुझे भी यही लगा कि कहीं पिया की शादी तो नहीं हो रही । फिर जब गार्ड ने कहा सगाई है, तब मेरी सांस में सांस आई। और मैंने देखा समर ने भी बहुत चैन की सांस ली।”

“मैं देख रहा हूं आजकल तुम दोनों की कुछ ज्यादा ही नजर है मुझ पर।”

एक तो पिया की हरकतों से समर वैसे ही नाराज था। दूसरा आदित्य और विराट उसका इतनी देर से मजाक उड़ा रहे थे। उसका गुस्सा और बढ़ता जा रहा था कि तभी समर की बात पर प्रेम चहक उठा।

“उन दोनों की ही नहीं मेरी भी नजर है तुम पर।”

प्रेम के ऐसा बोलते हैं आदित्य और विराट जोर से हंस पड़े….

“ज्यादा हंसिए मत आदित्य बाबू अब इसके बाद आपकी ही पारी है।”

विराट की बात पर समर ने भी हामी भर दी और आदित्य खिड़की से बाहर देखने लगा! उसी वक्त प्रेम के फोन पर घंटी बजने लगी प्रेम ने फोन उठाया फोन निरमा का था।

“सुनिए कहां है इस वक्त आप ?”

“मैं जरा काम से बाहर था बोलो क्या हो गया ?”

“आते वक्त याद से मीठी के स्कूल के क्राफ्ट के लिए क्राफ्ट का सामान लेते आइएगा। भूलिएगा मत। कल भी आप निकले थे, तब भी आपको मैसेज किया था और आप भूल भाल कर घर वापस आ गए थे।”

“सॉरी बाबा नहीं भूलूंगा।”

“बस कहते तो ऐसा है जैसे एक मेरे और मीठी के अलावा दुनिया में आपको कुछ याद नहीं, और हम ही दोनों की सारी चीजें आप भूल जाते हैं। अभी के अभी लिखकर रख लीजिए कि नहीं भूलना है, वरना अगर आज बिना भूले वापस आए ना तो।”

“तो क्या खाना नहीं दोगी?”

“खाना तो दूंगी, लेकिन अकेले सोना पड़ेगा।”

प्रेम के गले में कुछ अटक गया और उसे हल्की सी खांसी आ गई….” चलो रखता हूं अभी आसपास लोग हैं।”

प्रेम के फोन रखते ही एक जोर का ठहाका गाड़ी में गूंज उठा और चारों लड़के मंगल भवन की तरफ आगे बढ़े चलें।

   मंगल भवन बाहर से बहुत खूबसूरती से सजा था। गेंदे और गुलाब की मालाओं से सजा हुआ था , जिनमें बीच बीच में रोशनी की झालर लगी थीं।
इतनी खूबसूरती से पूरा परिसर बाहर से सजा सँवरा दिख रहा था की एक पल को समर को लगा कि यहां आकर कोई गलती तो नहीं हो गई ।उसने प्रेम की तरफ देखा प्रेम ने उसे कंधे थपथपा कर इशारा किया और खुद आगे बढ़ गया समर ने बड़ी हिम्मत करके कदम आगे बढ़ाया।
    मुख्य दरवाजे के दोनों तरफ बड़े-बड़े कलसो में पानी भर कर रखा था जिनमें गुलाब की पंखुड़ियां तैर रही थी। सामने फूलों से सुस्वागतम लिखा हुआ था। और एक बड़ी सी फूलों की रंगोली बनी थी। एक तरफ बड़े से पानी के कलसे मैं खूब सारी खुशबूदार मोमबत्तियां जल रही थी। सब कुछ बहुत सुहावना लग रहा था। लेकिन मन ही मन समर को अजीब सा डर लग रहा था कहीं इतनी सारी तैयारियां के कारण इतने सारे लोगों के बीच पिया ने उसका साथ देने से मना कर दिया तो?
इतने सारे लोगों के बीच पहले से तय सगाई को तोड़ने की हिम्मत पिया कैसे कर पाएगी? यह कोई फिल्म तो है नहीं कि हीरो मौके पर पहुंचा और हीरोइन ने अपनी सगाई तोड़ दी, और हीरो के साथ चली गई!
ऐसा सिर्फ फिल्मों में कल्पनाओं में और कहानियों में होता है वास्तविक जिंदगी ऐसी तो नहीं होती ना।

यही सब सोचकर वह दरवाजे से ही वापस जाने लगा कि प्रेम ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया…-” क्या हुआ समर अब भी किसी सोच विचार में हो?”

“मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं सही कर रहा हूं या गलत।”

“क्यों इसमें क्या सोचने वाली बात है?”

“सोचने वाली बात यह है कि आज तक ना मैंने, ना पिया ने एक दूसरे से प्यार का इजहार किया। और मैं आज अचानक यहां उसकी सगाई में चला आया। अब अगर मैं उससे यह कहूं भी कि पिया मैं तुमसे प्यार करता हूं तुमसे शादी करना चाहता हूं। तो वह उस लड़के को इनकार करके आखिर क्यों मेरी बात मानेगी? और चलो एक बार को पिया मुझे स्वीकार भी कर ले, तब भी इस सब में उस लड़के का क्या कसूर? अगर मैं सही समय पर पिया से अपने मन की बातें नहीं कर पाया , और पिया ने जल्दबाजी में उस लड़के से शादी के लिए हां कह दी तो इस सब में वह बेचारा तो बुरी तरह से फंस गया? अब वह और उसका परिवार यहां इतने तामझाम के साथ सगाई करने आए हैं .. ऐसे में अगर पिया उस लड़के को ठुकरा देती है तो वह बेचारा क्या करेगा कहां जाएगा?

“और तुम! तुम्हारा क्या होगा ? तुम अपने बारे में भी तो सोचो ना।” आदित्य ने समर से ही उल्टा सवाल कर दिया

“मेरा क्या है दोस्त !मैंने तो आज तक कभी शादी के लिए सोचा ही नहीं था। ऐसा तो है नहीं कि मेरे जीवन में कभी लड़कियां थी नहीं। पर मैं शादी ब्याह कर जिम्मेदारी से भरी जिंदगी जीने वाला लड़का हूँ ही नहीं।  मेरे लिए यह सगाई शादी यह सारे चोंचले नहीं बने।

“ऐसा तुम्हें लगता है, समर पर ऐसा है नहीं। शादी सिर्फ जिम्मेदारियों को उठाना नहीं होता। अगर तुम सामने वाली की जिम्मेदारी उठा रहे हो, तो वह लड़की भी तो तुम्हारी जिम्मेदारी बराबरी से उठाती है। यह क्यों भूल जाते हो। शादीशुदा जिंदगी हर हाल में एक कुंवारे की जिंदगी से कहीं बेहतर है। एक बार जी कर तो देखो अपनी जिम्मेदारियों से मत डरो। अगर आज तुम पिया से बिना मिले यहां से निकल गए तो याद रखना जिंदगी भर पछताओगे।
   अगर तुम ने सच में कभी भी उससे प्यार किया है तो एक बार जाकर उसे बता दो। फिर जो होगा उसे अपना नसीब मान लेना। “

   प्रेम की बात मान कर समर एक बार फिर अंदर की ओर बढ़ चला, उसके पीछे ही वो तीनों भी बढ़ गए। लेकिन दरवाजे पर पहुंचकर उसकी हिम्मत फिर चूकने लगी वह वापस मुड़ा ही था कि प्रेम ने उसे पकड़ लिया …-” इतना घबराओ मत समर। अपने जीवन के समर में तुमने अब तक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। फिर अपने प्रेम के समर में पीछे क्यों हट रहे हो?

  समर कोई जवाब देता है इसके पहले ही दरवाजे से उसे किसी ने आवाज लगा दी….
“आइए आइए ! आप सभी तक चले आइए आप लोगों का स्वागत है।”

पिया के माता-पिता अभ्यागतों के स्वागत के लिए दरवाजे पर ही खड़े थे। उन लोगों ने उन चारों को आते देख कर रोक लिया और अंदर बुला लिया। अब समर के पास अंदर जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। वह चारों जैसे ही अंदर की तरफ प्रवेश करने लगे, पिया की मासी और उनकी बेटी ने उन लोगों के ऊपर गुलाब जल छिड़क कर चारों के माथे पर कुमकुम का तिलक लगा दिया।
    “यहां कुछ ज्यादा ही स्वागत नहीं हो रहा है?” विराट ने धीरे से आदित्य के कान में कहा जिसे समर और प्रेम ने भी सुन लिया कि तभी पिया की मां हाथ में थाली लिए चली आई और समर की आरती उतारने लगी। समर ऐसा होते देख हड़बड़ा कर एक कदम पीछे हट गया।

“अरे घबराइये मत बेटा हमारे यहां ऐसे ही आगंतुकों का स्वागत किया जाता है। आइये अब आप चारों अंदर पधारे।”

अंदर की रौनक देखते ही बन रही थी। समर ने आज तक पिया के रहन सहन की तरफ ध्यान नही दिया था, उसे हमेशा उसकी सादी कुर्तियों और जीन्स के पहनावे को देख यही लगता था कि वो एक मध्यमवर्गीय परिवार की सीधी सी लड़की है। इतना तामझाम और चकाचौंध देख उसे अपने महल के कार्यक्रमों की याद आ गयी। तभी उसकी नज़र सामने से आते युवराज पर पड़ गयी….-” युवराज सा आप यहाँ ?”

“हाँ क्यों ? हम नही आ सकते यहाँ। “

युवराज के सवाल पर समर खिसिया गया तभी रूपा भी चली आयी…-” हम तो पूछने वाले थे आप यहाँ कैसे? “

समर रूपा की बात का क्या जवाब देता? क्योंकि उसके मन में खुद यही उथल पुथल थी कि युवराज और रूपा को पिया भला कैसे जानती है?

वो अभी क्या कहूँ सोच रहा था कि रूपा ने जैसे उसके मन की बात ताड़ ली…-“आप शायद यह सोच रहे की हम लोग यहाँ कैसे? “

” हाँ बिल्कुल मैं यही…” अपने उतावलेपन पर समर एकाएक बोलते बोलते रुक गया… उसकी ये हालत देख रुपा को हंसी आ गयी…- पिया आपकी माँ यानी काकी सा की जांच और इलाज के लिए महल आती थी न तभी उससे हमारी जान पहचान हुई थी। इसलिए उसने अपनी सगाई में हमें बुलाया। और हम ही क्या काकी सा भी आयीं हैं।”

समर पर एक के बाद एक बम फूट रहे थे। उसके लिए ये बहुत आश्चर्य की बात थी कि उसकी माँ जो महल के अलावा बाहरी किसी कार्यक्रम में कभी शामिल नही होती वो भी पिया के बुलावे पर यहाँ चली आयीं हैं।
वो इधर उधर अपनी माँ को ढूंढ रहा था कि प्रेम ने उसे एक तरफ इशारा कर दिखा दिया। उसकी माँ आराम से सोफे पर बैठी किसी औरत के साथ बातचीत में लगी थीं।
समर को पिया के ऊपर एक बार फिर गुस्सा आने लगा…-” हद करती है ये लड़की। एक तो किसी और से सगाई कर रही उस पर मेरे सारे खानदान को बुला रखा है। और अब जाने कहाँ छिपी बैठी है। ये भी नही हो रहा कि बाहर आ जाये। “

वो इधर उधर पिया को ढूंढ रहा था कि उसकी नज़र अपनी माँ से मिली उन्होंने भी उसे उसी वक्त देखा और हाथ के इशारे से अपने पास बुला लिया।

वो भारी कदमों से उन तक पहुंच गया… – ” ये मेरा बेटा है समर! समर इनके पैर छुओ बेटा ये पिया की दादी हैं। “
समर आश्चर्य से उन्हें देख उनके पैरों में झुक गया। उन्होंने भी उसे आशीर्वाद देने के बाद हाथों से ही उसकी बलैय्या ले लीं..-” बहुत सुंदर है आपका बेटा !”
समर को ऐसे अपनी तारीफ सुनना बड़ा अजीब लग रहा था, वो वहाँ से खिसकने के बहाने सोचने लगा…-” पापा साहेब भी आये हैं क्या?”
“हाँ फिर !हम अकेले किसके साथ आते?”

समर का जी कर रहा था चीख चीख कर पूछे जब कहीं और नही जाती तो यहाँ अपने बेटे का तमाशा देखने का ही क्या शौक चढ़ा था? लेकिन वो बिना कुछ बोले एक तरफ को जाने लगा कि उसकी माँ ने उसे हाथ पकड़ कर रोक लिया और एक तरफ इशारा कर कुछ दिखाने लगी….- ” वो देख! ऑर्केस्ट्रा आया है, जा न तू भी कुछ गा ले।।”

समर को अब अपनी माँ के बचपने पर गुस्सा आने लगा था। जिसे देखो वही खुश नजर आ रहा था लेकिन जिसके लिए ये सारा तामझाम था वही कहीं नजर नही आ रही थी।
उसे ढूंढता समर आगे बढ़ रहा था कि सामने से आती एक दुबली सी लड़की उससे टकराते बची…-” ओह्ह सॉरी जीजू!” लेकिन दूसरे ही पल समर को देख वो जीभ काट कर रह गयी..
” जीजू?” समर के ऐसा बोलते ही उस लड़की ने एक किनारे बने स्टेज की तरफ इशारा कर दिया। वहाँ दो चार लड़के खड़े थे।
समर को उस लड़की का इशारा समझ में नही आया। उसकी आँखों में सवाल देख वो लडकी जल्दी जल्दी बोलने लगी…-“मैं पिया दी कि मासी की बेटी हूँ। अभी हड़बड़ी में मुझे लगा मैं मेरे जीजू से टकरा गई , यानी उनसे । फिर चेहरा देखने पर समझ आया कि आप तो कोई और है।”

समर को समझ आ गया कि यह पिया की छोटी बहन है और यह ही इस वक्त पिया का पता बता सकती है। वह जाने लगी तो उसे आवाज देकर समर ने रोक लिया…-” सुनो एक मिनट! क्या तुम मुझे बता सकती हो कि पिया इस वक्त कहां मिलेगी?”

उस लड़की ने भौंहे चढ़ाकर समर को देखा..-” आप उनसे मिलना चाहते हैं?”

“हां! कुछ बहुत जरूरी काम है!”

“ओके! यह पीछे वाली सीढ़ियां चढ़कर ऊपर चले जाइए। पहला ही कमरा पिया दीदी का है। वह अपने रूम में सगाई के लिए तैयार हो रही है।”

आगे बिना कुछ सुने समर सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया। अपने बालों पर हाथ फिराते हुए यही सोच रहा था कि पिछले 1 घंटे से तो वो इस हॉल में इधर से उधर भटक रहा है। जाने और कितना पिया तैयार होने वाली है? ऊपर पहुंच कर उसने पहले वाले कमरे के दरवाजे पर लगी बेल बजा दी…

” एक मिनट रुको अभी आई।”


अंदर से पिया की आवाज आई और कुछ देर में ही दरवाजा खुल गया। पिया ने समर को देखा, समर ने पिया को और दोनों कुछ देर के लिए एक दूसरे को देखते रह गए। पिया की आंखों में आंसू झिलमिलाने लगे…-” अब क्या यही खड़े रखोगी। अंदर भी नहीं आ सकता मैं?”

पिया एक एक तरफ हो कर खड़ी हो गई। समर अंदर चला आया, पिया ने दरवाजा बंद किया, और समर से आगे बढ़ गयी।
” पिया बिना मुझसे कुछ बोले तुमने ऐसे कैसे सगाई के लिए हां कर दी?”

बिना किसी भूमिका के समर सीधे मुद्दे पर चला आया….

“तुमसे क्या पूछना और क्या बोलना था समर?'”

“तुम्हें सच में इस बात की जरूरत नहीं लगी, कि एक बार मुझे बता दो कि तुम सगाई करने जा रही हो!”

“मुझसे यह सवाल पूछने से पहले अपना फोन चेक करके देखो।”

“उस वक्त व्यस्त था मैं। फोन नहीं उठा पाया। फोन चार्ज भी नहीं कर पाया ,और मेरा फोन बंद हो गया था। लेकिन तुम एक मैसेज तो डाल ही सकती थी मुझे।”

“क्या फर्क पड़ जाता समर, क्या तुम अपना काम छोड़कर मेरे लिए आ जाते?”

“नहीं आता! लेकिन तुमसे मेरा इंतजार करने तो कह देता।”

“देखा !! अभी भी तुम्हारी अकड़ कम नहीं हुई ना। अभी भी मुझसे ज्यादा तुम्हें तुम्हारे काम से प्यार है।”

समर मुस्कुराने लगा। उसने आगे बढ़कर पिया को पकड़ लिया…-” मतलब मानती हो ना कि मुझे तुमसे प्यार है!”

समर की बात सुन पिया गुस्से में दूसरी तरफ मुंह फेर कर खड़ी हो गई।

“अब यह नाराजगी कैसी ? मैं जानता हूं ,तुम मुझसे प्यार करती हो।”

“पर मैं नहीं जानती कि तुम मुझसे प्यार करते हो या नहीं?”

“करता हूं यार बहुत प्यार करता हूं । लेकिन हर बात बताने की तो नहीं होती ना। लेकिन तुमने हड़बड़ी में आकर यह जो निर्णय ले लिया क्या यह तुम्हें सही लग रहा है।”

“अब मैं सही हूं या गलत लेकिन यही मेरी किस्मत है।”

“मैं जानता हूं तुम जिद्दी हो! अपनी बात से पीछे नहीं हटोगी । लेकिन बस यह कहना चाहता हूं कि एक बार सोच लो जिंदगी बहुत खूबसूरत हो जाती है, अगर वह उसके साथ गुजरे जिसे आपने सबसे ज्यादा प्यार किया हो।”

“किस ने सिखा कर भेजा यह सब मंत्री जी! क्योंकि आप तो बही-खाते हिसाब वकालत इनसे ज्यादा कुछ बोल ही नहीं पाते।”

“जब अपने प्यार को अपने अलावा किसी और का जीवन साथी बनते देख रहा हूं तो सब कुछ बोलना आ ही गया। बस एक मौका दे दो पिया मुझे। मैं तुम्हें कभी निराश नहीं करूंगा । तुम्हारी जिंदगी के सुख-दुख, हर मोड़ पर, हर ऊंचाई और हर गहराई पर तुम्हारे साथ रहूंगा। बोलो पिया मेरी जीवन साथी बनोगी?’

समर ने पिया की तरफ हाथ बढ़ा दिया, पिया ने धीरे से उसके हाथ में हाथ रख कर कहा…-” लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है मंत्री जी। अब कुछ नही हो सकता।”

“तुम हां तो कहो मैं सब सही कर लूंगा।”

पिया कुछ कह पाती उसके पहले ही दरवाजे पर किसी ने दस्तक देनी शुरू कर दी। पिया घबराकर दरवाजा खोलने जा ही रही थी कि, समर ने पीछे से पकड़ कर उसे अपनी बाहों में ले लिया। उसके कानों के पास जाकर एक बार फिर गुनगुनाना गया…-” सोच लो पिया किसी और की बाहों में मुझे याद करती रहोगी उससे बेहतर है कि मेरी बाहों में जिंदगी भुला दो।”



“अब तुम पागल हो रहे हो छोड़ो मुझे।” समर की बाहों से खुद को छुड़ा कर पिया ने दरवाजा खोल दिया। सामने उसकी मौसेरी बहन और बाकी सहेलियां खड़ी थी सब उसे लेने आई थी। चहचाहती हुई सारी की सारी पिया का हाथ थामे उसे बाहर ले गईं।
समर उस कमरे में अकेला रह गया। कुछ देर वहीं बैठने के बाद वह फिर तेज कदमों से कमरे से निकलकर सीढ़ियां उतरता नीचे हॉल में पहुंच गया….
आखिरी सीढ़ी पर उसका कदम जैसे ही पड़ा सारे हॉल की बत्तियां बुझ गयीं। और वो एकदम से चौक कर इधर-उधर देखने लगा कि, यह हुआ क्या ? तभी एक गोल रोशनी का घेरा सिर्फ उसके ऊपर पड़ने लगा। उसे कुछ समझ में आता तभी एक दूसरा गोल रोशनी का घेरा हॉल के दूसरी तरफ खड़ी पिया के ऊपर उसी तरह पड़ने लगा।
उसने पिया को देखा वो मुस्कुरा कर उसी की तरफ देख रही थी।
पिया धीरे धीरे आगे बढ़ने लगी, उसे अपनी तरफ आते देख समर भी उसकी तरफ बढ़ने लगा।
दोनों के एक दूसरे के सामने आते ही एक गुलाब की पंखड़ियों से सजी प्लेट उनके सामने किसी ने कर दी। उसमें दो अंगूठियां रखी थीं ।
पिया ने मुस्कुरा कर एक अंगूठी उठा ली और बड़ी हसरत से समर की ओर देखने लगी। समर उसे देख रहा था कि समर के कानों में उसकी माँ की आवाज़ पड़ी..-“अब तुम भी उठा लो अंगूठी। और पहना दो हमारी होने वाली बहु को।”
समर ने चौन्क कर देखा, उसके ठीक बाजू में उसकी माँ खड़ी थीं।
समर ने अंगूठी पिया की उंगली में पहनाई और पिया ने समर की उंगली में।
तालियों के शोर के साथ ही कमरे में रौशनी की चकाचौंध फैल गयी…
दोनों के ऊपर ढेर सारे गुलाबों की पंखुड़ियां बरसने लगी। पिया ने आगे बढ़ कर समर के माता पिता के पैर छुए तब कहीं जाकर समर को होश आया कि यहाँ क्या हो रहा है।
उसने भी अपने माता पिता के साथ ही बाकियों का आशीर्वाद लिया और युवराज सा के पैर छूने के बाद प्रेम की ओर बढ़ गया। प्रेम के पैर छूने वो जैसे ही पिया के साथ झुकने को हुआ कि प्रेम ने उसे उठा कर सीने से लगा लिया…- ” पैरों में नही तुम्हारी जगह यहाँ हैं।”

” तो तुम सब कुछ जानते थे न प्रेम ?”

समर के सवाल पर प्रेम ही नही बाकी लोग भी मुस्कुरा उठे, की प्रेम के पीछे से राजा अजातशत्रु भी आगे निकल आये…-“हुकुम आप यहाँ? “

” क्या करें? तुम्हारी भाभी सा का हुक्म था कि समर की सगाई का सारा ड्रामा उन्हें लाइव देखना है। तो बस यहाँ खड़े खड़े उन्हें सब कुछ लाइव दिखा रहे थे। “

समर मुस्कुराने लगा …-” अब तो कोई बता दो की ये सारा माजरा क्या है? और अब उस लड़के का क्या होगा जिससे पिया की सगाई…”

समर की बात आधे में ही काट कर पिया ने उसकी बाहें थामते हुए उसका चेहरा स्टेज की तरफ घुमा दिया…- ” जिनसे मेरी सगाई होने वाली थी, उन्हें कल रात मैंने सारी बातें कह सुनाई। वो हमारे रास्ते से हटने को तैयार थे कि मौसी जी ने अपनी बेटी की शादी का प्रस्ताव उनके जीजा और जीजी के सामने रख दिया। वहीं तुरन्त दोनों का मिलना और बातचीत हुई और दोनो ने ही एक दूसरे को पसन्द कर लिया।
अब स्टेज पर उन्हीं दोनो की सगाई है। “

समर ने देखा स्टेज पर वही लड़कीं थी जो कुछ देर पहले उससे टकरा कर उसे सॉरी जीजू बोल गयी थी।
सारी बातें समझ में आते ही समर ने पास खड़ी पिया को देखा और धीरे से उसे अपनी बाहों के घेरे में समेट लिया…

क्रमशः

दिल से …

क्या करूँ भाग इतना लंबा हो रहा था कि इसे अंतिम भाग नही लिख पायी। एक और भाग लिखवाना चाहतें हैं अजातशत्रु जी।
तो इंतज़ार रहेगा आपको भी और मुझे भी अगले भाग का।
जल्दी ही मिलतें हैं…!!

aparna …







  



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समिधा-28

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      ससुराल में पारो का समय कैसे बीत रहा था उसे खुद ख्याल नही था। इसी बीच एक बार लाली भी उससे मिलने आई। लाली पेट से थी और इसी कारण उसे पहले आने नही दिया गया था।
   मांग भर लाल सिंदूर हाथ में शाखा पोला पहनी लाली पारो को अति सौभाग्यशाली दिख रही थी। उसके सामने पारो अपनी किस्मत का रोना लेकर नही बैठना चाहती थी। इसलिए उसे अपने कमरे में बैठा कर उसके लिए वो मुस्कुराती उसके सामने बैठ गयी। कुछ देर इधर उधर की बातों के बाद आनन्दी उन दोनों के लिये कुछ खाने पीने का सामना लिए ऊपर ही चली आयीं।
   बहुत दिनों बाद पारो के चेहरे पर मुस्कान आई थी , लाली को देख कर।
  जाने क्यों उसे लाली में देव नज़र आ रहा था। देव अपनी भतीजी पर जान भी तो छिड़कता था।।
  लाली भी पारो से मिल कर प्रसन्न थी, उसे पारो में उसके देव काका दिखाई दे रहे थे…-” पारो एक बात पूछूं”

” हाँ पूछ ना? “

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” तुम वापस पढ़ाई क्यों नही शुरू कर देती? “

पारो अनमनी सी लाली को देखने लगी..-” अपने घर के रीति रिवाजों से तो परीचित हो भली तरह। जब तक देव बाबू थे फिर भी किसी तरह सम्भव था लेकिन अब पारो का पढना एक तरह से असंभव है!”
   जवाब आनन्दी ने दिया । जवाब कड़वा ज़रूर था पर सत्य था। घर में पहले भी देव ने चोरी छिपे ही पारो को पढ़ने में मदद की थी और अब उसके जाने के बाद पारो में भी वो उत्साह कम दिख रहा था।

” आप कह तो सहीं रहीं हैं बऊ दी , लेकिन पढेंगी लिखेगी तो मन लगा रहेगा। वरना करेगी क्या दिन भर?”..

  लाली की बात सुन पारो की आंखों में पानी भर आया। आनन्दी भी पारो को देख दुख में डूब गई। तीनों औरतें कुछ पलों को चुप रह गईं की क्या किया जाए क्या नही… उसी वक्त कहीं से घूम घाम कर लौटा दर्शन भी ऊपर ही चला आया…-” ये लो दर्शन चला आया। सुन तू ही पारो की मदद क्यों नही कर देता पढ़ने लिखने में। थोड़ा उसका भी मन लगा रहेगा।”

” तो मैंने कब मना किया ? बऊ दी जब चाहें पढ़ लें। मैं इन्हें पढ़ाने में पूरी मदद कर दूंगा।”

“पर मदद सबसे छिप कर करनी होगी दर्शन बाबू। अगर घर भर को पता चल गया तो एक और नई मुसीबत हो जाएगी।”
  आनन्दी की बात पर दर्शन ने भी हामी भर दी….
पारो का अब किसी काम में मन नही लगता था। न रसोई में न पढ़ाई में। उसे अब सारा सारा दिन देव के बारे में सोचना ही बस भाता था। खिड़की की बल्लियां पकड़े खड़े वो देव में खोई रहती।
  पर घर की बाकी औरतों को ये कैसे सहन होता। आखिर उनके भी अपने दुख थे। तो अकेली पारो को ही गमगीन रहने का अवसर क्यों मिले भला? जब बेटा खो कर भी माँ कामधाम में लगी है?
  आखिर देव की माँ ने पारो को भी गृहस्थी के जंजाल में वापस बुला लिया। अब सुबह उठ कर आंगन को पानी से धो कर पारो घर भर के लिए चाय चढ़ा कर फिर नहाने चली जाती। नहा कर आने के बाद ठाकुर माँ  के पूजा पाठ का सरंजाम जुटाने के बाद एक बार फिर रसोई बनाने में डूब जाती। दोपहर सबके खाने पीने के बाद ही उसे छुट्टी मिलती। तब कुछ देर को अपने कमरे में आराम करने का मौका उसे मिल पाता। हालांकि दोपहर सोने की आदत न होने से वो दर्शन की दी हुई किताबें पढ़ने लगती।
  अक्सर किताब के सबसे रस भरे अध्याय में डूबी होती कि नीचे से शाम की चाय बना लेने की पुकार चली आती और वो अपनी किताब बंद कर नीचे भाग जाती।
  वो इतना काम करते हुए भी नही थकती क्योंकि अब उसे देव की माँ में अपनी सास कम और देव की माँ का अंश अधिक नज़र आने लगा था। अब उसे उस सारे घर से प्यार हो गया था। वो प्यार जिसका अधिकारी जा चुका था उसके उस अधिकार को उसके प्यार को अब पारो उसके घर और सम्बन्धों पर लुटा देना चाहती थी। वैसे भी अब इसके अलावा उसके जीवन में और बचा क्या था?
   देव के बाबा का अब वो और ज्यादा खयाल रखती। बिल्कुल जैसे वो सुबह नाश्ते के बाद और रात खाने के बाद कि गोलियां उन्हें निकाल कर दिया करता वैसे ही वो गोलियां निकाल उनकी टेबल पर पानी के गिलास के साथ रख आती।
   और वो धीमे से अपने चश्मे पर चढ़ आई भाप को चुपके से साफ कर लेते।
  ठाकुर माँ को शाम में बैठ कर सुखसागर पढ़ कर सुनाती बिल्कुल जैसे वो सुनाया करता था। माँ की कही हर बात वैसे ही जी जान से लग कर पूरा करती जैसे वो किया करता था लेकिन बस एक ही जगह वो चूक जाती…
   जहाँ खुद से प्यार करने की बारी आती वो लाचारगी से खिड़की पर खड़ी खुद पर तरस खा कर रह जाती। उसे तो वो टूट कर चाहता था, उसका प्यार जब तब वो महसूस कर पाती थी लेकिन न कभी उसने खुल कर कहा और न पारो ने ही उससे खुल कर कहने कहा लेकिन समझते तो दोनो ही थे।
  कितनी कोमलता थी देव के प्यार में। उसे छूता भी ऐसे था कि कहीं वो मैली न हो जाये और आज उसे इस अनजान सी दुनिया में अनछुआ अकेला तड़पता छोड़ गया था।
अब जब उसे शादी प्यार पति पत्नी के सम्बन्धो के बारे में थोड़ा बहुत मालूम चलने लगा तब वो ही चला गया।
  यही सोचती कभी कभी वो एकदम गुमसुम रह जाती तो कभी रोते रोते उसकी हिचकियाँ बंध जाती।
    लेकिन अब उसे सासु माँ अधिकतर समय काम में भिड़ाये रखती जिससे वो सुकून से कमरे में बैठ रो भी नही पाती थी।
  ऐसे ही एक शाम वो अपनी खिड़की पर खड़ी बाहर डूबते सूरज को देख रही थी कि उसकी सास और बड़ी बुआ अंदर चली आयी…-” क्या देख रही है पारो? “वो चौन्क कर मुड़ी और माँ के साथ बड़ी माँ और बुआ को भी आया देख चुप खड़ी रह गयी।
“दिन भर ऊपर अकेली पड़ी पड़ी उकता नही जाती हो? नीचे चली आया करो। हम सब के साथ बैठोगी तो अच्छा लगेगा न। “
  हाँ में सिर हिला कर वो ज़मीन पर अपने पैर के अंगूठे से गुणा भाग के चिह्न बनाती रही।
  वो तीनों एक साथ उसके कमरे में क्या सचमुच उसकी चिंता में ही चली आयीं थीं ? पारो सोच नही पा रही थी। पर जाने क्यों आज इतने दिनों में पहली बार उसे उसकी सास के चेहरे पर खुद के लिए एक अलग सी ममता दिखी थी। फिर भी वो उस वक्त उनके भावों का अर्थ नही जान पायी…
   बड़ी बुआ ने बोलना जारी रखा…-”  बेटा पारो ! तुझे ऐसे अकेले ऊपर अब छोड़ा नही जाता। वैसे भी इतने बड़े कमरे में अकेले घबराहट सी होती होगी न। ऐसा करना अपना सामान कल नीचे ठाकुर माँ के कमरे में रख लेना।
   उनका कमरा बड़ा भी बहुत है। उसी में एक ओर तेरे लिए खाट भी पड़ जाएगी, और तेरी ठाकुर माँ के साथ रहने पर तुझे अकेले डर भी न लगेगा।”
  पारो का जी किया कि चिल्ला के कह दे कि मुझे अभी भी किसी से डर नही लगता। और मैं ये कमरा छोड़ कही नही जाऊंगी। लेकिन देव जाते जाते उसकी ज़बान उसकी बोली भी अपने साथ ले गया था।
  वो चुप खड़ी रही।

” क्यों बऊ दी मैं गलत कह रही हूँ क्या? इतने बड़े पलंग का और इतने बड़े कमरे का अब इसे क्या काम?वैसे भी अब इसे पलंग पर नही खाट पर सोना चाहिए। पुराने लोग तो ज़मीन पर सोने कहते थे, पर चलो हम लोग वैसे पुराने खयालों वाले नही हैं। दूसरी बात यह नीचे माँ के साथ रहेगी तो उन्हें भी आसरा हो जाएगा। रात बरात कभी पानी पीना है कभी बाथरूम जाना है आखिर कोई तो साथ रहेगा। और फिर बऊ दी तुम्हें माँ के लिए नर्स रखने की भी ज़रूरत न होगी। अरे जब घर की बहु नहला धुला सकती है तो इसी काम के लिए पैसे बहाने की क्या ज़रूरत?”

पारो ने बड़ी मुश्किल से आँख उठा कर अपनी सास को देखा उन्होंने उससे नज़रे चुरा लीं। पारो समझ गयी देव के न रहने पर शोक जताने आयी बड़ी बुआ इसी घर में अपना पक्का आवास बनाना चाह रहीं थीं। एक ही लड़का था उनका, जो पढ़ लिख नही पाया था। वो पहले भी एक बार देव से उसे अपने साथ काम सिखाने कह चुकी थी लेकिन अब तो लग रहा था वो उसे देव की दुकान पर ही बैठाने के मंसूबे लिए आयीं थीं। क्योंकि सारे काज निपटने के बाद जब उनके पतिदेव ने उनसे भी वापस चलने की बात कही तो उन्होंने कुछ दिन बाद आने की बात कह कर उन्हें अकेले ही भेज दिया था। उनके पति पोस्टमास्टर रह कर रिटायर हुए थे इसी से कुछ खास आमद थी नही पर मायके की सम्पन्नता उनकी आंखें चौन्धिया जाती थी।

  जबसे वो यहाँ आई थी कोई न कोई तिकतिक लगाये ही रहतीं। कभी उन्हें माछ में सरसों की झाल कम लगती तो कभी मिष्टी दोई में मीठा। कुल मिलाकर वो किसी से संतुष्ट नही थीं। पारो से तो कतई नही।
  अब आज वो एक तरह से पारो का कमरा हथियाने चली आयी थीं। पारो ने एक नज़र सासु माँ पर डाली उनके चेहरे पर कष्ट की हल्की सी छाया आकर गुज़र गयी, अपनी भावनाओं पर अपने गुस्से को जबरदस्ती लादती वो भी अपनी ननंद के सुरों में सुर मिलाने लगी…-“ठीक ही तो कह रहीं है दीदी। तुम इतने बड़े कमरे में घबराओगी ही,इससे अच्छा है वहीं नीचे रहोगी तो माँ को वक्त पर कुछ ज़रूरत हो तो तुम कर सकोगी। वैसे भी अब तुम्हारे जीवन में और बचा ही क्या है? “

  ” ऐसा क्यों बोल रहीं है काकी माँ! उसका पूरा जीवन बचा है और जीवन से अनमोल क्या है भला? वो भी अपने जीवन को किसी सुंदर और सार्थक कार्य में लगा सकती है। अपने जीवन को एक सुंदर आकार दे सकती हैं। आखिर भगवान ने तो हमें अकेला ही पैदा किया है,रिश्ते नाते तो हम जोड़ते चले जातें हैं। और फिर उन्हीं नातों में अपना जीवन ढूंढने लगते हैं ये सोचे बिना की उस ऊपर वाले ने हमें क्यों पैदा किया…”


  
    आनन्दी अपनी लय में बोलती चली जा रही थी, की उसकी सास ने उसे टोक दिया…-“तुम्हारे जितना दिमाग हम लोगों के पास तो है नही बऊ माँ! कनकलता दीदी घर पर सबसे बड़ी हैं, ये अपना घर छोड़ हमारे यहाँ दुख के समय में खड़ी हैं, हम सब के साथ। इनका सम्मान करना भी हमारा ही धर्म है। नीचे उनके लिए अलग से कोई कमरा नही है। माँ और बेटा दो लोग हैं। इस इतने बड़े कमरे में आराम से रह सकतें हैं। पारो का क्या है कुछ दिन ठाकुर माँ के कमरे में रह जायेगी तो क्या बिगड़ जायेगा। नीचे हम सब भी तो साथ होंगे।
   और फिर दीदी के जाने के बाद तो कमरा देव का ही है, पारो को मिल ही जायेगा।”

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  अपनी सास के सामने आनन्दी कम ही बोलती थी, लेकिन आज उसका धैर्य चूक गया था। उसे बुआ जी के वहाँ रहने से कोई परेशानी नही थी, लेकिन उनका बात-बात पर घर परिवार के मामले में दखल देना उसे अखर जाता था।
   पर अब सासु माँ की तीखी आँखों के चाबुक ने उसे एक किनारे चुप खड़ा रहने की ताकीद कर दी थी। वो चुप खड़ी पारो को देख रही थी…-” जी ठीक है, मैं रात तक अपनी जरूरत का सामना लेकर नीचे चली जाऊंगी। ” पारो ने कह तो दिया लेकिन वो उन सब से और क्या कहती कि जब वो अपनी सास तक में अपने पति को देख पा रही थी तो इस कमरे में तो कितनी अनगिनत यादें गुंथी पड़ी थी। इसी खिड़की की बल्लियों पर उसके हाथों के निशान थे, जिन्हें पकड़ कर खड़ी वो यही महसूस करती की उसका हाथ देव के हाथों पर हैं। जिस तकिए पर वो सिर रखता था, जिस चादर को वो ओढता था, जिस तौलिए को काम में लाता था, वो सारी अनमोल धरोहरों को साथ ले पारो नीचे चली गयी। ठाकुर माँ के कमरे में एक ओर उसके लिए एक पुरानी चारपाई डाल दी गयी।
   उसमें एक पतले से रुई के गद्दे पर तकिया डाले जब वो रात में लेटी तो उसकी आंखें झर झर बहने लगीं… कहाँ देव के सामने वो अकेले उस हिंडोले से पलंग पर अकेली सोती थी। उन रेशमी चादरों मखमली तकियों के बाद आज ये पतला गद्दा उतना नही चुभ रहा था जितना देव का ऐसे चला जाना।
   किसी एक व्यक्ति के चले जाने से संसार कैसा वीरान और सूना हो जाता है, पारो महसूस कर रही थी। और सोचते सोचते अचानक एक बात उसके दिमाग में आई की क्या अगर वो देव की जगह मर जाती तो देव का जीवन भी ऐसा ही कठिन हो जाता? या उसके जीवन में कुछ और तरह की बातें होतीं।
  सभी तरह की बातें सोचती वो सो गई।
       रात उसे ऐसा लगा जैसे देव की उंगलियां उस पर चल रहीं हैं। चेहरे पर से फिसलती उंगलियां गले से नीचे उतरने को थीं कि नींद में भी उसे याद आ गया कि देव तो अब है नही फिर ये कौन था। वो चौन्क कर उठ बैठी। खिड़की पर कुछ सरसराहट सी हुई और सब कुछ एकदम शांत हो गया।
  उसकी खाट खिड़की से लगी हुई थी, उसने बैठे बैठे ही बाहर झांक कर देखा, बाहर कोई नज़र नही आया। तब क्या वो सच में सपने में देव को ही महसूस कर रही थी, या फिर खिड़की से किसी ने अपना हाथ अंदर डाल रखा था?
  पर कौन हो सकता था वहाँ इस वक्त? उसके बदन में एक झुरझुरी सी दौड़ गयी… उसके बाद वो रात उसकी आँखों ही आंखों में कट गई…रात बीत गयी, सुबह हो गयी लेकिन वो रात की बात किसी से कह न सकी।

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   दिन बीत रहे थे। लाली भी कुछ दिन मायके रह कर वापस चली गयी थी। अब घर भर में दो ही लोग थे जिन्हें पारो की चिंता थी, एक आनन्दी और दूसरी ठाकुर माँ। उन्हें हमेशा पारो को देख कर यही लगता कि उसकी इस हालत की ज़िम्मेदार वो खुद हैं। ना वो देव को अपने साथ लेकर जाती और न देव के साथ ये हादसा होता।
   पर घर भर की सबसे बुज़ुर्ग होने पर भी कई बातों में उनकी भी नही चलती थी। जो नियम थे वो तो थे ही।
   आनन्दी ने दर्शन से कह कर पारो को पढ़ने के लिए किताबें दिलवानी शुरू कर दी थीं। अब दोपहर में पारो ठाकुर माँ के कमरे में एक किनारे बैठी किताबें पढ़ती रहती।
   और कभी जब दर्शन उससे किसी पढ़े गए पद की व्याख्या पूछता या उसे गलत बताता तो वो उसे सहीं कर देती।
  एक शाम वो बाहर से आते हुए ढेर सारे अमरूद ले आया। नीचे आंगन में बैठी पारो कोई काम कर रही थी कि पीछे से आकर उसने उसकी झोली में अमरूद डाल दिए। चौन्क कर दर्शन को देख पारो मुस्कुरा उठी। उसके मन के अंदर कहीं छिपी बैठी लड़की मुस्कुरा उठी। वो सारे अमरूद समेट कर रसोई की तरफ जाने लगी…-” अरे कहाँ चल दीं सारे अमरूद समेट कर? क्या हम लोगों को एक भी न दोगी? “
  दर्शन के सवाल पर वो पलट कर थम गई…-“सारे ही तुम्हारे हैं। मैं तो अंदर धोने लेकर जा रही थी। “
   ” मैं क्या जानूं? मुझे तो लगा तुम अकेली ही खा लोगी!”
   ” इतनी भुक्खड़ लगती हूँ तुम्हें”  हँस कर उसे घूरती पारो आगे बढ़ने लगी कि उसके सिर पर पीछे से एक टपली मार दर्शन सीढ़ियों पर भागता हुआ चढ़ गया, और उसकी टपली का जवाब देने आँचल से सारे अमरूद फेंक कर पारो उसके पीछे दौड़ पड़ी। बड़े दिनों बाद पारो ने जतन से जिस बावली सी लड़की को अपने भीतर छिपा रखा था बाहर आ गयी।
  ” अरे सम्भल के ! फिसल न जाना तुम दोनों। ” आनन्दी दोनो की चुलहबाज़ी देखती मुस्कुराती हुई अपने आँचल से अपना हाथ पोंछती रसोई में चली गयी, और उसकी बात पर वहीं आंगन में बैठी बुआ जी ज़हर बुझा तीर छोड़ गई…-” समय रहते इन्हें न रोका तो फिसल ही तो जाएंगे। “
   वही बैठ कर चांवल चुनती पारो की सास का जी धक से रह गया, उन्होंने साथ बैठी अपनी जेठानी की ओर देखा, उनकी अनुभवी आंखों में भी चिंता की रेखाएं नज़र आने लगीं थीं…..

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क्रमशः

aparna…..

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दिल से …..

     समाज के कायदे कौन बनाता है? कौन हैं वो समाज के ठेकेदार जिन्होंने औरतों के लिए अलग और मर्दों के लिए अलग नियम बना रखें हैं।
  हम कितना भी लिख पढ़ जाएं , कितने भी आगे निकल जाएं लेकिन अब भी बिना पति के एक औरत का जीवन उतना सुगम और सहज नही हो पाया है। दुर्भाग्यवश अगर जीवनसाथी बिछड़ जाएं या अलग हो जाएं तो इसमें किसी का कोई दोष तो नही फिर क्यों उसके साथ ऐसा सुलूक किया जाता है कि उसका दुख कम होने की जगह और बढ़ता चला जाता है।


   काश लोग फ़िज़ूल नियमों की जगह एक ही नियम प्रेम का नियम मान लें तो किसी का दुख समाप्त भले न कर सकें कुछ हद तक कम तो ज़रूर कर पाएंगे।
  
     आगे के भाग हो सकता है पढ़ने में थोड़े और तकलीफदेह हों लेकिन अगर कृष्ण दुख देते हैं तो उससे उबारने वाले भी वहीं हैं।

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  आपका सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ। आप मुझे पढ़ते हैं सराहतें हैं, दिल से शुक्रिया नवाज़िश!!!

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aparna…


 

शादी.कॉम-11

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   पिंकी और रतन की सगाई संपन्न हुई।।।सारे लोगों को व्यस्तता का जो बहाना मिला था चूक गया,, सारे रस भरे दिन चूक गये,रसोइये ने अपने साजो सामान को समेटा ,तगडा नेग लिया और चलता बना,एक एक कर मेहमानो ने भी जाना शुरु कर दिया।।
  पर ऐसे मौकों पे कुछ ऐसे मेहमान भी आते हैं,जो आते ही लम्बा टिकने के लिये हैं,,ऐसी ही एक मेहमान थी राजा की अम्मा की चचेरी बहन शन्नो मौसी।।।
     शन्नो मौसी का वहाँ टिकने का मुख्य उददेश्य था,राजा भैय्या की शादी।। एक तो कान्यकुब्ज ब्राम्हण परिवारों में मिलने वाला ऊँचा दहेज उसपे उनकी सहेली की ननंद की भतीजी जिसके फूफा स्वयं जज महोदय!!! अब ऐसा जानदार रिश्ता कोई हाथ से निकलने दे सकता है क्या,,कम से कम शन्नो मौसी जैसी व्यवहार कुशला और सामाजिक महिला तो बिल्कुल नही।।
   राजा की अम्मा पहले ही रूपा की बहन रेखा को लेकर परेशान थी,अब शन्नो जिज्जी एक नया फसाद लिये खड़ी थी,,पर इन सबसे बेखबर राजा भैय्या अपने में मगन थे।।।

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  राजा भईया का सारा दिन जिम मे पसीना बहाने बहवाने में निकल जाता और रात थोड़ा बहुत किताबें खोलने में ।।
    राजा भैय्या ऐसे जीव थे जिन्हें ज्यादा सोचने की आदत नही थी,जो बात उन्हें एक बार में समझ नही आती,उसे वो दुबारा पलट के भी नही देखते।। ऐसा नही था कि वो दिमाग से पैदल थे,पर बात ये थी कि उन्होनें आज तक ये नही जाना था कि दिमाग संभाल कर तिजोरी में रखने की वस्तु नही बल्कि दिल खोल कर खर्च करने की चीज़ है,और जितना ही उसे खर्चोगे उतनी ही बढेगी।।पर उनकी इस खूबी को बांसुरी ने पकड़ लिया।।।
   बांसुरी इतने दिनों की राजा की संगत में ये बात समझ गई कि राजा को पढ़ाई बोल कर पढ़ाने पर उसका डब्बा गोल ही होना है,इसिलिए उसने राजा को अलग ढंग से पढ़ाना शुरु कर दिया,,इतिहास में उसने सिलसिलेवार सन लिख कर उन उन काल में हुई घटनाओं दुर्घटनाओं की कहानी सी तैयार की और जिम में वर्क आउट करते हुए वो राजा को सतत उन कहानियों का स्मरण और पाठ कराती,जल्दी ही राजा  को सारा सब कुछ कंठस्थ होने लगा,कब प्रथम महायुद्ध हुआ,किसके बीच हुआ,,पहली सभ्यता का नाम,गान्धी जी का कब स्वदेश आगमन हुआ से लेकर कब गोलमेज सम्मेलन हुआ,और कब हमे आज़ादी मिली,कब हमारा संविधान तैयार हुआ।।
    जब एक बार किसी इन्सान को दिमागी मेहनत करने की आदत हो जाती है तो इससे इतर अन्य कोई कार्य रुचिकर नही लगता।।ये सब पढ़ते हुए राजा को ऐसी रूचि उत्पन्न हुई कि अब उसकी दिमागी खुराक के लिये बारहवीं के सिलेबस की रसद कम पड़ने लगी,अब राजा खोज खोज कर पढ़ने योग्य अयोग्य सभी कुछ पढ़ने लगा।।।

” हमको तो लगने लगा है,हम इत्ता पढ़ डाले हैं कि अगर हम कौन बनेगा करोड़पति खेलने गये तो हम पूरा एक करोड़ एके बार में जीत डालेंगे ऊ भी बिना लाईफ लाइन के,,क्यों गुरू जी।।”

राजा ने बांसुरी से हँसके पूछा,पर जवाब मिला प्रेम से…..

” बिल्कुल सही बोले भईया जी,औ ई बसुरीया इत्ता बजन कम कर डाली है की अगर मिस इंडिया बनने गई तो अकेली ही सब जीत डालेगी,ऊ का का होता है ना मिस वर्ड,मिस ब्रम्हाण्ड औ जाने का का।।”

” हमारे लिये काहे इतना कड़वे हो प्रेम,,हमने सुना था लड़के लड़कों से जलतें हैं,लड़कियाँ लड़कियों से,पर तुम तो हमी से जले कटे बैठे रहते हो,,दिमाग को थोड़ा ठंडा रखा करो।।”

बाँसुरी ऐसा बोल कर वहाँ से उठ गई,और दिनों की तरह उसके चेहरे पे वो उल्लास नही दिखा राजा को, जिसके कारण राजा भी उठ कर उसके पीछे पीछे चला आया।।

” क्या हुआ बांसुरी? कोई परेसानी है?? आज तुम थोड़ा चिंतित दुखी परेसान लग रही हो।।”

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” समझ गये कि हम परेशान लग रहे पर तुमको तीन पर्यायवाची बोलने की क्या ज़रूरत??आजकल हर जगह अपनी परीक्षा की तैयारी में ही भिडे रहते हो।।” ऐसा बोल कर बांसुरी मुस्कुरा पड़ी और राजा शरमा के नीचे देखने लगा।।

” बांसुरी हम बहुत दिनों से एक बात सोच रहे थे,तुम हमारी सबसे करीबी दोस्त बन गई हो,तुमने हमें इतना अच्छे से पढ़ाया है कि हमको अब पढ़ाई लिखाई अच्छी लगने लगी है।” बांसुरी खड़ी मुस्कुराती रही
” हम और कुछ तो दे नही सकते,,आज तुमको एक छोटा सा पार्टी देना चाहतें हैं ।””

” अरे अभी पास तो हो जाओ,,फिर हम तुमसे पार्टी भी ले लेंगे।।”

” हमारे पास होने की पार्टी तो तुम दोगी हमे,देखो ई दू  तीन महीना में तुम भी दुबला गई और हम भी पढ़ लिख लिये तो अब हमको लगता है पार्टी तो देना ही पड़ेगा।।”

बांसुरी के मन की उदासी राजा के पकड़ में नही आई, अभी वो दोनो खड़े बात कर ही रहे थे कि डॉ रानी वहाँ चली आई ।।

” कैसे हो राजा,क्या चल रहा आजकल!! बहुत दिन से तुम दिखे नही तो हमनें सोचा हम ही मिल आते हैं तुमसे ।।”
उन दोनों को बातों में उलझा छोड़ बाँसुरी वहां से निकल गई ,,रानी और राजा भईया वहीं जिम की सीढियों पर बैठ गये,,रानी दुनिया भर की तमाम बातें राजा को बताती रही,बीच बीच में ” सुन रहे हो ना”  ” अच्छा बताओ मैने अभी अभी क्या कहा था” जैसे क़्विज़ कॉंटेस्ट भी खेलती रही पर बाँसुरी का इस तरह चुपचाप चले जाना राजा को बुरी तरह खलने लगा,वो दूर तक बाँसुरी को जाते हुए देखता रहा,, बार बार राजा का मन हुआ कि जाकर बाँसुरी को रोक ले और पूछ ले कि ऐसे बिना कुछ बोले कैसे चली गई ,पर वक्त की नजाकत देखते हुए वो चुप चाप बैठा रानी की बातों को सुनता रहा।।

   लोग कहतें हैं पहला प्यार कभी नही भूलता,अब लोग कहतें हैं तो ऐसा होता ही होगा पर लोगों के साथ ही,, क्योंकि राजा के साथ ऐसा कुछ नही हुआ।।
     राजा ने जितनी शिद्दत से रानी से अपनी अल्हड़ सी उम्र में प्यार किया था,उतनी ही शिद्दत से आज वो उस प्यार को भूल बैठा।।रानी में आज भी कोई कमी नही थी,खूबसूरत तो पहले ही थी अब डॉक्टरी की पढाई के आत्मविश्वास ने चेहरे को एक अलग लुनायी से रंग दिया था,बावजूद इसके अब राजा को रानी में सिर्फ एक अच्छी सच्ची दोस्त ही नज़र आ रही थी।।
     प्यार मोहब्बत ऐसा एहसास होता है कि जो करता है और जिससे करता है,उसे बताने और जताने की ज़रूरत नही रह जाती,,और जब वही प्यार करने वाला प्यार नही करता है,तब तो लगता है जैसे सारा संसार चीख चीख कर आपको ये बताने पे अमादा है कि ‘ अब ये तुझसे प्यार नही करता’।।
रानी भी राजा की भावनाओं को समझ चुकी थी,पर उसे कोई शिकायत ना थी,या शिकायत करने कि अवधि वो पार कर चुकी थी।।अपने मन की दुविधा को खुद में ही समेटे उसने बहुत सारी बातें राजा से करी,ये जानते हुए भी कि राजा उसके पास बैठा हो कर भी बांसुरी के साथ उसके घर तक चला गया है।

” राजा एक बात पूछें तुमसे?अरे हमे सुन भी रहे हो या नही?? माना की बहुत पतली हो गई है तुम्हारी मुटकि पर अभी भी हमसे तो मोटी ही है।”  रानी अपनी ही बात पर हंसने लगी,राजा चौंक कर उसे देखने लगा__ ” क्या कहा तुमने रानी,अच्छा सुनो हमे कुछ काम से घर जाना है,चलो तुम्हें तुम्हारे घर उतार देंगे।।”

” जी मेहरबानी आप मुझे मेरे घर तक लिफ्ट देंगे,,एक बात पूछना चाहतें हैं आपसे राजा बाबु।”

” हाँ पूछो।” अपनी गाड़ी स्टार्ट करते हुए राजा ने कहा

” बुरा मत मान जाना,,हम कुछ दिन से जो नोटिस किये वही पूछ रहे हैं,,तुम्हें बाँसुरी कैसी लगती है।।”

” कैसी लगती है मतलब?? ठीके है,मेहनती है,होशियार है,जो ठान लेती है कर के रहती है,,अब देखो ,,जब जिम मे आई रही 68 किलो की रही ,और अभी 60 की हुई गई,,बहुत मेहनती है,एकदम जी जान से जुट जाती है,,पढ़ाई में तो पुछो मत,हमें सोचो हमार जैसे लठ को आदमी बना डाली( राजा भैय्या की नजरों में जिसे शिक्षा का मह्त्व पता हो और जो शिक्षित हो वही असली पुरूष संज्ञा है)
राजा भैय्या की बात को बीच में ही काट कर रानी ने कहना शुरु किया__

” हाँ समझ गये!! बस करो अब तारीफ ,,तो मतलब हम जो सोच रहे वो सच है।”

” अब हमे क्या पता तुम क्या सोच रही??”

” ये कि तुम्हें बांसुरी अच्छी लगने लगी है।।है ना?”

” अच्छी है तो अच्छी लगेगी ही??”

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रानी मुस्कुराने लगी ” हम्म अच्छी तो है,पर तुम्हें कुछ ज्यादा ही अच्छी लगने लगी है।।”

जब किसी की चोरी पकड़ी जाती है तो उस वक्त उस इन्सान का सारा प्रयास इसी ओर रहता है कि किसी तरह उसकी बेगुनाही साबित हो जाये,ऐसा ही कुछ राजा के साथ हुआ!!! अभी वो बेचारे स्वयं अपने मन की थाह नही पा पाये थे उन्हें स्वयं अपने हृदय के अन्दर बहने वाले इस प्रेमझरने का स्त्रोत पता नही था कि उस झरने को पहचान कर लोग बाग उसका रसास्वादन करने लगे।।।राजा भैय्या सोच में पड़ गये कि शाम को बांसुरी से मिलने जाना चाहिये या नही, उन्हें उस समय यही उचित लगा कि मिलने नही जाना ही ठीक रहेगा।।वो बार बार अपने मन को तरह तरह से यही समझाने में लगे रहे कि रानी को कुछ गलतफहमी हुई है,और उनके मन में बाँसुरी को लेकर कोई विकार नही है।।

  वो पूरा दिन बस यही सोचते निकल गया कि अगर मिलने चला गया तो सब क्या सोचेंगे,और अगर मिलने नही गया तो बांसुरी क्या सोचेगी!! आखिर बांसुरी सब पर भारी पड़ी ।।
    तरह तरह के विचारों को सोचते सोचते अंतत: राजा ने यही सोचा कि जब उनका मन साफ है स्वच्छ है बांसुरी से मिलने जाने मे कोई परहेज नही।।ऐसा सोचने के बाद मन फूल सा हल्का हो गया,सुबह से सोच सोच के जो पीड़ा के बादल राजा ने अपने दिमाग मे जमा कर लिये थे,सब एकाएक बरस गये,और उजली चांदनी छिटक गई ।।

  अपने आप को भली तरह से सजा संवार कर राजा बाबु बाँसुरी से मिलने जाने निकले,ये प्रथम अनुभव था जब राजा अपनी किसी महिला मित्र से मिलने जा रहा था,इसके पहले तो हमेशा अपने चेलों के साथ घूमने के लिये कभी कोई तैयारी नही लगी पर आज कुछ विशेष यत्न से सारी साज संवार की गई थी,,मन ही मन अपने आप पे खुश होते राजा भईया निकल ही रहे थे कि भाभी जी का स्वर सुनाई पड़ा

” किधर को चली सवारी लल्ला जी?? बड़े बन ठन के निकल रहे हैं ।”
   ‘काली बिल्ली रास्ता काट गई ‘ वैसे भैय्या जी ये सब बातों को नही मानते थे,उन्हें अपनी भाभी पर स्नेह भी था पर उनकी इस कदर की टॉन्ट वाली बातों पे अरुचि भी थी।।

” कुछ नही भाभी बस मन्दिर तक जा रहे थे।।”

” आज कौन से मन्दिर जा रहे लल्ला जी??”
भाभी तो एकदम ही पीछे पड गई,अब बेचारे राजा भैय्या क्या बोलते

” बड़े हनुमान जा रहे,,आप चलेंगी??” आप चलेंगी कुछ इस ढंग से पूछा गया कि इस सवाल का जवाब आपको ना में ही देना है कहीं गलती से हाँ कह दिया तो भईया जी कहीं गाड़ी सहित आपको गंगा जी में ना डूबा आयें।।

” ना ना आप ही जाओ,,बस आते बखत उधर जो सेंतराम हलवाई है ना उसकी चाट हमारे लिये लेते आना,और उसे बोलना छोले कम डालेगा,ज्यादा गीला ना करे,टिकिया को अलग से बाँधेगा नही क्या होता है ना टिकिया गल जाती है सारी की सारी।”

” और कुछ भाभी।।”

” नही बस इत्ता ही याद से ले आना,बहुत है।”

अब राजा बाबु को जाना था रॉयल पैलेस होटल और बड़े हनुमान पड़ते थे घड़ी चौक से दाहिना जाकर,बेचारे झूठ बोल कर बुरा फंसे।।चाट तो वो अपने अनुचरों से भी मँगा लेते पर हनुमान जी का नाम ले दिया,अब मन्दिर नही गये तो भगवान नाराज और होटल टाईम से नही पहुँचे तो बांसुरी ।।

उन्होनें बांसुरी को फ़ोन लगाया,,रिंग बजने पे फ़ोन उठाया उधर से बांसुरी की अम्मा ने__ ” हेलो कौन बोल रा।”

बेचारे राजा भईया पहली बार किसी लड़की के नम्बर पे फ़ोन किये वो भी उसकी माँ उठा ली,अब का करे का ना करें की स्थिति थी।।

” नमस्ते !! बांसुरी है क्या?”
” ऊ तो अभिचे कहीं निकल गई!! बोल के गई है आने में थोड़ा देरी हो जायेगा।।तुम कौन बोल रये बेटा…..इतने में फ़ोन कट गया,राजा भईया को बड़ा गुस्सा आया,अरे इतनी भी क्या हड़बड़ी,,थोड़ा देर में नही निकल सकती थी।।
  हर बात पे बांसुरी की राय लेने की ऐसी आदत हो गई की अब इस आड़े वक्त में क्या करें,राजा भैय्या को सूझ ही नही रहा था।।उन्होनें अपनी गाड़ी उठाई और चल दिये।।

कुछ 20 मिनट बाद राजा भैय्या रॉयल पैलेस होटल की पार्किंग में थे।।गाड़ी खड़े करते हुए जाने क्यों एक अजीब सी बेचैनी उन्हें घेरने लगी।।आज तक किसी काम को करने के पहले दुबारा ना सोचने वाले राजा की हालत खराब थी,इतना तो उसने अपने सारे जीवन मे नही सोचा जितना आज अकेले एक दिन मे सोच लिया।खैर अपने आप को मजबूत कर अन्दर बढ़ ही रहे थे कि__” सर क्या आप अपनी पहली डेट पर आये हैं,अगर हाँ तो हमारे पास आपके लिये कुछ है”

अचानक से दरबान के साथ खड़े होटल मैनेजर के इस सवाल पर राजा भईया घबड़ा गये,एकाएक उनसे बोल ना फूटा__”सर अगर ये आपकी फ़र्स्ट डेट है तो ये रहा आपके लिये एक गुलाब !! हमारी ओर से!! आप अपनी गर्लफ्रैंड को ये दीजिये।।

” पर भैय्या तुम काहे दे रहे फ़्री में गुलाब??”

” सर पॉलिसी है हमारी,आज की तारीख पे हमारे साहब की शादी हुई थी तो आज के दिन जो कपल डेट पे आते हैं उन्हें हम गुलाब और कोम्प्लिमेन्ट्री ड्रिंक और स्टार्टर खिलाते हैं ।”

राजा का ये प्रथम अनुभव था,आज तक अपने चेलों के साथ सेंतराम की कचौड़ियाँ पेली थी या टिक्की।। पीने पिलाने का ऐसा था कि कभी एक बार प्रेम कहीं  से पी पिला के लौटा तो उसकी लटपटाती जिव्हा और उठने वाली कड़वी गन्ध से भी राजा नही समझ पाया तब प्रिंस ने ही सहायता की” अरे ई प्रेम कहीं से पी के आ रहा है भैय्या जी” बस इतना सुनना था कि राजा ने उसे 2 थप्पड़ लगा दिये__
               ” अरे बस बियरे तो पिये हैं,ऊ हार्ड ड्रिंक थोड़ी होता है भैय्या जी,,पुराने सब दोस्त मिल गये रहे जबरिया पिला दिये,औ जो थोड़ी बहुत चढ़ी रही ऊ आपका थप्पड़ उतार दिया।।”
  हालाँकि बाद में राजा ने प्रेम को ताकीद करी की जिम में जहां महिलायें भी आती हैं,वहाँ इस तरह पी कर आना वर्जित है,माफ कर दिया।।
   
  अब आज इस तरह मैनेजर से डाइरेक्ट फ़्री ड्रिंक की बात सुन भैय्या जी ज़रा झेंप गये और सिर्फ गुलाब लिये अन्दर चल दिये।।

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   अन्दर बड़े से हॉल में हल्की-सी रोशनी में हल्का धीमा सा कर्णप्रिय संगीत गूँज रहा था।।रूम फ्रेशनर की खुशबू सारे माहौल को खुशनुमा कर रही थी, ऐसे में भईया जी चारों तरफ नज़र दौड़ाते बांसुरी को ढूँढ रहे थे।।
     राजा को बांसुरी दिख गई,,,वो एक बार फिर अजीब सी परेशानी में घिरने लगा,आज सुबह तक जिसे सिर्फ एक छोटी सी पार्टी समझ कर देना चाहता था, वो रानी से बात होने के बाद से एक छोटी सी डेट में बदल गई ।।कितना भी नादान हो पर राजा डेट का मतलब तो समझता ही था।।
   
” कब आईं बांसुरी?? हमको थोड़ा ट्रैफिक के कारण देर हो गया।”

आज सब कुछ बदला सा लग रहा था राजा को।।
रानी की बातों का असर था या मैनेजर की बातों का, या उस रोमैंटिक माहौल का असर आज बांसुरी वाकई बाकी दिनों से अलग लग रही थी।।
बहुत सुन्दर तो बांसुरी को नही कहा जा सकता था पर वो स्मार्ट थी,अपने आप को सलीके से रखना उसे आता था,अब आठ किलो वजन कम करने के बाद उसका आत्मविश्वास और चमक गया था।।
कुल मिलाकर आज के ज़माने में कही जाने वाली स्मार्ट प्रेजेंटेबल लड़की थी।।

” अरे तुम खड़े क्यों हो राजा बैठो ना।”

” क्या कर रही थी अब तक ” अपनी कुर्सी पर बैठते हुए राजा ने सवाल किया

” कुछ नही ,बस मेन्यू देख रहे थे कि तुम्हारे लायक क्या हेल्दी खाने को मिल सकता है।”

” अरे हमारे चक्कर में ना पड़ो,जो तुम्हें पसंद हो वो मँगा लो।।” राजा के ऐसा बोलते ही बांसुरी मुस्कुरा पड़ी

” अरे राजा अब हमें भी तुम्हारी तरह मूँग और चना ही भाने लगा है,पता है एक दिन तो अम्मा बेचारी रो पड़ी,बुआ से बोलती हैं” लगता है हमार बांसुरी को जिन ऊन पकड़ लिया है,आज कल खाने को देखती भी नही,सिर्फ फलाहार करे है छोरी जिज्जी।” मुझे तो ऐसी हँसी आई,मैनें कहा अम्मा उस जिन्न का एक नाम भी है ” राजा”

बांसुरी तो ऐसा बोल कर फिर हंसने लगी पर राजा बेचारा शरमा गया।।

” अच्छा राजा सुनो तुमसे एक बात पूछना चाहते हैं “

” हाँ पूछो”
” सच तो बोलोगे ना??”
धड़कते दिल से राजा ने कहा” बिल्कुल सच बोलेंगे।”
उसे लगा जाने क्या पूछने वाली है।असल में तो राजा को खुद ही समझ नही आया था,कि इन कुछ महिनों के साथ में कब बांसुरी उसके मन में रात दिन बजने लगी,हर काम उस से पूछ पूछ कर करने की ऐसी आदत हुई कि कई बार जिम के काम से भी कहीं जाना हो तो पहले बांसुरी का अप्रूवल लगने लगा।।राजा तो नही समझा कि ये क्या है लेकिन उसके आस पास के लोगों जैसे प्रेम रानी यहाँ तक की पिंकी को भी समझ आने लगा कि राजा को बांसुरी भा गई है।।

” हम कैसे दिखते हैं,देखो एकदम सच बोलना ,तुम्हें तुम्हारे भगवान की कसम।”

भगवान की कसम सुनते ही भैय्या जी को बड़े हनुमान याद आ गये,दोनों हाथ कान से लगा कर मन ही मन भगवान से माफी मांग कर राजा ने कहा__

” हम सच बोलें तो तुम बहुत ही प्यारी दिखती हो,मासूम सी ।। और होशियार तो बहुतै दिखती हो।।”
  अभी राजा अपनी बात पूरा भी नही किया था कि वेटर उनका ऑर्डर ले कर आ गया।।

” अरे कॉफ़ी मंगाए हो राजा??”

” हाँ बांसुरी ऐसे होटल में चाय नही पी जाती, इसिलिए हम कॉफ़ी मँगा लिये,जल्दी से कॉफ़ी पी लो,फिर तुम्हे किसी से मिलवाने ले कर जाना है।।”

दोनो कॉफ़ी पीकर निकलने लगे तब बांसुरी ने राजा को टेबल पर गलती से भूले हुए गुलाब की याद दिलाई,,” किसके लिये लाये हो गुलाब”

” बताते हैं!! पहले हमारे साथ चलो।।”

बांसुरी को सिर्फ एक गुलाब देने की भी हिम्मत राजा नही जुटा पाया,दोनो उसकी रॉयल एनफील्ड में बैठ कर बड़े हनुमान मन्दिर को निकल चले।।रास्ते भर इधर उधर की बातें बताती बांसुरी ने अपने गणित के प्रोफेसर भास्कर सर की ढ़ेर सारी बातें राजा को बताईं,और बताते बताते अंत में धीरे से अपने मन में उपजी प्यार की भावना को भी राजा को बता दिया__
         ” देखो राजा जाने अनजाने तुम हमारे बहुत ही ज्यादा अच्छे दोस्त बन गये हो!! निरमा से तो अब मिलना भी कम हो पाता है,उसे बताएंगे भी तो हमारी बात समझेगी नही,और ना ही कोई मदद करेगी,क्योंकि वो हमसे इतना प्यार करती है कि उसे हममे कोई कमी नज़र ही नही आती।। तुम भी हमारे बहुत सच्चे दोस्त बन गये हो,हो ना।।”

बहुत धीरे से राजा ने कहा” हाँ हैं,बोलो क्या मदद चाहिये।”

” पहली बार जब भास्कर सर से मिले तभी हमें सर बहुत भा गये थे,,फिर उनका गणित पढ़ाने का स्टायल!!ऐसा पढाते हैं राजा की पूछो मत!! नये नये समीकरण खुद तैय्यार कर देते हैं ।।तुम हमारी इतनी मदद बस कर दो कि वो भी हमारी तरफ ध्यान देने लगे,,मतलब समझ रहे हो,हम क्या कर रहे।।

बिल्कुल रुआंसा होकर राजा ने कहा” नही समझे”

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” अरे बुद्धू!! तुम खुद लड़के हो,तुम हमें बता सकते हो ना कि लड़कों को क्या पसंद होता है,मतलब कैसी लडकियों से बात करना पसंद है ….अब और कितना खुल के बताएँ ।।”

” हम्म समझ गये!! कर देंगे तुम्हारी मदद।।”

” थैंक यू राजा ,हमे पता था,तुम बहुत अच्छे हो हमारी मदद ज़रूर करोगे,,अच्छा ये तो बताया ही नही तुमने कि ये गुलाब किसके लिये रखे हो।।”

” हनुमान जी के लिये,,वही चढाना है हमें,सुनो बांसुरी तुम्हें घर जाने की देरी हो रही तो तुम्हे घड़ी चौक पे उतार देते हैं!! हमको हनुमान मन्दिर जाना है।।”

” नही ऐसी कोई देर नही हो रही ,तुम्हारे साथ ही तो हैं,आज हमारे पतले होने की पार्टी जो है,पर तुम तो बस कॉफ़ी में निपटा दिये।।”

” अरे तुम वो भास्कर भास्कर किये जा रही थी तो हमे कुछ सूझा ही नही,बस कॉफ़ी मँगा लिये।।

” चलो कोई बात नही!! अभी हमे चार पांच किलो और कम करना है,उसके बाद जी भर के खायेंगे, अच्छा सुनो !! तुम मिलवाने किससे वाले हो।।’

” अरे किसी से नही!! ऐसे ही कह दिये रहे!! हमको मन्दिर जाना था।।हम बचपन से जब भी परेशान होते थे या बहुत खुश होते थे तब बड़े हनुमान मन्दिर ही जाया करते थे,उन्हीं से अपना सारा सुख दुख साझा करते रहे हैं,आज भी तुम्हें वहीं ले जाने की सोचे थे।”

” अरे वाह!! चलो हम भी मिल लेंगे अपने दोस्त के बाल सखा से।। पर सुनो भूल मत जाना राजा, पटला होने में इतनी मदद किये हो अब इस मामले में भी थोड़ी मदद कर दो,और किसी से कहना नही,समझे।।”

” हाँ मेरी माँ किसी से नही कहेंगे। और कल से तुम्हारी एक हफ्ते की एक और ट्रेनिंग शुरु कर देंगे,,उसके बाद वो भास्कर की क्या औकात तुम्हारे सामने।।भास्कर को मारो गोली सलमान खान भी पट जायेगा।।”

” अरे अरे अरे गोली क्यों मार रहे हो भई !! भास्कर सर ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ,रही बात सलमान की तो हमें सलमान खान पसंद ही नही….

बातों ही बातों में बड़े हनुमान मन्दिर पहुंच कर दोनों ने दर्शन किये,और सेंतराम के यहाँ से आलू टिक्की खा कर और पैक करा कर दोनो अपने अपने घर वापस आ गये।।

क्रमशः

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aparna..

मैं मैं हूँ!! जब तक तुम तुम हो!

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मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

तुमसे सारे रंग रंगीले
तुमसे सारे साज सजीले,
नैनों की सब धूप छाँव तुम,
होठों की मुस्कान तुम ही हो।
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

तुमसे प्रीत के सारे मौसम
तुमसे सूत,तुम ही से रेशम
तुमसे लाली,तुमसे कंगन,
मन उपवन के राग तुम ही हो
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !

जीवन का यह सार तुम्हारा,
मेरा सब संसार तुम्हारा,
गुण अवगुण मेरे सब जानो,
मुझमे बसे मेरे प्राण तुम ही हो।
मैं,मैं हूँ! जब तक तुम,तुम हो !।।

शुभकामनाएं … हिंदी दिवस की

महादेवी वर्मा

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जो तुम आ जाते एक बार

जो तुम आ जाते एक बार

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग

आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार

हँस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग

आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार

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समिधा-27

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   समिधा- 27

    केदारनाथ त्रासदी को घटे सात महीने बीत चुके थे। जिन्होंने अपने अपनों को खोया था वो उस त्रासदी को इन सात महीनों में भी नही भूल पा रहे थे, यही हाल उनका भी था जिनके अपने इस त्रासदी से वापस लौट चुके थे।

        वरुण मंदिर ट्रस्ट में स्थायी सदस्यता पा चुका था। उसके माता पिता ने भी इस बार न उसे रोका न टोका,और सहर्ष सहमति दे दी। कादम्बरी के परिवार ने ज़रूर कुछ टोकाटाकी करने की कोशिश की लेकिन वरुण का परिवार वरुण के सामने दीवार बन खड़ा रहा, फिर अपना सा मुहँ लेकर उन्हें भी लौटना ही पड़ा।
    कोलकाता के मंदिर में दो महीने बिताने के बाद वरुण और दो चार अन्य सेवादारों को मथुरा राधाकृष्ण मंदिर भेज दिया गया था।

    मंदिर में सुबह सवेरे उठ कर सारे मंदिर परिसर में झाड़ू लगाने के बाद पानी का छिड़काव कर वरुण अपने दो साथी सेवादारों के साथ पोंछा लगाया करता।
     मंदिर की ही पुष्पवाटिका से चुन चुन कर लाये फूलों की फिर सारे लोग मिल कर लंबी सी माला गूंथते और द्वारिकाधीश का श्रृंगार होता।
      दोपहर बाद सभी एक साथ बैठे भजन गाया करते।
   इस सब के साथ ही सुबह और शाम का समय वेदाध्ययन के लिए भी निश्चित था।
   वरुण को ये सारे कार्य प्रिय थे। वह इन सभी कार्यों को करते हुए अपने मन को शांत रखने का पूरा प्रयास करता और उसे इन कुछ महीनों में इन कार्यों में एक सुख मिलने लगा था एक शांति मिलने लगी थी ऐसा लगने लगा था कि वह अपने कृष्ण के आसपास है और कृष्ण सिर्फ उसके ही नहीं हर किसी के आसपास हैं। और इसीलिए धीरे-धीरे वरुण की श्रद्धा इस बात पर बढ़ने लग गई थी कि जो जिसके साथ होता है वह सब कृष्ण का रचा रचाया है और इसीलिए उससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता ।
  वरुण की यही सोच उसे धीरे-धीरे शांति की तरफ ले जा रही थी, लेकिन बीच-बीच में कभी अचानक एक चेहरा उसकी खुली आंखों में झांकने चला आता। जैसे पूछ रहा हो…-” मेरा क्या कसूर था जो तुम्हारे कृष्ण ने मुझे ऐसी सजा दी ?” ऐसे समय में वरुण अपने विचारों को झटक कर कोई ना कोई किताब खोल कर पढ़ने बैठ जाया करता। लेकिन इन सारी व्यस्तताओं के बाद भी बार बार एक जोड़ी पनीली आंखें उसका पीछा करती सी लगती जैसे कह रहीं हो “वापस आ जाओ!”  उसे अक्सर यूँ लगता कि वो मन से यही सब करना चाहता तो है पर उसकी आत्मा इस सब में शामिल ही नही होना चाहती। 
सुबह और शाम के समय के अतिरिक्त रात में भी जब उसे समय मिलता वह मंदिर परिसर के कोने में बैठ अपनी किताब को पढ़ने में डूब जाया करता। वेदों का अध्ययन करते करते धीरे-धीरे उसे हिंदू धर्म की जटिलताएं समझ में आने लगी थी।
   आज तक जिन रीति-रिवाजों को मानने के लिए वह अपनी मां का मजाक उड़ाया करता था और रीति-रिवाजों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को देख पढ़ कर समझ कर उसके ज्ञान चक्षु भी खुलने लगे थे।
    मंदिर का पूरा कार्य एक ट्रस्ट के अधीन था वह ट्रस्ट पूरे भारतवर्ष ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कृष्ण मंदिर की स्थापना कर चुका था। मंदिरों में होने वाले आय-व्यय के साथ ही दानदाताओं को अधिक से अधिक दान के लिए प्रेरित करने के लिए भी मंदिर ट्रस्ट को पढ़े लिखे शिक्षित वर्ग की आवश्यकता थी और अगर वरुण जैसे युवा इस कार्य में उनका सहयोग करें तो मंदिर ट्रस्ट को लाभ ही लाभ था इसलिए वरुण की तरफ मठाधीशों का कुछ अधिक ही झुकाव था।

   मंदिर में अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग पद सृजित बहुत से सेवादार ऐसे थे जो स्वेच्छा से जीवन पर्यंत सिर्फ सेवादार ही बने रह जाते थे।लेकिन कुछ उनमें से ऐसे भी थे जो सेवादार से ऊपर के कुछ 1 पदों तक जाकर रुक जाए करते थे। लेकिन वरुण जैसे उच्च शिक्षित युवाओं को मंदिर ट्रस्ट द्वारा सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ाते हुए मंदिर के मठाधीश तक के पद तक पहुंचाए जाने की व्यवस्था थी। वैसे मंदिर में जाति धर्म या गरीबी अमीरी के नाम पर किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं था। सभी के लिए समान कार्य बांटे गए थे , और सभी को अपने हिस्से के कार्य करने ही होते थे। अंतर बस इतना होता था कि शिक्षित लोग जो विद्या अध्ययन करने में सक्षम थे उन्हें वेदों का अध्ययन करवा कर उनसे प्रवचन आदि दिलवाए जाने की व्यवस्था की जाती थी।
     पिछले कुछ समय में ही वरुण ने बहुत सारी किताबों का अध्ययन कर लिया था और जैसे-जैसे अध्ययन करता जा रहा था उसका दिमाग भी विस्तृत होता जा रहा था।
       मंदिर परिसर हर किसी के लिए खुला था लोग दर्शनों के लिए आते मंदिर में चढ़ावा चढ़ाते, और चले जाते। सब के जाने के बाद हफ्ते में एक दिन चढ़े हुए सारे चढ़ाव की गणना की जाती और उसके बाद उस धनराशि को मंदिर ट्रस्ट के पास भेज दिया जाता।
    ट्रस्ट से हर महीने एक निश्चित धनराशि मंदिर में रहने वालों के खाने पीने आदि के लिए भेज दी जाती। इन सब का हिसाब योगेंद्र जी रखा करते थे।

   मंदिर परिसर बहुत विशाल था। चारों तरफ फैली वृहत वाटिका के बीचो बीच स्थापित मंदिर में पीछे तरफ कमरे बने हुए थे जहां सेवादार और बाकी के मंदिर कर्मचारी रहा करते थे।
      उसी परिसर में एक और हटकर विधवा आश्रम बना हुआ था जहां वृद्ध युवा और बाल विधवाये रहा करती थी। आश्रम के कर्मचारियों तथा अन्य लोगों के लिए भोजन पकाने बर्तन साफ करने आदि की जिम्मेदारी इन्हीं महिलाओं की थी । महिलाओं की संख्या कम अधिक होती रहती थी। वैसे तो एक बार जिस महिला को उसके घर वाले इस आश्रम में छोड़ जाते उसका वापस अपने घर लौट पाना असंभव ही था। इसलिए अधिकतर समय उस आश्रम में महिलाओं की संख्या में वृद्धि ही हुआ करती थी, संख्या में कमी तभी आती थी जब उनमें से कोई देवलोक को चली जाया करती थी।
     उनका जीवन कठिन नहीं कठिनतम था। क्योंकि उनके जीवन में वेद अध्ययन को स्थान नहीं दिया गया था। उनमें से अधिकतर वृद्ध महिलाएं अपने आपको कृष्ण समर्पित कर चुकी थी । इसलिए उनका मन सिर्फ कृष्ण को समर्पित लोगों की सेवा से ही प्रसन्न हो जाता था। लेकिन कुछ युवा और बाल विधाएं भी थी जिन्हें अच्छा खाने और अच्छा पहनने का शौक हुआ करता था। लेकिन उस स्थान में जहां उन्हें पर्याप्त आहार भी ना मिल पाता हो,उनके शौक कौन पूछता और कौन पूरे करता?

    वह औरतें एक रटी रटाई दिनचर्या का पालन करती हुई बस जीवन जीती चली जा रही थी! जिसका ना कोई आदि था ना अंत। बहुत बार ऐसा लगता जैसे वह वहां रहते हुए बस अपनी सांसें गिन रही हैं, कि किस तरह उनकी सांसो की अवधि पूरी हो और वह स्वयं कृष्ण के लोक पहुंच जाएं। कुछ महिलाओं ने एक आध बार वहां से निकलने की भी कोशिश की, लेकिन बाहर भी उनके पास कोई और आश्रय नहीं था दो-चार दिन बाद लौट कर वापस ही आ गई थी।
        जैसे ज़िन्दगी कट रही हो बस…. बिना जीने की आरज़ू के।
   लेकिन वरुण इन बातों से अनजान था….
….. पर अब अधिक समय नही बचा था कि वो इन सारी अव्यवस्थाओं से अपरिचित रह पाता…

******

   
     देव को गए वक्त बीत चुका था। जब उसके जाने का पता चला था उस समय उसके परिवार द्वारा किये कर्मकांड में पारो की माँ और बाकी सदस्य आये और जाते वक्त पारो की माँ देव की माँ के चरणों में लोट गयी….-” गरीब की बेटी का कोई आसरा नही होता बऊ दी! पहले ही बिना बाप की थी अब माथे से पति का साया भी सरक गया। पता नही इतनी बदकिस्मत लड़की क्यों मेरे घर ही पैदा हुई। इससे तो पैदा होते ही मर जाती तो सही होता,लेकिन फिर ये बदकिस्मती कैसे देखती?
  आपके पांव पड़ती हूँ, इसका आसरा मत छीनना। यहीं कहीं किसी कोने में पड़ी रहेगी। घर की नौकरानी को भी तो दो वक्त का खाना दिया ही जाता है। उससे अधिक की अब इसे दरकार भी कहाँ रही? “

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   बोलते-बोलते जाने कितनी बार वो भरभरा के रो पड़ीं। इतने कठोर शब्द मुहँ से भी तो नही निकल पा रहे थे। कैसी मर्मान्तक पीड़ा के साथ अपनी ही बेटी के लिए नौकरानी जैसा अलंकार जोड़ना पड़ा। किस्मत लड़की से ज्यादा तो उनकी खराब थी। पहले पति का दुख सहा फिर लक्ष्मी सी बेटी का …
  … इतनी छोटी सी उम्र में ये रंगविहीन साड़ी ! ये देखने से पहले दुर्गा माँ उसे उठा लेती तो कितना अच्छा होता। कम से कम अपनी ही बेटी का ये रूप तो न देखना पड़ता।
    दिल में तो आ रहा था कि बेटी को सीने से लगाये अपने साथ ले जाये। कैसे भी कर के अपने पास रख लेगी लेकिन अभी तो वो अकेली अपनी ससुराल की गुलामी में टूट रही है फिर अपने साथ अपनी फूल सी बेटी को वैसे ही टूटते कैसे देख पाएंगी?
   दूसरी बात जब घर भर मछली भात खा रहा होगा उसकी लाड़ली को सिर्फ शाक खा कर संतोष करना पड़ेगा। पान की कितनी शौकीन थी,अब तो वो भी कहाँ खा पाएगी।
   ये सारा सब अपनी आंखों से देखना उसके लिए मृत्युतुल्य कष्ट सहने के बराबर था।
   इससे तो अपनी ससुराल में रह कर क्या कर रही क्या नही इन सब बातों से तो उन्हें फुर्सत रहेगी।
  वैसे उनके मन में एक छोटा सा लालच और भी तो था…..
   देव का छोटा भाई दर्शन पारो से एक दो साल ही तो बड़ा था। अगर पारो यहीं अपनी ससुराल में रह गयी तो हो सकता है घर वालों के मन में पारो का ब्याह दर्शन से कर देने का विचार जाग जाए। और अगर ऐसा हो गया तो इससे अच्छा पारो के लिए क्या होगा भला।
   इतने गहन दुख के बीच एक बहुत छोटी सी खुशी उनके मन को उद्भासित कर गयी ..
…..-“ऐसा क्यों कह रही हो बऊ माँ। नौकरानी सी क्यों रहेगी भला। देव के पीछे अब यही तो हमारी देव है। पारोमिता जैसी अब तक रहती आयी है वैसे ही रहेगी।”

   देव की ठाकुर माँ का स्वर उस कमरे में गूंज गया और फिर घर के किसी सदस्य की पारो को वहाँ से हटाने या निकालने की हिम्मत नही हुई।

*****

  दिन कट रहे थे सिर्फ पारो के ही नही बल्कि घर के अन्य सदस्यों के भी।
  पहले पहल किसी ने पारो से कुछ नही कहा। वो अपने कमरे में सारा सारा दिन चुपचाप पड़ी देव को याद कर ऑंसू बहाती रहती।
   कभी खिड़की पर घंटो खड़ी रह जाती। यूँ लगता जैसे उसी का इंतज़ार कर रही हो।
  उसे पता नही क्यों अंदर से यही लगता कि समय को चीरता देव उसके पास वापस चला जायेगा।
कभी अचानक ही उसका मन ये मानने से इनकार कर देता की देव नही रहा।
वो उसकी कमीज़ें धोती अपनी साड़ी के साथ सुखाती और आयरन कर अलमीरा में सजा देती। जूते भी रोज़ रोज़ साफ करती और जब देखती की पहनने वाला तो दूर दूर तक नज़र नही आ रहा तो बिलख उठती।
    अब उसका खाना उसकी सास उसकी जेठानी के हाथों उसके कमरे में ही भिजवा दिया करतीं। शायद उन्हें मन ही मन लगने लगा था कि उन सब सुहागिनों के बीच बैठ पारो अपनी रूखी थाली का निवाला कैसे ले पाएगी। लेकिन पारो की जेठानी से ये पक्षपात जाने क्यों सहन नही हुआ जा रहा था।।
  रोज़ रोज़ उसकी रूखी सूखी थाली ऊपर लेकर जाना उसके मन को मसले दे रहा था, आखिर एक दिन घर भर की औरतों की नज़र बचा कर उसने मछली के झोल भरी कटोरी पारो की थाली में रखी और दाल की कटोरी में घी भर अपने आँचल से ढाँक ऊपर ले चली।
  पारो की तो नही लेकिन उसकी खुद की सास ने देख कर उसे आधी सीढ़ियों पर ही टोक दिया। पारो उस समय छज्जे पर कपड़े सूखा रही थी। उसने भी बड़ी माँ की रुबावदार आवाज़ सुन ली और ऊपर से झांकने लगी…-” ए आनंदी! की होलो? पारो के लिए क्या माछ लेकर जा रही हो? “

आनन्दी सकपका गई। उसे नही लगा था कि उसकी चोरी ऐसे पकड़ी जाएगी। उसने बहुत धीमी आवाज़ में अपनी बात रखी…-” उसकी अभी उम्र ही क्या है माँ। इतनी छोटी सी उम्र में इतना कुछ झेल गयी , अब कम से कम ठीक से खा पी तो सके। यही तो खाने पहनने की उम्र…”

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  उसकी बात बीच में ही काट कर उसकी सास लगभग उस पर चीख पड़ी…-“अब तुम आज की लड़कियां हमें नियम बताओगी, उसकी उम्र क्या है ये हमे बताने की ज़रूरत नही है।तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है हमने। चुपचाप माछेर झोल उठा कर थाली से बाहर कर दो। “

” धीमे बोलिए मां ,वो सुन लेगी। अच्छा नही लगेगा।”

” तुम्हें नियम भंग करते हुए अच्छा लगा न तो अब मुझे कोई लेना देना नही की किसे बुरा लगेगा और किसे नही। जो सच्चाई है सो है। अगर भगवान को उस पर इतना ही तरस था दयादृष्टि थी तो उसके पति को ऐसे अकालमृत्यु नही मिलती.।

   आगे की पंक्तियों के साथ ही भावुकता में बड़ी माँ रोने लगी,क्योंकि बेटा भले ही देवरानी का था लेकिन प्रेम तो उन्हें भी उससे बहुत था। और देव की असमय मृत्यु का दुख अब पारो पर गुस्से और नाराज़गी के रूप में उतारना शुरू हो रहा था।

आनन्दी समझ गयी कि इस वक्त सास से लड़ने में कोई लाभ नही है। वो चुपचाप मछली की कटोरी हटा कर फिर थाली ऊपर ले गयी….
… धीरे से उसने पारो के कमरे के दरवाज़े को धक्का दिया,पारो पलंग पर सिर टिकाए ज़मीन पर बैठी थी।
” आओ पारो !खाना खा लो!”
 
  पारो ने ऑंसू भरी आंखों से अपनी जेठानी को देखा और फिर बाहर देखने लगी…-“मेरी प्यारी छोटी बहन कुछ तो खा लो। देखो ऐसे भूखा रहने से क्या होगा। बल्कि तुम ऐसे भूखी रहोगी तो देव बाबू की भी आत्मा तड़प उठेगी। वो कैसे सुख से रह पाएंगे भला। चलो खा लो चुपचाप। बड़ी माँ की बातों को दिल से न लगा लेना। वो सब अभी बहुत दुखी हैं। उबर नही पाएं हैं ना । तुम तो समझ सकती हो।”

पारो ने हाँ में सिर हिला दिया और नीचे देखती चुप बैठी रही।
आनन्दी को उसी वक्त नीचे से किसी ने आवाज़ दी और वो एक बार फिर पारो से खा लेने का इसरार करती बाहर चली गयी।
पारो का थाली देखने का भी जी नही किया…  उसने धीरे से थाली सरका दी जैसे थाली से नाराजगी हो कि तुम उस समय क्योँ सामने नही इठलाई जब देव बाबू साथ थे और अपने हाथो से अपनी प्रेयसी अपनी पत्नी को खिलाना चाहते थे। उस वक्त इसी थाली ने क्यों चुपके से उसके कान में  नही कहा कि खा ले पारो! फिर इतना प्रेम करने वाला जीवन में कोई नही आएगा। “

  देव के बारे में सोचते हुए वो फफक के रो पड़ी। वहीं उस गांव से कई किलोमीटर दूर मथुरा में स्वामी वरुण के सामने सेवादार थाली परोस कर रख गया, पर जाने अंदर से वरुण को कैसी बेचैनी ने घेरा की उसने उस थाली को धीरे से आगे सरका दिया…-” स्वामी ऐसा क्यों? क्या आज भोजन नही लेंगे।”

” मालूम नही केवल लेकिन आज बिल्कुल भी खाने का जी नही कर रहा। अंदर से ऐसा लग रहा जैसे हृदय में किसी बात की पीड़ा सी उबर रही है। यूँ लग रहा कोई बहुत करीबी दुख में है, अपार दुख में और मैं उसकी कोई सहायता नही कर पा रहा हूँ। अब बस कृष्ण से यही प्रार्थना है कि वो जो कोई भी है उसे जल्दी से जल्दी मुझसे मिलवा दे, जिससे अपने मन की इस बेचैनी से छुटकारा पा सकूं।”

  वरुण क्या जानता था कि उसके कॄष्ण उसके प्रिय को उससे मिलवाने की भूमिका बांध ही चुके हैं…..

क्रमशः

aparna…..
  


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मैं हूँ…..

मैं खुशबू से भरी हवा हूँ
मै बहता जिद्दी झरना हूँ
कठिन आंच मे तप के बना जो
मै ऐसा सुन्दर गहना हूँ ।।

छोटा दिखता आसमान भी,
मेरे हौसलों की उड़ान पे,
रातें भी जो बुनना चाहे,
मैं ऐसा न्यारा सपना हूँ ।।

हरा गुलाबी नीला पीला
मुझसे हर एक रंग सजा है,
इन्द्रधनुष भी फीका लगता
प्रकृति की ऐसी रचना हूं ।।

मैं हूँ पत्नी ,मै हूँ प्रेयसी
मै हूँ  बेटी, मै ही बहू भी,
तुझको जीवन देने वाली
मै ही माँ,मै ही बहना हूं ।।

मैं हूँ मीठी धूप सुहानी,
मैं ही भीगी सी बयार भी,
मुझमें डूब के सब कुछ पा ले,
मै ऐसा अमृत झरना हूं ।।।

अपर्णा ।

ओ स्त्री: कभी खुद को भी जिया करो……..

जल्द आ रही है, मेरे ब्लॉग पर !!

बस यूं ही….

भीड़ से निकले तो सिग्नल ने पकड़ लिया,
ज़िन्दगी स्पीड ब्रेकर की नुमाइंदगी हो गयी….